Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, महाभारत - Mahabharat

महावीर हनुमानजी के अतुल्य पराक्रम की रोचक कथा
~~~~~~~
ऐसा पढ़ने में आता है कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर बैठे हनुमानजी कभी-कभी खड़े हो कर कौरवों की सेना की और घूर कर देखते तो उस समय कौरवों की सेना तूफान की गति से युद्ध भूमि को छोड़ कर भाग जाती, हनुमानजी की दृष्टि का सामना करने का साहस किसी में नही था, उसदिन भी ऐसा ही हुआ था जब कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध चल रहा था।

कर्ण अर्जुन पर अत्यंत भयंकर बाणों की वर्षा किये जा रहा था , उनके बाणों की वर्षा से श्रीकृष्ण को भी बाण लगते गए , अतः उनके बाण से श्रीकृष्ण का कवच कटकर गिर पड़ा और उनके सुकुमार अंगोपर बाण लगने लगे।

रथकी छत पर बैठे (पवनपुत्र हनुमानजी ) एक टक निचे अपने इन आराध्य की और ही देख रहे थे।
श्रीकृष्ण कवच हीन हो गए थे , उनके श्री अंगपर कर्ण निरंतर बाण मारता ही जा रहा था , हनुमानजी से यह सहन नही हुआ , आकस्मात् वे उग्रतर गर्जना करके दोनों हाथ उठाकर कर्णको मार देने के लिए उठ खड़े हुए।

हनुमानजी की भयंकर गर्जना से ऐसा लगा मानो ब्रह्माण्ड फट गया हो , कौरव- सेना तो पहले ही भाग चुकी थी अब पांडव पक्षकी सेना भी उनकी गर्जना के भय से भागने लगी , हनुमानजी का क्रोध देख कर कर्णके हाथसे धनुष छूट कर गिर गया।

भगवान श्रीकृष्ण तत्काल उठकर अपना दक्षिण हस्त उठाया और हनुमानजी को स्पर्श करके सावधान किया — रुको ! आपके क्रोध करने का समय नही है।

श्रीकृष्णके स्पर्श से हनुमानजी रुक तो गए किन्तु उनकी पूंछ खड़ी हो कर आकाश में हिल रही थी , उनके दोनों हाथोंकी मुठ्ठियाँ बन्द थीं , वे दाँत कट- कटा रहे थे और आग्नेय नेत्रों से कर्णको घूर रहे थे , हनुमानजी का क्रोध देख कर कर्ण और उनके सारथी काँपने लगे।

हनुमानजी का क्रोध शांत न होते देख कर श्रीकृष्ण ने कड़े स्वर में कहा हनुमान ! मेरी और देखो , अगर तुम इस प्रकार कर्णकी ओर कुछ क्षण और देखोगे तो कर्ण तुम्हारी दृष्टि से ही मर जाएगा।

यह त्रेतायुग नहीं है।
आपके पराक्रम को तो दूर आपके तेज को भी कोई यहाँ सह नही सकता।
आपको मैंने इस युद्धमे शांत रहकर बैठने को कहा है।

फिर हनुमानजी ने अपने आराध्यदेव की और निचे देखा और शांत हो कर बैठ गए।

जय जय सियाराम ❤

मधुस्मिता रावत

Posted in महाभारत - Mahabharat

द्वापर युग में १८ की संख्या का क्या महत्व है

यह था कि पहले महाभारत युद्ध के लिए युद्ध भूमि खोजी गई जो आज के कुरुक्षेत्र जिले में मिली। अब समय आ गई कि युद्ध भूमि की एक ऐसी सीमा निर्धारित कर दी जाय
जिससे योद्धा उस सीमा से बाहर न निकल जायं

कहा गया है कि
सबहिं नचावैं राम गुसाईं
अपुना रहइं दास की नाईं
और
होइहंइ वहि जो राम रचि राखा
को करि तर्क बढावहिं साखा।

वैसे तो यह चौपाई रामायण की है पर सटीक उतरती है।
यह कि इस सीमा का निर्धारण कौशल करे?याद रखें कि द्वापर युग के नियमानुसार इसे १८ मील लंबा चौड़ा होना था। श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि यह कार्य तो बड़े भाई बलराम ही कर सकते हैं। ध्यान दीजिए कि बलराम जी ही उस नारायणी सेना के सेनापति थे जिसे कृष्ण ने दुर्योधन को दिया था।अब बलराम जी ने अपना हल कंधे से उतारा और रेखा खींचना शुरू कर दिया। एक माया रूपी वृद्ध गाय बराबर सामने आ कर खड़ी होती रही। कुछ देर तक बलराम जी मुंह से डांटकर भगाते रहे पर गऊ माता भी जिद पर अड़ी रही। उन्हें न हटना था और न हटीं।
अब बलराम जी क्रोधित हो गए।
क्रोधी तो थे ही।कटकटाकर हल छोड़कर गाय को धक्का दे दिया। संयोग या दुर्योग से गऊ माता के प्राण पखेरू उड़ गए। आपदा में अवसर का लाभ श्रीकृष्ण ने उठाया और कहा कि बड़े भैया यह क्या कर दिया?
अब आपको गऊ हत्या लग गई है।
जाइये प्रायश्चित करके आइए। अब वह देदव्यास के यहां पहुंचे अब इसे नियति का खेल कहें कौरवों का दुर्भाग्य कहें कि कृष्ण की लीला कहें कि व्यास जी आश्रम पर नहीं थे।मिले उनके पुत्र शुकदेव जी। उन्होंने विधान बताया कि बलराम जी आप १८ दिन तक १८
तीर्थों का भ्रमण करके दान पुण्य देते हुए यहां आ जाइए तभी यह
पलायन पूरा होगा। अब श्रीकृष्ण भाई से युद्ध करने से बच गए और अगले १८ दिनों में महाभारत युद्ध को समाप्त करा दिया। बलराम जी तब पहुंचे जब भीम दुर्योधन की जंघा पर गदा प्रहार कर चुके थे।बाद श्रीकृष्ण ने किसी तरह मनाकर उन्हें शांत कराया।

सनातन धर्म में ९ ,१८ ,१०८ सभी का बहुत महत्व है।सबका जोड़ ९
नौ को बहुत शुभ माना जाता है नौ एक पूर्णाक भी है
ग्रह नौ , गर्भ में शिशु नौ महीने रहता है , नव दुर्गा और नवरात्र

द्वापर युग = ८६४००० वर्ष
८ + ६+ ४+०+०+० = १८ =१+८= ९
त्रेता १२९६००९ वर्ष = जोड़ ९
सतयुग १७२८००० वर्ष = ९
पुराण व उप पुराण १८ = ९

महाभारत युद्ध १८ दिनों चला = १+८= ९
कंस वध १८ वर्ष की आयु में १+८=९

श्री मद्भागवत गीता अध्याय १८ ,१+८=९
माला के मनके १०८ १+०+८= ९

१२ राशियों और ९ ग्रहों की गुडंखंड १०८ = ९
काल के १८ भेद ( १साल १२ महीने ५ ऋतुएं)
= ९

सिद्धियां १८ , १+८= ९
विधाएं १८ शिवांग १०८ अर्थात १+८= ९
महाभारत युद्ध
१८ अक्षौहिणी सेना = ९
युद्ध का क्षेत्रफल कोस १८ =९
युद्ध में भाग ले रहे योद्धा १८= ९
अर्थात सूत्रधार मुख्यत १८ =९
१८ योद्धा शेष बचे भगवान विष्णु के (आठवें) अवतार श्री कृष्ण
माता देवकी के (आठावे) पुत्र
आठवें मुहूर्त में अष्टमी को जन्म

पृथ्वी का ऊपरी वृत ३६० डिग्री ३+६ = ९
सूर्य का व्यास १०८ गुना
चन्द्रमा का १०८ गुना
२४ घंटे सांसों की संख्या २१६००= ९
सूर्य की बदलती कलाएं २१६०००= ९
नक्षत्र २७ , २+७ = ९
द्वापरयुग में भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लेकर कंस आदि दुष्टों का संहार किया और महाभारत के युद्ध में गीता का उपदेश दिया।
कहते हैं कि महाभारत युद्ध में 18 संख्‍या का बहुत महत्व है।
इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे महाभारत की पुस्तक में 18 अध्याय हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया। 18 दिन तक ही युद्ध चला। गीता में भी 18 अध्याय हैं। कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिनी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिनी सेना थी। कुल 18 अध्याय हैं- अर्जुनविषादयोग, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग, कर्मसंन्यासयोग, आत्मसंयमयोग, ज्ञानविज्ञानयोग, अक्षरब्रह्मयोग, राजविद्याराजगुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग एंव भक्तियोग, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञविभागयोग, गुणत्रयविभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुरसम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रयविभागयोग और मोक्षसंन्यासयोग। महाभारत ग्रंथ में कुल 18 पर्व हैं- आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, अश्वमेधिक पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशासन पर्व, मौसल पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, स्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व। मालूम हो क‍ि ऋषि वेदव्यास ने 18 पुराण भी रचे हैं। 18 का महाभारत तथा द्वापर युग में यही बहुत बड़ा रहस्मयि योगदान है |
हिंदू धर्म में 18 के अंक को बहुत ही शुभ माना जाता है।क्योंकि इसका योग 9 बनता है।और 9 अंक को सबसे पॉवरफुल अंक माना जाता है।ज्योतिष में इसका संबंध मंगल ग्रह से माना जाता है। इतना ही नहीं इस ज्ञान सागर में श्लोक भी 18 हजार हैं।समय की गति, जिसे हम चक्रकाल कहते हैं, इसके भी 18 भेद होते है |मां भगवती के 18 प्रसिद्ध स्वरूप हैं।

Posted in महाभारत - Mahabharat

भारतजहाँरथहाँकनेवालाइतनाजानता_था

पहले बात करते हैं बोड्स लॉ(Bode’s Law) की, इसने पृथ्वी से ग्रहों की दूरी का एक समानुपातिक गणित दिया और बताया कि प्रत्येक ग्रह दूनी दूनी दूरी पर स्थित है। Titius ने सन् 1766 में Bode को लिखा था और सन् 1772 में यह प्रचारित हुआ। इसके बाद ही सन् 1801 में मंगल तथा बृहस्पति के मध्य Ceres को खोजा गया था। Titius-Bode से भी पहले Gregory ने 1702 में इसे लिखा था। कुछ अन्य सन्दर्भ भी मिलते हैं कि योरुप में यह बात कुछ अन्य लोग भी लिख पढ़ रहे थे। इस प्रकार Bode’s Law को अब Gregory-Wolff-Titius-Bode Law भी कहा जाने लगा है।
ग्रहों की अवस्थिति तथा दूरी के समानुपात की अवधारणा या सूत्र वस्तुतः अत्यन्त प्राचीन है और भारतीय पुराणों में ही इसका सर्वप्रथम उल्लेख प्राप्त होता है।
महाभारत युद्ध का हाल जब संजय धृतराष्ट्र को सुनाने पहुँचता है तब आरम्भ में भूमि के वर्णन के साथ ही सौरमण्डल का वर्णन भी है क्योंकि पृथ्वी सौरमण्डल के अन्तर्गत है और उसी पृथ्वी पर ही युद्ध हुआ था।
धृतराष्ट्र बोले- संजय! तुमने यहाँ #जम्बूखण्‍ड का यथावत् वर्ण‍न किया है। अब तुम इसके विस्तार और परिमाण को ठीक-ठीक बताओ। संजय! समुद्र के सम्पूर्ण परिमाण को भी अच्छी तरह समझा कर कहो। इसके बाद मुझसे #शाकद्वीप और #कुशद्वीप का वर्णन करो। संजय! इसी प्रकार #शाल्मलिद्वीप, #क्रौंचद्वीप तथा सूर्य, चन्द्रमा एवं राहु से सम्बन्ध रखने वाली सब बातों का यथार्थ रूप से वर्णन करो।

संजय बोले- राजन्! बहुत-से द्वीप हैं, जिनसे सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है। अब मैं आपकी आज्ञा के अनुसार सात द्वीपों का तथा चन्द्रमा, सूर्य और राहु का भी वर्णन करूंगा। राजन्! जम्बूद्वीप का विस्तार पूरे 18600 योजन है। इसके चारों ओर जो खारे पानी का समुद्र है, उसका विस्तार जम्बूद्वीप की अपेक्षा दूना माना गया है। लवणसमुद्र सब ओर से मण्‍डलाकार है। राजन्! अब मैं शाकद्वीप का यथावत् वर्णन आरम्भ करता हूँ। कुरुनन्दन! मेरे इस न्यायोचित कथन को आप ध्‍यान देकर सुनें।

महाराज! नरेश्‍वर! वह द्वीप विस्तार की दृष्टि से जम्बूद्वीप के परिमाण से दूना है। भरतश्रेष्‍ठ! उसका समुद्र भी विभागपूर्वक उससे दूना ही है। भरतश्रेष्‍ठ! उस समुद्र का नाम क्षीरसागर है, जिसने उक्त द्वीप को सब ओर से घेर रखा है।

संजय बोले- महाराज! कुरुनन्दन! इसके बाद वाले द्वीपों के विषय में जो बातें सुनी जाती हैं, वे इस प्रकार हैं; उन्हें आप मुझसे सुनिये। #क्षीरोद समुद्र के बाद #घृतोद समुद्र है। फिर #दधिमण्‍डोदक समुद्र है। इनके बाद #सुरोद समुद्र है, फिर #मीठे पानी का सागर है। महाराज! इन समुद्रों से घिरे हुए सभी द्वीप और पर्वत उत्तरोत्तर #दुगुने विस्तार वाले हैं।
