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अफ्रीका का रामायण ओर राम से सम्बन्ध
अफ्रीका का एक देश इजिप्ट नाम से जाना जाता है, यह नाम अजपति राम के नाम पर पड़ा हुआ है । प्रभु श्री के कई नामो में एक अन्य नाम अजपति भी था । उसी अजपति का अपभ्रंश इजिप्ट होकर रह गया ।
अफ्रीका के सारे लोग Cushiets ( कुशाइत ) कहे जाते है । इसका अर्थ यही है वे प्रभु श्री राम के पुत्र कुश के प्रजाजन ही है । अफ्रीका में राम की ख्याति इसलिए फैली, क्यो की अफ्रीका खण्ड रावण के कब्जे में था । रावण के भाईबंद माली – सुमाली के नाम से अफ्रीका में दो देश आज भी है ही ।
रामायण में जिक्र है लोहित सागर का , आपने कभी गौर किया कि वो लोहित सागर था, तो अब कहाँ है ? लंका की शोध में जब वानर उड़ान भरते थे, तब लोहित सागर का उल्लेख आता है । वह लोहित सागर अफ्रीका खण्ड के करीब ही है । जिसे आज RED SEA के नाम से जाना जाता है । हो सकता है कि वह पिरामिड रामायण कालीन दैत्यों के मरुस्थल स्तिथ किले या महल रहे हो , वे जीते जाने के बाद उनके आगे राम विजय के चिन्ह के रूप में रामसिंह के The sphinx नाम की प्रतिमा बना दी गयी हो ।
अफ्रीका में केन्या नाम का देश है, हो सकता है वहां ” कन्या ” नाम की कोई देवी रही हो , ओर उसकी पूजा की जाती हो । कन्या से ही केन्या बना है । और कन्या तो संस्कृत शब्द ही है ।
अफ्रीका के हिन्दू नगर
दारेसलाम नाम का जो सागर तट पर प्रमुख नगर अफ्रीका में है, वह स्पष्ठतया द्वारेशाल्यम ( द्वार-इशालायं ) संस्कृत नाम है । उसका अभिप्राय यह है कि उस नगर में कोई विशाल शिव मंदिर , विष्णु मंदिर या गणेश मंदिर रहा हो ।
अफ्रीका के एक प्रदेश का नाम रोडेशिया है । एक RHODES नाम का प्रदेश भी है । Sir Cecil Rhodes नाम के एक अंग्रेज के कारण रोडेशिया आदि नाम प्रचलित हुआ, यह सामान्य धारणा है । किन्तु होड्स होडेशिया आदि हम “हत ” यानि ह्रदय यानी heartland अर्थात ह्रदय प्रदेश या हार्दिक प्रदेश इसका मूल संस्कृत नाम है ।
Sir Cecil का मूलतः श्री शुशील नाम है । ताँगानिका नाम का एक अफ्रीकी प्रदेश है , जो तुंगनायक यानि श्रेष्ठ नेता इसका अपभ्रंस है ।द्वारेशलम उसी प्रदेश में आता है ।
मॉरीशस –
अफ्रीका के पूर्ववर्ती किनारे के पास मारिशश द्वीप है । राम के बाण उर्फ रॉकेट ने मारीच को वहां ही गिराया था । अतः उस द्वीप का नाम मासिशश पड़ा । या यह हो सकता है, की मारीच ने राम के भय से वहां शरण ली हो, इस कारण उस द्वीप का नाम मॉरीशस पड़ा हो । कुश के पिता हाम ( Ham ) थे , ऐसा इथोयोपिया की पुस्तकों में लिखा है । हां … हीं आदि संस्कृत में भगवान के रूप बीजाक्षर है । इसी कारण राम का नाम वहां हाम पड़ गया ।
अफ्रीका की नील गंगा/ सरस्वती
अफ्रीका के इजिप्ट में जो नील ( इसका उच्चार नाइल किया जाता है ) नदी है, उसे दुनिया की सबसे प्रमुख नदी में गिना जाता है । प्राचीन वैदिक परंपरा के अनुसार वह बड़ी पवित्र भी मानी गयी है । नील विश्लेषण दैवीय गुणों का धोतक है । नील नदी का उद्गम कहा से है, इसका पता ही यूरोपीय लोग नही लगा सके । लेकिन अंत मे प्राचीन संस्कृत पुराणों से यह समश्या हल हुई । भारत मे ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जब यहां पुराणों का अध्यनन करवाया तो पुराणों में नील सरिता नदी का उल्लेख था, जिसका चंद्रगिरि की पहाड़ियों से उद्गम था । पुराणों में दिए भौगोलिक नक्शे के अनुसार यह सच साबित हुआ, ओर नील नदी का उद्गम मिल भी गया । किंतने आश्चर्य की बात है, की जहां देखो वहां भारतीयों का इतिहास मिलता है ।
अफ्रीका मूल रूप से हिन्दू राष्ट्र ही था । आज भी Kenya ( कन्या ) दारेसलाम ( द्वारेशलम ) Rhodesia ( रुद्रदेश) Nile ( नील) , इजिप्ट ( अजपति ) Cairo ( कौरव ) अल-अक्षर ( यानि अल-ईश्वर ) विश्वविद्यालय आदि हिन्दू संस्कृत नाम अफ्रीका खण्ड से जुड़े हुए है ।

