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कुछ महान जातियों के कुछ हिस्सों का एक छोटा सा अंश

१. चर्मकार या चमार : आज सबसे नीची दृष्टि से देखे जाने वाली ये जाती एक समय बड़ी समृद्ध होती थी | १९वि सदी के प्रारंभ में कानपुर के सम्हाल दास चमार प्रसिद्ध है धन ऐश्वर्य के लिए | जो जानवर मरता था उसकी खाल को उतारकर वैदिक पद्धति से शोधित किया जाता था | कबूतर के मल को डाल कर पैरों से मसलने की विधि थी | ना जल दूषित होता था जैसा के आज टेनरियो के जल से नदिया दूषित हों रही है जिसमे गंगा माता प्रमुख है | अंग्रेजो ने सामूहिक बूचड़ खाने यानी पशुवध शालाये खुलवा के चर्मकारो की रोजी रोटी बंद कर दी | एक तों जीव हत्या ऊपर से समाज के सबसे समृद्ध वर्ग को तोड़ दिया | आज ये कार्य मुसलमानों ने प्रमुखता से पकड लिया है और टेनरी उद्योग मे अरबो कमा रहे है | अखबार उनके, संचार माध्यम उनके, तों दबे वर्ग की आवाज लोगो तक पहुचाये कौन ?

२. कुम्भकार या कुम्हार या प्रजापति : समृद्ध वर्गों में ये वर्ग भी रहा क्यों के सब बर्तन प्रयोग करते थे | जैसे ही फसल होती थी फसल के बदले बर्तन ले लिए जाते थे | मृदा वर्तन प्रयोग करने से कोई बीमार नहीं पड़ता था | शरीर पुष्ट रहता था और समाज के बड़े वर्ग की आर्थिक समृधि रहती थी | धातु के वर्तन उद्योगों को चला कर कुम्भकारो के काम को शनैः-शनैः बंद करवा दिया गया | आज कुम्हारों ने अधिकतर अपना कार्य छोड़ हि दिया है | प्रजापति यानि प्रजा की रक्षा करने वाला स्वास्थ की रक्षा तों कर्ता ही था इस प्रकार के भी वर्तनो को बनाने की विद्या रही है भारत में के विषयुक्त भोजन होने पर वर्तन चिटक जाते थे |

३. सविता या कलपक या वृत्ति या नाऊ : ये शैल्य चिकित्सक होते थे | आज भी फोड़ा इत्यादि होता तों नाइ उस्तरे से काट देते | अंग्रेजो ने भारत से सर्जेरी सीखी और भारत में ही प्राचीन पद्धति से सर्जरी खत्म करा दी | आज यदि लोग स्वास्थ सेवाओ के महंगे होने का रोना रो रहे है वो ब्राह्मणों द्वारा संचालित शिक्षा व्यवस्था के बंद होने के कारण ही है | आज के नाऊ सविता नाम इसलिए पड़ा क्यों के परमात्मा का नाम है उत्पादक होने के कारण, इसी प्रकार नाऊ बच्चा होता था तों नाडा काटता था | आज ये वर्ग या तों अन्य नौकरी ढूंड रहा है या बाल काट के अपनी जीविकोपार्जन कर्ता है |

४. लोहार या विश्वकर्मा : ये भी वेद में परमात्मा का नाम था इनकी कमर तोड़ी इन्डियन फोरेस्ट एक्ट १८६५ बना कर | भारत का इस्पात उद्योग जो कुटीर उद्योग था वो खत्म कर दिया एक तों इस से भारतीय स्वतंत्र रूप से हथियार नहीं बना सकते थे ऊपर विकेन्द्रित अर्थ व्यवस्था को तोडना आवश्यक था लोग स्वतंत्र थे उन्हें गुलाम बनाने के लिए आपको उनके अर्थ के मार्ग को नियंत्रित करना था वही किया गया | बड़े-२ उद्योगपति खड़े किये गए जो केंद्रित थे उन्हें नियंत्रण करना कर कानूनों से अधिक सरल था बजाये बड़े समाज को नियंत्रित करने के |

५. जुलाहे : हाथ से कपडे बनाने वालो को पावर लूम खड़ा कर के खत्म कर दिया गया | कुछ विद्वानों ने तों ये भी कहा के अंग्रेजो ने जुलाहों के हाथ तक कटवाए ठीक वैसे ही जैसे गुरुकुलो को बंद करने के लिए ब्राह्मणों के हाथ कटवाए हत्या करवाई |

६. रजका या वरिष्ठा या दिवाकर धोबी : मिट्टी से कपडे धोने की विद्या थी और कपडे उद्योग पर पकड़ से इनका व्यवसाय प्रभावित हुआ | आज ये प्रभावित वर्ग है |

७. मोची : मोची चर्मकार का सीधा सम्बन्ध था जब चमार प्रभावित हुआ तों मोची भी प्रभावित हुआ आज मोची सड़क पर है |

८. कहार या बाथम : ये डोली उठाने का कार्य करते थे श्रमिक कार्य के लिए अधिक धन दिया जाता था क्यों के उसे धन की अधिक आवयश्कता थी | आज अंग्रेजो का ब्रास बैंड चलता है | डोली की परंपरा पुनः चालु की जाए तों ये ब्रास बैंड जैसी गुलामी की निशानी बंद हों जाये |

९. कश्यप या केवट : नाव चलाने का कार्य कर्ता था | क्यों के सभी वर्ग प्रभावित हों रहे थे अंग्रेजो की नीतियों से तों श्रमिक वर्ग पर भी प्रभावित हुआ | याद करिये श्री राम ने केवट को नदी पार कराइ मुद्रिका दी थी |

दक्षिण भारत की जातियों के साथ भी यही सब हुआ | इसके अतिरिक्त अंग्रेजो ने योद्धा ज्ञातियो को पिछड़ा वर्ग घोषित कर दिया जैसे यादव, जाट, गुर्जर इत्यादि क्यों के ये लड़ाकू कौम थी | कितना आश्चर्य है के श्री कृष्ण के वंशज आज गर्व से अपने को पिछड़ा कहते हैं। अंग्रेजो ने जाल में ऐसा फसाया के आज तक आपस में ही उलझे पड़े है | कुछ कौमों को तों जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया अंग्रेजो ने | ठगी प्रथा है इस जाती मे ऐसा प्रचार किया उस देश मे जो त्याग और तपस्या के सिधान्तो पर चलता रहा है लाखो वर्षों से और वो कह रहे थे ये बात जो इस देश मे लूटने आये थे | उस वक्त तों राष्ट्रभक्तो पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा।

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!!

