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रामभक्त माता शबरी की सम्पूर्ण पावन कथा,


रामभक्त माता शबरी की सम्पूर्ण पावन कथा,,,,,,

शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा बताया गया है। इन्होने शबर जाती में जन्म लिया जिस कारण इनका नाम शबरी पड़ गया। संतजन कहते है की इन्होने भगवान श्री राम का इतना सब्र किया की इनका नाम ही सबरी पड़ गया।
शबरी के पिता भीलों के राजा थे। शबरी को श्रीराम के प्रमुख भक्तों में गिना जाता है।

शबरी के पिता भीलों के राजा थे। शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने एक दूसरे भील कुमार से उसका विवाह पक्का कर दिया और धूमधाम से विवाह की तैयारी की जाने लगी। विवाह के दिन सैकड़ों बकरे-भैंसे बलिदान के लिए लाए गए।

बकरे-भैंसे देखकर शबरी ने अपने पिता से पूछा- ‘ये सब जानवर यहां क्यों लाए गए हैं?’ पिता ने कहा- ‘तुम्हारे विवाह के उपलक्ष्य में इन सबकी बलि दी जाएगी।’

यह सुनकर बालिका शबरी को अच्छा नहीं लगा और सोचने लगी यह किस प्रकार का विवाह है, जिसमें इतने निर्दोष प्राणियों का वध किया जाएगा। यह तो पाप कर्म है, इससे तो विवाह न करना ही अच्छा है। ऐसा सोचकर वह रात्रि में उठकर जंगल में भाग जाती है।

दंडकारण्य में वह देखती है कि हजारों ऋषि-मुनि तप कर रहे हैं। बालिका शबरी अशिक्षित होने के साथ ही निचली जाति से थी। वह समझ नहीं पा रही थीं कि किस तरह वह इन ऋषि-मुनियों के बीच यहां जंगल में रहें जबकि मुझे तो भजन, ध्यान आदि कुछ भी नहीं आता।

लेकिन शबरी का हृदय पवित्र था और उसमें प्रभु के लिए सच्ची चाह थी, जिसके होने से सभी गुण स्वत: ही आ जाते हैं। वह रात्रि में जल्दी उठकर, जिधर से ऋषि निकलते, उस रास्ते को नदी तक साफ करती, कंकर-पत्थर हटाती ताकि ऋषियों के पैर सुरक्षित रहे। फिर वह जंगल की सूखी लकड़ियां बटोरती और उन्हें ऋषियों के यज्ञ स्थल पर रख देती। इस प्रकार वह गुप्त रूप से ऋषियों की सेवा करती थी।

(शबरी और गुरु मतंग ऋषि ) इन सब कार्यों को वह इतनी तत्परता से छिपकर करती कि कोई ऋषि देख न ले। यह कार्य वह कई वर्षों तक करती रही। अंत में मतंग ऋषि ने उस पर कृपा की।

जब मतंग ऋषि मृत्यु शैया पर थे तब उनके वियोग से ही शबरी व्याकुल हो गई। महर्षि ने उसे निकट बुलाकर समझाया- ‘बेटी! धैर्य से कष्ट सहन करती हुई साधना में लगी रहना। प्रभु राम एक दिन तेरी कुटिया में अवश्य आएंगे। प्रभु की दृष्टि में कोई दीन-हीन और अस्पृश्य नहीं है। वे तो भाव के भूखे हैं और अंतर की प्रीति पर रीझते हैं।’

महर्षि की मृत्यु के बाद शबरी अकेली ही अपनी कुटिया में रहती और प्रभु राम का स्मरण करती रहती थी। राम के आने की बांट जोहती शबरी प्रतिदिन कुटिया को इस तरह साफ करती थीं कि आज राम आएंगे। साथ ही रोज ताजे फल लाकर रखती कि प्रभु राम आएंगे तो उन्हें मैं यह फल खिलाऊंगी।

(शबरी राम मिलन )
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥

उदार श्री रामजी उसे गति देकर शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्री रामचंद्रजी को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया॥

