Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

मुग़ल इतिहास- १०६

#mannjeemugal

अकबर महान की लव स्टोरी खूब पढ़ाई गई फ़िल्मी अन्दाज़ में दिखाई गई। असलियत जानते है आज इसकी।

अकबर ने पहला निकाह किया अपने चाचे की लड़की रुकैया बेगम से – साल १५५२ में।
दूसरा निकाह किया अपने दरबारी अब्दुल्ला ख़ान की लड़की से – साल १५५७ में।

तीसरा निकाह किया सलीमा बेगम से जो बैरम खां की पहली बेगम थी। सलीमा अकबर की फुफेरी बहन थी और उसका पहला इश्क़ भी। इस सलीमा बेगम का लड़का था रहीम- दोहे वाला। तो रहीम का सौतेला बाप और मामा था अकबर- डबल रोल में।साल था १५६१।

चौथा निकाह किया मरियम जमानी से जिसे जोधा के नाम से उड़ाया गया। साल -१५६२ में।

पाँचवा निकाह किया बीवी दौलत शाद से – जो उसके दरबारी अब्दुल शाद की पहली बीवी थी। साल १५६३ में।
छठा निकाह किया खानदेश की शहज़ादी से – साल १५६४ में।
सातवा निकाह किया कश्मीर के सुल्तान की लड़की से – साल १५६९ में।

ये लिस्ट विशाल है। आख़िरी निकाह मियाँ अकबर ने किया था साल १५९९ में। साल १६०५ में अकबर ख़ुदा को प्यारा हुआ। मतलब इंतेकाल होने के छह साल पहले तक बाक़ायदा निकाह रचा रहा था अकबर महान। पैटर्न देखिए हर साल अकबर अपने नए निकाह का वलीमा पूरे दरबार को खिला रहा होता था।

वैसे अकबर का फेटिश था दरबारियों की बेगम आदि को टापना!

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बिठूर


11 सितम्बर 1857 आज का ही दिन था जब…बिठूर में एक पेड़ से बंधी 13 वर्ष की लड़की को, ब्रिटिश सेना ने जिंदा ही आग के हवाले किया, धूँ धूँ कर जलती वो लड़की, उफ़ तक न बोली और जिंदा लाश की तरह जलती हुई, राख में तब्दील हो गई।

ये लड़की थी नाना साहब पेशवा की दत्तक पुत्री मैना कुमारी।
जिसे 160 वर्ष पूर्व, आज ही के दिन, आउटरम नामक ब्रिटिश अधिकारी ने जिंदा जला दिया था।

जिसने 1857 क्रांति के दौरान, अपने पिता के साथ जाने से इसलिए मना कर दिया, की कही उसकी सुरक्षा के चलते, उसके पिता को देश सेवा में कोई समस्या न आये।और बिठूर के महल में रहना उचित समझा।

नाना साहब पर ब्रिटिश सरकार इनाम घोषित कर चुकी थी।
और जैसे ही उन्हें पता चला नाना साहब महल से बाहर है, ब्रिटिश सरकार ने महल घेर लिया, जहाँ उन्हें कुछ सैनिको के साथ बस मैना कुमारी ही मिली।

मैना कुमारी, ब्रटिश सैनिको को देख कर महल के गुप्त स्थानों में जा छुपी, ये देख ब्रिटिश अफसर आउटरम ने महल को तोप से उड़ने का आदेश दिया।। और ऐसा कर वो वहां से चला गया पर अपने कुछ सिपाहियों को वही छोड़ गया।
रात को मैना को जब लगा की सब लोग जा चुके है, और वो बहार निकली तो 2 सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और फिर आउटरम के सामने पेश किया।

आउटरम ने पहले मैना को एक पेड़ से बंधा, फिर मैना से नाना साहब के बारे में और क्रांति की गुप्त जानकारी जाननी चाही।
पर उस से मुह नही खोला।

यहाँ तक की आउटरम ने मैना कुमारी को जिंदा जलने की धमकी भी दी, पर उसने कहा की वो एक क्रांतिकारी की बेटी है, मृत्यु से नही डरती। ये देख आउटरम तिलमिला गया और उसने मैना कुमारी को जिंदा जलने का आदेश दे दिया।
इस पर भी मैना कुमारी, बिना प्रतिरोध के आग में जल गई, ताकि क्रांति की मशाल कभी न बुझे।

बिना खड्ग बिना ढाल वाली गैंग या धूर्त वामपंथी लेखक चाहे जो लिखे पर हमारी स्वतंत्रता इन जैसे असँख्य क्रांतिवीर और वीरांगनाओं के बलिदानों का ही प्रतिफल है ….और इनकी गाथाएँ आगे की पीढ़ी तक पहुँचनी चाहिए, इन्हें हर कृतज्ञ भारतीय का नमन पहुँचना चाहिये !

शत शत नमन है इस महान बाल वीरांगना को ! 🙏🏻
Nidhi Singh जी की wall se साभार

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बाँका


#बाँका नाम का वर्तमान जिला
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बिहार का अब एक जिला है बाँका। चारों ओर से नदी के संजाल से घिरा यह त्रिमुहान क्षेत्र है बिहार का, जिससे झारखंड की सीमा लगती है। कह सकते हैं कि यह वो क्षेत्र है जहां प्रवेश करने के लिए पहले आपको चरण धोने होते हैं। अब नदियों पर पुल बन गए तो चरण धोने की परंपरा समाप्त होती गई।

यहाँ आप आम लोगों से पूछें कि इसका नाम #बाँका क्यों पड़ा? वे बताएंगे कि यहां के लोग बाँका होते थे इसलिए…। वैसे, बाँका का शाब्दिक अर्थ बहुत है। वीर, डेढ़ा, प्रियतम, प्रियदर्शी जैसे और भी। लोग कहेंगे कि यह क्षेत्र लड़ाकों का रहा है, वीरों का रहा है इसलिए ‘बाँका’ है। यह सच भी है कि क्षेत्र लड़ाकों का रहा मगर अंग्रेज इसे #बाँका क्यों कहते भला?

