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रामायण कथा का एक अंश
जिससे हमे सीख मिलती है “एहसास” की…
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श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता’ मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत पथरीली और कंटीली थी !
की यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया !

श्रीराम रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे !
बोले- “माँ, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी ?”

धरती बोली- “प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !”

प्रभु बोले, “माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना !
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना !
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे आघात मत करना”

श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !
पूछा- “भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है ?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी व्याकुलता क्यों ?”

श्री राम बोले- “नही…नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा !”

“हृदय विदीर्ण !! ऐसा क्यों प्रभु ?”,
धरती माँ जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !

“अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि…इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे !
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना..!!”

अर्थात
रिश्ते अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।
जहाँ गहरी आत्मीयता नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु दिखावा हो सकता है ।
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इसीलिए कहा गया है कि…
रिश्तेखून से नहीं, परिवार से नही,
मित्रता से नही, व्यवहार से नही,
बल्कि…
सिर्फ और सिर्फ आत्मीय “एहसास” से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं।
जहाँ एहसास ही नहीं,
आत्मीयता ही नहीं ..
वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा l
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हम सबके लिए प्रेरणास्पद लघुकथा ✍✍
इन शब्दो ने यदि आपकी आत्मा को छुआ हो कृपया इन शब्दो को आगे बढाए ।
🕉🙏 🙏🌹🌹🕉

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क्यों मिला माता सीता को वनवास
😢😢
एक बार सीता अपनी सखियों के साथ मनोरंजन के लिए महल के बाग में गईं,उन्हें पेड़ पर बैठे तोते का एक जोड़ा दिखा,दोनों तोते आपस में सीता के बारे में बात कर रहे थे,एक ने कहा-अयोध्या में एक सुंदर और प्रतापी कुमार हैं,जिनका नाम श्रीराम है,उनसे जानकी का विवाह होगा,श्रीराम ग्यारह हजार वर्षों तक इस धरती पर शासन करेंगे,सीता-राम एक दूसरे के जीवन साथी की तरह इस धरती पर सुख से जीवन बिताएंगे,सीता ने अपना नाम सुना तो दोनों पक्षी की बात गौर से सुनने लगीं,उन्हें अपने जीवन के बारे में और बातें सुनने की इच्छा हुई,सखियों से कहकर उन्होंने दोनों पक्षी पकड़वा लिए सीता ने उन्हें प्यार से पुचकारा और कहा- डरो मत तुम बड़ी अच्छी बातें करते हो यह बताओ ये ज्ञान तुम्हें कहां से मिला,मुझसे भयभीत होने की जरूरत नहीं,दोनों का डर समाप्त हुआ,वे समझ गए कि यह स्वयं सीता हैं. दोनों ने बताया कि वाल्मिकी नाम के एक महर्षि हैं वे उनके आश्रम में ही रहते हैं वाल्मिकी रोज राम-सीता जीवन की चर्चा करते हैं वे यह सब सुना करते हैं और सब कंठस्थ हो गया है
सीता ने और पूछा तो शुक ने कहा-दशरथ पुत्र राम शिव का धनुष भंग करेंगे और सीता उन्हें पति के रूप में स्वीकार करेंगी,तीनों लोकों में यह अद्भुत जोड़ी बनेगी,सीता पूछती जातीं और शुक उसका उत्तर देते जाते,दोनों थक गए,उन्होंने सीता से कहा यह कथा बहुत विस्तृत है,कई माह लगेंगे सुनाने में यह कह कर दोनों उड़ने को तैयार हुए,सीता ने कहा-तुमने मेरे भावी पति के बारे में बताया है. उनके बारे में बड़ी जिज्ञासा हुई है जब तक श्रीराम आकर मेरा वरण नहीं करते मेरे महल में तुम आराम से रहकर सुख भोगो,शुकी ने कहा- देवी हम वन के प्राणी है. पेडों पर रहते सर्वत्र विचरते हैं,मैं गर्भवती हूं,मुझे घोसले में जाकर अपने बच्चों को जन्म देना है,सीताजी नहीं मानी,शुक ने कहा-आप जिद न करें,जब मेरी पत्नी बच्चों को जन्म दे देगी तो मैं स्वयं आकर शेष कथा सुनाउंगा,अभी तो हमें जाने दें
सीता ने कहा-ऐसा है तो तुम चले जाओ लेकिन तुम्हारी पत्नी यहीं रहेगी,मैं इसे कष्ट न होने दूंगी शुक को पत्नी से बड़ा प्रेम था वह अकेला जाने को तैयार न था शुकी भी अपने पति से वियोग सहन नहीं कर सकती थी उसने सीता को कहा-आप मुझे पति से अलग न करें मैं आपको शाप दे दूंगी,सीता हंसने लगीं. उन्होंने कहा- शाप देना है तो दे दो. राजकुमारी को पक्षी के शाप से क्या बिगड़ेगा शुकी ने शाप दिया-एक गर्भवती को जिस तरह तुम उसके पति से दूर कर रही हो उसी तरह तुम जब गर्भवती रहोगी तो तुम्हें पति का बिछोह सहना पड़ेगा. शाप देकर शुकी ने प्राण त्याग दिए,पत्नी को मरता देख शुक क्रोध में बोला- अपनी पत्नी के वचन सत्य करने के लिए मैं ईश्वर को प्रसन्न कर श्रीराम के नगर में जन्म लूंगा और अपनी पत्नी का शाप सत्य कराने का माध्यम बनूंगा
वही शुक(तोता) अयोध्या का धोबी बना जिसने झूठा लांछन लगाकर श्रीराम को इस बात के लिए विवश किया कि वह सीता को अपने महल से निष्काषित कर दें.
गोविन्द🙏🏻🙏🏻

