Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

विश्व की अमूल्य धरोहर श्रीमद् भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक भाग है। महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने और लेखन भगवान श्री गणेश ने किया।

युद्ध के समय जब सेनाएं आमने-सामने खड़ी हो गईं ….तो अर्जुन के विषाद को दूर करने के लिए योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया जो आज भी व्यवहारिक जीवन की समस्याओं के लिए समाधानकारक है।

१. साहसी होना
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।
(अध्याय 2, श्लोक 3)

कायरता, कायरता है। चाहे वह करुणाजनित हो, या भय जनित। अत: अपने स्वत्व और अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। अन्याय का सदैव प्रतिकार करना चाहिए और पलायन नहीं पुरुषार्थ का चयन करना चाहिए।

२. कर्मठ होना
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
माकर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संड्गोत्स्वकर्माणि।।
(अध्याय 2, श्लोक 47)

केवल मनुष्य को ही यह सौभाग्य प्राप्त है कि वह नए कर्म करने के लिए स्वतंत्र है। जिससे उन्नति के शिखर पर आरूढ़ होकर उपलब्धियों के कीर्तिमान रचकर इतिहास में अद्वितीय स्थान प्राप्त कर सकता है। अत: अकर्मण्य नहीं, कर्मठता से कार्य करते रहना चाहिए।

३. स्वविवेक से निर्णय लेना
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैमदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।
(अध्याय 18, श्लोक 6३)

सलाह और विचार-विमर्श तथा मार्गदर्शन भले ही सबसे लेते रहें, लेकिन निर्णय स्वयं की बुद्धि से लेना चाहिए। श्री कृष्ण ने अर्जुन को पूरा ज्ञान देने के बावजूद यह स्वतंत्रता दी थी कि वह स्वविवेक से निर्णय ले और कार्य करे। पराश्रित नहीं, स्वआश्रित होने का आह्वान कर व्यक्ति को स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनने का संदेश दिया है।
४. मधुर और हितकर वाणी
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्भ्यसनं चैव वांगमयं तप उच्यते।।
(अध्याय 17, श्लोक 15)

तप तीन प्रकार के बताए गए है- शरीर, वाणी और मन। तीनों का उपयोग लोकहित में करना चाहिए। वाणी मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र है। इससे व्यक्ति सारे संसार को अपना मित्र बना सकता है या शत्रु बना सकता है। अत: बोली की महत्ता, शब्दों का प्रभाव और वाणी को नियंत्रित और मर्यादित रखें।
५. दुर्गुणों का त्याग करना
दंभो दर्पोभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदामासुरीम्।।
(अध्याय 16, श्लोक 4)

पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान- इनसे मनुष्य को दूर रहना चाहिए। सदगुणों को अपने जीवन में उतारना चाहिए जिससे जीवन में परम शांति का अनुभव होता है।
६. ज्ञान पिपासु और जिज्ञासु होना
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन: ।।
(अध्याय 4, श्लोक 34)

सच्चा ज्ञान आसानी से नहीं मिलता क्योंकि केवल सूचनाओं को पढ़ कर ज्ञानी नहीं बना जा सकता। इसके लिए विशेषज्ञों के पास तथा विधा पारंगतों के पास विनम्रता और श्रद्धापूर्वक हमें जाना चाहिए। तभी सही लक्ष्य एवं वास्तविक शिखर स्पष्ट दिखाई देने लगेगा।
नहि ज्ञानेने सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (अध्याय 4, श्लोक 38)
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला दूसरा कोई साधन नहीं है।
श्रद्धावॉंल्लभते ज्ञानं… (अध्याय 4, श्लोक 39)
ज्ञान के प्रति जिज्ञासा होगी तभी ज्ञान प्राप्त होगा।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति। (अध्याय 4, श्लोक 39)
क्योंकि शांति साधनों से नहीं ज्ञान से प्राप्त होती है।
७. व्यवहारिक ज्ञान में कुशल
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्म्यहम्।।
(अध्याय 4, श्लोक 11)

मनुष्य को व्यवहार करते समय बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि जैसा व्यवहार करोगे, वैसा ही तुम्हारे साथ भी होगा।
८. निर्भय होना
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चय:।।
(अध्याय 2, श्लोक 37)

निर्भीक होकर कर्म करने से असफलता भी कीर्ति यश और मान दिलाती है। भयग्रस्त मन-मस्तिष्क से किए कए काम में सफलता मिल भी जाए तो वह सम्मानीय, वंदनीय नहीं हो सकती।

९. व्यक्तित्व का विकास
दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।
(अध्याय 2, श्लोक 56)

आदर्श व्यक्तित्व वाला व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में विचलित नहीं होता। राग, भय, क्रोध- जब समाप्त हो जाते हैं तो व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला हो जाता है। तथा वह संकट और संतापों से प्रतिकूलता और अनुकूलता में संतुलन बनाए रखेगा।
१०. स्वयं के प्रति उत्तरदायी
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।
(अध्याय 6, श्लोक 5)

अपने उत्कर्ष एवं अपकर्ष के लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी होता है। दूसरे का अहित किए बिना स्वयं का उद्धार अपने प्रयत्न और बुद्धि बल से करना चाहिए। क्योंकि मनुष्य आप ही अपना मित्र और आप ही अपना शत्रु है।
११. वफादारी से कार्य करना
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
(अध्याय 9, श्लोक 22)

यह एक व्यवहारिक सत्य है। जो व्यक्ति अपने स्वामि की कृपा का चिंतन करते हुए पूरी ईमानदारी और निष्ठा से काम करता है उसे स्वामि का पूर्ण संरक्षण मिलता है और स्वामि सदैव उसकी सुख-सुविधा का ध्यान रखता है।
१२. एकाग्रचित्त कार्य करना
असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं चलम्।
अभ्याभ्सेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।
(अध्याय 6, श्लोक 35)

किसी भी संकल्प को पूरा करने के लिए मन का स्थिर और अचल होना आवश्यक है। उद्देश्य प्राप्ति के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। मन को बार बार अन्य बिंदुओं से हटाकर अपने लक्ष्य पर केंद्रित करने की प्रक्रिया को दोहराते रहना चाहिए। इस प्रक्रिया का चमत्कारिक प्रभाव देखने को मिलता है। और कार्य तल्लीनता से संपन्न होता है। इसलिए लक्ष्य के प्रति रुचि जागरुक करना चाहिए।
१३. तनाव रहित रहें
अश्योच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता:।।
(अध्याय 2, श्लोक 11)

आगत-विगत कि चिंता से मुक्त होकर कर्मपथ पर आगे बढ़ते जाना चाहिए। घटनाएं प्रकृति के घटनाक्रम की कड़ी हैं और वे समयानुसार घटती रहती हैं। अनावश्यक चिंताओं में उलझना जीवन के अमूल्य समय को नष्ट करना है। इसलिए तनाव रहित होकर अपना कर्म करते जाना चाहिए।
१४. प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:।
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ।।
(अध्याय 3, श्लोक 11)

पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्रि, वनस्पति आदि जीवन के आधार स्तंभ हैं। इनके बिना जीवन संभव नहीं। और हमारी संस्कृति में इन्हें देवता माना गया है। सृष्टि में साम्य बनाए रखने के लिए जीवन, जगत एवं प्रकृति में साम्य जरूरी है। इसलिए प्रकृति का सम्मान करो और पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करो।
१५. स्वकर्म को प्राथमिकता
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
(अध्याय 18, श्लोक 45)

दूसरे का कर्म यदि अपने कर्म से श्रेष्ठ भी प्रतीत हो तो भी अपना कर्म त्याग कर उसे अपनाने के लिए आतुर नहीं होना चाहिए। अपने कर्म में प्रवीणता हासिल कर के उसी में अपनी पहचान बनानी चाहिए। स्वकर्म को करते हुए ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
१६. संचयवृत्ति का त्याग
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।
(अध्याय 3, श्लोक 13)

जीवन में परोपकार और समाज कल्याण का व्रत भी लेना चाहिए क्योंकि मनुष्य जो भी अर्जित करता है उसमें समाज का योगदान होता है। इसलिए समाज का भी उसपर अधिकार है। इसलिए उसका कुछ अंश समाजसेवा में भी लगाया जाना चाहिए। यह एक आदर्श समाजवाद का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

