Posted in रामायण - Ramayan

ही #लोग भूल गए होंलेकिन #राम#जन्मभूमि का #केस लड़ने के लिए 2005 में उन्हे गोली मार दी गई थी और 1996 में 16 बार चाकू मारा गया था मगर वह बच गए क्योंकि उन्हें राम लल्ला ने #अपना केस लड़ने के लिए #चुना था .#जयश्रीराम🕉️🙏🚩

Posted in रामायण - Ramayan

भाग्य नगर के एक धर्मप्रेमी ने अयोध्या श्रीराम मंदिर के लिए सोने चांदी हीरे से युक्त रामजी को चरणपादुका समर्पित की😍बोलते रहिए जय श्रीराम

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, रामायण - Ramayan

🍁🍁जय श्री सीताराम जी 🍁🍁
🏵️🏵️🌴🌴🪴🪴🌴🌴🏵️🏵️ 🌻🌻श्री हनुमान जी का अवतरण🌻🌻 त्रेतायुग में एक केसरी नाम का असुर उत्पन्न हुआ। उसने पुत्र कामना से श्री शिवजी को प्रसन्न करने के लिए पञ्चाक्षर मंत्र का जप करते हुए जितेन्द्रिय और निराहार रहकर तप किया। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे दर्शन दिया और कहा -- 'तू अपने इच्छानुसार वर मांग ले।' तब केसरी ने कहा -- देवदेव! यदि आप संतुष्ट हैं और वर देना चाहते हैं तो मैं एक ऐसा पुत्र चाहता हूं, जो बलवान, संग्राम में विजयी, महाधैर्यवान एवं महाबुद्धिमान भी हो। तब श्री शंकर जी बोले -- मैं तुझे पुत्र तो नहीं दे सकता। कारण, विधाता ने तुझे पुत्र सुख नहीं लिखा है, तथापि एक सुन्दरी कन्या दूँगा, जिससे तेरी इच्छा के अनुसार महान बलशाली पुत्र उत्पन्न होगा।' ऐसा कहकर श्री शंकर जी अंतर्ध्यान हो गए। वह असुर मनचाहा वर पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो गया। कुछ समय बाद उसके एक लोकविस्मयकारिणी कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम दैत्यराज ने अञ्जना रखा।वह कन्या शुक्लपक्ष में चंद्रकला की तरह बढ़ने लगी। पिता पुत्रवत् ही उस कन्या से प्रेम करता था। समय बीतता रहा, एक बार केसरी नामक वानर ने, जो बड़ा पराक्रमी एवं वानरों में श्रेष्ठ था, उस कन्या की याचना की। तब दैत्यराज ने बड़ी प्रसन्नता से उसे वह कन्या दे दी। केसरी इच्छानुसार रूप धारण करने वाली अंजना के साथ आनन्द से क्रीणा करने लगा। इस प्रकार बहुत समय बीत गया, पर अंजना के कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। एक बार धर्मदेवता पुल्कसी (वन्य नीचे स्त्री) का रूप धारण कर वहाँ आये। उनके एक हाथ में था बेंत तथा दूसरे हाथ में थी एक सुतली। वह स्त्री जोर-जोर से यह आवाज़ लगा रही थी कि 'किसी को अपने भाग्य के विषय में प्रश्न करना हो तो करें, उसके भाग्य में क्या है, मैं बता दूँगी।' इस प्रकार सबके हाथ की रेखाएं देखती और उन्हें फल बताती हुई वह अंजना के पास पहुँची। तब अंजना ने उसको सुंदर आसन देकर बैठाया और सुवर्णपात्र में मौक्तिक रूपी तण्डुल उसके सामने रखकर उसको सभी प्रकार से संतुष्ट करके पूछा -- ' देवि! मेरे भाग्य में पुत्र सुख है या नहीं? सत्य कहो। यदि मुझे एक बलवान पुत्र हो जायगा तो मैं तुम्हें तुम्हारे इच्छानुसार सब कुछ दूँगी।' तब वह पुल्कसी बोली --'तुझे बलवान पुत्र अवश्य प्राप्त होगा, यह मैं धर्म की शपथ खाकर कहती हूँ, तू चिन्ता मत कर। किन्तु मैं जैसा बताऊँ, उसी प्रकार तू नियमपूर्वक तप कर। श्री वेंकटाचलपर्वत पर सात हजार वर्ष तक तप करने से तुझे मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा।' ऐसा कहकर पुल्कसी जैसे आयी थी वैसे ही चली गई। अब अंजना उसके कथनानुसार वेंकटाद्रि पर आकाशगंगा के पास जाकर, जहाँ बहुत से सिद्ध महात्मा वास करते थे, केवल वायु भक्षण कर वायु देवता का ध्यान करती हुई दारुण तप करने लगी। कुछ दिनों बाद आकाशगंगा से यह आकाशवाणी हुई कि 'बेटी! तू चिन्ता मत कर, तेरा भाग्य खुल गया। रावण नाम का राक्षस बड़ा दुष्ट हो कर सब लोगों को रुलायेगा, वह सबकी सुन्दर-सुन्दर स्त्रियों को हरण करके लायेगा। उसका नाश करने के लिए भगवान श्री हरिकुल में श्री राम रुप से अवतार लेंगे। उनकी सहायता करने के लिए बड़ा पराक्रमी, बलशाली, धैर्यवान, जितेन्द्रिय और अप्रमेय गुणवाला एक तुम्हारा पुत्र भी होगा। यह आकाशवाणी सुनकर अंजना परम प्रसन्न हुई। उसने यह सब वृतांत केसरी को बतलाया। वह भी अत्यन्त प्रसन्न होकर पुत्रोत्पत्ति की प्रतीक्षा करने लगा। अंजना का गर्भ क्रमशः बढ़ने लगा और दस मास पूर्ण होने पर श्रावण मास की एकादशी के दिन श्रवण नक्षत्र में कमलनयनी अंजना ने सूर्योदय के समय कानों में कुण्डल और यज्ञोपवीत धारण किए हुए, कौपीन पहने हुए, जिसका रूप, मुख, पूंछ और अधोभाग वानर के समान लाल था, ऐसे सुवर्ण के समान रंग वाले सुंदर पुत्र को जन्म दिया। हनुमान जी के जन्म की कथाएँ पुराणों में विभिन्न प्रकार से मिलती हैं। कल्पभेद से वे सभी सत्य ही हैं। हमें तो भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करनी चाहिए।

