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“सुंदरकांड का धार्मिक महत्त्व”

सुंदरकांड वास्तव में हनुमान जी का कांड है। हनुमान जी का एक नाम सुंदर भी है। सुंदर कांड के लिए कहा गया है – सुंदरे सुंदरे राम: सुंदरे सुंदरीकथा। सुंदरे सुंदरे सीता सुंदरे किम् न सुंदरम्।।

हनुमान जी सेवक रूप से भक्ति के प्रतीक हैं। सकल सुमंगलदायक, रघुनायक गुनगान।

सादर सुनहिं ते तरहिं, भवसिंधु बिना जलजान।।

अर्थात् –

श्री रघुनाथ जी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का यानी सभी लौकिक एवं पारलौकिक मंगलों को देने वाला है, जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी अन्य साधन के ही भवसागर को तर जाएंगे। सुंदरकांड में तीन श्लोक, साठ दोहे तथा पांच सौ छब्बीस चौपाइयां हैं। साठ दोहों में से प्रथम तीस दोहों में विष्णुस्वरूप श्री राम के गुणों का वर्णन है। सुंदर शब्द इस कांड में चौबीस चौपाइयों में आया है। सुंदरकांड के नायक रूद्रावतार श्री हनुमान जी हैं। अशांत मन वालों को शांति मिलने की अनेक कथाएं इसमें वर्णित हैं।

इसमें रामदूत श्रीहनुमान के बल, बुद्धि और विवेक का बड़ा ही सुंदर वर्णन है। एक ओर श्रीराम की कृपा पाकर हनुमान जी अथाह सागर को एक ही छलांग में पार करके लंका में प्रवेश भी पा लेते हैं। बालब्रह्माचारी हनुमान ने विरह-विदग्ध मां सीता को श्रीराम के विरह का वर्णन इतने भावपूर्ण शब्दों में सुनाया है कि स्वयं सीता अपने विरह को भूलकर राम की विरह वेदना में डूब जाती है।

इसी कांड में विभीषण को भेदनीति, रावण को भेद और दंडनीति तथा भगवत्कृपा प्राप्ति का मंत्र भी हनुमान जी ने दिया है।

अंतत: पवनसुत ने सीता जी का आशीर्वाद तो प्राप्त किया ही है, राम काज को पूरा करके प्रभु श्रीराम को भी विरह से मुक्त किया है और उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित भी किया है। इस प्रकार सुंदरकांड नाम के साथ-साथ इसकी कथा भी अति सुंदर है।

आध्यात्मिक अर्थों में इस कांड की कथा के बड़े गंभीर और साधनामार्ग के उत्कृष्ट निर्देशन हैं अत: सुंदरकांड आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं आधिदैविक सभी दृष्टियों से बड़ा ही मनोहारी कांड है। सुंदरकांड के पाठ को अमोघ अनुष्ठान माना जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि सुंदरकांड के पाठ करने से दरिद्रता एवं दुःखों का दहन, अमंगलों, संकटों का निवारण तथा गृहस्थ जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है। पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए भगवान में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना आवश्यक है।

!! जय श्री राम !!
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
!! जय श्री राम!! 🙏 जय श्री राम 🙏

मधुस्मिता रावत

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जय श्री राम 🙏🏼

रामायण कथा संपूर्ण सुन्दरकाण्ड: हनुमान का सागर पार करना, हनुमान जी ने समुद्र कैसे पार किया, हनुमान जी की लंका यात्रा, हनुमान जी का लंका में प्रवेश, कौन सी राक्षसी लंका के समीप समुद्र में रहती थी आदि…..

नुमान जी ने समुद्र कैसे पार किया, हनुमान जी की लंका यात्रा
बड़े बड़े गजराजों से भरे हुए महेन्द्र पर्वत के समतल प्रदेश में खड़े हुए हनुमान जी वहाँ जलाशय में स्थित हुए विशालकाय हाथी के समान जान पड़ते थे। सूर्य, इन्द्र, पवन, ब्रह्मा आदि देवों को प्रणाम कर हनुमान जी ने समुद्र लंघन का दृढ़ निश्चय कर लिया और अपने शरीर को असीमित रूप से बढ़ा लिया। उस समय वे अग्नि के समान जान पड़ते थे।