बाँका की पहली चर्चा 1810 में आए फ्रांसिस बुकनन करते हैं। उन्होंने इस बाँका क्षेत्र में 6 नवंबर 1810 को पहली बार कदम रखा था। वे पर्वतों की गोद में बसे पहरीडीह पहुंचे जहां 58 वर्षों बाद 1869 में बाबू रास बिहारी बोस पहुंचे थे। वहां आसपास से हेमेटाइट लाकर लोहा पृथक्करण के बाद उसका औजार बनाने का काम होता था। यह काम कोल करते थे।

इससे पहले इस क्षेत्र का सर्वे करने जेम्स रेनेल फोर्ट विलियम के गवर्नर हेनरी वेंसिटार्ट के 6 मई 1764 का पत्र लेकर आए थे। उनके साथ एक सहायक सर्वेयर, 3 अन्य सहायक यूरोपियन, 11 लश्कर, 11 मोटिया, 11 सिपाही व एक दुभाषिया था। इस दल में कुल 39 सदस्य थे।

इस इलाके के सभी नदी-नालों, टीलों, मंदिरों का अवलोकन कराया। इस बात पर भी गौर किया कि लोगों का रहन-सहन क्या है?

रेनेल नीत टीम को तब बाँका जैसी कोई खास जगह नहीं मिली। हां, इसके समीप एक ग्राम जरूर था जिसे #बोगरिया कहा जाता था। यह बाँका से एक किलोमीटर दूर बड़ा ग्राम था। इससे यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि बाँका तब था या नहीं। रेनेल ने अपने सर्वे में, नक्शे में इसकी चर्चा नहीं की।
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बाँका नाम #कृष्ण का भी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए। उन्हें ब्रज में बाँके बिहारी कहते हैं तो नदिया (पश्चिम बंगाल) में ‘बाँका’ ही पुकारा जाता है। अब भी नित्यानंद महाप्रभु (निताई) के एकचक्र ग्राम में कृष्ण का प्रसिद्ध मंदिर है। इसके विग्रह को ‘बाँका’ ही कहते हैं। वैसे, बहुत जगह इन्हें बाँका कहने का प्रचलन है।
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चैतन्य देव नदिया ग्राम से मंदार होते हुए गया तीर्थ इसी मार्ग से गए। गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित ‘चैतन्य चरितावली’ इस यात्रा को अति-संक्षेप में बताता है। उनके साथ चल रहे संगियों ने अपनी डायरी में लिखा है कि बाँका (कृष्ण) के जिस विग्रह को वे साथ लेकर चल रहे थे उसे मंदार से आगे बढ़ने पर नदी पार के एक राजा के अनुरोध पर अपनी निशानी के तौर पर छोड़ गए। भौगोलिक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि वह जगह आज का #ककवारा है।
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सन 1866 में ककवारा के पहाड़ के समीप कुछ लोगों द्वारा कृषि कार्य के दौरान कांस्य की एक प्रतिमा निकली थी। इस पर एक पुरालेख है। इस लेख को 1871 में जेम्स बर्गीज़ ने पढ़ा। इससे पता चलता है कि यहां एक विशिष्ट नगर था। इस नगर के राजा का नाम गोविंद था। यह मूर्ति उनके राज्यारोहण के 23वें वर्ष में प्रतिष्ठित किया गया था।
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ईस्वी 1507 में चैतन्य महाप्रभु की टोली इस होकर गई थी। संभवतः यहीं के किसी राजा ने उक्त विग्रह को ग्रहण किया था।

यह कथा आज भी चर्चित है कि मंदार पर्वत से वे जमदाहा, ककवारा, तारापुर होते हुए गंगा के किनारे-किनारे पुनपुन पहुंचे और फिर वहां से गया तीर्थ। यह लंबा रास्ता संभवतः सघन वन क्षेत्र होने के कारण उनके दल ने चुना होगा।
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जहांगीर काल की एक पुस्तक का विवरण इस ग्राम को ‘चक्रवर’ बताता है। सभी जानते हैं कि चक्र किन देवता का आयुध है। यहां भी कृष्ण ही हैं। वे ही #बाँका हैं।
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इतिहासकार केपी जायसवाल मानते हैं कि बोगरिया ग्राम 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध में बसा। यहां कुछ लोग भागलपुर के चंपानगर से आए जिन्हें डुमराँव के क्षत्रिय जमींदारों ने बसने नहीं दिया।

वे जहां बसे उस जगह को पहले बोगलिया कहा जाता था। ये बोगलीपुर से आए थे। बाद में अपभ्रंश रूप में यह #बोगरिया हो गया। अब इसे एक मानक नामकरण कर दिया गया है। इसे #विजयनगर कहा जाता है। यहां केदारवंशियों की संख्या बहुत अधिक थी। आज के बाँका जिले में जहां भी कादर जाति के लोग मिलेंगे वे पूर्णिया से बोगलीपुर फिर बाँका में आए। उस समय यह समस्या थी कि आक्रमणकारी उस गांव को सर्वाधिक क्षति पहुंचाते थे जो सघन होता था। अतः छोटे-छोटे जमींदार अपने कुनबे में बाहरी लोगों को कम ही बसाते थे।
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चक्रवरा अपने समय में बाँका मंदिर से ख्यात हो गया था। वह समय वैष्णव काल था। नाम संकीर्तन की परंपरा चैतन्य के प्रताप से इस क्षेत्र में भी विस्तृत हो गई थी। यह क्षेत्र पूर्व से ही मधुसूदन के प्रभाव में था जिसे चैतन्य महाप्रभु और वल्लभाचार्य ने आकर अधिक कर दिया।

उसी बाँका मंदिर की प्रसिद्धि के कारण इस जगह का नाम ‘बाँका’ पड़ा।

चक्रवरा ग्राम अब ककवारा नाम से जाना जाता है। यह अंग्रेजी लेखन का प्रभाव है। तोमर टोला का यह छोटा मंदिर अब ज़मीन में 10 फीट से अधिक धंस चुका है। इसका प्राचीन विग्रह ज़मीन से लगभग 20 फीट नीचे चला गया है जो आंशिक रूप से नज़र आता है। जब इस मंदिर का अस्तित्व था तब 1897 में यहां एक कुआं का निर्माण किया गया।