१७. राग-द्वेष रहित जीवन
अद्वेष्टा सर्वभूतानां (अध्याय 12, श्लोक 13)
किसी भी प्राणी से राग-द्वेष न रखें
निर्वैर: सर्वभूतेषु (अध्याय 11, श्लोक 55)
बैर-भाव रहित होकर रहो
सर्वभूतहितेरता: (अध्याय 5, श्लोक 25)
सभी प्राणियों का कल्याण करो
ये तीनों सूत्र तीन महा मंत्र हैं। जिनके आचरण करने से व्यक्ति और समाज शांत और सुखी रहेगा। क्योंकि बैर-भाव, राग-द्वेष सारे झगड़े-फसाद की जड़ है।
१८. कठोर प्रभावी नीति से प्रतिद्वंद्वता का सामना
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युभ्त्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्म्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
(अध्याय 4, श्लोक 7,8)

दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं- सज्जन और दुर्जन। जब तक सज्जन जागरुक और सक्रीय होते हैं तब दुष्ट अपनी दुष्ट प्रवृतियों से समाज को त्रस्त नहीं कर पाते। लेकिन सज्जनों की थोड़ी सी निष्क्रीयता और उदासीनता दुष्टों का प्रभाव बढ़ाने लगती है। फिर सज्जन बचाव का मार्ग अपनाने लगते हैं और हताश और निराश होकर सदकार्यों को छोड़ समाज को दुष्टों के भरोसे छोड़ देते हैं। दुष्टों पर नियंत्रण रखने और अपना कार्य जारी रखने के लिए कठोर और प्रभावी नीति अपनानी चाहिए।
१९. स्वस्थ तन, स्वस्थ मन
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।
(अध्याय 6, श्लोक 17)

जीवन में प्रगति के लिए मन-मस्तिष्क के साथ साथ तन का स्वस्थ रहना भी जरूरी है। कोई भी कार्य शरीर के द्वारा किया जाता है। यदि शरीर अस्वस्थ है तो वह कभी भी कोई कार्य नहीं कर पाएगा। अत: शरीर साधना बेहद जरूरी है।
२०. कर्म और लोक कल्याण में समन्वय
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मनुस्मर युद्ध च।
(अध्याय 8, श्लोक 7)

जीवन में यदि सफलता चाहते हैं तो कर्म और लोक कल्याण में समन्वय जरूरी है। तभी जीवन का समग्र विकास हो पाएगा। दोनों में से यदि कोई एक ही कार्य करते रहें या तो लोक कल्याण या कर्म , तो दोनों ही स्थितियां कभी भी आदर्श नहीं मानी जाती । इसलिए इनमें सामन्जस्य होना जरूरी है।

२१. चारित्रिक बल से आदर्श नेतृत्व
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
(अध्याय 3, श्लोक 21)

कोई भी राष्ट्र केवल आर्थिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रकृति से उन्नत नहीं हो जाता। जब तक कि वह आध्यात्मिक एवं नैतिक रूप से सबल नहीं हो उसकी प्रगति अधूरी है। वर्तमान में भारत के पास सब कुछ है परंतु धीरे-धीरे नैतिक और चारित्रिक बल की कमी हमें महसूस होने लगी है। अत: चरित्रवान बनकर आदर्श नेतृत्व प्रदान करना होगा, क्योंकि जो श्रेष्ठ पुरुष आचरण करते हैं लोग भी उनका अनुसरण करते हैं। अपने आचरण से ऐसे मूल्य स्थापित करने चाहिए जिनसे अन्य लोग प्रेरणा ले सकें।

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

अरुण सुक्ला

परमाणु बम का जनक – सनातनी भारत

आधुनिक परमाणु बम का सफल परीक्षण 16 जुलाई 1945 को New Mexico के एक दूर दराज स्थान में किया गया था|

इस बम का निर्माण अमेरिका के एक वैज्ञानिक Julius Robert Oppenheimer के नेतृत्व में किया गया था

Oppenheimer को आधुनिक परमाणु बम के निर्माणकर्ता के रूप में जाना जाता है, आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है की इस परमाणु परीक्षण का कोड नाम Oppenheimer ने त्रिदेव (Trinity) रखा था,

परमाणु विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया में २३५ भार वला यूरेनियम परमाणु,बेरियम और क्रिप्टन तत्वों में विघटित होता है। प्रति परमाणु ३ न्यूट्रान मुक्त होकर अन्य तीन परमाणुओं का विखण्डन करते है। कुछ द्रव्यमान ऊर्जा में परिणित हो जाता है। ऊर्जा = द्रव्यमान * (प्रकाश का वेग)२ {E=MC^2} के अनुसार अपरिमित ऊर्जा अर्थात उष्मा व प्रकाश उत्पन्न होते है।

Oppenheimer ने महाभारत और गीता का काफी समय तक अध्ययन किया था और हिन्दू धर्मं शास्त्रों से वे बेहद प्रभावित थे १८९३ में जब स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में थे, उन्होने वेद और गीता के कतिपय श्लोकों का अंग्रेजी अनुवाद किया।

यद्यपि परमाणु बम विस्फोटट कमेटी के अध्यक्ष ओपेन हाइमर का जन्म स्वामी जी की मृत्यु के बाद हुआ था किन्तु राबर्ट ने श्लोकों का अध्ययन किया था। वे वेद और गीता से बहुत प्रभावित हुए थे। वेदों के बारे में उनका कहना था कि पाश्चात्य संस्कृति में वेदों की पंहुच इस सदी की विशेष कल्याणकारी घटना है।

उन्होने जिन तीन श्लोकों को महत्व दिया वे निम्र प्रकार है।

१. राबर्ट औपेन हाइमर का अनुमान था कि परमाणु बम विस्फोट से अत्यधिक तीव्र प्रकाश और उच्च ऊष्मा होगी, जैसा कि भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को विराट स्वरुप के दर्शन देते समय उत्पन्न हुआ होगा।

गीता के ग्यारहवें अध्याय के बारहवें श्लोक में लिखा है-

दिविसूर्य सहस्य भवेयुग पदुत्थिता यदि
मा सदृशीसा स्यादा सस्तस्य महात्मन: {११:१२ गीता}

अर्थात – आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश उत्पन्न होगा वह भी वह विश्वरुप परमात्मा के प्रकाश के सदृश्य शायद ही हो।

२. औपेन हाइमर के अनुसार इस बम विस्फोट से बहुत अधिक लोगों की मृत्यु होगी, दुनिया में विनाश ही विनाश होगा।

उस समय उन्होंने गीता के गीता के ग्यारहवें अध्याय के ३२ वें श्लोक में वर्णित बातों का सन्दर्भ दिया –

कालोस्स्मि लोकक्षयकृत्प्रवृध्दो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत:।
ऋ तेह्यपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येह्यवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।। {११:३२ गीता}

अर्थात – मैं लोको का नाश करने वाला बढा हुआ महाकाल हूं। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं,अत: जो प्रतिपक्षी सेना के योध्दा लोग हैं वे तेरे युध्द न करने पर भी नहीं रहेंगे अर्थात इनका नाश हो जाएगा।

३. औपेन हाइमर के अनुसार बम विस्फोट से जहां कुछ लोग प्रसन्न होंगे तो जिनका विनाश हुआ है वे दु:खी होंगे विलाप करेंगे,जबकि अधिकांश तटस्थ रहेंगे। इस विनाश का जिम्मेदार खुद को मानते हुए वे दुखी हुए, परन्तु उन्होंने गीता में वर्णित कर्म के सिद्धांत का प्रतिपालन किया

उन्होंने गीता के सबसे प्रसिद्ध द्वितीय अध्याय के सैंतालिसवें श्लोक का सन्दर्भ दिया।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङ्गोह्यस्त्वकर्माणि।। {२:४७ गीता}

अर्थात – तू कर्म कर फल की चिंता मत कर। तू कर्मो के फल हेतु मत हो, तेरी अकर्म में (कर्म न करने में) आसक्ति नहीं होनी चाहिए!

