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ब्राह्मण


अब बताइये पण्डितजी – ज्योतिषी जी कहाँ ग़लत हैं |* सन् 2005 – यजमान- पंडितजी, बेटे ने 10 पास कर ली हैं बताए कौन सा क्षेत्र इसके लिए अच्छा रहेगा पंडित जी- इसकी पत्रिका मे सी ए बनने के योग हैं इसे सी ए बनाए | पंडित जी की दक्षिणा 200/ परंतु दक्षिणा केवल 51/रु दी गयी ! सन् 2010 – यजमान – पंडित जी , आपकी कृपा से बेटा सी ए बन गया हैं आपने बताया भी था । अब ज़रा नौकरी के विषय मे भी बता देते ! पंडितजी – इसे आगामी माह मे नौकरी मिल जानी चाहिए बस ये एक छोटा सा उपाय करवा दीजिएगा | पंडितजी की दक्षिणा -500/परंतु दक्षिणा 101 रु दी गयी ??? अगले माह 30,000 रु प्रति माह की नौकरी भी प्राप्त हो गयी सन् 2013 – यजमान- पंडितजी बेटा विवाह नहीं कर रहा हैं ? पंडितजी – इसकी पत्रिका मे प्रेमविवाह की संभावना हैं संभवत: इसी कारण विवाह करने मे आना कानी कर रहा हो , प्यार से बैठा कर पूछिये कोई लड़की पसंद होगी जिस कारण ऐसा हो रहा हैं | यजमान- पंडित जी लड़की पसंद बताता तो हैं क्या करे?? पंडित जी- उसी कन्या से उसका विवाह कर दीजिये सही रहेगा,हो सके तो उस कन्या की पत्रिका दिखा दीजिएगा पंडितजी की दक्षिणा 1001/ परंतु दक्षिणा 200 रु दी गयी | सन् 2015 – यजमान- पंडितजी आपकी दया से बेटा 70,000 रु प्रति माह कमा रहा हैं , शादी भी हो गयी हैं | एक बेटी भी हैं , बेटा कब होगा यह बताए ??? पंडितजी- इसकी पत्रिका मे गुरु ग्रह का श्राप हैं जिस कारण बेटे का होना मुश्किल जान पड़ता हैं | यजमान- हैं ऐसा कैसे पंडितजी हमने या हमारे किसी भी बुजुर्ग ने कभी भी किसी ब्राह्मण,विद्वान तथा गुरु का अपमान नहीं किया हैं गुरु ग्रह का श्राप कैसे लग सकता हैं “ पंडितजी – इसके पूर्वजो ने अपने पंडित को कभी भी पंडित के कार्य का दक्षिणा नहीं दिया जिस कारण ऐसा हैं नहि-नहीं पंडितजी,, आपसे देखने मे ग़लती हो रही हैं | पंडितजी –सही कह रहे हैं आप…. हमसे देखने मे ही ग़लती हो रही होगी यह बेटा जब 10वी मे था और अब 70,000 रुपये प्रति माह कमा रहा हैं शादी,बच्चा भी हो गया परंतु पंडित जी को अबतक आपने 352 रुपये ही दिये हैं शायद आपके पिता ने भी आपके लिए ऐसा ही किया होगा जिस कारण ऐसा हो रहा हैं | ये कटु सत्य है पिछले 20 साल में महंगाई कहाँ से कहाँ पहुँच गयी लेकिन नही बढ़ा तो पण्डित की दक्षिणा ……..? लोग आज भी बड़े बड़े पूजा अनुष्ठान के संकल्प और आरती में चढ़ाने के लिये एक रूपये का सिक्का ही ढूंढ कर लाते है। नोट- कुछ दिन ऐसा दिन आने वाला है की ब्राह्मण इस पूजा पाठ के कार्य को छोड़ देगा लोग की ऐसी मानसिकता रही तो कुछ दिन में कोई ब्राह्मण दान भी नही लेगा, और ये मानसिकता समाज छोड़ दे की ब्राह्नण कभी गरीब था भागवतपुराण में साफ लिखा है की पृथ्वी का एक मात्र देवता ब्राह्मण है , आज लोग इसलिये इतना कष्ट भोग रहे है की लोग ब्राह्मण को घटिया से घटिया सामग्री ,अनुपयोगी वस्त्रh दान और उचित दक्षिणा नहीं दे रहे है ,कुछ ही वर्षो में ब्राह्मण का दर्शन दुर्लभ हो जायेगा ऐसा बहुत जल्द होने वाला है और जो पूजा करवाऐंगे वो किसी भी तरह के लोग होंगे होंगे. । शादी में लोग 10-12 लाख रुपये सिर्फ शानौशौकत के लिए उड़ा देंगे। ढोली बैंडबाजे वाले को छः महिने पहले बुक करके21-31000 हजार रुपए एक डेढ घंटे के लिये दे देंगे । डीजे व शराब में बर्बाद करके अपनी ही बहन बेटियों को नचायेंगेऔर ये सारा मांगलिक मुहूर्त कार्यक्रम तय करने वाले ब्राह्मण पंडित को जो इसका रचनाकार और धूरी है उस विप्र श्रेष्ठ को 1100रुपए में ही निपटाने का भरसक प्रयास करेंगे। * तब कौन ब्राह्मण का पुत्र यह संस्कार अपनायेगा??? *ब्राह्मण को सम्मान देवे * -डॉक्टर वैद्य पंडित विनय कुमार उपाध्याय 🙏🙏

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शाकटायन रचित उणादि प्रकरण के


 

शाकटायन रचित उणादि प्रकरण के अनुसार शुच् दीप्तौ धातु में रक् प्रत्यय करने से चकार का दकार होकर रेफ् का आगम होता है तथा ह्रस्व का दीर्घ हो जाता है इस प्रकार शूद्र की उत्पत्ति होती है जिसका अर्थ होता है निर्माण करने वाला,आविष्कार करने वाला,यह कार्य विद्वान् हीं कर सकते हैं अतः मनुष्य जाति का विद्वान् मनुष्य हीं शूद्र वर्ण का कार्य कर सकते हैं।महर्षि दयानंद सरस्वती के नहीं रहने पर सत्यार्थ प्रकाश का प्रकाशन हुआ था और उसी समय पौराणिकों द्वारा षड्यंत्र पूर्वक मिलावट करके शूद्र शब्द को क्षुद्र के अर्थ में लेकर महर्षि दयानंद सरस्वती का मोहर लगा दिया गया था ।

