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अहिरावण कथा ! 🔔

🐒🐒 पंचमुखी क्यों हुए हनुमानजी ? 🐒🐒

लंका में महा बलशाली मेघनाद के साथ बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया. रावण जो अब तक मद में चूर था राम सेना, खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर थोड़ा तनाव में आया.

रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई. रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के मित्र रहे हैं.

लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी. रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं.

रावण ने उन्हें बुला भेजा और कहा कि वह अपने छल बल, कौशल से श्री राम व लक्ष्मण का सफाया कर दे. यह बात दूतों के जरिए विभीषण को पता लग गयी. युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए.

विभीषण को लगा कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसका जिम्मा परम वीर हनुमान जी को राम-लक्ष्मण को सौंप कर दिया जाए. साथ ही वे अपने भी निगरानी में लगे थे.

राम-लक्ष्मण की कुटिया लंका में सुवेल पर्वत पर बनी थी. हनुमान जी ने भगवान श्री राम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया. कोई जादू टोना तंत्र-मंत्र का असर या मायावी राक्षस इसके भीतर नहीं घुस सकता था.

अहिरावण और महिरावण श्री राम और लक्ष्मण को मारने उनकी कुटिया तक पहुंचे, पर इस सुरक्षा घेरे के आगे उनकी एक न चली, असफल रहे. ऐसे में उन्होंने एक चाल चली. महिरावण विभीषण का रूप धर के कुटिया में घुस गया.

राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे. दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की ओर लेकर चल दिए.

विभीषण लगातार सतर्क थे. उन्हें कुछ देर में ही पता चल गया कि कोई अनहोनी घट चुकी है. विभीषण को महिरावण पर शक था, उन्हें राम-लक्ष्मण की जान की चिंता सताने लगी.

विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि वे उसका पीछा करें. लंका में अपने रूप में घूमना राम भक्त हनुमान के लिए ठीक न था, सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये.

निकुंभला नगरी में पक्षी रूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना. कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है. अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे. बस सारा युद्ध समाप्त.

कबूतर की बातों से ही बजरंग बली को पता चला कि दोनों राक्षस राम लक्ष्मण को सोते में ही उठाकर कामाक्षी देवी को बलि चढाने पाताल लोक ले गये हैं. हनुमान जी वायु वेग से रसातल की और बढे और तुरंत वहां पहुंचे.

हनुमान जी को रसातल के प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार मिला. इसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था. उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश से रोक दिया.

द्वारपाल हनुमान जी से बोला कि मुझ को परास्त किए बिना तुम्हारा भीतर जाना असंभव है. दोनों में लड़ाई ठन गयी. हनुमान जी की आशा के विपरीत यह बड़ा ही बलशाली और कुशल योद्धा निकला.

दोनों ही बड़े बलशाली थे. दोनों में बहुत भयंकर युद्ध हुआ, परंतु वह बजरंग बली के आगे न टिक सका. आखिर कार हनुमान जी ने उसे हरा तो दिया पर उस द्वारपाल की प्रशंसा करने से नहीं रह सके.

हनुमान जी ने उस वीर से पूछा कि हे वीर तुम अपना परिचय दो. तुम्हारा स्वरूप भी कुछ ऐसा है कि उससे कौतुहल हो रहा है. उस वीर ने उत्तर दिया- मैं हनुमान का पुत्र हूं और एक मछली से पैदा हुआ हूं. मेरा नाम है मकरध्वज.

हनुमान जी ने यह सुना तो आश्चर्य में पड़ गए. वह वीर की बात सुनने लगे. मकरध्वज ने कहा- लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में अपनी अग्नि शांत करने पहुंचे. उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा.

उस समय मेरी मां ने आहार के लिए मुख खोला था. वह तेज मेरी माता ने अपने मुख में ले लिया और गर्भवती हो गई. उसी से मेरा जन्म हुआ है. हनुमान जी ने जब यह सुना तो मकरध्वज को बताया कि वह ही हनुमान हैं.

मकरध्वज ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किए और हनुमान जी ने भी अपने बेटे को गले लगा लिया और वहां आने का पूरा कारण बताया. उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अपने पिता के स्वामी की रक्षा में सहायता करो.

मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में राक्षस बलि के लिए आने वाले हैं. बेहतर होगा कि आप रूप बदल कर कामाक्षी के मंदिर में जा कर बैठ जाएं. उनको सारी पूजा झरोखे से करने को कहें.

हनुमान जी ने पहले तो मधु मक्खी का वेश धरा और मां कामाक्षी के मंदिर में घुस गये. हनुमान जी ने मां कामाक्षी को नमस्कार कर सफलता की कामनाकी और फिर पूछा- हे मां क्या आप वास्तव में श्री राम जी और लक्ष्मण जी की बलि चाहती हैं ?

हनुमान जी के इस प्रश्न पर मां कामाक्षी ने उत्तर दिया कि नहीं. मैं तो दुष्ट अहिरावण व महिरावण की बलि चाहती हूं. यह दोनों मेरे भक्त तो हैं पर अधर्मी और अत्याचारी भी हैं. आप अपने प्रयत्न करो. सफल रहोगे.

