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नारी


संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण
१. उषा के समान प्रकाशवती-
ऋग्वेद ४/१४/३
हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.
२. वीरांगना-
यजुर्वेद ५/१०
हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.
३. वीर प्रसवा
ऋग्वेद १०/४७/३
राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे
हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.
४. विद्या अलंकृता
यजुर्वेद २०/८४
विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.
५. स्नेहमयी माँ
अथर्वेद ७/६८/२
हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.
६. अन्नपूर्ण
अथर्ववेद ३/२८/४
इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:
जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं

अरुण सुक्ला

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अर्धनग्न


अर्धनग्न महिलाओं को देख कर 90℅ कौन मजे लेता है नारी स्वतंत्रता पर सच्चाई जाने, समझें
एक लेख

एक दिन मोहल्ले में किसी ख़ास अवसर पर महिला सभा का
आयोजन किया गया, सभा स्थल पर
महिलाओं की संख्या अधिक
और पुरुषों की कम थी.!!

मंच पर तकरीबन पच्चीस वर्षीय
खुबसूरत युवती, आधुनिक वस्त्रों से
सुसज्जित, माइक थामें कोस रही थी
पुरुष समाज को..!!

वही पुराना आलाप….
कम और छोटे कपड़ों को जायज,
और कुछ भी पहनने की स्वतंत्रता का बचाव करते हुए, पुरुषों की गन्दी सोच और खोटी नीयत का
दोष बतला रही थी.!!

तभी अचानक सभा स्थल से…
तीस बत्तीस वर्षीय सभ्य, शालीन और आकर्षक से दिखते नवयुवक ने खड़े होकर अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगी..!!

अनुमति स्वीकार कर माइक उसके हाथों में सौप दिया गया , हाथों में माइक आते ही उसने बोलना शुरु किया..!!

“माताओं, बहनों और भाइयों,
मैं आप सबको नहीं जानता और आप सभी मुझे नहीं जानते कि, आखिर मैं कैसा इंसान हूं..??

लेकिन पहनावे और शक्ल सूरत से
मैं आपको कैसा लगता हूँ, बदमाश या शरीफ..??

सभास्थल से कई आवाजें गूंज उठीं… पहनावे और बातचीत से तो आप शरीफ लग रहे हो…

बस यही सुनकर, अचानक ही
उसने अजीबोगरीब हरकत कर डाली… सिर्फ हाफ पैंट टाइप की
अपनी अंडरवियर छोड़ कर के बाक़ी सारे कपड़े मंच पर ही उतार दिये..!!

ये देख कर पूरा सभा स्थल आक्रोश से गूंज उठा, मारो-मारो गुंडा है,
बदमाश है, बेशर्म है, शर्म नाम की
चीज नहीं है इसमें…. मां बहन का
लिहाज नहीं है इसको, नीच इंसान है,
ये छोड़ना मत इसको….

ये आक्रोशित शोर सुनकर अचानक वो माइक पर गरज उठा… “रुको…
पहले मेरी बात सुन लो, फिर मार भी लेना , चाहे तो जिंदा जला भी देना
मुझको..!!

अभी अभी तो ये बहन जी कम कपड़े, तंग और बदन नुमा छोटे-छोटे कपड़ों के पक्ष के साथ साथ स्वतंत्रता की दुहाई देकर गुहार लगाकर…
“नीयत और सोच में खोट” बतला रही थी…!! तब तो आप सभी तालियां बजा-बजाकर सहमति जतला रहे थे.. फिर मैंने क्या किया है..??
सिर्फ कपड़ों की स्वतंत्रता ही तो
दिखलायी है..!!

“नीयत और सोच” की खोट तो नहीं ना और फिर मैने तो, आप लोगों को… मां बहन और भाई भी कहकर ही संबोधित किया था..फिर मेरे अर्द्ध नग्न होते ही आप में से किसी को भी
मुझमें “भाई और बेटा” क्यों नहीं नजर आया..??

मेरी नीयत में आप लोगों को
खोट कैसे नजर आ गया..??

मुझमें आपको सिर्फ “मर्द” ही क्यों नजर आया? भाई, बेटा, दोस्त क्यों नहीं नजर आया? आप में से तो किसी की “सोच और नीयत” भी
खोटी नहीं थी…
फिर ऐसा क्यों?? “

सच तो यही है कि झूठ बोलते हैं लोग कि… “वेशभूषा” और “पहनावे” से
कोई फर्क नहीं पड़ता हकीकत तो यही है कि मानवीय स्वभाव है कि किसी को सरेआम बिना “आवरण” के देख लें तो कामुकता जागती है
मन में…रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्श
ये बहुत प्रभावशाली कारक हैं। इनके प्रभाव से “विश्वामित्र” जैसे मुनि के
मस्तिष्क में विकार पैदा हो गया था..
जबकि उन्होंने सिर्फ रूप कारक के दर्शन किये। आम मनुष्यों की
विसात कहाँ..??

दुर्गा शप्तशती के देव्या कवच श्लोक 38 में भगवती से इन्हीं कारकों से रक्षा करने की प्रार्थना की गई है..

“रसेरुपेगन्धेशब्देस्पर्शेयोगिनी।
सत्त्वंरजस्तमश्चैवरक्षेन्नारायणी_सदा।।”

रस रूप गंध शब्द स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें.!!

अब बताइए, हम भारतीय हिन्दु महिलाओं को “हिन्दु संस्कार” में
रहने को समझाएं तो स्त्रियों की कौन-सी “स्वतंत्रता” छीन रहे हैं..??