साभार : वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास

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हनुमान जी की कथा

श्रीराम हाथ जोड़कर अगस्त्य मुनि से बोले, “ऋषिवर! निःसन्देह वालि और रावण दोनों ही भारी बलवान थे, परन्तु मेरा विचार है कि हनुमान उन दोनों से अधिक बलवान हैं। इनमें शूरवीरता, बल, धैर्य, नीति, सद्गुण सभी उनसे अधिक हैं। यदि मुझे ये न मिलते तो भला क्या जानकी का पता लग सकता था? मेरे समझ में यह नहीं आया कि जब वालि और सुग्रीव में झगड़ा हुआ तो इन्होंने अपने मित्र सुग्रीव की सहायता करके वालि को क्यों नहीं मार डाला। आप कृपा करके हनुमानजी के बारे में मुझे सब कुछ बताइये।”

रघुनाथजी के वचन सुनकर महर्षि अगस्त्य बोले, “हे रघुनन्दन! आप ठीक कहते हैं। हनुमान अद्भुत बलवान, पराक्रमी और सद्गुण सम्पन्न हैं, परन्तु ऋषियों के शाप के कारण इन्हें अपने बल का पता नहीं था। मैं आपको इनके विषय में सब कुछ बताता हूँ। इनके पिता केसरी सुमेरु पर्वत पर राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम अंजना था। इनके जन्म के पश्चात् एक दिन इनकी माता फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिये आकाश में उड़ने लगे। उनकी सहायता के लिये पवन भी बहुत तेजी से चला। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की कि देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज जब अमावस्या के दिन मैं सूर्य को ग्रस्त करने के लिये गया तो मैंने देखा कि एक दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।

“राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और राहु को साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमान जी सूर्य को छोड़कर राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमान जी के ऊपर वज्र का प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर जा गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक ली। इससे कोई भी प्राणी साँस न ले सका और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मृत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने उन्हें जीवित कर दिया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सब प्राणियों की पीड़ा दूर की। चूँकि इन्द्र के वज्र से हनुमान जी की हनु (ठुड्डी) टूट गई थी, इसलिये तब से उनका नाम हनुमान हो गया। फिर प्रसन्न होकर सूर्य ने हनुमान को अपने तेज का सौंवा भाग दिया। वरुण, यम, कुबेर, विश्वकर्मा आदि ने उन्हें अजेय पराक्रमी, अवध्य होने, नाना रूप धारण करने की क्षमता आदि के वर दिया। इस प्रकार नाना शक्तियों से सम्पन्न हो जाने पर निर्भय होकर वे ऋषि-मुनियों के साथ शरारत करने लगे। किसी के वल्कल फाड़ देते, किसी की कोई वस्तु नष्ट कर देते। इससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने इन्हें शाप दिया कि तुम अपने बल और शक्ति को भूल जाओगे। किसी के याद दिलाने पर ही तुम्हें उनका ज्ञान होगा। तब से उन्हें अपने बल और शक्ति का स्मरण नहीं रहा। वालि और सुग्रीव के पिता ऋक्षराज थे। चिरकाल तक राज्य करने के पश्चात् जब ऋक्षराज का देहान्त हुआ तो वालि राजा बना। वालि और सुग्रीव में बचपन से ही प्रेम था। जब उन दोनों में बैर हुआ तो सुग्रीव के सहायक होते हुये भी शाप के कारण हनुमान अपने बल से अनजान बने रहे।”

हनुमान के जीवन की यह कथा सुनकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ।

जब अगस्त्य तथा अन्य मुनि अयोध्या से विदा होकर जाने लगे तो श्रीराम ने उनसे कहा, “मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियों को अपने-अपने कार्यों में लगाकर मैं यज्ञों का अनुष्ठान करूँ। आपसे प्रार्थना है कि आप सब उन यज्ञों में अवश्य पधारकर भाग लेने की कृपा करें।”

सब ऋषियों ने उसमें भाग लेने की अपनी स्वीकृति प्रदान की। फिर वे वहाँ से विदा होकर अपने-अपने आश्रम को चले गये।

!! जय श्री राम !!
स्वर्ग में देवता भी उनका अभिनंदन करते हैं
जो हर पल हनुमान जी का वंदन करते है !
जय श्री राम प्रातः वंदन आदर-सत्कार अभिनंदन प्यारे भैया

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सन 1558 में अमृतसर में पवित्र स्वर्ण मंदिर बनने जा रहा था ..लाहौर के एक साईं मियां मीर नामक मुस्लिम को यह बात पता चली… वह लाहौर से ननकाना साहिब यानी गुरु गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान की मिट्टी लेकर पैदल चलकर आया और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के नींव में डाल दिया

आजादी के बाद जब जवाहरलाल नेहरू ने इतिहास को लिखने का काम वामपंथियों को सौंपा तब वामपंथियों ने यह लिख दिया स्वर्ण मंदिर की नींव एक मुस्लिम साईं मियां मीर ने रखी थी और आज इतिहास की किताबों में यही पढ़ाया जाता है कि स्वर्ण मंदिर की नींव साईं मियां मीर ने रखी थी

अब यह फैज खान जो भगवान राम के ननिहाल से मिट्टी लेकर निकला है यदि उसने यही काम राम मंदिर में किया तब भगवान ना करें यदि इस देश पर फिर से कांग्रेसी कुत्तों का शासन होगा तब कांग्रेसी कुत्ते वामपंथी इतिहासकारों के माध्यम से आज के सौ दो सौ साल बाद आने वाली पीढ़ियों को यही पढ़ाएंगे कि अयोध्या में भगवान श्री राम के मंदिर की नींव एक मुस्लिम फैज खान ने रखी थी

मुझे आश्चर्य होता है कि यदि फैज खान को सनातन धर्म से इतना प्यार है तब वह अलतकिया क्यों कर रहे हैं वह इस्लाम छोड़कर हिंदू धर्म क्यों नहीं स्वीकार कर लेते

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पहाड़ी को छूने पर रिसता है जल : पत्थर पर बने पदचिन्ह रामायण