धृतराष्ट्र बोले- संजय! तुमने द्वीपों की स्थिति के विषय में तो बड़े विस्तार के साथ वर्णन किया है। अब जो अन्तिम विषय- सूर्य, चन्द्रमा तथा राहु का प्रमाण बताना शेष रह गया है, उसका वर्णन करो। संजय बोले- महाराज! मैंने द्वीपों का वर्णन तो कर दिया। अब ग्रहों का यथार्थ वर्णन सुनिये। कौरवश्रेष्‍ठ! राहु की जितनी बड़ी लंबाई-चौड़ाई सुनने में आती है, वह आपको बताता हूँ। महाराज! सुना है कि राहु ग्रह मण्‍डलाकार है। निष्‍पाप नरेश! राहु ग्रह का व्यासगत विचार बारह हजार योजन है और उसकी परिधि का विस्तार छत्तीस हजार योजन है। पौराणिक विद्वान् उसकी विपुलता (मोटाई) छ: हजार योजन की बताते हैं। राजन्! चन्द्रमा का व्यास ग्यारह हजार योजन है।
कुरूश्रेष्ठ! उनकी परिधि या मण्‍डल का विस्तार तैंतीस हजार योजन बताया गया है और महामना शीतरश्मि चन्द्रमा का वैपुल्यगत विस्तार (मोटाई) उनसठ सौ योजन हैं। कुरुनन्दन! सूर्य का व्यासगत विस्तार दस हजार योजन है और उनकी परिधि या मण्‍डल का‍ विस्तार तीस हजार योजन है तथा उनकी विपुलता अट्ठावन सौ योजन की है।

अनघ! इस प्रकार शीघ्रगामी परम उदार भगवान् सूर्य के त्रिविध विस्तार का वर्णन सुना जाता है। भारत! यहाँ सूर्य का प्रमाण बताया गया, इन दोनों से अधिक विस्तार रखने के कारण राहु यथासमय इन सूर्य और चन्द्रमा को आच्छादित कर लेता है।

✍🏼अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

🎋”भूतपूर्व वैयाकरणज्ञ 🔥भव्य-भारत”🎋
एक समय था, जब भारत सम्पूर्ण विश्व में प्रत्येक क्षेत्र सबसे आगे था । प्राचीन काल में सभी भारतीय बहुश्रुत,वेद-वेदाङ्गज्ञ थे । राजा भोज को तो एक साधारण लकडहारे ने भी व्याकरण में छक्के छुडा दिए थे ।व्याकरण शास्त्र की इतनी प्रतिष्ठा थी की व्याकरण ज्ञान शून्य को कोई अपनी लड़की तक नही देता था ,यथा :- “अचीकमत यो न जानाति,यो न जानाति वर्वरी।अजर्घा यो न जानाति,तस्मै कन्यां न दीयते”

यह तत्कालीन लोक में ख्यात व्याकरणशास्त्रीय उक्ति है ‘अचीकमत, बर्बरी एवं अजर्घा इन पदों की सिद्धि में जो सुधी असमर्थ हो उसे कन्या न दी जाये” प्रायः प्रत्येक व्यक्ति व्याकरणज्ञ हो यही अपेक्षा होती थी ताकि वह स्वयं शब्द के साधुत्व-असाधुत्व का विवेकी हो,स्वयं वेदार्थ परिज्ञान में समर्थ हो, इतना सम्भव न भी हो तो कम से कम इतने संस्कृत ज्ञान की अपेक्षा रखी ही जाती थी जिससे वह शब्दों का यथाशक्य शुद्ध व पूर्ण उच्चारण करे :-
यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥

अर्थ : ” पुत्र! यदि तुम बहुत विद्वान नहीं बन पाते हो तो भी व्याकरण (अवश्य) पढ़ो ताकि ‘स्वजन’ ‘श्वजन’ (कुत्ता) न बने और ‘सकल’ (सम्पूर्ण) ‘शकल’ (टूटा हुआ) न बने तथा ‘सकृत्’ (किसी समय) ‘शकृत्’ (गोबर का घूरा) न बन जाय। “

भारत का जन जन की व्याकरणज्ञता सम्बंधित प्रसंग “वैदिक संस्कृत” पेज के महानुभव ने भी आज ही उद्धृत की है जो महाभाष्य ८.३.९७ में स्वयं पतञ्जलि महाभाग ने भी उद्धृत की हैं ।

सारथि के लिए उस समय कई शब्द प्रयोग में आते थे । जैसे—सूत, सारथि, प्राजिता और प्रवेता ।

आज हम आपको प्राजिता और प्रवेता की सिद्धि के बारे में बतायेंगे और साथ ही इसके सम्बन्ध में रोचक प्रसंग भी बतायेंगे ।

रथ को हाँकने वाले को “सारथि” कहा जाता है । सारथि रथ में बाई ओर बैठता था, इसी कारण उसे “सव्येष्ठा” भी कहलाता थाः—-देखिए,महाभाष्य—८.३.९७

सारथि को सूत भी कहा जाता था , जिसका अर्थ था—-अच्छी प्रकार हाँकने वाला । इसी अर्थ में प्रवेता और प्राजिता शब्द भी बनते थे । इसमें प्रवेता व्यकारण की दृष्टि से शुद्ध था , किन्तु लोक में विशेषतः सारथियों में “प्राजिता” शब्द का प्रचलन था ।

भाष्यकार ने गत्यर्थक “अज्” को “वी” आदेश करने के प्रसंग में “प्राजिता” शब्द की निष्पत्ति पर एक मनोरंजक प्रसंग दिया है । उन्होंने “प्राजिता” शब्द का उल्लेख कर प्रश्न किया है कि क्या यह प्रयोग उचित है ? इसके उत्तर में हाँ कहा है ।

कोई वैयाकरण किसी रथ को देखकर बोला, “इस रथ का प्रवेता (सारथि) कौन है ?”

सूत ने उत्तर दिया, “आयुष्मन्, इस रथ का प्राजिता मैं हूँ ।”

वैयाकरण ने कहा, “प्राजिता तो अपशब्द है ।”

सूत बोला, देवों के प्रिय आप व्याकरण को जानने वाले से निष्पन्न होने वाले केवल शब्दों की ही जानकारी रखते हैं, किन्तु व्यवहार में कौन-सा शब्द इष्ट है, वह नहीं जानते । “प्राजिता” प्रयोग शास्त्रकारों को मान्य है ।”

इस पर वैयाकरण चिढकर बोला, “यह दुरुत (दुष्ट सारथि) तो मुझे पीडा पहुँचा रहा है ।”

सूत ने शान्त भाव से उत्तर दिया, “महोदय ! मैं सूत हूँ । सूत शब्द “वेञ्” धातु के आगे क्त प्रत्यय और पहले प्रशंसार्थक “सु” उपसर्ग लगाकर नहीं बनता, जो आपने प्रशंसार्थक “सूत” निकालकर कुत्सार्थक “दुर्” उपसर्ग लगाकर “दुरुत” शब्द बना लिया । सूत तो “सूञ्” धातु (प्रेरणार्थक) से बनता है और यदि आप मेरे लिए कुत्सार्थक प्रयोग करना चाहते हैं, तो आपको मुझे “दुःसूत” कहना चाहिए, “दुरुत” नहीं ।

उपर्युक्त उद्धरण से यह स्पष्ट है कि सारथि, सूत और प्राजिता तीनों शब्दों का प्रचलन हाँकने वाले के लिए था । व्याकरण की दृष्टि से प्रवेता शब्द शुद्ध माना जाता था । इसी प्रकार “सूत” के विषय में भी वैयाकरणों में मतभेद था ।
✍🏼
इत्यलयम् 🌺 संलग्न कथानक के लिये “वैदिक संस्कृत” पृष्ठ के प्रति कृतज्ञ हूँ।💐

Posted in महाभारत - Mahabharat

महाभारत :-

माना जाता है कि महाभारत युद्ध में एकमात्र जीवित बचा कौरव युयुत्सु था और 24,165 कौरव सैनिक लापता हो गए थे। लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, ‍जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे।

शोधानुसार जब महाभारत का युद्ध हुआ, तब श्रीकृष्ण की आयु 83 वर्ष थी। महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद उन्होंने देह त्याग दी थी। इसका मतलब 119 वर्ष की आयु में उन्होंने देहत्याग किया था। भगवान श्रीकृष्ण द्वापर के अंत और कलियुग के आरंभ के संधि काल में विद्यमान थे। ज्योतिषिय गणना के अनुसार कलियुग का आरंभ शक संवत से 3176 वर्ष पूर्व की चैत्र शुक्ल एकम (प्रतिपदा) को हुआ था। वर्तमान में 1936 शक संवत है। इस प्रकार कलियुग को आरंभ हुए 5112 वर्ष हो गए हैं।

इस प्रकार भारतीय मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण विद्यमानता या काल शक संवत पूर्व 3263 की भाद्रपद कृ. 8 बुधवार के शक संवत पूर्व 3144 तक है। भारत का सर्वाधिक प्राचीन युधिष्ठिर संवत जिसकी गणना कलियुग से 40 वर्ष पूर्व से की जाती है, उक्त मान्यता को पुष्ट करता है। कलियुग के आरंभ होने से 6 माह पूर्व मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत का युद्ध का आरंभ हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था। आओ जानते हैं महाभारत युद्ध के 18 दिनों के रोचक घटनाक्रम को।
महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने अपनी सेना का पड़ाव कुरुक्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र में सरस्वती नदी के दक्षिणी तट पर बसे समंत्र पंचक तीर्थ के पास हिरण्यवती नदी (सरस्वती नदी की सहायक नदी) के तट पर डाला। कौरवों ने कुरुक्षेत्र के पूर्वी भाग में वहां से कुछ योजन की दूरी पर एक समतल मैदान में अपना पड़ाव डाला।

दोनों ओर के शिविरों में सैनिकों के भोजन और घायलों के इलाज की उत्तम व्यवस्था थी। हाथी, घोड़े और रथों की अलग व्यवस्था थी। हजारों शिविरों में से प्रत्येक शिविर में प्रचुर मात्रा में खाद्य सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, यंत्र और कई वैद्य और शिल्पी वेतन देकर रखे गए।

दोनों सेनाओं के बीच में युद्ध के लिए 5 योजन (1 योजन= 8 किमी की परिधि, विष्णु पुराण के अनुसार 4 कोस या कोश= 1 योजन= 13 किमी से 16 किमी)= 40 किमी का घेरा छोड़ दिया गया था।
कौरवों की ओर थे सहयोगी जनपद:- गांधार, मद्र, सिन्ध, काम्बोज, कलिंग, सिंहल, दरद, अभीषह, मागध, पिशाच, कोसल, प्रतीच्य, बाह्लिक, उदीच्य, अंश, पल्लव, सौराष्ट्र, अवन्ति, निषाद, शूरसेन, शिबि, वसति, पौरव, तुषार, चूचुपदेश, अशवक, पाण्डय, पुलिन्द, पारद, क्षुद्रक, प्राग्ज्योतिषपुर, मेकल, कुरुविन्द, त्रिपुरा, शल, अम्बष्ठ, कैतव, यवन, त्रिगर्त, सौविर और प्राच्य।

कौरवों की ओर से ये यौद्धा लड़े थे : भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा, कलिंगराज, श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज, सुदक्षिण, बृहद्वल, दुर्योधन व उसके 99 भाई सहित अन्य हजारों यौद्धा।

पांडवों की ओर थे ये जनपद : पांचाल, चेदि, काशी, करुष, मत्स्य, केकय, सृंजय, दक्षार्ण, सोमक, कुन्ति, आनप्त, दाशेरक, प्रभद्रक, अनूपक, किरात, पटच्चर, तित्तिर, चोल, पाण्ड्य, अग्निवेश्य, हुण्ड, दानभारि, शबर, उद्भस, वत्स, पौण्ड्र, पिशाच, पुण्ड्र, कुण्डीविष, मारुत, धेनुक, तगंण और परतगंण।

पांडवों की ओर से लड़े थे ये यौद्धा : भीम, नकुल, सहदेव, अर्जुन, युधिष्टर, द्रौपदी के पांचों पुत्र, सात्यकि, उत्तमौजा, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, पाण्ड्यराज, घटोत्कच, शिखण्डी, युयुत्सु, कुन्तिभोज, उत्तमौजा, शैब्य और अनूपराज नील।

तटस्थ जनपद : विदर्भ, शाल्व, चीन, लौहित्य, शोणित, नेपा, कोंकण, कर्नाटक, केरल, आन्ध्र, द्रविड़ आदि ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।
पितामह भीष्म की सलाह पर दोनों दलों ने एकत्र होकर युद्ध के कुछ नियम बनाए। उनके बनाए हुए नियम निम्नलिखित हैं-

  1. प्रतिदिन युद्ध सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही रहेगा। सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं होगा।
  2. युद्ध समाप्ति के पश्‍चात छल-कपट छोड़कर सभी लोग प्रेम का व्यवहार करेंगे।
  3. रथी रथी से, हाथी वाला हाथी वाले से और पैदल पैदल से ही युद्ध करेगा।
  4. एक वीर के साथ एक ही वीर युद्ध करेगा।
  5. भय से भागते हुए या शरण में आए हुए लोगों पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं किया जाएगा।
  6. जो वीर निहत्था हो जाएगा उस पर कोई अस्त्र नहीं उठाया जाएगा।
  7. युद्ध में सेवक का काम करने वालों पर कोई अस्त्र नहीं उठाएगा।
