Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav, यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

भारतीय संस्कृति में मां के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है


सुनील शास्त्री

भारतीय संस्कृति में मां के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है, लेकिन आज आधुनिक दौर में जिस तरह से मदर्स डे मनाया जा रहा है, उसका इतिहास भारत में बहुत पुराना नहीं है। इसके बावजूद दो-तीन दशक से भी कम समय में भारत में मदर्स डे काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

अलौकिक शब्द है माँ

मातृ दिवस-समाज में माताओं के प्रभाव व सम्मान का उत्सव है। मां शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। मां नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। मां के आगे सभी रिश्ते बौने पड़ जाते हैं। मातृत्व की छाया में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका सहारा बन जाती है। समाज में मां के ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने अकेले ही अपने बच्चों की जिम्मेदारी निभाई। मातृ दिवस सभी माताओं का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। एक बच्चे की परवरिश करने में माताओं द्वारा सहन की जाने वालीं कठिनाइयों के लिये आभार व्यक्त करने के लिये यह दिन मनाया जाता है। कवि रॉबर्ट ब्राउनिंग ने मातृत्व को परिभाषित करते हुए कहा है- सभी प्रकार के प्रेम का आदि उद्गम स्थल मातृत्व है और प्रेम के सभी रूप इसी मातृत्व में समाहित हो जाते हैं। प्रेम एक मधुर, गहन, अपूर्व अनुभूति है, पर शिशु के प्रति मां का प्रेम एक स्वर्गीय अनुभूति है।

‘मां!’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘मां’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘मां’ की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। जिन्होंने आपको और आपके परिवार को आदर्श संस्कार दिए। उनके दिए गए संस्कार ही मेरी दृष्टि में आपकी मूल थाती है। जो हर मां की मूल पहचान होती है।

माँ से ही मिलता है संस्कार

हर संतान अपनी मां से ही संस्कार पाता है। लेकिन मेरी दृष्टि में संस्कार के साथ-साथ शक्ति भी मां ही देती है। इसलिए हमारे देश में मां को शक्ति का रूप माना गया है और वेदों में मां को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। श्रीमद् भगवद् पुराण में उल्लेख मिलता है कि माता की सेवा से मिला आशीष सात जन्मों के कष्टों व पापों को दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है।

माँ के बारे में महान लोगों का कथन

प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने मां की महिमा को उजागर करते हुए कहा है कि जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मां के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं। अब्राहम लिंकन का मां के बारे में मार्मिक कथन है कि जो भी मैं हूँ, या होने की उम्मीद है, मैं उसके लिए अपने प्यारी माँ का कर्जदार हूँ। किसी औलाद के लिए ‘माँ’ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए माँ शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है।

मुसीबत में माँ ही क्यों याद आती है?

क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है क्योंकि वो माँ ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्मे होते हैं। बचपन में हमारा रातों का जागना, जिस वजह से कई रातों तक माँ सो भी नहीं पाती थी। वह गिले में सोती और हमें सूखे में सुलाती। जितना माँ ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। जाहिर है माँ के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी, कई सदियां भी कम है।
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‘मां’-इस लघु शब्द में प्रेम की विराटता/समग्रता निहित है। अणु-परमाणुओं को संघटित करके अनगिनत नक्षत्रों, लोक-लोकान्तरों, देव-दनुज-मनुज तथा कोटि-कोटि जीव प्रजातियों को मां ने ही जन्म दिया है। मां के अंदर प्रेम की पराकाष्ठा है या यूं कहें कि मां ही प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम की यह चरमता केवल माताओं में ही नहीं, वरन् सभी मादा जीवों में देखने को मिलती है। अपने बच्चों के लिए भोजन न मिलने पर हवासिल (पेलिकन) नाम की जल-पक्षिनी अपना पेट चीर कर अपने बच्चों को अपना रक्त-मांस खिला-पिला देती है।

माँ के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?