पहाड़ी को छूने पर रिसता है जल : पत्थर पर बने पदचिन्ह रामायण कालीन*****************************************************************************झारखंड की राजधानी रांची से 20 किलोमीटर दूर स्थित है एडचोरो। यहां की पहाड़ी पर महादेव का एक मंदिर बना हुआ है जिसे लादा महादेव टंगरा के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर दो कारणों से भक्तों की आस्था का केंद्र है।^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^पहला कारण मंदिर परिसर में एक चट्टान स्थित है। ऐसी मान्यता है की अगर सच्चे दिल से महादेव टंगरा की चट्टान पर हाथ फेरा जाये तो यहां से जल का रिसाव होने लगता है और आपकी मांगी हुई हर मुराद पूरी होती है।~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~दूसरा कारण यहां एक पत्थर पर बने हुए पदचिन्ह जो की रामायण कालीन… जाते है। ऐसा माना जाता है की यहां पर राम और सीता अपने वनवास के दौरान आए थे और ये पद चिन्ह उनके ही है। भक्त लोग इन पद चिन्हों को छूकर भी मुरादे मांगते है। ये परम्पराए यहां पर सदियों से चली आ रही है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में लोग पहुंचते है। इसके अलावा यहां पर राम नवमी, शिवरात्रि और सावन में भक्तों का हुजूम उमड़ता है।

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Yantrodharaka Hanuman idol was installed by sriVyasarajteerth, rajguru of Vijaya Nagar king srikrishnadevaraya 1509-1529. It is located near by bank of the Tungabhadra river and 2 km away from Virupaksha temple, Hampi. According to most of the historians,
1) This temple is said to be the place where SriRam & Hanuman had met for the first time during Ramayan period.
2) Among the 732 Hanuman idol installation, this is the first installation.
3) A portion of Tungabhadra river which flows in this divine land is known as ‘Chakrateertha’.

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ही #लोग भूल गए होंलेकिन #राम#जन्मभूमि का #केस लड़ने के लिए 2005 में उन्हे गोली मार दी गई थी और 1996 में 16 बार चाकू मारा गया था मगर वह बच गए क्योंकि उन्हें राम लल्ला ने #अपना केस लड़ने के लिए #चुना था .#जयश्रीराम🕉️🙏🚩

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भाग्य नगर के एक धर्मप्रेमी ने अयोध्या श्रीराम मंदिर के लिए सोने चांदी हीरे से युक्त रामजी को चरणपादुका समर्पित की😍बोलते रहिए जय श्रीराम

