Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

बौद्ध धर्म और महिला :-

1-स्त्री पुरुष को विचलित करती है-

स्त्रियां पुरुष का मन विचलित करती हैं।स्त्री का गंध,आवाज,स्पर्श विचलित करता है। स्त्री मोह में डालती है।
(अंगुत्तरनिकाय एककनिपात रुपादिवर्ग १)

2-स्त्रियां बुद्ध नहीं बन सकतीं-

स्त्री बुद्ध नहीं बन सकती। केवल तभी बन सकती है जब पुरुष का जन्म ले ले। स्त्री चक्रवर्ती सम्राट भी नहीं बन सकती । केवल पुरुष ही राजा बन सकता है। केवल पुरुष ही शक्र,मार,ब्रह्मा बन सकता है।
(अंगुत्तरनिकाय, एककनिपात,असंभव वग्गो,द्वितीय वर्ग, १/१५/१)

3-स्त्री की तुलना काले सांप से : उसके पांच दुर्गुण:

“भिक्षुओं! काले सांप में पांच दुर्गुण हैं। अस्वच्छता,दुर्गंध,बहुत सोने वाला,भयकारक और मित्रद्रोही(विश्वासघाती)। ये सारे दुर्गुण स्त्रियों में भी हैं। वे अस्वच्छ,दुर्गंधयुत,बहुत सोने वाली,भय देने वाली और विश्वासघाती है।”
(अंगु.पांचवा निपात,दीघचारिका वग्गो,पठण्हसुत्त ५/२३/९)

4-स्त्री के दुर्गुण:नारी नरकगामी:-

अधिकतर स्त्रियों को मैंने नरक में देखा है। उसके तीन कारण हैं जिससे स्त्रियां नरकगामी बनती हैं:-
-वो पूर्वाह्न काल में, सुबह, कृपण और मलिन चित्त की होती है।
-दोपहर में मत्सर युक्त होती हैं।
-रात को लोभ और काम युक्त चित्त की होती है।
(संयुक्त निकाय,मातुगामसंयुत्त,पेयाल्लवग्गो , तीहिधम्मोसुत्त ३५/१/४)


इस्लाम और महिला : –

1-औरत को खेती की तरह जोतो :-

“औरतें तुम्हारे लिए खेती के समान है ,तो खेती में जैसे चाहो हल चलाओ “
(कुरान -2 :223)

2-.पति का दर्जा पत्नी से ऊँचा :-

“हाँ परुषों को स्त्रियों पर एक दर्जा प्राप्त है “
(‘कुरान -2:228)

3- पुरुषो के लिए चार पत्नियां :-

तुम चाहो तो दो – दो ,तीन-तीन , और चार पत्नियां रख सकते हो “
(कुरान- 4:3)

4-पत्नी को जब चाहो पीटो :-

यदि तुम्हारी औरतें बात नहीं माने ,तो उनको मारो और पीटो ,ताकि वह तुम्हारी बातें मानने लगें “
(कुरान- 4:34)


ईसाई धर्म और नारी :-

1-माहवारी के समय औरतों से दूर रहो :-
बाइबिल -“जब कोई स्त्री ऋतुमती हो ,तो वह सात दिनों तक अशुद्ध मानी जाये .और जो कोई भी उसे छुए वह भी अशुद्ध माना जाये “
(लैव्यव्यवस्था -15 :19)

2-औरतें खुद को छुपा कर रखें :-

बाइबिल -यदि स्त्री ओढ़नी न ओढ़े, तो बाल भी कटा ले; यदि स्त्री के लिये बाल कटाना या मुण्डाना लज्ज़ा की बात है, तो ओढ़नी ओढ़े।”
(1 कुरिन्थियों 11 :6)

3-स्त्रियों को पुरुषों के अधीन रहना चाहिए

स्त्री को चुपचाप पूरी आधीनता में सीखना चाहिए और मैं (परमेश्वर) कहता हूं, कि स्त्री न उपदेश करे, और न पुरूष पर आज्ञा चलाए, परन्तु चुपचाप रहे।
(1 तीमुथियुस – अध्याय 2:11-12)

4–महिला को अपने बलात्कारी से शादी करनी चाहिए

यदि किसी पुरूष को कोई कुंवारी कन्या मिले और वह उसे पकड़ कर उसके साथ कुकर्म करे, और वे पकड़े जाएं, तो पुरुष पीड़ित लड़की के पिता को 50 शेकेल दे और उससे विवाह कर ले
(व्यवस्थाविवरण-22:28-29)


हिन्दू धर्म और महिला : –

1-स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है
(यजुर्वेद 20/9 )

2-बह्मचर्य सूक्त -इसमें कन्याओं को बह्मचर्य और विद्याग्रहण के पश्चात् ही विवाह के लिए कहा गया है
(अथर्ववेद – 11/5/18)

3-जिस समाज या परिवार में स्त्रियों पूजा होती है , वहां देवता और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।
(मनुस्मृति 3/56)

4- वेदों के सभी भागों का अध्ययन और चार वेदों की पढ़ाने वाली महिला सभी मनुष्यों के लिए प्रगति लाती है .
(ॠग्वेद-1/164/41)

5-शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें | जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों |
(यजुर्वेद 10/26 )

6-पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।
-(मनुस्मृति 9/96)


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वेदों में नारी की महिमा

(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)

संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण देकर हम अपने कथन को सिद्ध करेगे.