स्पृश्याश्पृश्य !!

न ज्ञायते कुलं यस्य बीजशुद्धिं विना तत:!

तस्य खादन् पिबन् वापि साधु: सीदति तत्क्षणात्!!

जिसके कुल का ज्ञान ना हो,जिसके जन्म में वीर्यशुद्धि का आभाव हो,उसका अन्न खाने वाला और जल पीने वाला तत्काल कष्ट में पड़ जाता है!!
—>
इस बात को रेलवे ने भी माना है, किसी अनजान व्यक्ति से कुछ न खाएं!!

अब इस बात को रेलवे या कोई और कहे तो निर्देश!
और शास्त्र कहें तो स्पृश्याश्पृश्य??😊😊

प्रश्न—
यदि सभी जीव में शिव हैं,तो ऊंच नीच भेदभाव क्यों??

उत्तर–///

यदि सभी में शिव हैं तो भोजन त्यागकर मिट्टी क्यों न खाया जाय??

राख धूल क्यों नहीं फांकते??

इसलिये संसार की व्यवहार सिद्धि के लिये एक मर्यादा स्थापित की गयी है, जो समय से सफल होती है,अन्यथा नहीं!

जैसे—//
सुवर्ण के बने हुए बहुत से आभूषण होते हैं,उनमें कोई विशुद्ध स्वर्ण के होते हैं,कुछ खोटे भी होते हैं!

खरे खोटे सभी आभूषणों में सुवर्ण तो है ही!

इसी प्रकार ऊंच नीच,शुद्ध अशुद्ध सब में भगवान् शिव हैं!

खोटा सुवर्ण भी शोधित होने पर शुद्ध सुवर्ण की एकता प्राप्त कर लेता है!

उल्टा नाम जपत जग जाना!
वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना!!

जय श्री राम!!💐

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“वर्ण व्यवस्था” बनाम “जातिवाद” !!!

नीरज शर्मा

काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ॥

ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों का नाम चातुर्वर्ण्य है i सत्व, रज, तम – इन तीन गुणों के विभाग से तथा कर्मों के विभाग से यह चारों वर्ण मुझ ईश्वर द्वारा रचे हुए – उत्पन्न किए हुए हैं i इस प्रकार, गुण और कर्मों के विभाग से चारों वर्ण मेरे द्वारा उत्पन्न किए गए हैं, यह अभिप्राय है I यद्यपि मायिक व्यवहार से मैं उस कर्म का कर्ता हूँ, तो भी वास्तव में मुझे अकर्ता ही जान तथा इसीलिए मुझे अव्यय और असंसारी ही समझ I

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय – ४, श्लोक – १२ और १३)

जिसमें सत्वगुण प्रधान और रजोगुण गौण है, उस ब्राह्मण के शम, दम, तप इत्यादि कर्म हैं I जिसमें सत्वगुण गौण और रजोगुण प्रधान है, उस क्षत्रिय के शूरवीरता, तेज प्रभृति कर्म हैं I जिसमें तमोगुण गौण और रजोगुण प्रधान है, ऐसे वैश्य के कृषि आदि कर्म है I तथा जिसमें रजोगुण गौण और तमोगुण प्रधान है, उस शूद्र का केवल सेवा ही कर्म है I

ऐसी यह चार वर्णों की अलग-अलग व्यवस्था दूसरे लोकों में नहीं है, इसलिए (पूर्व श्लोक) में ‘मानुषे लोके’ यह विशेषण लगाया गया है I

हर व्यक्ति में तीनों गुण होते हैं, तीसरा नगण्य होता है अतः यहाँ तीसरे की चर्चा नहीं की गई है I जैसे, एक ब्राह्मण में ७६% सत्वगुण, २२% रजोगुण और २% तमोगुण हो ; यहाँ तमोगुण नगण्य है अतः उसे शामिल करने की आवश्यकता नहीं है I इन गुणों के प्रतिशत से व्यक्ति का स्वभाव निर्धारित होता है I इन तीनों गुणों का प्रतिशत सभी में अलग-अलग होता है। इसीलिए हर व्यक्ति का स्वभाव मौलिक अर्थात् अनूठा होता है और चाह कर भी नहीं बदलता है I गुणों के प्रतिशत का यह मेल पूर्व जन्म नहीं, पूर्व जन्मों के फलस्वरूप है I एक खास व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने में सहज महसूस करता है I

जैसे एक मजदूर कड़ी धूप में काम करता है तो हमें लगता है कैसे वह इतनी कड़ी धूप में काम कर रहा है! लेकिन, उसका यह स्वाभाविक कर्म है अतः उसके लिए सहज है I एक ब्राह्मण के ज्ञान की उपलब्धि आपको आश्चर्यचकित कर देती है, किन्तु गुणों के कारण ब्राह्मण के ज्ञान की प्राप्ति उसके लिए सहज है I

इन तीनों गुणों के प्रतिशत का यदि आप permutation – combination करें तो अभी इस समय पूरी पृथ्वी की जनसंख्या से कई गुना अधिक संख्या या शायद आप गणना भी नहीं कर सकें उतनी संख्या आप पाएंगे।

भगवान् ने यहाँ स्पष्ट कहा है, चारों वर्ण मेरे द्वारा उत्पन्न किए गए हैं I पूरी गीता में किसी भी श्लोक के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा जाति शब्द नहीं कहा गया है I भगवान् ने मनुष्य लोक को वर्ण व्यवस्था दिया I इसका मतलब है कि सभी देश इसमेँ शामिल हैं I शास्त्र विहीन, नास्तिक सम्प्रदाय वाले पाश्चात्य देशों और इस्लामिक देशों के लिए वर्ण व्यवस्था कल्पनातीत ही है I

भारत की ऐसी विडम्बना रही कि अपने राजनीतिक तुष्टि के लिए राजनेताओं ने “वर्ण व्यवस्था” को संपूर्णतया दूषित कर दिया I वर्ण के स्थान पर जाति और व्यवस्था के स्थान पर वाद रख दिया I इस प्रकार “जातिवाद” रुपी ऐसे जहरीले शब्द की उत्पत्ति हुई जिसका उच्चारण मात्र ही अलगाव की भावना और कड़वाहट से भर देता है I

जय श्री कृष्ण !!