उन्होंने अपनी डायरी में स्वयं की मनोस्तिथि लिखी , और इस परीक्षण का कोड नेम इन्ही ३ श्लोको के आधार तथा भगवान ब्रम्हा विष्णु महेश के नाम पर ट्रिनिटी रखा…

तत्कालीन अमेरिकी सरकार नहीं चाहती थी की कोई और सभ्यता तथा संस्कृति आधुनिक परमाणु बम की अवधारणा का का श्रेय ले जाए…. इसीलिए इस परीक्षण के नामकरण की सच्चाई को उन्होंने Oppenheimer को छुपाने के लिए कहा…. परन्तु जापान में परमाणु बम गिरने के बाद Oppenheimer ने एक इंटरव्यू में ये बात स्वीकार की थी……. विकिपीडिया भी दबी जुबान में ये बात बोलता है…
इसके अतिरिक्त 1933 में उन्होंने अपने एक मित्र Arthur William Ryder, जोकि University of California, Berkeley में संस्कृत के प्रोफेसर थे, के साथ मिल कर भगवद गीता का पूरा अध्यन किया और परमाणु बम बनाया 1945 में | परमाणु बम जैसी किसी चीज़ के होने का पता भी इनको भगवद गीता, रामायण तथा महाभारत से ही मिला, इसमें कोई संदेह नहीं | Oppenheimer ने इस प्रयोग के बाद प्राप्त निष्कर्षों पर अध्यन किया और कहा की विस्फोट के बाद उत्पन विकट परिस्तियाँ तथा दुष्परिणाम जो हमें प्राप्त हुए है ठीक इस प्रकार का वर्णन भगवद गीता तथा महाभारत आदि में मिलता है |

बाद में Oppenheimer के खुलासे के बाद भारी पैमाने पर महाभारत और गीता आदि पर शोध किया गया उन्हें इस बात पर बेहद आश्चर्य हुआ की इन ग्रंथो में “ब्रह्माश्त्र” नामक अस्त्र का वर्णन मिलता है जो इतना संहारक था की उस के प्रयोग से कई हजारो लोग व अन्य वस्तुएं न केवल जल गई अपितु पिघल भी गई| ब्रह्माश्त्र के बारे में हमसे बेहतर कौन जान सकता है इसका वर्णन प्रत्येक पुराण आदि में मिलता है… जगत पिता भगवान ब्रह्मा द्वारा असुरो के नाश हेतु ब्रह्माश्त्र का निर्माण किया गया था…
रामायण में भी मेघनाद से युद्ध हेतु श्रीलक्ष्मण ने जब ब्रह्माश्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कह कर रोक दिया की अभी इसका प्रयोग उचित नही अन्यथा पूरी लंका साफ़ हो जाएगी |

इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में परमाण्विक बमों के प्रयोग होने के प्रमाणों की कोई कमी नही है । सिन्धु घाटी सभ्यता (मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि) में अनुसन्धान से ऐसी कई नगरियाँ प्राप्त हुई है जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व तक अस्तित्व में थी| वहां ऐसे कई नर कंकाल इस स्थिति में प्राप्त हुए है मानो वो सभी किसी अकस्मात प्रहार में मारे गये हों… इनमें रेडिएशन का असर भी था | वह कई ऐसे प्रमाण भी है जो यह सिद्ध करते है की किसी समय यहाँ भयंकर ऊष्मा उत्पन्न हुई जो केवल परमाण्विक बम या फिर उसी तरह के अस्त्र से ही उत्पन्न हो सकती है

उत्तर पश्चिम भारत में थार मरुस्थल के एक स्थान में दस मील के घेरे में तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव्ह राख की मोटी सतह पाई जाती है। वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी परमाणु विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे। एक शोधकर्ता के आकलन के अनुसार प्राचीनकाल में उस नगर पर गिराया गया परमाणु बम जापान में सन् 1945 में गिराए गए परमाणु बम की क्षमता से ज्यादा का था।

मुंबई से उत्तर दिशा में लगभग 400 कि.मी. दूरी पर स्थित लगभग 2,154 मीटर की परिधि वाला एक अद्भुत विशाल गड्ढा (crater), जिसकी आयु 50,000 से कम आँकी गई है, भी यही इंगित करती है कि प्राचीन काल में भारत में परमाणु युद्ध हुआ था। शोध से ज्ञात हुआ है कि यह गड्ढा crater) पृथ्वी पर किसी 600.000 वायुमंडल के दबाव वाले किसी विशाल के प्रहार के कारण बना है किन्तु इस गड्ढे (Crater) तथा इसके आसपास के क्षेत्र में उल्कापात से सम्बन्धित कुछ भी सामग्री नहीं पाई जाती। फिर यह विलक्षण गड्ढा आखिर बना कैसे? सम्पूर्ण विश्व में यह अपने प्रकार का एक अकेला गड्ढा (Crater) है।

महाभारत में सौप्तिक पर्व अध्याय १३ से १५ तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिये गए है|

महाभारत युद्ध का आरंभ 16 नवंबर 5561 ईसा पूर्व हुआ और 18 दिन चलाने के बाद 2 दिसम्बर 5561 ईसा पूर्व को समाप्त हुआ उसी रात दुर्योधन ने अश्वथामा को सेनापति नियुक्त किया । 3 नवंबर 5561 ईसा पूर्व के दिन भीम ने अश्वथामा को पकड़ने का प्रयत्न किया ।

{ तब अश्वथामा ने जो ब्रह्मास्त्र छोड़ा उस अस्त्र के कारण जो अग्नि उत्पन्न हुई वह प्रलंकारी थी । वह अस्त्र प्रज्वलित हुआ तब एक भयानक ज्वाला उत्पन्न हुई जो तेजोमंडल को घिर जाने मे समर्थ थी ।

तदस्त्रं प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमंडल संवृतम ।। ८ ।। }

{ इसके बाद भयंकर वायु चलने लगी । सहस्त्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे ।
आकाश में बड़ा शब्द (ध्वनि ) हुआ । पर्वत, अरण्य, वृक्षो के साथ पृथ्वी हिल गई|

सशब्द्म्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम । चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा ।। १० ।। अध्याय १४ }

यहाँ वेदव्यास जी लिखते हैं कि –

“जहां ब्रह्मास्त्र छोड़ा जाता है वहीं १२ वषों तक पर्जन्यवृष्ठी (जीव-जंतु , पेड़-पोधे आदि की उत्पति ) नहीं हो पाती

सनातनी भारत के विलक्षण विज्ञानं को नमन है…।

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

बहुत ही सुंदर समसामयिक पद्य रचना —

जिस गीता को गा केशव ने,
जग को राह दिखाई थी।
जिसका पालन कर अर्जुन ने,
धर्म ध्वजा लहराई थी।।

आंख बंद कर आर्यभूमि ने,
जिसपर है विश्वास किया।
जिसका पालन कर वीरों ने,
है अधर्म का नाश किया।।

वह गीता लेकर हाथों में,
कैसे कोई भ्रमित हुआ❓
किञ्चित पढ़ा नहीं गीता को,
ज्ञान तभी सीमित हुआ।।

धर्म सदा कहता है प्रतिपल,
दानव कुल का नाश करो!
कब सिखलाया है गीता ने,
सबका साथ विकास करो❓

सबको सह रखने की जिद में,
अपना अक्सर खोता है।
मानवता का साथी बोलो,
दानव कुल कब होता है❓

मातृभूमि के खण्डन के,
नित नये व्यूह जो रचते हैं !
संविधान का कवच पहनकर ,
प्रतिदिन वह बच लेते हैं।।

तुमने पूरा जोर लगाया,
साथ न उनका है पाया।
कुछ लोमड़ियों के लालच में,
क्यों सिंहों का बलिदान कराया❓

शक्ति मिली है महादेव से,
उसका पूर्ण प्रयोग करो।
पढ़ने से ज्यादा गीता का,
शासन में उपयोग करो।।

आर्यभूमि के अरि हैं जितने,
उनका पूर्ण विनाश करो।
चलकर गीता के पथ राजन्,
अब अधर्म का नाश करो।।

— साभार संकलित
मूल रचनाकार को अनंत साधुवाद

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

ગીતાની શરૂઆત “ધૃતરાષ્ટ્ર ઉવાચ”થી થાય છે, અને અંત “સંજય ઉવાચ”થી થાય છે. એનો અર્થ, ગીતા વાંચ્યા પહેલાં આપણે ધૃતરાષ્ટ્ર જેવા આંધળા છીએ, પણ ગીતા વાંચ્યા અને સમજ્યા પછી આપણને સંજય દૃષ્ટી મળે છે.

