Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

रानी लक्ष्मीबाई


अरुण सुक्ला

झांझांसी की रानी ने कहा था अंतिम क्षणों में
अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए,
जला दो🔥
अंग्रेज़ों की तरफ़ से कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स पहला शख़्स था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आँखों से लड़ाई के मैदान में लड़ते हुए देखा.
उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दाँतों से दबाई हुई थी. वो दोनों हाथों से तलवार चला रही थीं और एक साथ दोनों तरफ़ वार कर रही थीं.
उनसे पहले एक और अंग्रेज़ जॉन लैंग को रानी लक्ष्मीबाई को नज़दीक से देखने का मौका मिला था, लेकिन लड़ाई के मैदान में नहीं, उनकी हवेली में.
जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने अवैध घोषित कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा था.
उन्होंने एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली ‘रानी महल’ में शरण ली थी.
रानी ने वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं जिसने हाल ही में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ एक केस जीता था.
गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग के कार्यकाल में ही 1857 का गदर हुआ था
‘रानी महल’ में लक्ष्मी बाई
लैंग का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और वो मेरठ में एक अख़बार, ‘मुफ़ुस्सलाइट’ निकाला करते थे.
लैंग अच्छी ख़ासी फ़ारसी और हिंदुस्तानी बोल लेते थे और ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन उन्हें पसंद नहीं करता था, क्योंकि वो हमेशा उन्हें घेरने की कोशिश किया करते थे.
जब लैंग पहली बार झाँसी आए तो रानी ने उनको लेने के लिए घोड़े का एक रथ आगरा भेजा था.
उनको झाँसी लाने के लिए रानी ने अपने दीवान और एक अनुचर को आगरा रवाना किया.
अनुचर के हाथ में बर्फ़ से भरी बाल्टी थी जिसमें पानी, बियर और चुनिंदा वाइन्स की बोतलें रखी हुई थीं. पूरे रास्ते एक नौकर लैंग को पंखा करते आया था.
झाँसी पहुंचने पर लैंग को पचास घुड़सवार एक पालकी में बैठा कर ‘रानी महल’ लाए जहाँ के बगीचे में रानी ने एक शामियाना लगवाया हुआ था.
मलमल की साड़ी
रानी लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं. तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया.
लैंग की नज़र रानी के ऊपर गई. बाद में रेनर जेरॉस्च ने एक किताब लिखी, ‘द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.’
किताब में रेनर जेरॉस्च ने जॉन लैंग को कहते हुए बताया, ‘रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं. अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था. मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था. हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थी और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी.उनका रंग बहुत गोरा नहीं था. उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था, सिवाए सोने की बालियों के. उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें उनके शरीर का रेखांकन साफ़ दिखाई दे रहा था.. जो चीज़ उनके व्यक्तित्व को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़.’
रानी के घुड़सवार
बहरहाल कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स ने तय किया कि वो खुद आगे जा कर रानी पर वार करने की कोशिश करेंगे.
लेकिन जब जब वो ऐसा करना चाहते थे, रानी के घुड़सवार उन्हें घेर कर उन पर हमला कर देते थे. उनकी पूरी कोशिश थी कि वो उनका ध्यान भंग कर दें.
कुछ लोगों को घायल करने और मारने के बाद रॉड्रिक ने अपने घोड़े को एड़ लगाई और रानी की तरफ़ बढ़ चले थे.
उसी समय अचानक रॉड्रिक के पीछे से जनरल रोज़ की अत्यंत निपुण ऊँट की टुकड़ी ने एंट्री ली. इस टुकड़ी को रोज़ ने रिज़र्व में रख रखा था.
इसका इस्तेमाल वो जवाबी हमला करने के लिए करने वाले थे. इस टुकड़ी के अचानक लड़ाई में कूदने से ब्रिटिश खेमे में फिर से जान आ गई. रानी इसे फ़ौरन भाँप गई.
उनके सैनिक मैदान से भागे नहीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होनी शुरू हो गई.
