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रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः। ‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’


विजय कृष्ण पांडेय 

 

★रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
‘जिसमें योगी लोगों का मन
रमण करता है उसी को कहते
हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।★★

प्रभु श्री राम द्वारा रामेश्वर
महादेव की स्थापना,,,,

सैल बिसाल आनि कपि देहीं।
कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।

देखि सेतु अति सुन्दर रचना।
बिहसि कृपानिधि बोले बचना।।

परम रम्य उत्तम यह धरनी।
महिमा अमित जाइ नही बरनी।।

करिहउँ इहाँ संभु थापना।
मोरे हृदय परम कलपना।।

सुनि कपीस बहु दूत पठाए।
मुनिबर सकल बोली लै आये।।

लिंग थापि बिधिवत करि पूजा।
सिव समानप्रिय मोहि न दूजा।।

सिव द्रोही मम भगत कहावा।
सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।

संकर बिमुख भगती चह मोरी।
सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।

संकरप्रिय मम द्रोही
सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि
घोर नरक महूँ बास।।

भावार्थ:-

वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर
देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की
तरह ले लेते हैं।
सेतु की अत्यंत सुंदर रचना देखकर
कृपासिन्धु श्री रामजी हँसकर वचन
बोले-
यह(यहाँ की)भूमि परम रमणीय और
उत्तम है।
इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की
जा सकती।

मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा।
मेरे हृदय में यह महान्‌ संकल्प है।

श्री रामजी के वचन सुनकर वानरराज
सुग्रीव ने बहुत से दूत भेजे,जो सब श्रेष्ठ
मुनियों को बुलाकर ले आए।

शिवलिंग की स्थापना करके विधि
पूर्वक उसका पूजन किया
(फिर भगवान बोले-)
शिवजी के समान मुझको दूसरा कोई
प्रिय नहीं है।
जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा
भक्त कहलाता है,वह मनुष्य स्वप्न में
भी मुझे नहीं पाता।
शंकरजी से विमुख होकर (विरोध
करके) जो मेरी भक्ति चाहता है,वह
नरकगामी,मूर्ख और अल्पबुद्धि है।

जिनको शंकरजी प्रिय हैं,परन्तु जो
मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही
हैं और मेरे दास (बनना चाहते) हैं,
वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में
निवास करते हैं।

समस्त चराचर प्राणियोँ एवं विश्व का
कल्याण करो प्रभु रामेश्वर महादेव,,,

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे
पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुज
भास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं
तापहम्।
मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ
स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे
ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं
श्रीरामभूपप्रियम्।।

धर्म रुपी बृक्ष के मूल,विवेक रुपी समुद्र
को आनंद देने वाले पूर्णचंद्र,वैराग्य रूपी
कमल के सूर्य,पाप रूपी घोर अन्धकार
को निश्चय ही मिटने वाले,तीनों तापों को
हरने वाले,मोहरूपी बादलों के समूह को
छिन्न छिन्न भिन्न करने की विधि में
आकाश से उत्पन्न पवन स्वरुप,ब्रह्मा
जी के वंशज(आत्मज) तथा कलंक
नाशक मेरे(महाराज श्री राम चन्द्र जी)
प्रिय श्री शंकर जी की मैं वंदना करता हूँ।

कष्ट हरो,,काल हरो,,
दुःख हरो,,दारिद्र्य हरो,,,
हर,,,हर,,,महादेव,,,

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं
कालमत्तेभसिंह योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं
गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्म
वृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं
सरसिजनयनं देवमुर्वीशरुपम्।।

कामदेव के शत्रु शिव जी के सेव्य,
भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरने
वाले,कालरुपी मतवाले हाथी के
लियेसिंह के समान,योगियोँ के
स्वामी (योगीश्वर),ज्ञान के द्वारा
जानने योग्य,गुणोँ के निधि,अजेय.
निर्गुण,निर्विकार,माया से परे,देवताओँ
के स्वामी, दुष्टोँ के वध मेँ तत्पर,ब्राह्मण
वृन्द के एकमात्र देवता (रक्षक),जलवाले
मेघ के समान सुन्दर श्याम.कमल के से
नेत्रवाले,पृथ्वीपति (राजा) के रुप मेँ परम
देव श्रीराम जी की मैँ वन्दना करता हुँ।

राम से बड़ा राम का नाम !!!

★ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा
दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब
से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं।★

★राजा दिलीप,राजा रघु एवं राजा
दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम
का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम
केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं,बल्कि
रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है,
रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही
नाम है ‘राम’।

★राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों
वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में
पायी जाती है।★

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।

‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण
करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य ने कहाः “गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए।
ऐसा कैसे ?”

गुरूः “थोड़ी साधना कर,जपध्यानादि
कर,फिर समझ में आ जायेगा।”

साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई,
तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले।
ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा।
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव,ईश,बिंदु
व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही
हुए न ?”
गुरु ने देखा कि साधना आदि करके
इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है।

किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं।

गुरु ने करूणा करके समझाया कि,
“वत्स ! देख,घड़े में आया हुआ आकाश,
मठ में आया हुआ आकाश,मेघ में आया
हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक
आकाश,ये चार दिखते हैं।

अगर तीनों उपाधियों – घट,मठ,और
मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो
एक-का-एक ही है।

इसी प्रकारः

वही राम घट-घट में बोले।
वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा।
वही राम है सबसे न्यारा।।

★रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्व
वही का वही है और उसी का नाम है
चैतन्य “राम” वे ही श्री राम जिस दिन
दशरथ कौशल्या के घर साकार रूप
में अवतरित हुए,
उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी
के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।

कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम
नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे।

वे आदर्श पुत्र,आदर्श शिष्य,आदर्श
मित्र एवं आदर्श शत्रु थे।

आदर्श शत्रु ! हाँ,आदर्श शत्रु थे,तभी तो
शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह
सके।

कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा
मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती
सुलोचना के समीप जा गिरी।

सुलोचना ने कहाः’अगर यह मेरे पति की
भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को
प्रमाणित कर दे।’

कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई
स्पष्ट कर दी।

सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’
किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था।
फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर
अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा।

तब रावण ने उत्तर दियाः “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव
प्राप्त करो।

जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान,
परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नी
व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं,
उस समाज में तुम्हें जाने से डरना
नहीं चाहिए।

★मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य
महापुरुषोंके द्वारा तुम निराश
नहीं लौटायी जाओगी।”★

जब रावण सुलोचना से ये बातें कह
रहा था,उस समय कुछ मंत्री भी उसके
पास बैठे थे।

उन लोगों ने कहाः
“जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बना
कर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है,
उनके पास आपकी बहू का जाना
कहाँ तक उचित है ?

यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस
लौट सकेगी ?”

यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो !
लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है।

★अरे ! यह तो रावण का काम है जो
दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी
बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।★

धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र !

जिसका विश्वास शत्रु भी करता है
और प्रशंसा करते थकता नहीं !
प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य
होते हुए भी इतना सहज सरल है
कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन
में भी उसका अनुसरण कर सकता है।

—नर या नारायण कौन थे ‘राम’

श्रीराम पूर्णतः ईश्वर हैं।
भगवान हैं।
साथ ही पूर्ण मानव भी हैं।
उनके लीला चरित्र में जहां एक ओर
ईश्वरत्व का वैचित्रमय लीला विन्यास
है,वहीं दूसरी ओर मानवता का प्रकाश
भी है।

विश्वव्यापिनी विशाल यशकीर्ति के
साथ सम्यक निरभिमानिता है।
वज्रवत न्याय कठोरता के साथ
पुष्यवत प्रेमकोमलता है।

अनंत कर्ममय जीवन के साथ
संपूर्ण वैराग्य और उपरति है।

समस्त निषमताओं के साथ
नित्य सहज समता है।
अनंत वीरता के साथ मनमोहक
नित्य सौंदर्य है।