कितनी दयनीय बात है कि देश ने स्त्री की शक्ति के रूप में अवधारणा दी, जिसने पुराणों के पृष्ठों में देवताओं को 4 या 8 हाथ दिये किन्तु देवियों को 108 हाथ दिये, उसी ने स्त्रियों को पुरुषों से नीचा स्थान दिया और उन्हें वेद पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया और सबसे शोचनीय बात यह है कि उन्हें चारदिवारी में बंद कर दिया।’’ ‘मां’ को देवी सम्मान दिलाना वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता में से एक है। मां प्राण है, मां शक्ति है, मां ऊर्जा है, मां प्रेम, करुणा और ममता का पर्याय है। मां केवल जन्मदात्री ही नहीं जीवन निर्मात्री भी है। मां धरती पर जीवन के विकास का आधार है। मां ने ही अपने हाथों से इस दुनिया का ताना-बाना बुना है। सभ्यता के विकास क्रम में आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक इंसानों के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार, मस्तिष्क में लगातार बदलाव हुए। लेकिन मातृत्व के भाव में बदलाव नहीं आया। उस आदिमयुग में भी मां, मां ही थी। तब भी वह अपने बच्चों को जन्म देकर उनका पालन-पोषण करती थीं। उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा करना सिखाती थी। आज के इस आधुनिक युग में भी मां वैसी ही है। मां नहीं बदली। विक्टर ह्यूगो ने मां की महिमा इन शब्दों में व्यक्त की है कि एक मां की गोद कोमलता से बनी रहती है और बच्चे उसमें आराम से सोते हैं।
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धरती की विधाता है माँ

मां को धरती पर विधाता की प्रतिनिधि कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सच तो यह है कि मां विधाता से कहीं कम नहीं है। क्योंकि मां ने ही इस दुनिया को सिरजा और पाला-पोशा है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा किसी को नजर आये न आए मां हर किसी को हर जगह नजर आती है। कहीं अण्डे सेती, तो कहीं अपने शावक को, छोने को, बछड़े को, बच्चे को दुलारती हुई नजर आती है। मां एक भाव है मातृत्व का, प्रेम और वात्सल्य का, त्याग का और यही भाव उसे विधाता बनाता है।

मां विधाता की रची इस दुनिया को फिर से, अपने ढंग से रचने वाली विधाता है। मां सपने बुनती है और यह दुनिया उसी के सपनों को जीती है और भोगती है। मां जीना सिखाती है। पहली किलकारी से लेकर आखिरी सांस तक मां अपनी संतान का साथ नहीं छोड़ती। मां पास रहे या न रहे मां का प्यार दुलार, मां के दिये संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं। मां ही अपनी संतानों के भविष्य का निर्माण करती हैं। इसीलिए मां को प्रथम गुरु कहा गया है। स्टीव वंडर ने सही कहा है कि मेरी माँ मेरी सबसे बड़ी अध्यापक थी, करुणा, प्रेम, निर्भयता की एक शिक्षक। अगर प्यार एक फूल के जितना मीठा है, तो मेरी माँ प्यार का मीठा फूल है।
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कन्याभ्रूणों की हत्या नृशंस

प्रथम गुरु के रूप में अपनी संतानों के भविष्य निर्माण में मां की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मां कभी लोरियों में, कभी झिड़कियों में, कभी प्यार से तो कभी दुलार से बालमन में भावी जीवन के बीज बोती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मातृत्व के भाव पर नारी मन के किसी दूसरे भाव का असर न आए। जैसाकि आज कन्याभ्रूणों की हत्या का जो सिलसिला बढ़ रहा है, वह नारी-शोषण का आधुनिक वैज्ञानिक रूप है तथा उसके लिए मातृत्व ही जिम्मेदार है। महान् जैन आचार्य एवं अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य तुलसी की मातृ शक्ति को भारतीय संस्कृति से परिचित कराती हुई निम्न प्रेरणादायिनी पंक्तिया पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं- ‘‘भारतीय मां की ममता का एक रूप तो वह था, जब वह अपने विकलांग, विक्षिप्त और बीमार बच्चे का आखिरी सांस तक पालन करती थी। परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा की गई उसकी उपेक्षा से मां पूरी तरह से आहत हो जाती थी। वही भारतीय मां अपने अजन्मे, अबोल शिशु को अपनी सहमति से समाप्त करा देती है। क्यों? इसलिए नहीं कि वह विकलांग है, विक्षिप्त है, बीमार है पर इसलिए कि वह एक लड़की है। क्या उसकी ममता का स्रोत सूख गया है? कन्याभ्रूणों की बढ़ती हुई हत्या एक ओर मनुष्य को नृशंस करार दे रही है, तो दूसरी ओर स्त्रियों की संख्या में भारी कमी मानविकी पर्यावरण में भारी असंतुलन उत्पन्न कर रही है।’’ अन्तर्राष्ट्रीय मातृ-दिवस को मनाते हुए मातृ-महिमा पर छा रहे ऐसे अनेक धुंधलों को मिटाना जरूरी है, तभी इस दिवस की सार्थकता है।