सोशल मीडिया पर अर्ध-नग्न होकर नाचती 90% कन्याएँ-महिलाएँ हिंदू हैं..और मज़े लेने वाले 90% कौन है?
ये बताने की भी ज़रूरत है क्या..?

आँखे खोलिए…संभालिए अपने आप को और अपने समाज को, क्योंकि भारतीय समाज और संस्कृति का आधार नारीशक्ति है और धर्म विरोधी, अधर्मी, चांडाल (बॉलीवुड, वामपंथ) ये हमारे समाज के आधार को तोड़ने का षड्यंत्र कर रहे हैं..!!

परम्परागत सनातन धर्म की रक्षा का दायित्व हम सभी पर है।

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अस्मिता


8240297590
डॉ उर्मिला साव कामनास्त्री अस्मिता

अस्मिता के केन्द्र में “अस्मिता” केन्द्रीय धुरी है.
जो स्त्री के शुभारम्भ जीवन का प्रथम छुरी है.

जिसने सदियों से हाशिये पर पड़े स्त्री लाकर.
बहस केन्द्र में बना दिया बहसी पुरुष ने आकर.

स्त्री पुरुषों में जैविक भेद तो प्रकृति प्रदत है.
लैंगिक भेद के कारण अस्मिता
संदिग्ध प्रदत है.

एक सीमा तक अस्तित्व वनिता का दबाकर रखा.
क्षण पर स्त्री अस्मिता संघर्ष अस्तित्व जारी रखा.

मानवी ने धर जब चन्डी रूप अस्मिता के लिए.
कब तक बलपूर्वक दबाते नर
शक्ति के लिए.

सतयुग से सुप्तावस्था में पड़ी थी जो नारियॉ.
अचानक जाग उठी कलयुग में स्व आधी नारियॉ.

इतने प्रखर रूप में आयी संसार की धरा पर.
स्वंय को स्थापित की केन्द्र में स्त्री अस्मिता पर.

किसके किन मापदंडों से निर्धारित की जायेगी.
मूल्यांकन स्त्री का नर या स्त्री द्वारा की जायेगी.

पुरूष के मूल्यांकन में अस्मिता का अस्तित्व नहीं.
नारी के मूल्यांकन में पुरूषों का अस्तित्व नहीं.

पुरूषार्थ से नारी को आदर्श देवी बनाया .
जो कलयुग में विकृत रुप उभर कर सामने आया.

यथार्थ धरती पर नारियों ने पहचान बनाई.
गुरदेल से गुलडजर तक जग में चलाकर दिखाई.

जाग्रत अवस्था में बुद्धि जीवी नर
नजर डालो.
तुमसे नारी आगे निकली अच्छे विचार पालो.

पितृसत्ता में सभी शक्ति को किया गया नियंत्रित.
स्त्री को पुरूष अधीन उपभोग में किया आमंत्रित.

स्त्री जाति नाम गोत्र अपने अनुरूप परिभाषित किया.
स्त्री जीवन कार्यशैली सता को निर्धारित किया.

वनिता महिला मानवी जोरू घरनी तिरिया, नारी .
घरवाली, औरत ,स्त्री वनिता की दर्द सभी सारी.

पहचान, निर्णय सामाजिकता पुरुष अस्वीकारा.
स्त्री को अमानवीय हरकतों का शिकार स्वीकारा .

स्त्री को स्वतंत्र व्यक्तित्व का संघर्ष लड़ना पड़ा.
षड्यंत्र अवरोधों प्रश्नों का सामना करना पड़ा.

अमानुषिक विवशता जुर्म सहकर भी स्व निर्भर है.
स्वंय के लक्ष्यों आधुनिकता की ओर अग्रसर है.

एक दूजे कै पूरक सर्वसम्मति ईकाईयां है
स्वतंत्र अस्तित्व अस्मिता कहीं न दिखाईयां है.

जगत में समाजिक अस्मिता का यहाँ यह जिक्र है
“यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता” हैं.

सूक्तियों को गिनाकर नारी का है गुणगान किया.
अधिकारों को सुरक्षित समझ कर यहाँ कल्याण किया.

विज्ञान महिलाओं के बुद्धि विवेक को विकसित किया.
नारी के हर क्षेत्र के समानाधिकार में वृद्धि किया.

कन्या का लालन पालन हर जुल्म से जोड़ा हुआ.
मुकदर का जुर्म सहकर बहुओं का भाग्योदय हुआ.

जो जीवन में पुरूषो के सब खुशियों का ख्याल रखी.
उत्सर्ग त्याग बलिदान की निज कहानी अमर रखी.

स्त्री अस्मिता, गुण हैं दोनों ही समान.
जो समाज में हर स्तर पर रखे हैं लैंगिक समान.

डॉ उर्मिला साव कामना

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वेदों की विहंगम दृष्टि में नारी


Anand Nimbadia,
चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं।

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्रीकृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्रीकृषण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम शासन रहा।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब “कास्ट ऑफ़ माइंड” में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जातीय व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं..।।🚩🚩

भवितव्य मिश्र, [07/12/2021 8:22 PM]
🔥 वेदों की विहंगम दृष्टि में नारी 🔥

✍️ :- भवितव्य आर्य “मनुगामी”

स्त्री को शास्त्र-अध्ययन का निषेध करने वाले स्वयं शास्त्रों से कितनी दूर थे, इसका एक छोटा उदाहरण यह शोध-कणिका है।

पिछले दिनों सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश और उसपर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की चर्चाएँ जोरों पर थीं। नारी अधिकारों की बात कुछ नई नहीं है।