ગીતા છંદોબધ્ધ રચના છે. પ્રથમ શ્ર્લોકની શરૂઆત છે, “ધર્મક્ષેત્રે કુરૂક્ષેત્રે”. હવે છંદનો ભંગ કર્યા વગર એ લખી શકત “કુરૂક્ષેત્રે ધર્મક્ષેત્રે”, પણ એવું નથી કર્યું. કદાચ એમાં એવો સંદેશ છે કે આપણે આ દુનિયામાં આવીએ છીએ ત્યારે શરીર અને મનથી આપણે ધર્મક્ષેત્ર જેવા છીએ,એને કુરૂક્ષેત્ર તો આપણે જીવન દરમ્યાન બ નાવીએ છીએ.

બીજા એક શ્ર્લોકમાં લખ્યું છે, “પરિત્રાણાય સાધુનામ, વિનાશાય દુષ્કૃતામ”. અહીં પણ પરિત્રાણાય સાધુનામ પહેલાં લખ્યું છે, દુષ્ટોને મારવાની વાત પછી કરી છે. ભગવાનનો મુખ્ય ઉદ્દેશ સારા માણસોનું રક્ષણ કરવાનો છે, અને એના માટે જરૂર પડે ત્યારે દુષ્ટોનો નાશ કરે છે.

ગીતા ટુ-વે ‘સંવાદ’ છે. કૃષ્ણ અને અર્જુન મિત્રો છે, બન્નેનો અલગ અલગ મત છે, એટલે ચર્ચાના રૂપમાં દલીલો થાય છે,પણ ક્યાંયે એકબીજાને ઉતારી પાડવાનો પ્રયાસ નજરે પડતો નથી. ક્યાંયે એકબીજા ઉપર ગુસ્સે થતા નથી. અર્જુન શંકાઓના રૂપમાં સવાલ કરે છે, અને કૃષ્ણ સમાધાનના રૂપમાં જવાબ આપે છે. આમ ગીતા બે સજ્જન માણસો વચ્ચે ચર્ચા કઈ રીતે થવી જોઈએ એનું એક ઉદાહણ છે.

ગીતાની શરૂઆતમાં અર્જુન નહીં લડવા માટેની તર્કબધ્ધ દલીલો કરે છે. શ્રીકૃષ્ણ બધું ચુપચાપ સાંભળી લે છે, વચ્ચે ટોકતા પણ નથી અને કંઈ બોલતા પણ નથી. જ્યારે અર્જુન થાકીને સલાહ માગે છે ત્યારે જ શ્રીકૃષ્ણ સમજાવવાની શરૂઆત કરે છે. આ ગીતાનો પહેલો પાઠ કહી શકાય, કે વણમાગી સલાહ આપવી નહીં.

અર્જુન ક્ષત્રિય છે, એટલે અન્યાય સામે લડવાનો એનો ધર્મ છે. આ વાત કૃષ્ણ અર્જુનને સમજાવીને કહે છે, એની ઠેકડી ઉડાવીને નથી કહેતા. સાચી વાત પણ સારી રીતે કહેવી જોઈએ, એ ગીતાની બીજી શીખ છે. ગીતા એ પણ શીખવે છે કે બે મિત્રો વચ્ચે મદભેદ હોય તો પણ શિષ્ટાચાર છોડીને વર્તવું ન જોઈએ.

ગીતામાં એકની એક વાત ફરી ફરી કહેવામાં આવે છે. કૃષ્ણ પોતાની દલીલ અર્જુનના મનમાં ઠસાવવા માટે એકની એક વાત અલગ અલગ રીતે કહે છે, જ્યારે એમને ખાત્રી થાય છે કે અર્જુન આ વાત હવે સમજી ગયો છે, ત્યારે એ બીજી વાતો કહે છે. શિક્ષકોએ આ વાત ગીતામાંથી સમજવાની જરૂર છે. અર્જુન વચ્ચે વચ્ચે અનેક શંકાઓ વ્યક્ત કરે છે, અનેક સવાલો પૂછે છે, છતાં કૃષ્ણ કંટાળ્યા વિના શાંતિથી દરેક સવાલનો જવાબ આપે છે. સારા ગુરૂએ શિષ્ય પ્રત્યે આવો ભાવ કેળવવો જોઈએ.

શ્રીકૃષ્ણ અર્જુનની લડાઈ લડતા નથી, એને લડવા માટે તૈયાર કરે છે. તેનો અર્થ એ થયો કે દરેક માણસે પોતે જ પોતાની લડાઈ લડવી પડે.ભગવાન આપણા બદલે લડવા માટે ન આવે. યુદ્ધમાં વિજયી થવા માટેના માર્ગો ભગવાન બતાવે પણ યુધ્ધ તો આપણે જ લડવું પડે.

ગીતામાં માત્ર ધર્મની વાત નથી, એ જીવન જીવવાની રીત બતાવે છે.ગીતા માત્ર પરલોકની વાત નથી કરતી, આ લોકમાં કેમ સુખ, શાંતિ અને તંદુરસ્તી મળે, એની વાત કહે છે.ગીતા વૃધ્ધાવસ્થામાં સમજવાની કૃતિ નથી, એ બાળપણથી આત્મસાત કરવા જેવી શીખામણ આપે છે.

ગીતા જીવનની વાસ્તવિકતા સ્વીકારીને પરમાર્થ સાધવાની વાત કરે છે. જીવન મળ્યું એટલે તેને જીવવું પડશે, અને જીવવા માટે સંઘર્ષ કરવો પડશે, પણ સંઘર્ષ કઈ રીતે કરવો એ ગીતા શીખવે છે.

હિન્દુ ધર્મમાં અનેક ફાંટા અને અનેક પંથો હોવા છતાં, પ્રત્યેક પંથે અને પ્રત્યેક ફાંટાએ ભગવદ ગીતાને માન્યતા આપી છે. ગીતાનો સંદેશ લોકોને સહેલાઈથી ગળે ઉતરે છે.

ગીતામાં કહેલી વાતોમાં પર્યાયના રૂપમાં બાંધછોડની ગુંજાઈશ દેખાય છે. ગીતાએ દર્શાવેલા જીવન જીવવાના અનેક માર્ગોમાંથી કોઈપણ એક માર્ગ પસંદ કરી આગળ વધવાની છૂટ અન્ય કોઈ ધર્મગ્રંથમાં ભાગ્યે જ હશે.

જે ગ્રંથમાં ‘મામેકં શરણં વ્રજ’ જેવી ઇશ્વરને અનુસરવાની અચળ આજ્ઞા છે,એમાં જ ‘યથેચ્છસિ તથા કુરૂ’ (તને જેમ યોગ્ય લાગે તેમ કર!) વાળી મુકત મોકળાશ પણ છે!

ગીતા નિષ્ક્રિય બનીને કર્મનો ત્યાગ કરવાને બદલે કર્મનો મોહ ત્યાગવાની વાત કરે છે. ગાંધીજીએ કહ્યું છે, ‘જે કર્મ છોડે એ પડે, કર્મ કરી તેના ફળને છોડે એ ચડે!’. ગીતાનું મઘ્યબિંદુ હોય તો એ છે ‘અનાસક્તિ’. આખી ગીતાનો સારાંશ એક જ શબ્દમાં આપવો હોય તો એ શબ્દ છે ‘સ્થિતપ્રજ્ઞ’.

રમતમાં હમેશાં જીત જ થાય તે શક્ય નથી, તેમ સંઘર્ષમાં હંમેશાં સફળ જ થવાય તેમ ન માની લેવું. તેથી ગીતા ફળની અપેક્ષા રાખ્યા વિના કર્મ કરવાની વાત કરે છે. એનો અર્થ એ નથી કે કરેલાં કર્મ મિથ્યા છે, અને તેનું ફળ નહિ મળે. ફળ તો અવશ્ય મળશે, પણ તે તમારી અપેક્ષા પ્રમાણેનું ન પણ હોય. વ્યહવારમાં તો આપણે હંમેશાં બોલીએ છીએ કે આપણે તો આ કામ ઈમાનદારીથી કર્યું છે,જોઈએ હવે પ્રભુ કેવો બદલો આપે છે. આ માત્ર બોલવાની વાત નથી, જીવનના એકે એક કામ માટે આ વૃતિ કેળવવાની અને અમલમાં લાવવાની વાત છે.

