Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

સ્ત્રી વગર જિંદગી નકામી છે
પુરુષ ને હમેંશા સ્ત્રી સાથે જ જોઈએ માત્ર મંદિર માં કૃષ્ણ એ રાધા કે રુકમણી , રામ ભગવાને સીતા , શંકર ભગવાને પાર્વતી અમસ્તા જ નથી રાખ્યા

આપણે મનુષ્ય પણ જુઓ

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ભણતી વખતે વિદ્યા
પછી લક્ષ્મી
અને છેલ્લે શાંતિ
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સવારે ઉષા ની સંગાથે દિવસ ઉગે અને સંધ્યા ની સાથે દિવસ આથમે પણ કામ અન્નપૂર્ણા માટે જ કરીએ

વળી નિશા સમયે પણ નિંદીયા રાણી અને ઊંઘ્યા પછી પણ સપના

મંત્રોચ્ચાર કરીએ તો ગાયત્રી અને વાંચીએ તો ગીતા
મંદિર માં ભગવાન સામે વંદના ,પૂજા અને આરતી જોઈએ એ પણ વળી શ્ર્ર્ધા સાથે જ હો એમાય જો અંધકાર હોય તો જ્યોતિ અને એકલવાયુ લાગે તો પ્રેમવતી અને સ્નેહા

જો લડાઈ લડવા જઈએ તો જ્યા અને વિજ્યા ઉમર લાયક થઈએ તો કરુણા અને લાગણી એ પણ મમતા સાથે જ

જો ગુસ્સે થઈએ તો ક્ષમા જોઈએ
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માટે ધન્ય છે તમામ સ્ત્રીજાતિ ને જેમના વગર આ દુનિયા માં પુરુષો અધૂરા જ છે

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Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

क्या नारी सिर्फ भोग की वस्तु है ?
कृपया पूरा पढ़े :-
☞ जब वोडाफोन के एक विज्ञापन में दो पैसो मे लड़की पटाने की बात की जाती है तब कौन ताली बजाता है?
☞ हर विज्ञापन ने अधनंगी नारी दिखा कर ये विज्ञापन एजेंसिया / कम्पनियाँ क्या सन्देश देना चाहती है ?
☞ इस पर कितने चैनल बहस करेंगे ?
☞ पेन्टी हो या पेन्ट हो, कॉलगेट या पेप्सोडेंट हो, साबुन या डिटरजेण्ट हो ,कोई भी विज्ञापन हो, सब में ये छरहरे बदन वाली छोरियो के अधनंगे बदन को परोसना क्या नारीत्व के साथ बलात्कार नहीं है?
☞ फिल्म को चलाने के लिए आईटम सॉन्ग के नाम पर लड़कियो को जिस तरह
मटकवाया जाता है !
☞ या यू कहे लगभग आधा नंगा करके उसके अंग प्रत्यंग को फोकस के साथ दिखाया जाता है !
☞ क्या वो स्त्रीयत्व के साथ बलात्कार करना नहीं है?
☞ पत्रिकाए हो या अखबार
सबमे आधी नंगी लड़कियो के फोटो किसके लिए?
और
☞ क्या सिखाने के लिए भरपूर
मात्र मे छापे जाते है?
☞ ये स्त्रीयत्व का बलात्कार
नहीं है क्या?
☞ दिन रात ,टीवी हो या पेपर , फिल्मे हो या सीरियल, लगातार
स्त्रीयत्व का बलात्कार होते
देखने वाले, और उस पर खुश होने वाले, उसका समर्थन करने वाले
क्या बलात्कारी नहीं है ?
☞ संस्कृति के साथ ,
☞ मर्यादाओ के साथ,
☞ संस्कारो के साथ,
☞ लज्जा के साथ
☞ जो ये सब किया जा रहा है वो बलात्कार नहीं है क्या?
☞ निरंतर हो रहे नारीत्व के बलात्कार के समर्थको को नारी के
बलात्कार पर शर्म आना उसी तरह है !
☞ जैसे मांस खाने वाला , लहसुन
प्याज पर नाक सिकोडे
☞ H देश में “आजा तेरी _ मारू , तेरे सर से _ _ का भूत उतारू” जैसे गाने ?
☞ और इसी तरह का नंगा नाच फैलाने वाले भांड युवाओ के
“आइडल” बन रहे हो वहा बलात्कार और छेडछाड़ की घटनाए नहीं बढेंगी तो और क्या बढ़ेगा?
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य ये है कि जब तक हम नारी जाति को नारित्व का दर्जा नहीं देंगे तब तक महिला विकास या महिला सशक्तिकरण की बाते बेमानी लगती है ।
आज मिडिया चीख़ चीख़ कर कहती है महिलाओं को आज़ादी दो, फिर कहती है सुरक्षा दो। क्या दोनों ही चीजें एक साथ हो सकतीं है। मिडिया किसे बेवकूफ बना रही है अपने व्यापार के लिए…..

