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​मनु जी मनुस्मृति के श्लोक १२/१०८ में कहते है –

” अनाम्नातेषु धर्मेषु कथ स्यादिति चेभ्दवेत् |

य शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयु: स धर्म: स्यादशन्कित : ||

अर्थात जिन विषयों पर हमने उपदेश नही किया उन पर

यदि संदेह हो जाए कि इसे किस प्रकार करे , तो शिष्ट ब्राह्मण

जिसको धर्म कहे ,निस्संदेह वो धर्म है |

यहा ब्राह्मण -विद्वान ,धर्म प्रवक्ता ,मार्गदर्शक इत्यादि अर्थ

में लक्षित होता है |

अम्बेडकरवादी लोग इसे जन्मना ब्राह्मण के वर्चस्व

के अर्थ में लगा अर्थ का अनर्थ करते है | उस ब्राह्मण के क्या

लक्षण है वो भी देखना चाहिए जिससे जन्मना

जातिवादी ब्राह्मण का स्पष्ट निषेध हो गुण कर्म से

ब्राह्मण का विधान होता है –

तैतरीय शिक्षा-११ और कुछ भेद के साथ

तैतरीय उपनिषद में निम्न श्लोक आता है – ” अथ यदि

ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ,ये तत्र ब्राह्मणा:

समर्शिन: युक्ता आयुक्ता अलूक्षा धर्मकामा: स्यु: | यथा ते तत्र

वर्तेरन तथा तत्र वर्तेथा: || ”

अर्थ – यदि तुम्हे किसी कर्म या आचार के विषय में

कुछ संदेह हो जाए तो तुम वैसा करो जैसा धर्मात्मा ब्राह्मण करता

है उस ब्राह्मण की पहचान है – ” सब कुछ

सहन करने वाला (अर्थात गाली देने ,पत्थर मारने पर

भी बुरा न माने नाराज न हो क्षमा करने वाला ) धर्म

कार्य में तत्पर ,निठल्ला न बैठने वाला , धर्मकार्यो में लगा रहने वाला

जैसा वो व्यवहार करे वैसा ही तुम भी करो

अर्थात उसका अनुसरण करो |

यहा ब्राह्मण के लक्षण बता दिए है उससे स्पष्ट है कि मनु

का उद्देश्य व्यक्ति को उचित मार्गदर्शक खोज अपने कर्म और

आचार के निर्वाह का उपदेश है न कि जन्मना ब्राह्मण के

वर्चस्व स्थापित करने का |

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Rayvi Kumar's photo.



In ancient Bharata no part of society was closed to anyone on the basis of family background, and acceptance into another varna was solely by merit . The issue of caste appeared only after enactment of Hindu Law by Britishers. To understand how caste and community have been misunderstood one has to go through famous case of Ganapathi Iyer versus Maharaja of Kolhapur.

In India there is no caste but only communities. If caste is the prerogative under what caste Jats, Gujjars, Kapus will fit? There are only communities comprising of industrial class, mercantile class, priestly class, labour class etc.,India is the only country where priestly class are at the disposal of local people and each community have their own priests.

Then where is the question of casteism? The community set up in 1500AD is not as of today and that in 1000AD was not that of 1500AD and so on. Community set up is dynamic and not static. For example upto 1000AD South India was dominated by Brahmakshatriyas who cannot be identified now.

One among the groups was VAIDHYAS/AMBASHTAS to which SIRUTHONDAR and VIGYAPATHI OF VELVIKUDI GRANT viz.,SATTAN GANAPATHI belonged. The Valluvars occupied a prominent place upto CHOLAS. The VALMIKIS AND VALLUARS have the right to don sacred threads. Even now in Tamilnadu Valluvars are excellent astrologers and priests for untouchables.

If the dynamic nature of community set up was not understood properly, tomorrow there will be new class of Brahmins and outcastes i.e.,those in all communities including Brahmins who cannot cope up with Science and Technology will become irrelevant and take jobs considered as menial as per current standards and become outcastes and the blame game sill start after hundred years.

The greatest misunderstanding of caste is not of Manu Law but due to the fact that it was standardised through prejuidiced lense of history. The societal change can never be understood through the history of Aryan invasion and one conveniently shift the blame to casteism which can satisfy one’s ego for contemporary times but not for long.

Any passionate person will demand scrapping of Hindu Law which has created unnecessary prejudice against anteriority. Caste can be abolished but not community set up because caste can never provide hetrogenity while community provides hetrogenity within the limited space and fit into caste as per the changing times. If one likes or not Indian polity has to accept existence of community which can never become caste.

What happens in Tamilnadu the land of Periyarism? The internicine quarrel is due to fear of survival and loss of identity of one’s self mistitled as caste clash.

Everybody can welcome abolishing of caste but what is the alternative to the customs of various communities from birth to death? Will this also be enacted by COMMON CIVIL LAW? A true historian can never blame anybody for societal changes but will try to provide level playing field for everybody without hatred and malice towards none. Blaming Casteism and Aryan invasion theory is not going to solve the problems.

It didn’t develop in one shot and evolved over time by merging many different social groups. The caste system is not a well-defined entity, but an amorphous grouping of people with different origins that all got mixed over time. Indian varna system is also very similar to the Confucianist system of grouping occupations into 4 groups [Four occupations] – scholars, farmers, artisans and traders and systems elsewhere the world.

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प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे – वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था। ये चार आश्रम थे-

(१) ब्रह्मचर्य, (२) गार्हस्थ्य, (३) वानप्रस्थ और (४) संन्यास।

अमरकोश (७.४) पर टीका करते हुए भानु जी दीक्षित ने ‘आश्रम’ शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है: आश्राम्यन्त्यत्र। अनेन वा। श्रमु तपसि। घञ््‌ा। यद्वा आ समंताछ्रमोऽत्र। स्वधर्मसाधनक्लेशात्‌। अर्थात्‌ जिसमें स्म्यक्‌ प्रकार से श्रम किया जाए वह आश्रम है अथवा आश्रम जीवन की वह स्थिति है जिसमें कर्तव्यपालन के लिए पूर्ण परिश्रम किया जाए। आश्रम का अर्थ ‘अवस्थाविशेष’ ‘विश्राम का स्थान’, ‘ऋषिमुनियों के रहने का पवित्र स्थान’ आदि भी किया गया है।

आश्रमसंस्था का प्रादुर्भाव वैदिक युग में हो चुका था, किंतु उसके विकसित और दृढ़ होने में काफी समय लगा। वैदिक साहित्य में ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य अथवा गार्हपत्य का स्वतंत्र विकास का उल्लेख नहीं मिलता। इन दोनों का संयुक्त अस्तित्व बहुत दिनों तक बना रहा और इनको वैखानस, पर्व्राािट्, यति, मुनि, श्रमण आदि से अभिहित किया जाता था। वैदिक काल में कर्म तथा कर्मकांड की प्रधानता होने के कारण निवृत्तिमार्ग अथवा संन्यास को विशेष प्रोत्साहन नहीं था। वैदिक साहित्य के अंतिम चरण उपनिषदों में निवृत्ति और संन्यास पर जोर दिया जाने लगा और यह स्वीकार कर लिया गया था कि जिस समय जीवन में उत्कट वैराग्य उत्पन्न हो उस समय से वैराग्य से प्रेरित होकर संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। फिर भी संन्यास अथवा श्रमण धर्म के प्रति उपेक्षा और अनास्था का भाव था।

सुत्रयुग में चार आश्रमों की परिगणना होने लगी थी, यद्यपि उनके नामक्रम में अब भी मतभेद था। आपस्तंब धर्मसूत्र (२.९.२१.१) के अनुसार गार्हस्थ्य, आचार्यकुल (=ब्रह्मचर्य), मौन तथा वानप्रस्थ चार आश्रम थे। गौतमधर्मसूत्र (३.२) में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु और वैखानस चार आश्रम बतलाए गए हैं। वसिष्ठधर्मसूत्र (७.१.२) में गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा पर्व्राािजक, इन चार आश्रमों का वर्णन किया है, किंतु आश्रम की उत्त्पति के संबंध में बतलाया है कि अंतिम दो आश्रमों का भेद प्रह्लाद के पुत्र कपिल नामक असुर ने इसलिए किया था कि देवताओं को यज्ञों का प्राप्य अंश न मिले और वे दुर्बल हो जाएँ (६.२९.३१)। इसका संभवत: यह अर्थ हो सकता है कि कायक्लेशप्रधान निवृत्तिमार्ग पहले असुरों में प्रचलित था और आर्यो ने उनसे इस मार्ग को अंशत: ग्रहण किया, परंतु फिर भी ये आश्रम उनको पूरे पंसद और ग्राह्य न थे।

बौद्ध तथा जैन सुधारणा ने आश्रम का विरोध नहीं किया, किंतु प्रथम दो आश्रमों-ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य-की अनिवार्यता नहीं स्वीकार की। इसके फलस्वरूप मुनि अथवा यतिवृत्ति को बड़ा प्रोत्साहन मिला और समाज में भिक्षुओं की अगणित वृद्धि हुई। इससे समाज तो दुर्बल हुआ ही, अपरिपक्व संन्यास अथवा त्याग से भ्रष्टाचार भी बढ़ा। इसकी प्रतिक्रिया और प्रतिसुधारण ई. पू. दूसरी सदी अथवा शुंगवंश की स्थापना से हुई। मनु आदि स्मृतियों में आश्रमधर्म का पूर्ण आग्रह और संघटन दिखाई पड़ता है। पूरे आश्रमधर्म की प्रतिष्ठा और उनके क्रम की अनिवार्यता भी स्वीकार की गई। ‘आश्रमात्‌ आश्रमं गच्छेत्‌’ अर्थात्‌ एक आश्रम से दूसरे आश्रम को जाना चाहिए, इस सिद्धांत को मनु ने दृढ़ कर दिया।

स्मृतियों में चारों आश्रमों के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। मनु ने मानव आयु सामान्यत: एक सौ वर्ष की मानकर उसको चार बराबर भागों में बांटा है। प्रथम चतुर्थांश ब्रह्मचर्य है। इस आश्रम में गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना कर्तव्य है। इसका मुख्य उद्देश्य विद्या का उपार्जन और ्व्रात का अनुष्ठान है। मनु ने ब्रह्मचारी के जीवन और उसके कर्तव्यों का वर्णन विस्तार के साथ किया (अध्याय २, श्लोक ४१-२४४)। ब्रह्मचर्य उपनयन संस्कार के साथ प्रारंभ और समावर्तन के साथ समाप्त होता है। इसके पश्चात्‌ विवाह करके मुनष्य दूसरे आश्रम गार्हस्थ्य में प्रवेश करता है। गार्हस्थ्य समाज का आधार स्तंभ है। जिस प्रकार वायु के आश्रम से सभी प्राणी जीते हैं उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम के सहारे अन्य सभी आश्रम वर्तमान रहते हैं (मनु. ३७७)। इस आश्रम में मनुष्य ऋषिऋण से वेद से स्वाध्याय द्वारा, देवऋण से यज्ञ द्वारा और पितृऋण से संतानोत्पत्ति द्वारा मुक्त होता है। इसी प्रकार नित्य पंचमहायज्ञों-ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा भूतयज्ञ-के अनुष्ठान द्वारा वह समाज एवं संसार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है। मनुस्मृत्ति के चतुर्थ एवं पंचम अध्याय में गृहस्थ के कर्त्तव्यों का विवेचन पाया जाता है। आयु का दूसरा चतुर्थाश गार्हस्थ्य में बिताकर मनुष्य जब देखता है कि उसके सिर के बाल सफेद हो रहे हैं और उसके शरीर पर झुर्रियाँ पड़ रही हैं तब वह जीवन के तीसरे आश्रम-वानप्रस्थ-में प्रवेश करता है। (मनु. ५, १६९)। निवृत्ति मार्ग का यह प्रथम चरण है। इसमें त्याग का आंशिक पालन होता है। मनुष्य सक्रिय जीवन से दूर हो जाता है, किंतु उसके गार्हस्थ्य का मूल पत्नी उसके साथ रहती है और वह यज्ञादि गृहस्थधर्म का अंशत: पालन भी करता है। परंतु संसार का क्रमश: त्याग और यतिधर्म का प्रारंभ हो जाता है (मनु.६)। वानप्रस्थ के अनंतर शांतचित्त, परिपक्व वयवाले मनुष्य का पार्व्राािज्य (संन्यास) प्रारंभ होता है। (मनु.६,३३)। जैसा पहले लिखा गया है, प्रथम तीन आश्रमों ओर उनके कर्त्तव्यों के पालन के पश्चात्‌ ही मनु संन्यास की व्यवस्था करते हैं:एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाकर, जितेंद्रिय हो, भिक्षा (ब्रह्मचर्य), बलिवैश्वदेव (गार्हस्थ्य तथा वानप्रस्थ) आदि से विश्राम पाकर जो संन्यास ग्रहण करता है वह मृत्यु के उपरांत मोक्ष प्राप्त कर अपनी (पारमार्थिक) परम उन्नति करता है (मनु.६,३४)। जो सब प्राणियों को अभय देकर घर से प्र्व्राजित होता है उस ब्रह्मवादी के तेज से सब लोक आलोकित होते हैं (मनु. ६,३९)। एकाकी पुरुष को मुक्ति मिलती है, यह समझता हुआ संन्यासी सिद्धि की प्राप्ति के लिए नित्य बिना किसी सहायक के अकेला ही बिचरे; इस प्रकार न वह किसी को छोड़ता है और न किसी से छोड़ा जाता है (मनु. ६,४२)। कपाल (भग्न मिट्टी के बर्तन के टुकड़े) खाने के लिए, वृक्षमूल रहने के लिए तथा सभी प्राणियों में समता व्यवहार के लिए मुक्त पुरुष (संन्यासी) के लक्षण हैं (मनु. ६,४४)।

आश्रमव्यवस्था का जहाँ शारीरिक और सामाजिक आधार है, वहाँ उसका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक आधार भी है। भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन को केवल प्रवाह न मानकर उसको सोद्देश्य माना था और उसका ध्येय तथा गंतव्य निश्चित किया था। जीवन को सार्थक बनाने के लिए उन्होंने चार पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-की कल्पना की थी। प्रथम तीन पुरुषार्थ साधनरूप से तथा अंतिम साध्यरूप से व्यवस्थित था। मोक्ष परम पुरुषार्थ, अर्थात्‌ जीवन का अंतिम लक्ष्य था, किंतु वह अकस्मात्‌ अथवा कल्पनामात्र से नहीं प्राप्त हो सकता है। उसके लिए साधना द्वारा क्रमश: जीवन का विकास और परिपक्वता आवश्यक है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय समाजशास्त्रियों ने आश्रम संस्था की व्यवस्था की। आश्रम वास्तव में जीव का शिक्षणालय अथवा विद्यालय है। ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म का एकांत पालन होता है। ब्रह्मचारी पुष्टशरीर, बलिष्ठबुद्धि, शांतमन, शील, श्रद्धा और विनय के साथ युगों से उपार्जित ज्ञान, शास्त्र, विद्या तथा अनुभव को प्राप्त करता है। सुविनीत और पवित्रात्मा ही मोक्षमार्ग का पथिक्‌ हो सकता है। गार्हस्थ्य में धर्म पूर्वक अर्थ का उपार्जन तथा काम का सेवन होता है। संसार में अर्थ तथा काम के अर्जन और उपभोग के अनुभव के पश्चात्‌ ही त्याग और संन्यास की भूमिका प्रस्तुत होती है। संयमपूर्वक ग्रहण के बिना त्याग का प्रश्न उठता ही नहीं। वानप्रस्थ तैयार होती है। संन्यास के सभी बंधनों का त्याग कर पूर्णत: मोक्षधर्म का पालन होता है। इस प्रकार आश्रम संस्था में जीवन का पूर्ण उदार, किंतु संयमित नियोजन था।