मंदिर में पांच दीप जल रहे थे. अलग-अलग दिशाओं और स्थान पर मां ने कहा यह दीप अहिरावण ने मेरी प्रसन्नता के लिए जलाये हैं जिस दिन ये एक साथ बुझा दिए जा सकेंगे, उसका अंत सुनिश्चित हो सकेगा.

इस बीच गाजे-बाजे का शोर सुनाई पड़ने लगा. अहिरावण, महिरावण बलि चढाने के लिए आ रहे थे. हनुमान जी ने अब मां कामाक्षी का रूप धरा. जब अहिरावण और महिरावण मंदिर में प्रवेश करने ही वाले थे कि हनुमान जी का महिला स्वर गूंजा.

हनुमान जी बोले- मैं कामाक्षी देवी हूं और आज मेरी पूजा झरोखे से करो. झरोखे से पूजा आरंभ हुई ढेर सारा चढावा मां कामाक्षी को झरोखे से चढाया जाने लगा. अंत में बंधक बलि के रूप में राम लक्ष्मण को भी उसी से डाला गया. दोनों बंधन में बेहोश थे.

हनुमान जी ने तुरंत उन्हें बंधन मुक्त किया. अब पाताल लोक से निकलने की बारी थी, पर उससे पहले मां कामाक्षी के सामने अहिरावण महिरावण की बलि देकर उनकी इच्छा पूरी करना और दोनों राक्षसों को उनके किए की सज़ा देना शेष था.

अब हनुमान जी ने मकरध्वज को कहा कि वह अचेत अवस्था में लेटे हुए भगवान राम और लक्ष्मण का खास ख्याल रखे और उसके साथ मिलकर दोनों राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.

पर यह युद्ध आसान न था. अहिरावण और महिरावण बडी मुश्किल से मरते तो फिर पाँच पाँच के रूप में जिदां हो जाते. इस विकट स्थिति में मकरध्वज ने बताया कि अहिरावण की एक पत्नी नागकन्या है.

अहिरावण उसे बलात् हर लाया है. वह उसे पसंद नहीं करती, पर मन मार के उसके साथ है, वह अहिरावण के राज जानती होगी. उससे उसकी मौत का उपाय पूछा जाये. आप उसके पास जाएं और सहायता मांगे.

मकरध्वज ने राक्षसों को युद्ध में उलझाये रखा और उधर हनुमान अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे. नागकन्या से उन्होंने कहा कि यदि तुम अहिरावण के मृत्यु का भेद बता दो तो हम उसे मारकर तुम्हें उसके चंगुल से मुक्ति दिला देंगे.

अहिरावण की पत्नी ने कहा- मेरा नाम चित्रसेना है. मैं भगवान विष्णु की भक्त हूं. मेरे रूप पर अहिरावण मर मिटा और मेरा अपहरण कर यहां कैद किये हुए है, पर मैं उसे नहीं चाहती. लेकिन मैं अहिरावण का भेद तभी बताउंगी, जब मेरी इच्छा पूरी की जायेगी.

हनुमान जी ने अहिरावण की पत्नी नागकन्या चित्रसेना से पूछा कि आप अहिरावण की मृत्यु का रहस्य बताने के बदले में क्या चाहती हैं ? आप मुझसे अपनी शर्त बताएं, मैं उसे जरूर मानूंगा.

चित्रसेना ने कहा- दुर्भाग्य से अहिरावण जैसा असुर मुझे हर लाया. इससे मेरा जीवन खराब हो गया. मैं अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहती हूं. आप अगर मेरा विवाह श्री राम से कराने का वचन दें तो मैं अहिरावण के वध का रहस्य बताऊंगी.

हनुमान जी सोच में पड़ गए. भगवान श्री राम तो एक पत्नी निष्ठ हैं. अपनी धर्म पत्नी देवी सीता को मुक्त कराने के लिए असुरों से युद्ध कर रहे हैं. वह किसी और से विवाह की बात तो कभी न स्वीकारेंगे. मैं कैसे वचन दे सकता हूं ?

फिर सोचने लगे कि यदि समय पर उचित निर्णय न लिया तो स्वामी के प्राण ही संकट में हैं. असमंजस की स्थिति में बेचैन हनुमानजी ने ऐसी राह निकाली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

हनुमान जी बोले- तुम्हारी शर्त स्वीकार है, पर हमारी भी एक शर्त है. यह विवाह तभी होगा, जब तुम्हारे साथ भगवान राम जिस पलंग पर आसीन होंगे, वह सही सलामत रहना चाहिए. यदि वह टूटा तो इसे अपशकुन मांगकर वचन से पीछे हट जाऊंगा.

जब महाकाय अहिरावण के बैठने से पलंग नहीं टूटता तो भला श्रीराम के बैठने से कैसे टूटेगा !

यह सोच कर चित्रसेना तैयार हो गयी. उसने अहिरावण समेत सभी राक्षसों के अंत का सारा भेद बता दिया.

चित्रसेना ने कहा- दोनों राक्षसों के बचपन की बात है. इन दोनों के कुछ शरारती राक्षस मित्रों ने कहीं से एक भ्रामरी को पकड़ लिया. मनोरंजन के लिए वे उसे भ्रामरी को बार-बार काटों से छेड रहे थे.

