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આપણો ભ્રમ

અશોક વાટિકામાં જ્યારે રાવણ ક્રોધમાં આવીને સીતા માતાને તલવાર લઈ મારવા દોડ્યો, ત્યારે હનુમાનજીને લાગ્યું કે રાવણ પાસેથી તલવાર છીનવી લઈને, તેનું ગળું કાપી નાખવું જોઈએ. પરંતુ એ જ સમયે મંદોદરીએ રાવણ નો હાથ પકડી લીધો. આ દ્રશ્ય જોઈને હનુમાનજી ગદગદ થઈ ગયા. પરંતુ હનુમાનજી વિચારવા લાગ્યા કે, “જો હું સીતાજીને બચાવવા આગળ ગયો હોત, તો મને એ વાતનો ભ્રમ થઈ જાત કે, હું ન હોત તો આજે સીતા માતાનું શું થાત ? તેમને બચાવવા માટે કોણ આગળ આવે ?” તો આવી જ રીતે ઘણીવાર આપણને પણ એવો ભ્રમ થતો હોય છે કે હુ હોત તો શું થાત ?

પરંતુ ત્યારે બન્યું એવું કે સીતાજીને બચાવવાનું કામ પ્રભુએ રાવણની પત્ની મંદોદરીને સોપ્યું. ત્યારે હનુમાનજી સમજી ગયા કે, “ પ્રભુ જે કાર્ય જેમની પાસે કરવાવવા માંગે છે, તેઓ તેમની પાસે જ કરાવે છે.” ઈશ્વરની ઈચ્છા વગર કોઈ પણ કાર્ય થતું નથી.

આગળ જતા જ્યારે ત્રીજટાએ રાવણને કહ્યું કે, “ લંકામાં કોઈ વાનર ઘુસી આવ્યો છે અને તે લંકાને સળગાવવાનો છે. ત્યારે હનુમાનજી ચિંતામાં પડી ગયા અને વિચારવા લાગ્યા કે, “ પ્રભુ એ મને લંકા સળગાવવાનું તો કીધું નથી. તો પછી આ ત્રીજટા કેમ આવું કહે છે કે, મેં સપનું જોયું છે અને તેમાં એક વાનર લંકા ને સળગાવી રહ્યો છે. તો હવે મારે શું કરવું ? હનુમાનજી એ ત્યારે કહે છે જેવી પ્રભુ ની ઈચ્છા.

જ્યારે રાવણ નાં સૈનિકો તલવાર લઈ હનુમાનજીને મારવા દોડ્યા, ત્યારે હનુમાનજીએ પોતાના બચાવમાં થોડો પણ પ્રયત્ન ન કર્યો. પરંતુ એ સમય જ ત્યાં વિભીષણ આવ્યા અને કહ્યું કે, કોઈ દૂતને મારવા એ અનીતિ છે. ત્યારે પણ હનુમાનજી સમજી ગયા કે પ્રભુએ મને બચાવવા માટે આ ઉપાય કર્યો છે.
હનુમાનજી ને ખુબ જ આશ્ચર્ય થયું કે જ્યારે રાવણે કીધું કે, આ વાનર ને મારવો નથી,પરંતુ તેની પૂછડી પર કપડું બાંધી, ઘી નાખી અને આગ લગાવી દો. ત્યારે હનુમાનજી વિચારવા લાગ્યા કે ત્રીજટાના સપનાની વાત સાચી હતી. કેમ કે લંકા સળગાવવા હું કપડું અને ઘી ક્યાંથી લાવું ? અને આગ પણ કંઈ રીતે પ્રગટાવેત ? પણ આ બધી તૈયારીઓ પ્રભુએ રાવણ પાસે જ કરાવી લીધી. ત્યારે હનુમાનજી કહે છે, જ્યારે તમે રાવણ પાસે પણ આવું કામ કરાવી લ્યો છો, તો મારે આમાં આશ્વર્ય કર્યા જેવું કંઈ નથી. ત્યારે હનુમાનજી ને પણ સમજાય જાય છે કે આપણા વગર પણ બધું શક્ય હોય છે. આપણે બસ નિમિત હોઈએ.
એટલા માટે હંમેશા યાદ રાખો કે આ સંસાર માં જે કંઈ પણ થાય છે, તે ક્રમબદ્ધ થાય છે. હું અને તમે, તેના માત્રને માત્ર નિમિત પાત્ર છીએ. એટલા માટે ક્યારે પણ મનુષ્ય જીવેભ્રમ માં રહેવું જોઈએ કે, “ હું હોત તો શુ થાત ? અથવા હું નહી હોઉ તો શું થશે ? જો આપણે એ સ્થાન પર ન હોઈએ તો તેની જગ્યાએ ભગવાન કોઈ બીજા પાત્ર ને નિમ્મીત બનાવે ,

શીખ* :- માણસ માત્ર કોઈ ભ્રમ માં રહેવુ કે હુ છુ તો શક્ય છે , અને હુ નહી હોઉ તો શુ થશે , માણસ ને પ્રભુ કાર્ય માટે નિમ્મીત બનાવે છે .

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प्रसाद देवरानी

राम भक्त ‘हनुमान’ जी से सीखें जीवन प्रबंधन के ये दस सूत्र!

