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आप सभी रामायण के सीता माता के स्वयम्बर प्रसंग से अवश्य ही अवगत होंगे


आप सभी रामायण के सीता माता के स्वयम्बर प्रसंग से अवश्य ही अवगत होंगे, राजा जनक शिव जी के वंशज थे तथा शिव जी का धनुष उनके यहाँ रखा हुआ था. राजा जनक ने कहा था कि जो राजा उस धनुष की प्रत्यंचा को चढा देगा (संचालित कर देगा) उसे ही सीतामाता वरण करेगी. शिव जी का धनुष कोई साधारण धनुष नहीं था बल्कि उस काल का परमाण्विक मिसाइल(ब्रह्मास्त्र) छोड़ने का एक यंत्र था. रावण कि दृष्टि उस पर लगी थी और इसी कारण वह भी स्वयम्बर में आया था. उसका विश्वास था कि वह शिव का अनन्य भक्त है,वह सीता को वरण करने में सफल होगा. जनक राज को भय था कि अगर यह रावण के हाथ लग गया तो सृष्टि का विनाश हो जायेगा,अतः इसका नष्ट हो जाना ही श्रेयस्कर होगा. उस चमत्कारिक धनुष के सञ्चालन कि विधि कुछ लोगों को ही ज्ञात थी, स्वयं जनक राज,माता सीता,आचार्य श्री परशुराम,आचार्य श्री विश्वामित्र ही उसके सञ्चालन विधि को जानते थे. आचार्य श्री विश्वमित्र ने उसके सञ्चालन की विधि प्रभु श्री राम को बताई तथा कुछ अज्ञात तथ्य को माता सीता ने श्री राम को वाटिका गमन के समय बताया. वह धनुष बहुत ही पुरातन था और प्रत्यंचा चढाते(सञ्चालन करते) ही टूट गया, आचार्य श्री परशुराम कुपित हुए कि श्री राम को सञ्चालन विधि नहीं आती है, पुनः आचार्य विश्वामित्र एवं लक्ष्मण के समझाने के बाद कि वह एक पुरातन यन्त्र था,संचालित करते ही टूट गया,आचार्य श्री परशुराम का क्रोध शांत हो गया. ++++++++++++++++++++++++ #प्राचीनसमृद्धभारत;—– साधारण धनुष नहीं था वह शिवजी का धनुष, उस ज़माने का आधुनिक परिष्कृत नियुक्लियर वेपन था. हमारे ऋषि मुनियों को तब चिंता हुई जब उन्होंने देखा की शिवजी के धनुष पर रावण जैसे लोगों की कुद्रष्टि लग गई है. जब इसपर विचार हुआ की इसका क्या किया जाये ? अंत में निर्णय हुआ की आगे भी गलत हाथ में जाने के कारण इसका दुरूपयोग होने से भयंकर विनाश हो सकता है अतः इसको नष्ट करना ही सर्वथा उचित होगा. हमारे ऋषियों(तत्कालीन विज्ञानिक) ने खोजा तो पाया की कुछ पॉइंट्स ऐसे हैं जिनको विभिन्न एंगिल से अलग अलग दवाव देकर इसको नष्ट किया जा सकता है. और यह भी निर्णय हुआ की इसको सर्वसमाज के सन्मुख नष्ट किया जाये. अब इसके लिए आयोजन और नष्ट करने हेतू सही व्यक्ति चुनने का निर्णय देवर्षि विश्वामित्र को दिया गया, तब सीता स्वम्वर का आयोजन हुआ और प्रभु श्रीराम जी द्वारा वह नष्ट किया गया। बोलो महापुरुष श्रीरामचन्द्र महाराज की जय ……. भारतवर्ष की गौरवशाली गाथा संसार में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिये शेयर करें। आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति ! आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति ! #साभार_संकलित:: जयति पुण्य सनातन संस्कृति,, जयति पुण्य भूमि भारत,,, सदा सर्वदा सुमंगल,, हर हर महादेव,, वंदेमातरम,,, जय भवानी, जय श्री राम,,,

