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नेशनल हेराल्ड


“नेशनल हेराल्ड” केस क्या है आसान शब्दों में जानिए…❗

जवाहर लाल नेहरू ने #नेशनल हेराल्ड नामक अखबार सन १९३० में शुरू किया, धीरे-धीरे इस अखबार ने ५००० करोड़ ₹ की संपत्ति अर्जित कर ली, आश्चर्य की बात ये है कि इतनी संपत्ति अर्जित करने के बावजूद भी सन् २००० मे यह अखबार घाटे में चला गया और इस पर ९० करोड़ का कर्जा हो गया…

“नेशनल हेराल्ड” के तत्कालीन डायरेक्टर्स, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और मोतीलाल वोरा ने, इस अखबार को यंग इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी को बेचने का निर्णय लिया…

मज़े की बात ये कि, यंग इंडिया के डायरेक्टर्स थे, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, ऑस्कर फेर्नाडीज़ और मोतीलाल वोरा…

डील यह थी कि यंग इंडिया, #नेशनल हेराल्ड के ९० करोड़ के कर्ज़ को चुकाएगी और बदले में ५००० करोड़ रुपए की अचल संपत्ति यंग इंडिया को मिलेगी…

इस डील को फाइनल करने के लिए नेशनल हेराल्ड के डायरेक्टर मोती लाल वोरा ने “तत्काल” यंग इंडिया के डायरेक्टर मोतीलाल वोरा से बात की, क्योंकि वह अकेले ही, दोनों ही कंपनियों के डायरेक्टर्स थे… 😎

अब यहाँ एक और नया मोड़ आता है, ९० करोड़ का कर्ज़ चुकाने के लिए #यंग इंडिया ने कांग्रेस पार्टी से ९० करोड़ का लोन माँगा…

इसके लिये कांग्रेस पार्टी ने एक मीटिंग बुलाई जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और कांग्रेस पार्टी के महासचिव शामिल हुए…

और यह वरिष्ठ लोग कौन थे…?
सोनिया, राहुल, ऑस्कर और मोतीलाल वोरा…

आखिरकार कांग्रेस पार्टी ने लोन देना स्वीकार कर लिया, और इसको कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने पास भी कर दिया और #यंग इंडिया के डायरेक्टर मोतीलाल वोरा ने ले लिया और आगे #नेशनल हेराल्ड के डायरेक्टर मोतीलाल वोरा को दे दिया…

अभी कुछ और मज़ा बाकी था…
अब कांग्रेस पार्टी ने एक मीटिंग और बुलाई जिसमें सोनिया, राहुल, ऑस्कर और वोरा साहब सम्मलित हुए…
उन्होंने मिलकर यह तय किया कि #नेशनल हेराल्ड ने आज़ादी की लड़ाई में बहुत सेवा की है इसलिए उसके ऊपर ९० करोड़ के कर्ज़ को माफ़ कर दिया जाए और इस तरह ९० करोड़ का छोटा सा कर्ज माफ़ कर दिया गया…
और इस तरह से #यंग इंडिया जिसमें ३६ प्रतिशत शेयर सोनिया और राहुल के हैं और शेष शेयर ऑस्कर और वोरा साहब के हैं, को, ५००० करोड़ रूपए की संपत्ति मिल गई…

जिसमें, एक ११ मंज़िल बिल्डिंग जो बहादुर शाह जफ़र मार्ग दिल्ली में और उस बिल्डिंग के कई हिस्सों को अब पासपोर्ट ऑफिस सहित कई ऑफिसेस को किराये पर दे दिया गया है…

इसको कहते हैं #राख के ढेर से महल# खड़ा कर लेना।

राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी इसी #नेशनल हेराल्ड केस में ५००० करोड़ के घोटाले में पिछ्ले कुछ सालों से जमानत पर घूम रहे हैं…

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Diego Garci


Diego Garcia एक टापू है जिस पर इंग्लैंड का कब्जा है और जो मॉरीशस का है.

Diego Garcia वही टापू है जिसका जिक्र मैंने MH370 के गायब होने पे किया था

इस टापू को इंग्लैंड ने अमेरिका को दिया हुआ है और अमेरिका ने इस पर अपना सैन्य अड्डा बना रखा है. अभी पिछले कुछ दिनों पूर्व मॉरीशस इंटरनेशनल कोर्ट के अंदर इंग्लैंड और अमेरिका से यह केस जीत गया है और उसने अमेरिका को इसे खाली करने के लिए कह दिया है.

सनद रहे कि इस अमेरिका के लाखों करोड़ों डॉलर इस सैन्य अड्डे को डिवेलप करने में लगे हुए हैं और स्ट्रैटेजिक दृष्टि से ईस्ट ओर वेस्ट पर नजर रखने के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है. अब अमेरिका भारत को रिक्वेस्ट कर रहा है कि भारत अपना मॉरीशस पर प्रभाव को यूज करते हुए उसको इस अड्डे पर बने रहने के लिए मॉरीशस पर दबाव बनाए और अगले 100 सालों के लिए इसको अमेरिका को लीज पर दे दे. उसके बदले में अमेरिका बहुत बड़ी रकम देने को तैयार है.