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हनुमान जी को कलियुग में सबसे प्रमुख ‘देवता’ माना जाता है। रामायण के सुन्दर कांड और तुलसीदास की हनुमान चालीसा में बजरंगबली के चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार हनुमान जी का किरदार हर रूप में युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।

हनुमान जी को कलियुग में सबसे असरदार भगवान माना गया है। हनुमान जी के बारे में तुलसीदास लिखते हैं ‘संकट कटे मिटे सब पीरा,जो सुमिरै हनुमत बल बीरा’। हमेशा अपने भक्तों को संकट से निवृत्त करने वाले हनुमान जी ‘स्किल्ड इंडिया’ के जमाने में युवाओं के परमप्रिय देवता होने के साथ ही उनके जीवन प्रबंधन गुरु की भी भूमिका निभाते हैं।

आज हम आपको ‘बजरंगबली’ के उन 10 गुणों के बारे में बताएंगे, जो न केवल आपको ‘उद्दात’ बनाएंगे, बल्कि आपके प्रोफ्रेशनल जीवन के लिए भी काफी प्रेरक साबित होंगे।

  1. संवाद कौशल : – सीता जी से हनुमान पहली बार रावण की ‘अशोक वाटिका’ में मिले, इस कारण सीता उन्हें नहीं पहचानती थीं। एक वानर से श्रीराम का समाचार सुन वे आशंकित भी हुईं, परन्तु हनुमान जी ने अपने ‘संवाद कौशल’ से उन्हें यह भरोसा दिला ही दिया की वे राम के ही दूत हैं। सुंदरकांड में इस प्रसंग को इस तरह व्यक्त किया गया हैः

“कपि के वचन सप्रेम सुनि, उपजा मन बिस्वास । जाना मन क्रम बचन यह ,कृपासिंधु कर दास ।।”

  1. विनम्रता : – समुद्र लांघते वक्त देवताओं ने ‘सुरसा’ को उनकी परीक्षा लेने के लिए भेजा। सुरसा ने मार्ग अवरुद्ध करने के लिए अपने शरीर का विस्तार करना शुरू कर दिया। प्रत्युत्तर में श्री हनुमान ने भी अपने आकार को उनका दोगुना कर दिया। “जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा, तासु दून कपि रूप देखावा।” इसके बाद उन्होंने स्वयं को लघु रूप में कर लिया, जिससे सुरसा प्रसन्न और संतुष्ट हो गईं। अर्थात केवल सामर्थ्य से ही जीत नहीं मिलती है, “विनम्रता” से समस्त कार्य सुगमतापूर्वक पूर्ण किए जा सकते हैं।
  2. आदर्शों से कोई समझौता नहीं : – लंका में रावण के उपवन में हनुमान जी और मेघनाथ के मध्य हुए युद्ध में मेघनाथ ने ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग किया। हनुमान जी चाहते, तो वे इसका तोड़ निकाल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह उसका महत्व कम नहीं करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का तीव्र आघात सह लिया। हालांकि, यह प्राणघातक भी हो सकता था। यहां गुरु हनुमान हमें सिखाते हैं कि अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए । तुलसीदास जी ने हनुमानजी की मानसिकता का सूक्ष्म चित्रण इस पर किया हैः

“ब्रह्मा अस्त्र तेंहि साँधा, कपि मन कीन्ह विचार। जौ न ब्रहासर मानऊँ, महिमा मिटाई अपार ।।

  1. बहुमुखी भूमिका में हनुमान : – हम अक्सर अपनी शक्ति और ज्ञान का प्रदर्शन करते रहते हैं, कई बार तो वहां भी जहां उसकी आवश्यकता भी नहीं होती। तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में लिखते हैंः “सूक्ष्म रूप धरी सियंहि दिखावा, विकट रूप धरी लंक जरावा ।”

सीता के सामने उन्होंने खुद को लघु रूप में रखा, क्योंकि यहां वह पुत्र की भूमिका में थे, परन्तु संहारक के रूप में वे राक्षसों के लिए काल बन गए। एक ही स्थान पर अपनी शक्ति का दो अलग-अलग तरीके से प्रयोग करना हनुमान जी से सीखा जा सकता है।

  1. समस्या नहीं समाधान स्वरूप : – जिस वक़्त लक्ष्मण रण भूमि में मूर्छित हो गए, उनके प्राणों की रक्षा के लिए वे पूरे पहाड़ उठा लाए, क्योंकि वे संजीवनी बूटी नहीं पहचानते थे। हनुमान जी यहां हमें सिखाते हैं कि मनुष्य को शंका स्वरूप नहीं, वरन समाधान स्वरूप होना चाहिए।
  2. भावनाओं का संतुलन : – लंका के दहन के पश्चात् जब वह दोबारा सीता जी का आशीष लेने पहुंचे, तो उन्होंने सीता जी से कहा कि वह चाहें तो उन्हें अभी ले चल सकते हैं, पर “मै रावण की तरह चोरी से नहीं ले जाऊंगा। रावण का वध करने के पश्चात ही यहां से प्रभु श्रीराम आदर सहित आपको ले जाएंगे।” रामभक्त हनुमान अपनी भावनाओं का संतुलन करना जानते थे, इसलिए उन्होंने सीता माता को उचित समय (एक महीने के भीतर) पर आकर ससम्मान वापिस ले जाने को आश्वस्त किया।
  3. आत्ममुग्धता से कोसों दूर : – सीता जी का समाचार लेकर सकुशल वापस पहुंचे श्री हनुमान की हर तरफ प्रशंसा हुई, लेकिन उन्होंने अपने पराक्रम का कोई किस्सा प्रभु राम को नहीं सुनाया। यह हनुमान जी का बड़प्पन था,जिसमे वह अपने बल का सारा श्रेय प्रभु राम के आशीर्वाद को दे रहे थे। प्रभू श्रीराम के लंका यात्रा वृत्तांत पूछने पर हनुमान जी जो कहा उससे भगवान राम भी हनुमान जी के आत्ममुग्धताविहीन व्यक्तित्व के कायल हो गए।

“ता कहूं प्रभु कछु अगम नहीं, जा पर तुम्ह अनुकूल । तव प्रभाव बड़वानलहि ,जारि सकइ खलु तूल ।।

