Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

लता जी के साथ में कौन हैं?जानते हैं??सलिल चौधरी जी का नाम भी सुना नहीं होगा अधिकांश ने ! 1958 में साउथ कैलिफोर्निया (लॉस एंजेल्स) में एक भारतीय संगीत वाद्य यंत्रों (म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स) की एक बहुत फेमस दुकान हुआ करती थी.. वो एकमात्र दुकान थी जो पूरे अमेरिका में प्रामाणिक भारतीय वाद्य यंत्रों को बेचती थी.. डेविड बर्नाड इसके मालिक हुआ करते थे..
एक दिन एक 36 वर्षीय भारतीय नौजवान इस दुकान में आया और वाद्य यंत्रों को बड़े ध्यान से देखने लगा….. साधारण वेशभूषा वाला ये आदमी वहां के सेल्स के लोगों को कुछ ख़ास आकर्षित नहीं कर सका, मगर फिर भी एक सेल्स गर्ल क्रिस्टिना उसके पास आ कर बनावटी मुस्कान से बोली कि “मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ ?”
उस नौजवान ने सितार देखने की मांग की और क्रिस्टिना ने उसको सितारों के संग्रह दिखाए.. मगर उस व्यक्ति को सारे सितार छोड़ कर एक ख़ास सितार पसंद आई और उसे देखने की ज़िद की.. क्यूंकि वो बहुत ऊपर रखी थी और शोकेस में थी इसलिए उसको उतारना मुश्किल था.. तब तक डेविड, जो की दूकान के मालिक थे, वो भी अपने केबिन से निकलकर आ गए थे क्योंकि आज तक किसी ने उस सितार को देखने की ज़िद नहीं की थी.. बहरहाल सितार उतारी गयी तो क्रिस्टिना शेखी घबराते हुवे बोली “इसे “बॉस” सितार कहा जाता है और आम सितार वादक इसे नहीं बजा सकता है। ये बहुत बड़े बड़े शो में इस्तेमाल होती है।”
वो भारतीय बोला “आप इसे “बॉस” सितार कहते हैं मगर हम इसे “सुरबहार” सितार के नाम से जानते हैं.. क्या मैं इसे बजा कर देख सकता हूँ”?
अब तक तो सारी दुकान के लोग वहां इकठ्ठा हो चुके थे..खैर.. डेविड ने इजाज़त दी बजाने की और फिर उस भारतीय ने थोड़ी देर तार कसे और फिर सुर मिल जाने पर वो उसे अपने घुटनों पर ले कर बैठ गया.. और फिर उसने राग “खमाज” बजाया …. उसका वो राग बजाना था कि सारे लोग वहां जैसे किसी दूसरी दुनिया में चले गए.. किसी को समय और स्थान का कोई होश न रहा.. जैसे सब कुछ थम गया वहां.. जब राग खत्म हुआ तो वहां ऐसा सन्नाटा छा चुका था जैसे तूफ़ान के जाने के बाद होता है.. लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि वो ताली बजाएं कि मौन रहें..
डेविड इतने अधिक भावुक हो गए कि उस भारतीय से बोले कि “आखिर कौन हो तुम.. मैंने रवि शंकर को सुना है और उन जैसा सितार कोई नहीं बजाता; मगर तुम उन से कहीं से कम नहीं हो.. मैं आज धन्य हो गया कि आप मेरी दुकान पर आये.. बताईये मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ”
उस व्यक्ति ने वो सितार खरीदने के लिए कहा मगर डेविड ने कहा इसको मेरी तरफ से उपहार के तौर पर लीजिये.. क्यों इस सितार का कोई मोल नहीं है, ये अनमोल है, इसे मैं बेच नहीं सकता..
क्रिस्टिना जो अब तक रो रही थी, उन्होंने उस भारतीय को चूमा और एक डॉलर का नोट देते हुए कहा कि “मैं भारतीयों को कम आंकती थी और अपने लोगों पर ही गर्व करती थी.. आप दुकान पर आये तो भी मैंने बुझे मन से आपको सितार दिखायी थी.. मगर आपने मुझे अचंभित कर दिया.. फिर पता नहीं आपसे कभी मुलाक़ात हो या न हो, इसलिए मेरे लिए इस पर कुछ लिखिए”. उस व्यक्ति ने क्रिस्टिना की तारीफ करते हुए अंत में नोट पर अपना नाम लिखा
“सलिल चौधरी”
उसी वर्ष सलिल चौधरी ने अपनी एक फ़िल्म के लिए उसी सुरबहार सितार का उपयोग करके एक बहुत प्रसिद्ध बंगाली गाना बनाया जो राग खमाज पर आधारित था.. बाद में यही गाना हिंदी में बना जिसको लता जी ने गाया.. गाने के बोल थे
ओ सजना.. बरखा बहार आई..
रस की फुहार लायी..
अखियों में प्यार लायी
फिल्म “परख” (1959/60)
✍..Anshu Raj

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

THE LADY WHO DESIGNED THE PARAM VIR CHAKRA :

*AN UNBELIEVABLE LOVE STORY * 🙏🙏🙏

The Param Vir Chakra was designed by Savitri Khanolkar, a Swiss national whose real name was Eve Yvonne Maday de Maros, married to an Indian Army officer, Vikram Ramji Khanolkar.