विजय कृष्णा पांडेय

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भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक गए।


भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक गए। भगवान श्री राम के मृत्यु वरण में सबसे बड़ी बाधा उनके प्रिय भक्त हनुमान थे। क्योंकि हनुमान के होते हुए यम की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो राम के पास पहुँच चुके। पर स्वयं श्री राम से इसका हल निकाला। आइये जानते है कैसे श्री राम ने इस समस्या का हल निकाला। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। यह कथा अघोरी बाबाओ के श्रीमुख से प्राप्त हुई एक दिन, राम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है। “यम को मुझ तक आने दो। मेरे लिए वैकुंठ, मेरे स्वर्गिक धाम जाने का समय आ गया है”, उन्होंने कहा। लेकिन मृत्यु के देवता यम अयोध्या में घुसने से डरते थे क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था। यम के प्रवेश के लिए हनुमान को हटाना जरुरी था। इसलिए राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वंय का स्वरुप छोटा करते हुए बिलकुल भंवरे जैसा आकार बना लिया और केवल उस अंगूठी को ढूढंने के लिए छेद में प्रवेश कर गए, वह छेद केवल छेद नहीं था बल्कि एक सुरंग का रास्ता था जो सांपों के नगर नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया। वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए जहां अंगूठियों का पहाड़ जैसा ढेर लगा हुआ था! “यहां आपको राम की अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा। हनुमान सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे क्योंकि ये तो भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सौभाग्य से, जो पहली अंगूठी उन्होंने उठाई वो राम की अंगूठी थी। आश्चर्यजनक रुप से, दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम की ही अंगूठी थी। वास्तव में वो सारी अंगूठी जो उस ढेर में थीं, सब एक ही जैसी थी। “इसका क्या मतलब है?” वह सोच में पड़ गए। वासुकी मुस्कुराए और बाले, “जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं। दूसरे भाग या त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है और पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए यह सैकड़ो हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। अंगूठियां गिरती रहीं और इनका ढेर बड़ा होता रहा। भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां काफी जगह है”। हनुमान जान गए कि उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह राम का उनको समझाने का मार्ग था कि मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकेगा। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे। लष्मीकांत

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रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी.


रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी….. और, वे बस काल्पनिक महाकाव्य हैं…! दरअसल… वे ऐसे कर के …. भगवान और कृष्ण के को काल्पनिक बताना चाहते हैं… और, साथ ही ये भी प्रमाणित करना चाहते हैं कि….. हम हिन्दू काल्पनिक दुनिया में जीते हैं…! लेकिन…. हम हिन्दू भी हैं कि…. ऐसे सेक्यूलरों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए….. कहीं न कहीं से ….. सबूत जुगाड़ कर ही लाते हैं….! जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा….! उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि….. महाभारत का युद्घ आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्घ में पाण्डवों के साथ थे……. जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी। ऐसे समय में भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक ने….. अपनी माता को वचन दिया कि… युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा ! इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे। परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे …… ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये। श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि….. वह तीन वाण से भला क्या युद्घ लड़ेगा…????? कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि ……उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है ..तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा। इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि….. हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं… अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि…. तुम एक बाण से युद्घ का परिणाम बदल सकते हो। इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके……भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया.। जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया….। इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा… क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था…। भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्घ में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए….. और, माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी। इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की….। जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया… तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया… जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है। और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा…..और, श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं। सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है ….तथा, महाभारत युद्घ को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है,,,,। भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया… जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा। ============ और, ये सारी घटना …….. आधुनिक वीर बरबरान नामक जगह पर हुई थी…. जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं…! अब ये …. जाहिर सी बात है कि …. इस जगह का नाम वीर बरबरान…….. वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है…! आश्चर्य तो इस बात का है कि….. अपने महाभारत काल की गवाही देते हुए….. वो पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है….. जिसे वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर… अपने वाणों से छेदन किया था… और, आज भी इन पत्तो में छेद है । ( चित्र संलग्न) साथ ही….. सबसे बड़ी बात तो ये है कि……. जब इस पेड़ के नए पत्ते भी निकलते है ……तो उनमे भी छेद होता है ! सिर्फ इतना ही नहीं…. बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है…!