  1. नेतृत्व क्षमता : – समुद्र में पुल बनाते वक़्त अपेक्षित कमजोर और उच्चश्रृंखल वानर सेना से भी कार्य निकलवाना उनकी विशिष्ठ संगठनात्मक योग्यता का परिचायक है। राम-रावण युद्ध के समय उन्होंने पूरी वानरसेना का नेतृत्व संचालन प्रखरता से किया।
  2. बौद्धिक कुशलता और वफादारी : -सुग्रीव और बाली के परस्पर संघर्ष के वक़्त प्रभु राम को बाली के वध के लिए राजी करना, क्योंकि एक सुग्रीव ही प्रभु राम की मदद कर सकते थे। इस तरह हनुमान जी ने सुग्रीव और प्रभू श्रीराम दोनों के कार्यों को अपने बुद्धि कौशल और चतुराई से सुगम बना दिया। यहां हनुमान जी की मित्र के प्रति ‘वफादारी’ और ‘आदर्श स्वामीभक्ति’ तारीफ के काबिल है।
  3. समर्पण : – हनुमान जी एक आदर्श ब्रह्चारी थे। उनके ब्रह्मचर्य के समक्ष कामदेव भी नतमस्तक थे। यह सत्य है कि श्री हनुमान विवाहित थे, परन्तु उन्होंने यह विवाह एक विद्या की अनिवार्य शर्त को पूरा करने के लिए अपने गुरु भगवान् सूर्यदेव के आदेश पर किया था। श्री हनुमान के व्यक्तित्व का यह आयाम हमें ज्ञान के प्रति ‘समर्पण’ की शिक्षा देता है। इसी के बलबूते हनुमान जी ने अष्ट सिद्धियों और सभी नौ निधियों की प्राप्ति की।

बड़ी विडंबना है कि दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति भारत के पास होने के बावजूद उचित जीवन प्रबंधन न होने के कारण हम युवाओं की क्षमता का समुचित दोहन नहीं कर पा रहे हैं। युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय श्री हनुमान निश्चित रूप से युवाओं के लिए सबसे बड़े आदर्श हैं, क्योंकि हनुमान जी का चरित्र अतुलित पराक्रम, ज्ञान और शक्ति के बाद भी अहंकार से विहीन था।

आज हमें हनुमान जी की पूजा से अधिक उनके चरित्र को पूजकर उसे आत्मसात करने की आवश्यकता है, जिससे हम भारत को राष्ट्रवाद सरीखे उच्चतम नैतिक मूल्यों के साथ ‘कौशल युक्त’ भी बना सकें।

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ओ३म्
-रामजन्म रामनवमी 2 अप्रैल पर-

“राम का वनगमन से पूर्व अपने पिता दशरथ व माता से प्रशंसनीय संवाद”

राम को हमारे पौराणिक बन्धु ईश्वर मानकर उनकी मूर्तियों की पूजा अर्थात् उनको सिर नवाते हैं और यत्रतत्र समय-समय पर राम चरित मानस का पाठ भी आयोजित किया जाता है। वाल्मीकि रामायण ही राम के जीवन पर आद्य महाकाव्य एवं इतिहास होने सहित प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में परवर्ती काल में अनेक लोगों ने कुछ प्रक्षेप भी किये हैं परन्तु इनका पता लगाया जा सकता है। कुछ विद्वानों ने यह कार्य किये भी हैं। उनके प्रयत्नों का परिणाम है कि हमें शुद्ध रामायण उपलब्ध होता है जिसमें से एक स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी का ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण है। आगामी रामनवमी पर्व, चैत्र शुक्ल नवमी तदनुसार 2 अप्रैल सन् 2020 को ध्यान में रखकर हम राम के राज्याभिषेक के निर्णय, उनके वनगमन तथा श्रीराम के अपने पिता दशरथ एवं माता कैकेयी के साथ संवाद का वर्णन कर रहे हैं। इसका वर्णन पढ़ व सुन कर हम स्वयं व अपनी भावी पीढ़ियों को सन्मार्ग दिखा सकते हैं और हमारी युवा पीढ़ी अपने देवता के समान माता-पिता को आदर सम्मान देकर उनकी पूजा वन्दना कर सके।

राम के राज्याभिषेक के निर्णय व वनगमन की कथा इस प्रकार है। महाराजा दशरथ ने राज्य पुरोहित वसिष्ठ को बुलाकर उन्हें कल अर्थात् अगले दिन होने वाले राम के राज्याभिषेक के विषय में राम को सूचित करने के लिये कहा। उन्होंने कहा कि हे तपोधन! आप राम के पास जाइए और उनसे कल्याण, यश और राज्य-प्राप्ति के लिये पत्नी सीता सहित उपवास कराइए। वेदज्ञों में श्रेष्ठ भगवान वसिष्ठ ‘‘बहुत अच्छा” कहकर स्वयं श्री राम के घर गये। महर्षि वसिष्ठ श्वेत बादलों के समान सफेद रंग वाले भवन में पहुंच कर श्री राम को हर्षित करते हुए बोले। हे राम! तुम्हारे पिता दशरथ तुम पर प्रसन्न हैं। वह कल तुम्हारा राज्याभिषेक करेंगे। अतः आज आप सीता सहित उपवास करें। यह कहकर मुनिवर वसिष्ठ ने श्रीराम एवं सीता जी से उस रात्रि को नियत व्रत वा उपवास कराया। इसके बाद राजगुरु वसिष्ठ राम द्वारा भलीप्रकार सम्मानित एवं सत्कृत होकर अपने निवास स्थान को चले गये। वसिष्ठ जी के जाने के बाद श्रीराम एवं विशालाक्षी सीता जी ने स्नान किया। उन्होंने शुद्ध मन से एकाग्रचित्त होकर परमपिता परमात्मा की उपासना की। जब एक प्रहर रात्रि शेष रही तो वह दोनो उठे और प्रातःकालीन सन्ध्योपासन कर, एकाग्रचित्त होकर गायत्री का जप करने लगे। इस समाचार को सुनकर सभी प्रजाजनों ने अयोध्या को सजाया। राजमार्गों को फुल-मालाओं से सुशोभित एवं इत्र आदि से सुगन्धित किया। भवनों एवं वृक्षों पर ध्वजा एवं पताकाएं फहराई गईं। सभी लोग राज्याभिषेक की प्रतीक्षा करने लगे।

