Posted in महाभारत - Mahabharat

Sanjay Gupta

महाभारत काल में यदुवंशियों को हर जगह से पलायन ही क्यों करना पड़ा?

महाभारत काल में यदुवंशियों को हर जगह से पलायन ही करना पड़ा। इस पलायन के कई कारण थे। कहते हैं कि यदुवंशियों के प्रारंभ में मथुरा में ही कुल 18 कुटुम्ब के लोग थे। देशभर की संख्या ज्ञात नहीं। महाभारत के बाद जब मौसुल युद्ध हुआ तो यही 18 कुल के लोग आपस में लड़कर मारे गए। लेकिन यह भी कहा जाता है कि उस काल में बहुत से यदुवंशी पलायन करके भारत के बाहर भी चले गए थे, जहां उन्होंने अपना एक अलग साम्राज्य स्थापित कर अपने वंश को विस्तार दिया।

हालांकि कालांतर में उनका साम्राज्य भी नष्ट हो गया या कर दिया गया। यह आलेख सिर्फ महाभारत पर ही केंद्रित है और यह आलेख किसी निष्कर्ष या समाधान की बात नहीं करता, सिर्फ शोधार्थियों हेतु सवाल प्रस्तुत करता है। यदुवंशियों का प्राचीन और मध्यभारत में अतुलनीय योगदान रहा है। उनकी पीढ़ियों के योगदान और इतिहास को प्रकट और संरक्षित करने की जरूरत है।

महाभारत का युद्ध अधर्म के विरुद्ध धर्म का युद्ध था। लेकिन अधर्म की ओर वे लोग भी थे, जो धर्म के पक्षधर थे। एकमात्र यह युद्ध ऐसा युद्ध था जिससे कई घटनाओं और कहानियों का जन्म हुआ और जिससे भारत का भविष्य तय हुआ। इस युद्ध में एक ओर जहां भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा आदि को शाप दिया था वहीं भगवान कृष्ण को भी शाप का सामना करना पड़ा।

मथुरा अंधक संघ की राजधानी थी और द्वारिका वृष्णियों की। ये दोनों ही यदुवंश की शाखाएं थीं। यदुवंश में अंधक, वृष्णि, माधव, यादव आदि वंश चला। श्रीकृष्ण वृष्णि वंश से थे। वृष्णि ही ‘वार्ष्णेय’ कहलाए, जो बाद में वैष्णव हो गए। भगवान श्रीकृष्ण के पूर्वज महाराजा यदु थे। यदु के पिता का नाम ययाति था। ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में हुए थे। ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनद कहा गया है।

पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गए थे और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को कभी राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहते थे और उसी को उन्होंने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया।

यदु ने पुरु पक्ष का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इंकार कर दिया। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ। उसके वंशज पौरव कहलाए। कहते हैं कि यदु के बाद अधिकतर यदुओं को कभी भी उस काल में राज्य का सुख हासिल नहीं हुआ। उनके वंशज के लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को भटकते रहे और उनको हर जगह से पलायन ही करना पड़ा। वे जहां भी गए उन्होंने एक नया नगर बसाया और अंतत: उस नगर का विध्वंस हो गया या कर दिया गया।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अनुमानित 7,200 ईसा पूर्व यदु ने राज्य को छोड़ने के बाद समुद्र के किनारे अपनी नगरी को बसाया था। यह भी कहा जाता है कि ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पश्चिम में पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुहु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिन्ध-गुजरात प्रांत) और उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भू-मंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए। ययाति के राज्य का क्षे‍त्र अ‍फगानिस्तान के हिन्दूकुश से लेकर असम तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक था।

यदु के कुल में भगवान कृष्ण हुए। यदु के 4 पुत्र थे- सहस्रजीत, क्रोष्टा, नल और रिपुं। सहस्रजीत से शतजीत का जन्म हुआ। शतजीत के 3 पुत्र थे- महाहय, वेणुहय और हैहय। हैहय से धर्म, धर्म से नेत्र, नेत्र से कुन्ति, कुन्ति से सोहंजि, सोहंजि से महिष्मान और महिष्मान से भद्रसेन का जन्म हुआ।

ययाति ने जब यदु को सिन्ध-गुजरात के क्षेत्र दिए तो उस समय गुजरात के समुद्र तट पर एक उजाड़ नगरी थी जिसे कुशस्थली कहा जाता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराज रैवतक ने प्रथम बार समुद्र में से कुछ भूमि बाहर निकालकर यहां एक नगरी बसाई थी।

यहां उनके द्वारा कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण इसे कुशस्थली कहा गया। अन्य मान्यताओं के कारण इसे राम के पुत्र कुश के वंशजों ने बसाया था। यह भी कहा जाता है कि यहीं पर त्रिविक्रम भगवान ने ‘कुश’ नामक दानव का वध किया था इसीलिए इसे कुशस्थली कहा जाता है। जो भी हो, यहां पर महाराजा यदु ने अपनी एक नगरी बसाई थी।

अज्ञात कारणों के चलते जब यह नगरी उजाड़ हो गई तो सैकड़ों वर्षों तक इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया। बाद में जरासंध के आक्रमण से त्रस्त होकर श्रीकृष्ण ने मथुरा से अपने 18 कुल के हजारों लोगों के साथ पलायन किया तो वे कुशस्थली आ गए थे और यहीं उन्होंने नई नगरी बसाई और जिसका नाम उन्होंने द्वारका रखा। इसमें सैकड़ों द्वार थे इसीलिए इसे द्वारका या द्वारिका कहा गया। इस नगरी को श्रीकृष्‍ण ने विश्वकर्मा और मयासुर की सहायता से बनवाया था।

यह अभेद्य दुर्ग था। लेकिन कहते हैं कि जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका से बाहर लंबी यात्रा पर थे तब उनके शत्रु शिशुपाल ने यहां आक्रमण कर इस नगरी को कुछ हद तक नष्ट कर दिया था। इसे श्रीकृष्ण ने फिर से मजबूत बनवाया था। विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में उल्लेख मिलता है कि कुशस्थली उस प्रदेश का नाम था, जहां यादवों ने द्वारका बसाई थी।

मौसुल युद्ध के बाद यदुवंशियों का विनाश हो गया। इसके बाद श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद जब द्वारिका नगरी जल में डूब रही थी तब अर्जुन सभी यदुवंशी स्त्री और बच्चों को लेकर हस्तिनापुर के लिए निकले। हजारों की संख्या में एक जगह पड़ाव डाला तब उनके साथ लूटपाट हुई और लगभग सभी मारे गए। बस बच गया था तो श्रीकृष्ण का प्रपोत्र वज्रनाभ।

उल्लेखनीय है कि कालांतर में मथुरा को भी कई बार नष्ट किया गया था। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को बहुत सी जगहों पर वज्रनाभ भी लिखा गया है। वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा भी घोषित किया था।

उसे इन्द्रप्रस्थ भी दिया गया था लेकिन वह नष्ट हो गया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है। इस वज्र ने ही मथुरा में सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर बनवाया था लेकिन कालांतर में आक्रांताओं ने इसे नष्ट कर दिया था।

मथुरा को नष्‍ट करने में सबसे पहला नाम जरासंध का आता है। उसके बाद शिवभक्त मिहिरकुल का आता है। मिहिरकुल हूण सम्राट तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल भारतीय इतिहास में अपनी खूंखार और ध्वंसात्मक प्रवृत्ति के लिए प्रसिद्ध हैं। 450 ईस्वी के लगभग हूण, गांधार इलाके के शासक थे, जब उन्होंने वहां से सारे सिन्धु घाटी प्रदेश को जीत लिया था। इसके बाद महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी ने इस शहर का विध्वंस किया था।

ऐसा नहीं है कि यादव क्षत्रियों ने कभी राजपाट नहीं किया। उन्होंने कई वर्षों तक देश में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में राज किया लेकिन उनका शासन आक्रांताओं के कारण अस्थिर ही रहा। जैसे कश्मीर में अभीर यादव वंश का शासन था। आज का अभिसार और राजौरी क्षेत्र उसी शासन के अंतर्गत आता था।

इसी तरह गुजरात में भी अहीरवंशी क्षत्रियों का शासन रहा है। आज भी गुजरात में यादव समुदाय की आबादी जामनगर, जूनागढ़, कच्छ, राजकोट एवं अमरेली जिलों में अधिक है। अहीर, ग्वाल तथा यादव शब्द एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द ही माने जाते हैं। यादवों में घोसी, गौड़, गौर, राउत, रावत, भाटी आदि भी होते हैं।