मेरा इस पोस्ट को लिखने का अभिप्राय सिर्फ इतना है की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण दो महाशक्तियां आज भारत को अपने पाले में देखना चाहती है और अपने बड़े बड़े मसलों को हल करने के लिए भारत की सहायता मांगती है. यह सब देखते भालते हुए भी लोगों को लगता है कि भारत के अच्छे दिन अभी नहीं आए कोई इनसे पूछे की अभी कितने अच्छे दिन इनको चाहिए.आपका क्या ख्याल है ❓

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30 A


આના પર કોઈ કોમેંટ?

કાયદો 30 A

મોદીજી નેહરુના હિંદુઓ સાથેના વિશ્વાસઘાતને સુધારવાની તૈયારી કરી રહ્યા છે.

શું તમે “કાયદો 30”, “કાયદો 30 A” વિશે સાંભળ્યું છે ????
શું તમે જાણો છો કે “30A” નો અર્થ શું છે?

વધુ જાણવા માટે વિલંબ કરશો નહીં……

30A એ બંધારણમાં સમાવિષ્ટ કાયદો છે*
જ્યારે નહેરુએ આ કાયદાને બંધારણમાં સામેલ કરવાનો પ્રથમ પ્રયાસ કર્યો ત્યારે સરદાર વલ્લભભાઈ પટેલે તેનો ઉગ્ર વિરોધ કર્યો.

સરદાર પટેલે કહ્યું, “આ કાયદો હિન્દુઓ સાથે મોટો વિશ્વાસઘાત છે, તેથી જો આ ગુર્નેય કાયદો બંધારણમાં લાવવામાં આવશે, તો હું કેબિનેટ અને કોંગ્રેસ પાર્ટીમાંથી રાજીનામું આપીશ… પછી હું આ વિશ્વાસઘાત સામે લડીશ. તમામ ભારતીયો સાથે કામ કરો… આગળથી.. “

સરદાર પટેલના નિશ્ચય સમક્ષ નેહરુએ ઘૂંટણિયે પડવું પડ્યું કમનસીબે.. મને ખબર નથી કે કેવી રીતે.. થોડા મહિનામાં સરદાર વલ્લભભાઈ પટેલનું અણધાર્યું અવસાન થયું…

પટેલના મૃત્યુ પછી, નેહરુએ આ કાયદાનો બંધારણમાં સમાવેશ કર્યો.

ચાલો હું તમને 30 A ના લક્ષણો જણાવું.

આ કાયદા હેઠળ – હિંદુઓને હિંદુઓમાં તેમનો “હિંદુ ધર્મ” શીખવવાની મંજૂરી નથી. “કાયદો 30A” તેને પરવાનગી કે સત્તા આપતો નથી…. તો પછી હિંદુઓએ પોતાની ખાનગી કોલેજોમાં હિંદુ ધર્મ ન ભણાવવો જોઈએ… હિંદુ ધર્મ શીખવવા માટે કોલેજો શરૂ કરવી જોઈએ નહીં…. હિંદુ ધર્મ શીખવવા માટે હિંદુ શાળાઓ શરૂ કરવી જોઈએ નહીં. અધિનિયમ 30A હેઠળ સરકારી શાળાઓ કે કોલેજોમાં હિંદુ ધર્મના શિક્ષણની પરવાનગી નથી….

પરંતુ.. વિચિત્ર વાત એ છે કે આની સાથે (30A સાથે) એક બીજો કાયદો છે જે નેહરુએ તેમના બંધારણમાં ઘડ્યો હતો – “અધિનિયમ 30”. આ “કાયદો 30” અનુસાર મુસ્લિમો તેમના ધાર્મિક શિક્ષણ માટે ઇસ્લામિક ધાર્મિક શાળાઓ શરૂ કરી શકે છે અને શરૂ કરી શકે છે….. મુસ્લિમો તેમનો ધર્મ શીખવી શકે છે…. કાયદો 30 મુસ્લિમોને તેમની પોતાની ‘મદ્રેસા’ શરૂ કરવાની સંપૂર્ણ સત્તા અને પરવાનગી આપે છે. ….અને બંધારણની કલમ 30 ખ્રિસ્તીઓને તેમની પોતાની ધાર્મિક શાળાઓ અને કોલેજો સ્થાપવા અને મુક્તપણે તેમના ધર્મનું શિક્ષણ અને પ્રચાર કરવાની સંપૂર્ણ સત્તા અને પરવાનગી આપે છે…!!

આનું બીજું કાનૂની પાસું એ છે કે હિંદુ મંદિરોના તમામ પૈસા અને સંપત્તિ સરકારની ઇચ્છા પર છોડી શકાય છે…. હિંદુ મંદિરોમાં હિંદુ ભક્તો દ્વારા કરવામાં આવતા તમામ નાણાં અને અન્ય દાન રાજ્યની તિજોરીમાં લઈ શકાય છે. …. …

તે જ સમયે મુસ્લિમ અને ખ્રિસ્તી મસ્જિદોમાંથી દાન અને દાન સંપૂર્ણપણે ખ્રિસ્તી-મુસ્લિમ સમુદાયને આપી શકાય છે…. આ રીતે આ “લો 30” ની વિશેષતાઓ છે..*તેથી "કાયદો 30A" અને "કાયદો 30" એ સ્પષ્ટ ભેદભાવ અને હિંદુઓ સાથેનો સ્પષ્ટ વિશ્વાસઘાત છે.*

