Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, रामायण - Ramayan

यह रामायण सीरियल का वह दृश्य है जहाँ एक अदभुद घटना घटी ( सत्य घटना )

1985-86 में समुद्र के किनारे पर रामायण सीरियल की शूटिंग चल रही थी .. राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल एक शिला पर बैठे हुए थे.. समुद्र के पास में ही एक छोटा सा गाँव था, उस गाँव के लोग कभी कभी रामायण की शूटिंग देखने आ जाते थे …

एक दिन उस गाँव में एक बच्चे को सर्प ने डस लिया, बच्चा एक दम बेहोश हो ग
या और उसके मुँह से सफेद झाग आने लगे …! जैसे ही उसकी माँ को पता चला, वो अपने बच्चे को गोदी में लेकर वहां दौड़ी जहाँ रामायण की शूटिंग चल रही थी… सभी रामायण की शूटिंग में व्यस्त थे ..महिला रोती रोती एक दम वहाँ पहुँची और जहाँ रामजी ( अरुण गोविल ) बैठे हुए थे…
महिला ने बच्चे को रामजी के चरणों मे पटक दिया और जोर जोर से रोने लगी, रामजी मेरे बच्चे को बचाओ..इसे सर्प ने डस लिया है ..आप भगवान हो, मेरे बच्चे को बचाओ … प्रभु मेरे बच्चे को बचाओ …🙏

सभी शूटिंग करने वाले हैरान होकर महिला की तरफ देखते रहे, कुछ समय के लिये शूटिंग रोक दी गई ….. जब महिला रामजी के सामने जोर जोर से रोने लगी, तब रामजी एक दम खड़े हो गए और बच्चे को देख कर उसके ऊपर अपना हाथ फेरने लगे …

और जैसे ही रामजी ने बच्चे पर हाथ फेरा बच्चे को होश आने लगा , आँखे खोलने लगा…सभी शूटिंग करने वाले लोग और कुछ महिला के साथ आये लोग दंग रह गए और बच्चा खड़ा हो गया.. !

महिला का भाव देखो कि उधर एक अभिनेता के अंदर प्रभु की शक्ति पैदा हो गयी !

यह घटना खुद अरुण गोविल ने अपने मुँह से सुनाई थी …. 1995 में किसी stage प्रोग्राम में उनको आमंत्रित किया, तब किसी व्यक्ति ने arun govil जी से पूछा कि रामायण की शूटिंग करते समय आपका कोई ऐसा अनुभव जो आपके लिए अविस्मरणीय रहा हो …. तब उन्होंने यह घटना सभी को बताई …

जब सच्चे भाव और भावना से पत्थर में भगवान प्रकट हो सकते हैं तो व्यक्ति में क्यों नहीं.. कौन कहता सच्चे मन से पुकारे तो भगवान प्रकट नहीं होते…..

सियाराम मय सब जग जानी,
करहु प्रणाम जोर जुग पानी…!

जाकी रही भावना जैसी
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी …।।

जय श्रीराम 🙏🌹

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सुबह मेघनाथ से लक्ष्मण का अंतिम युद्ध होने वाला था। वह मेघनाथ जो अब तक अविजित था। जिसकी भुजाओं के बल पर रावण युद्ध कर रहा था। अप्रितम योद्धा ! जिसके पास सभी दिव्यास्त्र थे।

सुबह लक्ष्मण जी , भगवान राम से आशीर्वाद लेने गये।

उस समय भगवान राम पूजा कर रहे थे !
पूजा समाप्ति के पश्चात प्रभु श्री राम ने हनुमानजी से पूछा अभी कितना समय है युद्ध होने में?

हनुमानजी ने कहा कि अभी कुछ समय है! यह तो प्रातःकाल है।

भगवान राम ने लक्ष्मण जी से कहा ! यह पात्र लो भिक्षा मांगकर लाओ , जो पहला व्यक्ति मिले उसी से कुछ अन्न मांग लेना।

सभी बड़े आश्चर्य में पड़ गये। आशीर्वाद की जगह भिक्षा! लेकिन लक्ष्मण जी को जाना ही था।

लक्ष्मण जी जब भिक्षा मांगने के लिए निकले तो उन्हें सबसे पहले रावण का सैनिक मिल गया! आज्ञा अनुसार मांगना ही था। यदि भगवान की आज्ञा न होती तो उस सैनिक को लक्ष्मण जी वहीं मार देते। परंतु वे उससे भिक्षा मांगते है।
सैनिक ने अपनी रसद से लक्ष्मण जी को कुछ अन्न दे दिए।

लक्ष्मण जी वह अन्न लेकर भगवान राम को अर्पित कर दिए। तत्पश्चात भगवान राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया…विजयी भवः।

भिक्षा का मर्म किसी के समझ नहीं आया ! कोई पूछ भी नहीं सकता था… फिर भी यह प्रश्न तो रह ही गया।

फ़िर भीषण युद्ध हुआ! अंत मे मेघनाथ ने त्रिलोक कि अंतिम शक्तियों को लक्ष्मण जी पर चलाया। ब्रह्मास्त्र , पशुपात्र , सुदर्शन चक्र ! इन अस्त्रों कि कोई काट न थी।

लक्ष्मण जी सिर झुकाकर इन अस्त्रों को प्रणाम किए। सभी अस्त्र उनकोआशीर्वाद देकर वापस चले गए।

उसके बाद राम का ध्यान करके लक्ष्मण जी ने मेघनाथ पर बाण चलाया ! वह हँसने लगा और उसका सिर कटकर जमीन पर गिर गया।उसकी मृत्यु हो गई।

उसी दिन सन्ध्याकालीन समय भगवान राम शिव की आराधना कर रहे थे। वह प्रश्न तो अबतक रह ही गया था। हनुमानजी ने पूछ लिया! प्रभु वह भिक्षा का मर्म क्या है ?