शास्त्रों में आश्रम के संबंध में कई दृष्टिकोण पाए जाते हैं जिनको तीन वर्गो में विभक्त किया जा सकता है। (१) समुच्चय, (२) विकल्प और बाध। समुच्चय का अर्थ है सभी आश्रमों का समुचित समाहार, अर्थात्‌ चारों आश्रमों का क्रमश: और समुचित पालन होना चाहिए। इसके अनुसार गृहस्थाश्रम में अर्थ और काम संबंधी नियमों का पालन उतना ही आवश्यक है जितना ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास में धर्म और मोक्षसंबंधी धर्मो का पालन। इस सिद्धांत के सबसे बड़े प्रवर्तक और समर्थक मनु (अ.४ तथा६) हैं। दूसरे सिद्धांत विकल्प का अर्थ यह है कि ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात्‌ व्यक्ति को यह विकल्प करने की स्वतंत्रता है कि वह गार्हस्थ्य आश्रम में प्रवेश करे अथवा सीधे संन्यास ग्रहण करे। समावर्तन से संदर्भ में ब्रह्मचारी दो प्रकार के बताए गए हैं। (१) उपकुर्वाण, जो ब्रह्मचर्य समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहता था और (२) नैष्ठिक, जो आजीवन गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहता था। इसी प्रकार स्त्रियों में ब्रह्मचर्य के पश्चात सद्योद्वाहा (तुरंत विवाहयोग्य) और ब्रह्मवादिनी (आजीवन ब्रह्मोपासना में लीन) होती थीं। यह सिद्धांत जाबालोपनिषद् तथा कई धर्मसूत्रों (वसिष्ठ तथा आपस्तंब) और कतिपय स्मृतियों (याज्ञ., लघु, हारीत) में प्रतिपादित किया गया है। बाध का अर्थ है सभी आश्रमों के स्वतंत्र अस्तित्व अथवा क्रम को न मानना अथवा आश्रम संस्था को ही न स्वीकार करना। गौतम तथा बौधायनधर्मसूत्रों में यह कहा गया है कि वास्तव में एक ही आश्रम गार्हस्थ्य है। ब्रहाचर्य उसकी भूमिका है:श्वानप्रस्थ और संन्यास महत्व में गौण (और प्राय: वैकल्पिक) हैं। मनु ने भी सबसे अधिक महत्व गार्हस्थ्य का ही स्वीकार किया गया है, जो सभी कर्मो और आश्रमों का उद्गम है। इस मत के समर्थक अपने पक्ष में शतपथ ब्राह्मण का वाक्य (एतद्वै जरामर्थसत्रं यदग्निहोत्रम = जीवनपर्यत अग्निहोत्र आदि यज्ञ करना चहिए। शत. १२, ४, १, १), ईशोपनिषद् का वाक्य (कुर्वत्रेवेहि कर्माणि जिजीविषेच्छंत समा:।-ईश-२) आदि उधृत करते हैं। गीता का कर्मयोग भी कर्म का संन्यास नहीं अपितु कर्म में संन्यास को ही श्रेष्ठ समझता है। आश्रम संस्था को सबसे बड़ी बाधा परंपराविरोधी बौद्ध एवं जैन मतों से हुई जो आश्रमव्यवस्था के समुच्चय और संतुलन को ही नहीं मानते और जीवन का अनुभव प्राप्त किए बिना अपरिपक्व संन्यास या यतिधर्त को अत्यधिक प्रश्रय देते हैं। मनु. (६, ३५) पर भाष्य करते हुए सर्वज्ञनारायण ने उपर्युक्त तीनों मतों में समन्वय करने की चेष्टा की है। सामान्यत: तो उनको समुच्चय का सिद्धांत मान्य है। विकल्प में वे अधिकारभेद मानते हैं। उनके विचार में बाध का सिद्धांत उन व्यक्तियों के लिए ही है जो अपने पूर्वसंस्कारों के कारण सांसारिक कर्मों में आजीवन आसक्त रहते हैं और जिनमें विवेक और वैराग्य का यथासमय उदय नहीं होता।

सुसंघटित आश्रम संस्था भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। किंतु इसका एक बहुत बड़ा सार्वभौम और शास्त्रीय महत्व है। यद्यपि ऐतिहासिक कारणों से इसके आदर्श और व्यवहार में अंतर रहा है, जो मानव स्वभाव को देखते हुए स्वाभाविक है, तथापि इसकी कल्पना और आंशिक व्यवहार अपने आप में गुरुत्व रखते हैं। इस विषय पर डॉयसन (एनसाइक्लोपीडिया ऑव रेलिजन ऐंड एथिक्स-‘आश्रम’ शब्द) का निम्नांकित मत उल्लेखनीय है: मनु तथा अन्य धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित आश्रम की प्रस्थापना से व्यवहार का कितना मेल था, यह कहना कठिन है; किंतु यह स्वीकार करने में हम स्वतंत्र हैं कि हमारे विचार में संसार के मानव इतिहास में अन्यत्र कोई ऐसा (तत्व या संस्था) नहीं है जो इस सिद्धांत की गरिमा की तुलना कर सके।

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • मनुस्मृति (अध्याय ३, ४, ५, तथा);
  • पी.वी.काणे: हिस्ट्री ऑव धर्मशास्त्र, भाग२, खंड १, पृ. ४१६-२६;
  • भगवानदास: सायंस ऑव सोशल आर्गेनाइज़ेशन, भाग१;
  • राजबली पांडेय: हिंदू संस्कार, धार्मिक तथा सामाजिक अध्ययन, चौखंभा भारती भवन, वाराणसी;
  • हेस्टिंग्ज़: एनसाइक्लोपिडिया ऑव रेलिजन ऐंड एथिक्‌स, ‘आश्रम’ शब्द।
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સંસ્કૃતમાં વિવાહ સંસ્કાર

સંસ્કૃતમાં વિવાહ સંસ્કાર

આપણાં શાસ્ત્રોએ તો અનેક રીતે અનેક પ્રસંગો દ્વારા લગ્નમાંગ્લય છતું કર્યુ છે. એટલે જીવનના અનેક ઉત્સવોમાં લગ્નોત્સવ સર્વ મંગલ જોવા મળે છે. આથી આ મંગલ પ્રવૃતિ માટે શાસ્ત્રોએ સપ્તપદી જેવી દીર્ઘદ્રષ્ટિયુક્ત વિધિનું નિર્માણ કર્યુ છે.લગ્નમાં જોડાતાં યુવકયુવતી-વરવધૂ-પોતાની ભાવિ જવાબદારી સમજે ને એને સતત નજરમાં રાખી, એનાથી ચ્યુત ન થાય તે હેતુસર ધર્મશાસ્ત્રે આ વિવાહ સંસ્કારની ચર્ચા કરી છે.

લગ્ન દામપત્યજીવનનો અનોખો સંસ્કાર છે. જગતની સભ્ય, અસભ્ય બધી જાતિઓએ તેનું મહત્વ સ્વીકાર્યુ છે. અને તેને એક સંસ્કાર તરીકેનો દરજ્જો આપ્યો છે. માનવી શરીર, મન અને બુદ્ધિના આવેગો પ્રમાણે જીવવા સર્જાયો નથી. એમ જ હોત તો મનુષ્ય અને પશુ વચ્ચે કોઇ તફાવત ન રહેત. વ્યક્તિ તરીકે અને સમાજ તરીકે માનવીના ભાગે કેટલાંક કર્તવ્યો અને અધિકારો આવે છે. તે બધાને નિષ્ઠાથી તથા સારી રીતે બજાવી શકાય તે સારુ જીવનમાં તેણે કેટલાક નિયમો વિધિ-વિધાનો સ્વીકારવા પડે છે. જેમને આપણે ધર્મ એમ જાણીએ છીએ.

આ પ્રકારના વ્રતો, વિધિ, વિધાનો અનેક પ્રકારના હોઇ શકે. આ ધર્મોને સિદ્ધ કરવા માટેનો આ વિવાહ બહુહેતુક છે.તે અનેક પ્રયોજનોને સિદ્ધ કરે છે.વિવાહ આ રીતે દામપત્ય જીવન અર્પણ કરતો અદ્ભૂત અને પાવન સંસ્કાર છે.જેમાં સ્ત્રી પુરુષનું દ્વેત ટળે છે. અને અદ્વેત સધાય છે. વર-વધૂમાં આ સંસ્કાર દ્વારા દિવ્યતા પ્રગટે છે. માનવીય ભાવનાઓનું ઉદાતીકરણ થાય છે. આ સંસ્કારથી વર-વધૂમાં અલૌકિક ભાવો જન્મે છે. ધર્મ, અર્થ, કામ અને મોક્ષ એ ચાર પુરુષાર્થોની સિદ્ધિ કરવા સારું આ ઉમદા વિવાહ સંસ્કાર આપણે ત્યાં મહત્વનું સ્થાન ધરાવે છે.

ચાર આશ્રમોની યોજના એ ભારતીય સંસ્કૃતિની આધાર-શિલા છે. તેમાં ગૃહસ્થાશ્રમ મોખરે છે. કારણ કે ગૃહસ્થાશ્રમ બધા આશ્રમોનો પાયો છે. ગૃહસ્થ જીવનનો આદર્શ વિવાહ સંસ્કારમાં ખૂબીપૂર્વક વ્યક્ત થયો છે. દેવ,બ્રાહ્મણ,સૂર્યનારાયણ, અગ્નિદેવ તથા સાજન-મહાજનની સમક્ષ સ્ત્રી-પુરુષ અથવા વર-વધૂ લગ્નગ્રંથિથી જોડાય છે. ભારતીય સંસ્કૃતિનો અપૂર્વ ચિતાર આપતો આ સંસ્કાર ન કેવળ ધાર્મિક, અર્પિતુ આધ્યાત્મિક રીતે પણ એકતા તરફ દોરી જનારો દિવ્ય સંસ્કાર છે.

વિવાહ સંસ્કાર સધર્મનું પાલન કરવા પ્રેરે છે. અને મનુષ્યને તે રીતે પરમપદને પંથે વાળે છે. વેદોની પવિત્ર ઋચાઓનો ઉદ્ ઘોષ, યજ્ઞવેદીની પાવક-જવાળાઓ વર-વધૂનાં હ્રદય દ્વારા અને ચિતને એક કરીને જીવનને મંગલમય બનાવે છે. તે રીતે વિવાહસંસ્કાર એક જીવનયજ્ઞ બની રહે છે.જેમાં ઇર્ષ્યા, દ્વેષ, કલહ, અને વૈમનસ્ય વગેરે અંદરના શત્રુઓને હોમીને વર-વધૂ સાચા અર્થમાં એકબીજાનાં પૂરક બને છે. દિવ્યજીવનમાં અધિકારી બને છે. આ સંસ્કારથી સ્ત્રી-પુરુષ ખરા અર્થમાં સહધર્મચારી બને છે, પુરુષ ગૃહસ્થ બને છે. અને સ્ત્રી ગૃહિણી (જાયા) બને છે. जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः। અર્થાત્ આ સ્ત્રી (જાયા) માં પુરુષ પુત્ર રુપે જન્મ પામે છે તેથી જ સ્ત્રીને જાયા કહે છે. (મનુસ્મૃતિ અ.9,શ્ર્લોક -8 ) એ વિધાન યથાર્થ છે. વિવાહનો આવો અપૂર્વ મહિમા છે અને એવી તેની અનેરી સિદ્ધિ છે.

માનવજીવનમાં સંસ્કારોને મહત્વનું સ્થાન આપ્યું છે. એટલે જ ભારતીય સંસ્કૃતિ વિશ્ર્વની સર્વ સંસ્કૃતિઓમાં શ્રેષ્ઠ ગણાય છે. જન્મથી મનુષ્ય માત્ર શુદ્ર છે. સંસ્કારથી દ્ધિજ બને છે. શીલ એ આપણી સંસ્કૃતિનું હાર્દ છે. शीलं परं भूषणम् એ ભર્તુહરિની ઉક્તિ પણ ચારિત્ર્યની સર્વોપરિતા દશાવે છે. સંસ્કૃત ભાષામાં રહેલું આ અપૂર્વ સંસ્કૃતિનું તત્વ,પવિત્ર ષોડશ સંસ્કારો ખીલવીને તે દ્વારા માનવજીવનની નવી કેડીઓ કંડારવાનું કામ કરે છે. અને માનવને સાચા અર્થમાં સંસ્કારપૂર્તિ મનુષ્ય બનાવે છે. સાહિત્ય, સંગીત,કલાવિહીન અને પુચ્છવિષાણહીન પશુત્વમાંથી માનવનું સર્જન કરવાની અપૂર્વ શક્તિ સંસ્કારોમાં રહેલી છે. તે આપણને સંસ્કારોથી વિભૂષિત, પવિત્રજીવન જીવવાની કળા શીખવાડે છે. અને માનવીને કર્તવ્યની કેડીએ ચાલતાં ચાલતાં तेन त्यक्तेन भुजीथाः એ ઇશાવાસ્યોપનિષદનો પાઠ ભણાવે છે. ભારતીય સંસ્કૃતિના હાર્દસમી, સંસ્કારોથી સભર અનોખી એવી આ જીવનપદ્ધતિ છે, જેને વિવાહસંસ્કાર કહે છે.

આશ્રમોમાં શ્રેષ્ઠ ગૃહસ્થાશ્રમ છે. તેમ સંસ્કારોમાં લોકપ્રિય તથા શ્રેષ્ઠ વિવાહ સંસ્કાર કહે છે. વિવાહ દ્વારા વર-વધૂ ધર્મપૂર્વક પ્રજોત્પાદક કરી જીવનયજ્ઞને સારી રીતે ચલાવી શકે તેવા બલિષ્ઠ, દ્રઢિષ્ઠ અને તેજસ્વી સંતાનો ઉત્પન્ન કરે છે. અને સંસારને સુવ્યવસ્થિત ચલાવવાના બ્રહ્માના કાર્યને વધુ વ્યવસ્થિત બનાવે છે. ગૃહસ્થાશ્રમ બધા આશ્રમોનો આધાર છે.

यथा नदी नदाः सवे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणः सवे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ।  ( मनुस्मृति – 6-9 )

અર્થાત્ જેમ બધી નદીઓ સાગરમાં આશ્રય મેળવે છે. તેમ બધા આશ્રમ ગૃહસ્થાશ્રમનો આધાર મેળવે છે. ગૃહસ્થાશ્રમ વિવાહ દ્રારા મળે છે. ગૃહસ્થાશ્રમ જીવનરથનાં બે પૈડાં છે. બન્ને પૈડાં વ્યવસ્થિત હોય તો જ રથ સરસ ચાલે. તેવું જ સંસારનું છે. વિવાહ શબ્દમાં વિ એટલે વિશિષ્ટ અને વાહ એટલે રથ. લગ્ન એક એવો વિશિષ્ટ રથ છે. જેનાં સ્ત્રી-પુરુષ બે ચક્રો છે. તે સમાન વિચારધારા વાળાં હોય તો સંસાર મધુર બને છે. લગ્ન એ ભોગવિલાસનું પ્રતીક નથી, તે તો માનવજીવનનો અદ્વૈત તંતુ છે. કર્તવ્યપાલનની કેડીએ ચાલવા માટેનો પરવાનો છે. એટલે જ વિવાહ એ યજ્ઞ છે. જીવનયજ્ઞનાં વર-વધૂ બન્ને સાધકો છે. તેમણે અનેક પ્રકારનાં કષ્ટો વચ્ચે અડગ રહીને, જીવન જીવી જવાનું છે. તેમ કરવામાં પ્રભુ ભૂલાય નહિ. એ રીતે લૌકિક કાયો પણ સાથે જ કરવાનાં રહે છે. ધર્મ, અર્થ, અને કામનું સમભાવે વિવેકપૂર્વક સેવન કરતાં મોક્ષ સહજભાવે મળી જાય તેવો આ ઉતમ સંસ્કાર છે.