लंबे कालखंड और आपसी फूट के कारण यादव समाज उपजातियों में बंटकर बिखर गया है। प्रत्येक प्रदेश में यादवों की पीढ़ियों का इतिहास अलग-अलग मिलेगा, लेकिन शुरुआती क्रम समान है। यदि हम गुजरात की बात करें तो अत्रि से सोम, सोम से ययाति, ययाति से यदु, यदु से आगे 59वीं पीढ़ी में सूरसेन, सूरसेन से वसुदेव, वसुदेव से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

श्रीकृष्ण से प्रद्युम्न, प्रद्युम्न से अनिरुद्ध, अनिरुद्ध से वज्रनाभ का जन्म हुआ। वज्रनाभ की 140वीं पीढ़ी में देवेन्द्र हुए। देवेन्द्र के बाद गजपत हुए। गजपत के बाद शालिवाहन, शालिवाहन के बाद यदुभाण, यदुभाण के बाद जसकर्ण, जसकर्ण के बाद समाकुमार, समाकुमार के बाद ईस्वी सन् 875 में चूड़चन्द्र हुए। इस तरह हमें यह लिस्ट मिलती है

Advertisements
Posted in महाभारत - Mahabharat

इन पाँच गांवों की वजह से हुआ था महाभारत का युद्ध, अब ऐसा है उनका हाल, इनकी बदौलत टल सकता था युद्ध!!!!!!!

संजय गुप्ता

लालच, स्त्री का अपमान, जैसी जैसी कई चीजों के परिणाम स्वरूप महाभारत का युद्ध हुआ। जमीन या राज्य का बंटवारा भी इन्हीं कारणों में से एक था। जमीन के लालच में कौरवों ने कई षड्यंत्र रचे। पांडवों को मारने का प्रयास भी किया और तो और भरी सभा में अपनी कुलवधू द्रोपदी का चीरहरण करके उन्हें अपमानित भी किया।

इस सब के बावजूद युधिष्ठिर युद्ध नहीं चाहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि युद्ध से उनका पूरा वंश तबाह हो जाएगा। इसलिए उन्होंने मात्र 5 गांवों के बदले युद्ध ना करने का प्रस्ताव रखा था। अगर दुर्योधन उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता तो इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध टल जाता।

आखिर क्या है पूरा किस्सा? कौन-से थे वे 5 गांव और आज वे कहां मौजूद है? आइये जानते हैं।

युधिष्ठिर के निवेदन पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, पांडवों की ओर से शांतिदूत बनकर कौरवों के पास गए थे। हस्तिनापुर पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण ने पांडवों का संदेश देते हुए कहा था कि अगर कौरव उन्हें मात्र 5 गांव प्रदान कर दें तो यह युद्ध नहीं होगा।

पांडवों का प्रस्ताव सुनने के बाद धृतराष्ट्र इसे स्वीकार करना चाहते थे, लेकिन दुर्योधन ने अपने पिता को भड़काते हुए कहा कि ये पांडवों की चाल है। वे जानते हैं कि हमारी विशाल सेना के आगे वे पलभर भी नहीं टिक पाएंगे इसलिए ये चाल चल रहे हैं।

श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को फिर से समझाते हुए कहा था कि पांडव युद्ध से डरते नहीं हैं। वे बस कुल का नाश होते नहीं देखना चाहते। आगे श्रीकृष्ण ने कहा कि अगर वो पांडवों को आधा राज्य लौटा दें तो युद्ध तो टल ही जाएगा, साथ ही पांडव दुर्योधन को युवराज के रूप में भी स्वीकार कर लेंगे।

धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह, गुरु द्रोण सभी ने दुर्योधन को समझाने की बहुत कोशिशें कीं। यहां तक कि गांधारी ने भी दुर्योधन से पांडवों का प्रस्ताव स्वीकार करने की विनती की, लेकिन हठी दुर्योधन ने किसी की बात नहीं मानी। परिणाम स्वरूप युद्ध में पूरे कौरव वंश का नाश हो गया।

ये था महाभारत का वो रोचक किस्सा, जिसमें पांच गांवों का जिक्र किया गया था। चलिए अब आपको बताते हैं कौन-से थे वे पांच गांव और आज कहां, किस नाम से मौजूद हैं।

पहला गांव- इंद्रप्रस्थ : – महाभारत में इंद्रप्रस्थ को कहीं-कहीं पर श्रीपत के नाम से भी पुकारा गया है। जब कौरवों और पांडवों के बीच मदभेद होने लगे थे, तब धृतराष्ट्र ने यमुना किनारे स्थित खांडवप्रस्थ क्षेत्र पांडवों को देकर, राज्य से अलग कर दिया था। इस जगह पर हर तरफ जंगल ही जंगल था। तभी पांडवों ने रावण के ससुर और महान शिल्पकार मायासुर से यहां महल बनाने की विनती की। पांडवों के कहने पर मयासुर ने यहां सुंदर नगरी बनाई और इस जगह का नाम इंद्रप्रस्थ रख दिया गया। आज की दिल्ली का दक्षिणी इलाका महाभारत काल का इंद्रप्रस्थ माना जाता है।

दूसरा गांव- व्याघ्रप्रस्थ : – व्याघ्रप्रस्थ यानी बाघों के रहने की जगह। महाभारत काल का व्याघ्रप्रस्थ आज बागपत कहा जाता है। मुगलकाल से इस जगह को बागपत के नाम से जाना जाने लगा था। आज ये जगह उत्तरप्रदेश में मौजूद है। कहा जाता है कि इसी जगह पर दुर्योधन ने पांडवों को मरवाने के लिए लाक्षागृह का निर्माण करवाया था।

तीसरा गांव- स्वर्णप्रस्थ : – स्वर्णप्रस्थ का मतलब है ‘सोने का शहर’। महाभारत का स्वर्णप्रस्थ आज सोनीपत के नाम से जाना जाता है। आज ये हरियाणा का एक प्रसिद्ध शहर है। समय के साथ इसका नाम पहले ‘सोनप्रस्थ’ हुआ और फिर सोनीपत।

चौथा गांव- पांडुप्रस्थ : – हरियाणा का पानीपत महाभारत के समय पांडुप्रस्थ कहा जाता था। कुरुक्षेत्र, जहां महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, पानीपत के पास ही स्थित है। नई दिल्ली से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थिर इस जगह को ‘सिटी ऑफ वीबर’ यानी ‘बुनकरों का शहर’ भी कहा जाता है।

पांचवा गांव- तिलप्रस्थ : – महाभारत काल में तिलप्रस्थ के नाम से प्रसिद्ध ये जगह आज तिलपत बन चुकी है। यह हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित एक कस्बा है।

Posted in महाभारत - Mahabharat

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद की 14 रोमांचक घटनाएं!!!!!!!!

महाभारत युद्ध के बाद का इतिहास सभी जानना चाहते हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडव, कृष्ण और बचे हुए योद्धाओं का क्या हुआ? धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर, संजय, युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम और भगवान कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई? भारत का इतिहास और समाज उस काल में किस हाल में था। क्या यदुवंश का नाश हो गया था? तो आओ इसी संबंध में जानते हैं 14 प्रमुख रोमांचक घटनाएं।

1) युद्ध के 18वें अर्थात अंतिम दिन दुर्योधन ने रात्रि में उल्लू और कौवे की सलाह पर अश्वत्थामा को सेनापति बनाया था। उस एक रात्रि में ही अश्वत्थामा ने पांडवों की बची लाखों सेनाओं, पुत्रों और गर्भ में पल रहे पांडवों के पुत्रों तक को मौत के घाट उतार दिया था। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्‍थामा के द्वारा किए गए नरसंहार के बाद युद्ध समाप्त हो गया था।

2) युद्ध के बाद दुर्योधन कहीं जाकर छुप गया था। पांडवों ने उसे खोज लिया तब भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध हुआ। इस युद्ध को देखने के लिए बलराम भी उपस्थित थे। भीम कई प्रकार के यत्न करने पर भी दुर्योधन का वध नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि दुर्योधन का शरीर वज्र के समान कठोर था। ऐसे समय श्रीकृष्ण ने अपनी जंघा ठोककर भीम को संकेत दिया जिसे भीम ने समझ लिया। तब भीम ने दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया और अंत में उसकी जंघा उखाड़कर फेंक दी। बाद में दुर्योधन की मृत्यु हो गई।

