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औरंगजेब की हर चाल को परास्त किया छत्रसाल ने

राकेश कुमार आर्य

छत्रसाल जैसे हिंदू वीरों के प्रयासों को अतार्किक, अयुक्तियुक्त, असमसामयिक और निरर्थक सिद्घ करने के लिए धर्मनिरपेक्षतावादी/ साम्यवादी इतिहास लेखकों ने एड़ी-चोटी का बल लगाया है। इन लोगों ने शाहजहां को ही नही, अपितु औरंगजेब को भी धर्मनिरपेक्ष शासक सिद्घ करने का प्रयास किया है। जबकि वास्तव में ऐसा नही था। डा. वी.ए. स्मिथ ने कहा है कि-”शाहजहां धार्मिक दृष्टि से एक कट्टर मुसलमान तथा धर्मांध शासक था। हिंदुओं पर उसने कठोर नियंत्रण लगाये। नये मंदिर बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। प्रयाग एवं बनारस में उसने 76 हिंदू मंदिरों को गिरवा दिया था।”

हिन्दू राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करते रहे हिन्दू वीर

(संदर्भ : ‘दा ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ पृष्ठ 397)

इतिहासकारों का कहना है कि उसने हिंदुओं पर पुन: तीर्थ यात्रा कर लगाया। उसने हिंदुओं को बलात मुसलमान बनाने की प्रक्रिया को भी प्रोत्साहन दिया। इतना ही नही वह शिया मुस्लिमों के प्रति भी कठोर था। अनेक शियाओं को उसकी कठोरता का शिकार होना पड़ा था। उसकी दक्षिण नीति उसकी धार्मिक कट्टरता तथा धार्मिक असहिष्णुता की नीति थी।

डा. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव कहते हैं-”यह ठीक है कि उसके शासन काल में प्रतिक्रियावादी भारत के बीज बोये जा चुके थे, जो फलस्वरूप मुगलवंश तथा साम्राज्य के पतन के मूल कारण थे। उसकी धार्मिक कट्टरता तथा असहिष्णुता ने ही औरंगजेबी प्रतिक्रियावादी शासन पद्घति को जन्म दिया।”

(संदर्भ : ‘भारत का इतिहास’ पृष्ठ 703)

शाहजहां के शासन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बनारसीदास सक्सेना ने कहा है कि उसके शासन काल में ”प्रांतीय शासक प्राय: स्वतंत्र हो गये।” कथित स्वर्ण-युग के निर्माता इस शासक के शासनकाल में एक बार अकाल पड़ गया था तो उस समय लोगों की जो स्थिति हुई थी उस पर इतिहासकार मूरलैंड ने लिखा है कि जब लोग भूखे मर रहे थे। उस समय शाहजहां के शिविर में हर प्रकार की रसद पड़ी थी।

मुण्डी ने लिखा है कि- ”जहां तक मैंने देखा दुखी लोगों की सहायतार्थ सरकार द्वारा कुछ भी नही किया गया।”

अब्दुल हमीद लाहौरी ने इस अकाल का आंखों देखा वर्णन करते हुए लिखा है-”एक-एक रोटी के लिए लोग अपना जीवन बेचने को तत्पर थे। पर कोई भी व्यक्ति उन लोगों को खरीदने के लिए उत्सुक नही था बाजारों में बकरे के मांस के स्थान पर कुत्ते का मांस बिकता था और मरे हुए व्यक्तियों की हड्डियों को पीस कर आटे में मिलाकर लोग बेचते थे।”

छत्रसाल इसी अवस्था से भारत की मुक्ति चाहते थे

शाहजहां के कुशासन की प्रतिक्रिया स्वरूप छत्रसाल का जन्म हुआ। जब उस महायोद्घा ने देखा कि लोग एक रोटी के लिए भी अपना जीवन बेच देना चाहते है, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि छत्रसाल जैसे देशभक्तों के हृदयों में आग न लगी हो? आग लगी, और इतनी तेज लगी कि संपूर्ण तंत्र को ही भस्मीभूत करने के लिए प्रचण्ड हो उठी।

इसी तेज पुंज छत्रसाल को राजा सुजानसिंह की मृत्यु के उपरांत उसके भाई इंद्रमणि ने ओरछा की गद्दी संभालने के पश्चात 1674-1676 के मध्य अपनी सहायता देना बंद कर दिया, तो इस शासक के बहुत बड़े क्षेत्र को जीतकर छत्रसाल ने अपने राज्य में मिला लिया। तब इंद्रमणि पर छत्रसाल ने अपना शिकंजा कसना आरंभ किया तो वह भयभीत हो गया और उसने शीघ्र ही छत्रसाल के साथ संधि कर ली। उसने छत्रसाल को मुगलों के विरूद्घ सहायता देने का भी वचन दिया।

तहवर खां को किया परास्त

1679 ई. में औरंगजेब ने अपने चिरशत्रु शत्रुसाल (छत्रसाल) का मान मर्दन करने के लिए अपने बहुत ही विश्वसनीय योद्घा तहवर खां को विशाल सेना के साथ भेजा। छत्रसाल इस समय संडवा बाजने में अपनी स्वयं की वर यात्रा लेकर आये हुए थे। उस समय उनकी भंवरी पड़ रही थी, तो तहवर खां ने उसी समय उन्हें घेर लिया। छत्रसाल के विश्वसनीय साथी बलदीवान ने तहवर खां से टक्कर ली। भंवरी पड़ चुकने पर छत्रसाल ने तहवरखां की सेना के पृष्ठ भाग पर आक्रमण कर दिया और जब तक तहवरखां इस सच से परिचित होता कि उसकी सेना के पृृष्ठ भाग पर मार करने वाला योद्घा ही छत्रसाल है, तब तक छत्रसाल ने तहवरखां को भारी क्षति पहुंचा दी थी।

जब तहवरखां अपनी सेना के पृष्ठ भाग की रक्षार्थ उस ओर चला तो बलदीवान भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। रामनगर की सीमा में छत्रसाल की सेना से तहवरखां का सामना हो गया। अब सामने से छत्रसाल की सेना और पीछे से बल दीवान की सेना ने तहवरखां की सेना को मारना आरंभ कर दिया। अंत में तहवरखां वीरगढ़ की मुगल सैनिक चौकी की ओर भाग लिया। पर यह क्या? उसे तो छत्रसाल के सैनिक पहले ही नष्ट कर चुके थे। अब तो वह और भी कठिनाई में फंस गया। वीरगढ़ में उसे ऐसा लगा कि छत्रसाल की सेना मुगलों के भय से भागती फिर रही है तो उसने छत्रसाल का पीछा करना चाहा। उसे सूचना मिली कि छत्रसाल टोकरी की पहाड़ी पर छुपा है। तब वह उसी ओर चल दिया। उधर बलदीवान वीरगढ़ के पास छिपा सारी वस्तुस्थिति पर दृष्टि गढ़ाये बैठा था, उसे जैसे ही ज्ञात हुआ कि तहवरखां टोकरी की ओर बढ़ रहा है तो वह भी तुरंत उसी ओर चल दिया। छत्रसाल और बलदीवान शत्रु को इसी पहाड़ी पर ले आना चाहते थे क्योंकि यहां शत्रु को निर्णायक रूप से परास्त किया जा सकता था।