વિવાહ સંસ્કારથી પવિત્ર વર-વધૂ પોતાના ગૃહસ્થજીવનમાં કામ, ક્રોધ, લોભ,મોહ,મદ, અને મદત્સર એ ષડ્ રિપુઓને વ્રતાચરણો ધ્વારા મહાત કરીને બદલામાં પ્રેમ અને સંતોષ પ્રાપ્ત કરે છે. એટલે જ લગ્ન ધ્વારા મનુષ્યને ઋણમુક્ત થવાનું ધર્મશાસ્ત્ર સૂચવે છે.

जायमानो ह वै ब्राह्मणः त्रिभिऋणैऋणवान् जायते ब्रह्मचयेण ।
ऋषिभ्यः यज्ञेन देवेभ्यः प्रज्या पितृभ्यः ।।  ( तैतरीयसंहिता-6-3-10-5 )

ઉત્પન્ન થતાં દ્વિજ માથે ત્રણ ઋણ હોય છે. બ્રહ્મચર્ય પાલન કરીને વેદાધ્યયનથી તે ઋષિ ઋણમાંથી મુક્તિ મેળવે છે. અને પ્રજોત્પાદન કરીને પિતૃઋણમાંથી મુક્તિ મેળવે છે.  ભગવાન મનુ પણ આ વિષે લખે છે

ऋणानि त्रीण्यापकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् ।
अनपाकृत्य मोक्षन्तु सेवमानो व्रजत्यधः ।।  ( मनुस्मृति-6-35 )

અર્થાત્ મનુષ્યએ ત્રણ પ્રકારનાં ઋણમાંથી મુક્ત થયા બાદ જ મોક્ષ માર્ગની ઉપાસના કરવી જોઇએ. ત્રણ ઋણ વેડફયા સિવાય મોક્ષની કામના કરનાર અધોગતિને પામે છે.

વિવાહ શબ્દ વિ ઉપસર્ગપૂર્વક વહ્ ધાતુથી કૃદન્તમાં घग्न् પ્રત્યય લગાડીને બનવાય છે જેનો અર્થ પત્નીસ્વીકાર એવો થાય છે.वाचस्पत्यम् કોશકારે दारपरिग्रहे तज्जनके व्यापारे च એવો અર્થ આપે છે.બીજા પણ અનેક અર્થો જેવાં કે કન્યાને તેના પિતાના ઘેરથી પતિને ઘેર સન્માનપૂર્વક લઇ જવી તે હસ્તમેળાપ,પાણિ-ગ્રહણ વગેરે.

આ સંસ્કારનો હેતુ જીવને શુદ્ધ અને પવિત્ર બનાવવાનો છે. સદાચરણ અને સમ્યક્ ચારિત્ર્યથી સંસારને માણીને પુરુષે પોતાની પત્ની સાથે પરમપદને પંથે સંચરવાનું છે.

આ સંસ્કારની વિધિ પણ એટલી જ ભવ્ય ઉદાત અને દિવ્ય છે.તેને સમજવામાં આવે તો જ તેની મહતા પિછાની શકાય.

વિવાહવિધિ એ સંસ્કારનો અમૂલ્ય વારસો જાળવનારી વિધિ છે. તેનું મૂલ્ય જેટલું આંકીએ તેટલું ઓછું છે. સંસ્કૃતિનાં સાચાં મૂલ્યો વૈદિક મહર્ષિઓએ આ સંસ્કારો ધ્વારા રજૂ કયા છે. આ સંસ્કારવિધિનું મૂલ્ય જનતા સમજે તે વધુ સારુ આટલી લાંબી વિવાહસંસ્કારની પ્રસ્તાવના રજૂ કરવામાં આવી છે.

લગ્ન સંસ્કારથી જોડાતાં વર-વધૂ માટે આ સંસ્કારવિધિ એક અનુપમ ભેટ છે. મધુપર્કાચન,પાણિગ્રહણ, કન્યાદાન-સંકલ્પ, લાજાહોમ, અશ્મારોહણ, સપ્તપદી, હદયલંબન વગેરે વિવાહની અંગભૂત વિધિઓ વર-વધૂ સમજે તો તેમને માટે આ સંસ્કાર એક દિવ્ય પ્રસંગ બની જાય. પ્રભુતામાં પગલાં માંડનાર પ્રત્યેક પરણીત યુગલ આ સંસ્કાર દ્વારા જીવનને ધન્ય બનાવી શકે છે. બે મળીને એક બનતાંની સાથે धन्यो गृहस्थाश्रमः ની સાત્વિક ભાવના તેમના હદયમાં જાગે છે અને વાસનાજન્મ કામનું વિરેચનીકરણ થઇ પ્રેમની પવિત્ર ભાવના તેમના હદયમાં ધબકે છે. જીવન મંગળમય બની જાય છે તેમાં કોઇ શંકા નથી.

આજે જ્યારે સંસ્કૃતિનાં મૂલ્યોનો હ્રાસ થઇ રહ્યો છે ત્યારે વિવાહ સંસ્કારમાં આવતી વિધિઓ, તેમાં ભણવામાં આવતા વૈદિક મંત્રોનો મર્મ, વિધિનું ગાંભીર્ય તથા પવિત્રતા વર-વધૂમાં પ્રગટે તો જ તે વિધિનું સાર્થક્ય છે.

પ્રસ્તુત લેખમાં માનવજીવનના અમૂલ્ય એવા વિવાહસંસ્કારનું એક આગવુ નિરૂપણ કરેલ છે.

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विवाह संस्कार

विवाह संस्कार
हिन्दू धर्म में; सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है । भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है । इसलिए कहा गया है ‘धन्यो गृहस्थाश्रमः’ । सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं । वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं । ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है । युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं ।

संस्कार प्रयोजन

विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है । दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं । स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं । विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करतेहैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है । इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है । एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है । वासना कादाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके ।

विवाह का स्वरूप्

विवाह का स्वरूप आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं । रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का हीरूप धारण कर लेगा । पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी । शारीरिक आकषर्ण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे । अभी पत्नि का चुनाव शारीरिक आकषर्ण का ध्यान में रखकर किये जाने की प्रथा चली है, थोड़े ही दिनों में इसकी प्रतिक्रिया पति के चुनाव में भी सामने आयेगी । तब असुन्दर पतियों को कोई पतनी पसन्द न करेगी और उन्हेंदाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा । समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकषर्ण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए । शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दयर् देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसेप्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए । इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है । अतएव पति-पतनी को एक-दूसरे से आकषर्ण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास कीसम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए । चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है । जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए । जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए । जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनीओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है । इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है । समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की,देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में सेकोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें । पति-पतनी इन सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं । यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है । इस अवसर पर दोनों की ही यह भावनाएँ गहराई तक अपने मन में जमानी चाहिएकि वे पृथक् व्यक्तियों की सत्ता समाप्त कर एकीकरण की आत्मीयता में विकसित होते हैं । कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने अधीन-वशवर्ती रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा । वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो । दोनों अपनी इच्छा आवश्कता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा । इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है । इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बन्धन में बँधें । विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए । यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए ।

विशेष व्यवस्था

विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए । सामूहिक विवाह हो, तो प्रत्येक जोड़े के हिसाब से प्रत्येक वेदी पर आवश्यक सामग्री रहनी चाहिए,कमर्काण्ड ठीक से होते चलें, इसके लिए प्रत्येक वेदी पर एक-एक जानकार व्यक्ति भी नियुक्त करना चाहिए । एक ही विवाह है, तो आचार्य स्वयं ही देख-रेख रख सकते हैं । सामान्य व्यवस्था के साथ जिन वस्तुओं की जरूरत विशेष कमर्काण्ड में पड़ती है, उन पर प्रारम्भ में दृष्टि डाल लेनी चाहिए । उसके सूत्र इस प्रकार हैं । वर सत्कार के लिए सामग्री के साथ एक थाली रहे, ताकि हाथ, पैर धोने की क्रिया में जल फैले नहीं । मधुपर्क पान के बाद हाथ धुलाकर उसे हटा दिया जाए । यज्ञोपवीत के लिए पीला रंगा हुआ यज्ञोपवीत एक जोड़ा रखा जाए । विवाह घोषणा के लिए वर-वधू पक्ष की पूरी जानकारी पहले से ही नोट कर ली जाए । वस्त्रोपहार तथा पुष्पोपहार के वस्त्र एवं मालाएँ तैयार रहें । कन्यादान में हाथ पीले करने की हल्दी, गुप्तदान के लिए गुँथा हुआ आटा (लगभग एक पाव) रखें । ग्रन्थिबन्धन के लिए हल्दी, पुष्प,अक्षत, दुर्वा और द्रव्य हों । शिलारोहण के लिए पत्थर की शिला या समतल पत्थर का एक टुकड़ा रखा जाए । हवन सामग्री के अतिरिक्त लाजा (धान की खीलें) रखनी चाहिए । ‍वर-वधू के पद प्रक्षालन के लिए परात या थाली रखे जाए । पहले से वातावरण ऐसा बनाना चाहिए कि संस्कार के समय वर और कन्या पक्ष के अधिक से अधिक परिजन, स्नेही उपस्थित रहें । सबके भाव संयोग से कमर्काण्ड के उद्देश्य में रचनात्मक सहयोग मिलता है । इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही ढंग से आग्रह किए जा सकते हैं । विवाह के पूर्व यज्ञोपवीत संस्कार हो चुकता है । अविवाहितों को एक यज्ञोपवीत तथा विवाहितों को जोड़ा पहनाने का नियम है । यदि यज्ञोपवीत न हुआ हो, तो नया यज्ञोपवीत और हो गया हो, तो एक के स्थान पर जोड़ा पहनाने का संस्कार विधिवत् किया जाना चाहिए । ‍अच्छा हो कि जिस शुभ दिन को विवाह-संस्कार होना है, उस दिन प्रातःकाल यज्ञोपवीत धारण का क्रम व्यवस्थित ढंग से करा दिया जाए । विवाह-संस्कार के लिए सजे हुए वर के वस्त्र आदि उतरवाकर यज्ञोपवीत पहनाना अटपटा-सा लगता है । इसलिए उसको पहले ही पूरा कर लिया जाए । यदि वह सम्भव न हो, तो स्वागत के बाद यज्ञोपवीत धारण करा दिया जाता है । उसे वस्त्रों पर ही पहना देना चाहिए, जो संस्कार के बाद अन्दर कर लिया जाता है । जहाँ पारिवारिक स्तर के परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वारचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना सम्भव लगे, तो स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण उस समय भी पूरे कराये जा सकते हैं ‍विशेष आसन पर बिठाकर वर का सत्कार किया जाए । फिर कन्या को बुलाकर परस्पर वस्त्र और पुष्पोपहार सम्पन्न कराये जाएँ । परम्परागत ढंग से दिये जाने वाले अभिनन्दन-पत्र आदि भी उसी अवसर पर दिये जा सकते हैं । इसके कमर्काण्ड का संकेत आगे किया गया है । ‍पारिवारिक स्तर पर सम्पनन किये जाने वाले विवाह संस्कारों के समय कई बार वर-कन्या पक्ष वाले किन्हीं लौकिक रीतियोंके लिए आग्रह करते हैं । यदि ऐसा आग्रह है, तो पहले से नोट कर लेना-समझ लेना चाहिए । पारिवारिक स्तर पर विवाह-प्रकरणों में वरेच्छा, तिलक (शादी पक्की करना), हरिद्रा लेपन (हल्दी चढ़ाना) तथा द्वारपूजन आदि के आग्रह उभरते हैं । उन्हें संक्षेप में दिया जा रहा है, ताकि समयानुसार उनकानिवार्ह किया जा सके ।

वर-वरण (तिलक)

विवाह से पूर्व ‘तिलक’ का संक्षिप्त विधान इस प्रकार है- वर पूर्वाभिमुख तथा तिलक करने वाले (पिता,भाई आदि) पश्चिमाभिमुख बैठकर निम्नकृत्य सम्पन्न करें- मङ्गलाचरण, षट्कर्म, तिलक, कलावा,कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन आदि इसके बाद कन्यादाता वरका यथोचित स्वागत-सत्कार (पैर धुलाना, आचमन कराना तथा हल्दी से तिलक करके अक्षत लगाना) करें । ‍तदुपरान्त ‘वर’ को प्रदान की जाने वाली समस्त सामग्री (थाल-थान, फल-फूल, द्रव्य-वस्त्रादि) कन्यादाता हाथ में लेकर संकल्प मन्त्र बोलते हुए वर को प्रदान कर दें-
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य, अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये पर्राधे श्रीश्वेतवाराहकल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे, भूर्लोके, जम्बूद्वीपे, भारतर्वषे, भरतखण्डे, आर्यावर्त्तैकदेशान्तर्गते, ………. क्षेत्रे, ………. विक्रमाब्दे ………. संवत्सरे ………. मासानां मासोत्तमेमासे ………. मासे ……….पक्षे ………. तिथौ ………. वासरे ………. गोत्रोत्पन्नः …………(कन्यादाता) नामाऽहं ……………(कन्या-नाम) नाम्न्या कन्यायाः (भगिन्याः) करिष्यमाण उद्वाहकमर्णि एभिवर्रणद्रव्यैः ……………(वर का गोत्र) गोत्रोत्पन्नं ……………(वर का नाम) नामानं वरं कन्यादानार्थं वरपूजनपूर्वकं त्वामहं वृणे, तन्निमित्तकंयथाशक्ति भाण्डानि, वस्त्राणि, फलमिष्टान्नानि द्रव्याणि च……………(वर का नाम) वराय समपर्ये ।
तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न तथा शान्ति पाठ करते हुए कार्यक्रम समाप्त करें ।


विवाह से पूर्व वर-कन्या के प्रायः हल्दी चढ़ाने का प्रचलन है, उसका संक्षिप्त विधान इस प्रकार है- सवर्प्रथम षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें । तत्पश्चात् निम्न मंत्र बोलते हुए वर/कन्या की हथेली- अङ्ग-अवयवों में (लोकरीति के अनुसार) हरिद्रालेपन करें-
ॐ काण्डात् काण्डात्प्ररोहन्ती, परुषः परुषस्परि । एवा नो दूवेर् प्र तनु, सहस्त्रेण शतेन च॥ -१३.२०
इसके बाद वर के दाहिने हाथ में तथा कन्या के बायें हाथ में रक्षा सूत्रकंकण (पीले वस्त्र में कौड़ी, लोहे की अँगूठी, पीली सरसों, पीला अक्षत आदि बाँधकर बनाया गया ।) निम्नलिखित मन्त्र से पहनाएँ-
ॐ यदाबध्नन्दाक्षायणा, हिरण्य शतानीकाय, सुमनस्यमानाः । तन्मऽआबध्नामि शतशारदाय,आयुष्माञ्जरदष्टियर्थासम्॥ -३४.५२
तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न, शान्तिपाठ के साथ कायर्क्रम पूर्ण करें ।

