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मैंगोलीचलानेकाआदेशनहींदूँगा , सरकार जानी है तो जाए।

ऐ शब्द है माननीय कल्याण सिंह जी के । आज अत्यंत ही दुखद समाचार मिला कि कल्याण सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं ।

कल्याण सिंह जी के साहसिक प्रयास को भुलाया नही जा सकता…

भारत के इतिहास में 2 नवंबर 1990 का दिन एक काले अध्याय के समान है। यही वो खून से रंगी तारीख है जिस दिन अयोध्या में कारसेवकों पर पुलिस ने मुलायम सिंह यादव के आदेश पर गोलियां बरसाईं थी।

एक कारसेवक पुलिस द्वारा फेंके गए आंसू गैस के गोले को उठा कर दोबारा उन्ही (पुलिस) पर ही फेंक रहा था। आंसू गैस के प्रभाव से बचने के लिए उस शख्स ने अपनी आंखों के आस-पास चूना लगा रखा था, हालांकि थोड़ी देर बाद ही वह व्यक्ति पुलिस की गोली का शिकार हो कर सड़क पर गिर जाता है। जिसके बाद सड़क पर वह अपने खून से ‘सीताराम’ लिख देता है।

इस भयावह गोलीकांड में 40 कारसेवकों की मौत हो गई थी, हालांकि सरकारी आदेश का पालन करने वाले सुरक्षाकर्मियों की आंखों से कारसेवकों पर गोली चलाते वक्त आंसू बह रहे थे, 2 नवंबर के गोलीकांड से पहले 30 अक्टूबर को भी कारसेवकों पर गोलियां चलाई गई थीं, जिसमें 11 कारसेवक मारे गए थे। इसके बाद मुल्ला मुलायम सरकार गिर जाती हैं।

फिर नब्बे के दशक में कल्याण सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने…भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर को लेकर पूरे भारत में रथ यात्राएं निकाली थी। उत्तर प्रदेश की जनता ने पूर्ण बहुमत के साथ कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश की सत्ता दी…यानी खुल के कहा की जाओ मंदिर बनाओ…?

कल्याण सिंह बहुत भावुक नेता थे , सरकार बनने के बाद तुरंत विश्व हिन्दू परिषद को बाबरी ढ़ांचे से सटी जमीन कार सेवा के लिए दे दी…संघ के हज़ारों कार सेवक साधु संत दिन रात उस जमीन को समतल बनाने में लगे रहते…

सुप्रीम कोर्ट ये सब देख के बहुत परेशान हो रहा था । सर्वोच्च न्यायालय ने कल्याण सिंह से स्पष्ट शब्दों में पूछा कि आपको पक्का यकीन हैं ना,ये हाफ पैंट वाले सिर्फ यहाँ की जमीन समतल करने आये हैं..? मतलब की कोई गडबड नहीं होनी चाहिए.।..आपके लोगों ने अगर बाबरी मस्जिद को हाथ लगाया तो अच्छा नहीं होगा.।..यही लोग दो साल पहले मस्जिद के गुम्बद पर चढ़ गए थे फावड़ा ले के…अबकी बार अगर फिर ऐसा हुवा तो…?

कल्याण सिंह ने मिलाॅड को समझाया कि हुजुर अब कुछ नहीं होगा…आप भरोसा रखिये…! लेकिन मिलाॅड नहीं माने… बोले, हमें तुम संघियों पर भरोसा नहीं, इसलिए लिख कर दो कि कुछ नहीं करोगे…?

कल्याण सिंह ने मिलाॅड को बाकायदा लिख के एक हलफनामा दिया कि हम लोग सब कुछ करेंगे लेकिन मस्जिद को हाथ नहीं लगायेंगे.!

तो साहब अयोध्या में कार सेवा के लिए दिन रखा गया। छह दिसंबर 1992 ,केंद्र की कांग्रेसी सरकार से कहा कि साहब केवल दो लाख लोग आयेंगे कार सेवा के लिए, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने पांच लाख लोगों को कारसेवा के लिए बुला लिया प्रशाशन को ख़ास हिदायत थी की भीड़ कितनी भी उग्र हो कोई गोली लाठी नहीं चलाएगा…?

पांच लाख लोग एक जगह जुट गए जय श्री राम और मंदिर वही बनायेगे के नारे लगने लगे। लोगों को जोश आ गया और लोग गुम्बद पर चढ़ गए…पांच घंटे में उस चार सौ साल पुराने ढ़ांचे का अता पता नहीं था ।

एक-एक ईंट कार सेवकों ने उखाड़ दी…बस फिर क्या था,…केंद्र सरकार के गृह मंत्री का फोन कल्याण सिंह के CM ऑफिस में आया…गृह मंत्री ने कल्याण सिंह से पूछा ये सब कैसे हुआ…?

कल्याण सिंह ने कहा कि जो होना था वो हो गया,…अब क्या कर सकते हैं…? एक गुम्बद और बचा है कारसेवक उसी को तोड़ रहे हैं, लेकिन आप जान लीजिये कि मै गोली नहीं चलाऊंगा।

उधर सुप्रीम कोर्ट के मिलाॅड कल्याण सिंह से बहुते नाराज हो गए थे…! छह दिसंबर की शाम कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया और उधर काँग्रेस ने भाजपा की चार राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया, कल्याण सिंह को जेल हो गयी…!

उत्तर प्रदेश में दुबारा चुनाव हुए, बीजेपी को यही लगा कि हिंदुओं के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी देने के बाद उत्तर प्रदेश की जनता उन्हें फिर से चुनेगी, लेकिन हुआ उलटा, बीजेपी उत्तर प्रदेश चुनाव हार गयी और एक बार फिर मुल्ला मुलायम की सरकार बन गई।

कल्याण सिंह जैसे बड़े और साहसिक फैसले लेने वाले नेता का कैरियर बाबरी मस्जिद विध्वंस ने खत्म कर दिया 400 साल से खड़े किसी विवादित ढांचे को पांच लाख की भीड़ से गिरवाने के लिए 56 इंच का सीना चाहिए होता है, जो वाकई में कल्याण सिंह के पास था।

कल्याण सिंह जी को भावभीनी श्रद्धांजलि 💐🙏🙏

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श्री संकट मोचन मंदिर वाराणसी ।

यही वह जंगल का स्थान था जहा गोस्वामी तुलसीदास जी को श्री हनुमान जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुए ।आज भी जंगल को बाउन्ड्री मे वैसे ही सुरक्षित रखा गया है । यह प्रतिमा पूज्य गोस्वामी जी महाराज के हाथो गढ़ी गई ।यहा दर्शन करने की महिमा है कि मनुष्य के सभी संकट दूर हो जाते है ।