She was born in Neuchatel, Switzerland to a Hungarian father and Russian mother. Her father, André de Maday, was a professor of sociology at Geneva University, while her mother, Marthe Hentzelt, taught at the Rosseau Institute. In 1929, she met Vikram Khanolkar, a young Indian Army cadet undergoing training at Sandhurst, who had come to Switzerland for a break. She was still a teenager then; however, both fell in love although Vikram was much older than her.

She came to India in 1932 – though her father was not too keen on it – and married Vikram in Lucknow. She changed her name to Savitri Bai after marriage. In spite of her European background she quickly adapted to Hindu tradition.

She became a vegetarian, learnt to speak fluent Marathi, Hindi and Sanskrit. And also learnt Indian music, dance and painting. She called herself an European with an Indian soul, and never liked being called a foreigner. She had a deep interest in Hindu Puranas, which she read extensively, and also studied India’s ancient history and its legends. It was due to this that Major Hira Lal Atal, the first Indian Adjutant General of independent India, asked her help in designing the Param Vir Chakra.

Drawing on her extensive knowledge of the Puranas, Savitri Bai thought of Rishi Dadhichi, who had given up his own body for Indra to make the deadly Vajra, or thunderbolt. She came up with the design of a double Vajra, a common Tibetan motif then. The Param Vir Chakra is cast in bronze, with a radius of 1 and 3/8th inches. In the centre, on a raised circle, is the Ashok stambh, surrounded by four replicas of Indra’s Vajra and flanked by swords.

Incidentally, the first recipient of the PVC, Major Somnath Sharma, was the brother-in-law of Savitri Bai’s elder daughter Kumudini, who died while fighting at the Battle of Badgam during the 1948 war with Pakistan.

She also did a lot of social work, helping the families of soldiers killed in war, as well as Partition refugees. After her husband passed away in 1952, Savitri Bai sought refuge in spirituality and spent her later years with the Ramakrishna Math. She also wrote a book on the Saints of Maharashtra.

She passed away on 26 November 1990 at the age of 77 after leading a truly remarkable life. A Swiss national of mixed Hungarian-Russian descent, married to an Indian Army officer, who adapted to the Hindu ethos extremely well, had designed the Param Vir Chakra, the highest military award in India!

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

ये सारी उपलब्धियां पढ़ें

  1. हावड़ा में गंगा पर पुल बनाकर कलकत्ता शहर बसाया
  2. अंग्रेजों को ना तो नदी पर टैक्स वसूलने दिया और ना दुर्गा पूजा की यात्रा रोकने दिया
  3. कलकत्ता में दक्षिणेश्वर मंदिर बनवाया
  4. कलकत्ता में गंगा नदी पर बाबू घाट, नीमतला घाट बनवाया
  5. श्रीनगर में शंकराचार्य मंदिर का पुनरोद्धार करवाया
  6. मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की दीवार बनवाई
  7. ढाका में मुस्लिम नवाब से 2000 हिंदुओं की स्वतंत्रता खरीदी
  8. रामेश्वरम से श्रीलंका के मंदिरों के लिए नौका सेवा शुरू किया
  9. कलकत्ता का क्रिकेट स्टेडियम इनके द्वारा दान दी गई भूमि पर बना है।
  10. सुवर्ण रेखा नदी से पुरी तक सड़क बनाया
  11. प्रेसिडेंसी कॉलेज और नेशनल लाइब्रेरी के लिए फंद दिया

क्या इस महान हस्ती को नेहरू, मौलवी, पादरी ने आपके सिलेबस में शामिल किया?

इन महान हस्ती का नाम रानी राशमणि है। ये कलकत्ता के जमींदार की विधवा थी। 1793 से 1863 तक के जीवन काल में रानी ने इतना यश कमाया है कि इनकी बड़ी बड़ी प्रतिमाएं दिल्ली और शेष भारत में लगनी चाहिए थी।

रानी राशमणि कैवर्त जाति की थी जो आजकल अनुसूचित जाति में शामिल है। क्या दलित नेताओं को रानी राशमणि को नायिका नहीं बनाना चाहिए था?
साभार: नीलम अरोड़ा

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

पुराने व्यापारियों की एक प्रथा थी कि वे सुबह दुकान खोलते ही एक छोटी-सी कुर्सी दुकान के बाहर रख देते थे। ज्यों ही पहला ग्राहक आता, दुकानदार कुर्सी को उस जगह से उठाकर दुकान के अंदर रख देता था।

लेकिन जब दूसरा ग्राहक आता तो दुकानदार बाज़ार पर एक नज़र डालता और यदि किसी दुकान के बाहर कुर्सी अभी भी रखी होती तो वह ग्राहक से कहता-‘’आपकी ज़रूरत की ची ज़ उस दुकान से मिलेगी। मैं सुबह की बोहनी कर चुका हूँ।’’