3) अश्‍वत्थामा ने जब द्रौपदी के पुत्रों का उनकी निद्रावस्था में वध कर दिया तो द्रौपदी खूब विलाप करने लगी। यह देख भीम से रहा नहीं गया और वे अश्‍वत्‍थामा को पकड़ने के लिए रथ पर सवार होकर चल देते हैं। भीम के पीछे श्रीकृष्ण भी अर्जुन के साथ अपने रथ पर सवार होकर चल पड़े। सभी ने गंगा के तट पर अश्वत्‍थामा को ढूंढ लिया। द्रोणपुत्र अश्वत्‍थामा यह देखकर डर गया और उसने तुरंत ही अपने दिव्य अस्त्र ब्रह्मास्त्र का संकल्प किया और उस प्रचंड अस्त्र को पांडवों की वध की इच्‍छा से छोड़ दिया। यह देख अर्जुन ने भी संकल्प लिया कि इस ब्रह्मास्त्र से शत्रु का ब्रह्मास्त्र शांत हो जाए, ऐसा कहकर अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। दोनों के अस्त्रों से प्रचंड अग्नि का जन्म हुआ। यह देख वहां वेद व्यास और देवर्षि नारद प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि इन दोनों अस्त्रों से धरती का विनाश हो जाएगा। आप इन्हें वापस ले लें। ऐसे में अर्जुन ने तो अपना अस्त्र वापस ले लिया लेकिन अश्‍वत्थामा इसे वापस लेने में सक्षम नहीं था। ऐसे में वह उस अस्त्र को उत्तरा के गर्भ पर उतार देता है।

4) अश्वत्थामा द्वारा उत्तरा के गर्भ पर अस्त्र छोड़ देने के बाद श्रीकृष्ण उत्तरा के बच्चे को बाद में पुन: जीवित कर देते हैं। इस बीच अश्‍वत्थामा के इस अपराध के लिए श्रीकृष्ण उसे 3,000 वर्षों तक कोढ़ी के रूप में रहकर भटकने का शाप दे देते हैं। उनके इस शाप का वेद व्यासजी ने अनुमोदन किया था। शिव महापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां है, यह नहीं बताया गया है। तब अश्वत्‍थामा पांडवों को अपनी मणि देकर वन में चला जाता है। वह मणि भीमसेना युधिष्ठिर की आज्ञा से द्रौपदी को दे देते हैं। द्रौपदी वह मणि युधिष्ठिर को देकर अश्‍वत्‍थामा को क्षमा कर देती है।
75
5) युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने युद्धभूमि पर ही सभी मृत योद्धाओं का विधिवत रूप से दाह-संस्कार किया। महाभारत के स्त्री पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर के कहने पर पांडवों ने ही दोनों पक्षों के मरे हुए योद्धाओं का अंतिम संस्कार किया था।

6) भीष्म यद्यपि शरशैया पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। प्रतिदिन दिए गए इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है।

7) बाद में सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर आदि सगे-संबंधी, पुरोहित और अन्यान्य लोग भीष्म के पास पहुंचते हैं। उन सबसे भीष्म पितामह ने कहा कि इस शरशैया पर मुझे 58 दिन हो गए हैं। मेरे भाग्य से माघ महीने का शुक्ल पक्ष आ गया। अब मैं शरीर त्यागना चाहता हूं। इसके पश्चात उन्होंने सब लोगों से प्रेमपूर्वक विदा मांगकर शरीर त्याग दिया। सभी लोग भीष्म को याद कर रोने लगे। युधिष्ठिर तथा पांडवों ने पितामह के शरबिद्ध शव को चंदन की चिता पर रखा तथा दाह-संस्कार किया।

8) भीष्म पितामह के अंतिम संस्कार के बाद युधिष्ठिर के राज्याभिषेक की तैयारी होती है। महाभारत शांति पर्व के ‘राजधर्मानुशासन पर्व’ में इस राज्याभिषेक का वर्णन मिलता है। इस राज्याभिषेक में पांडु पुत्र भीम, अर्जुन, नकुल सहदेव के अलावा श्री‍कृष्ण, विदुर, धृतराष्ट्र, गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि सभी सम्मिलित होते हैं। इस राज्याभिषेक में देश और विदेश के कई राजाओं को आमंत्रित किया जाता है और भव्य आयोजन के बीच युधिष्ठिर का राज्याभिषेक होता है।

9) युद्ध के 15 वर्ष बाद धृतराष्ट्र, गांधारी, संजय और कुंती वन में चले जाते हैं। एक दिन धृतराष्ट्र गंगा में स्नान करने के लिए जाते हैं और उनके जाते ही जंगल में आग लग जाती है। वे सभी धृतराष्ट्र के पास आते हैं। संजय उन सभी को जंगल से चलने के लिए कहते हैं, लेकिन धृतराष्ट्र वहां से नहीं जाते हैं, गांधारी और कुंती भी नहीं जाती है। जब संजय अकेले ही उन्हें जंगल में छोड़ चले जाते हैं, तब तीनों लोग आग में झुलसकर मर जाते हैं। संजय उन्हें छोड़कर हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं, जहां वे एक संन्यासी की तरह रहते हैं। एक साल बार नारद मुनि युधिष्ठिर को यह दुखद समाचार देते हैं। युधिष्ठिर वहां जाकर उनकी आत्मशांति के लिए धार्मिक कार्य करते हैं।उ

10) एक दिन पांचों पांडव विदुर से मिलने आए। विदुर ने युधिष्ठिर को देखते ही अपने प्राण छोड़ दिए और वे युधिष्ठिर में समा गए। यह देखकर युधिष्ठिर को समझ में नहीं आया कि यह क्या हुआ? ऐसे में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया। श्रीकृष्ण प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि विदुर भी धर्मराज के अंश थे अत: वे तुम में समा गए, लेकिन अब मैं विदुर की इच्‍छानुसार दिया गया अपना वचन पूरा करूंगा। यह कहकर श्रीकृष्ण ने विदुर की इच्छानुसार उनके शरीर को सुदर्शन चक्र में बदलकर उस सुदर्शन चक्र को वहीं स्थापित कर दिया।

11) महाभारत युद्ध के बाद जब 36वां वर्ष प्रारंभ हुआ तो श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के कारण मोसुल का युद्ध हुआ जिसमें सभी यदुवंशी आपस में ही लड़कर मारे गए। साम्‍ब, चारुदेष्‍ण, प्रद्युम्‍न और अनिरुद्ध की मृत्‍यु हो गई। बस श्रीकृष्ण का एक पौत्र बचा था जिसका नाम वज्र था। बलराम ने द्वारिका के समुद्र के किनारे जाकर समाधि ले ली थी।

12) मोसुल के युद्ध के बाद प्रभाष क्षेत्र में एक वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण लेटे हुए थे तभी एक भील ने उन्हें हिरण समझकर बाण मार दिया। यह बाण उनके पैरों में आकर लगा। इस बाण से उनकी मृत्यु हो गई। अर्जुन को जब यह समाचार मिला तो वे द्वारिका पहुंचे और शोक व्यक्त किया।

13) श्रीकृष्ण के स्वर्गवास के बाद द्वारिका नगरी समुद्र में डूबने लगी। यह देख अर्जुन ने सभी यदुवंशी नारियों और कृष्ण के पौत्र को लेकर हस्तिनापुर के लिए कूच कर दिया। हजारों महिलाओं और द्वारिकावासियों के साथ उन्होंने पंचनद देश में पड़ाव डाला, जहां लुटेरों ने खूब लूटपाट की और सुंदर महिलाओं का अपहरण कर लिया। बहुत मुश्किल से अर्जुन, व्रज और कुछ नगरवासी इन्द्रप्रस्थ पहुंचे। अर्जुन ने व्रज को इन्द्रप्रस्थ का राजा बना दिया।

14) अर्जुन हस्तिनापुर जाकर महाराज युधिष्ठिर को सारा वृत्तांत सुनाते हैं। बाद में पांचों पांडव सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा से परीक्षित को राजपाट सौंपकर द्रौपदी के साथ स्वर्ग की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यात्रा के कठिन मार्ग में सबसे पहले द्रौपदी की, फिर नकुल और सहदेव की मृत्यु हो जाती है। बाद में अर्जुन भी गिर पड़ते हैं। अर्जुन के बाद भीम भी साथ छोड़ देते हैं। मार्ग में एक जगह इन्द्र खुद युधिष्ठिर को स्वर्ग ले जाने के लिए उपस्थित होते हैं। इन्द्र युधिष्ठिर को लेकर स्वर्ग चले जाते हैं।

 

Sanjay Gupta

Posted in महाभारत - Mahabharat

महाभारत में इन पंद्रह योद्धाओं को माना जाता था मायावी और रहस्यमयी???????