नीरज आर्य अँधेड़ी

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अंबेडकर – दूध का दूध पानी का पानी  !
6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक गवेषक पंडित शिवपूजन सिंह जी का चर्चित ‘भ्रांति निवारण’  सोलह पृष्ठीय लेख  ‘सार्वदेशिक ‘ मासिक के जुलाई-अगस्त 1951अंक में उनके देहावसान के पांच वर्ष तीन माह  पूर्व प्रकाशित हुआ । डा. अंबेडकर जी इस मासिक से भलीभांति परिचित थे और तभी यह चर्चित अंक भी उनकी सेवा में.भिजवा दिया गया था । लेख  डा. अंबेडकर के वेदादि विषयक विचारों की समीक्षा में 54 प्रामाणिक  उद्धरणों के साथ लिखा गया था। इसकी प्रति विदर्भ के वाशिम जनपद के आर्य समाज कारंजा के प्राचीन ग्रंथालय में सुरक्षित है।
आशा थी कि अंबेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली विद्वान या तो इसका उत्तर देते या फिर अपनी पुस्तकें बताये गये अकाट्य तथ्यों की रोशनी में संपादित करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ऐसा इसलिये कि जो जातिगत भेदभाव और अपमान उन्होंने लगातार सहा उसकी वेदना और विद्रोह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
डा. अंबेडकर जी की दोनों पुस्तकें – अछूत कौन और कैसे तथा शूद्रों की खोज – पर लेख शंका समाधान शैली में लिखा गया था पर डा. कुशलदेव शास्त्री जी ने इसे सुविधा और सरलता हेतु संवाद शैली में रुपांतरित किया है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस लेख को स्वामी जी द्वारा लिखित ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के आलोक में पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय सहर्ष लिया जा सकता है ।
1 – ‘ अछूत कौन और कैसे ‘
डा. अंबेडकर- आर्य लोग निर्विवाद रूप से दो हिस्सों और दो संस्कृतियों में विभक्त थे,जिनमें से एक ऋग्वेदीय आर्य और दूसरे यजुर्वेदीय आर्य , जिनके बीच बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी।ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे,अथर्ववेदीय जादू-टोना में।
पंडित शिवपूजन सिंह- दो प्रकार के आर्यों की कल्पना केवल आपके और आप जैसे कुछ मस्तिकों की उपज है।यह केवल कपोल कल्पना या कल्पना विलास है।इसके पीछे कोई ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।कोई ऐतिहासिक विद्वान भी इसका समर्थन नहीं करता।अथर्ववेद में किसी प्रकार का जादू टोना नहीं है।
डा. अंबेडकर- ऋग्वेद में आर्यदेवता इंद्र का सामना उसके शत्रु अहि-वृत्र (सांप देवता) से होता है,जो कालांतर में नाग देवता के नाम से प्रसिध्द हुआ।
पं. शिवपूजन सिंह- वैदिक और लौकिक संस्कृत में आकाश पाताल का अंतर है।यहाँ इंद्र का अर्थ सूर्य और वृत्र का अर्थ मेघ है।यह संघर्ष आर्य देवता और और नाग देवता का न होकर सूर्य और मेघ के बीच में होने वाला संघर्ष है।वैदिक शब्दों के विषय में.निरुक्त का ही मत मान्य होता है।वैदिक निरूक्त प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने के कारण ही आपको भ्रम हुआ है।
डा. अंबेडकर- महामहोपाध्याय डा. काणे का मत है कि गाय की पवित्रता के कारण ही वाजसनेही संहिता में गोमांस भक्षण की व्यवस्था की गयी है।
पं. शिवपूजन सिंह- श्री काणे जी ने वाजसनेही संहिता का कोई प्रमाण और संदर्भ नहीं दिया है और न ही आपने यजुर्वेद पढ़ने का कष्ट उठाया है।आप जब यजुर्वेद का स्वाध्याय करेंगे तब आपको स्पष्ट गोवध निषेध के प्रमाण मिलेंगे।
डा. अंबेडकर- ऋग्वेद से ही यह स्पष्ट है कि तत्कालीन आर्य गोहत्या करते थे और गोमांस खाते थे।
पं. शिवपूजन सिंह- कुछ प्राच्य और पाश्चात्य विद्वान आर्यों पर गोमांस भक्षण का दोषारोपण करते हैं , किंतु बहुत से प्राच्य विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है।वेद में गोमांस भक्षण  विरोध करने वाले 22 विद्वानों के मेरे पास स-संदर्भ प्रमाण हैं।ऋग्वेद से गोहत्या और गोमास भक्षण का आप जो विधान कह रहे हैं , वह वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के अंतर से अनभिज्ञ होने के कारण कह रहे हैं । जैसे वेद में’उक्ष’ बलवर्धक औषधि का नाम है  जबकि लौकिक संस्कृत में भले ही उसका अर्थ ‘बैल’ क्यों न हो ।
डा. अंबेडकर- बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता । मधुपर्क में मांस और विशेष रूप से गोमांस का एक आवश्यक अंश होता है ।
पं. शिवपूजन सिंह- आपका यह विधान वेदों पर नहीं अपितु गृह्यसूत्रों पर आधारित है । गृहसूत्रों के वचन वेद विरूध्द होने से माननीय नहीं हैं । वेद को स्वत: प्रमाण मानने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार,” दही में घी या शहद मिलाना मधुपर्क कहलाता है । उसका परिमाण 12 तोले दही में चार तोले शहद या चार तोले घी का मिलाना है ।”
डा. अंबेडकर- अतिथि के लिये गोहत्या की बात इतनी सामान्य हो गयी थी कि अतिथि का नाम ही ‘गोघ्न’ , अर्थात् गौ की हत्या करना पड़ गया था ।
प. शिवपूजन सिंह- ‘गोघ्न’ का अर्थ गौ की हत्या करने वाला नहीं है । यह शब्द ‘गौ’ और ‘हन’ के योग से बना है। गौ के अनेक अर्थ हैं , यथा – वाणी , जल , सुखविशेष , नेत्र आदि। धातुपाठ में महर्षि पाणिनि ‘हन’ का अर्थ ‘गति’ और ‘हिंसा’ बतलाते हैं।गति के अर्थ हैं – ज्ञान , गमन , और प्राप्ति । प्राय: सभी सभ्य देशों में जब किसी के घर अतिथि आता है तो उसके स्वागत करने के लिये गृहपति घर से बाहर आते हुये कुछ गति करता है , चलता है,उससे मधुर वाणी में बोलता है , फिर जल से उसका सत्कार करता है और यथासंभव उसके सुख के लिये अन्यान्य सामग्रियों को प्रस्तुत करता है और यह जानने के लिये कि प्रिय अतिथि इन सत्कारों से प्रसन्न होता है नहीं , गृहपति की आंखें भी उस ओर टकटकी लगाये रहती हैं । ‘गोघ्न’ का अर्थ हुआ – ‘ गौ: प्राप्यते दीयते यस्मै: स गोघ्न: ‘ = जिसके लिये गौदान की जाती है , वह अतिथि ‘गोघ्न’ कहलाता है ।
डा. अंबेडकर- हिंदू ब्राह्मण हो या अब्राह्मण , न केवल मांसाहारी थे , किंतु गोमांसहारी भी थे ।
प. शिवपूजन सिंह- आपका कथन भ्रमपूर्ण है, वेद में गोमांस भक्षण की बात तो जाने दीजिये मांस भक्षण का भी विधान नहीं है ।
डा. अंबेडकर- मनु ने गोहत्या के विरोध में कोई कानून नहीं बनाया । उसने तो विशेष अवसरों पर ‘गो-मांसाहार’ अनिवार्य ठहराया है ।
पं. शिवपूजन सिंह- मनुस्मृति में कहीं भी मांसभक्षण का वर्णन नहीं है । जो है वो प्रक्षिप्त है । आपने भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि मनु जी ने कहां पर गोमांस अनिवार्य ठहराया है। मनु ( 5/51 ) के अनुसार हत्या की अनुमति देनेवाला , अंगों को काटने वाला , मारनेवाला , क्रय और विक्रय करने वाला , पकाने वाला , परोसने वाला और खानेवाला इन सबको घातक कहा गया है ।