ગીતાએ જીવનનો સંઘર્ષ ક્યાં સુધી થાય અને ક્યારે શસ્ત્રો હેઠાં મૂકી દઈને શરણાગતિ સ્વીકારી લેવી પડે એ વાત કરીને માનવીના પુરુષાર્થની સીમા બતાવી દીધી છે.

ગીતા મન ઉપર બુધ્ધિથી કાબુ રાખવાની વાત કરે છે.

આપણી અંદર પાંડવો જેવા સદગુણ અને કૌરવો જેવા દુર્ગુણો છે.આ બધા આપણી અંદર એક સાથે રહેતા હોવાથી આપણને એ બધાને સાચવવાની આદત પડી જાય છે, અને લડાઈ કરવાથી કતરાઈએ છીએ. ગીતા કહે છે, આ ખોટું છે, મક્કમતાથી બુરાઈઓ સામે લડાઈ કરી એમાંથી મુક્તિ મેળવવી જોઇએ. આપણે અર્જુનની જેમ આનાકાની ન કરીએ એટલા માટે ગીતા આપણને કૃષ્ણ બનીને માર્ગ દેખાડે છે.

પ્રકૃતિમાંથી આપણને કેટલી બધી અમુલ્ય વસ્તુઓ મફતમાં મળે છે. સૂર્યનો પ્રકાશ, જીવવા માટે જરૂરી ઓક્સીજન, પાણી; આપણે જો આના બદલામાં પ્રકૃતિને કંઈ ન આપીએ તો આપણી ગણત્રી ચોરમાં થવી જોઈએ. પુરૂષ અને પ્રકૃતિ વચ્ચે પ્રમાણિક આપ લે કરવાથી જ પૃથ્વી ઉપરનું જીવન ટકી રહેશે. પુરૂષ અને પ્રકૃતિ એક જ પરમાત્માના અંશ છે. જો આ વાત સ્વીકારી લેવામાં આવે તો માણસ અને માણસ વચ્ચેના ઘર્મના ઝગડા બંધ થઈ જાય, અને પશુ અને પક્ષીઓ પ્રત્યેનો પણ વ્યહવાર બદલાઈ જાય.

ગીતાની શીખ પ્રમાણે વર્તવા સ્વસ્થ શરીર અને સ્વસ્થ મન હોવાં જરૂરી છે, જેના માટે સ્વસ્થ ખોરાક લેવો જરૂરી છે. ગીતા રોજીંદા જીવનમાં ખોરાકનું મહત્વ સમજાવે છે, કેવો ખોરાક ખાવો જોઈએ અને કેવો ખોરાક ત્યજવો જોઈએ, એ ગીતામાં વિગતવાર સમજાવ્યું છે.

ગીતામાં એક મોટી વાત કહી છે. કોઈપણ કર્મ સારૂં કે ખરાબ નથી, એનો આધાર એ સારા કે ખરાબ ધ્યેય માટે કરવામાં આવ્યું છે એના ઉપર છે. દરેક વ્યક્તિને અમુક કામ એક કર્તવ્ય તરીકે મળ્યું હોય છે. જેલમાં ફાંસીગર જે કામ કરે છે એમાં કોઈ પાપ નથી. એ માણસને મારતો નથી, એ માત્ર કાયદાનું પાલન કરે છે.

અંતમાં ગીતા એક સંદેશ આપે છે કે સારી અને સાચી સલાહ આપવી એ તમારૂં કર્તવ્ય છે, પણ સામા માણસે તમારી સલાહ પ્રમાણે વર્તવું કે પોતાની ઈચ્છા પ્રમાણે વર્તવું એ સામા માણસ ઉપર છોડી દેવું જોઈએ. કૃષ્ણે પણ અર્જુનને અંતમાં એ જ કહ્યું છે કે “યથેચ્છસિ તથા કુરુ” , હવે તને જે યોગ્ય લાગે તે કર. ગીતા મોસ્ટ ડેમોક્રેટિક ગ્રંથ છે. આજની જનરેશનના કોઈ પણ છોકરા-છોકરીને મળો તો એને સૌથી વધારે ગમતી બાબત હોય તો આ લિબર્ટી છે, આ ફ્રીડમ છે, આ સ્વતંત્રતા છે.

અંતમાં અર્જૂન વિષાદમાંથી બહાર આવે છે, અને કહે છે, “નષ્ટો મોહઃ સ્મૃતિરલબ્ધા ત્વપ્રસાદાન મયા અચ્યુત” અને “ સ્થિતોઅસ્મી ગતસન્દેહઃ કરિષ્યે વચનં તવ”. ગીતાનો સંદેશ જેને સમજાઈ જાય, એનો મોહ નાશ પામે છે અને એ ઇશ્વરે બતાવેલા માર્ગ પર ચાલવા તૈયાર થઈ જાય છે.

માણસે જીવનમાં શું કરવું એ રામાયણ શીખવે છે, અને શું ન કરવું તે મહાભારત શીખવે છે, પણ જીવન કેવી રીતે જીવવું એ ગીતા શીખવે છે.

સંજય ધૃતરાષ્ટ્રનો સારથી છે. દિવ્ય દૃષ્ટી પ્રાપ્ત કરી માત્ર હકીકતનું જ બ્યાન કરે છે. સાચું રીપોર્ટીંગ કેમ કરાય એનું ઉત્તમ ઉદાહરણ છે.

ગીતા કહે છે કે Every problem comes with a solution.

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

सरस्वती पूजन के पीछे पौराणिक मान्यताएं

  1. श्रीकृष्ण ने की सरस्वती की प्रथम पूजा
    इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करने के पीछे भी पौराणिक कथा है। इनकी सबसे पहले पूजा भगवान श्रीकृष्ण और ब्रह्माजी ने ही की। देवी सरस्वती ने जब भगवान श्रीकृष्ण को देखा, तो उनके मनमोहक रूप पर मोहित हो गईं और पति के रूप में पाने की इच्छा करने लगीं। भगवान कृष्ण को इस बात का पता चलने पर उन्होंने कहा कि वे श्री राधा के प्रति समर्पित हैं। परंतु देवी सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि प्रत्येक विद्या की इच्छा रखने वाला माघ मास की शुक्ल पंचमी को तुम्हारा पूजन करेगा। यह वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने पहले देवी की पूजा की।
  2. शक्ति के रूप में भी माँ सरस्वती
    मत्स्यपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, मार्कण्डेयपुराण, स्कंदपुराण तथा अन्य ग्रंथों में भी देवी सरस्वती की महिमा का वर्णन किया गया है। इन धर्मग्रंथों में देवी सरस्वती को सतरूपा, शारदा, वीणापाणि, वाग्देवी, भारती, प्रज्ञापारमिता, वागीश्वरी तथा हंसवाहिनी आदि नामों से संबोधित किया गया है। ‘दुर्गा सप्तशती’ में माँ आदिशक्ति के महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती रूपों का वर्णन और महात्म्य बताया गया है।
  3. कुंभकर्ण की निद्रा का कारण बनीं सरस्वती
    कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हजार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए, तो देवों ने निवेदन किया कि आप इसको वर तो दे रहे हैं, लेकिन यह आसुरी प्रवृत्ति का है और अपने ज्ञान और शक्ति का कभी भी दुरुपयोग कर सकता है। तब ब्रह्मा ने सरस्वती का स्मरण किया। सरस्वती राक्षस की जीभ पर सवार हुईं। सरस्वती के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- ‘मैं कई वर्षों तक सोता रहूं, यही मेरी इच्छा है.’ इस तरह त्रेता युग में कुंभकर्ण सोता ही रहा और जब जागा तो भगवान श्रीराम उसकी मुक्ति का कारण बने।
    • डॉ0 विजय शंकर मिश्र
Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

भगवद्गीता यथारुप….

1- जब हम पहली बार भगवद्गीता पढ़ते हैं। तो हम एक अन्धे व्यक्ति के रूप में पढ़ते हैं और बस इतना ही समझ में आता है कि कौन किसके पिता, कौन किसकी बहन, कौन किसका भाई। बस इससे ज्यादा कुछसमझ नहीं आता।

2- जब हम दूसरी बार भगवद्गीता पढ़ते हैं, तो हमारे मन में सवाल जागते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया या उन्होंने वैसा क्यों किया ?

