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शीतला दुबे

भगवान् श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी अनसुनी बातें…
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1. भगवान् श्री कृष्ण के खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजन्य’ था जो गुलाबी रंग का था।

  1. भगवान् श्री कॄष्ण के परमधामगमन के समय ना तो उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्री थीं।

3.भगवान् श्री कॄष्ण के धनुष का नाम शारंग व मुख्य आयुध चक्र का नाम ‘ सुदर्शन’ था। वह लौकिक, दिव्यास्त्र व देवास्त्र तीनों रूपों में कार्य कर सकता था उसकी बराबरी के विध्वंसक केवल दो अस्त्र और थे पाशुपतास्त्र ( शिव , कॄष्ण और अर्जुन के पास थे) और प्रस्वपास्त्र ( शिव , वसुगण , भीष्म और कृष्ण के पास थे) ।

  1. भगवान् श्री कॄष्ण की परदादी ‘मारिषा’ व सौतेली मां रोहिणी( बलराम की मां) ‘नाग’ जनजाति की थीं.

  2. भगवान श्री कॄष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।

  3. भगवान् श्री कॄष्ण की प्रेमिका ‘राधा’ का वर्णन महाभारत, हरिवंशपुराण, विष्णुपुराण व भागवतपुराण में नहीं है। उनका उल्लेख बॄम्हवैवर्त पुराण, गीत गोविंद व प्रचलित जनश्रुतियों में रहा है।

  4. जैन परंपरा के मुताबिक, भगवान श्री कॄष्ण के चचेरे भाई तीर्थंकर नेमिनाथ थे जो हिंदू परंपरा में ‘घोर अंगिरस’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

  5. भगवान् श्री कॄष्ण अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी द्वारिका में 6 महीने से अधिक नहीं रहे।

  6. भगवान श्री कृष्ण ने अपनी औपचारिक शिक्षा उज्जैन के संदीपनी आश्रम में मात्र कुछ महीनों में पूरी कर ली थी।

  7. ऐसा माना जाता है कि घोर अंगिरस अर्थात नेमिनाथ के यहाँ रहकर भी उन्होंने साधना की थी.

  8. प्रचलित अनुश्रुतियों के अनुसार, भगवान श्री कॄष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था और डांडिया रास उसी का नॄत्य रूप है।

  9. कलारीपट्टु’ का प्रथम आचार्य कॄष्ण को माना जाता है। इसी कारण ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

  10. भगवान श्रीकृष्ण के रथ का नाम ‘जैत्र’ था और उनके सारथी का नाम दारुक/ बाहुक था। उनके घोड़ों (अश्वों) के नाम थे शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक।

  11. भगवान श्री कृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था और उनके शरीर से एक मादक गंध स्रावित होती थी.

  12. भगवान श्री कॄष्ण की मांसपेशियां मृदु परंतु युद्ध के समय विस्तॄत हो जातीं थीं, इसलिए सामन्यतः लड़कियों के समान दिखने वाला उनका लावण्यमय शरीर युद्ध के समय अत्यंत कठोर दिखाई देने लगता था ठीक ऐसे ही लक्ष्ण कर्ण, द्रौपदी व कॄष्ण के शरीर में देखने को मिलते थे।

  13. जनसामान्य में यह भ्रांति स्थापित है कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे, परंतु वास्तव में कॄष्ण इस विधा में भी सर्वश्रेष्ठ थे और ऐसा सिद्ध हुआ मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में जिसकी प्रतियोगिता द्रौपदी स्वयंवर के ही समान परंतु और कठिन थी।

  14. यहां कर्ण व अर्जुन दोंनों असफल हो गये और तब श्री कॄष्ण ने लक्ष्यवेध कर लक्ष्मणा की इच्छा पूरी की, जो पहले से ही उन्हें अपना पति मान चुकीं थीं।

  15. भगवान् श्री युद्ध कृष्ण ने कई अभियान और युद्धों का संचालन किया था, परंतु इनमे तीन सर्वाधिक भयंकर थे। 1- महाभारत, 2- जरासंध और कालयवन के विरुद्ध 3- नरकासुर के विरुद्ध

  16. भगवान् श्री कृष्ण ने केवल 16 वर्ष की आयु में विश्वप्रसिद्ध चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया. मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया.

  17. भगवान् श्री कॄष्ण ने असम में बाणासुर से युद्ध के समय भगवान शिव से युद्ध के समय माहेश्वर ज्वर के विरुद्ध वैष्णव ज्वर का प्रयोग कर विश्व का प्रथम ‘जीवाणु युद्ध’ किया था।

  18. भगवान् श्री कॄष्ण के जीवन का सबसे भयानक द्वंद युद्ध सुभुद्रा की प्रतिज्ञा के कारण अर्जुन के साथ हुआ था, जिसमें दोनों ने अपने अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल लिए थे। बाद में देवताओं के हस्तक्षेप से दोंनों शांत हुए।

  19. भगवान् श्री कृष्ण ने 2 नगरों की स्थापना की थी द्वारिका (पूर्व मे कुशावती) और पांडव पुत्रों के द्वारा इंद्रप्रस्थ ( पूर्व में खांडवप्रस्थ)।

  20. भगवान् श्री कृष्ण ने कलारिपट्टू की नींव रखी जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई।

  21. भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में आध्यात्मिकता की वैज्ञानिक व्याख्या दी, जो मानवता के लिए आशा का सबसे बडा संदेश थी, है और सदैव रहेगी।
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Little Long Message Bt Do Read.

महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है …. !!🙏🙏

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी …. !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा “देवव्रत” (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था — अकेला …. !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , “प्रणाम पितामह” …. !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , ” आओ देवकीनंदन …. ! स्वागत है तुम्हारा …. !!

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था” …. !!

कृष्ण बोले , “क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप” …. !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले,” पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव … ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है” …. !

कृष्ण चुप रहे …. !

भीष्म ने पुनः कहा , “कुछ पूछूँ केशव …. ?
बड़े अच्छे समय से आये हो …. !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय ” …. !!

कृष्ण बोले – कहिये न पितामह ….!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न …. ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , “नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं … मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह … ईश्वर नहीं ….”

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े …. ! बोले , ” अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे …. !! ”

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले …. ” कहिये पितामह …. !”

भीष्म बोले , “एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या …. ?”

“किसकी ओर से पितामह …. ? पांडवों की ओर से …. ?”

” कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था …. ? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या …. ? यह सब उचित था क्या …. ?”

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह …. !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ….. !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन …. !!