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2- ‘ शूद्रों की खोज ‘
डा. अंबेडकर- पुरूष सूक्त ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिये प्रक्षिप्त किया है।कोल बुक का कथन है कि पुरूष सूक्त छंद और शैली में शेष ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न है।अन्य भी अनेक विद्वानों का मत है कि पुरूष सूक्त बाद का बना हुआ है।
पं. शिवपूजन सिंह- आपने जो पुरूष सूक्त पर आक्षेप किया है वह आपकी वेद अनभिज्ञता को प्रकट करता है।आधिभौतिक दृष्टि से चारों वर्णों के पुरूषों का समुदाय – ‘संगठित समुदाय’- ‘एक पुरूष’ रूप है।इस समुदाय पुरूष या राष्ट्र पुरूष के यथार्थ परिचय के लिये पुरुष सूक्त के मुख्य मंत्र ‘ ब्राह्मणोSस्य मुखमासीत्…’ (यजुर्वेद 31/11) पर विचार करना चाहिये।
उक्त मंत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण मुख है , क्षत्रिय भुजाएँ , वैश्य जङ्घाएँ और शूद्र पैर। केवल मुख , केवल भुजाएँ , केवल जङ्घाएँ या केवल पैर पुरुष नहीं अपितु मुख , भुजाएँ , जङ्घाएँ और पैर ‘इनका समुदाय’ पुरुष अवश्य है।वह समुदाय भी यदि असंगठित और क्रम रहित अवस्था में है तो उसे हम पुरूष नहीं कहेंगे।उस समुदाय को पुरूष तभी कहेंगे जबकि वह समुदाय एक विशेष प्रकार के क्रम में हो और एक विशेष प्रकार से संगठित हो।
राष्ट्र में मुख के स्थानापन्न ब्राह्मण हैं , भुजाओं के स्थानापन्न क्षत्रिय हैं , जङ्घाओं के स्थानापन्न वैश्य और पैरों के स्थानापन्न शूद्र हैं । राष्ट्र में चारों वर्ण जब शरीर के मुख आदि अवयवों की तरह सुव्यवस्थित हो जाते हैं तभी इनकी पुरूष संज्ञा होती है । अव्यवस्थित या छिन्न-भिन्न अवस्था में स्थित मनुष्य समुदाय को वैदिक परिभाषा में पुरुष शब्द से नहीं पुकार सकते ।

आधिभौतिक दृष्टि से यह सुव्यवस्थित तथा एकता के सूत्र में पिरोया हुआ ज्ञान , क्षात्र , व्यापार- व्यवसाय , परिश्रम-मजदूरी इनका निदर्शक जनसमुदाय ही ‘एक पुरुष’ रूप है।

