Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

आजकल अनभिज्ञविद्वान तथाकथित विद्वानो द्वारो ए कहना की स्त्रियो को गुरु नही बनाना चाहिए उनके लिए एक तमाचा सप्रमाण सहित

नारीदीक्षाविमर्श

नारियों को गुरु बनाना चाहिए या नहीं ??–इस विषय पर बड़ा विवाद चल रहा है । शास्त्रीय प्रमाणों के कुछ वाक्य प्रस्तुत करके पण्डितम्मन्य नारी दीक्षा का खण्डन बडे ज़ोर शोर से कर रहे हैं ।उनका एक वाक्य है–

सामान्यत: द्विजाति का गुरु अग्नि, वर्णों का गुरु ब्राह्मण, स्त्रियों का गुरु पति और सबका गुरु अतिथि होता है-

गुरुग्निद्विजातीनां वर्णानां बाह्मणो गुरु:.
पतिरेको गुरु: स्त्रीणां सर्वेषामतिथिर्गुरु:॥–औशनस स्मृति

” पतिरेको गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु:॥”–चाणक्यनीति:

कूर्ममहापुराण के उत्तरार्ध अध्याय-१२ का ४८-४९ वां श्लोक प्रस्तुत है । जिसमें स्त्री का गुरु पति ही कहा गया है-

“गुरुरग्निर् र्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु: ॥४८॥ पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु: ॥४९॥”

द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) का गुरु अग्नि है । चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है । स्त्रियों का गुरु पति ही है । और अभ्यागत सबका गुरु है ।

श्लोक का सीधा अर्थ लें तो सब गड़बड़ हो जायेगा ।क्या द्विजातियों का गुरु अग्नि है?? ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों में किसको अग्नि ने दीक्षा दी है ?? द्विजातीनां में बहुवचन है । तथा इन तीनों के प्रति अग्नि का गुरुत्व प्रत्यक्ष बाधित है । इन तीनों के गुरु अग्निदेव से भिन्न कोई देहधारी विप्र होते हैं ।दूसरी बात यह कि जब द्विजातियों का गुरु अग्नि बतला दिये गये । तब शेष बचे शूद्र । तब शूद् का गुरु ब्राह्मण को बतलाना चाहिये, न कि सभी वर्णों का=वर्णानां।

श्लोक के चतुर्थ पाद में अभ्यागत अर्थात् अतिथि को सबका गुरु बतलाया गया है । सबमें तो सभी वर्ण के लोग आ गये । और अतिथि किसी भी वर्ण का प्राणी हो सकता है –

” यस्य न ज्ञायते नाम न च गोत्रं नच स्थिति:। अकस्मात् गृहमायाति सोSतिथि: प्रोच्यते बुधै: ॥

महर्षि शातातप कहते हैं कि प्रिय हो या मूर्ख अथवा पतित जो वैश्वदेव कर्म के अन्त में पहुँच जाय वह अतिथि स्वर्ग का संक्रम ही होता है । अब बतलायें क्या मूर्ख या पतित व्यक्ति ब्राह्मणादि सभी वर्णों का गुरु माना जा सकता है?? नहीं ना ।

प्रकृत श्लोक में गुरु शब्द का अर्थ दीक्षा गुरु नहीं अपितु सम्मान्य है । द्विजातियों का गुरु अग्नि है । अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वैश्य इन सबको अग्नि का सम्मान करना चाहिए । अग्निहोत्रादि से प्रतिदिन त्रैवर्णिकों को अग्नि की पूजा करनी चाहिए । वर्णानां= सभी वर्णों का गुरु = सम्मान्य आदरणीय ब्राह्मण होता है । ब्राह्मण स्वयं भी ब्राह्मण का सम्मान करे । इसी प्रकार स्त्री का गुरु= समादरणीय उसका पति ही होता है । पति के कारण ही सास ससुर आदि से सम्बन्ध है । परिवार के अन्य सदस्यों की अपेक्षा पति ही अधिक सम्माननीय है नारी के लिए । यही उक्त श्लोक का अर्थ है ।

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि स्त्री किसी को गुरु ही न बनाये । पद्ममहापुराण के उत्तरखण्ड के २५४वें अध्याय में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी ने महाराज दिलीप को यह तथ्य प्रकाशित किया है कि भगवती उमा स्वयं पति चन्द्रशेषर भगवान् की अर्धांगिनी होने पर भी उनसे मन्त्र न लेकर मह्रर्षि वामदेव को अपना गुरु बनायीं ।