भगवान मुस्कराने लगे , बोले मैं लक्ष्मण को जानता हूँ….वह अत्यंत क्रोधी है।लेकिन युद्ध में बहुत ही विन्रमता कि आवश्यकता पड़ती है! विजयी तो वही होता है जो विन्रम हो। मैं जानता था मेघनाथ! ब्रह्मांड कि चिंता नहीं करेगा। वह युद्ध जीतने के लिये दिव्यास्त्रों का प्रयोग करेगा! इन अमोघ शक्तियों के सामने विन्रमता ही काम कर सकती थी। इसलिये मैंने लक्ष्मण को सुबह झुकना बताया!एक वीर शक्तिशाली व्यक्ति जब भिक्षा मांगेगा तो विन्रमता स्वयं प्रवाहित होगी। लक्ष्मण ने मेरे नाम से बाण छोड़ा था …यदि मेघनाथ उस बाण के सामने विन्रमता दिखाता तो मैं भी उसे क्षमा कर देता।

भगवान श्रीरामचन्द्र जी एक महान राजा के साथ अद्वितीय सेनापति भी थे। युद्धकाल में विन्रमता शक्ति संचय का भी मार्ग है ! वीर पुरुष को शोभा भी देता है।इसलिए किसी भी बड़े धर्म युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए विनम्रता औऱ धैर्य का होना अत्यंत आवश्यक है……

वर्तमान काल भी हमारी इसी प्रकार परीक्षा ले रहा है इस कांग्रेस, बामपंथी एवं अन्य तथाकथित सेकुलरों द्वारा प्रेरित अनैतिक वैचारिक युद्ध को भी हम विनम्रता और धैर्य से ही जीत सकेंगे।

रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा भी है……………….

धीरज धर्म मित्र अरु नारी…
आपद काल परिखिअहिं चारी…!!
जय सियाराम । जय जय हनुमान ।।

राम चंद्र आर्य

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*आप के नाम में छुपा है राम का नाम! *
*एक बार पुरा गणित लगाकर देख ले आश्चर्य चकित हो जॉंएगे *

: अद्भुत गणित
अदभुत गणितज्ञ “श्री.तुलसीदासजी से एक भक्त ने पूछा कि महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?
तुलसीदास बोले :- ” हां “
भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???
तुलसीदास :- ” हां अवश्य ” ….तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!!
तुलसीदास जी ने कहा , “”अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.””
हर नाम के अंत में राम का ही नाम है।

इसे समझने के लिए तुम्हे एक “सूत्रश्लोक ” बताता हूँ।
यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!
भक्त :-” कौनसा सूत्र महाराज ?”

तुलसीदास :- यह सूत्र है …
*नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण*
*तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष*
*राम ही राम*

इस सूत्र के अनुसार
अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें..
1)उस गिनती को (चतुर्गुण) 4 से गुणाकार करें
2) उसमें (पंचतत्व मिलन) 5 मिला लें
3) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें
4)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) 8 से विभाजित करें ।
“” संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!! …
यह 2 ही *राम* है। यह 2 अंक ही *राम* अक्षर हैं।.

विश्वास नहीं हों रहा है ना???
चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं …
आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!!

उदाहरण के लिए :- *निरंजन*… 4 अक्षर
1) 4 से गुणा करिए 4×4=16
2) 5 जोड़िए 16+5=21
3) दुगने करिए 21×2=42
4) 8 से विभाजन करने पर 42÷8= 5 पूर्ण अंक , शेष 2 !!!
शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे 2 अर्थात् – “राम” !!!

विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है!!
1) चतुर्गुण अर्थात् 4 पुरुषार्थ :- धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष !!!
2) पंचतत्व अर्थात् 5 पंचमहाभौतिक :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश!!!
3) द्विगुण प्रमाण अर्थात् 2 माया व ब्रह्म !!!
4) अष्ट सो भागे अर्थात् 8 आठ प्रकार की लक्ष्मी (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योग
लक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति।

अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष 2 ही प्राप्त होगा …!!
इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!

जय बाबा तुलसी दास!!
जय श्री सीताराम!!
🌹🙏 *जय श्री राम*🙏🌹

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#रामायण_में_वर्णित_मुख्य_स्थान ::

1.#तमसानदी : अयोध्या से 20 किमी दूर है तमसा नदी। यहां पर उन्होंने नाव से नदी पार की।

2.#श्रृंगवेरपुरतीर्थ : प्रयागराज से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था। श्रृंगवेरपुर को वर्तमान में सिंगरौर कहा जाता है।

3.#कुरईगांव : सिंगरौर में गंगा पार कर श्रीराम कुरई में रुके थे।

4.#प्रयाग: कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। कुछ महीने पहले तक प्रयाग को इलाहाबाद कहा जाता था ।

5.#चित्रकूट : प्रभु श्रीराम ने प्रयाग संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

6.#सतना: चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। हालांकि अनुसूइया पति महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे, लेकिन सतना में ‘रामवन’ नामक स्थान पर भी श्रीराम रुके थे, जहां ऋषि अत्रि का एक ओर आश्रम था।

7.#दंडकारण्य: चित्रकूट से निकलकर श्रीराम घने वन में पहुंच गए। असल में यहीं था उनका वनवास। इस वन को उस काल में दंडकारण्य कहा जाता था। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर दंडकाराण्य था। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के अधिकतर हिस्से शामिल हैं। दरअसल, उड़ीसा की महानदी के इस पास से गोदावरी तक दंडकारण्य का क्षेत्र फैला हुआ था। इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

8.#पंचवटीनासिक : दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। यह आश्रम नासिक के पंचवटी क्षे‍त्र में है जो गोदावरी नदी के किनारे बसा है। यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

9.#सर्वतीर्थ: नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया था जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है। जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।

10.#पर्णशाला: पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था। इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

11.#तुंगभद्रा: सर्वतीर्थ और पर्णशाला के बाद श्रीराम-लक्ष्मण सीता की खोज में तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

12.#शबरी_का_आश्रम : तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है। शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है। केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।

13.#ऋष्यमूक_पर्वत : मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया। ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था जो हनुमानजी के गुरु थे।

14.#कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने वानर सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है। यहां श्रीराम की सेना ने पड़ाव डाला और श्रीराम ने अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित कर विचार विमर्ष किया। लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

15..#रामेश्‍वरम: रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।

16.#धनुषकोडी : वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया। धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।

इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।

17.’#नुवारा_एलिया’ पर्वत श्रृंखला :
वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।