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संजय गुप्ता

मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई!!!!!!!

मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात में श्रीराम और लक्ष्मण के समक्ष भगवती महाशक्ति प्रकट हो गईं। देवी उस समय सिंह पर बैठी हुईं थीं।…

श्रीराम ने किष्किंधा पर्वत पर किया था शारदीय नवरात्र व्रत। उनके व्रत-अनुष्ठान का क्या था प्रयोजन? मान्यता है कि शारदीय नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई और रावण पर विजय भी। इसलिए इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है।

मार्कंडेयपुराण के अनुसार, ‘दुर्गासप्तशतीÓ में स्वयं भगवती ने इस समय शक्ति-पूजा को महापूजा बताया है। अन्य धर्मग्रंथों में भी शारदीय नवरात्र की महत्ता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने भी अजेय रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए इस व्रत का विधिवत अनुष्ठान किया था।

रावण ने सीता का हरण कर लिया, जिससे श्रीराम दुखी और चिंतित थे। किष्किंधा पर्वत पर वे लक्ष्मण के साथ रावण को पराजित करने की योजना बना रहे थे। उनकी सहायता के लिए उसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे।

उन्हें आया देखकर श्रीराम उठ खड़े हुए। उन्होंने नारद को आसन पर बैठाकर उनका स्वागत किया। श्रीराम को दुखी देखकर देवर्षि बोले, ‘राघव! आप साधारण लोगों की भांति दुखी क्यों हैं? दुष्ट रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है- यह बात मुझे मालूम है। अपने सिर पर मंडराती हुई मृत्यु को न जानने के कारण ही उसने यह कुकर्म किया है। रावण का वध ही आपके अवतार का प्रयोजन है, इसीलिए सीता का हरण हुआ है।

रावण के वध का उपाय बताते हुए देवर्षि नारद ने श्रीराम को यह परामर्श दिया, ‘आश्विन मास के नवरात्र-व्रत का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करें। नवरात्र में उपवास, भगवती-पूजन, मंत्र का जप और हवन मनोवांछित सिद्धि प्रदान करता है। पूर्वकाल में ब्रह्म, विष्णु, महेश और देवराज इंद्र भी इसका अनुष्ठान कर चुके हैं। किसी विपत्ति या कठिन समस्या में घिर जाने पर मनुष्य को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। भृगु, वसिष्ठ, कश्यप और विश्वमित्र जैसे ऋषि भी इस व्रत का अनुष्ठान कर चुके हैं।

नारद ने संपूर्ण सृष्टि का संचालन करने वाली उस महाशक्ति का परिचय राम को देते हुए बताया कि वे सभी जगह विराजमान रहती हैं। उनकी कृपा से ही समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं। आराधना किए जाने पर भक्तों के दुखों को दूर करना उनका स्वाभाविक गुण है। त्रिदेव-ब्रह्म,विष्णु, महेश उनकी दी गई शक्ति से सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार करते हैं।