चर्चित मंत्र का महर्षि दयानंद जी इसप्रकार अर्थ करते हैं-
“इस पुरूष की आज्ञा के अनुसार विद्या आदि उत्तम गुण , सत्य भाषण और सत्योपदेश आदि श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है । इन मुख्य गुण और कर्मों के सहित होने से वह मनुष्यों में उत्तम कहलाता है और ईश्वर ने बल पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है।इस पुरुष के उपदेश से खेती , व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना और पशुपालन आदि मध्यम गुणों से वैश्य वर्ण सिध्द होता है।जैसे पग सबसे नीचे का अंग है वैसे मूर्खता आदि गुणों से शूद्र वर्ण सिध्द होता है।”
आपका लिखना कि पुरुष सूक्त बहुत समय बाद जोड़ दिया गया सर्वथा भ्रमपूर्ण है।मैंने अपनी पुस्तक ” ऋग्वेद दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात ” में संपूर्ण पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों के इस मत का खंडन किया है कि ऋग्वेद का दशम मण्डल , जिसमें पुरूष सूक्त भी विद्यमान है , बाद का बना हूआ है ।
डा. अंबेडकर- शूद्र क्षत्रियों के वंशज होने से क्षत्रिय हैं।ऋग्वेद में सुदास , तुरवाशा , तृप्सु,भरत आदि शूद्रों के नाम आये हैं।
पं. शिवपूजन सिंह- वेदों के सभी शब्द यौगिक हैं , रूढ़ि नहीं । आपने ऋग्वेद से जिन नामों को प्रदर्शित किया है वो ऐतिहासिक नाम नहीं हैं । वेद में इतिहास नहीं है क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में दिया गया ज्ञान है ।
डा. अंबेडकर- छत्रपति शिवाजी शूद्र और राजपूत हूणों की संतान हैं (शूद्रों की खोज , दसवां अध्याय , पृष्ठ , 77-96)
पं. शिवपूजन सिंह- शिवाजी शूद्र नहीं क्षत्रिय थे।इसके लिये अनेक प्रमाण इतिहासों.में भरे पड़े हैं । राजस्थान के प्रख्यात इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डी.लिट् , लिखते हैं- ‘ मराठा जाति दक्षिणी हिंदुस्तान की रहने वाली है । उसके प्रसिद्ध राजा छत्रपति शिवाजी के वंश का मूल पुरुष मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ही था।’  कविराज श्यामल दास जी लिखते है – ‘ शिवाजी महाराणा अजय सिंह के वंश में थे। ‘  यही सिध्दांत डा. बालकृष्ण जी , एम. ए. , डी.लिट् , एफ.आर.एस.एस. , का भी था।

इसीप्रकार राजपूत हूणों की संतान नहीं किंतु शुध्द क्षत्रिय हैं । श्री चिंतामणि विनामक वैद्य , एम.ए. , श्री ई. बी. कावेल , श्री शेरिंग , श्री व्हीलर , श्री हंटर , श्री क्रूक , पं. नगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , एम.एम.डी.एल. आदि विद्वान राजपूतों को शूद्र क्षत्रिय मानते हैं।प्रिवी कौंसिल ने भी निर्णय किया है कि जो क्षत्रिय भारत में रहते हैं और राजपूत दोनों एक ही श्रेणी के हैं ।

– ‘ आर्य समाज और डा. अंबेडकर,

डा. कुशलदेव शास्त्री

(डॉ. अरुण लवानिया)

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ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र

सनातन हिंदू धर्म के चौथे स्तम्भ यानी शुद्र जाति के कुछ संगठन और लोग आजकल बाकी तीनो स्तम्भों पर आरोप लगाते है!

की शुद्र को दबाया गया कुचला गया कुछ हद तक सही है ये लेकिन ये कहाँ तक उचित है की अगर आप पर जुल्म हुवे तो उसे गा गा कर दुनिया को सुनाये और उसी जाति ने जब आपको अपने सर आखों पर बिठाया तो उसका नाम भी ना लें ???

क्षत्रिय कुल वधु मीरा के गुरु एक शुद्र जाति के थे नाम है संत रैदास!

भगवान् राम के पिता दशरथ के मंत्री सुमंत शुद्र थे!

महर्षि वाल्मीकि जिन्होंने कालजयी ग्रन्थ रामायण की रचना की वो शुद्र ही थे!

अयोध्या में 1990 में राममंदिर की शिला रखने वाले कामेश्वर शुद्र थे!

वाराणसी में शंकराचार्य ने डोम के घर खाना खाया था!

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में पूजा का अधिकार शबर यानी शुद्र को ही है!

महाभारत में जिस मत्रिमंडल का वर्णन है जिसमे 54 सदस्य है!

उनमे 4 ब्राह्मण 18 क्षत्रिय ,21 वैश्य और 3 शुद्र और 1 सूत के लिए आरक्षित था!

क्या आप इसे ब्राह्मणवादी प्रधान संस्कृति कहेंगे ??

हिन्दू धर्म जातियां हमेशा कर्म आधारित रही है जैसे।

लोहे का काम करने वाला लोहार।

सोने का काम करने वाला सोनार।

और चमड़े का काम करने वाला चमार।

क्षत्रिय यानी क्षत यानी चोट से रक्षा करने वाला क्षत्रिय माना जाता था!

मुर्दा छूने वाला डोम दाग देने वाला!

#रजस्वला स्त्री और घृणित कार्य करने वालों को #अछूत माना जाता था!

#आदिवासी शब्द 1931 में सबसे पहले अंग्रेजो के द्वारा उपयोग किया गया आदिवासियों का धर्म परिवर्तन तथा भारत की धार्मिक एकता को तोड़ने के लिए!

वैसे ही #गुंडा शब्द!

वैसे ही दलित शब्द 1970 में पहली बार प्रयोग किया गया!

राजनीतिक स्वार्थ के लिए कांशीराम ने बहुजन शब्द का इस्तेमाल 1984 में पहली बार किया!

जिस आदिवासी, दलित और बहुजन शब्द का इस्तेमाल शूद्रों से वोट लेने के लिए किया गया वो शब्द भारतीय संविधान में आपको कहीं नहीं मिलेगा!

”बाबा साहेब अम्बेडकर खुद शूद्रों को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहते थे और ये भी कहते थे की #शुद्र राजा शूद्रक की वंशज हैं और जो लोग वर्तमान जातिप्रथा के लिए मनु स्मृति को दोष देते हैं उन्हें पता होना चाहिए की मनु समृति सतयुग के लिए बनी थी!

कलयुग के लिए #परासर_स्मृति है!

वैसे ही जैसे द्वापर के लिए शंख स्मृति और त्रेता युग के लिए गौतम स्मृति का निर्माण किया गया था!

भारत में जाति प्रथा केवल नेताओं और राजनीतिक पार्टियों ने पैदा किया अंग्रेजों के लिखे देश विरोधी इतिहास का आधार लेकर और जिन #ब्राह्मणों को लोग आज गाली देते हैं उनकी जानकारी के लिए बता दूँ की #ब्राह्मण कोई जाति नहीं बल्कि गुण का नाम है!