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विपिन खुराना

वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में कैसे बदल गया?

जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते। – मनु स्मृतिअर्थात मनुष्य शूद्र के रूप में उत्पन्न होता है तथा संस्कार से ही द्विज बनता है। मनुस्मृति का वचन है- ‘विप्राणं ज्ञानतो ज्येष्ठम् क्षत्रियाणं तु वीर्यतः। ’ अर्थात् ब्राह्मण की प्रतिष्ठा ज्ञान से है तथा क्षत्रिय की बल वीर्य से। जावालि का पुत्र सत्यकाम जाबालि अज्ञात वर्ण होते हुए भी सत्यवक्ता होने के कारण ब्रह्म-विद्या का अधिकारी समझा गया। वेद और महाभारत पढ़ने पर हमें पता चलता है कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीन काल में ७ द्वीपों में बांटा गया था- जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। इसमें जम्बू द्वीप में मानव का उत्थान और विकास हुआ। एक ही कुल और जाति का होने के बाद मानव भिन्न भिन्न जगहर पर रहकर हजारों जातियों में बंटता गया। पहले स्थानीय आधार पर जाति को संबोधित किया जाता था। जाति को आज अलग अर्थों में लिया जाता है। जाति, समाज या संप्रदाय पर अध्ययन करने वाले जानते हैं कि सभी का अलग-अलग अर्थ होता है। आज हम जिसे जातिवाद कहते हैं वह दुनिया के सभी धर्मों में विद्यमान है। ऊँच और नीच की भावना सभी धर्मों में विद्यमान है।
यहां यह लिखने की आवश्यकता नहीं है कि गैर-हिन्दू धर्मों में कौन-सा समाज खुद को ऊँचा मानता है। तथाकथित जातिवादी व्यवस्था की आड़ में सनातन हिंदू धर्म को तोड़ने का कुचक्र बढ़ा है। सैकड़ों वर्ष की गुलामी के काल में जातिवाद इतना नहीं था जितना की आजादी के इन ७० वर्षों में देखने को मिलता है। इसके पीछे कारण भी है। एक अंग्रेज लेखक ने सही कहा था कि जिन लोगों के हाथों में आप सत्ता सौंप रहे हैं, वे मात्र ३०-४० वर्ष में सब कुछ चौपट करके रख देंगे। आज हालत यही है। खैर, हम आपको बताना चाहते हैं कि किस तरह ‘रंग’ बन गया जातिवाद का ‘जहर’। पहले हम सुर और असुर, फिर वैष्णव और शैव में बदल गए। फिर ब्राह्मण और शूद्र में बदल कर धर्म का नाश कर दिया। इस दौरान लोगों ने अपने अपने वंश चलाएं। फिर ये वंश समाज में बदल गए। उक्त सभी का धर्म से कोई लेना देना नहीं है। वेदों में जहां धर्म की बातें हैं वहीं उक्त काल की सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख भी है। धर्म ने नहीं अपने हितों की रक्षा के लिए राजा और पुरोहितों ने बदला समाज। जैसा कि आज के राजनीतिज्ञ और तथाकथित स्वयंभू संत कर रहे हैं। जहां तक सवाल जाति का है तो जातियों के प्रकार अलग होते थे जिनका सनातन धर्म से कोई लेना-देना नहीं था। जातियां होती थी द्रविड़, मंगोल, शक, हूण, कुशाण आदि। आर्य जाति नहीं थी बल्कि उन लोगों का समूह था जो सामुदायिक और कबीलाई संस्कृति से निकलकर सभ्य होने के प्रत्येक उपक्रम में शामिल थे और जो सिर्फ वेद पर ही कायम थे। लेकिन यह भी सच है कि उस काल में लोग खुद को आर्य नहीं कहते थे। वे अपने नाम के आगे आर्य नहीं लगाते थे। वे सभी यदु, कुरु, पुरु, द्रहु, आनव, अत्रि, कश्यप, भृगु, मारीच, स्वायंभुव, अंगिरस, भारद्वाज, गौतम, अगस्त्य, विश्‍वकर्मा, वशिष्ठ, गर्ग, वैवस्वत आदि हजारों हिमालय पुत्रों की संतानें हैं। उल्लेखनी है कि उक्त काल के ऋषियों के नाम के आगे वर्तमान में लिखे जाने वाले पंडित, चतुर्वेदी, त्रिपाठी, सिंह, राव, गुप्ता, नंबूदरी आदि जैसे जातिसूचक शब्द नहीं होते थे। ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। ऐसे हजारों नाम गिनाएं जा सकते हैं जो सभी आज के दृष्टिकोण से दलित थे। वेद को रचने वाले, मनु स्मृति को लिखने वाले और पुराणों को गढ़ने वाले ब्राह्मण नहीं थे।

