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ॐ नमः शिवाय,ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि । ॐ नमः शिवाय, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमन्यं स्नानं समर्पयामि।


ॐ नमः शिवाय,ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ।
ॐ नमः शिवाय, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमन्यं स्नानं समर्पयामि।

सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् .
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु .

हे महादेव, मैंने अपने मन में नवीन रत्नखण्डों से जड़ित स्वर्ण पात्रों में धृतयूक्त खीर, दुध एवं दही युक्त पाँच प्रकार के व्यंजन, रम्भा फल एवं शुद्ध मीठा जल ताम्बुल और कर्पूर से सुगन्धित धुप आपके लिए प्रस्तुत किया है। हे प्रभू मेरी इस भक्ति को स्वीकार करें।

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम्
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा .
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ..

हे प्रभो! मैंने सकंल्प द्वारा आपके लिए एक छ्त्र, दो चंवर, पंखा एव निर्मल दर्पन की कल्पना की है। आपको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए, तथा विणा, भेरि एवं मृदङ्ग के साथ गीत, नृत्य एव बहुदा प्रकार की स्तुति प्रस्तुत करता हूँ। हे प्रभो! मेरी इस पूजा को ग्रहण करें।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः .
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ..

हे शम्भों ! आप मेरी आत्मा हैं, माँ भवानी मेरी बुद्धी हैं, मेरी इन्द्रियाँ आपके गण हैं एवं मेरा शरीर आपका गृह है। सम्पुर्ण विषय-भोग की रचना आपकी ही पूजा है। मेरे निद्रा की स्थिति समाधि स्थिति है, मेरा चलना आपकी ही परिक्रमा है, मेरे शब्द आपके ही स्तोत्र हैं। वास्त्व में मैं जो भी करता हूँ वह सब आपकी आराधना ही है।

करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा .
श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधम् .
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व .
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो ..

हे प्रभो! मेरे हाथ या पैर द्वारा, कर्म द्वारा, वाक्य या स्रवण द्वारा या मन द्वारा हुए समस्त विहित अथवा अविहित अपराधों को क्षमा करें। हे करूणा मय महादेव सम्भों आपकी सदा जय हो।

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ेवी देवताओं के गायत्री मन्त्र


ेवी देवताओं के गायत्री मन्त्र ~
(१) विष्णु गायत्री – त्रैलोक्य-मोहनाय विद्महे काम-
देवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।
(२)नारायण गायत्री – नारायणाय विद्महे वासुदेवाय
धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।
(३)नृसिंह गायत्री – वज्र नखाय विद्महे
तीक्ष्ण दंष्ट्राय
धीमहि तन्नो नरसिंहः प्रचोदयात्।
(४)गोपाल गायत्री -कृष्णाय विद्महे दामोदराय
धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।
(५)राम गायत्री – द्शरथाय विद्महे
सीता वल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्।
(६)शिव गायत्री – तत्पुरुषाय विद्महे महा-देवाय
धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।
७)गणेश गायत्री – दक्षिणामूर्तये विद्महे वक्रतुण्डाय
धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।
(८)सूर्य गायत्री – आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय
धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।
(१०)दुर्गा गायत्री – महा देव्यै विद्महे दुर्गायै
धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।
(११)लक्ष्मी गायत्री – महा लक्ष्म्यै
विद्महे महा – श्रियै
धीमहि तन्नः श्रीः प्रचोदयात्।
(१२)सरस्वती गायत्री – वाग्देव्यै विद्महे
काम- राजाय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।
(१३)अन्नपूर्णा गायत्री – भगवत्यै विद्महे माहेश्वर्यै
धीमहि तन्नोऽन्नपूर्णे प्रचोदयात्।
(१४)कालिका गायत्री – कालिकायै विद्महे श्मशान-वासिन्यै
धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।
(१५)काम गायत्री – काम देवाय विद्महे पुष्प-बाणाय
धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात्।

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पुराणोक्त पितृ -स्तोत्र :


पुराणोक्त पितृ -स्तोत्र :
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।।
प्रजापतं कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु I