इसी बीच कैकेयी को अपनी दासी मन्थरा से राम के राज्याभिषेक की जानकारी मिली और साथ ही महाराज दशरथ से वर मांगने तथा राम को 14 वर्ष के लिये वन भेजने तथा भरत को कौशल देश का राजा बनाने का परामर्श मिला। इस मंथरा-कैकेयी के इस षडयन्त्र ने राम को राजा बनाने की सारी योजना को धराशायी कर दिया। राज्याभिषेक के दिन राम प्रातः अपने पिता के दर्शन करने आते हैं। वहां पिता की जो दशा वह देखते हैं उसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि जी ने करते हुए लिखा है कि राजभवन मेघ-समूह के समान जान पड़ता था। साथ के सब लोगों को अन्तिम डयोढ़ी पर छोड़ कर श्रीराम ने अन्तःपुर में प्रवेश किया। अन्तःपुर में जाकर श्रीराम ने देखा कि महाराज दशरथ कैकेयी के साथ सुन्दर आसन पर विराजमान हैं। वे दीन और दुःखी हैं तथा उनके मुख का रंग फीका पड़ गया है। श्रीराम ने जाते ही पहले अत्यन्त विनीत भाव से पिता के चरणों में शीश झुकाया, फिर बड़ी सावधानी से माता कैकेयी के चरणों का स्पर्श किया। श्री राम को देखकर महाराज दशरथ केवल ‘राम!’ ही कह सके। क्योंकि फिर महाराज के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। उनका कष्ठ बन्द हो गया। फिर वे न तो कुछ देख ही सके और न बोल ही सके। अपने पिताजी की ऐसी असम्भावित दशा देख और उनके शोक का कारण न जानकर श्रीराम ऐसे विक्षुब्ध हुए जैसे पूर्णमासी के दिन समुद्र क्षुब्ध होता है। सदा पिता के हित में लगे रहने वाले राम विचारने लगे कि क्या कारण है कि पिता इतनी प्रसन्नता के अवसर पर भी न तो मुझसे प्रसन्न हैं और न ही मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं।

राम पिता दशरथ तथा माता कैकेयी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि और दिन तो पिताजी क्रुद्ध होने पर भी मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाया करते थे परन्तु आज मुझे देखकर उन्हें कष्ट क्यों हो रहा है? इस चिन्ता से श्रीराम का मुंह उतर गया। दीनों की भांति शोक-पीड़ित और द्युतिहीन श्रीराम कैकेयी को अभिवादन करके बोले। यदि अज्ञानवश मुझसे कोई अपराध हो गया हो जिससे पिताजी मुझसे अप्रसन्न हैं तो आप मुझे उस अपराध को बतायें और मेरी ओर से आप इनकी शंका का निवारण कर इन्हें प्रसन्न करें। महाराज का कहना न मानकर उनको असन्तुष्ट एवं कुपित कर मैं एक क्षण भी जीना नहीं चाहता। जब श्रीराम ने कैकेयी से उपर्युक्त वचन कहे तब कैकेयी ने यह धृष्टता एवं स्वार्थपूर्ण वचन कहे। कैकेयी ने कहा हे राम! न तो महाराज तुमसे अप्रसन्न हैं, न ही इनके शरीर में कोई रोग हैं। इनके शरीर में कोई बात है जिसे तुम्हारे भय से यह कहते नहीं। यदि तुम यह बात स्वीकार करो कि महाराज उचित या अनुचित जो कुछ कहें उसे करोगे तो मैं तुम्हें सब कुछ बतला दूं। कैकेयी के इन वचनों को सुनकर राम अत्यन्त दुःखी हुए। उन्होंने महाराज दशरथ के समीप बैठी हुई कैकेयी से कहा ‘अहो! धिक्कार है!! हे देवि! आपको ऐसा कहना उचित नहीं। महाराज की आज्ञा से मैं जलती चिता में कूद सकता हूं, हलाहल विष का पान कर सकता हूं और समुद्र में छलांग लगा सकता हूं। अपने गुरु, हितकारी, राजा और पिता के आदेश से ऐसा कौन-सा कार्य है जिसे मैं न कर सकूं? हे देवि महाराज दशरथ को जो भी अभीष्ट है वह तू मुझसे कह। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं उनकी आज्ञा का पालन करूंगा। माता! सदा स्मरण रख राम दो प्रकार की बात नहीं कहता अर्थात् राम जो कहता है वही करता है।’

राम के इन शब्दों को सुनकर अनार्या कैकेयी सरल स्वभाव एवं सत्यवादी श्रीराम से ये कठोर वचन बोली। हे राम! पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम में शत्रु के बाणों से पीड़ित और मेरे द्वारा रक्षित तुम्हारे पिता ने मेरी सेवाओं से प्रसन्न होकर मुझे दो वर दिये थे। हे राम! उन दो वरों में से मैंने एक से तो ‘भरत का राज्याभिषेक’ और दूसरे से ‘तुम्हारा आज ही दण्डकारण्य-गमन’ मांगा है। हे नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिता को और अपने आपको सत्यप्रतिज्ञ सिद्ध करना चाहते हो तो मैं जो कुछ कहूं उसे सुनो। ‘तुम पिता की आज्ञा के पालन में तत्पर रहो। जैसा कि उन्होंने प्रतिज्ञा की है–तुम्हें चौदह वर्ष के लिए वन में चले जाना चाहिए। हे राम! महाराज दशरथ ने तुम्हारे राज्याभिषेक के लिए जो सामग्री एकत्र कराई है उससे भरत का राज्याभिषेक हो। तुम इस अभिषेक को त्याग कर तथा जटा और मृगचर्म धारण कर चैदह वर्ष तक दण्डक वन में वास करो। भरत कौसलपुर में रह कर विभिन्न प्रकार के रत्नों से भरपूर तथा घोड़े, रथ और हाथियों सहित इस राज्य का शासन करे। यही कारण है कि महाराज करुणा से पूर्ण हैं, शोक से उनका मुख शुष्क हो रहा है और वे तुम्हारी ओर देख भी नहीं सकते। हे रघुनन्दन! तुम महाराज की इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करो। राम! महान् सत्य के पालन द्वारा तुम महाराज का उद्धार करो।’ कैकेयी के इस प्रकार के कठोर वचन बोलने पर भी श्रीराम को कोई शोक नहीं हुआ परन्तु महाराज दशरथ जो पहले ही दुःखी थे, राम के संभावित वियोग के कारण होने वाले दुःख से अति व्याकुल हुए।