इस प्रकार असंख्य परस्पर विरोधी
गुणों और भावों का समन्वय है।

भगवान श्री राम की लीला चरित्रों का
श्रद्धा भक्ति के साथ चिंतन,अध्ययन
व विचार करने पर साधारण नर नारी
भी सर्वगुण समन्वित एवं सर्वगुण
रहित अखिल विश्व व्यापी,सर्वातीत,
सर्वमय श्रीराम को अपने निकटस्थ
अनुभव कर सकते हैं।

श्री राम में नर और नारायण तथा मानव और ईश्वर की दूरी मिटाकर भगवान के नित्य परिपूर्ण स्वरूप का परिचय मिलता है।

भगवान पुरुषोत्तम ने श्री राम के रूप में प्रकट होकर मानवीय रूप में सांसारिक लोगों के दिलो दिमाग पर नित्य प्रभुत्व की प्रतिष्ठा कर समस्त भारतीय संस्कृति को आध्यात्म भाव से ओतप्रोत कर दिया है।

रामचरितमानस महाकवि तुलसीदास
की अमर कृति है।

यह एक ऐसा सर्वोपयोगी आदर्श
प्रदर्शित करने वाला पवित्र धर्मग्रंथ है।
जिसने मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम को समस्त नर नारियों के हृदय में परम देवत्व रूप के साथ अत्यंत आत्मीय रूप
में प्रतिष्ठित किया है।

इसने शिक्षित अशिक्षित आबाल वृद्ध
स्त्री पुरुष सभी प्रकार के जीवन को
श्रीराम के प्रति भक्ति तथा प्रेम के
दिव्य,मधुर सुधारस से अभिषिक्त
कर अपना अद्भुत प्रभाव विस्तार
किया है।

श्रीरामचरितमानस के श्रीराम
सर्वसद्गुण संपन्न मर्यादारक्षक
परम आदर्श शिरोमणि होने के
साथ ही स्वमहिमा में स्थित
महामानव है।

श्रीरामचरित मानस के श्रवण,मनन
तथा चिंतन से अत्यंत विष्यासक्त,
असदाचारी कठोर हृदय मानव भी
पवित्र विचार परायण एवं सदाचारी
होकर निर्मल प्रेम भक्ति की रसधारा
में सराबोर होकर मुक्ति प्राप्त कर
सकता है।

इस ग्रंथ के सभी पात्र आदर्श चरित्र
से परिपूर्ण हैं।

इसमें गुरु शिष्य,माता पिता,भ्राता पुत्र
स्वामी सेवक,प्रेम सेवा,क्षमा,वीरता,दान,
त्याग,धर्मनीति आदि संपूर्ण आदर्शों के
प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।

यही कारण है कि इस ग्रंथ का सर्वत्र समादर है।
तथा यह सर्वप्रिय ग्रंथ है।
श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों को अधिकांश मानव मंत्रवत कर जप
परायण करते हैं।

वाल्मीकि ने श्री रामायण की रचना करते समय श्रीराम कथा के रूप में मानवता की
कथा कही है।

उन्होंने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से विश्व के मानवों को मानवता का संदेश दिया है।
राम जैसा नर मानव है।

राम के समान चरित से मानवता की
प्राप्ति होती है।

राम एक ऐसे सेतु हैं जहां एक छोर
से शुरू होकर मनुष्य दूसरे छोर पर
परमात्मा तक पहुंच जाता है।

उन्हीं पूर्णाभिराम श्रीराम के दिव्य गुणों
को अपने जीवन में अपनाकर श्रीराम
तत्त्व की ओर प्रयाण करने के पथ पर
अग्रसर हो,
यही अभ्यर्थना… यही शुभ कामना….

