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जब कभी जीवन मे किसी बड़ी असफलता का सामना करना पड़े


जब कभी जीवन मे किसी बड़ी असफलता का सामना करना पड़े , सबकुछ बिल्कुल विपरीत हो , निराशा आपको आकर घेर ले तो इस व्यक्ति का चरित्र पढो आपमे आत्मविश्वास जागेगा !
1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध मे मराठो को दुरानी ,रोहिलों और बंगाल की संयुक्त सेना द्वारा बड़ी हार का सामना करना पड़ा ,मराठो की लगभग एक पीढ़ी इस युद्ध मे वीरगती को प्राप्त हो गयी !
उस वक्त शायद ही किसीने सोचा हो कि मराठा इस शब्द का जिक्र भी कोई उत्तर भारत में करेंगा !

पर बिल्कुल इसके विपरीत , इस युद्ध मे गंभीर जख्मी होकर बच निकले प्रस्तुत योद्धा ने दस वर्ष बाद उत्तर भारत मे किसी भूखे शेर की तरह धड़क दी !
पानीपत में अहमदशाह अब्दाली को न्यौता देने वाले नजीबखान रोहले के रोहिलखंड को पूरी तरह तहस नहस कर डाला, उसकी राजधानी नजीबाबाद लूट ली , नजीबखान तो पहले ही मर गया था सो उसकी कब्र खोद डाली, उसके बेटे झबिता खान को मुल्क छोड़कर भागना पड़ा !
आगे बढ़कर इस महान योद्धा ने लाहौर लूट लिया , वहाँकी लूट से सोमनाथ मंदिर के द्वार ले आये जो आज भी उज्जैन के गोपाल मंदिर की शोभा बढाते है !

इतना सब होने के बाद भी वो चुप नही बैठा ।
उभरते हुए विदेशी अंग्रेजो को भी मध्य भारत मे परास्त कर जीत हासिल की !
उत्तर और मध्य भारत मे अपना केसरिया लहराने के बाद उसने दक्षिण में एक के बाद एक निजाम और हैदर अली दोनों को मात देते हुए अपना एकछत्र राज कायम किया !!
विदेशी इतिहासकार उसे उस समय का दक्षिण एशिया का सबसे शक्तिशाली राजा मानते है ।
इसप्रकार अपनी हार होनेपर भी टूटने की बजाय इस व्यक्ति ने नया दम भर कर चारो दिशाओं में जोरदार जीत हासिल की 👍
अफगान,रोहिले,मुगल,निजाम,टिपू सुल्तान,अंग्रेज कोई भी उस योद्धा के आत्मबल के आगे नही टिक पाया !
इसमें कोई शक नही की यदी वो 10 साल और जी लेता तो इतिहास कुछ और होता , पर 1794 इस महान रनसूर्य का अस्त हुआ और लगभग 25 साल बाद भारत अंग्रेजो का गुलाम हो गया !!
आप सभी जानते है इस महान योद्धा का नाम था –
महादजी सिंधिया

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गाँधीजी द्वारा किया गया परिवर्तन और असली भजन


गाँधीजी द्वारा किया गया परिवर्तन और असली भजन

गाँधीजी का भजन

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम
सीताराम सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान…

असली राम धुन भजन…

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालीग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम

‘श्रीराम को सुमिरन’ करने के इस भजन को जिन्होंने बनाया था उनका नाम था लक्ष्मणाचार्य

“श्री नमः रामनायनम”
नामक हिन्दू-ग्रन्थ से लिया गया है।

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हम सब जानते हैं कि जब 1972 में इजराइल के  ओलिंपिक खिलाड़ियों को आतंकवादियों ने मार दिया था


हम सब जानते हैं कि जब 1972 में इजराइल के  ओलिंपिक खिलाड़ियों को आतंकवादियों ने मार दिया था तब इस्राएल ने भी सबको खोज खोज कर मारा… लेकिन इसमें कई आश्चर्यजनक जानकारी भी है.. जैसे कि जिन आतंकियों ने इसरायली खिलाड़ियों के ऊपर हमला किया था.. उन सबको तो एयरपोर्ट पर ही मार दिया गया था… फिर खोज खोज कर किसको मारा गया था ? ?

 

कहानी तो वहीं एयरपोर्ट पर खत्म हो जानी चाहिए थी…  जब मुस्लिम आतंकियों को भागते समय इस्राएली कमांडो ने एयरपोर्ट पर घेर लिया.. उसी वक़्त खुद को घिरा देख एयरपोर्ट पर ही बंधक खिलाड़ियों को आतंकियों ने भून डाला.. इसके बाद इसरायली कमाण्डो ने 8 आआतंकवादियों को वहीं मार डाला..खेल खत्म हो चुका था… लेकिन नहीं इजराइल ने तो इसका बदला सैकड़ों को मार कर लिया..