वर्ण का अर्थ रंग : रंगों का सफर कर्म से होकर आज की तथाकथित जाति पर आकर पूर्णत: विकृत हो चला है। अब इसके अर्थ का अनर्थ हो गया है। वैदिक काल में ऐसी मान्यता थी कि जो श्वेत रंग का है वह ब्राह्मण, जो लाल रंग का है वह क्षत्रिय, जो काले रंग का है वह क्षुद्र और जो मिश्रित रंग का होता था उसे वैश्य माना जाता था। यह विभाजन लोगों की पहचान और मनोविज्ञान के आधार पर किए जाते थे। इसी आधार पर कैलाश पर्वत की चारों दिशाओं में लोगों का अलग-अलग समूह फैला हुआ था। काले रंग का व्यक्ति भी आर्य होता था और श्वेत रंग का भी। विदेशों में तो सिर्फ गोरे और काले का भेद है किंतु भारत देश में चार तरह के वर्ण (रंग) माने जाते थे। गौरतलब है कि बहुत प्राचीनकाल में धरती का कुछ ही भाग जल में डूबा हुआ नहीं था और वह भाग था हिमालय के आसपास का। बाकी संपूर्ण धरती जल में डूबी हुई थी।
रक्त की शुद्धता : श्वेत लोगों का समूह श्वेत लोगों में ही रोटी और बेटी का संबंध रखता था। पहले रंग, नाक-नक्क्ष और भाषा को लेकर शुद्धता बरती जाती थी। आज भी ऐसा होता है। उस काल में किसी समुदाय, कबीले, समाज या अन्य भाषा का व्यक्ति दूसरे कबीले की स्त्री से विवाह कर लेता था तो उसे उस समुदाय, कबीले, समाज या भाषायी लोगों के समूह से बहिष्कृत कर दिया जाता था। उसी तरह जो कोई श्वेत रंग का व्यक्ति काले रंग की लड़की से विवाह कर लेता था तो उसे उक्त समूह के लोग उसे बहिष्कृत कर देते थे या उसका तिरस्कार करते थे। कालांतर में बहिष्कृत लोगों का भी अलग समूह और समाज बनने लगा। लेकिन इस तरह के भेदभाव का संबंध धर्म से कतई नहीं माना जा सकता। यह समाजिक चलन, मान्यता और परम्पराओं का हिस्सा हैं। जैसा कि आज लोग अनोखे विवाह करने लगे हैं…गे या लेस्बियन। क्या इस तरह के विवाह को धर्म का हिस्सा माने। लोग या जनता बनाते हैं समाज और जाति और बदलते भी वही है।

रंग बना कर्म: कालांतर में वर्ण अर्थात रंग का अर्थ बदलकर कर्म होने लगा। कहना चाहिए की रंग के कारण उत्पन्न हुए तनाव को समाप्त करने के लिए उस काल के अग्रजों ने इसे कर्म आधारित स्थापित करने का कार्य किया। माना जाता है कि राजा मनु ने अपनी राज्य व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए समाज में हजारों तरह की बिखरी जातियों को चार तरह के कर्म सौंप दिए। राज्य में पुरोहितों, क्षत्रियों, वैश्यों और दासों की नियुक्त होती थी। जो भी व्यक्ति जिस भी योग्यता का होता था उसके लिए उस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता था और योग्यता के आधार पर नियुक्ति हो जाती थी। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘चर्तुवर्णयम् माया श्रीष्टाम् गुणकर्म विभागसा’ अर्थात् गुण और कर्म के आधार पर मेरे द्वारा समाज को चार वर्णों में विभक्त किया गया है। स्मृति काल में कार्य के आधार पर लोगों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या दास कहा जाने लगा। वेदों का ज्ञान प्राप्त कर ज्ञान देने वाले को ब्राह्मण, क्षेत्र का प्रबंधन और रक्षा करने वाले को क्षत्रिय, राज्य की अर्थव्यवस्था व व्यापार को संचालित करने वाले को वैश्य और राज्य के अन्य कार्यो में दक्ष व्यक्ति को दास अर्थात सेवक कहा जाने लगा। कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार कुछ भी हो सकता था। जैसा कि आज बनता है कोई सोल्जर्स, कोई अर्थशास्त्री, कोई व्यापारी और कोई शिक्षक। योग्यता के आधार पर इस तरह धीरे-धीरे एक ही तरह के कार्य करने वालों का समूह बनने लगा (जैसा कि आजकल डॉक्टरों, वकीलों आदि का समूह या संगठन होता है) और बाद में यही समूह अपने हितों की रक्षा के लिए समाज में बदलकर अपने ही समाज से रोटी और बेटी का व्यवहार करने लगा। उक्त समाज को उनके कार्य के आधार पर पुकारा जाने लगा। जैसे की कपड़े सिलने वाले को दर्जी, कपड़े धोने वाले को धोबी, बाल काटने वाले को नाई, शास्त्र पढ़ाने वाले को शास्त्री, पुरोहिताई करने वाले को पुरोहित आदि।
प्राचीन काल में ब्राह्मणत्व या क्षत्रियत्व को वैसे ही अपने प्रयास से प्राप्त किया जाता था, जैसे कि आज वर्तमान में एमए, एमबीबीएस आदि की डिग्री प्राप्त करते हैं। जन्म के आधार पर एक पत्रकार के पुत्र को पत्रकार, इंजीनियर के पुत्र को इंजीनियर, डॉक्टर के पुत्र को डॉक्टर या एक आईएएस, आईपीएस अधिकारी के पुत्र को आईएएस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है, जब तक की वह आईएएस की परीक्षा नहीं दे देता।