आज मेरे गुरुदेव का वचन पूरा हो गया। उन्होंने कहा था की राम आयेगे। और प्रभु आज आप आ गए। निष्ठा हो तो शबरी जैसी। बस गुरु ने एक बार बोल दिया की राम आयेगे। और विश्वास हो गया। हमे भगवान इसलिए नही मिलते क्योकि हमे अपने गुरु के वचनो पर भरोसा ही नही होता।

जब शबरी ने श्री राम को देखा तो आँखों से आंसू बहने लगे और चरणो से लिपट गई है। (सबरी परी चरन लपटाई)।
मुह से कुछ बोल भी नही पा रही है चरणो में शीश नवा रही है। फिर सबरी ने दोनों भाइयो राम, लक्ष्मण जी के चरण धोये है।

कुटिया के अंदर गई है और बेर लाई है। वैसे रामचरितमानस में कंद-मूल लिखा हुआ है। लेकिन संतो ने कहा की सबरी ने तो रामजी को बेर ही खिलाये। सबरी एक बेर उठती है उसे चखती है। बेर मीठा निकलता है तो रामजी को देती है अगर बेर खट्टा होता है तो फेक देती है।

भगवन राम एकशब्द भी नही बोले की मैया क्या कर रही है। तू झूठे बेर खिला रही है। भगवान प्रेम में डूबे हुए है। बिना कुछ बोले बेर खा रहे है। माँ एकटक राम जी को निहार रही है।

भगवान ने बड़े प्रेम से बेर खाए और बार बार प्रशंसा की है। (प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि)॥ उसके बाद शबरी हाथ जोड़ कर कड़ी हो गई। सबरी बोली की प्रभु में किस प्रकार आपकी स्तुति करू?

मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ।(अधम जाति मैं जड़मति भारी)॥ जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ।
भगवन राम माँ की ये बात सुन नहीं पाये और बीच में ही रोक दिया- भगवन कहते है माँ मैं केवल एक भगति का ही नाता मानता हूँ।(मानउँ एक भगति कर नाता)

जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी यदि इंसान भक्ति न करे तो वह ऐसा लगता है , जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥

माँ में तुम्हे अपनी 9 प्रकार की भक्ति के बारे में बताता हु। जिसे भक्ति कहते है नवधा भक्ति ।

  • नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
    प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

भावार्थ:- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम॥

  • गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
    चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

भावार्थ:- तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें॥

  • मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
    छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

भावार्थ:- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना॥

  • सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
    आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

भावार्थ:- सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना॥

  • नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
    नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

भावार्थ:- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो-॥

  • सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
    जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

भावार्थ:- हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है॥

देखिये भगवान माँ को भक्ति के बारे में बताने से पहले भी कह सकते थे की माँ आपके अंदर सभी प्रकार की भक्ति है। लेकिन राम जानते थे अगर मैंने पहले बोल दिया तो माँ मुझे बीच में ही रोक देगी। और कहेगी बेटा मेरी बड़ाई नही सब आपकी कृपा का फल है। इसलिए भगवान ने पहले भक्ति के बारे में बताया और बाद में माँ को कहा- आपके अंदर सब प्रकार की भक्ति है।

प्रताप राज

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जब हनुमान पहुंचे रावण के कक्ष में तो अद्भुत
था वहां का दृश्य

सीता की खोज करते हुए
हनुमानजी रावण के अंत:पुर
यानी शयनकक्ष में पहुंच गए तो वहां उन्होंने रावण
की हजारों पत्नियां देखीं।
हनुमानजी ने पहले
कभी भी सीता को देखा नहीं था,
उन्हें यह मालूम
नहीं था कि सीता दिखती कैसी हैं,
इस कारण सीता को खोजने
का आसान काम नहीं था। रावण की कई
पत्नियां बहुत सुंदर
थीं और हनुमानजी जिस सुंदर
स्त्री को देखते तो यही सोचते
कि कहीं यही सीता तो नहीं हैं।
यहां जानिए हनुमान किस प्रकार
समुद्र लांघकर लंका पहुंचे और हनुमान जब रावण के
शयनकक्ष में पहुंचे तो वहां का दृश्य कैसा था…