महाभारत में इन पंद्रह योद्धाओं को माना जाता था मायावी और रहस्यमयी???????

महाभारत में एक से एक बढ़कर योद्धा थे जो शक्तिशाली होने के साथ ही विचित्र किस्म की सिद्धियों और चमत्कारों से भी संपन्न थे। श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान विष्णु थे, लेकिन उनके समक्ष और सामने जो योद्धा लड़ रहे थे वे भी कम नहीं थे। कुरुक्षेत्र के युद्ध में इन योद्धाओं के मायावी कारनामों ने इतिहास रच दिया था।

1) सहदेव भविष्य में होने वाली हर घटना को पहले से ही जान लेते थे। वे जानते थे कि महाभारत होने वाली है और कौन किसको मारेगा और कौन विजयी होगा। लेकिन भगवान कृष्ण ने उन्हें शाप दिया था कि अगर वह इस बारे में लोगों को बताएगा तो उसकी मृत्य हो जाएगी।

2) बर्बरीक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। लेकिन श्रीकृष्ण ने युद्ध के पहले उन्हें भी ठीकाने लगा दिया उसका शीश मांगकर। आज उन्हें खाटू श्याम के नाम से जानते हैं।

3) महाभारत युद्ध में संजय वेदादि विद्याओं का अध्ययन करके वे धृतराष्ट्र की राजसभा के सम्मानित मंत्री बन गए थे। आज के दृष्टिकोण से वे टेलीपैथिक विद्या में पारंगत थे। कहते हैं कि गीता का उपदेश दो लोगों ने सुना, एक अर्जुन और दूसरा संजय। सैंकड़ों किलोमीटर दूर बैठे संजय ही धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन प्रतिदिन सुनाते थे।

4) गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा हर विद्या में पारंगत थे। वे चाहते तो पहले दिन ही युद्ध का अंत कर सकते थे, लेकिन कृष्ण ने ऐसा कभी होने नहीं दिया। कृष्‍ण यह जानते थे कि पिता-पुत्र की जोड़ी मिलकर ही युद्ध को समाप्त कर सकती है। दोनों के पास अति संहारक क्षमता वाले अस्त्र और शस्त्र थे लेनि श्रीकृष्ण को अपनी नीति से द्रोणाचार्य का वध करवा दिया।

5) कर्ण से यदि कवच-कुंडल नहीं हथियाए होते, यदि कर्ण इन्द्र द्वारा दिए गए अपने अमोघ अस्त्र का प्रयोग घटोत्कच पर न करते हुए अर्जुन पर करता तो आज भारत का इतिहास और धर्म कुछ और होता। कर्ण के कवच कुंडल होना उसके रहस्यमी व्यक्तित्व का परिचायक था।

6) कुंती-वायु के पुत्र थे भीम अर्थात पवनपुत्र भीम। भीम में हजार हाथियों का बल था। युद्ध में भीम से ज्यादा शक्तिशाली उनका पुत्र घटोत्कच ही था। घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक था। भीम ने ही दुर्योध की जंघा उखाड़कर फेंक दी थी और इससे पहले उसी ने ही जरासंध के वध किया था।

7) माना जाता है कि कद-काठी के हिसाब से भीम पुत्र घटोत्कच इतना विशालकाय था कि वह लात मारकर रथ को कई फुट पीछे फेंक देता था और सैनिकों को तो वह अपने पैरों तले कुचल देता था। भीम की असुर पत्नी हिडिम्बा से घटोत्कच का जन्म हुआ था। हिडिम्बा एक मायावी राक्षसनी थीं।

8) अभिमन्यु ने अपनी मां सुभद्रा की कोख में रहकर ही संपूर्ण युद्ध विद्या सीख ली थी। माता के गर्भ में रहकर ही उसने चक्रव्यूह को भेदना सीखा था। लेकिन वह चक्रव्यूह को तोड़ना इसलिए सीख नहीं पाया क्योंकि जब इसकी शिक्षा दी जा रही थी तब उसकी मां सो गई थीं।

9) शांतनु-गंगा के पुत्र भीष्म का नाम देवव्रत था। उनको इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। वे स्वर्ग के आठ वसुओं में से एक थे जिन्होंने एक श्राप के चलते मनुष्य योनी में में जन्म लिया था।

10) दुर्योधन का शरीर वज्र के समान कठोर था, जिसे किसी धनुष या अन्य किसी हथियार से छेदा नहीं जा सकता था। लेकिन उसकी जांघ श्रीकृष्ण के छल के कारण प्राकृतिक ही रह गई थी। इस कारण भीम ने उसकी जांघ पर वार करके उसके शरीर के दो फाड़ कर दिए थे।

11) जरासंघ का शरीर दो फाड़ करने के बाद पुन: जुड़ जाता था। तब श्रीकृष्ण ने भीम को इशारों में समझाया की दो फाड़ करने के बाद दोनों फाड़ को एक दूसरे की विपरित दिशा में फेंक दिया जाए।

12) बलराम सबसे शक्तिशाली व्यक्ति थे। यदि वे महाभारत के युद्ध में शामिल होते तो सेना की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। दरअसल बलराम का संबंध दोनों ही पक्ष से घनिष्ठ था। बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है। कहते हैं कि जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब को बंदी बना लिया था तो बलराम ने अपने हल से हस्तिनापुर की धरती को हिलाकर चेताया था कि यदि समझौता नहीं किया तो इस नगरी को उखाड़कर फेंक दूंगा। दुर्योधन हर के इस भूकंप से डर गया था।

13) यह सुनने में अजीब है कि युद्ध के लिए अर्जुन के बेटे इरावन की बलि दी गई थी। बलि देने से पहले उसकी अंतमि इच्छा थी कि वह मरने से पहले शादी कर ले। लेकिन इस शादी के लिए कोई भी लड़की तैयार नहीं थी क्योंकि शादी के तुरंत बाद उसके पति को मरना था। इस स्थिति में भगवान कृष्ण ने मोहिनी का रूप लिया और इरावन से न केवल शादी की बल्कि एक पत्नी की तरह उसे विदा करते हुए रोए भी। यही इरावन आज देशभर के किन्नरों का देवता है।

14) एकलव्य का नाम तो सभी ने सुना होगा। एकलव्य अपनी विस्तारवादी सोच के चलते जरासंध से जा मिला था। जरासंध की सेना की तरफ से उसने मथुरा पर आक्रमण करके यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। इसका उल्लेख विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में मिलता है। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने एकलव्य को भी युद्ध करके निपटा दिया था अन्यथा वह महाभारत में कोहराम मचा देता। एकलव्य के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उसका पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठता है और वह कौरवों की सेना की ओर से पांडवों के खिलाफ लड़ता है। महाभारत युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा जाता है।

15) शकुनी भी मायावी था। उसके पासे उसकी ही बात मानते थे। युद्ध में शकुनी ने श्रीकृष्‍ण और अर्जुन को मोहित करते हुए उनके प्रति भयंकर तरीके से माया का प्रयोग किया था। शकुनी की माया से अर्जुन की ओर हजारों तरह के हिंसक पशु दौड़ने लगे थे। आसमान से लोगों के गोले और पत्थर गिरने लगे थे। कई तरह के अस्त्र शस्त्र सभी दिशाओं से आने लगे थे। अर्जुन इस माया जाल से कुछ समय के लिए तो घबरा गए थे लेकिन उन्होंने दिव्यास्त्र का प्रयोग कर इसको काट दिया था।

इसके अलावा भूरिश्रवा, सात्यकी, युयुत्सु, नरकासुर का पुत्र भगदत्त आदि कई अन्य योद्धा भी थे। इस तरह हमने देखा कि महाभारत में कई तरह के वि‍चित्र और मायावी योद्धा थे। उपर हमें कुछ खास योद्धाओं का ही वर्णन किया।

 

Posted in महाभारत - Mahabharat

आचार्य विकाश

महाभारत से सीखें सफलता पाने के 6 टिप्स
जीवन और करियर में सफलता पाने के लिए धार्मिक ग्रंथों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. जी हां, भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ महाभारत से स्टूडेंट काफी सीख सकते हैं.