इस्लाम में दो महिलाओं की गवाही को एक पुरुष के बराबर माना गया है वहीं प्रथम स्त्री हौवा को आदम की पसली से बना बताया जाता है, पुरूष वहां भी आगे है।

मुसलमानो के इस स्थापना की जड़ ईसाइयों की बाइबिल है, जो किसी स्थिति में कमतर नहीं है, जिसकी दृष्टि में महिला केवल पुरूष को इन्द्रिय सुख की तृप्ति के लिए गढ़ी गई है।

यहूदियों की मान्यता भी इसी के आर्श्व-पार्श्व विचरण करती है। इससे भी बड़ी भयावह बात यह है कि पश्चिमी सभ्यता में स्त्री की “मानव-जाति” में गिनती ही नहीं की जाती थी।

वो तो भला हो विज्ञान का, जिससे भयाकुल यूरोपीय समाज मजबूरन संसद में कानून बनाकर अभी कुछ सौ साल पहले स्त्री को “मानव जाति” का होना स्वीकार किया।

इसी प्रकार बौद्ध मत में स्त्रियों को बुद्धत्व प्राप्ति का अधिकार नहीं है। त्रिपिटक में स्त्रियों को अनेक जन्मजात दुर्गुणों से युक्त बताया है।

जैन मत में स्त्री को अगले जन्म में पुरुष शरीर धारण करने के पश्चात ही मोक्ष का अधिकारी माना है।

यदि वेदों की दिव्य विहंगम दृष्टि को स्वयं में स्थापित कर लिया जाए तो विश्व भर में मजहब अथवा सम्प्रदाय के नाम पर उत्पात मचाने वाले इन सभी मिथ्या-विवादों अथवा विश्वासों की चूल हिल जाएगी।

भारतीय ज्ञान परम्परा पर विहंगम दृष्टि डालने से यह विदित होता है कि इस समृद्ध परम्परा में लैंगिक समानता व न्याय के स्वर यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। अग्रलिखित उद्धरण दृष्टव्य है:-

(1) वेद यदि पुरुष को ‘ओजस्वान्’ (अथर्व. 8.5.4) ओज वाला कहता है तो स्त्री को ‘ओजस्वती’ (यजु. 10.3) कहता है।

(2) पुरुष यदि ‘सहस्त्रवीर्यः’ (अथर्व. 2.4.2) सहस्त्र पराक्रम वाला है तो स्त्री ‘सहस्त्रवीर्याः’ (यजु. 13.26) कही गई है।

(3) पुरुष यदि ‘सहीयान्’ (ऋ. 1.61.7) अत्यन्त बल वाला है, तो स्त्री ‘सहीयसी’ (अथर्व. 10.5.43) बताई गई।

(4) पुरुष को यदि ‘सम्राट’ (ऋ. 2.28.6) शासक कहा, तो स्त्री को ‘सम्राज्ञी’ (ऋ. 1.85.64) कहा गया।

(5) पुरुष यदि ‘मनीषी’ (ऋ. 9.96.8) मन वशीकरण करने वाला है तो स्त्री ‘मनीषा’ (ऋ. 1.101.7) है।

(6) पुरुष यदि ‘राजा’ (अथर्व. 1.33.2) दीप्तिमान् कहा गया, तो स्त्री ‘राज्ञी’ (यजु. 14.13) कही गई।

(7) पुरुष यदि ‘सभासदः’ (अथर्व. 20.21.3) सभाओं के अधिकारी हैं, तो स्त्री ‘सभासदा’ (अथर्व. 8.8.9) है।

(8) पुरुष को यदि ‘अषाडहः’ (ऋ. 7.20.3) अपराजित घोषित किया गया, तो स्त्री ‘अषाढा’ (यजु. 13.26) प्रसिद्ध हुई।

(9) पुरुष यदि ‘यज्ञियः’ (ऋ. .14.3) यज्ञ करने वाला, की उपाधि से युक्त है तो स्त्री ‘यज्ञिया’ (यजु. 4.19) से सुभूषित है।

(10) यदि पुरुष ‘ब्रह्मायं वाचः’ (ऋ. 10.71.11) ब्रह्मा = (चतुर्वेद वेत्ता) नाम से शोभित हुआ, तो स्त्री भी ‘स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ’ (ऋ. 8.33.19) ‘ब्रह्मा’ संज्ञा से विभूषित हुई, आदि आदि।

ये तो बस कुछ उद्धरण मात्र हैं, वेदों में ऐसे प्रतिमानों का भण्डार है, जो कदाचित संसार के अन्य किसी ग्रंथ, साहित्य या परम्परा में देखने को नहीं मिलते।

भारतीय विश्वदृष्टि समस्त चराचर जगत् की तात्विक एकता का उद्घोष करती है।

आज आवश्यकता है वेदों की इस विहंगम सम्यक् दृष्टि को अपनाने की, जिसके द्वारा ही विज्ञानमय नए युग का भव्य स्वागत किया जा सकता है।

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“स्त्री” क्यों पूजनीय है ?
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एक बार सत्यभामाजी ने श्रीकृष्ण से पूछा, “मैं आप को कैसी लगती हूँ ?

