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हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने लिखा है –
“रामचरितमानस ऐसी रचना है , जिसमें एक भी अलंकार दोष नहीं है । यह गुण किसी भी भाषा के साहित्य में दुर्लभ है ।”

इस देश में जो दो वाक्य शुद्ध बोल नहीं सकता , वह भी रामचरितमानस की समीक्षा कर रहा है । वामपंथी तो अहंकारी हैं ही ।

उन लोगों से पूछना है कि मॉस्को से लेकर क्यूबा तक और कलकत्ता से लेकर केरल तक , कोई वामी साहित्यकार पैदा हुआ है , जो गोस्वामीजी के सामने कमर सीधी करके खड़ा हो सकता है ।।
Ravishankar Singh ji

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बाबरी मस्जिद विध्वंस में अहमद पटेल पीवी नरसिम्हा राव पर इतना गुस्सा थे कि उन्होंने पीवी नरसिम्हा राव को कभी माफ नहीं किया… पीवी नरसिम्हा राव के निधन के पश्चात जब उनका पार्थिव शरीर परंपरा के मुताबिक कांग्रेस कार्यालय में ले जाना था सारी तैयारी हो चुकी थी।

ऐन मौके पर अहमद पटेल ने मना कर दिया।

कहते हैं मरने के बाद किसी व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए लेकिन यह अहमद पटेल ही हमें सिखा कर गए कि व्यक्ति के मरने के बाद भी आप उसका अपमान कर सकते हैं और उन्होंने खुद पी वी नरसिंह राव का अपमान किया था जब उनके पार्थिव शरीर को बीच रास्ते से वापस भेज दिया गया था।

पी वी नरसिंह राव को श्रद्धांजलि देने कई बड़े कांग्रेसी नेता गए लेकिन अहमद पटेल नहीं गए उन्होंने कई बार अपने नजदीकी मित्रों को यह कहा था कि मैं बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए पी वी नरसिंह राव को दोषी मानता हूं और मैं उसे जिंदगी में कभी माफ नहीं कर सकता यहां तक कि मुझे उसके पार्थिव शरीर से भी नफरत थी।

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हमारे राम


एक विचार: हमारे राम*

राम शब्द में दो अर्थ व्यंजित हैं। सुखद होना और ठहर जाना जैसे अपने मार्ग से भटका हुआ कोई क्लांत पथिक किसी सुरम्य स्थान को देखकर ठहर जाता है। हमने सुखद ठहराव का अर्थ देने वाले जितने भी शब्द गढ़े, सभी में राम अंतर्निहित है, यथा आराम, विराम, विश्राम, अभिराम, उपराम, ग्राम
जो रमने के लिए विवश कर दे, वह राम

जीवन की आपाधापी में पड़ा अशांत मन जिस आनंददायक गंतव्य की सतत तलाश में है, वह गंतव्य है राम

भारतीय मन हर स्थिति में राम को साक्षी बनाने का आदी है।

दुःख में हे राम,

पीड़ा में अरे राम,

लज्जा में हाय राम,

अशुभ में अरे राम राम,

अभिवादन में राम राम,

शपथ में रामदुहाई,

अज्ञानता में राम जाने,

अनिश्चितता में राम भरोसे,

अचूकता के लिए रामबाण,

मृत्यु के लिए रामनाम सत्य,

सुशासन के लिए रामराज्य

जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर राम को साथ खड़ा करतीं हैं। राम भी इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं। हर भारतीय उन पर अपना अधिकार मानता है। जिसका कोई नहीं उसके लिए राम हैं- निर्बल के बल राम। असंख्य बार देखी सुनी पढ़ी जा चुकी रामकथा का आकर्षण कभी नहीं खोता। राम पुनर्नवा हैं। हमारे भीतर जो कुछ भी अच्छा है, वह राम है। जो शाश्वत है, वह राम हैं।
सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही तो राम है। घोर निराशा के बीच जो उठ खड़ा होता है, वह भी राम ही है।
🙏

एक बारी प्रेम से बोलो।🙏🏻🙏
जय श्री राम🙏🏻😇

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पेरियार


और यह आदमी खुद 75 साल की उम्र में जब पेशाब की नली लगी थी तब अपनी 30 साल की शिष्या के साथ पेशाब नली के साथ शादी रचाता है यह आदमी रामायण पर अत्यंत घिनौने आक्षेप करता है !