किसी कुर्सी का दुकान के बाहर रखे होने का अर्थ था कि अभी तक दुकानदार ने बोहनी नहीं की है।

यही वजह थी कि जिन व्यापारियों में ऐसा प्रेम-भाव हुआ करता थी, उन पर ईश्वरीय कृपा हमेशा बनी रहती थी।

सनातन धर्म की यही विशेषता है कि वह समस्त विश्व का कल्याण चाहता है।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। (महोपनिषद्,अध्याय ४,श्‍लोक ७१)

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

फार कमी जणांना माहीत असेल
पुढच्या पिढीला पण माहीत करून द्या…

🚩 छत्रपती शिवाजी महाराज🚩

शिवाजी महाराजांचे 7 घोडे –
1- मोती
2- विश्वास
3- तुरंगी
4- इंद्रायणी
5- गाजर
6- रणभीर
7- कृष्णा- शेवटच्या काळातील पांढरा घोडा. महाराज राज्याभिषेकांनंतर या वर बसले.
शिवाजी महाराज घोड्याचा वापर निर्णायक प्रसंगीच करत असत.

छत्रपती शिवरायांचा आहार साधा होता.
संपूर्ण जीवन निर्व्यसनी. मोहिमेच्यावेळी तंबूत झोपणे. दैनंदीन पोशाख साधा परंतु दरबारी पोशाख राजेशाही असे. काळी दाढी, मिशी, लांब केस, मोठे व तेजस्वी डोळे, भेदक नजर, अत्यंत सावध, बोलतांना स्मित हास्य. उंची पेक्षा हाताची लांबी नजेरेत भरणारी.

मराठी माणसाला स्वाभीमानाने जगायला शिकविले.

जगातील 111 देशात १९फ़ेब्रुवरिला जयंती साजरी केली जाते. 1300 पेक्षा जास्त शब्दांचा पहिला मराठी शब्दकोश शिवरायांनी तयार केला.

छत्रपती शिवाजी महाराज एक
भूगर्भ शाश्रज्ञ-

आज आपण शेतीत 300 फूट बोअर घेऊनही पाणी लागत नाही परंतु आज 400 वर्षांनंतरही महाराष्ट्रातील कुठल्याही किल्यावर गेलो तर 4000 फूट उंचीवर भर उन्हाळ्यात आपल्याला किल्यावरील टाक्यांमधून स्वच्छ पाणी आढळते/दिसते. तीही कुठलीही मोटार किंवा पाईपलाईन नसतांना.

छत्रपती शिवराय “स्वराज्य स्थापनेचा” विचाराशी सहमत असणाऱ्या सर्व जाती धर्माच्या लोकांना एकत्र घेवून लढले. स्वराज्यावर आक्रमण करणारे, फंदफितुरी करणारे मग ते शत्रू असतील, घरातील, स्वराज्यातील, कुठल्या जातीधर्माचे आहेत याचा विचार न करता त्यांना कठोर शासन केले.

जगाच्या इतिहासात एकमेव राजा आहे ज्याच्या दरबारी कधी स्त्री/नर्तकी नाचली नाही, स्वतःसाठी मोठमोठे महाल बांधले नाहीत, सत्तेचा वापर स्वतःच्या किंवा कुटुंबाच्या फायद्यासाठी केला नाही. शिवाजी महाराज “रयतेच स्वराज्य” असाच शब्द वापरत.

छत्रपती शिवाजी महाराज एक इंजिनिअर –

प्रत्येक किल्ल्यावर 2 प्रकारचे हौद/टाके- ओपन आणि भूगर्भात
किल्यावर पाण्याचे हौद/टाक बांधकामात खडक फोडण्यासाठी दारुगोळा/सुरुंग कधीच वापरले नाहीत. त्या ऐवजी नैसर्गीक साधनांचा वापर करून खडक फोडले. म्हणूनच टाक्यांचा आकार एकदम गुण्यात/आयताकृती आहे.
याच टाक्यांमधील पाणी संपूर्ण गडावर वापरले जायचे. ते पाणी स्वच ठेवण्यासाठी नैसर्गीक तंत्राचा वापर केला जायचा.
पाण्याचे टाके खडकाच्या कपारीला ५० ते १५० फुट पर्यंत खोल कोरलेले आहेत. त्यांना आतल्या बाजूला स्टेप दिलेल्या आहेत. एक स्टेप/टप्पा साधारण 25 फुट व जास्त लांब आहे.

रायगड-
राज्यभिषेक दिन 6 जून.
महाराज्यांच्या काळात रायगडावरील लोकसंख्या कमीतकमी 10000 असे.
65 किल्ल्यांच्या गराड्यात रायगड किल्ला.
2000 फुटावर पहिली तटबंदी
4000 फुटावर दुसरी तटबंदी
किल्याची वाट एकदम छोटी.
किल्यावर 300 इमारती होत्या.
10000 लोकांना वर्षभर पाणी मिळावे यासाठी 9 टाके.
रायगडाला 3 बाजूला तटबंदी नव्हती फक्त पश्चिम बाजूला तटबंदी आहे.
किल्याचे एकूण क्षेत्र 1200 एकर.
रायगडावर 42 दुकाने होती. पैकी 21 दुकाने देशी माल विक्री व 21 दुकाने परदेशी माल विक्रीसाठी.