सीता की खोज के बाद श्रीराम के
अतिप्रिय हो गए हनुमान
सीता की खोज, हनुमानजी के
इस एक काम के कारण श्रीराम
भी उनके वश में हो गए। हनुमानजी ने
लंका जाकर जिस प्रकार
अपनी बुद्धिमानी से
सीता की खोज
की थी, उससे श्रीराम
भी अतिप्रभावित हो गए थे। श्रीराम ने
हनुमानजी से
कहा भी था कि मैं तुम्हारे ऋण से
कभी भी उऋण नहीं हो पाउंगा।
मैं सदा तुम्हारा ऋणी रहुंगा।
आगे जानिए हनुमानजी के इस महत्वपूर्ण कार्य से
जुड़े कुछ
रोचक प्रसंग…

– जांबवान् ने हनुमान से कहा था रावण को मारना नहीं,
लंका को जलाना नहीं
– लंका में प्रवेश से पहले हनुमान ने हराया किन तीन
राक्षसियों कोजांबवान् ने हनुमान से कहा था रावण
को मारना नहीं,
लंका को जलाना नहीं
समुद्र लांघने से पहले हनुमान
को अपनी शक्तियों का ध्यान
नहीं था। उस समय जांबवान ने हनुमान को उनके
सामर्थ्य और
शक्तियों का स्मरण करवाया। अपनी शक्तियां याद आते
ही हनुमानजी अत्यधिक उत्तेजित हो गए
और कहने लगे
कि अब तो मैं ऐसे सैकड़ों समुद्र लांघ सकता हूं, रावण और
उसकी पूरी लंका को उखाड़कर समुद्र में
डुबो सकता हूं, रावण
को किसी मच्छर के समान मार सकता हूं।

जब हनुमान इस प्रकार की बातें करने लगे तब जांबवान
ने
सोचा कि केसरीनंदन आवश्यकता से अधिक उत्तेजित
हो गए
हैं। जांबवान ने हनुमानजी को समझाया कि हम
श्रीराम के दूत हैं
और दूत को अपनी मर्यादा में
ही रहना चाहिए। दूत को लड़ाई-
झगड़ा करने का अधिकार नहीं है। अत: तुम सिर्फ
सीता की खोज करके आना। रावण
को मारना नहीं है और
ना ही लंका को जलाना है, साथ
ही किसी को नुकसान
भी नहीं पहुंचाना है। जब तुम्हें
सीता का पता मिल
जाएगा तो स्वयं श्रीराम सेना सहित रावण
की लंका पर
आक्रमण करेंगे और उसका नाश करेंगे।
वही कीर्ति और
प्रतिष्ठा के अनुरूप होगा। अत: हनुमान तुम इस बात का ध्यान
रखना।

आगे पढ़िए इसके बाद क्या हुआ…अपनी रक्षा के लिए
कर
सकते
हैं युद्ध
जब इस प्रकार जांबवान ने समझाया तो हनुमानजी ने
प्रश्न
किया कि यदि कोई खुद आगे होकर मुझ पर प्रहार करे तब
भी युद्ध ना करूं?
इस प्रश्न के जवाब में जांबवान ने हंसकर
कहा कि अपनी आत्म रक्षा के लिए युद्ध
किया जा सकता है।
इस प्रकार बातचीत होने के बाद
हनुमानजी ने सभी से
आज्ञा ली और वे समुद्र को लांघकर
लंका की ओर उड़ चले।
हनुमानजी को लंका के रास्ते में सबसे पहले मैनाक
पर्वत मिला।
मैनाक पर्वत ने हनुमान को विश्राम करने के लिए कहा। इस
बात पर हनुमान ने कहा कि जब तक श्रीराम का काम
पूरा नहीं हो जाता, मैं विश्राम नहीं कर
सकता।