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह …. !!

“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण …. ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है …. !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण …. !”

“तो सुनिए पितामह …. !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ …. !
वही हुआ जो हो होना चाहिए …. !”

“यह तुम कह रहे हो केशव …. ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ….? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ….. ? ”

“इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है …. !

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है …. !!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था …. !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह …. !!”

” नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो …. !”

” राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह …. !
राम के युग में खलनायक भी ‘ रावण ‘ जैसा शिवभक्त होता था …. !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ….. ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे …. ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था …. !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया …. ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं …. !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह …. ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो …. !!”

“तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव …. ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा …. ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ….. ??”

” भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह …. !

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा …. !

वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा …. नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा …. !

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह …. !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय …. !

भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह ….. !!”

“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव …. ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ….. ?”

“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह …. !

ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ….. !केवल मार्ग दर्शन करता है*

सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है …. !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न …. !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ….. ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न …. ?
यही प्रकृति का संविधान है …. !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से …. ! यही परम सत्य है ….. !!”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे …. !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी …. !
उन्होंने कहा – चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है …. कल सम्भवतः चले जाना हो … अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण …. !”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था …. !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ….।।

धर्मों रक्षति रक्षितः 🚩🚩

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ભગવાન શ્રીકૃષ્ણની સ્તુતિ

સૂર્ય ઉત્તરાયણના થતાં ભીષ્મ પિતામહે સાવધાન બનીને મનને આત્મામાં સ્થિર કર્યું. તે વખતે એ પરમપ્રકાશિત પ્રભાકરની પેઠે પ્રકાશમય દેખાયા. એમની પાસે અનેક પ્રાતઃસ્મરણીય પરમાત્માના પરમ કૃપાપાત્ર ઋષિઓ આવી પહોંચ્યા. એ સૌની સમુપસ્થિતિમાં એમણે શરશય્યા પર સૂતાંસૂતાં બે હાથ જોડીને વિશુદ્ધ અંતઃકરણથી ભગવાન કૃષ્ણનું ધ્યાન કર્યું અને એમની સ્તુતિ કરવા માંડી. ભીષ્મ પિતામહની ભક્તિભાવનાને યોગબળ દ્વારા જાણી લઇને ભગવાન કૃષ્ણે એમની પાસે પહોંચીને એમને અલૌકિક આત્મજ્ઞાન પ્રદાન કર્યું. પોતાની અસાધારણ આત્મશક્તિથી અનુગ્રહની એવી સૂક્ષ્મ વર્ષા વરસાવ્યા પછી શ્રીકૃષ્ણ યુધિષ્ઠિરાદિ સત્પુરુષો સાથે સ્થૂળરૂપે એમની સમક્ષ ઉપસ્થિત થયા. ભીષ્મ પિતામહે શરશય્યા પરથી ધ્યાનમગ્ન બનીને કરેલી શ્રીકૃષ્ણના સ્તુતિ અતિશય આહલાદક અને રોચક છે. એ સ્તુતિ પુરવાર કરે છે કે ભીષ્મ પિતામહ શ્રીકૃષ્ણને કેવળ માનવ નહોતા માનતા પરંતુ પરમાત્મા સમજતા હતા. એમની પ્રેમપ્રશસ્તિમાં એમની એ ભાવનાના પ્રતિધ્વનિ પડેલા છે. એ સ્તુતિ અથવા પ્રેમપ્રશસ્તિનો આંશિક પરિચય પ્રાપ્ત કરીએ તો એ અસ્થાને નહિ લેખાય. એ આંશિક પરિચય આ રહ્યોઃ

आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषामि याम् ।
तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥
शुचिं शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् ।
मुकत्वा सर्वात्मनात्मनं तं प्रपद्य प्रजापतिम् ॥
अनाद्यत् परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः ।
एकोङयं वेद भगवान् धाता नारायणो हरिः ॥ (અધ્યાય ૪૭, શ્લોક ૧૬ થી ૧૮)

य़स्मिन् विश्वानि भूतानि तिष्ठंतिच विशंतिच ।
गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ॥ (શ્લોક ર૧)

अतिवाप्निन्द्रकर्माणमणिसूर्यातितेजसम् ।
अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥
पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषि ।
क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्मोह ॥ (શ્લોક 3૧-3ર)

ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म यत्तत् सदसतोः परम् ।
अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदु ॥
यं सुरासुरगंधर्वाः सिद्धा ऋषिमहोरगाः ।
प्रयता नित्यमर्चन्ति परमं दुखभेषजम् ॥
अनादिनिधनं देवमात्मयोनिं सनातनम् ॥ (શ્લોક 3પ-3૬)

यः शेते योगमास्याय पर्यके नागभूषिते ।
फणासहस्त्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥ (શ્લોક ૪૮)

अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भया ।
शांताः संन्यासिनेः यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ॥ (શ્લોક પપ)

यं न देवा न गंधर्वा न दैत्या न च दानवाः ।
तत्वतो हि विजानंति तस्मै मोक्षात्मने नमः ॥ (શ્લોક ૭૪)

यस्मिन्सर्वं यतः सर्व यः सर्वं सर्वतश्च यः ।
यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥
विश्वकर्मन् नमस्तेङस्तु विश्वात्मन् विश्वसंभव ।
अपवर्गस्थ भूतानां पंचानां परतः स्थित ॥ (શ્લોક ૮૩-૮૪)

नमो ब्रह्मण्देवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
जगद्विताय कृष्णाय गोविंदाय नमोनमः ॥ (શ્લોક ૯૪)

त्वां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे ।
य च्छ्रेयः पुंडरीकाक्षः तदधयायस्व सुरोत्तम ॥
इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडितः ।
वाग्यज्ञेनर्चितो देवः प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
नारायणः परं ब्रह्म नारायणः परं तपः ।
नारायणः परा देवः सर्वं नारायणः सदा ॥ (શ્લોક ૯૭ થી ૯૯)