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Copied1972 में आयरलैंड-ब्रिटिश युद्ध के दौरान ली गई यह तस्वीर एक आयरिश लड़की की है. वह अपने मंगेतर की बंदूक से गोली चला रही है जो ब्रिटिश आर्मी से युद्ध के दौरान घायल हो गया था.
इसका घायल मंगेतर एक कार द्वारा सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिए जाने के कारण बच गया जबकि प्रेमिका ब्रिटिश सैनिकों से मुठभेड़ के दौरान मारी गई.
जब इंग्लिश सेना के बटालियन कमांडर को यह पता लगा कि वे एक महिला से लड़ रहे थे तब उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया
कि वे महिला के शव को हाथ न लगाएं और आयरिश लोगों को उसका शव दफ़नाने की अनुमति दे दी. तब उन लोगों ने कमांडर को यह कहते भी सुना कि-
“We defend a queen who doesn’t care about us. And this woman cares about her lover and her land.”
“हम एक रानी की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं जिसे हमारी परवाह नहीं, और यह महिला अपने प्रेमी और मातृभूमि की परवाह करती है”
यह तस्वीर आयरलैंड में महिला दिवस पर सर्वश्रेष्ठ चुनी गई और लिखा गया –
“Don’t be afraid to be associated with a strong woman the day may come and she’ll be your only army”.
“एक मजबूत महिला को अपनाने से मत डरिये, जब वक़्त आएगा वह तुम्हारा इकलौता हथियार होगी”
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अरुण सुक्ला

संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण
१. उषा के समान प्रकाशवती-
ऋग्वेद ४/१४/३
हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.
२. वीरांगना-
यजुर्वेद ५/१०
हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.
३. वीर प्रसवा
ऋग्वेद १०/४७/३
राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे
हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.
४. विद्या अलंकृता
यजुर्वेद २०/८४
विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.
५. स्नेहमयी माँ
अथर्वेद ७/६८/२
हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.
६. अन्नपूर्ण
अथर्ववेद ३/२८/४
इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:
जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं

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अफ्रीका की हिम्बा प्रजाति में बच्चे का जन्म उस दिन से माना जाता है, जिस दिन स्त्री गर्भधारण का निर्णय करती है। उस दिन वो स्त्री अकेले कहीं बैठती है और खुद ही एक गाना रचती है-गुनती है। फिर जाकर ‘वो गीत’ उस आदमी को सुनाती है, जिसे वो अपने होने वाले शिशु के पिता की तरह देखती है। फिर वे दोनों मिल के वो गीत गाते है…संसर्ग के बाद भी दोनों वही गीत गाते हैं।

इसको आप इस तरह देख सकते हैं कि दोनों अपने होने वाले उस बच्चे को बुला रहे होते हैं, स्वागत कर रहे होते हैं, जिसकी उन्होंने कल्पना की है। जब स्त्री गर्भवती हो जाती है तो वही गीत वो अपने घर-पड़ोस-गांव की औरतों को सिखाती है, ताकि प्रसवपीड़ा के दौरान सब उसी गीत को गायें और शिशु के जन्म का स्वागत करें ।

‘वो गाना’ उस बच्चे के ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाता है, जिसे हर ज़रूरी अवसर पर गाया जाता है। जब उसे चोट लगती है, तब भी।

