Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

‼भगवत्कृपा हि केवलम्

गीतासुगीताकर्तव्याकिमन्यैःशास्त्रविस्तरैः।
यास्वयंपद्मनाभस्यमुखपद्माद्विनिःसृता ।।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
भावार्थ – जो स्वयं पद्मनाभ श्रीविष्णु भगवान के मुखकमल से निकली हुई है, वह गीता अच्छी तरह कण्ठस्थ और हृदयस्थ करना चाहिए । अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की आवश्यकता नही है, केवल गीता का स्वाध्याय करते हुए तदनुसार आचरण करके जीवन को दिव्य बनाया जा सकता है ।
आपका आज का दिन मंगलमय रहे

*सुप्रभातम् *

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

“श्रीमद्भगवद्गीता” के कहने, सुनने और पढ़ने का महात्म्य !!!

संजय गुप्ता

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥

जो मनुष्य, परम कल्याण जिसका फल है ऐसे इस कृष्णार्जुन – संवाद रूप अत्यंत गोप्य गीता ग्रन्थ को मुझमें भक्ति रखने वाले भक्तों में सुनाएगा – ग्रन्थरूप से या अर्थरूप से स्थापित करेगा। कैसे सुनाएगा ? मुझमें पराभक्ति करके, अर्थात परमगुरु भगवान् की मैं सेवा करता हूँ ऐसा समझ कर जो इसे सुनाएगा उसका यह फल है कि वह मुझे ही प्राप्त हो जाएगा – इसमें संशय नहीं करना चाहिए।

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥

इस गीता शास्त्र की परम्परा चलाने वाले भक्त से बढ़ कर, मेरा अधिक प्रिय कार्य करने वाला, मनुष्यों में कोई नहीं है। अर्थात वह मेरा अतिशय प्रिय करने वाला है, वर्तमान मनुष्यों में उससे बढ़ कर प्रियतम कार्य करने वाला और कोई नहीं है, तथा भविष्य में भी इस भूलोक में उससे बढ़ कर प्रियतर कोई दूसरा नहीं होगा।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥

जो मनुष्य हम दोनों के संवादरूप इस धर्मयुक्त गीता ग्रंथ को पढ़ेगा, उसके द्वारा यह होगा कि मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा। यह फल विधि है यानी इसका फल देवता विषयक ज्ञानयज्ञ के समान होता है। उस अध्ययन से मैं ज्ञानयज्ञ द्वारा पूजित होता हूँ, ऐसा मेरा निश्चय है।

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌ ॥

जो मनुष्य, इस ग्रन्थ को श्रद्धायुक्त और दोष दृष्टि रहित होकर केवल सुनता ही है, वह भी पापों से मुक्त होकर, पुण्यकारियों के अर्थात अग्निहोत्रादि श्रेष्ठ कर्म करने वालों के, शुभ लोकों को प्राप्त हो जाता है। ‘अपि’ शब्द से यह पाया जाता है कि अर्थ समझने वालों की तो बात ही क्या है !

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय – १८, श्लोक – ६८ से ७१)

ज्ञानयज्ञ का क्या अर्थ है ?? मन और बुद्धि को केंद्रित करके गीता पढ़ना यानी अध्ययन करना यज्ञ है। इस प्रकार अध्ययन करने से विषय का समझ में आना ज्ञान है। भगवान् स्पष्ट कह रहे हैं कि इस प्रक्रिया से मैं पूजित होता हूँ। अर्थात इस प्रकार से गीता के अध्ययन मात्र से पाठक द्वारा मेरी पूजा हो जाती है।

आज कल ‘अष्टावक्र गीता’ काफी चर्चा में है। इसके पठन – पाठन का प्रचार और प्रसार जोर – शोर से किया जा रहा है। प्रचार माध्यमों में टी वी चैनल भी शामिल है। इसका बाजारीकरण आरम्भ हो गया है। इसे श्रीमद्भगवद्गीता से किसी भी प्रकार कम नहीं बताया जा रहा है।

‘श्रीमद्भगवद्गीता’ भगवान् द्वारा गाया गीत है जबकि ‘अष्टावक्र गीता’ एक मनुष्य द्वारा गाया गीत है।जिस प्रकार विश्व के सर्वश्रेष्ठ बाँसुरी वादक की तुलना क्या कल्पना भी भगवान् के बाँसुरी वादन से नहीं की जा सकती है। ठीक उसी प्रकार सर्वश्रेष्ठ मनुष्य के द्वारा भी गाए गीत से भगवान् के द्वारा गाए गीत की तुलना / कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

अष्टावक्र गीता के प्रचारकों की ओर से एक प्रश्न आया है – ज्ञान/विद्या कहीं से भी प्राप्त हो, इसमें बुरा क्या है? उत्तर है – श्रीमद्भगवद्गीता प्रमाण है जबकि अष्टावक्र गीता प्रमाण “नहीं” है। और जो प्रमाण है वही ज्ञान/विद्या है शेष सभी अज्ञान/अविद्या है!