ब्रिटिश सैनिक
उस लड़ाई में भाग ले रहे जॉन हेनरी सिलवेस्टर ने अपनी किताब ‘रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया’ में लिखा, “अचानक रानी ज़ोर से चिल्लाई, ‘मेरे पीछे आओ.’ पंद्रह घुड़सवारों को एक जत्था उनके पीछे हो लिया. वो लड़ाई के मैदान से इतनी तेज़ी से हटीं कि अंग्रेज़ सैनिकों को इसे समझ पाने में कुछ सेकेंड लग गए. अचानक रॉड्रिक ने अपने साथियों से चिल्ला कर कहा, ‘दैट्स दि रानी ऑफ़ झाँसी, कैच हर.'”
रानी और उनके साथियों ने भी एक मील ही का सफ़र तय किया था कि कैप्टेन ब्रिग्स के घुड़सवार उनके ठीक पीछे आ पहुंचे. जगह थी कोटा की सराय.
लड़ाई नए सिरे से शुरू हुई. रानी के एक सैनिक के मुकाबले में औसतन दो ब्रिटिश सैनिक लड़ रहे थे. अचानक रानी को अपने बायें सीने में हल्का सा दर्द महसूस हुआ, जैसे किसी सांप ने उन्हें काट लिया हो.
एक अंग्रेज़ सैनिक ने, जिसे वो देख नहीं पाईं थीं, उनके सीने में संगीन भोंक दी थी. वो तेज़ी से मुड़ी और अपने ऊपर हमला करने वाले पर पूरी ताकत से तलवार से टूट पड़ी.
राइफ़ल की गोली
रानी को लगी चोट बहुत गहरी नहीं थी, लेकिन उसमें बहुत तेज़ी से ख़ून निकल रहा था. अचानक घोड़े पर दौड़ते-दौड़ते उनके सामने एक छोटा सा पानी का झरना आ गया.
उन्होंने सोचा वो घोड़े की एक छलांग लगाएंगी और घोड़ा झरने के पार हो जाएगा. तब उनको कोई भी नहीं पकड़ सकेगा.
उन्होंने घोड़े में एड़ लगाई, लेकिन वो घोड़ा छलाँग लगाने के बजाए इतनी तेज़ी से रुका कि वो करीब करीब उसकी गर्दन के ऊपर लटक गईं.
उन्होंने फिर एड़ लगाई, लेकिन घोड़े ने एक इंच भी आगे बढ़ने से इंकार कर दिया. तभी उन्हें लगा कि उनकी कमर में बाई तरफ़ किसी ने बहुत तेज़ी से वार हुआ है.
उनको राइफ़ल की एक गोली लगी थी. रानी के बांए हाथ की तलवार छूट कर ज़मीन पर गिर गई.
उन्होंने उस हाथ से अपनी कमर से निकलने वाले खून को दबा कर रोकने की कोशिश की.
रानी पर जानलेवा हमला
एंटोनिया फ़्रेज़र अपनी पुस्तक, ‘द वारियर क्वीन’ में लिखती हैं, “तब तक एक अंग्रेज़ रानी के घोड़े की बगल में पहुंच चुका था. उसने रानी पर वार करने के लिए अपनी तलवार ऊपर उठाई. रानी ने भी उसका वार रोकने के लिए दाहिने हाथ में पकड़ी अपनी तलवार ऊपर की. उस अंग्रेज़ की तलवार उनके सिर पर इतनी तेज़ी से लगी कि उनका माथा फट गया और वो उसमें निकलने वाले खून से लगभग अंधी हो गईं.”
तब भी रानी ने अपनी पूरी ताकत लगा कर उस अंग्रेज़ सैनिक पर जवाबी वार किया. लेकिन वो सिर्फ़ उसके कंधे को ही घायल कर पाई. रानी घोड़े से नीचे गिर गई.
तभी उनके एक सैनिक ने अपने घोड़े से कूद कर उन्हें अपने हाथों में उठा लिया और पास के एक मंदिर में ले लाया. रानी तब तक जीवित थीं.
मंदिर के पुजारी ने उनके सूखे हुए होठों को एक बोतल में रखा गंगा जल लगा कर तर किया. रानी बहुत बुरी हालत में थी. धीरे धीरे वो अपने होश खो रही थी.
उधर, मंदिर के अहाते के बाहर लगातार फ़ायरिंग चल रही थी. अंतिम सैनिक को मारने के बाद अंग्रेज़ सैनिक समझे कि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया है.