नमामि रामं रघुवंशनाथं !
#साभार_संकलित;

ॐ नमः शिवाय
नमामि रामं रघुवंश नाथं

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,
ॐ नमः शिवाय,,,
जय भवानी,,
जय श्री राम

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पढ़ें तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है


*पढ़ें तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है!*

आम तौर पर हिंदुस्तान में ऐसे परिस्थितियां कई बार उत्पन्न हुई जब राम -मंदिर और बाबरी मस्जिद (ढांचा ) एक विचार-विमर्श का मुद्दा बना और कई विद्वानों ने चाहे वो इस पक्ष के हो या उस पक्ष के अपने विचार रखे . कई बार तुलसीदास रचित रामचरित मानस पर भी सवाल खड़े किये गए की अगर बाबर ने राम -मंदिर का विध्वंश किया तो तुलसीदास जी ने इस घटना का जिक्र क्यों नही किया .
सच ये है कि कई लोग तुलसीदास जी कि रचनाओं से अनभिज्ञ है और अज्ञानतावश ऐसी बातें करते हैं . वस्तुतः रामचरित्रमानस के अलावा तुलसीदास जी ने कई अन्य ग्रंथो की भी रचना की है . तुलसीदास जी ने तुलसी शतक में इस घंटना का विस्तार से विवरण भी दिया है .

हमारे वामपंथी विचारको तथा इतिहासकारो ने ये भ्रम की स्थति उतप्पन की , कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नही है . श्री नित्यानंद मिश्रा ने जिज्ञाशु के एक पत्र व्यवहार में “तुलसी दोहा शतक ” का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है | हमनें भी उस अर्थो को आप तक पहुंचने का प्रयास किया है | प्रत्येक दोहे का अर्थ उनके नीचे दिया गया है , ध्यान से पढ़ें |

*(1) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।*
*जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

*(2) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।*
*भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

*(3) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।*
*हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

*(4) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।*
*तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥*

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।

*(5) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।*
*जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥*

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

*(6) दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।*
*तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥*

मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

*(7) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।*
*तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥*

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

*(8)रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।*
*तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया
है!
– डॉक्टर वैद्य पण्डित विनय कुमार उपाध्याय

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हमारे वामपन्थी इतिहासकारों ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया कि “रामचरितमानस” रचयिता ने राम मंदिर विध्वंस का रामायण में कहीं नहीं उल्लेख किया,


हमारे वामपन्थी इतिहासकारों ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया कि “रामचरितमानस” रचयिता ने राम मंदिर विध्वंस का रामायण में कहीं नहीं उल्लेख किया, शायद उन्हें पता नहो कि गोस्वामी जी की बहुत सी रचनायें हैं जिनमे एक “तुलसी शतक” भी है ।

 

श्री नित्यानन्द मिश्र ने जिज्ञासु के पत्र व्यवहार में

“तुलसी दोहा शतक” का अर्थ जो इलाहाबाद उच्च-न्यायलय में प्रस्तुत किया जो नीचे दिया है ।

 

(1)  मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।

जवन जराये रोष भरि करि तुलसी  परिहास ॥

 

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

 

(2)  सिखा सूत्र से हीन करि बल

ते हिन्दू लोग ।

भमरि भगाये देश ते तुलसी

कठिन कुजोग ॥

 

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

 

(3)  बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।

हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥

 

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

 

(4)  सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।

तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥

 

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)

 

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।

 

(5)  राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।

जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥

 

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

 

(6)  दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।

तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥

 

मीरबाकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

 

(7)  राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।

तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥

 

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबाकी ने मस्जिद बनाई ।

 

(8)  रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।

तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥

 

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे ।

 

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है।

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श्री राम आर्य थे और वेदो के ज्ञाता थे


*श्री राम आर्य थे और वेदो के ज्ञाता थे* जो लोग अपने आप को आर्य कहलवाने में शर्माते है और आर्यो को विदेशी कहते है और साथ में श्री राम की पूजा भी करते है , उन्हें यह जानना चाहिए की श्री राम आर्य थे और वेदो के ज्ञाता है वाल्मीकि रामायण , बालकाण्ड सर्ग1 श्लोक16 *आर्य सर्वसमश्चव् सदैव प्रियदर्शन* ऋषि वाल्मीकि , श्री राम के सम्बन्ध में कहते है कि वे आर्य है , समदृष्टि है और प्रियदर्शन है *सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित् ।।―(अयो० १/२०)* *भावार्थ―* श्रीराम सर्वविद्याव्रतस्नातक तथा छहों अङ्गों सहित सम्पूर्ण वेदों के यथार्थ ज्ञाता थे। अब हिन्दुओ आँखे खोलो और अपने आपको आर्य कहलवाना पसंद करो *वेदो का अध्ययन करना प्रारंभ तो करो* वरना कोई भी ऐरा गैरा विधर्मी प्रचारित कर देगा की वेदो में गौमांस का विधान है और हम अज्ञानवश संदेह में ही जीते रहेंगे । *धर्म की रक्षा करनी हो तो धर्म का सही ज्ञान लो* #गर्व_से_कहो_हम_आर्य_है