संजय गुप्ता

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

#नास्तिमातृसमो_गुरुः
माता के समान कोई भी गुरु नही हो सकता…..

।।मातृ देवो भव: पितृ देवो भव:।।

पितुरप्यधिका माता
गर्भधारणपोषणात् ।
अतो हि त्रिषु लोकेषु
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है!

नास्ति गङ्गासमं तीर्थं
नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।
नास्ति शम्भुसमः पूज्यो
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।

नास्ति चैकादशीतुल्यं
व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
तपो नाशनात् तुल्यं
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

एकादशी के समान त्रिलोक में प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढकर कोई तप नहीं और माता के समान गुरु नहीं!

नास्ति भार्यासमं मित्रं
नास्ति पुत्रसमः प्रियः।
नास्ति भगिनीसमा मान्या
नास्ति मातृसमो गुरुः॥

पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं, बहन के समान कोई माननीय नहीं और माता के समान गुरु नही!

न जामातृसमं पात्रं
न दानं कन्यया समम्।
न भ्रातृसदृशो बन्धुः
न च मातृसमो गुरुः ॥

दामाद के समान कोई दान का पात्र नहीं, कन्यादान के समान कोई दान नहीं, भाई के जैसा कोई बन्धु नहीं और माता जैसा गुरु नहीं!

देशो गङ्गान्तिकः श्रेष्ठो
दलेषु तुलसीदलम्।
वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो
गुरुर्माता गुरुष्वपि ॥

गंगा के किनारे का प्रदेश अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, पत्रों में तुलसीपत्र, वर्णों में ब्राह्मण और माता तो गुरुओं की भी गुरु है!

पुरुषः पुत्ररूपेण
भार्यामाश्रित्य जायते।
पूर्वभावाश्रया माता
तेन सैव गुरुः परः ॥

पत्नी का आश्रय लेकर पुरुष ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है, इस दृष्टि से अपने पूर्वज पिता का भी आश्रय माता होती है और इसीलिए वह परमगुरु है!

मातरं पितरं चोभौ
दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।
प्रणम्य मातरं पश्चात्
प्रणमेत् पितरं गुरुम् ॥

धर्म को जानने वाला पुत्र माता पिता को साथ देखकर पहले माता को प्रणाम करे फिर पिता और गुरु को!

माता धरित्री जननी
दयार्द्रहृदया शिवा ।
देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा
निर्दोषा सर्वदुःखहा॥

माता, धरित्री , जननी , दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी , त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, सभी दुःखों का नाश करने वाली है!

आराधनीया परमा
दया शान्तिः क्षमा धृतिः ।
स्वाहा स्वधा च गौरी च
पद्मा च विजया जया ॥

आराधनीया, परमा, दया , शान्ति , क्षमा, धृति, स्वाहा , स्वधा, गौरी , पद्मा, विजया , जया,

दुःखहन्त्रीति नामानि
मातुरेवैकविंशतिम् ।
शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः
सर्वदुःखाद् विमुच्यते ॥

और दुःखहन्त्री -ये माता के इक्कीस नाम हैं। इन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है!

दुःखैर्महद्भिः दूनोऽपि
दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्।
यमानन्दं लभेन्मर्त्यः
स किं वाचोपपद्यते ॥

बड़े बड़े दुःखों से पीडित होने पर भी भगवती माता को देखकर मनुष्य जो आनन्द प्राप्त करता है उसे वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता!

इति ते कथितं विप्र
मातृस्तोत्रं महागुणम्।
पराशरमुखात् पूर्वम्
अश्रौषं मातृसंस्तवम्॥

हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् गुण वाले मातृस्तोत्र को कहा , इसे मैंने अपने पिता पराशर के मुख से पहले सुना था!

सेवित्वा पितरौ कश्चित्
व्याधः परमधर्मवित्।
लेभे सर्वज्ञतां या तु
साध्यते न तपस्विभिः॥

अपने माता पिता की सेवा करके ही किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने उस सर्वज्ञता को पा लिया था जो बडे बडे तपस्वी भी नहीं पाते!