    प्रथम दिन का युद्ध : प्रथम दिन एक ओर जहां कृष्ण-अर्जुन अपने रथ के साथ दोनों ओर की सेनाओं के मध्य खड़े थे और अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे इसी दौरान भीष्म पितामह ने सभी योद्धाओं को कहा कि अब युद्ध शुरू होने वाला है। इस समय जो भी योद्धा अपना खेमा बदलना चाहे वह स्वतंत्र है कि वह जिसकी तरफ से भी चाहे युद्ध करे। इस घोषणा के बाद धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु डंका बजाते हुए कौरव दल को छोड़ पांडवों के खेमे में चले गया। ऐसा युधिष्ठिर के क्रियाकलापों के कारण संभव हुआ था। श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाकर युद्ध की घोषणा की।

इस दिन 10 हजार सैनिकों की मृत्यु हुई। भीम ने दु:शासन पर आक्रमण किया। अभिमन्यु ने भीष्म का धनुष तथा रथ का ध्वजदंड काट दिया। पहले दिन की समाप्ति पर पांडव पक्ष को भारी नुकसान उठाना पड़ा। विराट नरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत क्रमशः शल्य और भीष्म के द्वारा मारे गए। भीष्म द्वारा उनके कई सैनिकों का वध कर दिया गया।

कौन मजबूत रहा : पहला दिन पांडव पक्ष को नुकसान उठाना पड़ा और कौरव पक्ष मजबूत रहा।

दूसरे दिन का युद्ध : कृष्ण के उपदेश के बाद अर्जुन तथा भीष्म, धृष्टद्युम्न तथा द्रोण के मध्य युद्ध हुआ। सात्यकि ने भीष्म के सारथी को घायल कर दिया।

द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को कई बार हराया और उसके कई धनुष काट दिए, भीष्म द्वारा अर्जुन और श्रीकृष्ण को कई बार घायल किया गया। इस दिन भीम का कलिंगों और निषादों से युद्ध हुआ तथा भीम द्वारा सहस्रों कलिंग और निषाद मार गिराए गए, अर्जुन ने भी भीष्म को भीषण संहार मचाने से रोके रखा। कौरवों की ओर से लड़ने वाले कलिंगराज भानुमान, केतुमान, अन्य कलिंग वीर योद्धा मार गए।

कौन मजबूत रहा : दूसरे दिन कौरवों को नुकसान उठाना पड़ा और पांडव पक्ष मजबूत रहा।
तीसरा दिन : कौरवों ने गरूड़ तथा पांडवों ने अर्धचंद्राकार जैसी सैन्य व्यूह रचना की। कौरवों की ओर से दुर्योधन तथा पांडवों की ओर से भीम व अर्जुन सुरक्षा कर रहे थे। इस दिन भीम ने घटोत्कच के साथ मिलकर दुर्योधन की सेना को युद्ध से भगा दिया। यह देखकर भीष्म भीषण संहार मचा देते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को भीष्म वध करने को कहते हैं, परंतु अर्जुन उत्साह से युद्ध नहीं कर पाता जिससे श्रीकृष्ण स्वयं भीष्म को मारने के लिए उद्यत हो जाते हैं, परंतु अर्जुन उन्हें प्रतिज्ञारूपी आश्वासन देकर कौरव सेना का भीषण संहार करते हैं। वे एक दिन में ही समस्त प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव क्षत्रियगणों को मार गिराते हैं।

भीम के बाण से दुर्योधन अचेत हो गया और तभी उसका सारथी रथ को भगा ले गया। भीम ने सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया। इस दिन भी कौरवों को ही अधिक क्षति उठाना पड़ती है। उनके प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव वीर योद्धा मारे जाते हैं।

कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।

चौथा दिन : चौथे दिन भी कौरव पक्ष को भारी नुकसान हुआ। इस दिन कौरवों ने अर्जुन को अपने बाणों से ढंक दिया, परंतु अर्जुन ने सभी को मार भगाया। भीम ने तो इस दिन कौरव सेना में हाहाकार मचा दी, दुर्योधन ने अपनी गज सेना भीम को मारने के लिए भेजी, परंतु घटोत्कच की सहायता से भीम ने उन सबका नाश कर दिया और 14 कौरवों को भी मार गिराया, परंतु राजा भगदत्त द्वारा जल्द ही भीम पर नियंत्रण पा लिया गया। बाद में भीष्म को भी अर्जुन और भीम ने भयंकर युद्ध कर कड़ी चुनौती दी।

कौन मजबूत रहा : इस दिन कौरवों को नुकसान उठाना पड़ा और पांडव पक्ष मजबूत रहा।
पांचवें दिन का युद्ध : श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद युद्ध की शुरुआत हुई और फिर भयंकर मार-काट मची। दोनों ही पक्षों के सैनिकों का भारी संख्या में वध हुआ। इस दिन भीष्म ने पांडव सेना को अपने बाणों से ढंक दिया। उन पर रोक लगाने के लिए क्रमशः अर्जुन और भीम ने उनसे भयंकर युद्ध किया। सात्यकि ने द्रोणाचार्य को भीषण संहार करने से रोके रखा। भीष्म द्वारा सात्यकि को युद्ध क्षेत्र से भगा दिया गया। सात्यकि के 10 पुत्र मारे गए।

कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।

छठे दिन का युद्ध : कौरवों ने क्रोंचव्यूह तथा पांडवों ने मकरव्यूह के आकार की सेना कुरुक्षे‍त्र में उतारी। भयंकर युद्ध के बाद द्रोण का सारथी मारा गया। युद्ध में बार-बार अपनी हार से दुर्योधन क्रोधित होता रहा, परंतु भीष्म उसे ढांढस बंधाते रहे। अंत में भीष्म द्वारा पांचाल सेना का भयंकर संहार किया गया।

कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।
सातवें दिन का युद्ध : सातवें दिन कौरवों द्वारा मंडलाकार व्यूह की रचना और पांडवों ने वज्र व्यूह की आकृति में सेना लगाई। मंडलाकार में एक हाथी के पास सात रथ, एक रथ की रक्षार्थ सात अश्‍वारोही, एक अश्‍वारोही की रक्षार्थ सात धनुर्धर तथा एक धनुर्धर की रक्षार्थ दस सैनिक लगाए गए थे। सेना के मध्य दुर्योधन था। वज्राकार में दसों मोर्चों पर घमासान युद्ध हुआ।

इस दिन अर्जुन अपनी युक्ति से कौरव सेना में भगदड़ मचा देता है। धृष्टद्युम्न दुर्योधन को युद्ध में हरा देता है। अर्जुन पुत्र इरावान द्वारा विन्द और अनुविन्द को हरा दिया जाता है, भगदत्त घटोत्कच को और नकुल सहदेव मिलकर शल्य को युद्ध क्षेत्र से भगा देते हैं। यह देखकर एकभार भीष्म फिर से पांडव सेना का भयंकर संहार करते हैं।

विराट पुत्र शंख के मारे जाने से इस दिन कौरव पक्ष की क्षति होती है।
कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।

आठवें दिन का युद्ध : कौरवों ने कछुआ व्यूह तो पांडवों ने तीन शिखरों वाला व्यूह रचा। पांडव पुत्र भीम धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का वध कर देते हैं। अर्जुन की दूसरी पत्नी उलूपी के पुत्र इरावान का बकासुर के पुत्र आष्ट्रयश्रंग (अम्बलुष) के द्वारा वध कर दिया जाता है।

घटोत्कच द्वारा दुर्योधन पर शक्ति का प्रयोग परंतु बंगनरेश ने दुर्योधन को हटाकर शक्ति का प्रहार स्वयं के ऊपर ले लिया तथा बंगनरेश की मृत्यु हो जाती है। इस घटना से दुर्योधन के मन में मायावी घटोत्कच के प्रति भय व्याप्त हो जाता है।

तब भीष्म की आज्ञा से भगदत्त घटोत्कच को हराकर भीम, युधिष्ठिर व अन्य पांडव सैनिकों को पीछे ढकेल देता है। दिन के अंत तक भीमसेन धृतराष्ट्र के नौ और पुत्रों का वध कर देता है।

पांडव पक्ष की क्षति : अर्जुन पुत्र इरावान का अम्बलुष द्वारा वध।
कौरव पक्ष की क्षति : धृतराष्ट्र के 17 पुत्रों का भीम द्वारा वध।
कौन मजबूत रहा : इस दोनों ही पक्ष ने डट किया और दोनों की पक्ष को नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि कौरवों को ज्यादा क्षति पहुंची।
नौवें दिन का युद्ध : कृष्ण के उपदेश के बाद भयंकर युद्ध हुआ जिसके चलते भीष्म ने बहादुरी दिखाते हुए अर्जुन को घायल कर उनके रथ को जर्जर कर दिया। युद्ध में आखिरकार भीष्म के भीषण संहार को रोकने के लिए कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ती है। उनके जर्जर रथ को देखकर श्रीकृष्ण रथ का पहिया लेकर भीष्म पर झपटते हैं, लेकिन वे शांत हो जाते हैं, परंतु इस दिन भीष्म पांडवों की सेना का अधिकांश भाग समाप्त कर देते हैं।

कौन मजबूत रहा : कौरव

दसवां दिन : भीष्म द्वारा बड़े पैमाने पर पांडवों की सेना को मार देने से घबराए पांडव पक्ष में भय फैल जाता है, तब श्रीकृष्ण के कहने पर पांडव भीष्म के सामने हाथ जोड़कर उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछते हैं। भीष्म कुछ देर सोचने पर उपाय बता देते हैं।

इसके बाद भीष्म पांचाल तथा मत्स्य सेना का भयंकर संहार कर देते हैं। फिर पांडव पक्ष युद्ध क्षे‍त्र में भीष्म के सामने शिखंडी को युद्ध करने के लिए लगा देते हैं। युद्ध क्षेत्र में शिखंडी को सामने डटा देखकर भीष्म ने अपने अस्त्र त्याग दिए। इस दौरान बड़े ही बेमन से अर्जुन ने अपने बाणों से भीष्म को छेद दिया। भीष्म बाणों की शरशय्या पर लेट गए। भीष्म ने बताया कि वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही शरीर छोड़ेंगे, क्योंकि उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त है।

पांडव पक्ष की क्षति : शतानीक
कौरव पक्ष की क्षति : भीष्म
कौन मजबूत रहा : पांडव
ग्यारहवें दिन : भीष्म के शरशय्या पर लेटने के बाद ग्यारहवें दिन के युद्ध में कर्ण के कहने पर द्रोण सेनापति बनाए जाते हैं। ग्यारहवें दिन सुशर्मा तथा अर्जुन, शल्य तथा भीम, सात्यकि तथा कर्ण और सहदेव तथा शकुनि के मध्य युद्ध हुआ। कर्ण भी इस दिन पांडव सेना का भारी संहार करता है।

दुर्योधन और शकुनि द्रोण से कहते हैं कि वे युधिष्ठिर को बंदी बना लें तो युद्ध अपने आप खत्म हो जाएगा, तो जब दिन के अंत में द्रोण युधिष्ठिर को युद्ध में हराकर उसे बंदी बनाने के लिए आगे बढ़ते ही हैं कि अर्जुन आकर अपने बाणों की वर्षा से वर्षा से उन्हें रोक देता है। नकुल, युधिष्ठिर के साथ थे व अर्जुन भी वापस युधिष्ठिर के पास आ गए। इस प्रकार कौरव युधिष्ठिर को नहीं पकड़ सके।

पांडव पक्ष की क्षति : विराट का वध
कौन मजबूत रहा : कौरव

बारहवें दिन का युद्ध : कल के युद्ध में अर्जुन के कारण युधिष्ठिर को बंदी न बना पाने के कारण शकुनि व दुर्योधन अर्जुन को युधिष्ठिर से काफी दूर भेजने के लिए त्रिगर्त देश के राजा को उससे युद्ध कर उसे वहीं युद्ध में व्यस्त बनाए रखने को कहते हैं, वे ऐसा करते भी हैं, परंतु एक बार फिर अर्जुन समय पर पहुंच जाता है और द्रोण असफल हो जाते हैं।

होता यह है कि जब त्रिगर्त, अर्जुन को दूर ले जाते हैं तब सात्यकि, युधिष्ठिर के रक्षक थे। वापस लौटने पर अर्जुन ने प्राग्ज्योतिषपुर (पूर्वोत्तर का कोई राज्य) के राजा भगदत्त को अर्धचंद्र को बाण से मार डाला। सात्यकि ने द्रोण के रथ का पहिया काटा और उसके घोड़े मार डाले। द्रोण ने अर्धचंद्र बाण द्वारा सात्यकि का सिर काट ‍लिया।

सात्यकि ने कौरवों के अनेक उच्च कोटि के योद्धाओं को मार डाला जिनमें से प्रमुख जलसंधि, त्रिगर्तों की गजसेना, सुदर्शन, म्लेच्छों की सेना, भूरिश्रवा, कर्णपुत्र प्रसन थे। युद्ध भूमि में सात्यकि को भूरिश्रवा से कड़ी टक्कर झेलनी पड़ी। हर बार सात्यकि को कृष्ण और अर्जुन ने बचाया।