सर्वज्ञ एवं सर्वसमर्थ भगवान् शंकर भी अपनी प्रियतमा पार्वती जी को महर्षि वामदेव के पास ही दीक्षा के लिए भेजते हैं ।

शिव जी कहते हैं हे गिरिजे ! गुरु के उपदेश द्वारा ही केशव की पूजा करके प्राणी मनोवांछित फल प्राप्त कर सकता है ,अन्यथा नहीं ।–

“गुरूपदेशमार्गेण पूजयित्वैव केशवम् ।प्राप्नोति वाञ्छितं सर्वं नान्यथा भूधरात्मजे ॥७॥

भगवान् भव की बात मानकर भगवती पार्वती वामदेव महर्षि के समीप भगवान् विष्णु के पूजन की लालसा से पहुँचीं। –

एवमुक्ता तदा देवी वामदेवान्तिकं नृप ! जगाम सहसा हृष्टा विष्णुपूजनलालसा ॥८॥

और उनको गुरु रूप में प्राप्त करके पूजन और प्रणाम किया तथा विनम्रभाव से बोलीं–

समेत्य तं गुरुं देवी पूजयित्वा प्रणम्य च ।विनीता प्राञ्जलिर्भूत्वा उवाच मुनिसत्तमम् ॥९॥

वे महर्षि वामदेव से कहती हैं कि भगवन् मैं आपकी कृपा से भगवन्मन्त्र प्राप्त करके हरिपूजन करना चाहती हूँ । आप मुझपर कृपा करें ।तत्पश्चात् गुरुवर महर्षि वामदेव ने भगवती शैलपुत्री को विधिपूर्वक भगवन्मन्त्र दिया –

इत्युक्तस्तु तया देव्या वामदेवो महामुनि: । तस्यै मन्त्रवरं श्रेष्ठं ददौ स विधिना गुरु: ॥११॥

क्या जगद्गुरु कामारि भगवान् शङ्कर से भी आजकल के तथाकथित कामकिङ्कर ज्ञानी बन चुके हैं ??
नारी को केवल कामवासना की पूर्ति का साधन समझने वाला ही पत्नी के परमार्थ पथ का घातक बनता है ।और कहता है कि–” पतिरेको गुरु: स्त्रीणां-”

भगवान् शिव ने भगवती पार्वती को भगवान् विष्णु की आराधना के विषय में बतलाया कि वह सभी आराधनाओं सर्वश्रेष्ठ है । भगवान् भव स्वयं सर्वज्ञ तथा सम्पूर्ण मन्त्रशास्त्र के मूल हैं फिर भी अपनी प्रियतमा को स्वयं मन्त्र न देकर ब्रह्मर्षि वामदेव के पास भेजते हैं ।इससे सिद्ध होता है कि “पति स्वयम् अपनी परिणीता को मन्त्र प्रदान न करे ।”

और इस तथ्य में प्रमाण है ब्रह्मवैवर्तमहापुराण का देवर्षि नारद के प्रति चतुरानन का वचन । जब उन्होंने अपने पिता ब्रह्मा जी से कृष्णमन्त्र प्रदान करने की उत्कण्ठा व्यक्त की । तब ब्रह्मा जी ने उन्हें मन्त्र देने से मना करते हुए कहा—

” पत्युर्मन्त्रं पितुर्मन्त्रं न गृह्णीयाद्विचक्षण ।”–ब्रह्मखण्ड-२४/४२,

हे प्राज्ञ ! कोई भी प्राणी पति एवं पिता से मन्त्रग्रहण न करे ।

यह एक प्रबल तमाचा है उन लोगों को जो स्त्री का गुरु पति को बतलाने का प्रयास करते हैं । ” पतिरेको गुरु: स्त्रीणां ” वचन में गुरु का अर्थ मात्र पूज्य है, दीक्षा गुरु नहीं । अतएव भगवान् भोलेनाथ ने अपनी प्राणवल्लभा भगवती उमा को ब्रह्मर्षि वामदेव से दीक्षा लेने भेजा । प्राज्ञ को शास्त्रीय वचनों का सामञ्जस्य बिठाना चाहिए ।
नारी को मात्र भोग की वस्तु समझने वाले भगवदुपासना या मोक्षमार्ग की ओर उसका बढ़ना कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?? ॥अस्तु॥