 

उसने अपनी खुफिया एजेंसी मोसाद की मदद से उन सभी लोगों के कत्ल की योजना बनाई, जिनका वास्ता ऑपरेशन ब्लैक सेंप्टेंबर से था। इस मिशन को नाम दिया गया  ‘रैथ ऑफ गॉड’ यानी ईश्वर का कहर।

 

दो दिन के बाद इजरायली सेना ने सीरिया और लेबनान में मौजूद फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के 10 ठिकानों पर बमबारी की और करीब 200 आतंकियों को तो मारा ही सैकड़ों आम नागरिकों को भी मौत के घाट उतार दिया।

 

मिशन शुरू होने के कुछ ही महीनों के अंदर मोसाद एजेंट्स ने वेल ज्वेटर और महमूद हमशारी का कत्ल कर सनसनी मचा दी।

 

हुसैन अल बशीर नाम का ये शख्स होटल में रहता था, और होटल में वो सिर्फ रात को आता था और दिन शुरू होते ही निकल जाता था। मोसाद की टीम ने उसे खत्म करने के लिए उसके बिस्तर में बम लगाने का प्लान बनाया।

 

बम लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था, ये काम तो आसानी से हो गया। मुश्किल ये था कि कैसे ये पता किया जाए कि हुसैन अल बशीर बिस्तर पर है  तभी धमाका किया जा सकता है। इसके लिए एक मोसाद एजेंट ने बशीर के ठीक बगल वाला कमरा किराए पर ले लिया। वहां की बालकनी से बशीर के कमरे में देखा जा सकता था। रात को जैसे ही बशीर बिस्तर पर सोने के लिए गया। एक धमाके के साथ उसका पूरा कमरा उड़ गया।

 

इसके बाद फलस्तीनी आतंकियों को हथियार मुहैया कराने के शक में बेरूत के प्रोफेसर बासिल अल कुबैसी को गोली मार दी गई। मोसाद के दो एजेंट्स ने उसे 12 गोलियां मारीं।

 

9 अप्रैल 1973 को इजराय़ल के कुछ कमांडो लेबनान के समुद्री किनारे पर स्पीडबोट के जरिए पहुंचे। इन कमांडोज को मोसाद एजेंट्स ने कार से टार्गेट के करीब पहुंचाया। कमांडो आम लोगों की पोशाक में थे, और कुछ ने महिलाओं के कपड़े पहन रखे थे। पूरी तैयारी के साथ इजरायली कमांडोज की टीम ने इमारत पर हमला किया। इस ऑपरेशन के दौरान लेबनान के दो पुलिस अफसर, एक इटैलियन नागरिक भी मारा गया।।इनमें साइप्रस में जाइद मुचासी को एथेंस के एक होटल रूम में बम से उड़ा दिया गया।

 

इतने लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद मोसाद कुछ समय के लिए रुका क्योंकि कमांडोज में दो तीन घायल भी थे और थक गए थे.. नए कमांडोज शामिल हुए.. क्योंकि अभी मुस्लिम आतंकियों की लिस्ट में नाम बाकी थे..

 

28 जून 1973 को ब्लैक सेप्टेंबर से जुड़े मोहम्मद बउदिया को उसकी कार की सीट में बम लगाकर उड़ा दिया।

15 दिसंबर 1979 को दो फलस्तीनी अली सलेम अहमद और इब्राहिम अब्दुल अजीज की साइप्रस में हत्या हो गई।

-17 जून 1982 को पीएलओ के दो वरिष्ठ सदस्यों को इटली में अलग-अलग हमलों में मार दिया गया।

23 जुलाई 1982 को पेरिस में पीएलओ के दफ्तर में उप निदेशक फदल दानी को कार बम से उड़ा दिया गया।

-21 अगस्त 1983 को पीएलओ का सदस्य ममून मेराइश एथेंस में मार दिया गया।

-10 जून 1986 को ग्रीस की राजधानी एथेंस में पीएलओ के डीएफएलपी गुट का महासचिव खालिद अहमद नजल मारा गया।

-21 अक्टूबर 1986 को पीएलओ के सदस्य मुंजर अबु गजाला को काम बम से उड़ा दिया गया।

-14 फरवरी 1988 को साइप्रस के लीमासोल में कार में धमाका कर फलस्तीन के दो नागरिकों को मार दिया गया।

 

मोसाद के एजेंट्स दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर करीब 20 साल तक हत्याओं को अंजाम देते रहे।

अगली नंबर था अली हसन सालामेह का, वो शख्स जो म्यूनिख कत्ल-ए-आम का मास्टरमाइंड था लेकिन अबतक इसने अपनी सुरक्षा काफी बढ़ा ली थी…

 

मोसाद ने सलामेह को लेबनान की राजधानी बेरूत में ढूंढ़ निकाला। 22 जनवरी 1979 को एक कार बम धमाका कर सलामेह को भी मौत के घाट उतार दिया गया।

 

इन कमांडोज में एक बेंजामिन नेतन्याहू भी था।

 

बदले की ये भावना कि आप 20 साल तक अपना इंतकाम पूरा करते रहें.. ये सिर्फ इजराइल में हो सकता था.. भारत के सेक्युलर और डरपोक नेताओं से तो ऐसी कोई कल्पना ही नहीं कि जा सकती।।