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रुद्र – सूक्तम्


रुद्र – सूक्तम्
नमस्ते रुद्र मन्यवऽ उतोतऽ इषवे नम :
बाहुभ्यामुत

ते नम : ॥१॥
हे रुद्र । आपको नमस्कार है , आपके क्रोध

को नमस्कार है , आपके वाण को नमस्कार है और

आपकी भुजाओं को नमस्कार है ।
या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी ।

तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्तभिचाकशीहि ॥

२॥
हे गिरिशन्त अर्थात् पर्वत पर स्थित होकर सुख

का विस्तार करने वाले रुद्र ।
आप हमें अपनी उस

मङ्गलमयी मूर्ति द्वारा अवलोकन करें

जो सौम्य होने के कारण केवल पुण्यों का फल

प्रदान करने वाली है ।
यामिषुङ्गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे ।

शिवाङ्गिरित्र तां कुरु मा हि सी :

पुरुषञ्जगत् ॥३॥
हे गिरिशन्त । हे गिरित्र अर्थात् पर्वत पर

स्थित होकर त्राण करने वाले । आप प्रलय करने

के लिए जिस बाण को हाथ में धारण करते हैं उसे

सौम्य कर दें और जगत् के जीवों की हिंसा न

करें ।
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छावदामसि ।

यथा न : सर्वमिज्जगदयक्ष्म सुमनाऽ असत् ॥४॥
हे गिरिश । हम आपको प्राप्त करने के लिए

मंगलमय स्तोत्र से आपकी प्रार्थना करते हैं ।

जिससे हमारे यह सम्पूर्ण जगत् रोग रहित एवं

प्रसन्न हो ।
अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक् ।

अहींश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च

यातुधान्योधराची : परासुव ॥५॥
शास्त्र सम्मत बोलने वाले , देव हितकारी ,

परमरोग नाशक , प्रथम पूज्य रुद्र हमें श्रेष्ठ कहें

और सर्पादिका विनाश करते हुए

सभी अधोगामिनी राक्षसियों आदि को भी हमसे

दूर करें ।
असौ यस्ताम्रोऽ अरुणऽ उत बब्भ्रु : सुमङ्गल : ।

ये चैन रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिता :

सहस्त्रशो वैषा हेडऽ ईमहे ॥६॥
ये जो ताम्र , अरुण और पिङ्ग वर्ण वाले मंगलमय

सूर्य रूप रुद्र हैं और जिनके चारों ओर जो ये

सहस्त्रों किरणों रूप रुद्र हैं , हम

भक्ति द्वारा उनके क्रोध का निवारण करते हैं


असौ योवसर्पति नीलग्रीवो विलोहित : ।

उतैनं गोपाऽ अदृश्रन्नदृश्रन्नुदहार्य :

सदृष्टो मृडयाति न : ॥७॥
ये जो विशेष रक्तवर्ण सूर्य रूप नीलकण्ठ रुद्र

गतिमान हैं , जिन्हें गोप देखते हैं , जल

वाहिकाएं देखती हैं वह हमारे देखे जाने पर

हमारा मङ्गल करें ।
नमोस्तु नीलग्रीवाय सहस्त्राक्षाय मीढुषे ।

अथो येऽ अस्य सत्त्वानोहन्तेभ्यो करन्नम : ॥८॥
सेचनकारी सहस्त्रों नेत्रों वाले पर्जन्य रूप

नीलकण्ठ रूद्र को हमारा नमस्कार है और इनके

जो अनुचार है उन्हें भी हमारा नमस्कार है ।
प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरात्क्रर्योर्ज्याम् ।

याश्च ते हस्तऽ इषव : पराता भगवो व्वप ॥९॥
हे भगवन् । आपके धनुष की कोटियों के मध्य यह

जो ज्या है उसे आप खोल दें और आपके हाथ में ये

जो वाण हैं उन्हें आप हटा दें और इस प्रकार

हमारे लिए सौम्य हो जांयँ ।
विज्यन्धनु : कपर्दिनो विशल्यो वाणवाँ २॥

ऽउत।

अनेशन्नस्य याऽ इषवऽ आभुरस्य निषङ्गधि : ॥

१०॥
जटाधारी रूद्र का धनुष ज्यारहित , तूणीर

फलकहीन वाणरहित , वाण दर्शन रहित और

म्यान खंगरहित हो जाय अर्थात् ये सौम्य

हो जाएं ।
या ते हेतिर्म्मीढुष्टम हस्ते बभूव ते धनु : ।

तयास्मान्विश्वतस्त्वमयक्ष्मया परिभुज ॥११॥
हे संतृप्त करने वाले रुद्र । आपके हाथ में जो आयुध