” श्रीकृष्ण ने कहा, “तुम मुझे नमक जैसी लगती हो ।”

सत्यभामाजी इस तुलना को सुन कर क्रुद्ध हो गयी, तुलना भी की तो किस से । आपको इस संपूर्ण विश्व में मेरी तुलना करने के लिए और कोई पदार्थ नहीं मिला।

श्रीकृष्ण ने उस वक़्त तो किसी तरह सत्यभामाजी को मना लिया और उनका गुस्सा शांत कर दिया ।

कुछ दिन पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने महल में एक भोज का आयोजन किया छप्पन भोग की व्यवस्था हुई।

सर्वप्रथम सत्यभामाजी से भोजन प्रारम्भ करने का आग्रह किया श्रीकृष्ण ने ।

सत्यभामाजी ने पहला कौर मुँह में डाला मगर यह क्या – सब्जी में नमक ही नहीं था । कौर को मुँह से निकाल दिया ।

फिर दूसरा कौर मावा-मिश्री का मुँह में डाला और फिर उसे चबाते-चबाते बुरा सा मुँह बनाया और फिर पानी की सहायता से किसी तरह मुँह से उतारा ।

अब तीसरा कौर फिर कचौरी का मुँह में डाला और फिर.. आक्..थू !

तब तक सत्यभामाजी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चुका था । जोर से चीखीं.. किसने बनाई है यह रसोई ?

सत्यभामाजी की आवाज सुन कर श्रीकृष्ण दौड़ते हुए सत्यभामाजी के पास आये और पूछा क्या हुआ देवी ? कुछ गड़बड़ हो गयी क्या ? इतनी क्रोधित क्यों हो ? तुम्हारा चेहरा इतना तमतमा क्यूँ रहा है ? क्या हो गया ?

सत्यभामाजी ने कहा किसने कहा था आपको भोज का आयोजन करने को ?

इस तरह बिना नमक की कोई रसोई बनती है ? किसी वस्तु में नमक नहीं है। मीठे में शक्कर नहीं है। एक कौर नहीं खाया गया।

श्रीकृष्ण ने बड़े भोलेपन से पूछा, तो क्या हुआ बिना नमक के ही खा लेती ।

सत्यभामाजी फिर क्रुद्ध होकर बोली कि लगता है दिमाग फिर गया है आपका ? बिना शक्कर के मिठाई तो फिर भी खायी जा सकती है मगर बिना नमक के कोई भी नमकीन वस्तु नहीं खायी जा सकती है ।

तब श्रीकृष्ण ने कहा तब फिर उस दिन क्यों गुस्सा हो गयी थी जब मैंने तुम्हे यह कहा कि तुम मुझे नमक पर जितनी प्रिय हो ।

अब सत्यभामाजी को सारी बात समझ में आ गयी की यह सारा वाकया उसे सबक सिखाने के लिए था और उनकी गर्दन झुक गयी ।

