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मनुवाद की वापसी


संजय गुप्ता

* मनुवाद की वापसी*

आपने अपने शास्त्रों का एवं ब्राह्मणों का खूब मज़ाक उड़ाया था जब वह यह कहते थे कि जिस व्यक्ति का आप चरित्र न जानते हों, उससे जल या भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए ।

*क्योंकि आप नहीं जानते कि अमुक व्यक्ति किस विचार का है , क्या शुद्धता रखता है ,कौन से गुण प्रधान का है , कौन सा कर्म करके वह धन ला रहा है , शौच या शुचिता का कितना ज्ञान है , किस विधा से भोजन बना रहा है , उसके लिए शुचिता या शुद्धता के क्या मापदंड हैं इत्यादि !!!*

जिसका चरित्र नहीं पता हो , उसका स्पर्श करने को भी मना किया गया है । यह बताया जाता था कि हर जगह पानी और भोजन नहीं करना चाहिए , तब English में american और british accent में आपने इसको मूर्खता और discrimination बोला था !!

बड़ी हँसी आती थी तब आपको !!!! बकवास कहकर आपने अपने ही शास्त्र और ब्राह्मणों को दुत्कारा था ।

*और आज ??????*

यही जब लोग विवाह के समय वर वधु की 3 से 4 पीढ़ियों का अवलोकन करते थे कि वह किस विचारधारा के थे ,कोई जेनेटिक बीमारी तो नहीं , किस height के थे , कितनी उम्र तक जीवित रहे , खानदान में कोई वर्ण संकर का इतिहास तो नहीं रहा इत्यादि ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि आने वाली सन्तति विचारों और शरीर से स्वस्थ्य बनी रहे और बीमारियों से बची रहे , जिसे आज के शब्दों में *GENETIC SELECTION* बोला जाता है ।

जैसे आप अपने पशु कुतिया के लिए कुत्ता ढुंढते हैं तो यह ध्यान रखते हैं कि अमुक कुत्ता बीमारी विहीन हो , अच्छे “नस्ल” का हो । ताकि कुतिया के बच्चे बेचकर मोटा पैसा कमा सको।

ऐसा तो नहीं कहते न कि गली में इतने कुत्ते हैं तो दुसरे कुत्ते की क्या जरूरत है। इसको जिससे प्रेम हो उससे गर्भाधान करा लें । तब तो समझ रहे हैं न कि आपकी कुतिया का क्या हश्र होगा और आने वाली generation क्या होगी !!!!!

*पर आप इन सब बातों पर हंसते थे ।।।*

यही शास्त्र जब बोलते थे कि जल ही शरीर को शुद्ध करता है और कोई तत्व नहीं ,बड़ी हँसी आयी थी आपको !!
तब आपने बकवास बोलकर अपना पिछवाड़ा tissue paper से साफ करने लगे ,खाना खाने के बाद जल से हाथ धोने की बजाय tissue पेपर से पोंछ कर इतिश्री कर लेते थे ।

*और अब ????*

जब यही ब्राह्मण और शास्त्र बोलते थे कि भोजन ब्रह्म के समान है और यही आपके शरीर के समस्त अवयव बनाएंगे और विचारों की शुद्धता और परिमार्ज़िता इसी से संभव है इसलिए भोजन को चप्पल या जूते पहनकर न छुवें ।
बड़ी हँसी आयी थी आपको !! Obsolete कहकर आपने खूब मज़ाक उड़ाया !!!
जूते पहनकर खाने का प्रचलन आपने दूसरे देशों के आसुरी समाज से ग्रहण कर लिया । Buffet system बना दिया ।
उन लोगों का मजाक बनाया जो जूते चप्पल निकालकर भोजन करते थे ।

अरे हमारी कोई भी पूजा , यज्ञ, हवन सब पूरी तरह स्वच्छ होकर , हाथ धोकर करने का प्रावधान है ।
पंडित जी आपको हाथ में जल देकर हस्त प्रक्षालन के लिए बोलते हैं । आपके ऊपर जल छिड़ककर मंत्र बोलते हैं :-

*ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा ।।*
*यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्यभ्यन्तरः शुचिः ॥*
*ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।।*

*तब भी आपने मजाक उड़ाया ।*

जब सनातन धर्मी के यहाँ किसी के घर शिशु का जन्म होता था तो नातक लगता था । इस अवस्था में नामकरण संस्कार तक सबसे अलग रखा जाता है । उसके घर लोग , जल तक का सेवन नहीं किया जाता था जब तक उसके घर हवन या यज्ञ से शुद्धिकरण न हो जाये । प्रसूति गृह से माँ और बच्चे को निकलने की मनाही होती थी । माँ कोई भी कार्य नहीं कर सकती थी और न ही भोजनालय में प्रवेश करती थी ।
इसका भी आपने बड़ा मजाक उड़ाया ।।
ये नहीं समझा कि यह बीमारियों से बचने या संक्रमण से बचाव के लिए Quarantine किया जाता था या isolate किया जाता था ।
प्रसूति गृह में माँ और बच्चे के पास निरंतर बोरसी सुलगाई रहती थी जिसमें नीम की पत्ती, कपूर, गुग्गल इत्यादि निरंतर धुँवा दिया जाता था ।
उनको इसलिए नहीं निकलने दिया जाता था क्योंकि उनकी immunity इस दौरान कमज़ोर रहती थी और बाहरी वातावरण से संक्रमण का खतरा रहता था ।
लेकिन आपने फिर पुरानी चीज़ें कहकर इसका मज़ाक उड़ाया और आज देखिये 80% महिलाएँ एक delivery के बाद रोगों का भंडार बन जाती हैं कमर दर्द से लेकर , खून की कमी से लेकर अनगिनत समस्याएं ।

ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र के लिए अलग Quarantine या isolation की अवधी इसलिए क्योंकि हर वर्ण का खान पान अलग रहता था , कर्म अलग रहते थे जिससे सभी वर्णों के शरीर की immunity system अलग होता था जो उपरोक्त अवधि में balanced होता था ।

ऐसे ही जब कोई मर जाता था तब भी 12 दिन तक सूतक Isolation period था । क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है । यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 12 दिन का quarantine period बनाया गया ।

अरे जो शव को अग्नि देता था या दाग देता था । उसको घर वाले तक नहीं छू सकते थे 12 दिन तक । उसका खाना पीना , भोजन , बिस्तर , कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे । पीपलपानी के दिन शुद्धिकरण के पश्चात , सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था ।

तब भी आप बहुत हँसे थे । ब्राहम्णों ने पैसा कमाने के लिए बनाया है कहकर मजाक बनाया था !!!

जब किसी रजस्वला स्त्री को 4 दिन isolation में रखा जाता है ताकि वह भी बीमारियों से बची रहें और आप भी बचे रहें तब भी आपने पानी पी पी कर गालियाँ दी । और दो टके की अरुंधती राय जैसी रांडो को और फिल्मी प्रोड्यूसर को कौन कहे , वो तो दिमागी तौर से अलग होती हैं , उन्होंने जो ज़हर बोया कि उसकी कीमत आज सभी स्त्रियाँ तमाम तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर चुका रही हैं ।

जब किसी के शव यात्रा से लोग आते हैं घर में प्रवेश नहीं मिलता है और बाहर ही हाथ पैर धोकर स्नान करके , कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है , इसका भी खूब मजाक उड़ाया आपने ।

आज भी गांवों में एक परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं । जब कोई भी बहूं , लड़की या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी बूढ़ी लोटे में जल लेकर , हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वही जल बहाती नहीं हों , तब तक । इसे छुआछूत नाम दिया था न? तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूता चार का खूब नारा लगाया था ना?

*खूब मजाक बनाया था न ?*

इन्हीं सवर्णों को और ब्राह्मणों को अपमानित किया था जब ये गलत और गंदे कार्य करने वाले , माँस और चमड़ों का कार्य करने वाले लोगों को तब तक नहीं छूते थे जब तक वह स्नान से शुद्ध न हो जाये । ये वही लोग थे जो जानवर पालते थे जैसे सुअर, भेड़ , बकरी , मुर्गा , कुत्ता इत्यादि जो अनगिनत बीमारियाँ अपने साथ लाते थे ।
ये लोग जल्दी उनके हाथ का छुआ जल या भोजन नहीं ग्रहण करते थे तब बड़ा हो हल्ला आपने मचाया और इन लोगों को इतनी गालियाँ दी कि इन्हें अपने आप से घृणा होने लगी ।

यही वह गंदे कार्य करने वाले लोग थे जो प्लेग , TB , चिकन पॉक्स , छोटी माता , बड़ी माता , जैसी जानलेवा बीमारियों के संवाहक थे ,और जब आपको बोला गया कि बीमारियों से बचने के लिए आप इनसे दूर रहें तो आपने गालियों का मटका इनके सिर पर फोड़ दिया और इनको इतना अपमानित किया कि इन्होंने बोलना छोड़ दिया और समझाना छोड़ दिया ।

आज जब आपको किसी को छूने से मना किया जा रहा है तो आप इसे ही विज्ञान बोलकर अपना रहे हैं । Quarantine किया जा रहा है तो आप खुश होकर इसको अपना रहे हैं ।

जब शास्त्रों ने बोला था तो ब्राह्मणवाद बोलकर आपने गरियाया था और अपमानित किया था ।

आज यह उसी का परिणति है कि आज पूरा विश्व इससे जूझ रहा है ।

*याद करिये पहले जब आप बाहर निकलते थे तो आप की माँ आपको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ इत्यादि देती थी रखने को । यह सब कीटाणु रोधी होते हैं।*
शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें ।

लेकिन सब आपने भुला दिया ।।

आपको तो अपने शास्त्रों को गाली देने में और ब्राह्मणों को अपमानित करने में , उनको भगाने में जो आनंद आता है शायद वह परमानंद आपको कहीं नहीं मिलता ।

अरे ……!! अपने शास्त्रों के level के जिस दिन तुम हो जाओगे न तो यह देश विश्व गुरु कहलायेगा ।

तुम ऐसे अपने शास्त्रों पर ऊँगली उठाते हो जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति के मूर्ख 7 वर्ष का बेटा ISRO के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाए ।

अब भी कहता हूँ अपने शास्त्रों का सम्मान करना सीखो । उनको मानो । बुद्धि में शास्त्रों की अगर कोई बात नहीं घुस रही है तो समझ जाओ आपकी बुद्धि का स्तर उतना नहीं हुआ है । उस व्यक्ति के पास जाओ जो तुम्हे शास्त्रों की बातों को सही ढंग से समझा सके । शायद मैं ही कुछ मदद कर दूँ । लेकिन गाली मत दो , उसको जलाने का दुष्कृत्य मत करो ।

*आपको बता दूँ कि आज जो जो Precautions बरते जा रहे हैं , मनुस्मृति उठाइये , उसमें सभी कुछ एक एक करके वर्णित है ।*

लेकिन आप पढ़ते कहाँ हैं , दूसरे की बातों में आकर प्रश्नचिन्ह उठायेंगे और उन्हें जलाएंगे ।

यह पोस्ट वैसे ही लम्बी हो गयी है अन्यथा आपको एक एक अवयव से रूबरू करवाता और पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण लेकर ।
क्योंकि जिसने विज्ञान का गहन अध्ययन किया होगा , वह शास्त्र वेद पुराण इत्यादि की बातों को बड़े ही आराम से समझ सकता है , corelate कर सकता है और समझा भी सकता है ।

*लेकिन मेरी यह बात स्वर्ण अक्षरों में लिख लीजिये कि मनुस्मृति से सर्वश्रेष्ठ विश्व में कोई संविधान नहीं बना है और एक दिन पूरा विश्व इसी मनुस्मृति संविधान को लागू कर इसका पालन करेगा ।*
Note it down !! Mark my words again !!