कैकेयी के इन कठोर वचनों पर राम की प्रतिक्रिया संसार के सभी लोगों मुख्यतः युवा पुत्रों को पढ़नी चाहिये। शत्रु-संहारक श्रीराम मृत्यु के समान पीड़ादायक कैकेयी के इन अप्रिय वचनों को सुनकर तनिक भी दुःखी नहीं हुए और उससे बोले ‘‘बहुत अच्छा” ऐसा ही होगा। महाराज की प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए मैं जटा और वल्कल वस्त्र धारण कर अभी नगर को छोड़कर वन को जाऊंगा। राम ने कहा ‘मैं यह अवश्य जानना चाहता हूं कि अजेय तथा शत्रु-संहारक महाराज पूर्ववत् मुझसे बोलते क्यों नहीं? एक मानसिक दुःख मेरे हृदय को बुरी तरह से जला-सा रहा है कि महाराज ने भरत के अभिषेक के विषय में स्वयं मुझसे क्यों नहीं कहा। महाराज की तो बात ही क्या मैं तो तेरे कहने से ही प्रसन्नतापूर्वक भाई भरत के लिये राज्य ही नही अपितु सीता, अपने प्राण, इष्ट और धन सब कुछ वार सकता हूं।’ श्री राम के इन वचनों को सुन कैकेयी अति प्रसन्न हुई। राम के वनगमन के सम्बन्ध में विश्वस्त होकर वह श्रीराम को शीघ्रता करने के लिए प्रेरित करने लगी।

क्या आज के युग में कोई पुत्र राम के समान अपने माता-पिता का शुभचिन्तक, आज्ञाकारी तथा उनके के लिये अपने जीवन को सकट में डाल सकता है? हमें लगता है कि उपर्युक्त पंक्तियों में वर्णित राम के आदर्श को कोई पुत्र निभा नहीं सकता। इसी लिये रामायण संसार का आदर्श ग्रन्थ है। संसार के सभी स्त्री-पुरुषों व युवाओं को इसे नियमित पढ़ना चाहिये और इससे शिक्षा लेकर अपने परिवार व माता-पिता को सुख व शान्ति प्रदान करनी चाहिये। आगामी रामनवमी पर श्रीराम का जन्मदिवस है। हमें इस दिन इन पंक्तियों को पढ़कर और इन पर मनन कर श्री राम को अपनी श्रद्धांजलि देनी चाहिये और उनके जीवन का अनुकरण करने का व्रत लेना चाहिये। हमने इस लेख की सामग्री स्व. स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी की पुस्तक ‘वाल्मीकि रामायण’ से ली है उनका आभार एवं वन्दन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, रामायण - Ramayan

बात ज्यादा पुरानी नहीं है…
🙏🚩🕉️🚩🙏
अंग्रेजो के ज़माने में एक दंगा हुआ था
श्री राम जन्मभूमि को ले लेकर.. और फैज़ाबाद की तरफ से मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था।

तब दंगे के बीच सबने देखा कि हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों से 6 फुट से ज्यादा ऊंचा विशालकाय नागा साधु हाथ मे तलवार लिए उतरा और दंगाई भीड़ पे अकेले टूट पड़ा और गाजर मूली की तरहः काटता हुआ फैज़ाबाद की तरफ निकल गया
हनुमान गढ़ी में रहने वाले अन्य महंत पुजारी नागा भी हैरान रह गए क्योंकि किसी ने उस नागा साधु को न उस दिन के पहले देखा था न उस दिन के बाद देखा।

लेकिन उस अकेले नागा ने ऐसी मार काट की थी कि फैज़ाबाद तक सड़क पे दंगाइयों की लाशें पड़ी थी और दंगा खत्म हो गया था।
अयोध्या शहर के कोतवाल हनुमान जी है और अयोध्या की सुरक्षा का जिम्मा उनके ऊपर है
और जब अयोध्या पर संकट आता है तो वो किसी न किसी साधु रूप में आते है।
🙏🚩⛳🕉️⛳🚩🙏
6 दिसम्बर वाले दिन बाबरी ढांचे के चारो तरफ प्रशाशन ने कई स्तर की बैरिकेड लगाया हुआ था और कार सेवक अंदर नही जा पा रहे थे।
तभी एक नागा साधु एक सरकारी बस स्टार्ट कर के तेज़ी से बस ले कर बैरिकेड के एक के बाद एक स्तर तोड़ता हुआ अंदर घुसता गया। उसके पीछे भीड़ घुस गई और वो नागा उस भीड़ में गायब हो गया

ये घटना फ़ोटो और वीडियो में रिकॉर्ड हुई थी अखबारों में भी छपी लेकिन वो नागा कभी दुबारा नही दिखा लेकिन उसने ढांचा गिराने के लिए कारसेवकों के लिए रास्ता खोल दिया था।
प्रशाशन देखता रह गया और कुछ नही कर सका था।

अयोध्या में हनुमान जी का किला है हनुमान गढ़ी और देश भर के सभी प्रमुख हनुमान मंदिरों का मुख्यालय भी है

🚩श्री हनुमतये नमः🚩
⛳जय बजरंग बली⛳

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माँ सुमित्रा की अनुपम सीख !

भगवान श्री रामचन्द्र जी को ‘चौदह वर्ष का वनवास मिला। लक्ष्मणजी ने उनसे कहा: ‘‘प्रभु! मैं भी आपके साथ चलूँगा। “श्रीरामजी ने कहा: ‘‘जाओ, माँ से विदा माँग आओ, उनसे आशीर्वाद ले आओ।”

लक्ष्मणजी ने माँ सुमित्रा को प्रणाम कर कहा: ‘‘माँ! मैं प्रभु श्रीरामजी की सेवा में वन जा रहा हूँ।”
सुमित्राजी: ‘‘बेटा! तुम मेरे पास क्यों आये?”
लक्ष्मणजी: ‘‘माँ! आप मेरी माता हैं इसलिए आपका आशीर्वाद, आपकी आज्ञा लेने आया हूँ।”

सुमित्राजी: ‘‘बेटा! क्या पिछले जन्म में मैं तेरी माँ थी? क्या अगले जन्म में मैं तेरी माँ होऊँगी? कुछ पता नहीं… परंतु बेटा! जन्मों-जन्मों से जो तेरी माँ हैं, जन्मों-जन्मों से जो तेरे पिता हैं, तू उन प्रभु की सेवा में जा रहा है तो मेरे से पूछने की क्या आवश्यकता है? फिर भी मैं तुझे एक सलाह देती हूँ कि तुम पाँच दोषों से बचकर प्रभु की सेवा करना।”

लक्ष्मणजी ने पूछा: ‘‘माँ! वे पाँच दोष कौन-से हैं?”
सुमित्राजी कहती हैं:
‘‘रागु रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।
सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।

‘राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह – इनके वश स्वप्न में भी मत होना। सब प्रकार के विकारों का त्याग कर मन, वचन और कर्म से श्री सीताराम जी की सेवा करना। (श्रीरामचरित. अयो.कां.)