पांडव पक्ष की क्षति : द्रुपद
कौरव पक्ष की क्षति : त्रिगर्त नरेश
कौन मजबूत रहा : दोनों
तेरहवें दिन : कौरवों ने चक्रव्यूह की रचना की। इस दिन दुर्योधन राजा भगदत्त को अर्जुन को व्यस्त बनाए रखने को कहते हैं। भगदत्त युद्ध में एक बार फिर से पांडव वीरों को भगाकर भीम को एक बार फिर हरा देते हैं फिर अर्जुन के साथ भयंकर युद्ध करते हैं। श्रीकृष्ण भगदत्त के वैष्णवास्त्र को अपने ऊपर ले उससे अर्जुन की रक्षा करते हैं।

अंततः अर्जुन भगदत्त की आंखों की पट्टी को तोड़ देता है जिससे उसे दिखना बंद हो जाता है और अर्जुन इस अवस्था में ही छल से उनका वध कर देता है। इसी दिन द्रोण युधिष्ठिर के लिए चक्रव्यूह रचते हैं जिसे केवल अभिमन्यु तोड़ना जानता था, परंतु निकलना नहीं जानता था। अतः अर्जुन युधिष्ठिर, भीम आदि को उसके साथ भेजता है, परंतु चक्रव्यूह के द्वार पर वे सबके सब जयद्रथ द्वारा शिव के वरदान के कारण रोक दिए जाते हैं और केवल अभिमन्यु ही प्रवेश कर पाता है।

ये लोग करते हैं अभिमन्यु का वध : कर्ण के कहने पर सातों महारथियों कर्ण, जयद्रथ, द्रोण, अश्वत्थामा, दुर्योधन, लक्ष्मण तथा शकुनि ने एकसाथ अभिमन्यु पर आक्रमण किया। लक्ष्मण ने जो गदा अभिमन्यु के सिर पर मारी वही गदा अभिमन्यु ने लक्ष्मण को फेंककर मारी। इससे दोनों की उसी समय मृत्यु हो गई।

अभिमन्यु के मारे जाने का समाचार सुनकर जयद्रथ को कल सूर्यास्त से पूर्व मारने की अर्जुन ने प्रतिज्ञा की अन्यथा अग्नि समाधि ले लेने का वचन दिया।

पांडव पक्ष की क्षति : अभिमन्यु
कौन मजबूत रहा : पांडव

चौदहवें दिन : अर्जुन की अग्नि समाधि वाली बात सुनकर कौरव पक्ष में हर्ष व्याप्त हो जाता है और फिर वे यह योजना बनाते हैं कि आज युद्ध में जयद्रथ को बचाने के लिए सब कौरव योद्धा अपनी जान की बाजी लगा देंगे। द्रोण जयद्रथ को बचाने का पूर्ण आश्वासन देते हैं और उसे सेना के पिछले भाग में छिपा देते हैं।

युद्ध शुरू होता है भूरिश्रवा, सात्यकि को मारना चाहता था तभी अर्जुन ने भूरिश्रवा के हाथ काट दिए, वह धरती पर गिर पड़ा तभी सात्यकि ने उसका सिर काट दिया। द्रोण द्रुपद और विराट को मार देते हैं।

तब कृष्ण अपनी माया से सूर्यास्त कर देते हैं। सूर्यास्त होते देख अर्जुन अग्नि समाधि की तैयारी करने लगे जाते हैं। छिपा हुआ जयद्रथ जिज्ञासावश अर्जुन को अग्नि समाधि लेते देखने के लिए बाहर आकर हंसने लगता है, उसी समय श्रीकृष्ण की कृपा से सूर्य पुन: निकल आता है और तुरंत ही अर्जुन सबको रौंदते हुए कृष्ण द्वारा किए गए क्षद्म सूर्यास्त के कारण बाहर आए जयद्रथ को मारकर उसका मस्तक उसके पिता के गोद में गिरा देते हैं।

पांडव पक्ष की क्षति : द्रुपद, विराट
कौरव पक्ष की क्षति : जयद्रथ, भगदत्त
पंद्रहवें दिन : द्रोण की संहारक शक्ति के बढ़ते जाने से पांडवों के ‍खेमे में दहशत फैल गई। पिता-पुत्र ने मिलकर महाभारत युद्ध में पांडवों की हार सुनिश्चित कर दी थी। पांडवों की हार को देखकर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से छल का सहारा लेने को कहा। इस योजना के तहत युद्ध में यह बात फैला दी गई कि ‘अश्वत्थामा मारा गया’, लेकिन युधिष्‍ठिर झूठ बोलने को तैयार नहीं थे। तब अवंतिराज के अश्‍वत्थामा नामक हाथी का भीम द्वारा वध कर दिया गया। इसके बाद युद्ध में यह बाद फैला दी गई कि ‘अश्वत्थामा मारा गया’।

जब गुरु द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से अश्वत्थामा की सत्यता जानना चाही तो उन्होंने जवाब दिया- ‘अश्वत्थामा मारा गया, परंतु हाथी।’ श्रीकृष्ण ने उसी समय शंखनाद किया जिसके शोर के चलते गुरु द्रोणाचार्य आखिरी शब्द ‘हाथी’ नहीं सुन पाए और उन्होंने समझा मेरा पुत्र मारा गया। यह सुनकर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए और युद्ध भूमि में आंखें बंद कर शोक में डूब गए। यही मौका था जबकि द्रोणाचार्य को निहत्था जानकर द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से उनका सिर काट डाला।

कौरव पक्ष की क्षति : द्रोण
कौन मजबूत रहा : पांडव

सोलहवें दिन का युद्ध : द्रोण के छल से वध किए जाने के बाद कौरवों की ओर से कर्ण को सेनापति बनाया जाता है। कर्ण पांडव सेना का भयंकर संहार करता है और वह नकुल व सहदेव को युद्ध में हरा देता है, परंतु कुंती को दिए वचन को स्मरण कर उनके प्राण नहीं लेता। फिर अर्जुन के साथ भी भयंकर संग्राम करता है।

दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने अमोघ शक्ति द्वारा घटोत्कच का वध कर दिया। यह अमोघ शक्ति कर्ण ने अर्जुन के लिए बचाकर रखी थी लेकिन घटोत्कच से घबराए दुर्योधन ने कर्ण से इस शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए कहा। यह ऐसी शक्ति थी जिसका वार कभी खाली नहीं जा सकता था। कर्ण ने इसे अर्जुन का वध करने के लिए बचाकर रखी थी।

इस बीच भीम का युद्ध दुःशासन के साथ होता है और वह दु:शासन का वध कर उसकी छाती का रक्त पीता है और अंत में सूर्यास्त हो जाता है।

कौरव पक्ष की क्षति : दुःशासन
कौन मजबूत रहा : दोनों
सत्रहवें दिन : शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया। इस दिन कर्ण भीम और युधिष्ठिर को हराकर कुंती को दिए वचन को स्मरण कर उनके प्राण नहीं लेता। बाद में वह अर्जुन से युद्ध करने लग जाता है। कर्ण तथा अर्जुन के मध्य भयंकर युद्ध होता है। कर्ण के रथ का पहिया धंसने पर श्रीकृष्ण के इशारे पर अर्जुन द्वारा असहाय अवस्था में कर्ण का वध कर दिया जाता है।

इसके बाद कौरव अपना उत्साह हार बैठते हैं। उनका मनोबल टूट जाता है। फिर शल्य प्रधान सेनापति बनाए गए, परंतु उनको भी युधिष्ठिर दिन के अंत में मार देते हैं।

कौरव पक्ष की क्षति : कर्ण, शल्य और दुर्योधन के 22 भाई मारे जाते हैं।
कौन मजबूत रहा : पांडव
अठारहवें दिन का युद्ध : अठारहवें दिन कौरवों के तीन योद्धा शेष बचे- अश्‍वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। इसी दिन अश्वथामा द्वारा पांडवों के वध की प्रतिज्ञा ली गई। सेनापति अश्‍वत्थामा तथा कृपाचार्य के कृतवर्मा द्वारा रात्रि में पांडव शिविर पर हमला किया गया। अश्‍वत्थामा ने सभी पांचालों, द्रौपदी के पांचों पुत्रों, धृष्टद्युम्न तथा शिखंडी आदि का वध किया।

पिता को छलपूर्वक मारे जाने का जानकर अश्वत्थामा दुखी होकर क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया जिससे युद्ध भूमि श्मशान भूमि में बदल गई। यह देख कृष्ण ने उन्हें कलियुग के अंत तक कोढ़ी के रूप में जीवित रहने का शाप दे डाला।

इस दिन भीम दुर्योधन के बचे हुए भाइयों को मार देता है, सहदेव शकुनि को मार देता है और अपनी पराजय हुई जान दुर्योधन भागकर सरोवर के स्तंभ में जा छुपता है। इसी दौरान बलराम तीर्थयात्रा से वापस आ गए और दुर्योधन को निर्भय रहने का आशीर्वाद दिया।

छिपे हुए दुर्योधन को पांडवों द्वारा ललकारे जाने पर वह भीम से गदा युद्ध करता है और छल से जंघा पर प्रहार किए जाने से उसकी मृत्यु हो जाती है। इस तरह पांडव विजयी होते हैं।

पांडव पक्ष की क्षति : द्रौपदी के पांच पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखंडी
कौरव पक्ष की क्षति : दुर्योधन
कुछ यादव युद्ध में और बाद में गांधारी के शाप के चलते आपसी युद्ध में मारे गए। पांडव पक्ष के विराट और विराट के पुत्र उत्तर, शंख और श्वेत, सात्यकि के दस पुत्र, अर्जुन पुत्र इरावान, द्रुपद, द्रौपदी के पांच पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखंडी, कौरव पक्ष के कलिंगराज भानुमान, केतुमान, अन्य कलिंग वीर, प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव वीर।

कौरवों की ओर से धृतराष्ट्र के दुर्योधन सहित सभी पुत्र, भीष्म, त्रिगर्त नरेश, जयद्रथ, भगदत्त, द्रौण, दुःशासन, कर्ण, शल्य आदि सभी युद्ध में मारे गए थे।

युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध की समाप्ति पर बचे हुए मृत सैनिकों का (चाहे वे शत्रु वर्ग के हों अथवा मित्र वर्ग के) दाह-संस्कार एवं तर्पण किया था। इस युद्ध के बाद युधिष्ठिर को राज्य, धन, वैभव से वैराग्य हो गया।

कहते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद अर्जुन अपने भाइयों के साथ हिमालय चले गए और वहीं उनका देहांत हुआ।

बच गए योद्धा : महाभारत के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे जिनके नाम हैं- कौरव के : कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा, जबकि पांडवों की ओर से युयुत्सु, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, कृष्ण, सात्यकि आदि।

संदर्भ : महाभारत
🚩🚩🚩🚩🚩

✍️आर्यावर्तकाअघोर_अतीत

Posted in महाभारत - Mahabharat

મહાભારતના અંત માં ફક્ત 13 લોકો બચ્યા હતા : મહાયુદ્ધ


મહાભારતના અંત માં ફક્ત 13 લોકો બચ્યા હતા : મહાયુદ્ધ

અત્યંત સંક્ષિપ્ત માં વર્ણન :-

ધર્મ ક્ષેત્ર કુરૂક્ષેત્ર (પ્રવર્તમાન હરિયાણામાં) લડાયેલા મહાભારતના મહા ભિષણ યુદ્ધ ના અંતમાં મહાપરાક્રમી, મહાશક્તિશાળી, મહાબળશાળી અને અમિત તેજસ્વી, ઓજસ્વી એવા ૧૩ ધુરંધર મહારથી યોધ્ધાઓ જીવિત રહ્યા હતા જેમને ૧૮ દિવસ સુધી મૃત્યુ પણ સ્પર્શ કરી શક્યું ન હતું.

  1. ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ
  2. દ્વારિકા ના ચતુરંગીની સૈન્ય (નારાયણી સેના)ના મહાનાયક આને સેનાધ્યક્ષ મહાવિર સાત્યિકિ
  3. ધર્યમરાજ યુધિષ્ઠિર
  4. ગદાધર ભીમ
  5. ધનુર્ધર અર્જુન
  6. ત્રિકાળજ્ઞાની સહદેવ
  7. બુદ્ધિમાન નકુલ
  8. યુયુત્સુ
  9. મહામહિમ્ન ભિષ્મપિતામહ
  10. કુલગુરુ કૃપાચાર્ય
  11. ક્રુતાવર્મા
  12. દ્રોણપુત્ર અશ્વત્થામા
  13. કર્ણપુત્ર વૃષકેતુ

વિગતવાર જવાબ : –

ધર્મ ક્ષેત્ર કુરૂક્ષેત્ર માં સત્ય, ધર્મ, નીતિ, ન્યાય ની સુરક્ષા માટે લડાયેલા મહાભારતના મહાયુદ્ધની શરૂઆત ઈડા વત્સર (ચંદ્ર પંચાંગ) અનુસાર દ્વિતિય મહિનો એટલે કે પવિત્ર મૃગશીર્ષ (માગશર) મહિના ના શુક્લ (સુદ) પક્ષ (અજવાળીયુ) ના એકાદશી (અગિયારમાં દિવસે) થઈ હતી. તેથી આ જ તિથિ ને શ્રીમદ ભાગવત ગીતા જયંતિ પણ ગણાય છે.

વામપંથી (લેફ્ટી), કોમ્યુનિષ્ટ, કોંગ્રેસી ઈતિહાસ કારો ભારતવર્ષના ઇતિહાસમાં બનેલી કોઈ પણ ઘટના ને માત્ર ૨૪૦૦ થી ૨૫૦૦ વર્ષ જુની જ દર્શાવે છે. પૂર્ણ પુરુષોત્તમ શ્રી કૃષ્ણચંદ્ર તેમજ શ્રીમદ ભાગવત ગીતાજી ને પણ માત્ર ૨૪૦૦ વર્ષ જુના દર્શાવે છે.