है और आपका जो धनुष है उपद्रव रहित उस आयुध

या धनुष द्वारा आप हमारी सब ओर से

रक्षा करें ।
परिते धन्विनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वत : ।

अथो यऽ इषुधिस्तवारेऽ अस्मन्निधेहि तम् ॥१२॥
आप धनुर्धारी का यह जो आयुध है वह

हमारी रक्षा करने के लिए हमें चारों ओर से घेरे

रहे किन्तु यह जो आपका तरकस है उसे आप हमसे

दूर रखें ।
अवतत्त्यधनुष्ट्व सहस्त्राक्ष शतेषुधे ।

निशीर्य्य शल्यानाम्मुखा शिवो न :

सुमना भव ॥१३॥
हे सहस्त्रों नेत्रों वाले , सैकडों तरकस वाले रुद्र

। आप अपने धनुष को ज्या रहित और वामों के

मुखों को फलक रहित करके हमारे लिए सुप्रसन्न

एवं कल्याणमय हो जांयँ ।
नमस्त ऽआयुधायानातताय धृष्णवे ।

उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यान्तव धन्नवने ॥१४॥
हे रुद्र । धनुष पर न चढाये गये आपके वाण

को नमस्कार है , आपकी दोनों भुजाओं

को नमस्कार है एवं शत्रु – संहारक आपके धनुष

को नमस्कार है ।
मा नो महान्तमुत मा नोऽ अर्ब्भकम्मा न

उक्षन्तमुत मा नऽ उक्षितम् ।

मा नो व्वधी : पितरम्मोत मातरम्मा न :

प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिष : ॥१५॥
हे रुद्र हमारे बडों को मत मारो । हमारे

बच्चों को मत मारो । हमारे तरुणों को मत

मारो । हमारे भ्रूणों को मत मारो । हमारे

पिताओं की हिंसा न करो ।

हमारी माताओं की हिंसा न करो ।
मानस्तोके तनये मा नऽ आयुषि मा नो गोषु

मा नोऽ अश्वेषु रीरिष : ।

मा नो वीरान्नरुद्र

भामिनो वधीर्हविष्मन्त :

सदमित्त्वा हवामहे ॥१६॥
हे रुद्र । हमारे पुत्रों पर और हमारे पौत्रों पर

क्रोध न करें । हमारी गायों पर और हमारे

घोडों पर क्रोध न करें । हमारे क्रोधयुक्त

वीरों को न मारें । हम हविष्य लिए हुए

निरन्तर यज्ञार्थ आपका आवाहन करते हैं ।
हर हर महादेव
बृजमोहन ओजा दधीचि

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રુદ્રી


*રુદ્રી*

રુદ્રીના આઠ અઘ્યાય હોવાથી અષ્ટાઘ્યાયી કહેવાય છે તથા જેમાં ભગવાન રુદ્ર એટલે કે શિવનું વર્ણન હોવાથી ‘રુદ્રી’ કહેવાય છે. આ આઠ અઘ્યાયોમાં પ્રથમ અઘ્યાયને ‘શિવસંકલ્પ સૂકત’ના નામે ઓળખવામાં આવે છે. આ અઘ્યાયમાં આવતા છ મંત્રોમાં આપણા મનનું સૂક્ષ્મ વર્ણન છે. શાસ્ત્ર અનુસાર બ્રહ્માએ પહેલા માનવીના મનની રચના કરી ત્યાર બાદ માનવ શરીરની રચના કરી છે.

*પ્રથમ અઘ્યાય*
પ્રથમ અઘ્યાયમાં ઋષિઓ શિવને પ્રાર્થના કરે છે. હે શિવ! અમારું આ ચંચળ મન અનેક પ્રકારના તર્ક-વિતર્ક અને વિચારો કરે છે. તમારી પૂજામાં સ્થિર બનતું નથી. આપ અમારા આ મર્કટ જેવા મનને સ્થિર કરો, પવિત્ર વિચારોવાળું બનાવો. દરેક મંત્રના અંતમાં આવે છે ‘તન્મે મન: શિવસંકલ્પમસ્તુ’ હે શિવ! અમારું મન ઉદાર અને પવિત્ર બનો.