उन्होंने अपने साथी वानरों से कहा, हे मित्रों! जैसे श्री रामचन्द्र जी का छोड़ा हुआ बाण वायुवेग से चलता है वैसे ही तीव्र गति से मैं लंका में जाउँगा और वहाँ पहुँच कर सीता जी की खोज करूँगा। यदि वहाँ भी उनका पता न चला तो रावण को बाँध कर रामचन्द्र जी के चरणों में लाकर पटक दूँगा। आप विश्वास रखें कि मैं सर्वथा कृतकृत्य होकर ही सीता के साथ लौटूँगा अन्यथा रावण सहित लंकापुर को ही उखाड़ कर लाउँगा।

इतना कह कर हनुमान आकाश में उछले और अत्यन्त तीव्र गति से लंका की ओर चले। उनके उड़ते ही उनके झटके से साल आदि अनेक वृक्ष पृथ्वी से उखड़ गये और वे भी उनके साथ उड़ने लगे। फिर थोड़ी दूर तक उड़ने के पश्चात् वे वृक्ष एक-एक कर के समुद्र में गिरने लगे। वृक्षों से पृथक हो कर सागर में गिरने वाले नाना प्रकार के पुष्प ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो शरद ऋतु के नक्षत्र जल की लहरों के साथ अठखेलियाँ कर रहे हों। तीव्र गति से उड़ते हुए महाकपि पवनसुत ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे कि वे महासागर एवं अनन्त आकाश का आचमन करते हुये उड़े जा रहे हैं। तेज से जाज्वल्यमान उनके नेत्र हिमालय पर्वत पर लगे हुये दो दावानलों का भ्रम उत्पन्न करते थे।

कुछ दर्शकों को ऐसा लग रहा था कि आकाश में तेजस्वी सूर्य और चन्द्र दोनों एक साथ जलनिधि को प्रकाशित कर रहे हों। उनका लाल कटि प्रदेश पर्वत के वक्षस्थल पर किसी गेरू के खान का भ्रम पैदा कर रहा था। हनुमान के बगल से जो तेज आँधी भारी स्वर करती हुई निकली थी वह घनघोर वर्षाकाल की मेघों की गर्जना सी प्रतीत होती थी। आकाश में उड़ते हये उनके विशाल शरीर का प्रतिबम्ब समुद्र पर पड़ता था तो वह उसकी लहरों के साथ मिल कर ऐसा भ्रम उत्पन्न करता था जैसे सागर के वक्ष पर कोई नौका तैरती चली जा रही हो। इस प्रकार हनुमान निरन्तर आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़े जा रहे थे।

हनुमान के अद्भुत बल और पराक्रम की परीक्षा करने के लिये देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने नागमाता सुरसा के पास जा कर कहा, हे नागमाता! तुम जा कर वायुपुत्र हनुमान की यात्रा में विघ्न डाल कर उनकी परीक्षा लो कि वे लंका में जा कर रामचन्द्र का कार्य सफलता पूर्वक कर पायेंगे या नहीं। ऋषियों के मर्म को समझ कर सुरसा विशालकाय राक्षसनी का रूप धारण कर के समुद्र के मध्य में जा कर खड़ी हो गई और उसने अपने रूप को अत्यन्त विकृत बना लिया। हनुमान को अपने सम्मुख पा कर वह बोली, आज मैं तुम्हें अपना आहार बना कर अपनी क्षुधा को शान्त करूँगी।

मैं चाहती हूँ, तुम स्वयं मेरे मुख में प्रवेश करो ताकि मुझे तुम्हें खाने के लिये प्रयत्न न करना पड़े। सुरसा के शब्दों को सुन कर हनुमान बोले, तुम्हारी इच्छा पूरी करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु इस समय मैं अयोध्या के राजकुमार रामचन्द्र जी के कार्य से जा रहा हूँ। उनकी पत्नी को रावण चुरा कर लंका ले गया है। मैं उनकी खोज करने के लिये जा रहा हूँ तुम भी राम के राज्य में रहती हो, इसलिये इस कार्य में मेरी सहायता करना तुम्हारा कर्तव्य है। लंका से मैं जब अपना कार्य सिद्ध कर के लौटूँगा, तब अवश्य तुम्हारे मुख में प्रवेश करूँगा। यह मैं तुम्हें वचन देता हूँ।