તદ્ ઉપરાંત ભારતીય સંસ્કૃતિ ના સર્વ પ્રાચિન ગ્રંથ વેદો નો રચનાકાળ માત્ર ઈ.સ.પુર્વ ૧૦૦૦ દર્શાવીને ભારતવર્ષમાં માનવ સંસ્કૃતિ, સભ્યતા વધુ માં વધુ ૩૫૦૦ વર્ષથી વધુ જૂની ન હોય તેવું સાબિત કરવા એડીચોટીનું જોર લગાવે છે. મર્યાદા પુરુષોત્તમ શ્રી રામચંદ્ર તેમજ શ્રીમદ વાલ્મિકી રામાયણને પણ માત્ર ૨૫૦૦ વર્ષ જુના દર્શાવે છે.

ધર્મક્ષેત્ર કુરુક્ષેત્રમાં મહાભારત ના મહાયુદ્ધ ની તિથિ:-

(૧). સંસ્કૃત તિથિ :- મૃગશીર્ષ શુક્લ એકાદશી, સૂર્યવાર

(૨). ગુજરાતી તિથિ :- માગશર સુદ અગિયારસ, રવિવાર

(૩). યુગાબ્દ સંવત :- ૮,૬૩,૯૬૩ એટલે કે,

દ્વાપર યુગ ના અંત થી માત્ર ૩૭ વર્ષ પુર્વ
કલિ યુગ ના આરંભ થી માત્ર ૩૭ વર્ષ પુર્વ
નોંધ :- કલિયુગ નો આરંભ અક્ષય તૃતીયા (અખા ત્રીજ) ની તિથિએ યુધ્ધિષ્ઠીર રાજ્યાભિષેક સંવત ૩૭ માં થયો હતો. (આંતરરાષ્ટ્રીય કેલેન્ડર પ્રમાણે ઈ.સ. પુર્વ ૩૧૦૨)

આંતરરાષ્ટ્રીય કેલેન્ડર પ્રમાણે :- ઈ.સ.પુર્વ ૩,૧૩૮ ( ઈ.સ.૨૦૨૦ થી ૫,૧૫૮ વર્ષ પહેલાં). જે પદભ્રષ્ટ અને રાષ્ટ્રદ્રોહી ઈતિહાસ કારો દ્વારા દર્શાવવામાં આવેલા સમય કરતાં ૨૭૦૦ વર્ષ વધારે જુનો છે.

પુર્ણ પુરૂષોત્તમ ભગવાન શ્રીકૃષ્ણએ તે દિવસે શ્રીમદ્ ભાગવત ગીતા નું પરમ પવિત્ર દિવ્ય જ્ઞાન અર્જુનને આપ્યું હતું તેથી આ દિવસ “શ્રીમદ્ ભાગવત ગીતા” જયંતિ પણ છે.

આ પહેલાં આ જ્ઞાન બ્રહ્માંડ ની રચના કર્યા પછી ભગવાન મહાવિષ્ણુએ સૂર્ય નારાયણ ને આપ્યું હતું, સૂર્ય દેવે પોતાના પુત્ર વૈવસ્વત મનુ, તેમજ વૈવસ્વત મનુ એ પોતાના જ્યેષ્ઠ પુત્ર ઇક્ષ્વાકુ ને તેમજ સપ્તર્ષિ ગણ, સનત કુમારો, દેવર્ષિ નારદ, પ્રજાપતિ દક્ષ ઉપરાંત પ્રજાપતિ ક્રતુ, પ્રજાપતિ કર્દમ ને આ જ્ઞાન આપ્યું. જે પરથી મનુસ્મૃતિની રચના થઈ. પરંતુ તેમા સમયાંતરે અમુક રુષિ, મુની, મહર્ષિ, રાજર્ષિ, બ્રમ્હર્ષિ, દેવર્ષિ ઓ એ વિસ્તૃત સમજુતી મળે તે હેતુથી શ્લોક ઉમેર્યા. મહાભારત સમય પછી તેમાં કોઈ ઉમેરો થયો નહિ. (આ સૂર્ય વંશ (ઇક્ષ્વાકુવંશી/રઘુવંશી) વંશમાં ૧૫૦ રાજાઓ થયા હતા, મર્યાદા પુરુષોત્તમ શ્રીરામ ૮૪ માં રાજા હતાં.)

મહાભારત યુદ્ધના સમયે આ દિવ્યજ્ઞાન પૃથ્વી ઉપર કુલ પાંચ વ્યક્તિઓને પ્રત્યક્ષ રીતે મળ્યુ.

  1. અર્જુન
  2. હનુમાનજી
  3. ઘટોત્કચ પુત્ર બર્બરીક (ભીમ અને હિડિંબા નો પૌત્ર)
  4. બ્રહ્મર્ષિ શ્રી કૃષ્ણ દ્વેપાયન વેદ વ્યાસ (મહાભારત ગ્રંથના રચનાકાર)
  5. સંજય (ધ્રુતરાષ્ટ્રના સારથિ)

કુલ ૧૪ લોક (૧૪ બ્રહ્માંડ) માં પૃથ્વી સિવાયના બાકી રહેલા ૧૩ લોક (૧૩ બ્રહ્માંડ) માં રહેતા દેવી-દેવતાઓ ને આ જ્ઞાન પ્રત્યક્ષ મળ્યું.

સ્વર્ગલોક માં રહેતા ૩૩ દેવતાઓ કે જેમકે
૧૨ આદિત્ય,
૧૧ રુદ્ર,
૦૮ વસુ,
૦૨ અશ્વિનીકુમાર (નરિષ્યત અને અશ્વિન)

ગંધર્વ રાજા ચિત્રરથ, ઉચ્ચ કોટિના ગંધર્વો જેમકે મલયકેતુ, તેમજ પ્રેમ-પ્રણય ના દેવતા કામદેવ અને પ્રેમ-પ્રણય ની દેવી રતિ.
યક્ષ રાજ કુબેર, તેમના બંને પુત્ર નલ અને મણિગ્રિવ, તેમજ નલની પત્ની દમયંતી (કે જે સ્ત્રી ને સત્ય યુગના મધ્ય માં રાવણે બળ પુર્વક અપહરણ કરીને તેમની પવિત્રતા ભંગ કરી હતી તે સ્ત્રી, તેના બદલામાં રાવણને અભિશાપ મળ્યો હતો જેના ફળસ્વરૂપે ત્રેતાયુગના અંતમાં સીતાજી નિમિત્તે શ્રીરામચંદ્ર દ્વારા રાવણનો કુળસહિત વિનાશ થયો હતો.)
નાગ રાજ વાસુકિ સહિત મુખ્ય ૭ નાગ જેમકે તક્ષક, શેષ, કાલિ, અનંત, પદ્મનાભ, કરકોટક.
સપ્તર્ષિ (સાત રૂષિઓનો ગણ)

૦૪ સનત કુમારો (સત, સનાતન, સનંદન, સનત)
દેવર્ષિ નારદ
પ્રજાપતિ દક્ષ
મનુ
નવ ગ્રહ દેવતાઓ
ધ્રુવ (વિષ્ણુ ભક્ત)
સર્વોચ્ચ દેવી-દેવતાઓ જેમકે શિવ-પાર્વતી, વિષ્ણુ-લક્ષ્મી, બ્રહ્મા-સરસ્વતી.
મધ્ય અને દક્ષિણ એશિયામાં વર્તમાન સમય નાં કુલ ૧૪ દેશોના સૈન્ય તે સમયે મહાભારતના મહાયુદ્ધ માં સંમિલિત હતાં (ભારત, પાકિસ્તાન, અફઘાનિસ્તાન, કઝાકિસ્તાન, ઉઝબેકિસ્તાન, ઈરાન, ઈરાક, સિરિયા, નેપાળ, તિબેટ, ભુટાન, બાંગ્લાદેશ, મ્યાનમાર, શ્રીલંકા).

કુલ ૧૮ ઔક્ષોહિણી નું સમુદ્ર સમાન વિશાળ સૈન્ય કે જેમાં ૩૯,૩૬,૬૦૦ (એટલે કે ૩૯ લાખ, ૩૬ હજાર, ૬૦૦) સૈનિકો હતાં જે પૈકી મોટા ભાગના સૈનિકો યુદ્ધમાં મૃત્યુ પામ્યા હતા.

પગી, રથી, અર્ધરથિ, અતિરથી, મહારથી, અતિ મહારથી, મહા મહારથી એમ સર્વ પ્રકારના વીર ક્ષત્રિય યોધ્ધાઓ ધર્મ ક્ષેત્ર કુલ ક્ષેત્રમાં આ મહાભિષણ ધર્મયુદ્ધ માં સંમિલિત હતાં જે માત્ર ૧૮ દિવસ ચાલેલા રણસંગ્રામમાં કાળ નો ગ્રાસ બન્યા હતા.

પાંડવો બાજુ બચેલા યોદ્ધા (યુદ્ધ સમયે તેમની ઉમર) : –
૧. વાસુદેવ શ્રી કૃષ્ણ (વય ૮૯ વર્ષ, ૪ મહિના)

૨. સાત્યિકિ

૩. ધર્મરાજા યુધિષ્ઠિર (વય ૯૧ વર્ષ)

૪. ગદાધર ભીમસેન (વય ૯૦ વર્ષ)

૫. ધનુર્ધર અર્જુન (વય ૮૮ વર્ષ, ૯ મહિના = ૮૯ વર્ષ)

૬. ત્રિકાળજ્ઞાની સહદેવ (વય ૮૮ વર્ષ)

૭. બુદ્ધિશાળી નકુલ (વય ૮૮ વર્ષ)

૮. યુયુત્સુ (વય ૯૦ વર્ષ)

યુયુત્સુ : –
યુયુત્સુ મહારાજા ધુતરાષ્ટ્રની બીજી પત્ની સુગંધા દ્વારા જન્મેલો પુત્ર હતો પરંતુ તે પાંડવો તરફથી મહાભારત નું યુદ્ધ લડ્યો હતો.

એકવાર યુયુત્સુએ પાંચ પાંડવોને દુર્યોધન દ્વારા બળવાન ભીમસેનને ભોજનમાં વિષ(ઝેર) આપીને ગંગા નદીના પાણીમાં ડુબાડવાના ષડયંત્ર વિશે માહિતી આપીને ભીમનો જીવ બચાવ્યો હતો.

યુયુત્સુનો જન્મ દુર્યોધન ના જન્મ ના દિવસે જ પરંતુ દુર્યોધન ના જન્મના અમુક ક્ષણ પછી થયો હતો.

તે દુર્યોધનથી માત્ર અમુક ક્ષણ નાનો હતો પરંતુ બાકીના ૧૦૦ કૌરવ ભાઈઓ અને દુશીલા નામની બહેનથી મોટો હતો.

ગાંધારી દ્વારા ધ્રુતરાષ્ટ્ર ને ૧૦૦ પુત્ર અને ૧ પુત્રીની પ્રાપ્તિ થઈ હતી. જેમાં દરેક પુત્ર તેની પહેલા જન્મેલા પુત્ર કરતા ૧ દિવસ નાનો હતો. એટલે કે સતત ૧૦૧ દિવસ સુધી ક્રમિક રીતે ૧-૧ સંતાન નો જન્મ થતો હતો.

નોંધ :- ભગવાન શ્રી મહાવિષ્ણુના જ્ઞાનાવતાર શ્રી કૃષ્ણ દ્વૈપાયન વેદ વ્યાસ ની વૈજ્ઞાનિક પધ્ધતિ દ્વારા આ ૧૦૧ કૌરવોનો જન્મ થયો. જેથી તેને મૈથુન કે પ્રજનન સાથે જોડવા પ્રયત્ન ન કરવો.

કૌરવ બાજુ બચેલા યોદ્ધા (યુદ્ધ સમયે તેમની ઉમર) : –
પિતામહ ભીષ્મ (વય ૧૯૧ વર્ષ)
કુલગુરુ કૃપાચાર્ય (વય ૧૭૫ વર્ષ)
ક્રુતવર્મા
અશ્વત્થામા
વૃષકેતુ (વય ૫૬ વર્ષ, કર્ણનો સૌથી નાનો પુત્ર)
વષકેતુ : –
વૃષકેતુ કર્ણનો સૌથી નાનો પુત્ર હતો.

કર્ણને તેની બે પત્નીઓ વૃષાલી અને સુપ્રિયા દ્વારા દસ પુત્રો થયા હતા.

કર્ણના નવ પુત્રોએ મહાભારત યુદ્ધમાં ભાગ લીધો હતો.

કર્ણએ ૩૨ વર્ષની ઉંમરે ઈ.સ.પુર્વ ૩,૨૧૩ માં વૃષાલી સાથે લગ્ન કર્યા.

કલિન્ગ રાજ્યની (ઓરિસ્સાની) રાજકુમારી ભાનુમતી સાથે દુર્યોધનના લગ્ન થયા ત્યારે કર્ણે સુપ્રિયા આને વૃષાલી સાથે લગ્ન કર્યાં.

કર્ણના દસમાંથી નવ પુત્રો ઈ.સ.પુર્વ ૩,૧૩૮ માં મહાભારત ના યુદ્ધમાં ભાગ લીધો હતો.