नेहा रावत

Posted in रामायण - Ramayan

कर्म बधी संसार

“वनवास के दौरान माता सीताजी को प्यास लगी, तभी श्री राम जी ने चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक जंगल ही जंगल दिख रहा था।

कुदरत से प्रार्थना की ~ हे वन देवता !आसपास जहाँ कहीं पानी हो, वहाँ जाने का मार्ग कृपा कर सुझाईये।

तभी वहाँ एक मयूर ने आकर श्री राम जी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर एक जलाशय है। चलिए मैं आपका मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ, किंतु मार्ग में हमारी भूल चूक होने की संभावना है।

श्री राम जी ने पूछा ~ वह क्यों ?तब मयूर ने उत्तर दिया कि ~मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप चलते हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ जाऊंगा। उस के सहारे आप जलाशय तक पहुँच ही जाओगे।

यहां पर एक बात स्पष्ट करनी है कि मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं। अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध पंखों को बिखेरेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाती है।

और वही हुआ। अंत में जब मयूर अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है, तब उसने मन में ही कहा कि वह कितना भाग्यशाली है, कि जो जगत की प्यास बुझाते हैं, ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ।मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही।

तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर, अपने जीवन का त्यागकर मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है, मैं उस ऋण को अगले जन्म में जरूर चुकाऊंगा ….

★तुम्हारे पंख अपने सिर पर धारण करके★

तत्पश्चात अगले जन्म में श्री कृष्ण अवतार में उन्होंने अपने माथे (मुकुट) पर मयूर पंख को धारण कर वचन अनुसार उस मयूर का ऋण उतारा था। *तात्पर्य यही है कि अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो हम तो मानव हैं। न जाने हम कितने ही ऋणानुबंध से बंधे हैं। उसे उतारने के लिए हमें तो कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे।*

अर्थात ~~

जो भी भला हम कर सकते हैं, इसी जन्म में हमें करना है।

मंगलमय प्रभात
स्नेह वंदन
प्रणाम 🙏Jai Shri Ram🙏

गौरव गुप्ता

Posted in रामायण - Ramayan

राम तत्त्व की महिमा
ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है ‘राम’। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।
रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य ने कहाः “गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?”
गुरूः “थोड़ी साधना कर, जप-ध्यानादि कर, फिर समझ में आ जायेगा।” साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई, तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले।
ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा।
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?”
गुरु ने देखा कि साधना आदि करके इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है। किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। गुरु ने करूणा करके समझाया कि “वत्स ! देख, घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों – घट, मठ, और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक-का-एक ही है। इसी प्रकारः

वही राम घट-घट में बोले।
वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा।
वही राम है सबसे न्यारा।।

रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम”
वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए, उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।
कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे। आदर्श शत्रु ! हाँ, आदर्श शत्रु थे, तभी तो शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह सके। कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी। सुलोचना ने कहाः ‘अगर यह मेरे पति की भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दे।’ कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी। सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दियाः “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”
जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः “जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?”
यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे ! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।”
धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए भी इतना सहज सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुसरण कर सकता है।
उन्हीं पूर्णाभिराम श्रीराम के दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाकर श्रीराम-तत्त्व की ओर प्रयाण करने के पथ पर अग्रसर हो, यही अभ्यर्थना… यही शुभ कामना….
हे राम ! हे हरि ! हे अच्युत ! गोविंद ! दीनदयाल ! हम सभी को सदबुद्धि दे। हम संयमी, सदाचारी बनकर आत्मदेव को पा लें। हे अंतरात्मा ! हे परमात्मा ! हे दीनबंधु ! हे भक्तवत्सल ! ॐ ॐ ॐ प्रभु जी ॐ…ॐ…ॐ. प्यारे जी ॐ….ॐ…ॐ मेरे जी ॐ….’ ऐसा पुकारते, प्रार्थना करते डूब जायें। वे कृपालु अवश्य कृपा करते हैं, सदबुद्धि देते हैं।

गौरव गुप्ता

Posted in रामायण - Ramayan

अत्यंत ज्ञानवर्धक

तुलसी दास जी ने जब राम चरित मानस की रचना की,तब उनसे किसी ने पूंछा कि बाबा! आप ने इसका नाम रामायण क्यों नहीं रखा? क्योकि इसका नाम रामायण ही है.बस आगे पीछे नाम लगा देते है, वाल्मीकि रामायण,आध्यात्मिक रामायण.आपने राम चरित मानस ही क्यों नाम रखा?
बाबा ने कहा – क्योकि रामायण और राम चरित मानस में एक बहुत बड़ा अंतर है.रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर,जब हम मंदिर जाते है तो
एक समय पर जाना होता है, मंदिर जाने के लिए नहाना पडता है,जब मंदिर जाते है तो खाली हाथ नहीं जाते कुछ फूल,फल साथ लेकर जाना होता है.मंदिर जाने कि शर्त होती है,मंदिर साफ सुथरा होकर जाया जाता है.
और मानस अर्थात सरोवर, सरोवर में ऐसी कोई शर्त नहीं होती,समय की पाबंधी नहीं होती,जाती का भेद नहीं होता कि केवल हिंदू ही सरोवर में स्नान कर सकता है,कोई भी हो ,कैसा भी हो? और व्यक्ति जब मैला होता है, गन्दा होता है तभी सरोवर में स्नान करने जाता है.माँ की गोद में कभी भी कैसे भी बैठा जा सकता है.
रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है।
इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्रीराम आप के जीवन को सुखमय बना देगे।