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन
भक्तिः कार्या तु मातरि।
पितर्यपीति चोक्तं वै
पित्रा शक्तिसुतेन मे ॥

इसलिए सब प्रयत्न करके माता और पिता की भक्ति करनी चाहिए, मेरे पिता शक्तिपुत्र पराशर जी ने भी मुझसे यही कहा था!

—भगवान वेदव्यास

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, रामायण - Ramayan

नारी का श्रृंगार


(((((( नारी का श्रृंगार ))))))
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भगवान राम ने धनुष तोड़ दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, माताश्री इतना श्रृंगार क्यो ?
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बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है ? उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था।
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अर्थात ? सीताजी ने पुनः पूछा, इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध ?
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बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।
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और मेहंदी का अर्थ ?
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मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।
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और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी ?
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बेटी ! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।
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बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री ?
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बिंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।
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यह नथ क्यों ?
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नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’
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और यह टीका ?’
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पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।
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और यह बंदनी क्यों ?
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बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।
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पत्ती का अर्थ ?
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पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।
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कर्णफूल क्यों ?
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हे सीते ! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।
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और इस हंसली से क्या तात्पर्य है ?
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हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’
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मोहनलता क्यों ?
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मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।
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नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री ?
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पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कड़े का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा,
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छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बड़ियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।
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माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रृंगार है ?
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बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।
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हे राम ! कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांग्नी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे…

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Sanjay Gupta

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

बेटियाँ चावल उछाल बिना पलटे, महावर लगे कदमों से विदा हो जाती हैं ।


बेटियाँ चावल उछाल
बिना पलटे,
महावर लगे कदमों से विदा हो जाती हैं ।

छोड़ जाती है बुक शेल्फ में,
कवर पर अपना नाम लिखी किताबें ।
दीवार पर टंगी खूबसूरत आइल पेंटिंग के एक कोने पर लिखा अपना नाम ।
खामोशी से नर्म एहसासों की निशानियां,
छोड़ जाती है ……
बेटियाँ विदा हो जाती हैं ।

रसोई में नए फैशन की क्राकरी खरीद,
अपने पसंद की सलीके से बैठक सजा,
अलमारियों में आउट डेटेड ड्रेस छोड़,
तमाम नयी खरीदादारी सूटकेस में ले,
मन आँगन की तुलसी में दबा जाती हैं …
बेटियाँ विदा हो जाती हैं।

सूने सूने कमरों में उनका स्पर्श,
पूजा घर की रंगोली में उंगलियों की महक,
बिरहन दीवारों पर बचपन की निशानियाँ,
घर आँगन पनीली आँखों में भर,
महावर लगे पैरों से दहलीज़ लांघ जाती है…

बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं ।

एल्बम में अपनी मुस्कुराती तस्वीरें ,
कुछ धूल लगे मैडल और कप ,
आँगन में गेंदे की क्यारियाँ उसकी निशानी,
गुड़ियों को पहनाकर एक साड़ी पुरानी,
उदास खिलौने आले में औंधे मुँह लुढ़के,
घर भर में वीरानी घोल जाती हैं ….

बेटियाँ चावल उछाल विदा हो जाती हैं।

टी वी पर शादी की सी डी देखते देखते,
पापा हट जाते जब जब विदाई आती है।
सारा बचपन अपने तकिये के अंदर दबा,
जिम्मेदारी की चुनर ओढ़ चली जाती हैं ।
बेटियाँ चावल उछाल बिना पलटे विदा हो जाती हैं ।
……बस यही एक ऐसा पौधा है ..जो बीस पच्चीस साल का होकर भी दूसरे आंगन मे जा के फिर उस आंगन का होकर खुशबू, छांव , फल , सकून और हरियाली देता है …ये तुलसी से कम योग्य नहीं …..ये भी पूजने योग्य है …

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

श्रेष्ठतर माताएँ –


श्रेष्ठतर माताएँ –

माँ हर स्थिति में माँ है । बच्चे को संकट में डालकर भी शिक्षण देना उसका कर्तव्य है । घोंसले में बैठके नन्हें से परिन्दे ने पर फड़फड़ाये और सहम कर जहाँ था, चिपककर बैठ गया । बच्चे को भयभीत देख माँ ने उसे घोंसले से धकेलते हुए कहा – “ जब तक तू भय नहीं छोड़ेगा, उड़ना कहाँ से आयेगा ? “ दूसरे क्षण परिन्दा हवा में उड़ रहा था ।

चित्तौड़ के राजकुमार एक चीते का पीछा कर रहे थे । वह चोट खाकर झाड़ियों में जा छिपा था । राजकुमार घोड़े को झाड़ी के इर्द-गिर्द घुमा रहे थे ; पर छिपे चीते को बाहर निकालने में वे सफल न हो पा रहे थे ।

