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महान धनुर्धर एकलव्य की अनसुनी कथा जो आपका ज्ञानवर्द्धन करेगी!!!!!!

एकलव्य महाभारत का एक पात्र है। वह हिरण्य धनु नामक निषाद का पुत्र था। एकलव्य को अप्रतिम लगन के साथ स्वयं सीखी गई धनुर्विद्या और गुरुभक्ति के लिए जाना जाता है।

मित्रों अक्सर एक झूठ फैलाया जाता है कि गुरु द्रोण ने एकलव्य का अंगूठा इसलिये मांग लिया था कि क्योंकि वो एक शूद्र था । जबकि ऐसा बिल्क नही है आज मैं आप सबको एकलव्य की असली कहानी बता रहा हूँ जो शायद आपने नही सुनी होगी क्योंकि इस कहानी को अक्सर कथावाचकों द्वारा न तो सुनाया जाता है और न ही इस पर कोई लिखता है । खैर छोड़िए हम आपको बताते हैं आली कहानी ।

महाभारत काल मेँ प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश मेँ सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्योँ के समकक्ष थी। निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी।

निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के स्नेहांचल से जनता सुखी व सम्पन्न थी। राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था। निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम “अभिद्युम्न” रखा गया। प्राय: लोग उसे “अभय” नाम से बुलाते थे। पाँच वर्ष की आयु मेँ अभिद्युम्न की शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरूकुल मेँ की गई। गुरुकुल में ही गुरुओं ने इसकी सीखने की क्षमता को देखकर इसको नया नाम दिया एकलव्य ।

एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दिया। एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। उस समय धनुर्विद्या मेँ गुरू द्रोण की ख्याति थी। एकलव्य ने अपने पिता से गुरु द्रोण के पाया धनुर्विद्या सीखने की बात कही तो पिता तो कहा गुरु द्रोण शत्रु राज्य के राजगुरु हैं और उन्होंने भीष्म को वचन भी दिया हुआ है कि वो हस्तिनापुर के राजकुमारों के सिवा किसी को शिक्षा नही देंगे । वो एक ब्राह्मण हैं इसलिए अपने वचन से नही हटेंगे वो तुम्हे शिक्षा नही देंगे । लेकिन एकलव्य जिद करके हठपूर्वक घर से गुरु द्रोण से शिक्षा प्राप्त करने निकल पड़ा ।

गुरु द्रोण के आश्रम आकर उसने स्वयं का परिचय देकर और अपनी अभिमान पूर्वक अपनी योग्यता बताकर गुरु द्रोण से शिक्षा देने की बात कही । जिसे गुरु द्रोण ने वचन बंधे होने की बात कहकर मना दिया । बार बार कहने पर भी गुरु द्रोण नही माने तो उसने आश्रम के पास छिपकर हस्तिनापुर के राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते गुरु द्रोण को देखते हुए धनुर्विद्या सीखता रहा ।

और फिर एक दिन गुरु द्रोण जंगल भ्रमण को अपने शिष्यों के साथ निकले । एकलव्य भी पीछे पीछे उनके साथ गया । गुरु द्रोण के साथ गए कुत्ते ने उसे देख लिया और वो भौकने लगा । कुत्ते को चुप कराने के लिए एकलव्य ने कुत्ते का मुंह बाणों से बंद कर दिया । ये देखकर गुरु द्रोण स्तब्ध रह गए क्योंकि उस समय मे ऐसा कोई दूसरा गुरु था ही नही जो ऐसी शिक्षा दे सकता हो ।

गुरु द्रोण ने एकलव्य से उसके गुरु का नाम पूछा तो उसने उन्हें ही अपना गुरु बताया और साथ ही ये झूठ भी बोला कि उसने गुरु द्रोण की प्रतिमा बनाकर ये धनुर्विद्या सीखी । गुरु द्रोण समझ गए कि इसने छिपकर सारी धनुर्विद्या सीखी है ।

एकलव्य ने गुरु द्रोण से गुरु दक्षिणा मांगने का आग्रह किया तो द्रोण ने उससे छलपुर्वक सीखी गई विद्या को नष्ट करने के लिए उसका अंगूठा ही मांग लिया जिसे उसने काटकर दे दिया । इससे ही गुरु ने प्रसन्न होकर उसे बगैर अंगूठे के ही धनुष बाण चलाने की विद्या का दान दिया इस शर्त पर कि इसका प्रयोग कभी भी वो हस्तिनापुर पर नही करेगा।