*मुझे आप गालियाँ दे सकते हैं ।

मुझे नहीं पता कि आप इतनी लंबी पोस्ट पढ़ेंगे या नहीं लेकिन मेरा काम है आप लोगों को जगाना , जिसको जगना है या लाभ लेना है वह पढ़ लेगा ।
यह भी अनुरोध करता हूँ कि सभी *ब्राह्मण* बनिये _( भले आप किसी भी जाति से हों )_ और *ब्राह्मणत्व* का पालन कीजिये इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधरेगा…

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धन्यो गृहस्थाश्रमः


राकेश पांडे

धन्यो गृहस्थाश्रमः-
गृहस्थ – धर्म अन्य सभी धर्मों से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।

महर्षि व्यास के शब्दों में “गृहस्थ्येव हि धर्माणा सर्वेषाँ मूल मुच्यते” गृहस्थाश्रम ही सर्व धर्मों का आधार है। “धन्यो गृहस्थाश्रमः” चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम धन्य है। जिस तरह समस्त प्राणी माता का आश्रय पाकर जीवित रहते हैं, उसी तरह सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर आधारित हैं।

परिवार-संस्था सहजीवन के व्यावहारिक शिक्षण की प्रयोगशाला है। इसीलिए कुटुम्ब समाज संस्था की इकाई माना जाता है। गृहस्थ में बिना किसी संविधान, दण्ड-विधान, सैनिक शक्ति के ही सब सदस्य परस्पर सहयोगी सह-जीवन बिताते हैं। माता, पिता, पुत्र, पति-पत्नी, नाते-रिश्तों के सम्बन्ध किसी दण्ड के भय अथवा कानून की प्रेरणा पर कायम नहीं होते, वरन् वे स्वेच्छा से कुल धर्म कुल परम्परा, आनुवंशिक संस्कारों पर निर्भर करते हैं।

प्रत्येक सदस्य अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करने में अपनी प्रतिष्ठा, कल्याण, गौरव की भावना रखकर खुशी-खुशी उन्हें निभाने का प्रयत्न करता है। कुटुम्ब के साथ सह-जीवन में आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक सदस्य अपने व्यक्तिगत सुख स्वार्थों का त्याग करने में भी प्रसन्नता अनुभव करता है।

यही सह-जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता होती है। बिना अपने स्वार्थों का त्याग किये, कष्ट सहन किये सह- जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती और उसमें भी विशेषता यह है कि यह त्याग-सहिष्णुता स्वेच्छा से खुशी के साथ वहन की जाती है। सह-जीवन के लिए ऐसा शिक्षण और कहाँ मिल सकता है?

कुटुम्ब के निर्माण के लिए फिर किसी कृत्रिम उपाय, संकल्प विधान की आवश्यकता नहीं होती। परिवार अपने आप में ‘स्वयं-सिद्ध’ संस्था है। माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-ताऊ, पुत्र आदि के चुनाव करने की आवश्यकता नहीं होती। जहाँ गृहस्थ है, वहाँ ये सब तो हैं ही। और इन सम्बन्धों को स्थिर रखने के लिए किसी कृत्रिम उपाय की भी आवश्यकता नहीं होती। कुटुम्ब तो सहज आत्मीयता पर चलते हैं।

कहावत है-”पानी की अपेक्षा खून अधिक गाढ़ा होता है, इसलिए एक ही जलाशय के पास बसने वालों की अपेक्षा एक ही कुटुम्ब में बँधे लोगों के सम्बन्ध अधिक प्रगाढ़ आत्मीय, अभेद्य होते हैं।” कितना ही बैर भाव क्यों न पैदा हो जाय लेकिन खून का असर आदमी के दिल और दिमाग से हट नहीं सकता। एक खून का व्यक्ति अपने साथी से स्वयं लड़ लेगा लेकिन दूसरे का आक्रमण बर्दाश्त नहीं करता। दुनिया में सब सम्बन्ध परिस्थिति वश टूट सकते हैं लेकिन खून का नहीं।

कोई पुत्र अपने पिता से यह नहीं कह सकता कि मैं तुम्हारा बेटा नहीं। कोई भाई अपनी बहन से यह सिद्ध नहीं कर सकता कि “मैं तुम्हारा भाई नहीं।” खून का सम्बन्ध स्वयं सिद्ध है। एक माता-पिता अपने पुत्र के लिए जितना सोच सकते हैं, उतना हृदयपूर्वक अन्य नहीं सोच सकता। इसमें कोई सन्देह नहीं कि एक ही खून से सींची हुई कुटुम्ब संस्था गृहस्थ जीवन का अलौकिक चमत्कार है।

गृहस्थ का आधार है, वैवाहिक जीवन। स्त्री और पुरुष विवाह-संस्कार के द्वारा गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। तब वे गृहस्थाश्रमी कहलाते हैं। स्मरण रहे विवाह संस्कार का अर्थ दो शरीरों का मिलन नहीं होता। हमारे यहाँ विवाह स्थूल नहीं, वरन् हृदय की, आत्मा की, मन की एकता का संस्कार है। जो विवाह को शारीरिक निर्बाध कामोपभोग का सामाजिक स्वीकृति-पत्र समझते हैं, वे भूल करते हैं। वे अज्ञान में हैं। विवाह का यह प्रयोजन कदापि नहीं है।