यहां से बलदीवान ने एक सैनिक टुकड़ी छत्रसाल की सहायतार्थ भेजी। उसने स्वयं ने मुगलों को ऊपर न चढऩे देने के लिए उनसे संघर्ष आरंभ कर दिया। यहां पर छत्रसाल की सेना के हरिकृष्ण मिश्र नंदन छीपी और कृपाराम जैसे कई वीरों ने अपना बलिदान दिया। पर उनका यह बलिदान व्यर्थ नही गया-कुछ ही समयोपरांत मुगल सेना भागने लगी। हमीरपुर के पास उस सेना का सामना छत्रसाल से हुआ तो तहवरखां को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया गया। तहवरखां को अपने स्वामी औरंगजेब को मुंह दिखाने का भी साहस नही हुआ।

कालिंजर विजय

मुगल सत्ता व शासकों के पापों का प्रतिशोध लेता छत्रसाल अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ कालिंजर की ओर बढ़ा तो वहां के दुर्ग के मुगल दुर्ग रक्षक करम इलाही के हाथ पांव फूल गये। कालिंजर का दुर्ग बहुत महत्वपूर्ण था। छत्रसाल ने 18 दिन के घेराव और संघर्ष के पश्चात अंत में इसे भी अपने अधिकार में ले ही लिया। दुर्ग पर छत्रसाल का भगवाध्वज फहर गया। इस युद्घ में बहुत से बुंदेले वीरों का बलिदान हुआ, पर उस बात की चिंता किसी को नही थी।

कालिंजर विजय की प्रसन्नता में बलिदान सार्थक हो उठे। सभी ने अपने वीरगति प्राप्त साथियों के बलिदानों को नमन किया और उनके द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा भी की। यहीं से छत्रसाल को लोगों ने ‘महाराजा’ कहना आरंभ किया। ये कालिंजर की महत्ता का ही प्रमाण है कि लोग अब छत्रसाल को ‘महाराजा’ कहने में गौरव अनुभव करने लगे। छत्रसाल महाराजा के इस सफल प्रयास से मुगल सत्ता को उस समय कितनी ठेस पहुंची होगी?-यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

छत्रसाल को घेरने की तैयारी होने लगी

अब छत्रसाल की ख्याति इतनी बढ़ चुकी थी कि उनसे ईष्र्या करने वाले या शत्रुता मानने वाले मुगल शासकों तथा उनके चाटुकार देशद्रोही ‘जयचंदों’ ने उन्हें घेरने का प्रयास करना आरंभ कर दिया। औरंगजेब के लिए यह अत्यंत लज्जाजनक स्थिति थी कि छत्रसाल जैसा एक युवक उसी की सेना से निकलकर उसी के सामने छाती तानकर खड़ा हो जाए और मिट्टी में से रातों रात एक साम्राज्य खड़ा करने में सफल हो जाए। विशेषत: तब जबकि यह साम्राज्य उसी के साम्राज्य को छिन्न-भिन्न करके तैयार किया जा रहा था।

छत्रसाल ने भी स्थिति को समझ लिया था। डा. भगवानदास गुप्त ‘महाराजा छत्रसाल बुंदेला’ में लिखते हैं कि-”छत्रसाल ने ऐसी परिस्थितियों में दूरदृष्टि का परिचय देते हुए औरंगजेब के पास अपने कार्यों की क्षमायाचना का एक पत्र लिखा। वास्तव में यह पत्र उन्होंने मुगलों को धोखे में डालने के लिए नाटकमात्र किया था। जिससे मुगल कुछ समय के लिए भ्रांति में रह जाएं और उन्हें अपनी तैयारियां करने का अवसर मिल जाए। क्योंकि छत्रसाल यह जान गये थे कि अब जो भी युद्घ होगा वह बड़े स्तर पर होगा। बुंदेलखण्ड की मिट्टी में रहकर किसी के लिए यह संभव ही नही था कि वह वहां स्वतंत्रता के विरूद्घ आचरण करे। इस मिट्टी में स्वतंत्रता की गंध आती थी और उस सौंधी सौंधी गंध को पाकर लोग वीरता के रस से भर जाते थे। छत्रसाल के साथ भी ऐसा ही होता था।”

स्वामी प्राणनाथ और छत्रसाल

स्वामी प्राणनाथ छत्रसाल के आध्यात्मिक गुरू थे-उन्होंने अपने प्रिय शिष्य के भीतर व्याप्त स्वतंत्रता और स्वराज्य के अमिट संस्कारों को और भी प्रखर कर दिया और उन्हें गतिशील बनाकर इस प्रकार सक्रिय किया कि संपूर्ण बुंदेलखण्ड ही नही, अपितु तत्कालीन हिंदू समाज भी उनसे प्राण ऊर्जा प्राप्त करने लगा। स्वामी प्राणनाथ और छत्रसाल का संबंध वैसा ही बन गया जैसा कि छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ गुरू रामदास का संबंध था। स्वामी प्राणनाथ का उस समय हिन्दू समाज में अच्छा सम्मान था।

साम्राज्य निर्माता छत्रसाल

इसके पश्चात छत्रसाल ने जलालखां नामक एक सरदार का सामना किया और उसे बेतवा के समीप परास्त कर उससे 100 अरबी घोड़े, 70 ऊंट तथा 13 तोपें प्राप्त कीं। इसी प्रकार जब औरंगजेब द्वारा बारह हजार घुड़सवारों की सेना अनवर खां के नेतृत्व में 1679 ई. में भेजी गयी तो उसे भी छत्रसाल ने परास्त कर दिया।

इस प्रकार की अनेकों विजयों से तत्कालीन भारत के राजनीतिक गगन मंडल पर छत्रसाल ने जिस वीरता और साहस के साथ अपना साम्राज्य खड़ा किया उसने उनके नाम को इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर सदा-सदा के लिए अमर कर दिया। उनका पुरूषार्थ भारत के इतिहास के पृष्ठों को उनकी कान्ति से इस प्रकार महिमामंडित और गौरवान्वित कर गया कि लोग आज तक उन्हें सम्मान के साथ स्मरण करते हैं। उसका प्रयास हिंदू राष्ट्र निर्माण की दिशा में उठाया गया ठोस और महत्वपूर्ण कार्य था। दुर्भाग्य हमारा था कि हम ऐसे प्रयासों को निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी केवल इसीलिए अनवरतता या नैरतंर्य प्रदान नही कर पाये कि छत्रसाल जैसे राष्ट्रनिर्माताओं के चले जाने पर हमारे भीतर से ही कुछ ‘जयचंद’ उठते थे और उनके प्रयासों को धक्का देने के लिए सचेष्ट हो उठते थे।

यह सच है कि अपने काल के बड़े-बड़े शत्रुओं को समाप्त करना और महादुष्ट और निर्मम शासकों की नाक तले साम्राज्य खड़ा कर राष्ट्र निर्माण का कार्य संपन्न करना बहुत बड़ा कार्य था। जिसे शत्रु के अत्याचारों से मुक्त होने की दिशा में उठाया गया वंदनीय कृत्य ही माना जाना चाहिए।

औरंगजेब की नींद उड़ा दी थी छत्रसाल ने

औरंगजेब की रातों की नींद छत्रसाल के कारण उड़ चुकी थी। वह जितने प्रयास करता था कि छत्रसाल का अंत कर दिया जाए-छत्रसाल था कि उतना ही बलशाली होकर उभरता था।