द्वार पूजा

विवाह हेतु बारात जब द्वार पर आती है, तो सर्वप्रथम ‘वर’ का स्वागत-सत्कार किया जाता है, जिसका क्रम इस प्रकार है- ‘वर’ के द्वार पर आते ही आरती की प्रथा हो, तो कन्या की माता आरती कर लें । तत्पश्चात् ‘वर’ और कन्यादाता परस्पर अभिमुख बैठकर षट्कर्म, कलावा, तिलक, कलशपूजन, गुरुवन्दना,गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें । इसके बाद कन्यादाता वर सत्कार के सभी कृत्य आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क आदि (विवाह संस्कार से) सम्पन्न कराएँ । तत्पश्चात् ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां……….. (पृ० …..) से तिलक लगाएँ तथा ॐ अक्षन्नमीमदन्त …… (पृ० ….) से अक्षत लगाएँ । माल्यार्पण एवं कुछ द्रव्य ‘वर’ को प्रदान करना हो, तो निम्नस्थ मन्त्रों से सम्पन्न करा दें- माल्यापर्ण मन्त्र- ॐ मंगलं भगवान् विष्णुः ………… (पृ०…) द्रव्यदान मन्त्र – ॐ हिरण्यगर्भः समवत्तर्ताग्रे ……… (पृ०…) तत्पश्चात् क्षमाप्रार्थना, नमस्कार, देवविसर्जन एवं शान्तिपाठ करें ।

विवाह संस्कार का विशेष कमर्काण्ड

विवाह वेदी पर वर और कन्या दोनों को बुलाया जाए, प्रवेश के साथ मङ्गलाचरण ‘भद्रं कणेर्भिः…….’मन्त्र बोलते हुए उन पर पुष्पाक्षत डाले जाएँ । कन्या दायीं ओर तथा वर बायीं ओर बैठे । कन्यादान करने वाले प्रतिनिधि कन्या के पिता, भाई जो भी हों, उन्हें पत्नी सहित कन्या की ओर बिठाया जाए । पत्नी दाहिने और पति बायीं ओर बैठें । सभी के सामने आचमनी, पंचपात्र आदि उपकरण हों । पवित्रीकरण, आचमन, शिखा-वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी-पूजन आदि षट्कर्म सम्पन्न करा लिये जाएँ । वर-सत्कार- (अलग से द्वार पूजा में वर सत्कार कृत्य हो चुका हो, तो दुबारा करने की आवश्यकतानहीं है ।) अतिथि रूप में आये हुए वर का सत्कार किया जाए । (१)आसन (२) पाद्य (३) अघ्यर् (४) आचमन (५) नैवेद्य आदि निधार्रित मन्त्रों से समपिर्त किए जाएँ ।
दिशा और प्रेरणा वर का अतिथि के नाते सत्कार किया जाता है । गृहस्थाश्रम में गृहलक्ष्मी का महत्त्व सवोर्परि होता है । उसे लेने वर एवं उसके हितैषी परिजन कन्या के पिता के पास चल कर आते हैं । श्रेष्ठ उद्देश्य से सद्भावनापूर्वक आये अतिथियों का स्वागत करना कन्या पक्ष का कत्तर्व्य हो जाता है । दोनों पक्षों को अपने-अपने इन सद्भावों को जाग्रत् रखना चाहिए । ■ वर का अर्थ होता है- श्रेष्ठ, स्वीकार करने योग्य । कन्या-पक्ष वर को अपनी कन्या के अनुरूप श्रेष्ठ व्यक्ति मानकर ही सम्बन्ध स्वीकार करें, उसी भाव से श्रेष्ठ भाव रखते हुए सत्कार करें और भगवान् से प्राथर्ना करें कि यह भाव सदा बनाये रखने में सहायता करें । ■ वर पक्ष सम्मान पाकर निरर्थक अहं न बढ़ाएँ । जिन मानवीय गुणों के कारण श्रेष्ठ मानकर वर का सत्कार करने की व्यवस्था ऋषियों ने बनाई है, उन शालीनता, जिम्मेदारी,आत्मीयता, सहकारिता जैसे गुणों को इतना जीवन्त बनाकर रखें कि कन्या पक्ष की सहज श्रद्धा उसकेप्रति उमड़ती ही रहे । ऐसा सम्भव हो, तो पारिवारिक सम्बन्धों में देवोपम स्नेह-मधुरता का संचार अवश्य होगा । ■ इन दिव्य भावों के लिए सबसे अधिक घातक है, संकीर्ण स्वाथर्परक लेन-देन का आग्रह । दहेज, चढ़ावा आदि के नाम पर यदि एक-दूसरे पर दबाव डाले जाते हैं, तो सद्भाव तो समाप्त हो ही जाती है, द्वेष और प्रतिशोध के दुर्भाव उभर आते हैं । वर-वधू के सुखद भविष्य को ध्यान में रखकर ऐसे अप्रिय प्रसंगों को विष मानकर उनसे सवर्था दूर रहना चाहिए । ध्यान रखें कि सत्कार में स्थूल उपचारों को नहीं हृदयगत भावों को प्रधान माना जाता है । उन्हीं के साथ निधार्रित क्रम पूरा किया-कराया जाए । क्रिया और भावना- स्वागतकत्तार् हाथ में अक्षत लेकर भावना करें कि वर की श्रेष्ठतम प्रवृत्तियों का अचर्न कर रहे हैं । देव-शक्तियाँ उन्हें बढ़ाने-बनाये रखने में सहयोग करें । निम्न मन्त्र बोलें- ॐ साधु भवान् आस्ताम् । अचर्यिष्यामो भवन्तम् । -पार०गृ० १.३1४
वर दाहिने हाथ में अक्षत स्वीकार करते हुए भावना करें कि स्वागतकत्तार् की श्रद्धा पाते रहने के योग्य व्यक्तित्व बनाये रखने का उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं । बोलें- ‘ॐ अचर्य ।’ आसन- स्वागतकत्तार् आसन या उसका प्रतीक (कुश या पुष्प आदि) हाथ में लेकर निम्न मन्त्र बोलें । भावना करें कि वर को श्रेष्ठता का आधार-स्तर प्राप्त हो । हमारे स्नेह में उसका स्थान बने । ॐ विष्टरो, विष्टरो, विष्टरः प्रतिगृह्यताम् । -पार०गृ०सू० १.३.६ वर कन्या के पिता के हाथ से विष्टर (कुश या पुष्प आदि) लेकर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि । – पार०गृ०सू० १.३.७ उसे बिछाकर बैठ जाए, इस क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए- ॐ वष्मोर्ऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूयर्ः । इमन्तमभितिष्ठामि, यो मा कश्चाभिदासति॥ – पार०गृ०सू० १.३.८ पाद्य- स्वागतकत्तार् पैर धोने के लिए छोटे पात्र में जल लें । भावना करें कि ऋषियों के आदर्शों के अनुरूप सद्गृहस्थ बनने की दिशा में बढ़ने वाले पैर पूजनीय हैं । कन्यादाता कहें- ॐ पाद्यं, पाद्यं, पाद्यं, प्रतिगृह्यताम् । – पार०गृ०सू०१.३.६ वर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि । – पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि आदर्शों की दिशा में चरण बढ़ाने की उमंग इष्टदेव बनाये रखें । पद प्रक्षालन की क्रिया के साथ यह मन्त्र बोला जाए । ॐ विराजो दोहोऽसि, विराजो दोहमशीय मयि, पाद्यायै विराजो दोहः । – पार०गृ०सू० १.३.१२
अर्घ्य- स्वागतकत्तार् चन्दन युक्त सुगन्धित जल पात्र में लेकर भावना करे कि सत्पुरुषाथर् में लगने का संस्कार वर के हाथों में जाग्रत् करने हेतु अघ्यर् दे रहे हैं । कन्यादाता कहे- ॐ अर्घो, अर्घो, अर्घःप्रतिगृह्यताम् । – पार०गृ०सू०१.३.६
जल पात्र स्वीकार करते हुए वर कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि । – पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि सुगन्धित जल सत्पुरुषार्थ के संस्कार दे रहा है । जल से हाथ धोएँ । क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए ।
ॐ आपःस्थ युष्माभिः, सवार्न्कामानवाप्नवानि । ॐ समुद्रं वः प्रहिणोमि, स्वां योनिमभिगच्छत । अरिष्टाअस्माकं वीरा, मा परासेचि मत्पयः । – पार०गृ०सू० १.३.१३-१४
आचमन- स्वागतकत्तार् आचमन के लिए जल पात्र प्रस्तुत करें । भावना करें कि वर-श्रेष्ठ अतिथि का मुख उज्ज्वल रहे, उसकी वाणी उसका व्यक्तित्व तदनुरूप बने । कन्यादाता कहे- ॐ आचमनीयम्,आचमीयनम्, आचमीनयम्, प्रतिगृह्यताम्॥ ॐ प्रतिगृह्णामि । (वर कहे) -पार०गृ०सू० १.३.६ भावना करेंकि मन, बुद्धि और अन्तःकरण तक यह भाव बिठाने का प्रयास कर रहे हैं । तीन बार आचमन करें । यह मन्त्र बोला जाए । ॐ आमागन् यशसा, स सृज वचर्सा । तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं,पशूनामरिष्टिं तनूनाम् । – पार०गृ०सू० १.३.१५
नैवेद्य- एक पात्र में दूध, दही, शकर्रा (मधु) और तुलसीदल डाल कर रखें । स्वागतकर्त्ता वह पात्र हाथ में लें । भावना करें कि वर की श्रेष्ठता बनाये रखने योग्य सात्विक, सुसंस्कारी और स्वास्थ्यवधर्क आहार उन्हें सतत प्राप्त होता रहे । कन्यादाता कहे- ॐ मधुपकोर्, मधुपकोर्, मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम् । – पार०गृ०सू० १.३.६ वर पात्र स्वीकार करते हुए कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि । वर मधुपर्क का पान करे । भावना करें कि अभक्ष्य के कुसंस्कारों से बचने, सत्पदार्थों से सुसंस्कार अजिर्त करते रहने का उत्तरदायित्व स्वीकार रहे हैं । पान करते समय यह मन्त्र बोला जाए । ॐ यन्मधुनो मधव्यं परम रूपमन्नाद्यम् । तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण, रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि ।- पार०गृ०सू० १.३.२०
तत्पश्चात् जल से वर हाथ-मुख धोए । स्वच्छ होकर अगले क्रम के लिए बैठे । इसके बाद चन्दन धारण कराएँ । यदि यज्ञोपवीत धारण पहले नहीं कराया गया है, तो यज्ञोपवीत प्रकरण के आधार पर संक्षेप में उसे सम्पन्न कराया जाए । इसके बाद क्रमशः कलशपूजन, नमस्कार, षोडशोपचार पूजन, स्वस्तिवाचन,रक्षाविधान आदि सामान्य क्रम करा लिए जाएँ । रक्षा-विधान के बाद संस्कार का विशेष प्रकरण चालू किया जाए ।

विवाह घोषणा

विवाह घोषणा की एक छोटी-सी संस्कृत भाषा की शब्दावली है, जिसमें वर-कन्या के गोत्र पिता-पितामह आदि का उल्लेख और घोषणा है कि यह दोनों अब विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होते हैं । इनका साहचर्य धर्म-संगत जन साधारण की जानकारी में घोषित किया हुआ माना जाए । बिना घोषणा के गुपचुप चलने वाले दाम्पत्य स्तर के प्रेम सम्बन्ध, नैतिक, धामिर्क एवं कानूनी दृष्टि से अवांछनीय माने गये हैं । जिनके बीच दाम्पत्य सम्बन्ध हो, उसकी घोषणा सवर्साधारण के समक्ष की जानी चाहिए । समाज की जानकारी से जो छिपाया जा रहा हो, वही व्यभिचार है । घोषणापूवर्क विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होकर वर-कन्या धर्म परम्परा का पालन करते हैं ।
स्वस्ति श्रीमन्नन्दनन्दन चरणकमल भक्ति सद् विद्या विनीतनिजकुलकमलकलिकाप्रकाशनैकभास्कार सदाचार सच्चरित्र सत्कुल सत्प्रतिष्ठा गरिष्ठस्य ………गोत्रस्य …….. महोदयस्य प्रपोत्रः ……….महोदयस्य पोत्र………. महोदयस्य पुत्रः॥ ……. महोदयस्य प्रपौत्री, …….. महोदयस्य पौत्री ………महोदसस्य पुत्री प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये । स्वस्ति संवादेषूभयोवृर्द्धिवर्रकन्ययोश्चिरंजीविनौ भूयास्ताम् ।


विवाह घोषणा के बाद, सस्वर मङ्गलाष्टक मन्त्र बोलें जाएँ । इन मन्त्रों में सभी श्रेष्ठ शक्तियों से मङ्गलमय वातावरण, मङ्गलमय भविष्य के निमार्ण की प्रार्थना की जाती है । पाठ के समय सभी लोग भावनापूर्वक वर-वधू के लिए मङ्गल कामना करते रहें । एक स्वयं सेवक उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करता रहे ।
ॐमत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः । चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः । प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः, स्वामी शक्तिधरश्च लाङ्गलधरः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥१॥ गङ्गागोमतिगोपतिगर्णपतिः, गोविन्दगोवधर्नौ, गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता, गङ्गाधरो गौतमः । गायत्री गरुडो गदाधरगया, गम्भीरगोदावरी, गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥२॥ नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं, तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम् । गङ्गावाहपथत्रयं सुविमलं,वेदत्रयं ब्राह्मणम्, संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥३॥ बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासोवसिष्ठो भृगुः, जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽ गिरा गौतमः । मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः, पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥४॥ गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपणार्शिवाः, सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती । स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी, वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥५॥ गङ्गा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चमर्ण्वती वेदिका । शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी, पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥६॥ लक्ष्मीःकौस्तुभपारिजातकसुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमा, गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः । अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधे, रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥७॥ ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूयोर् ग्रहाणां पतिः, शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः । विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमा, इत्येते पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥८॥

परस्पर उपहार

वर पक्ष की ओर से कन्या को और कन्या पक्ष की ओर से वर का वस्त्र-आभूषण भेंट किये जाने की परम्परा है । यह कार्य श्रद्धानुरूप पहले ही हो जाता है । वर-वधू उन्हें पहनाकर ही संस्कार में बैठते हैं । यहाँ प्रतीक रूप से पीले दुपट्टे एक-दूसरे को भेंट किये जाएँ । यही ग्रन्थि बन्धन के भी काम आ जाते हैं । आभूषण पहिनाना हो, तो अँगूठी या मङ्गलसूत्र जैसे शुभ-चिह्नों तक ही सीमित रहना चाहिए । दोनों पक्ष भावना करें कि एक-दूसरे का सम्मान बढ़ाने, उन्हें अलंकृत करने का उत्तरदायितव समझने और निभाने के लिए संकल्पित हो रहे हैं । नीचे लिखे मन्त्र के साथ परस्पर उपहार दिये जाएँ ।
ॐ परिधास्यै यशोधास्यै, दीघार्युत्वाय जरदष्टिरस्मि । शतं च जीवामि शरदः, पुरूचीरायस्पोषमभि संव्ययिष्ये । – पार०गृ०सू० २.६.२०