भारतीय जीवन पद्धति में उसका उद्देश्य बहुत बड़ा है, दिव्य है , पवित्र है। विवाह के समय वर कहता है-

“द्यौरहं पृथ्वी त्वं सामाहम्हक्त्वम्।
सम्प्रिदौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौजीवेव शरदः शतम्॥”

“मैं आकाश हूँ, तू पृथ्वी है। मैं सामवेद हूँ, तू ऋग्वेद है। हम एक दूसरे पर प्रेम करें। एक दूसरे को सुशोभित करें। एक दूसरे के प्रिय बनें। एक दूसरे के साथ निष्कपट व्यवहार करके सौ वर्ष तक जियें।”

यही कहीं नहीं कहा है कि पति और पत्नी दो शरीर हैं। उन दोनों शरीरों का मिलन ही विवाह है अथवा भोगासक्त जीवन बिता कर अल्प- मृत्यु प्राप्त करना ही विवाह है।

आकाश और पृथ्वी का सहज मिलन पति पत्नी के सम्बन्धों का अपूर्व आदर्श है। विवाह ज्ञान और कला का संगम है। प्रेम के लिए एक दूसरे को अर्पण कर देने का विधान है, दो हृदयों को निष्कपट- खुले व्यवहार सूत्र में पिरोने का विधान है। विवाह संयमपूर्वक लेकिन आनन्दमय जीवन बिताकर पूर्ण आयु प्राप्त करने का सहज मार्ग है।

गृहस्थ का उद्देश्य स्त्री – पुरुष एवं अन्य सदस्यों का ऐसा संयुक्त जीवन है जो उन्हें शारीरिक सीमाओं से ऊपर उठा कर एक दूसरे के प्रति निष्ठा, आत्मीयता, एकात्मकता की डोर में बाँध देता है। यह डोर जितनी प्रगाढ़ – पुष्ट होती जाती है, उतनी ही शारीरिकता गौण होती जाती है। ऐसी परिस्थिति में शरीर भले ही रोगी, कुरूप हो जावे लेकिन पारस्परिक निष्ठा कम नहीं होती।

एक स्त्री ही संसार में सबसे सुन्दर और गुणवती नहीं होती, लेकिन पति के लिए सृष्टि में उसके समान कोई नहीं। संसार में सभी माँ एक सी नहीं होतीं, लेकिन प्रत्येक माँ अपने बच्चे के लिए मानो ईश्वरी वात्सल्य की साकार प्रतिमा है। एक गरीब कंजर अशिक्षित माँ के अंक में बालक को जो कुछ मिल सकता है, वह किसी दूसरी स्त्री के पास नहीं मिल सकता। प्रत्येक बालक के लिए माँ उसकी जननी ही हो सकती हैं और काना, कुरूप, गन्दा, अविकसित बालक भी माँ के लिए सबसे अधिक प्रिय होता है। धर्म की बहन कितनी ही बना ली जाएं लेकिन भाई के लिए जो उमड़ता-घुमड़ता हृदय एक सहोदर बहन में हो सकता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इस तरह हम देखते हैं कि गृहस्थाश्रम शारीरिक सम्बन्धों पर टिका हुआ नहीं है। अपितु स्नेहमय, दिव्य, सूक्ष्म आधार स्तम्भों पर इस पुण्य भवन का निर्माण होता है। पारिवारिक जीवन में परस्पर सम्बन्धों की यह दिव्यता ही गृहस्थ जीवन की आत्मा है।

गृहस्थाश्रम वृत्तियों का शोधन करना जीवन की साधना की एक रचनात्मक प्रयोगशाला है। मनुष्य की काम वासना को पति-पत्नी में एक दूसरे के प्रति कर्त्तव्य, निष्ठा, प्रेम में परिवर्तित कर कामोपभोग को एक साँस्कृतिक संस्कार बनाकर सामाजिक मूल्य में बदल देना गृहस्थाश्रम की ही देन है। स्मरण रहे गृहस्थाश्रमी शरीर-निष्ठ अथवा रूप-निष्ठ नहीं होता। कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व, प्रेम की निष्ठा ज्यों-ज्यों बढ़ती है, शारीरिकता नष्ट होने लगती है और क्रमशः पूर्णरूपेण शारीरिकता का अन्त होकर उक्त दिव्य आधार मुख्य हो जाते हैं। कामुकता भी नष्ट हो जाती है। इसलिए गृहस्थाश्रम कामोपभोग का प्रमाण-पत्र नहीं, अपितु संयम-ब्रह्मचर्य मूलक है। संयम का एक क्रमिक लेकिन व्यावहारिक साधना स्थल है। सेवा-शुश्रूषा, पालन-पोषण, शिक्षण एक दूसरे के प्रति प्रेम, त्याग, सहिष्णुता के माध्यम से मनुष्य की कामशक्ति संस्कारित, निर्मल होकर मनुष्य को व्यवस्थित संगत, दिव्य बनाने का आधार बन जाती है।