देश के ऐतिहासिक मंदिरों में शामिल काशी के संकट मोचन मंदिर का इतिहास करीब 400 साल पुराना है। इसी मंदिर में हनुमान ने राम भक्त गोस्वामी तुलसीदास को दर्शन दिए थे, जिसके बाद बजरंगबली मिट्टी का स्वरूप धारण कर यहीं स्थापित हो गए। बताया जाता है कि संवत 1631 और 1680 के बीच इस मंदिर को बनवाया गया। इसकी स्थापना तुलसीदास ने कराई थी। मान्यता है कि जब वे काशी में रह कर रामचरितमानस लिख रहे थे, तब उनके प्रेरणा स्त्रोत संकट मोचन हनुमान थे। कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों के सभी कष्‍ट हनुमान के दर्शन मात्र से ही दूर हो जाते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसीदास स्नान-दान के बाद गंगा के उस पार जाते थे। वहां एक सूखा बबूल का पेड़ था। ऐसे में वे जब भी उस जगह जाते, एक लोटा पानी डाल देते थे। धीरे-धीरे वह पेड़ हरा होने लगा। एक दिन पानी डालते समय तुलसीदास को पेड़ पर भूत मिला। उसने कहा- ‘क्या आप राम से मिलना चाहते हैं? मैं आपको उनसे मिला सकता हूं।’ इस पर उन्होंने हैरानी से पूछा- ‘तुम मुझे राम से कैसे मिला सकते हो?’ उस भूत ने बताया कि इसके लिए आपको हनुमान से मिलना पड़ेगा। काशी के कर्णघंटा में राम का मंदिर है। वहां सबसे आखिरी में एक कुष्ठ रोगी बैठा होगा, वो हनुमान हैं। यह सुनकर तुलसीदास तुरंत उस मंदिर में गए।

बजरंगबली ने तुलसीदास को दिए थे दर्शन…

बताया जाता है कि जैसे ही तुलसीदास उस कुष्ठ रोगी से मिलने के लिए उसके पास गए, वो वहां से चला गया। तुलसीदास भी उनके पीछे-पीछे चलते रहे। आज जिस क्षेत्र को अस्सी कहा जाता है, उसे पहले आनद कानन वन कहते थे। यहां पहुंचने पर उन्होंने सोचा कि अब तो जंगल आ गया है, पता नहीं यह व्यक्ति कहां तक जाएगा। ऐसे में उन्होंने उसके पैर पकड़ लिए और कहा कि आप ही हनुमान हैं, कृप्या मुझे दर्शन दीजिए। इसके बाद बजरंग बली ने उन्हें दर्शन दिया और उनके आग्रह करने पर मिट्टी का रूप धारण कर यहीं स्थापित हो गए, जो आज संकट मोचन मंदिर के नाम से जाना जाता है।

नाराज होकर लिख डाला हनुमान बाहुक…

तुलसीदास के बारे में कहा जाता है कि वे हनुमान के अभिन्न भक्त थे। एक बार तुलसीदास के बांह में पीड़ा होने लगी, तो वे उनसे शिकायत करने लगे। उन्होंने कहा कि ‘आप सभी के संकट दूर करते हैं, मेरा कष्ट दूर नहीं करेंगे।’ इसके बाद नाराज होकर उन्होंने हनुमान बाहुक लिख डाली। बताया जाता है कि यह ग्रंथ लिखने के बाद ही उनकी पीड़ा खुद ही समाप्त हो गई।

।।जय श्री संकट मोचन हनुमान जी महाराज।।

।। जय सिया राम ।।

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अहिरावण कथा ! 🔔

🐒🐒 पंचमुखी क्यों हुए हनुमानजी ? 🐒🐒

लंका में महा बलशाली मेघनाद के साथ बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया. रावण जो अब तक मद में चूर था राम सेना, खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर थोड़ा तनाव में आया.

रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई. रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के मित्र रहे हैं.

लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी. रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं.

रावण ने उन्हें बुला भेजा और कहा कि वह अपने छल बल, कौशल से श्री राम व लक्ष्मण का सफाया कर दे. यह बात दूतों के जरिए विभीषण को पता लग गयी. युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए.

विभीषण को लगा कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसका जिम्मा परम वीर हनुमान जी को राम-लक्ष्मण को सौंप कर दिया जाए. साथ ही वे अपने भी निगरानी में लगे थे.

राम-लक्ष्मण की कुटिया लंका में सुवेल पर्वत पर बनी थी. हनुमान जी ने भगवान श्री राम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया. कोई जादू टोना तंत्र-मंत्र का असर या मायावी राक्षस इसके भीतर नहीं घुस सकता था.

अहिरावण और महिरावण श्री राम और लक्ष्मण को मारने उनकी कुटिया तक पहुंचे, पर इस सुरक्षा घेरे के आगे उनकी एक न चली, असफल रहे. ऐसे में उन्होंने एक चाल चली. महिरावण विभीषण का रूप धर के कुटिया में घुस गया.

राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे. दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की ओर लेकर चल दिए.

विभीषण लगातार सतर्क थे. उन्हें कुछ देर में ही पता चल गया कि कोई अनहोनी घट चुकी है. विभीषण को महिरावण पर शक था, उन्हें राम-लक्ष्मण की जान की चिंता सताने लगी.

विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि वे उसका पीछा करें. लंका में अपने रूप में घूमना राम भक्त हनुमान के लिए ठीक न था, सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये.

निकुंभला नगरी में पक्षी रूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना. कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है. अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे. बस सारा युद्ध समाप्त.

कबूतर की बातों से ही बजरंग बली को पता चला कि दोनों राक्षस राम लक्ष्मण को सोते में ही उठाकर कामाक्षी देवी को बलि चढाने पाताल लोक ले गये हैं. हनुमान जी वायु वेग से रसातल की और बढे और तुरंत वहां पहुंचे.

हनुमान जी को रसातल के प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार मिला. इसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था. उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश से रोक दिया.

द्वारपाल हनुमान जी से बोला कि मुझ को परास्त किए बिना तुम्हारा भीतर जाना असंभव है. दोनों में लड़ाई ठन गयी. हनुमान जी की आशा के विपरीत यह बड़ा ही बलशाली और कुशल योद्धा निकला.

दोनों ही बड़े बलशाली थे. दोनों में बहुत भयंकर युद्ध हुआ, परंतु वह बजरंग बली के आगे न टिक सका. आखिर कार हनुमान जी ने उसे हरा तो दिया पर उस द्वारपाल की प्रशंसा करने से नहीं रह सके.