यहाँ तक कि जब कोई हिम्बा स्त्री/पुरुष अपराध करता है तो सबसे पहले उन्हें बीच गाँव में ले जाया जाता हैं और सारे लोग हाथ पकड़ के एक गोल घेरा बनाते हैं और फिर वही गीत उसको सुनाते हैं, जो उसकी माँ ने उसके जन्म से पहले ही उसके लिए गुना था।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह सब करने का औचित्य क्या है? दरअसल हिम्बा जनजाति सुधार के लिए दंड को महत्व नहीं देती, बल्कि व्यक्ति को फिर से उसकी पहचान से, अपनी जड़ों से जोड़ देने को ज़रूरी मानती है। ऐसा करके वे याद दिलाते हैं कि तुम्हारा असल गीत तो यह है कि तुम कितने निर्दोष थे-निष्पाप थे, यह क्या करने लगे हो तुम !!!
हिब्बा लोग गलती पर पश्चाताप कराने को प्रमुखता देते हैं, इंसान को उसकी इनोसेंस भूलने नहीं देते, पुनः स्मरण कराते हैं ।

और जब वो मनुष्य मरता है, तब भी-जो लोग उसका गीत जानते हैं, वो सब उसे दफनाते वक़्त भी वही गीत गाते हैं!
आखिरी बार!!
वही गीत जो उसकी “माँ” ने गुनगुनाया था, उसके आने से भी बहुत पहले!!

साभार-Apoorva Pratap Singh

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औरत का सफर☺🙏*
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😔बाबुल का घर छोड़ कर पिया के घर आती है..
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☺एक लड़की जब शादी कर औरत बन जाती है..
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😔अपनों से नाता तोड़कर किसी गैर को अपनाती है..
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☺अपनी ख्वाहिशों को जलाकर किसी और के सपने सजाती है..
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☺सुबह सवेरे जागकर सबके लिए चाय बनाती है..
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😊नहा धोकर फिर सबके लिए नाश्ता बनाती है..
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☺पति को विदा कर बच्चों का टिफिन सजाती है..
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😔झाडू पोछा निपटा कर कपड़ों पर जुट जाती है..
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😔पता ही नही चलता कब सुबह से दोपहर हो जाती है..
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☺फिर से सबका खाना बनाने किचन में जुट जाती है..
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☺सास ससुर को खाना परोस स्कूल से बच्चों को लाती है..
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😊बच्चों संग हंसते हंसते खाना खाती और खिलाती है..
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☺फिर बच्चों को टयूशन छोड़,थैला थाम बाजार जाती है..
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☺घर के अनगिनत काम कुछ देर में निपटाकर आती है..
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😔पता ही नही चलता कब दोपहर से शाम हो जाती है..
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😔सास ससुर की चाय बनाकर फिर से चौके में जुट जाती है..
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☺खाना पीना निपटाकर फिर बर्तनों पर जुट जाती है..
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😔सबको सुलाकर सुबह उठने को फिर से वो सो जाती है..
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😏हैरान हूं दोस्तों ये देखकर सौलह घंटे ड्यूटी बजाती है..
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😳फिर भी एक पैसे की पगार नही पाती है..
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😳ना जाने क्यूं दुनिया उस औरत का मजाक उडाती है..
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😳ना जाने क्यूं दुनिया उस औरत पर चुटकुले बनाती है..
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😏जो पत्नी मां बहन बेटी ना जाने कितने रिश्ते निभाती है..
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😔सबके आंसू पोंछती है लेकिन खुद के आंसू छुपाती है..
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🙏नमन है मेरा घर की उस लक्ष्मी को जो घर को स्वर्ग बनाती है..☺
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*☺ड़ोली में बैठकर आती है और अर्थी पर लेटकर जाती
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Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

आजकल अनभिज्ञविद्वान तथाकथित विद्वानो द्वारो ए कहना की स्त्रियो को गुरु नही बनाना चाहिए उनके लिए एक तमाचा सप्रमाण सहित

नारीदीक्षाविमर्श

नारियों को गुरु बनाना चाहिए या नहीं ??–इस विषय पर बड़ा विवाद चल रहा है । शास्त्रीय प्रमाणों के कुछ वाक्य प्रस्तुत करके पण्डितम्मन्य नारी दीक्षा का खण्डन बडे ज़ोर शोर से कर रहे हैं ।उनका एक वाक्य है–

सामान्यत: द्विजाति का गुरु अग्नि, वर्णों का गुरु ब्राह्मण, स्त्रियों का गुरु पति और सबका गुरु अतिथि होता है-