कुमारी कन्याओं के मन्त्रदीक्षा में प्रमाण–

श्रीपार्वती जी ने विवाह से पूर्व देवर्षि नारद से शिवमन्त्र की दीक्षा ग्रहण की थी । भगवती शैलजा कहती हैं कि हे सर्वज्ञ मुने ! आप मुझे भगवान् रुद्र की आराधना के लिए मन्त्र प्रदान करें–

त्वं तु सर्वज्ञ जगतामुपकारकर प्रभो । रुद्रस्याराधनार्थाय मन्त्रं देहि मुने हि मे ॥

क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का सद्गुरु के विना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है । ऐसी सनातनी श्रुति मैंने पहले सुन रखी है –

” नहि सिद्ध्यति क्रिया कापि सर्वेषां सद्गुरुं विना । मया श्रुता पुरा यत्या श्रुतिरेषा सनातनी ॥

ऐसा सुनकर देवर्षि नारद ने भगवती पार्वती को विधिपूर्वक पञ्चाक्षर शिवमन्त्र का उपदेश दिया–

इति श्रुत्वा वचस्तस्या: पार्वत्या मुनिसत्तम । पञ्चाक्षरं शम्भुमन्त्रं विधिपूर्वमुपादिशत् ॥

बाल्यावस्था में ही कुन्ती जी को महर्षि दुर्वासा ने देवों के आवाहन का विशेष मन्त्र दिया था–

तस्यै स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षया ।अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनि:॥ –महाभारत, आदिपर्व-१११/६,

स्कन्दमहापुराण के ब्रह्मोत्तरखण्ड- ३ के प्रथम अध्याय में यह कथा आयी है कि प्राचीनकाल में मथुरानरेश दाशार्ह का विवाह काशीनरेश की कन्या कलावती से हो गया । महा राज ने अपनी पत्नी का अंग बलपूर्वक स्पर्श किया तो उसका देह लौहपिण्ड की भाँति जलता हुआ प्रतीत हुआ । राजा ने कारण पूछा कि तुम्हारा सुकोमल शरीर अग्नि के समान क्यों लग रहा है –

” कथमग्निसमं जातं वपु:पल्लवकोमलम् ?–१/४३,

महारानी ने उत्तर दिया कि बाल्यावस्था में महर्षि दुर्वासा ने मुझ पर कृपा करके पञ्चाक्षरी विद्या ( शिवमन्त्र ) का उपदेश किया था । उस मन्त्र के प्रभाव से मेरे समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं ।अत: पापी पुरुष मेरा स्पर्श नहीं कर सकते ।आप नित्य स्नान नहीं करते हैं और कुलटा वेश्याओं का सेवन तथा मदिरापान करते रहते हैं । इसलिए पापपरायण आप मेरे निष्पाप शरीर का स्पर्श नहीं सह सकते । अपनी शुद्धि के लिए महाराज ने पत्नी से पञ्चाक्षरी मन्त्र प्रदान करने की बात कही । तो उन्होंने कहा कि मैं आपको मन्त्र नहीं दे सकती ; क्योंकि आप मेरे पूज्य हैं । आप मन्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि गर्ग को अपना गुरु बनायें —

” नाहं तवोपदेशं वै कुर्यां मम गुरुर्भवान् । उपातिष्ठ गुरुं राजन् गर्गं मन्त्रविदाम्वरम् –१/५०,

तत्पश्चात पत्नी के साथ महर्षि गर्ग के चरणों में जाकर महाराज दाशार्ह ने वन्दना की और उनसे मन्त्रदीक्षा ली–

इति सम्भाषमाणौ तौ दम्पती गर्गसन्निधिम् । प्राप्य तच्चरणौ मूर्ध्ना ववन्दाते कृताञ्जली ॥–१/५१,
तन्मस्तके करं न्यस्य ददौ मन्त्रं शिवात्मकम् ॥१/५७

पूर्वोक्त इतिहास एवं पुराणों के वचनों से यह सिद्ध होता है कि पति से भिन्न व्यक्ति स्त्रियों का दीक्षा गुरु
होता है ।