विक्रम प्रकाश राइसोनि

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श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?


🏹🏹🏹🏹🏹🏹कभी सोचा है की प्रभु 🏹🏹श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था? नहीं तो जानिये- 1 – ब्रह्मा जी से मरीचि हुए, 2 – मरीचि के पुत्र कश्यप हुए, 3 – कश्यप के पुत्र विवस्वान थे, 4 – विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था, 5 – वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की | 6 – इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए, 7 – कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था, 8 – विकुक्षि के पुत्र बाण हुए, 9 – बाण के पुत्र अनरण्य हुए, 10- अनरण्य से पृथु हुए, 11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ, 12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए, 13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था, 14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए, 15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ, 16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित, 17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए, 18- भरत के पुत्र असित हुए, 19- असित के पुत्र सगर हुए, 20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था, 21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए, 22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए, 23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे | 24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है | 25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए, 26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे, 27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए, 28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था, 29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए, 30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए, 31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे, 32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए, 33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था, 34- नहुष के पुत्र ययाति हुए, 35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए, 36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था, 37- अज के पुत्र दशरथ हुए, 38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए | इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ | शेयर करे ताकि हर हिंदू इस जानकारी को जाने.. 🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹 1:~मानस में राम शब्द = 1443 बार आया है। 2:~मानस में सीता शब्द = 147 बार आया है। 3:~मानस में जानकी शब्द = 69 बार आया है। 4:~मानस में बैदेही शब्द = 51 बार आया है। 5:~मानस में बड़भागी शब्द = 58 बार आया है। 6:~मानस में कोटि शब्द = 125 बार आया है। 7:~मानस में एक बार शब्द = 18 बार आया है। 8:~मानस में मन्दिर शब्द = 35 बार आया है। 9:~मानस में मरम शब्द = 40 बार आया है। 10:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे। 11:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं। 12:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है। 13:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है। 14:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है। 15:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है। 16:~मानस में छन्द संख्या = 86 है। 17:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का। 18:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में। 19:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी। 20:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी। 21:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला। 22:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला। 23:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ। 24:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं। 25:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं। 26:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए। 27:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में। 28:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर। यह जानकारी महीनों के परिश्रम केबाद आपके सम्मुख प्रस्तुत है । तीन को भेज कर धर्म लाभ कमाये जय श्री राम 🙏� जय श्री राम 🙏

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खाते-कमाते-अघाते मनोवृत्ति’ वाले हिंदुओं को पता होना चाहिए कि रामजन्मूभि के लिए 464 सालों में उनके कितने पूर्वजों का बलिदान हुआ है!


खाते-कमाते-अघाते मनोवृत्ति’ वाले हिंदुओं को पता होना चाहिए कि रामजन्मूभि के लिए 464 सालों में उनके कितने पूर्वजों का बलिदान हुआ है!

रामजन्मूभि मुक्ति आंदोलन आज से नहीं 489 वर्षों से चल रहा है। 1528 से 1992 तक 464 सालों में अनगिनत हिंदुओं ने इसके लिए प्राणोत्सर्ग किया है! लेकिन चार वामपंथी लेखकों ने न केवल इसे झुठलाने का प्रयास किया, अपितु यह भी साबित करने का प्रयास किया कि वहां कभी कोई राममंदिर था ही नहीं! राम कभी हुए ही नहीं!