१. उषा के समान प्रकाशवती-

ऋग्वेद ४/१४/३

हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.

२. वीरांगना-

यजुर्वेद ५/१०

हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.

३. वीर प्रसवा

ऋग्वेद १०/४७/३

राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे

हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.

४. विद्या अलंकृता

यजुर्वेद २०/८४

विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.

५. स्नेहमयी माँ

अथर्वेद ७/६८/२

हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.

६. अन्नपूर्ण

अथर्ववेद ३/२८/४

इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:

जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं.

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Giriraj Nagar:
तुलसीदास की रामचरितमानस में ढोल गंवार शूद्र पशु और नारी का अभिप्राय एवं इस दोहे को लेकर समाज में फैला भ्रम :-
तुलसीदास जी रचित रामचरित मानस में नारियों को सम्मान जनक रूप में प्रस्तुत किया है। जिससे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ ही सिद्ध होता है। नारियों के बारे में उनके जो विचार देखने में आते हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:-
“धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिए चारी।।”
अर्थात धीरज, धर्म, मित्र और पत्नी की परीक्षा अति विपत्ति के समय ही की जा सकती है। इंसान के अच्छे समय में तो उसका हर कोई साथ देता है, जो बुरे समय में आपके साथ रहे वही आपका सच्चा साथी है। उसीके ऊपर आपको सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए।"जननी सम जानहिं पर नारी । तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ।।" अर्थात जो पुरुष अपनी पत्नी के अलावा किसी और स्त्री को अपनी मां सामान समझता है, उसी के ह्रदय में भगवान का निवास स्थान होता है। जो पुरुष दूसरी नारियों के साथ संबंध बनाते हैं वह पापी होते हैं, उनसे ईश्वर हमेशा दूर रहता है। "मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना । नारी सिखावन करसि काना ।।" अर्थात भगवान राम सुग्रीव के बड़े भाई बाली के सामने स्त्री के सम्मान का आदर करते हुए कहते हैं, दुष्ट बाली तुम अज्ञानी पुरुष तो हो ही लेकिन तुमने अपने घमंड में आकर अपनी विद्वान् पत्नी की बात भी नहीं मानी और तुम हार गए। मतलब अगर कोई आपको अच्छी बात कह रहा है तो अपने अभिमान को त्यागकर उसे सुनना चाहिए, क्या पता उससे आपका फायदा ही हो जाए। "तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर न सुन्दर । केकिही पेखु बचन सुधा सम असन अहि ।। अर्थात तुलसीदास जी कहते हैं सुन्दर लोगों को देखकर मुर्ख लोग ही नहीं बल्कि चालाक मनुष्य भी धोखा खा जाता है। सुन्दर मोरों को ही देख लीजिए उनकी बोली तो बहुत मीठी है लेकिन वह सांप का सेवन करते हैं। इसका मतलब सुन्दरता के पीछे नहीं भागना चाहिए। चाहे कोई भी हो। तमाम सीमाओं और अंतर्विरोधों के बावजूद तुलसी लोकमानस में रमे हुए कवि हैं। उनका सबसे प्रचलित दोहा जिसे सबने अपने तरीके से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया। हमेशा विवादों के घेरे में आ जाता है। कई महिला संगठनों ने तो इसका घोर विरोध भी किया। "प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥ ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥" अर्थात प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी (दंड दिया), किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं। कुछ लोग इस चौपाई का अपनी बुद्धि और अतिज्ञान के कारण विपरीत अर्थ निकालकर तुलसी दास जी और रामचरित मानस पर आक्षेप लगाते हुए अक्सर दिख जाते हैं। सामान्य समझ की बात है कि अगर तुलसीदास जी स्त्रियों से द्वेष या घृणा करते तो रामचरित मानस में उन्होंने स्त्री को देवी समान क्यों बताया? और तो और- तुलसीदास जी ने तो- "एक नारिब्रतरत सब झारी। ते मन बच क्रम पतिहितकारी। अर्थात, पुरुष के विशेषाधिकारों को न मानकर दोनों को समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश दिया है। साथ ही सीता जी की परम आदर्शवादी महिला एवं उनकी नैतिकता का चित्रण, उर्मिला के विरह और त्याग का चित्रण यहां तक कि लंका से मंदोदरी और त्रिजटा का चित्रण भी सकारात्मक ही है। सिर्फ इतना ही नहीं सुरसा जैसी राक्षसी को भी हनुमान द्वारा माता कहना, कैकेई और मंथरा भी तब सहानुभूति का पात्र हो जाती हैं जब उन्हें अपनी गलती का पश्चाताप होता है ऐसे में तुलसीदासजी के शब्द का अर्थ स्त्री को पीटना अथवा प्रताड़ित करना है ऐसा तो आसानी से हजम नहीं होता। इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि तुलसीदास जी शूद्रों के विषय में तो कदापि ऐसा लिख ही नहीं सकते क्योंकि उनके प्रिय राम द्वारा शबरी, निषाद, केवट आदि से मिलन के जो उदाहरण है वो तो और कुछ ही दर्शाते हैं। तुलसीदास जी ने मानस की रचना अवधी में की है और प्रचलित शब्द ज्यादा आए हैं, इसलिए 'ताड़न' शब्द को संस्कृत से ही जोड़कर नहीं देखा जा सकता, राजा दशरथ ने स्त्री के वचनों के कारण ही तो अपने प्राण दे दिए थे। श्री राम ने स्त्री की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया, रामायण के प्रत्येक पात्र द्वारा पूरी रामायण में स्त्रियों का सम्मान किया गया और उन्हें देवी बताया गया। असल में ये चौपाइयां उस समय कही गई है जब समुद्र द्वारा श्रीराम की विनय स्वीकार न करने पर जब श्री राम क्रोधित हो गए और अपने तरकश से बाण निकाला तब समुद्र देव श्रीराम के चरणों मे आए और श्रीराम से क्षमा मांगते हुए अनुनय करते हुए कहने लगे कि- हे प्रभु आपने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी और ये ये लोग विशेष ध्यान रखने यानि, शिक्षा देने के योग्य होते हैं। ताड़ना एक अवध