भ्रामरी साधारण भ्रामरी न थी. वह भी बहुत मायावी थी, किंतु किसी कारण वश वह पकड़ में आ गई थी. भ्रामरी की पीड़ा सुनकर अहिरावण और महिरावण को दया आ गई और अपने मित्रों से लड़ कर उसे छुड़ा दिया.

मायावी भ्रामरी का पति भी अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर आया था. अपनी पत्नी की मुक्ति से प्रसन्न होकर उस भौंरे ने वचन दिया थ कि तुम्हारे उपकार का बदला हम सभी भ्रमर जाति मिलकर चुकाएंगे.

ये भौंरें अधिकतर उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं. ये सब बड़ी भारी संख्या में हैं. दोनों राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ है और ये मरने को हो हो जाते हैं तब भ्रमर उनके मुख में एक बूंद अमृत का डाल देते हैं.

उस अमृत के कारण ये दोनों राक्षस मरकर भी जिंदा हो जाते हैं. इनके कई-कई रूप उसी अमृत के कारण हैं. इन्हें जितनी बार फिर से जीवन दिया गया उनके उतने नए रूप बन गए हैं. इस लिए आपको पहले इन भंवरों को मारना होगा.

हनुमान जी रहस्य जानकर लौटे. मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था. तो हनुमान जी ने भंवरों का खात्मा शुरू किया. वे आखिर हनुमान जी के सामने कहां तक टिकते.

जब सारे भ्रमर खत्म हो गए और केवल एक बचा तो वह हनुमान जी के चरणों में लोट गया. उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की याचना की. हनुमान जी पसीज गए. उन्होंने उसे क्षमा करते हुए एक काम सौंपा.

हनुमान जी बोले- मैं तुम्हें प्राण दान देता हूं पर इस शर्त पर कि तुम यहां से तुरंत चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी के पलंग की पाटी में घुसकर जल्दी से जल्दी उसे पूरी तरह खोखला बना दोगे.

भंवरा तत्काल चित्रसेना के पलंग की पाटी में घुसने के लिए प्रस्थान कर गया. इधर अहिरावण और महिरावण को अपने चमत्कार के लुप्त होने से बहुत अचरज हुआ पर उन्होंने मायावी युद्ध जारी रखा.

भ्रमरों को हनुमान जी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था. यह देखकर हनुमान जी कुछ चिंतित हुए.

फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया. देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा.

हनुमान जी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया. उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख.

उसके बाद हनुमान जी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए. अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी. हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये.

इसके बाद उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए. दोनो भाई होश में आ गए. चित्रसेना भी वहां आ गई थी. हनुमान जी ने कहा- प्रभो ! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए.

पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी. अहिरावण इसे बल पूर्वक उठा लाया था. वह आपसे विवाह करना चाहती है. कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें. इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी.

श्री राम हनुमान जी की बात सुनकर चकराए. इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमान जी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं. अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है. इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते.

कृपा निधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए. परंतु आप चिंता न करें. हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए, बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं.

हनुमान जी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्री राम जी और लक्ष्मण जी दोनों चिंता में पड़ गये. वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमान जी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली.

हनुमान जी ने भावावेश में प्रभु श्री राम की बांह पकड़ कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया. श्री राम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमरा कर टूट गयी.

पलंग धराशायी हो गया. चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी. हनुमान जी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता. तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं.

चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है. उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है. मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें, यह तो बहुत अनुचित है. मैं हनुमान को श्राप दूंगी.

चित्रसेना हनुमान जी को श्राप देने ही जा ही रही थी कि श्री राम का सम्मोहन भंग हुआ. वह इस पूरे नाटक को समझ गये. उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है. इस लिए हनुमान जी को यह करना पड़ा. उन्हें क्षमा कर दो.

क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी. श्री राम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लूंगा, तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा. इससे वह मान गयी.

हनुमान जी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था. भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया.

श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमान जी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये.

!! जय श्री राम !!
निकला मित्र सवेरा घंटिया धन-धन बाजी
सुना राम के गीत रामधन मन में साजी
!! जय श्री राम !!

(यह प्रसंग स्कंद पुराण और आनंद रामायण के सारकांण्ड की कथा से लिया गया है ।

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राम सेतु के अभियंता नल नील 🕉🙏

रामायण की कथा में नल और नील नामक दो वानरों की कथा आती है। दोनों महान योद्धा थे और लंका युद्ध में उन्होंने कई प्रमुख राक्षस योद्धाओं का वध किया। कई लोगों को ये लगता है कि नल और नील भाई थे। कई ये भी कहते हैं कि दोनों जुड़वाँ भाई थे, किन्तु ये सत्य नहीं है। रामायण में जो वानर सेना थी वे सभी किसी ना किसी देवता के अंश थे। उसी प्रकार नल भगवान विश्वकर्मा और नील अग्निदेव के अंशावतार थे।