श्रीराम ने देवर्षि नारद से नवरात्र के व्रत और देवी की उपासना की विधि पूछी। इस पर वे बोले- ‘राम! समतल भूमि पर एक सिंहासन रखकर उस पर भगवती जगदंबा को विराजमान कर दें। नौ दिनों तक उपवास रखते हुए उनकी आराधना करें। पूजा विधिपूर्वक होनी चाहिए। आप के इस अनुष्ठान का मैं आचार्य बनूंगा। आपका प्रयोजन शीघ्र सिद्ध हो, इसके लिए मेरे मन में प्रबल उत्साह उत्पन्न हो रहा है।

राम ने नारद के निर्देश पर एक उत्तम सिंहासन बनवाया और उस पर कल्याणमयी भगवती जगदंबा की मूर्ति विराजमान की। नवरात्र में व्रत रखकर श्रीराम ने विधि-विधान के साथ देवी-पूजन किया। श्रीराम ने नौ दिनों तक उपवास करते हुए सभी नियमों का पालन भी किया। उनके साथ लक्ष्मण ने भी यह नवरात्र-व्रत किया।

मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात में श्रीराम और लक्ष्मण के समक्ष भगवती महाशक्ति प्रकट हो गईं। देवी उस समय सिंह पर बैठी हुईं थीं। पर्वत के ऊंचे शिखर पर विराजमान होकर भगवती ने प्रसन्न-मुद्रा में कहा- ‘श्रीराम! मैं आपके व्रत से संतुष्टï हूं।

जो आपके मन में है, वह मुझसे मांग लें। सभी जानते हैं कि रावण-वध के लिए ही आपने पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में अवतार लिया है। आप भगवान विष्णु के अंश से प्रकट हुए हैं और लक्ष्मण शेषनाग के अवतार हैं। सभी वानर देवताओं के ही अंश हैं, जो युद्ध में आपके सहायक होंगे। इन सबमें मेरी शक्ति निहित है। आप अवश्य रावण का वध कर सकेंगे। अवतार का प्रयोजन पूर्ण हो जाने के बाद आप अपने परमधाम चले जाएंगे।

इस प्रकार श्रीराम के शारदीय नवरात्र-व्रत से प्रसन्न भगवती उन्हें मनोवांछित वर देकर अंतर्धान हो गईं। महाशक्ति से वरदान पाकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और युद्ध में असत्य के प्रतीक रावण का वध किया।

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एस एन व्यास

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   ‼ *🔴दिव्य ज्ञान धारा🔴*‼
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‼हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे‼
‼हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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🌞 प्रातः वंदन 🙏🏻 जय जय सियाराम 🚩

🗣श्रीराम के जन्म की सत्यता प्रमाणित करते हैं , ये तथ्य!!!

👉राम – ईश्वर या महापुरुष

भगवान राम के जन्म लेकर धरती पर अवतरित होने की घटना हमेशा से ही चर्चा का विषय रही है। कई बार यह प्रमाणित करने की कोशिश की जाती रही है कि इस कथन में कोई सत्यता नहीं है कि त्रेतायुग में जन्मे अयोध्या के राजा राम कोई चमत्कारी पुरुष थे। इस बात को सिद्ध करने के लिए कई प्रयत्न किए गए कि वह महज़ एक राजा थे ना कि विष्णु के अवतार, जिन्होंने अपनी चमत्कारी ताकतों द्वारा असुर सम्राट रावण का अंत किया था।

👉रामसेतु

यही वजह है कि रामायण में उल्लिखित रामसेतु, जिस पर चढ़कर राम और उनकी सेना ने लंका पर आक्रमण किया था, को भी भगवान राम की वानर सेना द्वारा बनाया गया मानने से इनकार किया जाता रहा है।

👉शोध

जहां एक ओर अनेक तथ्यों द्वारा भगवान राम की सत्यता पर संदेह किया जाता रहा है वहीं बहुत से शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने अपने-अपने दावों और शोधों से यह पुख्ता किया है कि भगवान राम एक चमत्कारी पुरुष थे और उन्होंने धरती पर जन्म लिया था।

👉रामायण की सत्यता

गादर कामिल बुल्के ने अपने शोध के द्वारा 300 ऐसे प्रमाण पेश किए थे जिनके आधार पर राम के जन्म की घटना को सत्य कहा जा सकता है। भगवान राम से जुड़ा एक अन्य शोध चेन्नई की एक गैर सरकारी संस्था द्वारा किया गया, जिसके अनुसार राम का जन्म 5,114 ईसापूर्व हुआ था। इस शोध के अनुसार राम के जन्म को करीब 7,123 वर्ष हो चुके हैं।