सन 1869 में बाँका सबडिवीजन बना। उससे पहले बौंसी सबडिवीजन था। बौंसी में गोड्डा और हंसडीहा से आगे तक के क्षेत्र थे। बाँका के पहले एसडीओ बाबू रासबिहारी बोस थे। इनका क्षेत्रीय ऐतिहासिक भ्रमण और लेखन आज भी आदर की दृष्टि से देखा जाता है।

बोस बाबू के काल 1870 में बाँका में 7 कैदियों को रखने के लिए पहली बार जेल बनाया गया था। तब एक प्राथमिक इंग्लिश स्कूल बोगरिया में हुआ करता था। इसे किसी कायस्थ ने अपने निजी फंड से स्थापित किया था। सन 1899 में रानी महकम कुमारी ने यहां एक इंग्लिश हाई स्कूल बनवाया। आज यह रानी महकम कुमारी इंटरस्तरीय विद्यालय (आर.एम.के) है। सन 1959 में पंडित बेनी शंकर शर्मा (1966 में सांसद) ने पीबीएस कॉलेज की स्थापना की। ये कलकत्ता हाईकोर्ट में आयकर के नामचीन अधिवक्ता थे।
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सन 1913 में बाँका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति तब अर्जित की जब यहां समुद्रगुप्त काल के दो सिक्के निकले थे। इनमें से एक स्वर्ण का सिक्का था जिसे

21 फरवरी 1991 से बाँका एक जिला है।

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(पाठकगण क्षमा करेंगे। सुरक्षा कारणों से यहां संदर्भों का पूर्ण विवरण नहीं दे रहा हूँ।)

~ उदय शंकर झा ‘चंचल’

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टीपू सुल्तान


आज ओवैसी ने कहा टीपू सुल्तान हिंदुओं से नफरत नहीं करता था वह राम लिखा हुआ अंगूठी पहनता था

अब सच्चाई जानिए

पेशेवर वामपंथी इतिहासकारो ने टीपू सुल्तान को ये कहकर सेकुलर साबित करने की नाकाम कोशिस की , क्योकि वो राम लिखा अंगूठी पहनता था .जबकि ये झूठ है ।।

हैदर अली ने मैसूर के हिन्दू राजा की हत्या करके उनकी 41 ग्राम सोने की “राम” लिखी अंगूठी उनकी ऊँगली काटकर निकाल
ली थी ..

कहते हैं कि मैसूर के हिंदू राजा ने उसी वक्त हैदर अली को श्राप दिया था कि यही हश्र तुम्हारे साथ होगा


मैसूर के राजा की बात हैदर अली ने सुना था और हैदर अली इस बात में मानता था कि मरते समय दिया गया श्राप जरूर लगता है इसलिए हैदर अली ने अपने पूरे जीवन में इस अंगूठी को नहीं पहना

बाद में उसने ये अंगूठी अपने पुत्र टीपू सुल्तान को दी .. टीपू भी इसे पहनता नही था … क्योंकि उसे भी हैदर अली ने यह बात बताई थी

लेकिन श्रीरंगपट्टम के युद्ध में जाते समय उसने ये अंगूठी पहनी थी .. दरअसल टीपू सुल्तान के एक मंत्री ने उसे यह कह कर राजी कर लिया कि जिसके पास यह अंगूठी होगी वह इस युद्ध में विजई होगा

फिर श्रीरंगपट्टम्म के युद्ध में टीपू के साथ ठीक वही हुआ जो उसके पिता हैदर अली ने मैसूर के राजा के साथ किया था ..

अंग्रेजो ने उसे मार दिया और उसकी ऊँगली काटकर ये अंगूठी निकाल ली ..

बाद में नीलामी हाउस क्रिस्टीज ने इसे नीलाम किया जिसे मैसूर में राजा के वंशजो ने खरीद लिया ..इस तरह ये अंगूठी अपने मूल मालिक के पास करीब पांच सौ साल के बाद वापस पहुंच गयी ..

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15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस विशेष~:

अंग्रेजो के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में पहली फांसी चढ़ने वाले भारत मां के वीर सपूत सेठ रामदास जी गुड़़वाला उर्फ रामदास जी अग्रवाल-1857 के महान क्रांतिकारी व दानवीर

सेठ रामदास जी गुड़वाला/रामदास जी अग्रवाल दिल्ली के अरबपति सेठ और बैंकर थे और बहादुर शाह जफर के गहरे दोस्त थे।उनका जन्म बहुत ही संपन्न सेठ परिवार में हुआ था।उनके परिवार ने दिल्ली क्लॉथ मिल्स की स्थापना की थी। उस समय मुग़ल दरबार की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय थी।ईस्ट इंडिया कंपनी के कुचक्रों से बहादुर शाह जफर बहुत परेशान था। एक दिन वो अपनी खास बैठक में बड़े बेचैन हो उदास होकर घूम रहा था।उसी समय सेठ रामदास गुड़वाला जी वहाँ पहुंच गए और हर प्रकार से अपने मित्र को सांत्वना दी। उन्होंने बहादुर शाह जफर को कायरता छोड़कर सन्नद्ध हो क्रांति के लिए तैयार किया, परंतु बहादुर शाह जफर ने खराब आर्थिक स्थिति को देखते हुए असमर्थता प्रकट की।सेठ जी ने तुरंत 3 करोड़ रुपये बहादुर शाह जफर को देने का प्रस्ताव रखा। इस धन से क्रांतिकारी सेना तैयार की।

सेठ जी जिन्होंने अभी तक व्यापार ही किया था, सेना व खुफिया विभाग के संघठन का कार्य भी प्रारंभ कर दिया। उनकी संघठन की शक्ति को देखकर अंग्रेज़ सेनापति भी दंग हो गए सारे उत्तर भारत में उन्होंने जासूसों का जाल बिछा दिया और अनेक सैनिक छावनियों से गुप्त संपर्क किया।उन्होंने भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली सेना व गुप्तचर संघठन का निर्माण किया।देश के कोने कोने में गुप्तचर भेजे व छोटे से छोटे मनसबदार और राजाओं से प्रार्थना की इस संकट काल में बहादुर शाह जफर की मदद कर देश को स्वतंत्र करवाएं।