ी शब्द है जिसका अर्थ पहचानना परखना या रेकी करना होता है। तुलसीदास जी के कहने का मंतव्य यह है कि अगर हम ढोल के व्यवहार (सुर) को नहीं पहचानते तो, उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी अतः उससे स्वभाव को जानना आवश्यक है।
इसी तरह गंवार का अर्थ किसी का मजाक उड़ाना नहीं बल्कि उनसे है जो अज्ञानी हैं और उनकी प्रकृति या व्यवहार को जाने बिना उसके साथ जीवन सही से नहीं बिताया जा सकता। इसी तरह पशु और नारी के परिप्रेक्ष में भी वही अर्थ है कि जब तक हम नारी के स्वभाव को नहीं पहचानते उसके साथ जीवन का निर्वाह अच्छी तरह और सुखपूर्वक नहीं हो सकता। इसका सीधा सा भावार्थ यह है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी के व्यवहार को ठीक से समझना चाहिए और उनके किसी भी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए।
परन्तु दुर्भाग्य तुलसीदास जी रचित इस चौपाई को लोग अपने जीवन में भी उतारते हैं और रामचरित मानस को नहीं समझ पाते हैं।
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वरपरीक्षा


वरपरीक्षा

कुलमग्रे परीक्षेत ये मातृतः पितृश्चेति यथोक्तं पुरस्तात् ॥ १ ॥

First (अग्रे), he should examine (परीक्षेत) the family (कुलम्) (of the intended bride or groom) – those (ये) from the mother’s side (मातृतः) as well as the father’s side (पितृतः च इति), from earlier generations (पुरस्तात्) as per the tradition (यथा उक्तम्).

Note:  There is a reference to this in the Āśvalāyana Śrauta Sūtra:

ये मातृतश्च पितृतश्च दशपुरुषं समनुष्ठिता विद्यातपोभ्यां पुण्यैश्च कर्मभिर्येषामुभयतो नाब्रह्मण्यं निनयेयुः ।

Those whose ancestors up to ten generations on the mother’s and father’s side have studied and understood the Veda, have performed all the prescribed duties therein, and have led an austere life – such people can never be led away from the status of a brāhmaṇa.

बुद्धिमते कन्यां प्रयच्छेत् ॥ २ ॥

He should give away (प्रयच्छेत्) his daughter (कन्याम्) to an intelligent person बुद्धिमते).

बुद्धिरूपशीललक्षणसम्पन्नामरोगामुपयच्छेत ॥ ३ ॥

(A prospective groom) should marry (उपयच्छेत) a girl endowed with intelligence, beauty, character (बुद्धि-रूप-शील-लक्षणसम्पन्नाम्), and one who is free of disease (अरोगाम्).

दुर्विज्ञेयानि लक्षणानीति ॥ ४ ॥

The characteristics (लक्षणानि) (mentioned about) are difficult to determine (दुर्विज्ञेयानि इति).