हनुमान जी ने उस वीर से पूछा कि हे वीर तुम अपना परिचय दो. तुम्हारा स्वरूप भी कुछ ऐसा है कि उससे कौतुहल हो रहा है. उस वीर ने उत्तर दिया- मैं हनुमान का पुत्र हूं और एक मछली से पैदा हुआ हूं. मेरा नाम है मकरध्वज.

हनुमान जी ने यह सुना तो आश्चर्य में पड़ गए. वह वीर की बात सुनने लगे. मकरध्वज ने कहा- लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में अपनी अग्नि शांत करने पहुंचे. उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा.

उस समय मेरी मां ने आहार के लिए मुख खोला था. वह तेज मेरी माता ने अपने मुख में ले लिया और गर्भवती हो गई. उसी से मेरा जन्म हुआ है. हनुमान जी ने जब यह सुना तो मकरध्वज को बताया कि वह ही हनुमान हैं.

मकरध्वज ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किए और हनुमान जी ने भी अपने बेटे को गले लगा लिया और वहां आने का पूरा कारण बताया. उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अपने पिता के स्वामी की रक्षा में सहायता करो.

मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में राक्षस बलि के लिए आने वाले हैं. बेहतर होगा कि आप रूप बदल कर कामाक्षी के मंदिर में जा कर बैठ जाएं. उनको सारी पूजा झरोखे से करने को कहें.

हनुमान जी ने पहले तो मधु मक्खी का वेश धरा और मां कामाक्षी के मंदिर में घुस गये. हनुमान जी ने मां कामाक्षी को नमस्कार कर सफलता की कामनाकी और फिर पूछा- हे मां क्या आप वास्तव में श्री राम जी और लक्ष्मण जी की बलि चाहती हैं ?

हनुमान जी के इस प्रश्न पर मां कामाक्षी ने उत्तर दिया कि नहीं. मैं तो दुष्ट अहिरावण व महिरावण की बलि चाहती हूं. यह दोनों मेरे भक्त तो हैं पर अधर्मी और अत्याचारी भी हैं. आप अपने प्रयत्न करो. सफल रहोगे.

मंदिर में पांच दीप जल रहे थे. अलग-अलग दिशाओं और स्थान पर मां ने कहा यह दीप अहिरावण ने मेरी प्रसन्नता के लिए जलाये हैं जिस दिन ये एक साथ बुझा दिए जा सकेंगे, उसका अंत सुनिश्चित हो सकेगा.

इस बीच गाजे-बाजे का शोर सुनाई पड़ने लगा. अहिरावण, महिरावण बलि चढाने के लिए आ रहे थे. हनुमान जी ने अब मां कामाक्षी का रूप धरा. जब अहिरावण और महिरावण मंदिर में प्रवेश करने ही वाले थे कि हनुमान जी का महिला स्वर गूंजा.

हनुमान जी बोले- मैं कामाक्षी देवी हूं और आज मेरी पूजा झरोखे से करो. झरोखे से पूजा आरंभ हुई ढेर सारा चढावा मां कामाक्षी को झरोखे से चढाया जाने लगा. अंत में बंधक बलि के रूप में राम लक्ष्मण को भी उसी से डाला गया. दोनों बंधन में बेहोश थे.

हनुमान जी ने तुरंत उन्हें बंधन मुक्त किया. अब पाताल लोक से निकलने की बारी थी, पर उससे पहले मां कामाक्षी के सामने अहिरावण महिरावण की बलि देकर उनकी इच्छा पूरी करना और दोनों राक्षसों को उनके किए की सज़ा देना शेष था.

अब हनुमान जी ने मकरध्वज को कहा कि वह अचेत अवस्था में लेटे हुए भगवान राम और लक्ष्मण का खास ख्याल रखे और उसके साथ मिलकर दोनों राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.

पर यह युद्ध आसान न था. अहिरावण और महिरावण बडी मुश्किल से मरते तो फिर पाँच पाँच के रूप में जिदां हो जाते. इस विकट स्थिति में मकरध्वज ने बताया कि अहिरावण की एक पत्नी नागकन्या है.

अहिरावण उसे बलात् हर लाया है. वह उसे पसंद नहीं करती, पर मन मार के उसके साथ है, वह अहिरावण के राज जानती होगी. उससे उसकी मौत का उपाय पूछा जाये. आप उसके पास जाएं और सहायता मांगे.

मकरध्वज ने राक्षसों को युद्ध में उलझाये रखा और उधर हनुमान अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे. नागकन्या से उन्होंने कहा कि यदि तुम अहिरावण के मृत्यु का भेद बता दो तो हम उसे मारकर तुम्हें उसके चंगुल से मुक्ति दिला देंगे.

अहिरावण की पत्नी ने कहा- मेरा नाम चित्रसेना है. मैं भगवान विष्णु की भक्त हूं. मेरे रूप पर अहिरावण मर मिटा और मेरा अपहरण कर यहां कैद किये हुए है, पर मैं उसे नहीं चाहती. लेकिन मैं अहिरावण का भेद तभी बताउंगी, जब मेरी इच्छा पूरी की जायेगी.

हनुमान जी ने अहिरावण की पत्नी नागकन्या चित्रसेना से पूछा कि आप अहिरावण की मृत्यु का रहस्य बताने के बदले में क्या चाहती हैं ? आप मुझसे अपनी शर्त बताएं, मैं उसे जरूर मानूंगा.

चित्रसेना ने कहा- दुर्भाग्य से अहिरावण जैसा असुर मुझे हर लाया. इससे मेरा जीवन खराब हो गया. मैं अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहती हूं. आप अगर मेरा विवाह श्री राम से कराने का वचन दें तो मैं अहिरावण के वध का रहस्य बताऊंगी.

हनुमान जी सोच में पड़ गए. भगवान श्री राम तो एक पत्नी निष्ठ हैं. अपनी धर्म पत्नी देवी सीता को मुक्त कराने के लिए असुरों से युद्ध कर रहे हैं. वह किसी और से विवाह की बात तो कभी न स्वीकारेंगे. मैं कैसे वचन दे सकता हूं ?

फिर सोचने लगे कि यदि समय पर उचित निर्णय न लिया तो स्वामी के प्राण ही संकट में हैं. असमंजस की स्थिति में बेचैन हनुमानजी ने ऐसी राह निकाली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

हनुमान जी बोले- तुम्हारी शर्त स्वीकार है, पर हमारी भी एक शर्त है. यह विवाह तभी होगा, जब तुम्हारे साथ भगवान राम जिस पलंग पर आसीन होंगे, वह सही सलामत रहना चाहिए. यदि वह टूटा तो इसे अपशकुन मांगकर वचन से पीछे हट जाऊंगा.

जब महाकाय अहिरावण के बैठने से पलंग नहीं टूटता तो भला श्रीराम के बैठने से कैसे टूटेगा !