👉नक्षत्रों की गणना

वाल्मीकि रामायण में उल्लिखित राम के जन्म के समय के नक्षत्रों की स्थिति को ‘प्ले‍नेटेरियम’ नामक सॉफ्टवेयर से गणना की गई तो उस समय और तारीख का स्पष्ट ज्ञान हो गया जिस समय राम ने धरती पर जन्म लिया था। प्लेनेटेरियम एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो आगामी सूर्य और चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणियों के साथ-साथ गत लाखों सालों के हालातों का भी वर्णन कर सकता है।

👉लव-कुश का जन्म

राम के पुत्र लव-कुश के विषय में भी शोध संपन्न किए गए, जिनके अनुसार यह प्रमाणित हुआ कि लव-कुश की 50वीं पीढ़ी से शल्य वंश का उद्भव हुआ था जिन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से युद्ध किया था। इसे आधार माना जाए तो लव और कुश का जन्म महाभारत काल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुआ था यानि आज से करीब 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व।

👉संस्कृतियां और पौराणिक ग्रंथ

राम के जन्म लेने का प्रमाण केवल भारत में ही नहीं बल्कि अनेक देशों में लिखी गई पुस्तकों और ग्रंथों में भी मिलता है। बाली, जावा, सुमात्रा, नेपाल, लाओस, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, कंपूचिया, मलेशिया, श्रीलंका और थाईलैंड आदि देशों की संस्कृतियों व पौराणिक ग्रंथों द्वारा आज भी वहां राम को जीवित रखा गया है।

👉पवित्र ग्रंथ रामायण

हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ रामायण के रचयिता वाल्मीकि ने रामायण की रचना भगवान राम के काल के दौरान ही की थी। इसी वजह से इस ग्रंथ को सबसे अधिक प्रमाणिक भी माना जाता है। वाल्मीकि ने पुराणों में गठित इतिहास को मिथकीय स्वरूप द्वारा रामायण में गढ़ा था। इसमें तथ्यों की क्रमबद्धता ना होने की वजह से ही शायद राम के जन्म को लेकर विवाद कायम रहा है।

👉तुलसीदास

इसके बाद गोस्वामी तुलसीदास, जिनका जन्म सन् 1554 ई. हुआ था, ने रामचरित मानस की रचना की। सत्य है कि रामायण से अधिक रामचरित मानस को लोकप्रियता मिली है लेकिन यह ग्रंथ भी रामायण के तथ्यों पर ही आधारित है।

👉प्राचीनकाल में रचना

संस्कृत के अलावा तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि को प्राचीनकाल में ही लिख दिया गया था।

👉विदेशी रामायण

भारत के अलावा विदेशी भाषा में भी रामायण की रचना हुई जिनमें कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम, मलेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रमुख हैं।

👉राम कथा का प्रभाव

इन सभी के अलावा अन्य भी बहुत से ऐसे देश हैं जहां रामायण को लिखा गया। इससे यह प्रमाणित होता है कि केवल भारत में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी राम कथा का गहरा प्रभाव रहा है।

👉श्रीलंका में रामायण

संस्कृत और पालि साहित्य का प्राचीनकाल से ही श्रीलंका से गहरा संबंध रहा है। रामायण समेत अन्य कई भारतीय महाकाव्यों के आधार पर रचित जानकी हरण के श्रीलंकाई रचनाकार और वहां के राजा, कुमार दास को कालिदास के घनिष्ठ मित्र की संज्ञा दी जाती है। इतना ही नहीं सिंघली भाषा में लिखी गई मलेराज की कथा भी राम के जीवन से ही जुड़ी हुई है।

👉बर्मा और कंपूचिया में रामायण

शुरुआती दौर में बर्मा को ब्रह्मादेश के नाम से जाना जाता था। बर्मा की प्राचीनतम रचना रामवत्थु श्री राम के जीवन से ही प्रभावित है। इसके अलावा लाओस में भी रामकथा के आधार पर कई रचनाओं का विकास हुआ, जिनमें फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), ख्वाय थोरफी, पोम्मचक (ब्रह्म चक्र) और लंका नाई आदि प्रमुख हैं।

👉इंडोनेशिया और जावा की रामायण

प्रारंभिक काल में इंडोनेशिया और मलेशिया में पहले हिन्दू धर्म के लोग ही रहा करते थे लेकिन फिलिपींस के इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बाद वहां धार्मिक हिंसा ने जन्म लिया, जिसकी वजह से समस्त देश के लोगों ने इस्लाम को अपना लिया। इसलिए जिस तरह फिलिपींस में रामायण का एक अलग ही स्वरूप विद्यमान है कुछ उसी तरह इंडोनेशिया और जावा की रामायण भी उसी से मिलती-जुलती है।