*દ્વિતીય અઘ્યાય*
અષ્ટાઘ્યાયી રુદ્રીના બીજા અઘ્યાયને આપણે ‘પુરુષસૂકત’ના નામે જાણીએ છીએ. આ પુરુષસૂકત ભારત વર્ષના દરેક પંડિતો બોલે છે. તેના દિવ્ય મંત્રોથી દેવોની ષોડશોપચાર પૂજા થાય છે. આ પુરુષસૂકતના ૧૬ મંત્રોમાં પરમાત્માના વ્યાપક સ્વરૂપનું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે. ભગવદ્ ગીતામાં જેમ ભગવાનના વિરાટ સ્વરૂપનું વર્ણન આવે છે તે જ રીતે આ બીજા અઘ્યાયમાં ભગવાનના વિરાટ સ્વરૂપનું વર્ણન છે. હે પ્રભુ! આપ ચૌદ બ્રહ્માંડને માપી લીધા પછી પણ આપ એક મુઠ્ઠી જેટલા વધો છો.

*તૃતીય અઘ્યાય*
રુદ્રીના ત્રીજા અઘ્યાયને ‘અપ્રતિરથસૂકત’ કહેવામાં આવે છે. અપ્રતિરથનો અર્થ છે, જેના રથને કોઇ અટકાવી શકતું નથી. સૂર્યના રથને કોણ અટકાવી શકે? આ અઘ્યાયમાં દેવોના રાજા ઇન્દ્રને લગતા મંત્રો છે. હે ઇન્દ્ર! અમે આપના જેવા બળવાન તથા ચપળ બનીએ. અમારામાં નીડરતા અને ચપળતા આવે.

*ચતુર્થ અઘ્યાય*
અષ્ટાઘ્યાયી રુદ્રીના ચોથા અઘ્યાયને ‘મૈત્રસૂકત’ કહેવામાં આવે છે. સૂર્યનું એક નામ મિત્ર છે. સૂર્યની કૃપાથી જ ભૌતિક ક્રિયાઓ થાય છે. વરસાદ, ધન, ધાન્ય, વનસ્પતિ આ બધું સૂર્યકૃપાથી જ આપણને મળે છે. નવ ગ્રહો તથા આપણી પૃથ્વીને પણ સૂર્યમાંથી બળ પ્રાપ્ત થાય છે. સૂર્યનારાયણની ઉપાસનાથી આત્મબળ તથા જ્ઞાન પ્રાપ્ત થાય છે.

*પંચમ અઘ્યાય*
અષ્ટાઘ્યાયી રુદ્રીના પાંચમા અઘ્યાયને ‘રુદ્ર’ કહેવામાં આવે છે કારણ કે આ અઘ્યાયમાં કેવળ શિવજીનું વર્ણન આવે છે. આ અઘ્યાયને ‘શતરુદ્રીયમ્’ પણ કહેવામાં આવે છે, કારણ કે આ અઘ્યાયમાં શિવજીનાં સો સ્વરૂપોનું વર્ણન આવે છે. ‘નમ:સભાભ્ય:’ દેવોની સભામાં સભાપતિ બનીને બેઠેલા, પાર્વતી સાથે બેઠેલા, સ્મશાનમાં બેઠેલા, જટાવાળા, જટા વગરના, ઉપદેશ આપતા, કવચ ધારણ કરીને બેઠેલા, આનંદમાં આવીને દુંદુભી વગાડી રહેલા, પારધીના રૂપમાં, ભીલના રૂપમાં, હિંસક પ્રાણીઓના રૂપમાં ભ્રમણ કરતા શિવ. આવાં સો સ્વરૂપોનું વર્ણન આવે છે, માટે પાંચમા અઘ્યાયને ‘શતરુદ્રીયમ્’ કહેવામાં આવે છે. આ અઘ્યાયમાં ૬૬ મંત્રો આવે છે. શિવજીના યજ્ઞમાં બીજા અઘ્યાય માત્ર એક વાર બોલવામાં આવે છે, જયારે પાંચમો અઘ્યાય વારંવાર બોલવામાં આવે છે. આ અઘ્યાય ૧૧ વખત બોલવાથી ૧ રુદ્રી ગણાય છે. ૧૨૧ વાર બોલવાથી ૧ લઘુરુદ્ર થયો કહેવાય તથા ૧૩૩૧ વાર બોલવાથી ૧ મહારુદ્ર ગણાય છે. શિવજીને સંહારના દેવ માનવામાં આવે છે. માણસના મરણ સમયે કફ-તાવ-પિત્તનો હુમલો થાય છે, જીવ ગભરાય છે ત્યારે શિવજી તેને આ પીડામાંથી મુકત કરે છે. હે પ્રભુ! અમને તમારા સંહારરૂપ બાણોથી બચાવો. અમને મૃત્યુના મૂળમાંથી મુકત કરીને અમૃતના માર્ગે, મોક્ષના માર્ગે લઇ જાઓ.