शिवाजी की मृत्यु के उपरांत 14 अप्रैल 1680 ई. में औरंगजेब ने मिर्जा सदरूद्दीन (धमौनी का सूबेदार) को छत्रसाल को बंदी बनाने के लिए भेजा। छत्रसाल इस समय अपने गुरू छत्रपति शिवाजी की मृत्यु (4 अप्रैल 1680 ई.) से आहत थे। पर वह तलवार हाथ में लेकर युद्घ के लिए सूचना मिलते ही चल दिये।

चिल्गा नौरंगाबाद (महोबा राठ के बीच) में दोनों पक्षों का आमना-सामना हो गया। छत्रसाल ने सदरूद्दीन की सेना के अग्रिम भाग पर इतनी तीव्रता से प्रहार किया कि वह जितनी शीघ्रता से आगे बढ़ रही थी उतनी ही शीघ्रता से पीछे भागने लगी। इससे सदरूद्दीन की सेना में खलबली मच गयी। सदरूद्दीन भी छत्रसाल की सेना के आक्रमण से संभल नही पाया और ना ही वह अपने भागते सैनिकों को कुछ समझा पाया कि भागिये मत, रूकिये और शत्रु का सामना वीरता से कीजिए। उसको स्वयं को भी भय लगने लगा।

सदरूद्दीन को भी पराजित होना पड़ा

इस युद्घ में परशुराम सोलंकी जैसे अनेकों हिंदू वीरों ने अपनी अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन किया और मुगल सेना को भागने के लिए विवश कर दिया। पर सदरूद्दीन ने अपनी सेना को ललकारा और उसे कुछ समय पश्चात वह रोकने में सफल रहा। फिर युद्घ आरंभ हुआ। इस बार बुंदेले वीर छत्रसाल को मुगल सेना ने घेर लिया। पर वह वीर अपनी तलवार से शत्रु को काटता हुआ धीरे-धीरे पीछे हटता गया। वह बड़ी सावधानी से और योजनाबद्घ ढंग से पीछे हट रहा था और शत्रुसेना को अपने साथी परशुराम सोलंकी की सेना की जद में ले आने में सफल हो गया, जो पहले से ही छिपी बैठी थी। यद्यपि मुगल सैनिक छत्रसाल के पीछे हटने को ये मान बैठे थे कि वह अब हारने ही वाली है।

परशुराम के सैनिक भूखे शेर की भांति मुगलों पर टूट पड़े। युद्घ का परिदृश्य ही बदल गया , सदरूद्दीन को अब हिंदू वीरों की वीरता के साक्षात दर्शन होने लगे। वीर बुंदेले अपना बलिदान दे रहे थे और बड़ी संख्या में शत्रु के शीश उतार-उतार कर मातृभूमि के ऋण से उऋण हो रहे थे। परशुराम सोलंकी, नारायणदास, अजीतराय, बालकृष्ण, गंगाराम चौबे आदि हिंदू योद्घाओं ने मुगल सेना को काट-काटकर धरती पर शवों का ढेर लगा दिया। अपनी पराजय को आसन्न देख सदरूद्दीन मियां ने अपने हाथी से उतरकर एक घोड़े पर सवार होकर भागने का प्रयास किया। जिसे छत्रसाल ने देख लिया। वह तुरंत उस ओर लपके और सदरूद्दीन को आगे जाकर घेर लिया। सदरूद्दीन के बहुत से सैनिकों ने उसका साथ दिया। छत्रसाल की सेना के नायक गरीबदास ने यहां भयंकर रक्तपात किया और अपना बलिदान दिया। पर सिर कटे गरीबदास ने भी कई मुगलों को काटकर वीरगति प्राप्त की। मुगल सेना का फौजदार बागीदास सिर विहीन गरीब दास की तलवार का ही शिकार हुआ था। गरीबदास की स्थिति को देखकर छत्रसाल और उनके साथियों ने और भी अधिक वीरता से युद्घ करना आरंभ कर दिया।

अंत में सदरूद्दीन क्षमायाचना की मुद्रा में खड़ा हो गया। उसने छत्रसाल को चौथ देने का वचन भी दिया। छत्रसाल ने तो उसे छोड़ दिया पर बादशाह औरंगजेब ने उसे भरे दरबार में बुलाकर अपमानित किया और उसके सारे पद एवं अधिकारों से उसे विहीन कर दिया।

हमीद खां को भी किया परास्त

इसी प्रकार कुछ कालोपरांत छत्रसाल को एक हमीदखां नामक मुगल सेनापति के आक्रमण की जानकारी मिली। हमीदखां ने चित्रकूट की ओर से आक्रमण किया था और वह वहां के लोगों पर अत्याचार करने लगा था। तब उस मुगल को समाप्त करने के लिए छत्रसाल ने बलदीवान को 500 सैनिकों के साथ उधर भेजा। बलदीवान ने उस शत्रु पर जाते ही प्रबल प्रहार कर दिया और उसे प्राण बचाकर भागने के लिए विवश कर दिया। बलदीवान ने हमीद खां का पीछा किया और उसके द्वारा महोबा के जागीरदार को छत्रसाल के विरूद्घ उकसाने की सूचना पाकर उस जागीरदार को भी दंडित किया। यहां से बचकर भागा हमीद खां बरहटरा में जाकर लूटमार करने लगा तो वहां छत्रसाल के परमहितैषी कुंवरसेन धंधेरे ने हमीद खां को निर्णायक रूप से परास्त कर भागने के लिए विवश कर दिया।

मुगल साम्राज्य हो गया छिन्न-भिन्न

हम यहां पर स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि औरंगजेब भारतवर्ष में ऐसा अंतिम मुस्लिम बादशाह था-जिसके साम्राज्य की सीमाएं उसके जीवनकाल में भी तेजी से सिमटती चली गयीं। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका साम्राज्य बड़ी तेजी से छिन्न-भिन्न हो गया था, और फिर कभी उन सीमाओं तक किसी भी मुगल बादशाह को राज्य करने का अवसर नही मिला। मुगलों के साम्राज्य को इस प्रकार छिन्न-भिन्न करने में छत्रसाल जैसे महायोद्घाओं का अप्रतिम योगदान था। हमें चाहे सन 1857 तक चले मुगल वंश के शासकों के नाम गिनवाने के लिए कितना ही विवश किया जाए पर सत्य तो यही है कि औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के पश्चात ही भारत से मुगल साम्राज्य समाप्त हो गया था। उसकी मृत्यु के पश्चात भारतीय स्वातंत्रय समर की दिशा और दशा में परिवर्तन आ गया था। जिसका उल्लेख हम यथासमय और यथास्थान करेंगे।

यहां इतना स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि औरंगजेब अपने जीवन में बुंदेले वीरों के पराक्रमी स्वभाव से इतना भयभीत रहा कि वह कभी स्वयं बुंदेलखण्ड आने का साहस नही कर सका। वह दूर से ही दिल्ली की रक्षा करता रहा और उसकी योजना मात्र इतनी रही कि चाहे जो कुछ हो जाए और चाहे जितने बलिदान देने पड़ जाएं पर छत्रसाल को दिल्ली से दूर बुंदेलखण्ड में ही युद्घों में उलझाये रखा जाए और उससे ‘दिल्ली दूर’ रखी जाए। औरंगजेब जैसे बादशाह की इस योजना को जितना समझा जाएगा उतना ही हम छत्रसाल की वीरता को समझने में सफल होंगे। इतिहास के अध्ययन का यह नियम है कि अपने चरित नायक को समझने के लिए आप उसके शत्रु पक्ष की चाल को समझें और देखें कि आपके चरितनायक ने उन चालों को किस प्रकार निरर्थक सिद्घ किया या उनका सामना किया या शत्रु पक्ष को दुर्बल किया? निश्चय ही हम ऐसा समझकर छत्रसाल के प्रति कृतज्ञता से भर जाएंगे।