👉कावी भाषा में रचना

डॉ. जॉन. आर. फ्रुकैसिस्को ने फिलिपींस की मारनव भाषा में रचित एक रामकथा को खोजा जिसका नाम मसलादिया लाबन दिया गया। रामकथा पर आधारित जावा की प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’ है। काकावीन की रचना जावा की प्राचीनतम कावी भाषा में हुई है।

👉रावण का ननिहाल था मलेशिया

13वीं शताब्दी में मलेशिया का भी इस्लामीकरण हुआ। यहां रामकथा पर एक विस्तृत ग्रंथ की रचना हुई जिसका नाम है ‘हिकायत सेरिराम’। माना जाता है मूल रूप से मलेशिया पर रावण के मामा का शासन था।

👉जंबू द्वीप के सम्राट थे दशरथ

चीनी रामायण को ‘अनामकं जातकम्’ और ‘दशरथ कथानम्’ ने नाम से जाना जाता है। इन दोनों ही ग्रंथों में रामायण के अलग-अलग पात्रों का जिक्र है। इन चीनी रामायणों के अनुसार राजा दशरथ अयोध्या के नहीं बल्कि जंबू द्वीप के सम्राट थे जिनके पहले पुत्र का नाम लोमो था। चीनी लोक कथाओं के अनुसार राम का जन्म 7,323 ईसापूर्व हुआ था।

👉वानर सेना की प्रतिमाएं

चीन की अपेक्षा उसके उत्तर-पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को राम के जीवन की विस्तृत जानकारी है। वहां रहने वाले लामाओं के घरों या निवास स्थलों से राम की सेना यानि वानरों की कई प्रतिमाएं मिलती हैं। मंगोलिया से राम के जीवन से जुड़ी कई पांडुलिपियां भी प्राप्त हुई हैं।

👉राम से परिचित हैं तिब्बत के लोग

तिब्बत के लोग रामकथा को किंरस-पुंस-पा से जानते हैं। प्राचीनकाल से ही यहां वाल्मीकि रामायण काफी प्रख्यात रही है। तिब्बत के तुन-हुआंग नामक स्थल से रामायण की छ: प्रतियां भी प्राप्त हुई हैं।

✍~रामचरणानुरागी🙏😊

     🙏🔥जय श्री राम🔥🙏
  🔅‼राम शरणम ममः‼🔅
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हनुमानजीकीउड़नेकी_गती….

बचपन में जब हमारे बड़े हमें रामायण की कहानियां सुनाया करते थे तब हमें लक्ष्मण जी के बेहोश होने पर हनुमान जी का संजीवनी बूटी लेने जाना व जाने का किस्सा सुनाया जाता था जिसमे संजीवनी बूटी ना मिलने पर पूरा का पूरा पर्वत उठाकर लाने वाला किस्सा रोचक लगता था। क्या कभी आपने यह सोचा कि उनके उड़ने की गति क्या होगी ? जिस तरह से हनुमान जी एक ही रात में श्रीलंका से हिमालय के पर्वतों पर पहुंचे ? और पहाड़ उठाकर वापस भी आ गए तो निश्चित ही उनके उड़ने की क्षमता बेहद तेज रही होगी। लेकिन कितनी तेज ? इस बात का सही सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन फिर भी आपके मन में उठ रहे सवालों के जवाब खोजने के लिए हमने कुछ तथ्यों का सहारा लिया और गुणा भाग करके हनुमान जी की रफ्तार जानने की कोशिश की है।

अगर इसमे कोई गलती या चुक होने कि संभावना भी हो सकती है। जहां तक हमारी जानकारी है जिस वक्त लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध होने वाला था उससे ठीक पहले मेघनाथ ने अपनी कुलदेवी की तपस्या शुरू की थी और वह तपस्या मेघनाथ ने पूरा दिन की थी। इस पूजा की खबर जब श्रीराम व उनकी सेना को लगी तो विभीषण ने बताया कि अगर मेघनाथ की तपस्या पूर्ण हो गई तो मेघनाथ अमर हो जाएगा उसके बाद तीनों लोकों में मेघनाथ को कोई नहीं मार सकेगा। इसीलिए मेघनाथ की तपस्या किसी तरीके से भंग कर के उसे अभी युद्ध के लिए ललकारना होगा। इसके बाद हनुमान जी सहित कई वानर मेघनाथ की तपस्या भंग करने गए। उन्होंने अपनी गदा के प्रहार से मेघनाथ की तपस्या भंग करने में सफलता प्राप्त की लेकिन तब तक रात हो चुकी थी।