अपने पिता की मृत्यु के बाद एकलव्य शाशक बना जिसने अपने राज्य का खूब प्रसार किया । आसपास के सभी छोटे राज्यों को अपने मे मिला लिया । बचन बद्ध होने के कारण हस्तिनापुर पर कभी आक्रमण नही कर पाया लेकिन विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में उल्लिखित है कि निषाद वंश का राजा बनने के बाद एकलव्य ने जरासंध की सेना की तरफ से मथुरा पर आक्रमण कर यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था।

यादव वंश में हाहाकर मचने के बाद जब कृष्ण ने दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखा तो उन्हें इस दृश्य पर विश्वास ही नहीं हुआ। और उन्हें स्वयं युद्धभूमि में आकर उसके साथ युद्ध करना पड़ा जिसमे वो मारा गया।

उसकी मृत्यु के बाद एकलव्य का पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठता है और वह कौरवों की सेना की ओर से पांडवों के खिलाफ लड़ता है। महाभारत युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा जाता है।

कुछ कथाएं और सामने आती हैं जिनमे कहा गया है कि एकलव्य निषदराज का दत्तक पुत्र था असल में वो श्रीकृष्ण के यदुवंश से था जिसे किसी ज्योतिषीय भविष्यवाणी के अनुसार निषदराज को दे दिया गया था।

एकलव्य का युद्ध करते हुए मारा जाना और उसके पुत्र का महाभारत के युद्ध में भाग लेना ये सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शूद्रों को भी बराबर का अधिकार था ।
वामपंथियों ने गलत तथ्य फैलाकर हिन्दू धर्म को तोड़ने का कुचक्र रचा है।

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सभी से निवेदन है तथ्यों की सही से जांच करें । हिंदुत्व के चार स्तम्भ में से एक भी कमजोर हुआ तो हिंदुत्व कमजोर होगा फिलहाल निशाना चतुर्थ स्तम्भ को बनाया जा रहा। सचेत रहें सतर्क रहें।