દરેક વ્યક્તિએ આ સારી રીતે જાણવું અને સમજવું જોઈએ…

અન્યની જાગૃતિ આપણે દરેક સનાતન ધર્મના રક્ષક બનીશું.. વાંચો, જાણો અને ફેલાવો

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होलकर


बात है 1948 की ………..जब होलकर राजघराने का वारिस चुनने की बात चली ……….तो जाहिर है, बेटा ही वारिस बनेगा……….पर यहीं पेच फस गया।

यशवंतराव द्वितिय ने 2 विवाह किए थे………. एक भारतीय महिला से और एक अमेरिकन महिला से।
भरतीय महिला की बेटी थी उषा राजे होलकर।जबकि अमेरिकन महिला के बेटे थे शिवाजी राजे होलकर जो रिचर्ड होलकर के नाम से प्रसिध्द थे ।

रिचर्ड को वारिस बनाने का वक्त आया तब उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरू,गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल और राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने साथ मे बैठकर निर्णय किया कि होलकर का वारिस रिचर्ड नही बन सकता क्योंकि वो खुद एक विदेशी महिला की संतान है।

इस लिए वारिस बेटी उषा राजे होलकर को बनाया गया।
हालांकि रिचर्ड को सम्पति में हिस्सा मिला।उनके बेटे का नाम यशवंत होलकर है।जिनकी शादी गोदरेज घराने की बेटी से हुई है।रिचर्ड की बेटी सबरीना की शादी गोआ के राजघराने में हुई है।

तन मन धन से भरतीय रिचर्ड को वारिस नही बनाया गया……… क्योंकि उस वक्त के pm ने ये नही चाहा कि कोई विदेशी महिला की औलाद इस देश मे राजकाज करे ।
तो अब सवाल ये उठता है कि ये कोंग्रेसी किस मुह से पप्पू गांधी को pm बनवाना चाहते है।
क्या वो भूल गए अपने खुद के दल के सुपर पावर अध्यक्ष ने क्या निर्णय लिया था ????????
भाई अपने को तो नेहरू का ये निर्णय भोत पसन्द आया।
इस बात पर गौर करना चाहिए ।राहुल को pm बनने से रोकने के लिए उनके नाना का फैसला ही दिखा देना चाहिए। भावेश संसारकर

रिपोस्ट

चित्र :रिचर्ड होलकर

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भाजपा सत्ता में आई, उसमें गुजरात का बहुत बड़ा योगदान है!

गुजरात को मीडिया के लोग “हिंदुत्व की प्रयोगशाला” कहते थे!

गुजरात पहला राज्य है, जहां भाजपा सत्ता में आई, और जिस जमाने में भाजपा के केवल दो संसद सदस्य थे! उसमें से एक मेहसाना से थे!

आपको जानकर बड़ा आश्चर्य होगा, कि गुजरात में भाजपा सत्ता में कैसी आई?

मित्रों, गुजरात में भाजपा को सत्ता में लाने में कुख्यात “माफिया डॉन अब्दुल लतीफ” का बहुत बड़ा योगदान है

अगर अब्दुल लतीफ नहीं होता, तो संभव है भाजपा सत्ता में नहीं आती!

अब्दुल लतीफ इतना कुख्यात डॉन था, कि उसने सबसे पहले एके-५६ का उपयोग किया था! और १२ पुलिस कर्मियों सहित, १५० से अधिक नागरिकों का वध किया था, जिसमें “राधिका जिमखाना” वध बहुत प्रसिद्ध हुआ था!

जब “राधिका जिमखाना” क्लब में लतीफ ने अंधाधुंध गोलीबारी करके, एक साथ ३५ नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया था!

लतीफ के ऊपर कांग्रेस और जनता दल दोनों के नेताओं का वरदहस्त था!

लतीफ की इतनी पहुंच थी, कि वह मुख्य मंत्री चिमन भाई पटेल के चेंबर में, बगैर अपॉइंटमेंट के, चला जाता था, और तस्करी, सोने चांदी की स्मगलिंग, ड्रग्स की स्मगलिंग, इत्यादि में अरबों रुपए कमाये, और उसमें नेताओं को हिस्सा जाता था!

यदि लतीफ या लतीफ के गैंग के किसी गुर्गे को कोई हिंदू लड़की पसंद आ जाती थी, तो वो रातों-रात उठा ली जाती थी!

लतीफ, जब चाहे तब, किसी हिंदू का बंगला, दुकान खाली करवा लेता था! उस समय भाजपा गुजरात में संघर्ष के दौर में थी

नरेंद्र मोदी, शंकर सिंह वाघेला, केशुभाई पटेल साइकिल स्कूटर पर, चप्पल पहन कर घूमते थे!

एक दिन, गोमतीपुर में भाजपा की एक सभा थी! भाषण देते देते, केशुभाई पटेल ने जोश में बोल दिया, कि जब भाजपा की सरकार आएगी, तब अब्दुल लतीफ का एनकाउंटर करवा दिया जाएगा! बोलने के बाद, वह डर गए! उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई! लेकिन गुजरात की जनता के अंदर एक संदेश चला गया, कि आखिर यह कौन से पार्टी के नेता हैं, जो अब्दुल लतीफ के गढ़ में, उसका इनकाउंटर करने की बात कर रहे हैं?

केशुभाई पटेल के इस भाषण के बाद, जब चुनाव हुए, तब गुजरात में भाजपा की ३५ सीटे आई, जो अपने आप में बहुत बड़ी विजय थी!