लक्ष्मण जी ने रात को ही मेघनाथ को युद्ध के लिए ललकारा, रामायण के अनुसार उस समय रात्रि का दूसरा पहर शुरु हो चुका था। दोस्तों रात्रि का पहला पहर सूर्य अस्त होते ही शुरू हो जाता है और सूर्य उदय होने के साथ ही रात्रि का अंतिम यानी चौथा पहर खत्म हो जाता है। यानी चार पहर होते हैं। इसका मतलब प्रत्येक पहर 3 घंटे का हुआ अब अगर आधुनिक काल की घड़ी के हिसाब से देखें तो लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध रात के करीब 9:00 बजे शुरू हुआ होगा। यह भी कहा जाता है कि लक्ष्मण जी और मेघनाथ के बीच बेहद घनघोर युद्ध हुआ था जो लगभग 1 पहर यानी 3 घंटे तक चला था उसके बाद मेघनाथ ने अपने शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग किया जिससे लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। लक्ष्मण जी के मूर्छित होने का समय लगभग 12:00 बजे के आसपास का रहा होगा।

लक्ष्मण जी के मूर्छित होने से समस्त वानर सेना में हड़कंप मच गया मेघनाथ ने मूर्छित लक्ष्मण को उठाने की जी तोड़ कोशिश की लेकिन जो शेषनाग समस्त पृथ्वी को अपने फन पर उठा सकता था उसी शेषनाग के अवतार को भला मेघनाथ कैसे व क्या उठा पाता। लक्ष्मण जी को ना उठा पाने पर मेघनाथ वापस चला गया। श्री राम अपने प्राणों से भी प्यारे भाई को मूर्छित देखकर शोक में डूब गए, उसके बाद विभीषण के कहने पर हनुमान जी लंका में से लंका के राज्य वैद्य को जबरदस्ती उठा लाए। लक्ष्मण जी अगर 12:00 बजे मूर्छित हुए तो जाहिर है उसके बाद श्री राम के शोक और विभीषण द्वारा सुषेण वैद्य लाने के लिया कहना और हनुमान जी द्वारा सुषेण वैद्य को उठा लाना इन सब में कम से कम 1 घंटा तो लग ही गया होगा। यानी रात्रि के करीब 1:00 बज चुके होंगे | इसके बाद वैद्य द्वारा लक्ष्मण की जांच करने और उनके प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने की सलाह देने और हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रस्थान करने में भी कम से कम आधा घंटा जरूर लगा होगा।

तो हम ये मान सकते हैं कि बजरंगबली हनुमान आज के समय के अनुसार करीब रात्रि में 1:30 पर संजीवनी बूटी लाने के लिए रावण की नगरी से उड़े होंगे। जहां तक सवाल उनके वापस आने का है तो निश्चित ही वह सूर्य उदय होने से पहले वापस आ गए होंगे। यानि की बजरंगबली के वापस आने का समय लगभग 5:00 बजे का रहा होगा। 1:30 बजे लक्ष्मण जी की जान बचाने के लिए हनुमान जी उड़े और 5:00 बजे तक वापस आ गये इसका मतलब हनुमान जी 3:30 घंटे में द्रोणागिरी पर्वत उठाकर वापस आ गए। लेकिन मित्रों इन 3:30 घंटों में से भी हमें कुछ समय कम करना होगा क्योंकि जैसे ही लंका से निकलकर पवन पुत्र भारत आए तो रास्ते में उन्हें कालनेमि नामक राक्षस अपना रूप बदले मिला।

कालनेमि निरंतर श्री राम नाम का जप कर रहा था लेकिन वास्तव में उसकी मंशा हनुमान जी का समय खराब करने की थी। हनुमान जी ने जब जंगल से रामनाम का जाप सुना तो जिज्ञासावश नीचे उतर आए कालनेमि ने खुद को बहुत बड़ा ज्ञानी बताया और हनुमान जी से कहा कि पहले आप स्नान करके आओ उसके बाद मैं आपको रावण के साथ चल रहे युद्ध का नतीजा बताऊंगा। भोले हनुमान जी उसकी बातों में आ गए और स्नान करने चले गए | स्नान करते समय उनका सामना एक मगरमच्छ से हुआ जिसे हनुमान जी ने मार डाला।