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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 479वी जयंती पर पढ़िए उनका संक्षिप्त जीवनकाल”

9 मई, 1540 ई. :- कुंभलगढ़ में जन्म
1552 ई. :- कुंभलगढ़ से चित्तौड़गढ़ प्रस्थान
1555 ई. :- 15 वर्ष की उम्र में जैताणा के युद्ध में करण सिंह को मारकर डूंगरपुर रावल आसकरण की फौज को पराजित किया
1556 ई. :- छप्पन के इलाके पर कब्जा किया
1557 ई. :- बिजोलिया की राजकुमारी अजबदे बाई सा से विवाह
1563 ई. :- राठौड़ राजपूतों को पराजित कर भोमठ पर कब्जा किया
1565 ई. :- गोडवाड़ पर आक्रमण व विजय
अक्टूबर, 1567 ई. :- कुंभलगढ़ पर हुसैन कुली खां के आक्रमण को विफल किया
1572 ई. :- मेवाड़ के महाराणा बने व सिरोही पर कब्जा किया | कुछ समय बाद सिरोही राव सुरताण से मित्रता कर ली |
1572 ई. :- महाराणा द्वारा मंदसौर के मुगल थानों पर हमले व विजय
1573 ई. :- गुजरात से आगरा जाती हुई मुगल फौज पर हमला किया व खजाना लूट लिया
1572 ई. से 1573 ई. के बीच अकबर द्वारा भेजे गए 4 सन्धि प्रस्तावों को खारिज किया :- 1) जलाल खां 2) मानसिंह 3) भगवानदास 4) टोडरमल
1574 ई. :- सिन्हा राठौड़ को पराजित कर सलूम्बर पर अधिकार
1576 ई. :- हल्दीघाटी का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जो कि अनिर्णित रहा
23 जून, 1576 ई. :- गोगुन्दा की लड़ाई। आमेर के मानसिंह द्वारा गोगुन्दा पर कब्ज़ा।
अगस्त, 1576 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा अजमेर, गोडवाड़, उदयपुर की मुगल छावनियों में लूटमार
सितम्बर, 1576 ई. :- महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा पर हमला किया व कईं मुगलों को मारकर गोगुन्दा पर कब्जा किया
अक्टूबर, 1576 ई. :- मुगल बादशाह अकबर का 60,000 जंगी सवारों समेत मेवाड़ पर हमला
अकबर एक वर्ष तक मेवाड़ में ही रहा व महाराणा प्रताप पर कईं हमले किए, पर हर बार नाकामयाबी मिली
महाराणा प्रताप ने कुतुबुद्दीन, भगवानदास, मानसिंह को पराजित करते हुए गोगुन्दा पर दोबारा अधिकार किया
महाराणा प्रताप के खौफ से हज यात्रियों के जुलूस की हिफाजत में अकबर द्वारा 2 फौजें भेजी गईं
महाराणा प्रताप ने दूदा हाडा को बूंदी जीतने में मदद की
1577 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा दिबल दुर्ग पर अधिकार
23 फरवरी, 1577 ई. :- ईडर के युद्ध में महाराणा प्रताप व ईडर के राय नारायणदास ने मुगलों का सामना किया
1577 ई. :- ईडर के दूसरे युद्ध में मुगलों की रसद व खजाना लूट लिया
मई-सितम्बर, 1577 ई. :- महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा, उदयपुर समेत कईं मुगल थानों पर कब्जा किया
अक्टूबर, 1577 ई. :- महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सबसे बड़े मुगल थाने मोही पर हमला किया | थानेदार मुजाहिद बेग कत्ल हुआ व मोही पर महाराणा का अधिकार हुआ |
अक्टूबर, 1577 ई. :- अकबर ने शाहबाज खां को फौज समेत मेवाड़ भेजा
नवम्बर, 1577 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा केलवाड़ा मुगल थाने पर लूटमार, 4 मुगल हाथी लूटे
1578 ई. :- कुम्भलगढ़ का युद्ध :- शाहबाज खां ने कुम्भलगढ़ पर अधिकार किया
महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ की पराजय के प्रतिशोध स्वरुप जालौर व सिरोंज के सभी मुगल थाने जलाकर खाक किये