इसके बाद हनुमानजी को सुरसा नाम
की राक्षसी मिली,
जो कि सर्पों की माता थी। देवताओं ने हनुमान
की बुद्धि और
बल की परीक्षा लेने का दायित्व
सुरसा को सौंपा था। देवताओं
के मन में संशय था कि हनुमान श्रीराम के काम
को पूरा कर
पाएंगे या नहीं। इस संशय को दूर करने के लिए उन्होंने
सुरसा की मदद ली थी।इस
प्रकार समझाया सुरसा को
सुरसा ने हवा में उड़ते हुए हनुमान को रोका और कहा कि तुम
मेरा आहार हो और तुम्हें मैं खाउंगी। तब हनुमान ने
कहा कि जब
मैं लौटकर आऊं, तब खा लेना, अभी मुझे जाने दो। इस
प्रकार
कहने के बाद भी जब
सुरसा नहीं मानी तो हनुमान ने
कहा कि ठीक है अपना मुंह खोलों, मैं तुम्हारे मुंह में
प्रवेश
करता हूं।

सुरसा ने जितना बड़ा मुंह खोला, हनुमान ने उससे कई
गुना बड़ा स्वयं का आकार कर लिया। फिर सुरसा ने बड़ा मुंह
किया तो हनुमान ने भी शरीर का आकार
बड़ा कर लिया। इस
प्रकार जब सुरसा का मुंह करीब सौ योजन के बराबर
हो गया तो हनुमान ने स्वयं का रूप छोटा सा किया और वे उस
राक्षसी के मुंह में प्रवेश करके, स्पर्श करके पुन:
बाहर आ
गए। इस प्रकार हनुमानजी को खाने
की सुरसा की बात
भी पूरी हो गई और वह शांत हुई।
हनुमान की बुद्धि देखकर
सुरसा प्रसन्न हो गई और मार्ग छोड़ दिया।
इसके बाद क्या हुआ, आगे पढ़िए…छाया से
प्राणी को पकड़
लेती थी ये राक्षसी
सुरसा को हराने के बाद हनुमान के मार्ग में सिंहिका नाम
की राक्षसी आई। यह
राक्षसी मायावी थी और छाया से
किसी भी प्राणी को पकड़
लेती थी। इस प्रकार
प्राणी को पकडऩे के बाद उसे
खा जाती थी। हनुमान उसके
क्षेत्र में पहुंचते ही सारी स्थिति समझ
गए थे और
सिंहिका कुछ करती, इसके पहले ही मुक्के
के एक ही प्रहार से
सिंहिका की जीवन लीला समाप्त
कर दी।
इसके बाद मिली लंकिनी
सिंहिका को हराने के बाद हनुमान का सामना हुआ
लंकिनी से।
लंकिनी लंका की रक्षा किया करती थी।
वह बहुत
शक्तिशाली और सर्तक रहने
वाली राक्षसी थी। लंका में
प्रवेश करने के लिए हनुमान ने बहुत ही छोटा सा रूप
बनाया था,
फिर भी लंकिनी ने हनुमान को रोक लिया था।
हनुमान ने
लंकिनी को मुक्के से प्रहार किया और वह अचेत
हो गई। इसके
बाद लंकिनी ने हनुमान से कहा कि बहुत पहले
ब्रह्माजी ने मुझे
बताया था कि जब किसी वानर के प्रहार से तू अचेत
हो जाएगी,
तब समझ लेना कि लंका का अंत करीब आ गया है।
ऐसा था रावण
के शयन कक्ष का दृश्य
लंकिनी को हराने के बाद हनुमान ने लंका में प्रवेश किया।
लंका बहुत बड़ी थी। इधर-उधर देख-
देखकर हनुमान
सीता की खोज करने लगे।
काफी जगह तलाश करने के बाद
हनुमान रावण के शयनकक्ष में पहुंच गए। रावण के अंत:पुर
का दृश्य अद्भुत था। रावण स्वर्ण मंडित यानी सोने से
बने हुए
पलंग पर सो रहा था। नीचे जमीन पर शानदार
गलीचा बिछा हुआ था। इस गलीचे पर रावण
की सहस्त्रों (हजारों) पत्नियां बेसुध होकर
सो रही थीं।
किसी स्त्री का मुख खुला हुआ
था तो किसी के मुंह से लार गिर
रही थी। कोई जोर-जोर से खर्राटे ले
रही थी तो कोई
बड़बड़ा रही थी। कोई स्त्री पान
खाते-खाते सो गई
थी तो उसके मुंह से पान पीक टपक
रही थी।
रावण की सभी पत्नियां एक से बढ़कर एक
सुंदर थीं और बेसुध
होकर सो रही थीं। हनुमान उनमें एक-एक
सुंदर
स्त्री को देखकर यही सोच रहे थे
कि कहीं यही सीता तो नहीं है।
हनुमान ने सीता को देखा नहीं था, इस कारण
वे
हजारों स्त्रियों में सीता को खोज नहीं पा रहे
थे। जब हनुमान
को यह लगा कि इन स्त्रियों में
सीता नहीं है तो वे वहां से अन्य
स्थानों पर सीता को खोजने लगे।
इसके कुछ समय बाद हनुमान की भेंट
विभीषण से हुई। विभीषण
ने हनुमान को बताया कि सीता को रावण
की अशोक वाटिका में
बंदी बनाकर रखा गया है। इसके बाद हनुमान ने
सीता से भेंट की,
लंका को जलाया। श्रीराम के पास लौटकर
सीता को किस
प्रकार खोजा, पूरी कथा सुनाई। —