उसके बाद, भाजपा ने अब्दुल लतीफ और उसके गुर्गों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया, और अगले चुनावों में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई! और अपने वायदे के अनुसार, शंकर सिंह वाघेला ने अब्दुल लतीफ का एनकाउंटर करवा दिया!

अब्दुल लतीफ का एनकाउंटर भी बड़े जोरदार तरीके से हुआ था! शंकर सिंह वाघेला के सामने डीएसपी जाडेजा आए, और बोले सर लतीफ का एनकाउंटर करना चाहता हूं, क्योंकि इसने मेरे इंस्पेक्टर झाला का मर्डर किया था, जब वह अपनी गर्भवती पत्नी को देखने छुट्टी पर जा रहा था!

अब्दुल लतीफ को गिरफ्तार किया गया! और नवरंगपुरा स्थित पुराने उच्च न्यायालय में उसकी पेशी होनी थी! पेशी के पहले, डीएसपी जडेजा ने कहा, “दाबेली खाओगे?” लतीफ ने हां बोला, तो उसकी हथकड़ी खोल दी गई! और फिर उसे ८ गोलियां मार दी गई! और मीडिया में कह दिया गया, लतीफ ने नाश्ता करने के लिए हथकड़ी खुलवाई, और भागने का प्रयास किया! जिसके फलस्वरूप वह मारा गया!

उसके बाद, शंकरसिंह वाघेला ने एक और बहुत अच्छा काम किया, कि उन्होंने “अशांत धारा एक्ट” लागू कर दिया, यानी गुजरात के विभिन्न शहरों में बहुत से विस्तार चिन्हित कर दिए गए! और इन विसतारों में किसी हिंदू की संपत्ति, कोई मुस्लिम नहीं खरीद सकता!

और उसके बाद भाजपा गुजरात से होती हुई मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बंगाल, इत्यादि अन्य कई जगह बढ़ती चली गई! और आज केंद्र में ३०३ बैठकों के साथ सत्ता में है!

जब एक हिन्दू जागता है, और दूसरे सोये हुए हिन्दुओं को जगाता है, तब ये गुजरात वाला वातावरण बनता है!

जब केशूभाई ने लतीफ का एनकाउंटर करने की घोषणा की थी, गुजरातियों ने बिना किसी प्रश्न-उत्तर के भाजपा को अपना भरपूर समर्थन किया था!

अगर पूरे देश में गुजरात वाला परिणाम हिन्दुओं को चाहिए, तो सभी को वही करना होगा, जो तब गुजरातियों ने किया था!

इसीलिए भाजपा और मोदी को, बिना प्रश्न किये, साथ दें! तभी पूरे देश में से लतीफों का सफाया मोदीजी और भाजपा कर पाएंगे!

गुजराती नागरिक सदैव दूर की सोचते हैं, और ये एक पाठ देशवासियों को, और विशेष कर हिन्दुओं को, उनसे सीखना होगा!

छोटी-छोटी बातों में मोदीजी और भाजपा का विरोध न करें! बल्कि उन्हें अपना पूरा समर्थन दें! ताकि वे अपना काम पूरी प्रामाणिकता से कर सकें!
🤔 🤔 🤔