पुष्पोहार (माल्यापर्ण) वर-वधू एक-दूसरे को अपने अनुरूप स्वीकार करते हुए, पुष्प मालाएँ अपिर्त करते हैं । हृदय से वरण करते हैं । भावना करें कि देव शक्तियों और सत्पुरुषों के आशीर्वाद से वे परस्पर एक दूसरे के गले के हार बनकर रहेंगे । मन्त्रोच्चार के साथ पहले कन्या वर को फिर वर-कन्या को मालापहिनाएँ ।
ॐ यशसा माद्यावापृथिवी, यशसेन्द्रा बृहस्पती । यशो भगश्च मा विदद्, यशो मा प्रतिपद्यताम् । – पार०गृ०सू० २.६.२१, मा०गृ०सू० १.९.२७


शिक्षा एवं प्रेरणा

कन्यादान करने वाले कन्या के हाथों में हल्दी लगाते हैं । हरिद्रा मङ्गलसूचक है । अब तक बालिका के रूप में यह लड़की रही । अब यह गृहलक्ष्मी का उत्तरदायित्व वहन करेगी, इसलिए उसके हाथों को पीतवर्ण-मङ्गलमय बनाया जाता है । उसके माता-पिता ने लाड़-प्यार से पाला, उसके हाथों में कोई कठोरकत्तर्व्य नहीं सौंपा । अब उसे अपने हाथों को नव-निमार्ण के अनेक उत्तरदायित्व सँभालने को तैयार करना है, अतएव उन्हें पीतवर्ण माङ्गलिक-लक्ष्मी का प्रतीक-सृजनात्मक होना चाहिए । पीले हाथ करते हुए कन्या परिवार के लोग उस बालिका को यही मौन शिक्षण देते हैं कि उसे आगे सृजन शक्ति के रूप में प्रकट होना है और इसके लिए इन कोमल हाथों को अधिक उत्तरदायी, मजबूत और माङ्गलिक बनाना है ।

क्रिया और भावना

कन्या दोनों हथेलियाँ सामने कर दे । कन्यादाता गीली हल्दी उस पर मन्त्र के साथ मलें । भावना करें कि देव सान्निध्य में इन हाथों को स्वाथर्परता के कुसंस्कारों से मुक्त कराते हुए त्याग परमार्थ के संस्कार जाग्रत् किये जा रहे हैं ।
ॐ अहिरिव भोगैः पयेर्ति बाहंु, ज्याया हेतिं परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्, पुमान् पुमा सं परिपातु विश्वतः । -२९.५१

शिक्षा एवं प्रेरणा

कन्यादान – गुप्तदान

कन्यादान के समय कुछ अंशदान देने की प्रथा है । आटे की लोई में छिपाकर कुछ धन कन्यादान के समय दिया जाता है । दहेज का यही स्वरूप है । बच्ची के घर से विदा होते समय उसके अभिभावक किसी आवश्यकता के समय काम आने के लिए उपहार स्वरूप कुछ धन देते हैं, पर होता वह गुप्त ही है । अभिभावक और कन्या के बीच का यह निजी उपहार है । दूसरों को इसके सम्बन्ध में जानने या पूछने की कोई आवश्यकता नहीं । दहेज के रूप में क्या दिया जाना चाहिए, इस सम्बन्ध में ससुराल वालों को कहने या पूछने का कोई अधिकार नहीं । न उसके प्रदशर्न की आवश्यकता है, क्यों कि गरीब-अमीर अपनी स्थिति के अनुसार जो दे, वह चर्चा का विषय नहीं बनना चाहिए, उसके साथ निन्दा-प्रशंसा नहीं जुड़नी चाहिए । एक-दूसरे का अनुकरण करने लगें, प्रतिस्पर्द्धा पर उतर आएँ, तो इससे अनर्थ ही होगा । कन्या-पक्ष पर अनुचित दबाव पड़ेगा और वर-पक्ष अधिक न मिलने पर अप्रसन्न होने की धृष्टता करने लगेगा । इसलिए कन्यादान के साथ कुछ धनदान का विधान तो है, पर दूरर्दशी ऋषियों ने लोगों की स्वाथर्परता एवं दुष्टता की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह नियम बना दिया है कि जो कुछ भी दहेज दिया जाए, वह सर्वथा गुप्त हो, उस पर किसी को चर्चा करने का अधिकार न हो । आटे में साधारणतया एक रुपया इस दहेज प्रतीक के लिए पयार्प्त है । यह धातु का लिया जाए और आटे के गोले के भीतर छिपाकर रखा जाए ।

कन्यादान का अर्थ

– अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना । अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे,अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा । कन्या नये घर में जाकर विरानेपन का अनुभव न करने पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा । कन्यादान स्वीकार करते समय-पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहना है । कन्यादान का अर्थ यह नहीं कि जिस प्रकार कोई सम्पत्ति, किसी को बेची या दान कर दी जाती है, उसी प्रकार लड़की को भी एक सम्पत्ति समझकर किसी न किसी को चाहे जो उपयोग करने के लिए दे दिया है । हर मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता एवं स्थिति है । कोई मनुष्य किसी मनुष्य को बेच या दान नहीं कर सकता । फिर चाहे वह पिता ही क्यों न हो । व्यक्ति के स्वतन्त्र अस्तित्व एवं अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता, न उसे चुनौती दी जा सकती है । लड़की हो या लड़का अभिभावकों को यह अधिकार नहीं कि वे उन्हें बेचें या दान करें । ऐसा करना तो बच्चे के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के तथ्य को ही झुठलाना हो जाएगा । विवाह उभयपक्षीय समझौता है, जिसे वर और वधू दोनों ही पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निर्वाह कर सफल बनाते हैं । यदि कोई किसी को खरीदी या बेची सम्पत्ति के रूप में देखें और उस पर पशुओं जैसा स्वामित्व अनुभव करें या व्यवहार करें, तो यह मानवता के मूलभूत अधिकारों का हनन करना ही होगा । कन्यादान का यह तात्पर्य कदापि नहीं, उसका प्रयोजन इतना ही है कि कन्या के अभिभावक बालिका के जीवन को सुव्यवस्थित,सुविकसित एवं सुख-शान्तिमय बनाने की जिम्मेदारी को वर तथा उसके अभिभावकों पर छोड़ते हैं, जिसे उन्हें मनोयोगपूवर्क निबाहना चाहिए । पराये घर में पहुँचने पर कच्ची उम्र की अनुभवहीन भावुक बालिका को अखरने वाली मनोदशा में होकर गुजरना पड़ता है । इसलिए इस आरम्भिक सन्धिवेला में तो विशेष रूप से वर पक्ष वालों को यह प्रयास करना चाहिए कि हर दृष्टि से वधू को अधिक स्नेह, सहयोग मिलता रहे । कन्या पक्ष वालों को भी यह नहीं सोच लेना चाहिए कि लड़की के पीले हाथ कर दिये,कन्यादान हो गया, अब तो उन्हें कुछ भी करना या सोचना नहीं है । उन्हें भी लड़की के भविष्य कोउज्ज्वल बनाने में योगदान देते रहना है । क्रिया और भावना- कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर सङ्कल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं । वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों को पकड़कर स्वीकार-शिरोधार्य करता है । भावना करें कि कन्या वर को सौंपते हुए उसके अभिभावक अपने समग्र अधिकार को सौंपते हैं । कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा के अनुसार होंगे । कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने तथा पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्तिदेवशक्तियाँ प्रदान कर रही हैं । इस भावना के साथ कन्यादान का सङ्कल्प बोला जाए । सङ्कल्प पूरा होने पर सङ्कल्पकत्तार् कन्या के हाथ वर के हाथ में सौंप दें ।
अद्येति………नामाहं………नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि – अचिर्तां,वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ……… नाम्ने,विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पतनीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे । वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति ।


दिशा प्रेरणा

गौ पवित्रता और परमार्थ परायणता की प्रतीक है । कन्या पक्ष वर को ऐसा दान दें, जो उन्हें पवित्रता और परमार्थ की प्रेरणा देने वाला हो । सम्भव हो, तो कन्यादान के अवसर पर गाय दान में दी जा सकती है । वह कन्या के व उसके परिवार के लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त भी है । आज कीस्थिति में यदि गौ देना या लेना असुविधाजनक हो, तो उसके लिए कुछ धन देकर गोदान की परिपाटी को जीवित रखा जा सकता है । क्रिया और भावना- कन्यादान करने वाले हाथ में सामग्री लें । भावना करें कि वर-कन्या के भावी जीवन को सुखी समुन्नत बनाने के लिए श्रद्धापूवर्क श्रेष्ठ दान कर रहे हैं ।मन्त्रोच्चार के साथ सामग्री वर के हाथ में दें ।
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां, स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः । प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा,गामनागामदितिं वधिष्ट॥ -ऋ०८.१०.१.१५, पार०गृ०सू० १.३.२७


दिशा और प्रेरणा

कन्यादान-गोदान के बाद कन्यादाता वर से सत् पुरुषों और देव शक्तियों की साक्षी में मर्यादा की विनम्र अपील करता है । वर उसे स्वीकार करता है । कन्या का उत्तरदायित्व वर को सौंपा गया है । ऋषियों द्वारा निधार्रित अनुशासन विशेष लक्ष्य के लिए हैं । अधिकार पाकर उस मयार्दा को भुलकर मनमानाआचरण न किया जाए । धर्म, अर्थ और काम की दिशा में ऋषि प्रणीत मयार्दा का उल्लंघन अधिकार के नशे में न किया जाए । यह निवेदन किया जाता है, जिसे वर प्रसन्नतापूवर्क स्वीकार करता है ।

क्रिया और भावना

कन्यादान करने वाले अपने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत लें । भावना करें कि वर को मयार्दा सौंप रहे हैं । वर मयार्दा स्वीकार करें, उसके पालन के लिए देव शक्तियों के सहयोग की कामना करे ।
ॐ गौरीं कन्यामिमां पूज्य! यथाशक्तिविभूषिताम् । गोत्राय शमर्णे तुभ्यं, दत्तां देव समाश्रय॥ धमर्स्याचरणं सम्यक्, क्रियतामनया सह । धमेर् चाथेर् च कामे च, यत्त्वं नातिचरेविर्भो॥ वर कहें- नातिचरामि ।


दिशा एवं प्रेरणा

वर द्वारा मर्यादा स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे । इस प्रकार दोनों एक दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं । यह क्रिया हाथ से हाथ मिलाने जैसी होती है । मानों एक दूसरे को पकड़कर सहारा दे रहे हों । कन्यादान की तरह यह वर-दान कीक्रिया तो नहीं होती, फिर भी उस अवसर पर वर की भावना भी ठीक वैसी होनी चाहिए, जैसी कि कन्या को अपना हाथ सौंपते समय होती है । वर भी यह अनुभव करें कि उसने अपने व्यक्तित्व का अपनी इच्छा, आकांक्षा एवं गतिविधियों के संचालन का केन्द्र इस वधू को बना दिया और अपना हाथ भी सौंप दिया । दोनों एक दूसरे को आगे बढ़ाने के लिए एक दूसरे का हाथ जब भावनापूर्वक समाज के सम्मुख पकड़ लें, तो समझना चाहिए कि विवाह का प्रयोजन पूरा हो गया ।

क्रिया और भावना

नीचे लिखे मन्त्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाये, वर उसे अँगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले । भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं ।
ॐे यदैषि मनसा दूरं, दिशोऽ नुपवमानो वा । हिरण्यपणोर् वै कणर्ः, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ॥ – पार०गृ०सू० १.४.१५


दिशा और प्रेरणा

वर-वधू द्वारा पाणिग्रहण एकीकरण के बाद समाज द्वारा दोनों को एक गाँठ में बाँध दिया जाता है । दुपट्टे के छोर बाँधने का अर्थ है-दोनों के शरीर और मन से एक संयुक्त इकाई के रूप में एक नई सत्ता का आविर्भाव होना । अब दोनों एक-दूसरे के साथ पूरी तरह बँधे हुए हैं । ग्रन्थिबन्धन में धन, पुष्प,दूर्वा, हरिद्रा और अक्षत यह पाँच चीजें भी बाँधते हैं । पैसा इसलिए रखा जाता है कि धन पर किसी एक का अधिकार नहीं रहेगा । जो कमाई या सम्पत्ति होगी, उस पर दोनों की सहमति से योजना एवं व्यवस्था बनेगी । ‍दूर्वा का अर्थ है- कभी निजीर्व न होने वाली प्रेम भावना । दूर्वा का जीवन तत्त्व नष्ट नहीं होता, सूख जाने पर भी वह पानी डालने पर हरी हो जाती है । इसी प्रकार दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए अजस्र प्रेम और आत्मीयता बनी रहे । चन्द्र-चकोर की तरह एक-दूसरे पर अपने को न्यौछावर करते रहें । अपना कष्ट कम और साथी का कष्ट बढ़कर मानें, अपने सुख की अपेक्षा साथी के सुख का अधिक ध्यान रखें । अपना आन्तरिक प्रेम एक-दूसरे पर उड़ेलते रहें । हरिद्रा का अर्थ है- आरोग्य, एक-दूसरे के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को सुविकसित करने का प्रयतन करें । ऐसा व्यवहार न करें, जिससे साथी का स्वास्थ्य खराब होता हो या मानसिक उद्वेग पैदा होता हो । अक्षत, सामूहिक-सामाजिक विविध-विध उत्तरदायित्वों का स्मरण कराता है । कुटुम्ब में कितने ही व्यक्ति होते हैं । उन सबका समुचित ध्यान रखना, सभी को सँभालना संयुक्त पति-पत्नी का परम पावन कत्तर्व्य है । ऐसा न हो कि एक-दूसरे को तो प्रेम करें, पर परिवार के लोगों की उपेक्षा करने लगें । इसी प्रकार परिवार से बाहर भी जन मानस के सेवा की जिम्मेदारी हर भावनाशील मनुष्य पर रहती है । ऐसा न हो कि दो में से कोई किसी को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ सहयोग तक ही सीमित कर ले, उसे समाज सेवा की सुविधा न दे । इस दिशा में लगने वाले समय व धन का विरोध करे । अक्षत इसी का संकेत करता है कि आप दोनों एक-दूसरे के लिए ही नहीं बने हैं, वरन् समाजसेवा का व्रत एवं उत्तरदायित्व भी आप लोगों के ग्रन्थिबन्धन में एक महत्त्वपूणर् लक्ष्य के रूप में विद्यमान है । पुष्प का अर्थ है, हँसते-खिलते रहना । एक-दूसरे को सुगन्धित बनाने के लिए यश फैलाने और प्रशंसा करने के लिए तत्पर रहें । कोई किसी का दूसरे के आगे न तो अपमान करे और न तिरस्कार । इस प्रकार दूर्वा, पुष्प, हरिद्रा, अक्षत और पैसा इनपाँचों को रखकर दोनों का ग्रन्थिबन्धन किया जाता है और यह आशा की जाती है कि वे जिन लक्ष्यों के साथ आपस में बँधे हैं, उन्हें आजीवन निरन्तर स्मरण रखे रहेंगे । ‍