हनुमान की प्रतिज्ञा पर ध्यान न देते हुये सुरसा बोली, जब तक तुम मेरे मुख में प्रवेश न करोगे, मैं तुम्हारे मार्ग से नहीं हटूँगी। यह सुन कर हनुमान बोले, अच्छा तुम अपने मुख को अधिक से अधिक खोल कर मुझे निगल लो। मैं तुम्हारे मुख में प्रवेश करने को तैयार हूँ। यह कह कर महाबली हनुमान ने योगशक्ति से अपने शरीर का आकार बढ़ा कर चालीस कोस का कर लिया। सुरसा भी अपू्र्व शक्तियों से सम्पन्न थी। उसने तत्काल अपना मुख अस्सी कोस तक फैला लियाा हनुमान ने अपना शरीर एक अँगूठे के समान छोटा कर लिया और तत्काल उसके मुख में घुस कर बाहर निकल आये। फिर बोले, अच्छा सुरसा, तुम्हारी इच्छा पूरी हुई अब मैं जाता हूँ। प्रणाम! इतना कह कर हनुमान आकाश में उड़ गये।

पवनसुत थोड़ी ही दूर गये थे कि सिंहिका नामक राक्षसनी की उन पर दृष्टि पड़ी। वह हनुमान को खाने के लिये लालयित हो उठी। वह छाया ग्रहण विद्या में पारंगत थी। जिस किसी प्राणी की छाया पकड़ लेती थी, वह उसके बन्धन में बँधा चला आता था। जब उसने हनुमान की छाया को पकड़ लिया तो हनुमान की गति अवरुद्ध हो गई। उन्होंने आश्चर्य से सिंहिका की ओर देखा। वे समझ गये, सुग्रीव ने जिस अद्भुत छायाग्राही प्राणी की बात कही थे, सम्भवतः यह वही है। यह सोच कर उन्होंने योगबल से अपने शरीर का विस्तार मेघ के समान अत्यन्त विशाल कर लिया। सिंहिंका ने भी अपना मुख तत्काल आकाश से पाताल तक फैला लिया और गरजती हई उनकी ओर दौड़ी। यह देख कर हनुमान अत्यन्त लघु रूप धारण करके उसके मुख में जा गिरे और अपने तीक्ष्ण नाखूनों से उसके मर्मस्थलों को फाड़ डाला।इसके पश्चात् बड़ी फुर्ती से बाहर निकल कर आकाश की ओर उड़ चले। राक्षसनी क्षत-विक्षत हो कर समुद्र में गिर पड़ी और मर गई।

हनुमान जी का लंका में प्रवेश – सुन्दरकाण्ड
चार सौ योजन अलंघनीय समुद्र को लाँघ कर महाबली हनुमान जी त्रिकूट नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भाव से खड़े हो गये। कपिश्रेष्ठ ने वहाँ सरल (चीड़), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल (चिरौंजी), मुचुलिन्द (जम्बीरी नीबू), कुटज, केतक (केवड़े), सुगन्धपूर्ण प्रियंगु (पिप्पली), नीप (कदम्ब या अशोक), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे। फूलों के भार से लदे हुए तथा मुकुलित (अधखिले), बहुत से वृक्ष भी उन्हें दृष्टिगोचर हुए जिनकी डालियाँ झूम रही थीं और जिन पर नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे।

हनुमान जी धीरे धीरे अद्भुत शोभा से सम्पन्न रावणपालित लंकापुरी के पास पहुँचे। उन्होंने देखा, लंका के चारों ओर कमलों से सुशोभित जलपूरित खाई खुदी हुई है। वह महापुरी सोने की चहारदीवारी से घिरी हुई हैं। श्वेत रंग की ऊँची ऊँची सड़कें उस पुरी को सब ओर से घेरे हुए थीं। सैकड़ों गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ ध्वजा-पताका फहराती हुई उस नगरी की शोभा बढ़ा रही हैं।

उस पुरी के उत्तर द्वार पर पहुँच कर वानरवीर हुनमान जी चिन्ता में पड़ गये। लंकापुरी भयानक राक्षसों से उसी प्रकार भरी हुई थी जैसे कि पाताल की भोगवतीपुरी नागों से भरी रहती है। हाथों में शूल और पट्टिश लिये बड़ी बड़ी दाढ़ों वाले बहुत से शूरवीर घोर राक्षस लंकापुरी की रक्षा कर रहे थे। नगर की इस भारी सुरक्षा, उसके चारों ओर समुद्र की खाई और रावण जैसे भयंकर शत्रु को देखकर हनुमान जी विचार करने लगे कि यदि वानर वहाँ तक आ जायें तो भी वे व्यर्थ ही सिद्ध होंगे क्योंकि युद्ध द्वारा देवता भी लंका पर विजय नहीं पा सकते। रावणपालित इस दुर्गम और विषम (संकटपूर्ण) लंका में महाबाहु रामचन्द्र आ भी जायें तो क्या कर पायेंगे? राक्षसों पर साम, दान और भेद की नीति का प्रयोग असम्भव दृष्टिगत हो रहा है। यहाँ तो केवल चार वेगशाली वानरों अर्थात् बालिपुत्र अंगद, नील, मेरी और बुद्धिमान राजा सुग्रीव की ही पहुँच हो सकती है। अच्छा पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेहकुमारी सीता जीवित भी है या नहीं? जनककिशोरी का दर्शन करने के पश्चात् ही मैँ इस विषय में कोई विचार करूँगा।