सेठ रामदास गुड़वाला जी ने अंग्रेजों की सेना में भारतीय सिपाहियों को आजादी का संदेश भेजा और क्रांतिकारियों ने निश्चित समय पर उनकी सहायता का वचन भी दिया।यह भी कहा जाता है की क्रांतिकारियों द्वारा मेरठ व दिल्ली में क्रांति का झंडा खड़ा करने में रामदास का प्रमुख हाथ था।

रामदास जी की इस प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से अंग्रेज़ शासन व अधिकारी बहुत चिंतित हुए। सर जॉन लॉरेन्स आदि सेनापतियों ने रामदास जी को अपनी तरफ मिलने का बहुत प्रयास किया लेकिन वो अग्रेंजो से बात करने को भी तैयार नहीं हुए।इस पर अंग्रेज़ अधिकारियों ने मीटिंग बुलाई और सभी ने एक स्वर में कहा की रामदास की इस तरह की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से हमारे भारत पर शासन करने का स्वप्न चूर ही जाएगा । अतः इसे पकड़ कर इसकी जीवनलीला समाप्त करना बहुत जरूरी है।

सेठ रामदास जी गुड़वाला को धोके से पकड़ा गया और जिस तरह मारा गया वो क्रूरता की मिसाल है।पहले उनपर शिकारी कुत्ते छुड़वाए गए उसके बाद उन्हें उसी घायल अवस्था में दिल्ली के चांदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया।

इस तरह अरबपति सेठ रामदास गुड़वाला जी ने देश की आजादी के लिए अपनी अकूत संपत्ति और अपना जीवन मातृभूमि के लिए हंसते हंसते न्योछावर कर दिया। सुप्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट’ में लिखा है – “सेठ रामदास गुड़वाला उत्तर भारत के सबसे धनी सेठ थे।अंग्रेजों के विचार से उनके पास असंख्य मोती, हीरे व जवाहरात व अकूत संपत्ति थी। वह मुग़ल बादशाहों से भी अधिक धनी थे। यूरोप के बाजारों में भी उसकी अमीरी का डंका बजता था।”

परंतु भारतीय इतिहास में उनका जो स्थान है वो उनकी अतुलनीय संपत्ति की वजह से नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने की वजह से है। वह मंगल पांडेय से भी पहले देश की स्वतंत्रता के लिए फांसी पर चढ़े थे।इस तरह उनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखने योग्य है।दिल्ली की विधानसभा के गलियारे में उनके बलिदान के बारे में चित्र लगा है।
#Narsingh_Gems💎

जय श्री नृसिंह महराज🦁🙏🙏||जय श्री सेठ✊✊||विजई सेठ समाज✊✊

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Labnon and Berut


ABOUT LABNON & BERUT:
एक जमाने में दुनिया के खूबसूरत और दुनिया की आर्थिक ताकत के रूप में बेरुत शहर मशहूर था।बॉलीवुड के तमाम फिल्मों की शूटिंग के रूप में होती थी जिसमें धर्मेंद्र और माला सिन्हा की आंखें भी शामिल थी …इतना ही नहीं हॉलीवुड का भी पसंदीदा शूटिंग स्थल बेरुत हुआ करता था और दुनिया के कुल सोने के गहनों का 50% कारोबार अकेले बेरुत से होता था और बेरुत को दुनिया की सबसे बड़ी सोने की मंडी कहा जाता था।

लेबनान की आर्थिक ताकत इतनी ज्यादा थी एक जमाने में लेबनान की मुद्रा पाउंड और डॉलर से भी ज्यादा मजबूत हुआ करती थी। लेबनान बेहद खूबसूरत देश हुआ करता था। मेडिटरेनियन सी का बहुत बड़ा किनारा लेबनान के पास है मेडिटरेनियन के समुद्र तट कोरल रीफ से बने हैं इस वजह से साफ-सुथरी सफेद रेती जो कोरल रीफ के इरोजन से बनती है और मेडिटरेनियन का खूबसूरत नीला समुंदर साथ ही साथ ओलिव यानी जैतून के हजारों हेक्टेयर के विशाल फार्म खजूर के फॉर्म लेबनान को बेहद खूबसूरत बनाते थे।

ऐसा देश है जहां का कुछ हिस्सा इतना ठंडा है कि वहां काफी बर्फ गिरती है और middle-east के देशों में यानी अरब देशों में लेबनान एकमात्र ऐसा देश है जहां के काफी बड़े हिस्से में बर्फबारी भी होती है।

1972 तक लेबनान और इसकी राजधानी बेरुत घूमना लोगों का एक सपना हुआ करता था।

1960 तक लेबनान में 30% मुस्लिम आबादी थी जिसमें 15% शिया थे और 15% सुन्नी थे। 1975 तक लेबनान में 54% मुस्लिम हो गए जिसमें 27% शिया और 27% सुन्नी थे।

फिर मुसलमानों ने अपनी चिर परिचित शैली में लेबनान में शरिया कानून लागू करने की मांग कर दी और जगह जगह आगजनी होने लगी और 1975 में लेबनान में छोटा-मोटा गृहयुद्ध ही छिड़ गया।

फिर जब 1978 में ईरान में तख्तापलट हुआ और ईरान को धर्मनिरपेक्ष देश से कट्टर इस्लामिक देश बनाने की घोषणा की गई और कट्टरपंथी मौलाना अयातुल्लाह खोमेनी ने ईरान में शरिया कानून लागू कर दिया तब लेबनान के कट्टरपंथी मौलाना लोगों ने भी लेबनान को धर्मनिरपेक्ष से इस्लामिक देश बनाने की मांग को लेकर मारकाट मचा दिया। फिर संयुक्त राष्ट्र संघ के दखल के बाद लेबनान में डेमोग्राफिक शिफ्टिंग की गई जो विश्व में अपनी तरह का अनूठा शिफ्टिंग था जिस में ईसाइयों को एक अलग इलाके में बसाया गया और मुस्लिमों को एक अलग इलाके में बसाया गया और यह शिफ्टिंग राजधानी बेरुत में भी हुई बेरुत में ईसाइयों का अलग इलाका घोषित कर दिया गया और मुसलमानों का एक अलग इलाका घोषित कर दिया गया। नतीजा यह हुआ अब मुसलमान आपस में ही शिया सुन्नी मारकाट करने लगे और शियाओ ने एक कट्टर आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला बनाया और यह हिजबुल्ला शियाओं का सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठन है उसके बाद हिजबुल्ला ने लेबनान में सुन्नियों को मारना शुरू किया और बड़ी संख्या में सुन्नियों का कत्लेआम किया गया जिससे बहुत से सुननी सऊदी अरब भाग गए हिजबुल्ला को ईरान और सीरिया का समर्थन प्राप्त है।