कथा का मर्म :-
~~~~~

स्त्री जल की तरह होती है, जिसके साथ मिलती है उसका ही गुण अपना लेती है । स्त्री नमक की तरह होती है जो अपना अस्तित्व मिटा कर भी अपने प्रेम-प्यार तथा आदर-सत्कार से परिवार को ऐसा बना देती है ।

माला तो आप सबने देखी होगी। तरह-तरह के फूल पिरोये हुवे पर शायद ही कभी किसी ने अच्छी से अच्छी माला में अदृश्य उस “सूत” को देखा होगा जिसने उन सुन्दर सुन्दर फूलों को एक साथ बाँध कर रखा है ।

लोग तारीफ़ तो उस माला की करते हैं जो दिखाई देती है मगर तब उन्हें उस सूत की याद नहीं आती जो अगर टूट जाये तो सारे फूल इधर-उधर बिखर जाते है ।।

स्त्री उस सूत की तरह होती है जो बिना किसी चाह के , बिना किसी कामना के , बिना किसी पहचान के , अपना सर्वस्व खो कर भी किसी के जान-पहचान की मोहताज नहीं होती है और शायद इसीलिए दुनिया श्रीराम के पहले सीताजी को और कान्हाजी के पहले श्री-राधे जी को याद करती है ।

अपने को विलीन कर के पुरुषों को सम्पूर्ण करने की शक्ति भगवान् ने केवल स्त्रियों को ही दी है ।। *सम्पूर्ण नारी शक्ति को नमन्*

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रघुनंदन मिश्र जी के सौजन्य से

सरदार जी की ‘कन्याएं’


😔😔😔😔😔😔😔

मुहल्ले की औरतें कन्या पूजन के लिए तैयार थी,
मिली नहीं कोई लड़की, उन्होंने हार अपनी मान ली !

फिर किसी ने बताया, अपने मोहल्ले के है बाहर जी,
बारह बेटियों का बाप, है सरदार जी !

सुन कर उसकी बात, हँस कर मैंने यह कह दिया,
बेटे के चक्कर में सरदार, बेटियां बारह कर के बैठ गया !

पड़ोसियों को साथ लेकर, जा पहुँचा उसके घर पे,
सत श्री अकाल कहा, मैंने प्रणाम उसे कर के !

कन्या पूजन के लिए आपकी बेटियां घर लेकर जानी है,
आपकी पत्नी ने कन्या बिठा ली, या बिठानी है ?

सुन के मेरी बात बोला, आपको कोई गलतफहमी हुई है,
किसकी पत्नी जी ? मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है !

सुन के उसकी बात, मैं तो चकरा गया,
बातों-बातों में वो मुझे क्या-क्या बता गया !

मत पूछो इनके बारे में, जो बातें मैंने छुपाई है,
क्या बताऊँ आपको, कि मैंने कहाँ-कहाँ से उठाई हैं !

माँ-बाप इनके हैवानियत की हदें सब तोड़ गए,
मन्दिर, मस्ज़िद और कई हस्पतालों में थे छोड़ गए !

बड़े-बड़े दरिंदे है, अपने इस जहान में,
यह जो दो छोटियां है, मिली थी मुझेे कूड़ेदान में !

इसका बाप कितना निर्दयी होगा, जिसे दया ना आई नन्ही सी जान पे,
हम मुर्दों को लेकर जाते हैं, वो जिन्दा ही छोड़ गया इसे श्मशान में !

यह जो बड़ी प्यारी सी है, थोड़ा लंगड़ा के चल रही है,
मैंने देखा के तलाब के पास एक गाड़ी खड़ी थी !

बैग फेंक कर भगा ली गाड़ी, जैसे उसे जल्दी बड़ी थी,
शायद उसके पीछे कोई बड़ी आफ़त पड़ी थी !

बैग था आकर्षित, मैंने लालच में उठाया था,
देखा जब खोल के, आंसू रोक नहीं पाया था !

जबरन बैग में डालने के लिए, उसने पैर इसके मोड़ दिये थे,
शायद उसे पता नहीं चला, कि उसने कब पैर इसके तोड़ दिये थे !

सात साल हो गए इस बात को, ये दिल पे लगा कर बैठी है,
बस गुमसुम सी रहती हैं, दर्द सीने में छुपा कर बैठी है !

सुन के बात सरदार जी की, सामने आया सब पाप था,
लड़की के सामने जो खड़ा था कोई और नहीं, वो उसका बाप था !

देखा जब पडोसियों के तरफ़, उनके चेहरे के रंग बताते थे,
वो भी किसी ना किसी लड़की के, मुझे माँ-बाप नजर आते थे !

दिल पे पत्थर रख कर, लड़कियों को घर लेकर आ गया,
बारी-बारी से सब को हमने पूजा के लिए बिठा दिया !

जिन हाथों ने अपने हाथ से, तोड़े थे जो पैर जी,
टूटे हुए पैरों को छू कर, मांग रहे थे ख़ैर जी !

क्यों लोग खुद की बेटी मार कर, दूसरों की पूजना चाहते हैं ?
कुछ लोग कन्या पूजन ऐसे ही मनाते हैं !

🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹 Hindu samaya book

ओम प्रकाश त्रेहन

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बौद्ध धर्म और महिला :-

1-स्त्री पुरुष को विचलित करती है-

स्त्रियां पुरुष का मन विचलित करती हैं।स्त्री का गंध,आवाज,स्पर्श विचलित करता है। स्त्री मोह में डालती है।
(अंगुत्तरनिकाय एककनिपात रुपादिवर्ग १)

2-स्त्रियां बुद्ध नहीं बन सकतीं-

स्त्री बुद्ध नहीं बन सकती। केवल तभी बन सकती है जब पुरुष का जन्म ले ले। स्त्री चक्रवर्ती सम्राट भी नहीं बन सकती । केवल पुरुष ही राजा बन सकता है। केवल पुरुष ही शक्र,मार,ब्रह्मा बन सकता है।
(अंगुत्तरनिकाय, एककनिपात,असंभव वग्गो,द्वितीय वर्ग, १/१५/१)

3-स्त्री की तुलना काले सांप से : उसके पांच दुर्गुण:

“भिक्षुओं! काले सांप में पांच दुर्गुण हैं। अस्वच्छता,दुर्गंध,बहुत सोने वाला,भयकारक और मित्रद्रोही(विश्वासघाती)। ये सारे दुर्गुण स्त्रियों में भी हैं। वे अस्वच्छ,दुर्गंधयुत,बहुत सोने वाली,भय देने वाली और विश्वासघाती है।”
(अंगु.पांचवा निपात,दीघचारिका वग्गो,पठण्हसुत्त ५/२३/९)

4-स्त्री के दुर्गुण:नारी नरकगामी:-

अधिकतर स्त्रियों को मैंने नरक में देखा है। उसके तीन कारण हैं जिससे स्त्रियां नरकगामी बनती हैं:-
-वो पूर्वाह्न काल में, सुबह, कृपण और मलिन चित्त की होती है।
-दोपहर में मत्सर युक्त होती हैं।
-रात को लोभ और काम युक्त चित्त की होती है।
(संयुक्त निकाय,मातुगामसंयुत्त,पेयाल्लवग्गो , तीहिधम्मोसुत्त ३५/१/४)


इस्लाम और महिला : –