यह सोच कर चित्रसेना तैयार हो गयी. उसने अहिरावण समेत सभी राक्षसों के अंत का सारा भेद बता दिया.

चित्रसेना ने कहा- दोनों राक्षसों के बचपन की बात है. इन दोनों के कुछ शरारती राक्षस मित्रों ने कहीं से एक भ्रामरी को पकड़ लिया. मनोरंजन के लिए वे उसे भ्रामरी को बार-बार काटों से छेड रहे थे.

भ्रामरी साधारण भ्रामरी न थी. वह भी बहुत मायावी थी, किंतु किसी कारण वश वह पकड़ में आ गई थी. भ्रामरी की पीड़ा सुनकर अहिरावण और महिरावण को दया आ गई और अपने मित्रों से लड़ कर उसे छुड़ा दिया.

मायावी भ्रामरी का पति भी अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर आया था. अपनी पत्नी की मुक्ति से प्रसन्न होकर उस भौंरे ने वचन दिया थ कि तुम्हारे उपकार का बदला हम सभी भ्रमर जाति मिलकर चुकाएंगे.

ये भौंरें अधिकतर उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं. ये सब बड़ी भारी संख्या में हैं. दोनों राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ है और ये मरने को हो हो जाते हैं तब भ्रमर उनके मुख में एक बूंद अमृत का डाल देते हैं.

उस अमृत के कारण ये दोनों राक्षस मरकर भी जिंदा हो जाते हैं. इनके कई-कई रूप उसी अमृत के कारण हैं. इन्हें जितनी बार फिर से जीवन दिया गया उनके उतने नए रूप बन गए हैं. इस लिए आपको पहले इन भंवरों को मारना होगा.

हनुमान जी रहस्य जानकर लौटे. मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था. तो हनुमान जी ने भंवरों का खात्मा शुरू किया. वे आखिर हनुमान जी के सामने कहां तक टिकते.

जब सारे भ्रमर खत्म हो गए और केवल एक बचा तो वह हनुमान जी के चरणों में लोट गया. उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की याचना की. हनुमान जी पसीज गए. उन्होंने उसे क्षमा करते हुए एक काम सौंपा.

हनुमान जी बोले- मैं तुम्हें प्राण दान देता हूं पर इस शर्त पर कि तुम यहां से तुरंत चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी के पलंग की पाटी में घुसकर जल्दी से जल्दी उसे पूरी तरह खोखला बना दोगे.

भंवरा तत्काल चित्रसेना के पलंग की पाटी में घुसने के लिए प्रस्थान कर गया. इधर अहिरावण और महिरावण को अपने चमत्कार के लुप्त होने से बहुत अचरज हुआ पर उन्होंने मायावी युद्ध जारी रखा.

भ्रमरों को हनुमान जी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था. यह देखकर हनुमान जी कुछ चिंतित हुए.

फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया. देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा.

हनुमान जी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया. उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख.

उसके बाद हनुमान जी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए. अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी. हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये.

इसके बाद उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए. दोनो भाई होश में आ गए. चित्रसेना भी वहां आ गई थी. हनुमान जी ने कहा- प्रभो ! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए.

पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी. अहिरावण इसे बल पूर्वक उठा लाया था. वह आपसे विवाह करना चाहती है. कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें. इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी.

श्री राम हनुमान जी की बात सुनकर चकराए. इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमान जी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं. अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है. इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते.

कृपा निधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए. परंतु आप चिंता न करें. हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए, बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं.

हनुमान जी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्री राम जी और लक्ष्मण जी दोनों चिंता में पड़ गये. वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमान जी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली.

हनुमान जी ने भावावेश में प्रभु श्री राम की बांह पकड़ कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया. श्री राम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमरा कर टूट गयी.

पलंग धराशायी हो गया. चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी. हनुमान जी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता. तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं.

चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है. उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है. मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें, यह तो बहुत अनुचित है. मैं हनुमान को श्राप दूंगी.

चित्रसेना हनुमान जी को श्राप देने ही जा ही रही थी कि श्री राम का सम्मोहन भंग हुआ. वह इस पूरे नाटक को समझ गये. उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है. इस लिए हनुमान जी को यह करना पड़ा. उन्हें क्षमा कर दो.

क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी. श्री राम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लूंगा, तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा. इससे वह मान गयी.

हनुमान जी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था. भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया.

श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमान जी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये.

!! जय श्री राम !!
निकला मित्र सवेरा घंटिया धन-धन बाजी
सुना राम के गीत रामधन मन में साजी
!! जय श्री राम !!

(यह प्रसंग स्कंद पुराण और आनंद रामायण के सारकांण्ड की कथा से लिया गया है ।

शिव कुमार भारद्वाज

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जानकी माता ने कहा कि हनुमान एक बात बताओ बेटा तुम्हारी पूंछ नहीं जली आग में और पूरी लंका जल गई?

श्री हनुमान जी ने कहा कि माता! लंका तो सोने की है और सोना कहीं आग में जलता है क्या?

फिर कैसे जल गया? मां ने पुनः पूछा… ?

हनुमान जी बोले– माता! लंका में साधारण आग नहीं लगी थी .. पावक थी •••• !(पावक जरत देखी हनुमंता ..)

पावक ••••• ?

हाँ मां ••••• !

ये पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो, पावक माने तो आग ही है।

हनुमान जी बोले– न माता! यह पावक साधारण नहीं थी।

फिर ..

जोअपराधभगतकरकरई।

रामरोषपावकसोजरई।।

यह राम जी के रोष रूपी पावक थी जिसमे सोने की लंका जली।

तब जानकी माता बोलीं– बेटा ! आग तो अपना पराया नहीं देखती, फिर यह तो बताओ•••यह तुम्हारी पूंछ कैसे बच गई? लंका जली थी तो पूंछ भी जल जानी चाहिए थी ।

हनुमान जी ने कहा कि माता! उस आग में जलाने की शक्ति ही नहीं, बचाने की शक्ति भी बैठी थी।

मां बोली — बचाने की शक्ति कौन है?

हनुमान जी ने तो जानकी माता के चरणों में सिर रख दिया ओर कह कि माँ ! हमें पता है, प्रभु ने आपसे कह दिया था। तुम पावक महुं करहु निवासा- – उस पावक में तो आप बैठी थीं। तो जिस पावक में आप विराजमान हों, उस पावक से मेरी पूंछ कैसे जलेगी? माता की कृपा शक्ति ने मुझे बचाया, माँ! आप बचाने वाली हो, आप ही भगवान की कृपा हो ..

तब माँ के मुह से निकल पड़ा ..