એ શ્લોકોનો ભાવાર્થ આ પ્રમાણેઃ શ્રીકૃષ્ણની આરાધના કરવાની ઇચ્છાથી હું જે વાણીનો ઉચ્ચાર કરું છું તે વિસ્તૃત અથવા સંક્ષિપ્ત વાણીથી પુરુષોત્તમ શ્રીકૃષ્ણ મારા પર પ્રસન્ન થાવ. સ્વ-પર દોષથી રહિત, દોષશૂન્ય માર્ગ દ્વારા પ્રાપ્ત કરવા યોગ્ય, સર્વના કરતાં અધિક શક્તિમાન, તત્વમસિ એ મહાવાક્યના તત્ પદના અર્થભૂત-ઇશ્વર, સર્વના આત્મારૂપ તથા હિરણ્યગર્ભ સ્વરૂપ શ્રીકૃષ્ણને સ્થૂલ, સૂક્ષ્મ અને કારણ શરીરના અહંભાવનો ત્યાગ કરીને હું શરણે જઉં છું. આદિ તથા અંતરહિત જે પરબ્રહ્મને દેવો કે ઋષિઓ જાણતા નથી તે પરબ્રહ્મને સર્વના ઉત્પાદક તથા સંહારક ભગવાન નારાયણ જાણે છે. સર્વ ભૂતોના નિયંતા એવા જે પરમાત્મામાં માળાના મણકાઓ જેમ સૂત્રમાં ગૂંથાઇને રહે છે તેમ સત્વાદિ ગુણવાળા આ સર્વ સ્થાવર જંગમ ભૂતસમુદાયો રહેલા છે, તથા અંતે-સૃષ્ટિના પ્રલય સમયે, તે પરમાત્મામાં લીન થઇ જાય છે. વાયુ તથા ઇન્દ્રના કરતાં પણ અધિક પરાક્રમી, સૂર્યના કરતાં પણ અધિક તેજસ્વી અને બુદ્ધિ, ઇન્દ્રિય તથા મનથી અગોચર એવા પ્રજાપતિ શ્રીકૃષ્ણને હું શરણે જાઉં છું. જેને સૃષ્ટિના આરંભમાં ‘પુરુષ’ નામથી તથા બ્રહ્મ નામથી કહ્યા છે, તથા સૃષ્ટિના પ્રલય સમયે સંકર્ષણ નામથી વર્ણવ્યા છે તે ઉપાસના કરવા યોગ્ય શ્રીકૃષ્ણ ભગવાનની અમે ઉપાસના કરીએ છીએ. સત્યસ્વરૂપ, કાર્યકારણથી પર, આદિ, મધ્ય અને અંતથી રહિત તથા એકાક્ષર બ્રહ્મ સ્વરૂપ જે ભગવાનને દેવો તથા ઋષિઓ પણ જાણી શકતા નથી તેને શરણે જાઉં છું. દુઃખના પરમ ઔષધરૂપ, આદિ અને અંતરહિત, સ્વયંભૂ તથા સનાતન એવા જે દેવની દેવો અસુરો, ગંધર્વો, સિદ્ધો ઋષિઓ અને નાગરાજાઓ પ્રયત્નશીલ થઇને નિત્ય પૂજા કર્યા કરે છે, તે દેવને હું શરણે જઉં છું. જે યોગની ધારણા કરીને હજારો ફણાઓથી યુક્ત શેષનાગરૂપી ભવ્ય પલંગ પર શયન કરે છે તે નિદ્રાત્મા ભગવાનને હું નમસ્કાર કરું છું.

પુણ્યપાપની નિવૃત્તિ થઇ ગયા પછી પુનર્જન્મના ભયથી મુક્ત થયેલા શાંત સંન્યાસીઓ જેને પામે છે તે મોક્ષરૂપ પરમાત્માને હું નમસ્કાર કરું છું. દેવો, ગંધર્વો, દૈત્યો કે દાનવો જેને યથાર્થ રીતે જાણી શક્તા નથી તે સૂક્ષ્મમૂર્તિ પરમાત્માને હું નમન કરું છું. જેનામાં આ સર્વ જગત નિવાસ કરી રહ્યું છે, જેનાથી સર્વ જગતની ઉત્પત્તિ થાય છે, જે સર્વસ્વરૂપ છે, જે સર્વત્ર વ્યાપક છે, જે નિત્ય સર્વમય છે, તે સર્વસ્વરૂપ પરમાત્માને નમસ્કાર કરું છું. હે વિશ્વસૃષ્ટા ! હું તમને નમસ્કાર કરું છું. હે વિશ્વાત્મન્ ! હે વિશ્વોત્પાદક ! હે મોક્ષસ્વરૂપ ! હે પાંચેય ભૂતોથી પર રહેલા ! તમને હું નમસ્કાર કરું છું. હે કમળ સમાન નેત્રવાળા ઉત્તમદેવ ! હું આપનો ભક્ત છું. ઇષ્ટગતિ મેળવવા ઇચ્છું છું અને આપને શરણે આવેલો છું. માટે મારા શ્રેયસ્કર માર્ગનું તમે ચિંતન કરો. આ રીતે વિદ્યા અને તપના કારણભૂત શ્રી વિષ્ણુનું મેં સ્તવન કર્યું છે, તથા વાણીરૂપી યજ્ઞ દ્વારા પૂજન કર્યું છે. તેથી જનાર્દન શ્રી વિષ્ણુદેવ મારા પર પ્રસન્ન બનો. નારાયણ પરબ્રહ્મસ્વરૂપ છે. નારાયણ જ પરમદેવ છે, તથા સર્વદા સર્વવસ્તુ નારાયણસ્વરૂપ જ છે. ગાયો, બ્રાહ્મણો તથા સર્વજગતનું હિત કરનાર, વેદવાણીનું રક્ષણ કરનાર તથા બ્રહ્મનિષ્ઠ જ્ઞાની પુરુષોના પરમ ઇષ્ટદેવ શ્રીકૃષ્ણને મારા અનેકવાર નમસ્કાર હો.

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Sanjay Gupta

महाभारत काल में यदुवंशियों को हर जगह से पलायन ही क्यों करना पड़ा?