કર્ણ ઈ.સ.પુર્વ ૩,૨૧૩ માં ૩૨ વર્ષની ઉંમરે ધનુર્વિદ્યા શીખવા માટે ભગવાન મહાવિષ્ણુના સાતમા અવતાર ગુરુશ્રેષ્ઠ પરમશુરામ પાસે ગયો કે જે ભૂતકાળમાં ભિષ્મ અને દ્રોણ જેવા મહાન યોદ્ધાઓના પણ ગુરુ હતાં.

કર્ણ ૮ વર્ષ સુધી ધનુર્વિદ્યા શીખ્યા પછી (ઈ.સ.પુર્વ ૩૨૧૩ – ૩૨૦૫) માં ૪૦ વર્ષની ઉંમરે પાછો ફર્યો.

કર્ણનો સૌથી મોટો પુત્ર સુદામાનો જન્મ ત્યારે થયો જ્યારે કર્ણની વય ૪૧ વર્ષની (ઈ.સ.પુર્વ ૩૨૦૪) હતી.

કર્ણનો સૌથી નાનો પુત્ર વૃષકેતુનો જન્મ જ્યારે કર્ણ ૫૧ વર્ષનો હતો (ઈ.સ.પુર્વ ૩૧૯૪) ત્યારે થયો હતો.

કર્ણના દસ પુત્રો: –

  1. સુદામા,
  2. ચિત્રસેન,
  3. સત્યસેન,
  4. સુશેન,
  5. વૃષશેન,
  6. શત્રુંજય,
  7. દ્વિપાત,
  8. બાણસેન,
  9. પ્રસેન,
  10. વૃષકેતુ (મહાભારત યુદ્ધ પછી એક માત્ર કર્ણનો બચેલો પુત્ર).

અર્જુન દ્વારા યુદ્ધ માં વધ કરાયેલા કર્ણ ના પુત્ર: –

દ્રૌપદી સ્વયંવર (ઈ.સ.પુર્વ ૩૧૯૫) દરમિયાન :- સુદામા (ઉંમર ૦૯ વર્ષ
ધર્મક્ષેત્ર કુરુક્ષેત્રમાં મહાભારતના યુધ્ધ (ઈ.સ.પુર્વ ૩૧૩૯) દરમિયાન : –

  1. વૃષસેન
  2. શત્રુંજય
  3. દ્વિપાત
    નકુલ દ્વારા યુદ્ધ માં વધ કરાયેલા કર્ણ ના પુત્ર : –
  4. ચિત્રસેન
  5. સત્યસેન
  6. સુશેન
    ભીમ દ્વારા યુદ્ધ માં વધ કરાયેલા કર્ણ ના પુત્ર : –
  7. બાણસેન
    સત્યિકીએ દ્વારા યુદ્ધ માં વધ કરાયેલા કર્ણ ના પુત્ર : –
  8. પ્રસેન
    વૃષકેતુ નું મૃત્યુ : –

મહાભારત યુદ્ધ પછી કર્ણના પુત્રોમાં એક માત્ર વૃષકેતુ જ બચી ગયો હતો. મહાભારત ના યુદ્ધ પુર્ણ થયાનાં ૧૬ વર્ષ પશ્વાત ૧૭‌મા વર્ષે વૃષકેતુને અશ્વમેધ યજ્ઞમાં અર્જુનને તેના પોતાના જ માત્ર ૧૬ વર્ષ ના પુત્ર બબ્રૂવાહને યુદ્ધ માં હરાવ્યો હતો અને તેનો વધ કર્યો હતો.

બબ્રૂવાહન તેમજ પરિક્ષિત (અભિમન્યુ નો પુત્ર) સમાન વયના હતા.

(ચિત્ર :- ચક્રવર્તી સમ્રાટ પરિક્ષિત, આયુષ્ય :- ૯૬ વર્ષ)

પરિક્ષિત નો જન્મ મહાભારતના મહાયુદ્ધ ના પરીપુર્ણ થયાના બીજા જ દિવસે થયો હતો.
બબ્રૂવાહન નો જન્મ મહાભારતના યુધ્ધ પુર્ણ થયાનાં ૧ વર્ષ અને ૧૦ દિવસ પછી થયો હતો.
બબ્રૂવાહન અર્જુન અને મણિપુર રાજ્યની રાજકુમારી ચિત્રાંગદાનો પુત્ર હતો તેમજ પિતામહ ભીષ્મનો બીજો જન્મ હતો.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મનું મૃત્યુ : –
“ધનુર્માસ” પૂર્ણ થયા પછી પિતામહ મહામહિમ્ન ભીષ્મ એ પોતાની સ્વેચ્છાએ દેહત્યાગ કર્યો.

ધનુર્માસ એ છે કે જેમાં સૂર્ય દેવ “ધન” રાશિ માં થી “મકર” રાશિ માં પ્રવેશ કરે છે. (જાન્યુઆરી મહિનાનો મધ્ય ભાગ)

પિતામહ મહામહિમ્ન ભીષ્મે આ “ધનુર્માસ” ના અંતમાં પોતાનો નશ્વર દેહ છોડી દીધો.

તેથી, ૧૮ દિવસ સુધી ચાલેલા મહાભારત યુદ્ધના અંત પછી ઓછામાં ઓછું એક અઠવાડિયા અને વધુ માં વધુ એક મહિના સુધી ની પિતામહ ભીષ્મ જીવિત હતા.

નોંધ :-

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ મહાભારતના મહાયુદ્ધ માં સૌથી વૃદ્ધ અને સૌથી શક્તિશાળી મહાયોધ્ધા હતા.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ મહાભારતના મહાયુદ્ધ માં શરુઆત ના ૧૦ દિવસ સુધી કૌરવ સેનાના સેનાધ્યક્ષ રહ્યા.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મે મહાભારતના મહાયુદ્ધ માં પ્રત્યેક દિવસે ૧૦,૦૦૦ પાંડવ સૈનિકોનો વધ કર્યો હતો.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ મહાભારતના મહાયુદ્ધ માં એક માત્ર એવા યોધ્ધા હતાં કે જેમને મોક્ષ પ્રાપ્ત થયો હતો.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ વાસ્તવમાં “ધ્યા” નામના વસુ નો અવતાર હતા.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ, હસ્તિનાપુર ના મહારાજા શાંતનુ અને ગંગાનું આઠમું સંતાન હતા જેમનો જન્મ શાંતનુ અને ગંગાના ના લગ્ન ના ૧૬મા વર્ષે થયો હતો.

હસ્તીનાપુર માં ૧૨ વર્ષ સુધી રાજ્ય કર્યા પછી મહારાજા શાંતનુ ના ગંધર્વ લગ્ન (પ્રેમ લગ્ન) દેવી ગંગા સાથે થયા હતા.
મહારાજા શાંતનુ ૨૫ વર્ષ ની વયે હસ્તિનાપુર ના મહારાજા બન્યા હતા.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ ના જ્ન્મ સમયે હસ્તિનાપુર ના મહારાજા શાન્તનુ ની વય ૫૩ વર્ષ હતી.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ ૧૬ વર્ષના હતા ત્યારે હસ્તિનાપુરના મહારાજા શાન્તનુને બે નવજાત શિશુ મળ્યા જે આગળ જતાં કુરુવંશના કુલગુરુ કૃપાચાર્ય અને તેમની બહેન કૃપી (દ્રોણાચાર્ય ના પત્ની) થયાં.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મએ જ્યારે આજીવન અવિવાહિત આને વંશવિહિન રહેવાની પ્રતિજ્ઞા કરી હતી ત્યારે તેમની ઉંમર ૩૬ વર્ષ હતી (તેમના પિતા હસ્તિનાપુરના મહારાજા શાન્તનુ તે સમયે ૮૯ વર્ષ ના હતા).

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ, મત્સ્ય કન્યા સત્યવતી (હસ્તિનાપુરના મહારાજા શાન્તનુના દ્વિતીય પત્ની) કરતાં ૨૦ ઉમર માં વર્ષ મોટા હતા તે છતાં પણ પોતાના કરતાં ૨૦ વર્ષ નાની સ્ત્રી ને પોતાની માતા સમાન આદર, માન-સન્માન આપ્યું. (હસ્તિનાપુરના મહારાજા શાન્તનુ પોતાની દ્વિતીય પત્ની મત્સ્ય કન્યા સત્યવતી કરતાં આયુમાં ૭૩ વર્ષ મોટા હતા).

પોતાના જીવનમાંથી દેવી ગંગાના ચાલ્યા ગયાના ૨૦ વર્ષ બાદ ગયા બાદ હસ્તિનાપુરના મહારાજા શાન્તનુને મત્સ્યકન્યા સત્યવતી સાથે પ્રેમ થયો હતો.(હસ્તિનાપુરના મહારાજા શાન્તનુ તે સમયે ૮૯ વર્ષના હતા).

મહારાજા શાંતનુ અને તેમના દ્વિતીય પત્ની મત્સ્યકન્યા સત્યવતીના લગ્નના ૧૦ વર્ષ પછી બે સંતાન થયાં હતા : – ચિત્રાંગદ અને વિચિત્રવિર્ય

હસ્તિનાપુરના મહારાજા શાન્તનુ ૧૧૪ વર્ષનું લાંબુ આયુષ્ય જીવીને વૃધ્ધ અવસ્થામાં મૃત્યુ પામ્યા ત્યારે ચિત્રાંગદ અને વિચિત્રવિર્ય શિશુઅવસ્થામા (બાલ્યાવસ્થામાં) હતાં એટલે કે ચિત્રાંગદ અને વિચિત્રવિર્ય ૧૬ વર્ષ ના થયા ન હતાં.

યુવાન અવસ્થામાં ચિત્રાંગદનું તેના જ નામના ગંધર્વ સાથે યુદ્ધ માં મૃત્યુ થયું તેથી વિચિત્રવિર્યને રાજા બનાવવામાં આવ્યા. ૯ વર્ષ રાજ્ય કર્યા પશ્વાત વિચિત્રવિર્ય નો વિવાહ કાશી રાજ્ય ની ત્રણ રાજકુમારીઓ અંબા, અંબિકા અને અંબાલિકા પૈકી અંબિકા અને અંબાલિકા સાથે થયો કારણકે અંબા ને શાલ્વ રાજ્ય ના રાજકુમાર સાથે પ્રેમ હતો. આ ઘટના ના ૧૨૦ વર્ષ પછી આ અંબા જ શિખંડી સ્વરૂપે ધર્મક્ષેત્ર કુરુક્ષેત્રમાં મહાભારતના મહાયુદ્ધ માં પિતામહ ભીષ્મ પિતામહ ના મૃત્યુ ના કારણ બની.
માત્ર ૧ વર્ષ નું સંતાનવિનાનુ વૈવાહિક જીવન જીવ્યા બાદ ૨૬ વર્ષ ની નાની વયે રાજા વિચિત્રવિર્યનું મૃત્યુ ક્ષય (ટી.બી) ના રોગથી થયું હતું.

ભગવાન મહા વિષ્ણુ ના જ્ઞાન આવતાર બ્રમ્હર્ષિ શ્રી કૃષ્ણ દ્વૈપાયન વેદ વ્યાસે પોતાની યૌગિક ઊર્જા દ્વારા અંબિકા, અંબાલિકા આને શુદ્રી (દાસી) ને એક-એક પુત્ર ના માતા બનાવ્યા જે અનુક્રમે ધુતરાષ્ટ્ર, પાંડુ, વિદુર ના નામ થી પ્રસિદ્ધ થયા.
મહારાજા શુરસેન અને મહારાજા કુંતીભોજ બાળપણમાં મહર્ષિ ભારદ્વાજના શિષ્ય હતા. મહારાજા શુરસેને મહારાજા કુંતીભોજ ને વચન આપ્યું હતું કે, મહારાજા શુરસેન તેમનું પ્રથમ સંતાન મહારાજા કુંતીભોજને આપી દેશે. મહારાજા કુંતીભોજને કોઈ સંતાન નહોતું. મહારાજા શુરસેને પહેલું સંતાન કન્યા હતી જેનું નામ પૃથા હતું. તેની વય ૧૨ વર્ષ ની થઇ એટલે મહારાજા શુરસેને પોતાની વહાલસોયી દીકરી પૃથા પોતાના પરમ મિત્ર મહારાજા કુંતીભોજને આપી. મહારાજા કુંતીભોજે પોતાના નામ ઉપરથી પોતાની દિકરી ને “કુંતી” નામ આપ્યું.
દાનેશ્વરી કર્ણ ના જન્મ સમયે માતા પૃથા (માતા કુંતા) ૧૩ વર્ષના હતા.

માતા કુંતી ૨૨ વર્ષના થયા ત્યારે મહારાજા કુંતીભોજે તેમની દિકરીના સ્વયંવરનુ આયોજન કર્યું જેમાં ભારત વર્ષ ના તમામ રાજા, મહારાજા ને આમંત્રણ આપવામાં આવ્યું, જેમાં માતા કુંતીએ દશ દિગવંત વિજયી મહારાજા પાંડુની પસંદગી કરી.
પાંડુએ પોતાના સંબંધિઓ સિવાયના સમગ્ર પૃથ્વી પરના રાજાઓ ને યુદ્ધ માં હરાવ્યા હતા અને ચક્રવર્તી સમ્રાટ બન્યા. માતા કુંતીના લગ્ન ના ૭ વર્ષ ના લગ્ન પશ્વાત ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિરનો જન્મ થયો. ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિરના જન્મ સમયે માતા પૃથા (માતા કુંતા) ૨૯ વર્ષના હતા.

ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિરના જન્મ ના ૧ વર્ષ અને ૧૯ દિવસ પશ્વાત ગદાધર ભિમસેન નો જન્મ થયો. તેના બીજા જ દિવસે દુર્યોધન અને યુયુત્સુ નો જન્મ થયો. તે જ વર્ષે શ્રાવણ વદ આઠમ ની તિથિએ રોહિણી નક્ષત્ર માં બુધવાર ની મધ્ય રાત્રિએ ભગવાન શ્રી કૃષ્ણનો જન્મ થયો તેની પછી ના વર્ષના ફાલ્ગુન (ફાગણ) મહિનાની પુર્ણિમા (પુનમ)ના દિવસે સર્વશ્રેષ્ઠ ધનુર્ધર અર્જુન નો જન્મ થયો. શ્રી કૃષ્ણ, અર્જુન કરતા ૬ મહિના મોટા હતા. અર્જુનના જન્મના બીજા વર્ષે સહદેવ અને નકુલનો જન્મ થયો હતો.

પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ ની ઊંમર ૧૦૦ વર્ષ હતી ત્યારે ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિર નો જન્મ થયો હતો.
મહારાજા પાંડુ ના મૃત્યુ સમયે ધર્મરાજા યુધિષ્ઠિર ની વય ૧૬ વર્ષ હતી. પાંડુ રાજાના મૃત્યુ પશ્વાત માતા પૃથા (માતા કુંતા) તેમના પાંચેય પુત્રોને લઈને હસ્તીનાપુર આવ્યાં અને ત્યાર પછીના ૧૩ વર્ષ ગુરુ દ્રોણાચાર્ય ના આશ્રમમાં વિદ્યાભ્યાસ કરતા રહ્યા.
ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિર ૨૯ વર્ષે હસ્તિનાપુર ના યુવરાજ બન્યા, જેના થોડા દિવસ પશ્વાત વાર્ણવતમાં લાક્ષગૃહ દુર્ઘટના થઈ. તેના થોડા મહિના પછી ભિમના લગ્ન હિડિમ્બા સાથે થયા જેનાથી ઘટોત્કચ નામનો પુત્ર અને બર્બરીક (બળિયા દેવ) નામનો પૌત્ર થયો.
વાર્ણવતમાં લાક્ષગૃહ દુર્ઘટના ના ૫ વર્ષ પશ્વાત દ્રૌપદી સ્વયંવર થયો તે સમયે ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિર ૩૪ વર્ષના હતા.
હસ્તિનાપુર નું વિભાજન થયું. ઈન્દ્રપ્રસ્થના રાજા બન્યા ત્યારે ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિર ૪૦ વર્ષ ના હતા. મહારાજા યુધિષ્ઠિર ૩૬ વર્ષ સુધી ઈન્દ્રપ્રસ્થ ના રાજા રહ્યા હતા. આમ, જ્યારે ધ્યુત સભામાં કપટ અને દ્રૌપદી વસ્ત્રાહરણ થયું હતું ત્યારે મહારાજા યુધિષ્ઠિર ૭૬-૭૭ વર્ષ ના હતા. આ જ વયે પાંચ પાંડવોને તેમની પટરાણી યાજ્ઞસૈની દ્રૌપદી સહિત ૧૨ વર્ષનો વનવાસ અને ૧ વર્ષનો અજ્ઞાતવાસ થયો. લગભગ સવા વર્ષ સુધી પાંચ પાંડવો અને દ્રૌપદી વિરાટ રાજ્ય માં રહ્યાં.

અજ્ઞાતવાસ દરમિયાન પાંચ પાંડવો અને દ્રૌપદી ના નામ:-
ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિર = વિરાટ રાજ્યના મહામંત્રી (કંક)
ભિમસેન = રસોઈયો (બલ્લવ મહારાજ)
ગાંડીવધારી અર્જુન = રાજકુમારી ઉત્તરાના સંગીત (ગાન, વાદન અને નૃત્ય) શિક્ષકા (બૃહંદલા)
સહદેવ = ગૌશાળા પ્રબંધક
નકુલ = અશ્વશાળા પ્રબંધક
દ્રૌપદી = મહારાણી ની સેવિકા (શૈલેન્દ્રિ)

અજ્ઞાતવાસ પુર્ણ થયાના ૨ મહિના પશ્વાત ધર્મક્ષેત્ર કુરુક્ષેત્રમાં મહાભારતનું યુધ્ધ શરૂ થયું. આ ૨ મહિના નાં સમયમાં ર્અજુનપુત્ર અભિમન્યુ નો વિવાહ વિરાટ રાજ્યની કુંવરી ઉત્તરા સાથે થયો તેમજ ભિમસેને ૧૪ દિવસના મલ્લયુદ્ધમા જરાસંઘ વધ કર્યો
.
માતા કુંતી અને ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ સિવાય એક માત્ર પિતામહ મહામહિમ્નન ભિષ્મ જ એક માત્ર એવા વ્યક્તિ હતા કે જેમને કર્ણની કુંતીપુત્ર હોવાની વાસ્તવિકતા જ્ઞાત હતી.
પિતામહ મહામહિમ્ન ભિષ્મ તેમના બીજા જન્મમાં વર્તમાન ભારત ના મણિપુર રાજ્યનો રાજા ના બબ્રૂવાહન થયાં જેમણે મહાભારતના મહાયુદ્ધથી ૧૭ વર્ષ પછી અશ્વમેઘ યજ્ઞ સમયે યુદ્ધ માં માત્ર ૧૬ વર્ષની આયુ માં અર્જુનને હરાવ્યો હતો અને વધ કર્યો હતો પરંતુ બબ્રૂવાહનના માતા ચિત્રાંગદાએ સુતાલ નામના પાતાળ ના રાજા નાગરાજ વાસુકિ ની પુત્રી નાગકન્યા ઉલુપ્પી નું આહ્નાવાહન કર્યુ અને નાગમણિની મદદથી અર્જુનને સજીવન કર્યો અને પિતા (અર્જુન), પુત્ર (બબ્રૂવાહન) તેમજ અર્જુન ની પત્ની દ્રૌપદી અને સુભદ્રા સિવાયની બાકીની બે પત્નીઓ (ચિત્રાંગદા આને ઊલુપ્પી) સાથે સુખદ મિલાપ થયો.
ધર્મક્ષેત્ર કુરુક્ષેત્રમાં મહાભારતના યુધ્ધમાં વિજય મેળવ્યા પછી ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિર ૩૬ વર્ષ સુધી હસ્તિનાપુરના રાજા રહ્યા. સ્વર્ગ ગમન સમયે યુધિષ્ઠિર ૧૨૭, ભીમ ૧૨૬, અર્જુન ૧૨૫, સહદેવ અને નકુલ ૧૨૪ વર્ષ ના હતા. યાજ્ઞસૈની દ્રૌપદી ના જન્મ ને ૮૮ વર્ષ થયાં હતાં.

યાજ્ઞસૈની દ્રૌપદી ઈન્દ્રાણી નો પુર્ણ અવતાર તેમજ માતા સરસ્વતી, માતા લક્ષ્મી, માતા મહાકાલિ નો અંશ અવતાર હતી જેનો જન્મ સમગ્ર ચંદ્રવંશ એટલે કે કુરુવંશ, યદુવંશ, મગધવંશ, પંચાલ વંશ, વિદર્ભ વંશ નો વિનાશ માટે થયો હતો.
યાજ્ઞસૈની દ્રૌપદીની ઉત્પત્તિ પોતાના સ્વયંવરથી માત્ર ૫ વર્ષ પહેલાં થઈ હતી પરંતુ તે ઉત્પત્તિ સમયે જ ૧૬ વર્ષની યુવતી હતી.

પાંડવો ના સ્વર્ગારોહણ પશ્વાત અભિમન્યુ અને ઉત્તરાના પુત્ર પરિક્ષિતને હસ્તિનાપુર ના રાજા બનાવ્યા ત્યારે તે ૩૬ વર્ષ ના હતા. પરિક્ષિત ૬૦ વર્ષ સુધી હસ્તિનાપુર ના રાજા રહ્યા. ૯૬ વર્ષ ની લાંબી વયે પણ પરીક્ષત ખુબ જ શક્તિશાળી અને સ્વસ્થ હતા. “શ્રીમદ ભગવદ મહાપુરાણ” ની મહાકથા ને ૭ દિવસ સુધી અન્ન-જળ નો ત્યાગ કરીને સાંભળનાર સૌથી પહેલી વ્યક્તિ મહારાજા પરીક્ષિત હતા.

પરિક્ષિતની પશ્વાત તેમનો પુત્ર જનમેજય ૮૯ વર્ષ સુધી હસ્તિનાપુર ના રાજા રહ્યા હતા. મહારાજા જન્મેજયે “સર્પમેઘ” યજ્ઞ કરીને પૃથ્વી ઉપર રહેલી પ્રત્યેક પ્રજાતિના તમામ સર્પ નો વધ કરવા પ્રયત્ન કર્યો હતો. જો આ યજ્ઞ પરીપુર્ણ થઈ જાત તો પૃથ્વી ઉપર એક પણ સર્પ જીવિત ન હોત અંતે ૧૨૪ વર્ષ ની લાંબી વયે મહારાજા જન્મેજય મૃત્યુ પામ્યા. જન્મેજયના પુત્ર શતાનિક ૮૮ વર્ષ શાસન કરીને ૧૪૮ વર્ષ ની લાંબી વયે મૃત્યુ પામ્યા. ત્યાર પછી શતાનિકના પુત્ર સહસ્ત્રાનિક પણ ૮૮ વર્ષ શાસન કરીને ૧૭૫ વર્ષ ની વયે મૃત્યુ પામ્યા. ત્યાર પછી કડિયુગના વધતા જતા પ્રભાવથી આ વંશ માં કોઈ પણ રાજા ૬૬ વર્ષ કરતા વધારે વર્ષ શાસન ન કરી શક્યા, તેમજ કલિયુગમાં આ વંશના કોઈ પણ રાજા મહત્તમ ૯૪ વર્ષ કરતા વધારે લાંબુ આયુષ્ય જીવી ન શક્યા. જેમ સમય પસાર થતો ગયો તેમ આયુષ્ય ઓછું થતું ગયુ.

આ વંશના અંતિમ સ્વતંત્ર રાજા બીજું કોઈ નથી પરંતુ મહારાજા પૃથ્વીરાજ સિંહ ચૌહાણ (ઈ.સ. ૧૧૪૯ – ઈ.સ. ૧૧૯૨) હતા, જેમણે ૧૪ વર્ષ શાસન કર્યું હતું. તેઓ ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિરથી ૧૨૪ માં ક્રમના રાજા હતા. તેથી ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિરથી પૃથ્વીરાજ ચૌહાણ સુધી ૪,૨૯૪ વર્ષ લાંબો સમય પસાર થયો તેમાં ૧૨૪ પેઢીઓ થવાથી ધર્મરાજ યુધિષ્ઠિરથી પછીના સમયમાં તેમના વંશમા થઈ ગયેલા રાજાઓ સરેરાશ ૩૫ વર્ષ શાસન કરતા હતાં અને તેમનું સરેરાશ આયુષ્ય ૭૦ વર્ષ હતું.

આવી ઐતહાસિક પોસ્ટ માટે પેજ લાઈક કરો ને શેર કરવાનું ભૂલશો નહિ.. : સાહિત્ય વંદના | MD Parmar – Gir

Posted in महाभारत - Mahabharat

महाभारत को पढ़ने का समय न हो तो भी इसका नव सार सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकता है :-*


महाभारत को पढ़ने का समय न हो तो भी इसका नव सार सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकता है :-*

1 संतानों की गलत माँग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे = कौरव

2 आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हो तो आपकी विद्या अस्त्र शस्त्र शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा = कर्ण

3 संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे = अश्वत्थामा

4 कभी किसी को ऐसा वचन मत दो कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े = भीष्म पितामह

5 संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है = दुर्योधन

6 अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है = धृतराष्ट्र

7 व्यक्ति के पास विद्या विवेक से बँधी हो तो विजय अवश्य मिलती है = अर्जुन

8 हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते = शकुनि

9 यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता पूर्वक पालन करेंगे तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती = युधिष्ठिर

यदि जीवन में इन सभी सूत्रों से सबक नही लिया तो जीवन मे महाभारत होना संभव ही है।🙏🙏

Posted in महाभारत - Mahabharat

કર્ણના અગ્નિસંસ્કાર કુંવારી જમીનમાં થયેલા,આ જમીન ગુજરાતમાં જ છે,


કર્ણના અગ્નિસંસ્કાર કુંવારી જમીનમાં થયેલા,

આ જમીન ગુજરાતમાં જ છે,

હજુ પણ આ જગ્યાએ જ સૌથી વધુ દાનવીર પેદા થાય છે.

મિત્રો તમે મહારાણી કુંતીના સૌથી મોટા પુત્ર કર્ણની જીવનગાથા વિશે તો ઘણું સાંભળ્યું હશે.

પરંતુ શું તમે તેના મૃત્યુ વિશે જાણો છો ?

તો આજે અમે તેના મૃત્યુ અને તેને સંબંધિત રહસ્યો વિશે જણાવશું.

જેનાથી લગભગ તમે અજાણ હશો.

જ્યારે મહાભારતનું યુદ્ધ ચાલી રહ્યું હતું,
ત્યારે કર્ણના રથનું પૈડું જમીનમાં ફસાઈ ગયું હતું.

ત્યારે કર્ણએ અર્જુનને જણાવ્યું કે અર્જુન જ્યાં સુધી હું મારા રથનું પૈડું જમીનમાંથી બહાર ન કાઢી લઉ
ત્યાં સુધી તું મારા પર વાર નહિ કરે.