ब्राह्मण राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है!

चाणक्य ने कुटिया को अपना निवास स्थान चुना।

सुदामा जैसे ब्राह्मण मधु को इक्कठा कर अपना जीवन यापन करते थे!

द्रोणाचार्य इतने गरीब थे कि अपने पुत्र को सतुवा घोल कर पिलाए पर कभी अपने जीवन में गोदान नहीं माँगा। जबकि उस समय दूध की नदियाँ बहती थी ।

द्रोणाचार्य अर्जुन को चक्रव्हूह भेदने का रहस्य जमीन पे रेखा चित्र बनाकर समझा रहे थे तभी उनका पुत्र अस्वस्थामा वहां आ गया, द्रोणाचार्य ने तुरंत उस रेखाचित्र को मिटा दिया की कहीं उनका पुत्र वो विद्या ना सिख ले…! 

ऐसे ब्राह्मण थे द्रोणाचार्य!

क्या यही ब्राह्मणवाद है जिसे आज कुछ राजनीतिक और आदिवासी चिंतक कोसते हैं???

इस्लामी, अंग्रेज, मार्क्सवादी, कम्युनिस्ट, साम्यवादी वगैरह जो भी आया भारतीयों को बर्बाद कर गया!

कारण यह है की बिना सच को जानें हिन्दुओ ने सबपर विश्वास किया।

हिंन्दुओं ने कभी नहीं सोचा हमारे देश की संस्कृति, धर्म और आर्थिक स्थिति क्यों सबसे महान थी।

बस यही हिन्दुओ की गलती है और आज भी हिन्दू जात पात, धर्म में बंट चुके है और महान भारत की महान संस्कृति को भूल चुके है ।

जय श्री राम

चन्द्रशेखर पाण्डेय जी की कलम से. 

कापी पेस्ट.

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ब्राह्मण


​मनु जी मनुस्मृति के श्लोक १२/१०८ में कहते है –

” अनाम्नातेषु धर्मेषु कथ स्यादिति चेभ्दवेत् |

य शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयु: स धर्म: स्यादशन्कित : ||

अर्थात जिन विषयों पर हमने उपदेश नही किया उन पर

यदि संदेह हो जाए कि इसे किस प्रकार करे , तो शिष्ट ब्राह्मण

जिसको धर्म कहे ,निस्संदेह वो धर्म है |

यहा ब्राह्मण -विद्वान ,धर्म प्रवक्ता ,मार्गदर्शक इत्यादि अर्थ

में लक्षित होता है |

अम्बेडकरवादी लोग इसे जन्मना ब्राह्मण के वर्चस्व

के अर्थ में लगा अर्थ का अनर्थ करते है | उस ब्राह्मण के क्या

लक्षण है वो भी देखना चाहिए जिससे जन्मना

जातिवादी ब्राह्मण का स्पष्ट निषेध हो गुण कर्म से

ब्राह्मण का विधान होता है –

तैतरीय शिक्षा-११ और कुछ भेद के साथ

तैतरीय उपनिषद में निम्न श्लोक आता है – ” अथ यदि

ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ,ये तत्र ब्राह्मणा:

समर्शिन: युक्ता आयुक्ता अलूक्षा धर्मकामा: स्यु: | यथा ते तत्र

वर्तेरन तथा तत्र वर्तेथा: || ”

अर्थ – यदि तुम्हे किसी कर्म या आचार के विषय में

कुछ संदेह हो जाए तो तुम वैसा करो जैसा धर्मात्मा ब्राह्मण करता

है उस ब्राह्मण की पहचान है – ” सब कुछ

सहन करने वाला (अर्थात गाली देने ,पत्थर मारने पर

भी बुरा न माने नाराज न हो क्षमा करने वाला ) धर्म

कार्य में तत्पर ,निठल्ला न बैठने वाला , धर्मकार्यो में लगा रहने वाला

जैसा वो व्यवहार करे वैसा ही तुम भी करो

अर्थात उसका अनुसरण करो |

यहा ब्राह्मण के लक्षण बता दिए है उससे स्पष्ट है कि मनु

का उद्देश्य व्यक्ति को उचित मार्गदर्शक खोज अपने कर्म और

आचार के निर्वाह का उपदेश है न कि जन्मना ब्राह्मण के

वर्चस्व स्थापित करने का |

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Q. CASTEISM IN HINDUS? A. NO …. IT WAS VARNA AS PER PROFESSIONAL CONDUCT AND NOT CASTE !!


Rayvi Kumar's photo.
Rayvi Kumar to INDIAN HISTORY ~ REAL TRUTH

SHARE PLEASE ….JEWELS OF BHARATAM~SERIES[TM]

Q. CASTEISM IN HINDUS?
A. NO …. IT WAS VARNA AS PER PROFESSIONAL CONDUCT AND NOT CASTE !!

In ancient Bharata no part of society was closed to anyone on the basis of family background, and acceptance into another varna was solely by merit . The issue of caste appeared only after enactment of Hindu Law by Britishers. To understand how caste and community have been misunderstood one has to go through famous case of Ganapathi Iyer versus Maharaja of Kolhapur.

In India there is no caste but only communities. If caste is the prerogative under what caste Jats, Gujjars, Kapus will fit? There are only communities comprising of industrial class, mercantile class, priestly class, labour class etc.,India is the only country where priestly class are at the disposal of local people and each community have their own priests.

Then where is the question of casteism? The community set up in 1500AD is not as of today and that in 1000AD was not that of 1500AD and so on. Community set up is dynamic and not static. For example upto 1000AD South India was dominated by Brahmakshatriyas who cannot be identified now.

One among the groups was VAIDHYAS/AMBASHTAS to which SIRUTHONDAR and VIGYAPATHI OF VELVIKUDI GRANT viz.,SATTAN GANAPATHI belonged. The Valluvars occupied a prominent place upto CHOLAS. The VALMIKIS AND VALLUARS have the right to don sacred threads. Even now in Tamilnadu Valluvars are excellent astrologers and priests for untouchables.