क्रिया और भावना-

ग्रन्थिबन्धन, आचायर् या प्रतिनिधि या कोई मान्य व्यक्ति करें । दुपट्टे के छोर एक साथ करके उसमें मंगल-द्रव्य रखकर गाँठ बाँध दी जाए । भावना की जाए कि मंगल द्रव्यों के मंगल संस्कार सहित देवशक्तियों के समथर्न तथा स्नेहियों की सद्भावना के संयुक्त प्रभाव से दोनों इस प्रकार जुड़ रहे हैं, जो सदा जुड़े रहकर एक-दूसरे की जीवन लक्ष्य यात्रा में पूरक बनकर चलेंगे-
ॐ समंजन्तु विश्वेदेवाः, समापो हृदयानि नौ । सं मातरिश्वा सं धाता, समुदेष्ट्री दधातु नौ॥ – ऋ०१०.८५.४७, पार०गृ०सू० १.४.१४

वर-वधू की प्रतिज्ञाएँ

दिशा और प्रेरणा

किसी भी महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण के साथ शपथ ग्रहण समारोह भी अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है । कन्यादान, पाणिग्रहण एवं ग्रन्थि-बन्धन हो जाने के साथ वर-वधू द्वारा और समाज द्वारा दाम्पत्य सूत्र में बँधने की स्वीकारोक्ति हो जाती है । इसके बाद अग्नि एवं देव-शक्तियों की साक्षी में दोनों को एकसंयुक्त इकाई के रूप में ढालने का क्रम चलता है । इस बीच उन्हें अपने कर्त्तव्य धर्म का महत्त्व भली प्रकार समझना और उसके पालन का संकल्प लेना चाहिए । इस दिशा में पहली जिम्मेदारी वर की होती है । अस्तु, पहले वर तथा बाद में वधू को प्रतिज्ञाएँ कराई जाती हैं ।

क्रिया और भावना-

वर-वधू स्वयं प्रतिज्ञाएँ पढ़ें, यदि सम्भव न हो, तो आचार्य एक-एक करके प्रतिज्ञाएँ व्याख्या सहित समझाएँ ।

वर की प्रतिज्ञाएँ

धमर्पतनीं मिलित्वैव, ह्येकं जीवनामावयोः । अद्यारम्भ यतो मे त्वम्, अर्द्धांगिनीति घोषिता ॥१॥ आज से धमर्पतनी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ । अपने शरीर के अंगों की तरह धमर्पतनी का ध्यान रखूँगा ।
स्वीकरोमि सुखेन त्वां, गृहलक्ष्मीमहन्ततः । मन्त्रयित्वा विधास्यामि, सुकायार्णि त्वया सह॥२॥ प्रसन्नतापूर्वक गृहलक्ष्मी का महान् अधिकार सौंपता हूँ और जीवन के निधार्रण में उनके परामर्श को महत्त्व दूँगा ।
रूप-स्वास्थ्य-स्वभावान्तु, गुणदोषादीन् सवर्तः । रोगाज्ञान-विकारांश्च, तव विस्मृत्य चेतसः॥३॥ रूप,स्वास्थ्य, स्वभावगत गुण दोष एवं अज्ञानजनित विकारों को चित्त में नहीं रखूँगा, उनके कारण असन्तोष व्यक्त नहीं करूँगा । स्नेहपूर्वक सुधारने या सहन करते हुए आत्मीयता बनाये रखूँगा ।
सहचरो भविष्यामि, पूणर्स्नेहः प्रदास्यते । सत्यता मम निष्ठा च, यस्याधारं भविष्यति॥४॥ पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और पूरा-पूरा स्नेह देता रहूँगा । इस वचन का पालन पूरी निष्ठा और सत्य के आधार पर करूँगा ।
यथा पवित्रचित्तेन, पातिव्रत्य त्वया धृतम् । तथैव पालयिष्यामि, पतनीव्रतमहं ध्रुवम्॥५॥ पत्नी के लिए जिस प्रकार पतिव्रत की मर्यादा कही गयी है, उसी दृढ़ता से स्वयं पतनीव्रत धर्म का पालन करूँगा । चिन्तन और आचरण दोनों से ही पर नारी से वासनात्मक सम्बन्ध नहीं जोडूँगा ।
गृहस्याथर्व्यवस्थायां, मन्त्रयित्वा त्वया सह । संचालनं करिष्यामि, गृहस्थोचित-जीवनम्॥६॥ गृह व्यवस्था में धर्म-पत्नी को प्रधानता दूँगा । आमदनी और खर्च का क्रम उसकी सहमति से करने की गृहस्थोचित जीवनचयार् अपनाऊँग ।
समृद्धि-सुख-शान्तीनां, रक्षणाय तथा तव । व्यवस्थां वै करिष्यामि, स्वशक्तिवैभवादिभि॥७॥ धमर्पत्नी की सुख-शान्ति तथा प्रगति-सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी शक्ति और साधन आदि को पूरी ईमानदारी से लगाता रहूँगा ।
यतनशीलो भविष्यामि, सन्मागर्ंसेवितुं सदा । आवयोः मतभेदांश्च, दोषान्संशोध्य शान्तितः॥८॥ अपनी ओर से मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयतन करूँगा । मतभेदों और भूलों का सुधार शान्ति के साथ करूँगा । किसी के सामने पतनी को लाञ्छित-तिरस्कृत नहीं करूँगा ।
भवत्यामसमथार्यां, विमुखायाञ्च कमर्णि । विश्वासं सहयोगञ्च, मम प्राप्स्यसि त्वं सदा॥९॥ पत्नी के असमर्थ या अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाने पर भी अपने सहयोग और कर्त्तव्य पालन में रत्ती भर भी कमी न रखूँगा ।

कन्या की प्रतिज्ञाएँ

स्वजीवनं मेलयित्वा, भवतः खलु जीवने । भूत्वा चाधार्ंगिनी नित्यं, निवत्स्यामि गृहे सदा॥१॥ अपने जीवन को पति के साथ संयुक्त करके नये जीवन की सृष्टि करूँगी । इस प्रकार घर में हमेशा सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी बनकर रहूँगी ।
‍शिष्टतापूवर्कं सवैर्ः, परिवारजनैः सह । औदायेर्ण विधास्यामि, व्यवहारं च कोमलम्॥२॥ पति के परिवार के परिजनों को एक ही शरीर के अंग मानकर सभी के साथ शिष्टता बरतूँगी, उदारतापूवर्क सेवा करूँगी,मधुर व्यवहार करूँगी ।
त्यक्त्वालस्यं करिष्यामि, गृहकायेर् परिश्रमम् । भतुर्हर्षर्ं हि ज्ञास्यामि, स्वीयामेव प्रसन्नताम्॥३॥ आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूवर्क गृह कार्य करूँगी । इस प्रकार पति की प्रगति और जीवन विकास में समुचित योगदान करूँगी ।
श्रद्धया पालयिष्यामि, धमर्ं पातिव्रतं परम् । सवर्दैवानुकूल्येन, पत्युरादेशपालिका॥४॥ पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी, पति के प्रति श्रद्धा-भाव बनाये रखकर सदैव उनके अनूकूल रहूँगी । कपट-दुराव न करूँगी,निदेर्शों के अविलम्ब पालन का अभ्यास करूँगी ।
सुश्रूषणपरा स्वच्छा, मधुर-प्रियभाषिणी । प्रतिजाने भविष्यामि, सततं सुखदायिनी॥५॥ सेवा, स्वच्छता तथा प्रियभाषण का अभ्यास बनाये रखूँगी । ईर्ष्या, कुढ़न आदि दोषों से बचूँगी और सदा प्रसन्नता देने वाली बनकर रहूँगी ।
‍मितव्ययेन गाहर्स्थ्य-सञ्चालने हि नित्यदा । प्रयतिष्ये च सोत्साहं, तवाहमनुगामिनी॥६॥ मितव्ययी बनकर फिजूलखर्ची से बचूँगी । पति के असमर्थ हो जाने पर भी गृहस्थ के अनुशासन का पालन करूँगी ।
‍देवस्वरूपो नारीणां, भत्तार् भवति मानवः । मत्वेति त्वां भजिष्यामि, नियता जीवनावधिम्॥७॥ नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है- यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन भर सक्रिय रहूँगी,कभी भी पति का अपमान न करूँगी ।
पूज्यास्तव पितरो ये, श्रद्धया परमा हि मे । सेवया तोषयिष्यामि, तान्सदा विनयेन च॥८॥ जो पति के पूज्य और श्रद्धा पात्र हैं, उन्हें सेवा द्वारा और विनय द्वारा सदैव सन्तुष्ट रखूँगी ।
विकासाय सुसंस्कारैः, सूत्रैः सद्भाववद्धिर्भिः । परिवारसदस्यानां, कौशलं विकसाम्यहम्॥९॥ परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों के विकास तथा उन्हें सद्भावना के सूत्रों में बाँधे रहने का कौशल अपने अन्दर विकसित करूँगी ।

प्रायश्चित होम

दिशा एवं प्रेरणा

गायत्री मन्त्र की आहुति के पश्चात् पाँच आहुतियाँ प्रायश्चित होम की अतिरिक्त रूप से दी जाती है । वर और कन्या दोनों के हाथ में हवन सामग्री दी जाती है । प्रायश्चित होम की आहुतियाँ देते समय यह भावना दोनों के मन में आनी चाहिए कि दाम्पत्य जीवन में बाधक जो भी कुसंस्कार अब तक मन में रहे हों, उन सब को स्वाहा किया जा रहा है । किसी से गृहस्थ के आदर्शों के उल्लंघन करने की कोई भूल हुई हो, तो उसे अब एक स्वप्न जैसी बात समझकर विस्मरण कर दिया जाए । इस प्रकार की भूल के कारण कोई किसी को न तो दोष दे, न सन्देह की दृष्टि से देखे । इसी प्रकार कोई अन्य नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन रहा हो या स्वभाव में कठोरता, स्वाथर्परता, अहंकार जैसी कोई त्रुटि रही हो, तो उसका त्याग कर दिया जाए । साथ ही, उन भूलों का प्रायश्चित करते हुए भविष्य में कोई ऐसी भूल न करने का संकल्प भी करना है, जो दाम्पत्य जीवन की प्रगति में बाधा उत्पन्न करे ।

क्रिया और भावना

वर-वधू हवन सामग्री से आहुति करें । भावना करें कि प्रायश्चित आहुति के साथ पूर्व दुष्कृत्यों की धुलाई हो रही है । स्वाहा के साथ आहुति डालें, इदं न मम के साथ हाथ जोड़कर नमस्कार करें
ॐ त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्, देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो, विश्वा द्वेषा सि प्र मुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ -२१.३ ॐ स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती, नेदिष्ठो अस्या ऽ उषसो व्युष्टौ । अव यक्ष्व नो वरुण रराणो, वीहि मृडीक सुहवो न ऽ एधि स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ -२१.४ ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य, नभिशस्तिपाश्च, सत्यमित्वमयाऽ असि । अया नो यज्ञं वहास्यया, नो धेहि भेषज स्वाहा । इदमग्नये अयसे इदं न मम । -का०श्रौ०सू० २५.१.११ ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं, यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः, तेभिनोर्ऽअद्य सवितोत विष्णुः, विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वकार्ः स्वाहा । इदं वरुणायसवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वकेर्भ्यश्च इदं न मम । -का०श्रौ० सू० २५.१.११ ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं, विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो, अदितये स्याम स्वाहा । इदं वरुणायादित्यायादितये च इदं न मम । -१२.१२


दिशा एवं प्रेरणा

शिलारोहण के द्वारा पत्थर पर पैर रखते हुए प्रतिज्ञा करते हैं कि जिस प्रकार अंगद ने अपना पैर जमा दिया था, उसी तरह हम पत्थर की लकीर की तरह अपना पैर उत्तरदायित्वों को निबाहने के लिए जमाते हैं । यह धर्मकृत्य खेल-खिलौने की तरह नहीं किया जा रहा, जिसे एक मखौल समझकर तोड़ा जाता रहे,वरन् यह प्रतिज्ञाएँ पत्थर की लकीर की तरह अमिट बनी रहेंगी, ये चट्टान की तरह अटूट एवं चिरस्थाई रखी जायेंगी ।

क्रिया और भावना

मन्त्र बोलने के साथ वर-वधू अपने दाहिने पैर को शिला पर रखें, भावना करें कि उत्तरदायित्वों के निवार्ह करने तथा बाधाओं को पार करने की शक्ति हमारे संकल्प और देव अनुग्रह से मिल रही है । ॐ आरोहेममश्मानम् अश्मेव त्वं स्थिरा भव । अभितिष्ठ पृतन्यतोऽ, वबाधस्व पृतनायतः॥ पार०गृ०सू० १.७.१

लाजाहोम एवं परिक्रमा (भाँवर)

प्रायश्चित आहुति के बाद लाजाहोम और यज्ञाग्नि की परिक्रमा (भाँवर) का मिला-जुला क्रम चलता है । लाजाहोम के लिए कन्या का भाई एक थाली में खील (भुना हुआ धान) लेकर पीछे खड़ा हो । एक मुट्टी खील अपनी बहिन को दे । कन्या उसे वर को सौंप दे । वर उसे आहुति मन्त्र के साथ हवन कर दे । इस प्रकार तीन बार किया जाए । कन्या तीनों बार भाई के द्वारा दिये हुए खील को अपने पति को दे,वह तीनों बार हवन में अपर्ण कर दे । लाजाहोम में भाई के घर से अन्न (खील के रूप में) बहिन को मिलता है, उसे वह अपने पति को सौंप देती है । कहती है बेशक मेरे व्यक्तिगत उपयोग के लिए पिता के घर से मुझे कुछ मिला है, पर उसे मैं छिपाकर अलग से नहीं रखती, आपको सौंपती हूँ ।‍अलगाव या छिपाव का भाव कोई मन में न आए, इसलिए जिस प्रकार पति कुछ कमाई करता है, तो पत्नी को सौंपता है, उसी प्रकार पत्नी भी अपनी उपलब्धियों को पति के हाथ में सौंपती है । पति सोचता है, हम लोग हाथ-पैर से जो कमायेंगे, उसी से अपना काम चलायेंगे, किसी के उदारतापूर्वक दिये हुए अनुदान को बिना श्रम किये खाकर क्यों हम किसी के ऋणी बनें । इसलिए पति उस लाजा को अपने खाने के लिए नहीं रख लेता, वरन् यज्ञ में होम देता है । जन कल्याण के लिए उस पदार्थ को वायुभूत बनाकर संसार के वायुमण्डल में बिखेर देता है । इस क्रिया में यहाँ महान् मानवीय आदर्श सन्निहित है कि मुफ्त का माल या तो स्वीकार ही न किया जाय या मिले भी तो उसे लोकहित में खर्च कर दिया जाए । लोग अपनी-अपनी निज की पसीने की कमाई पर ही गुजर-बसर करें । मृतक भोज के पीछे भी यही आदर्शवादिता थी कि पिता के द्वारा उत्तराधिकार में मिले हुए धन को लड़के अपने काम में नहीं लेते थे,वरन् समाजसेवी ब्राह्मणों के निर्वाह में या अन्य पुण्यकार्यों में खर्च कर डालते थे । यही दहेज के सम्बन्ध में भी ठीक है । पिता के गृह से उदारतापूवर्क मिला, सो उनकी भावना सराहनीय है, पर आपकी भी तो कुछ भावना होनी चाहिए । मुफ्त का माल खाते हुए किसी कमाऊ मनुष्य का गैरत आना स्वाभाविक है । उसका यह सोचना ठीक ही है कि बिना परिश्रम का धन, वह भी दान की उदार भावना से दिया हुआ उसे पचेगा नहीं, इसलिए उपहार को जन मंगल के कायर् में, परमार्थ यज्ञ में आहुति कर देना ही उचित है । इसी उद्देश्य से पत्नी के भाई के द्वारा दिये गये लाजा को वह यज्ञ कार्य में लगा देता है । दहेज का ठीक उपयोग यही है, प्रथा भी है कि विवाह के अवसर पर वर पक्ष की ओर से बहुत सा दान-पुण्य किया जाता है । अच्छा हो जो कुछ मिले, वह सबको ही दान कर दे । विवाह के समय ही नहीं, अन्य अवसरों पर भी यदि कभी किसी से कुछ ऐसा ही बिना परिश्रम का उपहार मिले, तो उसके सम्बन्ध में एक नीति रहनी चाहिए कि मुफ्त का माल खाकर हम परलोक के ऋणी न बनेंगे, वरन् ऐसे अनुदान को परमार्थ में लगाकर उस उदार परम्परा को अपने में न रोककर आगे जन कल्याण के लिए बढ़ा देंगे । कहाँ भारतीय संस्कृति की उदार भावना और कहाँ आज के धन लोलुपों द्वारा कन्या पक्ष की आँतें नोच डालने वाली दहेज की पैशाचिक माँगें, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है । जिसने अपने हृदय का, आत्मा का टुकड़ा कन्या दे दी, उनके प्रति वर पक्ष का रोम-रोम कृतज्ञ होना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि इस अलौकिक उपहार के बदले में किस प्रकार अपनी श्रद्धा-सद्भावना व्यक्त करें । यह न होकर उल्टे जब कन्या पक्ष को दबा हुआ समझ कर उसे तरह-तरह से सताने और चूसने की योजना बनाई जाती है, तो यही समझना चाहिए कि भारतीय परम्पराएँ बिल्कुल उल्टी हो गयीं । धर्म के स्थान पर अधर्म, देवत्व के स्थान पर असुरता का साम्राज्य छा गया । लाजाहोम वतर्मान काल की क्षुद्र मान्यताओं को धिक्कारता है और दहेज के सम्बन्ध में सही दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है ।