3- जब हम तीसरी बार भगवद्गीता को पढ़ेगें, तो हमे धीरे-धीरे उसके मतलब समझ में आने शुरू हो जायेंगे। लेकिन हर एक को वो मतलब अपने तरीके से ही समझ में आयेंगे।

4- जब चौथी बार हम भगवद्गीता को पढ़ेंगे, तो हर एक पात्र की जो भावनायें हैं, इमोशन… उसको आप समझ पायेगें कि किसके मन में क्या चल रहा है। जैसे अर्जुन के मन में क्या चल रहा है या दुर्योधन के मन में क्या चल रहा है ? इसको हम समझ पाएंगे।

5- जब पाँचवी बार हम भगवद्गीता को पढ़ेंगे तो पूरा कुरूश्रेत्र हमारे मन में खड़ा होता है, तैयार होता है,हमारे मन में अलग-अलग प्रकार की कल्पनायें होती हैं।

6- जब हम छठी बार भगवद्गीता को पढ़ते हैं, तब हमें ऐसा नही लगता की हम पढ़ रहें हैं… हमे ऐसा ही लगता है कि कोई हमें ये बता रहा है।

7- जब सातवी बार भगवद्गीता को पढ़ेंगे, तब हम अर्जुन बन जाते हैं और ऐसा ही लगता है कि सामने वो ही भगवान कृष्ण हैं, जो मुझे ये बता रहें हैं।

8- और जब हम आठवी बार भगवद्गीता पढ़ते हैं, तब यह एहसास होता है कि श्रीकृष्ण कहीं बाहर नही हैं, वो तो हमारे अन्दर हैं और हम उनकेअन्दर हैं। जब हम आठ बार भगवद्गीता पड़ लेगें तब हमें गीता का महत्व पता चलेगा |

कि इस संसार में भगवद् गीता से अलग कुछ है ही नहीं और इस संसार में भगवद्गीता ही हमारे मोक्ष का सबसे सरल उपाय है।

भगवद्गीता में ही मनुष्य के सारे प्रश्नों के उत्तर लिखें हैं। जो प्रश्न मनुष्य ईश्वर से पूछना चाहता है। वो सब गीता में सहज ढंग से लिखें हैं।

मनुष्य की सारी परेशानियों के उत्तर भगवद्गीता में लिखें हैं,गीता अमृत है। गीता स्यमं भगवान कृष्ण है…समय निकाल कर गीता अवश्य पढ़ें…
“जय श्रीहरि”
“हरे कृष्ण”

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

श्रीमद भागवत गीता जयंती📙🚩
🙏मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष ११,
विक्रम संवत २०७६
🙏 मोक्षदा एकादशी- गीता जयंती
रविवार 08 दिसम्बर 2019🚩

🚩योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण कें मुखारबींद से अवतरित परम कल्याणकारी श्रेस्ठ ग्रन्थ 📙 श्रीमद्भागवतगीता

🙏🏻 धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसलिए प्रतिवर्ष इस तिथि को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। गीता एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी जयंती मनाई जाती है।
🙏🏻 गीताजी ऐसा ग्रंथ है जो विश्व को हज़ारों वर्षों से मार्ग दर्शन करा रहे है, जो आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं और जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा रही है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर मनुष्य के सामने आती है।

🚩गीताजी में ऐसा उत्तम और सर्वव्यापी ज्ञान है कि उनकी रचना हुए हजारों वर्ष बीत गए हैं किन्तु, उनके समान किसी भी ग्रंथ की रचना नहीं हुई है ।

18 अध्याय एवं 700 श्लोकों में रचित तथा भक्ति, ज्ञान, योग एवं निष्कामता आदि से भरपूर है यह गीता ग्रन्थ

🚩श्रीमद्भगवद्गीता ने किसी मत, पंथ की सराहना या निंदा नहीं की अपितु मनुष्यमात्र की उन्नति की बात कही है । गीता जीवन का दृष्टिकोण उन्नत बनाने की कला सिखाती है और युद्ध जैसे घोर कर्मों में भी निर्लेप रहने की कला सिखाती है । मरने के बाद नहीं, जीते-जी मुक्ति का स्वाद दिलाती है गीता !

🚩‘गीताजी’ में
👉18 अध्याय हैं,
👉 700 श्लोक हैं,
👉94569 शब्द हैं ।
👉 विश्व की 578 से भी अधिक भाषाओं में गीता का अनुवाद हो चुका है ।

🚩’यह मेरा हृदय है’- ऐसा अगर किसी ग्रंथ के लिए भगवान ने कहा है तो वह गीता जी है । गीता मे हृदयं पार्थ । ‘गीता मेरा हृदय है ।’

🚩श्री वेदव्यास ने महाभारत में गीता का वर्णन करने के उपरान्त कहा हैः

📙गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सुता ।।

👉 अर्थ :- गीता सुगीता करने योग्य है अर्थात् श्री गीता को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भाव सहित अंतःकरण में धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है, जो कि स्वयं श्री पद्मनाभ विष्णु भगवान के मुखारविन्द से निकली हुई है,

🚩श्रीमद् भगवदगीता केवल किसी विशेष धर्म या जाति या व्यक्ति के लिए ही नहीं, परंतु मानवमात्र के लिए उपयोगी व हितकारी है । चाहे किसी भी देश, वेश, समुदाय, संप्रदाय, जाति, वर्ण व आश्रम का व्यक्ति क्यों न हो, यदि वह इसका थोड़ा-सा भी नियमित पठन-पाठन करें तो उसे अनेक अनेक आश्चर्यजनक लाभ मिलने लगते हैं ।

🚩श्रीमद् भगवद् गीता के ज्ञानामृत के पान से मनुष्य के जीवन में साहस, सरलता, स्नेह, शांति और धर्म आदि दैवी गुण सहज में ही विकसित हो उठते हैं । अधर्म, अन्याय एवं शोषण मुकाबला करने का सामर्थ्य आ जाता है । भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्रदान करने वाला, निर्भयता आदि दैवी गुणों को विकसित करनेवाला यह गीता ग्रन्थ पूरे विश्व में अद्वितीय है ।

🚩गीता माता ने अर्जुन को सशक्त बना दिया। गीता माता अहिंसक पर वार नहीं कराती और हिंसक व्यक्तियों के आगे हमें डरपोक नहीं होने देती।

📙देहं मानुषमाश्रित्य चातुर्वर्ण्ये तु भारते।
न श्रृणोति पठत्येव ताममृतस्वरूपिणीम्।।
हस्तात्त्याक्तवाऽमृतं प्राप्तं कष्टात्क्ष्वेडं समश्नुते।
पीत्वा गीतामृतं लोके लब्ध्वा मोक्षं सुखी भवेत्।।

👉अर्थ :- भरतखण्ड में मनुष्य देह प्राप्त करके भी जो अमृतस्वरूप गीता नहीं पढ़ता है या नहीं सुनता है वह हाथ में आया हुआ अमृत छोड़कर कष्ट से विष खाता है। किन्तु जो मनुष्य गीता सुनता है, पढ़ता है तो वह इस लोक में गीतारूपी अमृत का पान करके मोक्ष प्राप्त कर सुखी होता है।

📙1⃣ : गीता जी के श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
🙏🏻 अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

📙2⃣ : गीता जी श्लोक
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।
सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
🙏🏻 अर्थ- हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योग युक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।

📙3⃣ *: गीता जी श्लोक*
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।
🙏🏻 अर्थ- योग रहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावना रहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।

🙏🚩🇮🇳🔱🏹🐚🕉

🚩विदेशों में श्री गीताजी का महत्व समझकर स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाने लगे हैं, भारत सरकार भी अगर बच्चों एवं देश का भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहती है तो सभी स्कूलों कॉलेज में गीता अनिवार्य कर देना चाहिए ।

🙏🚩🇮🇳🔱🏹🐚🕉

🕉जय श्रीकृष्ण🕉
🔱जय महादेव🔱
🚩जय भारत🚩

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

.
08/12/2019

🍁📖 ગીતા જયંતિ સ્પેશિયલ પોસ્ટ 📖🍁

જય શ્રીકૃષ્ણ, નમસ્કાર.