इनमें सबसे बड़ी भूमिका वामपंथी और मुल्लापंथी का मिक्सचर-इरफान हबीब ने निभाया। उसके अलावा रोमिला थापर, आर.एस.शर्मा और डी.एन.झा-यही वो चार वामपंथी इतिहासकार हैं, जिन्होंने हिंदू-मुसलिम के बीच जहर घोलने का कार्य किया और देश को गुमराह किया।

इरफान हबीब खुद को इतिहासकार कहता है, लेकिन इस घटिया व्यक्ति को इतिहास का बेसिक तक पता नहीं है। इसके अनुसार अयोध्या में उस जगह पर कभी राम मंदिर था ही नहीं, यही नहीं, यह लिखता है कि रामकथा का उद्भव 18-19 वीं शताब्दी में हुआ है! यानी राम का नाम इससे पूर्व इस देश ने सुना ही नहीं!

जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 5000 पन्ने के निर्णय में रामजन्मूभि विवाद पर सबसे पहले दस्तावेज की जो जानकारी दी गयी है, वह 1858 की है। यह फैजाबाद जिला अदालत का निर्णय है। यानी इस मूढ़ इतिहासकार ने उपलब्ध दस्तावेजों का भी अध्ययन नहीं किया है!

जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय हिंदुओं के पक्ष में आया, तो इरफान हबीब ने भारत विभाजन की विचारधारा देने वाले अलीगढ़ मुसलियम विवि के इतिहासकारों का फोरम बनाकर एक बुकलेट छापा, जिसमें अदालत के निर्णय को झूठ ठहराने का प्रयास किया गया और ऐसी मनगढंत बातें लिखी गयी, जो उपलब्ध साक्ष्यों से कभी मेल ही नहीं खाती है! इसका एक एक झूठ धाराशायी होता चला गया! यह पतित बिरादरी सुप्रीम कोर्ट के आगामी निर्णय को लेकर इसीलिए डरी हुयी है! बाबरी मसजिद एक्शन कमेटी तो सिर्फ इनका पिछलग्गू है!

मैं इसीलिए कहता हूं कि आमजन अपने इतिहास को पढ़ें, जाने, समझे; अन्यथा केवल चार लोग देश का झूठा इतिहास लिख सकते हैं, आंखों के सामने की चीज को झुठला सकते हैं और समाज में विभाजन का बीज बो सकते हैं; अयोध्या इसका जीवंत उदाहरण है!

मेरी पुस्तक ‘राज-योगी: गोरखनाथ से आदित्यनाथ तक’ संक्षेप में आपको बताती है कि अयोध्या का आंदोलन पिछले 489 सालों से चल रहा है। हर भारतीय और हिंदू को अयोध्या के आंदोलन के बारे में जानना चाहिए, जिसके लिए साधु-संन्यासियों से लेकर सामान्य स्त्री-पुरुषों ने 1528 से 1992 तक लगातार बलिदान दिया है। ‘खाते-कमाते-अघाते मनोवृत्ति’ वाले हिंदुओं को पता चलना चाहिए कि उनके पूर्वजों ने इस केवल एक मंदिर के लिए हंसते-हंसते अनेकों बार अपना प्राण न्यौछावर किया है!

चूंकि आजादी के बाद 1949 में इसके लिए पहला आंदोलन योगी आदित्नाथ के दादा गुरू महंत दिग्विजयनाथ ने शुरू किया, फिर 1980 के दशक में इसकी शुरूआत योगी के गुरू महंत अवेद्यनाथ ने किया और आज नियति ने इस मंदिर के निर्माण का सुनहरा अवसर योगी को दिया है, इसलिए यह आंदोलन इस पुस्तक का हिस्सा है!