1-औरत को खेती की तरह जोतो :-

“औरतें तुम्हारे लिए खेती के समान है ,तो खेती में जैसे चाहो हल चलाओ “
(कुरान -2 :223)

2-.पति का दर्जा पत्नी से ऊँचा :-

“हाँ परुषों को स्त्रियों पर एक दर्जा प्राप्त है “
(‘कुरान -2:228)

3- पुरुषो के लिए चार पत्नियां :-

तुम चाहो तो दो – दो ,तीन-तीन , और चार पत्नियां रख सकते हो “
(कुरान- 4:3)

4-पत्नी को जब चाहो पीटो :-

यदि तुम्हारी औरतें बात नहीं माने ,तो उनको मारो और पीटो ,ताकि वह तुम्हारी बातें मानने लगें “
(कुरान- 4:34)


ईसाई धर्म और नारी :-

1-माहवारी के समय औरतों से दूर रहो :-
बाइबिल -“जब कोई स्त्री ऋतुमती हो ,तो वह सात दिनों तक अशुद्ध मानी जाये .और जो कोई भी उसे छुए वह भी अशुद्ध माना जाये “
(लैव्यव्यवस्था -15 :19)

2-औरतें खुद को छुपा कर रखें :-

बाइबिल -यदि स्त्री ओढ़नी न ओढ़े, तो बाल भी कटा ले; यदि स्त्री के लिये बाल कटाना या मुण्डाना लज्ज़ा की बात है, तो ओढ़नी ओढ़े।”
(1 कुरिन्थियों 11 :6)

3-स्त्रियों को पुरुषों के अधीन रहना चाहिए

स्त्री को चुपचाप पूरी आधीनता में सीखना चाहिए और मैं (परमेश्वर) कहता हूं, कि स्त्री न उपदेश करे, और न पुरूष पर आज्ञा चलाए, परन्तु चुपचाप रहे।
(1 तीमुथियुस – अध्याय 2:11-12)

4–महिला को अपने बलात्कारी से शादी करनी चाहिए

यदि किसी पुरूष को कोई कुंवारी कन्या मिले और वह उसे पकड़ कर उसके साथ कुकर्म करे, और वे पकड़े जाएं, तो पुरुष पीड़ित लड़की के पिता को 50 शेकेल दे और उससे विवाह कर ले
(व्यवस्थाविवरण-22:28-29)


हिन्दू धर्म और महिला : –

1-स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है
(यजुर्वेद 20/9 )

2-बह्मचर्य सूक्त -इसमें कन्याओं को बह्मचर्य और विद्याग्रहण के पश्चात् ही विवाह के लिए कहा गया है
(अथर्ववेद – 11/5/18)

3-जिस समाज या परिवार में स्त्रियों पूजा होती है , वहां देवता और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।
(मनुस्मृति 3/56)

4- वेदों के सभी भागों का अध्ययन और चार वेदों की पढ़ाने वाली महिला सभी मनुष्यों के लिए प्रगति लाती है .
(ॠग्वेद-1/164/41)

5-शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें | जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों |
(यजुर्वेद 10/26 )

6-पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।
-(मनुस्मृति 9/96)


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वेदों में नारी की महिमा

(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)

संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण देकर हम अपने कथन को सिद्ध करेगे.

१. उषा के समान प्रकाशवती-

ऋग्वेद ४/१४/३

हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.

२. वीरांगना-

यजुर्वेद ५/१०

हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.

३. वीर प्रसवा

ऋग्वेद १०/४७/३

राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे

हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.

४. विद्या अलंकृता

यजुर्वेद २०/८४

विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.

५. स्नेहमयी माँ

अथर्वेद ७/६८/२

हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.

६. अन्नपूर्ण

अथर्ववेद ३/२८/४

इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:

जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं.

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Giriraj Nagar:
तुलसीदास की रामचरितमानस में ढोल गंवार शूद्र पशु और नारी का अभिप्राय एवं इस दोहे को लेकर समाज में फैला भ्रम :-
तुलसीदास जी रचित रामचरित मानस में नारियों को सम्मान जनक रूप में प्रस्तुत किया है। जिससे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ ही सिद्ध होता है। नारियों के बारे में उनके जो विचार देखने में आते हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:-
“धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिए चारी।।”
अर्थात धीरज, धर्म, मित्र और पत्नी की परीक्षा अति विपत्ति के समय ही की जा सकती है। इंसान के अच्छे समय में तो उसका हर कोई साथ देता है, जो बुरे समय में आपके साथ रहे वही आपका सच्चा साथी है। उसीके ऊपर आपको सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए।"जननी सम जानहिं पर नारी । तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ।।" अर्थात जो पुरुष अपनी पत्नी के अलावा किसी और स्त्री को अपनी मां सामान समझता है, उसी के ह्रदय में भगवान का निवास स्थान होता है। जो पुरुष दूसरी नारियों के साथ संबंध बनाते हैं वह पापी होते हैं, उनसे ईश्वर हमेशा दूर रहता है। "मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना । नारी सिखावन करसि काना ।।" अर्थात भगवान राम सुग्रीव के बड़े भाई बाली के सामने स्त्री के सम्मान का आदर करते हुए कहते हैं, दुष्ट बाली तुम अज्ञानी पुरुष तो हो ही लेकिन तुमने अपने घमंड में आकर अपनी विद्वान् पत्नी की बात भी नहीं मानी और तुम हार गए। मतलब अगर कोई आपको अच्छी बात कह रहा है तो अपने अभिमान को त्यागकर उसे सुनना चाहिए, क्या पता उससे आपका फायदा ही हो जाए। "तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर न सुन्दर । केकिही