इसकी नजरों में रामायण तो काल्पनिक ग्रंथ है लेकिन शंबूक का वध इसकी लाईव आंखों देखी घटना है !

इसकी नजरों में पिछड़े और दलित यहां के मूल निवासी और राजे महाराजे हैं फिर भी तथाकथित विदेशी आर्यों ने इनका शोषण किया है अर्थात मूलनिवासी इतने कमजोर थे कि वह विदेशियों के सामने हर प्रकार से कायर कमजोर भगोड़े और तुच्छ साबित हुए और अपना सब कुछ तथाकथित विदेशियों को सौंप दिया !

इसकी नजर में पिछड़े और दलित ही मूल निवासी हैं लेकिन पिछड़े वर्ग में आने वाले जाट गुर्जर यादव जैसे अनेक जातियां आज भी इनका शोषण करती हैं और सबसे ज्यादा sc-st की रिपोर्ट इन्हीं जातियों के खिलाफ लिखी जाती है !

अर्थात मूलनिवासी ही मूलनिवासी लोगों पर मुकदमे कायम करके अपना उत्थान कर रहे हैं !

👉 और यह है दलित हित चिंतक और पिछड़ों के मसीहा ?

जब इन लोगों को हम अपना आईकॉन और आदर्श मानकर आंखें मूंदकर जय बोलने लगते हैं और झंडा उठाकर चल देते हैं इसी को अंधविश्वास और अफीम कहा गया है यह खुद अपने वैचारिक प्रकाश और आवरण के बाहर सोचने विचारने और रहन-सहन संस्कृति वाले लोगों को सारी उम्र नीच नीच कहता रहा और वैचारिक समन्वय के लिए इसके पास कभी भी कोई स्थान नहीं रहा अर्थात जो इसकी विचारधारा के विपरीत इसकी कहीं बातों के विपरीत चाहे जो भी हो वह दुष्ट है।

हां इस ब्रह्मांड के तथाकथित सबसे सर्वश्रेष्ठ मजहब के प्रति इसका और इसके फालोवरों का विशेष झुकाव होता है ।

इनके जैसे तथाकथित महापुरुष समाज में समरसता भाईचारा प्रेम को एक कोने में रख कर अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु केवल कुछ सामाजिक त्रुटियों को बखान कर समाज में तुच्छ मानसिकता घृणा आपसी वैमनस्य और सामाजिक बंटवारे का खतरनाक बीज रोप देते हैं ।

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लंकाधीश रावण की एक मांग ))))

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बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की इरामावतारम् में यह कथा है।

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रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था। उसे भविष्य का पता था। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है।

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जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया, तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं।

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खर दूसन मो सम बलवंता।

तिनहि को मरहि बिनु भगवंता॥

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रावण के पास जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया।

जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे।

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लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा।

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स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ।मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ।

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उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।

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रावण ने सविनय कहा:- आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा!

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जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया।

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तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं।

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इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण,वेदज्ञ और शैव रावण को आचार्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है। ”मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।

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”प्रणाम। प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया। ”क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है?”

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“बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है।”

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जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे?

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रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा- “आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है।उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है।राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।”

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जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है।

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रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।

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अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है।

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“यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं।

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विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी।

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अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना।”

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स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य.! यह जान, जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया!

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स्वस्थ कण्ठ से “सौभाग्यवती भव:” कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।

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सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे।

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“आदेश मिलने पर आना” कहकर सीता को उन्होंने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे।

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जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

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“दीर्घायु भव। लंका विजयी भव। ”दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया। सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।

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भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा।

“यजमान। अर्द्धांगिनी कहाँ है? उन्हें यथास्थान आसन दें।”

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श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की, कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।

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“अवश्य-अवश्य,किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं।

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यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है।

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इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो?”

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” कोई उपाय आचार्य?”

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“आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।

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”श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया।

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श्री रामादेश के परिपालन में, विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।”

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अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान।” आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया।

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गणपति पूजन,कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा – लिंग विग्रह?

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यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।

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आचार्य ने आदेश दे दिया:- “विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है।इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।”

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जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया।

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यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया।

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आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।

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अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की।

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श्रीराम ने पूछा:- “आपकी दक्षिणा?”