गृहस्थ तप और त्याग का जीवन है। गृहस्थी के निर्वाह-पालन के लिये किए जाने वाला प्रयत्न किसी तप से कम नहीं है। कुटुम्ब का भार वहन करना, परिवार के सदस्यों को सुविधापूर्ण जीवन के साधन जुटाना, स्त्री, बच्चे, माता, पिता, अन्य परिजनों की सेवा करना बहुत कठिन तपस्या है। गृहस्थ में स्वयमेव मनुष्य को अपनी अनेकों प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना पड़ता है। कोई भी गृहस्थ स्वयं कम खा लेता है, पुराना कपड़ा पहन लेता है, लेकिन परिवार के सदस्यों की चिकित्सा, वस्त्र, भोजन, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए सब प्रबन्ध करता है। पेट काट कर भी माँ-बाप बच्चों को पढ़ाते हैं। फटा कपड़ा स्वयं पहनकर बच्चों को अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाते हैं। गृहस्थ में जिम्मेदार व्यक्ति के सामने अन्य सदस्यों को सुखी सन्तुष्ट रखने का ध्यान प्रमुख होता है, स्वयं का गौण। उधर गृहिणी सबसे पीछे जो बच जाता है, वह खा लेती है। सबकी सेवा में दिन-रात लगी रहती है। बिना किसी प्राप्ति की इच्छा से सहज रूपेण। सचमुच गृहस्थाश्रम एक यज्ञ है तप और त्याग का। प्रत्येक सदस्य उदारतापूर्वक सहज ही एक दूसरे के लिए कष्ट सहता है, एक दूसरे के लिए त्याग करता है।

गृहस्थाश्रम समाज को सुनागरिक देने की खान है। भक्त, ज्ञानी, सन्त, महात्मा, महापुरुष, विद्वान, पण्डित, गृहस्थाश्रम से ही निकल कर आते हैं। उनके जन्म से लेकर शिक्षा-दीक्षा, पालन-पोषण, ज्ञान-वर्धन गृहस्थाश्रम के बीच ही होता है। परिवार के बीच ही मनुष्य की सर्वोपरि शिक्षा होती है।

गृहस्थाश्रम की सर्वोपरि उपलब्धि है उसका आतिथ्य धर्म। आतिथ्य धर्म कितना बड़ा सामाजिक मूल्य है। जिसे कहीं भोजन न मिले, जो संयोग से ही पहुँच जाय उसे भोजन कराये बगैर गृहस्थी भोजन नहीं करता। गाँव के पास -पड़ौस में कोई भूखा न रह जाय, इसके लिए प्रतिदिन नियम पूर्वक किसी अतिथि को भोजन कराये बिना कुछ भी न खाना, हमारे यहाँ गृहस्थाश्रम की अभूतपूर्व देन है। असंख्यों असमर्थ, अपाहिज अथवा अन्य उच्च कार्यों में लगे त्यागी तपस्वी, संन्यासी, सेवकों का जीवन निर्वाह गृहस्थाश्रम से ही होता है।

गृहस्थाश्रम समाज के संगठन, मानवीय मूल्यों की स्थापना, समाज निष्ठा, भौतिक विकास के साथ-साथ मनुष्य के आध्यात्मिक-मानसिक विकास का क्षेत्र है। गृहस्थाश्रम ही समाज के व्यवस्थित स्वरूप का मूलाधार है।

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देवी सिंग तोमर

भारत के राष्ट्रीय जीवन मे राजपूत शब्द एक परंपरा के रूप में परिणित हो गया है .. जहां इस जाति ने बसकर एक बंजर ओर मरु भूमि में , अपनी चेतना और चरित्र से ही अपना राग, ओर रक्त से अपना इतिहास रचा।

मध्ययुग में जहां जौहर की चिंताएं जली, ओर जिन वीरांगना क्षत्राणियो ने , अग्नि की भयावह लपटों का प्रेम से आलिंगन किया, वहीं पुरुष प्रवीरो ने केशरिया बाना पहनकर शत्रु को यही सिखाया की सिंहःव्रत क्या होता है ………..

राजपूतो के बारे में आज अनेक तरह की अटकलें लगाई जाती है, आरोप लगाए जाते है, उनके इतिहास को चोरी किया जाता है, ओर राजपूतो के बारे में अनर्गल प्रलाप किया जाता है, उसने इतिहास का मख़ौल बनाकर छोड़ दिया है ।

इस देश के लोगो को … इस देश के इतिहासकारो को …. अपनी अटकलों के बीच इतिहास के चिंतकों ओर दो कौड़ी के दार्शनिको ने तत्कालीन सामाजिक और राष्ट्रक्रांति के उद्घोष को नही सुना !

अंग्रेजी के ग्रन्थो को पढ़कर , इतिहासकार बनने वालो के कानों में राजपूतो के राष्ट्रप्रेम की ” राष्ट्रवाणी कभी पहुंच ही नही सकी । यौद्धेय स्वतंत्रता , सौहार्द ओर समता के आदर्शों पर चलकर, भूमि से लेकर पशुओं तक कि पूजा करने वाले राजपूतो को विदेशी कहने में इतिहासकारो को ज़रा भी लज्जा नही आयी । राजपूतो पर आरोप- प्रत्यारोप लगाने वाले अति-ज्ञानीजन एक बार रोम-मकदूनिया आदि देशों का इतिहास भी पढ़े, गरीब लोगों को आजीवन दास बनाकर रखा जाता था जबकि दूसरी ओर आप ओर हम भारत मे दूध की नदियां बहा रहे थे । मनुष्य को पीड़ा देने की बात तो दूर है … राजपूतो में तो ऐसे राजा हुए है, जो भूलवश हुए जानवरो के वध के शोक में भी संन्यास ले लेते थे …. राजा भृतहरि उदारहण है ।
ऐसे दयालु राजपूत कभी स्वार्थी शाशक हो सकते थे ??