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बाबर और राणा सांगा में भयानक युद्ध चल रहा था ।


बाबर और राणा सांगा में भयानक युद्ध चल रहा था ।
बाबर ने युद्ध में पहली बार तोपों का इस्तेमाल किया था । उन दिनों युद्ध केवल दिन में लड़ा जाता था, शाम के समय दोनों तरफ के सैनिक अपने अपने शिविरों
में आराम करते थे । फिर सुबह युद्ध होता था !
लड़ते लड़ते शाम हो चली थी , दोनों तरफ के सैनिक अपने शिविरों में भोजन तैयार कर रहे थे ।
बाबर टहलते हुए अपने शिविर के बाहर खड़ा दुश्मन सेना के कैम्प को देख रहा था तभी उसे राणा सांगा की सेना के शिविरों से कई जगह से धुँआ उठता दिखाई दिया।
बाबर को लगा कि दुश्मन के शिविर में आग लग गई है, उसने तुरंत अपने सेनापति मीर बांकी को बुलाया और पूछा कि देखो दुश्मन के शिविर में आग लग गई है क्या ? शिविर में पचासों जगहों से धुँआ निकल रहा हैं ।
सेनापति ने अपने गुप्तचरों को आदेश दिया -जाओ पता लगाओं कि दुश्मन के सैन्य शिविर से इतनी बड़ी संख्या में इतनी जगहों से धुँओ का गुब्बार क्यों निकल रहा है ?
गुप्तचर कुछ देर बाद लौटे उन्होंने बताया हुजूर दुश्मन सैनिक सब हिन्दू हैं वो एक साथ एक जगह बैठकर खाना नहीं खाते ।सेना में कई जात के सैनिक है जो
एक दूसरे का छुआ नहीं खाते इसलिए सब अपना अपना भोजन अलग अलग बनाते हैं अलग अलग खाते हैं ।एक दूसरे
का छुआ पानी तक नहीं पीते।
यह सुनकर बाबर खूब जोर से हँसा काफी देर हँसने के बाद उसने अपने सेनापति से कहा .मीर बांकी फ़तेह हमारी ही होगी !
ये क्या हमसे लड़ेंगे, जो सेना एक साथ
मिल बैठकर खाना तक नहीं खा सकती, वो एक साथ मिलकर दुश्मन के खिलाफ कैसे लड़ेगी ?
बाबर सही था।
तीन दिनों में राणा सांगा की सेना मार दी गई और बाबर ने मुग़ल शासन की नीव रखी।
भारत की गुलामी का कारण जातिवाद छुआछूत भेदभाव था जो आज भी जारी है जागो रे ….जागो जरा

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आज मैं एक ऐसे महावीर के बारे में बताने जा रहा हूँ जिन्होंने गजनी (अफगानिस्तान) में विगत 800 वर्षों से पददलित हो रहे


