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पंच केदार

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उत्तराखंड कुमाउगढ्वाल और नेपाल का डोटी भाग में असीम प्राकृतिक सौंदर्य को अपने गर्भ में छिपाए, हिमालय की पर्वत शृंखलाओं के मध्य, सनातन हिन्दू संस्कृति का शाश्वत संदेश देनेवाले, अडिग विश्वास के प्रतीक केदारनाथ और अन्य चार पीठों सहित, नव केदार के नाम से जाने जाते हैं। श्रद्धालु तीर्थयात्री, सदियों से इन पावन स्थलों के दर्शन कर, कृतकृत्य और सफल मनोरथ होते रहे हैं।

धर्मात्मा पाण्डब ब्रह्महत्या, गुरुहत्या और गोत्र हत्याके पापसे मुक्त होने और बिश्वमे शान्ती , राज्यमे समृद्धि, और यज्ञ हेतु भागवान भुतनाथ इश्वर से असिर्बाद लेने हेतु और क्षमा पुजा कर्ने हेतु भागवान भोलेनाथ कि सरण मे उत्तराखण्ड आए। क्यु कि उपमन्यु को दिए बचन के मुताबिक भागवान भोले नाथ कालीयुग आने से १००  बर्स तक कैलास से उतरकर उत्तराखण्ड मे रहने लगे। प्रभु ने उपमन्यु को बचन दे रखाथा कि कृश्ण के लौट जाने से कुछ बर्सपुर्ब तक वो यही रहङे। |पान्डबौको अप्ने गुरु, भायि, पितामह ,पुत्रौ कि याद ज सताने लागि, रात दिन रोने लगे, सारा सन्शार उन्हे सुन्य लग्ने लगा। भागवान शृकृश्ण समिप होते तो उन्हे शान्ती मिल्ती जब वो सम्मुख नही होते उन्हे युद्धा और बिगत उन्हे भयन्कर दुख देने लगा। वो अकर्मण्य बन गए। ब्रह्महत्या और कुल हत्या उन्हे सताने लागि। इस्के बाद उन्हौ ने प्रभु शृकृष्ण को हस्तीनपुर बुलया और अप्नी मुक्ती का मार्ग पुछा। शृहरी ने कहा, हे पाण्डु पुत्रो तुमने क्ष्तृय धर्मका पालन किया सो तुम ने कोइ पाप नही किया, तुम तो मुक्त हो फिर भि तुम्हारे मन मे जो बिशाल्तम दया है इसिलिए वो तुम्हे प्रायस्चित्त के मार्ग लेजा रही है। और भागवानभोलेनाथ शंकर यह नही चाह्ते है कि तुम लोग सारीर त्यागे बिना स्वोर्ग जाए। उन्हौ ने केबल पापियौ को नस्ट कर्ने हेतु तुम्हे पशुपतास्त्र दिया था जो तुमने आभी नही लौटाया। इसके बाद पाण्डब और नारायण कृश्ण बेदव्यासके शरण मे गए और मधुशुदन ने प्रभु बेद व्यासको अप्ने पाण्डबौको दिएपाप मुक्त होने के सुझाव के बारेमे बताया। महात्मा ब्यास ने सुझाव को सर्बोतम कहते हुए पान्डबौको बिलम्ब किए बिना भागवान चन्द्रमौली के शरण मे जाने को कहा। पान्डब द्रोपदी सहित उत्तराखण्ड कि यात्रा मे चल पडे | पाण्डब बिना कृश्ण के अकेले दर्शन कर्ने गए । पान्डबौको नारायण कृश्ण ने यह कहकर बिदा किया था कि भागवान भुत नाथ अब लौकिक रूप के बजाय बहुँदा रूप मे ज्योतिर्लिङ के रूप मे कुछ शक्ती धर्ती मे छोडना चाह्ते है क्यु कि उपम्न्यु को दिए बरदान का समय आब समाप्त हो रहे । इसिलिए तुम्हे वो बैल के रूप मे मिलेङे तुम उस बैल को पकडना ता कि इश्वर  अप्ने बहु रूप कर सके क्यु कि तुम्हे दिया हुवा पशुपताश्त्र आब तुम्हार सारीर का हिस्साबन गया, यिसिलिए वो जैसे तुमने पाया था उसि मार्ग से वो भि प्रभुमे समाहित होना चाहता है, सो तुमने शिब के सरणमे जाना हि होगा। शृकृश्ण और भागवान बेदब्यास कि आज्ञा पाकार पान्डब केदार का दर्शन गए। उन्हौने केदारखण्ड कि केदार घाटी मे पहुचते हि रात्री मे