अजरअमरगुणनिधिसुतहोहू_।

करहुबहुतरघुनायकछोहू।।

भझो राम राम राम जपो राम राम राम

!! जय श्री राम !!

वंदन हनुमत का करें, बाँधे वंदनवार।
राम राम हनुमान संग, बोलें बारंबार।।

!! सियावर रामचंद्र जी की जय !!

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🌹श्री राम नाम की महिमा🌹

🙏🌹Om Shanti🌹🙏

लंकापति रावण के वध के बाद जब अयोध्यापति प्रभु श्री राम की कीर्ति दूर-दूर तक फैल रही थी और वह मर्यादा पुरूषोतम कहलाने लगे थे।

तब एक दिन महादेव शिव की इच्छा भी मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम से मिलने की हुई। पार्वती जी को संग लेकर महादेव कैलाश पर्वत से उतर कर अयोध्या नगरी के रास्ते पर चल पड़े।

भगवान शिव और मां पार्वती को अयोध्या आया देखकर श्री सीताराम जी बहुत खुश हुए। माता जानकी ने उनका उचित आदर सत्कार किया और स्वयं भोजन बनाने के लिए रसोई में चली गई। इस बीच भगवान शिव ने श्री राम जी से पूछाः-“आपके सेवक हनुमानजी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं।” श्री राम बोलेः- “वे बगीचे में हैं।”

शिवजी ने श्रीराम जी से बगीचे में जाने की अनुमति मांगी और पार्वती जी का हाथ थाम कर बगीचे में आ गए। बगीचे की खूबसूरती देख कर उनका मन मोहित हो गया। आम के एक घने वृक्ष के नीचे हनुमान जी दीन-दुनियां से बेखबर गहरी नींद में सोए थे और एक लय में खर्राटों से राम नाम की ध्वनि उठ रही थी।

चकित होकर शिव जी और माता पार्वती एक दूसरे की ओर देखने लगे। माता पार्वती मुस्करा उठी और वृक्ष की डालियों की ओर इशारा किया। राम नाम सुनकर पेड़ की डालियां भी झूमने लगी थी और इनके बीच से भी राम नाम उच्चारित हो रहा था।

शिव जी इस राम नाम की धुन में मस्त मगन होकर खुद भी राम राम कहकर नाचने लगे। माता पार्वती जी ने भी अपने पति का अनुसरण किया और अपने कोमल पांव थिरकाने लगी। शिव जी और पार्वती जी के नृत्य से ऐसी झनकार उठी कि स्वर्गलोक के देवतागण भी आकर्षित होकर बगीचे में आ गए और राम नाम की धुन में सभी मस्त हो गए।

माता जानकी भोजन तैयार करके प्रतिक्षारत थीं परंतु संध्या घिरने तक भी अतिथि नहीं पधारे तब अपने देवर लक्ष्मण जी को बगीचे में भेजा। लक्ष्मण जी तो स्वयं को श्री राम का सेवक ही मानते थे, अत बगीचे में आकर जब उन्होंने धरती पर स्वर्ग का नजारा देखा तो खुद भी राम नाम की धुन में झुम उठे।

महल में माता जानकी परेशान हो रही थी की अभी तक भोजन ग्रहण करने कोई भी क्यों नहीं आया। उन्होंने श्री राम जी से कहा भोजन ठंडा हो रहा है चलिये हम ही जाकर बगीचे में से सभी को ले लाएं।

जब सीताराम जी बगीचे में गए तो वहां राम नाम की धूम मची हुई थी। हुनमान जी गहरी नींद में सोए हुए थे और उनके खर्राटों से अभी तक राम नाम निकल रहा था।

श्रीसियाराम भाव विहल हो उठे, राम जी ने हनुमान जी को नींद से जगाया और प्रेम से उनकी तरफ निहारने लगे।
हनुमान जी प्रभु को आया देख शीघ्रता से उठ खड़े हुए, नृत्य का समा भंग हो गया।

शिव जी खुले कंठ से हनुमान जी की राम भक्ति की सराहना करने लगे। हनुमान जी संकुचाए लेकिन मन ही मन खुश हो रहे थे।श्री सियाराम ने भोजन करने का आग्रह भगवान शिव जी से किया।सभी लोग महल में भोजन करने के लिए चल पड़े। माता जानकी भोजन परोसने लगी। हनुमान जी को भी श्री राम जी ने पंक्ति में बैठने का आदेश दिया। हनुमान जी बैठ तो गए पंरतु आदत ऐसी थी की राम जी के भोजन करने के उपरांत ही सभी लोग भोजन करते थे।

आज श्री राम के आदेश से पहले भोजन करना पड़ रहा था। माता जानकी हनुमान जी को भोजन परोसती जा रही थी पर हनुमान का पेट ही नहीं भर रहा था। सीता जी कुछ समय तक तो उन्हें भोजन परोसती रही फिर समझ गई इस तरह से तो हनुमान जी का पेट नहीं भरेगा।

उन्होंने तुलसी के एक पत्ते पर राम नाम लिखा और भोजन के साथ हनुमान जी को परोस दिया। तुलसी पत्र खाते ही हनुमान जी को संतुष्टी मिली और वह भोजन खा कर उठ खड़े हुए।

भगवान शिव शंकर ने प्रसन्न होकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया कि आप की राम भक्ति युगों-युगों तक याद की जाएगी और आप संकट मोचन कहलाएंगे।

संकट हरै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।

🌹श्री राम जय राम जय जय राम🌹

शिव कुमार भारद्वाज

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हनुमान जी से धोखा!

करीब 95 साल पहले की बात है। राजस्थान के अलवर इलाके में एक गडरिया भेड़ चराते हुए जंगल में चला गया। अचानक किसी ने उसे कहा कि यहाँ बकरियां चराना मना है। बातों बातों में पता चला कि वो इलाके का तहसीलदार था। दोनों में बात होने लगी। पता चला कि बहुत कोशिश के बाद भी तहसीलदार को बच्चे नहीं होते। गड़रिये ने उनसे कहा कि आप दौसा के बालाजी हनुमानजी के मंदिर जाकर बेटा मांग लो, मिल जायेगा।

न जाने क्यों तहसीलदार ने उस गड़रिए की बात मान ली। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि अगर मेरा बेटा हो जायेगा तो मैं उसे यहीं इसी मंदिर में सेवा के लिए छोड़ जाऊंगा। इस बात का ज़िक्र उन्होंने अपनी पत्नी से भी नहीं किया । मन्नत मांगने के एक साल के अंदर उन्हें बेटा नसीब हो गया लेकिन बाप का प्यार अब आड़े आ गया। उन्होंने हनुमानजी से कहा कि मैं अपना वचन पूरा नहीं कर सकता। आपका ये ऋण मुझ पर रहेगा।