उस मगर की आत्मा ने हनुमान को उस कपटी कालनेमि की वास्तविकता बताई तो बजरंगबली ने उसे भी अपनी पूंछ में लपेटकर परलोक भेज दिया। लेकिन इन सब में भी हनुमान जी का कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। उसके बाद बजरंगबली ने उड़ान भरी होगी और द्रोणागिरी पर्वत जा पहुंचे लेकिन हनुमान जी कोई वैद्य तो नहीं थे इसीलिए संजीवनी बूटी को पहचान नहीं सके और संजीवनी को खोजने के लिए वह काफी देर तक भटकते रहे होंगे। इसमें भी उनका कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। बूटी को ना पहचान पाने की वजह से हनुमान जी ने पूरा पर्वत ही उठा लिया और वापस लंका की ओर जाने लगे। लेकिन हनुमान जी के लिए एक और मुसीबत आ गई।

हुआ यह की जब पवन पुत्र पर्वत लिए अयोध्या के ऊपर से उड़ रहे थे तो श्री राम के भाई भरत ने सोचा कि यह कोई राक्षस अयोध्या के ऊपर से जा रहा है और उन्होंने बिना सोचे समझे महावीर बजरंगबली पर बाण चला दिया। बाण लगते ही वीर हनुमान श्री राम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमान जी के मुंह से श्री राम का नाम सुनते ही भरत दंग रह गए और उन्होंने हनुमानजी से उनका परिचय पूछा तो उन्होंने (हनुमान जी) ने उन्हें राम रावण युद्ध के बारे में बताया। लक्ष्मण के मूर्छित होने का पूरा किस्सा सुनाया तब सुनकर वह भी रोने लग गए और उनसे माफी मांगी| फिर हनुमानजी का उपचार किया गया और हनुमान जी वापस लंका की ओर ओर चलें। लेकिन इन सभी घटनाओं में भी बजरंगबली के कीमती समय का आधा घंटा फिर से खराब हो गया। अब हनुमान जी के सिर्फ उड़ने के समय की बात करें तो सिर्फ दो घंटे थे और इन्हीं दो घंटों में वह लंका से द्रोणागिरी पर्वत आए और वापस गए।

अब अगर हम उनके द्वारा तय की गई दूरी को देखें तो श्रीलंका और द्रोणागिरी पर्वत तक की दूरी लगभग “ 2500 किलोमीटर” की है यानी कि यह दूरी आने जाने दोनों तरफ की मिलाकर 5000 किलोमीटर बैठती है और बजरंगबली ने यही 5000 किलोमीटर की दूरी 2 घंटे में तय की। इस हिसाब से हनुमान जी के उड़ने की रफ्तार लगभग 2500 किलोमीटर प्रति घंटा की दर से निकलती है. तो इसकी तुलना अगर ध्वनी की रफ्तार से करें तो उसकी तुलना में हनुमानजी की गति लगभग 2 गुना ज्यादा बैठती है।

आधुनिक भारत के पास मौजूद रसिया से मंगवाए गए लड़ाकू विमान मिग 29 की रफ्तार 2400 किलोमीटर प्रति घंटा है. अगर इसकी तुलना हनुमान जी की रफ्तार से करें तो यहां पर भी हनुमान जी की रफ्तार ज्यादा निकलती है यानी हनुमान जी आधुनिक भारत के पास मौजूद सबसे तेज लड़ाकू विमान से भी तेज उड़ते थे।

!!जय जय सियाराम!!
!!जय जय श्री सद्गुरु महावीर बजरंगबली!!.

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रघुनंरघु नन्दन मिश्र जी के सौजन्य से
राम कथा के दर्शन थाई लैंड से
भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है l वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम कहा जाता है l*

भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे, रामायण के बालकाण्ड के सर्ग, 70 / 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है, जिसका सारांश है।

मिथिला के राजा सीरध्वज थे, जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था, जिनकी पुत्री सीता जी थीं, जिनका विवाह राम से हुआ था l राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे l इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी उर्मिला लक्षमण से, मांडवी भरत से, और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थी l केशव दास रचित ”रामचन्द्रिका“ पृष्ठ 354 (प्रकाशन संवत 1715) के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए थे l

भगवान राम के समय ही राज्यों बँटवारा
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर ), पूर्व में कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चन्द्रकेतु को चंद्रावतीl कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था l थाईलैंड के राजा उसी कुश के वंशज हैंl इस वंश को “चक्री वंश कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है, और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को “राम” की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम “भूमिबल अतुल्य तेज ” है।