संजय गुप्ता

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भगवान कृष्ण की (16108 ).स्त्रियों से विवाह.
कहते हैं कि भगवान कृष्ण की 16,108 पत्नियां थीं। क्या यह सही है? इस संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं और लोगों में इसको लेकर जिज्ञासा भी है। आइए, जानते हैं कि कृष्ण की 16,108 पत्नियां होने के पीछे राज क्या है।
महाभारत अनुसार कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह किया था। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि भगवान कृष्ण से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। रुक्मणि के पांच भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मणि सर्वगुण संपन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किंतु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। यह कारण था कि कृष्ण को रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा।
पांडवों के लाक्षागृह से कुशलतापूर्वक बच निकलने पर सात्यिकी आदि यदुवंशियों को साथ लेकर श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने के लिए इंद्रप्रस्थ गए। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और कुंती ने उनका आतिथ्य पूजन किया।
इस प्रवास के दौरान एक दिन अर्जुन को साथ लेकर भगवान कृष्ण वन विहार के लिए निकले। जिस वन में वे विहार कर रहे थे वहां पर सूर्य पुत्री कालिन्दी, श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थी। कालिन्दी की मनोकामना पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण ने उसके साथ विवाह कर लिया।
फिर वे एक दिन उज्जयिनी की राजकुमारी मित्रबिन्दा को स्वयंवर से वर लाए। उसके बाद कौशल के राजा नग्नजित के सात बैलों को एकसाथ नाथ कर उनकी कन्या सत्या से पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात उनका कैकेय की राजकुमारी भद्रा से विवाह हुआ। भद्रदेश की राजकुमारी लक्ष्मणा भी कृष्ण को चाहती थी, लेकिन परिवार कृष्ण से विवाह के लिए राजी नहीं था तब लक्ष्मणा को श्रीकृष्ण अकेले ही हरकर ले आए।
इस तरह कृष्ण की आठों पत्नियां थी रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा।
इसके बाद कैसे और क्यों किया कृष्ण ने 16,100 स्त्रियों से विवाह…
कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, ‘हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। क्रूर भौमासुर ने वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीन ली है और वह त्रिलोक विजयी हो गया है।
इंद्र ने कहा, भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुन्दरी कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा है। कृपया आप हमें बचाइए प्रभु।
इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।
मुर दैत्य के वध हो जाने का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला।
इस प्रकार भौमासुर को मारकर श्रीकृष्ण ने उसके पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसे प्रागज्योतिष का राजा बनाया। भौमासुर के द्वारा हरण कर लाई गईं 16,100कन्याओं को श्रीकृष्ण ने मुक्त कर दिया।
ये सभी अपहृत नारियां थीं या फिर भय के कारण उपहार में दी गई थीं और किसी और माध्यम से उस कारागार में लाई गई थीं। वे सभी भौमासुर के द्वारा पीड़ित थीं, दुखी थीं, अपमानित, लांछित और कलंकित थीं।
सामाजिक मान्यताओं के चलते भौमासुर द्वारा बंधक बनकर रखी गई इन नारियों को कोई भी अपनाने को तैयार नहीं था, तब अंत में श्रीकृष्ण ने सभी को आश्रय दिया और उन सभी कन्याओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। उन सभी को श्रीकृष्ण अपने साथ द्वारिकापुरी ले आए। वहां वे सभी कन्याएं स्वतंत्रपूर्वक अपनी इच्छानुसार सम्मानपूर्वक रहती थीं।
कौन था भौमासुर जिसे नरकासुर भी कहा जाता था…
भागवत पुराण में बताया गया है कि भौमासुर भूमि माता का पुत्र था। विष्णु ने वराह अवतार धारण कर भूमि देवी को समुद्र से निकाला था। इसके बाद भूमि देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पिता एक दैवीशक्ति और माता पुण्यात्मा होने पर भी पर भौमासुर क्रूर निकला। वह पशुओं से भी ज्यादा क्रूर और अधमी था। उसकी करतूतों के कारण ही उसे नरकासुर कहा जाने लगा।
नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का दैत्यराज था जिसने इंद्र को हराकर इंद्र को उसकी नगरी से बाहर निकाल दिया था। नरकासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे थे। वह वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर त्रिलोक विजयी हो गया था। वह पृथ्वी की हजारों सुन्दर कन्याओं का अपहरण कर उनको बंदी बनाकर उनका शोषण करता था।
नरकासुर अपने मित्र मुर और मुर दैत्य के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण के साथ रहता था। भगवान कृष्ण ने सभी का वध करने के बाद नरकासुर का वध किया और उसके एक पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसका राजतिलक किया।
श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर किया था। इसी दिन की याद में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाने लगी। मान्यता है कि नरकासुर की मृत्यु होने से उस दिन शुभ आत्माओं को मुक्ति मिली थी।
नरक चौदस के दिन प्रातःकाल में सूर्योदय से पूर्व उबटन लगाकर नीम, चिचड़ी जैसे कड़ुवे पत्ते डाले गए जल से स्नान का अत्यधिक महत्व है। इस दिन सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने घरों के दरवाजों पर चौदह दीये जलाकर दक्षिण दिशा में उनका मुख करके रखते हैं तथा पूजा-पाठ करते हैं।

संजय गुप्ता

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युधिष्ठिर की भूल


🍁 🍁 🍁युधिष्ठिर की भूल 🍁 🍁 🍁

महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। चारों छोटे भाई सदा उनकी सेवा में लगे रहते थे। युधिष्ठिर का नियम था कि प्रतिदिन वह द्रौपदी के साथ राजमहल के मुख्य द्वार पर खड़े होते और आने वाले याचकों को उनकी अपेक्षा के अनुरूप सामग्री भेंट करते। सुबह से लेकर दोपहर तक धर्मराज का यह दान चलता था। एक दिन धर्मराज सभी को दान देकर राजमहल लौट आए। वह आसन पर बैठने को ही थे कि भीम ने आकर सूचना दी, दो याचक और आए है। वे बड़ी दूर से पहुंचे हैं और दर्शन तथा अपेक्षानुरूप सामग्री की कामना से भरे हैं। युधिष्ठिर उस दिन कुछ थके थे। उन्होंने भीम से कहा, ‘याचकों से कहो कि अब कल भेंट होगी।’ यह सुनकर भीम बाहर आए और राजमहल की सीढ़ियों पर खड़े होकर जोर-जोर से कहना शुरु किया, ‘हमारे महाराज अब तक धर्मराज थे। अब यमराज भी हो गए हैं।’ भीम का शोर सुन युधिष्ठिर आखिरकार बाहर आए और उनकी बात का अर्थ पूछा। भीम ने विनम्रता से कहा, ‘महाराज, आपने ही कहा था कि याचकों को कल बुलाऊं। आपकी बात और आने वाले कल पर आपका इतना विश्वास देख मुझे लगा कि आप तो यमराज ही हो गए हैं जो इतने विश्वास से कह सकते हैं कि कल आना। आपको इतना विश्वास है कि कल आप जीवित रहेंगे। मैंने तो सुना था कि जीवन का भरोसा एक पल भी नहीं। तब आप कैसे कह सकते है कि कल आना?’ युधिष्ठिर को तत्क्षण अपनी भूल का भान हुआ और उन्होंने उसी समय विलंब से पहुंचे दोनों याचकों को दान देकर विदा किया। युधिष्ठिर ने स्वीकारा कि अपने कार्य को कल पर लंबित नहीं करना चाहिए। ‘काल करे सो आज कर’ की प्रसिद्ध पंक्ति का यही आशय है कि अपने काम को कभी भी दूसरे दिन पर नहीं टालना चाहिए, उसे तुरंत करना चाहिए।
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Sanjay gupta