पतिरेको गुरु: स्त्रीणां का तात्पर्य है कि स्त्री के लिए अन्य सम्बन्धियों की अपेक्षा ”पति ही पूज्य है” ; क्योंकि ननद, सास, ससुर आदि सम्बन्ध पतिमूलक ही हैं । पति की उपेक्षा करके इन सम्बन्धियों से उसका कल्याण कथमपि नहीं हो सकता है ।

##आचार्य सियारामदासनैयायिक##

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शुक्रवार विशेष,,,,

संजय गुप्ता

भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है- “यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:” अर्थात्, जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं, किंतु वर्तमान में जो हालात दिखायी देते हैं, उसमें नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है, उसे भोग की वस्तु समझकर आदमी अपने तरीके से इस्तेमाल कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है।

लेकिन हमारी संस्कृति को बनाए रखते हुए नारी का सम्मान कैसे किय जाये? इस पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है, माँ अर्थात माता के रूप में नारी, धरती पर अपने सबसे पवित्रतम रूप में हैं, माता यानी जननी, माँ को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है, माँ देवकीजी (कृष्ण) तथा माँ पार्वतीजी (गणपति, कार्तिकेय) के संदर्भ में हम देख सकते हैं।

किन्तु बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी माँ को महत्व देना कम कर दिया है, यह चिंताजनक पहलू है, सब धन-लिप्सा व अपने स्वार्थ में डूबते जा रहे हैं, परंतु जन्म देने वाली माता के रूप में नारी का सम्मान अनिवार्य रूप से होना चाहिये जो वर्तमान में कम हो गया है, यह सवाल आजकल यक्षप्रश्न की तरह चहुं ओर पांव पसारता जा रहा है, इस बारे में नई पीढ़ी को आत्मावलोकन करना चाहिये।

अगर आजकल की लड़कियों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि ये लड़कियां आजकल हर क्षेत्र में हम आगे बढ़ते हुए देखा जा सकता है, विभिन्न परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं, किसी समय इन्हें कमजोर समझा जाता था, किंतु इन्होंने अपनी मेहनत और मेधा शक्ति के बल पर हर क्षेत्र में प्रवीणता अर्जित कर ली है, इनकी इस प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिये।

नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है, पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता है, पिता के घर में भी उसे घर का कामकाज करना होता है, साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी होती है, उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता है, उसे इस दौरान घर के कामकाज के साथ पढ़ाई-लिखाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती है।

जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा और कोई काम नहीं रहता है, कुछ नवुयवक तो ठीक से पढ़ाई भी नहीं करते हैं, जबकि उन्हें इसके अलावा और कोई काम ही नहीं रहता है, इस नजरिये से देखा जाए, तो नारी सदैव पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तो चलती ही है, बल्कि उनसे भी अधि‍क जिम्मेदारियों का निर्वाहन भी करती हैं, नारी इस तरह से भी सम्माननीय है।

विवाह पश्चात तो महिलाओं पर और भी भारी जिम्मेदारि‍यां आ जाती है, पति, सास-ससुर, देवर-ननद की सेवा के पश्चात उनके पास अपने लिए समय ही नहीं बचता, वे कोल्हू के बैल की मानिंद घर-परिवार में ही खटती रहती हैं, संतान के जन्म के बाद तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। घर-परिवार, चौके-चूल्हे में खटने में ही एक आम महिला का जीवन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

कई बार वे अपने अरमानों का भी गला घोंट देती हैं अपने घर-परिवार की खातिर, उन्हें इतना समय भी नहीं मिल पाता कि वे अपने लिए भी जियें, परिवार की खातिर अपना जीवन होम करने में भारतीय महिलाएं सबसे आगे हैं, परिवार के प्रति उनका यह त्याग उन्हें सम्मान का अधि‍कारी बनाता है।

बच्चों में संस्कार का काम माँ के रूप में नारी द्वारा ही किया जाता है, हम सभी बचपन से सुनते चले आ रहे हैं कि बच्चों की प्रथम गुरु माँ ही होती है, माँ के व्यक्तित्व-कृतित्व का बच्चों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का असर पड़ता है, इतिहास उठाकर देखें तो माँ जीजाबाई ने शिवाजी महाराज में श्रेष्ठ संस्कारों का बीजारोपण किया था।