1578 ई. :- महाराणा प्रताप की डूंगरपुर-बांसवाड़ा विजय
15 दिसम्बर, 1578 ई. :- शाहबाज खां का दूसरा असफल मेवाड़ अभियान
1578 ई. :- भामाशाह को फौज देकर मालवा पर हमला करने भेजना
15 नवम्बर, 1579 ई. :- शाहबाज खां का तीसरा असफल मेवाड़ अभियान
1580 ई. :- अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का असफल मेवाड़ अभियान, महाराणा ने रहीम की बेगमों को मुक्त कर क्षात्र धर्म का पालन किया
1580 ई. :- मालवा में भामाशाह के भाई ताराचंद के ज़ख़्मी होने पर महाराणा प्रताप द्वारा मालवा से ताराचंद को सुरक्षित चावण्ड लाना व रास्ते में आने वाली मुगल चौकियों को तहस-नहस करना, साथ ही मंदसौर के सबसे बड़े मुगल थाने पर हमला व विजय
अक्टूबर, 1582 ई. :- दिवेर का युद्ध :- महाराणा प्रताप द्वारा अकबर के काका सुल्तान खां की पराजय
1583 ई. :- हमीरपाल झील पर तैनात मुगल छावनी हटाई
1583 ई. :- कुम्भलगढ़ का दूसरा युद्ध :- महाराणा प्रताप ने दुर्ग पर अधिकार किया | मुगल सेनापति अब्दुल्ला खां कत्ल हुआ |
1583 ई. :- महाराणा प्रताप ने मांडल के थाने पर हमला किया | इस थाने के मुख्तार राव खंगार कछवाहा व नाथा कछवाहा कत्ल हुए | ये दोनों मानसिंह के काका थे | दोनों ही क्रमश: खंगार राजपूतों व नाथावत राजपूतों के मूलपुरुष थे |
1583 ई. :- बांसवाड़ा में मानसिंह चौहान से युद्ध
1584 ई. :- उदयपुर के राजमहलों में तैनात मुगलों पर महाराणा प्रताप का हमला व विजय | अकबर द्वारा 1576 ई. में उदयपुर का नाम ‘मुहम्मदाबाद’ रखने पर महाराणा द्वारा फिर से नाम बदलकर उदयपुर रखना |
1584 ई. :- अकबर ने जगन्नाथ कछवाहा को फौज समेत मेवाड़ भेजा, पर ये अभियान भी महाराणा प्रताप को पराजित नहीं कर सका
1584 ई. :- अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का दोबारा असफल मेवाड़ अभियान
1585 ई. :- लूणा चावण्डिया को पराजित कर चावण्ड पर अधिकार व चावण्ड को राजधानी बनाना
1586 ई. :- नवाब अली खां को पराजित करना
1586 ई. :- अकबर द्वारा 1568 ई. में चित्तौड़गढ़ का नाम “अकबराबाद” रखने के कारण महाराणा प्रताप द्वारा चित्तौड़ के एक शाही थाने पर हमला व विजय, गढ़ नहीं जीतने के बावजूद महाराणा ने नाम बदलकर पुनः चित्तौड़गढ़ रखा
1585 – 87 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा मोही, मदारिया समेत कुल 36 मुगल थानों पर हमले व विजय
1588 ई. :- महाराणा प्रताप की जहांजपुर विजय
1589 ई. महाराणा प्रताप द्वारा सूरत के शाही थानों में लूटमार व हाथी पर सवार सूरत के मुगल सूबेदार को भाले से मारना
1591 ई. :- राजनगर के युद्ध में महाराणा की फौज द्वारा दलेल खां की पराजय
1591 ई. :- दिलावर खां से कनेचण का युद्ध
29 जनवरी, 1597 ई. :- वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप—–🙏
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अढ़ाईदिनका_झोंपड़ा
या
सरस्वतीकंठावरणमहाविद्यालय
अढ़ाई दिन का झोंपड़ा, इस स्थान पर संस्कृत विद्यालय ‘सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय’ एवं विष्णु मन्दिर का निर्माण विशालदेव चौहान ने करवाया था|इस बात का प्रमाण मस्जिद के मुख्यद्वार के बायीं और लगा संगमरमर का संस्कृत में खुदा हुआ शिलालेख है और इधर-उधर बिखरी सैकड़ों देवी-देवताओं की मूर्तियां मस्जिद के अंदर खम्बों पर खंडित मूर्तियां भी अलौकिक है।
मोहम्मद गौरी ने तराईन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को धोखे से हरा दिया उसके बाद पृथ्वीराज की राजधानी तारागढ़ अजमेर पर हमला किया। यहां स्थित संस्कृत विद्यालय में रद्दो बदल करके मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। । इसका निर्माण संस्कृत महाविद्यालय के स्थान पर हुआ। इसका प्रमाण अढाई दिन के झोपड़े के मुख्य द्वार के बायीं ओर लगा संगमरमर का एक शिलालेख है जिस पर संस्कृत में इस विद्यालय का उल्लेख है। ये अजीब बात है मोहम्मद गौरी और उसकी सेना संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ थी जिस कारण वो इसे पढ़ नही पाए जिससे ये पत्थर नष्ट होने से बच गया । ऐसा माना जाता है कि यहाँ चलने वाले ढाई दिन के उर्स के कारण इसका नाम पड़ा । ये भी अजीब संयोग है कि अढाई दिन का झोपड़ा से मशहूर इस इमारत के अंदर कही कोई झोपड़ा नही है फिर भी इस जगह को झोपड़ा कहा जाता है । यहाँ भारतीय शैली में अलंकृत स्तंभों का प्रयोग किया गया है, जिनके ऊपर छत का निर्माण किया गया है । मस्जिद के प्रत्येक कोने में चक्राकार एवं बासुरी के आकार की मीनारे निर्मित है । 90 के दशक में इस मस्जिद के आंगन में कई देवी – देवताओं की प्राचीन मूर्तियां यहां-वहां बिखरी हुई पड़ी थी जिसे बाद में एक सुरक्षित स्थान रखवा दिया गया ।

सच्चाई यही है कि यह किसी भी प्रकार से मस्जिद नजर नहीं आती इसकी वास्तु कला शिल्प कला और चारों तरफ हिंदू देवी देवताओं की लगी मूर्तियां इसका प्रांगण इसकी छत हर प्रकार से सनातन संस्कृति की है
हिंदू मुस्लिम वास्तुकला नाम की कोई चीज नहीं है हर राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति होती है और वहां की एक अपनी वास्तु कला और शिल्प कला होती है भारत में या भारत से बाहर जितने भी मंदिर और धरोहर बनी हुई है उनकी वास्तु कला और शिल्प कला जो है वह हमारी है और वह वास्तु कला और शिल्प कला हवा में नहीं बनाई जाती उसके हमारे पास प्रमाण है शास्त्र है शास्त्रों के आधार पर वह सारी शिल्प कला और वास्तुकला तैयार की जाती है
★इतिहास★
इस स्थान पर संस्कृत विद्यालय ‘सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय’ एवं विष्णु मन्दिर का निर्माण विशालदेव चौहान ने करवाया था|
अजमेर राजस्थान
आर्यवर्त
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જલિયાંવાલા બાગ


13 માર્ચ 1940 જયારે ઉધમસિંહે જલિયાવાંલા બાગ હત્યાકાંડનો લંડનમાં બદલો લીધો

ઉધમસિંહે બાગમાં બેસીને લીધેલી પ્રતિજ્ઞા પુરી કરી હતી.

લંડનમાં પંજાબના પૂર્વ ગર્વનર માઇકલ ઓડવાયરને ઉધમસિંહે ઠાર માર્યો હતો.

ભારતના મહાન ક્રાંતિકારીઓમાં ઉધમસિંહનું નામ ગૌરવથી લેવામાં આવે છે. ઉધમસિંહે ૧૩ માર્ચ ૧૯૪૦ના રોજ પંજાબના જલિયાંવાલા નરસંહારનો બદલો ભારત સુધી લંડન સુધીની લાંબી સફર ખેડીને ૨૧ વર્ષ પછી લીધો હતો. સામાન્ય રીતે એવી માન્યતા છે કે ઉધમસિંહે જનરલ ડાયરને મારીને જલિયાંવાલા બાગ હત્યાકાંડનો બદલો લીધો હતો પરંતુ ભારતના આ સપૂતે ડાયરને નહી પરંતુ માઇકલ ઓડવાયરને માર્યો હતો જે અમૃતસરમાં વૈશાખીના દિવસે થયેલા નરસંહાર સમયે પંજાબ પ્રાંતનો ગર્વનર હતો. આ ઓડવાયરના આદેશથી જ જનરલ ડાયરે જલિયાંવાલા બાગમાં શાંત વિરોધ પ્રદર્શન કરી રહેલા લોકો પર આડેધડ ગોળીઓ વરસાવી હતી.  ઉધમસિંહ આ દર્દનાક ઘટના માટે હંમેશા ઓડવાયરને જવાબદાર ગણતા હતા.

૨૬ ડિસેમ્બર ૧૮૯૯માં પંજાબના સંગરુર જિલ્લાના સુનામ ગામમાં જન્મેલા ઉધમસિંહેએ ૧૯૦૧માં માતા અને ૧૯૦૭માં તેમણે પિતાની છત્રછાયા ગૂમાવી હતી. ઉધમસિંહે મોટા ભાઇ સાથે અમૃતસરના એક આશ્રમ આશરો લીધો હતો.ઉધમસિંહનું બાળપણનું નામ શેરસિંહ જયારે તેમના ભાઇનું નામ મુકતાસિંહ હતું.  શેરસિંહને અનાથાશ્રમમાં જ ઉધમસિંહ અને તેમના ભાઇને સાધુસિંહ નામ મળ્યું હતું. ૧૯૧૭માં ઉધમસિંહના મોટા ભાઇનું પણ અવસાન થતા તેઓ દુનિયામાં એકલા પડી ગયા હતા. ૧૯૧૯માં તેમણે અનાથાશ્રમ છોડીને ક્રાંતિકારીઓ સાથે આઝાદીની લડતમાં કૂદી પડયા હતા. 