किसान की लड़की यह दृश्य देख रही थी । उसने राजकुमार से कहा – “ घोड़ा दौड़ाने से हमारा खेत खराब होता है । आप पेड़ की छाया में बैठे । चीते को मार कर मैं लाये देती हूँ ।” वह एक मोटा डंडा लेकर झाड़ी में घुस गई ओर मल्ल युद्ध में चीते पछाड़ दिया । उसे घसीटते हुए बाहर ले आई और राजकुमार के सामने पटक दिया ।

इस पराक्रम पर राजकुमार दंग रह गये । उन्होंने किसान से विनय करके उस लड़की से विवाह कर लिया । प्रख्यात योद्धा हमीर उस लड़की की कोख से पैदा हुआ था । माताओं के अनुरूप संतान का निर्माण होता है।

सुभद्रा की कोख से अभिमन्यु जन्मे थे । अंजनी ने हनुमान को जन्म दिया था । श्रेष्ठतर की माताएँ अपने गुण, कर्म, स्वभाव के अनुरूप ही श्रेष्ठ संतानों को जन्म देती है। हिरण्यकश्यपु के घर प्रह्लाद जैसा भक्त होना ;नारी की -उनकी धर्मप्राण माता कयाधू की योग्यता का प्रमाण है।

आचार्य विकाज़ह शर्मा

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

एक स्त्री द्वारा लिखित बेहद संवेदन शील और अन्दर तक झकझोरने वाला लेख.


एक स्त्री द्वारा लिखित बेहद संवेदन शील और अन्दर तक झकझोरने वाला लेख..😢 मुझे याद नहीं कि बचपन में कभी सिर्फ इस वजह से स्‍कूल में देर तक रुकी रही होऊं …कि बाहर बारिश हो रही है। ना। भीगते हुए ही घर पहुंच जाती थी। और तब बारिश में भीगने का मतलब होता था घर पर अजवाइन वाले गर्म सरसों के तेल की मालिश। और ये हर बार होता ही था। मौज में भीगूं तो डांट के साथ-साथ सरसों का तेल हाजिर। फिर जब घर से दूर रहने लगी तो धीरे- धीरे बारिश में भीगना कम होते -होते बंद ही हो गया। यूं नहीं कि बाद में जिंदगी में लोग नहीं थे। लेकिन किसी के दिमाग में कभी नहीं आया कि बारिश में भीगी लड़की के तलवों पर गर्म सरसों का तेल मल दिया जाए। कभी नहीं। ऐसी सैकड़ों चीजें, जो ” मां ” हमेशा करती थीं, मां से दूर होने के बाद किसी ने नहीं की। किसी ने कभी बालों में तेल नहीं लगाया । मां आज भी एक दिन के लिए भी मिले तो बालों में तेल जरूर लगाएं। बचपन में खाना मनपसंद न हो तो मां दस और ऑप्‍शन देती। अच्‍छा घी-गुड़ रोटी खा लो, अच्‍छा आलू की भुजिया बना देती हूं। मां नखरे सहती थी, इसलिए उनसे लडियाते भी थे। लेकिन बाद में किसी ने इस तरह लाड़ नहीं दिखाया। मैं भी अपने आप सारी सब्जियां खाने लगीं। मेरी जिंदगी में मां सिर्फ एक ही है। दोबारा कभी कोई मां नहीं आई, हालांकि बड़ी होकर मैं जरूर मां बन गई। लड़कियां हो जाती हैं न मां अपने आप।। पति कब छोटा बच्‍चा हो जाता है, कब उस पर मुहब्‍बत से ज्‍यादा दुलार बरसने लगता है, पता ही नहीं चलता। उनके सिर में तेल भी लग जाता है, ये परवाह भी होने लगती है कि उसका पसंदीदा (फेवरेट ) खाना बनाऊं, उसके नखरे भी उठाए जाने लगते हैं। लड़कों की जिंदगी में कई माएं आती हैं। बहन भी मां हो जाती है, पत्‍नी तो होती ही है, बेटियां भी एक उम्र के बाद बूढ़े पिता की मां ही बन जाती हैं, लेकिन लड़कियों के पास सिर्फ एक ही मां है। बड़े होने के बाद उसे दोबारा कोई मां नहीं मिलती। वो लाड़- दुलार, नखरे, दोबारा कभी नहीं आते। लड़कियों को जिंदगी में सिर्फ एक ही बार मिलती है मां….!