बेटा! पहला दोष है ‘राग’। तुम प्रभु की सेवा करने जा रहे हो तो कई लोग तुम्हें मिलेंगे, कइयों से परिचय होगा परंतु तुम किसीमें राग मत करना, आसक्ति मत करना। अनुराग तो बस एक रामजी से ही करना।

दूसरा दोष है ‘रोष’। कभी तुम्हारे मन का न हो तो रोष नहीं करना। क्रोध से अपने-आपको बचाना। ऐसी इच्छा नहीं करना जिसकी आपूर्ति पर क्रोध उत्पन्न हो।

तीसरा दोष है ‘ईर्ष्या’। कोई प्रभु की ज्यादा सेवा-भक्ति करे, प्रभु किसीको ज्यादा प्रेम करें तो तुम उससे ईर्ष्या नहीं करना बल्कि उसकी सेवा-भक्ति का आदर करना। कोई श्रीरामजी के ज्यादा निकट हो तो उससे ईर्ष्या नहीं करना अपितु उसके प्रति अपना प्रेम बढ़ाना।

चौथा दोष है ‘मद’। तुम अभिमान से बचना। सेवा का, उन्नति का, सदगुणों का अभिमान अपने में मत लाना अपितु इन्हें प्रभु की कृपा समझना।

पाँचवाँ दोष है ‘मोह’। किसीके मोह में मत फँसना। इसके बिना नहीं चलेगा, उसके बिना नहीं चलेगा – ऐसा नहीं करना। अपितु प्रभु में अपने मन को लगाये रखना। अनुकूलता में फँसना नहीं, प्रतिकूलता से घबराना नहीं, प्रभु का आश्रय लेना और अपने हृदय में उनको बसाये रखना तथा निष्कपटतापूर्वक उनकी सेवा करना।

बेटा लक्ष्मण! जहाँ श्रीरामजी का निवास हो वहीं तुम्हारी अयोध्या है। श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणों के भी प्रिय हैं, हृदय के भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं। उनके साथ वन जाओ और जगत में जीने का लाभ उठाओ। हे पुत्र! मैं तुम पर बलिहारी जाती हूँ। मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्य के पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्त ने छल छोड़कर श्रीरामजी के चरणों में स्थान प्राप्त किया है।

पुत्रवती जुबती जग सोई । रघुपति भगतु जासु सुतु होई ।।
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।।

‘संसार में वही युवती स्त्री पुत्रवती है, जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजी का भक्त हो। नहीं तो जो भगवान से विमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशु की भाँति उसका पुत्र को जन्म देना व्यर्थ ही है।’ (श्रीराम‘रित. अयो.कां.)

“सम्पूर्ण पुण्यों का सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजी के चरणों में स्वाभाविक प्रेम हो। बेटा! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वन में क्लेश न पायें। तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सदैव सुख पायें।”

माँ सुमित्रा ने इस प्रकार लक्ष्मणजी को अनुपम शिक्षा देकर वन जाने की आज्ञा दी और यह आशीर्वाद दिया कि ‘श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजी के चरणों में तुम्हारा निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो, बढता रहे।’ माता सुमित्रा लखनलालजी को उपदेश देती हुयी कहती हैं!

  • उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
    पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥
    तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
    रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित-नित नई॥

भावार्थ:-हे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात तुम वही करना), जिससे वन में तुम्हारे कारण श्री रामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की याद भूल जाएँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजी ने इस प्रकार हमारे प्रभु (श्री लक्ष्मणजी) को शिक्षा देकर (वन जाने की) आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्री सीताजी और श्री रघुवीरजी के चरणों में तुम्हारा निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो!

भगवान श्रीरामजी के प्रति माता सुमित्रा की प्रीति अदभुत है! धन्य हैं ऐसी माँ, जो अपने प्यारे पुत्र को उत्तम सीख देकर प्रभुभक्ति का उपदेश देती हैं और प्रभुसेवा में भेजती हैं। हे प्रभो! हम पर ऐसी कृपा कीजिये कि हमारे दिल में भी आपके प्रति ऐसी भक्ति आ जाय। - डॉ0 विजय शंकर मिश्र

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प्रसाद देवरानी

क्यों हनुमानजी ने स्वयं की लिखी हुयी ‘रामायण’ समुद्र में फेंक दी थी

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जग में सुंदर है दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम।

राम और कृष्ण पर जितनी कथा टीका, भाष्य, व्याख्याएं आदि लिखी गई हैं उतनी किसी अन्य महापुरुष पर नहीं। कहते हैं कि हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता। शास्त्रों में एक घटना ऐसी भी है कि श्री हनुमानजी ने रामायण को वाल्मीकि जी के सामने ही समुद्र में फेंक दिया था। अगले पन्ने पर होगा इस घटना का खुलासा…

वाल्मीकि जी ने जो रामाय‍ण लिखी थी वह तो प्रभु श्रीराम के जीवन के कुछ घास घटनाक्रम की लिखी थी। उन्होंने उनके 14 वर्ष के वनवास का संपूर्ण वर्णन थोड़े ही किया है। यही कारण रहा कि वाल्मीकिजी रामायण में जो कथा नहीं मिलती वह हमें कबंद रामायण (कबंद एक राक्षस का नाम था) और जो कबंद में नहीं मिलती वह हमें अद्भुत रामायण में मिल जाती है और जो अद्भुत में नहीं मिलती है वह हमें आनंद रामायण में मिल जाती है।