ll जय श्री राम ll

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ઇમરજન્સી


આજે તારીખ 25 જૂન – ઇમર્જન્સીને આજે 46 વર્ષ થયા.. ભારતની લોકશાહી ઉપર કટોકટી લાદી દેનાર કોંગ્રેસના કોફીનને વર્તમાન સમયમાં એક બાદ એક ખીલા ઠોકાઈ રહ્યા છે. ત્યારે 46 વર્ષ પેહલા શું બન્યું હતું તે નવી પેઢીએ જાણવું એટલું જ જરૂરી છે. બન્યું હતું એવું કે માર્ચ 1971ની સામાન્ય ચૂંટણીમાં ‘ગરીબી હટાઓ’ના નારા સાથે કોંગ્રેસે 518માંથી 352 બેઠક મેળવી પ્રચંડ બહુમતી હાંસલ કરી. ડિસેમ્બર 1971માં ભારતે પાકિસ્તાનને યુદ્ધમાં કારમી હાર આપી હતી અને દુનિયાના નકશામાં બાંગ્લાદેશ અસ્તિત્વમાં આવ્યું. ઇદિંરા ગાંધી 1971 ની લોકસભાની ચૂંટણી રાયબરેલી બેઠક ઉપર 71,499 વિરુદ્ધ 1,83,309 મતે વિજેતા જાહેર કરાયા ત્યારે પરાજિત ઉમેદવાર સંયુક્ત સમાજવાદી પક્ષના ‘લોકબંધુ’ તરીકે ઓળખાતા ભૂતપૂર્વ સવાતંત્ર સેનાની હતા રાજ નારાયણે ઇંદિરા ગાંધી ઉપર આચારસંહિતા બાબતે અલાહાબાદ હાઇકોર્ટેમાં કેસ કયૉ હતો જે ચાલી રહ્યો હતો. જેમાં ઇંદિરા ગાંધી સામે અદાલતમાં બે આરોપ મુકાયા હતાં. એક કે નવી દિલ્હી ખાતે વડાપ્રધાન સચિવાલયમાં ફરજ બજાવતા યશપાલ કપૂર પાસે ચુંટણી પ્રચારનું કામ કરાવવું. કેમકે કાયદા મુજબ સરકારી અધિકારીને અંગત કામે લગાડી શકાય નહીં. બીજું કે રાય બરેલીમાં ચૂંટણી સભાઓ માટે જે મંચ તૈયાર થયાં હતાં એમાં ઉત્તરપ્રદેશના સરકારી કર્મચારીઓ પાસે કામ લેવામાં આવ્યું હતું. રાજ નારાયણનો કેસ એડવોકેટ શાંતિ ભૂષણ (પ્રશાંત ભૂષણના પિતા) લડી રહ્યા હતા. ઇંદિરા ગાંધીએ વી.એ.ખેર ને કેસ સોંપ્યો. આ કેસ જસ્ટિસ જગમોહનલાલ સિંહા સામે ચાલી રહ્યો હતો. જેઓ ઇમાનદાર માણસ હતા.જસ્ટિસ સિંહાએ માચૅ 1975 દરમ્યાન વડાપ્રધાનને અદાલતમાં હાજર થવા સમન્સ પાઠવ્યું. 18 માચૅ 1975ના રોજ ઇંદિરા ગાંધી અદાલતમાં હાજર થઇને જવાબ આપવા કઠેડામાં 5 કલાક ઉભા રહ્યા. ઇંદિરા ગાંધી માટે આ કેસ જીતવો પ્રતિષ્ઠાનો પ્રશ્ર બની ગયો. તેમણે જસ્ટિસ સિંહાને ઉત્તરપ્રદેશના કોગ્રેસી સાંસદ સભ્ય દ્રારા રુપિયા 5,00,000 માં ખરીદવાની કોશિશ કરી જે નિષ્ફળ ગઈ. બીજી કોશિશમાં તેમણે અલ્હાબાદ હાઇકોર્ટેના ચીફ જસ્ટિસ ડી.એસ.માથુર દ્વારા ઓફર મોકલી સુપ્રીમ કોર્ટેમાં જસ્ટિસ પદ આપવાની વાત કરી. પણ બંને વાત જનતા વચ્ચે પહોંચી ગઈ. કોઈ કીમિયો કામ ન લાગતા આખરે જસ્ટિસ સિંહા બંગલા પર આઈબીની વૉચ ગોઠવી દેવાઈ અને જસ્ટિસ સિંહાના સ્ટેનોગ્રાફર નેગી રામ નિગમને એરેસ્ટ કરીને ટોર્ચર કરવામાં આવ્યા. હેતુ હતો ચુકાદો શું આવવાનો છે તે અગાઉથી સ્ટેનોગ્રાફર પાસથી જાણી લેવાનો. જો કે તે બાદ પણ સફળતા ના મળી. 12, જૂન 1975ને દિવસે જસ્ટિસ સિંહાએ ઇંદિરા ગાંધી વિરુધ્ધ ચુકાદો આપ્યો. જેમાં ઇંદિરા ગાંધીની જીતને રદ કરી સાથે પ્રતિબંધ ફરમાવ્યો કે આગામી છ વષૅ સુધી તેઓ કોઈ પણ પ્રકારની ચૂંટણી લડી શકે નહીં. ઇન્દિરા ગાંધીના વકીલે ચુકાદાના વિરુધ્ધ માં સ્ટે માગ્યો જેમાં ચુકાદા સામે 20 દિવસ માટે સ્ટે મળ્યો. ચુકાદો આવ્યો તે સાથે જુન 23ના રોજ વિરોધપક્ષોએ જયપ્રકાશ નારાયણના નેતૃત્વમાં રેલી કાઢી જેનું નામ હતું “અહંકાર રેલી”. જેમાં જયપ્રકાશે પોલીસ તથા સૈન્યને કહ્યું કે તેમણે સરકારના ‘ગેરકાયદે’ હુકમો માનવા નહીં. આ નિવેદનનો લાભ લેવા સંજય ગાંધીનું કુટિલ દિમાગ કામ કરી ગયું અને તેમના મતે સંવિધાનની કલમ 352 મુજબ ઇમર્જન્સી લગાવવાનું આ સારું બહાનું હતું. દરમ્યાન હાઇકોર્ટના ચુકાદા સામે ઇન્દિરા ગાંધી સુપ્રીમ કોર્ટ ગયા હતા જ્યાં જસ્ટિસ વી.કે. કૃષ્ણા ઐયરે 24 જૂન, 1975ના દિવસે હાઇકોર્ટના નિર્ણયને યોગ્ય ગણાવીને સાંસદ તરીકે ઇન્દિરા ગાંધીને મળતી તમામ સુવિધાઓ પર પ્રતિબંધ મૂકી દીધો જે પછી ઇંદિરાગાંધી ચારે બાજુથી ચુકાદાનો અમલ કરવાની જવાબદારીમાં ધેરાયેલા હતા. જે બાદ સફદરજંગ રોડ ઉપર આવેલા વડાપ્રધાનના સત્તાવાર નિવાસસ્થાને મિટિંગોનો દોર ચાલુ થયો. કોંગ્રેસ પ્રમુખ દેવકાંત બરુઆ, સિધ્ધાર્થ શંકર રાય, બાબુ જગજીવનરામ, યશવંત ચવાણ, ડૉ. કીરણસિંહ, સંજય ગાંધી અને રાજીવ ગાંધી સાથે જેમને કારણે ઇન્દિરા મુશ્કેલીમાં મુકાયા હતા તે યશપાલ કપૂર. સંજય ગાંધીના મતે રાજીનામુ આપવાને સ્થાને કલમ 352 મુજબ કટોકટી લાદવા નિર્ણય લેવાનો હતો. તે સમેયે કોંગ્રેસ ઉપર સંજય ગાંધીનો ભારે પ્રભાવ હતો તેથી તેમની વાતને કોઈ નકારી શક્યું નહીં. સરકાર સમક્ષ સિદ્ધાર્થ શંકર રાયે ઇમર્જન્સીનો પ્રસ્તાવ મુક્યો. જેને ઇંદિરા ગાંધીએ ટેકો જાહેર કર્યો પછી જરૂર હતી માત્ર રાષ્ટ્રપતિની સહીની ઔપચારિકતાની. ઇંદિરા ગાંધીના અહેસાન તળે દબાયેલા રાષ્ટપતિ ફકરુદીન્ અલી એહમદે જૂન 25, 1975ના રોજ ઇમર્જન્સીના ઘોષણાપત્ર પર સહી કરી દીધી. ઇમર્જન્સીની પૂર્વ તૈયારીઓ સંજય ગાંધી અને તેમનું જૂથ RAWના ગુપ્તચરો સાથે મળીને કયારના કરી ચૂક્યા હતા. દેશની નિર્દોષ પ્રજા ઉપર ઇમર્જન્સી ઠોકી બેસાડ્યાના પ્રથમ 72 કલાકમાં હજારો નિર્દોષ માણસોને જેલમાં ધકેલી દેવામાં આવ્યા. એક સપ્તાહમાં જ આવા કેદીઓની સંખ્યા 1,10,000 થઇ ગઈ. ન્યાયપાલિકાની સત્તા ખતમ કરી દેવામાં આવી. પોલીસ કે સરકારી અધિકારીના જનતા સામેના કોઈ પણ વર્તન બાબતે કોર્ટમાં ન જઈ શકાય. કોઈ પણ કારણ વગર કોઈને પણ ગમે તે રીતે પકડીને પોલીસ જેલમાં નાખી દે. પરિવારને કે લગતા વળગતાને જાણ સુદ્ધાં કરી ન શકાય. પ્રેસની સ્વતંત્રતા સંપૂર્ણપણે છીનવી લેવામાં આવી. સરકારના બાતમીદાર ચારેબાજુ ફરતા રહેતા. લગભગ તમામ લોકપ્રિય વ્યક્તિઓના ફોન ટેપ કરવામાં આવતા. દેશની સુપ્રીમ કોર્ટે નિવેદન આપ્યું કે ભારતમાં હવે right to life પણ નથી રહ્યો. નાગરિકને વાંક ગુના વગર પણ હકૂમત ગમે ત્યારે શૂટ કરાવી કે ફાંસી એ લટકાવી શકે છે. આ બધું ભારતમાં બન્યુ અને એકવીસ મહિના સુધી આ ચાલતું રહ્યું. આજે 46 વર્ષ થયા અત્યારની પેઢીને ત્યારના ઘટનાક્રમ અંગે ઝાઝો અણસાર નહીં હોય. ત્યારની પેઢીએ ભોગવેલી યાતનાઓ અને તકલીફો વિષે જાણીશું તો આપણે આજની પેઢી લોકશાહીની કિંમત સમજીશું. – કેયુર જાની