आखिर नियति क्यों नाथपंथियों और गोरखपीठ को बार-बार रामजन्मूभि पर ले जाकर खड़ी कर दे रही है? यह नाथपंथ का इतिहास पढकर ही पता चलेगा! #संदीपदेव #SandeepDeo

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रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः। ‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’


विजय कृष्ण पांडेय 

 

★रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
‘जिसमें योगी लोगों का मन
रमण करता है उसी को कहते
हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।★★

प्रभु श्री राम द्वारा रामेश्वर
महादेव की स्थापना,,,,

सैल बिसाल आनि कपि देहीं।
कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।

देखि सेतु अति सुन्दर रचना।
बिहसि कृपानिधि बोले बचना।।

परम रम्य उत्तम यह धरनी।
महिमा अमित जाइ नही बरनी।।

करिहउँ इहाँ संभु थापना।
मोरे हृदय परम कलपना।।

सुनि कपीस बहु दूत पठाए।
मुनिबर सकल बोली लै आये।।

लिंग थापि बिधिवत करि पूजा।
सिव समानप्रिय मोहि न दूजा।।

सिव द्रोही मम भगत कहावा।
सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।

संकर बिमुख भगती चह मोरी।
सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।

संकरप्रिय मम द्रोही
सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि
घोर नरक महूँ बास।।

भावार्थ:-

वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर
देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की
तरह ले लेते हैं।
सेतु की अत्यंत सुंदर रचना देखकर
कृपासिन्धु श्री रामजी हँसकर वचन
बोले-
यह(यहाँ की)भूमि परम रमणीय और
उत्तम है।
इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की
जा सकती।

मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा।
मेरे हृदय में यह महान्‌ संकल्प है।

श्री रामजी के वचन सुनकर वानरराज
सुग्रीव ने बहुत से दूत भेजे,जो सब श्रेष्ठ
मुनियों को बुलाकर ले आए।

शिवलिंग की स्थापना करके विधि
पूर्वक उसका पूजन किया
(फिर भगवान बोले-)
शिवजी के समान मुझको दूसरा कोई
प्रिय नहीं है।
जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा
भक्त कहलाता है,वह मनुष्य स्वप्न में
भी मुझे नहीं पाता।
शंकरजी से विमुख होकर (विरोध
करके) जो मेरी भक्ति चाहता है,वह
नरकगामी,मूर्ख और अल्पबुद्धि है।

जिनको शंकरजी प्रिय हैं,परन्तु जो
मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही
हैं और मेरे दास (बनना चाहते) हैं,
वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में
निवास करते हैं।

समस्त चराचर प्राणियोँ एवं विश्व का
कल्याण करो प्रभु रामेश्वर महादेव,,,

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे
पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुज
भास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं
तापहम्।
मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ
स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे
ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं
श्रीरामभूपप्रियम्।।

धर्म रुपी बृक्ष के मूल,विवेक रुपी समुद्र
को आनंद देने वाले पूर्णचंद्र,वैराग्य रूपी
कमल के सूर्य,पाप रूपी घोर अन्धकार
को निश्चय ही मिटने वाले,तीनों तापों को
हरने वाले,मोहरूपी बादलों के समूह को
छिन्न छिन्न भिन्न करने की विधि में
आकाश से उत्पन्न पवन स्वरुप,ब्रह्मा
जी के वंशज(आत्मज) तथा कलंक
नाशक मेरे(महाराज श्री राम चन्द्र जी)
प्रिय श्री शंकर जी की मैं वंदना करता हूँ।

कष्ट हरो,,काल हरो,,
दुःख हरो,,दारिद्र्य हरो,,,
हर,,,हर,,,महादेव,,,

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं
कालमत्तेभसिंह योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं
गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्म
वृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं
सरसिजनयनं देवमुर्वीशरुपम्।।

कामदेव के शत्रु शिव जी के सेव्य,
भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरने
वाले,कालरुपी मतवाले हाथी के
लियेसिंह के समान,योगियोँ के
स्वामी (योगीश्वर),ज्ञान के द्वारा
जानने योग्य,गुणोँ के निधि,अजेय.
निर्गुण,निर्विकार,माया से परे,देवताओँ
के स्वामी, दुष्टोँ के वध मेँ तत्पर,ब्राह्मण
वृन्द के एकमात्र देवता (रक्षक),जलवाले
मेघ के समान सुन्दर श्याम.कमल के से
नेत्रवाले,पृथ्वीपति (राजा) के रुप मेँ परम
देव श्रीराम जी की मैँ वन्दना करता हुँ।

राम से बड़ा राम का नाम !!!

★ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में राजा
दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब
से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं।★

★राजा दिलीप,राजा रघु एवं राजा
दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम
का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम
केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं,बल्कि
रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है,
रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही
नाम है ‘राम’।

★राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों
वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में
पायी जाती है।★

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।

‘जिसमें योगी लोगों का मन रमण
करता है उसी को कहते हैं ‘राम’।’

एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य ने कहाः “गुरुजी ! आपके कथनानुसार तो चार राम हुए।
ऐसा कैसे ?”

गुरूः “थोड़ी साधना कर,जपध्यानादि
कर,फिर समझ में आ जायेगा।”

साधना करके शिष्य की बुद्धि सूक्ष्म हुई,
तब गुरु ने कहाः

जीव राम घट-घट में बोले।
ईश राम दशरथ घर डोले।
बिंदु राम का सकल पसारा।
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।

शिष्य बोलाः “गुरुदेव ! जीव,ईश,बिंदु
व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही
हुए न ?”
गुरु ने देखा कि साधना आदि करके
इसकी मति थोड़ी सूक्ष्म तो हुई है।

किंतु अभी तक चार राम दिख रहे हैं।

गुरु ने करूणा करके समझाया कि,
“वत्स ! देख,घड़े में आया हुआ आकाश,
मठ में आया हुआ आकाश,मेघ में आया
हुआ आकाश और उससे अलग व्यापक
आकाश,ये चार दिखते हैं।

अगर तीनों उपाधियों – घट,मठ,और
मेघ को हटा दो तो चारों में आकाश तो
एक-का-एक ही है।

इसी प्रकारः

वही राम घट-घट में बोले।
वही राम दशरथ घर डोले।
उसी राम का सकल पसारा।
वही राम है सबसे न्यारा।।

★रोम-रोम में रमने वाला चैतन्यतत्व
वही का वही है और उसी का नाम है
चैतन्य “राम” वे ही श्री राम जिस दिन
दशरथ कौशल्या के घर साकार रूप
में अवतरित हुए,
उस दिन को भारतवासी श्रीरामनवमी
के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।

कैसे हैं वे श्रीराम ? भगवान श्रीराम
नित्य कैवल्य ज्ञान में विचरण करते थे।

वे आदर्श पुत्र,आदर्श शिष्य,आदर्श
मित्र एवं आदर्श शत्रु थे।

आदर्श शत्रु ! हाँ,आदर्श शत्रु थे,तभी तो
शत्रु भी उनकी प्रशंसा किये बिना न रह
सके।

कथा आती है कि लक्ष्मण जी के द्वारा
मारे गये मेघनाद की दाहिनी भुजा सती
सुलोचना के समीप जा गिरी।

सुलोचना ने कहाः’अगर यह मेरे पति की
भुजा है तो हस्ताक्षर करके इस बात को
प्रमाणित कर दे।’

कटी भुजा ने हस्ताक्षर करके सच्चाई
स्पष्ट कर दी।

सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’
किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था।
फिर वह कैसे सती होती ! जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर
अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा।

तब रावण ने उत्तर दियाः “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव
प्राप्त करो।

जिस समाज में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान,
परम जितेन्द्रिय श्री लक्ष्मण तथा एकपत्नी
व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं,
उस समाज में तुम्हें जाने से डरना
नहीं चाहिए।

★मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य
महापुरुषोंके द्वारा तुम निराश
नहीं लौटायी जाओगी।”★

जब रावण सुलोचना से ये बातें कह
रहा था,उस समय कुछ मंत्री भी उसके
पास बैठे थे।

उन लोगों ने कहाः
“जिनकी पत्नी को आपने बंदिनी बना
कर अशोक वाटिका में रख छोड़ा है,
उनके पास आपकी बहू का जाना
कहाँ तक उचित है ?