अभी जो बेरुत के पोर्ट पर ब्लास्ट हुआ जिससे लगभग 70% बेरूत शहर बर्बाद हो गया यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय को ही काफी बड़ा नुकसान हुआ उस ब्लास्ट के पीछे एक तर्क यह आ रहा है कि हिजबुल्ला ने एक गोदाम में लगभग 40000 टन अमोनियम नाइट्रेट इकट्ठा किया था जिसके द्वारा वह इजरायल पर हमला करना चाहता था लेकिन इसराइल को इसकी भनक लग गई और इजराइल ने उस गोदाम में ब्लास्ट करके 70% बेरूत को ही उड़ा दिया।

बेरुत अब एक खंडहर में तब्दील हो चुका है।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

पाँच सौ साल पुरानी बात है, भारत के दक्षिणी तट पर एक राजा के दरबार में एक यूरोपियन आया था। मई का महीना था, मौसम गर्म था पर उस व्यक्ति ने एक बड़ा सा कोर्ट-पतलून और सिर पर बड़ी सी टोपी डाल रखी थी।

उस व्यक्ति को देखकर जहाँ राजा और दरबारी हँस रहे थे, वहीं वह आगन्तुक व्यक्ति भी दरबारियों की वेशभूषा को देखकर हैरान हो रहा था।

स्वर्ण सिंहासन पर बैठे जमोरिन राजा के समक्ष हाथ जोड़े खड़ा वह व्यक्ति वास्कोडिगामा था जिसे हम भारत के खोजकर्ता के नाम से जानते हैं।

यह बात उस समय की है जब यूरोप वालों ने भारत का सिर्फ नाम भर सुन रखा था, पर हाँ…इतना जरूर जानते थे कि पूर्व दिशा में भारत एक ऐसा उन्नत देश है जहाँ से अरबी व्यापारी सामान खरीदते हैं और यूरोपियन्स को महँगे दामों पर बेचकर बड़ा मुनाफा कमाते हैं।

भारत के बारे में यूरोप के लोगों को बहुत कम जानकारी थी लेकिन यह “बहुत कम” जानकारी उन्हें चैन से सोने नहीं देती थी…और उसकी वजह ये थी कि वास्कोडिगामा के आने के दो सौ वर्ष पहले (तेरहवीं सदी) पहला यूरोपियन यहाँ आया था जिसका नाम मार्कोपोलो (इटली) था। यह व्यापारी शेष विश्व को जानने के लिए निकलने वाला पहला यूरोपियन था जो कुस्तुनतुनिया के जमीनी रास्ते से चलकर पहले मंगोलिया फिर चीन तक गया था।

ऐसा नहीं था कि मार्कोपोलो ने कोई नया रास्ता ढूँढा था बल्कि वह प्राचीन शिल्क रूट होकर ही चीन गया था जिस रूट से चीनी लोगों का व्यापार भारत सहित अरब एवं यूरोप तक फैला हुआ था। जैसा कि नाम से ज्ञात हो रहा है चीन के व्यापारी जिस मार्ग से होकर अपना अनोखा उत्पाद ” रेशम ” तमाम देशों तक पहुँचाया था उन मार्गों को ” रेशम मार्ग ” या शिल्क रूट कहते हैं।

(आज की तारीख में यह मार्ग विश्व की अमूल्य धरोहरों में शामिल है)।

तो मार्कोपोलो भारत भी आया था, कई राज्यों का भ्रमण करते हुए केरल भी गया था। यहाँ के राजाओं की शानो शौकत, सोना-चाँदी जड़ित सिंहासन, हीरों के आभूषण सहित खुशहाल प्रजा, उन्नत व्यापार आदि देखकर वापस अपने देश लौटा था। भारत के बारे में यूरोप को यह पहली पुख्ता जानकारी मिली थी।

इस बीच एक गड़बड़ हो गई, अरब देशों में पैदा हुआ इस्लाम तब तक इतना ताकतवर हो चुका था कि वह आसपास के देशों में अपना प्रभुत्व जमाता हुआ पूर्व में भारत तक पहुँच रहा था तो वहीं पश्चिम में यूरोप तक।
कुस्तुनतुनीया (वर्तमान टर्की )जो कभी ईसाई रोमन साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी, उसके पतन के बाद वहाँ मुस्लिमों का शासन हो गया….और इसी के साथ यूरोप के लोगों के लिए एशिया का प्रवेश का मार्ग बंद हो गया क्योंकि मुस्लिमों ने इसाईयों को एशिया में प्रवेश की इजाजत नहीं दी।

अब यूरोप के व्यापारियों में बेचैनी शुरू हुई, उनका लक्ष्य बन गया कि किसी तरह भारत तक पहुँचने का मार्ग ढूँढा जाए।

तो सबसे पहले क्रिस्टोफर कोलंबस निकले भारत को खोजने (1492 में) पर वे बेचारे रास्ता भटक कर अमेरिका पहुँच गए। परंतु उन्हें यकीन था कि यही इंडिया है और वहाँ के लोगों का रंग गेहुँआ – लाल देखकर उन्हें “रेड इंडियन” भी कह डाला। वे खुशी खुशी अपने देश लौटे, लोगों ने जब पूछा कि इंडिया के बारे में मार्कोपोलो बाबा की बातें सच है ना? तब उन्होंने कहा कि – अरे नहीं, कुछ नहीं है वहाँ ..सब जंगली हैं वहाँ।

अब लोगों को शक हुआ।

बात पुर्तगाल पहुँची, एक नौजवान और हिम्मती नाविक वास्कोडिगामा ने अब भारत को खोजने का बीड़ा उठाया। अपने बेड़े और कुछ साथियों को लेकर निकल पड़ा समुद्र में और आखिरकार कुछ महीनों बाद भारत के दक्षिणी तट कालीकट पर उसने कदम रखा।