जिसका ही परिणाम है कि शिवाजी महाराज को हम आज भी उनके श्रेष्ठ कर्मों के कारण जानते हैं, इनका व्यक्तित्व विराट व अनुपम है, बेहतर संस्कार देकर बच्चे को समाज में उदाहरण बनाना, नारी ही कर सकती है, अत: नारी सम्माननीय है, आजकल महिलाओं के साथ अभद्रता की पराकाष्ठा हो रही है।

हम रोज ही अखबारों और न्यूज चैनलों में पढ़ते व देखते हैं, कि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई या सामूहिक बलात्कार किया गया, इसे नैतिक पतन ही कहा जाएगा, शायद ही कोई दिन जाता हो, जब महिलाओं के साथ की गई अभद्रता पर समाचार न हो, क्या कारण है? प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिन पर- दिन अश्लीलता बढ़ती‍ जा रही है।

इसका नवयुवकों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही खराब असर पड़ता है, वे इसके क्रियान्वयन पर विचार करने लगते हैं, परिणाम होता है दिल्ली गैंगरेप जैसा जघन्य व घृणित अपराध, नारी के सम्मान और उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए इस पर विचार करना बेहद जरूरी है, साथ ही उसके सम्मान और अस्मिता की रक्षा करना भी जरूरी है।

कतिपय आधुनिक’ महिलाओं का पहनावा भी शालीन नहीं हुआ करता है, इन वस्त्रों के कारण भी यौन-अपराध बढ़ते जा रहे हैं, इन महिलाओं का सोचना कुछ अलग ढंग का हुआ करता हैं, वे सोचती हैं कि हम आधुनिक हैं, यह विचार उचित नहीं कहा जा सकता है, अपराध होने पर यह बात उभरकर सामने नहीं आ पाती है कि उनके वस्त्रों के कारण ही यह अपराध प्रेरित हुआ है।

इतिहास गवाह है, जब कभी अपने बच्चों को तकलीफ आयीं तो नारी ने माँ के धर्म को निभाया, पति पर तकलीफ आयी तो एक भार्या का धर्म निभाया, देश पर तकलीफ आयी तो एक जिम्मेदार नारी ने अपने वतन परस्ती का परिचय दिया, नारी ने अपने दृढ़ संकल्प और मन-वचन व कर्म से सभी क्षैत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करायीं, वे दृढ़ चट्टान की तरह अपने कर्मक्षेत्र में कार्यरत रहीं, और सफल भी हुयीं।

सज्जनों! अंत में यही कहना ठीक रहेगा कि हम हर महिला का सम्मान करें, अवहेलना, भ्रूण हत्या ना करें, अपनी बेटीयों को पढ़ायें, नारी की अहमियत समझें, नारी की अहमियत न समझने के परिणाम स्वरूप महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले लगभग आधी ही बची है, इंसान को यह नहीं भूलना चाहिये, कि नारी द्वारा जन्म दिए जाने पर ही वह दुनिया में अस्तित्व बना पाया है, और यहां तक पहुंचा है।

नारी का अपमान करना भगवान् का अपमान करना हैं, भारतीय संस्कृति में नारी को देवी, दुर्गा व लक्ष्मी आदि का यथोचित सम्मान दिया गया है, अत: उसे उचित सम्मान दिया ही जाना चाहिये, आज विश्व महिला दिवस पर आप सभी भाई-बहनों से आव्हान करता हूँ कि हम नारी शक्ति को कभी तकलीफ नहीं देंगे, भले वो माँ हो, बहन हो, बेटी हो या अपनी अर्धांगिनी हो, या समाज की कोई नारी शक्ति, हमेशा प्रोत्साहित करेंगे व उनकी रक्षा करेंगे, आप सभी को आज के दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