आजच काम आजच झालं पाहिजे, उद्या नाही त्यांचं नाव शिवाजी महाराज.

मराठ्यांचे घोडे एकदा निघाल्यावर एक दमात 100/125 किमी सहज जात कारण मावळे स्वराज्यासाठी लढत होते.

मुघलांचे घोडे 30/35 किमीवर थांबत कारण मुघल सैन्य पगारसाठी काम करत होते.

महाराज्यांच्या अष्टप्रधान मंडळात
८ मंत्री
३० विभाग (12 महाल व १८ कारखाने)
३० विभागात ६०० कर्मचारी
महाराजांकडे येणाऱ्या केसेसचा समोरासमोर निकाल.
रायगडावर काम घेऊन आलेला प्रत्येक व्यक्ती जेवल्याशिवाय गडावरून खाली जाऊ द्यायचा नाही हा नियम.

छत्रपती शिवाजी महाराज –
महाराष्ट्राच्या किनार पट्टीवर १६७१ मध्ये त्या काळात मीठ शेती केली जायची. परंतु इंग्रच, डच, पोर्तुगीज यांनी तिथली शेती मोडीत काढण्यासाठी त्यावेळच्या गोवा प्रांतातून मीठ आणून स्वस्तात विक्री सुरु केली. महाराज्यांच्या हे लक्षात आल्यावर त्यांनी आयात मिठावर कर लावला. त्यामुळे आयात मीठ महाग झाले व आपल्या शेतकऱ्यांच्या मिठाची मागणी वाढली.
म्हणून छत्रपतींना जानता राजा म्हणतात.

वयाच्या 17 व्या शिवरायांच्या करिअरची सुरुवात आर्किटेक्ट म्हणून झाली. त्यांनी स्वतः डिजाईन करून राजगड किल्ला बांधला. एक इंग्रज लिहितो “ शिवाजी महाराज द ग्रेट गॅरिसन- इंजिनिअरचा गुरु” होते. बांधकाम खर्च 22000 कोटी.
या गडावर महाराज 27 वर्ष राहिले.

1982 साली पोर्तुगालची राजधानी लिसबेन येथे गडकोट/किल्ल्यांचे जागतिक प्रदर्शन भरले होते.

त्या प्रदर्शनाच्या निवड समितीने जगातील किल्ले बघितल्यावर “राजगड” किल्यास प्रथम पारितोषिक दिले.
महाराज्यांच्या मृत्यूनंतर 302 वर्षांनीही महाराजांचा सन्मान होतो. 🚩