वाल्मीकि रामायण में लंका सेतु की रचना का श्रेय केवल नल को ही दिया गया है और सेतु निर्माण में नील का कोई वर्णन नहीं। है यही कारण है कि इस सेतु को लंका सेतु एवं रामसेतु के अतिरिक्त नलसेतु के नाम से भी जाना जाता है। विश्वकर्मा के पुत्र होने के कारण नल में स्वाभाविक रूप से वास्तुशिल्प की कला थी। अपने पिता विश्वकर्मा की भांति वो भी एक उत्कृष्ट शिल्पी थे। यही कारण है कि समुद्र पर सेतु निर्माण का दायित्व नल को ही दिया गया था।

जब भगवान ब्रह्मा भविष्य में श्रीराम की सहायता के लिए देवताओं को उनका दायित्व समझा रहे थे उसी दौरान उन्होंने श्री विश्वकर्मा को भी इस कार्य के लिए बुलाया। तब विश्वकर्मा जी ने उनसे पूछा – “हे ब्रह्मदेव! मुझे पता है कि रावण के अत्याचार को रोकने श्रीहरि शीघ्र ही अवतार लेने वाले हैं। उस अवतार में उनका भयानक युद्ध रावण से होगा। किन्तु मैं तो एक शिल्पी हूँ, योद्धा नहीं। फिर उस युद्ध में मैं किस प्रकार अपना योगदान दे सकता हूँ?”

तब ब्रह्मदेव ने कहा – “पुत्र! नारायण जो अवतार लेने वाले हैं वो तब तक सार्थक नहीं है जब तक तुम उनकी सहायता नहीं करोगे। तुम्हे उनके अवतार काल में एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण कार्य पूर्ण करना है जो समय आने पर तुम स्वतः ही समझ जाओगे।” इस प्रकार ब्रह्मदेव के आदेश पर विश्वकर्मा के अंश से नल का जन्म वानर योनि में हुआ। कहा जाता है कि अग्निदेव के अंश से जन्मे नील भी उसी दिन पैदा हुए और दोनों बहुत घनिष्ठ मित्र थे।

बचपन में नल बहुत चंचल थे। वे वन में तपस्या कर रहे ऋषियों की देव मूर्तियों को सरोवर में डाल देते थे। नील भी उनके इस कृत्य में उनका बराबर साथ देते थे। ऋषियों की उनकी शरारतों से बड़ा कष्ट होता था और उन्हें अपनी देव मूर्तियां बार-बार बनानी पड़ती थी। इससे उन्हें क्रोध तो बड़ा आता था किन्तु बालक होने के कारण वे उन्हें कोई दंड नहीं देते थे।

एक बार शिवरात्रि के दिन ऋषियों ने शिवलिंग की स्थापना की किन्तु सदा की भांति नल ने उस शिवलिंग को चुराकर सरोवर में डाल दिया। ऋषियों को इससे विलम्ब हुआ और पूजा का शुभ मुहूर्त बीत गया। इससे रुष्ट होकर ऋषियों के धैर्य का बांध टूट गया और उन्होंने नल को ये श्राप दे दिया कि उसके द्वारा स्पर्श की गयी कोई भी वस्तु जल में नहीं डूबेगी। उसके बाद जब भी नल ऋषियों की मूर्तियाँ सरोवर में डाल देते थे तो वो जल पर ही तैरती रहती थी और ऋषि उसे वापस ले आते थे।

ऋषियों द्वारा दिया गया यही श्राप नल के लिए वरदान बन गया। कई कथा में नल के साथ-साथ ये वरदान नील को भी दिया गया बताया गया है। जब श्रीराम ने देवी सीता की खोज के लिए अंगद के नेतृत्व में सेना दक्षिण की ओर भेजी तो नल-नील भी उनके साथ थे। जब श्रीराम ने समुद्र को सुखाने के लिए बाण का संधान किया तब समुद्र ने उनसे कहा – “हे प्रभु! अगर आपने मेरे जल को सुखा दिया तो उसमे आश्रय पाने वाले असंख्य जीव और वनस्पतियों का भी नाश हो जाएगा। अतः आप मेरे ऊपर एक सेतु का निर्माण करें और उसपर होकर लंका में प्रवेश करें।”

जब श्रीराम ने पूछा कि १०० योजन लम्बे इस समुद्र पर पुल कैसे बनाया जा सकता है तब समुद्र ने कहा – “प्रभु! आपकी सेना में स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा के पुत्र नल हैं। वे उन्ही की भांति एक महान शिल्पी हैं और वे समुद्र पर पुल बना सकते हैं।” तब जांबवंत जी ने श्रीराम को नल और नील को मिले गए श्राप के बारे में बताया। तब नल के नेतृत्व में, नल और नील को दिए गए श्राप के प्रभाव से पाषाण समुद्र में तैरने लगे और उसी को जोड़ कर वानर सेना ने ५ दिनों में उस १०० योजन लम्बे समुद्र पर महान सेतु बांध दिया।