आज मैं एक ऐसे महावीर के बारे में बताने जा रहा हूँ जिन्होंने गजनी (अफगानिस्तान) में विगत 800 वर्षों से पददलित हो रहे भारत के महान हिन्दू-सम्राट् पृथ्वीराज चौहान की अस्थियों को भारत वापिस लाने के दुस्साहसिक कारनामे को अंजाम दिया. यह महावीर हैं : श्री शेर सिंह राणा, जिन्हें कुख्यात दस्यु-सुंदरी फूलन देवी (1963-2001) की 25 जुलाई, 2001 को हत्या के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद किया गयाI श्री शेरसिंह राणा अगस्त, 2014 से उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। भारत के अंतिम (अंतिम महान) हिन्दू-सम्राट् चौहानवंशीय पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1149 में अजमेर में हुआ थाI उन्होंने 1179 से 1192 तक दिल्ली पर शासन किया थाI सन 1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध में वह अफ़ग़ान सेनापति मुहम्मद गोरी (1173-1192) के हाथों पराजित हुए और जंजीरों में जकड़कर गजनी (दक्षिणी-पूर्वी अफगानिस्तान) ले जाए गएI वहां क्रूरतापूर्वक उनकी आँखें निकल ली गईं और जेल में बंद कर दिया गयाI कुछ समय बाद पृथ्वीराज चौहान के मित्र और दरबारी कवि श्री चंदबरदाई ने अफगानिस्तान जाकर गोरी से भेंट की और उसे पृथ्वीराज चौहान की “शब्दभेदी बाण” चलाने की विशेषता के बारे में बताया. फलस्वरूप गोरी ने पृथ्वीराज की कला का तमाशा देखने का निश्चय कियाI 1192 में हुए इसी तमाशे में चंदबरदाई का संकेत पाकर पृथ्वीराज चौहान ने गोरी की आवाज सुनकर शब्दभेदी बाण से उसे मार डाला. गोरी के वध के तुरंत बाद पृथ्वीराज ने चंदबरदाई के साथ आत्मबलिदान करके मृत्यु का वरण कर लिया. गोरी को गजनी में दफनाने के बाद पृथ्वीराज चौहान और कवि चन्दबरदाई को गोरी के मकबरे से बाहर कुछ मीटर की दूरी पर दफ़न किया गया थाI पृथ्वीराज चौहान के मृत शरीर पर एक कच्ची कब्र बना दी गयी और कब्र पर फारसी में एक शिलालेख उत्कीर्ण किया गया : “यहां दिल्ली का काफ़िर राजा दफन है”. कब्र के समीप एक जोड़ी जूती रख दी गई ताकि गोरी की मजार देखने आए अफगानी पहले पृथ्वीराज चौहान की कब्र को जूती से मारकर अपमानित करें. आतंकियों द्वारा 1999 में इण्डियन एयरलाइंस का हवाईजहाज-814 अपहृतकर कंधार ले जाया गया। उसे वापिस लाने के लिए तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह वहाँ गये और लौटकर उन्होंने देशवासियों को बताया कि अफगानिस्तान में आज भी पृथ्वीराज चौहान और चंदवरदायी की समाधि है जिस पर वहाँ के मुसलमान जूते-चप्पल मारकर न सिर्फ उस वीर शिरोमणि का अपमान करते हैं बल्कि समूचे भारत व भारत के गौरवशाली इतिहास को बेइज्जत करते हैंI सुलतान गोरी की कब्र के बाहर पृथ्वीराज चौहान तथा चंदवरदायी की समाधि पर जूता रखा रहता हैI वहाँ के लोग पृथ्वीराज चौहान तथा चंदवरदायी की कब्र पर दो-दो जूते मारकर ही अंदर सुलतान गौरी की कब्र पर जियारत के लिए जाते हैंI इस सनसनीखेज समाचार से देश में हडकंप मच गया। उस समाधि (कब्र) को सम्मानपूर्वक भारत लाकर उनका विधिवत अंतिम संस्कार करने के लिए आंदोलन होने लगे। उस समय ‘विश्व क्षत्रिय महासभा’ द्वारा भी दिल्ली में संसद भवन के सामने जंतर-मंतर पर धरने तथा सरकार को ज्ञापन भी दिए गए और संसद भवन में कुछ सांसदों द्वारा प्रश्न भी पुछ्वाये गए। उस समय कुछ इतिहासकारों ने बयान दिया कि पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु भारत में ही हुई है, रणभूमि में या दिल्ली अथवा अजमेर की जेल में; गजनी में नहींI परन्तु यह रहस्य पहले भी एक भारतीय विद्वान श्री एस.सी. शर्मा ने 25 अप्रैल, 1998 को ‘दि इण्डियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अपने लेख ‘Ghazni’s best-kept secret’ में यह उद्घाटित किया था कि एक बार अफगानिस्तान में कार से कन्दहार से काबुल जाते समय रास्ते में उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की समाधि को देखा थाI एक अन्य लेखक श्री यज्ञनारायण चतुर्वेदी ने वाराणसी के अघोर पंथ के एक महात्मा औघड़ भगवान राम की जीवनी (“औघड़ भगवान राम”, प्रकाशक : श्री सरस्वती समूह, वाराणसी, 1973) में लिखा था कि गोरी के कब्र के बाहर सम्राट् पृथ्वीराज की समाधि पर वहाँ के लोग जूते मारते हैंI परन्तु इस वारदात के पक्ष-विपक्ष में लेखों का प्रकाशन काफी समय तक चलता रहा और देश भ्रमित हो गया। अत: इस विषय में निर्णय के लिए ‘विश्व क्षत्रिय महासभा’ द्वारा वाराणसी में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहास विभाग में संगोष्ठी करने के साथ ही अफगानिस्तान भी जाने के प्रयास किये गए। उस समय विश्व हिंदू परिषद के आचार्य गिरिराज किशोर, सांसद अमर सिंह तथा पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर आदि का दल भी इसके लिए अफगानिस्तान जाने के प्रयास में था। किन्तु तत्कालीन