महाभारत काल में यदुवंशियों को हर जगह से पलायन ही करना पड़ा। इस पलायन के कई कारण थे। कहते हैं कि यदुवंशियों के प्रारंभ में मथुरा में ही कुल 18 कुटुम्ब के लोग थे। देशभर की संख्या ज्ञात नहीं। महाभारत के बाद जब मौसुल युद्ध हुआ तो यही 18 कुल के लोग आपस में लड़कर मारे गए। लेकिन यह भी कहा जाता है कि उस काल में बहुत से यदुवंशी पलायन करके भारत के बाहर भी चले गए थे, जहां उन्होंने अपना एक अलग साम्राज्य स्थापित कर अपने वंश को विस्तार दिया।

हालांकि कालांतर में उनका साम्राज्य भी नष्ट हो गया या कर दिया गया। यह आलेख सिर्फ महाभारत पर ही केंद्रित है और यह आलेख किसी निष्कर्ष या समाधान की बात नहीं करता, सिर्फ शोधार्थियों हेतु सवाल प्रस्तुत करता है। यदुवंशियों का प्राचीन और मध्यभारत में अतुलनीय योगदान रहा है। उनकी पीढ़ियों के योगदान और इतिहास को प्रकट और संरक्षित करने की जरूरत है।

महाभारत का युद्ध अधर्म के विरुद्ध धर्म का युद्ध था। लेकिन अधर्म की ओर वे लोग भी थे, जो धर्म के पक्षधर थे। एकमात्र यह युद्ध ऐसा युद्ध था जिससे कई घटनाओं और कहानियों का जन्म हुआ और जिससे भारत का भविष्य तय हुआ। इस युद्ध में एक ओर जहां भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा आदि को शाप दिया था वहीं भगवान कृष्ण को भी शाप का सामना करना पड़ा।

मथुरा अंधक संघ की राजधानी थी और द्वारिका वृष्णियों की। ये दोनों ही यदुवंश की शाखाएं थीं। यदुवंश में अंधक, वृष्णि, माधव, यादव आदि वंश चला। श्रीकृष्ण वृष्णि वंश से थे। वृष्णि ही ‘वार्ष्णेय’ कहलाए, जो बाद में वैष्णव हो गए। भगवान श्रीकृष्ण के पूर्वज महाराजा यदु थे। यदु के पिता का नाम ययाति था। ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में हुए थे। ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनद कहा गया है।

पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गए थे और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को कभी राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहते थे और उसी को उन्होंने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया।

यदु ने पुरु पक्ष का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इंकार कर दिया। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ। उसके वंशज पौरव कहलाए। कहते हैं कि यदु के बाद अधिकतर यदुओं को कभी भी उस काल में राज्य का सुख हासिल नहीं हुआ। उनके वंशज के लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को भटकते रहे और उनको हर जगह से पलायन ही करना पड़ा। वे जहां भी गए उन्होंने एक नया नगर बसाया और अंतत: उस नगर का विध्वंस हो गया या कर दिया गया।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अनुमानित 7,200 ईसा पूर्व यदु ने राज्य को छोड़ने के बाद समुद्र के किनारे अपनी नगरी को बसाया था। यह भी कहा जाता है कि ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पश्चिम में पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुहु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिन्ध-गुजरात प्रांत) और उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भू-मंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए। ययाति के राज्य का क्षे‍त्र अ‍फगानिस्तान के हिन्दूकुश से लेकर असम तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक था।

यदु के कुल में भगवान कृष्ण हुए। यदु के 4 पुत्र थे- सहस्रजीत, क्रोष्टा, नल और रिपुं। सहस्रजीत से शतजीत का जन्म हुआ। शतजीत के 3 पुत्र थे- महाहय, वेणुहय और हैहय। हैहय से धर्म, धर्म से नेत्र, नेत्र से कुन्ति, कुन्ति से सोहंजि, सोहंजि से महिष्मान और महिष्मान से भद्रसेन का जन्म हुआ।

ययाति ने जब यदु को सिन्ध-गुजरात के क्षेत्र दिए तो उस समय गुजरात के समुद्र तट पर एक उजाड़ नगरी थी जिसे कुशस्थली कहा जाता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराज रैवतक ने प्रथम बार समुद्र में से कुछ भूमि बाहर निकालकर यहां एक नगरी बसाई थी।

यहां उनके द्वारा कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण इसे कुशस्थली कहा गया। अन्य मान्यताओं के कारण इसे राम के पुत्र कुश के वंशजों ने बसाया था। यह भी कहा जाता है कि यहीं पर त्रिविक्रम भगवान ने ‘कुश’ नामक दानव का वध किया था इसीलिए इसे कुशस्थली कहा जाता है। जो भी हो, यहां पर महाराजा यदु ने अपनी एक नगरी बसाई थी।

अज्ञात कारणों के चलते जब यह नगरी उजाड़ हो गई तो सैकड़ों वर्षों तक इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया। बाद में जरासंध के आक्रमण से त्रस्त होकर श्रीकृष्ण ने मथुरा से अपने 18 कुल के हजारों लोगों के साथ पलायन किया तो वे कुशस्थली आ गए थे और यहीं उन्होंने नई नगरी बसाई और जिसका नाम उन्होंने द्वारका रखा। इसमें सैकड़ों द्वार थे इसीलिए इसे द्वारका या द्वारिका कहा गया। इस नगरी को श्रीकृष्‍ण ने विश्वकर्मा और मयासुर की सहायता से बनवाया था।

यह अभेद्य दुर्ग था। लेकिन कहते हैं कि जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका से बाहर लंबी यात्रा पर थे तब उनके शत्रु शिशुपाल ने यहां आक्रमण कर इस नगरी को कुछ हद तक नष्ट कर दिया था। इसे श्रीकृष्ण ने फिर से मजबूत बनवाया था। विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में उल्लेख मिलता है कि कुशस्थली उस प्रदेश का नाम था, जहां यादवों ने द्वारका बसाई थी।

मौसुल युद्ध के बाद यदुवंशियों का विनाश हो गया। इसके बाद श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद जब द्वारिका नगरी जल में डूब रही थी तब अर्जुन सभी यदुवंशी स्त्री और बच्चों को लेकर हस्तिनापुर के लिए निकले। हजारों की संख्या में एक जगह पड़ाव डाला तब उनके साथ लूटपाट हुई और लगभग सभी मारे गए। बस बच गया था तो श्रीकृष्ण का प्रपोत्र वज्रनाभ।

उल्लेखनीय है कि कालांतर में मथुरा को भी कई बार नष्ट किया गया था। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को बहुत सी जगहों पर वज्रनाभ भी लिखा गया है। वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा भी घोषित किया था।

उसे इन्द्रप्रस्थ भी दिया गया था लेकिन वह नष्ट हो गया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है। इस वज्र ने ही मथुरा में सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर बनवाया था लेकिन कालांतर में आक्रांताओं ने इसे नष्ट कर दिया था।

मथुरा को नष्‍ट करने में सबसे पहला नाम जरासंध का आता है। उसके बाद शिवभक्त मिहिरकुल का आता है। मिहिरकुल हूण सम्राट तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल भारतीय इतिहास में अपनी खूंखार और ध्वंसात्मक प्रवृत्ति के लिए प्रसिद्ध हैं। 450 ईस्वी के लगभग हूण, गांधार इलाके के शासक थे, जब उन्होंने वहां से सारे सिन्धु घाटी प्रदेश को जीत लिया था। इसके बाद महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी ने इस शहर का विध्वंस किया था।