तेलुगु, बंगाली एवं इंडोनेशिया में रचित रामायण के अनुसार नल और नील पत्थर को अपने बाएं हाथ से समुद्र से डालते थे। ये देख कर महावीर हनुमान ने उन्हें समझाया कि उन्हें बांये हाथ से पत्थर उठा कर दाहिने हाथ से समुद्र में डालना चाहिए क्यूंकि दाहिना हाथ पवित्र माना जाता है। ये प्रथा आज भी हिन्दू धर्म में प्रचलित है कि कोई भी शुभ कार्य अपने दाहिने हाथ से ही करना चाहिए।

आनंद रामायण के अनुसार ऐसा वर्णन है कि नल द्वारा स्पर्श किये गए पहले ९ पाषाणों से श्रीराम ने नवग्रहों की पूजा की और उसे सबसे पहले समुद्र में प्रवाहित किया ताकि सेतु का कार्य निर्विघ्न पूरा हो सके। कम्ब रामायण के अनुसार लंका में प्रवेश करने वाली सेना के लिए शिविर बनाने का दायित्व भी श्रीराम ने नल को ही दिया था। उन्होंने लंका में उपलब्ध स्वर्ण और मणियों से अपने सेना के लिए शिविर बनाया किन्तु अपना शिविर उन्होंने बांस और लकड़ियों से बनाया। ये दर्शाता है कि वे कितने कुशल सेनापति थे।

लंका युद्ध में भी नल ने बढ़-चढ़ के भाग लिया। जब इंद्रजीत ने वानर सेना में त्राहि-त्राहि मचा दी तब नल ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। उस युद्ध में मेघनाद ने नल को अपने सहस्त्र बाणों से बींध दिया था किन्तु फिर भी उनका वध करने में वो असमर्थ रहा। राक्षस यूथपति तपना का वध भी नल ने उस युद्ध में किया। महाभारत के अनुसार तुण्डक नमक महान राक्षस योद्धा का वध भी नल ने उससे ३ प्रहर युद्ध कर किया था।

जैन धर्म में भी नल और नील का वर्णन आता है। जैन ग्रन्थ तत्वार्थसूत्र के अनुसार नल ने मंगी-तुंगी पर्वत पर जैन धर्म की दीक्षा ली थी और अंततः मोक्ष को प्राप्त किया था।
🕉🙏 जय शंकर की ।।🕉🙏

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#सुंदरकाणड सें जुङी 5 अहम बातें

1 :- सुंदरकाणड का नाम सुंदरकाणड क्यों रखा गया ?

हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थें और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी ! त्रिकुटाचल पर्वत यानी यहां 3 पर्वत थें !

पहला सुबैल पर्वत,
जहां कें मैदान में युद्ध हुआ था !

दुसरा नील पर्वत,
जहां राक्षसों कें महल बसें हुए थें ! और

तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका नीर्मित थी ! इसी वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी !

इस काण्ड की यहीं सबसें प्रमुख घटना थी , इसलिए इसका नाम सुंदरकाणड रखा गया है !

2 :- शुभ अवसरों पर ही सुंदरकाणड का पाठ क्यों ?

शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस कें सुंदरकाणड का पाठ किया जाता हैं ! शुभ कार्यों की शुरूआत सें पहलें सुंदरकाणड का पाठ करनें का विशेष महत्व माना गया है !
जबकि किसी व्यक्ति कें जीवन में ज्यादा परेशानीयाँ हो , कोई काम नहीं बन पा रहा हैं, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या हो , सुंदरकाणड कें पाठ सें शुभ फल प्राप्त होने लग जाते है, कई ज्योतिषी या संत भी विपरित परिस्थितियों में सुंदरकाणड करनें की सलाह देते हैं !

3 :- जानिए सुंदरकाणड का पाठ विषेश रूप सें क्यों किया जाता हैं ?

माना जाता हैं कि सुंदरकाणड कें पाठ सें हनुमानजी प्रशन्न होतें है !
सुंदरकाणड कें पाठ में बजरंगबली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती हैं !
जो लोग नियमित रूप सें सुंदरकाणड का पाठ करतें हैं , उनके सभी दुख दुर हो जातें हैं , इस काण्ड में हनुमानजी नें अपनी बुद्धि और बल सें सीता की खोज की हैं !
इसी वजह सें सुंदरकाणड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता

4 :- सुंदरकाणड सें मिलता हैं मनोवैज्ञानिक लाभ ?

वास्तव में श्रीरामचरितमानस कें सुंदरकाणड की कथा सबसे अलग हैं , संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम कें गुणों और उनके पुरूषार्थ को दर्शाती हैं , सुंदरकाणड ऐक मात्र ऐसा अध्याय हैं जो श्रीराम कें भक्त हनुमान की विजय का काण्ड हैं !
मनोवैज्ञानिक नजरिए सें देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला काण्ड हैं , सुंदरकाणड कें पाठ सें व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती हैं , किसी भी कार्य को पुर्ण करनें कें लिए आत्मविश्वास मिलता हैं !

5 :- सुंदरकाणड सें मिलता है धार्मिक लाभ ?