थाईलैंड की अयोध्या
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं, क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है, देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है “क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि ”

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया हैl इस नाम की एक और विशेषता ह l इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता हैl कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l

असली राम राज्य थाईलैंड में है
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं, इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है, थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं, फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है l जिसे थाई भाषा में ”राम कियेन” कहते हैं l जिसका अर्थ राम कीर्ति होता है, जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी, जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ, क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है, जो नाम के हिन्दू हैं, हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग हैं l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है l राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-
1. राम (राम)
2. लक (लक्ष्मण)
3. पाली (बाली)
4. सुक्रीप (सुग्रीव)
5. ओन्कोट (अंगद)
6. खोम्पून ( जाम्बवन्त )
7. बिपेक ( विभीषण )
8. तोतस कन (दशकण्ठ) रावण
9. सदायु ( जटायु )
10. सुपन मच्छा (शूर्पणखा)
11. मारित ( मारीच )
12. इन्द्रचित (इंद्रजीत) मेघनाद

थाईलैंड में हिन्दू देवी देवता
थाईलैंड में बौद्ध बहुसंख्यक और हिन्दू अल्प संख्यक हैं l वहां कभी सम्प्रदायवादी दंगे नहीं हुए l थाई लैंड में बौद्ध भी जिन हिन्दू देवताओं की पूजा करते है, उनके नाम इस प्रकार हैं
1. ईसुअन (ईश्वन) ईश्वर शिव
2. नाराइ (नारायण) विष्णु
3. फ्रॉम (ब्रह्म) ब्रह्मा
4. इन ( इंद्र )
5. आथित (आदित्य) सूर्य
6 . पाय ( पवन ) वायु

थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है, जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The Brahminy Kite ) कहा जाता है, इसका वैज्ञानिक नाम “Haliastur Indus” है l फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco Indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डिचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा था l इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है l इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है l चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं, और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है, और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं, इसलिए उन्होंने ”गरुड़” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है l यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है।

सुवर्णभूमि हवाई अड्डा
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य, क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पर हैं l जैसे हुमायूँ रोड, अकबर रोड, औरंगजेब रोड इत्यादि, इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि हैl यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है l इसका क्षेत्रफल 563,000 स्क्वेअर मीटर है। इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ हैl पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग, मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थेl मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थेl जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है।

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो l अपनी संस्कृति की उपेक्षा कर के कोई भी समाज अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकती।
आजकल सेकुलर गिरोह के मरीच सनातन संस्कृति की उपेक्षा और उपहास एक सोची समझी साजिश के तहत कर रहे हैं और अपनी संस्कृति से अनजान नवीन पीढ़ी अन्धो की तरह उनका अनुकरण कर रही है।

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।।जय जय श्री सीता राम ।।
क्‍या आप जानते हैं, भगवान राम की एक बहन भी थी? इस सवाल को पढ़कर शायद आप चौंक गये होंगे, क्योंकि बचपन से जो रामचरित मानस आपने पढ़ी या टीवी पर रामायण धारावाहिक देखा या फिर दादा-दादी , मम्मी-पापा ने जो रामायण के बारे में बताया उसमें तो कहीं भी भगवान राम की

बहन का जिक्र नहीं था, तो आज कहां से यह बात छिड़ गई।तो हम आपको पहले ही बता दें, कि यह बात हम आपको बताने जा रहे हैं, रामायण के अलग-अलग स्वरूप से एकत्र किये गये तथ्यों के आधार पर। अगर दक्षिण की रामायण की मानें तो भगवान राम को मिलाकर चार भाई थे- राम, भरत, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न और एक बहन, जिनका नाम शान्ता था। शान्ता चारों भाईयों से बड़ी थीं। दक्षिण में लिखी गई रामायण में ऐसा लिखा गया है कि राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के थोड़े ही दिन के बाद उन्हें अंगदेश के राजा रोमपद ने गोद ले लिया था।भगवान राम की बड़ी बहन का पालन पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्शिनी (महारानी कौशल्या की बहन) ने किया। आगे चलकर शान्ता का विवाह ऋष्याश्रिंगा से हुआ। ऐसा माना जाता है कि ऋष्याश्रिंगा और शान्ता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। आज भी सेंगर राजपूत ही हैं, जिन्हें ऋषिवंशी राजपूत कहा जाता है।.