રોલેટ એકટ નામના કાળા કાયદાનો વિરોધ કરવા માટે ૧૩ એપ્રિલ ૧૯૧૯ના રોજ અમૃતસરના જલિયાવાલા બાગમાં એક સભા રાખવામાં આવી હતી. આ સભામાં ઉધમસિંહ લોકોને પાણી પિવડાવવાની સેવા કરતા હતા.  જલિયાવાલાબાગમાં ભારતીયોનો જુસ્સોે જોઇને ગુસ્સામાં આવેલા ગર્વનર જનરલ ઓડમાયરે ભારતીયોને સબક શિખવવા  બ્રિગેડિયર જનરલ રેજીનલ્ડ ડાયરને આદેશ આપ્યો હતો. આદેશની સાથે જ જનરલ ડાયરે ૯૦ સૈનિકો સાથે બાગને ઘેરો ખાલ્યો હતો. અંગ્રેજોએ મશીનગનથી ધડાધડ ગોળીઓ વરસાવીને સેંકડો નિદોર્ષની લાશો પાડી હતી. જીવ બચાવવા માટે કેટલાક લોકોએ પાર્કમાં રહેલા કૂવામાં પડતા ૧૨૦ લાશો તો કૂવામાંથી જ મળી હતી.  સરકારી આંકડા મુજબ મૃતકોની સંખ્યા ૩૭૯ બતાવવામાં આવી પરંતુ પંડિત મદનમોહન માલવિયનું માનવું હતું કે આ હત્યાકાંડમાં ૧૩૦૦થી વધુ લોકોના મોત થયા હતા.

 આ ઘટના સાક્ષી ઉધમસિંહના ગુસ્સાનો પારો આસમાને પહોંચ્યો હતો. તેમણે બાગમાં જ બદલો લેવાની પ્રતિજ્ઞાા લીધી હતી. ૧૯૩૪માં તેઓ પ્રથમવાર લંડન પહોંચ્યા અને એક કાર તથા રિવોલ્વર ખરીદી હતી. વિદેશમાં ભારતની સ્વતંત્રતા માટે લડતી ગદ્ર પાર્ટીના તે સભ્ય પણ હતા. ભારતનો આ સપૂત બદલા માટે મોકો મળે તેની સતત શોધમાં રહેતો હતો. ૧૩ માર્ચ ૧૯૪૦ના રોજ માઇકલ ઓડવાયર કાકસ્ટન હોલમાં યોજાયેલી એક સભામાં ભાગ લેવા આવ્યો હતો. ઉધમસિંહે એક મોટા પુસ્તકના પાનાને રિવોલ્વર આકારમાં કોતરીને તેમાં રિવોલ્વર છુપાવી દીધી હતી. એનકેન રીતે તેઓ સભાખંડમાં ઘૂસવામાં સફળ થયા હતા.

સભાના અંતમાં ઓડવાયર સામે રિવોલ્વર તાકીને બે ગોળીઓ ધરબી દીધી હતી. ઉધમસિંહેને એક મહિલાએ પકડી રાખ્યા છતાં તેમણે ભાગવાની કોિશિષ કરી નહી. ઉધમસિંહ પર ખટલો ચાલ્યો અને કોઇએ પૂછયું કે રિવોલ્વરમાં ગોળીઓ હતી તે મહિલાને ધરબીને ભાગી શકાય તેમ હતું છતાં કેમ એમ ના કર્યુ ?ત્યારે ઉધમસિંહે જવાબ આપ્યો કે ભારતીય સંસ્કૃતિમાં મહિલાઓ પર હુમલો કરવો તે પાપ ગણાય છે.  ૩૧ જુલાઇ ૧૯૪૦ના રોજ ઉધમસિંહને ફાંસીના માંચડે ચડાવવામાં આવ્યા હતા. ફાંસીએ ચડતા પહેલા તેમના મનમાં કોઇ જ રંજ કે અફસોસ ન હતો. ૩૧ જુલાઇ ૧૯૭૪ના રોજ બ્રિટને ઉધમસિંહના અવશેષો ભારતને સોંપ્યા હતા. જયારે જલિયાવાંલા બાગ હત્યાકાંડનો બદનામ જનરલ ડાયર અનેક બીમારીઓનો ભોગ બનીને રિબાઇને મોતને ભેટયો હતો.

ગુજરાત સમાચાર માંથી સાભાર

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ये साल 1680 था जब औरंगजेब को पता चला कि शिवाजी महाराज का देहांत हो गया है। तो वो दक्षिण जीतने की इच्छा लिए आगरा से उठकर औरंगाबाद पहुंच गया। औरंगजेब को एक दिन निजामशाही और दो दिन आदिलशाही को खत्म करने में लगे लेकिन सामना होना था 23 साल के नए छत्रपति संभाजी से। इस समय औरंगजेब दुनिया का सबसे ताकतवर राजा था। वो ना सिर्फ विश्व के सबसे बड़ा भू-भाग पर राज कर रहा था उसके पास विश्व की सबसे बड़ी पांच लाख की सेना थी।

अगले 9 सालों में संभाजी ने पुर्तगालियों के खिलाफ 15 और मुगलों के खिलाफ 69 छोटे-बड़े युद्ध जीते। मराठा साम्राज्य की जो सीमा उनके पिता छोड़ कर गए थे वो उससे कई गुना बढ़ाकर आगे ले गए। गुजरात से लेकर गोवा तक भगवा फहर रहा था। साल 1689 में सगे साले की गद्दारी के चलते छत्रपति अपनी पत्नी और बच्चे समेत बंधक बनाए गए। उन्हें जोकर के कपड़े पहनाकर परेड कराते हुए मुगल खेमे में लाया गया। औरंगजेब ने जिंदा रहने का दो रास्ते दिए पहला पूरा मराठा साम्राज्य मुगलों को सौंप दिया जाए या इस्लाम स्वीकार कर लिया जाए। बंधक बने संभाजी का जवाब था अगर औरंगजेब अपनी बेटी की निकाह भी मुझसे करा दे तो भी इस्लाम स्वीकार नहीं करूंगा।

इसके बाद शुरू हुआ टॉर्चर पहली दिन उनकी आंखें फोड़ी गई, इसके बाद उनकी जीभ काटी गई, फिर खाल उतारी गई अंत में उनकी टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिए गए। औरंगजेब इसके बाद करीब 20 साल मराठों का खत्म करने का सपना लिए औरंगाबाद पड़ा रहा वो तो हिन्दू पदपादशाही समाप्त नहीं कर पाया हां उसके मरने के 40 साल बाद पेशवाओं ने जरूर मुगल बादशाहों को पेंशन पर रखा और उनकी रक्षा की। मराठों एवं अंग्रेजों में 1684 में जो समझौता हुआ, उसमें छत्रपति संभाजी महाराज ने एक ऐसी शर्त रखी थी कि अंग्रेजों को मेरे राज्य में दास (ग़ुलाम) बनाने अथवा ईसाई धर्म में दीक्षित करने हेतु लोगों का क्रय करने की अनुज्ञा नहीं मिलेगी

देश धरम पर मिटने वाला शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी एक ही शंभू राजा था।।
तेजपुंज तेजस्वी आंखें निकल गयीं पर झुका नहीं।
दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति का दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।
दोनों पैर कटे शंभू के ध्येय मार्ग से हटा नहीं।
हाथ कटे तो क्या हुआ सत्कर्म कभी तो छूटा नहीं।।
जिह्वा कटी खून बहाया धरम का सौदा किया नहीं।
वर्ष तीन सौ बीत गये अब शंभू के बलिदान को।
कौन जीता कौन हारा पूछ लो संसार को।।
मातृभूमि के चरण कमल परजीवन पुष्प चढ़ाया था।
है राजा दुनिया में कोई जैसा शंभू राजा था।।’ –

आज पुण्यतिथि है हमारे 23 साल के छत्रपति का….