इस बीच इटली के एक दूसरे नाविक के माइंड में एक बात कचोट रही थी कि आखिर कोलंबस पहुँचा कहाँ था , जिसने आकर ये कहा था कि इंडिया के लोग लाल और जंगली हैं ? उसकी बेचैनी जब बढ़ने लगी तो वह निकल पड़ा कोलंबस के बताये रास्ते पर! उसका नाम था अमेरिगो वेस्पुसी। जब वो वहाँ पहुँचा (1501ई.में) तो देखा कि ये तो वाकई एक नई दुनिया है, कोलंबस तो ठीक ही कह रहा था। पर इसने उसे इंडिया कहने की गलती नहीं की। वापस लौटकर जब इसने बताया कि वो इंडिया नहीं बल्कि एक “नई दुनिया” है तो यूरोपियन्स को दोहरी खुशी मिली। इंडिया के अलावे भी एक नई दुनिया मिल चुकी थी। लोग अमेरिगो वेस्पुसी की सराहना करने लगे, सम्मानित करने लगे, लगे हाथों उस ऩई दुनिया का नामकरण भी इन्हीं महाशय के नाम पर “अमेरिका” कर दिया गया।

यह बात कोलंबस तक पहुँची तो वह हैरान हुआ कि ढूँढा उसने और नाम हुआ दूसरे का, इंडिया कहने की गलती जो की थी उसने।

खैर, अब यूरोप के व्यापारियों के लिए भारत का दरवाजा खुल चुका था, नये समुद्री मार्ग की खोज हो चुकी थी जो यूरोप और भारत को जोड़ सकता था।

सिंहासन पर बैठे जमोरिन राजा से वास्कोडिगामा ने हाथ जोड़कर व्यापार की अनुमति माँगी, अनुमति मिली भी पर कुछ सालों बाद हालात बदल गए।

बहुत सारे पुर्तगाली व्यापारी आने लगे, इन्होंने अपनी ताकत बढ़ाई, साम दाम दंड की नीति अपनाते हुए राजा को कमजोर कर दिया गया और अन्ततः राजा का कत्ल भी इन्हीं पुर्तगालियों के द्वारा करवा दिया गया।

70 – 80 वर्षों तक पुर्तगालियों द्वारा लूटे जाने के बाद फ्रांसीसी आए। इन्होंने भी लगभग 80 वर्षों तक भारत को लूटा। इसके बाद डच (हालैंड वाले) आए श, उन्होंने भी खूब लूटा और सबसे अंत में अँगरेज आए पर ये लूट कर भागने के लिए नहीं बल्कि इन्होंने तो लूट का तरीका ही बदल डाला।

इन्होंने पहले तो भारत को गुलाम बनाया फिर तसल्ली से लूटते रहे। 20 मई 1498 को वास्कोडिगामा भारत की धरती पर पहला कदम रखा था और राजा के समक्ष अनुमति लेने के लिए हाथ जोड़े खड़ा था। उसके बाद उस लूटेरे और उनके साथियों ने भारत को जितना बर्बाद किया वो इतिहास बन गया।

आज जिसे हम भारत का खोजकर्ता कहते नहीं अघाते हैं, दरअसल वह एक लूटेरा था जिसने सिर्फ भारत को लूटा ही नहीं था बल्कि यहाँ रक्तपात भी बहुत l #JaiRajputana

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Emilie Schenkl


यह कहानी एक जर्मन महिला की है, जिनका नाम था, एमिली शेंकल #Emilie_Schenkl

मुझे नहीं पता आपमें से कितनों ने ये नाम सुना है…
और अगर नहीं सुना है तो आप दोषी नहीं, इस नाम को इतिहास से खुरच कर निकाल फेंका गया…

श्रीमती एमिली शेंकल ने १९३७ में भारत माँ के लाड़ले बेटे #सुभाष_चन्द्र_बोस से विवाह किया…
और एक ऐसे देश को ससुराल के रूप में चुना जिसने कभी इस बहू का स्वागत नहीं किया…

न बहू के आगमन में किसी ने मंगल गीत गाये और न उसकी बेटी के जन्म पर कोई सोहर गायी गयी…
कभी कहीं जनमानस में चर्चा तक नहीं हुई कि वो कैसे जीवन गुजार रही हैं…

सात साल के कुल वैवाहिक जीवन में सिर्फ ३ साल ही उन्हें अपने पति के साथ रहने का अवसर मिला…
फिर उन्हें और नन्हीं सी बेटी को छोड़ पति देश के लिए लड़ने चला आए…
इस वायदे के साथ कि पहले देश को आज़ाद करा लूँ…
फिर तो सारा जीवन तुम्हारे साथ बिताना ही है…..

पर ऐसा हुआ नहीं औऱ १९४५ में एक कथित विमान दुर्घटना में वो लापता हो गए…

उस समय एमिली शेंकल बेहद युवा थीं…
चाहतीं तो यूरोपीय संस्कृति के हिसाब से दूसरा विवाह कर सकतीं थीं…
पर उन्होंने ऐसा नहीं किया और सारा जीवन बेहद कड़ा संघर्ष करते हुए बिताया…
एक तारघर की मामूली क्लर्क की नौकरी और बेहद कम वेतन के साथ वो अपनी बेटी को पालती रहीं…
न किसी से शिकायत की न कुछ माँगा…

भारत भी तब तक आज़ाद हो चुका था…
और वे चाहतीं थीं कि कम से कम एक बार उस देश में आएँ जिसकी आजादी के लिए उनके पति ने जीवन न्योछावर कर दिया था…

भारत का एक अन्य राजनीतिक नेहरू/गाँधी परिवार इस एक महिला से इतनी बुरी तरह भयभीत था…
कि जिसे सम्मान सहित यहाँ बुलाकर देश की नागरिकता देनी चाहिए थी…
उसे कभी भारत का वीज़ा तक नहीं दिया गया..