तालिबान सरकार के अनुमति न दिए जाने से बात नहीं बनी। यह खबर श्री शेरसिंह राणा ने पढ़ी जो फूलन देवी की हत्या के आरोप में तिहाड़ जेल में बन्द थे। खबर पढ़ते ही शेरसिंह राणा के दिल में राष्ट्र-सम्मान वापस लाने की बेचैनी बढ़ गयी। कई दिन तक वह इसी उधेड़बुन में रहे कि किस तरह पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ वापस हिंदुस्तान लाई जा सकती हैं और जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने जेल से भागने का फैसला किया। सन् 2003 के अंतिम माह में श्री शेरसिंह राणा ने जेल से बाहर आने का खाका बनाना शुरू कर दिया और उसके बाद अपने भाई श्री विक्रम सिंह राणा को पूरी योजना समझाई। विक्रम ने पूरी दिल से अपने भाई की भावनाए समझीं और हर स्तर पर साथ देने का भरोसा दिया। योजनानुसार पुलिस वैन-जैसी एक बड़ी गाडी, एक हथकड़ी, कुछ पुलिस की वर्दी और भरोसेवाले कुछ लड़कों की जरूरत थी। विक्रम ने सबसे पहले इस योजना में रूडकी के श्री संदीप ठाकुर को जोड़ा। संदीप ठाकुर तिहाड़ में शेरसिंह राणा से मिला और पूरी योजना को समझा। शेरसिंह राणा से मिलने के लिए संदीप ठाकुर नकली वकील बने और उसी लिबास में अक्सर तिहाड़ जाता थे ताकि जेल का सिस्टम समझ सकें और आने-जाने का भय भी दूर हो सके। शेरसिंह संदीप को जेल की हर गतिविधि से अवगत करता ताकि संदीप अपनी योजना को फुलप्रूफ निभा सके। इस दोरान विक्रम ने तीन लड़के और योजना में जोड़ लिए और उनको उनका काम समझा दिया। 17 फरवरी, 2004 को शेरसिंह राणा जेल-नंबर 1 में ‘हाईरिस्क’ वार्ड में थे। सुबह 6 बजे हवालदार ने बताया कि आज तुम्हारी कोर्ट की तारीख है, साढ़े छः बजे तुमको जेल की ड्योढ़ी में आना है। योजनानुसार शेरसिंह राणा पहले से ही तैयार थे। उस दौरान शेरसिंह राणा ने अपने एक साथी शेखर सिंह, जो फूलन की हत्या के आरोप जेल मैं था, से कहा कि भाई आज यदि सायरन बजे तो समझ लेना कि शेरसिंह राणा तिहाड़ जेल से भाग गया, आगे हनुमान जी मेरी रक्षा करेंगेI ठीक 6:30 बजे शेरसिंह राणा जेल की ड्योडी में हवालदार के साथ पहुँचेI तभी संदीप ठाकुर पुलिस की वर्दी में अन्दर आ गया। संदीप ने नकली वारंट जेल-अधिकारियों को दिखाकर शेरसिंह राणा को हथकड़ी पहना दी और गेट पर ले आया। शेरसिंह राणा गेट पर खड़ी नकली पुलिस वैन में बैठ वहाँ से फरार हो गये। एक घंटे के बाद असली पुलिस के पहुचने पर पता चला कि शेरसिंह राणा जेल से निकल गया है। आनन-फानन में सायरन बजाया गयाI सारे जेल में तहलका मच गया, पर तब तक शेरसिंह राणा जेल की हद से बहुत दूर निकल गए थे। जेल से भागने के बाद शेरसिंह ने अपने भाई से संपर्क किया और कुछ रूपये मंगाए और रांची पहुँच गए। कुलदीप तोमर के अनुसार वहाँ उन्होंने ‘संजय गुप्ता’ के नाम से पासपोर्ट बनवाया और बंगलादेश निकल गये, क्योंकि भारत में पुलिस-प्रशासन द्वारा उन पर 50,000/- का इनाम घोषित हो गया था। बांग्लादेश पहुँचकर शेरसिंह राणा ने कुछ क्षत्रिय-नेताओं से संपर्क साधा और जेल से भागने के पीछे कारण पृथ्वीराज चौहान की समाधि वापस हिंदुस्तान लाना बताया। इस पर क्षत्रिय-नेताओं ने उन्हें पूरा साथ देने का भरोसा दिया। बांग्लादेश में उन्होंने अफगानिस्तान का वीसा लेने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुएI अन्ततः दिसम्बर, 2004 में उन्होंने मुंबई से अफगानिस्तान का वीसा प्राप्त कर लिया और जाने की तैयारियां की। उन दिनों अफगानिस्तान सिर्फ दिल्ली, पाकिस्तान और दुबई से ही जाया जा सकता था। चूँकि दिल्ली-पुलिस शेरसिंह राणा के पीछे थी, इसलिए उन्होंने पाकिस्तान से अफगानिस्तान जाने का प्रयास किया। परन्तु इसमें सफलता नहीं मिली। पुनः उन्होंने दुबई के रास्ते अफगानिस्तान जाने का रास्ता चुना। दुबई से काबुल, काबुल से कंधार और कंधार से हेरात पहुँचे। हेरात से वापस कंधार और कंधार से गजनी। इस तरह तालिबानियों के गढ़ में शेरसिंह राणा ने एक माह गुजारा और पृथ्वीराज चौहान की समाधि को खोजते रहे। पृथ्वीराज चौहान साहब की समाधि गजनी में गजनी शहर से करीब बीस किलोमीटर दूर देयक गाँव में है। शेरसिंह राणा ने देयक गाँव जाकर वहां पृथ्वीराज चौहान एवं चंदवरदायी की समाधि (कब्र) पर जाकर उनका अपमान अपनी आँखों से देखाI उन्होंने अपने कैमरे से इस दृश्य की वीडियो रिकॉर्डिंग की और और मिट्टी-पत्थर खोदने के औजार आदि लेकर वहाँ पहुँचकर कब्र की अस्थियोंयुक्त मिट्टी, जूती तथा शिलापट खोदकर निकाल लियाI इस प्रकार शेरसिंह राणा 3 महीने के कठिन परिश्रम तथा जीवन को संकटों में डालकर मार्च, 2005 में सफल होकर भारत वापस आयेI शेरसिंह राणा ने अपनी अफगानिस्तान-यात्रा का पूरा वर्णन अपनी पुस्तक ‘जेल-डायरी’ में किया हैI भारत आने पर पृथ्वीराज चौहान एवं चंदवरदायी की अस्थियों का जगह-जगह प्रदर्शन होने के बाद उनको पूरी श्रद्धा के साथ समाधिस्थ किया गयाI