जब से इस आर्यवत का इतिहास लिखा गया है , तब से लेकर आज तक अगर देश के लिए सबसे ज़्यादा खुन किसी ने बहाया है, तो वह राजपूत ही है । भगवान श्री राम से लेकर अंतिम वीर दुर्गादास राठौड़ …… यह सभी राजपूत ही थे ।
देवासुर – संग्राम में जिसने दैत्यों के वध करने वाले वीर ” राजपूत ” ही थे।

मनुस्मृति में रामायण में , एवम गीता में इन्ही रक्षको को क्षत्रिय कहा जाता है। ओर क्षत्रिय राजकुमार को — महात्माराजपुत्रोयं कहा गया है । युद्ध करना ही उनका स्वधर्म ओर स्वकर्म था । किसी भी कारण से काम, लोभ, क्रोध या द्रोह से — उसे स्वधर्म का त्याग करना उचित न था ।
राजपूतो को बचपन से एक ही शिक्षा दी जाती थी —-

” नैव नित्यं जयस्तात , नैव नित्यं पराजय: ”

ना तो सदा किसी की जय होती है, ओर ना पराजय ….

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आश्रम-व्यवस्था

वेद ने मनुष्य-जीवन को चार भागों में व्यक्त किया है।
वे भाग हैं-ब्रह्मचर्य आश्रम,गृहस्थ आश्रम,वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम।

आश्रम को आश्रम इसलिए कहा जाता है कि उसमें व्यक्ति पूर्णतया श्रम करता है और अपने जीवन को सफल बनाता है।मनुष्य जीवन की सफलता इसी बात पर आधारित है कि वह चारों आश्रमों में परिश्रम करे।

वेद ने मनुष्य-जीवन को गणित के मूलभूत आधार के समान माना है।

ब्रह्मचर्य-आश्रम:- ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्रह्मचारी अपने शारीरिक,मानसिक,बौद्धिक व आत्मिक बल का संग्रह करता है।यह संग्रह काल होता है। यह काल मनुष्य जीवन का आधार होता है।जितना आधार पुष्ट होगा,उतना ही जीवन-रुपी भवन सुदृढ होगा।ब्रह्मचारी सब प्रकार का ज्ञान प्राप्त करता है और वेद-विद्या के प्रचार से आचार्य की इष्ट सिद्धि करता है।

ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ।
आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते ।।- (अथर्व० ११/५/१७)

ब्रह्मचर्यरुपी तप से राजा राज्य को विशेष करके पालता है। आचार्य ब्रह्मचर्य से ब्रह्मचारी है।
मन्त्र का आशय यह है कि राजा यदि इन्द्रिय-निग्रही है,तो ही वह प्रजा का पालन कर सकता है।आचार्य ब्रह्मचारी के द्वारा ब्रह्मचर्य-पालन के कारण ही विद्या-प्राप्ति के लिए उससे प्रेम करता है।
महर्षि धन्वन्तरि से शिष्यों ने एक बार पूछा कि जीवन में सब प्रकार के रोगों को नष्ट करने का क्या उपाय है?इस पर आचार्य धन्वन्तरि जी ने कहा-

मृत्युव्यापी जरानाशी पीयूषं परमौषधम् ।
ब्रह्मचर्यं महद्रत्नं,सत्यमेव वदाम्यहम् ।।

अर्थात्-मैं सत्य कहता हूँ कि मृत्यु,रोग और वृद्धपन का नाश करने वाला अमृतरूप सबसे बडा उपचार ब्रह्मचर्य ही है।

🌷गृहस्थ-आश्रम:-आश्रम-व्यवस्था में गृहस्थाश्रम को दूसरा स्थान दिया गया है।
गृहस्थाश्रम में पति-पत्नि एक-दूसरे के लिए और मां-बाप सन्तान के लिए त्याग करते हैं।गृहस्थाश्रम तपश्चर्या का आश्रम है।

दु:ख,हानि,पराजय,अपमान और मृत्यु को सहन करने से गृहस्थ की तपस्या का परिचय मिलता है।इसी के कारण सम्बन्धों की स्थापना होती है।
मातृकुल,पितृकुल,माता-पिता,श्वसृकुल से जो रिश्ते मनुष्य को प्राप्त होते हैं ,वे सभी गृहस्थाश्रम से प्राप्त होते हैं।इससे उत्तम व्यवहारों की सहज सिद्धि होती है।यह नैतिकता का अच्छा प्रशिक्षण केन्द्र होता है।इसमें काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार और मानसिक निकृष्टता की परिक्षा होती रहती है।
गृहस्थाश्रम वात्सल्य की पूर्ति का आश्रम है।इसमें माता-पिता अपनी सन्तान के प्रति प्रेम-प्यार की भावना को पूरी करते हैं।यह आश्रम मनुष्य को शारीरिकता से आत्मिकता की और ले जाता है।इस संस्था में भी कुछ दोष हैं।उन दोषों के निवारण करने की आवश्यकता है,न कि यूरोप के कुछ स्वच्छन्दतावादियों की भाँति गृहस्थाश्रम की व्यवस्था को ही नष्ट करने की सोचनी चाहिए।

वैदिक साहित्य में गृहस्थाश्रम को ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ आश्रम माना गया है।मनु महाराज के दो श्लोक इस सन्दर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-

यथावायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तव: ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमा: ।।-(मनु० ३/६६)

अर्थ:-जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का जीवन सिद्ध होता है,वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचर्य,वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमों का निर्वाह होता है।
अर्थात् जिस प्रकार वायु के बिना प्राणियों का जीवन चल ही नहीं सकता,वैसे ही गृहस्थाश्रम के बिना उक्त तीनों आश्रम टिक ही नहीं सकते।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश के अधिकारी कौन हैं?इस विषय को लेकर मनु महाराज ने कहा है:-

स संधार्य: प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता ।
सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियै: ।।-(मनु० ३/७८)