कर्म कब बना जाति: ऐसे कई समाज निर्मित होते गए जिन्होंने स्वयं को दूसरे समाज से अलग करने और दिखने के लिए नई परम्पराएं निर्मित कर ली। जैसे कि सभी ने अपने-अपने कुल देवी-देवता अलग कर लिए। अपने-अपने रीति-रिवाजों को नए सिरे से परिभाषित करने लगे, जिन पर स्थानीय संस्कृति और परंपरा का प्रभाव ही ज्यादा देखने को मिलता है। उक्त सभी की परंपरा और विश्वास का सनातन हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं। स्मृति के काल में कार्य का विभाजन करने हेतु वर्ण व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया था। जो जैसा कार्य करना जानता हो, वह वैसा ही कार्य करें, जैसा की उसके गुण और स्वभाव में है तब उसे उक्त वर्ण में शामिल समझा जाए। आज यह व्यवस्था जाति व्यवस्था में बदलकर विकृत हो चली है।
उदाहरणार्थ : चार मंजिला भवन में रह रहे लोगों के लिए ऊपर या नीचे आने जाने के लिए सीढ़ियां हुआ करती थी। यदि कोई व्यक्ति अपने क्षत्रिय कर्म छोड़कर ब्राह्मण होना चाहे तो हो जाता था जैसा कि विश्वामित्र ने किया। कोई ब्राह्मण नीचे उतरकर क्षत्रिय बनना चाहे तो बन सकता था जैसा कि परशुराम ने किया। इसी तरह जबाला का पुत्र भी दास होकर भी ब्राह्मण बन गया। ऐसे कई उदाहरण है। गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार ही कर्म का निर्णय होना होता है, जिसे जाति मान लिया गया है। वर्ण का अर्थ समाज या जाति से नहीं वर्ण का अर्थ स्वभाव और रंग से माना जाता रहा है। लेकिन अब यह व्यवस्था विकृत हो चली है और इसके समाप्त हो जाने में ही हिन्दू धर्म की भलाई है। अगर ऋग्वेद की ऋचाओं व गीता के श्लोकों को गौर से पढ़ा जाए तो साफ परिलक्षित होता है कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था का कोई आधार नहीं है। सनातन हिंदू धर्म मानव के बीच किसी भी प्रकार के भेद को नहीं मानता। उपनाम, गोत्र, जाति आदि यह सभी कई हजार वर्ष की परंपरा का परिणाम है। कुछ व्यक्ति योग्यता या शुद्धाचरण न होते हुए भी स्वयं को ऊंचा या ऊंची जाति का और पवित्र मानने लगे हैं और कुछ अपने को नीच और अपवित्र समझने लगे हैं। बाद में इस समझ को क्रमश: बढ़ावा मिला मुगल काल, अंग्रेज काल और फिर भारत की आजादी के बाद भारतीय राजनीति के काल में जो अब विराट रूप ले चुका है। धर्मशास्त्रों में क्या लिखा है यह कोई जानने का प्रयास नहीं करता और मंत्रों तथा सूत्रों की मनमानी व्याख्या करता रहता है।

इस तरह बदला समाज को: प्राचीन काल में धर्म से संचालित होता था राज्य। हमारे धर्म ग्रंथ लिखने वाले और समाज को रचने वाले ऋषि-मुनी जब विदा हो गए तब राजा और पुरोहितों में सांठगाठ से राज्य का शासन चलने लगा। धीरे-धीरे अनुयायियों की फौज ने धर्म को बदल दिया। बौद्ध काल में जब यह व्यवस्था विकृ हो चली तो इस नए सिरे से स्थापित करने के लिए कई संतों और समाज सुधारकों ने प्रयास किया और समाज की नए सिरे से रचना की। हर्षवर्धन के जाने के बाद जब भारत का पतन होना शुरू हुआ और विदेशी आक्रांताओं ने भारत में घुसकर कई भूभाग कर कब्जा कर लिया तब यह पुण्य भूमि एक युद्ध और अराजक स्थिति में बदल गई। दहशत और डर के कारण लोग खुद को बदलते रहे। लंबे समय तक अराजक स्थिति बनी रही। मुगल काल में हिन्दू ग्रंथों पुराणों आदि के साथ छेड़खानी की गई। अयोध्या, मथुरा, काशी और वाराणसी के पुरोहितों आदि को मुगलों के अनुसार धर्म को संचालित करना होता था, क्योंकि हिन्दुओं के धर्म के यही असली गढ़ थे। बाद में अंग्रेजों ने भारत के इतिहास का सत्यानाश कर दिया। फिर अंग्रेज जिन लोगों के हाथों में सत्ता दे गए थे वे सभी मूर्ख वामपंथी और अंग्रेजोँ के पिट्ठू थे, जिन्होंने ३० से ४० वर्ष में भारत को बर्बाद ही कर दिया।