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पुनः एक बार सभी को चौंकाया आचार्य के शब्दों ने।

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घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है।”

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“लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।”

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“आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे। ”आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।

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“ऐसा ही होगा आचार्य।”

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यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी।

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रघुकुल रीति सदा चली आई।

प्राण जाई पर वचन न जाई॥

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यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए! सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया।

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रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी?

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जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है?

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(श्रीरामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )

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🌹राम से बड़ा राम का नाम🌹

🙏🌹Om Shanti🌹🙏

पुराणों में इस कथा का उल्लेख है कि अश्वमेघ यज्ञ के पूर्ण होने के पश्चात श्री राम ने एक बड़ी सभा का आयोजन किया। सभी राजाओं को उसमें आमंत्रित किया गया।

सभा में आए नारद जी के भड़काने पर एक राजा ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया।

ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने राम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पहले श्रीराम ने उक्त राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को शाप दे देंगे।

श्राप के भयभीत होकर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पहले मारने का प्रण ले लिया।

श्रीराम के प्राण की खबर पाते ही राजा भागा भागा हनुमान जी की माता अंजनी के पास गया और पूरी बात बताए बिना उनसे प्राण रक्षा का वचन मांगा।

माता अंजनी ने हनुमान जी को राजा की जान बचाने का आदेश दिया। हनुमान जी ने श्रीराम की कसम खाकर कहा कि कोई भी राजा का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा।

लेकिन जब राजा ने बताया कि श्रीराम ने ही उन्हें मारने का प्रण किया है तो हनुमान धर्म संकट में फंस गए। हनुमान के सामने धर्म संकट खड़ा हो गया कि वो राजा के प्राण कैसे बचाएं।

अगर राजा को मौत मिलती है तो माता का दिया हुआ वचन पूरा नहीं हो पाएगा। अगर राजा को बचाया तो श्री राम का प्रण पूरा नहीं हो पाएगा और उन्हें शाप मिलेगा।

उलझन में फंसे हनमान जी को एक युक्ति सूझी। हनुमान जी ने राजा से सरयू तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में राजा के पीछे छिप गए।

जब श्री राम राजा को खोजते हुए सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजा राम-राम जप रहा है। राम जी ने सोचा, अरे! ये तो मेरा भक्त है, मैं कैसे इस पर बाण चला सकता हूं।

श्री राम महल को लौट गए और विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अड़े रहे और श्रीराम को फिर से राजा के प्राण लेने के लिए सरयू तट पर लौटना पड़ा।

सारा राज्य देख रहा था कि कैसे श्रीराम दुविधा में फंसे हैं। एक तरफ राजा राम नाम जप रहा है और श्रीराम अपने ही भक्त को मारने के लिए मजबूर हैं।

सभी सोच रहे थे कि ऐसे वक्त में हनुमान को राम के साथ होना चाहिए था। लेकिन हनुमान जी थे कहां, वो तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे।

हनुमान जानते थे कि राम नाम जपते हु‌ए राजा को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं।

राम जी जब फिर से सरयू तट लौटे तो राजा को मारने के लिए शक्ति बाण निकाला लेकिन तब तक राजा हनुमान जी के कहने पर सिया राम सिया राम जपने लगा।

राम जानते थे कि सिया राम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता। वो बेबस हो गए और महल को लौट पड़े। उधर विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर शाप देने को उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा।

इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय‌ सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ साथ ये राजा शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। ऐसे में मेरा कोई अस्त्र इसे मार नहीं पाएगा।

इस संकट को देखकर श्रीराम को मूर्छा आने लगी तो अयोध्या के साध‌ु संतों में खलबली मच गई। तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में नहीं डालना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है।संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया।

मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम को प्रणाम किया।

तब श्रीराम ने कहा कि हनुमान ने इस प्रसंग से साबित किया है कि भक्त की शक्ति हमेशा आराध्य की ताकत बनी है और सच्चा भक्त हमेशा भगवान से बड़ा ही रहेगा।

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मन्दोदरी और विभीषण का रावण के शव पर विलाप मंदोदरी ने विलाप करते हुए बहुत अद्भुत बातें कही सभी राम भक्त जरूर पढ़े

काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना॥। हे पति!(रावण) काल के पूर्ण वश में होने से तुमने किसी का कहना नहीं माना और चराचर के नाथ परमात्मा को मनुष्य करके जाना॥ पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा॥उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना॥ पति की दशा देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगीं। उनके बाल खुल गए, देह की संभाल नहीं रही। वे अनेकों प्रकार से छाती पीटती हैं और रोती हुई रावण के प्रताप का बखान करती हैं॥

तव बल नाथ डोल नित धरनी।

तेज हीन पावक ससि तरनी॥

सेष कमठ सहि सकहिं न भारा।

सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥

भावार्थ:- (वे कहती हैं-) हे नाथ! तुम्हारे बल से पृथ्वी सदा काँपती रहती थी। अग्नि, चंद्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूल में भरा हुआ पृथ्वी पर पड़ा है!॥

बरुन कुबेर सुरेस समीरा।

रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥

भुजबल जितेहु काल जम साईं।

आजु परेहु अनाथ की नाईं॥

भावार्थ:-वरुण, कुबेर, इंद्र और वायु, इनमें से किसी ने भी रण में तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबल से काल और यमराज को भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथ की तरह पड़े हो॥

जगत बिदित तुम्हारि प्रभुताई।

सुत परिजन बल बरनि न जाई॥

राम बिमुख अस हाल तुम्हारा।

रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥

भावार्थ:-तुम्हारी प्रभुता जगत्‌ भर में प्रसिद्ध है। तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियों के बल का हाय! वर्णन ही नहीं हो सकता। श्री रामचंद्रजी के विमुख होने से तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुल में कोई रोने वाला भी न रह गया॥

तव बस बिधि प्रचंड सब नाथा।

सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥

अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं।

राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।।

भावार्थ:-हे नाथ! विधाता की सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे, किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं। राम विमुख के लिए ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात्‌ उचित ही है)॥

काल बिबस पति कहा न माना।

अग जग नाथु मनुज करि जाना॥

भावार्थ:- हे पति! काल के पूर्ण वश में होने से तुमने (किसी का) कहना नहीं माना और चराचर के नाथ परमात्मा को मनुष्य करके जाना॥

छंद :

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं।

जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥

आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।

तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं॥

भावार्थ:-दैत्य रूपी वन को जलाने के लिए अग्निस्वरूप साक्षात्‌ श्री हरि को तुमने मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्‌ को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा। तुम्हारा यह शरीर जन्म से ही दूसरों से द्रोह करने में तत्पर तथा पाप समूहमय रहा! इतने पर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्री रामजी ने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ।

दोहा :

अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।

जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥

भावार्थ:-अहह! नाथ! श्री रघुनाथजी के समान कृपा का समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन भगवान्‌ ने तुमको वह गति दी, जो योगि समाज को भी दुर्लभ है॥

चौपाई :

मंदोदरी बचन सुनि काना।

सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना॥

अज महेस नारद सनकादी।

जे मुनिबर परमारथबादी॥

भावार्थ:-मंदोदरी के वचन कानों में सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभी ने सुख माना। ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी (परमात्मा के तत्त्व को जानने और कहने वाले) श्रेष्ठ मुनि थे॥

भरि लोचन रघुपतिहि निहारी।

प्रेम मगन सब भए सुखारी॥

रुदन करत देखीं सब नारी।

गयउ बिभीषनु मनु दुख भारी॥

भावार्थ:- वे सभी श्री रघुनाथजी को नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्न हो गए और अत्यंत सुखी हुए। अपने घर की सब स्त्रियों को रोती हुई देखकर विभीषणजी के मन में बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गए॥

बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा।

तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा॥

लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो।

बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो॥

भावार्थ:-उन्होंने भाई की दशा देखकर दुःख किया। तब प्रभु श्री रामजी ने छोटे भाई को आज्ञा दी (कि जाकर विभीषण को धैर्य बँधाओ)। लक्ष्मणजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया। तब विभीषण प्रभु के पास लौट आए॥

कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका।

करहु क्रिया परिहरि सब सोका॥

कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी।

बिधिवत देस काल जियँ जानी॥

भावार्थ:-प्रभु ने उनको कृपापूर्ण दृष्टि से देखा (और कहा-) सब शोक त्यागकर रावण की अंत्येष्टि क्रिया करो। प्रभु की आज्ञा मानकर और हृदय में देश और काल का विचार करके विभीषणजी ने विधिपूर्वक सब क्रिया की

दोहा :

मंदोदरी आदि सब देह तिलांजलि ताहि।

भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि॥

भावार्थ:- मंदोदरी आदि सब स्त्रियाँ उसे (रावण को) तिलांजलि देकर मन में श्री रघुनाथजी के गुण समूहों का वर्णन करती हुई महल को गईं॥

मेरे प्रभु राम🌹जय श्री राम हरे राम

साभार रामायण

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लक्ष्मण रेखा


#लक्ष्मण_रेखा🚩🚩

लक्ष्मण रेखा आप सभी जानते हैं पर इसका असली नाम शायद नहीं पता होगा । लक्ष्मण रेखा का नाम (सोमतिती विद्या है)

यह भारत की प्राचीन विद्याओ में से जिसका अंतिम प्रयोग महाभारत युद्ध में हुआ था चलिए जानते हैं अपने प्राचीन भारतीय विद्या को

👉 #सोमतिती_विद्या--#लक्ष्मण_रेखा….

महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि एक वेदमन्त्र है–सोमंब्रही वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति,,

यह वेदमंत्र कोड है उस सोमना कृतिक यंत्र का,, पृथ्वी और बृहस्पति के मध्य कहीं अंतरिक्ष में वह केंद्र है जहां यंत्र को स्थित किया जाता है,, वह यंत्र जल,वायु और अग्नि के परमाणुओं को अपने अंदर सोखता है,, कोड को उल्टा कर देने पर एक खास प्रकार से अग्नि और विद्युत के परमाणुओं को वापस बाहर की तरफ धकेलता है,,

जब महर्षि भारद्वाज ऋषिमुनियों के साथ भृमण करते हुए वशिष्ठ आश्रम पहुंचे तो उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से पूछा–राजकुमारों की शिक्षा दीक्षा कहाँ तक पहुंची है??महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि यह जो ब्रह्मचारी राम है-इसने आग्नेयास्त्र वरुणास्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान करना सीख लिया है,,

यह धनुर्वेद में पारंगत हुआ है महर्षि विश्वामित्र के द्वारा,, यह जो ब्रह्मचारी लक्ष्मण है यह एक दुर्लभ सोमतिती विद्या सीख रहा है,,उस समय पृथ्वी पर चार गुरुकुलों में वह विद्या सिखाई जाती थी,,

महर्षि #विश्वामित्र के गुरुकुल में,,महर्षि #वशिष्ठ के गुरुकुल में,, महर्षि #भारद्वाज के यहां,, और उदालक गोत्र के आचार्य #शिकामकेतु के गुरुकुल में,,

श्रृंगी ऋषि कहते हैं कि लक्ष्मण उस विद्या में पारंगत था,, एक अन्य ब्रह्मचारी वर्णित भी उस विद्या का अच्छा जानकार था,,

सोमंब्रहि वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति- इस मंत्र को सिद्ध करने से उस सोमना कृतिक यंत्र में जिसने अग्नि के वायु के जल के परमाणु सोख लिए हैं उन परमाणुओं में फोरमैन

आकाशीय विद्युत मिलाकर उसका पात बनाया जाता है,,फिर उस यंत्र को एक्टिवेट करें और उसकी मदद से एक लेजर बीम जैसी किरणों से उस रेखा को पृथ्वी पर गोलाकार खींच दें,,

उसके अंदर जो भी रहेगा वह सुरक्षित रहेगा,, लेकिन बाहर से अंदर अगर कोई जबर्दस्ती प्रवेश करना चाहे तो उसे अग्नि और विद्युत का ऐसा झटका लगेगा कि वहीं राख बनकर उड़ जाएगा जो भी व्यक्ति या वस्तु प्रवेश कर रहा हो,,ब्रह्मचारी लक्ष्मण इस विद्या के इतने

जानकर हो गए थे कि कालांतर में यह विद्या सोमतिती न कहकर लक्ष्मण रेखा कहलाई जाने लगी,,

महर्षि दधीचि,, महर्षि शांडिल्य भी इस विद्या को जानते थे,

श्रृंगी ऋषि कहते हैं कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण इस विद्या को जानने वाले अंतिम थे,,