अर्थ-जो मोक्ष और संसार के सुख की इच्छा करता है,वह गृहस्थाश्रम को धारण करे।वह गृहस्थ निर्बल इन्द्रियवालों के द्वारा धारण करने के योग्य नहीं है।

काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
न चैवेनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ।।-(मनु० ९/८९)

अर्थ-कन्या रजस्वला होने पर भी चाहे मृत्युपर्यन्त घर में अविवाहित बैठी रहे,परन्तु पिता कभी उसे गुणहीन युवक के साथ विवाहित न करे।

उपर्युक्त दोनों श्लोकों से यह परिणाम निकलता है कि विवाह से पहले युवक और युवती का स्वस्थ और सबलेन्द्रिय होना आवश्यक है।इसके साथ-२ आजीविका के साधन से सम्पन्न होने के साथ ही दोनों का सदाचारी होना भी अत्यन्त आवश्यक है।

इसके साथ ही विवाह बाल्यावस्था में नहीं होना चाहिए,युवावस्था में विवाह ठीक रहता है-

(सुश्रुत,शारीरस्थान १०-४६,४८) में लिखा है:-
“सोलह वर्ष से कम आयु वाली स्त्री में पच्चीस वर्ष से न्युन आयु वाला पुरुष जो गर्भ का स्थापन करे तो वह कुक्षिस्थ हुआ गर्भ विपत्ति को प्राप्त होता है,अर्थात् पूर्णकाल तक गर्भाशय में रहकर उत्पन्न नहीं होता,अथवा उत्पन्न हो तो फिर चिरकाल तक नहीं जीता।यदि जिये तो दुर्बलेन्द्रिय होता है।”

🌷वानप्रस्थ आश्रम:-यह विज्ञान बढाने और तपश्चर्या करने के लिए है।यह गृहस्थ का मोह छोडकर बाहर वन में जाकर रहने का आश्रम है।वर्तमान काल में वैदिक राज्य न होने के कारण वानप्रस्थियों को वन जाने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

शिर के केश होतं जब श्वेता,आय बुढापा रुप विजेता
पोते का मुख ज्योंहि देखे,छोड देय सब घर के लेखे।
नगर ग्राम के त्याग अहारा,मीठा लोना चरपर खारा
बढिया अम्बर सकल उतारे,केवल सादे वस्त्र धारे।
चाहे तो पत्नि संग ले जाय,अथवा पुत्र पास ठहराये
बस्ती छोड वनों में जाय,सुन्दर पर्णकुटी में छाये।
अग्निहोत्र गहे साङ्ग उपङ्गा,भगवद्भक्ति करे सत्संगा
कन्द मूल फल खाये भोजन,उसे खिलाये आय जो जन।
अग्निहोत्र उन्हीं से कीजे,वन जीवन का आनन्द लीजे
स्वाध्याय में चित्त लगाये,वृथा न अपना समय गँवाय।
विद्यादिक वस्तुन को देता,कभी दान पुण्य नहीं लेता
इन्द्रिय जीत सबका हो प्यारा,मन को वश में राखन हारा।
तन के हित अति जतन अकारी,किन्तु रहे पूर्ण ब्राह्मचारी।
निज पत्नि यदि होवे संगा,तो भी उठे न काम तरंगा
दगावान् भूमि पर सोवे,निज वस्तुन में निर्मम होवे।
वृक्ष मूल में करे निवासा,उत्तम वाणप्रस्थ को वासा ।
शान्त चित्त हो जो विद्वाना,करते वन धर्मानुष्ठाना
भिक्षा मांग उदर को भरते,वे नर भव सागर को तरते।
अविनाशी ईश्वर को पावहिं,प्राण द्वार सों प्रभु पँह जावहिं।।

🌷सन्यास आश्रम:-यह वेदादि शास्त्रों का प्रचार,धर्म व्यवहार का ग्रहण,दुष्ट व्यवहार का त्याग,सत्योपदेश और सबको निस्सन्देह करने के लिए है।

जा छिन मन हो जाय विरागी,वीतराग निर्मोही त्यागी
उसी समय होवे सन्यासी,गृही होवे अथवा बनवासी।
तोड फोड जग के जंजाला,सन्यासी हो रहे निराला।
करता रहे जगत् उपकारा,मोह माया से करे किनारा।
जिससे दुराचार नहीं छूटा,माया का बन्धन नहीं टूटा
नहीं शान्ति जिसके मन में,लगी लालसा जग द्रव्यन में।
जाको अन्त:करण न योगी,नहीं सन्यासी है वह भोगी।
वह सन्यास करे यदि धारण,करता केवल आत्म प्रतारण
हे पारब्रह्म को कबहुँ न पावे,चाहे कितना ढोंग रचावे।
सन्यासी रोके मन वाणी,बिन रोके होवे बहु हानी
आत्म-ज्ञान में इन्हें लगावे,पुन: आत्म परमात्म पावे।
ब्रह्मज्ञान आत्म में लावे,शान्त चित्त में उसे टिकावें।
सकल भोग कर्मों से संचित,फिर भी रहे ज्ञान से वंचित।
अकृत ईश्वर कर्म अगोचर,ज्ञान हेत नर हो गुरु गोचर।
गुरु बिन कबहुँ ज्ञान नहीं आवे,तांते गुरु चरणन में जावे।
गुप्त रहस्य गुरु सब जाने,जीव ब्रह्म के भेद पचाने।
गुरु से प्राप्त करें विज्ञाना,मन के संशय सभी मिटाना।
ऐसे जन का त्यागे संगा,जिसे चित्त वृत्ति हो भंगा।
जग का यश सुत धन की इच्छा,इन्हें त्यागे माँगे जो भिच्छा।
रहे मुक्ति साधन लव लीना,सन्यासी भक्ति रस भीना।
यश रचे प्रभु दर्शन कारण,शिखा सूत्र तहाँ करे निवारण।
पञ्च अग्नि प्राणों में धारे,गृह के बन्धन तोड बिसारे।
पारब्रह्म वित गृह से निकले,ताकी आत्मज्योति विकसे।।

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हमसफ़र को समर्पित….