गुरुग्निद्विजातीनां वर्णानां बाह्मणो गुरु:.
पतिरेको गुरु: स्त्रीणां सर्वेषामतिथिर्गुरु:॥–औशनस स्मृति

” पतिरेको गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु:॥”–चाणक्यनीति:

कूर्ममहापुराण के उत्तरार्ध अध्याय-१२ का ४८-४९ वां श्लोक प्रस्तुत है । जिसमें स्त्री का गुरु पति ही कहा गया है-

“गुरुरग्निर् र्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु: ॥४८॥ पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु: ॥४९॥”

द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) का गुरु अग्नि है । चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है । स्त्रियों का गुरु पति ही है । और अभ्यागत सबका गुरु है ।

श्लोक का सीधा अर्थ लें तो सब गड़बड़ हो जायेगा ।क्या द्विजातियों का गुरु अग्नि है?? ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों में किसको अग्नि ने दीक्षा दी है ?? द्विजातीनां में बहुवचन है । तथा इन तीनों के प्रति अग्नि का गुरुत्व प्रत्यक्ष बाधित है । इन तीनों के गुरु अग्निदेव से भिन्न कोई देहधारी विप्र होते हैं ।दूसरी बात यह कि जब द्विजातियों का गुरु अग्नि बतला दिये गये । तब शेष बचे शूद्र । तब शूद् का गुरु ब्राह्मण को बतलाना चाहिये, न कि सभी वर्णों का=वर्णानां।

श्लोक के चतुर्थ पाद में अभ्यागत अर्थात् अतिथि को सबका गुरु बतलाया गया है । सबमें तो सभी वर्ण के लोग आ गये । और अतिथि किसी भी वर्ण का प्राणी हो सकता है –

” यस्य न ज्ञायते नाम न च गोत्रं नच स्थिति:। अकस्मात् गृहमायाति सोSतिथि: प्रोच्यते बुधै: ॥

महर्षि शातातप कहते हैं कि प्रिय हो या मूर्ख अथवा पतित जो वैश्वदेव कर्म के अन्त में पहुँच जाय वह अतिथि स्वर्ग का संक्रम ही होता है । अब बतलायें क्या मूर्ख या पतित व्यक्ति ब्राह्मणादि सभी वर्णों का गुरु माना जा सकता है?? नहीं ना ।

प्रकृत श्लोक में गुरु शब्द का अर्थ दीक्षा गुरु नहीं अपितु सम्मान्य है । द्विजातियों का गुरु अग्नि है । अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वैश्य इन सबको अग्नि का सम्मान करना चाहिए । अग्निहोत्रादि से प्रतिदिन त्रैवर्णिकों को अग्नि की पूजा करनी चाहिए । वर्णानां= सभी वर्णों का गुरु = सम्मान्य आदरणीय ब्राह्मण होता है । ब्राह्मण स्वयं भी ब्राह्मण का सम्मान करे । इसी प्रकार स्त्री का गुरु= समादरणीय उसका पति ही होता है । पति के कारण ही सास ससुर आदि से सम्बन्ध है । परिवार के अन्य सदस्यों की अपेक्षा पति ही अधिक सम्माननीय है नारी के लिए । यही उक्त श्लोक का अर्थ है ।

इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि स्त्री किसी को गुरु ही न बनाये । पद्ममहापुराण के उत्तरखण्ड के २५४वें अध्याय में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी ने महाराज दिलीप को यह तथ्य प्रकाशित किया है कि भगवती उमा स्वयं पति चन्द्रशेषर भगवान् की अर्धांगिनी होने पर भी उनसे मन्त्र न लेकर मह्रर्षि वामदेव को अपना गुरु बनायीं ।

सर्वज्ञ एवं सर्वसमर्थ भगवान् शंकर भी अपनी प्रियतमा पार्वती जी को महर्षि वामदेव के पास ही दीक्षा के लिए भेजते हैं ।

शिव जी कहते हैं हे गिरिजे ! गुरु के उपदेश द्वारा ही केशव की पूजा करके प्राणी मनोवांछित फल प्राप्त कर सकता है ,अन्यथा नहीं ।–