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एक श्लोकी रामायण : Ek shloki RAMAYAN


एक श्लोकी रामायण : Ek shloki RAMAYAN

श्री राम चरित मानस के अयोध्या काण्ड में श्लोक संख्या ३ एक श्लोकी रामायण कहलाती है | इसमें श्री राम के जीवन की चारो अवस्थाओं  का वर्णन है |

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नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं = नीले कमल के समान जिनके कोमल अंग है अर्थात बाल्यावस्था
सीतासमारोपितवामभागम् =सीता जी वाम भाग में है अर्थात विवाह समारोह
पाणौ महासायकचारुचापं =जिनके हाथ में अमोघ बाड़ और धनुष है अर्थात रावन से युद्ध

नमामि रामं रघुवंशनाथम्  =रघुवंश के स्वामी को प्रणाम  अर्थात रामराज्य स्थापित

ADUV speaks

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दो प्रकार के शत्रुओं को कभी क्षमा नहीं करना चाहि


द्रौपदी का नीति-ज्ञान

दो प्रकार के शत्रुओं को कभी क्षमा नहीं करना चाहिएः–

महाभारत में जब जयद्रथ ने द्रौपदी से अनाचार किया, तब युधिष्ठिर ने यह कहकर उसे क्षमा कर दिया कि वह हमारा रिश्तेदार है। इस दुष्ट रिश्तेदार ने युधिष्ठिर को ही मजा चखा दिया। कुरुक्षेत्र के मैदान में इस दुष्ट जयद्रथ के कारण ही अभिमन्यु मृत्यु का ग्रास बना।

जब जयद्रथ को युधिष्ठिर ने प्राणदान देने की बात कही तब द्रौपदी ने बहुत दूरदर्शितापूर्ण और नीतिमत्ता का परामर्श देते हुए कहाः—

राजन्, शत्रुओं को क्षमा भी किया जाता है, किन्तु दो प्रकार के शत्रुओं को कभी क्षमा नहीं करनी चाहिए, वे दो शत्रु कौन है—सुनिएः–

“भार्याभिहर्त्ता वैरी यो यश्च राज्यहरो रिपुः।
याचमानोsपि संग्रामे न मोक्तव्यः कदाचन।।” (म.भा.वनपर्व-85.46)

जो शत्रु स्त्रियों का अपहरण करना चाहे, उसे और जो राज्य को छिनना चाहे, उसे, ये दो प्रकार के शत्रु क्षमा-कोटि में नहीं आते।

किन्तु युधिष्ठिर ने भावुकता में किसी की नहीं सुनी और जयद्रथ को छुडवा दिया। किन्तु द्रौपदी की बात आगे चलकर अक्षरशः ठीक निकली और जयद्रथ का क्षमादान अभिमन्यु के वध का कारण बना।

युद्ध में जिन महारथियों ने मिलकर निहत्थे अभिमन्यु पर आक्रमण किया, उनमें सबसे प्रमुख जयद्रथ ही था। यह सब युधिष्ठिर की अदूरदर्शिता के कारण हुआ।

इतिहास साक्षी है कि अन्तिम हिन्दू सम्राट् महाराज पृथ्वी सिंह चौहान ने राज्य के लोभी मुहम्मद गोरी को एक बार तो क्या, 17 बार क्षमा कर दिया।