ऐसा नहीं है कि यादव क्षत्रियों ने कभी राजपाट नहीं किया। उन्होंने कई वर्षों तक देश में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में राज किया लेकिन उनका शासन आक्रांताओं के कारण अस्थिर ही रहा। जैसे कश्मीर में अभीर यादव वंश का शासन था। आज का अभिसार और राजौरी क्षेत्र उसी शासन के अंतर्गत आता था।

इसी तरह गुजरात में भी अहीरवंशी क्षत्रियों का शासन रहा है। आज भी गुजरात में यादव समुदाय की आबादी जामनगर, जूनागढ़, कच्छ, राजकोट एवं अमरेली जिलों में अधिक है। अहीर, ग्वाल तथा यादव शब्द एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द ही माने जाते हैं। यादवों में घोसी, गौड़, गौर, राउत, रावत, भाटी आदि भी होते हैं।

लंबे कालखंड और आपसी फूट के कारण यादव समाज उपजातियों में बंटकर बिखर गया है। प्रत्येक प्रदेश में यादवों की पीढ़ियों का इतिहास अलग-अलग मिलेगा, लेकिन शुरुआती क्रम समान है। यदि हम गुजरात की बात करें तो अत्रि से सोम, सोम से ययाति, ययाति से यदु, यदु से आगे 59वीं पीढ़ी में सूरसेन, सूरसेन से वसुदेव, वसुदेव से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

श्रीकृष्ण से प्रद्युम्न, प्रद्युम्न से अनिरुद्ध, अनिरुद्ध से वज्रनाभ का जन्म हुआ। वज्रनाभ की 140वीं पीढ़ी में देवेन्द्र हुए। देवेन्द्र के बाद गजपत हुए। गजपत के बाद शालिवाहन, शालिवाहन के बाद यदुभाण, यदुभाण के बाद जसकर्ण, जसकर्ण के बाद समाकुमार, समाकुमार के बाद ईस्वी सन् 875 में चूड़चन्द्र हुए। इस तरह हमें यह लिस्ट मिलती है

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इन पाँच गांवों की वजह से हुआ था महाभारत का युद्ध, अब ऐसा है उनका हाल, इनकी बदौलत टल सकता था युद्ध!!!!!!!

संजय गुप्ता

लालच, स्त्री का अपमान, जैसी जैसी कई चीजों के परिणाम स्वरूप महाभारत का युद्ध हुआ। जमीन या राज्य का बंटवारा भी इन्हीं कारणों में से एक था। जमीन के लालच में कौरवों ने कई षड्यंत्र रचे। पांडवों को मारने का प्रयास भी किया और तो और भरी सभा में अपनी कुलवधू द्रोपदी का चीरहरण करके उन्हें अपमानित भी किया।

इस सब के बावजूद युधिष्ठिर युद्ध नहीं चाहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि युद्ध से उनका पूरा वंश तबाह हो जाएगा। इसलिए उन्होंने मात्र 5 गांवों के बदले युद्ध ना करने का प्रस्ताव रखा था। अगर दुर्योधन उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता तो इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध टल जाता।

आखिर क्या है पूरा किस्सा? कौन-से थे वे 5 गांव और आज वे कहां मौजूद है? आइये जानते हैं।

युधिष्ठिर के निवेदन पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, पांडवों की ओर से शांतिदूत बनकर कौरवों के पास गए थे। हस्तिनापुर पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण ने पांडवों का संदेश देते हुए कहा था कि अगर कौरव उन्हें मात्र 5 गांव प्रदान कर दें तो यह युद्ध नहीं होगा।

पांडवों का प्रस्ताव सुनने के बाद धृतराष्ट्र इसे स्वीकार करना चाहते थे, लेकिन दुर्योधन ने अपने पिता को भड़काते हुए कहा कि ये पांडवों की चाल है। वे जानते हैं कि हमारी विशाल सेना के आगे वे पलभर भी नहीं टिक पाएंगे इसलिए ये चाल चल रहे हैं।

श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को फिर से समझाते हुए कहा था कि पांडव युद्ध से डरते नहीं हैं। वे बस कुल का नाश होते नहीं देखना चाहते। आगे श्रीकृष्ण ने कहा कि अगर वो पांडवों को आधा राज्य लौटा दें तो युद्ध तो टल ही जाएगा, साथ ही पांडव दुर्योधन को युवराज के रूप में भी स्वीकार कर लेंगे।

धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह, गुरु द्रोण सभी ने दुर्योधन को समझाने की बहुत कोशिशें कीं। यहां तक कि गांधारी ने भी दुर्योधन से पांडवों का प्रस्ताव स्वीकार करने की विनती की, लेकिन हठी दुर्योधन ने किसी की बात नहीं मानी। परिणाम स्वरूप युद्ध में पूरे कौरव वंश का नाश हो गया।

ये था महाभारत का वो रोचक किस्सा, जिसमें पांच गांवों का जिक्र किया गया था। चलिए अब आपको बताते हैं कौन-से थे वे पांच गांव और आज कहां, किस नाम से मौजूद हैं।

पहला गांव- इंद्रप्रस्थ : – महाभारत में इंद्रप्रस्थ को कहीं-कहीं पर श्रीपत के नाम से भी पुकारा गया है। जब कौरवों और पांडवों के बीच मदभेद होने लगे थे, तब धृतराष्ट्र ने यमुना किनारे स्थित खांडवप्रस्थ क्षेत्र पांडवों को देकर, राज्य से अलग कर दिया था। इस जगह पर हर तरफ जंगल ही जंगल था। तभी पांडवों ने रावण के ससुर और महान शिल्पकार मायासुर से यहां महल बनाने की विनती की। पांडवों के कहने पर मयासुर ने यहां सुंदर नगरी बनाई और इस जगह का नाम इंद्रप्रस्थ रख दिया गया। आज की दिल्ली का दक्षिणी इलाका महाभारत काल का इंद्रप्रस्थ माना जाता है।

दूसरा गांव- व्याघ्रप्रस्थ : – व्याघ्रप्रस्थ यानी बाघों के रहने की जगह। महाभारत काल का व्याघ्रप्रस्थ आज बागपत कहा जाता है। मुगलकाल से इस जगह को बागपत के नाम से जाना जाने लगा था। आज ये जगह उत्तरप्रदेश में मौजूद है। कहा जाता है कि इसी जगह पर दुर्योधन ने पांडवों को मरवाने के लिए लाक्षागृह का निर्माण करवाया था।