  1. रक्षा के लिए
    मामभिरक्षक रघुकुल नायक |
    घृत वर चाप रुचिर कर सायक ||
  2. विपत्ति दूर करने के लिए
    राजिव नयन धरे धनु सायक |
    भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ||
  3. सहायता के लिए
    मोरे हित हरि सम नहि कोऊ |
    एहि अवसर सहाय सोई होऊ ||
  4. सब काम बनाने के लिए
    वंदौ बाल रुप सोई रामू |
    सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ||
  5. वश मे करने के लिए
    सुमिर पवन सुत पावन नामू |
    अपने वश कर राखे राम ||
  6. संकट से बचने के लिए
    दीन दयालु विरद संभारी |
    हरहु नाथ मम संकट भारी ||
  7. विघ्न विनाश के लिए
    सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही |
    राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ||
  8. रोग विनाश के लिए
    राम कृपा नाशहि सव रोगा |
    जो यहि भाँति बनहि संयोगा ||
  9. ज्वार ताप दूर करने के लिए
    दैहिक दैविक भोतिक तापा |
    राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ||
  10. दुःख नाश के लिए
    राम भक्ति मणि उस बस जाके |
    दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ||
  11. खोई चीज पाने के लिए
    गई बहोरि गरीब नेवाजू |
    सरल सबल साहिब रघुराजू ||
  12. अनुराग बढाने के लिए
    सीता राम चरण रत मोरे |
    अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ||
  13. घर मे सुख लाने के लिए
    जै सकाम नर सुनहि जे गावहि |
    सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ||
  14. सुधार करने के लिए
    मोहि सुधारहि सोई सब भाँती |
    जासु कृपा नहि कृपा अघाती ||
  15. विद्या पाने के लिए
    गुरू गृह पढन गए रघुराई |
    अल्प काल विधा सब आई ||
  16. सरस्वती निवास के लिए
    जेहि पर कृपा करहि जन जानी |
    कवि उर अजिर नचावहि बानी ||
  17. निर्मल बुद्धि के लिए
    ताके युग पदं कमल मनाऊँ |
    जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ||
  18. मोह नाश के लिए
    होय विवेक मोह भ्रम भागा |
    तब रघुनाथ चरण अनुरागा ||
  19. प्रेम बढाने के लिए
    सब नर करहिं परस्पर प्रीती |
    चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ||
  20. प्रीति बढाने के लिए
    बैर न कर काह सन कोई |
    जासन बैर प्रीति कर सोई ||
  21. सुख प्रप्ति के लिए
    अनुजन संयुत भोजन करही |
    देखि सकल जननी सुख भरहीं ||
  22. भाई का प्रेम पाने के लिए
    सेवाहि सानुकूल सब भाई |
    राम चरण रति अति अधिकाई ||
  23. बैर दूर करने के लिए
    बैर न कर काहू सन कोई |
    राम प्रताप विषमता खोई ||
  24. मेल कराने के लिए
    गरल सुधा रिपु करही मिलाई |
    गोपद सिंधु अनल सितलाई ||
  25. शत्रु नाश के लिए
    जाके सुमिरन ते रिपु नासा |
    नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ||
  26. रोजगार पाने के लिए
    विश्व भरण पोषण करि जोई |
    ताकर नाम भरत अस होई ||
  27. इच्छा पूरी करने के लिए
    राम सदा सेवक रूचि राखी |
    वेद पुराण साधु सुर साखी ||
  28. पाप विनाश के लिए
    पापी जाकर नाम सुमिरहीं |
    अति अपार भव भवसागर तरहीं ||
  29. अल्प मृत्यु न होने के लिए
    अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा |
    सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ||
  30. दरिद्रता दूर के लिए
    नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना |
    नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना ||
  31. प्रभु दर्शन पाने के लिए
    अतिशय प्रीति देख रघुवीरा |
    प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ||
  32. शोक दूर करने के लिए
    नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी |
    आए जन्म फल होहिं विशोकी ||
  33. क्षमा माँगने के लिए
    अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता |
    क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ||
    इसलिए जो शुद्ध हो चुके है वे रामायण में चले जाए और जो शुद्ध होना चाहते है वे राम चरित मानस में आ जाए.राम कथा जीवन के दोष मिटाती है
    “रामचरित मानस एहिनामा, सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा”
    राम चरित मानस तुलसीदास जी ने जब किताब पर ये शब्द लिखे तो आड़े (horizontal) में रामचरितमानस ऐसा नहीं लिखा, खड़े में लिखा (vertical) रामचरित मानस। किसी ने गोस्वामी जी से पूंछा आपने खड़े में क्यों लिखा तो गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस राम दर्शन की ,राम मिलन की सीढी है ,जिस प्रकार हम घर में कलर कराते है तो एक लकड़ी की सीढी लगाते है, जिसे हमारे यहाँ नसेनी कहते है,जिसमे डंडे लगे होते है,गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस भी राम मिलन की सीढी है जिसके प्रथम डंडे पर पैर रखते ही श्रीराम चन्द्र जी के दर्शन होने लगते है,अर्थात यदि कोई बाल काण्ड ही पढ़ ले, तो उसे राम जी का दर्शन हो जायेगा।
    सत्य है शिव है सुन्दर है
    🙏🏻🌹जय श्रीराम🌹🙏🏻
    🌷🙏🏻 जय उमापति महाकाल