नीरज आर्य अँधेड़ी

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श्री राम का सात शब्दों वाला तारक महामंत्र


~~~***श्री राम का सात शब्दों वाला तारक महामंत्र***~~~ सौभाग्य और सुख देता है राम का तारक मंत्र… ‘श्री राम जय राम जय जय राम’ – यह सात शब्दों वाला तारक मंत्र है। साधारण से दिखने वाले इस मंत्र में जो शक्ति छिपी हुई है, वह अनुभव का विषय है। इसे कोई भी, कहीं भी, कभी भी कर सकता है। फल बराबर मिलता है। हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य आज यही है कि हम राम नाम का सहारा नहीं ले रहे हैं। हमने जितना भी अधिक राम नाम को खोया है, हमारे जीवन में उतनी ही विषमता बढ़ी है, उतना ही अधिक संत्रास हमें मिला है। एक सार्थक नाम के रुप में हमारे ऋषि-मुनियों ने राम नाम को पहचाना है। उन्होंने इस पूज्य नाम की परख की और नामों के आगे लगाने का चलन प्रारंभ किया। प्रत्येक हिन्दू परिवार में देखा जा सकता है कि बच्चे के जन्म में राम के नाम का सोहर होता है। वैवाहिक आदि सुअवसरों पर राम के गीत गाए जाते हैं। राम नाम को जीवन का महामंत्र माना गया है। राम सर्वमय व सर्वमुक्त हैं। राम सबकी चेतना का सजीव नाम हैं। अस समर्थ रघुनायकहिं, भजत जीव ते धन्य॥ प्रत्येक राम भक्त के लिए राम उसके हृदय में वास कर सुख सौभाग्य और सांत्वना देने वाले हैं। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिख दिया है कि प्रभु के जितने भी नाम प्रचलित हैं, उन सब में सर्वाधिक श्री फल देने वाला नाम राम का ही है। यह नाम सबसे सरल, सुरक्षित तथा निश्चित रुप से लक्ष्य की प्राप्ति करवाने वाला है। मंत्र जप के लिए आयु, स्थान, परिस्थिति, काल, जात-पात आदि किसी भी बाहरी आडम्बर का बंधन नहीं है। किसी क्षण, किसी भी स्थान पर इसे जप सकते हैं। जब मन सहज रूप में लगे, तब ही मंत्र जप कर लें। तारक मंत्र ‘श्री’ से प्रारंभ होता है। ‘श्री’ को सीता अथवा शक्ति का प्रतीक माना गया है। राम शब्द ‘रा’ अर्थात् र-कार और ‘म’ मकार से मिल कर बना है। ‘रा’ अग्नि स्वरुप है। यह हमारे दुष्कर्मों का दाह करता है। ‘म’ जल तत्व का द्योतक है। जल आत्मा की जीवात्मा पर विजय का कारक है। इस प्रकार पूरे तारक मंत्र – ‘श्री राम, जय राम, जय जय राम’ का सार निकलता है – शक्ति से परमात्मा पर विजय। योग शास्त्र में देखा जाए तो ‘रा’ वर्ण को सौर ऊर्जा का कारक माना गया है। यह हमारी रीढ़-रज्जू के दाईं ओर स्थित पिंगला नाड़ी में स्थित है। यहां से यह शरीर में पौरुष ऊर्जा का संचार करता है। ‘मा’ वर्ण को चन्द्र ऊर्जा कारक अर्थात स्त्री लिंग माना गया है। यह रीढ़-रज्जू के बांई ओर स्थित इड़ा नाड़ी में प्रवाहित होता है। इसीलिए कहा गया है कि श्वास और निश्वास में निरंतर र-कार ‘रा’ और म-कार ‘म’ का उच्चारण करते रहने से दोनों नाड़ियों में प्रवाहित ऊर्जा में सामंजस्य बना रहता है। अध्यात्म में यह माना गया है कि जब व्यक्ति ‘रा’ शब्द का उच्चारण करता है तो इसके साथ-साथ उसके आंतरिक पाप बाहर फेंक दिए जाते हैं। इससे अंतःकरण निष्पाप हो जाता है।