If the dynamic nature of community set up was not understood properly, tomorrow there will be new class of Brahmins and outcastes i.e.,those in all communities including Brahmins who cannot cope up with Science and Technology will become irrelevant and take jobs considered as menial as per current standards and become outcastes and the blame game sill start after hundred years.

The greatest misunderstanding of caste is not of Manu Law but due to the fact that it was standardised through prejuidiced lense of history. The societal change can never be understood through the history of Aryan invasion and one conveniently shift the blame to casteism which can satisfy one’s ego for contemporary times but not for long.

Any passionate person will demand scrapping of Hindu Law which has created unnecessary prejudice against anteriority. Caste can be abolished but not community set up because caste can never provide hetrogenity while community provides hetrogenity within the limited space and fit into caste as per the changing times. If one likes or not Indian polity has to accept existence of community which can never become caste.

What happens in Tamilnadu the land of Periyarism? The internicine quarrel is due to fear of survival and loss of identity of one’s self mistitled as caste clash.

Everybody can welcome abolishing of caste but what is the alternative to the customs of various communities from birth to death? Will this also be enacted by COMMON CIVIL LAW? A true historian can never blame anybody for societal changes but will try to provide level playing field for everybody without hatred and malice towards none. Blaming Casteism and Aryan invasion theory is not going to solve the problems.

It didn’t develop in one shot and evolved over time by merging many different social groups. The caste system is not a well-defined entity, but an amorphous grouping of people with different origins that all got mixed over time. Indian varna system is also very similar to the Confucianist system of grouping occupations into 4 groups [Four occupations] – scholars, farmers, artisans and traders and systems elsewhere the world.

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आश्रम


आश्रम

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प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे – वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था। ये चार आश्रम थे-

(१) ब्रह्मचर्य, (२) गार्हस्थ्य, (३) वानप्रस्थ और (४) संन्यास।

अमरकोश (७.४) पर टीका करते हुए भानु जी दीक्षित ने ‘आश्रम’ शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है: आश्राम्यन्त्यत्र। अनेन वा। श्रमु तपसि। घञ््‌ा। यद्वा आ समंताछ्रमोऽत्र। स्वधर्मसाधनक्लेशात्‌। अर्थात्‌ जिसमें स्म्यक्‌ प्रकार से श्रम किया जाए वह आश्रम है अथवा आश्रम जीवन की वह स्थिति है जिसमें कर्तव्यपालन के लिए पूर्ण परिश्रम किया जाए। आश्रम का अर्थ ‘अवस्थाविशेष’ ‘विश्राम का स्थान’, ‘ऋषिमुनियों के रहने का पवित्र स्थान’ आदि भी किया गया है।

आश्रमसंस्था का प्रादुर्भाव वैदिक युग में हो चुका था, किंतु उसके विकसित और दृढ़ होने में काफी समय लगा। वैदिक साहित्य में ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य अथवा गार्हपत्य का स्वतंत्र विकास का उल्लेख नहीं मिलता। इन दोनों का संयुक्त अस्तित्व बहुत दिनों तक बना रहा और इनको वैखानस, पर्व्राािट्, यति, मुनि, श्रमण आदि से अभिहित किया जाता था। वैदिक काल में कर्म तथा कर्मकांड की प्रधानता होने के कारण निवृत्तिमार्ग अथवा संन्यास को विशेष प्रोत्साहन नहीं था। वैदिक साहित्य के अंतिम चरण उपनिषदों में निवृत्ति और संन्यास पर जोर दिया जाने लगा और यह स्वीकार कर लिया गया था कि जिस समय जीवन में उत्कट वैराग्य उत्पन्न हो उस समय से वैराग्य से प्रेरित होकर संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। फिर भी संन्यास अथवा श्रमण धर्म के प्रति उपेक्षा और अनास्था का भाव था।

सुत्रयुग में चार आश्रमों की परिगणना होने लगी थी, यद्यपि उनके नामक्रम में अब भी मतभेद था। आपस्तंब धर्मसूत्र (२.९.२१.१) के अनुसार गार्हस्थ्य, आचार्यकुल (=ब्रह्मचर्य), मौन तथा वानप्रस्थ चार आश्रम थे। गौतमधर्मसूत्र (३.२) में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु और वैखानस चार आश्रम बतलाए गए हैं। वसिष्ठधर्मसूत्र (७.१.२) में गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा पर्व्राािजक, इन चार आश्रमों का वर्णन किया है, किंतु आश्रम की उत्त्पति के संबंध में बतलाया है कि अंतिम दो आश्रमों का भेद प्रह्लाद के पुत्र कपिल नामक असुर ने इसलिए किया था कि देवताओं को यज्ञों का प्राप्य अंश न मिले और वे दुर्बल हो जाएँ (६.२९.३१)। इसका संभवत: यह अर्थ हो सकता है कि कायक्लेशप्रधान निवृत्तिमार्ग पहले असुरों में प्रचलित था और आर्यो ने उनसे इस मार्ग को अंशत: ग्रहण किया, परंतु फिर भी ये आश्रम उनको पूरे पंसद और ग्राह्य न थे।

बौद्ध तथा जैन सुधारणा ने आश्रम का विरोध नहीं किया, किंतु प्रथम दो आश्रमों-ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य-की अनिवार्यता नहीं स्वीकार की। इसके फलस्वरूप मुनि अथवा यतिवृत्ति को बड़ा प्रोत्साहन मिला और समाज में भिक्षुओं की अगणित वृद्धि हुई। इससे समाज तो दुर्बल हुआ ही, अपरिपक्व संन्यास अथवा त्याग से भ्रष्टाचार भी बढ़ा। इसकी प्रतिक्रिया और प्रतिसुधारण ई. पू. दूसरी सदी अथवा शुंगवंश की स्थापना से हुई। मनु आदि स्मृतियों में आश्रमधर्म का पूर्ण आग्रह और संघटन दिखाई पड़ता है। पूरे आश्रमधर्म की प्रतिष्ठा और उनके क्रम की अनिवार्यता भी स्वीकार की गई। ‘आश्रमात्‌ आश्रमं गच्छेत्‌’ अर्थात्‌ एक आश्रम से दूसरे आश्रम को जाना चाहिए, इस सिद्धांत को मनु ने दृढ़ कर दिया।