आखिरकार बेहद कठिनाइयों भरे और किसी भी तरह की चकाचौंध से दूर रहकर बेहद साधारण जीवन गुजार कर श्रीमती एमिली शेंकल बोस ने मार्च १९९६ में गुमनामी में ही जीवन त्याग दिया…

जो इस देश के सबसे लोकप्रिय जन नेता नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की धर्मपत्नी थीं…
और जिन्हें नेहरू/ गाँधी कुनबे ने कभी इस देश में पैर नहीं रखने दिया…
नेहरू/गाँधी परिवार यह जानता था कि ये देश सुभाष बाबू की पत्नी को सर आँखों पर बिठा लेगा…
इसीलिए उन्हें एमिली बोस का इस देश में पैर रखना अपनी सत्ता के लिए चुनौती लगा…

काँग्रेसी और उनके जन्मजात अंध चाटुकार, कुछ पत्रकार, और इतिहासकार (?) अक्सर विदेशी मूल की राजीव की बीबी सोनिया गाँधी को देश की बहू का ख़िताब दे डालते हैं…
उसकी कुर्बानियों का बखान बेहिसाब कर डालते हैं…

क्या एंटोनिया माइनो (सोनिया गाँधी) कभी भी श्रीमती एमिली बोस की मौन कुर्बानियों के सामने कहीं भी ठहर सकती है…?

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છત્રપતિ શિવાજી મહારાજ઼


*🚩આભ માઁ ઉગેલ ચાંદલો🚩*

ઘણા ઓછા લોકોને જાણ હશે કે માતા જીજીબાઈ અને પિતા શાહજીના પુત્ર શિવાજીનો જન્મ ૧૯, ફેબ્રુઆરી ૧૬૩૦નાં રોજ રાત્રે થયેલો. પરંતુ એ સત્પુરુષનો જન્મ કેવી સ્થિતિમાં થયેલો અને તેની માતાએ કેવા પાઠો ભણાવેલાં એનું વર્ણન કવિ શ્રી ઝવેરચંદ મેઘાણીએ હાલરડામાં વર્ણવ્યું છે.

એવું બને છે કે બાદશાહની સેના એક રજવાડાં ઉપર હુમલો કરે છે, વિશાળ સેના હોવાથી એ નાનું રજવાડું તેની સેના સામે લડવા સક્ષમ નથી હોતું. તેથી બંને જણા ત્યાંથી નીકળી જવાનું વિચારે છે, આદેશ મુજબ દરવાજા ખોલાય છે અને બંને જણા પોતપોતાનાં ઘોડા લઈને બહાર નીકળી જાય છે. દરવાજા ફરી બંધ થઈ જાય છે.

બહાર નીકળે છે ત્યાં તો લાખોની સેના મીટ માંડીને બેઠી હોય છે. આગળ બંને ઘોડેસવાર અને પાછળ સેના. સેનાનો બસ એક જ ઉદ્દેશ હતો કે બંને યુગલને મારી નાખવામાં આવે. અને જો ના મારે તો બાદશાહ સેનાપતિને મારી નાંખે એમ હતા. સૌના હથિયારનું નિશાન બસ આ બે ઘોડેસવાર જ હતા.

પાઘડધામ પાઘડધામ કરતા ઘોડા દોડતા હતા, એવામાં એક સાંકડું નાળુ આવ્યું. એ નાળામાં એક તરફી જ રસ્તો હતો. કાંટાળી ઊંચી બે માથોડા જેવડી વાડ, એવામાં સામેથી બોરડીના કાંટા ભરેલું ગાડું આવતું હતું, તેથી ઘોડો આગળ દોડાવવો શક્ય નહોતો, પાછળ બાદશાહની સેના ખૂબ જ નજીક આવી ગઈ હતી. ત્યારે આગળનો અસવાર બોલ્યો જેટલાને મારી શકીએ એટલાને મારીયે અને છેલ્લે નહીં પહોંચી વળિયે તો મરી જાશું પણ અહીં ઉભા રહી જઈએ.

ત્યારે પાછળનો અસવાર કહે છે મારવું પણ નથી અને મરવું પણ નથી, ઉભું પણ નથી રહેવું. મારવાના, મરવાના, ઉભા રહેવાના, પાછા પડવાના અને નીકળી જવાના યોગ્ય ટાણા હોય. ત્યારે પાછળનો અસવાર કહે છે કે તમારો ઘોડો થોડો એકબાજુ રાખો તો હું મારો ઘોડો કુડાવી દઉં.

આગળનો ઘોડેસવાર એક બાજુ રહ્યો અને પાછળના અસવારે ઘોડાને થપાટ મારી અને ઘોડો કાંટા ભરેલું ગાડું કૂદી ગયો. અને પાછળનો અસવાર પણ થોડો પાછો જઈ થપાટ મારી ઘોડો કુદાવી ગયો. જાણો છો પહેલો ઘોડો કોણે કુદાવ્યો? સાહેબ!, એ પહેલો ઘોડો આ ભારત દેશની આર્યનારીએ કુદાવ્યો. એમ એક રાતમાં અઢીસો કિલોમીટરનું અંતર કાપ્યું. પાછળ સેના અવિરત ચાલી આવે છે.

આટલું અંતર કાપ્યા પછી પહેલો ઘોડો કુદાવનારી સ્ત્રી પોતાના પતિને કહે છે કે મારાથી હવે વધુ ઘોડા ઉપર નહીં બેસાય, તમે ચાલ્યા જાઓ. ત્યારે એ બીજો ઘોડેસવાર પૂછે છે કારણ શું? ત્યારે એ દેશની નારી કહે છે કે મને પ્રસૂતિની પીડા ઉપડવાની તૈયારી છે. તમને માતાજીનાં સોગંધ તમે નીકળી જાઓ. ત્યારે એ પુરુષ, એ ઘોડેસવાર માતાજીનાં સોગંધથી બંધાઈને આગળ નીકળી જાય છે અને એ દેશની નારી થોડી આગળ જતાં ત્યાં એક ડુંગરા પાસે પોતાનો ઘોડો થોભાવે છે. પાછળ સેનાપતિ અને બાદશાહની સેના તેને આંબી જાય છે.