समान परिश्रम और समय लगा कर श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन से भगवान् की पूजा सम्पन्न होती है ; जबकि अष्टावक्र गीता के अध्ययन से देव भी पूजित नहीं होते हैं। स्वयं विचार करें !

श्रीमद्भगवद्गीता का एक भी पृष्ठ खोलते ही आप सीधे भगवान् से जुड़ जाते हैं। आप होते हैं और भगवान् होते हैं, उनकी वाणी होती है।भगवान् स्पष्ट कह रहे हैं – श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन, वाचन, श्रवण अर्थात इस गीता शास्त्र की परम्परा चलाने वाले भक्त से बढ़ कर, मेरा अधिक प्रिय कार्य करने वाला, मनुष्यों में कोई नहीं है। ऐसे गीता शास्त्र – परम्परा को चलाने वाले भक्त भगवान् को अवश्य प्राप्त होते हैं – यह भगवान् का वचन है।

जय श्री कृष्ण !!

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

भगवान कृष्ण की बाल लीला,,,,,,


भगवान कृष्ण की बाल लीला,,,,,,

Sanjay Gupta

ऐसा कोन होगा जिसने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला को नहीं सुना होगा और बाल लीला में विशेषकर माखन चोरी लीला। माखन चोरी लीला भगवान ने इसलिए की क्योकि गोपियाँ भगवान से प्रेम करती थी। और भगवान अपनी लीला के माध्यम से उन्हें प्रेम देना चाहते थे।

और वास्तव में भगवान माखन चोर नहीं है वो तो चित-चोर है। एक बार जो उनकी लीला को सुन लेगा- देख लेगा फिर उसे संसार से क्या मतलब? भगवान ब्रज में नित्य ऐसी लीला करते रहते थे। एक बड़ी सुन्दर लीला आप पढ़िए और सिर्फ पढ़िए नहीं मन की आँखों से थोड़ा दर्शन कीजिये, मेरे गुरुदेव कहते है की चिंतन कीजिये-

एक बार की बात है भगवान अपनी टोली के साथ तैयार हुए। भगवान के मित्र बने है सुबल, मंगल, सुमंगल, श्रीदामा, तोसन, आदि। भगवान सोच रहे है की आज किसके घर माखन चोरी की जाये। याद आया की “चिकसोले वाली” गोपी के घर चलते है। भगवान पहुंच गए सुबह सुबह और जोर से दरवाजा खटखटाने लगे। गोपी ने दरवाजा खोला। तो श्रीकृष्ण को खड़े देखा। बाल बिखेर रखे थे, मुह पर उबासी थी। गोपी बोली – ‘अरे लाला! आज सुबह-सुबह यहाँ कैसे?

कन्हैया बोले – ‘गोपी क्या बताऊँ! आज सुबह उठते ही, मैया ने कहा लाला तू चिकसोले वाली गोपी के घर चले जाओ और उससे कहना आज हमारे घर में संत आ गए है मैंने तो ताजा माखन निकला नहीं, चिकसोले वाली गोपी तो भोर में उठ जावे है।ताजो माखन निकल लेवे है। तू उनसे जाकर माखन ले आ। और कहना कि एक मटकी माखन दे दो, बदले में दो मटकी माखन लौटा दूँगी।

गोपी बोली – लाला! मै अभी माखन की मटकी लाती हूँ और मैया से कह देना कि लौटने की जरुरत नहीं है संतो की सेवा मेरी तरफ से हो जायेगी ।झट गोपी अंदर गयी और माखन की मटकी लाई और बोली – लाला ये माखन लो और ये मिश्री भी ले जाओ। कन्हैया माखन लेकर बाहर आ गए और गोपी ने दरवाजा बंद कर लिया।

अब भगवान ने अपने सभी दोस्तों को बुलाया है और कहते है आओ आओ श्रीदामा, मंगल, सुबल, जल्दी आओ, सब-के-सब झट से बाहर आ गए भगवान बोले,” जिसके यहाँ चोरी की हो उसके दरवाजे पर बैठकर खाने में ही आनंद आता है, और वो चोरी भी नहीं कहलाती है।” झट सभी गोपी के दरवाजे के बाहर बैठ गए, भगवान ने सबकी पत्तल पर माखन और मिश्री रख दी। और बीच में स्वयं बैठ गए। सभी सखा माखन और मिश्री खाने लगे।

माखन के खाने से होंठो की पट पट और मिश्री के खाने से दाँतो के कट-कट की आवाज जब गोपी ने सुनी तो सोचा ये आवाज कहाँ से आ रही है , कोई बंदर तो घर में नही आ गयो है।