उन्होंने कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में मैदान के चारों तरफ यह रेखा खींच दी थी,, ताकि युद्ध में जितने भी भयंकर अस्त्र शस्त्र चलें उनकी अग्नि उनका ताप युद्धक्षेत्र से बाहर जाकर दूसरे प्राणियों को संतप्त न करे,,

मुगलों द्वारा करोडों करोड़ो ग्रन्थों के जलाए जाने पर और अंग्रेजों द्वारा महत्वपूर्ण ग्रन्थों को लूट लूटकर ले जाने के कारण कितनी ही अद्भुत विधाएं जो हमारे यशस्वी पूर्वजों ने खोजी थी लुप्त हो गई,,जो बचा है उसे संभालने में प्रखर बुद्धि के युवाओं को जुट जाना चाहिए, परमेश्वर सद्बुद्धि दे हम सबको…..

🚩 जय जय श्री राम 🚩

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राम नाम का जप क्यों?


राम नाम का जप क्यों?

र+आ+म=राम मधुर, मनोहर, मनोरंजक, विलक्षण, चमत्कारी जिसकी महिमा तीन लोक से न्यारी है। रामचरितमानस के बालकांड के वंदना प्रसंग में कहा गया है – नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू। मतलब यह है कि कलियुग में न तो कर्म का भरोसा है, न भक्ति का और न ज्ञान का ही, बल्कि केवल राम नाम ही एक सहारा है।

पद्मपुराण में कहा गया है

रामेति नाम यच्छोत्रे विश्रम्भादागतं यदि। करोति पापसंदाहं तूलं वहिकणो यवा ॥

-पद्मपुराण पातालखंड 20/80

अर्थात् जिसके कानों में राम यह नाम अकस्मात् भी पड़ जाता है, उसके पापों वह वैसे ही को जला देता है, जैसे अग्नि की चिंगारी रुई को।

पद्मपुराण में यह भी लिखा

राम रामेति रामेति रामेति च पुनर्जपन् ।

स चाण्डालोऽपि पूतात्मा जायते नात्र संशयः ॥

कुरुक्षेत्रं तवा काशी गया वे द्वारका तथा।

सर्वतीर्य कृतं तेन नामोच्चारणमात्रतः ॥

पद्मपुराण उत्तराखंड 71 20-21

अर्थात् राम, राम, राम, राम-इस प्रकार बार-बार जप करने वाला चाण्डाल हो तो भी वह पवित्रात्मा हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है। उसने केवल नाम का उच्चारण करते ही कुरुक्षेत्र, काशी, गया और द्वारका आदि संपूर्ण तीर्थों का सेवन कर लिया।

स्कंदपुराण में भगवान् शंकर देवी पार्वती से कहते हैं।

रामेति द्वयक्षरजपः सर्वपापापनोदकः। गच्छन्तिष्ठन् शयनो वा मनुजो रामकीर्तनात् ॥

इड निर्वर्तितो याति चान्ते हरिगणो भवेत् ।

-स्कंदपुराण/नागरखंड

अर्थात् ‘राम-यह दो अक्षरों का मंत्र जपे जाने पर समस्त पापों का नाश करता है। चलते, बैठते, सोते (जब कभी भी) जो मनुष्य राम-नाम का कीर्तन करता है, वह यहां कृतकार्य होकर जाता है और अंत में भगवान् हरि का पार्षद बनता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जो शक्ति भगवान् की है, उससे भी अधिक शक्ति भगवान् के नाम की है। नाम जप की तरंगें हमारे अंतर्मन में गहराई तक उतरती हैं। इससे मन और प्राण पवित्र हो जाते हैं, शक्ति-सामर्थ्य प्रकट होने लगती है, बुद्धि का विकास होने लगता है, सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, मनोवांछित फल मिलता है, सारे कष्ट दूर होते हैं, संकट मिट जाते हैं, मुक्ति मिलती है, भगवत्प्राप्ति होती है, भय दूर होते हैं, लेकिन जरूरत है, तो बस सच्चे हृदय और पवित्र मन से भगवान नाम लेने की।

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जब श्री राम जी और सीता माता की शादी हुई थी तो राम जी उम्र 25 वर्ष और सीता माता की उम्र 18 वर्ष थी। इसका उल्लेख रामायण में भी है।