श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए है।

#रामायण.।।
जय श्री सीता राम 🙏🚩

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राम जन्म भूमि


बात ज्यादा पुरानी नहीं है।

अंग्रेजो के ज़माने में एक दंगा हुआ था श्री राम जन्मभूमि को ले लेकर और फैज़ाबाद की तरफ से मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था।

तब दंगे के बीच सबने देखा कि हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों से ६ फुट से ज्यादा ऊंचा विशालकाय नागा साधु हाथ मे तलवार लिए उतरा और दंगाई भीड़ पे अकेले टूट पड़ा और गाजर मूली की तरहः काटता हुआ फैज़ाबाद की तरफ निकल गया।

हनुमान गढ़ी में रहने वाले अन्य महंत पुजारी नागा भी हैरान रह गए क्योंकि किसी ने उस नागा साधु को न उस दिन के पहले देखा था न उस दिन के बाद देखा लेकिन उस अकेले नागा ने ऐसी मार काट की थी कि फैज़ाबाद तक सड़क पे दंगाइयों की लाशें पड़ी थी और दंगा खत्म हो गया था।अयोध्या शहर के कोतवाल हनुमान जी है और अयोध्या की सुरक्षा का जिम्मा उनके ऊपर है और जब अयोध्या पर संकट आता है तो वो किसी न किसी साधु रूप में आते है।

६ दिसम्बर वाले दिन बाबरी ढांचे के चारो तरफ प्रशाशन ने कई स्तर की बैरिकेड लगाया हुआ था और कार सेवक अंदर नही जा पा रहे थे, तभी एक नागा साधु एक सरकारी बस स्टार्ट कर के तेज़ी से बस ले कर बैरिकेड के एक के बाद एक स्तर तोड़ता हुआ अंदर घुसता गया
उसके पीछे भीड़ घुस गई और वो नागा उस भीड़ में गायब हो गया।

ये घटना फ़ोटो और वीडियो में रिकॉर्ड हुई थी अखबारों में भी छपी लेकिन वो नागा कभी दुबारा नही दिखा लेकिन उसने ढांचा गिराने के लिए कारसेवकों के लिए रास्ता खोल दिया था ।प्रशाशन देखता रह गया और कुछ नही कर सका थाअयोध्या में हनुमान जी का किला है हनुमान गढ़ी और देश भर के सभी प्रमुख हनुमान मंदिरों का मुख्यालय भी है।।

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विभीषण की पुत्री त्रिजटा की सम्पूर्ण कथा?


विभीषण की पुत्री त्रिजटा की सम्पूर्ण कथा?

  • त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥

श्री रामचरित मानस के छोटे-से-छोटे पात्र भी विशेषता संपन्न है। इसके स्त्री पात्रों में त्रिजटा एक लधु स्त्रीपात्र है । यह पात्र आकार में जितना ही छोटा है, महिमा में उतना की गौरावमण्डित है । सम्पूर्ण ‘मानस’ में केवल सुन्दरकाण्ड और लंका काण्डमें सीता-त्रिजटा संवाद के रूपमें त्रिजटा का वर्णन आया है, परंतु इन लघु संवादो में ही त्रिजटा के चरित्र की भारी विशेषताएँ निखर उठी हैं।

छोटेसे वार्ताप्रसङ्गमें भी सम्पूर्ण चरित्र को समासरूप से उद्भासित करने की क्षमता पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी की विशेषता है । मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाईं में त्रिजटा का स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है :

त्रिजटा जाम राच्छसी एका ।
राम चरन रति निपुन बिबेका ।।
(प्रस्तुत पंक्ति त्रिजटाके चार गुणोंको स्पष्ट करती है-
१- वह राक्षसी है । २-श्री रामचरण में उसकी रति है ।
३ वह व्यवहार-निपुण और ४ -विवेकशीला है।

राक्षसी होते हुए भी श्री रामचरणानुराग, व्यवहार कुशलता एवं विवेकशीलता जैसे दिव्य देवोपम गुणों की अवतारणा चरित्र में अलौकिकता को समाविष्ट करती है । सम्भवत: इन्ही तीन गुणों के समाहार के कारण उसका नाम त्रिजटा रखा गया हो । संत कहते है इनके सिर पर ज्ञान,भक्ति और वैराग्य रुपी तीन जटाएं है अतः इनका नाम त्रिजटा है।

त्रिजटा रामभक्त बिभीषणजी की पुत्री है। इनकी माता का नाम शरमा है। वह राबण की भ्रातृजा है। राक्षसी उसका वंशगुण है और रामभक्ति उसका पैतृक गुण । लंका की अशोक वाटिका में सीताजी के पहरेपर अथवा सहचरी के रूपमें रावणद्वारा जिस स्त्री-दल की नियुक्ति होती है, त्रिजटा उसमें से एक है । अपने सम्पूर्ण चरित्र में सीताके लिये इसने परामर्शदात्री एवं प्राणरक्षिका का काम किया है । यही कारण है कि विरहाकुला और त्रासिता सीताने त्रिज़टा के सम्बोधन में माता शब्द का प्रयोग किया है।

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी ।
मातु बिपति संगिनि तें मोरी।।
ऐसी शुभेच्छुका के लिये मा शब्द कितना समीचीन है ।

त्रिज़टा की रति राम-चरण में है । रामभक्त पिताकी पुत्री होनेके कारण इसका यह अनुराग पैतृक सम्पत्ति है और स्वाभाविक है । त्रिजटा के घर में निरंतर रामकथा होती है । अभी माता सीता से मिलने के थोडी देर पहले वह घरसे आयी है, जहाँ हनुमान जी जैसे परम संत श्री बिभीषणजी से रामकथा कह रहे थे ।

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ।।

राक्षसी होते हुए भी त्रिजटा को मानव-मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान है । वह सीताजी के स्वभाव और मनोभाव को अच्छी तरह समझती है । वह यह भलीभांति जानती है कि सीताजी को सांत्वना के लिये और उनके दुखों को दूर करने के लिये रामकथा से बढकर दूसरा कोई उपाय नहीं है।