पेखु बचन सुधा सम असन अहि ।। अर्थात तुलसीदास जी कहते हैं सुन्दर लोगों को देखकर मुर्ख लोग ही नहीं बल्कि चालाक मनुष्य भी धोखा खा जाता है। सुन्दर मोरों को ही देख लीजिए उनकी बोली तो बहुत मीठी है लेकिन वह सांप का सेवन करते हैं। इसका मतलब सुन्दरता के पीछे नहीं भागना चाहिए। चाहे कोई भी हो। तमाम सीमाओं और अंतर्विरोधों के बावजूद तुलसी लोकमानस में रमे हुए कवि हैं। उनका सबसे प्रचलित दोहा जिसे सबने अपने तरीके से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया। हमेशा विवादों के घेरे में आ जाता है। कई महिला संगठनों ने तो इसका घोर विरोध भी किया। "प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥ ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥" अर्थात प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी (दंड दिया), किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं। कुछ लोग इस चौपाई का अपनी बुद्धि और अतिज्ञान के कारण विपरीत अर्थ निकालकर तुलसी दास जी और रामचरित मानस पर आक्षेप लगाते हुए अक्सर दिख जाते हैं। सामान्य समझ की बात है कि अगर तुलसीदास जी स्त्रियों से द्वेष या घृणा करते तो रामचरित मानस में उन्होंने स्त्री को देवी समान क्यों बताया? और तो और- तुलसीदास जी ने तो- "एक नारिब्रतरत सब झारी। ते मन बच क्रम पतिहितकारी। अर्थात, पुरुष के विशेषाधिकारों को न मानकर दोनों को समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश दिया है। साथ ही सीता जी की परम आदर्शवादी महिला एवं उनकी नैतिकता का चित्रण, उर्मिला के विरह और त्याग का चित्रण यहां तक कि लंका से मंदोदरी और त्रिजटा का चित्रण भी सकारात्मक ही है। सिर्फ इतना ही नहीं सुरसा जैसी राक्षसी को भी हनुमान द्वारा माता कहना, कैकेई और मंथरा भी तब सहानुभूति का पात्र हो जाती हैं जब उन्हें अपनी गलती का पश्चाताप होता है ऐसे में तुलसीदासजी के शब्द का अर्थ स्त्री को पीटना अथवा प्रताड़ित करना है ऐसा तो आसानी से हजम नहीं होता। इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि तुलसीदास जी शूद्रों के विषय में तो कदापि ऐसा लिख ही नहीं सकते क्योंकि उनके प्रिय राम द्वारा शबरी, निषाद, केवट आदि से मिलन के जो उदाहरण है वो तो और कुछ ही दर्शाते हैं। तुलसीदास जी ने मानस की रचना अवधी में की है और प्रचलित शब्द ज्यादा आए हैं, इसलिए 'ताड़न' शब्द को संस्कृत से ही जोड़कर नहीं देखा जा सकता, राजा दशरथ ने स्त्री के वचनों के कारण ही तो अपने प्राण दे दिए थे। श्री राम ने स्त्री की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया, रामायण के प्रत्येक पात्र द्वारा पूरी रामायण में स्त्रियों का सम्मान किया गया और उन्हें देवी बताया गया। असल में ये चौपाइयां उस समय कही गई है जब समुद्र द्वारा श्रीराम की विनय स्वीकार न करने पर जब श्री राम क्रोधित हो गए और अपने तरकश से बाण निकाला तब समुद्र देव श्रीराम के चरणों मे आए और श्रीराम से क्षमा मांगते हुए अनुनय करते हुए कहने लगे कि- हे प्रभु आपने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी और ये ये लोग विशेष ध्यान रखने यानि, शिक्षा देने के योग्य होते हैं। ताड़ना एक अवध

ी शब्द है जिसका अर्थ पहचानना परखना या रेकी करना होता है। तुलसीदास जी के कहने का मंतव्य यह है कि अगर हम ढोल के व्यवहार (सुर) को नहीं पहचानते तो, उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी अतः उससे स्वभाव को जानना आवश्यक है।
इसी तरह गंवार का अर्थ किसी का मजाक उड़ाना नहीं बल्कि उनसे है जो अज्ञानी हैं और उनकी प्रकृति या व्यवहार को जाने बिना उसके साथ जीवन सही से नहीं बिताया जा सकता। इसी तरह पशु और नारी के परिप्रेक्ष में भी वही अर्थ है कि जब तक हम नारी के स्वभाव को नहीं पहचानते उसके साथ जीवन का निर्वाह अच्छी तरह और सुखपूर्वक नहीं हो सकता। इसका सीधा सा भावार्थ यह है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी के व्यवहार को ठीक से समझना चाहिए और उनके किसी भी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए।
परन्तु दुर्भाग्य तुलसीदास जी रचित इस चौपाई को लोग अपने जीवन में भी उतारते हैं और रामचरित मानस को नहीं समझ पाते हैं।
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वरपरीक्षा


वरपरीक्षा

कुलमग्रे परीक्षेत ये मातृतः पितृश्चेति यथोक्तं पुरस्तात् ॥ १ ॥

First (अग्रे), he should examine (परीक्षेत) the family (कुलम्) (of the intended bride or groom) – those (ये) from the mother’s side (मातृतः) as well as the father’s side (पितृतः च इति), from earlier generations (पुरस्तात्) as per the tradition (यथा उक्तम्).

Note:  There is a reference to this in the Āśvalāyana Śrauta Sūtra:

ये मातृतश्च पितृतश्च दशपुरुषं समनुष्ठिता विद्यातपोभ्यां पुण्यैश्च कर्मभिर्येषामुभयतो नाब्रह्मण्यं निनयेयुः ।

Those whose ancestors up to ten generations on the mother’s and father’s side have studied and understood the Veda, have performed all the prescribed duties therein, and have led an austere life – such people can never be led away from the status of a brāhmaṇa.

बुद्धिमते कन्यां प्रयच्छेत् ॥ २ ॥