अष्टौ पिण्डान्कृत्वा ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञ ॠते सत्यं प्रतिष्ठितं यदियं कुमार्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यतां यत्सत्यं तद्दृश्यमिति पिण्डानभिमन्त्र्य कुमारीं ब्रूयादेषामेकं गृहाणेति ॥ ५ ॥

Having prepared eight lumps of earth (अष्टौ पिण्डान् कृत्वा) (procured from different places), and having consecrated them with the mantra (इति पिण्डान् अभिमन्त्र्य) – “Cosmic order (ऋतम्) was born at the beginning (अग्रे प्रथमम् जज्ञे); Truth (सत्यम्) is established in the cosmic order  (ऋते प्रतिष्ठितम्); If (यत्) this girl (इयम् कुमारी) is of noble birth (अभिजाता), then she (तत् इयम्) should make it known (प्रतिपद्यताम्), what the truth is (यत् सत्यम्) should be made evident (तत् दृश्यताम्)”, he should tell the girl (कुमारीम् इति ब्रूयात्) – “Take (गृहाण) one of (एकम्) these (एषाम्)”

क्षेत्राच्चेदुभयतःसस्याद्गृह्णीयादन्नवत्यस्याः प्रजा भविष्यतीति विद्याद्गोष्ठात्पशुमती वेदिपुरीषाद्ब्रह्मवर्चस्विन्यविदासिनो ह्रदात्सर्वसम्पन्ना देवनात्कितवी चतुष्पथाद्द्विप्रव्राजिनीरिणादधन्या श्मशानात् पतिघ्नी ॥ ६ ॥

If she chooses (गृह्णीयात् चेत्) the one from the field (क्षेत्रात्) that yields two crops in a year (उभयतः सस्यात्), he should know (इति विद्यात्) that her progeny (अस्याः प्रजाः) will have plenty of food (अन्नवती भविष्यति); If from the cow-shed (गोष्ठात्), (her progeny will have) plenty of cattle (पशुमती);  If from the fire-altar (वेदिपुरीषात्), (her progeny will) be endowed with the luster of learning (ब्रह्मवर्चस्विनी); If from lake that does not dry (अविदासिनः ह्रदात्), (her progeny will) be highly accomplished (सर्वसम्पन्ना); If from a gambling den (देवनात्), (her progeny will) become gamblers (कितवी); If from cross-roads (चतुष्पतात्), she be unfaithful (द्विप्रव्राजिनी); If from barren land (इरिणात्), she be destitute (अधन्या); If from a cremation ground (श्मशानात्), she will cause the death of her husband (पतिघ्नी).

Notes

  • द्विप्रव्राजिनी – going towards (प्रव्राजिनी) two (men) (द्वि), i.e. unfaithful

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वधूलक्षणपरीक्षा .

कुलमग्रे परीक्षेत ये मातृतः पितृतश्चेति यथोक्तं

पुरस्तात् बुद्धिमते कन्यां प्रयच्छेत् । बुद्धिरूपशील –

लक्षणसंपन्नामरोगामुपयच्छेत ॥ आश्व० गृह्यसूत्र .

उद्वहेत्तु द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणैर्युताम् ।

अव्यंगांगीं सौम्यनाम्नीं मृद्वंगीं च मनोहराम् ॥३४॥

अनन्यपूर्विकां कान्तामसपिडां यवीयसीम् ।

अरोगिणीं भ्रातृमतीमसमानार्षगोत्रजाम् ॥३५॥

Translate from: Marathi1281/5000वर और वधू के विवाह का निर्णय लेने से पहले गोत्र, सप्रवर, सपिन्दाय के बारे में सोचना चाहिए, और इसके बारे में पहले ही लिखा जा चुका है। लेकिन इसके अलावा, यह पता लगाना आवश्यक है कि माता-पिता के वंश शुद्ध हैं या नहीं। शुद्ध का मतलब है तपेदिक, मिर्गी, कुष्ठ रोग, एक आनुवांशिक और अपरिहार्य बीमारी जिसमें कोई पुरुष या महिला पहले से जुड़ा नहीं है। इसी तरह से दोनों कुलों में पुण्य होना चाहिए। वह बुद्धिमान, विद्वान, पवित्र, अच्छे स्वभाव वाला और स्वस्थ होना चाहिए। इसी तरह, दुल्हन को बुद्धिमान, सुशोभित, अच्छा स्वभाव और रोगसूचक होना चाहिए (जो कि बांझपन, बांझपन, आदि की उपेक्षा के बिना) है। एक दुल्हन जो एक ही जाति की है, उसके शरीर के अंगों में कोई दोष नहीं है, उसे सुंदर और कोमल दिखना चाहिए। सारांश में, दुल्हन के मातृ और पैतृक वंश की जांच करने के बाद, लड़की से शादी करनी चाहिए, अर्थात, दुल्हन दूल्हा होना चाहिए। साथ ही, आपको एक ऐसे कबीले की लड़की से शादी करनी चाहिए जो दूसरों के द्वारा स्वीकार नहीं की जाती है, जो आपसे संबंधित नहीं है, जो आपसे छोटी है, जो आपसे छोटी है, जो स्वस्थ है, जो एक भाई है, जो एक जनजाति से अलग जनजाति में पैदा हुई है और जो आपसे श्रेष्ठ नहीं है। उसी तरह, जैसे जनपदधर्म ग्रामधर्मशः तन विदेह प्रति ’का वादा, विवाह के समय देशचर, ग्रामचार और कुलाचार पर विचार करना चाहिए।

वर के लक्षण .