जैसे ही उसने दरवाजा खोला तो सारे मित्रों के साथ श्रीकृष्ण बैठे माखन खा रहे थे। गोपी बोली – ‘क्यों रे कन्हैया! माखन संतो को चाहिए था या इन संड-भुसंडान को।

भगवान बोले देख गोपी गाली मत दीजो। ये भी संत है, साधु है। और तो और नागा साधु है किसी के तन पर कोई वस्त्र तक नहीं है।
तुझे तो इनको प्रणाम करना चाहिए और वो भी दंडवत(लेट कर)। गोपी बोली अच्छा अभी दण्डोत करती हूँ। एक डंडा ले आउ फिर अच्छे से डंडे से दण्डोत करुँगी।

भगवान बोले सबको बेटा माखन बहुत खा लिए है अब पीटने का नंबर है। भागो सभी अपने-अपने घर को। इस प्रकार भगवान ब्रज में सुन्दर लीला कर रहे है और सबको अपने रूप मधुर से सराबोर कर रहे है।

भगवान पूरी मण्डली के साथ माखन चुराने जाते थे। एक बार गोपियों ने आपस में कहा की कुछ ऐसा इंतजाम करते है की इसे माखन चुराते हुए पकड़ ले। सबने मीटिंग की है।

एक गोपी ने एक तरकीब लगायी गोपी ने माखन निकला और छीके पर टांग दिया और साथ में एक घंटी बांध दी कि जैसे ही बाल कृष्ण माखन चुराने आयेगे तो घंटी बज पड़ेगी और मैं रंगे हाथों कान्हा को पकड़ लूँगी।

कुछ देर बाद बाल कृष्ण अपने सखाओ के साथ गोपी के घर माखन चुराने आये, तभी श्रीदामा जी ने कहा – कान्हा देखो, गोपी ने तो मटकी में घंटी बांध दी है अगर माखन कि मटकी को हाथ लगायेगे तो घंटी बज जायगी और गोपी हमे पकड़ लेगी।

बाल कृष्ण ने कहा – गोपी हमें नहीं पकडेगी। फिर बाल कृष्ण ने घंटी से कहा – देखो घंटी! हम सब माखन चुरायेगे पर तुम बजना मत।

घंटी बोली – ठीक है प्रभु! नहीं बजुगी।

अब भगवान ने झट से श्री दामा जी के कंधे पर चढ गए और माखन कि मटकी में से माखन निकाला, और एक-एक करके सभी सखाओं को खिलाने लगे अंत में बाल कृष्ण ने जैसे ही स्वयं माखन खाया, त्यों ही घंटी बजने लगी।

घंटी कि आवाज सुनते ही गोपी आ गई। सारे सखा तो भाग गए पर झट गोपी ने कान्हा को पकड़ लिया और बोली – आज तो रंगे हाथ पकडे गए।

कान्हा ने कहा – रुको गोपी! पहले मुझे इस घंटी से बात करने दो तुमसे बात में बात करूँगा फिर तुमसे बात करूँगा।

भगवान ने कहा – क्यों री घंटी ! तूने मेरी बात क्यों नहीं मानी? मैंने कहा था कि बजना मत।

घंटी बोली – प्रभु ! इसमें मेरा दोष नहीं है देखो जब तक आपके सखाओं ने माखन खाया तब तक में नहीं बजी लेकिन जैसे ही आपने माखन खाया तो में बज उठी। क्योकि मंदिर में जब पुजारी जी आपको भोग लगाते है तो घंटी बजाते है। इसलिए इसलिए मुझे बजना पड़ा ।

गोपी ने कहा – कान्हा आज बड़े दिनों के बाद हाथ लगे हो, झट गोपी ने एक रस्सी उठाई और बाल कृष्ण को बाँधने लगी। जैसे ही कलाई में रस्सी लपेटती तुरंत फिसल जाती क्योकि बड़े कोमल बाल कृष्ण है और हाथो में माखन भी लगा हुआ है। गोपी फिर लपेटती फिर रस्सी फिसल जाती।

बाल कृष्ण बोले – अरे गोपी तुझे तो बांधना भी नही आता। मै बताता हूँ। झट बाल कृष्ण ने रस्सी गोपी के हाथ से ली और गोपी के ही हाथ में लपेटने लगे देख गोपी ऐसे एक लपेटा फिर कस के गाँठ लगा।

गोपी – हाँ ठीक है लाला! मै समझ गई।
कान्हा – अरे! अभी कैसे समझ गई, एक गाँठ से क्या होगा एक गाँठ तो मै खोलकर भाग जाऊँगा , देखो गोपी फिर दूसरी गाँठ इस तरह से कस के लगाना।