राम काल में अनेक रामायणें लिखी गई थीं। ऐसा क्यों? क्योंकि राम के बारे में वाल्मीकिजी जो जानते थे वह उन्होंने लिखी। कबंद, अद्भुत और आनंद रामायण के रचयिता जो जानते थे वह उन्होंने लिखा। वाल्मीकिजी तो अयोध्या पुरी क्षेत्र में रहते थे लेकिन दंडकारण्य में राम के साथ क्या-क्या घटा, यह तो दंडकाराण्य के ऋषि ही जानते हैं। इस तरह रामायण कई होती गईं, लेकिन वाल्मीकिजी रामायण को ही मान्यता मिली, क्योंकि वह रामायण वाल्मीकिजी ने लिखी थी। वाल्मीकिजी उस समय के महान ऋषियों की गिनती में थे।

राम की कथा को वाल्मीकिजी के लिखने के बाद दक्षिण भारतीय लोगों ने अलग तरीके से लिखा। दक्षिण भारतीय लोगों के जीवन में राम का बहुत महत्व है। कर्नाटक और तमिलनाडु में राम ने अपनी सेना का गठन किया था। तमिलनाडु में ही श्रीराम ने रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी।

कई भाषाओं में लिखी गईं रामायण : जितनी भाषाओं में रामकथा पाई जाती है, उनकी फेहरिस्त बनाने में ही आप थक जाएंगे- अन्नामी, बाली, बांग्ला, कम्बोडियाई, चीनी, गुजराती, जावाई, कन्नड़, कश्मीरी, खोटानी, लाओसी, मलेशियाई, मराठी, ओड़िया, प्राकृत, संस्कृत, संथाली, सिंहली, तमिल, तेलुगु, थाई, तिब्बती, कावी आदि हजारों भाषाओं में उस काल में और उसके बाद कृष्ण काल, बौद्ध काल में चरित रामायण में अनुवाद के कारण कई परिवर्तन होते चले गए, लेकिन मूल कथा आज भी वैसी की वैसी ही है।

अब तक लिखी गई राम कथा की लिस्ट :

  1. अध्यात्म रामायण
  2. वाल्मीकि की ‘रामायण’ (संस्कृत)
  3. आनंद रामायण
  4. ‘अद्भुत रामायण’ (संस्कृत)
  5. रंगनाथ रामायण (तेलुगु)
  6. कवयित्री मोल्डा रचित मोल्डा रामायण (तेलुगु)
  7. रूइपादकातेणपदी रामायण (उड़िया)
  8. रामकेर (कंबोडिया)
  9. तुलसीदास की ‘रामचरित मानस’ (अव‍धी)
  10. कम्बन की ‘इरामावतारम’ (तमिल)
  11. कुमार दास की ‘जानकी हरण’ (संस्कृत)
  12. मलेराज कथाव (सिंहली)
  13. किंरस-पुंस-पा की ‘काव्यदर्श’ (तिब्बती)
  14. रामायण काकावीन (इंडोनेशियाई कावी)
  15. हिकायत सेरीराम (मलेशियाई भाषा)
  16. रामवत्थु (बर्मा)
  17. रामकेर्ति-रिआमकेर (कंपूचिया खमेर)
  18. तैरानो यसुयोरी की ‘होबुत्सुशू’ (जापानी)
  19. फ्रलक-फ्रलाम-रामजातक (लाओस)
  20. भानुभक्त कृत रामायण (नेपाल)
  21. अद्भुत रामायण
  22. रामकियेन (थाईलैंड)
  23. खोतानी रामायण (तुर्किस्तान)
  24. जीवक जातक (मंगोलियाई भाषा)
  25. मसीही रामायण (फारसी)
  26. शेख सादी मसीह की ‘दास्ताने राम व सीता’।
  27. महालादिया लाबन (मारनव भाषा, फिलीपींस)
  28. दशरथ कथानम (चीन)
  29. हनुमन्नाटक (हृदयराम-1623)
  30. खोज जारी है सबसे पहले किसने कही रामायण…

अध्‍यात्म रामायण : सर्वप्रथम श्रीराम की कथा भगवान श्री शंकर ने माता पार्वतीजी को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का पुनर्जन्म कागभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि को पूर्व जन्म में भगवान शंकर के मुख से सुनी वह रामकथा पूरी की पूरी याद थी। उन्होंने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार रामकथा का प्रचार-प्रसार हुआ। भगवान शंकर के मुख से निकली श्रीराम की यह पवित्र कथा ‘अध्यात्म रामायण’ के नाम से विख्यात है।

काकभुशुण्डि : लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामायण गिद्धराज गरूड़ को सुना दी थी।

जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया। गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं। भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशुण्डिजी के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया।

वैदिक साहित्य के बाद जो रामकथाएं लिखी गईं, उनमें वाल्मीकि रामायण सर्वोपरि है। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण-वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था। एक दिन वे वन में ऋषि भारद्वाज के साथ घूम रहे थे और उन्होंने एक व्याघ द्वारा क्रौंच पक्षी को मारे जाने की हृदयविदारक घटना देखी और तभी उनके मन से एक श्लोक फूट पड़ा। बस यहीं से इस कथा को लिखने की प्रेरणा मिली।

यह इसी कल्प की कथा है और यही प्रामाणिक है। वाल्मीकिज‍ी ने राम से संबंधित घटनाचक्र को अपने जीवनकाल में स्वयं देखा या सुना था इसलिए उनकी रामायण सत्य के काफी निकट है, लेकिन उनकी रामायण के सिर्फ 6 ही कांड थे। उत्तरकांड को बौद्धकाल में जोड़ा गया। उत्तरकांड क्यों नहीं लिखा वाल्मीकि ने? या उत्तरकांड क्यों जोड़ा गया, यह सवाल अभी भी खोजा जाता है।

अद्भुत रामायण संस्कृत भाषा में रचित 27 सर्गों का काव्य-विशेष है। कहा जाता है कि इस ग्रंथ के प्रणेता भी वाल्मीकि थे। किंतु शोधकर्ताओं के अनुसार इसकी भाषा और रचना से लगता है कि किसी बहुत परवर्ती कवि ने इसका प्रणयन किया है अर्थात अब यह वाल्मीकि कृत नहीं रही। तो क्या वाल्मीकि यह चाहते थे कि मेरी रामायण में विवादित विषय न हो, क्योंकि वे श्रीराम को एक मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में ही स्थापित करना चाहते थे?