वो बेटा बड़ा होने लगा। शिक्षा की उम्र तक आया तो पिताजी ने उसे हरिद्वार के एक बड़े विद्वान प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी के यहाँ पढ़ने भेज दिया। लड़के में अद्धभुत क्षमता थी उसे रामायण कंठस्थ थी। बिना पढ़े वो रामायण का पाठ करने लगा। उसकी ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गयी और वो साधु सन्यासियों और बड़े बड़े उद्योगपतियों के घर रामायण पाठ करने लगा। जवान होने पर उसकी शादी भी हो गयी। एक दिन देश के बड़े उद्योगपति जुगल किशोर बिरला ने अखबार में विज्ञापन दिया कि दिल्ली के लक्ष्मी नारायण मंदिर यानी बिरला मंदिर में हनुमान जी को रामायण पढ़कर सुनानी है। उसके लिए उस व्यक्ति का टेस्ट खुद बिरला जी लेंगे। तय तारीख पर नारायण स्वामी अपनी पत्नी के साथ बिरला निवास पहुंच गए! बहुत से और लोग भी बिरला जी को रामायण पढ़कर सुना रहे थे। जब नारायण बाबा का नंबर आया तो उन्होंने बिना रामायण हाथ में लिए पाठ शुरू दिया। बिरला जी के अनुग्रह पर नारायण ने हारमोनियम पर गाकर भी रामायण सुना दी।

बिरला जी भाव विभोर हो गए। नौकरी पक्की हो गयी। सस्ते ज़माने में 350 रुपए की पगार, रहने के लिए बिरला मंदिर में एक कमरा और इस्तेमाल के लिए एक कार भी नारायण बाबा को दे दी गयी। जीवन बेहद सुकून और आराम का हो गया। रूपया पैसा, शौहरत और देश के सबसे बड़े उद्योगपति से नज़दीकियां।

बिरला जी के गुरु चमत्कारी संत नीम करोली बाबा जैसे ही वृन्दावन से दिल्ली आये तो बिरला जी ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए नारायण बाबा का एक रामायण पाठ रख दिया। बिरला जी ने नीम करोली बाबा से कहा कि एक लड़का है जो रामायण गाकर सुनाता है। नीम करोली बाबा ने कहा कि मुझे भी उस लड़के से मिलना है! जैसे ही नारायण बाबा कमरे में गये तो नीम करोली बाबा ने कहा “तेरे बाप ने हनुमान जी से धोखा किया है।” नारायण बाबा अपने पिता की खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे लेकिन तय हुआ कि अगर नीम करोली बाबा की बात सच्ची है तो वो उन्हें गुरु रूप में स्वीकार कर लेंगे। तभी के तभी नारायण बाबा अलवर रवाना हो गए और अपने पिता से कहा कि एक संत आपको हनुमान जी का ऋणी बता रहा है और आपको धोखेबाज भी। नारायण बाबा के पिता ने कहा की वो संत हनुमान जी ही हो सकते हैं क्योंकि ये बात सिर्फ उन्हें ही पता है ।पिता की बात सुनकर नारायण बाबा वापस चले आये और नीम करोली बाबा को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।

नीम करोली बाबा ने आदेश दिया कि नारायण तेरा जनम हनुमान जी की सेवा के लिए हुआ है इसीलिए छोड़ लाला की नौकरी। गुरु आदेश मिलते ही नारायण बाबा ने नौकरी छोड़ दी और दिल्ली के मेहरौली इलाके में एक जंगल में एक गुप्त मंदिर में आश्रय लिया। बिरला मंदिर से निकल कर सांप, भूतों और एक अनजाने जंगल में हनुमान जी की सेवा शुरू कर दी। नीम करोली बाबा ने आदेश दिया कि किसी से एक रूपया भी नहीं लेना है और हर साल नवरात्रे में लोगों का भंडारा करना है।

बड़ी अजीबोगरीब बात है कि एक पैसा भी किसी से नहीं लेना और हर साल हज़ारों लोगों को खाना भी खिलाना है लेकिन गुरु ने जो कह दिया वो पत्थर पर लकीर है। बिना सोच के उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया! नीम करोली बाबा ने बिरला से कहकर नारायण बाबा की पत्नी को घर चलाने के पैसे हर महीने दिलवा दिए लेकिन नारायण बाबा को पैसे से दूर रखा।

1969 से आज तक इस मंदिर से हर साल दो बार नवरात्रे में हज़ारों लोग भंडारा खाकर जाते हैं। किसी को आज तक इस मंदिर में पैसे चढ़ाते नहीं देखा गया लेकिन हाँ प्रसाद पाते सबको देखा है। नारायण बाबा आज 94 साल के हो गए हैं लेकिन गुरु सेवा में आज भी लगे हैं और चाहते हैं कि कम ही लोग उनसे मिलने आये।

मधुस्मिता रावत

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रामायण कथा का एक अंश, जिससे हमे सीख मिलती है “एहसास” की…
…….
श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता’ मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत पथरीली और कंटीली थी !
की यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया !

श्रीराम रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे !
बोले- “माँ, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी ?”
धरती बोली- “प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !”
प्रभु बोले, “माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना !
कूछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छूपा लेना !
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे अघात मत करना”

श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !
पूछा- “भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकूमार है ?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कूमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी व्याकूलता क्यों ?”
श्री राम बोले- “नही…नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा !”
“हृदय विदीर्ण !! ऐसा क्यों प्रभु ?”,
धरती माँ जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !

“अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि…इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे !
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना..!!”

अर्थात-
रिश्ते अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।
जहाँ गहरी आत्मीयता नही, वो रिश्ता शायद नही परंतू दिखावा हो सकता है ।

इसीलिए कहा गया है कि…
रिश्ते खून से नहीं, परिवार से नही ,
मित्रता से नही, व्यवहार से नही,

बल्कि…
सिर्फ और सिर्फ आत्मीय “एहसास” से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं ।

और,जहाँ एहसास ही नहीं, आत्मीयता ही नहीं ..

वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा ?* *जय सिया राम*

🙏🏻 जय श्री रामभक्त हनुमान🙏🏻 🙏🏻 जय श्री राम

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🕉️ … हनुमान जी का कर्ज़ा … 🕉️

राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया।

तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे, लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया।

अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये।

अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें।

माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था।

वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि…!

कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥

मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।

अब बारी आई लखन जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था। पूरा राम दल विलाप कर रहा था।

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है। मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं।

अब बारी आयी भरत जी की। अरे! भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पे। हनुमान जी का, सब मिलके और लगवा दो।

और दूसरी बात ये कि…!

बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।
अधम कवन जग मोहि समाना॥

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि…!

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।
सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।

अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े..

मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए।

जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।

अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार…

माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं। और आप खुद भी कहते हो कि…!

प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु !

राघव जी ने कहा, देवी क़र्ज़दार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो..

सनमुख होइ न सकत मन मोरा

देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ राम में नहीं है, जो “राम नाम” में है।

क्योंकि कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न…! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो – हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है।

पहले हनुमान विवाह करें,
लंकेश हरें इनकी जब नारी।

मुंदरी लै रघुनाथ चले,
निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।

आयि कहें, सुधि सोच हरें,
तन से, मन से होई जाएं उपकारी।

तब रघुनाथ चुकायि सकें,
ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।

देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि…!

“सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं”

मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें।

दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे।

राघव जी ने कहा ! हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया।

विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ…?

हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो…!

तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना

तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?

सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं।

राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो।

सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा।

हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो।

तो फिर…! आप को कौन सा पद चाहिए ?

हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।

हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।
नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।

🌹 जय श्री राम 🌹

🙏🙏🙏🙏 जय श्री रामभक्त हनुमान🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏💐 जय जय सियाराम 💐🙏🙏

मधुस्मिता रावत

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शबरीकेपैरोंकीधूल

शबरी एक आदिवासी भील की पुत्री थी। देखने में बहुत साधारण, पर दिल से बहुत कोमल थी। इनके पिता ने इनका विवाह निश्चित किया, लेकिन आदिवासियों की एक प्रथा थी की किसी भी अच्छे कार्य से पहले निर्दोष जानवरों की बलि दी जाती थी। इसी प्रथा को पूरा करने के लिये इनके पिता शबरी के विवाह के एक दिन पूर्व सौ भेड़ बकरियाँ लेकर आये। तब शबरी ने पिता से पूछा – पिताजी इतनी सारी भेड़ बकरियाँ क्यूँ लाये ?

पिता ने कहा – शबरी यह एक प्रथा है जिसके अनुसार कल प्रातः तुम्हारी विवाह की विधि शुरू करने से पूर्व इन सभी भेड़ बकरियों की बलि दी जायेगी। यह कहकर उसके पिता वहाँ से चले जाते हैं। प्रथा के बारे में सुन शबरी को बहुत दुःख होता है और वो पूरी रात उन भेड़ बकरियों के पास बैठी रही और उनसे बाते करती रही। उसके मन में एक ही विचार था कि कैसे वो इन निर्दोष जानवरों को बचा पाये। तब ही एकाएक शबरी के मन में ख्याल आता है और वो सुबह होने से पूर्व ही अपने घर से भाग कर जंगल चली गई जिससे वो उन निर्दोष जानवरों को बचा सके। शबरी भली भांति जानती थी, अगर एक बार वो इस तरह से घर से जायेगी तो कभी उसे घर वापस आने का मौका नहीं मिलेगा फिर भी शबरी ने खुद से पहले उन निर्दोषों की सोची।

घर से निकल कर शबरी एक घने जंगल में जा पहुँची। अकेली शबरी जंगल में भटक रही थी तब उसने शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से कई गुरुवरों के आश्रम में दस्तक दी, लेकिन शबरी तुच्छ जाति की थी इसलिये उसे सभी ने धुत्कार के निकाल दिया। शबरी भटकती हुई मतंग ऋषि के आश्रम पहुंची और उसने अपनी शिक्षा प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। मतंग ऋषि ने शबरी को सहर्ष अपने गुरुकुल में स्थान दे दिया।

अन्य सभी ऋषियों ने मतंग ऋषि का तिरस्कार किया लेकिन मतंग ऋषि ने शबरी को अपने आश्रम में स्थान दिया। शबरी ने गुरुकुल के सभी आचरणों को आसानी से अपना लिया और दिन रात अपने गुरु की सेवा में लग गई।

शबरी जतन से शिक्षा ग्रहण करने के साथ- साथ आश्रम की सफाई, गौ शाला की देख रेख, दूध दोहने के कार्य के साथ सभी गुरुकूल के वासियों के लिये भोजन बनाने के कार्य में लग गई। कई वर्ष बीत गये, मतंग ऋषि शबरी की गुरु भक्ति से बहुत प्रसन्न थे।

मतंग ऋषि का शरीर दुर्बल हो चूका था इसलिये उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा- पुत्री मेरा शरीर अब दुर्बल हो चूका है, इसलिये मैं अपनी देह यहीं छोड़ना चाहता हूँ, लेकिन उससे पहले मैं तुम्हे आशीर्वाद देना चाहता हूँ बोलो पुत्री तुम्हे क्या चाहिये ?

आँखों में आसूं भरकर शबरी मतंग ऋषि से कहती है – हे गुरुवर आप ही मेरे पिता है, मैं आपके कारण ही जीवित हूँ, आप मुझे अपने साथ ही ले जाये।

तब मतंग ऋषि ने कहा- नहीं पुत्री तुम्हे मेरे बाद मेरे इस आश्रम का ध्यान रखना है। तुम जैसी गुरु परायण शिष्या को उसके कर्मो का उचित फल मिलेगा। एक दिन भगवान राम तुम से मिलने यहाँ आयेंगे और उस दिन तुम्हारा उद्धार होगा और तुम्हे मोक्ष की प्राप्ति होगी। इतना कहकर मतंग ऋषि अपनी देह त्याग कर समाधि ले लेते हैं।

उसी दिन से शबरी हर रोज प्रातः उठकर बाग़ जाती, ढेर सारे फल इकठ्ठा करती, सुंदर- सुंदर फूलों से अपना आश्रम सजाती क्यूंकि उसे भगवान राम के आने का कोई निश्चित दिन नहीं पता था, उसे केवल अपने गुरुवर की बात पर यकीन था इसलिये वो रोज श्री राम के इंतजार में समय बिता रही थी। वो रोजाना यही कार्य करती थी।

एक दिन शबरी आश्रम के पास के तालाब में जल लेने गई, वहीँ पास में एक ऋषि तपस्या में लीन थे। जब उन्होंने शबरी को जल लेते देखा तो उसे अछूत कहकर उस पर एक पत्थर फेंक कर मारा और उसकी चोट से बहते रक्त की एक बूंद से तालाब का सारा पानी रक्त में बदल गया।

यह देखकर संत शबरी को बुरा भला और पापी कहकर चिल्लाने लगा। शबरी रोती हुई अपने आश्रम में चली गई। उसके जाने के बाद ऋषि फिर से तप करने लगा उसने बहुत से जतन किये लेकिन वो तालाब में भरे रक्त को जल नहीं बना पाया। उसमे गंगा, यमुना सभी पवित्र नदियों का जल डाला गया लेकिन रक्त जल में नहीं बदला।