तीसरा गांव- स्वर्णप्रस्थ : – स्वर्णप्रस्थ का मतलब है ‘सोने का शहर’। महाभारत का स्वर्णप्रस्थ आज सोनीपत के नाम से जाना जाता है। आज ये हरियाणा का एक प्रसिद्ध शहर है। समय के साथ इसका नाम पहले ‘सोनप्रस्थ’ हुआ और फिर सोनीपत।

चौथा गांव- पांडुप्रस्थ : – हरियाणा का पानीपत महाभारत के समय पांडुप्रस्थ कहा जाता था। कुरुक्षेत्र, जहां महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, पानीपत के पास ही स्थित है। नई दिल्ली से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थिर इस जगह को ‘सिटी ऑफ वीबर’ यानी ‘बुनकरों का शहर’ भी कहा जाता है।

पांचवा गांव- तिलप्रस्थ : – महाभारत काल में तिलप्रस्थ के नाम से प्रसिद्ध ये जगह आज तिलपत बन चुकी है। यह हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित एक कस्बा है।

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महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद की 14 रोमांचक घटनाएं!!!!!!!!

महाभारत युद्ध के बाद का इतिहास सभी जानना चाहते हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडव, कृष्ण और बचे हुए योद्धाओं का क्या हुआ? धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर, संजय, युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम और भगवान कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई? भारत का इतिहास और समाज उस काल में किस हाल में था। क्या यदुवंश का नाश हो गया था? तो आओ इसी संबंध में जानते हैं 14 प्रमुख रोमांचक घटनाएं।

1) युद्ध के 18वें अर्थात अंतिम दिन दुर्योधन ने रात्रि में उल्लू और कौवे की सलाह पर अश्वत्थामा को सेनापति बनाया था। उस एक रात्रि में ही अश्वत्थामा ने पांडवों की बची लाखों सेनाओं, पुत्रों और गर्भ में पल रहे पांडवों के पुत्रों तक को मौत के घाट उतार दिया था। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्‍थामा के द्वारा किए गए नरसंहार के बाद युद्ध समाप्त हो गया था।

2) युद्ध के बाद दुर्योधन कहीं जाकर छुप गया था। पांडवों ने उसे खोज लिया तब भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध हुआ। इस युद्ध को देखने के लिए बलराम भी उपस्थित थे। भीम कई प्रकार के यत्न करने पर भी दुर्योधन का वध नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि दुर्योधन का शरीर वज्र के समान कठोर था। ऐसे समय श्रीकृष्ण ने अपनी जंघा ठोककर भीम को संकेत दिया जिसे भीम ने समझ लिया। तब भीम ने दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया और अंत में उसकी जंघा उखाड़कर फेंक दी। बाद में दुर्योधन की मृत्यु हो गई।

3) अश्‍वत्थामा ने जब द्रौपदी के पुत्रों का उनकी निद्रावस्था में वध कर दिया तो द्रौपदी खूब विलाप करने लगी। यह देख भीम से रहा नहीं गया और वे अश्‍वत्‍थामा को पकड़ने के लिए रथ पर सवार होकर चल देते हैं। भीम के पीछे श्रीकृष्ण भी अर्जुन के साथ अपने रथ पर सवार होकर चल पड़े। सभी ने गंगा के तट पर अश्वत्‍थामा को ढूंढ लिया। द्रोणपुत्र अश्वत्‍थामा यह देखकर डर गया और उसने तुरंत ही अपने दिव्य अस्त्र ब्रह्मास्त्र का संकल्प किया और उस प्रचंड अस्त्र को पांडवों की वध की इच्‍छा से छोड़ दिया। यह देख अर्जुन ने भी संकल्प लिया कि इस ब्रह्मास्त्र से शत्रु का ब्रह्मास्त्र शांत हो जाए, ऐसा कहकर अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। दोनों के अस्त्रों से प्रचंड अग्नि का जन्म हुआ। यह देख वहां वेद व्यास और देवर्षि नारद प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि इन दोनों अस्त्रों से धरती का विनाश हो जाएगा। आप इन्हें वापस ले लें। ऐसे में अर्जुन ने तो अपना अस्त्र वापस ले लिया लेकिन अश्‍वत्थामा इसे वापस लेने में सक्षम नहीं था। ऐसे में वह उस अस्त्र को उत्तरा के गर्भ पर उतार देता है।

4) अश्वत्थामा द्वारा उत्तरा के गर्भ पर अस्त्र छोड़ देने के बाद श्रीकृष्ण उत्तरा के बच्चे को बाद में पुन: जीवित कर देते हैं। इस बीच अश्‍वत्थामा के इस अपराध के लिए श्रीकृष्ण उसे 3,000 वर्षों तक कोढ़ी के रूप में रहकर भटकने का शाप दे देते हैं। उनके इस शाप का वेद व्यासजी ने अनुमोदन किया था। शिव महापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे गंगा किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां है, यह नहीं बताया गया है। तब अश्वत्‍थामा पांडवों को अपनी मणि देकर वन में चला जाता है। वह मणि भीमसेना युधिष्ठिर की आज्ञा से द्रौपदी को दे देते हैं। द्रौपदी वह मणि युधिष्ठिर को देकर अश्‍वत्‍थामा को क्षमा कर देती है।
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5) युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने युद्धभूमि पर ही सभी मृत योद्धाओं का विधिवत रूप से दाह-संस्कार किया। महाभारत के स्त्री पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर के कहने पर पांडवों ने ही दोनों पक्षों के मरे हुए योद्धाओं का अंतिम संस्कार किया था।

6) भीष्म यद्यपि शरशैया पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। प्रतिदिन दिए गए इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है।

7) बाद में सूर्य के उत्तरायण होने पर युधिष्ठिर आदि सगे-संबंधी, पुरोहित और अन्यान्य लोग भीष्म के पास पहुंचते हैं। उन सबसे भीष्म पितामह ने कहा कि इस शरशैया पर मुझे 58 दिन हो गए हैं। मेरे भाग्य से माघ महीने का शुक्ल पक्ष आ गया। अब मैं शरीर त्यागना चाहता हूं। इसके पश्चात उन्होंने सब लोगों से प्रेमपूर्वक विदा मांगकर शरीर त्याग दिया। सभी लोग भीष्म को याद कर रोने लगे। युधिष्ठिर तथा पांडवों ने पितामह के शरबिद्ध शव को चंदन की चिता पर रखा तथा दाह-संस्कार किया।