अब आते हैं अपने मूल प्रश्न पर जिसका उल्लेख अन्य मजहब के लोग हिंदू धर्म को अपमानित करने के लिए करते हैं।


अगर किसी ने वाल्मिकी रामायण या रामचरितमानस पढ़ी है तो इसमें साफ साफ संस्कृत में लिखा है की श्री राम जी और सीता माता की शादी के वक्त आयु 25 साल और 18 साल थी।

आईए समझते हैं हमारे धर्म ग्रंथों में क्या लिखा है


राम सीता विवाह का उल्लेख वाल्मिकी रामायण में
जिसने भी रामायण या हिन्दू ग्रन्थ पढ़े हैं उसको पता है की हिंदुओं में मनुष्य के जीवन को चार खंडों में बांटा गया है।

पहला चरण होता है ब्रह्चर्य जिसकी शुरुआत जन्म से लेकर 25 वर्ष तक रहती है।


उसके उपरांत आता है गृहस्थ जीवन जिसकी शुरुआत 25 साल से 50 साल तक होती है।

उसके उपरांत आता है वानप्रस्थ जीवन जिसकी शुरुआत 50 साल से 75 साल तक होती है।


फिर अंत में आता है सन्यास जीवन जिसकी शुरुआत 75 साल से 100 साल या मृत्यु तक रहती है।

अनादि काल से हिन्दू इसी को मानते आ रहें हैं और सभी हिन्दू ग्रंथों में भी यही लिखा है।


तो आप अब स्वयं सोच सकते हैं की जब श्री राम स्वयं 25 साल तक गुरुकुल में रहे तो वो 14 साल में शादी कैसे कर सकते हैं।

शादी की आयु ग्रहस्थ जीवन यानी की 25 साल से शुरू होती है।


राम जी की शादी के समय आयु 25 साल की थी और सीता माता की 18 साल।

अब आपको एक दूसरा तथ्य बताते हैं जो की रामायण में लिखा है।

रामायण में भी राम सीता के विवाह की आयु क्रमश: 25 और 18 वर्ष लिखी है। वाल्मिकी रामायण के अरण्य काण्ड में सीता जी ने स्वयं अपनी आयु बताई है।

उन्होने कहा है की जब उनका विवाह श्री राम जी के साथ हुआ तो उनकी उम्र 18 साल थी और श्री राम जी की 25 साल।

हिन्दू धर्म में जब शिक्षा देने की शुरुआत होती है तो उसे उपनयन (शिक्षा की दीक्षा) या द्विज (दूसरा जन्म) माना जाता है।

क्षत्रिय में यह 11 वर्ष से शुरू होता है और 25 वर्ष तक रहता है।

इसके पहले विवाह नहीं होता और श्री राम जी का उपनयन संस्कार भी उसी तरह हुआ था तो स्पष्ट है की श्री राम जी की शादी जब हुई तो उनकी उम्र 25 वर्ष थी।

स्त्रियों की शिक्षा हमारे शास्त्रों और ग्रंथों के अनुसार 8 साल से 18 तक होती है और उसके पहले शादी नहीं की जाती।

इसलिए जब सीता माता की शादी हुई थी तब उनकी उम्र 18 वर्ष थी।

बहुत से लोग ये तर्क देते हैं की पहले जमाने में शादी कम उम्र में हो जाती थी लेकिन ये सच नहीं है।

भारत वर्ष में मुगलों के आक्रमण के पहले कम उम्र में शादी का उल्लेख कहीं भी नहीं है।

मुगलों के हमले जब भारत में शुरू हुए तभी से बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथा शुरू हुई।

क्योंकि मुगल बहुत ही बर्बर और असभ्य थे वो बच्चियों तक का रेप करके उनको मार देते थे और उठा ले जाते थे।

इसलिए बच्चियों की कम उम्र में ही शादी कर दी जाती थी और सती प्रथा का भी यही कारण था।

आपने इतिहास में पढ़ा ही होगा की कैसे रानी पद्मावत ने जौहर (सती) किया था ताकि वो बर्बर आक्रमणकारी खिलजी के हाथ में ना आ सकें।

इसी तरह कई अन्य रानियों ने भी जौहर (सती) किया था ताकि उनका अपमान ना हो।