कुलं च शीलं च वयश्च रूपं विद्यां च वित्तं च सनाथतां च ।

एतान् गुणान् सप्त परीक्ष्य देया कन्या बुधै : शेषमचिंतनीयम् ॥३६॥

सतकुला में, एक दुल्हन को एक दूल्हे को दिया जाना चाहिए जो अच्छे शिष्टाचार, अच्छे शिष्टाचार, उम्र और उपस्थिति के साथ पैदा हुआ हो। सुविद्या का अर्थ है शिक्षित, गुणवान, पवित्र और अच्छी तरह से समझा जाने वाला।

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👉 દરેક સમાજ ને 100% સોના જેવો શ્રેષ્ઠ સંદેશ 👈

🙏આ લેખ છેલ્લા સુધી વાંચવા વિનંતી છે.🙏

【જેના દીકરા અને વહુ જેની દીકરી અને જમાઈ અને સાસરી વાળા વચ્ચે સંપ નથી રહેતો કોઈ પણ કારણ સર…… અને જીવનભર છુટા પાડવા ની નોબત આવે છે. તેના માટે જવાબદાર કોણ ……?દીકરો ….કે દીકરી……..? દીકરા ના માતા -પિતા …..કે દીકરી ના માતા-પિતા …..?આ નક્કી કરવા નું હું વાંચકો પર છોડું છું……….】

એક દિકરી એ તેના બાપ ને પ્રશ્ન કર્યો કે પપ્પા હું જ્યારે! સાસરે જઇશ તો શું તે બધા મને દિકરી ની જેમ રાખશે ? *તો તેના પિતા એ બહુ જ સરસ જવાબ આપ્યો...હા *બેટા, તું અહીયા શું છે? તો દિકરી એ જવાબ આપ્યો :-હું અહીંયા દિકરી છું તો તેના બાપે કહ્યું કે બેટા, અહીં તું દિકરી જ છે....* *પણ ત્યાં તો તારે બહુ વધારે પડતી ભૂમીકા ભજવવાની છે જો કહું*

(1) પત્નિ

(2) દિકરી

(3) મા

(4) ભાભી

(5) જેઠાણી કે પછી દેરાણી… *આટલા બધા તારા અંશ હશે તો તને અહીંયા કરતા ત્યાં વધારે જણાં સાચવશે.* *પણ... ખાલી તારી સાસરી ના માણસો સાથે તારો વહેવાર કેવો છે તે ઉપર બધો આધાર છે બીજું કે અહીં તો મેં તને 20 કે 25 વરસ સાચવી એટલે અહીં તો ટૂંકા સમય માટે જ હતી . બેટા*.... *એ ઘર તો તને આખી જીન્દગી નું નામ આપે છે તો ત્યાં તારે બધાને સાચવવાના છે. જો તું સાચવીશ તો જરૂર એ તને 10 ગણું સાચવશે..........* *પિતા એ પછી કાનમાં દિકરી ને કહ્યું કે બેટા જો કોઈને કહેતી નહીં હું જે કહુ છું તે સાચું છે.* *તારે જીન્દગીમાં દુ:ખી ના થવું હોય તો તેનો મંત્ર છે આખા જીવન ભર દુ:ખ નહી આવે,* *તો દિકરી એ કહ્યું: એવું શું છે પપ્પા? તરતજ પિતા એ કહ્યું કે*

(1) પિયર ઘેલી ના થતી.
(2) તારી મમ્મી નુ ક્યારેય ના સાંભળતી.
(3) કંઇ પણ વાત હોય તો પતિ, સાસુ, સસરા, દિયર, નણંદ, જેઠ-જેઠાણી કે દિયર- દેરાણી ને પોતાના સમજી બધાં સાથે બેસી ને ખુલ્લા દિલ થી વાત કરતી રહેજે………. *તારા જીવન મા દુ:ખ ભગવાન પણ નહીં લાવે તો બોલ બેટા અહીંયા સારું કે સાસરીયું સારું? તરત દિકરી બોલી પપ્પા તમારી વાત ખરેખર સાચી કે જેમનું નામ મરણ પછી પણ મારા સાથે જોડાઇ રહે તે જ મારો પરીવાર અને એ જ મારા સાચા માતા-પિતા છે અને દિયર મારો નાનો ભાઇ છે, જેઠ મારા મોટા ભાઇ અને બાપ સમાન છે, દેરાણી મારી બહેન છે, જેઠાણી મારી મોટી બહેન છે અને મા સમાન છે અને નણંદ મારી લાડકી દિકરી છે.*‼️

હા, પપ્પા મને તો અહીં કરતાં ત્યાં ધણું ફાવશે …..હું આખી જીન્દગી આ યાદ રાખીશ અને દરેક દિકરી ને આમ જ કરવાની સલાહ આપીશ કે આપણું ઘર તે આપણે જ સાચવવાનું છે આપણા પિયરીયાને નહીં……

જે મજા સંપીને રહેવામાં છે તે અલગ માં નથી.