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ब्राह्मण


अब बताइये पण्डितजी – ज्योतिषी जी कहाँ ग़लत हैं |* सन् 2005 – यजमान- पंडितजी, बेटे ने 10 पास कर ली हैं बताए कौन सा क्षेत्र इसके लिए अच्छा रहेगा पंडित जी- इसकी पत्रिका मे सी ए बनने के योग हैं इसे सी ए बनाए | पंडित जी की दक्षिणा 200/ परंतु दक्षिणा केवल 51/रु दी गयी ! सन् 2010 – यजमान – पंडित जी , आपकी कृपा से बेटा सी ए बन गया हैं आपने बताया भी था । अब ज़रा नौकरी के विषय मे भी बता देते ! पंडितजी – इसे आगामी माह मे नौकरी मिल जानी चाहिए बस ये एक छोटा सा उपाय करवा दीजिएगा | पंडितजी की दक्षिणा -500/परंतु दक्षिणा 101 रु दी गयी ??? अगले माह 30,000 रु प्रति माह की नौकरी भी प्राप्त हो गयी सन् 2013 – यजमान- पंडितजी बेटा विवाह नहीं कर रहा हैं ? पंडितजी – इसकी पत्रिका मे प्रेमविवाह की संभावना हैं संभवत: इसी कारण विवाह करने मे आना कानी कर रहा हो , प्यार से बैठा कर पूछिये कोई लड़की पसंद होगी जिस कारण ऐसा हो रहा हैं | यजमान- पंडित जी लड़की पसंद बताता तो हैं क्या करे?? पंडित जी- उसी कन्या से उसका विवाह कर दीजिये सही रहेगा,हो सके तो उस कन्या की पत्रिका दिखा दीजिएगा पंडितजी की दक्षिणा 1001/ परंतु दक्षिणा 200 रु दी गयी | सन् 2015 – यजमान- पंडितजी आपकी दया से बेटा 70,000 रु प्रति माह कमा रहा हैं , शादी भी हो गयी हैं | एक बेटी भी हैं , बेटा कब होगा यह बताए ??? पंडितजी- इसकी पत्रिका मे गुरु ग्रह का श्राप हैं जिस कारण बेटे का होना मुश्किल जान पड़ता हैं | यजमान- हैं ऐसा कैसे पंडितजी हमने या हमारे किसी भी बुजुर्ग ने कभी भी किसी ब्राह्मण,विद्वान तथा गुरु का अपमान नहीं किया हैं गुरु ग्रह का श्राप कैसे लग सकता हैं “ पंडितजी – इसके पूर्वजो ने अपने पंडित को कभी भी पंडित के कार्य का दक्षिणा नहीं दिया जिस कारण ऐसा हैं नहि-नहीं पंडितजी,, आपसे देखने मे ग़लती हो रही हैं | पंडितजी –सही कह रहे हैं आप…. हमसे देखने मे ही ग़लती हो रही होगी यह बेटा जब 10वी मे था और अब 70,000 रुपये प्रति माह कमा रहा हैं शादी,बच्चा भी हो गया परंतु पंडित जी को अबतक आपने 352 रुपये ही दिये हैं शायद आपके पिता ने भी आपके लिए ऐसा ही किया होगा जिस कारण ऐसा हो रहा हैं | ये कटु सत्य है पिछले 20 साल में महंगाई कहाँ से कहाँ पहुँच गयी लेकिन नही बढ़ा तो पण्डित की दक्षिणा ……..? लोग आज भी बड़े बड़े पूजा अनुष्ठान के संकल्प और आरती में चढ़ाने के लिये एक रूपये का सिक्का ही ढूंढ कर लाते है। नोट- कुछ दिन ऐसा दिन आने वाला है की ब्राह्मण इस पूजा पाठ के कार्य को छोड़ देगा लोग की ऐसी मानसिकता रही तो कुछ दिन में कोई ब्राह्मण दान भी नही लेगा, और ये मानसिकता समाज छोड़ दे की ब्राह्नण कभी गरीब था भागवतपुराण में साफ लिखा है की पृथ्वी का एक मात्र देवता ब्राह्मण है , आज लोग इसलिये इतना कष्ट भोग रहे है की लोग ब्राह्मण को घटिया से घटिया सामग्री ,अनुपयोगी वस्त्रh दान और उचित दक्षिणा नहीं दे रहे है ,कुछ ही वर्षो में ब्राह्मण का दर्शन दुर्लभ हो जायेगा ऐसा बहुत जल्द होने वाला है और जो पूजा करवाऐंगे वो किसी भी तरह के लोग होंगे होंगे. । शादी में लोग 10-12 लाख रुपये सिर्फ शानौशौकत के लिए उड़ा देंगे। ढोली बैंडबाजे वाले को छः महिने पहले बुक करके21-31000 हजार रुपए एक डेढ घंटे के लिये दे देंगे । डीजे व शराब में बर्बाद करके अपनी ही बहन बेटियों को नचायेंगेऔर ये सारा मांगलिक मुहूर्त कार्यक्रम तय करने वाले ब्राह्मण पंडित को जो इसका रचनाकार और धूरी है उस विप्र श्रेष्ठ को 1100रुपए में ही निपटाने का भरसक प्रयास करेंगे। * तब कौन ब्राह्मण का पुत्र यह संस्कार अपनायेगा??? *ब्राह्मण को सम्मान देवे * -डॉक्टर वैद्य पंडित विनय कुमार उपाध्याय 🙏🙏

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शाकटायन रचित उणादि प्रकरण के


 

शाकटायन रचित उणादि प्रकरण के अनुसार शुच् दीप्तौ धातु में रक् प्रत्यय करने से चकार का दकार होकर रेफ् का आगम होता है तथा ह्रस्व का दीर्घ हो जाता है इस प्रकार शूद्र की उत्पत्ति होती है जिसका अर्थ होता है निर्माण करने वाला,आविष्कार करने वाला,यह कार्य विद्वान् हीं कर सकते हैं अतः मनुष्य जाति का विद्वान् मनुष्य हीं शूद्र वर्ण का कार्य कर सकते हैं।महर्षि दयानंद सरस्वती के नहीं रहने पर सत्यार्थ प्रकाश का प्रकाशन हुआ था और उसी समय पौराणिकों द्वारा षड्यंत्र पूर्वक मिलावट करके शूद्र शब्द को क्षुद्र के अर्थ में लेकर महर्षि दयानंद सरस्वती का मोहर लगा दिया गया था ।