એક હાથમાં ભાલો અને બીજો હાથ પેટ ઉપર રાખીને એ દેશની સ્ત્રીને ઘોડેથી ઉતરતા જુવે છે ત્યારે એ સેનાપતિ બોલી ઉઠે છે, યા અલ્લાહ હું આ શું જોઈ રહ્યો છું? આ દેશની નારીની આ તાકાત? હાથમાંથી તમામ શસ્ત્રો જમીન ઉપર પડી જાય છે અને સેનાને આદેશ આપે છે કે દેશની આ સિંહણને કોઈ હાથ ના લગાવતાં, એ વિફરશે તો કેટલાંયે હોમાઈ જશે. અને એ સેનાપતિ ત્યારે આ ભારત દેશની નારીને સલામ કરીને એટલું બોલેલો કે પુરા દિવસો જતા હોય, બાળક જન્મવાની તૈયારી હોય અને તો’યે અઢીસો કિલોમીટરનું અંતર કાપી શકે એ માત્ર હિન્દુસ્તાનની નારી જ કરી શકે એવી તાકાત કોઈ અન્ય નારી પાસે ના હોય.

એ નારી જેમ જેમ આગળ ડગલાં ભરે એમ એમ એ લાખોની ફોજ તેને સેનાપતિના હુકમથી આગળ જવાનો માર્ગ કરી આપે છે. ભાલાને ટેકે એ ડુંગરો ચડે છે. અને શિવલહેરીનાં કિલ્લા તરફ પ્રયાણ કરે છે. એ દ્રશ્ય જોઈને બાદશાહનો સેનાપતિ એ સ્ત્રીને સલામ કરે છે અને કહે છે બેન હું બાદશાહનો સેનાપતિ છું તારે જરૂર હોય તો હું સો સૂયાણી બોલાવી દઉં પણ તને કંઈ થઈ જશે તો મારી જાતને માફ નહીં કરી શકું.

ત્યારે એ સ્ત્રી એટલું જ કહે છે કે નથી જરૂર સૂયાણીની, હું સક્ષમ છું, બસ તમે યુદ્ધ માટે તૈયાર રહેજો. ત્યારે સેનાપતિ વિચારે છે કે આ સ્ત્રી આવી હાલતમાં છે તો યુદ્ધ કરશે કોણ? અને એ સ્ત્રી દાદર ચડીને સોળ સ્થંભ અને ત્રણ ઘુમ્મટનાં શિવનાં મંદિરમાં પ્રવેશીને મંદિરના દ્વાર બંધ કરે છે. પરિણામને જોવા ચારેય બાજુ સેના પથરાયેલી છે.

થોડી વાર થઈ ત્યાં બાળકના રડવાનો અવાજ સંભળાયો હું…આ… હું…આ… હું…આ… સેનાપતિ ખુશ થઈ ગયો અને પૂછ્યું બેન દીકરો કે દીકરી ત્યારે એ લોહીથી લથપથ સ્ત્રી જવાબ આપે છે તમારું મોત, તમારો કાળ શિવાજી જન્મ્યો છે. સેનાપતિ કહે છે કે મારે એકવાર એનું મોઢું જોવું છે, જેની મા આટલી શૂરવીર હોય એનો દીકરો કેવો હશે ત્યારે એ વિરાંગના કહે છે કે અઢાર વરહની વાટુ જુવો જ્યારે એ ખંજર લઈને તમારી છાતીમાં ભોંકે ત્યારે એનું મોઢું જોઈ લેજો. અત્યારે મારાં શિવાનું મોઢું જોવાનો તમારો વખત નથી…

અને ત્યારે શ્રી ઝવેરચંદ મેઘાણી લખે છે કે,
આભમાં ઉગેલ ચાંદલો’ને જીજાબાઈને આવ્યા બાળ રે, જીજાબાઈને આવ્યા બાળ.
બાલૂડાંને નિંદરુ ના’વે,
માતા જીજાબાઈ ઝુલાવે…!!

શિવાજી મહારાજની પુન્યતિથી નિમિત્તે શત શત પ્રણામ🙏

(લેખકનું નામ જ્ઞાત નથી પણ વાંચીને શેર લોહી ચડે એવી વાત ઘરે ઘરે વંચાવી જ જોઈએ) 🙏જય શ્રીકૃષ્ણ🙏 *આ જ છે એક રજપુતાની શક્તિ દેશભક્તિ*

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#ये है देश के दो बड़े गद्दारोकी कहानी….

जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो…
*#भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ #शोभा सिंह ने गवाही दी और #दूसरा गवाह था शादी लाल !
दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को अंग्रेजोसे न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले।

#शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है जबकि

#शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है।

👉 सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि नजरों मे सदा घृणा के पात्र थे और अब तक हैं
लेकिन शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया। शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।

*#शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी। शोभा सिंह के बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया। सर शोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है। आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।

खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देशभक्त. दूरद्रष्टा और निर्माता साबित करने की भरसक कोशिश की।

खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की। खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेंका था। #बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही दी, शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में वह बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था। हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की।
खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं,
और…बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं

👉#आज़ादी के दीवानों के विरुद्ध और भी गवाह थे ।

*1. शोभा सिंह
*2. शादी राम
*3. दिवान चन्द फ़ोर्गाट
*4. जीवन लाल
*5. नवीन जिंदल की बहन के पति का दादा
*6. भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दादा

👉#दीवान चन्द फोर्गाट DLF कम्पनी का Founder था इसने अपनी पहली कालोनी रोहतक में बनाई थी .इसकी इकलौती बेटी थी जो कि K.P.Singh को ब्याही और वो मालिक बन गया DLF का ।
*👉#अब K.P.Singh की भी इकलौती बेटी है जो कि कांगरेस के गुलाम नबी आज़ाद के बेटे सज्जाद नबी आज़ाद के साथ ब्याही गई है । अब वह DLF का मालिक बनेगा ।

👉#जीवन लाल मशहूर एटलस साईकल कम्पनी का मालिक था।

#हुड्डा को तो आज किसी परिचय की जरुरत नहीं है हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री जिनकी कुर्सी जाने से आज वो इतना तिलमिला गए हैं की उन्होंने जाट आंदोलन की आड़ में पूरा हरियाणा जला दिया .इसका बेटा भी काँग्रेसका सांसद है.
*प्रभाकर मुंबईकर