जीवन और करियर में सफलता पाने के लिए भारत के धार्मिक ग्रंथ से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. जी हां, भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ महाभारत से स्टूडेंट काफी सीख ले सकते हैं.
महाभारत से सीखें सफलता पाने के 6 टिप्स
1. बुरी संगत हमेशा नुकसान दायक: हम सब ने महाभारत पढ़कर या सीरियल देखकर जरूर यह सोचा होगा कि शकुनी ने कौरवों की जिंदगी नर्क बना दी और उनका सब कुछ बर्बाद कर दिया जो भी उनका हो सकता था. शकुनी के माध्यम से स्टूडेंट के लिए यह सीख है कि वो हमेशा ऐसे लोगों से बचे जो अच्छे व्यवहार वाले नहीं होते हैं.

  1. बिना शर्तों के साथ रहने वाले दोस्त होते हैं अच्छे: भगवान कृष्ण ने पांडवों का साथ हर मुश्किल वक्त में देकर यह साबित कर दिया था कि दोस्त वही अच्छे होते हैं जो किसी भी परिस्थिति में आपके साथ रहते हैं. दोस्ती में शर्तों के लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए एक स्टूडेंट को भी ऐसे ही दोस्त अपने आस-पास रखने चाहिए जो हर मुश्किल परिस्थिति में उनका साथ दे सकता हो.

  2. जिदंगी में हर वक्त सीखते रहना: महाभारत का सबसे बड़ा योद्धा अर्जुन ने ना केवल अपने गुरू से सीख लिया बल्कि वह अपने अनुभवों से हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहे. यह सीख हर स्टूडेंट के लिए जरूरी है. स्टूडेंट को शिक्षक के अलावे अपनी गलतियों और असफलताओं से हमेशा सीखना चाहिए.

  3. अधूरे ज्ञान मतलब खतरे की घंटी: महाभारत में अभिमन्यू अपनी वीरता के लिए जाना जाता है लेकिन चक्रव्यूह भेदने के उनके अधूरे ज्ञान ने उन्हें मौत के मुंह में ढकेल दिया. स्टूडेंट को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि वह जो भी नॉलेज पाए उसे पूरा पाएं ना कि अधूरा, यह आपको कई बार परेशानी में डाल सकता है.

  4. सफलता पाने के लिए जुनूनी होना जरूरी: महाभारत के एकलव्य से ज्यादा जुनूनी हमें शायद ही कहीं और मिले. एकलव्य से हमें यह सीखना चाहिए कि सफलता उसी को मिलेगी जो जुनूनी होगा. स्टूडेंट के लिए एकलव्य एक अच्छा उदाहरण है.

  5. मास्टर स्ट्रैटजी: अगर पांडवों के पास भगवान कृष्ण की मास्टर स्ट्रैटजी ना होती तो शायद ही पांडव युद्ध में जीत पाते. इसलिए किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिए स्ट्रैटजी बनानी आवश्यक है.

Posted in महाभारत - Mahabharat

संजय गुप्ता

मित्रो आज हम आपको महाभारत की ये ग्यारह घटनाओं के बारे में बतायेंगे, कि ये घटनायें कहाँ कहाँ घटी?????

महाभारत में कई घटना, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत है, चाहे वह कौरव, पांडव, कर्ण और कृष्ण हो या धृष्टद्युम्न, शल्य, शिखंडी और कृपाचार्य हो। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं।

दरअसल, महाभारत की कहानी युद्ध के बाद समाप्त नहीं होती है। असल में महाभारत की कहानी तो युद्ध के बाद शुरू होती है, जो आज भी जारी है। जानकार जानते हैं कि वर्तमान युग महाभारत की ही देन है। खैर, हम आपको बताएंगे महाभारत से जुड़ी घटनाओं से जुड़े कुछ ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जहां आप कभी गए हों या नहीं भी गए हों।

पहला ऐतिहासक घटना स्थल महाभारत का युद्ध : – यह तो सभी जानते हैं कि महाभारत का युद्ध कुरुक्षे‍त्र में हुआ था। यह भी सभी जानते हैं कि भारतीय राज्य हरियाणा में स्थित है कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा महाभारत काल के कई अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनमें बाण और भाले प्रमुख हैं।

कुरुक्षेत्र की भूमि पर कई महान योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए थे। कुरूक्षेत्र ही वह स्थान है जहां पर भगवान श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन का मोहभंग करने के लिए उसे ‘गीता’ का ज्ञान दिया था।

कुरुक्षेत्र में प्राचीन कुआं आज भी देखा जा सकता है। माना जाता है क‌ि इसी जगह पर महाभारत युद्ध में कर्ण ने चक्रव्यूह की रचना करके अभ‌िमन्यु को धोखे से मारा था। जिससे वह वीरगति को प्राप्त हुआ था।

दूसरा ऐतिहासक घटना स्थल लाक्षागृह कांड : – शकुनी की नीति के तहत दुर्योधन ने पांडवों के रुकने के लिए एक ऐसा महल बनवाया था, जो लाख से बना थे जिसे बाद में लाक्षागृह कहा गया। लाख से बनी चुड़ियां तो आपने देखी ही होगी। यह लाख तेती से पिघलता है। दुर्योधन की योजना के अनुसार इस महल में रात में चुपचाप से आग लगा दी गई थी ताकि सोते हुए पांडवों की इस महल में ही जलकर मृत्यु हो जाए। किन्तु पांडवों के जासूसों ने उन्हें इस योजना की सूचना देदी और वे रात को ही एक गुप्त सुरंग से निकल भागे। ये सुरंग आज भी है, जो हिंडन नदी के किनारे पर खुलती है।

लाख से बनें महल के अवशेष आज भी बरनावा में पाए जाते हैं। यह बरनावा या वारणावत नामक स्थान मेरठ जिले में स्थित है। मेरठ से 35 और सरधना से 17 किलोमीटर दूर बागपत जिले में स्थित एक तहसील का नाम वारणावत है। यहां महाभारत कालीन लाक्षाग्रह चिन्हित है। लाक्षाग्रह नामक इमारत के अवशेष यहां आज एक टीले के रूप में दिखाई देते हैं।

लाक्षागृह से निकलने पर भटकते हुए पांडव वर्तमान नगालैंड में पहुंच गए थे। वहां पर राक्षसी ह‌िड‌िंबा संग भीम का विवाह हुआ था तत्पश्चात उनका घटोत्कच नामक पुत्र हुआ। जोकि भीम के समान ही बलशाली था। भीम अपने पुत्र के साथ जिन गो‌‌ट‌ियों से शतरंज खेला करते थे। वह आज भी नागालैंड के द‌िमापुर में देखी जा सकती हैं।

तीसरा ऐतिहासक घटना स्थल भीम नहीं उठा पाएं थे हनुमानजी की पूंछ : – सभी को यह घटन तो मालूम ही होगी की बलशाली भीम हनुमानजी की पूंछ नहीं उठा पाए थे। कुछ विद्वान मानते हैं कि यह घटना गंधमादन पर्वत पर घटी थी। हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था।

आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए। संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे।

हालांकि कुछ विद्वानों अनुसार उत्तराखंड में जोशीमठ से लगभग 25 क‌िलोम‌‌ीटर दूर हनुमान चट्टी है। यहां भीम और हनुमानजी की भेंट हुई थी और हनुमानजी ने भीम को महाभारत युद्ध में व‌िजयी होने का आशीष द‌िया था।

चौथा ऐतिहासक घटना स्थल बर्बरीक का सिर काटकर यहां रखा था : – भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के बारे में सभी जानते हैं कि वह मात्र तीन बाण ही लेकर युद्ध क्षे‍त्र में लड़ने जा रहे थे।

इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के भेष में उनसे दान में उनका शीश मांग लिया था। दान के पश्चात्‌ श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। बर्बरीक ने श्रीकृष्‍ण के समक्ष एक यह इच्छा भी व्यक्त की कि मैं यह युद्ध देखना चाहता हूं तब श्रीकृष्ण ने उसकी इच्छा से उस शीश को श्रीकृष्ण ने एक स्थान पर रखवा दिया लेकिन वह जिधर भी देखता उधर की सेना का सफाया हो जाता ऐसे में श्रीकृष्‍ण ने उसके शीश को दूर एक स्थान पर रखवा दिया।

आज उस स्थान को खाटू श्याम का स्थान कहा जाता है। श्रीकृष्ण के वरदान स्वरूप ही उनकी पूजा श्याम रूप में की जाती है। राजस्थान के शेखावाटी के सीकर जिले में स्थित है परमधाम खाटू। खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन वर्तमान मं‍दिर की आधारशिला सन 1720 में रखी गई थी। इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा के मुताबिक सन 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था।

पांचवां ऐतिहासक घटना स्थल सिंधु घाटी के नगर क्यों हो गए नष्ट?