गौरव गुप्ता

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, रामायण - Ramayan

केवट


. “कछुवा और केवट का अद्भुत प्रसंग” क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मी जी उनके पैर दबा रही हैं। विष्णु जी के एक पैर का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं। क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्हा से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा उनकी ओर बढ़ा। उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग जी ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा। फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया। कुछ समय पश्चात् जब शेष जी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया। इस बार लक्ष्मी देवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया। इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष जी और लक्ष्मी माता के कारण उसे कभी सफलता नहीं मिली। यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सतयुग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया। इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा। अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर लिया था। कछुवे को पता था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु राम का, वही शेष जी लक्ष्मण का और वही लक्ष्मी देवी सीता के रूप में अवतरित होंगे तथा वनवास के समय उन्हें गंगा पार उतरने की आवश्यकता पड़ेगी। इसीलिये वह भी केवट बन कर वहाँ आ गया था। एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सारे मर्म जान लिये थे इसीलिये उसने राम से कहा था कि मैं आपका मर्म जानता हूँ। संत श्री तुलसी दास जी भी इस तथ्य को जानते थे इसलिये अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है कि :- “कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना” केवल इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी प्रकार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। उसे याद था कि शेषनाग क्रोध कर के फुँफकारते थे और मैं डर जाता था। अबकी बार वे लक्ष्मण के रूप में मुझ पर अपना बाण भी चला सकते हैं पर इस बार उसने अपने भय को त्याग दिया था, लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं। इसीलिये विद्वान संत श्री तुलसी दास जी ने लिखा है :- पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उरराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥ बरु तीर मारहु लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥ (हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता। हे राम ! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं आपसे बिल्कुल सच कह रहा हूँ। भले ही लक्ष्मण जी मुझे तीर मार दें, पर जब तक मैं आपके पैरों को पखार नहीं लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ ! हे कृपालु ! मैं पार नहीं उतारूँगा।) तुलसीदास जी आगे और लिखते हैं :- सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥ (केवट के प्रेम से लपेटे हुये अटपटे वचन को सुन कर करुणा के धाम श्री रामचन्द्र जी जानकी जी और लक्ष्मण जी की ओर देख कर हँसे। जैसे वे उनसे पूछ रहे हैं कहो अब क्या करूँ, उस समय तो केवल अँगूठे को स्पर्श करना चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे पर अब तो यह दोनों पैर माँग रहा है।) केवट बहुत चतुर था। उसने अपने साथ ही साथ अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवा दिया। तुलसी दास जी लिखते हैं :- पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥ (चरणों को धोकर पूरे परिवार सहित उस चरणामृत का पान करके उसी जल से पितरों का तर्पण करके अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्र को गंगा के पार ले गया।) त्रेतायुग का प्रसंग जब केवट भगवान् के चरण धो रहे हैं। बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान् का एक पैर धोकर उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देते हैं, और जब दूसरा धोने लगते हैं, तो पहला वाला पैर गीला होने से जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है, केवट दूसरा पैर बाहर रखते हैं, फिर पहले वाले को धोते हैं, एक-एक पैर को सात-सात बार धोते हैं। फिर केवट ये सब देखकर कहते है, प्रभु एक पैर कठौती मे रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो। जब भगवान् ऐसा ही करते है। तो जरा सोचिये, क्या स्थिति होगी, यदि एक पैर कठौती में है दूसरा केवट के हाथो में, भगवान् दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते हैं, तो वे केवट से बोले - "केवट मै गिर जाऊँगा ?" केवट बोला - "चिंता क्यों करते हो भगवन् ! दोनों हाथो को मेरे सिर पर रख कर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेगे।" जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है, भगवान् भी आज वैसे ही खड़े है। भगवान् केवट से बोले - "भईया केवट ! मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया।" केवट बोला - प्रभु ! क्या कह रहे हैं ?" भगवान् बोले - "सच कह रहा हूँ केवट, अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि मै भक्तों को गिरने से बचाता हूँ पर, आज पता चला कि, भक्त भी भगवान् को गिरने से बचाता। ----------:::×:::---------- 🌷 जय श्री राधेगोविंद जी🙏


गौरव गुप्ता

Posted in रामायण - Ramayan

वनवास न होता तो संसार कैसे सीखता कि क्या होता है…भाइयोंकासम्बंध

वनवास समाप्त हुए वर्षों बीत गए थे, प्रभु श्रीराम और माता सीता की कृपा छाया में अयोध्या की प्रजा सुखमय जीवन जी रही थी। युवराज भरत अपनी कर्तव्यपरायणता और न्यायप्रियता के लिए ख्यात हो चुके थे।

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा, “एक बात पूछूं भइया? माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था, क्या वह राजद्रोह नहीं था? उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा तो दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई। ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?

राम मुस्कुराए। बोले, “जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले तो उसका जीवन उसके असँख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है। जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो उसे दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत ?”

भरत संतुष्ट नहीं हुए। कहा, “यह तो मोह है भइया, और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है। एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया, समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं, अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है।

राम गम्भीर हो गए। कुछ क्षण के मौन के बाद कहा, ” अपने सगे-सम्बन्धियों के किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत! माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है। वनवास के चौदह वर्षों में हम चारों भाई अपने अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं, पर माता कैकई हर क्षण मरती रही हैं।

अपनी एक भूल के कारण उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया, फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं। वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए, पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं। कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है? मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा।”

राम के नेत्रों में जल उतर आया था, और भरत आदि भाई मौन हो गए थे। राम ने फिर कहा,”और उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों भरत! यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता। मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था, पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा। वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है।”

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे। वे अनायास ही बड़े भाई से लिपट गए। 🙏Jai Shri Ram🙏