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जस्टिस बदरूल इस्लाम…
असम का निवासी…
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की
असम में प्रैक्टिस की…
1962 से 68 तक कोंग्रेस ने इसे राज्यसभा भेज दिया…
68 के बाद इसे फिर कोंग्रेस ने राज्यसभा भेज दिया, इस कार्यकाल को पूरा होने का समय था 1974 किंतु 1972 में कोंग्रेस ने इस से इस्तीफा लेकर इसे गुवाहाटी हाई कोर्ट का जज बना दिया…
यानी सीधे कोंग्रेस सांसद के पद से हाई कोर्ट का जज बन गया…
7 जुलाई 1979 मार्च 1980 तक हाई कोर्ट का जज बना रहा…
रिटायर होने के बाद इसे सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया गया…
और इस बार प्रधानमंत्री थी।इंदिरा गांधी…
क्या भारतीय इतिहास में ऐसा अन्य कोई उदाहरण है जिसमे हाई कोर्ट का जज रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट का जज बना हो??
कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त…
जज की कुर्सी संभालते ही उसने सब पहला निर्णय बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को अर्बन को ऑपरेटिव घोटाले से बरी करना, समझ गए ना इसे सुप्रीम कोर्ट का जज क्यों बनाया गया ओर किसने बनवाया…
पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त…
जगन्नाथ मिश्रा को घोटाले से बरी करने के एक माह बाद इस जज ने सुप्रीम कोर्ट से अचानक इस्तीफ़ा दे दिया…😊
जबकि कार्यकाल अभी भी लगभग 50 दिन का शेष था…
माने इसको 13 जनवरी 1983 को रिटायर होना था
इस्तीफा क्यों दिया…
क्योंकि 19 जनवरी विधानसभा नामांकन की अंतिम दिनांक थी😊
समझ रहे हो खेल कैसे खेला जाता था और कौन खेल रहा था और मोहरा एक मज़हब विशेष से संबंध रखता था…
इसे बारबेटा से कोंग्रेस का उम्मीदवार बनाया गया…
पर किसी कारण से ये चुनाव लड़ नही सका
अभी बाकी है दोस्तों…
15 जून 1983 को कोंग्रेस ने इसे फिर राज्यसभा से सांसद बना दिया…😊
इतना ड्रामा देश मे हो रहा था पर किसी लिब्राण्डु, कोंग्रेसी ने सवाल क्यों नही उठाया?