सीता जी का विरह जब असह्य हो चला तब मरणातुर सीताजी आत्मत्याग के लिये जब त्रिजटा से अग्नि की याचना करती हैं , सीताजी त्रिजटा से कहती है के चिता बनाकर सजा दे और उसमे आग लगा दे, तो इस अनुरोंध को वह बुद्धिमान राम भक्ता यह कहकर टाल देती है कि रात्रि के समय अग्नि नहीं मिलेगी और सीताजी के प्रबोधके लिये वह राम यश गुणगान का सहारा लेती है ।

ज्ञान गुणसागर हनुमान जी ने भी जब अशोकवाटिका में सीटा जी की विपत्ति देखी तो उनके प्रबोधके लिये उन्हें कोई उपाय सूझा ही नहीं । वे सीताजी के रूप और स्वभाव दोनोंही से अपरिचित थे । उन्होंने त्रिजटा प्रयुक्त विधिका ही अनुसरण किया । रावण त्रासिता सीताजी को राम सुयश सुनने से ही सांत्वना मिली थी, यह हनुमान् जी ऊपर पल्लवोंमें छिपे बैठे देख रहे थे । त्रिजटाके चले जानेके बाद सीताजी और भी व्याकुल हो उठी । तब उनकी परिशान्ति के लिये हनुमान जी ने भी श्रीराम गुणगान सुनाये ।

दानवी होनेके कारण त्रिजटा में दानव मनोविज्ञान का ज्ञान तो था ही । दानवोंका अधिक विश्वास दैहिक शक्तिमे है और इसीलिये उन्हें कार्यविरत करनेमें भय अधिक कारगर होता है । सीताजी को वशीभूत करने के लिये रावणने भय और त्रासका सहारा लिया था और तदनुसार राक्षसियों को ऐसा ही अनुदेश करके यह चला गया था । सीताजीका दुख दूना हो गया, क्योंकि राक्षसियाँ नाना भाँति बह्यंकर रूप बना बनाकर उन्हें डराने धमकाने लगी ।

व्यवहार-विशारद त्रिजटा के लिये यह असह्य हो गया । वर्जन के लिये उस पण्डिता ने विवेकपूर्ण एक युक्ति निकाली । उसने राक्षस मनोविज्ञान का सहारा लिया और एक भयानक स्वप्न कथा की सृष्टि की ।उसने सब राक्षसियों को बुलवाकर कहा सब सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। त्रिजटा ने उन राक्षसियों से कहा की मैंने एक स्वप्न देखा है। स्वप्नमे मैंने देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी । राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी । रावण नंगा है और गधे पर सवार है । उसके सिर मुँड़े हुए हैं बीसो भुजाएँ कटी हुई है ।

इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका बिभीषण ने पायी है। लंका में श्री रामचंद्र जी की दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुलावा भेजा । पुकारकर (निश्चय के साथ ) कहती हू कि यह स्वप्न चार ( कुछ ही) दिनों में सत्य होकर रहेगा । उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयी और जानकी जी के चरणों पर गिर पड़ी।

इस स्वप्न वार्तासे एक ओर जहाँ त्रिज़टा का भविष्य दर्शिनी होना सिद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर उसका व्यवहार-निपुणा और विवेकिनी होना भी उद्धाटित होता है।भय दिखाकर दूसरे को वशीभूत करनेवाली मण्डलि को उसने भावी भयकी सूचना देकर मनोनुकूल बना लिया । प्रत्यक्ष वर्जन मे तो राजकोप का डर था, अनिष्ट की सम्भावना थी । उसने उन राक्षसियों को साक्षात भक्तिरूपा सीता जी के चरणों में डाल दिया । यही तो भक्तो संतो का स्वभाव है।

लंका काण्डके युद्ध प्रसंग में त्रिज़टा की चातुरीका एक और विलक्षण उदाहरण मिलता है । राम रावण युद्ध चरम सीमापर है । रावण छोर युद्ध कर रहा है । उसके सिर कट-कट करके भी पुन: जुट जाते हैं । भुजाओ को खोकर

भी वह नवीन भुजावाला बन जाता है और श्रीराम के मारे भी नहीं मरता । अशोक वाटिका में त्रिज़टा के मुँहसे यह प्रसङ्ग सुनकर सीताजी व्याकुल हो जाती हैं । श्री रामचंद्र के बाणों से भी नहीं मरनेवाले रावणके बन्धनसे वह अब मुक्त होनेकी आशा त्याग देनेको हो जाती हैं । त्रिजटा को परिस्थितिवश अनुभव होता है ।

वह सीताजी की मनोदशा को देखकर फिर प्रभु श्रीरामके बलका वर्णन करती है और सीता को श्रीराम की विजय का विश्वास दिलाती है ।
त्रिजटाने कहा- राजकुमारी ! सुनो, देवताओ का। शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ।परन्तु प्रभु उसके हृदय मे बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमे जानकी जी (आप) बसती हैं ।

श्री राम जी यही सोचकर रह जाते हैं कि इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हदयमे मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भूवन हैं । अत: रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा।

यह वचन सुनकर, सीताजी के मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा- सुन्दरी ! महान सन्देह का त्याग कर दो अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा । सिरोंके बार बर कटि जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जायेगा और उसकी मृत्यु होगी।

(रावण हर क्षण जानकी जी को प्राप्त करने के बारे में ,उन्हें अपना बनाने के बारे में ही सोचता रहता अतः ह्रदय से जानकी जी का ही विचार करता रहता । संतो ने सीता माँ को साक्षात् भक्ति ही बताया है। रावण भक्ति को जबरन अपने बल से प्राप्त करना चाहता है, परंतु क्या भक्ति इस तरह प्राप्त होती है?