विक्रम प्रकाश रासनोई

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राम राम क्यों कहा जाता है?


*राम राम क्यों कहा जाता है?*👌 क्या कभी सोचा है कि बहुत से लोग जब एक दूसरे से मिलते हैं तो आपस में एक दूसरे को दो बार ही *“राम राम”* क्यों बोलते हैं ? *एक बार या तीन बार क्यों नही बोलते ?* दो बार *“राम राम”* बोलने के पीछे बड़ा गूढ़ रहस्य है क्योंकि यह आदि काल से ही चला आ रहा है… हिन्दी की शब्दावली में *‘र’* सत्ताइसवां शब्द है, *‘आ’* की मात्रा दूसरा और *‘म’* पच्चीसवां शब्द है… अब तीनो अंको का योग करें तो 27 + 2 + 25 = *54*, *अर्थात एक “राम”* का योग 54 हुआ- *इसी प्रकार दो “राम राम”* का कुल *योग 108* होगा। हम जब कोई जाप करते हैं तो 108 मनके की माला गिनकर करते हैं। सिर्फ *’राम राम’* कह देने से ही पूरी *माला का जाप* हो जाता है।आपको सभी को 🌹🎊👏 *राम राम जी* 👏🎊

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रामायण अनेको है जिन्हें अलग अलग विद्वानों ने अलग अलग काल में लिखा ।


रामायण अनेको है जिन्हें अलग अलग विद्वानों ने अलग अलग काल में लिखा । इन सब में बहुत बहुत भेद है । यहाँ तक की कथा के कुछ भाग किसी में है और किसी में नहीं ।
इन सभी में किसे प्रमाणिक माना जाए ।

इस निर्णय की  2 ही कसोटी हो सकती है ।

पहली कसोटी रामायण के लेखक का काल । यानी जो लेखक श्री राम के जीवन काल के सबसे निकट वही सबसे ज्यादा सत्य जानता है अतः सबसे ज्यादा प्रमाणिक । इस आधार पर वाल्मीकि कृत रामायण सबसे ज्यादा प्रमाणिक व तुलसीदास कृत रामचरित मानस सबसे कम प्रमाणित ।
दूसरी कसोटी विज्ञान : ईश्वर ने ही विज्ञान के नियमो को बनाया और उन्ही का पालन करते हुए श्रष्टी की उत्पत्ति की ।

किसी भी घटना व कथा में जितनी ज्यादा अवैज्ञानिक बाते होंगी वह उतनी ही कम प्रमानिक होगी।
तुलसीदास जी की रामायण श्री राम के प्रति अगाध भक्ति में लिखी प्रेम व सौंदर्य में डूबि कृति है जिसमे उन्होंने अज्ञानता या मोह वश विज्ञान के नियमो की धज्जियाँ ही उड़ा दी है ।
जैसे रावण के दस सर का होना । रामसेतु का तैरने वाले पथरो से निर्माण । रावण की नाभि में अम्रत होना और सर कटने पर भी ना मरना। सीता माँ की अग्नि परीक्षा और उनका ना जलना। हनुमान जी के पूँछ होना ।
परंतु वाल्मीकि रामायण पढ़ने से स्पस्ट होता है की श्री राम वैद विद्वान थे और कोई भी घटना विज्ञान विरुद्ध नहीं घटि।
अतः वाल्मीकि रामायण ही सबसे ज्यादा प्रमाणिक है ।
अतः वही पढ़िए और श्री राम की तरह वैद विद्या प्राप्त कीजिये शारीरिक व मानसिक बल बढाए और समाज में पुनः धर्म की स्थापना कीजिये ।
नुराज आर्य अँधेड़ी