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जब एक आतंकवादी, यासिर अराफात ने इजराइल के विरुद्ध फिलिस्तीन राष्ट्र की घोषणा की, तो फिलिस्तीन को सबसे पहले मान्यता देने वाला देश कौन था❓

सउदी अरब? – जी नहीं,
पाकिस्तान? – जी नहीं,
अफगानिस्तान? – जी नहीं,
इराक? – जी नहीं,
तुर्की? – जी नहीं,
सोचिये फिर किस देश ने फिलिस्तीन को सबसे पहले मान्यता दी होगी❓

सेकुलर भारत! जी हाँ!

इंदिरा गाँधी ने मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए, सबसे पहले फिलिस्तीन को मान्यता दी और यासिर अराफात जैसे आतंकवादी को “नेहरू शांति पुरस्कार” और राजीव गाँधी ने उसको “इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार” दिए।

और तो और
राजीव गाँधी ने तो उसको पूरे विश्व में घूमने के लिए बोइंग ७४७ गिफ्ट में दिया था।

अब आगे जानिए…

वही खुराफात, सॉरी अराफात, ने OIC (Organisation of Islamic Countries) में काश्मीर को “पाकिस्तान का अभिन्न भाग” बताया और उस आतंकवादी ने बोला कि “पाकिस्तान जब भी चाहे तब मेरे लड़ाके काश्मीर की आजादी के लिए लड़ेंगे।”

और जी हाँ, इतना ही नहीं, जिस शख्स को दुनिया के १०३ देश आतंकवादी घोषित किये हों, और जिसने ८ विमानों का अपहरण किया हो, और जिसने दो हजार निर्दोष लोगों को मार डाला हो, ऐसे आतंकवादी यासिर अराफात को सबसे पहले भारत ने किसी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा। जी हाँ।

इंदिरा गाँधी ने उसे “नेहरू शांति पुरस्कार” दिया, जिसमें एक करोड़ रुपये नगद और २०० ग्राम सोने से बना एक शील्ड होता है।

अब आप सोचिये, १९८३ में, यानि आज से ३७ वर्षों पहले, एक करोड़ रुपये की आज वैल्यू क्या होगी। (देढ़ अरब से भी ऊपर)

फिर राजीव गाँधी ने उसे “इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार” दिया।

फिर यही यासिर अराफात काश्मीर के मामले पर खुलकर पाकिस्तान के साथ हो गया, और इसने घूम घूमकर पूरे इस्लामिक देशों में कहा, कि फिलिस्तीन और काश्मीर दोनों जगहों के मुसलमान गैर-मुसलमानों के हाथों मारे जा रहे हैं, इसलिए पूरे मुस्लिम जगत को इन दोनों मामलों पर एकजुट होना चाहिए।

अब, वो कांग्रेस पार्टी मोदी जी को सिखा रही है, कि “विदेश नीति कैसे की जाती है।”