भक्ति तो संतो के संग से, प्रभु लीला चिंतन एवं जानकी जी की कृपा दृष्टी से ही प्राप्त हो सकती है । जानकी माता ने तो कभी रावण की ओर दृष्टी तक नहीं डालीं । रावण को पता था की प्रभु से वैर करने पर उन्हें हाथो मृत्यु होगी तो मोक्ष प्राप्त हो जायेगा परंतु प्रभु चरणों की भक्ति नहीं प्राप्त होगी। )

जानकी माता ने पुत्र कहकर हनुमान जी से और माता कहकर त्रिजटा से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया। किशोरी जी की कृपा हो गयी तब राम भक्ति सुलभ है। हनुमान जी को और त्रिजटा को सीता माँ ने अखंड भक्ति का दान दिया है ।सीता जी के प्राणों की रक्षा करने में और उनकी पीड़ा कम करने में हनुमान जी और त्रिजटा का मुख्य सहयोग रहा है।

संतो ने कहा है लगभग २ वर्ष तक सीताजी लंका में रही(कोई ४३५ दिन मानते है) और त्रिजटा अत्यंत भाग्यशाली रही की राक्षसी होने पर भी उन्हें साक्षात् भक्ति श्री सीता जी का प्रत्येक क्षण संग मिला,सेवा मिली और प्रेम मिला।

संत कहते है भगवान् के पास देने के लिए सबसे छोटी वस्तु कोई है तो वो है मोक्ष और भगवान् के पास देने के लिए सबसे बड़ी वस्तु कोई है तो वह है भक्ति। भगवान् संसार की बड़ी से बड़ी वस्तु और भोग प्रदान कर अपना पीछा छुडा लेते है ,परंतु अपने चरणों की अविचल भक्ति नहीं देते ।नारी भक्ताओ का चरित्र हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ रहा है, लंका में सर्वश्रेष्ठ भक्ता त्रिजटा है ऐसा संतो का मत है।

इस प्रकार त्रिजटाचरित्र भक्ति, विवेक और व्यवहारकुशलता का एक मणिकाञ्चन योग है।

मानस अमृत

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पतिव्रता की महिमा


जब सुलोचना मेघनाद का कटा सर लेने श्रीराम सेना-दल में जा पहुंची –
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रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं-
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“लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोर्इ संदह नहीं है।
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परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।
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ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशात्याग देनी पड़ेगी।
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लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया।
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हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।
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मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुर्इ उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी।
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सुलोचना चकित हो गयी। (सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। )दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया।
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उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यकित की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा।
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निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- “यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृतान्त लिख दे।
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भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- “प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्ध भूमि में श्रीराम के भार्इ लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कर्इ वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है।
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वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।
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पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी।
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पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- ‘शोक न कर पुत्री। प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा।
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करुण चीत्कार करती हुर्इ सुलोचना बोली- “पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे।
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सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती?
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जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।
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जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एक पत्नी व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए।
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मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”
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सुलोचना के आने का बादल सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले-
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“देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है।
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सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी। श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- “देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है।
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मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ?
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सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- “राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आर्इ हूँ।
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श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।
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पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं।
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रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- “सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है।
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मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ।
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पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।
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सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है।
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जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुर्इ कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है।
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सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- “मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुर्इ मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।
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व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- “निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।
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श्रीराम ने कहा- “व्यर्थ बातें मन करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।
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महान पतिव्रता स्त्री श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी।
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उसने कहा- “यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे।
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सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुर्इ थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। यह देखकर सभी दंग रह गये।
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सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे।
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चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- “भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। अत: आज युद्ध बंद रहे।
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श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गर्इ।
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लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।

ओली अमित

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जय सियाराम जी।

आइए जानें, 14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे।

श्रीराम को 14 वर्ष का वनवान हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमें से 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है।

जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में…

पहला पड़ाव…केवट प्रसंग :

राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।

‘सिंगरौर’ : इलाहाबाद से 22 मील (लगभग 35.2 किमी) उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।

‘कुरई’ : इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।

दूसरा पड़ाव….चित्रकूट के घाट पर :

कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।

अद्वितीय सिद्धा पहाड़ :

सतना जिले के बिरसिंहपुर क्षेत्र स्थित सिद्धा पहा़ड़। यहाँ पर भगवान श्रीराम ने निशाचरों का नाश करने पहली बार प्रतिज्ञा ली थी। आज समाज इसे भले ही मानने से इनकार कर रहा है, लेकिन यह वहीं पहाड़ है, जिसका वर्णन रामायण में किया गया है।

चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

तीसरा पड़ाव; अत्रि ऋषि का आश्रम :

चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी। चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से निकलकर भगवान राम पहुंच गए घने जंगलों में…

चौथा पड़ाव, दंडकारण्य :

अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है। इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

पांचवा पड़ाव; पंचवटी में राम :

दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।

छठा पड़ाव.. सीताहरण का स्थान ‘सर्वतीर्थ’ :

नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।

सातवां पड़ाव;सीता की खोज :

सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

आठवां पड़ाव…शबरी का आश्रम :

तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है। शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा। केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।

नवम पड़ाव; हनुमान से भेंट :

मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया। ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है।

कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।

सुग्रीव गुफा

सुग्रीव अपने भाई बाली से डरकर जिस कंदरा में रहता था, उसे सुग्रीव गुफा के नाम से जाना जाता है। यह ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित थी।

ग्यारहवां पड़ाव… रामेश्वरम :

रामेश्वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।

रामसेतु

रामसेतु जिसे अंग्रेजी में एडम्स ब्रिज भी कहा जाता है, भारत (तमिलनाडु) के दक्षिण पूर्वी तट के किनारे रामेश्वरम द्वीप तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के मध्य चूना पत्थर से बनी एक श्रृंखला है। भौगोलिक प्रमाणों से पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू-मार्ग से आपस में जोड़ता था। यह पुल करीब 18 मील (30 किलोमीटर) लंबा है।

बारहवां पड़ाव… धनुषकोडी :

वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया। धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्नार से करीब 18 मील पश्चिम में है।

तेरहवां पड़ाव…’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला :

वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।

रावण की लंका का रहस्य…

रामायण काल को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं होने के कारण कुछ लोग जहां इसे नकारते हैं, वहीं कुछ इसे सत्य मानते हैं। हालांकि इसे आस्था का नाम दिया जाता है, लेकिन नासा द्वारा समुद्र में खोजा गया रामसेतु ऐसे लोगों की मान्यता को और पुष्ट करता है।

शम्भू

साभार..

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जब धरती में समा गईं सीता माता


क्या हुआ जब धरती में समा गईं सीता माता?