यह क्षमादान भारतवर्ष के लिए नासूर बन गया और भारत 1000 वर्षों के लिए गुलाम बन गया ।

आज भी चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश क्षमादान भारत की ओर से पा रहा है।

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पाण्डव


पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं –
1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन
4. नकुल। 5. सहदेव

( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )

यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।

वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं –
1. दुर्योधन 2. दुःशासन 3. दुःसह
4. दुःशल 5. जलसंघ 6. सम
7. सह 8. विंद 9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष 11. सुबाहु। 12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण। 14. दुर्मुख 15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण 17. शल 18. सत्वान
19. सुलोचन 20. चित्र 21. उपचित्र
22. चित्राक्ष 23. चारुचित्र 24. शरासन
25. दुर्मद। 26. दुर्विगाह 27. विवित्सु
28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ
31. नन्द। 32. उपनन्द 33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा 35. सुवर्मा 36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु 38. महाबाहु 39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग 42. भीमबल
43. बालाकि 44. बलवर्धन 45. उग्रायुध
46. सुषेण 47. कुण्डधर 48. महोदर
49. चित्रायुध 50. निषंगी 51. पाशी
52. वृन्दारक 53. दृढ़वर्मा 54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति 56. अनूदर 57. दढ़संघ 58. जरासंघ 59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा 62. उग्रसेन 63. सेनानी
64. दुष्पराजय 65. अपराजित
66. कुण्डशायी 67. विशालाक्ष
68. दुराधर 69. दृढ़हस्त 70. सुहस्त
71. वातवेग 72. सुवर्च 73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी 75. नागदत्त 76. उग्रशायी
77. कवचि 78. क्रथन। 79. कुण्डी
80. भीमविक्र 81. धनुर्धर 82. वीरबाहु
83. अलोलुप 84. अभय 85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय 87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी। 89. विरवि
90. चित्रकुण्डल 91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि 93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान 95. दीर्घबाहु
96. सुजात। 97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी 99. विरज
100. युयुत्सु

( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम””दुशाला””था,
जिसका विवाह”जयद्रथ”सेहुआ था )

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आप सबने DD1 पर किसी समय BR Chopra का महाभारत सीरीयल देखा होगा ।


आप सबने DD1 पर किसी समय BR Chopra का महाभारत सीरीयल देखा होगा । जिसमें अर्जुण का किरदार फिरोज़ खान, कुंती का किरदार नाज़नीन खान, भीष्म का किरदार मुकेश खन्ना, भीम का किरदार प्रवीण कुमार, कर्ण का किरदार पंकज धीर, कृष्ण का किरदार नितिश भारद्वाज ने निभाया था आदि ।

तो इस महाभारत सीरीयल में केवल भीष्म के अभिनय मात्र से ही मुकेश खन्ना जी में इतना स्वाभिमान आया कि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लिया है और वो हर बात में स्वाभिमान का ध्यान रखते हैं । तो महाभारत की समाप्ती के बाद उन्होंने फिल्मों में भी स्वाभिमानी क्षत्रीय राजपूत का ही अभिनय किया है ।

फिरोज़ खान एक मुसलमान हैं जिसने बहुत सी पंजाबी और हिंदी फिल्मों में खल्नायक की भूमिका निभाई है । वो भी अर्जुण के किरदार से ऐसा प्रभावित हुए कि उन्होंने ईस्लाम छोड़ कर वैदिक धर्मी बनना स्विकार किया और अपना वास्तविक नाम भी अर्जुण ही रख लिया ।

नाज़नीन खान एक मुस्लिम अभिनेत्री हैं जिन्होंने केवल ये महाभारत सीरीयल ही किया इससे उनके मन में ईस्लाम के स्थान पर आर्यों का वो स्वाभिमान भर गया जो महाभारत के समय था । और उन्होंने भी ईस्लाम को त्याग करके सनातन धर्म में वापसी की है ।

तो मित्रों आप समझ सकते हैं कि आर्यों का स्वाभिमान महाभारतकाल तक कितना ऊँचा था ? जिसके केवल अभिनय मात्र से ही इन लोगों को परिवर्तित कर दिया है तो सोचो यदि वही प्राचीन स्वाभिमान पुनः आ जाए तो कितने लोग परिवर्तित हो जायेंगे ? और राष्ट्र में कैसा परिवर्तन आ सकेगा ?

सीख हम बीते युगों से नए युग का करें स्वागत…