शत शत नमन…कोटि कोटि नमन..

संभाजी द्वारा औरंगजेब को लिखा पत्र

“बादशाह सलामत सिर्फ मुसलमानों के बादशाह नहीं हैं. हिंदुस्तान की जनता अलग-अलग धर्मों की है. उन सबके ही बादशाह हैं वो. वो जो सोच कर दक्कन आये थे, वो मकसद पूरा हो गया है. इसी से संतुष्ट होकर उन्हें दिल्ली लौट जाना चाहिए. एक बार हम और हमारे पिता उनके कब्ज़े से छूट कर दिखा चुके हैं. लेकिन अगर वो यूं ही ज़िद पर अड़े रहे, तो हमारे कब्ज़े से छूट कर दिल्ली नहीं जा पाएंगे. अगर उनकी यही इच्छा है तो उन्हें दक्कन में ही अपनी क़बर के लिए जगह ढूंढ लेनी चाहिए.”

संभाजी की हत्या के बाद औरंगजेब ने कहा था-

अगर मेरे चार बेटों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता, तो सारा हिंदुस्तान कब का मुग़ल सल्तनत में समा चुका होता.”

जय भवानी जय शिवराज
हर हर महादेव
✍️अविनाश त्रिपाठी

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इतिहास का ठुकराया हीरा- वीर छत्रपति शम्भा जी

(11 मार्च को बलिदान दिवस पर विशेष रूप से प्रचारित)

डॉ विवेक आर्य

वीर शिवाजी के पुत्र वीर शम्भा जी वीरता में अपने पिता से किसी भी प्रकार से कम नहीं थे। वीर शम्भा जी कायर होते तो वे औरंगजेब की दासता स्वीकार कर इस्लाम ग्रहण कर लेते। वह न केवल अपने प्राणों की रक्षा कर लेते अपितु अपने राज्य को भी बचा लेते। वीर शम्भा जी का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था। आप वीर शिवाजी के साथ अल्पायु में औरंगजेब की कैद में आगरे के किले में बंद भी रहे थे। आपने 11 मार्च 1689 को वीरगति प्राप्त की थी। इस लेख में वीर शम्भाजी जी के उस महान और प्रेरणादायक जीवन के हमें दर्शन होते है जिसका वर्णन इतिहासकार प्राय:नहीं करते।

औरंगजेब के जासूसों ने सुचना दी की शम्भा जी इस समय आपने पांच-दस सैनिकों के साथ वारद्वारी से रायगढ़ की ओर जा रहे है। बीजापुर और गोलकुंडा की विजय में औरंगजेब को शेख निजाम के नाम से एक सरदार भी मिला जिसे उसने मुकर्रब की उपाधि से नवाजा था। मुकर्रब अत्यंत क्रूर और मतान्ध था। शम्भा जी के विषय में सुचना मिलते ही उसकी बांछे खिल उठी। वह दौड़ पड़ा रायगढ़ की ओर। शम्भा जी आपने मित्र कवि कलश के साथ इस समय संगमेश्वर पहुँच चुके थे। वह एक बाड़ी में बैठे थे की उन्होंने देखा कवि कलश भागे चले आ रहे है और उनके हाथ से रक्त बह रहा है। कलश ने शम्भा जी से कुछ भी नहीं बोला। बल्कि उनका हाथ पकड़कर उन्हें खींचते हुए बाड़ी के तलघर में ले गए। परन्तु उन्हें तलघर में घुसते हुए मुकर्रब खान के पुत्र ने देख लिया था। शीघ्र ही मराठा रणबांकुरों को बंदी बना लिया गया। शम्भा जी व कवि कलश को लोहे की जंजीरों में जकड़ कर मुकर्रब खान के सामने लाया गया। वह उन्हें देखकर खुशी से नाच उठा। दोनों वीरों को बोरों के समान हाथी पर लादकर मुस्लिम सेना बादशाह औरंगजेब की छावनी की और चल पड़ी।

औरंगजेब को जब यह समाचार मिला, तो वह ख़ुशी से झूम उठा। उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया। वहां शम्भा जी और कवि कलश को रंग बिरंगे कपडे और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गयी। फिर उन्हें ऊंट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया। औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्द शब्दों में उनका स्वागत किया। शम्भा जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी, परन्तु वह शांत रहे। उन्हें बंदी ग्रह भेज दिया गया। औरंगजेब ने शम्भा जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम काबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा।

नर केसरी लोहे के सींखचों में बंद था। कल तक जो मराठों का सम्राट था। आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये। फटे हुए चिथड़ों में लिप्त हुआ उनका शरीर मिटटी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था। उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी टकटकी बंधे हुए देख रहे थे। पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ। निश्चित रहिये। मैं मर जाऊँगा लेकिन…..

लेकिन क्या शम्भा जी …रूह्ल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहां।

तुम मरने से बच सकते हो शम्भा जी। परन्तु एक शर्त पर।

शम्भा जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता। शिवाजी का पुत्र मरने से कब डरता है।

लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी शम्भा जी- रुहल्ला खान ने कहा।

कोई चिंता नहीं , उस जैसी मौत भी हम हिन्दुओं को नहीं डरा सकती। संभव है कि तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो। शम्भा जी ने उत्तर दिया।

लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त है बड़ी मामूली। तुझे बस इस्लाम कबूल करना है। तेरी जान बक्श दी जाएगी। शम्भा जी बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ। रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया।

उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से शम्भा जी की दोनों आँखे फोड़ दी गई। उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया।

आखिर 11 मार्च को वीर शम्भा जी के बलिदान का दिन आ गया। सबसे पहले शम्भा जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरा पैर। शम्भा जी कर पाद-विहीन धड़ दिन भर खून की तलैया में तैरता रहा। फिर सांयकाल में उनका सर काट दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया। फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया।

मरहठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर आपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दांह संस्कार कर दिया गया। आज भी उस स्थान पर शम्भा जी की समाधी है। जो पुकार पुकार कर वीर शम्भा जी की याद दिलाती है कि हम सर कटा सकते है पर अपना प्यारे वैदिक धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।

मित्रों शिवाजी के तेजस्वी पुत्र शंभाजी के अमर बलिदान यह गाथा हिन्दू माताएं अपनी लोरियों में बच्चो को सुनाये तो हर घर से महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे महान वीर जन्मेंगे। इतिहास के इन महान वीरों के बलिदान के कारण ही आज हम गर्व से अपने आपको श्री राम और श्री कृष्ण की संतान कहने का गर्व करते है। आईये आज हम प्रण ले हम उसी वीरों के पथ के अनुगामी बनेगे।