गौरव गुप्ता

Posted in रामायण - Ramayan

. 🌷जय श्रीराम🙏
एक ऐसी निरापराध स्त्री की कथा, जिसे कष्ट और श्राप मुक्त करने के लिये भगवान को भी करना पड़ा अपने युगों के क्रम में परिवर्तन, और लेना पड़ा श्रीराम अवतार:- "अहिल्या" ब्रह्माजी ने अपने तपोबल से एक अत्यंत रूपमती स्त्री की रचना की। उसका नाम ब्रह्मा जी ने अहिल्या (जिसमें कोई भी हिल्य "कमी" न हो) रखा। अहिल्या का रूप इतना सुन्दर था कि उसके आगे स्वर्ग की सभी अप्सराएँ भी कुछ नहीं थीं। उसे देख कर हर कोई मोहित हो जाये। सभी देव उससे विवाह करने को आतुर थे। देवराज इन्द्र की इच्छा थी कि वह रूपवान स्त्री अहिल्या उनके देवलोक की अप्सरा बने। अहिल्या ब्रह्मा जी की मानस पुत्री थी इसलिए उन्होंने उसके विवाह के लिए एक प्रतियोगिता रखी जिसमें गौतम ऋषि विजयी हुये। अतः ब्रह्मा जी ने विधिवत अहिल्या का विवाह ऋषि गौतम से कर दिया। अहिल्या एक पतिव्रता स्त्री थी। वह गौतम ऋषि के साथ उनके आश्रम में अपना जीवन ऋषि सेवा में व्यतीत करने लगी। देवराज इन्द्र अहिल्या के रूप पर इतना अधिक मोहित थे कि उन्होंने चन्द्र देव के साथ मिलकर एक कुटिल योजना बना ड़ाली। गौतम ऋषि प्रातःकाल मुर्गे की पहली बाँग की आवाज पर उठ कर मंगलाचरण के लिये गंगा नदी के तट पर चले जाते थे। ऋषि की इसी दिनचर्या को देखते हुए इन्द्र ने चन्द्र देव को मुर्गे के रूप में गौतम ऋषि के द्वार पर बाँग देने के लिए वाध्य किया। मुर्गे की बाँग की आवाज सुन गौतम ऋषि अपनी नित्य की दिनचर्चा की तरह उठ कर गंगा नदी के तट की ओर चल दिये किन्तु जब वे गंगा जी के तट पर पहुंच गये जैसे ही स्नान के लिए वे गंगा जी में प्रविष्ट होने लगे तो उन्होंने पाया की गंगा मईया अभी निंद्रा में हैं, तो वेकिसी अनिष्ट की आशंका से पुनः आश्रम की ओर लौट आये। इधर गौतम ऋषि के जाने के उपरांत इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेश धारण कर लिया तथा निन्द्रालीन अहिल्या के पास जाकर उनका शील भंग कर दिया। गौतम ऋषि जब पुनः आश्रम में लौट कर आये तो उन्होंने मुर्गे के रूप में चन्द्रमा को छिपे पाया, जिसके असमय बाँग देने के लिए उन्होंने अपना गीला वस्त्र उस पर दे मारा। वस्त्र लगते ही चन्द्रमा वहाँ से भाग गये। गौतम ऋषि के गीले वस्त्र के निशान आज भी चन्द्रमा पर देखे जा सकते हैं। चन्द्रमा को भगाने के उपरांत गौतम ऋषि अन्दर कुटिया में गये तो वहाँ इन्द्र को उन्होंने अपने वेश में अहिल्या के पास पाया। जिससे गौतम ऋषि का क्रोध सभी सीमायें पार कर गया। उन्होंने तुरन्त ही इन्द्र को शाप दे दिया, कि जिस कामाग्नि ने द्रवित होकर तूने यह कृत्य किया है आज से तू हजार लिंगी हो जा। आज के बाद यह कार्य तू कभी नहीं कर सकेगा और देवराज होने के बाद भी कहीं तेरी पूजा ना होगी। निन्द्रा से जाग चुकी अहिल्या को भी अपने साथ हुए छल का आभास हो गया वह क्षमा याचना के लिए गौतम ऋषि के चरणों में गिर पड़ी किन्तु गौतम ऋषि का क्रोध शान्त नहीं हुआ था उन्होंने अहिल्या को भी क्षमा नहीं किया। उन्होंने अहिल्या से कहा तूने एक स्त्री होते हुए भी इन्द्र के साथ सहयोग कर एक पाषाण (पत्थर) रूपी कृत्य किया है, (ऋषि के रूप में इन्द्र को न पहचान पाने का अपराध) तो तू भी अभी से पाषाण रूप हो जा। अहिल्या निरापराध होते हुए भी उसी समय और उसी मुद्रा में एक पत्थर के रूप में परिवर्तित हो गई। इन्द्र के इस अत्यंत अशोभनीय कृत्य ने पूरे देव लोक को हिला कर रख दिया। सभी देवताओं को अहिल्या के साथ हुए इस अनैतिक कार्य पर शर्मिंदगी हुई। और सभी देव गौतम ऋषि के पास आकर निरापराध अहिल्या को क्षमा करने की विनती करने लगे। ऋषि का दिया शाप वापस तो नहीं हो सकता किन्तु जब गौतम ऋषि को क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने इस शाप से मुक्त होने का उपाय देवताओं को बताया। अहिल्या जल्द-से-जल्द शाप मुक्त हो और गौतम ऋषि द्वारा बताये गये शाप के निवारण के लिये सभी देव एकजुट हो भगवान् विष्णु के पास गये और उन्हें पूरी व्यथा कह सुनाई। तथा भगवान् विष्णु से अहिल्या के उद्धार की प्रार्थना की। त्रेता युग में भगवान् विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में अवतार लिया। महर्षि विश्वामित्र ताड़का नामक राक्षसी के वध के लिए अयोध्या से श्रीराम एवं लक्ष्मण जी को साथ ले गये थे। ताड़का के वध के उपरांत जब वे यज्ञ के लिए आश्रम की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो रास्ते में एक सुनसान पड़े आश्रम पर प्रभु श्रीराम की दृष्टि पड़ी जिसके बारे में उन्होंने महर्षि से जानना चाहा तो महर्षि ने बताया कि यह ऋषि गौतम का आश्रम है, तथा अहिल्या के साथ हुई घटना का पूरा वृतांत भी बताया।तथा अहिल्या के उद्धार के लिये बताये गये उपाय का भी वर्णन किया कि " गौतम ऋषि ने अहिल्या के उद्धार का उपाय यह बताया था कि जब भगवान् विष्णु स्वयं मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में आकर तुम्हें स्पर्श करेंगे तब तुम इस शाप से मुक्त हो कर उनके पास पुनः आ सकोगी तथा तभी हजार लिंगी इन्द्र भी हजार नेत्री हो जायेंगे।" सारा वृतांत सुनाने के उपरांत महर्षि ने प्रभु श्रीराम से निरापराध कष्ट भोग रही अहिल्या को स्पर्श कर उसका उद्धार करने को कहा। प्रभु श्रीराम के स्पर्श मात्र से ही अहिल्या पुनः स्त्री रूप में आ गयी तथा प्रभु श्रीराम को प्रणाम कर देवलोक में ऋषि गौतम के पास चली गयीं। तथा उसी समय हजार लिंगी इन्द्र भी हजार नेत्री हो गये इन्द्र को सहस्त्र नेत्री भी कहा जाता है। यह थी एक निरापराध स्त्री अहिल्या की कथा जिसके उद्धार के लिए भगवान् श्रीहरि विष्णु को मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में अवतार लेना पड़ा था। भगवान् श्रीराम के अवतार के अनेक कारणों में से "अहिल्या उद्धार" भी एक प्रमुख कारण था। अहिल्या की कथा सदा ही विवादों से ग्रसित रही है, किन्तु यहाँ इस कथा का मंतव्य किसी विवाद को बढ़ावा देने का नहीं है अपितु मंतव्य सिर्फ यह है कि अपराध चाहे इन्द्र का हो या ऋषि गौतम के क्रोध का किन्तु सजा मिली निरापराध स्त्री अहिल्या को युगों तक पाषाण बन कर रहने की। जिसका निवारण करने के लिये स्वयं भगवान् विष्णु को युगों के चक्र में परिवर्तन करके त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अवतार लेना पड़ा। ----------:::×:::---------- 🌷जय श्रीराम🙏