अग्नि की पति-पतनी परिक्रमा करें । बायें से दायें की ओर चलें । पहली चार परिक्रमाओं में कन्या आगे रहे और वर पीछे । चार परिक्रमा हो जाने पर लड़का आगे हो जाए और लड़की पीछे । परिक्रमा के समय परिक्रमा मन्त्र बोला जाए तथा हर परिक्रमा पूरी होने पर एक-एक आहुति वर-वधू गायत्री मन्त्र सेकरते चलें, इसका तात्पयर् है- घर-परिवार के कार्यों में लड़की का नेतृत्व रहेगा, उसके परामर्श को महत्त्व दिया जाएगा, वर उसका अनुसरण करेगा, क्योंकि उन कामों का नारी को अनुभव अधिक होता है । बाहर के कार्यों में वर नेतृत्व करता है और नारी उसका अनुसरण करती है, क्योंकि व्यावसायिक क्षेत्रों में वर का अनुभव अधिक होता है । जिसमें जिस दिशा की जानकारी कम हो, दूसरे में उसकी जानकारी बढ़ाकर अपने समतुल्य बनाने में प्रयतनशील रहें । भावना क्षेत्र में नारी आगे है, कर्म क्षेत्र में पुरुष । दोनों पक्ष अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं । कुल मिलाकर नारी का वचर्स्व, पद, गौरव एवं वजन बड़ा बैठता है । इसलिए उसे चार परिक्रमा करने और नर को तीन परिक्रमा करने का अवसर दिया जाता है । गौरव के चुनाव के ४ वोट कन्या को और ३ वोट वर को मिलते हैं । इसलिए सदा नर से पहला स्थान नारी को मिला है । सीताराम, राधेश्याम, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश आदि युग्मों में पहले नारी का नाम है,पीछे नर का ।

क्रिया और भावना

लाजा होम और परिक्रमा का मिला-जुला क्रम चलता है । शिलारोहण के बाद वर-वधू खड़े-खड़े गायत्री मन्त्र से एक आहुति समर्पित करें । अब मन्त्र के साथ परिक्रमा करें । वधू आगे, वर पीछे चलें । एक परिक्रमा पूरी होने पर लाजाहोम की एक आहुति करें । आहुति करके दूसरी परिक्रमा पहले की तरह मन्त्रबोलते हुए करें । इसी प्रकार लाजाहोम की दूसरी आहुति करके तीसरी परिक्रमा तथा तीसरी आहुति करके चौथी परिक्रमा करें । इसके बाद गायत्री मन्त्र की आहुति देते हुए तीन परिक्रमाएँ वर को आगे करके परिक्रमा मन्त्र बोलते हुए कराई जाएँ । आहुति के साथ भावना करें कि बाहर यज्ञीय ऊर्जा तथा अंतःकरण में यज्ञीय भावना तीव्रतर हो रही है । परिक्रमा के साथ भावना करें कि यज्ञीय अनुशासन को केन्द्र मानकर, यज्ञाग्नि को साक्षी करके आदर्श दाम्पत्य के निवार्ह का संकल्प कर रहे हैं ।


ॐ अयर्मणं देवं कन्या अग्निमयक्षत । स नोऽअयर्मा देवः प्रेतो मुञ्चतु, मा पतेः स्वाहा । इदम् अयर्म्णे अग्नये इदं न मम॥ ॐ इयं नायुर्पब्रूते लाजा नावपन्तिका । आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां, ज्ञातयो मम स्वाहा । इदम् अग्नये इदं न मम॥ ॐ इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ, समृद्धिकरणं तव । मम तुभ्यं च संवननं,तदग्निरनुमन्यतामिय स्वाहा । इदं अग्नये इदं न मम॥ -पार०गृ०सू० १.६.२ ॥ परिक्रमा मन्त्र॥ ॐ तुभ्यमग्ने पयर्वहन्त्सूयार्ं वहतु ना सह । पुनः पतिभ्यो जायां दा, अग्ने प्रजया सह॥ -ऋ०१०.८५.३८,पार०गृ०सू० १.७.३


दिशा और प्रेरणा भाँवरें फिर लेने के उपरान्त सप्तपदी की जाती है । सात बार वर-वधू साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर फौजी सैनिकों की तरह आगे बढ़ते हैं । सात चावल की ढेरी या कलावा बँधे हुए सकोरे रख दिये जाते हैं, इन लक्ष्य-चिह्नों को पैर लगाते हुए दोनों एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं, रुक जाते हैं और फिर अगला कदम बढ़ाते हैं । इस प्रकार सात कदम बढ़ाये जाते हैं । प्रत्येक कदम के साथ एक-एक मन्त्र बोला जाता है ।
पहला कदम अन्न के लिए, दूसरा बल के लिए, तीसरा धन के लिए, चौथा सुख के लिए, पाँचवाँ परिवार के लिए, छठवाँ ऋतुचर्या के लिए और सातवाँ मित्रता के लिए उठाया जाता है । विवाह होने के उपरान्त पति-पतनी को मिलकर सात कायर्क्रम अपनाने पड़ते हैं । उनमें दोनों का उचित और न्याय संगत योगदान रहे, इसकी रूपरेखा सप्तपदी में निधार्रित की गयी है ।
प्रथम कदम अन्न वृद्धि के लिए है । आहार स्वास्थ्यवर्धक हो, घर में चटोरेपन को कोई स्थान न मिले । रसोई में जो बने, वह ऐसा हो कि स्वास्थ्य रक्षा का प्रयोजन पूरा करे, भले ही वह स्वादिष्ट न हो । अन्न का उत्पादन, अन्न की रक्षा, अन्न का सदुपयोग जो कर सकता है, वही सफल गृहस्थ है । अधिकपका लेना, जूठन छोड़ना, बतर्न खुले रखकर अन्न की चूहों से बबार्दी कराना, मिचर्-मसालो की भरमार उसे तमोगुणी बना देना, स्वच्छता का ध्यान न रखना, आदि बातों से आहार पर बहुत खर्च करते हुए भी स्वास्थ्य नष्ट होता है, इसलिए दाम्पत्य जीवन का उत्तरदायित्व यह है कि आहार की सात्त्विकता का समुचित ध्यान रखा जाए ।
दूसरा कदम शारीरिक और मानसिक बल की वृद्धि के लिए है । व्यायाम, परिश्रम, उचित एवं नियमित आहार-विहार से शरीर का बल स्थिर रहता है । अध्ययन एवं विचार-विमर्श से मनोबल बढ़ता है । जिन प्रयतनों से दोनों प्रकार के बल बढें, दोनों अधिक समर्थ, स्वस्थ एवं सशक्त बनें-उसका उपाय सोचते रहना चाहिए ।
तीसरा कदम धन की वृद्धि के लिए है । अर्थ व्यवस्था बजट बनाकर चलाई जाए । अपव्यय में कानी कौड़ी भी नष्ट न होने पाए । उचित कार्यों में कंजूसी न की जाए- फैशन, व्यसन, शेखीखोरी आदि के लिए पैसा खर्च न करके उसे पारिवारिक उन्नति के लिए सँभालकर, बचाकर रखा जाए । उपार्जन के लिए पति-पत्नी दोनों ही प्रयतन करें । पुरुष बाहर जाकर कृषि, व्यवसाय, नौकरी आदि करते हैं, तो स्त्रियाँ सिलाई, धुलाई, सफाई आदि करके इस तरह की कमाई करती हैं । उपार्जन पर जितना ध्यान रखा जाता है, खर्च की मर्यादाओं का भी वैसा ही ध्यान रखते हुए घर की अर्थव्यवस्था सँभाले रहना दाम्पत्य जीवन का अनिवार्य कत्तर्व्य है ।
चौथा कदम सुख की वृद्धि के लिए है । विश्राम, मनोरंजन, विनोद, हास-परिहास का ऐसा वातावरण रखा जाए कि गरीबी में भी अमीरी का आनन्द मिले । दोनों प्रसन्नचित्त रहें । मुस्कराने की आदत डालें,हँसते-हँसाते जिन्दगी काटें । चित्त को हलका रखें, ‘सन्तोषी सदा सुखी’ की नीति अपनाएँ ।
पाँचवाँ कदम परिवार पालन का है । छोटे बड़े सभी के साथ समुचित व्यवहार रखा जाए । आश्रित पशुओं एवं नौकरों को भी परिवार माना जाए, इस सभी आश्रितों की समुचित देखभाल, सुरक्षा, उन्नति एवं सुख-शान्ति के लिए सदा सोचने और करने में लापरवाही न बरती जाए ।
छठा कदम ऋतुचर्या का है । सन्तानोत्पादन एक स्वाभाविक वृत्ति है, इसलिए दाम्पत्य जीवन में उसका भी एक स्थान है, पर उस सम्बन्ध में मयार्दाओं का पूरी कठोरता एवं सतर्कता से पालन किया जाए,क्योंकि असंयम के कारण दोनों के स्वास्थ्य का सर्वनाश होने की आशंका रहती है, गृहस्थ में रहकर भीब्रह्मचर्य का समुचित पालन किया जाए । दोनों एक दूसरे का भी सहयोगी मित्र की दृष्टि से देखें,कामुकता के सर्वनाशी प्रसंगों को जितना सम्भव हो, दूर रखा जाए । सन्तान उत्पन्न करने से पूर्व हजार बार विचार करें कि अपनी स्थिति सन्तान को सुसंस्कृत बनाने योग्य है या नहीं । उस मर्यादा में सन्तान उत्पन्न करने की जिम्मेदारी वहन करें ।
सातवाँ कदम मित्रता को स्थिर रखने एवं बढ़ाने के लिए है । दोनों इस बात पर बारीकी से विचार करते रहें कि उनकी ओर से कोई त्रुटि तो नहीं बरती जा रही है, जिसके कारण साथी को रुष्ट या असंतुष्ट होने का अवसर आए । दूसरा पक्ष कुछ भूल भी कर रहा हो, तो उसका उत्तर कठोरता, कर्कशता से नहीं, वरन्सज्जनता, सहृदयता के साथ दिया जाना चाहिए, ताकि उस महानता से दबकर साथी को स्वतः ही सुधरने की अन्तःप्रेरणा मिले । बाहर के लोगों के साथ, दुष्टों के साथ दुष्टता की नीति किसी हद तक अपनाई जा सकती है, पर आत्मीयजनों का हृदय जीतने के लिए उदारता, सेवा, सौजन्य, क्षमा जैसे शस्त्र की काम में लाये जाने चाहिए ।
सप्तपदी में सात कदम बढ़ाते हुए इन सात सूत्रों को हृदयंगम करना पड़ता है । इन आदर्शों और सिद्धान्तों को यदि पति-पत्नी द्वारा अपना लिया जाए और उसी मार्ग पर चलने के लिए कदम से कदम बढ़ाते हुए अग्रसर होने की ठान ली जाए, तो दाम्पत्य जीवन की सफलता में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता ।
क्रिया और भावना वर-वधू खड़े हों । प्रत्येक कदम बढ़ाने से पहले देव शक्तियों की साक्षी का मन्त्र बोला जाता है, उस समय वर-वधू हाथ जोड़कर ध्यान करें । उसके बाद चरण बढ़ाने का मन्त्र बोलने पर पहले दायाँ कदम बढ़ाएँ । इसी प्रकार एक-एक करके सात कदम बढ़ाये जाएँ । भावना की जाए कि योजनाबद्ध-प्रगतिशील जीवन के लिए देव साक्षी में संकल्पित हो रहे हैं, संकल्प और देव अनुग्रह का संयुक्त लाभ जीवन भर मिलता रहेगा ।
(१) अन्न वृद्धि के लिए पहली साक्षी- ॐ एको विष्णुजर्गत्सवर्ं, व्याप्तं येन चराचरम् । हृदये यस्ततो यस्य, तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥ पहला चरण- ॐ इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव । विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥१॥
(२) बल वृद्धि के लिए दूसरी साक्षी- ॐ जीवात्मा परमात्मा च, पृथ्वी आकाशमेव च । सूयर्चन्द्रद्वयोमर्ध्ये,तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥२॥ दूसरी चरण- ॐ ऊजेर् द्विपदी भव सा मामनुव्रता भव । विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥२॥
(३) धन वृद्धि के लिए तीसरी साक्षी- ॐ त्रिगुणाश्च त्रिदेवाश्च, त्रिशक्तिः सत्परायणाः । लोकत्रये त्रिसन्ध्यायाः, तस्य साक्षी प्रदीयताम् । तीसरा चरण- ॐ रायस्पोषाय त्रिपदी भव सा मामनुव्रता भव । विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥३॥
(४) सुख वृद्धि के लिए चौथी साक्षी- ॐ चतुमर्ुखस्ततो ब्रह्मा, चत्वारो वेदसंभवाः । चतुयुर्गाः प्रवतर्न्ते,तेषां साक्षी प्रदीयताम् । चौथा चरण- ॐ मायो भवाय चतुष्पदी भव सा मामनुव्रता भव । विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥४॥
(५) प्रजा पालन के लिए पाँचवी साक्षी- ॐ पंचमे पंचभूतानां, पंचप्राणैः परायणाः । तत्र दशर्नपुण्यानां,साक्षिणः प्राणपंचधाः॥ पाँचवाँ चरण- ॐ प्रजाभ्यां पंचपदी भव सा मामनुव्रता भव । विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥५॥
(६) ऋतु व्यवहार के लिए छठवीं साक्षी- ॐ षष्ठे तु षड्ऋतूणां च, षण्मुखः स्वामिकातिर्कः । षड्रसा यत्र जायन्ते, कातिर्केयाश्च साक्षिणः॥ छठवाँ चरण- ॐ ऋतुभ्यः षट्ष्पदी भव सा मामनुव्रता भव । विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥६॥
(७) मित्रता वृद्धि के लिए सातवीं साक्षी- ॐ सप्तमे सागराश्चैव, सप्तद्वीपाः सपवर्ताः । येषां सप्तषिर्पतनीनां, तेषामादशर्साक्षिणः॥ सातवाँ चरण- ॐ सखे सप्तपदी भव सा मामनुव्रता भव । विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥७॥ -पार०गृ०सू० १.८.१-२, आ०गृ०सू० १.७.१९