यदि यह गयी तो क्या सुरक्षित वापस
लौट सकेगी ?”

यह सुनकर रावण बोलाः “मंत्रियो !
लगता है तुम्हारी बुद्धि विनष्ट हो गयी है।

★अरे ! यह तो रावण का काम है जो
दूसरे की स्त्री को अपने घर में बंदिनी
बनाकर रख सकता है, राम का नहीं।★

धन्य है श्रीराम का दिव्य चरित्र !

जिसका विश्वास शत्रु भी करता है
और प्रशंसा करते थकता नहीं !
प्रभु श्रीराम का पावन चरित्र दिव्य
होते हुए भी इतना सहज सरल है
कि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन
में भी उसका अनुसरण कर सकता है।

—नर या नारायण कौन थे ‘राम’

श्रीराम पूर्णतः ईश्वर हैं।
भगवान हैं।
साथ ही पूर्ण मानव भी हैं।
उनके लीला चरित्र में जहां एक ओर
ईश्वरत्व का वैचित्रमय लीला विन्यास
है,वहीं दूसरी ओर मानवता का प्रकाश
भी है।

विश्वव्यापिनी विशाल यशकीर्ति के
साथ सम्यक निरभिमानिता है।
वज्रवत न्याय कठोरता के साथ
पुष्यवत प्रेमकोमलता है।

अनंत कर्ममय जीवन के साथ
संपूर्ण वैराग्य और उपरति है।

समस्त निषमताओं के साथ
नित्य सहज समता है।
अनंत वीरता के साथ मनमोहक
नित्य सौंदर्य है।

इस प्रकार असंख्य परस्पर विरोधी
गुणों और भावों का समन्वय है।

भगवान श्री राम की लीला चरित्रों का
श्रद्धा भक्ति के साथ चिंतन,अध्ययन
व विचार करने पर साधारण नर नारी
भी सर्वगुण समन्वित एवं सर्वगुण
रहित अखिल विश्व व्यापी,सर्वातीत,
सर्वमय श्रीराम को अपने निकटस्थ
अनुभव कर सकते हैं।

श्री राम में नर और नारायण तथा मानव और ईश्वर की दूरी मिटाकर भगवान के नित्य परिपूर्ण स्वरूप का परिचय मिलता है।

भगवान पुरुषोत्तम ने श्री राम के रूप में प्रकट होकर मानवीय रूप में सांसारिक लोगों के दिलो दिमाग पर नित्य प्रभुत्व की प्रतिष्ठा कर समस्त भारतीय संस्कृति को आध्यात्म भाव से ओतप्रोत कर दिया है।

रामचरितमानस महाकवि तुलसीदास
की अमर कृति है।

यह एक ऐसा सर्वोपयोगी आदर्श
प्रदर्शित करने वाला पवित्र धर्मग्रंथ है।
जिसने मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम को समस्त नर नारियों के हृदय में परम देवत्व रूप के साथ अत्यंत आत्मीय रूप
में प्रतिष्ठित किया है।

इसने शिक्षित अशिक्षित आबाल वृद्ध
स्त्री पुरुष सभी प्रकार के जीवन को
श्रीराम के प्रति भक्ति तथा प्रेम के
दिव्य,मधुर सुधारस से अभिषिक्त
कर अपना अद्भुत प्रभाव विस्तार
किया है।

श्रीरामचरितमानस के श्रीराम
सर्वसद्गुण संपन्न मर्यादारक्षक
परम आदर्श शिरोमणि होने के
साथ ही स्वमहिमा में स्थित
महामानव है।