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એક દિવસ માતા પુત્રી ફોન પર વાત કરી રહ્યા હતા. માં કહે “દીકરી તું આવે છે ત્યારે ઘર ની રોનક વધી જાય છે, તારા પપ્પા પણ બહુ જ આનંદમાં હોય છે, દીકરી કહે: “હા મા, બસ થોડો સમય..પછી તો ભાઈનો અભ્યાસ પૂરો થઈ જશે, પછી એના લગ્ન કરી એક દીકરી લાવજો જે ત્યાંજ રહેશે એટલે ઘર ફરી રોનક વાળું જ રહેશે.” માતા હરખાતા બોલી, હા, બેટા, પછી તો તને કુંવરી ની જેમ રાખીશ, અત્યારે તું આવે ત્યારે હું જરા વ્યસ્ત રહુ છુ, દીકરી સાસરે હતી એટલે માતા ને અટકાવતા બોલી, “માં, ભાભી આપણા ઘરમા આવશે પછી તને મારી ખોટ નહીં સાલે, મા કહે, તે જે હોય તે પણ મને એટલી ખબર પડે કે દીકરી એ દીકરી હોય, જેટલું એને માવતર નું પેટમાં બળે એટલું દીકરા ને પણ ના બળે.. મા ને અટકાવતા દીકરી બોલી, બસ આજ વાંધો છે આપણા સમાજનો, દીકરી નો મોહ જ નથી મુકતા, તમે પુત્રવધૂ ને પુત્રવધૂ તરીકે રાખો તો એ પુત્રથી પણ વઘુ ધ્યાન રાખે, પણ એ પારકી છે એ ગણીને એના વાંક કાઢ્યા કરો તો એ પણ સાસુ છે એમ જ મનમાં ગાંઠ વાળશે.. પણ બેટા..માં ને આગળ બોલતા અટકાવી પુત્રી બોલી, જુઓ માં, અમને તમારી ફિકર હોય જ એમાં શંકા ને સ્થાન નથી, અમે ક્યારેક આવીને તમારું થોડું ધ્યાન રાખીએ તો એમાં કોઈ મોટી વાત નથી, પણ એ ત્યાં રહી આખો દિવસ કામ કરે અને તમે અમારા ગુણ ગાઓ એતો વ્યાજબી ના કહેવાય ને? દિકરી જમાઈ એની જગ્યાએ ભલે મીઠા ખરા પણ ક્યારેક જ શોભે, જ્યારે વહુ તો લુણ હોય છે જેના વિના જેમ પકવાન ફિક્કા લાગે તેમ વહુ વિના ઘર સુનું લાગે, એજ સાચી રોનક છે, આજ થી જ મન માં ગાંઠ વાળી લો તો સ્વર્ગ મેળવવા માટે દેહ નહીં છોડવો પડે, ચાલ માં હવે મારે થોડું કામ છે, તમારું ધ્યાન રાખજો.. કહી દીકરીએ ફોન રાખી દીધો.!!*

માતા મનમાં જ ગર્વ કરતી રહી કે મારી દીકરી કેટલી મોટી થઈ ગઈ અને પરણ્યા પછી કેવી મૂલ્યવાન વાતો સમજાવે છે, મિત્રો.. નસીબદાર હોય છે એ ઘર જ્યાં માતાને દીકરી આવી સમજણ આપે છે, પરણ્યા પછી દિકરી ને આ બધું માત્ર એના જીવન નો અનુભવ શીખવે છે..

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સ્ત્રી વગર જિંદગી નકામી છે
પુરુષ ને હમેંશા સ્ત્રી સાથે જ જોઈએ માત્ર મંદિર માં કૃષ્ણ એ રાધા કે રુકમણી , રામ ભગવાને સીતા , શંકર ભગવાને પાર્વતી અમસ્તા જ નથી રાખ્યા

આપણે મનુષ્ય પણ જુઓ

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ભણતી વખતે વિદ્યા
પછી લક્ષ્મી
અને છેલ્લે શાંતિ
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સવારે ઉષા ની સંગાથે દિવસ ઉગે અને સંધ્યા ની સાથે દિવસ આથમે પણ કામ અન્નપૂર્ણા માટે જ કરીએ

વળી નિશા સમયે પણ નિંદીયા રાણી અને ઊંઘ્યા પછી પણ સપના

મંત્રોચ્ચાર કરીએ તો ગાયત્રી અને વાંચીએ તો ગીતા
મંદિર માં ભગવાન સામે વંદના ,પૂજા અને આરતી જોઈએ એ પણ વળી શ્ર્ર્ધા સાથે જ હો એમાય જો અંધકાર હોય તો જ્યોતિ અને એકલવાયુ લાગે તો પ્રેમવતી અને સ્નેહા

જો લડાઈ લડવા જઈએ તો જ્યા અને વિજ્યા ઉમર લાયક થઈએ તો કરુણા અને લાગણી એ પણ મમતા સાથે જ

જો ગુસ્સે થઈએ તો ક્ષમા જોઈએ
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માટે ધન્ય છે તમામ સ્ત્રીજાતિ ને જેમના વગર આ દુનિયા માં પુરુષો અધૂરા જ છે