“गुरूपदेशमार्गेण पूजयित्वैव केशवम् ।प्राप्नोति वाञ्छितं सर्वं नान्यथा भूधरात्मजे ॥७॥

भगवान् भव की बात मानकर भगवती पार्वती वामदेव महर्षि के समीप भगवान् विष्णु के पूजन की लालसा से पहुँचीं। –

एवमुक्ता तदा देवी वामदेवान्तिकं नृप ! जगाम सहसा हृष्टा विष्णुपूजनलालसा ॥८॥

और उनको गुरु रूप में प्राप्त करके पूजन और प्रणाम किया तथा विनम्रभाव से बोलीं–

समेत्य तं गुरुं देवी पूजयित्वा प्रणम्य च ।विनीता प्राञ्जलिर्भूत्वा उवाच मुनिसत्तमम् ॥९॥

वे महर्षि वामदेव से कहती हैं कि भगवन् मैं आपकी कृपा से भगवन्मन्त्र प्राप्त करके हरिपूजन करना चाहती हूँ । आप मुझपर कृपा करें ।तत्पश्चात् गुरुवर महर्षि वामदेव ने भगवती शैलपुत्री को विधिपूर्वक भगवन्मन्त्र दिया –

इत्युक्तस्तु तया देव्या वामदेवो महामुनि: । तस्यै मन्त्रवरं श्रेष्ठं ददौ स विधिना गुरु: ॥११॥

क्या जगद्गुरु कामारि भगवान् शङ्कर से भी आजकल के तथाकथित कामकिङ्कर ज्ञानी बन चुके हैं ??
नारी को केवल कामवासना की पूर्ति का साधन समझने वाला ही पत्नी के परमार्थ पथ का घातक बनता है ।और कहता है कि–” पतिरेको गुरु: स्त्रीणां-”

भगवान् शिव ने भगवती पार्वती को भगवान् विष्णु की आराधना के विषय में बतलाया कि वह सभी आराधनाओं सर्वश्रेष्ठ है । भगवान् भव स्वयं सर्वज्ञ तथा सम्पूर्ण मन्त्रशास्त्र के मूल हैं फिर भी अपनी प्रियतमा को स्वयं मन्त्र न देकर ब्रह्मर्षि वामदेव के पास भेजते हैं ।इससे सिद्ध होता है कि “पति स्वयम् अपनी परिणीता को मन्त्र प्रदान न करे ।”

और इस तथ्य में प्रमाण है ब्रह्मवैवर्तमहापुराण का देवर्षि नारद के प्रति चतुरानन का वचन । जब उन्होंने अपने पिता ब्रह्मा जी से कृष्णमन्त्र प्रदान करने की उत्कण्ठा व्यक्त की । तब ब्रह्मा जी ने उन्हें मन्त्र देने से मना करते हुए कहा—

” पत्युर्मन्त्रं पितुर्मन्त्रं न गृह्णीयाद्विचक्षण ।”–ब्रह्मखण्ड-२४/४२,

हे प्राज्ञ ! कोई भी प्राणी पति एवं पिता से मन्त्रग्रहण न करे ।

यह एक प्रबल तमाचा है उन लोगों को जो स्त्री का गुरु पति को बतलाने का प्रयास करते हैं । ” पतिरेको गुरु: स्त्रीणां ” वचन में गुरु का अर्थ मात्र पूज्य है, दीक्षा गुरु नहीं । अतएव भगवान् भोलेनाथ ने अपनी प्राणवल्लभा भगवती उमा को ब्रह्मर्षि वामदेव से दीक्षा लेने भेजा । प्राज्ञ को शास्त्रीय वचनों का सामञ्जस्य बिठाना चाहिए ।
नारी को मात्र भोग की वस्तु समझने वाले भगवदुपासना या मोक्षमार्ग की ओर उसका बढ़ना कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?? ॥अस्तु॥

कुमारी कन्याओं के मन्त्रदीक्षा में प्रमाण–

श्रीपार्वती जी ने विवाह से पूर्व देवर्षि नारद से शिवमन्त्र की दीक्षा ग्रहण की थी । भगवती शैलजा कहती हैं कि हे सर्वज्ञ मुने ! आप मुझे भगवान् रुद्र की आराधना के लिए मन्त्र प्रदान करें–