8) भीष्म पितामह के अंतिम संस्कार के बाद युधिष्ठिर के राज्याभिषेक की तैयारी होती है। महाभारत शांति पर्व के ‘राजधर्मानुशासन पर्व’ में इस राज्याभिषेक का वर्णन मिलता है। इस राज्याभिषेक में पांडु पुत्र भीम, अर्जुन, नकुल सहदेव के अलावा श्री‍कृष्ण, विदुर, धृतराष्ट्र, गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि सभी सम्मिलित होते हैं। इस राज्याभिषेक में देश और विदेश के कई राजाओं को आमंत्रित किया जाता है और भव्य आयोजन के बीच युधिष्ठिर का राज्याभिषेक होता है।

9) युद्ध के 15 वर्ष बाद धृतराष्ट्र, गांधारी, संजय और कुंती वन में चले जाते हैं। एक दिन धृतराष्ट्र गंगा में स्नान करने के लिए जाते हैं और उनके जाते ही जंगल में आग लग जाती है। वे सभी धृतराष्ट्र के पास आते हैं। संजय उन सभी को जंगल से चलने के लिए कहते हैं, लेकिन धृतराष्ट्र वहां से नहीं जाते हैं, गांधारी और कुंती भी नहीं जाती है। जब संजय अकेले ही उन्हें जंगल में छोड़ चले जाते हैं, तब तीनों लोग आग में झुलसकर मर जाते हैं। संजय उन्हें छोड़कर हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं, जहां वे एक संन्यासी की तरह रहते हैं। एक साल बार नारद मुनि युधिष्ठिर को यह दुखद समाचार देते हैं। युधिष्ठिर वहां जाकर उनकी आत्मशांति के लिए धार्मिक कार्य करते हैं।उ

10) एक दिन पांचों पांडव विदुर से मिलने आए। विदुर ने युधिष्ठिर को देखते ही अपने प्राण छोड़ दिए और वे युधिष्ठिर में समा गए। यह देखकर युधिष्ठिर को समझ में नहीं आया कि यह क्या हुआ? ऐसे में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया। श्रीकृष्ण प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि विदुर भी धर्मराज के अंश थे अत: वे तुम में समा गए, लेकिन अब मैं विदुर की इच्‍छानुसार दिया गया अपना वचन पूरा करूंगा। यह कहकर श्रीकृष्ण ने विदुर की इच्छानुसार उनके शरीर को सुदर्शन चक्र में बदलकर उस सुदर्शन चक्र को वहीं स्थापित कर दिया।

11) महाभारत युद्ध के बाद जब 36वां वर्ष प्रारंभ हुआ तो श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के कारण मोसुल का युद्ध हुआ जिसमें सभी यदुवंशी आपस में ही लड़कर मारे गए। साम्‍ब, चारुदेष्‍ण, प्रद्युम्‍न और अनिरुद्ध की मृत्‍यु हो गई। बस श्रीकृष्ण का एक पौत्र बचा था जिसका नाम वज्र था। बलराम ने द्वारिका के समुद्र के किनारे जाकर समाधि ले ली थी।

12) मोसुल के युद्ध के बाद प्रभाष क्षेत्र में एक वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण लेटे हुए थे तभी एक भील ने उन्हें हिरण समझकर बाण मार दिया। यह बाण उनके पैरों में आकर लगा। इस बाण से उनकी मृत्यु हो गई। अर्जुन को जब यह समाचार मिला तो वे द्वारिका पहुंचे और शोक व्यक्त किया।

13) श्रीकृष्ण के स्वर्गवास के बाद द्वारिका नगरी समुद्र में डूबने लगी। यह देख अर्जुन ने सभी यदुवंशी नारियों और कृष्ण के पौत्र को लेकर हस्तिनापुर के लिए कूच कर दिया। हजारों महिलाओं और द्वारिकावासियों के साथ उन्होंने पंचनद देश में पड़ाव डाला, जहां लुटेरों ने खूब लूटपाट की और सुंदर महिलाओं का अपहरण कर लिया। बहुत मुश्किल से अर्जुन, व्रज और कुछ नगरवासी इन्द्रप्रस्थ पहुंचे। अर्जुन ने व्रज को इन्द्रप्रस्थ का राजा बना दिया।

14) अर्जुन हस्तिनापुर जाकर महाराज युधिष्ठिर को सारा वृत्तांत सुनाते हैं। बाद में पांचों पांडव सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा से परीक्षित को राजपाट सौंपकर द्रौपदी के साथ स्वर्ग की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यात्रा के कठिन मार्ग में सबसे पहले द्रौपदी की, फिर नकुल और सहदेव की मृत्यु हो जाती है। बाद में अर्जुन भी गिर पड़ते हैं। अर्जुन के बाद भीम भी साथ छोड़ देते हैं। मार्ग में एक जगह इन्द्र खुद युधिष्ठिर को स्वर्ग ले जाने के लिए उपस्थित होते हैं। इन्द्र युधिष्ठिर को लेकर स्वर्ग चले जाते हैं।

 

Sanjay Gupta

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महाभारत में इन पंद्रह योद्धाओं को माना जाता था मायावी और रहस्यमयी???????


महाभारत में इन पंद्रह योद्धाओं को माना जाता था मायावी और रहस्यमयी???????

महाभारत में एक से एक बढ़कर योद्धा थे जो शक्तिशाली होने के साथ ही विचित्र किस्म की सिद्धियों और चमत्कारों से भी संपन्न थे। श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान विष्णु थे, लेकिन उनके समक्ष और सामने जो योद्धा लड़ रहे थे वे भी कम नहीं थे। कुरुक्षेत्र के युद्ध में इन योद्धाओं के मायावी कारनामों ने इतिहास रच दिया था।

1) सहदेव भविष्य में होने वाली हर घटना को पहले से ही जान लेते थे। वे जानते थे कि महाभारत होने वाली है और कौन किसको मारेगा और कौन विजयी होगा। लेकिन भगवान कृष्ण ने उन्हें शाप दिया था कि अगर वह इस बारे में लोगों को बताएगा तो उसकी मृत्य हो जाएगी।

2) बर्बरीक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। लेकिन श्रीकृष्ण ने युद्ध के पहले उन्हें भी ठीकाने लगा दिया उसका शीश मांगकर। आज उन्हें खाटू श्याम के नाम से जानते हैं।