नीरज आर्य अँधेड़ी

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अंबेडकर – दूध का दूध पानी का पानी  !
6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक गवेषक पंडित शिवपूजन सिंह जी का चर्चित ‘भ्रांति निवारण’  सोलह पृष्ठीय लेख  ‘सार्वदेशिक ‘ मासिक के जुलाई-अगस्त 1951अंक में उनके देहावसान के पांच वर्ष तीन माह  पूर्व प्रकाशित हुआ । डा. अंबेडकर जी इस मासिक से भलीभांति परिचित थे और तभी यह चर्चित अंक भी उनकी सेवा में.भिजवा दिया गया था । लेख  डा. अंबेडकर के वेदादि विषयक विचारों की समीक्षा में 54 प्रामाणिक  उद्धरणों के साथ लिखा गया था। इसकी प्रति विदर्भ के वाशिम जनपद के आर्य समाज कारंजा के प्राचीन ग्रंथालय में सुरक्षित है।
आशा थी कि अंबेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली विद्वान या तो इसका उत्तर देते या फिर अपनी पुस्तकें बताये गये अकाट्य तथ्यों की रोशनी में संपादित करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ऐसा इसलिये कि जो जातिगत भेदभाव और अपमान उन्होंने लगातार सहा उसकी वेदना और विद्रोह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
डा. अंबेडकर जी की दोनों पुस्तकें – अछूत कौन और कैसे तथा शूद्रों की खोज – पर लेख शंका समाधान शैली में लिखा गया था पर डा. कुशलदेव शास्त्री जी ने इसे सुविधा और सरलता हेतु संवाद शैली में रुपांतरित किया है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस लेख को स्वामी जी द्वारा लिखित ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के आलोक में पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय सहर्ष लिया जा सकता है ।
1 – ‘ अछूत कौन और कैसे ‘
डा. अंबेडकर- आर्य लोग निर्विवाद रूप से दो हिस्सों और दो संस्कृतियों में विभक्त थे,जिनमें से एक ऋग्वेदीय आर्य और दूसरे यजुर्वेदीय आर्य , जिनके बीच बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी।ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे,अथर्ववेदीय जादू-टोना में।
पंडित शिवपूजन सिंह- दो प्रकार के आर्यों की कल्पना केवल आपके और आप जैसे कुछ मस्तिकों की उपज है।यह केवल कपोल कल्पना या कल्पना विलास है।इसके पीछे कोई ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।कोई ऐतिहासिक विद्वान भी इसका समर्थन नहीं करता।अथर्ववेद में किसी प्रकार का जादू टोना नहीं है।
डा. अंबेडकर- ऋग्वेद में आर्यदेवता इंद्र का सामना उसके शत्रु अहि-वृत्र (सांप देवता) से होता है,जो कालांतर में नाग देवता के नाम से प्रसिध्द हुआ।
पं. शिवपूजन सिंह- वैदिक और लौकिक संस्कृत में आकाश पाताल का अंतर है।यहाँ इंद्र का अर्थ सूर्य और वृत्र का अर्थ मेघ है।यह संघर्ष आर्य देवता और और नाग देवता का न होकर सूर्य और मेघ के बीच में होने वाला संघर्ष है।वैदिक शब्दों के विषय में.निरुक्त का ही मत मान्य होता है।वैदिक निरूक्त प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने के कारण ही आपको भ्रम हुआ है।
डा. अंबेडकर- महामहोपाध्याय डा. काणे का मत है कि गाय की पवित्रता के कारण ही वाजसनेही संहिता में गोमांस भक्षण की व्यवस्था की गयी है।
पं. शिवपूजन सिंह- श्री काणे जी ने वाजसनेही संहिता का कोई प्रमाण और संदर्भ नहीं दिया है और न ही आपने यजुर्वेद पढ़ने का कष्ट उठाया है।आप जब यजुर्वेद का स्वाध्याय करेंगे तब आपको स्पष्ट गोवध निषेध के प्रमाण मिलेंगे।
डा. अंबेडकर- ऋग्वेद से ही यह स्पष्ट है कि तत्कालीन आर्य गोहत्या करते थे और गोमांस खाते थे।
पं. शिवपूजन सिंह- कुछ प्राच्य और पाश्चात्य विद्वान आर्यों पर गोमांस भक्षण का दोषारोपण करते हैं , किंतु बहुत से प्राच्य विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है।वेद में गोमांस भक्षण  विरोध करने वाले 22 विद्वानों के मेरे पास स-संदर्भ प्रमाण हैं।ऋग्वेद से गोहत्या और गोमास भक्षण का आप जो विधान कह रहे हैं , वह वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के अंतर से अनभिज्ञ होने के कारण कह रहे हैं । जैसे वेद में’उक्ष’ बलवर्धक औषधि का नाम है  जबकि लौकिक संस्कृत में भले ही उसका अर्थ ‘बैल’ क्यों न हो ।
डा. अंबेडकर- बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता । मधुपर्क में मांस और विशेष रूप से गोमांस का एक आवश्यक अंश होता है ।
पं. शिवपूजन सिंह- आपका यह विधान वेदों पर नहीं अपितु गृह्यसूत्रों पर आधारित है । गृहसूत्रों के वचन वेद विरूध्द होने से माननीय नहीं हैं । वेद को स्वत: प्रमाण मानने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार,” दही में घी या शहद मिलाना मधुपर्क कहलाता है । उसका परिमाण 12 तोले दही में चार तोले शहद या चार तोले घी का मिलाना है ।”
डा. अंबेडकर- अतिथि के लिये गोहत्या की बात इतनी सामान्य हो गयी थी कि अतिथि का नाम ही ‘गोघ्न’ , अर्थात् गौ की हत्या करना पड़ गया था ।
प. शिवपूजन सिंह- ‘गोघ्न’ का अर्थ गौ की हत्या करने वाला नहीं है । यह शब्द ‘गौ’ और ‘हन’ के योग से बना है। गौ के अनेक अर्थ हैं , यथा – वाणी , जल , सुखविशेष , नेत्र आदि। धातुपाठ में महर्षि पाणिनि ‘हन’ का अर्थ ‘गति’ और ‘हिंसा’ बतलाते हैं।गति के अर्थ हैं – ज्ञान , गमन , और प्राप्ति । प्राय: सभी सभ्य देशों में जब किसी के घर अतिथि आता है तो उसके स्वागत करने के लिये गृहपति घर से बाहर आते हुये कुछ गति करता है , चलता है,उससे मधुर वाणी में बोलता है , फिर जल से उसका सत्कार करता है और यथासंभव उसके सुख के लिये अन्यान्य सामग्रियों को प्रस्तुत करता है और यह जानने के लिये कि प्रिय अतिथि इन सत्कारों से प्रसन्न होता है नहीं , गृहपति की आंखें भी उस ओर टकटकी लगाये रहती हैं । ‘गोघ्न’ का अर्थ हुआ – ‘ गौ: प्राप्यते दीयते यस्मै: स गोघ्न: ‘ = जिसके लिये गौदान की जाती है , वह अतिथि ‘गोघ्न’ कहलाता है ।
डा. अंबेडकर- हिंदू ब्राह्मण हो या अब्राह्मण , न केवल मांसाहारी थे , किंतु गोमांसहारी भी थे ।
प. शिवपूजन सिंह- आपका कथन भ्रमपूर्ण है, वेद में गोमांस भक्षण की बात तो जाने दीजिये मांस भक्षण का भी विधान नहीं है ।
डा. अंबेडकर- मनु ने गोहत्या के विरोध में कोई कानून नहीं बनाया । उसने तो विशेष अवसरों पर ‘गो-मांसाहार’ अनिवार्य ठहराया है ।
पं. शिवपूजन सिंह- मनुस्मृति में कहीं भी मांसभक्षण का वर्णन नहीं है । जो है वो प्रक्षिप्त है । आपने भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि मनु जी ने कहां पर गोमांस अनिवार्य ठहराया है। मनु ( 5/51 ) के अनुसार हत्या की अनुमति देनेवाला , अंगों को काटने वाला , मारनेवाला , क्रय और विक्रय करने वाला , पकाने वाला , परोसने वाला और खानेवाला इन सबको घातक कहा गया है ।