त्वं तु सर्वज्ञ जगतामुपकारकर प्रभो । रुद्रस्याराधनार्थाय मन्त्रं देहि मुने हि मे ॥

क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों का सद्गुरु के विना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है । ऐसी सनातनी श्रुति मैंने पहले सुन रखी है –

” नहि सिद्ध्यति क्रिया कापि सर्वेषां सद्गुरुं विना । मया श्रुता पुरा यत्या श्रुतिरेषा सनातनी ॥

ऐसा सुनकर देवर्षि नारद ने भगवती पार्वती को विधिपूर्वक पञ्चाक्षर शिवमन्त्र का उपदेश दिया–

इति श्रुत्वा वचस्तस्या: पार्वत्या मुनिसत्तम । पञ्चाक्षरं शम्भुमन्त्रं विधिपूर्वमुपादिशत् ॥

बाल्यावस्था में ही कुन्ती जी को महर्षि दुर्वासा ने देवों के आवाहन का विशेष मन्त्र दिया था–

तस्यै स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षया ।अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनि:॥ –महाभारत, आदिपर्व-१११/६,

स्कन्दमहापुराण के ब्रह्मोत्तरखण्ड- ३ के प्रथम अध्याय में यह कथा आयी है कि प्राचीनकाल में मथुरानरेश दाशार्ह का विवाह काशीनरेश की कन्या कलावती से हो गया । महा राज ने अपनी पत्नी का अंग बलपूर्वक स्पर्श किया तो उसका देह लौहपिण्ड की भाँति जलता हुआ प्रतीत हुआ । राजा ने कारण पूछा कि तुम्हारा सुकोमल शरीर अग्नि के समान क्यों लग रहा है –

” कथमग्निसमं जातं वपु:पल्लवकोमलम् ?–१/४३,

महारानी ने उत्तर दिया कि बाल्यावस्था में महर्षि दुर्वासा ने मुझ पर कृपा करके पञ्चाक्षरी विद्या ( शिवमन्त्र ) का उपदेश किया था । उस मन्त्र के प्रभाव से मेरे समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं ।अत: पापी पुरुष मेरा स्पर्श नहीं कर सकते ।आप नित्य स्नान नहीं करते हैं और कुलटा वेश्याओं का सेवन तथा मदिरापान करते रहते हैं । इसलिए पापपरायण आप मेरे निष्पाप शरीर का स्पर्श नहीं सह सकते । अपनी शुद्धि के लिए महाराज ने पत्नी से पञ्चाक्षरी मन्त्र प्रदान करने की बात कही । तो उन्होंने कहा कि मैं आपको मन्त्र नहीं दे सकती ; क्योंकि आप मेरे पूज्य हैं । आप मन्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि गर्ग को अपना गुरु बनायें —

” नाहं तवोपदेशं वै कुर्यां मम गुरुर्भवान् । उपातिष्ठ गुरुं राजन् गर्गं मन्त्रविदाम्वरम् –१/५०,

तत्पश्चात पत्नी के साथ महर्षि गर्ग के चरणों में जाकर महाराज दाशार्ह ने वन्दना की और उनसे मन्त्रदीक्षा ली–

इति सम्भाषमाणौ तौ दम्पती गर्गसन्निधिम् । प्राप्य तच्चरणौ मूर्ध्ना ववन्दाते कृताञ्जली ॥–१/५१,
तन्मस्तके करं न्यस्य ददौ मन्त्रं शिवात्मकम् ॥१/५७

पूर्वोक्त इतिहास एवं पुराणों के वचनों से यह सिद्ध होता है कि पति से भिन्न व्यक्ति स्त्रियों का दीक्षा गुरु
होता है ।

पतिरेको गुरु: स्त्रीणां का तात्पर्य है कि स्त्री के लिए अन्य सम्बन्धियों की अपेक्षा ”पति ही पूज्य है” ; क्योंकि ननद, सास, ससुर आदि सम्बन्ध पतिमूलक ही हैं । पति की उपेक्षा करके इन सम्बन्धियों से उसका कल्याण कथमपि नहीं हो सकता है ।

##आचार्य सियारामदासनैयायिक##