सुंदरकाणड कें लाम सें मिलता हैं धार्मिक लाभ हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पुर्ण करनें वालीं मानी गई हैं , बजरंगबली बहुत जल्दी प्रशन्न होने वालें देवता हैं , शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताएं गए हैं , इन्हीं उपायों में सें ऐक उपाय सुंदरकाणड का पाठ करना हैं , सुंदरकाणड कें पाठ सें हनुमानजी कें साथ ही श्रीराम की भी विषेश कृपा प्राप्त होती हैं !

किसी भी प्रकार की परेशानी हो सुंदरकाणड कें पाठ सें दुर हो जाती हैं , यह ऐक श्रेष्ठ और सरल उपाय है , इसी वजह सें काफी लोग सुंदरकाणड का पाठ नियमित रूप सें करते हैं , हनुमानजी जो कि वानर थें , वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए वहां सीता की खोज की , लंका को जलाया सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए , यह ऐक भक्त की जीत का काण्ड हैं , जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है , सुंदरकाणड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं , इसलिए पुरी रामायण में सुंदरकाणड को सबसें श्रेष्ठ माना जाता हैं , क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता हैं , इसी वजह सें सुंदरकाणड का पाठ विषेश रूप सें किया जाता हैं !!

जय श्री राम !
जय श्री राम !
जय श्री राम !
जय श्री राम !
जय श्री राम !

जय जय जय सीयाराम !
सीयाराम जय जय राम !

सीता राम
सीता राम
सीता राम

जय श्री राम भक्त हनुमानजी नमो नमः !!

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जानिए कैसे खत्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुकुल?
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अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में रक्तपात के सिवाय कुछ हासिल नहीं हुआ। इस युद्ध में कौरवों के समस्त कुल का नाश हुआ, साथ ही पाँचों पांडवों को छोड़कर पांडव कुल के अधिकाँश लोग मारे गए। लेकिन इस युद्ध के कारण, युद्ध के पश्चात एक और वंश का खात्मा हो गया वो था ‘श्री कृष्ण जी का यदुवंश’।

गांधारी का श्राप
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महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। गांधारी के श्राप से विनाशकाल आने के कारण श्रीकृष्ण द्वारिका लौटकर यदुवंशियों को लेकर प्रयास क्षेत्र में आ गये थे। यदुवंशी अपने साथ अन्न-भंडार भी ले आये थे। कृष्ण ने ब्राह्मणों को अन्नदान देकर यदुवंशियों को मृत्यु का इंतजार करने का आदेश दिया था। कुछ दिनों बाद महाभारत-युद्ध की चर्चा करते हुए सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया। सात्यकि ने गुस्से में आकर कृतवर्मा का सिर काट दिया। इससे उनमें आपसी युद्ध भड़क उठा और वे समूहों में विभाजित होकर एक-दूसरे का संहार करने लगे। इस लड़ाई में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और मित्र सात्यकि समेत सभी यदुवंशी मारे गये थे, केवल बब्रु और दारूक ही बचे रह गये थे। यदुवंश के नाश के बाद कृष्ण के ज्येष्ठ भाई बलराम समुद्र तट पर बैठ गए और एकाग्रचित्त होकर परमात्मा में लीन हो गए। इस प्रकार शेषनाग के अवतार बलरामजी ने देह त्यागी और स्वधाम लौट गए।

कैसे हुई श्रीकृष्ण की मृत्यु
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बलराम जी के देह त्यागने के बाद जब एक दिन श्रीकृष्ण जी पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, तब उस क्षेत्र में एक जरा नाम का बहेलिया आया हुआ था। जरा एक शिकारी था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह पास गया तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा।

बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। इसके बाद उस क्षेत्र में सभी देवता और स्वर्ग की अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि आए और उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की। आराधना के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए।

श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए।

इन संस्कारों के बाद यदुवंश के बचे हुए लोगों को लेकर अर्जुन इंद्रप्रस्थ लौट आए। इसके बाद श्रीकृष्ण के निवास स्थान को छोड़कर शेष द्वारिका समुद्र में डूब गई। श्रीकृष्ण के स्वधाम लौटने की सूचना पाकर सभी पाण्डवों ने भी हिमालय की ओर यात्रा प्रारंभ कर दी थी। इसी यात्रा में ही एक-एक करके पांडव भी शरीर का त्याग करते गए। अंत में युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचे थे।

संत लोग यह भी कहते हैं कि प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

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पवनपुत्र हनुमानजी महाराज के अजर-अमर होने के दस प्रामाणिक साक्ष्य ! साक्ष्य नंबर 5 पढ़कर आप हनुमान के परम भक्त बन जाओगे!!!!!!!!