गौरव गुप्ता

Posted in रामायण - Ramayan

राम कथा और भगवान कथा की महिमा
बंधुओं, भगवान श्री राम ने कुछ ही जीवों का उद्धार किया होगा। हजारों, लाखों का। लेकिन भगवान श्री राम की कथा तो आज भी करोड़ों लोगो का उद्धार कर रही है। राम कथा सुनो , कृष्ण कथा सुनो, हरी कथा सुनो, शिव कथा सुनो आपके जो भी इष्ट देव है उनकी कथा सुनों, क्योंकि इस धरती पर अगर वास्तव में कुछ सुनने के लिए है तो वो है सिर्फ भगवान की कथा । और जिसने सुनी हैं तो दोबारा सुनो।

राम चरित्र को जीवन में धारण करने की कोशिश करो। यदि कोई कहे की हमने रामायण(ramayan) पढ़ ली हैं। देखिये तुलसीदास(tulsidas) जी कितना सुंदर कह रहे हैं-

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥॥
भावार्थ:-श्री रामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान्‌ के गुण निरंतर सुनते रहते हैं॥॥

उन्होंने भगवान की कथा को जाना ही नहीं जिसने कहा की बस-बस बहुत कथा सुन ली। क्योंकि भगवान की कथा आपकी प्यास बढाती हैं।