पहली बात तो यह कि माता सीता का धरती में समा जाने के प्रसंग पर मतभेद और विरोधाभाष है। पद्मपुराण की कथा में सीता धरती में नहीं समाई थीं बल्कि उन्होंने श्रीराम के साथ रहकर सिंहासन का सुख भोगा था और उन्होंने भी राम के साथ में जल समाधि ले ली थी।

वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के अनुसार प्रभु श्रीराम के दरबार में लव और कुश राम कथा सुनाते हैं। सीता के त्याग और तपस्या का वृतान्त सुनकर भगवान राम ने अपने विशिष्ट दूत के द्वारा महर्षि वाल्मीकि के पास सन्देश भिजवाया, ‘यदि सीता का चरित्र शुद्ध है और वे आपकी अनुमति ले यहां आकर जन समुदाय में अपनी शुद्धता प्रमाणित करें और मेरा कलंक दूर करने के लिए शपथ करें तो मैं उनका स्वागत करूंगा।’

यह संदेश सुनकर वाल्मीकि माता सीता को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। काषायवस्त्रधारिणी सीता की दीन-हीन दशा देखकर वहां उपस्थित सभी लोगों का हृदय दुःख से भर आया और वे शोक से विकल हो आंसू बहाने लगे।

वाल्मीकि बोले, ‘श्रीराम! मैं तुम्हें विश्‍वास दिलाता हूं कि सीता पवित्र और सती है। कुश और लव आपके ही पुत्र हैं। मैं कभी मिथ्याभाषण नहीं करता। यदि मेरा कथन मिथ्या हो तो मेरी सम्पूर्ण तपस्या निष्फल हो जाय। मेरी इस साक्षी के बाद सीता स्वयं शपथपूर्वक आपको अपनी निर्दोषिता का आश्‍वासन देंगीं।’

तत्पश्‍चात् श्रीराम सभी ऋषि-मुनियों, देवताओं और उपस्थित जनसमूह को लक्ष्य करके बोले, “हे मुनि एवं विज्ञजनों! मुझे महर्षि वाल्मीकि जी के कथन पर पूर्ण विश्‍वास है परन्तु यदि सीता स्वयं सबके समक्ष अपनी शुद्धता का पूर्ण विश्‍वास दें तो मुझे प्रसन्नता होगी।”

राम का कथन समाप्त होते ही सीता हाथ जोड़कर, नेत्र झुकाए बोलीं, “मैंने अपने जीवन में यदि श्रीरघुनाथजी के अतिरिक्‍त कभी किसी दूसरे पुरुष का चिन्तन न किया हो तो मेरी पवित्रता के प्रमाणस्वरूप भगवती पृथ्वी देवी अपनी गोद में मुझे स्थान दें।”

सीता के इस प्रकार शपथ लेते ही पृथ्वी फटी। उसमें से एक सिंहासन निकला। उसी के साथ पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूप में प्रकट हुईं। उन्होंने दोनों भुजाएं बढ़ाकर स्वागतपूर्वक सीता को उठाया और प्रेम से सिंहासन पर बिठा लिया। देखते-देखते सीता सहित सिंहासन पृथ्वी में लुप्त हो गया। सारे दर्शक स्तब्ध से यह अभूतपूर्व दृश्य देखते रह गए।

इस सम्पूर्ण घटना से राम को बहुत दुःख हुआ। उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वे दुःखी होकर बोले, “मैं जानता हूं, मां वसुन्धरे! तुम ही सीता की सच्ची माता हो। राजा जनक ने हल जोतते हुए तुमसे ही सीता को पाया था, परन्तु तुम मेरी सीता को मुझे लौटा दो या मुझे भी अपनी गोद में समा लो।” श्रीराम को इस प्रकार विलाप करते देख ब्रह्मादि देवताओं ने उन्हें नाना प्रकार से सान्त्वना देकर समझाया।

इसके बाद अनेकों वर्षो तक राज्य करने के बाद राम जी भी भाइयों और कुछ अयोध्या वासियों समेत सरयू में उतरते गए और एक एक करके सब वैकुण्ठ पहुंच गए। इससे पूर्व उन्होंने लव को लवपुरी नगर में राज्य दिया जबकि कुश अयोध्या के राज सिंघासन सौंपा।

यह घटना इस प्रकार है। एक दिन काल तपस्वी के वेश में राजद्वार पर आया। उसने सन्देश भिजवाया कि मैं महर्षि अतिबल का दूत हूं और अत्यन्त आवश्यक कार्य से श्री रामचन्द्र जी से मिलना चाहता हूं। संदेश पाकर राजचन्द्रजी ने उसे तत्काल बुला भेजा और महर्षि अतिबल का सन्देश सनाने का आग्रह किया। यह सुनकर मुनिवेषधारी काल ने कहा, ‘यह बात अत्यन्त गोपनीय है। यहां हम दोनों के अतिरिक्‍त कोई तीसरा व्यक्‍ति नहीं रहना चाहिए। मैं आपको इसी शर्त पर उनका संदेश दे सकता हूं कि यदि बातचीत के समय कोई व्यक्‍ति आ जाए तो आप उसका वध कर देंगे।’

श्रीराम ने काल की बात मानकर लक्ष्मण से कहा, “तुम इस समय द्वारपाल को विदा कर दो और स्वयं ड्यौढ़ी पर जाकर खड़े हो जाओ। ध्यान रहे, इन मुनि के जाने तक कोई यहां आने न पाए। जो भी आएगा, मेरे द्वारा मारा जाएगा।’

जब लक्ष्मण वहां से चले गए तो उन्होंने काल से महर्षि का सन्देश सुनाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर काल बोला, ‘मैं आपकी माया द्वारा उत्पन्न आपका पुत्र काल हूं। ब्रह्मा जी ने कहलाया है कि आपने लोकों की रक्षा करने के लिए जो प्रतिज्ञा की थी वह पूरी हो गई। अब आपके स्वर्ग लौटने का समय हो गया है। वैसे आप अब भी यहां रहना चाहें तो आपकी इच्छा है।’

यह सुनकर श्रीराम ने कहा, “जब मेरा कार्य पूरा हो गया तो फिर मैं यहां रहकर क्या करूंगा? मैं शीघ्र ही अपने लोक को लौटूंगा।’

जब काल से रामचन्द्रजी वार्तालाप कर रहे थे, उसी समय द्वार पर महर्षि दुर्वासा रामचन्द्र से मिलने आए। वे लक्ष्मण से बोले, “मुझे तत्काल राघव से मिलना है। विलम्ब होने से मेरा काम बिगड़ जाएगा। इसलिए तुम उन्हें तत्काल मेरे आगमन की सूचना दो।’