कलयुग में अगर आप सुखी रहना चाहते हैं तो आपको हनुमान की पूजा जरूर करनी होगी। आप किसी को भी अपना प्रिय देवता मानते रहें लेकिन अगर आप हनुमान की पूजा नहीं करते हैं तो आपको दुःख और परेशानियाँ घेरती रहेंगी।

अब आप ऐसा मत सोचिये कि आपको यह बातें हम बता रहे हैं किन्तु यह तो कलयुग के शास्त्रों में लिखा है कि हनुमान कलयुग के भगवान हैं। साथ ही साथ हनुमान ही ऐसे देवता हैं जो साक्षात् धरती पर कलयुग में विराजमान भी रहेंगे। तो आज हम आपको हनुमान जी के जीवन से जुड़ी कुछ रहस्यमयी बातें बताते हैं – हनुमान के होने के सबूत बताते है –

हनुमान के होने के सबूत –

  1. रामायण में बताया गया है कि जब लक्ष्मण मुर्छित पड़ें हुए थे तो वैद जी ने जिन जड़ी बूटियों का नाम बताया था वह हिमालय पर्वत पर ही मिलती थी। तब हनुमान जी हिमालय गये थे और वहां से पूरा पहाड़ ही उठाकर लाए थे। बाद में विज्ञान के समय श्रीलंका के अन्दर जो वह पहाड़ है उसकी जांच हुई तो वह और हिमालय के पहाड़ एक समान पाए गये थे। यह बात दर्शाती है कि हनुमान जी हिमालय से पहाड़ लेकर गये थे।
  2. श्रीलंका का एक आदिवासी कबीला है जिसका नाम मातंग कबीला है। हनुमान जी इस कबीले के लोगों से आज भी साक्षात् प्रकट होकर मुलाकात करते हैं। यह कबीला विभीषण के ही खून का कबीला है. इस बात की पुष्टि रीसर्च में भी हुई है।

  3. हनुमान के साक्षात् होने का एक सबूत यह भी है कि शास्त्रों में लिखा गया है कि कलयुग में हनुमान जी गंधमादन पर्वत पर निवास करेंगे। कई साधू-संतों से आप कुंभ में मिलिए और इस सच को जानिए, तो आपको हैरान करने वाली जानकारी मिलेगी।

  4. महाभारत में भी हनुमान जी का जिक्र आता है। एक तो भीम से हनुमान जी की मुलाकात जंगलों में होती है और दूसरा कि अर्जुन के रथ के ऊपर भी हनुमान जी विराजमान थे, यह कृष्ण खुद स्वीकार करते हैं।

  5. हनुमान का कलयुग में चमत्कार नैनीताल के कैंची धाम में देखा जा सकता है। खुद फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने और एप्पल प्रमुख स्टीव जॉब ने इस हनुमान मंदिर का जिक्र किया है।

  6. जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लिल्यो ताहि मधुर फल जानू… हनुमान चालीसा की यह पंक्तियाँ सूर्य और धरती के बीच की सही दूरी हजारों साल पहले बता देती हैं। नासा ने जो दूरी आज बताई है यह लगभग उतनी ही है, जितनी की हनुमान चालीसा की यह पंक्ति बताती है।

  7. आज एक बड़ा सच यह भी है कि हनुमान जी की जिस रूप में पूजा हम कर रहे हैं वह उस रूप में नहीं हैं। हनुमान का वानर रूप गलत बताया गया है. हनुमान किसी भी रूप में आ सकते हैं। और उनका कोई एक रूप नहीं है।

  8. अमेरिका की माया सभ्यता जो हजारों साल पुरानी है। यह सभ्यता जिसकी पूजा करती है, वह MONKEY HAWKER GOD हैं और आप कभी इनके भगवान की तस्वीर देखते हैं तो आपको मालुम चलेगा कि वह हनुमान ही हैं।

  9. शिमला के अन्दर एक मंदिर है जिसका नाम जाखू मंदिर है। इस मंदिर में हनुमान जी के पैरों के निशान मौजूद हैं।

  10. हनुमान चालीसा की हर पंक्ति और शब्द में इतनी शक्ति है कि व्यक्ति इसका जापकर, कुछ भी प्राप्त कर सकता है। यहाँ तक की हनुमान चालीसा के पढ़ने के समय व्यक्ति का तेज कई लाखों गुना बढ़ जाता है, इस बात को विज्ञानं भी स्वीकार करने लगा है।

तो ये थे हनुमान के होने के सबूत – इस तरह से यह 10 बातें हनुमान के होने के सबूत हैं।

कलयुग के भगवान हनुमान जी का अगर सच्चे दिल से जाप किया जाये तो व्यक्ति हर तरह की मुश्किलों से बच सकता है….!

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नारी गहने क्यों पहनती है ?????
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भगवान राम ने धनुष तोड दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों ?’’
‘‘बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था।
‘‘अर्थात?’’ सीताजी ने पुनः पूछा, ‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?’’
‘‘बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।’’
‘‘और मेहंदी का अर्थ?’’
मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’
‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’
‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।’’
‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?’’
‘‘बेंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।’’
‘‘यह नथ क्यों?’’
‘‘नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’’
‘‘और यह टीका?’’
‘‘पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।’’
‘‘और यह बंदनी क्यों?’’
‘‘बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।’’
‘‘पत्ती का अर्थ?’’
‘‘पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।’’
‘‘कर्णफूल क्यों?’’
‘‘हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।’’
‘‘और इस हंसली से क्या तात्पर्य है?’’
‘‘हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’
‘‘मोहनलता क्यों?’’
‘‘मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।’’
‘‘नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री?’’
‘‘पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कडे का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा, छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बडियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।’’
‘‘माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रंृगार है?’’
‘‘बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।’’
‘‘हे राम!’’ कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांग्नी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे.. 🙏

!! जय श्री राम !!
लेख गीत प्रलेख लिखें, लिखें कथा संदेश।
नित नूतन हम धर्म की, बातें करें विशेष
!! जय श्री राम !!