स्मृतियों में चारों आश्रमों के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। मनु ने मानव आयु सामान्यत: एक सौ वर्ष की मानकर उसको चार बराबर भागों में बांटा है। प्रथम चतुर्थांश ब्रह्मचर्य है। इस आश्रम में गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना कर्तव्य है। इसका मुख्य उद्देश्य विद्या का उपार्जन और ्व्रात का अनुष्ठान है। मनु ने ब्रह्मचारी के जीवन और उसके कर्तव्यों का वर्णन विस्तार के साथ किया (अध्याय २, श्लोक ४१-२४४)। ब्रह्मचर्य उपनयन संस्कार के साथ प्रारंभ और समावर्तन के साथ समाप्त होता है। इसके पश्चात्‌ विवाह करके मुनष्य दूसरे आश्रम गार्हस्थ्य में प्रवेश करता है। गार्हस्थ्य समाज का आधार स्तंभ है। जिस प्रकार वायु के आश्रम से सभी प्राणी जीते हैं उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम के सहारे अन्य सभी आश्रम वर्तमान रहते हैं (मनु. ३७७)। इस आश्रम में मनुष्य ऋषिऋण से वेद से स्वाध्याय द्वारा, देवऋण से यज्ञ द्वारा और पितृऋण से संतानोत्पत्ति द्वारा मुक्त होता है। इसी प्रकार नित्य पंचमहायज्ञों-ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा भूतयज्ञ-के अनुष्ठान द्वारा वह समाज एवं संसार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है। मनुस्मृत्ति के चतुर्थ एवं पंचम अध्याय में गृहस्थ के कर्त्तव्यों का विवेचन पाया जाता है। आयु का दूसरा चतुर्थाश गार्हस्थ्य में बिताकर मनुष्य जब देखता है कि उसके सिर के बाल सफेद हो रहे हैं और उसके शरीर पर झुर्रियाँ पड़ रही हैं तब वह जीवन के तीसरे आश्रम-वानप्रस्थ-में प्रवेश करता है। (मनु. ५, १६९)। निवृत्ति मार्ग का यह प्रथम चरण है। इसमें त्याग का आंशिक पालन होता है। मनुष्य सक्रिय जीवन से दूर हो जाता है, किंतु उसके गार्हस्थ्य का मूल पत्नी उसके साथ रहती है और वह यज्ञादि गृहस्थधर्म का अंशत: पालन भी करता है। परंतु संसार का क्रमश: त्याग और यतिधर्म का प्रारंभ हो जाता है (मनु.६)। वानप्रस्थ के अनंतर शांतचित्त, परिपक्व वयवाले मनुष्य का पार्व्राािज्य (संन्यास) प्रारंभ होता है। (मनु.६,३३)। जैसा पहले लिखा गया है, प्रथम तीन आश्रमों ओर उनके कर्त्तव्यों के पालन के पश्चात्‌ ही मनु संन्यास की व्यवस्था करते हैं:एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाकर, जितेंद्रिय हो, भिक्षा (ब्रह्मचर्य), बलिवैश्वदेव (गार्हस्थ्य तथा वानप्रस्थ) आदि से विश्राम पाकर जो संन्यास ग्रहण करता है वह मृत्यु के उपरांत मोक्ष प्राप्त कर अपनी (पारमार्थिक) परम उन्नति करता है (मनु.६,३४)। जो सब प्राणियों को अभय देकर घर से प्र्व्राजित होता है उस ब्रह्मवादी के तेज से सब लोक आलोकित होते हैं (मनु. ६,३९)। एकाकी पुरुष को मुक्ति मिलती है, यह समझता हुआ संन्यासी सिद्धि की प्राप्ति के लिए नित्य बिना किसी सहायक के अकेला ही बिचरे; इस प्रकार न वह किसी को छोड़ता है और न किसी से छोड़ा जाता है (मनु. ६,४२)। कपाल (भग्न मिट्टी के बर्तन के टुकड़े) खाने के लिए, वृक्षमूल रहने के लिए तथा सभी प्राणियों में समता व्यवहार के लिए मुक्त पुरुष (संन्यासी) के लक्षण हैं (मनु. ६,४४)।

आश्रमव्यवस्था का जहाँ शारीरिक और सामाजिक आधार है, वहाँ उसका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक आधार भी है। भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन को केवल प्रवाह न मानकर उसको सोद्देश्य माना था और उसका ध्येय तथा गंतव्य निश्चित किया था। जीवन को सार्थक बनाने के लिए उन्होंने चार पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-की कल्पना की थी। प्रथम तीन पुरुषार्थ साधनरूप से तथा अंतिम साध्यरूप से व्यवस्थित था। मोक्ष परम पुरुषार्थ, अर्थात्‌ जीवन का अंतिम लक्ष्य था, किंतु वह अकस्मात्‌ अथवा कल्पनामात्र से नहीं प्राप्त हो सकता है। उसके लिए साधना द्वारा क्रमश: जीवन का विकास और परिपक्वता आवश्यक है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय समाजशास्त्रियों ने आश्रम संस्था की व्यवस्था की। आश्रम वास्तव में जीव का शिक्षणालय अथवा विद्यालय है। ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म का एकांत पालन होता है। ब्रह्मचारी पुष्टशरीर, बलिष्ठबुद्धि, शांतमन, शील, श्रद्धा और विनय के साथ युगों से उपार्जित ज्ञान, शास्त्र, विद्या तथा अनुभव को प्राप्त करता है। सुविनीत और पवित्रात्मा ही मोक्षमार्ग का पथिक्‌ हो सकता है। गार्हस्थ्य में धर्म पूर्वक अर्थ का उपार्जन तथा काम का सेवन होता है। संसार में अर्थ तथा काम के अर्जन और उपभोग के अनुभव के पश्चात्‌ ही त्याग और संन्यास की भूमिका प्रस्तुत होती है। संयमपूर्वक ग्रहण के बिना त्याग का प्रश्न उठता ही नहीं। वानप्रस्थ तैयार होती है। संन्यास के सभी बंधनों का त्याग कर पूर्णत: मोक्षधर्म का पालन होता है। इस प्रकार आश्रम संस्था में जीवन का पूर्ण उदार, किंतु संयमित नियोजन था।