*ષષ્ઠો અઘ્યાય*
છઠ્ઠા અઘ્યાયમાં ઉગ્ર અને મૃત્યુના પાશમાંથી છોડાવનારા, મુકત કરનારા શિવજીનું વર્ણન છે. આ અઘ્યાયમાં ભગવાન શિવને ઉત્તમ વૈધ કહેવામાં આવ્યા છે. આ અઘ્યાયનું વારંવાર પઠન કરવાથી, શ્રવણ કરવાથી મનુષ્યને અસાઘ્ય રોગમાંથી પણ મુકિત મળે છે, મનોકામના પરિપૂર્ણ થાય છે. શિવજી તેના માટે કોમળ બને છે.

*સપ્તમ અઘ્યાય*
રુદ્રીના સાતમા અઘ્યાયને પંડિતો નમક-ચમક કહે છે. પંડિતો પરસ્પર વાતો કરે, ચાલો ભાઈ નમક ભણો નમક એટલે મીઠું ન સમજતા અને ચમક એટલે ચમક ચૂનો ન સમજતા. નમક ચમક એટલે જે અઘ્યાયમાં વારંવાર ચમે ચમે આવે છે તથા નમ: નમ: આવે છે માટે નમક ચમક કહેવાય છે. આ અઘ્યાયના મંત્રોમાં ભકત શિવજી પાસે અનેક પ્રકારની વસ્તુઓની માગણી કરે છે. જેમ કે વ્રીહયશ્ચમે જવાશ્ચમે હે શિવ! અમને ઘઉં, ડાંગર, મગ, ચણા જેવા દરેક પ્રકારનાં ધાન્ય મળો, શ્યામંશ્ચમે અમને સોનું, પિત્તળ, લોઢું, પથ્થર પ્રાપ્ત થાઓ. અમને અભયની પ્રાપ્તિ થાય, સુંદર મિત્રો તથા ઉત્તમ સંતાનોની પ્રાપ્તિ થાય, પરંતુ આ બધું અમને તારી કૃપાથી તથા યજ્ઞથી પ્રાપ્ત થાય. મિત્રો કેવી ઉત્તમ ભાવના. ભકત પહેલાં યજ્ઞ કરે છે ત્યાર બાદ પ્રભુ પાસે માગણી કરે છે.

*અષ્ટમ અઘ્યાય*
આઠમા અઘ્યાયને શાંતિ અઘ્યાય કહેવામાં આવે છે. આ અઘ્યાયમાં ઇન્દ્ર, વરુણ, વાયુ, બૃહસ્પતિ, નારાયણ, અગ્નિ આવા અનેક દેવોની પ્રાર્થના છે. શંનો મિત્ર: હે સૂર્ય અમારું કલ્યાણ કરો, શં વરુણ: હે વરુણ અમારું કલ્યાણ કરો, શંનો બૃહસ્પતિ: હે દેવગુરુ બૃહસ્પતિ અમારું કલ્યાણ કરો, શંનો વિષ્ણુરુરુ ક્રમ: હે ત્રણ ડગલાં ભરનાર નારાયણ અમારું કલ્યાણ કરો. આવો આપણે પણ આ બધા દેવોને હૃદયપૂર્વક પ્રાર્થના કરીએ તથા કલ્યાણની, શાંતિની માગણી કરીએ.