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🍁🍁जय श्री सीताराम जी 🍁🍁
🏵️🏵️🌴🌴🪴🪴🌴🌴🏵️🏵️ 🌻🌻श्री हनुमान जी का अवतरण🌻🌻 त्रेतायुग में एक केसरी नाम का असुर उत्पन्न हुआ। उसने पुत्र कामना से श्री शिवजी को प्रसन्न करने के लिए पञ्चाक्षर मंत्र का जप करते हुए जितेन्द्रिय और निराहार रहकर तप किया। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे दर्शन दिया और कहा -- 'तू अपने इच्छानुसार वर मांग ले।' तब केसरी ने कहा -- देवदेव! यदि आप संतुष्ट हैं और वर देना चाहते हैं तो मैं एक ऐसा पुत्र चाहता हूं, जो बलवान, संग्राम में विजयी, महाधैर्यवान एवं महाबुद्धिमान भी हो। तब श्री शंकर जी बोले -- मैं तुझे पुत्र तो नहीं दे सकता। कारण, विधाता ने तुझे पुत्र सुख नहीं लिखा है, तथापि एक सुन्दरी कन्या दूँगा, जिससे तेरी इच्छा के अनुसार महान बलशाली पुत्र उत्पन्न होगा।' ऐसा कहकर श्री शंकर जी अंतर्ध्यान हो गए। वह असुर मनचाहा वर पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो गया। कुछ समय बाद उसके एक लोकविस्मयकारिणी कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम दैत्यराज ने अञ्जना रखा।वह कन्या शुक्लपक्ष में चंद्रकला की तरह बढ़ने लगी। पिता पुत्रवत् ही उस कन्या से प्रेम करता था। समय बीतता रहा, एक बार केसरी नामक वानर ने, जो बड़ा पराक्रमी एवं वानरों में श्रेष्ठ था, उस कन्या की याचना की। तब दैत्यराज ने बड़ी प्रसन्नता से उसे वह कन्या दे दी। केसरी इच्छानुसार रूप धारण करने वाली अंजना के साथ आनन्द से क्रीणा करने लगा। इस प्रकार बहुत समय बीत गया, पर अंजना के कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। एक बार धर्मदेवता पुल्कसी (वन्य नीचे स्त्री) का रूप धारण कर वहाँ आये। उनके एक हाथ में था बेंत तथा दूसरे हाथ में थी एक सुतली। वह स्त्री जोर-जोर से यह आवाज़ लगा रही थी कि 'किसी को अपने भाग्य के विषय में प्रश्न करना हो तो करें, उसके भाग्य में क्या है, मैं बता दूँगी।' इस प्रकार सबके हाथ की रेखाएं देखती और उन्हें फल बताती हुई वह अंजना के पास पहुँची। तब अंजना ने उसको सुंदर आसन देकर बैठाया और सुवर्णपात्र में मौक्तिक रूपी तण्डुल उसके सामने रखकर उसको सभी प्रकार से संतुष्ट करके पूछा -- ' देवि! मेरे भाग्य में पुत्र सुख है या नहीं? सत्य कहो। यदि मुझे एक बलवान पुत्र हो जायगा तो मैं तुम्हें तुम्हारे इच्छानुसार सब कुछ दूँगी।' तब वह पुल्कसी बोली --'तुझे बलवान पुत्र अवश्य प्राप्त होगा, यह मैं धर्म की शपथ खाकर कहती हूँ, तू चिन्ता मत कर। किन्तु मैं जैसा बताऊँ, उसी प्रकार तू नियमपूर्वक तप कर। श्री वेंकटाचलपर्वत पर सात हजार वर्ष तक तप करने से तुझे मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा।' ऐसा कहकर पुल्कसी जैसे आयी थी वैसे ही चली गई। अब अंजना उसके कथनानुसार वेंकटाद्रि पर आकाशगंगा के पास जाकर, जहाँ बहुत से सिद्ध महात्मा वास करते थे, केवल वायु भक्षण कर वायु देवता का ध्यान करती हुई दारुण तप करने लगी। कुछ दिनों बाद आकाशगंगा से यह आकाशवाणी हुई कि 'बेटी! तू चिन्ता मत कर, तेरा भाग्य खुल गया। रावण नाम का राक्षस बड़ा दुष्ट हो कर सब लोगों को रुलायेगा, वह सबकी सुन्दर-सुन्दर स्त्रियों को हरण करके लायेगा। उसका नाश करने के लिए भगवान श्री हरिकुल में श्री राम रुप से अवतार लेंगे। उनकी सहायता करने के लिए बड़ा पराक्रमी, बलशाली, धैर्यवान, जितेन्द्रिय और अप्रमेय गुणवाला एक तुम्हारा पुत्र भी होगा। यह आकाशवाणी सुनकर अंजना परम प्रसन्न हुई। उसने यह सब वृतांत केसरी को बतलाया। वह भी अत्यन्त प्रसन्न होकर पुत्रोत्पत्ति की प्रतीक्षा करने लगा। अंजना का गर्भ क्रमशः बढ़ने लगा और दस मास पूर्ण होने पर श्रावण मास की एकादशी के दिन श्रवण नक्षत्र में कमलनयनी अंजना ने सूर्योदय के समय कानों में कुण्डल और यज्ञोपवीत धारण किए हुए, कौपीन पहने हुए, जिसका रूप, मुख, पूंछ और अधोभाग वानर के समान लाल था, ऐसे सुवर्ण के समान रंग वाले सुंदर पुत्र को जन्म दिया। हनुमान जी के जन्म की कथाएँ पुराणों में विभिन्न प्रकार से मिलती हैं। कल्पभेद से वे सभी सत्य ही हैं। हमें तो भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करनी चाहिए।