महाभारत का युद्ध आज से लगभग 5,300 वर्ष पूर्व हुआ था। उस दौरान गुरु द्रोण के पुत्र अश्‍वत्थामा ने भगवान कृष्ण के मना करने के बावजूद ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाना तो जानता था, पर उसे लौटाना नहीं जानता था।

उस अतिप्रचंड तेजोमय अग्नि को अपनी ओर आता देख अर्जुन भयभीत हो गया और उसने श्रीकृष्ण से विनती की। श्रीकृष्ण बोले, ‘है अर्जुन! तुम्हारे भय से व्याकुल होकर अश्वत्थामा ने यह ब्रह्मास्त्र तुम पर छोड़ा है। इस ब्रह्मास्त्र से तुम्हारे प्राण घोर संकट में हैं। इससे बचने के लिए तुम्हें भी अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा, क्योंकि अन्य किसी अस्त्र से इसका निवारण नहीं हो सकता।’

कहते हैं कि अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, प्रत्युत्तर में अर्जुन ने भी छोड़ा। अश्वत्थामा ने पांडवों के नाश के लिए छोड़ा था और अर्जुन ने उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए। दोनों द्वारा छोड़े गए इस ब्रह्मास्त्र के कारण लाखों लोगों की जान चली गई थी।

आज जिस हिस्से को पाकिस्तान और अफगानिस्तान कहा जाता है, महाभारतकाल में उसके उत्तरी हिस्से को गांधार, मद्र, कैकय और कंबोज की स्थली कहा जाता था। अयोध्या और मथुरा से लेकर कंबोज (अफगानिस्तान का उत्तर इलाका) तक आर्यावर्त के बीच वाले खंड में कुरुक्षेत्र होता था, जहां यह युद्ध हुआ। उस काल में कुरुक्षेत्र बहुत बड़ा क्षेत्र होता था। आजकल यह हरियाणा का एक छोटा-सा क्षेत्र है।

उस काल में सिन्धु और सरस्वती नदी के पास ही लोग रहते थे। सिन्धु और सरस्वती के बीच के क्षेत्र में कुरु रहते थे। यहीं सिन्धु घाटी की सभ्यता और मोहनजोदड़ो के शहर बसे थे, जो मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी तक फैले थे।

सिन्धु घाटी सभ्यता के मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि स्थानों की प्राचीनता और उनके रहस्यों को आज भी सुलझाया नहीं जा सका है। मोहन जोदड़ो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है।

जब पुरातत्वशास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोहन जोदड़ो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्होंने देखा कि वहां की गलियों में नरकंकाल पड़े थे। कई अस्थिपंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थिपंजरों ने एक-दूसरे के हाथ इस तरह पकड़ रखे थे, मानो किसी विपत्ति ने उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुंचा दिया था।

उन नरकंकालों पर उसी प्रकार की रेडियो एक्टिविटी के चिह्न थे, जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गए थे। मोहन जोदड़ो स्थल के अवशेषों पर नाइट्रिफिकेशन के जो चिह्न पाए गए थे, उसका कोई स्पष्ट कारण नहीं था, क्योंकि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है।

छठा ऐतिहासक घटना स्थल भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्म स्थल : – उत्तर प्रदेश में स्थित मथुरा नगरी भगवान श्रीकृष्ण की जन्म स्थली होने के कारण यह महाभारत की घटनाओं का प्रमुख केंद्र रहा है। महाभारत काल में इस नगरी पर जरासंध ने कई आक्रमण किए थे।

जिस स्थान पर कंस रहता था उस स्थान को कंस के क‌िले के नाम से जाना जाता है। कंस के आतंक को रोकने के लिए विष्णु भगवान ने श्रीकृष्‍ण अवतार लेना था। कंस उनके इस अवतार को रोकने और अवतार उपरांत उन्हें मारने का षड‍्यंत्र इसी कीले में रचता था। यह किला भी मुथरा में आज भी है।

सातवां ऐतिहासक घटना स्थल व्यास पोथी : -व्यास पोथी नामक स्थान बद्रीनाथ से 3 क‌िलोमीटर की दूरी पर उत्तराखंड के माणा गांव में स्थित है। यहां महाभारत के रचनाकार महर्षि वेद व्यासजी की गुफा है। इसके समीप ही गणेश गुफा है, मान्यता है की इसी गुफा में व्यासजी ने महाभारत को मौखिक रूप दिया था और गणेशजी ने उसे लिखा था।

माना जाता है की उत्तराखंड में अवस्थित पांडुकेश्वर तीर्थ में अपनी इच्छा से राज्य त्याग करने के बाद महाराज पांडु अपनी रानियों कुंती और मादरी संग निवास करते थे। इसी स्थान पर पांचों पांडवों का जन्म हुआ था।

आठवां ऐतिहासिक घटना स्थल जरासंध का अखाड़ा : – ब‌िहार के राजगृह में अवस्‍थ‌ित है कंस के ससुर जरासंध का अखाड़ा। जरासंध बहुत बलवान था। मान्यता है की इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्‍ण के इशारे पर भीम ने उसका वध क‌िया था।

राजगृह को राजगीर कहा जाता है। रामायण के अनुसार ब्रह्मा के चौथे पुत्र वसु ने ‘गिरिव्रज’ नाम से इस नगर की स्थापना की। बाद में कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले वृहद्रथ ने इस पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया। वृहद्रथ अपनी शूरता के लिए मशहूर था।

नौवां ऐतिहासिक घटना स्थल अर्जुन गुफा : -कहते हैं कौरवों से अपना राज्य हारने के बाद भगवान श्रीकृष्‍ण के कहने पर अर्जुन मनाली के प‌िरनी में तप करने चले गए थे। उस स्थान को अर्जुन गुफा के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर भगवान शिव ने अर्जुन को पशुपताशस्‍त्र द‌िया था।

मनाली भारत के हिमाचल प्रदेश का एक शहर है। मनाली कुल्लु घाटी के उत्तर में स्थित लोकप्रिय हिल स्टेशन और पर्यटन स्‍थल है। पौराणिक ग्रंथों में मनाली को मनु का घर कहा गया है। कहा जाता है कि जब सारा संसार प्रलय में डूब गया था तो एकमात्र मनु की जीवित बचे थे। मनाली में आकर ही उन्होनें मनुष्य की पुर्नरचना की। इसलिए मनाली को हिन्दुओं का पवित्र तीर्थस्थल भी माना जाता है। इसके अलावा मनाली में हिन्दू गाथाओं से जुड़े और भी कई प्राचीन स्थल है।

दसवां ऐतिहासिक घटना स्थल हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ : – दिल्ली को उस काल में इंद्रप्रस्थ कहा जाता था और मेरठ को हस्तीनापुर। दिल्ली में पुराना किला इस बात का सबूत है। खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर पुरातत्वविदों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि पांडवों की राजधानी इसी स्थल पर रही होगी। दिल्ली कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है।

पुराना किला दिल्ली में यमुना नदी के पास स्थित है, जिसे पांडवों ने बनवाया था। बाद में इसका पुनरोद्धार होता रहा। महाभारत के अनुसार यह पांडवों की राजधानी थी। दूसरी ओर कुरु देश की राजधानी गंगा के किनारे हस्तिनापुर में स्थित थी।

ग्यारहवां ऐतिहासिक घटना स्थल द्वारिका : -कहते हैं कि महाभारत युद्ध के पश्चात द्वारिका पर अंजान शक्तियों ने हमला किया था जिसके चलते वह नष्ट हो गई थी और कालांतर में यह समुद्र में डूब गई थी। द्वारिका उस काल में महाभारत काल का प्रमुख केंद्र हुआ करता था जो कई प्राचीन और ऐतिहासिक घटनाओं का केंद्र था।

गुजरात के पश्चिमी तट पर समुद्र में डूबे 7000-3500 वर्ष पुराने शहर खोजे गए हैं, जिनको महाभारत में वर्णित द्वारका के सन्दर्भों से जोड़ा गया है। हालांकि द्वारिका पर पहले प्राचीन शहर कुशस्थली था। ययाति ने यह संपूर्ण क्षेत्र अपने पुत्र यदु को सौंपा था। इसीलिए श्रीकृष्ण अपने अट्ठारह कुल के बंधु बांधवों के लेकर द्वारिका में बस गए थे।

Posted in महाभारत - Mahabharat

महाभारत में वर्णित ये पेंतीस नगर आज भी मौजूद हैं!!!!!