દરેક દીકરી ને આવી સલાહ મળે તો કોઈ દીકરી ના જીવન માં દુઃખ આવે જ નહીં.

દરેક માતા-પિતા અને ખાસ કરીને દીકરીઓ એ વાચવા જેવુ અને જીવન માં ઉતારવા જેવું છે. હાલ ની દરેક દીકરી ને આ લેખ સમર્પિત છે.

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav, यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

भारतीय संस्कृति में मां के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है


सुनील शास्त्री

भारतीय संस्कृति में मां के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है, लेकिन आज आधुनिक दौर में जिस तरह से मदर्स डे मनाया जा रहा है, उसका इतिहास भारत में बहुत पुराना नहीं है। इसके बावजूद दो-तीन दशक से भी कम समय में भारत में मदर्स डे काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

अलौकिक शब्द है माँ

मातृ दिवस-समाज में माताओं के प्रभाव व सम्मान का उत्सव है। मां शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। मां नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। मां के आगे सभी रिश्ते बौने पड़ जाते हैं। मातृत्व की छाया में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका सहारा बन जाती है। समाज में मां के ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने अकेले ही अपने बच्चों की जिम्मेदारी निभाई। मातृ दिवस सभी माताओं का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। एक बच्चे की परवरिश करने में माताओं द्वारा सहन की जाने वालीं कठिनाइयों के लिये आभार व्यक्त करने के लिये यह दिन मनाया जाता है। कवि रॉबर्ट ब्राउनिंग ने मातृत्व को परिभाषित करते हुए कहा है- सभी प्रकार के प्रेम का आदि उद्गम स्थल मातृत्व है और प्रेम के सभी रूप इसी मातृत्व में समाहित हो जाते हैं। प्रेम एक मधुर, गहन, अपूर्व अनुभूति है, पर शिशु के प्रति मां का प्रेम एक स्वर्गीय अनुभूति है।

‘मां!’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘मां’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘मां’ की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। जिन्होंने आपको और आपके परिवार को आदर्श संस्कार दिए। उनके दिए गए संस्कार ही मेरी दृष्टि में आपकी मूल थाती है। जो हर मां की मूल पहचान होती है।

माँ से ही मिलता है संस्कार

हर संतान अपनी मां से ही संस्कार पाता है। लेकिन मेरी दृष्टि में संस्कार के साथ-साथ शक्ति भी मां ही देती है। इसलिए हमारे देश में मां को शक्ति का रूप माना गया है और वेदों में मां को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। श्रीमद् भगवद् पुराण में उल्लेख मिलता है कि माता की सेवा से मिला आशीष सात जन्मों के कष्टों व पापों को दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है।

माँ के बारे में महान लोगों का कथन

प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने मां की महिमा को उजागर करते हुए कहा है कि जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मां के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं। अब्राहम लिंकन का मां के बारे में मार्मिक कथन है कि जो भी मैं हूँ, या होने की उम्मीद है, मैं उसके लिए अपने प्यारी माँ का कर्जदार हूँ। किसी औलाद के लिए ‘माँ’ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए माँ शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है।

मुसीबत में माँ ही क्यों याद आती है?

क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है क्योंकि वो माँ ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्मे होते हैं। बचपन में हमारा रातों का जागना, जिस वजह से कई रातों तक माँ सो भी नहीं पाती थी। वह गिले में सोती और हमें सूखे में सुलाती। जितना माँ ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। जाहिर है माँ के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी, कई सदियां भी कम है।
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‘मां’-इस लघु शब्द में प्रेम की विराटता/समग्रता निहित है। अणु-परमाणुओं को संघटित करके अनगिनत नक्षत्रों, लोक-लोकान्तरों, देव-दनुज-मनुज तथा कोटि-कोटि जीव प्रजातियों को मां ने ही जन्म दिया है। मां के अंदर प्रेम की पराकाष्ठा है या यूं कहें कि मां ही प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम की यह चरमता केवल माताओं में ही नहीं, वरन् सभी मादा जीवों में देखने को मिलती है। अपने बच्चों के लिए भोजन न मिलने पर हवासिल (पेलिकन) नाम की जल-पक्षिनी अपना पेट चीर कर अपने बच्चों को अपना रक्त-मांस खिला-पिला देती है।

माँ के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?