कुछ लोग कहते हैं की कथा में क्या रखा हैं? Why Ram Katha?
एक बार खुद कथा में आकर देखो तभी तो जान पाओगे की कथा में रखा क्या हैं। यदि किसी व्यक्ति को तैरना सीखना हैं तो पानी में जाना पड़ेगा। उसी तरह से आनंद चाहिए तो कथा में आओ ज़माने में क्या रखा हैं।

भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥॥
भावार्थ : जो लोग इस संसार रूपी भवसागर से पार पाना चाहते हैं उसके लिए सिर्फ राम नाम की नौका काफी हैं। बस एक बार आप भगवान के नाम पर विश्वास करके बैठ जाइये। भगवान श्री राम आपका खुद ही बेडा पार कर देंगे। और जो लोग संसार के विषयों को और सुखों को ढूंढने में लगे हैं भगवान के गुण तो उन लोगो को भी आनंद प्रदान करते हैं।

ऐसा कौन होगा जिसे भगवान की कथा अच्छी नही लगती होगी और उसमे से भी विशेषकर श्री राम जी की कथा।

तुलसीदास जी बहुत सुंदर लिखते हैं-

श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं॥
ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती॥॥
भावार्थ:-जगत्‌ में कान वाला ऐसा कौन है, जिसे श्री रघुनाथजी के चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्री रघुनाथजी की कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्मा की हत्या करने वाले हैं॥3॥

आपने देखा होगा कुछ लोग आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ बुरे लोग दूसरो की हत्या भी कर देते हैं। लेकिन ये सब शरीर की हत्या करते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं अरे मूरख जीव, तूने तो अपनी आत्मा की ही हत्या कर डाली की भगवान का चरित्र ना तूने सुना और ना तुझे सुहाया। इसलिए राम जी की कथा जरूर सुनिए।

-महर्षि वाल्मीकि जी की कथा
तुलसीदास जी कहते हैं की राम कथा तो चन्द्रमा की किरणों के समान शीतलता प्रदान करने वाली हैं। किसी ने कहा की राम कथा को चन्द्रमा के समान क्यों नही कहा?
क्योंकि चन्द्रमा की किरणे सबको शीतलता प्रदान करती हैं। और जब चन्द्रमा की किरणे धरती पर पड़ती हैं तो सब जगह समान रूप से जाती हैं। वह ये नही देखती की ये गरीब की कुटिया हैं या आमिर की कुटिया। इसी तरह से राम कथा भी सबके लिए हैं और सबको शीतलता प्रदान करती हैं।

रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥
भावार्थ:-श्री रामजी की कथा चंद्रमा की किरणों के समान है, जिसे संत रूपी चकोर सदा पान करते हैं। और इस कथा को चकोर रूपी संत हमेशा पीते रहते हैं।
आप सभी जानते हो चकोर को चन्द्रमा की चांदनी से कितना प्रेम होता हैं। इसी तरह संत लोग बस कथा का ही पान करते हैं।

किसी ने कहा की कितनी बार सुनें? कितनी बार इस कथा रस का पान करें?
तो संत जन बड़ा सुन्दर बताते हैं की जब तक जियो तब तक पियो।

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥॥
भावार्थ:-सत्संग के बिना हरि की कथा सुनने को नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गए बिना श्री रामचंद्रजी के चरणों में दृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता॥॥

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥॥
भावार्थ:-यदि श्री रामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो॥॥

भगवान की कथा दैहिक, दैविक और भौतिक तीनो ताप को मिटा देती है। श्रीमद भागवत कथा के अंतर्गत आया है की एक बार देवता कथा सुनने के बदले ऋषियों के पास अमृत लेकर पहुंचे थे। तब उन संतो ने कहा का कहाँ मेरी मणि रूपी कथा और कहाँ तुम्हारा कांच रूपी अमृत। कहने का तात्पर्य भगवान की कथा तो अमृत से भी बढ़कर है। आपने देखा होगा हनुमानजी(hanuman ji ) महाराज जहाँ भी कथा होती है वहां जरूर होते है। क्योंकि हनुमानजी को कथा से बहुत अधिक प्रेम है। इसलिए भगवान की कथा का जरूर श्रवण करें। और फिर फिर स्मरण करें। बस ये दो काम ही काफी है।

!! जय श्री राम !!
रामायण रघुवीर, धर्म की परम पुनीता।
धनुधारी श्रीलखन , साथ में माता सीता।
!! जय श्री राम !!

!! ,,जय श्री राम !!
भवसागर के पार रामजी कर दो बेड़ा पार जय बोलो श्री राम की गाओ मंगलाचार
!! जय श्री राम !!

गौरव गुप्ता