ગીતા જયંતિના આજના પાવન પર્વે મંગલકામના.. આજે આપણા નિયમિત અભ્યાસને વિરામ આપીએ, અને ગીતાજીનો વિશિષ્ટ ઓચ્છવ કરીએ . ઘણાં વાચકો આજના મંગલ દિને ગીતાજીનું પારાયણ પણ કરતાં હશે. આરતી કરતાં હશે.. આપણે આ ગ્રુપમાં તો નિયમિત અખંડ ગીતા વાંચન-મનન કરતાં જ રહ્યા છીએ. આજે ઉત્સવ નિમિત્તે નિયમિત અભ્યાસને વિરામ. રોજ નિયમિત અભ્યાસમાં આપણે પ્રભુની કીધેલી વાતો સમજવાનો પ્રયત્ન કરીએ છીએ. આજે આપણા દિલની વાતો કરીએ. પ્રભુ સાંભળશે, સમજશે અને ઘટતું પૂરશે.

પૃથાપુત્રને સંબોધી પ્રભુએ જે વાણી કહી
મહાભારતની મધ્યમાં તે ગીતારૂપે વહી
જીવન ભવસાગરમાં આવે તોફાનો કે આંધી
સાશ્વત રાહ ચીંધતી આ ગીતા દીવાદાંડી

મહાભારતનું યુદ્ધ એ કપોળકલ્પિત વાર્તા માત્ર નથી. હુલ્લડ કે રમખાણની Documentary નથી. બુદ્ધિશાળીઓને લાગે છે તેમ રાજ્યલાલસા માટેની લડાઇ નથી. મહાભારતનું યુદ્ધ એ બે વિચારધારા વચ્ચેની લડાઈ છે. જીવન કેવી રીતે જીવીશું? પ્રભુને પકડીને કે પ્રભુને છોડીને? આ બે વિચારધારા વચ્ચેનું યુદ્ધ તે મહાભારતનું યુદ્ધ. આ યુદ્ધ પૂરું નથી થયું. એ તો જ્યાં સુધી આ બ્રહ્માંડ પર માનવજીવન છે, ત્યાં સુધી ચાલતું જ રહેશે. આ બ્રહ્માંડમાં પ્રકૃતિગત બે જ કોમ છે. (બીજી બધી કોમો તો પાછળથી ઉમેરાઈ) મૂળભૂત બે વિભાગ છે
(૧) Believers
(૨) Non-believers. ગુજરાતીમાં… આસ્તિક અને નાસ્તિક. આ બે વિચારધારા વચ્ચે સતત ચાલતા સંગ્રામમાં વિજય કોનો થાય અને કેવી રીતે થાય? તેના જવાબમાં ગીતા કહે છે….
“यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:
तत्र श्रीर्विजयो….

અર્જુન અને ભગવાન- આ બે ગીતાના મોટાં પાત્રો. ક્યારેક ક્યારેક એમ વિચાર આવે કે અર્જુને કહેલું “सीदन्ति मम गात्राणि” આ સાચું હશે??? સમગ્રતાથી ગીતા તરફ જોઈએ તો એમાં માનવમાત્રને સાશ્વત માર્ગદર્શન આપવા માટે થયેલું કૃષ્ણ અને અર્જુનનું Fixing જણાય છે. pure નાટક. અર્જુન આપણો પ્રતિનિધિ બની Demonstration માટે ઊભો હોય તેવું. અગાઉથી લખાયેલી script મુજબ અર્જુને ધ્રૂજવાનો અભિનય કર્યો. એટલો આબેહૂબ કે હજારો વર્ષનાં વ્હાણાં વાયા પછી આજેય આપણે એમ માનીએ છીએ કે અર્જુન કાકા-મામા-સાળા-સસરા ને જોઈ ધ્રૂજયો. ત્રિખંડ હલાવનાર, શિવજીને હરાવનાર અર્જુન ધ્રૂજે??? ચાલો માની લઈએ કે ધ્રૂજે. તો ૧લા અધ્યાયમાં વિષાદ કરનાર, ધ્રૂજનાર અને યુદ્ધના પરિણામોની ગંભીરતા કૃષ્ણને સમજાવનાર અર્જુન — બીજા અધ્યાયમાં એમ પૂછે કે “स्थितप्रज्ञस्य का भाषा…..????”
૮ મા અધ્યાયમાં એમ પૂછે કે “किं कर्म किमध्यात्म….???” પછી કહે મને રૂપ બતાવ, આ નહીં પેલું બતાવ, અને અઢી કલાકમાં ૧૮ મા અધ્યાયમાં કહે “स्थितोડस्मि गतसन्देह…!!” આટલું ધડાધડ તો ફિલ્મ કે નાટકમાં જ થાય.

આ સમગ્ર ઘટનાક્રમનું એક જુદી દ્રષ્ટિથી અવલોકન/અભ્યાસ કરીએ તો અર્જુન એક Super Hero લાગે. સર્વશક્તિમાન છતાં વિનમ્ર. આવા અર્જુન અને સાક્ષાત યોગેશ્વરના સંવાદના એ શ્લોકોમાં જ્ઞાન+કર્મ+ભક્તિ અને માનવજીવન માટે જરૂરી આધિભૌતિક, આધિદૈવિક અને આધ્યાત્મિક વાતોની ભરમાર છે. એક સામાન્ય માનવના મગજમાં એ બધી જ વાતો સમજાય નહીં, જે સમજાય તે ઉતરે નહિ, જે ઉતરે તે બધી પચે નહીં. તેથી ગીતાસમુદ્રમાંથી આપણી સાઇઝની લોટીમાં આપણી ક્ષમતા મુજબ જેટલું આવે તે ભરી આચમન કરીએ. ભગવાને તો કહ્યું જ છે ને કે “निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन”

અર્જુને રણમેદાનમાં શંખનાદ કર્યો ત્યારે તે ૬૫ વર્ષનો હતો. આપણે એ વિચારવાનું કે આપણે ૬૫ ના થશું તો શંખ ફૂંકી શકીશું? (આજે પણ ફૂંકાય છે કે!!!) જે રીતે આહાર-વિહારની આદતો પડતી જાય છે, તે મુજબ તો આજની પેઢીએ એમ વિચાર કરવો પડે કે શું હું ૬૫ વર્ષનો થઈશ? જો થઇશ તો મારા પગ પર ઉભો હોઇશ કે પથારીવશ? — આહારવિહારની મર્યાદા નક્કી કરતી વખતે “तस्मात् शास्त्र प्रमाणं ते” યાદ રાખીએ. વાંચીએ, સાંભળીએ, સમજીએ અને એ મુજબ આચરણ કરીએ. કારણ કે પ્રભુએ સ્પષ્ટ કહ્યું છે “न श्रोष्यसि विनड़क्ष्यसि” ન સાંભળીશ તો વિનાશ પામીશ.

જીવન જીવતાં મગજમાં પ્રશ્નો તો થવાના જ, સંઘર્ષ તો આવવાના જ, કોયડા ઊભા થવાના જ. પરંતુ તે બધામાંથી સહીસલામત ઉગરવા માટે હું આ ગીતા સંવાદ હૃદયમાં રાખીશ, મગજમાં રાખીશ. આગ લાગે ત્યારે કૂવો ખોદવા ન જવાય!! કૂવો ખોદીને તૈયાર રાખવો પડે. તેથી, હું રોજ ગીતાનો એક શ્લોક કંઠસ્થ કરીશ, હૃદયસ્થ કરીશ. તો જ સંઘર્ષો સમયે શંખ ફૂંકી શકીશ ને!!!

અર્જુનની જેમ ૫૬ ઇંચની છાતી તો થતાં થશે. પરંતુ અત્યારની ૫૬ સેન્ટિમીટરની છાતીમાં પણ ખુમારી તો એવી જ રાખીશ કે ભગવાનને અમસ્તા પણ જોવા આવવાનું મન થાય. ભગવાન આવે. હું પણ ફરીથી કહું “सीदन्ति मम गात्राणि” ફરી મને પણ વિશ્વરૂપદર્શન જોવા મળે. ફરી જ્ઞાન+કર્મ+ભક્તિની ધારા વહે.