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2- ‘ शूद्रों की खोज ‘
डा. अंबेडकर- पुरूष सूक्त ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिये प्रक्षिप्त किया है।कोल बुक का कथन है कि पुरूष सूक्त छंद और शैली में शेष ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न है।अन्य भी अनेक विद्वानों का मत है कि पुरूष सूक्त बाद का बना हुआ है।
पं. शिवपूजन सिंह- आपने जो पुरूष सूक्त पर आक्षेप किया है वह आपकी वेद अनभिज्ञता को प्रकट करता है।आधिभौतिक दृष्टि से चारों वर्णों के पुरूषों का समुदाय – ‘संगठित समुदाय’- ‘एक पुरूष’ रूप है।इस समुदाय पुरूष या राष्ट्र पुरूष के यथार्थ परिचय के लिये पुरुष सूक्त के मुख्य मंत्र ‘ ब्राह्मणोSस्य मुखमासीत्…’ (यजुर्वेद 31/11) पर विचार करना चाहिये।
उक्त मंत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण मुख है , क्षत्रिय भुजाएँ , वैश्य जङ्घाएँ और शूद्र पैर। केवल मुख , केवल भुजाएँ , केवल जङ्घाएँ या केवल पैर पुरुष नहीं अपितु मुख , भुजाएँ , जङ्घाएँ और पैर ‘इनका समुदाय’ पुरुष अवश्य है।वह समुदाय भी यदि असंगठित और क्रम रहित अवस्था में है तो उसे हम पुरूष नहीं कहेंगे।उस समुदाय को पुरूष तभी कहेंगे जबकि वह समुदाय एक विशेष प्रकार के क्रम में हो और एक विशेष प्रकार से संगठित हो।
राष्ट्र में मुख के स्थानापन्न ब्राह्मण हैं , भुजाओं के स्थानापन्न क्षत्रिय हैं , जङ्घाओं के स्थानापन्न वैश्य और पैरों के स्थानापन्न शूद्र हैं । राष्ट्र में चारों वर्ण जब शरीर के मुख आदि अवयवों की तरह सुव्यवस्थित हो जाते हैं तभी इनकी पुरूष संज्ञा होती है । अव्यवस्थित या छिन्न-भिन्न अवस्था में स्थित मनुष्य समुदाय को वैदिक परिभाषा में पुरुष शब्द से नहीं पुकार सकते ।

आधिभौतिक दृष्टि से यह सुव्यवस्थित तथा एकता के सूत्र में पिरोया हुआ ज्ञान , क्षात्र , व्यापार- व्यवसाय , परिश्रम-मजदूरी इनका निदर्शक जनसमुदाय ही ‘एक पुरुष’ रूप है।

चर्चित मंत्र का महर्षि दयानंद जी इसप्रकार अर्थ करते हैं-
“इस पुरूष की आज्ञा के अनुसार विद्या आदि उत्तम गुण , सत्य भाषण और सत्योपदेश आदि श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है । इन मुख्य गुण और कर्मों के सहित होने से वह मनुष्यों में उत्तम कहलाता है और ईश्वर ने बल पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है।इस पुरुष के उपदेश से खेती , व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना और पशुपालन आदि मध्यम गुणों से वैश्य वर्ण सिध्द होता है।जैसे पग सबसे नीचे का अंग है वैसे मूर्खता आदि गुणों से शूद्र वर्ण सिध्द होता है।”
आपका लिखना कि पुरुष सूक्त बहुत समय बाद जोड़ दिया गया सर्वथा भ्रमपूर्ण है।मैंने अपनी पुस्तक ” ऋग्वेद दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात ” में संपूर्ण पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों के इस मत का खंडन किया है कि ऋग्वेद का दशम मण्डल , जिसमें पुरूष सूक्त भी विद्यमान है , बाद का बना हूआ है ।
डा. अंबेडकर- शूद्र क्षत्रियों के वंशज होने से क्षत्रिय हैं।ऋग्वेद में सुदास , तुरवाशा , तृप्सु,भरत आदि शूद्रों के नाम आये हैं।
पं. शिवपूजन सिंह- वेदों के सभी शब्द यौगिक हैं , रूढ़ि नहीं । आपने ऋग्वेद से जिन नामों को प्रदर्शित किया है वो ऐतिहासिक नाम नहीं हैं । वेद में इतिहास नहीं है क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में दिया गया ज्ञान है ।
डा. अंबेडकर- छत्रपति शिवाजी शूद्र और राजपूत हूणों की संतान हैं (शूद्रों की खोज , दसवां अध्याय , पृष्ठ , 77-96)
पं. शिवपूजन सिंह- शिवाजी शूद्र नहीं क्षत्रिय थे।इसके लिये अनेक प्रमाण इतिहासों.में भरे पड़े हैं । राजस्थान के प्रख्यात इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डी.लिट् , लिखते हैं- ‘ मराठा जाति दक्षिणी हिंदुस्तान की रहने वाली है । उसके प्रसिद्ध राजा छत्रपति शिवाजी के वंश का मूल पुरुष मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ही था।’  कविराज श्यामल दास जी लिखते है – ‘ शिवाजी महाराणा अजय सिंह के वंश में थे। ‘  यही सिध्दांत डा. बालकृष्ण जी , एम. ए. , डी.लिट् , एफ.आर.एस.एस. , का भी था।

इसीप्रकार राजपूत हूणों की संतान नहीं किंतु शुध्द क्षत्रिय हैं । श्री चिंतामणि विनामक वैद्य , एम.ए. , श्री ई. बी. कावेल , श्री शेरिंग , श्री व्हीलर , श्री हंटर , श्री क्रूक , पं. नगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , एम.एम.डी.एल. आदि विद्वान राजपूतों को शूद्र क्षत्रिय मानते हैं।प्रिवी कौंसिल ने भी निर्णय किया है कि जो क्षत्रिय भारत में रहते हैं और राजपूत दोनों एक ही श्रेणी के हैं ।

– ‘ आर्य समाज और डा. अंबेडकर,

डा. कुशलदेव शास्त्री

(डॉ. अरुण लवानिया)