गोपी – हाँ हाँ लाला ! में समझ गई अब खोल दो।

कान्हा – क्या कहा गोपी खोल दो ! मै काय खोलू, खोलेगो तेरो खसम! और ठेंगा दिखाकर भाग जाते है।

बहुत प्यारी बाल लीला कर रहे है भगवान। और गोपियों को, ब्रजवासियों को आनंद ही आनंद प्रदान कर रहे है।

बोलिए माखन चोर भगवान की जय।

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है…


56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है…

Dev Sharma
🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼
भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है |
इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे
छप्पन भोग कहा जाता है |

यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी,पापड़ आदि से होते हुए
इलायची पर जाकर खत्म होता है |
अष्ट पहर भोजन करने
वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले
छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं |
ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण
को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी |
अर्थात्…बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे |
जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत
को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक
भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया |
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र
की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को
गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा,
तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के
नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा
भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56
व्यंजनो का भोग बालकृष्ण को लगाया |
गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग…
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह
तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया,
अपितु कुलदेवी जगदम्बा कात्यायनी मां की अर्चना भी इस
मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप
में प्राप्त हों | श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी | व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के
उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन
भोग का आयोजन किया |छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां…ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान
श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर
विराजते हैं |उस कमल की तीन परतें होती हैं…
प्रथम परत में “आठ”,दूसरी में “सोलह”और
तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं |
प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में
भगवान विराजते हैं |इस तरह कुल पंखुड़ियों
संख्या छप्पन होती है | 56 संख्या का यही अर्थ है |

छप्पन भोग इस प्रकार है
1. भक्त (भात),
2. सूप्पिका (दाल),
3. प्रलेह (चटनी),
4. सदिका (कढ़ी),
5. दधिशाकजा (दही
शाक की कढ़ी),
6. सिखरिणी (श्रीखंड),
7. अवलेह (चटनिया ),
8. बालका (बाटी),
9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
10. त्रिकोण (शरक्करपारा),
11. बटक (बड़ा),
12. मधु शीर्षक (मख्खन बडा),
13. फेणिका (फेनी),
14. परिष्टïश्च (पूरी),
15. शतपत्र (खाजा),
16. सधिद्रक (घेवर),
17. चक्राम (मालपुआ),
18. चिल्डिका (चिलडे ),
19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
20. धृतपूर (मेसूर पाक ),
21. वायुपूर (रसगुल्ला),
22. चन्द्रकला (चांदी की बरक वाली मिठाई ),
23. दधि (महारायता),
24. स्थूली (थूली),
25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
26. खंड मंडल (खुरमा),
27. गोधूम (दलिया),
28. परिखा, ( रोट )
29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
30. दधिरूप (फलो से बना रायता ),
31. मोदक (लड्डू),
32. शाक (साग),
33. सौधान (अधानौ अचार),
34. मंडका (मोठ),
35. पायस (खीर)
36. दधि (दही),
37. गोघृत,
38. हैयंगपीनम (मक्खन),
39. मंडूरी (मलाई),
40. कूपिका (रबड़ी)
41. पर्पट (पापड़),
42. शक्तिका (बादाम का सीरा),

  1. लसिका (लस्सी),
  2. सुवत,( शरबत)
  3. संघाय (मोहन),
  4. सुफला (सुपारी),
  5. सिता (इलायची),
  6. फल,
  7. तांबूल, (पान)
  8. मोहन भोग, (मूंग दाल की चक्कि)
  9. लवण, (नमकीन व्यंजन)

🌼मुखवास🌼
52. कषाय, (आंवला )
53. मधुर, ( गुलुकंद)
54. तिक्त, (अदरक )
55. कटु, (मैथी दाना )
56. अम्ल ( निम्बू )

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

अपने बच्चों को आज गीता पढ़ाइये, ताकि कल को किसी कोर्ट में गीता पर हाथ ना रखना पड़े…
अच्छे संस्कार ही अपराध रोक सकते हैं…🙏

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

अद्धैतामृतवर्षिणीम्     भगवतीमष्टादशाध्यायिनीम्
                     अम्ब  त्वामनुसंदधामि  भगवद्गीते    भवद्वेषनीम्   l
अद्धैत का अमृत बरसाने वाली, हे भगवती आप अठ्ठारह (१८) अध्यायों वाली  हैं,
हे  अम्ब  (माता) श्रीमद्भगवद्गीता आपका  अनुसंधान  करने से आप  भवद्वेष
से मुक्त करानेवाली हैं .
Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

क्या आप जानते है ?
दुनिया के लगभग सभी भाषाओं का प्रथम अक्षर ( अ )है !!

अक्षराणामकारोऽस्मि 【श्रीमद्भागवत गीता】

कृष्णम वंदे जगत गुरु।