આ સાંભળી અર્જુન અટકી ગયો.

ત્યારે ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ અર્જુનને કહ્યું કે
અર્જુન તું કેમ અટકી ગયો બાણ ચલાવ.

અર્જુને શ્રી કૃષ્ણને જણાવ્યું કે તે યુદ્ધના નિયમથી વિરુદ્ધ છે.

ત્યારે ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ અર્જુનને યાદ અપાવ્યું કે
જ્યારે અભિમન્યુ એકલો જ બધા યોદ્ધાઓ સાથે લડી રહ્યો હતો
ત્યારે યુદ્ધના નિયમનો ખ્યાલ રાખ્યો હતો ?

ત્યારે શું પિતામહે યુદ્ધના કોઈ નિયમ બનાવ્યા ન હતા ?
અને
એટલું જ નહિ ભરી સભામાં દ્રૌપદીને વેશ્યા કહેવામાં આવી હતી ત્યારે….

આ સાંભળી અર્જુનને ગુસ્સો આવ્યો અને કર્ણ પર બાણ ચલાવી દીધું.

મિત્રો તમને જણાવી દઈએ કે અર્જુન દ્વારા ચલાવાયેલું બાણ કોઈ સાધારણ બાણ ન હતું કે જેનાથી કર્ણ બચી શકે.

તે પાશુપસ્ત્ર હતું.
જે ભગવાન શિવજીના વરદાનથી અર્જુનને મળ્યું હતું.

જ્યારે પાંડવો ૧૪ વર્ષના વનવાસ માટે ગયા
ત્યારે ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ પાંચેય પાંડવને અલગ અલગ તપસ્યા કરવા માટે મોકલી દીધા હતા.

તેમાં અર્જુને ભગવાન શિવજીની તપસ્યા કરી હતી
અને
ભગવાન શિવજીએ તેને પાશુપસ્ત્ર વરદાન સ્વરૂપે આપ્યું હતું.

અર્જુનના વાર બાદ તડપી તડપીને કર્ણ પોતાના મૃત્યુની રાહ જોઈ રહ્યો હતો

ત્યારે ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ કર્ણની પરીક્ષા લેવાનું વિચાર્યું
અને
બ્રાહ્મણ રૂપ ધારણ કરીને કૃષ્ણ ભગવાન કર્ણ પાસે આવ્યા
અને
કહ્યું કે હે કર્ણ મારી પુત્રીના લગ્ન છે
અને
મારી પાસે તેને દાનમાં આપવા માટે સોનું નથી તો મને સોનાનું દાન આપ.

ત્યારે કર્ણએ જણાવ્યું કે હવે મારી પાસે કંઈ નથી
હું તમને શું દાન કરી શકું શા માટે તમે મારી પરીક્ષા લઇ રહ્યા છો.

ત્યારે બ્રાહ્મણે કહ્યું કે હજુ પણ તારી પાસે તારો સોનાનો દાંત છે
દાન આપવા માટે.
ત્યારે કર્ણએ જણાવ્યું કે પથ્થર મારીને મારો દાંત કાઢી લો.
ત્યારે બ્રાહ્મણે જણાવ્યું કે દાન આપવાનું હોય મારાથી પથ્થર મારીને ન લેવાય તારે આપવો પડશે દાંત.
ત્યારે કર્ણએ પોતાના હાથે દાંત પર પથ્થર મારીને દાંત કાઢી બ્રાહ્મણને આપ્યો.

ત્યારે બ્રાહ્મણે કહ્યું કે દાંતને પવિત્ર કરીને આપ
ત્યારે કર્ણને પોતાનું બાણ જમીન પર ચલાવ્યું તો
ત્યાંથી ગંગા નદીની જળ ધારા થઇ
અને
દાંત પવિત્ર થઇ ગયો.

ત્યાર બાદ કર્ણ સમજી ગયો કે આ બ્રાહ્મણ કોઈ દેવતા છે અથવા તો ખુદ પરમાત્મા છે.

માટે તેણે બ્રાહ્મણને કહ્યું કે
તમે જે હોય તે મને તમારું અસલી રૂપ દેખાડો.

ત્યાર બાદ ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ પોતાના અસલી રૂપમાં આવ્યા
અને
કર્ણને જણાવ્યું કે તું ખરેખર મહાન દાનવીર છે
તારા જેટલું દાની જગતમાં બીજું કોઈ નથી,
માટે હું તારા આ કર્મથી પ્રસન્ન છું,

તું જે માંગીશ તે આપીશ માટે કોઈ વરદાન માંગ.

ત્યારે કર્ણએ કહ્યું, કે
આમ તો મેં ક્યારેય કોઈ પાસે માગ્યું નથી

પરંતુ આજે એક વરદાન માંગુ છું

કે મને જન્મ એક કુંવારી માતાએ આપ્યો છે
માટે મારા અંતિમ સંસ્કાર પણ એક કુંવારી જમીન પર થાય તેવું ઈચ્છું છું.

ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ પોતાની અંત:દ્રષ્ટિથી કુંવારી જમીન શોધી તો
તાપી નદીના કિનારે અશ્વિની કુમારના મંદિર પાસેની જમીન કુંવારી હતી.

ત્યાર બાદ ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ અને પાંચેય પાંડવોએ કર્ણના અંતિમ સંસ્કાર ત્યાં કર્યા.

ત્યારે પાંડવોએ પૂછ્યું કે આ કુંવારી જમીન જ છે
એવું કંઈ રીતે સાબિત થાય.

ત્યારે કર્ણ પ્રગટ થયો
અને
જણાવ્યું કે તાપી મારી બહેન છે,
અશ્વિની કુમાર મારા ભાઈઓ છે
અને
હું સૂર્ય પુત્ર છું
અને
મારો અગ્નિદાહ એક કુંવારી જમીનમાં જ થયો છે..

ત્યારે પાંડવોએ જણાવ્યું કે
હે પ્રભુ અમને તો ખબર પડી ગઈ કે
આ એક કુંવારી જમીન છે.

પરંતુ આવનારી પેઢીને કંઈ રીતે ખબર પડશે કે

કુંવારી જમીન પર જ દાનવીર કર્ણના અંતિમ સંસ્કાર થયા હતા.

ત્યારે ભગવાને વિચાર્યું અને કહ્યું કે આ જ જમીન પર એક વટ વૃક્ષ ઉગશે
અને
તેમાં ત્રણ પાંદડા આવશે જે
બ્રહ્મા, વિષ્ણુ અને મહેશના પ્રતિક હશે
અને
આગળ જણાવ્યું કે જે કોઈ પણ અહીં સાચી શ્રદ્ધાથી પ્રાર્થના કરશે.
તેની મનોકામના અહીં અવશ્ય પૂર્ણ થશે.

મિત્રો આ વટ વૃક્ષ આજે પણ છે.
અને
આજે પણ તેમાં માત્ર ત્રણ જ પાંદડા છે.
જે એ વાતની સાબિતી આપે છે કે
દાનવીર કર્ણના અગ્નિ સંસ્કાર ત્યાં જ કરવામાં આવ્યા હતા.

મિત્રો સૌથી મજેદાર વાત તો એ છે કે
આ વટ વૃક્ષ આપણા ગુજરાતમાં જ છે.

સુરત શહેરમાં તાપી નદીના કિનારે આવેલ
અશ્વિની કુમાર મંદિર પાસે આ ત્રણ પાંદડા વાળું વટ વૃક્ષ આવેલું છે.

અને
કદાચ એટલા માટે જ આજે સુરત શહેરની દુનિયાભરમાં બોલબાલા છે.

અહીયા આવીને કોઈપણ પોતાની લાઈફ સેટ કરી લે છે.

કેમ કે સુરત પર આજે પણ ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ અને સૂર્યદેવના આશીર્વાદ છે.

     🙏🏻🙏🏻  જય શ્રી કૃષ્ણ  🙏🏻🙏🏻
Posted in महाभारत - Mahabharat

महाभारत काल एवं उसके बाद के राजवंश


महाभारत काल एवं उसके बाद के राजवंश


पौराणिक तथा ज्योतिषीय प्रमाणों के आधार पर यह महाभारत युद्ध की प्रसिद्ध परंपरागत तिथि 3070 ई.पू. मानी जाती है. उस महायुद्ध में भयानक सर्वनाश हुआ था. इस युद्ध के कुछ बर्ष बाद भगवान् श्रीकृष्ण का यदुवंश भी आपस में लड़कर समाप्त हो गया था. उसके बाद भारत में दो ही प्रशिद्ध राजवंश बचे. एक इंद्रप्रस्थ का पाण्डुवंश और दूसरा मगध का जरासंध का वंश.

महाभारत के युद्ध के बाद युधिष्ठिर राजा बने और उनके बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित और मगध में जरासंध के पुत्र बृहद्रथ. राजा परीक्षित के बाद के द्वापर युग की समाप्ति तथा कलयुग का प्रारम्भ माना जाता है. परीक्षित के लगभग 28 पीढ़ी तक पाण्डु वंश का समय लगभग 1100 साल (2000 ई. पू.) माना जाता है. इनके समय तक म्लेच्छों के आक्रमण शुरू हो गए थे.

पाण्डु वंश के अन्तिम सम्राट क्षेमक हुए, जो मलेच्छों के साथ युद्ध करते हुए मारे गये थे. क्षेमक के वेदवान् तथा वेदवान् के सुनन्द नामक पुत्र हुआ. सुनन्द पुत्रहीन ही रहा,.इस प्रकार सुनन्द के अंत के साथ ही पाण्डव वंश का अंत हो गया. उधर मगध में जरासंध की 22 पीढ़ियों तक लगभग 1000 साल ( 2200 ई.पू.) तक चला. इस वंश का अन्तिम राजा रिपुञ्जय था.

साभार

Posted in महाभारत - Mahabharat

महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है …. !!🙏🙏

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी …. !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा “देवव्रत” (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था — अकेला …. !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , “प्रणाम पितामह” …. !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , ” आओ देवकीनंदन …. ! स्वागत है तुम्हारा …. !!

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था” …. !!

कृष्ण बोले , “क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप” …. !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले,” पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव … ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है” …. !

कृष्ण चुप रहे …. !

भीष्म ने पुनः कहा , “कुछ पूछूँ केशव …. ?
बड़े अच्छे समय से आये हो …. !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय ” …. !!

कृष्ण बोले – कहिये न पितामह ….!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न …. ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , “नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं … मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह … ईश्वर नहीं ….”

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े …. ! बोले , ” अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे …. !! “

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले …. ” कहिये पितामह …. !”

भीष्म बोले , “एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या …. ?”

“किसकी ओर से पितामह …. ? पांडवों की ओर से …. ?”

” कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था …. ? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या …. ? यह सब उचित था क्या …. ?”

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह …. !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ….. !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन …. !!

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह …. !!

“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण …. ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है …. !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण …. !”

“तो सुनिए पितामह …. !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ …. !
वही हुआ जो हो होना चाहिए …. !”

“यह तुम कह रहे हो केशव …. ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ….? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ….. ? “

“इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है …. !

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है …. !!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था …. !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह …. !!”

” नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो …. !”

” राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह …. !
राम के युग में खलनायक भी ‘ रावण ‘ जैसा शिवभक्त होता था …. !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ….. ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे …. ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था …. !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया …. ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं …. !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह …. ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो …. !!”

“तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव …. ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा …. ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ….. ??”

” भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह …. !

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा …. !

वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा …. नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा …. !

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह …. !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय …. !

भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह ….. !!”

“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव …. ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ….. ?”

“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह …. !

ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ….. !केवल मार्ग दर्शन करता है*

सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है …. !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न …. !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ….. ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न …. ?
यही प्रकृति का संविधान है …. !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से …. ! यही परम सत्य है ….. !!”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे …. !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी …. !
उन्होंने कहा – चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है …. कल सम्भवतः चले जाना हो … अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण …. !”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था …. !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ….।।

धर्मों रक्षति रक्षितः

Posted in महाभारत - Mahabharat

राहुल गर्ग

शस्त्र की महत्ता…!!

दधीचि ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था !

उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने- १. गांडीव, २. पिनाक और ३. सारंग !

जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !

सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !

और, पिनाक भगवान शिव जी के पास था जिसे तपस्या के माध्यम से खुश रावण ने शिव जी से मांग लिया था !

परन्तु… वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था !

इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !

ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही “एकघ्नी नामक वज्र” भी बना था … जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था !

इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घतोत्कक्ष कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !

लेकिन ……… दधिची के इस अस्थि-दान का उद्देश्य क्या था ??????

क्या उनका सन्देश यही था कि….. उनकी आने वाली पीढ़ी नपुंसकों और कायरों की भांति मुंह छुपा कर घर में बैठ जाए और शत्रु की खुशामद करे….??? नहीं..

कोई ऐसा काल नहीं है जब मनुष्य शस्त्रों से दूर रहा हो..

हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ से ले कर ऋषि-मुनियों तक का एक दम स्पष्ट सन्देश और आह्वान रहा है कि….

”हे सनातनी वीरो.शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो !”

बस आज भी सबके लिए यही एक मात्र सन्देश है !
राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए अंततः बस एक ही मार्ग है !

सशक्त बनो..!