दामोदर के लिए…
तभी रॉड्रिक ने ज़ोर से चिल्ला कर कहा, “वो लोग मंदिर के अंदर गए है. उन पर हमला करो. रानी अभी भी ज़िंदा है.”
उधर, पुजारियों ने रानी के लिए अंतिम प्रार्थना करनी शुरू कर दी थी. रानी की एक आँख अंग्रेज़ सैनिक की कटार से लगी चोट के कारण बंद थी.
उन्होंने बहुत मुश्किल से अपनी दूसरी आँख खोली. उन्हें सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था और उनके मुंह से रुक रुक कर शब्द निकल रहे थे, “….दामोदर… मैं उसे तुम्हारी… देखरेख में छोड़ती हूँ… उसे छावनी ले जाओ… दौड़ो उसे ले जाओ.”
बहुत मुश्किल से उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकालने की कोशिश की. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई और फिर बेहोश हो गई.
मंदिर के पुजारी ने उनके गले से हार उतार कर उनके एक अंगरक्षक के हाथ में रख दिया, “इसे रखो… दामोदर के लिए.”
रानी का पार्थिव शरीर
रानी की साँसे तेज़ी से चलने लगी थीं. उनकी चोट से खून निकल कर उनके फेफड़ों में घुस रहा था. धीरे धीरे वो डूबने लगी थीं. अचानक जैसे उनमें फिर से जान आ गई.
वो बोली, “अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए.” ये कहते ही उनका सिर एक ओर लुड़क गया. उनकी साँसों में एक और झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए थे. वहाँ मौजूद रानी के अंगरक्षकों ने आनन फानन में कुछ लकड़ियाँ जमा की और उन पर रानी के पार्थिव शरीर को रख आग लगा दी थी.
उनके चारों तरफ़ रायफलों की गोलियों की आवाज़ बढ़ती चली जा रही थी. मंदिर की दीवार के बाहर अब तक सैकड़ों ब्रिटिश सैनिक पहुंच गए थे.
मंदिर के अंदर से सिर्फ़ तीन रायफलें अंग्रेज़ों पर गोलियाँ बरसा रही थीं. पहले एक रायफ़ल शांत हुई… फिर दूसरी और फिर तीसरी रायफ़ल भी शांत हो गई.
चिता की लपटें
जब अंग्रेज़ मंदिर के अंदर घुसे तो वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. सब कुछ शांत था. सबसे पहले रॉड्रिक ब्रिग्स अंदर घुसा।
वहाँ रानी के सैनिकों और पुजारियों के कई दर्जन रक्तरंजित शव पड़े हुए थे. एक भी आदमी जीवित नहीं बचा था. उन्हें सिर्फ़ एक शव की तलाश थी.
तभी उसकी नज़र एक चिता पर पड़ी जिसकीं लपटें अब धीमी पड़ रही थीं. उसने अपने बूट से उसे बुझाने की कोशिश की.
तभी उसे मानव शरीर के जले हुए अवशेष दिखाई दिए. रानी की हड्डियाँ करीब करीब राख बन चुकी थीं.
इस लड़ाई में लड़ रहे कैप्टेन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखा, “हमारा विरोध ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी. बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था. कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया. हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया. बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी.”
तात्या टोपे
रानी के बेटे दामोदर को लड़ाई के मैदान से सुरक्षित ले जाया गया. इरा मुखोटी अपनी किताब ‘हिरोइंस’ में लिखती हैं, “दामोदर ने दो साल बाद 1860 में अंग्रेज़ों के सामने आत्म समर्पण किया. बाद में उसे अंग्रेज़ों ने पेंशन भी दी. 58 साल की उम्र में उनकी मौत हुई. जब वो मरे तो वो पूरी तरह से कंगाल थे. उनके वंशज अभी भी इंदौर में रहते हैं और अपने आप को ‘झाँसीवाले’ कहते हैं.”