*ઉપસંહાર*
આ અઘ્યાયમાં શિવનાં નામોનો ઉલ્લેખ છે. પંચમુખ શિવને અલગ અલગ મંત્રો બોલીને નમસ્કાર કરવામાં આવ્યા છે. શિવની મહાપૂજામાં શિવના પંચમુખની પૂજા થાય છે ત્યારે આ દિવ્ય મંત્રોનું પઠન કર્યા બાદ આરતી થાય છે.
શાસ્ત્રી સંદીપ પંડયા ગોઝારીયાવાળા

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भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि, धीयो यो न: प्रचोदयात्।


यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3
भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि, धीयो यो न: प्रचोदयात्।
अनुवाद:- (भूः) स्वयंभू परमात्मा है (भवः) सर्व को वचन से प्रकट करने वाला है (स्वः) सुख धाम सुखदाई है। (तत्) वह (सवितुः) सर्व का जनक परमात्मा है। (वरेणीयम) सर्व साधकांे को वरण करने योग्य अर्थात् अच्छी आत्माओं के भक्ति योग्य है। (भृगो) तेजोमय अर्थात् प्रकाशमान (देवस्य) परमात्मा का (धीमहि) उच्च विचार रखते हुए अर्थात् बड़ी समझ से (धी यो नः प्रचोदयात) जो बुद्धिमानों के समान विवेचन करता है, वह विवेकशील व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बनता है।
भावार्थ: परमात्मा स्वयंभू है, सर्व का सृजनहार है। उस उज्जवल परमेश्वर की भक्ति श्रेष्ठ भक्तों को यह विचार रखते हुए करनी चाहिए कि जो पुरुषोत्तम (सर्व श्रेष्ठ परमात्मा) है, जो सर्व प्रभुओं से श्रेष्ठ है, उसकी भक्ति करें जो सुखधाम अर्थात् सर्वसुख का दाता है।
वेद मंत्र में कहीं भी ॐ नहीं लिखा है। ये अज्ञानी संतो की अपनी सोच से लगाया गया है। आज से दो सौ वर्ष पुर्व किसी ने इस मन्त्र का उच्चारण विशेष रूप से परमात्मा की स्तुति के लिये नही किया । वेद वाचन और मनन के अतिरिक्त इस मन्त्र को साधना बता कर जोडना परमात्मा के विधान की सीधे तोर पर खण्डन करना ही है क्युकीं परमात्मा द्वारा रचित मन्त्र को किसी भी तरह तोड मरोड करना परमात्मा मे कमी बताना ही है , वेद मन्त्रो का अनुवाद करना अलग विषय है ।
वेदवती दास

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नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ॥


नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ॥

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥1॥
(हे मोक्षरूप, विभु, व्यापक ब्रह्म, वेदस्वरूप ईशानदिशा के ईश्वर और सबके स्वामी शिवजी, मैं आपको नमस्कार करता हूं. निज स्वरूप में स्थित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन, आकाश रूप शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूं.)
निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं । गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।

करालं महाकालकालं कृपालं । गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥2॥
(निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत) वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे परमेशवर को मैं नमस्कार करता हूं.)
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं । मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ॥

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा । लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥3॥
(जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित है…)
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥4॥
(जिनके कानों में कुण्डल शोभा पा रहे हैं. सुन्दर भृकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्न मुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं. सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाल पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ श्री शंकरजी को मैं भजता हूं.)
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥

त्रय: शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥5॥
(प्रचंड, श्रेष्ठ तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोडों सूर्य के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूं.)
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ॥

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥6॥
(कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप, प्रलय करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुरासुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालनेवाले हे प्रभो, प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए.)
न यावद् उमानाथपादारविन्दं । भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥7॥
(जब तक मनुष्य श्रीपार्वतीजी के पति के चरणकमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक में, न ही परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और अनके कष्टों का भी नाश नहीं होता है. अत: हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइए.)
न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ॥

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥8॥
(मैं न तो योग जानता हूं, न जप और न पूजा ही. हे शम्भो, मैं तो सदा-सर्वदा आप को ही नमस्कार करता हूं. हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म के दु:ख समूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दु:खों से रक्षा कीजिए. हे शम्भो, मैं आपको नमस्कार करता हूं.)
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ॥।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥9॥
(जो मनुष्य इस स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर शम्भु विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं.)

अविनाश गौर