नेहा रावत

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कर्म बधी संसार

“वनवास के दौरान माता सीताजी को प्यास लगी, तभी श्री राम जी ने चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक जंगल ही जंगल दिख रहा था।

कुदरत से प्रार्थना की ~ हे वन देवता !आसपास जहाँ कहीं पानी हो, वहाँ जाने का मार्ग कृपा कर सुझाईये।

तभी वहाँ एक मयूर ने आकर श्री राम जी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर एक जलाशय है। चलिए मैं आपका मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ, किंतु मार्ग में हमारी भूल चूक होने की संभावना है।

श्री राम जी ने पूछा ~ वह क्यों ?तब मयूर ने उत्तर दिया कि ~मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप चलते हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ जाऊंगा। उस के सहारे आप जलाशय तक पहुँच ही जाओगे।

यहां पर एक बात स्पष्ट करनी है कि मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं। अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध पंखों को बिखेरेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाती है।

और वही हुआ। अंत में जब मयूर अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है, तब उसने मन में ही कहा कि वह कितना भाग्यशाली है, कि जो जगत की प्यास बुझाते हैं, ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ।मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही।

तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर, अपने जीवन का त्यागकर मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है, मैं उस ऋण को अगले जन्म में जरूर चुकाऊंगा ….

★तुम्हारे पंख अपने सिर पर धारण करके★

तत्पश्चात अगले जन्म में श्री कृष्ण अवतार में उन्होंने अपने माथे (मुकुट) पर मयूर पंख को धारण कर वचन अनुसार उस मयूर का ऋण उतारा था। *तात्पर्य यही है कि अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो हम तो मानव हैं। न जाने हम कितने ही ऋणानुबंध से बंधे हैं। उसे उतारने के लिए हमें तो कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे।*

अर्थात ~~

जो भी भला हम कर सकते हैं, इसी जन्म में हमें करना है।

मंगलमय प्रभात
स्नेह वंदन
प्रणाम 🙏Jai Shri Ram🙏

गौरव गुप्ता

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राम तत्त्व की महिमा
ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है ‘राम’। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।
रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य ने कहाः “गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?”
गुरूः “थोड़ी साधना कर, जप-ध्यानादि कर, फिर समझ में आ जायेगा।” साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई, तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले।
ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा।
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?”
गुरु ने देखा कि साधना आदि करके इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है। किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। गुरु ने करूणा करके समझाया कि “वत्स ! देख, घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों – घट, मठ, और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक-का-एक ही है। इसी प्रकारः

वही राम घट-घट में बोले।
वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा।
वही राम है सबसे न्यारा।।

रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम”
वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए, उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।
कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे। आदर्श शत्रु ! हाँ, आदर्श शत्रु थे, तभी तो शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह सके। कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी। सुलोचना ने कहाः ‘अगर यह मेरे पति की भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दे।’ कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी। सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दियाः “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”
जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः “जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?”
यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो ! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे ! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।”
धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए भी इतना सहज सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुसरण कर सकता है।
उन्हीं पूर्णाभिराम श्रीराम के दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाकर श्रीराम-तत्त्व की ओर प्रयाण करने के पथ पर अग्रसर हो, यही अभ्यर्थना… यही शुभ कामना….
हे राम ! हे हरि ! हे अच्युत ! गोविंद ! दीनदयाल ! हम सभी को सदबुद्धि दे। हम संयमी, सदाचारी बनकर आत्मदेव को पा लें। हे अंतरात्मा ! हे परमात्मा ! हे दीनबंधु ! हे भक्तवत्सल ! ॐ ॐ ॐ प्रभु जी ॐ…ॐ…ॐ. प्यारे जी ॐ….ॐ…ॐ मेरे जी ॐ….’ ऐसा पुकारते, प्रार्थना करते डूब जायें। वे कृपालु अवश्य कृपा करते हैं, सदबुद्धि देते हैं।

गौरव गुप्ता