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क्या नारी सिर्फ भोग की वस्तु है ?
कृपया पूरा पढ़े :-
☞ जब वोडाफोन के एक विज्ञापन में दो पैसो मे लड़की पटाने की बात की जाती है तब कौन ताली बजाता है?
☞ हर विज्ञापन ने अधनंगी नारी दिखा कर ये विज्ञापन एजेंसिया / कम्पनियाँ क्या सन्देश देना चाहती है ?
☞ इस पर कितने चैनल बहस करेंगे ?
☞ पेन्टी हो या पेन्ट हो, कॉलगेट या पेप्सोडेंट हो, साबुन या डिटरजेण्ट हो ,कोई भी विज्ञापन हो, सब में ये छरहरे बदन वाली छोरियो के अधनंगे बदन को परोसना क्या नारीत्व के साथ बलात्कार नहीं है?
☞ फिल्म को चलाने के लिए आईटम सॉन्ग के नाम पर लड़कियो को जिस तरह
मटकवाया जाता है !
☞ या यू कहे लगभग आधा नंगा करके उसके अंग प्रत्यंग को फोकस के साथ दिखाया जाता है !
☞ क्या वो स्त्रीयत्व के साथ बलात्कार करना नहीं है?
☞ पत्रिकाए हो या अखबार
सबमे आधी नंगी लड़कियो के फोटो किसके लिए?
और
☞ क्या सिखाने के लिए भरपूर
मात्र मे छापे जाते है?
☞ ये स्त्रीयत्व का बलात्कार
नहीं है क्या?
☞ दिन रात ,टीवी हो या पेपर , फिल्मे हो या सीरियल, लगातार
स्त्रीयत्व का बलात्कार होते
देखने वाले, और उस पर खुश होने वाले, उसका समर्थन करने वाले
क्या बलात्कारी नहीं है ?
☞ संस्कृति के साथ ,
☞ मर्यादाओ के साथ,
☞ संस्कारो के साथ,
☞ लज्जा के साथ
☞ जो ये सब किया जा रहा है वो बलात्कार नहीं है क्या?
☞ निरंतर हो रहे नारीत्व के बलात्कार के समर्थको को नारी के
बलात्कार पर शर्म आना उसी तरह है !
☞ जैसे मांस खाने वाला , लहसुन
प्याज पर नाक सिकोडे
☞ H देश में “आजा तेरी _ मारू , तेरे सर से _ _ का भूत उतारू” जैसे गाने ?
☞ और इसी तरह का नंगा नाच फैलाने वाले भांड युवाओ के
“आइडल” बन रहे हो वहा बलात्कार और छेडछाड़ की घटनाए नहीं बढेंगी तो और क्या बढ़ेगा?
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य ये है कि जब तक हम नारी जाति को नारित्व का दर्जा नहीं देंगे तब तक महिला विकास या महिला सशक्तिकरण की बाते बेमानी लगती है ।
आज मिडिया चीख़ चीख़ कर कहती है महिलाओं को आज़ादी दो, फिर कहती है सुरक्षा दो। क्या दोनों ही चीजें एक साथ हो सकतीं है। मिडिया किसे बेवकूफ बना रही है अपने व्यापार के लिए…..

संजय गुप्ता

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#नास्तिमातृसमो_गुरुः
माता के समान कोई भी गुरु नही हो सकता…..

।।मातृ देवो भव: पितृ देवो भव:।।

पितुरप्यधिका माता
गर्भधारणपोषणात् ।
अतो हि त्रिषु लोकेषु
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है!

नास्ति गङ्गासमं तीर्थं
नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।
नास्ति शम्भुसमः पूज्यो
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।

नास्ति चैकादशीतुल्यं
व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
तपो नाशनात् तुल्यं
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

एकादशी के समान त्रिलोक में प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढकर कोई तप नहीं और माता के समान गुरु नहीं!

नास्ति भार्यासमं मित्रं
नास्ति पुत्रसमः प्रियः।
नास्ति भगिनीसमा मान्या
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं, बहन के समान कोई माननीय नहीं और माता के समान गुरु नही!

न जामातृसमं पात्रं
न दानं कन्यया समम्।
न भ्रातृसदृशो बन्धुः
न च मातृसमो गुरुः ॥

दामाद के समान कोई दान का पात्र नहीं, कन्यादान के समान कोई दान नहीं, भाई के जैसा कोई बन्धु नहीं और माता जैसा गुरु नहीं!