उन्होंने सोचा कि मैं इस रूप से राक्षसों की इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि बहुत से क्रूर और बलवान राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं। जानकी की खोज करते समय मुझे स्वयं को इन महातेजस्वी, महापराक्रमी और बलवान राक्षसों से गुप्त रखना होगा। अतः मुझे रात्रि के समय ही नगर में प्रवेश करना चाहिये और सीता का अन्वेषण का यह समयोचित कार्य करने के लिये ऐसे रूप का आश्रय लेना चाहिये जो आँख से देखा न जा सके, मात्र कार्य से ही यह अनुमान हो कि कोई आया था।

देवताओं और असुरों के लिये भी दुर्जय लंकापुरी को देखकर हनुमान जी बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुये विचार करने लगे कि किस उपाय से काम लूँ जिसमें दुरात्मा राक्षसराज रावण की दृष्टि से ओझल रहकर मैं मिथिलेशनन्दिनी जनककिशोरी सीता का दर्शन प्राप्त कर सकूँ। अविवेकपूर्ण कार्य करनेवाले दूत के कारण बने बनाये काम भी बिगड़ जाते हैं। यदि राक्षसों ने मुझे देख लिया तो रावण का अनर्थ चाहने वाले श्री राम का यह कार्य सफल न हो सकेगा। अतः अपने कार्य की सिद्धि के लिये रात में अपने इसी रूप में छोटा सा शरीर धारण करके लंका में प्रवेश करूँगा और घरों में घुसकर जानकी जी की खोज करूँगा।ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे। सूर्यास्त हो जाने पर रात के समय उन्होंने अपने शरीर को छोटा बना लिया और उछलकर उस रमणीय लंकापुरी में प्रवेश कर गये।

!! जय श्री राम !!
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
!! जय श्री राम!!

मधुस्मिता रावत

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सुमति
एक बार किसी ने तुलसी दास जी से पूछा — महाराज !
सम्पूर्ण रामायण का सार क्या है ? क्या कोई चौपाई ऐसी है जिसे हम सम्पूर्ण रामायण का सार कह सकते हैं ? तुलसी दास जी ने कहा — हाँ है, और वह है।

जहां सुमति तह सम्पत्ति नाना
जहां कुमति तहँ विपत्ति आना

जहां सुमति होती है, वहां हर प्रकार की सम्पत्ति, सुख–
सुविधाएं होती हैं और जहां कुमति होती है, वहां विपत्ति, दुःख और कष्ट पीछा नहीं छोड़ते। सुमति थी अयोध्या में। भाई-भाई में प्रेम था, पिता और पुत्र में प्रेम था, राजा-प्रजा में प्रेम था, सास-बहू में प्रेम था और मालिक-सेवक में प्रेम था, तो उजड़ी हुई अयोध्या फिर से बस गई । कुमति थी लंका में। एक भाई ने दूसरे भाई को लात मारकर निकाल दिया। कुमति और अनीति के कारण सोने की लंका राख का ढेर हो गई। गुरु वाणी में आता है।

इक लख पूत सवा लख नाती
ता रावण घर दीया ना बाती

पाँच पाण्डवों में सुमति थी, तो उन पर कितनी विपदाएं आई, लेकिन अंत में विजय उनकी ही हुई और हस्तिनापुर में उनका राज्य हुआ। कौरवों में कुमति थी,
अनीति थी, अनाचार था, अधर्म था, तो उनकी पराजय हुई और सारे भाई मारे गए।
यदि जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो जीवन में सुमति अपनाओ।

!! जय श्री राम !!
!! जय श्री राम !!