He should give away (प्रयच्छेत्) his daughter (कन्याम्) to an intelligent person बुद्धिमते).

बुद्धिरूपशीललक्षणसम्पन्नामरोगामुपयच्छेत ॥ ३ ॥

(A prospective groom) should marry (उपयच्छेत) a girl endowed with intelligence, beauty, character (बुद्धि-रूप-शील-लक्षणसम्पन्नाम्), and one who is free of disease (अरोगाम्).

दुर्विज्ञेयानि लक्षणानीति ॥ ४ ॥

The characteristics (लक्षणानि) (mentioned about) are difficult to determine (दुर्विज्ञेयानि इति).

अष्टौ पिण्डान्कृत्वा ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञ ॠते सत्यं प्रतिष्ठितं यदियं कुमार्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यतां यत्सत्यं तद्दृश्यमिति पिण्डानभिमन्त्र्य कुमारीं ब्रूयादेषामेकं गृहाणेति ॥ ५ ॥

Having prepared eight lumps of earth (अष्टौ पिण्डान् कृत्वा) (procured from different places), and having consecrated them with the mantra (इति पिण्डान् अभिमन्त्र्य) – “Cosmic order (ऋतम्) was born at the beginning (अग्रे प्रथमम् जज्ञे); Truth (सत्यम्) is established in the cosmic order  (ऋते प्रतिष्ठितम्); If (यत्) this girl (इयम् कुमारी) is of noble birth (अभिजाता), then she (तत् इयम्) should make it known (प्रतिपद्यताम्), what the truth is (यत् सत्यम्) should be made evident (तत् दृश्यताम्)”, he should tell the girl (कुमारीम् इति ब्रूयात्) – “Take (गृहाण) one of (एकम्) these (एषाम्)”

क्षेत्राच्चेदुभयतःसस्याद्गृह्णीयादन्नवत्यस्याः प्रजा भविष्यतीति विद्याद्गोष्ठात्पशुमती वेदिपुरीषाद्ब्रह्मवर्चस्विन्यविदासिनो ह्रदात्सर्वसम्पन्ना देवनात्कितवी चतुष्पथाद्द्विप्रव्राजिनीरिणादधन्या श्मशानात् पतिघ्नी ॥ ६ ॥

If she chooses (गृह्णीयात् चेत्) the one from the field (क्षेत्रात्) that yields two crops in a year (उभयतः सस्यात्), he should know (इति विद्यात्) that her progeny (अस्याः प्रजाः) will have plenty of food (अन्नवती भविष्यति); If from the cow-shed (गोष्ठात्), (her progeny will have) plenty of cattle (पशुमती);  If from the fire-altar (वेदिपुरीषात्), (her progeny will) be endowed with the luster of learning (ब्रह्मवर्चस्विनी); If from lake that does not dry (अविदासिनः ह्रदात्), (her progeny will) be highly accomplished (सर्वसम्पन्ना); If from a gambling den (देवनात्), (her progeny will) become gamblers (कितवी); If from cross-roads (चतुष्पतात्), she be unfaithful (द्विप्रव्राजिनी); If from barren land (इरिणात्), she be destitute (अधन्या); If from a cremation ground (श्मशानात्), she will cause the death of her husband (पतिघ्नी).

Notes

  • द्विप्रव्राजिनी – going towards (प्रव्राजिनी) two (men) (द्वि), i.e. unfaithful

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वधूलक्षणपरीक्षा .

कुलमग्रे परीक्षेत ये मातृतः पितृतश्चेति यथोक्तं

पुरस्तात् बुद्धिमते कन्यां प्रयच्छेत् । बुद्धिरूपशील –

लक्षणसंपन्नामरोगामुपयच्छेत ॥ आश्व० गृह्यसूत्र .

उद्वहेत्तु द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणैर्युताम् ।

अव्यंगांगीं सौम्यनाम्नीं मृद्वंगीं च मनोहराम् ॥३४॥

अनन्यपूर्विकां कान्तामसपिडां यवीयसीम् ।

अरोगिणीं भ्रातृमतीमसमानार्षगोत्रजाम् ॥३५॥

Translate from: Marathi1281/5000वर और वधू के विवाह का निर्णय लेने से पहले गोत्र, सप्रवर, सपिन्दाय के बारे में सोचना चाहिए, और इसके बारे में पहले ही लिखा जा चुका है। लेकिन इसके अलावा, यह पता लगाना आवश्यक है कि माता-पिता के वंश शुद्ध हैं या नहीं। शुद्ध का मतलब है तपेदिक, मिर्गी, कुष्ठ रोग, एक आनुवांशिक और अपरिहार्य बीमारी जिसमें कोई पुरुष या महिला पहले से जुड़ा नहीं है। इसी तरह से दोनों कुलों में पुण्य होना चाहिए। वह बुद्धिमान, विद्वान, पवित्र, अच्छे स्वभाव वाला और स्वस्थ होना चाहिए। इसी तरह, दुल्हन को बुद्धिमान, सुशोभित, अच्छा स्वभाव और रोगसूचक होना चाहिए (जो कि बांझपन, बांझपन, आदि की उपेक्षा के बिना) है। एक दुल्हन जो एक ही जाति की है, उसके शरीर के अंगों में कोई दोष नहीं है, उसे सुंदर और कोमल दिखना चाहिए। सारांश में, दुल्हन के मातृ और पैतृक वंश की जांच करने के बाद, लड़की से शादी करनी चाहिए, अर्थात, दुल्हन दूल्हा होना चाहिए। साथ ही, आपको एक ऐसे कबीले की लड़की से शादी करनी चाहिए जो दूसरों के द्वारा स्वीकार नहीं की जाती है, जो आपसे संबंधित नहीं है, जो आपसे छोटी है, जो आपसे छोटी है, जो स्वस्थ है, जो एक भाई है, जो एक जनजाति से अलग जनजाति में पैदा हुई है और जो आपसे श्रेष्ठ नहीं है। उसी तरह, जैसे जनपदधर्म ग्रामधर्मशः तन विदेह प्रति ’का वादा, विवाह के समय देशचर, ग्रामचार और कुलाचार पर विचार करना चाहिए।

वर के लक्षण .

कुलं च शीलं च वयश्च रूपं विद्यां च वित्तं च सनाथतां च ।

एतान् गुणान् सप्त परीक्ष्य देया कन्या बुधै : शेषमचिंतनीयम् ॥३६॥

सतकुला में, एक दुल्हन को एक दूल्हे को दिया जाना चाहिए जो अच्छे शिष्टाचार, अच्छे शिष्टाचार, उम्र और उपस्थिति के साथ पैदा हुआ हो। सुविद्या का अर्थ है शिक्षित, गुणवान, पवित्र और अच्छी तरह से समझा जाने वाला।