कई वर्षों बाद, जब भगवान राम सीता की खोज में वहां आये तब वहाँ के लोगो ने भगवान राम को बुलाया और आग्रह किया कि वे अपने चरणों के स्पर्श से इस तालाब के रक्त को पुनः जल में बदल दें।

राम उनकी बात सुनकर तालाब के रक्त को चरणों से स्पर्श करते हैं लेकिन कुछ नहीं होता। ऋषि उन्हें जो- जो करने बोलते हैं, वे सभी करते हैं लेकिन रक्त जल में नही बदला।

तब राम ऋषि से पूछते हैं – हे ऋषिवर मुझे इस तालाब का इतिहास बताये। तब ऋषि उन्हें शबरी और तालाब की पूरी कथा बताते हैं और कहते हैं – हे भगवान यह जल उसी शुद्र शबरी के कारण अपवित्र हुआ है।

तब भगवान राम दुखी होकर कहा – हे गुरुवर, यह रक्त उस देवी शबरी का नही मेरे ह्रदय का है जिसे तुमने अपने अप शब्दों से घायल किया है। भगवान राम ऋषि से आग्रह करते हैं कि मुझे देवी शबरी से मिलना है। तब शबरी को बुलावा भेजा जाता है। राम का नाम सुनते ही शबरी दौड़ी चली आती हैं।

‘राम मेरे प्रभु’ कहती हुई जब वो तालाब के समीप पहुँचती है तब उसके पैर की धूल तालाब में चली जाती है और तालाब का सारा रक्त जल में बदल जाता है।

तब भगवान राम कहते हैं – देखिये गुरुवर आपके कहने पर मैंने सब किया लेकिन यह रक्त भक्त शबरी के पैरों की धूल से जल में बदल गया।

शबरी जैसे ही भगवान राम को देखती हैं उनके चरणों को पकड़ लेती हैं और अपने साथ आश्रम लाती हैं। उस दिन भी शबरी रोज की तरह सुबह से अपना आश्रम फूलों से सजाती हैं और बाग़ से चख- चख कर सबसे मीठे बेर अपने प्रभु राम के लिये चुनती हैं।

वो पुरे उत्साह के साथ अपने प्रभु राम का स्वागत करती हैं और बड़े प्रेम से उन्हें अपने जूठे बेर परौसती हैं। भगवान राम भी बहुत प्रेम से उसे खाने उठाते हैं, तब उनके साथ गये लक्ष्मण उन्हें रोककर कहते हैं – भ्राता ये बेर जूठे हैं। तब राम कहते हैं – लक्ष्मण यह बेर जूठे नहीं सबसे मीठे हैं, क्यूंकि इनमे प्रेम हैं और वे बहुत प्रेम से उन बेरों को खाते हैं।

मतंग ऋषि का कथन सत्य होता है और देवी शबरी को मोक्ष की प्राप्ति होती है। और इस तरह भगवान राम, शबरी के राम कहलाए..!! जय श्री राम जय देवी तपस्विनी शबरी माता *🙏🏿🙏🏾🙏🏽जय श्री सीताराम*🙏🏻🙏🏼🙏

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“हनुमान जी की चतुरता की एक अनसुनी कथा”* एक समय कपिवर की प्रशंसा के आनन्द में मग्न श्रीराम ने सीताजी से कहा-"देवी ! लंका विजय में यदि हनुमान का सहयोग न मिलता तो आज भी मैं सीता वियोगी ही बना रहता।" सीताजी ने कहा-"आप बार-बार हनुमान की प्रशंसा करते रहते हैं, कभी उनके बल शौर्य की, कभी उनके ज्ञान की। अतः आज आप एक ऐसा प्रसंग सुनाइये कि जिसमें उनकी चतुरता से लंका विजय में विशेष सहायता हुई हो।" श्रीराम बोले, "ठीक याद दिलाया तुमने। युद्ध में रावण थक गया था। उसके अधिकतर वीर सैनिकों का वध हो चुका था। अब युद्ध में विजय प्राप्त करने का उसने अन्तिम उपाय सोचा। यह था देवी को प्रसन्न करने के लिए चण्डी महायज्ञ। यज्ञ आरम्भ हो गया। किन्तु हमारे हनुमान को चैन कहाँ ? यदि यज्ञ पूर्ण हो जाता और रावण देवी से वर प्राप्त करने मे सफल हो जाता तो उसकी विजय निश्चित थी। बस, तुरन्त उन्होने ब्राह्मण का रूप धारण किया और यज्ञ में शामिल ब्राह्मणों की सेवा करना प्रारम्भ कर दिया। ऐसी निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मण अति प्रसन्न हुये। उन्होंने हनुमान से वर मांगने के लिए कहा। पहले तो हनुमान ने कुछ भी मांगने से इनकार कर दिया, किन्तु सेवा से संतुष्ट ब्राह्मणों का आग्रह देखकर उन्होंने एक वरदान मांग लिया।" "वरदान में क्या मांगा हनुमान ने ?" सीताजी के प्रश्न में उत्सुकता थी। श्रीराम बोले, "उनकी इसी याचना में तो चतुरता झलकती है। "जिस मंत्र को बार बार किया जा रहा था, उसी मंत्र के एक अक्षर का परिवर्तन का हनुमान ने वरदान में मांग लिया और बेचारे भोले ब्राह्मणों ने "तथास्तु" कह दिया। उसी के कारण मंत्र का अर्थ ही बदल गया, जिससे कि रावण का घोर विनाश हुआ।" सीताजी ने प्रश्न किया, "एक ही अक्षर से अर्थ में इतना परिवर्तन !" "कौन सा मंत्र था वह ?" श्रीराम ने मंत्र बताया- जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥ इस श्लोक में "भूतार्तिहारिणि" मे "ह" के स्थान पर "क" का उच्चारण करने का हनुमान ने वर मांगा। भूतार्तिहारिणि का अर्थ है, "संपूर्ण प्रणियों की पीड़ा हरने वाली और "भूतार्तिकारिणि" का अर्थ है प्राणियों को पीड़ित करने वाली।" इस प्रकार एक सिर्फ एक अक्षर बदलने ने रावण का विनाश हो गया। "ऐसे चतुरशिरोमणि हैं हमारे हनुमान।" श्रीराम ने प्रसंग को पूर्ण किया। सीताजी इस प्रसंग को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई। मित्रों आज के युग में हमें हनुमान की आवश्यकता है। ऐसे हनुमान की जो स्वामी भक्त हो, ज्ञानी हो, त्यागी हो, चरित्र सम्पन्न और जिसमें चतुरशीलता हो। सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ भावार्थ:- श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर से तर जायेगे। जय संकटमोचन महाबली वीर महान जय हनुमान