श्रीरामचरित मानस के श्रवण,मनन
तथा चिंतन से अत्यंत विष्यासक्त,
असदाचारी कठोर हृदय मानव भी
पवित्र विचार परायण एवं सदाचारी
होकर निर्मल प्रेम भक्ति की रसधारा
में सराबोर होकर मुक्ति प्राप्त कर
सकता है।

इस ग्रंथ के सभी पात्र आदर्श चरित्र
से परिपूर्ण हैं।

इसमें गुरु शिष्य,माता पिता,भ्राता पुत्र
स्वामी सेवक,प्रेम सेवा,क्षमा,वीरता,दान,
त्याग,धर्मनीति आदि संपूर्ण आदर्शों के
प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।

यही कारण है कि इस ग्रंथ का सर्वत्र समादर है।
तथा यह सर्वप्रिय ग्रंथ है।
श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों को अधिकांश मानव मंत्रवत कर जप
परायण करते हैं।

वाल्मीकि ने श्री रामायण की रचना करते समय श्रीराम कथा के रूप में मानवता की
कथा कही है।

उन्होंने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से विश्व के मानवों को मानवता का संदेश दिया है।
राम जैसा नर मानव है।

राम के समान चरित से मानवता की
प्राप्ति होती है।

राम एक ऐसे सेतु हैं जहां एक छोर
से शुरू होकर मनुष्य दूसरे छोर पर
परमात्मा तक पहुंच जाता है।

उन्हीं पूर्णाभिराम श्रीराम के दिव्य गुणों
को अपने जीवन में अपनाकर श्रीराम
तत्त्व की ओर प्रयाण करने के पथ पर
अग्रसर हो,
यही अभ्यर्थना… यही शुभ कामना….

नमामि रामं रघुवंशनाथं !
#साभार_संकलित;

ॐ नमः शिवाय
नमामि रामं रघुवंश नाथं

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,
ॐ नमः शिवाय,,,
जय भवानी,,
जय श्री राम

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पढ़ें तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है


*पढ़ें तुलसीदास जी ने भी बाबरी मस्जिद का उल्लेख किया है!*

आम तौर पर हिंदुस्तान में ऐसे परिस्थितियां कई बार उत्पन्न हुई जब राम -मंदिर और बाबरी मस्जिद (ढांचा ) एक विचार-विमर्श का मुद्दा बना और कई विद्वानों ने चाहे वो इस पक्ष के हो या उस पक्ष के अपने विचार रखे . कई बार तुलसीदास रचित रामचरित मानस पर भी सवाल खड़े किये गए की अगर बाबर ने राम -मंदिर का विध्वंश किया तो तुलसीदास जी ने इस घटना का जिक्र क्यों नही किया .
सच ये है कि कई लोग तुलसीदास जी कि रचनाओं से अनभिज्ञ है और अज्ञानतावश ऐसी बातें करते हैं . वस्तुतः रामचरित्रमानस के अलावा तुलसीदास जी ने कई अन्य ग्रंथो की भी रचना की है . तुलसीदास जी ने तुलसी शतक में इस घंटना का विस्तार से विवरण भी दिया है .

हमारे वामपंथी विचारको तथा इतिहासकारो ने ये भ्रम की स्थति उतप्पन की , कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नही है . श्री नित्यानंद मिश्रा ने जिज्ञाशु के एक पत्र व्यवहार में “तुलसी दोहा शतक ” का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है | हमनें भी उस अर्थो को आप तक पहुंचने का प्रयास किया है | प्रत्येक दोहे का अर्थ उनके नीचे दिया गया है , ध्यान से पढ़ें |

*(1) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।*
*जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

*(2) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।*
*भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

*(3) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।*
*हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

*(4) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।*
*तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥*

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।

*(5) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।*
*जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥*

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

*(6) दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।*
*तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥*

मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

*(7) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।*
*तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥*

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

*(8)रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।*
*तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया
है!
– डॉक्टर वैद्य पण्डित विनय कुमार उपाध्याय