अति सुन्दर तेजस्ह्वी बैल को देख्। वो समय मार्ग्शिर्सका महिना था,दिपावाली के बाद का समय था। आकाश खुला था कोइ बादल नहिथे और खुला आकाशमे तारे और अन्य आकाशिय पिण्ड स्पस्ट दिखायिदे रहेथे। बस्तियौमे फुल फुले थे , वो बैले बिचित्र था, वो इत्ना बिशाल था कि उस बैले से दिखाइ देने वाला सारा आकाश ब्यप्त था, उस्के सिङौ तारौको छेद कर रहे थे, तारा पुन्ज उस बैले के सिङौ मे ऐसे लग्रहे थे मानौ कोइ मोतिकी माला हो, उस बैले के सर के रोमौ ने पुरा आकाश गङ्गा ब्याप्त कर रखिथी , उस बैले का शिर हिल्ता तो कोइ नए तारे दिखायी देते और कोइ तारे सिङौकी ओट मे छिप जाते। और उस्के शिरमे चन्द्रमा था, इस बिचित्र अनन्त बिशाल बैल को देख कर पान्डब प्रसन्न हुए|वोह बैल रातृमे तारौकी और चन्द्रमाकी कान्ती को फिका कर्ती जगमगारही थि। उस बैलका रङ सफेद था और बैल के तीन नेत्र स्पस्ट दिखायी देते थे। बैले के घाटी मे मालथी वो सारे रुद्राक्ष और सर्प डोरी बन बैठे थे। डमरू घन्टे का रूप बनाके उस बैल के गलेमे लटक रही थि और बिपरित तर्फ दृस्टी गोचार होने वाली दिशा उस घण्टे से ब्याप्त था, पान्डबौ मे से नकुल उस घण्टे को दर्शन कर्के उस्की बिशालता को माप्ते मगर उस घण्टी का पछला भाग कहा तक है अनौमान नही लगापाए। अर्जुन पाशुपताश्त्र के सहारे बैल के सिङौ तक जाने कि कामना कर्ने लगे भिम अप्नी गदाके चमत्कारके सहारे उस बैलेके आकाशमे ब्याप्त मुख के सम्मुख पहुच्ने के कल्पना कर्ने लगे। पाण्डब भागवान के स्तुती कर्ने लगे उसि समय जो अनन्त बैलथा उसकी पुछ नजिदिक दिखायी दिया और युधिस्ठिर ने आज्ञा दिया कि हे बलशाली भिम तुम यिस पुछको पकडो और अर्जुन तुम्हे पकडे क्युकी श्रीहरी कृश्ण कि यही आज्ञा है। यही हमारी बडी प्रर्थाना है। जैसे हि भिम ने बैल के पुछ पकड्कर अप्ने शिर मे लगाया, भागवान भुतनाथ प्रकट हुए। पान्डबौको पापमुक्त होने का बारादान दिया। और आज्ञा दि कि हे पाण्डबौ मै भि अब कृश्ण के जाने के बाद यहाँअ केबल अप्नी कुछ शक्ती छोडुङा और काली युग मे साक्षात नही मिलुङा इसिलिए मै अप्ने सारे अङौसे ज्योतिर्लिङ मे शक्ती स्थापित कर्ता हु और जहाँ जहाँ तुम मेरे इन अङौको जाते देखोगे और जहाँ वो प्रकट होङे वहा मेरे मन्दिर बन्वावो। पान्डबौ ने ऐसा हि किय और सारे मन्दिरौका निर्माण किया, बाद मे कत्युर साशकौ ने यिन सारे मन्दिरौका जिर्णोद्धार किया। । गुरु पुत्र अश्व्स्थामा कि भयन्कर पिडा देखकर द्रोपदी का मन द्रबित हुवा और उन्की पिडा को भि मुक्त कर्ने के लिए प्रभु से प्रर्थाना कि। द्रोपदी कि यही प्रर्थाना कालीयुग मे पिछे जाकर भारतके लिए अभिशप्त बनी। भोलेनाथ ने अश्वस्थामा को जो कल्पान्तर कि पिडा का स्राप मिलाथा उसे घटाके २८०० बर्स कर्दी। ठिक पान्डबौकी उत्तराखण्ड्की यात्रा के ४० बर्स बाद नारायण मे बैकुन्ठ चले गए और पान्डब दुबारा उत्तराखण्डकी यात्रा मे निक्ले, मृत्यु बरण कर्ने और डोटी राज्यकी हिमालौ के कठिन निर्जन पहाडौमे उन्हौने अप्ने प्राण त्यागे ,ठिक यिसी बक्त कली पृथिबिकी यात्रा मे चल पडा, अन्तरक्षमे भिशण घटना घटाते वो पृथिबी कि यात्रामे चल पडा और नारायण कृश्णके धर्तिको छोड्ते हो हि भारतबर्स के पस्चिमी भाग सागरके पार और पृथिबिके पस्चिमी दक्षिणी गोलार्धा तथा भारत बर्सके पुरबके समुद्रके पार भागको मोहके मोहके अदृशअनधकार से ढक्ता हुवा उतरा ब्याप्त कर्ता हुवा गर्जनाकरने लगा। यिसी दिन यबनौ देशमे बडी राज्नितिक उथल्पुथल हुयिथी| पुराने सारे यबन सासकौकी हत्या हुयिथी और नए सिद्धान्त वाले आएथे जो कालान्तरमे ग्रीक सभ्यता बनी।