🚩जय श्री सीताराम जी की 🚩

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जानिए रामचरित मानस में कितनी बार हुआ है “राम” शब्द का प्रयोग?????
गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस 36,000 शाब्दिक प्रयोगों के साथ 2796 भाषाओं में सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ पर जापान के तेस्सी से लेकर देश के हजारों विद्वानों ने न केवल शोध किया है। बल्कि अपने इसी अनुसंधान के द्वारा कई रोचक तथ्य भी सामने लाए हैं।
जिनके बारे में लोग जानने को हमेसा उत्सुक रहते हैं। तो आइए हम आपको रामचरित मानस से संबंधित कुछ ऐसे रोचक तथ्य बताते हैं, जिन्हें जानकर आप हैरान हुए बिना नहीं रह सकते हैं।
जानिए ये रोचक तथ्य…..
1-मानस में राम शब्द- 1443 बार आया है।
2-मानस में सीता शब्द- 147 बार।
3-मानस में जानकी शब्द- 69 बार।
4-मानस में बैदेही शब्द- 51 बार आया है।
5-मानस में बड़भागी शब्द- 51 बार आया है।
6-मानस में कोटि शब्द-125 बार आय़ा है।
7-मानस में एक शब्द-18 बार आया है।
8-मानस में मंदिर शब्द-35 बार आया है।
9-मानस में मरम शब्द-40 बार आया है।
10-भगवान राम लंका में रहे- 111 दिन।
11-लंका में सीता जी रही- 435 दिन।
12-मानस में श्लोक संख्या- 27.
13-मानस में चौपाई संख्या- 4608.
14-मानस में दोहा संख्या- 1074.
15- मानस में सोरठा संख्या- 207
16-मानस में छंद संख्या- 86.
17-सुग्रीव में बल था-10,000 हाथियों का।
18-सीता रानी बनी- 33 वर्ष की उम्र में।
19-मानस रचना के वक्त तुलसीदास की उम्र-77वर्ष।
20-पुष्पक विमान की चाल- 400मील/घंटा।
21-राम दल और रावण दल के बीच चले युद्ध के दिन-87
22-राम और रावण के बीच युद्ध चला-32 दिन।
23-सेतु निर्माण हुआ- 5 दिन में।
24-नल-नील के पिता का नाम- विश्वकर्मा के पुत्र।
25-विश्वामित्र राम को अपने पास ले गए-10 वर्ष की उम्र में।
स्त्रोत- रामचरित मानस

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रामायण

रामायण क्या है??

अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना…….

रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ… 😊

एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी।
नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ?

मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं ।
माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया |

श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं

माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ?
क्या नींद नहीं आ रही ?

शत्रुघ्न कहाँ है ?

श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी,
गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।

उफ !
कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया ।

तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए ।
आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी,
माँ चली ।

आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?

अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !!

माँ सिराहने बैठ गईं,
बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं,

माँ !

उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ?
मुझे बुलवा लिया होता ।

माँ ने कहा,
शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?”

शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए,
भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?

माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।

देखो क्या है ये रामकथा…

यह भोग की नहीं….
त्याग की कथा हैं, यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा… चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।

“रामायण” जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।

भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया।
परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते!
माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की..
परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी,
परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!!
क्या बोलूँगा उनसे!

यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- “आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ।
मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।”

लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था।
परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया।
वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!

लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया।
वन में प्रभु श्री राम माता सीता की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया।

मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं।

तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं।

यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे।
माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है।
मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं।
माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं?
क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?

हनुमान जी पूछते हैं- देवी!
आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा।

उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।
उर्मिला बोलीं- “
मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता।
आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं।
जो योगेश्वर प्रभु श्री राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता।
यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं।
मेरे पति जब से वन गये हैं,
तबसे सोये नहीं हैं।
उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे। और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो प्रभु श्री राम जी को लगी है।
मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में ही सिर्फ राम हैं, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा।
इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।”

राम राज्य की नींव जनक जी की बेटियां ही थीं…
कभी सीता तो कभी उर्मिला। भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया
परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया |

जिस मनुष्य में प्रेम, त्याग, समर्पण की भावना हो उस मनुष्य में राम हि बसता है…
कभी समय मिले तो अपने वेद, पुराण, गीता, रामायण को पढ़ने और समझने का प्रयास कीजिएगा | जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने और जीने का सऊर मिलेगा |

“लक्ष्मण सा भाई हो, कौशल्या माई हो,
स्वामी तुम जैसा, मेरा रघुराइ हो..
नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो,
चरण हो राघव के, जहाँ मेरा ठिकाना हो..
हो त्याग भरत जैसा, सीता सी नारी हो,
लव कुश के जैसी, संतान हमारी हो..
श्रद्धा हो श्रवण जैसी, सबरी सी भक्ति हो,
हनुमत के जैसी, निष्ठा और शक्ति हो… “