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

कोरोना


संजय कुमार
जाहिल और चम्मच ध्यान दे कि जिस दवा की मांग पुरे विश्व मे हो रही हैं
वह भी एक सनातन धर्म के पुजारी ने ही किया था
आज पुरा विश्व जिस दवा का मांग कर
रहे”Hydroxychloroquine” जो भारत में बना सब जानते हैं ,पर कुछ लोग यह कह रहें । इसको तो हमारे सरकार ने पैदा किया। एक नेता तो सही पैदा नहीं किए दवा कहा से पैदा कर दिए।
*अब आप सभी को इस दवा को किसने बनाया इसकी जानकारी देता हूं।
*Hydroxychloroquine बनाने वाले “महान हिन्दू रासायनिकी शोध” करता । डॉ. प्रफुल्लचंद्र राय का जन्म 2 अगस्त, 1861 ई. में जैसोर ज़िले के ररौली गांव में (एक कायस्थ परिवार में) हुआ था। यह स्थान अब बांग्लादेश में है तथा खुल्ना ज़िले के नाम से जाना जाता है। उनके पिता हरिश्चंद्र राय इस गाँव के प्रतिष्ठित ज़मींदार थे। वे प्रगितशील तथा खुले दिमाग के व्यक्ति थे। आचार्य राय की माँ भुवनमोहिनी देवी भी एक प्रखर चेतना-सम्पन्न महिला थीं। जाहिर है, प्रफुल्ल पर इनका प्रभाव पड़ा था। आचार्य राय के पिता का अपना पुस्तकालय था वे महान रसायनिज्ञ, उद्यमी तथा महान शिक्षक थे।
*आचार्य राय केवल आधुनिक रसायन शास्त्र के प्रथम भारतीय प्रवक्ता (प्रोफेसर) ही नहीं थे बल्कि उन्होंने ही इस देश में रसायन उद्योग की नींव भी डाली थी। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ वाले उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने कहा था, “शुद्ध भारतीय परिधान में आवेष्टित इस सरल व्यक्ति को देखकर विश्वास ही नहीं होता कि वह एक महान वैज्ञानिक हो सकता है।” आचार्य राय की प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि उनकी आत्मकथा “लाइफ एण्ड एक्सपीरियेंसेस ऑफ बंगाली केमिस्ट” (एक बंगाली रसायनज्ञ का जीवन एवं अनुभव) के प्रकाशित होने पर अतिप्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका “नेचर” ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए लिखा था कि “लिपिबद्ध करने के लिए संभवत: प्रफुल्ल चन्द्र राय से अधिक विशिष्ट जीवन चरित्र किसी और का हो ही नहीं सकता।”
*आचार्य राय एक समर्पित कर्मयोगी थे। उनके मन में विवाह का विचार भी नहीं आया और समस्त जीवन उन्होंने प्रेसीडेंसी कालेज के एक नाममात्र के फर्नीचर वाले कमरे में काट दिया। प्रेसीडेंसी कालेज में कार्य करते हुए उन्हें तत्कालीन महान फ्रांसीसी रसायनज्ञ बर्थेलो की पुस्तक “द ग्रीक एल्केमी” पढ़ने को मिली। तुरन्त उन्होंने बर्थेलो को पत्र लिखा कि भारत में भी अति प्राचीनकाल से रसायन की परम्परा रही है। बर्थेलो के आग्रह पर आचार्य ने मुख्यत: नागार्जुन की पुस्तक “रसेन्द्रसारसंग्रह” पर आधारित प्राचीन हिन्दू रसायन के विषय में एक लम्बा परिचयात्मक लेख लिखकर उन्हें भेजा। बर्थेलाट ने इसकी एक अत्यंत विद्वत्तापूर्ण समीक्षा “जर्नल डे सावंट” में प्रकाशित की, जिसमें आचार्य राय के कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी। इससे उत्साहित होकर आचार्य ने अंतत: अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री” का प्रणयन किया जो विश्वविख्यात हुई और जिनके माध्यम से प्राचीन भारत के विशाल रसायन ज्ञान से समस्त संसार पहली बार परिचित होकर चमत्कृत हुआ। स्वयं बर्थेलाट ने इस पर समीक्षा लिखी जो “जर्नल डे सावंट” के १५ पृष्ठों में प्रकाशित हुई।
*१९१२ में इंग्लैण्ड के अपने दूसरे प्रवास के दौरान डरहम विश्वविद्यालय के कुलपति ने उन्हें अपने विश्वविद्यालय की मानद डी.एस.सी. उपाधि प्रदान की। रसायन के क्षेत्र में आचार्य ने १२० शोध-पत्र प्रकाशित किए। मरक्यूरस नाइट्रेट एवं अमोनियम नाइट्राइट नामक यौगिकों के प्रथम विरचन से उन्हें अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई।
*डाक्टर राय ने अपना अनुसंधान कार्य पारद के यौगिकों से प्रारंभ किया तथा पारद नाइट्राइट नामक यौगिक, संसार में सर्वप्रथम सन् 1896 में, आपने ही तैयार किया, जिससे आपकी अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्रारम्भ हुई। बाद में आपने इस यौगिक की सहायता से 80 नए यौगिक तैयार किए और कई महत्वपूर्ण एवं जटिल समस्याओं को सुलझाया। आपने ऐमोनियम, जिंक, कैडमियम, कैल्सियम, स्ट्रांशियम, वैरियम, मैग्नीशियम इत्यादि के नाइट्राइटों के संबंध में भी महत्वपूर्ण गवेषणाएँ कीं तथा ऐमाइन नाइट्राइटों को विशुद्ध रूप में तैयार कर, उनके भौतिक और रासायनिक गुणों का पूरा विवरण दिया। आपने ऑर्गेनोमेटालिक (organo-metallic) यौगिकों का भी विशेष रूप से अध्ययन कर कई उपयोगी तथ्यों का पता लगाया तथा पारद, गंधक और आयोडीन का एक नवीन यौगिक, (I2Hg2S2), तैयार किया तथा दिखाया कि प्रकाश में रखने पर इसके क्रिस्टलों का वर्ण बदल जाता है और अँधेरे में रखने पर पुनः मूल रंग वापस आ जाता है। सन् 1904 में बंगाल सरकार ने आपको यूरोप की विभिन्न रसायनशालाओं के निरीक्षण के लिये भेजा। इस अवसर पर विदेश के विद्वानों तथा वैज्ञानिक संस्थाओं ने सम्मानपूर्वक आपका स्वागत किया।
ऐसे “महान हिन्दू कायस्थ रासायनशास्त्री” जिनके वजह से पुरा विश्व को “कोरोना वायरस “जैसे महामारी से निपटने में योगदान दिया । इन्हें कोटी कोटी नमन 🙏
Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