— साभार

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वर्ष 1980
इंदिरा गांधी की वापसी हुई थी ।आते ही उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री शरद पवार को चलता किया और वहां के नये मुख्यमंत्री बने श्री अब्दुल रहमान अंतुले। अंतुले इंदिरा गांधी के कट्टर समर्थक थे , इमरजेंसी में इन्होंने अपनी नेता का साथ दिया था और कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा कांग्रेस अंतुले साहब ही मैनेज करते थे । मराठा लौबी नाराज थी मगर इंदिरा गांधी को इन सब की कभी परवाह नहीं थी । सरकार चलने लगी।
उस समय देश के सबसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे श्री अरूण शौरी । एक दिन जब शौरी साहब अपने चैंबर में बैठे थे तो उनसे मिलने एक नामी डाक्टर साहब आए। उन्होंने बताया कि वे एक अस्पताल खोलना चाहते हैं मगर फाइल सी एम के यहां अटकी पड़ी है । कारण पता चला कि 5 करोड़ रूपए एक ट्रस्ट को दान देने पर ही मंजूरी मिलेगी। और कुछ अन्य लोगों ने भी बताया कि बिना इसके कोई काम नहीं होता है ।
ट्रस्ट का नाम था इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान । अरूण शौरी ने पहली बार इस ट्रस्ट का नाम सुना था । उन्होंने डाक्टर साहब को विदा किया और अपने सहकर्मी गोविंद तलवलकर को इसके बारे में पता लगाने को कहा । खोजबीन शुरू हुई मगर किसी को पता नहीं था कि यह ट्रस्ट कहां है। फिर एक दिन सचिवालय बीट के एक पत्रकार ने पता कर ही लिया कि इस ट्रस्ट का कार्यालय कोयना बांध पुनर्वास औफिस के एक कमरे में है ।
खोजी टीम वहां पहुंची तो पता चला कि एक कमरे में दो लोग बैठते हैं ,एक कैशियर ,एक टाइपिस्ट बस । बाहर में एक छोटा सा बोर्ड है जो दिखता भी नहीं
यह भी पता चला कि दोनों स्टाफ लंच के लिए एक घंटे बाहर जाते हैं । बस उसी समय खोजी पत्रकार उस कमरे में घुसे । वहां उन्होंने पाया कि ट्रस्ट के नाम से करीब 102 चेक पड़े हैं जो विभिन्न श्रोतों से प्राप्त हुए हैं ।एक रजिस्टर में उनकी एंट्री भी है। सारे चेक नंबर और बैंक का नाम नोट कर लिया । समय हो चुका था इसलिए उस दिन ये लोग वापस आ गए।
जाकर शौरी साहब को बता दिया लेकिन वे खुश नहीं हुए ।उनका कहना था कि इन सब की फोटो कॉपी चाहिए ।
दूसरे दिन ये कोयना पुनर्वास औफिस गये और खुद को आडिट टीम का बताकर कुछ डाक्यूमेंट फोटो कौपी करने का जुगाड कर लिया । फिर लंच ब्रेक में रजिस्टर और चेक की फोटो कॉपी हासिल हो गई
अब भी अरुण शौरी खुश नहीं थे ।उनका मानना था कि चेक से कैसे प्रूफ होगा कि यह किसी काम के एवज में दी गई है ? तब नई सरकार में शंटिंग में पड़े एक वरीय आई ए एस अफसर की मदद ली गई। उन्होंने बताया कि जिस जिस तारीख का जिस बिजनेस मैन का चेक है उससे संबंधित कोई न कोई निर्णय कैबिनेट में पारित हुआ है । होटल के लिए जमीन दिए जाने के दिन होटल मालिक का चेक । बीयर बार एसोसिएशन का चेक और उसी दिन बीयर बार में डांस देखने की स्वीकृति । कड़ी से कड़ी मिलती गई । उस समय सीमेंट और चीनी का राशनिंग था। ये दोनों परमिट पर मिलते थे । सीमेंट और चीनी को फ्री सेल में बेचने का पारी पारी से कंपनियों को छूट मिलता था ।यही सबसे बड़ा घोटाला था। जिस कंपनी ने पैसे दिए उसे लगातार छूट । जिसने नहीं दिए उस की राशनिंग।
अब न्यूज बनाने की बारी थी। संपादक खुद रात में 11 बजे कंपोज करने बैठे ।उन्हें डर था कि लिक न हो जाए ।
और बात लिक हो गई। अंतुले साहब का फोन इंडियन एक्सप्रेस के मालिक श्री रामनाथ गोयनका को आया। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि मैं संपादकीय मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करता और फोन रख दिया।
दूसरे दिन न्यूज छपा .. इंदिरा गांधी के नाम पर व्यापार ।
हंगामा हो गया । संसद में सवाल उठा तब वित्त मंत्री आर वेंकटरमण ने कहा कि इंदिरा गांधी को ऐसे किसी ट्रष्ट की जानकारी नहीं है
दूसरे दिन न्यूज छपा… झूठे हैं आप वित्त मंत्री जी और साथ में ट्रस्ट के उद्घाटन समारोह की तस्वीर भी छाप दी गई जिसमें इंदिरा गांधी भी उपस्थित थीं।
हंगामा इतना बढ़ा कि अंतुले साहब बर्खास्त हो गये ।
बताया जाता है कि मृणाल गोरे ने इस पर मुकदमा दायर कर दिया था और डर था कि इंदिरा गांधी भी न फंस जाएं।
इसलिए अंतुले को बर्खास्त कर दिया गया।
यह खोजी पत्रकारिता कै स्वर्णिम काल की अनूठी मिसाल है।

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मनमोहन सिंह सत्ता में थे… प्रतिभा पाटिल देश की राष्ट्रपति थी तभी अचानक एक खबर ने सबको चौंका दिया कि एक बेहद कट्टरपंथी मुस्लिम गुलाम वाहनवटी भारत का अटार्नी जनरल नियुक्त हुआ

गुलाम वाहनवती अपने हिंदू विरोधी होने के लिए मशहूर था

उसने सुप्रीम कोर्ट ने में भारत सरकार की तरफ से वह केस लड़ा था जिसमें रामसेतु तोड़ने की बात थी और इसी गुलाम वाहनवती के सलाह पर भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दिया था की रामायण काल्पनिक है राम रावण युद्ध कभी हुआ ही नहीं था रामसेतु तो एक प्राकृतिक संरचना है

मुसलमानों को ओबीसी कोटे में शामिल करने का केस हो

इतना ही नहीं उस वक्त भारतीय सेना के प्रमुख थे जनरल वीके सिंह यह गुलाम वाहनवती उनकी फर्जी सर्टिफिकेट बना कर सुप्रीम कोर्ट में उन्हें जबरदस्ती रिटायर करने की अपील किया था हालांकि सुप्रीम कोर्ट में इसे लात खानी पड़ी थी क्योंकि जांच में वह सर्टिफिकेट फर्जी निकला था

इतना कट्टर मुसलमान भारत का अटार्नी जनरल बनकर भारत की लॉ इन्फोर्समेंट एजेंसीज को अपने इस्लामी एजेंडे से चला रहा था

फिर अप्रैल 2014 में एडीशनल सॉलीसीटर जनरल हरिन पी रावल ने यह सनसनीखेज आरोप लगा दिया की गुलाम वाहनवती अपना कट्टर इस्लामिक एजेंडा चला रहे हैं इस आरोप के बाद इसे अपना पद छोड़ना पड़ा था

और इस कट्टरपंथी मुस्लिम को भारत का अटॉर्नी जनरल नियुक्त करने के पीछे अहमद पटेल था जिसने अब तक की सबसे भ्रष्ट राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के द्वारा उनका नियुक्ति करवाया था