3) महाभारत युद्ध में संजय वेदादि विद्याओं का अध्ययन करके वे धृतराष्ट्र की राजसभा के सम्मानित मंत्री बन गए थे। आज के दृष्टिकोण से वे टेलीपैथिक विद्या में पारंगत थे। कहते हैं कि गीता का उपदेश दो लोगों ने सुना, एक अर्जुन और दूसरा संजय। सैंकड़ों किलोमीटर दूर बैठे संजय ही धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन प्रतिदिन सुनाते थे।

4) गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा हर विद्या में पारंगत थे। वे चाहते तो पहले दिन ही युद्ध का अंत कर सकते थे, लेकिन कृष्ण ने ऐसा कभी होने नहीं दिया। कृष्‍ण यह जानते थे कि पिता-पुत्र की जोड़ी मिलकर ही युद्ध को समाप्त कर सकती है। दोनों के पास अति संहारक क्षमता वाले अस्त्र और शस्त्र थे लेनि श्रीकृष्ण को अपनी नीति से द्रोणाचार्य का वध करवा दिया।

5) कर्ण से यदि कवच-कुंडल नहीं हथियाए होते, यदि कर्ण इन्द्र द्वारा दिए गए अपने अमोघ अस्त्र का प्रयोग घटोत्कच पर न करते हुए अर्जुन पर करता तो आज भारत का इतिहास और धर्म कुछ और होता। कर्ण के कवच कुंडल होना उसके रहस्यमी व्यक्तित्व का परिचायक था।

6) कुंती-वायु के पुत्र थे भीम अर्थात पवनपुत्र भीम। भीम में हजार हाथियों का बल था। युद्ध में भीम से ज्यादा शक्तिशाली उनका पुत्र घटोत्कच ही था। घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक था। भीम ने ही दुर्योध की जंघा उखाड़कर फेंक दी थी और इससे पहले उसी ने ही जरासंध के वध किया था।

7) माना जाता है कि कद-काठी के हिसाब से भीम पुत्र घटोत्कच इतना विशालकाय था कि वह लात मारकर रथ को कई फुट पीछे फेंक देता था और सैनिकों को तो वह अपने पैरों तले कुचल देता था। भीम की असुर पत्नी हिडिम्बा से घटोत्कच का जन्म हुआ था। हिडिम्बा एक मायावी राक्षसनी थीं।

8) अभिमन्यु ने अपनी मां सुभद्रा की कोख में रहकर ही संपूर्ण युद्ध विद्या सीख ली थी। माता के गर्भ में रहकर ही उसने चक्रव्यूह को भेदना सीखा था। लेकिन वह चक्रव्यूह को तोड़ना इसलिए सीख नहीं पाया क्योंकि जब इसकी शिक्षा दी जा रही थी तब उसकी मां सो गई थीं।

9) शांतनु-गंगा के पुत्र भीष्म का नाम देवव्रत था। उनको इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। वे स्वर्ग के आठ वसुओं में से एक थे जिन्होंने एक श्राप के चलते मनुष्य योनी में में जन्म लिया था।

10) दुर्योधन का शरीर वज्र के समान कठोर था, जिसे किसी धनुष या अन्य किसी हथियार से छेदा नहीं जा सकता था। लेकिन उसकी जांघ श्रीकृष्ण के छल के कारण प्राकृतिक ही रह गई थी। इस कारण भीम ने उसकी जांघ पर वार करके उसके शरीर के दो फाड़ कर दिए थे।

11) जरासंघ का शरीर दो फाड़ करने के बाद पुन: जुड़ जाता था। तब श्रीकृष्ण ने भीम को इशारों में समझाया की दो फाड़ करने के बाद दोनों फाड़ को एक दूसरे की विपरित दिशा में फेंक दिया जाए।

12) बलराम सबसे शक्तिशाली व्यक्ति थे। यदि वे महाभारत के युद्ध में शामिल होते तो सेना की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। दरअसल बलराम का संबंध दोनों ही पक्ष से घनिष्ठ था। बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है। कहते हैं कि जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब को बंदी बना लिया था तो बलराम ने अपने हल से हस्तिनापुर की धरती को हिलाकर चेताया था कि यदि समझौता नहीं किया तो इस नगरी को उखाड़कर फेंक दूंगा। दुर्योधन हर के इस भूकंप से डर गया था।

13) यह सुनने में अजीब है कि युद्ध के लिए अर्जुन के बेटे इरावन की बलि दी गई थी। बलि देने से पहले उसकी अंतमि इच्छा थी कि वह मरने से पहले शादी कर ले। लेकिन इस शादी के लिए कोई भी लड़की तैयार नहीं थी क्योंकि शादी के तुरंत बाद उसके पति को मरना था। इस स्थिति में भगवान कृष्ण ने मोहिनी का रूप लिया और इरावन से न केवल शादी की बल्कि एक पत्नी की तरह उसे विदा करते हुए रोए भी। यही इरावन आज देशभर के किन्नरों का देवता है।

14) एकलव्य का नाम तो सभी ने सुना होगा। एकलव्य अपनी विस्तारवादी सोच के चलते जरासंध से जा मिला था। जरासंध की सेना की तरफ से उसने मथुरा पर आक्रमण करके यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। इसका उल्लेख विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में मिलता है। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने एकलव्य को भी युद्ध करके निपटा दिया था अन्यथा वह महाभारत में कोहराम मचा देता। एकलव्य के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उसका पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठता है और वह कौरवों की सेना की ओर से पांडवों के खिलाफ लड़ता है। महाभारत युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा जाता है।

15) शकुनी भी मायावी था। उसके पासे उसकी ही बात मानते थे। युद्ध में शकुनी ने श्रीकृष्‍ण और अर्जुन को मोहित करते हुए उनके प्रति भयंकर तरीके से माया का प्रयोग किया था। शकुनी की माया से अर्जुन की ओर हजारों तरह के हिंसक पशु दौड़ने लगे थे। आसमान से लोगों के गोले और पत्थर गिरने लगे थे। कई तरह के अस्त्र शस्त्र सभी दिशाओं से आने लगे थे। अर्जुन इस माया जाल से कुछ समय के लिए तो घबरा गए थे लेकिन उन्होंने दिव्यास्त्र का प्रयोग कर इसको काट दिया था।

इसके अलावा भूरिश्रवा, सात्यकी, युयुत्सु, नरकासुर का पुत्र भगदत्त आदि कई अन्य योद्धा भी थे। इस तरह हमने देखा कि महाभारत में कई तरह के वि‍चित्र और मायावी योद्धा थे। उपर हमें कुछ खास योद्धाओं का ही वर्णन किया।