अगर यह मुस्लिम होता तो अब तक मीडिया स्कोर बोल्ट का भी बाप बता कर विश्व विख्यात कर चुका होता.. चलो यह काम तब हम कर देते हैं
यह है श्रीनिवास गौड़ा ।
आयु केवल 28 वर्ष और यह कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के मूदबिदरी moodabidri से हैं।
142.5 मीटर की दूरी इन्होंने 13.62 सेकंड में पूरी की कंबला प्रतियोगिता में। अर्थात इन्होंने 100 मीटर 9:55सेकंड में पूरे किए।
जबकि ओलिम्पिक विजेता Usain Bolt ने 100 मीटर 9:58 सेकंड में पूरे किए।
यह भाग भी कीचड़ में रहे हैं, जहां फिसलन है, पैरों में आधुनिक टेक्नोलॉजी के जूते भी नहीं हैं ।दो बैलों को नियंत्रित भी करना है। पर इनकी प्रतिभा को विश्व पटल पर कोई प्रोत्साहन देने वाला नही। भारत में हज़ारों प्रतिभाएं ऐसे ही बिना प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ देती हैं।
8 पैक खेतों में काम करके भी बनते थे , जिम तो अंग्रेज़ों ने यहाँ आकर शुरू करवाया ।
कर्नाटक के #श्रीनिवास #गौड़ा 9.55 सेकंड में #कंबाला में 100 मीटर दौड़े। ये उसैन बोल्ट से तेज थे जिन्होंने विश्व #रिकॉर्ड बनाने में 9.58 सेकंड का समय लिया।
अब राष्ट्रीय स्तर पर इन्हें अपनी #स्पीड साबित करने का मौका मिल रहा है।
Bolt is no more the best .
आर्यवर्त
Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

Can you hear a pin drop?

What is the meaning of pin drop silence?

Following are some instances when silence could speak louder than voice.

Take 1:

Field Marshal Sam Bahadur Maneckshaw once started addressing a public meeting at Ahmedabad in English.

The crowd started chanting, “Speak in Gujarati.

We will hear you only if you speak in Gujarati.”
Field Marshal Sam Bahadur Maneckshaw stopped.
Swept the audience with a hard stare and replied,

“Friends, I have fought many a battle in my long career.
I have learned Punjabi from men of the Sikh Regiment;
Marathi from the Maratha Regiment;
Tamil from the men of the Madras Sappers;
Bengali from the men of the Bengal Sappers,
Hindi from the Bihar Regiment; and
Even Nepali from the Gurkha Regiment.

Unfortunately there was no soldier from Gujarat from whom I could have learned Gujarati.”…

You could have heard a pin drop

Take 2:

Robert Whiting,
an elderly US gentleman of 83, arrived in Paris by plane.

At French Customs, he took a few minutes to locate his passport in his carry on.

“You have been to France before, Monsieur ?”, the Customs officer asked sarcastically.

Mr. Whiting admitted that he had been to France previously.

“Then you should know enough to have your passport ready.”

The American said,
“The last time I was here,
I didn’t have to show it.”

“Impossible.
Americans always have to show their passports on arrival in France !”, the Customs officer sneered.

The American senior gave the Frenchman a long, hard look.

Then he quietly explained

“Well, when I came ashore at Omaha Beach,
at 4:40am, on D-Day in 1944, to help liberate your country, I couldn’t find a single Frenchman to show a passport to…. ”

You could have heard a pin drop

Take 3:

Soon after getting freedom from British rule in 1947, the de-facto prime minister of India, Jawahar Lal Nehru called a meeting of senior Army Officers to select the first General of the Indian army.

Nehru proposed, “I think we should appoint a British officer as a General of The Indian Army, as we don’t have enough experience to lead the same.”
Having learned under the British, only to serve and rarely to lead, all the civilians and men in uniform present nodded their heads in agreement.

However one senior officer, Nathu Singh Rathore, asked for permission to speak.

Nehru was a bit taken aback by the independent streak of the officer, though, he asked him to speak freely.

Rathore said, “You see, sir, we don’t have enough experience to lead a nation too, so shouldn’t we appoint a British person as the first Prime Minister of India?”

You could hear a pin drop.

After a pregnant pause, Nehru asked Rathore,
“Are you ready to be the first General of The Indian Army?”..

Rathore declined the offer saying “Sir, we have a very talented army officer, my senior, Gen. Cariappa, who is the most deserving among us.”

This is how the brilliant Gen. Cariappa became the first General and Rathore the first ever Lt. General of the Indian Army.

(Many thanks to Lt. Gen Niranjan Malik PVSM (Retd) for this article.)

👌👌👌🙏🙏
Worth reading?!

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

IT’S NOT THE SHOES. IT’S THE SOUL.

This is the daughter of a rice farmer, and her name is Hima.

She ate rice and daal (lentils), not supplements and protein bars.

She ran in rice fields before she could step onto any real track.

She wore cheap, worn-out spikes, but she didn’t let that matter.

She’s notorious for having a one-track mind, never caring about who her competition in the next lane is.

She just took Gold in the 400m event at the World U20 Championships in Finland.

And she’s the first Indian track athlete – male or female – to win a gold medal at any global track event.

That’s what success looks like.

Say her name: Hima Das.

निओ दीप

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

अपने देश का नामकरण (भारतवर्ष) किस भरत के नाम पर हुआ ?