गुंजन अग्रवाल

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क्यों नहीं पढाया जाता की श्री गुरु अर्जन देव जी को जहाँगीर ने गर्म तवे पर बैठाया था?


क्यों नहीं पढाया जाता की श्री गुरु अर्जन देव जी को जहाँगीर ने गर्म तवे पर बैठाया था? संजय द्विवेदी : श्री गुरु अर्जन देव जी को मुग़ल शाशक जहाँगीर ने गर्म तवे पर बैठा दिया था और गरम तेल में पका कर हत्या कर दी थी , लेकिन आज के कुछ सिख भाई मुगलों की क्रूरता भूल गए हैं और आज भी गुरु अर्जन देव की आत्मा की शांति के लिए हम ठंडा शर्बत पिलाते हैं , लेकिन कुछ सिख भाई सच को नहीं जानते । श्री गुरु अर्जन देव सिक्खों के पाँचवें गुरु थे। ये 1581 ई. में गद्दी पर बैठे। श्री गुरु अर्जन देव का कई दृष्टियों से सिख गुरुओं में विशिष्ट स्थान है। ‘श्री गुरु ग्रंथ साहब’ आज जिस रूप में उपलब्ध है, उसका संपादन इन्होंने ही किया था। श्री गुरु अर्जन देव सिक्खों के परम पूज्य चौथे गुरु रामदास के पुत्र थे। श्री गुरु नानक से लेकर श्री गुरु रामदास तक के चार गुरुओं की वाणी के साथ-साथ उस समय के अन्य संत महात्माओं की वाणी को भी इन्होंने ‘श्री गुरु ग्रंथ साहब’ में स्थान दिया। श्री गुरु अर्जुन देव जी को शहीदों का सरताज कहा जाता है। सिख धर्म के पहले शहीद थे। जागो सिख भाइयो श्री गुरु अर्जुन देव जी को शहीदों का सरताज कहा जाता है। सिख धर्म के पहले शहीद थे। भारतीय दशगुरु परम्परा के पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई. को हुआ। प्रथम सितंबर, 1581 को अठारह वर्ष की आयु में वे गुरु गद्दी पर विराजित हुए। 30 मई, 1606 को उन्होंने धर्म व सत्य की रक्षा के लिए 43 वर्ष की आयु में अपने प्राणों की आहुति दे दी। श्री गुरु अर्जुनदेव जी की शहादत के समय दिल्ली में मध्य एशिया के मुगल वंश के का राज जहाँगीर था और उन्हें राजकीय कोप का ही शिकार होना पड़ा। 1605 में जहांगीर गद्दी पर बैठा जो बहुत ही कट्टïर इस्लामिक विचारों वाला था। अपनी आत्मकथा ‘तुजुके जहांगीरी’ में उसने स्पष्ट लिखा है कि वह श्री गुरु अर्जुन देव जी के बढ़ रहे प्रभाव से बहुत दुखी था। इसी दौरान जहांगीर का पुत्र खुसरो बगावत करके आगरा से पंजाब की ओर आ गया। जहांगीर को यह सूचना मिली थी कि गुरु अर्जुन देव जी ने खुसरो की मदद की है इसलिए उसने गुरु जी को गिरफ्तार करने के आदेश जारी कर दिए। बाबर ने तो श्री गुरु नानक गुरुजी को भी कारागार में रखा था। लेकिन श्री गुरु नानकदेव जी तो पूरे देश में घूम-घूम कर हताश हुई जाति में नई प्राण चेतना फूंक दी।जहांगीर के अनुसार उनका परिवार मुरतजाखान के हवाले कर घरबार लूट लिया गया। इसके बाद गुरु जी ने शहीदी प्राप्त की। अनेक कष्ट झेलते हुए गुरु जी शांत रहे, उनका मन एक बार भी कष्टों से नहीं घबराया। जहांगीर ने श्री गुरु अर्जुनदेव जी को मरवाने से पहले उन्हें अमानवीय यातानाएं दी। मसलन चार दिन तक भूखा रखा गया। ज्येष्ठ मास की तपती दोपहरियां में उन्हें तपते रेत पर बिठाया गया। उसके बाद खौलते पानी में रखा गया। परन्तु श्री गुरु अर्जुनदेव जी ने एक बार भी उफ तक नहीं की और इसे परमात्मा का विधन मानकर स्वीकार किया। श्री गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में 30 मई 1606 ई. को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा’ के तहत लोहे की गर्म तवी पर बिठाकर शहीद कर दिया गया। यासा के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है। गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई। जब गुरु जी का शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह से जल गया तो आप जी को ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया जहां गुरुजी का पावन शरीर रावी में आलोप हो गया। गुरु अर्जुनदेव जी ने लोगों को विनम्र रहने का संदेश दिया। आप विनम्रता के पुंज थे। कभी भी आपने किसी को दुर्वचन नहीं बोले। गुरबाणी में आप फर्माते हैं : ‘तेरा कीता जातो नाही मैनो जोग कीतोई॥ मै निरगुणिआरे को गुण नाही आपे तरस पयोई॥ तरस पइया मिहरामत होई सतगुर साजण मिलया॥ नानक नाम मिलै ता जीवां तनु मनु थीवै हरिया॥’ तपता तवा उनके शीतल स्वभाव के सामने सुखदाईबन गया। तपती रेत ने भी उनकी ज्ञाननिष्ठा भंग न कर पायी। गुरु जी ने प्रत्येक कष्ट हंसते-हंसते झेलकर यही अरदास की- तेरा कीआ मीठा लागे॥ हरि नामु पदारथ नानक मांगे॥ जहांगीर द्वारा श्री गुरु अर्जुनदेव जी को दिए गए अमानवीय अत्याचार और अन्त में उनकी मृत्यु जहांगीर की इसी योजना का हिस्सा था। श्री गुरु अर्जुनदेव जी जहांगीर की असली योजना के अनुसार ‘इस्लाम के अन्दर’ तो क्या आते, इसलिए उन्होंने विरोचित शहादत के मार्ग का चयन किया। इधर जहांगीर की आगे की तीसरी पीढ़ी या फिर मुगल वंश के बाबर की छठी पीढ़ी औरंगजेब तक पहुंची। उधर श्री गुरु नानक देव जी की दसवीं पीढ़ी थी। श्री गुरु गोविन्द सिंह तक पहुंची। यहां तक पहुंचते-पहुंचते ही श्री नानकदेव की दसवीं पीढ़ी ने मुगलवंश की नींव में डायनामाईट रख दिया और उसके नाश का इतिहास लिख दिया। संसार जानता है कि मुट्ठी भर मरजीवड़े सिंघ रूपी खालसा ने 700 साल पुराने विदेशी वंशजों को मुगल राज सहित सदा के लिए ठंडा कर दिया। 100 वर्ष बाद महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में भारत ने पुनः स्वतंत्राता की सांस ली। शेष तो कल का इतिहास है, लेकिन इस पूरे संघर्षकाल में पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुनदेव जी की शहादत सदा सर्वदा सूर्य के ताप की तरह प्रखर रहेगी। आज कुछ सिख भाई भूल गए हैं की गुरु अर्जन देव जी को मुसलमानों ने कितनी यातनाए देकर शहीद किया था। रोम रोम नतमस्तक परंतु हृदय में अत्यंत ही क्षोभ है कि ऐसे देवपुरुष का इतिहास ना तो हमें कभी पढाया गया और ना ही कभी बताया गया… लेकिन अब समय आ गया है कि हम मैकाले के षडयंत्र पूर्वक रचे गए झूठे और भ्रामक शिक्षा कुचक्र से बाहर निकले और अपनी स्वयं की, धर्माधारित शिक्षा व्यवस्था की स्थापना करें। जिसमें अपने धर्म का अपने पूर्वजों का एवं अपने इष्ट का सम्मान हो, उनकी शौर्य गाथा को भारत का बच्चा – बच्चा जाने और उनके आदर्शों को अपनायें। ( अगर किसी भी भाई को इस लेख में कुछ गलती लगे वह कृपा करके हमें मेल करे उस गलती को लेखक को बता कर ठीक कर दिया जायेगा theindiapost@gmail.com )