आसन परिवतर्न

सप्तपदी के पश्चात् आसन परिवतर्न करते हैं । तब तक वधू दाहिनी ओर थी अर्थात् बाहरी व्यक्ति जैसी स्थिति में थी । अब सप्तपदी होने तक की प्रतिज्ञाओं में आबद्ध हो जाने के उपरान्त वह घर वाली अपनी आत्मीय बन जाती है, इसलिए उसे बायीं ओर बैठाया जाता है । बायें से दायें लिखने का क्रम है ।बायाँ प्रथम और दाहिना द्वितीय माना जाता है । सप्तपदी के बाद अब पत्नी को प्रमुखता प्राप्त हो गयी । लक्ष्मी-नारायण्, उमा-महेश, सीता-राम, राधे-श्याम आदि नामों में पत्नी को प्रथम, पति को द्वितीय स्थान प्राप्त है । दाहिनी ओर से वधू का बायीं ओर आना, अधिकार हस्तांतरण है । बायीं ओर के बाद पतनी गृहस्थ जीवन की प्रमुख सूत्रधार बनती है । ॐ इह गावो निषीदन्तु, इहाश्वा इह पूरुषाः । इहो सहस्रदक्षिणो यज्ञ, इह पूषा निषीदतु॥ -पा०गृ०सू० १.८.१०

पाद प्रक्षालन

आसन परिवतर्न के बाद गृहस्थाश्रम के साधक के रूप में वर-वधू का सम्मान पाद प्रक्षालन करके किया जाता है । कन्या पक्ष की ओर प्रतिनिधि स्वरूप कोई दम्पति या अकेले व्यक्ति पाद प्रक्षालन करे । पाद प्रक्षालीन करने वालों का पवित्रीकरण-सिंचन किया जाए । हाथ में हल्दी, दूवार्, थाली में जल लेकरप्रक्षालन करें । प्रथम मन्त्र के साथ तीन बार वर-वधू के पैर पखारें, फिर दूसरे मन्त्र के साथ यथा श्रद्धा भेंट दें । ॐ या ते पतिघ्नी प्रजाध्नी पशुघ्नी, गृहघ्नी यशोघ्नी निन्दिता, तनूजार्रघ्नीं ततऽएनांकरोमि, सा जीयर् त्वां मया सह॥ -पार०गृ०सू० १.११ ॐ ब्रह्मणा शालां निमितां, कविभिनिर्मितां मिताम् । इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः॥ -अथवर्० ९.३.१९

ध्रुव-सूर्य ध्यान

ध्रुव स्थिर तारा है । अन्य सब तारागण गतिशील रहते हैं, पर ध्रुव अपने निश्चित स्थान पर ही स्थिर रहता है । अन्य तारे उसकी परिक्रमा करते हैं । ध्रुव दर्शन का अर्थ है- दोनों अपने-अपने परम पवित्र कर्त्तव्यों पर उसी तरह दृढ़ रहेंगे, जैसे कि ध्रुव तारा स्थिर है । कुछ कारण उत्पन्न होने पर भी इस आदर्श से विचलित न होने की प्रतिज्ञा को निभाया जाए, व्रत को पाला जाए और संकल्प को पूरा किया जाए । ध्रुव स्थिर चित्त रहने की ओर, अपने कर्त्तव्यों पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है । इसी प्रकार सूर्य की अपनी प्रखरता, तेजस्विता, महत्ता सदा स्थिर रहती है । वह अपने निधार्रित पथ्ा पर ही चलता है,यही हमें करना चाहिए । यही भावना पति-पत्नी करें ।

सूर्य ध्यान (दिन में)

ॐ तच्चक्षुदेर्वहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतं , शृणुयाम शरदः शतं,प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः, स्याम शरदः शतं, भूयश्च शरदः शतात् । -३६.२४
ध्रुव ध्यान (रात में) ॐ ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि, ध्रुवैधि पोष्ये मयि । मह्यं त्वादात् बृहस्पतिमर्यापत्या,प्रजावती सञ्जीव शरदः शतम् । -पार०गृ०सू० १.८.१९

शपथ आश्वासन

पति-पत्नी एक दूसरे के सिर पर हाथ रखकर समाज के सामने शपथ लेते हैं, एक आश्वासन देकर अन्तिम प्रतिज्ञा करते हैं कि वे निस्संदेह निश्चित रूप से एक-दूसरे को आजीवन ईमानदार, निष्ठावान् और वफादार रहने का विश्वास दिलाते हैं । पिछले दिनों पुरुषों का व्यवहार स्त्रियों के साथ छली-कपटी और विश्वासघातियों जैसा रहा है । रूप, यौवन के लोभ में कुछ दिन मीठी बातें करते हैं, पीछे क्रूरता एवं दुष्टता पर उतर आते हैं । पग-पग पर उन्हें सताते और तिरस्कृत करते हैं । प्रतिज्ञाओं को तोड़कर आर्थिक एवं चारित्रिक उच्छृंखलता बरतते हैं और पत्नी की इच्छा की परवाह नहीं करते । समाज में ऐसीघटनाएँ कम घटित नहीं होतीं । ऐसी दशा में ये प्रतिज्ञाएँ औपचारिकता मात्र रह जाने की आशंका हो सकती है । सन्तान न होने पर लड़कियाँ होने पर लोग दूसरा विवाह करने पर उतारू हो जाते हैं । पति सिर पर हाथ रखकर कसम खाता है कि दूसरे दुरात्माओं की श्रेणी में उसे न गिना जाए । इस प्रकार पत्नी भी अपनी निष्ठा के बारे में पति को इस शपथ-प्रतिज्ञा द्वारा विश्वास दिलाती है ।
ॐ मम व्रते ते हृदयं दधामि, मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु । मम वाचमेकमना जुषस्व, प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् । – पार०गृ०सू०१.८.८ ॥ सुमङ्गली-सिन्दूरदान॥ मन्त्र के साथ वर अँगूठी से वधू की माँग में सिन्दूर तीन बार लगाए । भावना करें कि मैं वधू के सौभाग्य को बढ़ाने वाला सिद्ध होऊँ- ॐ सुमंगलीरियं वधूरिमा समेत पश्यत । सौभाग्यमस्यै दत्त्वा याथास्तं विपरेतन । सुभगा स्त्री सावित्र्याास्तव सौभाग्यं भवतु । -पार०गृ०सू० १.८.९


वधू वर को मंगल तिलक करे । भावना करे कि पति का सम्मान करते हुए गौरव को बढ़ाने वाली सिद्ध होऊ ‍ॐ स्वस्तये वायुमुपब्रवामहै, सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः । बृहस्पतिं सवर्गणं स्वस्तये, स्वस्तयऽ आदित्यासो भवन्तु नः॥ -ऋ० ५.५१.१२
इसके पश्चात् स्विष्टकृत होम, पूणार्हुति, वसोधार्रा, आरती, घृत-अवघ्राण, भस्म धारण, क्षमा प्रार्थना आदि कृत्य सम्पन्न करें ।

‍ अभिषेक सिञ्चन वर-कन्या को बिठाकर कलश का जल लेकर उनका सिंचन किया जाए । भावना की जाए कि जो सुसंस्कार बोये गये हैं, उन्हें दिव्यजल से सिंचित किया जा रहा है । सबके सद्भाव से उनका विकास होगा और सफलता-कुशलता के कल्याणप्रद सुफल उनमें लगेंगे । पुष्प वर्षा के रूप में सभी अपनी शुभकामनाएँ-आश्शीवार्द प्रदान करें- गणपतिः गिरिजा वृषभध्वजः, षण्मुखो नन्दीमुखडिमडिमा । मनुज-माल-त्रिशूल-मृगत्वचः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥१॥ रविशशी-कुज इन्द्र-जगत्पतिः, भृगुज-भानुज-सिन्धुज-केतवः । उडुगणा-तिथि-योग च राशयः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥२॥ वरुण-इन्द्र कुबेर-हुताशनाः, यम-समीरण-वारण-कंुजराः । सुरगणाः सुराश्च महीधराः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥३॥ सुरसरी-रविनन्दिनि-गोमती, सरयुतामपि सागर-घघर्रा । कनकयामयि-गण्डकि-नमर्दा, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥४॥ हरिपुरी-मथुरा च त्रिवेणिका, बदरि-विष्णु-बटेश्वर-कौशला । मय-गयामपि-ददर्र-द्वारका,प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥५॥ भृगुमुनिश्च पुलस्ति च अंगिरा, कपिलवस्तु-अगस्त्य च नारदः । गुरुवस्ाष्ठ-सनातन-जैमिनी, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥६॥ ऋग्वेदोऽथ यजुवेर्दः, सामवेदो ह्यथवर्णः ।रक्षन्तु चतुरो वेदा, यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
इसके बाद विसजर्न और आशीवचर्न के पुष्प प्रदान कर कृत्य समाप्त किया जाए ।

विवाह के प्रकार

  1. ब्रह्म विवाह

दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना ‘ब्रह्म विवाह’कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का “Arranged Marriage” ‘ब्रह्म विवाह’ का ही रूप है।

  1. दैव विवाह

किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना ‘दैव विवाह’ कहलाता है।

  1. आर्श विवाह

कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना ‘अर्श विवाह’ कहलाता है।

  1. प्रजापत्य विवाह

कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना ‘प्रजापत्य विवाह’ कहलाता है।

  1. गंधर्व विवाह

परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना ‘गंधर्व विवाह’ कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से ‘गंधर्व विवाह’ किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम “भारतवर्ष” बना।

  1. असुर विवाह

कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना ‘असुर विवाह’ कहलाता है।

  1. राक्षस विवाह

कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना ‘राक्षस विवाह’ कहलाता है।

  1. पैशाच विवाह

कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना ‘पैशाच विवाह’ कहलाता है।

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द्वितीयो गृहस्थाश्रमः सर्वेषु आश्रमेषु श्रेष्ठः इति प्रतिपादितं शास्त्रकारैः । यतः अस्मिन् एव आश्रमे धनम् अर्जयित्वा अन्यान् त्रीन् आश्रमान् पोषयित्वा समाजधारणायाः कार्यं सम्पादयति गृहस्थः । यावन्तश्च सुखोपभोगाः अभिलषिता मनुष्यस्य तेषां सर्वेषां यथावद् अनुभवः अनुमतः अस्मिन्नेव आश्रमे । अत्रैव विवाहबन्धने प्रविश्य स्त्रीसुखम् आस्वाद्य पुत्रादीन् उत्पाद्य तांस्तान् इन्द्रियविषयान् उपभुज्य आत्मा संतोषयितव्यः किन्तु एतत् सर्वं न अनिर्बन्धम् उपभोक्तव्यम् । अपि तु समाजहितस्य अविरोधेन साधयितव्यम् इति उपदिष्टं शास्त्रकारैः । तदर्थम् एतादृशानि कर्तव्यानि विहितानि येन तादृशं समाजहितसाधनम् अनायासेन सम्पद्येत । महाभारते गृहस्थस्य कर्तव्यानि एवम् उपवर्णितानि –

धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत् दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च ।
अनाददानश्च परैरदत्तं सैषा गृहस्थोपनिषद् पुराणी ॥ आदि.९१३ ॥


पाणिग्रहणसंस्कारसमनन्तरं गृहस्थः गृहस्थधर्मान् अनुसरति । गृहे तिष्ठतीति गृहस्थः । स च तावत् द्वे यज्ञोपवीते धृत्वा वैष्णवं दण्डं कमण्डलं च धारयति । स्नानादिनियमाचारस्सन् नित्यमौपासनं च कुर्वन् पाकयज्ञायाजी भूत्वा मनुष्ययज्ञेन अतिथीन्, दयासत्यादिगुणैः ऋषीन्, पुत्रैश्च पितॄन्, जलैःपुष्पाद्यैश्च देवान् च अर्चयति इति वैखानसधर्मसूत्रे विशेषतया गृहस्थधर्माः उपदिश्यन्ते ।

गृहस्थः गृह्याग्नौ गार्ह्याणि कर्माणि, श्रोताग्रिषु श्रोतानि च करोति ।
ऋतुरात्रिषु स्वभार्यामुपगच्छति ।
भार्यया सह न अश्नाति ।
असत्यवादं वर्जयति च ।
गृहस्थस्तावत् सर्वप्राणिहितस्सन् अद्रोहेणैव जीवति इति वैखानसधर्मसूत्रे विशेषतया प्रतिपाद्यन्ते ।

समाजधारणार्थं विशेषोपयुक्तः गृहस्थाश्रमः[सम्पादयतु]

अथ चतुर्षु आश्रमेषु गृहस्थाश्रमः सर्वश्रेष्ठः इत्युक्तं सर्वैः शास्त्रकारैः । धर्मस्य उद्देशः समाजधारणम् । तथा समाजधारणार्थं गृहस्थः एव अधिकाधिकं परिश्रमं कुरुते । कालिदासकृते रघुवंशे रघुः कौत्सं कुशलं पृच्छन् ब्रूते –

कालो ह्ययं संक्रमितुं द्वितीयं सर्वोपकारक्षममाश्रमं ते ॥५-१० ॥

इत्यतः केवलं गृहस्थाश्रमे वर्तमानस्य केषांचित् प्रमुखानां कर्तव्यानां विवेचनमत्र क्रियते ।

चतुर्विधानाम् ऋणानां संशुध्दिः[सम्पादयतु]

तत्र कृतज्ञताज्ञापनं भवति भारतीयानां वैशिष्ट्यपूर्णं जीवनमूल्यम् । तच्च ऋणशोधपरिकल्पनायां तथा गृहस्थेन कर्तव्येषु पञ्चमहायज्ञेषु अनुस्यूतं वर्तते । ऋणशोधपरिकल्पनायाः मूलं तु वेदे एव उपलभ्यते । तत्र तैत्तिरीयसंहितायां श्रूयते- ‘जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिः ऋणैः ऋणवान् जायते । ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः । एष वा अनृणी यः पुत्री यज्वा ब्रह्मचर्यवासी ।’ तै.सं. ८-३-१०-५ मनुरप्याह –ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ ६-३५

  1. देवऋणम्
  2. ऋषि – ऋणम्
  3. पितृ-ऋणम्
  4. मनुष्य–ऋणम्
  5. नित्यसंस्कारार्थं पञ्चमहायज्ञाः
  6. पञ्चसूनादोषपरिहारः


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सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः मुद्रण ई-मेल
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियभाषिणी
सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः ।
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे
साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥घर में आनंद हो, पुत्र बुद्धिमान हो, पत्नी प्रिय बोलनेवाली हो, अच्छे मित्र हो, धन हो, पति-पत्नी में प्रेम हो, सेवक आज्ञापालक हो, जहाँ अतिथि सत्कार हो, ईशपूजन होता हो, रोज अच्छा भोजन बनता हो, और सत्पुरुषों का संग होता हो – ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है ।