अन्त में हम दोनों ही होंगे !!!.
भले ही झगड़े, गुस्सा करे,
एक दूसरे पर टूट पड़े
एक दूसरे पर दादागिरि करने के
लिये, अन्त में हम दोनों ही होंगे
जो कहना हे, वह कह ले,
जो करना हे, वह कर ले
एक दुसरे के चश्मे और
लकड़ी ढूँढने में,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
मैं रूठूं तो तुम मना लेना,
तुम रूठो ताे मै मना लूँगा
एक दुसरे को लाड़ लड़ाने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
आँखे जब धुँधली होंगी,
याददाश्त जब कमजोर होंगी
तब एक दूसरे को एक दूसरे
मे ढूँढने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
घुटने जब दुखने लगेंगे,
कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
“मेरी हेल्थ रिपोर्ट एक दम नॉर्मल
है, आइ एम आलराईट
ऐसा कह कर ऐक दूसरे को
बहकाने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
साथ जब छूट जायेगा,
बिदाई की घड़ी जब आ जायेगी
तब एक दूसरे को माफ करने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होगें…

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वामांगी


🚩🙏 पत्नी “वामांगी” क्यों कहलाती है ?

शास्त्रों में पत्नी को वामांगी कहा गया है , जिसका अर्थ होता है बायें अंग की अधिकारी । इसीलिये पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है । इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बायें अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है उनका “अर्धनारीश्वर रूप” । यही कारण है कि हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार पुरुष के दायें हाथ से पुरुष की और बायें हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है ।

स्त्री पुरुष की वामांगी होती है , अतः सोते समय और सभा में, सिंदूरदान, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं तरफ रहने से शुभ फल की प्राप्ति होती है । जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है क्योंकि यह कर्म स्त्री प्रधान कर्म माने जाते हैं ।

वामांगी होने पर भी शास्त्रोक्त कथन है कि कुछ कार्यों में स्त्री को दायीं तरफ रहना चाहिये , जैसे कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं तरफ बैठना चाहिये क्योंकि यह सभी कार्य पारलौकिक माने जाते हैं और इन्हें पुरुष प्रधान माना गया है। इसलिए इन कर्मों में पत्नी के दायीं तरफ बैठने के नियम हैं ।

वामांगी के अतिरिक्त पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है । दोनों शब्दों का सार एक ही है जिसके अनुसार पत्नी के बिना पति अधूरा है । पत्नी ही पति के जीवन को पूर्ण करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है, और उसे सभी सुख प्रदान करती है ।

“सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा ।

सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता” ।।
🚩👏🌹🌺🌻🌼🌷🙏

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सुबह सुबह मिया बीवी के झगड़ा हो गया,

बीवी गुस्से मे बोली – बस, बहुत कर लिया बरदाश्त, अब एक मिनट भी तुम्हारे साथ नही रह सकती।

पति भी गुस्से मे था, बोला “मैं भी तुम्हे झेलते झेलते तंग आ चुका हुं।

पति गुस्से मे ही दफ्तर चले गया पत्नी ने अपनी मां को फ़ोन किया और बताया के वो सब छोड़ छाड़ कर बच्चो समेत मायके आ रही है, अब और ज़्यादा नही रह सकती इस जहन्नुम मे।

मां ने कहा – बेटी बहु बन के आराम से वही बैठ, तेरी बड़ी बहन भी अपने पति से लड़कर आई थी, और इसी ज़िद्द मे तलाक लेकर बैठी हुई है, अब तुने वही ड्रामा शुरू कर दिया है, ख़बरदार जो तुने इधर कदम भी रखा तो… सुलह कर ले पति से, वो इतना बुरा भी नही है।

मां ने लाल झंडी दिखाई तो बेटी के होश ठिकाने आ गए और वो फूट फूट कर रो दी, जब रोकर थकी तो दिल हल्का हो चुका था,
पति के साथ लड़ाई का सीन सोचा तो अपनी खुद की भी काफ़ी गलतियां नज़र आई।

मुहं हाथ धोकर फ्रेश हुई और पति के पसंद की डीश बनाना शुरू कर दी, और साथ स्पेशल खीर भी बना ली, सोचा कि शाम को पति से माफ़ी मांग लुंगी, अपना घर फिर भी अपना ही होता है पति शाम को जब घर आया तो पत्नी ने उसका अच्छे से स्वागत किया, जैसे सुबह कुछ हुआ ही ना हो पति को भी हैरत हुई। खाना खाने के बाद पति जब खीर खा रहा था तो बोला डिअर, कभी कभार मैं भी ज़्यादती कर जाता हुं, तुम दिल पर मत लिया करो, इंसान हुं, गुस्सा आ ही जाता है”।

पति पत्नी का शुक्रिया अदा कर रहा था, और पत्नी दिल ही दिल मे अपनी मां को दुआएं दे रही थी, जिसकी सख़्ती ने उसको अपना फैसला बदलने पर मजबूर किया था, वरना तो जज़्बाती फैसला घर तबाह कर देता।

अगर माँ-बाप अपनी शादीशुदा बेटी की हर जायज़ नाजायज़ बात को सपोर्ट करना बंद कर दे तो रिश्ते बच जाते है।
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