कितनी दयनीय बात है कि देश ने स्त्री की शक्ति के रूप में अवधारणा दी, जिसने पुराणों के पृष्ठों में देवताओं को 4 या 8 हाथ दिये किन्तु देवियों को 108 हाथ दिये, उसी ने स्त्रियों को पुरुषों से नीचा स्थान दिया और उन्हें वेद पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया और सबसे शोचनीय बात यह है कि उन्हें चारदिवारी में बंद कर दिया।’’ ‘मां’ को देवी सम्मान दिलाना वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता में से एक है। मां प्राण है, मां शक्ति है, मां ऊर्जा है, मां प्रेम, करुणा और ममता का पर्याय है। मां केवल जन्मदात्री ही नहीं जीवन निर्मात्री भी है। मां धरती पर जीवन के विकास का आधार है। मां ने ही अपने हाथों से इस दुनिया का ताना-बाना बुना है। सभ्यता के विकास क्रम में आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक इंसानों के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार, मस्तिष्क में लगातार बदलाव हुए। लेकिन मातृत्व के भाव में बदलाव नहीं आया। उस आदिमयुग में भी मां, मां ही थी। तब भी वह अपने बच्चों को जन्म देकर उनका पालन-पोषण करती थीं। उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा करना सिखाती थी। आज के इस आधुनिक युग में भी मां वैसी ही है। मां नहीं बदली। विक्टर ह्यूगो ने मां की महिमा इन शब्दों में व्यक्त की है कि एक मां की गोद कोमलता से बनी रहती है और बच्चे उसमें आराम से सोते हैं।
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धरती की विधाता है माँ

मां को धरती पर विधाता की प्रतिनिधि कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सच तो यह है कि मां विधाता से कहीं कम नहीं है। क्योंकि मां ने ही इस दुनिया को सिरजा और पाला-पोशा है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा किसी को नजर आये न आए मां हर किसी को हर जगह नजर आती है। कहीं अण्डे सेती, तो कहीं अपने शावक को, छोने को, बछड़े को, बच्चे को दुलारती हुई नजर आती है। मां एक भाव है मातृत्व का, प्रेम और वात्सल्य का, त्याग का और यही भाव उसे विधाता बनाता है।

मां विधाता की रची इस दुनिया को फिर से, अपने ढंग से रचने वाली विधाता है। मां सपने बुनती है और यह दुनिया उसी के सपनों को जीती है और भोगती है। मां जीना सिखाती है। पहली किलकारी से लेकर आखिरी सांस तक मां अपनी संतान का साथ नहीं छोड़ती। मां पास रहे या न रहे मां का प्यार दुलार, मां के दिये संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं। मां ही अपनी संतानों के भविष्य का निर्माण करती हैं। इसीलिए मां को प्रथम गुरु कहा गया है। स्टीव वंडर ने सही कहा है कि मेरी माँ मेरी सबसे बड़ी अध्यापक थी, करुणा, प्रेम, निर्भयता की एक शिक्षक। अगर प्यार एक फूल के जितना मीठा है, तो मेरी माँ प्यार का मीठा फूल है।
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कन्याभ्रूणों की हत्या नृशंस

प्रथम गुरु के रूप में अपनी संतानों के भविष्य निर्माण में मां की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मां कभी लोरियों में, कभी झिड़कियों में, कभी प्यार से तो कभी दुलार से बालमन में भावी जीवन के बीज बोती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मातृत्व के भाव पर नारी मन के किसी दूसरे भाव का असर न आए। जैसाकि आज कन्याभ्रूणों की हत्या का जो सिलसिला बढ़ रहा है, वह नारी-शोषण का आधुनिक वैज्ञानिक रूप है तथा उसके लिए मातृत्व ही जिम्मेदार है। महान् जैन आचार्य एवं अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य तुलसी की मातृ शक्ति को भारतीय संस्कृति से परिचित कराती हुई निम्न प्रेरणादायिनी पंक्तिया पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं- ‘‘भारतीय मां की ममता का एक रूप तो वह था, जब वह अपने विकलांग, विक्षिप्त और बीमार बच्चे का आखिरी सांस तक पालन करती थी। परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा की गई उसकी उपेक्षा से मां पूरी तरह से आहत हो जाती थी। वही भारतीय मां अपने अजन्मे, अबोल शिशु को अपनी सहमति से समाप्त करा देती है। क्यों? इसलिए नहीं कि वह विकलांग है, विक्षिप्त है, बीमार है पर इसलिए कि वह एक लड़की है। क्या उसकी ममता का स्रोत सूख गया है? कन्याभ्रूणों की बढ़ती हुई हत्या एक ओर मनुष्य को नृशंस करार दे रही है, तो दूसरी ओर स्त्रियों की संख्या में भारी कमी मानविकी पर्यावरण में भारी असंतुलन उत्पन्न कर रही है।’’ अन्तर्राष्ट्रीय मातृ-दिवस को मनाते हुए मातृ-महिमा पर छा रहे ऐसे अनेक धुंधलों को मिटाना जरूरी है, तभी इस दिवस की सार्थकता है।