लक्ष्मण बोले, “वे इस समय अत्यन्त व्यस्त हैं। आप मुझे आज्ञा दीजिए, जो भी कार्य हो मैं पूरा करूंगा। यदि उन्हीं से मिलना हो तो आपको दो घड़ी प्रतीक्षा करनी होगी।’

यह सुनते ही मुनि दुर्वासा का मुख क्रोध से तमतमा आया और बोले, “तुम अभी जाकर राघव को मेरे आगमन की सूचना दो। यदि तुम विलम्ब करोगे तो मैं शाप देकर समस्त रघुकुल और अयोध्या को अभी इसी क्षण भस्म कर दूंगा।’

ऋषि के क्रोधयुक्‍त वचन सुनकर लक्ष्मण सोचने लगे, चाहे मेरी मृत्यु हो जाए, रघुकुल का विनाश नहीं होना चाहिए। यह सोचकर उन्होंने रघुनाथजी के पास जाकर दुर्वासा के आगमन का समाचार जा सुनाया। रामचन्द्रजी काल को विदा कर महर्षि दुर्वासा के पास पहुंचे। उन्हें देखकर दुर्वासा ऋषि ने कहा, “रघुनन्दन! मैंने दीर्घकाल तक उपवास करके आज इसी क्षण अपना व्रत खोलने का निश्‍चय किया है। इसलिए तुम्हारे यहां जो भी भोजन तैयार हो तत्काल मंगाओ और श्रद्धापूर्वक मुझे खिलाओ।’

रामचन्द्र जी ने उन्हें सब प्रकार से सन्तुष्ट कर विदा किया। फिर वे काल को दिए गए वचन को स्मरण कर दुखी हो गए। राम दुखी देख लक्ष्मण बोले, “प्रभु! यह तो काल की गति है। आप दुखी न हों और निश्‍चिन्त होकर मेरा वध करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें।’

लक्ष्मण की बात सुनकर उन्होंने गुरु वसिष्ठ तथा मन्त्रियों को बुलाकर उन्हें सम्पूर्ण वृतान्त सुनाया। यह सुनकर वसिष्ठ जी बोले, “राघव! आप सबको शीघ्र ही यह संसार त्याग कर अपने-अपने लोकों को जाना है। इसका प्रारम्भ सीता के प्रस्थान से हो चुका है। इसलिए आप लक्ष्मण का परित्याग करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें। प्रतिज्ञा नष्ट होने से धर्म का लोप हो जाता है। साधु पुरुषों का त्याग करना उनके वध करने के समान ही होता है।’

गुरु वसिष्ठ की सम्मति मानकर श्री राम ने दुःखी मन से लक्ष्मण का परित्याग कर दिया। वहां से चलकर लक्ष्मण सरयू के तट पर आए। जल का आचमन कर हाथ जोड़, प्राणवायु को रोक, उन्होंने अपने प्राण विसर्जन कर दिए। इसके बाद श्रीराम भी जल समाधि लेने के लिए आतुर हुए और उन्होंने भरत को राज्य सौंपना चाहता लेकिन भरत ने इनकार कर दिया। भरत ने कहा मैं भी आपके साथ जाऊंगा। प्रजाजन भी कहने लगे कि हम सब भी आपके साथ चलेंगे।

कुछ क्षण विचार करके उन्होंने दक्षिण कौशल का राज्य कुश को और उत्तर कौशल का राज्य लव को सौंपकर उनका अभिषेक किया। कुश के लिए विन्ध्याचल के किनारे कुशावती और लव के लिये श्रावस्ती नगरों का निर्माण कराया फिर उन्हें अपनी-अपनी राजधानियों को जाने का आदेश दिया।

इसके पश्‍चात् एक द्रुतगामी दूत भेजकर मधुपुरी से शत्रघ्न को बुलाया। दूत ने शत्रुघ्न को लक्ष्मण के त्याग, लव-कुश के अभिषेक आदि की सारी बातें भी बताईं। इस घोर कुलक्षयकारी वृतान्त को सुनकर शत्रुघ्न अवाक् रह गये। तदन्तर उन्होंने अपने दोनों पुत्रों सुबाहु और शत्रुघाती को अपना राज्य बांट दिया। उन्होंने सबाहु को मधुरा का और शत्रुघाती को विदिशा का राज्य सौंप तत्काल अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। अयोध्या पहुंचकर वे बड़े भाई से बोले, ‘मैं भी आपके साथ चलने के लिए तैयार होकर आ गया हूं।”

यह सुनकर वहां उपस्थित सुग्रीव, विभीषण भी प्रभु के साथ सरयू में जाने के लिए तैयार हो गए लेकिन श्रीरामचंद्र जी ने विभीषण को रोक दिया। विभीषण को कलियुग की संधि तक जीवित रहने का आदेश दिया।

अगले दिन प्रातःकाल होने पर धर्मप्रतिज्ञ श्री रामचन्द्रजी ने गुरु वसिष्ठ जी की आज्ञा से महाप्रस्थानोचित सविधि सब धर्मकृत्य किए। तत्पश्‍चात् पीताम्बर धारण कर हाथ में कुशा लिए राम ने वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के साथ सरयू नदी की ओर प्रस्थान किया। नंगे पैर चलते हुए वे सरयू तट पहुंचे। उनके पीछे सारा नगर था। इस समस्त समुदाय में कोई भी दुःखी अथवा उदास नहीं था, बल्कि सभी इस प्रकार प्रफुल्लित थे जैसे छोटे बच्चे मनचाहा खिलौना पाने पर प्रसन्न होते हैं।

श्रीरामचन्द्रजी ने सभी भाइयों और साथ में आए जनसमुदाय के साथ पैदल ही सरयू नदी में प्रवेश किया। अकाश में स्थित सभी देवता उनकी स्तुति का गान कर रहे थे। प्रभु के पीछे जिसने भी सरयू में डुबकी लगाई वहीं शरीर त्यागकर परमधाम का अधिकारी हो गया।