देशो गङ्गान्तिकः श्रेष्ठो
दलेषु तुलसीदलम्।
वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो
गुरुर्माता गुरुष्वपि ॥

गंगा के किनारे का प्रदेश अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, पत्रों में तुलसीपत्र, वर्णों में ब्राह्मण और माता तो गुरुओं की भी गुरु है!

पुरुषः पुत्ररूपेण
भार्यामाश्रित्य जायते।
पूर्वभावाश्रया माता
तेन सैव गुरुः परः ॥

पत्नी का आश्रय लेकर पुरुष ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है, इस दृष्टि से अपने पूर्वज पिता का भी आश्रय माता होती है और इसीलिए वह परमगुरु है!

मातरं पितरं चोभौ
दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।
प्रणम्य मातरं पश्चात्
प्रणमेत् पितरं गुरुम् ॥

धर्म को जानने वाला पुत्र माता पिता को साथ देखकर पहले माता को प्रणाम करे फिर पिता और गुरु को!

माता धरित्री जननी
दयार्द्रहृदया शिवा ।
देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा
निर्दोषा सर्वदुःखहा॥

माता, धरित्री , जननी , दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी , त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, सभी दुःखों का नाश करने वाली है!

आराधनीया परमा
दया शान्तिः क्षमा धृतिः ।
स्वाहा स्वधा च गौरी च
पद्मा च विजया जया ॥

आराधनीया, परमा, दया , शान्ति , क्षमा, धृति, स्वाहा , स्वधा, गौरी , पद्मा, विजया , जया,

दुःखहन्त्रीति नामानि
मातुरेवैकविंशतिम् ।
शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः
सर्वदुःखाद् विमुच्यते ॥

और दुःखहन्त्री -ये माता के इक्कीस नाम हैं। इन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है!

दुःखैर्महद्भिः दूनोऽपि
दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्।
यमानन्दं लभेन्मर्त्यः
स किं वाचोपपद्यते ॥

बड़े बड़े दुःखों से पीडित होने पर भी भगवती माता को देखकर मनुष्य जो आनन्द प्राप्त करता है उसे वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता!

इति ते कथितं विप्र
मातृस्तोत्रं महागुणम्।
पराशरमुखात् पूर्वम्
अश्रौषं मातृसंस्तवम्॥

हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् गुण वाले मातृस्तोत्र को कहा , इसे मैंने अपने पिता पराशर के मुख से पहले सुना था!

सेवित्वा पितरौ कश्चित्
व्याधः परमधर्मवित्।
लेभे सर्वज्ञतां या तु
साध्यते न तपस्विभिः॥

अपने माता पिता की सेवा करके ही किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने उस सर्वज्ञता को पा लिया था जो बडे बडे तपस्वी भी नहीं पाते!

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन
भक्तिः कार्या तु मातरि।
पितर्यपीति चोक्तं वै
पित्रा शक्तिसुतेन मे ॥

इसलिए सब प्रयत्न करके माता और पिता की भक्ति करनी चाहिए, मेरे पिता शक्तिपुत्र पराशर जी ने भी मुझसे यही कहा था!

—भगवान वेदव्यास

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नारी का श्रृंगार


(((((( नारी का श्रृंगार ))))))
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भगवान राम ने धनुष तोड़ दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, माताश्री इतना श्रृंगार क्यो ?
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बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है ? उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था।
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अर्थात ? सीताजी ने पुनः पूछा, इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध ?
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बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।
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और मेहंदी का अर्थ ?
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मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।
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और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी ?
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बेटी ! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।
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बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री ?
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बिंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।
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यह नथ क्यों ?
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नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’
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और यह टीका ?’
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पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।
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और यह बंदनी क्यों ?
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बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।
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पत्ती का अर्थ ?
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पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।
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कर्णफूल क्यों ?
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हे सीते ! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।
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और इस हंसली से क्या तात्पर्य है ?
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हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’
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मोहनलता क्यों ?
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मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।
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नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री ?
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पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कड़े का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा,
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छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बड़ियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।
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माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रृंगार है ?
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बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।
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हे राम ! कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांग्नी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे…

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Sanjay Gupta