भारत देश महाभारतकाल में कई बड़े जनपदों में बंटा हुआ था। हम महाभारत में वर्णित जिन 35 राज्यों और शहरों के बारे में जिक्र करने जा रहे हैं, वे आज भी मौजूद हैं। आप भी देखिए।

  1. गांधार,,,आज के कंधार को कभी गांधार के रूप में जाना जाता था। यह देश पाकिस्तान के रावलपिन्डी से लेकर सुदूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वहां के राजा सुबल की पुत्री थीं। गांधारी के भाई शकुनी दुर्योधन के मामा थे।
  2. तक्षशिला,,,तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी। इसे वर्तमान में रावलपिन्डी कहा जाता है। तक्षशिला को ज्ञान और शिक्षा की नगरी भी कहा गया है।

  3. केकय प्रदेश,,, जम्मू-कश्मीर के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में केकय प्रदेश के रूप में है। केकय प्रदेश के राजा जयसेन का विवाह वसुदेव की बहन राधादेवी के साथ हुआ था। उनका पुत्र विन्द जरासंध, दुर्योधन का मित्र था। महाभारत के युद्ध में विन्द ने कौरवों का साथ दिया था।

  4. मद्र देश,,,केकय प्रदेश से ही सटा हुआ मद्र देश का आशय जम्मू-कश्मीर से ही है। एतरेय ब्राह्मण के मुताबिक, हिमालय के नजदीक होने की वजह से मद्र देश को उत्तर कुरू भी कहा जाता था। महाभारत काल में मद्र देश के राजा शल्य थे, जिनकी बहन माद्री का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था। नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र थे।

  5. उज्जनक,,,आज के नैनीताल का जिक्र महाभारत में उज्जनक के रूप में किया गया है। गुरु द्रोणचार्य यहां पांडवों और कौरवों की अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देते थे। कुन्ती पुत्र भीम ने गुरु द्रोण के आदेश पर यहां एक शिवलिंग की स्थापना की थी। यही वजह है कि इस क्षेत्र को भीमशंकर के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव का एक विशाल मंदिर है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह शिवलिंग 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है।

  6. शिवि देश,,,महाभारत काल में दक्षिण पंजाब को शिवि देश कहा जाता था। महाभारत में महाराज उशीनर का जिक्र है, जिनके पौत्र शैव्य थे। शैव्य की पुत्री देविका का विवाह युधिष्ठिर से हुआ था। शैव्य एक महान धनुर्धारी थे और उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों का साथ दिया था।

  7. वाणगंगा,,,कुरुक्षेत्र से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वाणगंगा। कहा जाता है कि महाभारत की भीषण लड़ाई में घायल पितामह भीष्म को यहां सर-सैय्या पर लिटाया गया था। कथा के मुताबिक, भीष्ण ने प्यास लगने पर जब पानी की मांग की तो अर्जुन ने अपने वाणों से धरती पर प्रहार किया और गंगा की धारा फूट पड़ी। यही वजह है कि इस स्थान को वाणगंगा कहा जाता है।

  8. कुरुक्षेत्र,,,हरियाणा के अम्बाला इलाके को कुरुक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यहां महाभारत की प्रसिद्ध लड़ाई हुई थी। यही नहीं, आदिकाल में ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ का आयोजन किया था। इस स्थान पर एक ब्रह्म सरोवर या ब्रह्मकुंड भी है। श्रीमद् भागवत में लिखा हुआ है कि महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंश के अन्य सदस्यों के साथ इस सरोवर में स्नान किया था।

  9. हस्तिनापुर,,,महाभारत में उल्लिखित हस्तिनापुर का इलाका मेरठ के आसपास है। यह स्थान चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। सही मायने में महाभारत युद्ध की पटकथा यहीं लिखी गई थी। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने हस्तिनापुर को अपने राज्य की राजधानी बनाया।

  10. वर्नावत,,,यह स्थान भी उत्तर प्रदेश के मेरठ के नजदीक ही माना जाता है। वर्णावत में पांडवों को छल से मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। यह स्थान गंगा नदी के किनारे है। महाभारत की कथा के मुताबिक, इस ऐतिहासिक युद्ध को टालने के लिए पांडवों ने जिन पांच गांवों की मांग रखी थी, उनमें एक वर्णावत भी था। आज भी यहां एक छोटा सा गांव है, जिसका नाम वर्णावा है।

  11. पांचाल प्रदेश,,,हिमालय की तराई का इलाका पांचाल प्रदेश के रूप में उल्लिखित है। पांचाल के राजा द्रुपद थे, जिनकी पुत्री द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। द्रौपदी को पांचाली के नाम से भी जाना जाता है।

  12. इन्द्रप्रस्थ,,,मौजूदा समय में दक्षिण दिल्ली के इस इलाके का वर्णन महाभारत में इन्द्रप्रस्थ के रूप में है। कथा के मुताबिक, इस स्थान पर एक वियावान जंगल था, जिसका नाम खांडव-वन था। पांडवों ने विश्वकर्मा की मदद से यहां अपनी राजधानी बनाई थी। इन्द्रप्रस्थ नामक छोटा सा कस्बा आज भी मौजूद है।

  13. वृन्दावन,,,यह स्थान मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर है। वृन्दावन को भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं के लिए जाना जाता है। यहां का बांके-बिहारी मंदिर प्रसिद्ध है।

  14. गोकुल,,यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह स्थान भी मथुरा से करीब 8 किलोमीटर दूर है। कंस से रक्षा के लिए कृष्ण के पिता वसुदेव ने उन्हें अपने मित्र नंदराय के घर गोकुल में छोड़ दिया था। कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम गोकुल में साथ-साथ पले-बढ़े थे।

  15. बरसाना,,,यह स्थान भी उत्तर प्रदेश में है। यहां की चार पहाड़ियां के बारे में कहा जाता है कि ये ब्रह्मा के चार मुख हैं।

  16. मथुरा,,,यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह प्रसिद्ध शहर हिन्दू धर्म के लिए अनुयायियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। यहां राजा कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यहीं पर श्रीकृष्ण ने बाद में कंस की हत्या की थी। बाद में कृष्ण के पौत्र वृजनाथ को मथुरा की राजगद्दी दी गई।

  17. अंग देश,,,वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इलाके का उल्लेख महाभारत में अंगदेश के रूप में है। दुर्योधन ने कर्ण को इस देश का राजा घोषित किया था। मान्यताओं के मुताबिक, जरासंध ने अंग देश दुर्योधन को उपहारस्वरूप भेंट किया था। इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है।

  18. कौशाम्बी,,,कौशाम्बी वत्स देश की राजधानी थी। वर्तमान में इलाहाबाद के नजदीक इस नगर के लोगों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। बाद में कुरुवंशियों ने कौशाम्बी पर अपना अधिकार कर लिया। परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया।

  19. काशी,,,महाभारत काल में काशी को शिक्षा का गढ़ माना जाता था। महाभारत की कथा के मुताबिक, पितामह भीष्म काशी नरेश की पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका को जीत कर ले गए थे ताकि उनका विवाह विचित्रवीर्य से कर सकें। अम्बा के प्रेम संबंध राजा शल्य के साथ थे, इसलिए उसने विचित्रवीर्य से विवाह से इन्कार कर दिया। अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया गया। विचित्रवीर्य के अम्बा और अम्बालिका से दो पुत्र धृतराष्ट्र और पान्डु हुए। बाद में धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाए और पान्डु के पांडव।