वाह क्या खूब गाया है…

🚩🙏🏻जय जय श्री राम🙏🚩

गौरव गुप्ता

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अफ्रीका का रामायण ओर राम से सम्बन्ध
अफ्रीका का एक देश इजिप्ट नाम से जाना जाता है, यह नाम अजपति राम के नाम पर पड़ा हुआ है । प्रभु श्री के कई नामो में एक अन्य नाम अजपति भी था । उसी अजपति का अपभ्रंश इजिप्ट होकर रह गया ।
अफ्रीका के सारे लोग Cushiets ( कुशाइत ) कहे जाते है । इसका अर्थ यही है वे प्रभु श्री राम के पुत्र कुश के प्रजाजन ही है । अफ्रीका में राम की ख्याति इसलिए फैली, क्यो की अफ्रीका खण्ड रावण के कब्जे में था । रावण के भाईबंद माली – सुमाली के नाम से अफ्रीका में दो देश आज भी है ही ।
रामायण में जिक्र है लोहित सागर का , आपने कभी गौर किया कि वो लोहित सागर था, तो अब कहाँ है ? लंका की शोध में जब वानर उड़ान भरते थे, तब लोहित सागर का उल्लेख आता है । वह लोहित सागर अफ्रीका खण्ड के करीब ही है । जिसे आज RED SEA के नाम से जाना जाता है । हो सकता है कि वह पिरामिड रामायण कालीन दैत्यों के मरुस्थल स्तिथ किले या महल रहे हो , वे जीते जाने के बाद उनके आगे राम विजय के चिन्ह के रूप में रामसिंह के The sphinx नाम की प्रतिमा बना दी गयी हो ।
अफ्रीका में केन्या नाम का देश है, हो सकता है वहां ” कन्या ” नाम की कोई देवी रही हो , ओर उसकी पूजा की जाती हो । कन्या से ही केन्या बना है । और कन्या तो संस्कृत शब्द ही है ।
अफ्रीका के हिन्दू नगर
दारेसलाम नाम का जो सागर तट पर प्रमुख नगर अफ्रीका में है, वह स्पष्ठतया द्वारेशाल्यम ( द्वार-इशालायं ) संस्कृत नाम है । उसका अभिप्राय यह है कि उस नगर में कोई विशाल शिव मंदिर , विष्णु मंदिर या गणेश मंदिर रहा हो ।
अफ्रीका के एक प्रदेश का नाम रोडेशिया है । एक RHODES नाम का प्रदेश भी है । Sir Cecil Rhodes नाम के एक अंग्रेज के कारण रोडेशिया आदि नाम प्रचलित हुआ, यह सामान्य धारणा है । किन्तु होड्स होडेशिया आदि हम “हत ” यानि ह्रदय यानी heartland अर्थात ह्रदय प्रदेश या हार्दिक प्रदेश इसका मूल संस्कृत नाम है ।
Sir Cecil का मूलतः श्री शुशील नाम है । ताँगानिका नाम का एक अफ्रीकी प्रदेश है , जो तुंगनायक यानि श्रेष्ठ नेता इसका अपभ्रंस है ।द्वारेशलम उसी प्रदेश में आता है ।
मॉरीशस –
अफ्रीका के पूर्ववर्ती किनारे के पास मारिशश द्वीप है । राम के बाण उर्फ रॉकेट ने मारीच को वहां ही गिराया था । अतः उस द्वीप का नाम मासिशश पड़ा । या यह हो सकता है, की मारीच ने राम के भय से वहां शरण ली हो, इस कारण उस द्वीप का नाम मॉरीशस पड़ा हो । कुश के पिता हाम ( Ham ) थे , ऐसा इथोयोपिया की पुस्तकों में लिखा है । हां … हीं आदि संस्कृत में भगवान के रूप बीजाक्षर है । इसी कारण राम का नाम वहां हाम पड़ गया ।
अफ्रीका की नील गंगा/ सरस्वती
अफ्रीका के इजिप्ट में जो नील ( इसका उच्चार नाइल किया जाता है ) नदी है, उसे दुनिया की सबसे प्रमुख नदी में गिना जाता है । प्राचीन वैदिक परंपरा के अनुसार वह बड़ी पवित्र भी मानी गयी है । नील विश्लेषण दैवीय गुणों का धोतक है । नील नदी का उद्गम कहा से है, इसका पता ही यूरोपीय लोग नही लगा सके । लेकिन अंत मे प्राचीन संस्कृत पुराणों से यह समश्या हल हुई । भारत मे ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जब यहां पुराणों का अध्यनन करवाया तो पुराणों में नील सरिता नदी का उल्लेख था, जिसका चंद्रगिरि की पहाड़ियों से उद्गम था । पुराणों में दिए भौगोलिक नक्शे के अनुसार यह सच साबित हुआ, ओर नील नदी का उद्गम मिल भी गया । किंतने आश्चर्य की बात है, की जहां देखो वहां भारतीयों का इतिहास मिलता है ।
अफ्रीका मूल रूप से हिन्दू राष्ट्र ही था । आज भी Kenya ( कन्या ) दारेसलाम ( द्वारेशलम ) Rhodesia ( रुद्रदेश) Nile ( नील) , इजिप्ट ( अजपति ) Cairo ( कौरव ) अल-अक्षर ( यानि अल-ईश्वर ) विश्वविद्यालय आदि हिन्दू संस्कृत नाम अफ्रीका खण्ड से जुड़े हुए है ।