यही कारण गृक लोग उन्की सभ्यताको ५००० बर्स पुरानी कहते है, क्यु कि ५६०० बर्स पहले के यबन आन्धुनिक (२०००-३०००) बर्स पहलेकी जैसी नही थि। वो सन्तानतो यबनौकी हि है मगर जिवन जिनेका सिद्दान्त बिल्कुल भिन्न है|| पान्डबकि उत्तराखण्डकी यात्राके २६०० बर्स बाद अश्वस्थामा पिडा मुक्त होकर भारत से बाहर के जङलौ मे चले गए ,उनका यही पलायन भारत बर्सके महाश्राप जैसा बना। ऐसी जनस्रुती है |। जनस्रुती के अनुसार अश्वस्थामा का असर जो है उससे मुक्त होने भारत बर्सको अभी बहुत समयका इन्ताजार कर्ना पडसक्ता है ||अगर रानी द्रोपदी कृश्ण के हजारौ बार “तुम पाप मुक्त हो” कहने के पस्चात भि ग्लानी रहित हो गयी होती और पान्डबौ का केबल बिनाशका मात्र जिबन का उद्देश्य बनाएवाले गुरुपुत्रके प्रति, उनके मागे बिना उनके लिए भि बरदान न माग्ती तो आजका समय कुछ और हि होता। “पान्डब महान थे”। युद्धके पस्चात वो सारे बिकारौ से रहित थे। ऐसी जनस्रुती है

भोलेनाथ पाण्डबौको पापमुक्त होने और अश्स्वथामा कि पिडाका समय घटदेनेके पस्चात प्रभु अन्तर्ध्यान होगए और बिभिन्न जगह उन्के ज्योतिर्लिङ प्रकट हुए, शिर के भाग के प्रतिकके रूप मे पशुपति, बाहु के रूप मे केदार (उन्के नौ भुजा थि यिसिलिए नौ केदार उतपन्न हुए) जिसमे पन्चकेदार कुमाउगढ्वाल मे और सयुक्त चारभुजा नेपाल के बैतडी मे , बाद मे वो चार भुजा भि अलग होकर आज उत्तराख्ण्डमे ९ केदार है अन्य चार स्थलों पर शेष भाग दिखाई दिए, जो कि शिव के उन रूपों के आराधना स्थल बने। रुद्रनाथ,  कल्पेश्वर, मध्यमेश्वर , तुंगनाथ , श्रीकेदार्, रौलाकेदार्, ध्वाजकेदार्, अशिमकेदार। कहा जाता हैकी यिस बक्त पाण्डब पुरा एक बर्स तक उत्तराखण्ड और डोटी क्षेत्र मे रहे यहाँ सारे मन्दिरौका निर्माण कर्नेके पस्चात वो हस्तिनापुर लौटे। और दुस्रे बर्स नेपाल के पशुपती मन्दिर और उज्ज्यानिका महाकाल मन्दिर एबम काशी बिश्वनाथका मन्दिर निर्माण किया मगर इस सन्धर्भ मे नेपालके डोटी राज्यकी जन स्रुती और कुमाउगढ्वालकी जन स्रुती मे भिन्नता है। डोटी राज्यकी जन स्रुती के अनुसार यह नौ केदार भुजाए है, शिर पशुपती और नेत्र उज्ज्यनिका महाकाल्, उदर सोमनाथ। उनके तृशुल्, रुद्रक्ष और सर्प आदी सभी भारतबर्स मे किसी न किसी देबता के रुपमे रहते है, जैसे रुद्राक्ष=भागेश्वर्, जट=शिगाश्, तृशुल्=महारुद्र्, डमरू=नागर्जुन आदी। मगर कुमाउगढ्वालकी जन स्रुतिके मुताबिक  मुख – रुद्रनाथ, जटा-सिर – कल्पेश्वर, पेट का भाग – मध्यमेश्वर और हाथ – तुंगनाथ और ए सारे कुमाउगढ्वाल मे हि है। ए जन स्रुती को मान्नेके लिए किसी किसी को थोडा सन्कोच होता है क्युकी केदार के ५००० बर्स पुराने ज्योतिर्लिङ (केदारेश्वर्) कुमाउ से बाहर डोटी राज्य मे भि है ||| हमारे यहाँ (डोटी) कि जन स्रुती मे यही कथा है