विक्रम प्रकाश राइसोनय

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राम दरबार
राम दरबार या राम परिवार को कई देवताओं के साथ दिखाया जाता है – श्रीराम, श्री लक्ष्मण, श्री सीता जी और श्री हनुमान जी। किसी-किसी चित्र-अंकन में श्रीराम के दो अन्य भाई – भरत तथा शत्रुघ्न भी साथ होते हैं। लगभग सभी राम-मंदिरों में राम दरबार होता है।

माहात्म्य: संपूर्ण राम दरबार ‘त्वम्’ का प्रतीक रूप है यानी तुम्हारा अपना समग्र रूप। तुम्हारे पास तुम्हारे अपने कई भाग होते हैं – जैसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। प्रथम तीन आसानी से सबके द्वारा जाने जाते हैं। अंतिम, आत्मा जो हमारे अंदर दिव्य ज्योति स्वरूप है – सरलता से अनुमान योग्य है। यह आत्मा ही है जो कि शरीर, मन और बुद्धि को क्रियाशील और परस्पर संयुक्त रखता है।

लक्ष्मण शरीर के प्रतीक हैं। वे शक्तिशाली हैं और राम की इच्छानुसार कार्य करने को तत्पर रहते हैं।
हमारी बुद्धि का प्रतिनिधित्व सीता जी करती हंै। यह विशुद्ध बुद्धि है जो आत्मा के सन्निकट रहती है। सीता जी पूरी तरह राम को समर्पित हैं। इसी तरह शुद्ध बुद्धि सदा आत्मा की सेवा में सहायक रहती है।
हनुमान जी हमारे मन का प्रतिनिधित्व करते हैं। हनुमान जी राम और सीता जी के पैरों के पास विराजमान होते हैं, संपूर्ण भक्ति की भावना के साथ, सदैव उनकी इच्छाओं के अनुसार कार्य करने के लिए तत्पर की मुद्रा में। शांत मन ही विशुद्ध बुद्धि और आत्मा की सेवा में रहता है। ऐसा मन न तो इधर-उधर भटकता है और न इंद्रियों के पीछे भागता है। वह तो अपने से ऊपर की शक्तियों के आदेश का अनुपालन करता है।
हमारी आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं श्रीराम। राम का श्यामल वर्ण अनंत और तल्लीन नीले आसमान की तरह है। हमारी आत्मा भी अनंत है। आत्मा तो शरीर, मन और बुद्धि के साम्राज्य पर शासन करता है। उसके रहने से ही शरीर, मन और बुद्धि एकजुट होकर कार्य करते हैं। अपने आत्मा के संपर्क में आकर हमें अपनी दिव्यता का आभास होना चाहिए जिससे वह हमारे जीवन पर सुशासन करने में समर्थ रहे।
अतः जब शरीर, मन और बुद्धि समग्रतया आत्मा के संपर्क में रहते हैं और उसके आगे स्वयं को समर्पित कर देते हैं, जिससे आत्मा उनके कार्यों का निर्देशन कर सके, तब हमारा जीवन ‘अयोध्या’ बन जाता है। एक ऐसा स्थान जहाँ न कलह है, न तनाव। तब तो हमारे जीवन में हर्ष, सौहार्द, ज्ञान और संपूर्णता की स्थापना हो जाती है क्योंकि यही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है।

अगली बार जब भी तुम राम-दरबार का कोई मंदिर देखो तो याद करना कि यही तो तुम (त्वम्) हो जो इन मूर्तियों में प्रतिबिम्बित हो रहे हो

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राम तत्व की महिमा

ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है ‘राम’। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।

‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।

एक राम घट-घट में बोले, दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा, ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य ने कहाः “गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?”