साभार : वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास

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हनुमान जी की कथा

श्रीराम हाथ जोड़कर अगस्त्य मुनि से बोले, “ऋषिवर! निःसन्देह वालि और रावण दोनों ही भारी बलवान थे, परन्तु मेरा विचार है कि हनुमान उन दोनों से अधिक बलवान हैं। इनमें शूरवीरता, बल, धैर्य, नीति, सद्गुण सभी उनसे अधिक हैं। यदि मुझे ये न मिलते तो भला क्या जानकी का पता लग सकता था? मेरे समझ में यह नहीं आया कि जब वालि और सुग्रीव में झगड़ा हुआ तो इन्होंने अपने मित्र सुग्रीव की सहायता करके वालि को क्यों नहीं मार डाला। आप कृपा करके हनुमानजी के बारे में मुझे सब कुछ बताइये।”

रघुनाथजी के वचन सुनकर महर्षि अगस्त्य बोले, “हे रघुनन्दन! आप ठीक कहते हैं। हनुमान अद्भुत बलवान, पराक्रमी और सद्गुण सम्पन्न हैं, परन्तु ऋषियों के शाप के कारण इन्हें अपने बल का पता नहीं था। मैं आपको इनके विषय में सब कुछ बताता हूँ। इनके पिता केसरी सुमेरु पर्वत पर राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम अंजना था। इनके जन्म के पश्चात् एक दिन इनकी माता फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिये आकाश में उड़ने लगे। उनकी सहायता के लिये पवन भी बहुत तेजी से चला। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की कि देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज जब अमावस्या के दिन मैं सूर्य को ग्रस्त करने के लिये गया तो मैंने देखा कि एक दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।

“राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और राहु को साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमान जी सूर्य को छोड़कर राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमान जी के ऊपर वज्र का प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर जा गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक ली। इससे कोई भी प्राणी साँस न ले सका और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मृत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने उन्हें जीवित कर दिया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सब प्राणियों की पीड़ा दूर की। चूँकि इन्द्र के वज्र से हनुमान जी की हनु (ठुड्डी) टूट गई थी, इसलिये तब से उनका नाम हनुमान हो गया। फिर प्रसन्न होकर सूर्य ने हनुमान को अपने तेज का सौंवा भाग दिया। वरुण, यम, कुबेर, विश्वकर्मा आदि ने उन्हें अजेय पराक्रमी, अवध्य होने, नाना रूप धारण करने की क्षमता आदि के वर दिया। इस प्रकार नाना शक्तियों से सम्पन्न हो जाने पर निर्भय होकर वे ऋषि-मुनियों के साथ शरारत करने लगे। किसी के वल्कल फाड़ देते, किसी की कोई वस्तु नष्ट कर देते। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने इन्हें शाप दिया कि तुम अपने बल और शक्ति को भूल जाओगे। किसी के याद दिलाने पर ही तुम्हें उनका ज्ञान होगा। तब से उन्हें अपने बल और शक्ति का स्मरण नहीं रहा। वालि और सुग्रीव के पिता ऋक्षराज थे। चिरकाल तक राज्य करने के पश्चात् जब ऋक्षराज का देहान्त हुआ तो वालि राजा बना। वालि और सुग्रीव में बचपन से ही प्रेम था। जब उन दोनों में बैर हुआ तो सुग्रीव के सहायक होते हुये भी शाप के कारण हनुमान अपने बल से अनजान बने रहे।”