પ્રભુને તો વારંવાર આ ધરતી પર આવવું છે. परित्राणाय साधुनां આવવું છે. પરંતુ સાધુજનો કયાં છે? પાર્થ જેવા પરમ પ્રિયજનો કયાં છે? આજના પાવન પર્વે એજ સંકલ્પ કરીએ કે…

યથામતિ – યથાશક્તિ ગીતાપૂજન કરીએ
પ્રભુજીનો આ દિવ્યસંદેશ નિજજીવનમાં ભરીએ
ગીતાજીના સ્પર્શે આવે જીવનમાં બહાર
નિ:સંકોચ શરૂઆત કરીએ જાગ્યા ત્યાંથી સવાર

🌸 જય શ્રીકૃષ્ણ 🌸

ટીમ
✍🏼
Limited 10પોસ્ટ

(આ પોસ્ટ કોપી રાઈટ આરક્ષિત હોવાથી તેના લખાણ માં કોઈ ફેરફાર ન કરવો)

[ 50 ગ્રુપ, 10000 જેટલા વાંચકો નિજાનંદ અને માત્ર માતૃભાષાના પ્રસાર-પ્રચાર માટે ધબકતું, મારુ Limited 10 ✉ પોસ્ટ, મારી પોકેટ 📚 લાઈબ્રેરી]

જોડાઓ, અમારી સાથે
વોટ્સએપ: 07041143511
ટેલિગ્રામ:
https://t.me/limited10post
.

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

Photo from Harshad Ashodiya


પર્વ / રવિવારે ગીતા જયંતી, આ ગ્રંથના ઉપદેશને ધ્યાનમાં રાખવાથી બધી પરેશાનીઓ દૂર થઈ શકે છે

મહાભારત યુદ્ધની શરૂઆતમાં જ અર્જુને શસ્ત્રો હેઠા મૂકી દીધા હતાં. ત્યારે શ્રીકૃષ્ણએ ગીતાનો ઉપદેશ આપ્યો અને અર્જુનને કર્મોનું મહત્વ સમજાવ્યું હતું

Divyabhaskar.Com
Dec 04, 2019, 03:43 PM IST
ધર્મ દર્શન ડેસ્ક- રવિવાર, 8 ડિસેમ્બરે મોક્ષદા એકાદશી છે. દ્વાપર યુગમાં માગશર મહિનાના શુક્લ પક્ષની એકાદશીએ ભગવાન શ્રીકૃષ્ણએ અર્જુનને ગીતા ઉપદેશ આપ્યો હતો. તેને લીધે આ તિથિને ગીતા જયંતીના નામે પણ ઓળખવામાં આવે છે. મહાભારતમાં જ્યારે કૌરવો અને પાંડવોની વચ્ચે યુદ્ધની શરૂઆત થઈ રહી હતીં, ત્યારે અર્જુને શ્રીકૃષ્ણની સામે શસ્ત્ર રાખી દીધા હતા અને કહ્યું હતું કે હું પોતાના જ કુળના લોકો ઉપર પ્રહાર નથી કરી શકતો. ત્યારબાદ શ્રીકૃષ્ણએ ગીતાનો ઉપદેશ આપ્યો અને અર્જુનને કર્મોનું મહત્વ બતાવ્યું હતું.

ભાગવદગીતામાં અનેક વિદ્યાઓ બતાવવામાં આવી છે. તેમાં ચાર મુખ્ય છે- અભય વિદ્યા, સામ્ય વિદ્યા, ઈશ્વર વિદ્યા અને બ્રહ્મ વિદ્યા. અભય વિદ્યા મૃત્યુના ભયને દૂર કરે છે. સામ્ય વિદ્યા રાગ-દ્વેષથી મુક્તિ અપાવે છે. ઈશ્વર વિદ્યાથી વ્યક્તિ અહંકારથી બચાવે છે. બ્રહ્મ વિદ્યાથી અંતરાત્મામાં બ્રહ્મા ભાવ જગાવે છે.

એક માત્ર ગ્રંથ ગીતા છે જેની જયંતી મનાવાય છે-

ગીતા એક માત્ર એવો ગ્રંથ છે જેની જયંતી મનાવવામાં આવે છે. હિન્દુ ધર્મમાં પણ માત્ર ગીતા જયંતી મનાવવાની પરંપરા પ્રાચીનકાળથી જ ચાલતી આવી છે, કારણ કે બીજા ગ્રંથ કોઈ મનુષ્ય દ્વારા લખવામાં આવ્યા અને સંકલિત કરવામાં આવ્યા છે, જ્યારે ગીતાનો જન્મ ભગવાન વિષ્ણુના અવતાર શ્રીકૃષ્ણના મુખેથી થયો હતો.

શ્રીગીતાજીની ઉત્પત્તિ ધર્મક્ષેત્ર કુરુક્ષેત્રમાં માગશર મહિનામાં શુક્લપક્ષની એકાદશીએ થઈ હતી. આ તિથિ મોક્ષદા એકાદશીના નામે વિખ્યાત છે. ગીતા એક સાર્વભૌમ ગ્રંથ છે. આ કોઈ કાળ, ધર્મ, સંપ્રદાય કે જાતિ વિશેષ માટે નહીં, પરંતુ સંપૂર્ણ માનવ જાતિ માટે છે. તેને સ્વયં શ્રીભગવાને અર્જુનને નિમિત્ત બનાવીને કહ્યું છે એટલા માટે આ ગ્રંથમાં ક્યાંય પણ શ્રીકૃષ્ણ ઉવાચ શબ્દ નથી આવ્યો પરંતુ શ્રીભગવાનુવાચનો પ્રયોગ કરવામાં આવ્યો છે.

ગીતાના 18 અધ્યાયોમાં સત્ય, જ્ઞાન અને કર્મનો ઉપદેશ છે. તેનાથી કોઈપણ મનુષ્યની બધી સમસ્યાઓને દૂર કરી શકાય છે અને જીવનને સફળ બનાવી શકાય છે.

આ છે ગીતા સાથે જોડાયેલો પ્રસંગ-

મહાભારતમાં જ્યારે કૌરવો અને પાંડવોની વચ્ચે યુદ્ધની શરૂઆત થવાની હતી. ત્યારે અર્જુને કૌરવોની સાથે ભીષ્મ, દ્રોણાચાર્ય, કૃપાચાર્ય વગેરે શ્રેષ્ઠ લોકોને જોઈને યુદ્ધ કરવાની ના પાડી દીધી હતી. ત્યારે ભગવાન શ્રીકૃષ્ણએ અર્જુનને ગીતાનો ઉપદેશ આપ્યો આ ઉપદેશ પછી અર્જને યુદ્ધમાં ભાગ લીધો. શ્રીકૃષ્ણએ અર્જુનને જે જ્ઞાન આપ્યું, તેનો સારાંશ આ પ્રકારે છે-

શા માટે વ્યર્થની ચિંતા કરે છે? કોઈનાથી શા માટે વ્યર્થનો ડરે છે? તને કોણ મારી શકે છે? આત્મા ન તો જન્મ લે છે, ન મરે છે. જે થયું, સારું થયું, જે થઈ રહ્યું છે, તે સારું થઈ રહ્યું છે. જે થશે, તે પણ સારું જ થશે.

તારું શું ગયું, જે તું રડે છે? તું શું લાવ્યો હતો, જે તને ખોઈ નાખ્યું? જે લીધું છે તે અહીંથી જ લીધું. જે આપ્યું, અહીં જ આપ્યું. જે આજે તારું છે, કાલે કોઈ બીજાનું હતું, પરમ દિવસે કોઈ ત્રીજાનું હશે.

પરિવર્તન સંસારનો નિયમ છે. જેને તું મૃત્યુ સમજે છે, તે જ તો જીવન છે. આ શરીર તારું નથી અને શરીરનો તું નથી. એ તો અગ્નિ, જળ, વાયુ, પૃથ્વી, આકાશથી બન્યું છે અને તેમાં જ પાછું ભળી જશે.

મારું-તારું, નાનું-મોટું, પોતાનું-પારકું, મનથી દૂર કરી દે, પછી બધું તારું જ છે, તું બધાનો છે. તું પોતાની જાતને ભગવાનને સોપી દે. આ જ સૌથી ઉત્તમ સહારો છે. આજ ગીતાનો મુખ્ય સંદેશો છે.