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दोस्तों क्या आपको पता है अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को ऑफर किया था कि यह जो सत्ता चल रही है


दोस्तों क्या आपको पता है अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को ऑफर किया था कि यह जो सत्ता चल रही है इसमें हमारे साथ शामिल हो जाओ, तुम भी लूटो, हम भी लूटें. सारे क्रांतिकारियों ने साफ मना किया था कि तुम्हारी इस लुट की व्यवस्था में हमें शामिल नहीं होना, हमें तो संपूर्ण आजादी चाहिए. संपूर्ण स्वराज्य चाहिए और जिस क्रांतिकारी ने यह बात सबसे पहले कही थी उन्हीं का नाम था नेताजी सुभाष चंद्र बोस. क्या आपको मालूम है उनके जीवन की विडंबना क्या थी उनको आईसीएस (ICS) की नौकरी में सेलेक्ट होना पड़ा. उनके पिताजी की इच्छा की पूर्ति के लिए, क्योकि पिता जी चाहते थे कि मेरा बेटा कलेक्टर बने और बेटे को बार-बार वह ताना मारते थे कि तू बन नहीं सकता. तू होशियार कम है, तेरे पास तैयारी नहीं है, इसलिए बहाना बनाता रहता है. तो बेटे ने अपनी पात्रता सिद्ध करने के लिए परीक्षा दी और उस जमाने में आई सी एस की परीक्षा देने के लिए चार-चार साल लोग पढ़ाई करते हैं. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिर्फ 7 महीने पढ़ाई की थी और उतनी पढ़ाई में उन्होंने आई सी एस के टॉपर की लिस्ट में चौथी पोजीशन पाई थी. उस जमाने में आईसीएस टॉप करना किसी भारतीय लड़के के लिए संभव ही नहीं था, क्योंकि इस परीक्षा में अंग्रेज टॉप किया करते थे. वह पहले भारतीय व्यक्ति थे जिनको टॉपर लिस्ट में चौथा स्थान मिला एक बहुत मजेदार घटना है वह लंदन गए थे, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेकर आईसीएस की परीक्षा में बैठे थे. जिस दिन रिजल्ट आया, उनके सहयोगी रिजल्ट देखने के लिए गए थे, लेकिन वह नहीं गए तो उनके सहयोगियों ने नाम देखा तो कहीं नहीं मिला तो उनको आकर कहा कि तुम तो पास ही नहीं हुए तो उन्होंने कहा ठीक है कोई बात नहीं पास नहीं हुआ तो. शाम को ब्रिटिश गवर्नमेंट के डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी आया और नेताजी को बोला कि तुम्हारा नाम पास होने वालों में नहीं है, ऊपर वाली लिस्ट में है और वह लिस्ट अभी तक लगी नहीं है. अब सुभाष चंद्र बोस को दुविधा हो गई कि मैं तो आईसीएस हो गया. अब मुझे कलेक्टर होना पड़ेगा. कलेक्टर होने का मतलब भारतियों को लूटना पढ़ेगा, लूट का कुछ हिस्सा अंग्रेजों को देना पड़ेगा. तो उनके मन में यह शुरू हुआ कि या तो मैं इस लूट में शामिल हो जाऊं या लूट की व्यवस्था के बाहर निकल कर देश के लिए काम करूं अंत में उनके दिल ने कहा कि तुमको तो लूट में शामिल नहीं होना है क्योंकि तुम्हारा जन्म इसके लिए नहीं हुआ है. उन्होंने नौकरी को रिजाइन कर दिया. जब उन्होंने इस्तीफा दिया था ब्रिटिश सिस्टम में हड़कंप मच गया था क्योंकि भारत के कई लड़के पहले आईसीएस बन चुके थे किसी में हिम्मत नहीं हुई थी इस्तीफा देने की. सुभाष चद्र बोस जी ने इस्तीफा दिया और इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि मै इस तंत्र में शामिल इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि मेरी भारत माता की लूट के लिए यह तंत्र बना है और मैं मेरे देश को लुटू यह मेरा दिल मुझे गवाही नहीं देता. इसलिए मै छोड़ रहा हूं. नेताजी ने रिजाइन किया, बोरिया बिस्तर समेट के भारत आ गए, पिताजी के दिल पर वज्रपात हो गया कि बेटे ने आईसीएस को लात मार दी. तो बेटे ने पिता को समझाया कि मै हर बार इस नौकरी को तो लात ही मारूंगा. जब तक यह व्यवस्था भारत को लूटने की व्यवस्था है. मैं इसमें शामिल नहीं हो सकता. इसलिए नेता जी ने आईसीएस को छोड़ा और जैसे ही आईसीएस छोडी उन्होंने तो सारा देश उनके लिए खड़ा हो गया. जब वह लंदन से वापस आए थे उस समय पानी के जहाज चला करते थे. बंबई में उतरे थे जो हुजूम बंबई में निकला था. वो तो गजब के लोग थे उन्होंने उसी दिन कह दिया था कि अब तो भारत आजाद हो जाएगा क्योंकि जब मुझे समर्थन देने के लिए इतने लोग भारत में है तो मैं जब गांव गांव जाऊंगा तब कितने लोग खड़े हो जाएंगे. उसी कॉन्फिडेंस से उसी आश्वासन पर उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया था. और जब फौज बनाई थी तब माताओं ने अपने मंगलसूत्र उतार के उन को दान किए थे. एक मां उनके पास आई थी अपने अंधे बेटे को लेकर कि इसको फौज में ले लो तो उन्होंने कहा इसको तो दिखाई नहीं देता तो बेटे ने कहा कि दिखाई तो नहीं देता लेकिन आप की फौज में आ जाऊंगा तो दुश्मन की एक गोली तो कम कर ही दूंगा. दोस्तों बहुत ही दुःख की बात है कि ये लूट का तंत्र आज भी चल रहा है, जो कानून अंग्रेज बनाकर गए थे वो आज भी चल रहे है.

ओम वीर