हनुमान के जीवन की यह कथा सुनकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ।

जब अगस्त्य तथा अन्य मुनि अयोध्या से विदा होकर जाने लगे तो श्रीराम ने उनसे कहा, “मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियों को अपने-अपने कार्यों में लगाकर मैं यज्ञों का अनुष्ठान करूँ। आपसे प्रार्थना है कि आप सब उन यज्ञों में अवश्य पधारकर भाग लेने की कृपा करें।”

सब ऋषियों ने उसमें भाग लेने की अपनी स्वीकृति प्रदान की। फिर वे वहाँ से विदा होकर अपने-अपने आश्रम को चले गये।

!! जय श्री राम !!
स्वर्ग में देवता भी उनका अभिनंदन करते हैं
जो हर पल हनुमान जी का वंदन करते है !
जय श्री राम प्रातः वंदन आदर-सत्कार अभिनंदन प्यारे भैया

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सन 1558 में अमृतसर में पवित्र स्वर्ण मंदिर बनने जा रहा था ..लाहौर के एक साईं मियां मीर नामक मुस्लिम को यह बात पता चली… वह लाहौर से ननकाना साहिब यानी गुरु गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान की मिट्टी लेकर पैदल चलकर आया और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के नींव में डाल दिया

आजादी के बाद जब जवाहरलाल नेहरू ने इतिहास को लिखने का काम वामपंथियों को सौंपा तब वामपंथियों ने यह लिख दिया स्वर्ण मंदिर की नींव एक मुस्लिम साईं मियां मीर ने रखी थी और आज इतिहास की किताबों में यही पढ़ाया जाता है कि स्वर्ण मंदिर की नींव साईं मियां मीर ने रखी थी

अब यह फैज खान जो भगवान राम के ननिहाल से मिट्टी लेकर निकला है यदि उसने यही काम राम मंदिर में किया तब भगवान ना करें यदि इस देश पर फिर से कांग्रेसी कुत्तों का शासन होगा तब कांग्रेसी कुत्ते वामपंथी इतिहासकारों के माध्यम से आज के सौ दो सौ साल बाद आने वाली पीढ़ियों को यही पढ़ाएंगे कि अयोध्या में भगवान श्री राम के मंदिर की नींव एक मुस्लिम फैज खान ने रखी थी

मुझे आश्चर्य होता है कि यदि फैज खान को सनातन धर्म से इतना प्यार है तब वह अलतकिया क्यों कर रहे हैं वह इस्लाम छोड़कर हिंदू धर्म क्यों नहीं स्वीकार कर लेते

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पहाड़ी को छूने पर रिसता है जल : पत्थर पर बने पदचिन्ह रामायण


पहाड़ी को छूने पर रिसता है जल : पत्थर पर बने पदचिन्ह रामायण कालीन*****************************************************************************झारखंड की राजधानी रांची से 20 किलोमीटर दूर स्थित है एडचोरो। यहां की पहाड़ी पर महादेव का एक मंदिर बना हुआ है जिसे लादा महादेव टंगरा के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर दो कारणों से भक्तों की आस्था का केंद्र है।^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^पहला कारण मंदिर परिसर में एक चट्टान स्थित है। ऐसी मान्यता है की अगर सच्चे दिल से महादेव टंगरा की चट्टान पर हाथ फेरा जाये तो यहां से जल का रिसाव होने लगता है और आपकी मांगी हुई हर मुराद पूरी होती है।~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~दूसरा कारण यहां एक पत्थर पर बने हुए पदचिन्ह जो की रामायण कालीन… जाते है। ऐसा माना जाता है की यहां पर राम और सीता अपने वनवास के दौरान आए थे और ये पद चिन्ह उनके ही है। भक्त लोग इन पद चिन्हों को छूकर भी मुरादे मांगते है। ये परम्पराए यहां पर सदियों से चली आ रही है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचते है। इसके अलावा यहां पर राम नवमी, शिवरात्रि और सावन में भक्तों का हुजूम उमड़ता है।

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Yantrodharaka Hanuman idol was installed by sriVyasarajteerth, rajguru of Vijaya Nagar king srikrishnadevaraya 1509-1529. It is located near by bank of the Tungabhadra river and 2 km away from Virupaksha temple, Hampi. According to most of the historians,
1) This temple is said to be the place where SriRam & Hanuman had met for the first time during Ramayan period.
2) Among the 732 Hanuman idol installation, this is the first installation.
3) A portion of Tungabhadra river which flows in this divine land is known as ‘Chakrateertha’.