अपने देश का नामकरण (भारतवर्ष) किस भरत के नाम पर हुआ ? अनेक ‘विद्वान्’ डेढ़ सौ वर्ष से तोते की तरह रट रहे हैं कि दुष्यन्तपुत्र भरत (जो सिंह के दांत गिनता था) के नाम पर इस देश का नामकरण ‘भारत’ हुआ है। आइए, देखते हैं कि इस कथन में कितनी वास्तविकता है।

हमारे पुराणों में बताया गया है कि प्रलयकाल के पश्चात् स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत ने रात्रि में भी प्रकाश रखने की इच्छा से ज्योतिर्मय रथ के द्वारा सात बार भूमण्डल की परिक्रमा की। परिक्रमा के दौरान रथ की लीक से जो सात मण्डलाकार गड्ढे बने, वे ही सप्तसिंधु हुए। फिर उनके अन्तर्वर्ती क्षेत्र सात महाद्वीप हुए जो क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप कहलाए। ये द्वीप क्रमशः दुगुने बड़े होते गए हैं और उनमें जम्बूद्वीप सबके बीच में स्थित है-

‘जम्बूद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यसंस्थितः’

(ब्रह्ममहापुराण, 18.13)

प्रियव्रत के 10 पुत्रों में से 3 के विरक्त हो जाने के कारण शेष 7 पुत्र— आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ट, मेधातिथि और वीतिहोत्र क्रमशः जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप के अधिपति हुए।

प्रियव्रत ने अपने पुत्र आग्नीध्र को जम्बूद्वीप दिया था-

‘जम्बूद्वीपं महाभाग साग्नीध्राय ददौ पिता’

मेधातिथेस्तथा प्रादात्प्लक्षद्वीपं तथापरम् ।।’

(विष्णुमहापुराण, 2.1.12)

जम्बूद्वीपाधिपति आग्नीध्र के 9 पुत्र हुए- नाभि, किंपुरुष, हरिवर्ष, इलावृत्त, रम्यक, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमाल। सम विभाग के लिए आग्नीध्र ने जम्बूद्वीप के 9 विभाग करके उन्हें अपने पुत्रों में बाँट दिया और उनके नाम पर ही उन विभागों के नामकरण हुए-

‘आग्नीध्रसुतास्तेमातुरनुग्रहादोत्पत्तिकेनेव संहननबलोपेताः पित्रा विभक्ता आत्म तुल्यनामानियथाभागं जम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजः’

(भागवतमहापुराण, 5.2.21; मार्कण्डेयमहापुराण, 53.31-35)

पिता (आग्नीध्र) ने दक्षिण की ओर का ‘हिमवर्ष’ (जिसे अब ‘भारतवर्ष’ कहते हैं) नाभि को दिया-

‘पिता दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्’

(विष्णुमहापुराण, 2.1.18)

आठ विभागों के नाम तो ‘किंपुरुषवर्ष’, ‘हरिवर्ष’ आदि ही हुए, किंतु ज्येष्ठ पुत्र का भाग ‘नाभि’ से ‘अजनाभवर्ष’ हुआ। नाभि के एक ही पुत्र ऋषभदेव थे जो बाद में (जैनों के) प्रथम तीर्थंकर हुए। ऋषभदेव के एक सौ पुत्र हुए जिनमें भरत सबसे बड़े थे । ऋषभदेव ने वन जाते समय अपना राज्य भरत को दे दिया था, तभी से उनका खण्ड ‘भारतवर्ष’ कहलाया-

‘ऋषभाद्भरतोः जज्ञे ज्येष्ठः पुत्राशतस्य सः ।’

‘ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते ।

भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रतिष्ठिता वनम् ।।

(विष्णुमहापुराण, 2.1.28; कूर्ममहापुराण, ब्राह्मीसंहिता, पूर्व, 40-41)

‘येषां खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठगुण आसीद्येनेदं वर्षं भारतमिति व्यदिशन्ति’

(भागवतमहापुराण, 5.4.9)

‘तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायणः ।

विख्यातं वर्षमेतद् यन्नाम्ना भरतमद्भुतम् ।।’

(भागवतमहापुराण, 11.2.17)

‘ऋषभो मेरुदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत् ।

भरताद् भारतंवर्षं भरतात् सुमतिस्त्वभूत् ।।’

(अग्निमहापुराण, 107.11)

‘नाभे पुत्रात्तु ऋषभाद् भरतो याभवत् ततः ।

तस्य नाम्ना त्विदंवर्षं भारतं येति कीर्त्यते ।।’

(नृसिंहपुराण, 30; स्कन्दमहापुराण, 1.2.37.57)

उसी दिन से इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ हो गया जो आज तक है।

(ऋषभदेव का) अजनाभवर्ष ही भरत के नाम पर ‘भारतवर्ष’ कहलाया—

‘अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति’

(भागवतमहापुराण, 5.7.3)

चूँकि ऋषभदेव ने अपने ‘हिमवर्ष’ नामक दक्षिणी खण्ड को अपने पुत्र भरत को दिया था, इसी कारण उसका नाम भरत के नामानुसार ‘भारतवर्ष’ पड़ा-