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भगवान राम की सेना में कौन क्या था, आप भी जानकर हैरान रह जाएंगे🕉 😊

👏 प्रभु श्रीराम जब सीता माता की खोज करते हुए कर्नाटक के हम्पी जिला बेल्लारी स्थित ऋष्यमूक पर्वत पर्वत पहुंचे तो वहां उनकी भेंट हनुमानजी और सुग्रीवजी से हुई। उस काल में इस क्षेत्र को किष्‍किंधा कहा जाता था। यहीं पर हनुमानजी के गुरु मतंग ऋषि का आश्रम था।

⛳ हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने वानर सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है। यहां श्रीराम की सेना ने पड़ाव डाला और श्रीराम ने अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित कर विचार-विमर्ष किया।

👉लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया। वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने विश्‍वकर्मा के पुत्र नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करवाया। नल और नील ने राम के सेना की मदद से यह निर्माण किया। उस वक्त इस रामसेतु का नाम प्रभु श्रीराम ने नल सेतु रखा था। आओ अब जानते हैं कि प्रभु श्रीराम की सेना में कौन क्या था।

🤝 दरअसल, प्रभु श्रीराम की ओर से सुग्रीव की सेना ने लड़ाई लड़ी थी। सुग्रीव ने सेना का गठन कर सभी को अलग अलग कार्य सौंपा था। प्रारंभ में उन्होंने सभी वानरों को सीता माता की खोज में लगाया। फिर जब सीता माता का पता चल गए तो वे राम की आज्ञा से समुद्र तट पर गए और उन्होंने वहां पर अपनी सेना का पड़ाव डाला। उनकी सेना में लाखों सैनिक थे। लेकिन यहां प्रधान योद्धाओं का नाम ही लिखा जा सकता है।

🐒वानर सेना में वानरों के अलग अलग झूंड थे। हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था। यूथ अर्थात झूंड। लंका पर चढ़ाई के लिए सुग्रीव ने ही वानर तथा ऋक्ष सेना का प्रबन्ध किया था।

सुग्रीव- बाली का छोटा भाई और राम सेना का प्रमुख प्रधान सेना अध्यक्ष। वानरों के राजा 10,00,000 से ज्यादा सेना के साथ युद्ध कर रहे थे।

हनुमान- सुग्रीव के मित्र और वानर यूथ पति। प्रधान योद्धाओं में से एक। ये रामदूत भी हैं।

लक्ष्मण- दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र, उर्मिला के पति लक्ष्मण प्रधान योद्धाओं में शामिल थे।

अंगद- बाली तथा तारा का पुत्र वानर यूथ पति एवं प्रधान योद्धा। ये रामदूत भी थे।

विभीषण- रावण का भाई। प्रमुख सलाहकार।

जामवंत- सुग्रीव के मित्र रीछ, रीछ सेना के सेनापति एवं प्रमुख सलाहकार। अग्नि पुत्र जाम्बवंत एक कुशल योद्धा के साथ ही मचान बांधने और सेना के लिए रहने की कुटिया बनने में भी कुशल थे। ये रामदूत भी हैं।

नल- सुग्रीव की सेना का वानरवीर। सुग्रीव के सेना नायक। सुग्रीव सेना में इंजीनियर। सेतुबंध की रचना की थी।

नील- सुग्रीव का सेनापति जिसके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थे, सेतुबंध की रचना में सहयोग दिया था। सुग्रीव सेना में इंजीनियर और सुग्रीव के सेना नायक। नील के साथ 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी।

क्राथ- वानर यूथपति।

मैन्द- द्विविद के भाई यूथपति।
द्विविद- सुग्रीव के मन्त्री और मैन्द के भाई थे। ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। द्विविद को भौमासुर का मित्र भी कहा गया है।

दधिमुख- सुग्रीव का मामा।

संपाती- जटायु का बड़ा भाई,वानरों को सीता का पता बताया।

जटायु- रामभक्त पक्षी,रावण द्वारा वध, राम द्वारा अंतिम संस्कार।

गुह- श्रंगवेरपुर के निषादों का राजा, राम का स्वागत किया था।

सुषेण वैद्य- सुग्रीव के ससुर।

परपंजद पनस-

कुमुद-

गवाक्ष-

केसरी- केसरी, पनस, और गज 1,00000 से ज्यादा वानर सेना के साथ युद्ध कर रहे थे। ये सभी यूथपति थे। केसरी हनुमानजी के पिता थे।

शतबली- शतबली के साथ भी 1,00000 से ज्यादा वानर सेना थी।

शरभ-

गवय-

गज-

गन्धमादन-

गवाक्ष-

जम्भ-

ज्योतिर्मुख-

क्रथन-

महोदर-

मयंद-

प्रजंघ-

प्रमथी-

पृथु-

रम्भ-

ऋषभ-

सानुप्रस्थ-

सभादन-

सुन्द-

वालीमुख-

वेगदर्श-

वेमदर्शी-