  20. एकचक्रनगरी,,,,वर्तमान कालखंड में बिहार का आरा जिला महाभारत काल में एकचक्रनगरी के रूप में जाना जाता था। लाक्षागृह की साजिश से बचने के बाद पांडव काफी समय तक एकचक्रनगरी में रहे थे। इस स्थान पर भीम ने बकासुर नामक एक राक्षक का अन्त किया था। महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया था, उस समय बकासुर के पुत्र ने भीषक ने उनका घोड़ा पकड कर रख लिया था। बाद में वह अर्जुन के हाथों मारा गया।

  21. मगध,,,दक्षिण बिहार में मौजूद मगध जरासंध की राजधानी थी। जरासंध की दो पुत्रियां अस्ती और प्राप्ति का विवाह कंस से हुआ था। जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब वह अनायास ही जरासंध के दुश्मन बन बैठे। जरासंध ने मथुरा पर कई बार हमला किया। बाद में एक मल्लयुद्ध के दौरान भीम ने जरासंध का अंत किया। महाभारत के युद्ध में मगध की जनता ने पांडवों का समर्थन किया था।

  22. पुन्डरू देश,,,मौजूदा समय में बिहार के इस स्थान पर राजा पोन्ड्रक का राज था। पोन्ड्रक जरासंध का मित्र था और उसे लगता था कि वह कृष्ण है। उसने न केवल कृष्ण का वेश धारण किया था, बल्कि उसे वासुदेव और पुरुषोत्तम कहलवाना पसन्द था। द्रौपदी के स्वयंवर में वह भी मौजूद था। कृष्ण से उसकी दुश्मनी जगजाहिर थी। द्वारका पर एक हमले के दौरान वह भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

  23. प्रागज्योतिषपुर,,,गुवाहाटी का उल्लेख महाभारत में प्रागज्योतिषपुर के रूप में किया गया है। महाभारत काल में यहां नरकासुर का राज था, जिसने 16 हजार लड़कियों को बन्दी बना रखा था। बाद में श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया और सभी 16 हजार लड़कियों को वहां से छुड़ाकर द्वारका लाए। उन्होंने सभी से विवाह किया। मान्यता है कि यहां के प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर को नरकासुर ने बनवाया था।

  24. कामख्या,,,गुवाहाटी से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कामख्या एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। भागवत पुराण के मुताबिक, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर बदहवाश इधर-उधर भाग रहे थे, तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के कई टुकड़े कर दिए। इसका आशय यह था कि भगवान शिव को सती के मृत शरीर के भार से मुक्ति मिल जाए। सती के अंगों के 51 टुकड़े जगह-जगह गिरे और बाद में ये स्थान शक्तिपीठ बने। कामख्या भी उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है।

  25. मणिपुर,,,नगालैन्ड, असम, मिजोरम और वर्मा से घिरा हुआ मणिपुर महाभारत काल से भी पुराना है। मणिपुर के राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। इस विवाह से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम था बभ्रुवाहन। राजा चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बभ्रुवाहन को यहां का राजपाट दिया गया। बभ्रुवाहन ने युधिष्ठिर द्वारा आयोजित किए गए राजसूय यज्ञ में भाग लिया था।

  26. सिन्धु देश,,,सिन्धु देश का तात्पर्य प्राचीन सिन्धु सभ्यता से है। यह स्थान न केवल अपनी कला और साहित्य के लिए विख्यात था, बल्कि वाणिज्य और व्यापार में भी यह अग्रणी था। यहां के राजा जयद्रथ का विवाह धृतराष्ट्र की पुत्री दुःश्शाला के साथ हुआ था। महाभारत के युद्ध में जयद्रथ ने कौरवों का साथ दिया था और चक्रव्युह के दौरान अभिमन्यू की मौत में उसकी बड़ी भूमिका थी।

  27. मत्स्य देश,,,राजस्थान के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में मत्स्य देश के रूप में है। इसकी राजधानी थी विराटनगरी। अज्ञातवास के दौरान पांडव वेश बदल कर राजा विराट के सेवक बन कर रहे थे। यहां राजा विराट के सेनापति और साले कीचक ने द्रौपदी पर बुरी नजर डाली थी। बाद में भीम ने उसकी हत्या कर दी। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यू का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा के साथ हुआ था।

  28. मुचकुन्द तीर्थ,,,यह स्थान धौलपुर, राजस्थान में है। मथुरा पर जीत हासिल करने के बाद कालयावन ने भगवान श्रीकृष्ण का पीछा किया तो उन्होंने खुद को एक गुफा में छुपा लिया। उस गुफा में मुचकुन्द सो रहे थे, उन पर कृष्ण ने अपना पीताम्बर डाल दिया। कृष्ण का पीछा करते हुए कालयावन भी उसी गुफा में आ पहुंचा। मुचकुन्द को कृष्ण समझकर उसने उन्हें जगा दिया। जैसे ही मुचकुन्द ने आंख खोला तो कालयावन जलकर भस्म हो गया। मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांडव हिमालय की तरफ चले गए और कृष्ण गोलोक निवासी हो गए, तब कलयुग ने पहली बार यहां अपने पग रखे थे।

  29. पाटन,,,महाभारत की कथा के मुताबिक, गुजरात का पाटन द्वापर युग में एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र था। पाटन के नजदीक ही भीम ने हिडिम्ब नामक राक्षस का संहार किया था और उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया। हिडिम्बा ने बाद में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम था घटोत्कच्छ। घटोत्कच्छ और उनके पुत्र बर्बरीक की कहानी महाभारत में विस्तार से दी गई है।

  30. द्वारका,,,माना जाता है कि गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित यह स्थान कालान्तर में समुन्दर में समा गया। कथाओं के मुताबिक, जरासंध के बार-बार के हमलों से यदुवंशियों को बचाने के लिए कृष्ण मथुरा से अपनी राजधानी स्थानांतरित कर द्वारका ले गए।

  31. प्रभाष,,,गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण का निवास-स्थान रहा है। महाभारत कथा के मुताबिक, यहां भगवान श्रीकृष्ण पैर के अंगूठे में तीर लगने की वजह से घायल हो गए थे। उनके गोलोकवासी होने के बाद द्वारका नगरी समुन्दर में डूब गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि समुन्दर के सतह पर द्वारका नगरी के अवेशष मिले हैं।

  32. अवन्तिका,,मध्यप्रदेश के उज्जैन का उल्लेख महाभारत में अवन्तिका के रूप में मिलता है। यहां ऋषि सांदपनी का आश्रम था। अवन्तिका को देश के सात प्रमुख पवित्र नगरों में एक माना जाता है। यहां भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में एक महाकाल लिंग स्थापित है।

  33. चेदी,,,वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र को महाभारत काल में चेदी देश के रूप में जाना जाता था। गंगा व नर्मदा के मध्य स्थित चेदी महाभारत काल के संपन्न नगरों में एक था। इस राज्य पर श्रीकृष्ण के फुफेरे भाई शिशुपाल का राज था। शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचा लिया।

इस घटना की वजह से शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच संबंध खराब हो गए। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय चेदी नरेश शिशुपाल को भी आमंत्रित किया गया था। शिशुपाल ने यहां कृष्ण को बुरा-भला कहा, तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। महाभरत की कथा के मुताबिक, दुश्मनी की बात सामने आने पर श्रीकृष्ण की बुआ उनसे शिशुपाल को अभयदान देने की गुजारिश की थी। इस पर श्रीकृष्ण ने बुआ से कहा था कि वह शिशुपाल के 100 अपराधों को माफ कर दें, लेकिन 101वीं गलती पर माफ नहीं करेंगे।

  1. सोणितपुर,,,मध्यप्रदेश के इटारसी को महाभारत काल में सोणितपुर के नाम से जाना जाता था। सोणितपुर पर वाणासुर का राज था। वाणासुर की पुत्री उषा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ सम्पन्न हुआ था। यह स्थान हिन्दुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ है।
  • विदर्भ,,,महाभारतकाल में विदर्भ क्षेत्र पर जरासंध के मित्र राजा भीष्मक का शासन था। रुक्मिणी भीष्मक की पुत्री थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचाया था। यही वजह थी कि भीष्मक उन्हें अपना शत्रु मानने लगे। जब पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ किया था, तब भीष्मक ने उनका घोड़ा रोक लिया था। सहदेव ने भीष्मक को युद्ध में हरा दिया

  • संजय गुप्ता