शास्त्रों में आश्रम के संबंध में कई दृष्टिकोण पाए जाते हैं जिनको तीन वर्गो में विभक्त किया जा सकता है। (१) समुच्चय, (२) विकल्प और बाध। समुच्चय का अर्थ है सभी आश्रमों का समुचित समाहार, अर्थात्‌ चारों आश्रमों का क्रमश: और समुचित पालन होना चाहिए। इसके अनुसार गृहस्थाश्रम में अर्थ और काम संबंधी नियमों का पालन उतना ही आवश्यक है जितना ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास में धर्म और मोक्षसंबंधी धर्मो का पालन। इस सिद्धांत के सबसे बड़े प्रवर्तक और समर्थक मनु (अ.४ तथा६) हैं। दूसरे सिद्धांत विकल्प का अर्थ यह है कि ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात्‌ व्यक्ति को यह विकल्प करने की स्वतंत्रता है कि वह गार्हस्थ्य आश्रम में प्रवेश करे अथवा सीधे संन्यास ग्रहण करे। समावर्तन से संदर्भ में ब्रह्मचारी दो प्रकार के बताए गए हैं। (१) उपकुर्वाण, जो ब्रह्मचर्य समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहता था और (२) नैष्ठिक, जो आजीवन गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहता था। इसी प्रकार स्त्रियों में ब्रह्मचर्य के पश्चात सद्योद्वाहा (तुरंत विवाहयोग्य) और ब्रह्मवादिनी (आजीवन ब्रह्मोपासना में लीन) होती थीं। यह सिद्धांत जाबालोपनिषद् तथा कई धर्मसूत्रों (वसिष्ठ तथा आपस्तंब) और कतिपय स्मृतियों (याज्ञ., लघु, हारीत) में प्रतिपादित किया गया है। बाध का अर्थ है सभी आश्रमों के स्वतंत्र अस्तित्व अथवा क्रम को न मानना अथवा आश्रम संस्था को ही न स्वीकार करना। गौतम तथा बौधायनधर्मसूत्रों में यह कहा गया है कि वास्तव में एक ही आश्रम गार्हस्थ्य है। ब्रहाचर्य उसकी भूमिका है:श्वानप्रस्थ और संन्यास महत्व में गौण (और प्राय: वैकल्पिक) हैं। मनु ने भी सबसे अधिक महत्व गार्हस्थ्य का ही स्वीकार किया गया है, जो सभी कर्मो और आश्रमों का उद्गम है। इस मत के समर्थक अपने पक्ष में शतपथ ब्राह्मण का वाक्य (एतद्वै जरामर्थसत्रं यदग्निहोत्रम = जीवनपर्यत अग्निहोत्र आदि यज्ञ करना चहिए। शत. १२, ४, १, १), ईशोपनिषद् का वाक्य (कुर्वत्रेवेहि कर्माणि जिजीविषेच्छंत समा:।-ईश-२) आदि उधृत करते हैं। गीता का कर्मयोग भी कर्म का संन्यास नहीं अपितु कर्म में संन्यास को ही श्रेष्ठ समझता है। आश्रम संस्था को सबसे बड़ी बाधा परंपराविरोधी बौद्ध एवं जैन मतों से हुई जो आश्रमव्यवस्था के समुच्चय और संतुलन को ही नहीं मानते और जीवन का अनुभव प्राप्त किए बिना अपरिपक्व संन्यास या यतिधर्त को अत्यधिक प्रश्रय देते हैं। मनु. (६, ३५) पर भाष्य करते हुए सर्वज्ञनारायण ने उपर्युक्त तीनों मतों में समन्वय करने की चेष्टा की है। सामान्यत: तो उनको समुच्चय का सिद्धांत मान्य है। विकल्प में वे अधिकारभेद मानते हैं। उनके विचार में बाध का सिद्धांत उन व्यक्तियों के लिए ही है जो अपने पूर्वसंस्कारों के कारण सांसारिक कर्मों में आजीवन आसक्त रहते हैं और जिनमें विवेक और वैराग्य का यथासमय उदय नहीं होता।

सुसंघटित आश्रम संस्था भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। किंतु इसका एक बहुत बड़ा सार्वभौम और शास्त्रीय महत्व है। यद्यपि ऐतिहासिक कारणों से इसके आदर्श और व्यवहार में अंतर रहा है, जो मानव स्वभाव को देखते हुए स्वाभाविक है, तथापि इसकी कल्पना और आंशिक व्यवहार अपने आप में गुरुत्व रखते हैं। इस विषय पर डॉयसन (एनसाइक्लोपीडिया ऑव रेलिजन ऐंड एथिक्स-‘आश्रम’ शब्द) का निम्नांकित मत उल्लेखनीय है: मनु तथा अन्य धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित आश्रम की प्रस्थापना से व्यवहार का कितना मेल था, यह कहना कठिन है; किंतु यह स्वीकार करने में हम स्वतंत्र हैं कि हमारे विचार में संसार के मानव इतिहास में अन्यत्र कोई ऐसा (तत्व या संस्था) नहीं है जो इस सिद्धांत की गरिमा की तुलना कर सके।

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • मनुस्मृति (अध्याय ३, ४, ५, तथा);
  • पी.वी.काणे: हिस्ट्री ऑव धर्मशास्त्र, भाग२, खंड १, पृ. ४१६-२६;
  • भगवानदास: सायंस ऑव सोशल आर्गेनाइज़ेशन, भाग१;
  • राजबली पांडेय: हिंदू संस्कार, धार्मिक तथा सामाजिक अध्ययन, चौखंभा भारती भवन, वाराणसी;
  • हेस्टिंग्ज़: एनसाइक्लोपिडिया ऑव रेलिजन ऐंड एथिक्‌स, ‘आश्रम’ शब्द।