बोलों वीर छत्रपति शिवाजी की जय।
बोलों वीर छत्रपति शम्भा जी की जय।।

SambhajiMaharajmartyrdomday

JaiBhawani

Jay Sambhaji Maharaj
Jai Shivaji

sambhajimaharaj

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,#मलमल के कुर्ते पे छीट लाल*

ये गाना सुने तो ध्यान आया कि, मलमल जैसे शानदार कपड़े पर छीट वो भी लाल रंग की कैसे पड़ी ।

खोज शुरू त्रिभुवन सिंह सर की संगति का असर और इशारा हम धुस गये नंग्रेजों की गांव मे। अब पता लगा ये छीट खून के है। जो ईस्ट इंडिया कंपनी के नंग्रेजों ने मलमल के बुनकरों के अंगूठे काटे उसकी छीटें है।

मछलीपट्टनम (तेलुगु : మచిలీపట్నం / मचिलीपट्नं) आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा जिले का एक नगर है। यह कृष्णा जिले का मुख्यालय एवं नगरपालिका है। यह मचहलीपट्टनम मण्डल का मण्डल मुख्यालय भी है। यह नगर १४वीं शताब्दी में स्थापित हुआ था तथा १७वीं शताब्दी में ब्रिटिश, डच एवं फ्रांसीसी ब्यापारियों के लिये प्रमुख ब्यापारिक पत्तन था।
मसलिन या मलमल सरल बुनाई वाला सूती वस्त्र है। ‘मसलिन’ शब्द इसी ‘मसलीपट्नम’ नामक तत्कालीन उड़ीसा के भारतीय पत्तन से आया है।

कहते हैं कि ढाका का मलमल इतनी महीन होती थी मसलिन की साड़ी अंगूठी से निकल जाय किन्तु नंग्रेजों की दमनकारी व्यापारिक नीति के कारण यह अंगूठी से निकलने वाली साड़ी बनाने वाले अपना अंगूठा कटा बैठे और यह उद्योग नष्ट हो गया।
भारतीय मसलिन हाथ से निर्मित अत्यन्त कोमल सूत से हाथ से बुनी जाती थी। भारत का वह भाग जो आजकल बंगलादेश है, इसका मुख्य केन्द्र था। १७वीं और १८वीं शताब्दी में भारत से ही मसलिन पूरे यूरोप में निर्यात की जाती थी।इसी मछली पट्टनम మచిలీపట్నం मसुलीपत्तनम्
मसूल के नाम पर यूरोपियन मसलिन कहने लगे। रोमन साम्राज्य काल मे यह वस्त्र शासक वर्ग की पसंद था।

During the Roman period, muslin was the foremost export of Masulipatam, in present Andhra Pradesh, India. Bengali khadi muslin was so prized by well-dressed ladies of Rome that according to Roman legend, “an ounce of muslin used to sell in Rome for an ounce of gold”.

पर जैसे रोमन साम्राज्य को समुद्री डकैतों की नजर लगी वैसे ही हमारे मलमल पर भी इन डकैतों का कहर बरपा।

Under British rule, the British East India company could not compete with local muslin with their own export of cloth to the Indian subcontinent. The colonial government favored imports of British textiles. Colonial authorities attempted to suppress the local weaving culture. Muslin production greatly declined and the knowledge of weaving was nearly eradicated.

It is alleged that in some instances the weavers were rounded up and their thumbs chopped off,

जी हां बुनकरों के अंगूठे काट दिये गये। ये कटे अंगूठे
बीपी मण्डल को नहीं दिखे।एकलव्य का फर्जी अंगूठा उन्हे दिखा और पंडी जी का अत्याचार बां बां कर बताये लेकिन अपने बाप की करतूत को देखा तक नहीं।

a report from 1772. The Bengali muslin industry was suppressed by various colonial policies. As a result, the quality of muslin suffered and the finesse of the cloth was lost.

अब ये खबर कहां से लाये हम। ये पंडित जी की बटलोई मे नहीं पकाएं है। लीजिए मौलिक रिफ्ररेंसः

(1)william bolts(1772)
considerations on Indian affair,j almon page.194

(2)Michael Edwards (1976)
Growth of british cotton trade(1780-1815)
Augustus M kelley pubs p.37
isbn 0-678-06775-9

(3)J.P.Marshall(1988) India abd Indonesia during the ancient Regime
E.J.Brull p.90
isbn 978-90-04-0865-3

(4)T. John Samuel
many avtars:challangea, achievements and future (S1)
friesn press
isbn1-4602-2893-6

इन अध्ययेताओ का निष्कर्ष निकलता है कि

From 1782 to 1787 the industrial revolution began in Britain, and fine cotton was produced locally. During British colonial rule, the muslin industry declined due to various colonial policies, which supported imports of industrially manufactured textiles from Britain. A heavy duty of 75 percent was imposed on export of cotton from Bengal. These measures ultimately lead to the decline of muslin trade in Bengal.

In 1811, Bengal was still a major exporter of cotton cloth to the Americas and the Indian Ocean. However, Bengali exports declined over the course of the early 19th century, as British imports to Bengal increased, from 25% in 1811 to 93% in 1840.

अब इन डकैतों ने अंगूठे काट लिए। इम्पोर्ट बढ़ा दिया, एक्सपोर्ट पर 75%ड्यूटी लगा दी परिणाम मलमल उद्योग की बर्बाद और भारी जनशक्ति की बेकारी,। उद्योग के अभाव मे गरीबी की नंगा नाच शुरू। फिर दुनिया के सबसे कमीनी संस्कृति के अत्याचार ने बंगाल को1770 में अकाल के मुंह मे झोंक दिया। लाखों श्रम शक्ति बेरोजगारी, गरीबी के चलते अकाल और बीमारियों की मौत मर गई।यूरोप का पेट भरने के लूट मार कर एकत्र अनाज बन्दरगाहों पर सड़ता रहा। हमारे लोग मरते रहे।
इसका सीधा फायद मानचेस्टर के काटन मिलों का हुआ। मरने से बचे मलमल के बंगाली बुनकर मजदूर बन कर रह गये। इन्हीं नंग्रेजों ने बहुतों को गिरमिटिया मजदूर बना कर वेस्टइंडीज अफ्रीकाऔर दक्षिण अमेरिकी द्वीपीय देशों में भेज दिया। मानव तस्करी और व्यापार के अभ्यास्त इन हरामियों ने हमारे पूर्वजों को हमारी भूमि से दूर फेंक दिया। जो बचे वो लार्ड कार्नवालिस की जमीदारी व्यवस्थामे पिस गये. कुछ ईसाई बन गये कुछ गरीबी के चलते अंग्रेजों की गन्दगी साफ करते करते अछूत वन गये।
बेशर्म लाइसेंसी जमीदारों, नवाबों ने भी नंग्रेजों की दलाली की
:-
When Edward VII, the Prince of Wales in 1875, came to Bengal, Sir Abdul Gani – the first Nawab of Dhaka – ordered 30 yards of the most superior muslin as a gift for the Prince. It is said that one yard of that fabric weighted only 10 grams!

फिर आये पेरियार, फूले और बाबा साहब ।जिन्होंने इस शोषण को धर्म मे खोजा और दुकान सजा कर बैठ गये। यह धंधा तो खूब फला फूला लेकिन मलमल के वे शानदार बुनकर कभी नहीं फल फूल पाये। बस नंग्रेजों के राजनैतिक जमीदारों के शो रुम मे बिकने को बैठे हैं।
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