‘नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हेमाख्यं तु पिता ददौ’

(लिंगमहापुराण, 47.6)

‘हिमाह्वं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत् ।

तस्मात् तद् भारतं वर्षं तस्य नाम्ना विदुर्बुधः ।।’

(वायुपुराण, 33.52; ब्रह्माण्डमहापुराण, 2.14.62; लिंगमहापुराण, 47.23-24)

‘हिमाह्वंदक्षिणंवर्षं भरतायपिताददौ ।

तस्मात्तु भारतंवर्षं तस्यनाम्नामहात्मनः ।।’

(मार्कण्डेयमहापुराण, 50.40-41)

‘इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम् ।।’

(मत्स्यमहापुराण, 113.28)

पाश्चात्य इतिहासकारों को तो यह सिद्ध करना था कि यह देश (भारतवर्ष) बहुत प्राचीन नहीं है, केवल पाँच हज़ार वर्ष का ही इसका इतिहास है। इसलिए उन्होंने बताया कि स्वायम्भुव मनु, प्रियव्रत, नाभि, ऋषभदेव, आदि तो कभी हुए ही नहीं, ये सब पुराणों की कल्पनाएँ हैं । ‘पुराणों के विद्वान्’ (?) कहे जानेवाले फ्रेडरिक ईडन पार्जीटर (1852-1927) ने अपने ग्रन्थ ‘Ancient Indian Historical Tradition’ (Oxford University Press, London, 1922) में स्वायम्भुव मनु से चाक्षुस मनु तक के इतिहास को लुप्त कर दिया। दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश के अनेक स्वनामधन्य इतिहासकारों ने भी पाश्चात्यों का अंधानुकरण करते हुए हमारी प्राचीन परम्परा को बर्बादकर दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम से ही अपने देश का नामकरण माना।

डा. राधाकुमुद मुखर्जी-जैसे विद्वान् तक ने अपने ग्रन्थ ‘Fundamental Unity of India’ (Bharatiya Vidya Bhawan, Bombay) में लगता है सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम से अपने देश का नामकरण माना है। कहाँ तक कहा जाए ! आधुनिक काल के इतिहासकारों ने किस प्रकार भारतीय इतिहास का सर्वनाश किया है, यह व्यापक अनुसन्धान का विषय है।

‘भारतवर्ष’ शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए श्रीश्री आनन्दमूर्ति (प्रभात रंजन सरकार: 1921-1990) ने लिखा है : ‘दो धातुओं का योग- भर् भरणे तथा तन् विस्तारे। भर्+अल् एवं तन्+ऽ से ‘भारत’ शब्द बना है। ‘भर’ का अर्थ है भरण-पोषण करनेवाला एवं ‘तन्’ माने विस्तार करनेवाला, क्रम-क्रम से बढ़नेवाला…. इस तरह ‘भारत’ शब्द बना । वर्ष का अर्थ है भूमि। अतः इस भूमिखण्ड के लिए ‘भारतवर्ष’ नाम अत्यन्त सार्थक है ।’ (महाभारत की कथाएँ, पृष्ठ 7, आनन्दमार्ग प्रचारक संघ, कलकत्ता, 1981 ई.)

गोस्वामी तुलसीदास (1497-1623) ने भी ‘भरत’ के नामकरण-प्रसंग में उल्लेख किया है—

‘बिस्व भरन पोषन कर जोई । ताकर नाम भरत अस होई ।’

(श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, 196.7)

अस्तु ! हमारे किसी भी ग्रन्थ में दुष्यन्तपुत्र भरत से ‘भारत’ नामकरण की बात नहीं कही गयी है । चन्द्रवंशीय दुष्यन्तपुत्र भरत वैवस्वत मन्वन्तर के 16वें सत्ययुग (5.4005 करोड वर्ष पूर्व) में हुए थे जबकि देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ स्वायम्भुव मन्वन्तर (1.955885 अरब वर्ष पूर्व) में ही हो चुका था। हाँ, दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम पर क्षत्रियों की एक शाखा ‘भरतवंश’ अवश्य प्रचलित हुई जिसके कारण अर्जुन, धृतराष्ट्र आदि को ‘भारत’ कहा गया है और यह महाभारत (आदिपर्व, 74.123) के—

‘………………….येनेदं भारतं कुलम् ।

अपरे ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुताः ।।’

से भी स्पष्ट है । ‘भारता’ शब्द बहुवचन है अतएव बहुत-से मनुष्यों का वाचक है । कुल तो स्पष्ट है ही ।  महाकवि कालिदास ने भी अपने ग्रन्थ ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ में दुष्यन्तपुत्र भरत के नाम पर अपने देश का नामकरण होने की बात नहीं कही है।

एक ज्ञान की मिसाल जड़ भारत

दूसरी त्याग, प्रेम और कर्तव्य की मिसाल श्री राम के भाई भारत

तीसरा सौर्य की मिसाल सकुन्तला  का भारत

इन तीनो विचारधारा से ये भारत हुआ।