गुरूः “थोड़ी साधना कर, जप-ध्यानादि कर, फिर समझ में आ जायेगा।” साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई, तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले, ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा, ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न?”
गुरु ने देखा कि साधना आदि करके इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है। किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं। गुरु ने करूणा करके समझाया कि “वत्स! देख, घड़े में आया हुआ आकाश, मठ में आया हुआ आकाश, मेघ में आया हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक आकाश, ये चार दिखते हैं। अगर तीनों उपाधियों – घट, मठ, और मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो एक-का-एक ही है। इसी प्रकारः

वही राम घट-घट में बोले, वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा, वही राम है सबसे न्यारा।।

रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्त्व वही का वही है और उसी का नाम है चैतन्य राम”
वे ही श्रीराम जिस दिन दशरथ-कौशल्या के घर साकार रूप में अवतरित हुए, उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।
कैसे हैं वे श्रीराम? भगवान श्रीराम नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे। वे आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श मित्र एवं आदर्श शत्रु थे। आदर्श शत्रु! हाँ, आदर्श शत्रु थे, तभी तो शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह सके। कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती सुलोचना के समीप जा गिरी। सुलोचना ने कहाः ‘अगर यह मेरे पति की भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को प्रमाणित कर दे।’ कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई स्पष्ट कर दी। सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दियाः “देवी! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान, परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”
जब रावण सुलोचना से ये बातें कह रहा था, उस समय कुछ मंत्री भी उसके पास बैठे थे। उन लोगों ने कहाः “जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बनाकर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है, उनके पास आपकी बहू का जाना कहाँ तक उचित है ? यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस लौट सकेगी ?”
यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो! लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है। अरे! यह तो रावण का काम है जो दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।”

धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र, जिसका विश्वास शत्रु भी करता है और प्रशंसा करते थकता नहीं ! प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य होते हुए भी इतना सहज सरल है कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन में भी उसका अनुसरण कर सकता है!
जय सिया राम
सियावर रामचन्द्र की जय
पवनसुत हनुमान की जय

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रामचरितमानस के अरण्यकांड में प्रभुश्रीराम ओर ऋषिवर अत्रि का मिलन, माताअनसूयाजी द्वारा माता सीता को पतिव्रतधर्म का उपदेश


रामचरितमानस के अरण्यकांड में प्रभुश्रीराम ओर ऋषिवर अत्रि का मिलन, माताअनसूयाजी द्वारा माता सीता को पतिव्रतधर्म का उपदेश,,,,

*रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥

भावार्थ:-चित्रकूट में बसकर श्री रघुनाथजी ने बहुत से चरित्र किए, जो कानों को अमृत के समान (प्रिय) हैं। फिर (कुछ समय पश्चात) श्री रामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गए हैं, इससे (यहाँ) बड़ी भीड़ हो जाएगी॥

  • सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥
    अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥

भावार्थ:-(इसलिए) सब मुनियों से विदा लेकर सीताजी सहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गए, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गए॥ अब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में आये हैं। दोनों भाइयों ने दंडवत प्रणाम किया और ऋषि ने उन्हें ह्रदय से लगा लिया है। श्री रामजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए। भगवान को खाने के लिए कंद-मूल और फल दिए हैं। अब प्रभु आसन पर विराजमान हैं। मुनि भगवान की स्तुति करते हैं –

मामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥ भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥

हे भक्त वत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देने वाले आपके चरण कमलों को मैं भजता हूँ॥ मुझे अपने चरण कमलों की भक्ति दीजिए।

फिर परम शीलवती और विनम्र श्री सीताजी अनसूयाजी (आत्रिजी की पत्नी) के चरण पकड़कर उनसे मिलीं। उन्होंने आशीष देकर सीताजी को पास बैठा लिया और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो नित्य-नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। कभी भी मैले और पुराने नही होते। फिर माँ अनसूयाजी ने सुंदर शिक्षा दी है जानकी जी को-

हे राजकुमारी! सुनिए- माता, पिता, भाई सभी हित करने वाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही (सुख) देने वाले हैं, परन्तु हे जानकी! पति तो (मोक्ष रूप) असीम (सुख) देने वाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती॥

धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन-ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है।

एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥ शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है॥

जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में अपने पति को छोड़कर दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है॥

मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराए पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो (अर्थात समान अवस्था वाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।

जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्न श्रेणी की) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं॥

और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराए पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है॥

क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है॥

किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है॥

स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। पतिव्रत धर्म के कारण ही) आज भी ‘तुलसीजी’ भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं॥

हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्री रामजी प्राणों के समान प्रिय हैं, यह (पतिव्रत धर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिए कही है॥

जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया।

तब कृपा की खान श्री रामजी ने मुनि से कहा- आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊँ॥ मुझ पर निरंतर कृपा करते रहिएगा और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़िएगा।

श्री रामजी के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमपूर्वक बोले- मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी! आप अब जाइए? हे नाथ! आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिए। और मुनि की आँखों से प्रेम के आंसू टपकने लगे।

Sanjay gupta

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सुंदरकाण्ड


रामायणी सत्संग सेवा समिति,
1 :- सुंदरकाण्ड का नाम सुंदरकाण्ड क्यों रखा गया?

हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थे और लंका त्रिकुटांचल पर्वत पर बसी हुई थी। त्रिकुटांचल पर्वत यानी यहां 3 पर्वत थे।
पहला सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था।
दुसरा नील पर्वत, जहां राक्षसों के महल बसे हुए थे।
तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका निर्मित थी। इसी वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी।
इस काण्ड की सबसे प्रमुख घटना यहीं हुई थी, इसलिए इसका नाम सुंदरकाण्ड रखा गया।
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2 :- शुभ अवसरों पर सुंदरकाण्ड का पाठ क्यों?
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शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड का पाठ किया जाता है। शुभ कार्यों की शुरूआत से पहले सुंदरकाण्ड का पाठ करने का विशेष महत्व माना गया है।
जबकि किसी व्यक्ति के जीवन में ज्यादा परेशानियाँ हों, कोई काम नहीं बन पा रहा हो, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या हो, सुंदरकाण्ड के पाठ से शुभ फल प्राप्त होने लग जाते हैं, कई ज्योतिषी या संत भी विपरित परिस्थितियों में सुंदरकाण्ड करने की सलाह देते हैं।
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3 :- सुंदरकाण्ड का पाठ विषेश रूप से क्यों किया जाता है?
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माना जाता हैं कि सुंदरकाण्ड के पाठ से हनुमानजी प्रशन्न होते हैं।
सुंदरकाण्ड के पाठ में बजरंगबली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती है।
जो लोग नियमित रूप से सुंदरकाण्ड का पाठ करते हैं, उनके सभी दुखः दुर हो जाते हैं, इस काण्ड में हनुमानजी ने अपनी बुद्धि और बल से सीता माता की खोज की है।
इसी वजह से सुंदरकाण्ड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता है।
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4 :- सुंदरकाण्ड से क्यों मिलता है मनोवैज्ञानिक लाभ?
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वास्तव में श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड की कथा सबसे अलग है, संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरूषार्थ को दर्शाती है, सुंदरकाण्ड एक मात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का काण्ड है।
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मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला काण्ड है, सुंदरकाण्ड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए आत्मविश्वास मिलता है।
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5 :- सुंदरकाण्ड से क्यों मिलता है धार्मिक लाभ?
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सुंदरकाण्ड के वर्णन से मिलता है धार्मिक लाभ, हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है। बजरंगबली बहुत जल्दी प्रशन्न होने वाले देवता हैं, शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं, इन्हीं उपायों में से एक उपाय सुंदरकाण्ड का पाठ करना है, सुंदरकाण्ड के पाठ से हनुमानजी के साथ ही श्रीराम की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
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किसी भी प्रकार की परेशानी हो सुंदरकाण्ड के पाठ से दूर हो जाती है, यह एक श्रेष्ठ और सरल उपाय है, इसी वजह से काफी लोग सुंदरकाण्ड का पाठ नियमित रूप से करते हैं,
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हनुमानजी जो कि वानर थे, वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए वहां सीता माता की खोज की, लंका को जलाया सीता माता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए, यह एक भक्त की जीत का काण्ड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है, सुंदरकाण्ड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं, इसलिए पुरी रामायण में सुंदरकाण्ड को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता है, इसी वजह से सुंदरकाण्ड का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
                           जय भवानी
जय श्री राम भक्त हनुमान

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बानर बांको रे, लंका नगरी में, मच गयो हाको रे, बानर बांको रे ॥


बानर बांको रे,
लंका नगरी में,
मच गयो हाको रे,
बानर बांको रे ॥

मात सिया यूं बोली रे बेटा,
फ़ल खाई तू पाको रे,….
इतने माही कूद्या हनुमत,
मार फ़दाको रे..बानर ॥

रुख उडाख पटक धरणी पर,
भोग लगाया फ़लां को रे,
रखवाला जब पकडन लाग्या,
दियो झडाको रे..बानर ॥

राक्षसिया अडरावै सारा,
काल आ गयो म्हाको रे,
मुँह पर मार पड़े मुक्के री,
फ़ाडे बाको रे..बानर ॥

हाथ टांग तोडे,सिर फ़ोडे,
घट फ़ोडे ज्यू पाको रे,
लुक छिप कर कई घर मे घुसग्या,
पड गयो फ़ांको रे..बानर ॥

उजडी पडी अशोका वाटिका,
ज्यूं मारग सडकां को रे,
उथल पुथल सब करयो बगिचो,
बिगडयो खाको रे..बानर ॥

जाय पुकार करी रावन स्यूं,
दिन खोटो असुरां को रे,
कपि आय एक घुस्यो बाग में,
गजब लडाको रे..बानर ॥

भेज्यो अक्षय कुमार भिडन नै,
हनुमत स्यामी झांक्यो रे,
एक लात की पडी असुर पर,
पी गयो नाको रे..बानर ॥

धन धन रे रघुवर का प्यारा,
अतुलित बल है थांको रे,
तु हे जग में मुकुटमणी है,
सब भक्तां को रे..बानर ॥