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रामायण


पेरियार के रावण बनाम वाल्मीकि के श्री राम

कार्तिक अय्यर

पेरियार ने भगवान राम और माता सीता के लिए बहुत ही बुरा लिखा है और रावण को महान बताया है।

राम के बारे में पेरियार का मत है कि वाल्मीकि के राम विचार और कर्म से धूर्त थे। झूठ, कृतघ्नता, दिखावटीपन, चालाकी, कठोरता, लोलुपता, निर्दोष लोगों को सताना और कुसंगति जैसे अवगुण उनमें कूट-कूट कर भरे थे। पेरियार कहते हैं कि जब राम ऐसे ही थे और रावण भी ऐसा ही था तो फिर राम अच्छे और रावण बुरा कैसे हो गया?
पेरियार राम में तो इतनी कमियां निकालते हैं, किन्तु रावण को वे सर्वथा दोषमुक्त मानते हैं। वे कहते हैं कि स्वयं वाल्मीकि रावण की प्रशंसा करते हैं और उनमें दस गुणों का होना स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार रावण महापंडित, महायोद्धा, सुन्दर, दयालु, तपस्वी और उदार हृदय जैसे गुणों से विभूषित था। जब हम वाल्मीकि के कथनानुसार राम को पुरुषोत्तम मानते हैं तो उसके द्वारा दर्शाये इन गुणों से संपन्न रावण को उत्तम पुरुष क्यों नहीं मान सकते? सीताहरण के लिए रावण को दोषी ठहराया जाता है, लेकिन पेरियार कहते हैं कि वह सीता को जबर्दस्ती उठाकर नहीं ले गया था, बल्कि सीता स्वेच्छा से उसके साथ गई थी। इससे भी आगे पेरियार यह तक कहते हैं कि सीता अन्य व्यक्ति के साथ इसलिये चली गई थी क्योंकि उसकी प्रकृति ही चंचल थी और उसके पुत्र लव और कुश रावण के संसर्ग से ही उत्पन्न हुए थे। सीता की प्रशंसा में पेरियार एक शब्द तक नहीं कहते।

महर्षि वाल्मीकि क्या कहते हैं?

भीमसैनिक, ओशोवादी, वामपंथी जैसे कि सुरेंद्रकुमार अज्ञात व राकेश नाथ, पेरियार आदि रावण को खूब महान बताते हैं। रावण का चरित्र हम वाल्मीकीय रामायण से प्रस्तुत करते हैं। पाठकगण समझ जायेंगे कि रावण कितना “चरित्रवान” था:-

(क) रावण यहां वहां से कई स्त्रियां हर लाया था:-
रावण संन्यासी का कपट वेश त्यागकर सीताजी से कहता है:-
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्ततः ।
सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव ॥ २८ ॥
मैं यहां वहां से अनेकों सुंदर स्त्रियों को हरण करके ले आया।उन सबमें तू मेरी पटरानी बन,इसमें तेरी भलाई है।।२८।।
(अरण्यकांड सर्ग ४७/२८)
परस्त्रीगमन राक्षसों का धर्म है:-
रावण ने सीता से कहा: –
स्वधर्मो रक्षसां भीरु सर्वथैव न संशयः ।
गमनं वा परस्त्रीणां हरणं संप्रमथ्य वा ॥ ५ ॥
“भीरू! तू ये मत समझ कि मैंने तुझे हरकर कोई अधर्म किया है।दूसरों की स्त्रियों का हरण व परस्त्रियों से भोग करना राक्षसों का धर्म है-इसमें संदेह नहीं ।।५।।”
( सुंदरकांड सर्ग २०/५)

लीजिये महाराज! रावण ने खुद स्वीकार किया है कि वो इधर उधर से परस्त्रियों को हरकर उनसे संभोग करता है। अब हम आपकी मानें या रावण की? निश्चित ही रावण की गवाही अधिक माननीय होगी, क्योंकि ये तो उसका अपना अनुभव है और आप केवल वकालत कर रहो हैं।वाल्मीकीय रामायण से इस विषय पर सैकड़ों प्रमाण दिये जा सकते हैं।
मंदोदरि का रावणवध के बाद विलाप करते हुये रोती है तथा कहती है।
धर्मव्यवस्थाभेत्तारं मायास्रष्टारमाहवे ।
देवासुरनृकन्यानां आहर्तारं ततस्ततः ।। ५३ ।।

आप(रावण) धर्मकी व्यवस्था को तोड़ने वाले,संग्राम में माया रचने वाले थे। देवता,असुर व मनुष्यों की कन्याओं यहां वहां से हरण करके लाते थे।।५३।।
( युद्धकांड सर्ग १११)

लीजिये, अब रावण की पटरानी,बीवी की गवाही भी आ गई कि रावण परस्त्रीगामी था।
अंततः जब उसने देवी सीता को चुराया, तो उसकी सीताजी पर भी गंदी दृष्टि थी। पर जीते जी उनसे संभोग न कर सका और उन पतिव्रता देवी के पातिव्रत्य तेज से जलकर खाक हो गया! देखिये, मंदोदरि के शब्दों में:-

ऐश्वर्यस्य विनाशाय देहस्य स्वजनस्य च ।
सीतां सर्वानवद्याङ्गीं अरण्ये विजने शुभाम् ।
आनयित्वा तु तां दीनां छद्मनाऽऽत्मस्वदूषणम् ।। २२ ।।
अप्राप्य तं चैव कामं मैथिलीसंगमे कृतम् ।
पतिव्रतायास्तपसा नूनं दग्धोऽसि मे प्रभो ।। २३ ।।

प्राणनाथ! सर्वांगसुंदरी शुभलक्षणा सीता को वन में आप उनके निवास से , छल द्वारा हरकर ले आये,ये आपके लिये बहुत बड़े कलंक की बात थी।मैथिली से संभोग करने की जो आपके मन में कामना थी,वो आप पूरी न कर सके उलट उस पतिव्रता देवी की तपस्या में भस्म हो गये अवश्य ऐसा ही घटा है।।२२-२३।

( युद्धकांड सर्ग १११)

एक पत्नी व्रती भगवान राम और पतिव्रताओं की आदर्श भगवती माता सीता का अपमान करने वाला पेरियार मेरे लिए खलनायक है और रहेगा।

सभी बोलो जय श्री राम।