हनुमानजी ने भी लिखी थी एक रामायण,हनुमद रामायण!!!!!!!!

शास्त्रों के अनुसार विद्वान लोग कहते हैं कि सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी एक शिला (चट्टान) पर अपने नाखूनों से लिखी थी। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और यह ‘हनुमद रामायण’ के नाम से प्रसिद्ध है।

यह घटना तब की है जबकि भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या में राज करने लगते हैं और श्री हनुमानजी हिमालय पर चले जाते हैं। वहां वे अपनी शिव तपस्या के दौरान की एक शिला पर प्रतिदिन अपने नाखून से रामायण की कथा लिखते थे। इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम की महिमा का उल्लेख करते हुए ‘हनुमद रामायण’ की रचना की।

कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि ने भी ‘वाल्मीकि रामायण’ लिखी और लिखने के बाद उनके मन में इसे भगवान शंकर को दिखाकर उनको समर्पित करने की इच्छा हुई। वे अपनी रामायण लेकर शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंच गए। वहां उन्होंने हनुमानजी को और उनके द्वारा लिखी गई ‘हनुमद रामायण’ को देखा। हनुमद रामायण के दर्शन कर वाल्मीकिजी निराश हो गए।

वाल्मीकिजी को निराश देखकर हनुमानजी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होंने बड़े ही कठिन परिश्रम के बाद रामायण लिखी थी लेकिन आपकी रामायण देखकर लगता है कि अब मेरी रामायण उपेक्षित हो जाएगी, क्योंकि आपने जो लिखा है उसके समक्ष मेरी रामायण तो कुछ भी नहीं है।

तब वाल्मीकिजी की चिंता का शमन करते हुए श्री हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठाकर समुद्र के पास गए और स्वयं द्वारा की गई रचना को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है। वह आज भी समुद्र में पड़ी है। कौन ढूंढेगा उसको और कौन निकालेगा उसको?

हनुमानजी द्वारा लिखी रामायण को हनुमानजी द्वारा समुद्र में फेंक दिए जाने के बाद महर्षि वाल्मीकि बोले कि हे रामभक्त श्री हनुमान, आप धन्य हैं! आप जैसा कोई दूसरा ज्ञानी और दयावान नहीं है। हे हनुमान, आपकी महिमा का गुणगान करने के लिए मुझे एक जन्म और लेना होगा और मैं वचन देता हूं कि कलयुग में मैं एक और रामायण लिखने के लिए जन्म लूंगा। तब मैं यह रामायण आम लोगों की भाषा में लिखूंगा।

माना जाता है कि रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास कोई और नहीं बल्कि महर्षि वाल्मीकि का ही दूसरा जन्म था। तुलसीदासजी अपनी ‘रामचरित मानस’ लिखने के पूर्व हनुमान चालीसा लिखकर हनुमानजी का गुणगान करते हैं और हनुमानजी की प्रेरणा से ही वे फिर रामचरित मानस लिखते हैं।

मिल गई समुद्र में हनुमान द्वारा लिखी हनुमान रामायण…

कहते हैं कि कालिदास के काल में एक पट्टलिका को समुद्र के किनारे पाया गया था जिसे एक सार्वजनिक स्थान पर टांग दिया गया था ताकि विद्यार्थी उस पर लिखी गूढ़ लिपि को समझ और पढ़कर उसका अर्थ निकाल सकें। ऐसा माना जाता है कि कालिदास ने उसका अर्थ निकाल लिया था और वो ये भी जान गए थे कि ये पट्टलिका कोई और नहीं, अपितु हनुमानजी द्वारा रचित हनुमद रामायण का ही एक अंश है, जो कि जल के साथ प्रवाहित होकर यहां तक आ गया है।

महाकवि तुलसीदास के हाथ वहीं पट्टलिका लग गई थी। उसे पाकर तुलसीदास ने अपने आपको बहुत भाग्यशाली माना कि उन्हें हनुमद रामायण के श्लोक का एक पद्य प्राप्त हुआ है।

हनुमन्नाटक रामायण के अंतिम खंड में लिखा है-
‘रचितमनिलपुत्रेणाथ वाल्मीकिनाब्धौ
निहितममृतबुद्धया प्राड् महानाटकं यत्।।
सुमतिनृपतिभेजेनोद्धृतं तत्क्रमेण
ग्रथितमवतु विश्वं मिश्रदामोदरेण।।’

अर्थात : इसको पवनकुमार ने रचा और शिलाओं पर लिखा था, परंतु वाल्मीकि ने जब अपनी रामायण रची तो तब यह समझकर कि इस रामायण को कौन पढ़ेगा, श्री हनुमानजी से प्रार्थना करके उनकी आज्ञा से इस महानाटक को समुद्र में स्थापित करा दिया, परंतु विद्वानों से किंवदंती को सुनकर राजा भोज ने इसे समुद्र से निकलवाया और जो कुछ भी मिला उसको उनकी सभा के विद्वान दामोदर मिश्र ने संगतिपूर्वक संग्रहीत किया।

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This is a joint stamp issued by India and Korea in 2019 commemorating princess Suriratna
Princess Suriratna (known to Koreans as Heo Hwang-ok) was a princess who claimed descent from the ancient Ikshvaku dynasty of Ayodhya.
According to the ancient Korean chronicle named Samguk Yusa, princess Suriratna came to Korea from Ayuta (Ayodhya).. She became the queen to king Suro who founded the ancient Karak kingdom (1st century CE), which is one of the earliest states of Korea.
Today, historians say, descendants of the couple number more than six million, which is roughly about 10% of the South Korean population.