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Copied1972 में आयरलैंड-ब्रिटिश युद्ध के दौरान ली गई यह तस्वीर एक आयरिश लड़की की है. वह अपने मंगेतर की बंदूक से गोली चला रही है जो ब्रिटिश आर्मी से युद्ध के दौरान घायल हो गया था.
इसका घायल मंगेतर एक कार द्वारा सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिए जाने के कारण बच गया जबकि प्रेमिका ब्रिटिश सैनिकों से मुठभेड़ के दौरान मारी गई.
जब इंग्लिश सेना के बटालियन कमांडर को यह पता लगा कि वे एक महिला से लड़ रहे थे तब उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया
कि वे महिला के शव को हाथ न लगाएं और आयरिश लोगों को उसका शव दफ़नाने की अनुमति दे दी. तब उन लोगों ने कमांडर को यह कहते भी सुना कि-
“We defend a queen who doesn’t care about us. And this woman cares about her lover and her land.”
“हम एक रानी की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं जिसे हमारी परवाह नहीं, और यह महिला अपने प्रेमी और मातृभूमि की परवाह करती है”
यह तस्वीर आयरलैंड में महिला दिवस पर सर्वश्रेष्ठ चुनी गई और लिखा गया –
“Don’t be afraid to be associated with a strong woman the day may come and she’ll be your only army”.
“एक मजबूत महिला को अपनाने से मत डरिये, जब वक़्त आएगा वह तुम्हारा इकलौता हथियार होगी”
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अरुण सुक्ला

संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण
१. उषा के समान प्रकाशवती-
ऋग्वेद ४/१४/३
हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.
२. वीरांगना-
यजुर्वेद ५/१०
हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.
३. वीर प्रसवा
ऋग्वेद १०/४७/३
राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे
हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.
४. विद्या अलंकृता
यजुर्वेद २०/८४
विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.
५. स्नेहमयी माँ
अथर्वेद ७/६८/२
हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.
६. अन्नपूर्ण
अथर्ववेद ३/२८/४
इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:
जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं

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अफ्रीका की हिम्बा प्रजाति में बच्चे का जन्म उस दिन से माना जाता है, जिस दिन स्त्री गर्भधारण का निर्णय करती है। उस दिन वो स्त्री अकेले कहीं बैठती है और खुद ही एक गाना रचती है-गुनती है। फिर जाकर ‘वो गीत’ उस आदमी को सुनाती है, जिसे वो अपने होने वाले शिशु के पिता की तरह देखती है। फिर वे दोनों मिल के वो गीत गाते है…संसर्ग के बाद भी दोनों वही गीत गाते हैं।

इसको आप इस तरह देख सकते हैं कि दोनों अपने होने वाले उस बच्चे को बुला रहे होते हैं, स्वागत कर रहे होते हैं, जिसकी उन्होंने कल्पना की है। जब स्त्री गर्भवती हो जाती है तो वही गीत वो अपने घर-पड़ोस-गांव की औरतों को सिखाती है, ताकि प्रसवपीड़ा के दौरान सब उसी गीत को गायें और शिशु के जन्म का स्वागत करें ।

‘वो गाना’ उस बच्चे के ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाता है, जिसे हर ज़रूरी अवसर पर गाया जाता है। जब उसे चोट लगती है, तब भी।

यहाँ तक कि जब कोई हिम्बा स्त्री/पुरुष अपराध करता है तो सबसे पहले उन्हें बीच गाँव में ले जाया जाता हैं और सारे लोग हाथ पकड़ के एक गोल घेरा बनाते हैं और फिर वही गीत उसको सुनाते हैं, जो उसकी माँ ने उसके जन्म से पहले ही उसके लिए गुना था।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह सब करने का औचित्य क्या है? दरअसल हिम्बा जनजाति सुधार के लिए दंड को महत्व नहीं देती, बल्कि व्यक्ति को फिर से उसकी पहचान से, अपनी जड़ों से जोड़ देने को ज़रूरी मानती है। ऐसा करके वे याद दिलाते हैं कि तुम्हारा असल गीत तो यह है कि तुम कितने निर्दोष थे-निष्पाप थे, यह क्या करने लगे हो तुम !!!
हिब्बा लोग गलती पर पश्चाताप कराने को प्रमुखता देते हैं, इंसान को उसकी इनोसेंस भूलने नहीं देते, पुनः स्मरण कराते हैं ।

और जब वो मनुष्य मरता है, तब भी-जो लोग उसका गीत जानते हैं, वो सब उसे दफनाते वक़्त भी वही गीत गाते हैं!
आखिरी बार!!
वही गीत जो उसकी “माँ” ने गुनगुनाया था, उसके आने से भी बहुत पहले!!

साभार-Apoorva Pratap Singh