दो दिन बाद महादजी सिधिंया ने इस जीत की खुशी में जनरल रोज़ और सर रॉबर्ट हैमिल्टन के सम्मान में ग्वालियर में भोज दिया।
रानी की मौत के साथ ही विद्रोहियों का साहस टूट गया और ग्वालियर पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया।
नाना साहब वहाँ से भी बच निकले लेकिन तात्या टोपे के साथ उनके अभिन्न मित्र नवाड़ के राजा ने ग़द्दारी की
तात्या टोपे पकड़े गए और उन्हें ग्वालियर के पास शिवपुरी ले जा कर एक पेड़ से फाँसी पर लटका दिया गया ।सी की रानी ने कहा था अंतिम क्षणों में
अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए,
जला दो🔥
अंग्रेज़ों की तरफ़ से कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स पहला शख़्स था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आँखों से लड़ाई के मैदान में लड़ते हुए देखा.
उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दाँतों से दबाई हुई थी. वो दोनों हाथों से तलवार चला रही थीं और एक साथ दोनों तरफ़ वार कर रही थीं.
उनसे पहले एक और अंग्रेज़ जॉन लैंग को रानी लक्ष्मीबाई को नज़दीक से देखने का मौका मिला था, लेकिन लड़ाई के मैदान में नहीं, उनकी हवेली में.
जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने अवैध घोषित कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा था.
उन्होंने एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली ‘रानी महल’ में शरण ली थी.
रानी ने वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं जिसने हाल ही में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ एक केस जीता था.
गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग के कार्यकाल में ही 1857 का गदर हुआ था
‘रानी महल’ में लक्ष्मी बाई
लैंग का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और वो मेरठ में एक अख़बार, ‘मुफ़ुस्सलाइट’ निकाला करते थे.
लैंग अच्छी ख़ासी फ़ारसी और हिंदुस्तानी बोल लेते थे और ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन उन्हें पसंद नहीं करता था, क्योंकि वो हमेशा उन्हें घेरने की कोशिश किया करते थे.
जब लैंग पहली बार झाँसी आए तो रानी ने उनको लेने के लिए घोड़े का एक रथ आगरा भेजा था.
उनको झाँसी लाने के लिए रानी ने अपने दीवान और एक अनुचर को आगरा रवाना किया.
अनुचर के हाथ में बर्फ़ से भरी बाल्टी थी जिसमें पानी, बियर और चुनिंदा वाइन्स की बोतलें रखी हुई थीं. पूरे रास्ते एक नौकर लैंग को पंखा करते आया था.
झाँसी पहुंचने पर लैंग को पचास घुड़सवार एक पालकी में बैठा कर ‘रानी महल’ लाए जहाँ के बगीचे में रानी ने एक शामियाना लगवाया हुआ था.
मलमल की साड़ी
रानी लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं. तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया.
लैंग की नज़र रानी के ऊपर गई. बाद में रेनर जेरॉस्च ने एक किताब लिखी, ‘द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.’
किताब में रेनर जेरॉस्च ने जॉन लैंग को कहते हुए बताया, ‘रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं. अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था. मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था. हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थी और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी.उनका रंग बहुत गोरा नहीं था. उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था, सिवाए सोने की बालियों के. उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें उनके शरीर का रेखांकन साफ़ दिखाई दे रहा था.. जो चीज़ उनके व्यक्तित्व को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़.’
रानी के घुड़सवार
बहरहाल कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स ने तय किया कि वो खुद आगे जा कर रानी पर वार करने की कोशिश करेंगे.
लेकिन जब जब वो ऐसा करना चाहते थे, रानी के घुड़सवार उन्हें घेर कर उन पर हमला कर देते थे. उनकी पूरी कोशिश थी कि वो उनका ध्यान भंग कर दें.
कुछ लोगों को घायल करने और मारने के बाद रॉड्रिक ने अपने घोड़े को एड़ लगाई और रानी की तरफ़ बढ़ चले थे.
उसी समय अचानक रॉड्रिक के पीछे से जनरल रोज़ की अत्यंत निपुण ऊँट की टुकड़ी ने एंट्री ली. इस टुकड़ी को रोज़ ने रिज़र्व में रख रखा था.
इसका इस्तेमाल वो जवाबी हमला करने के लिए करने वाले थे. इस टुकड़ी के अचानक लड़ाई में कूदने से ब्रिटिश खेमे में फिर से जान आ गई. रानी इसे फ़ौरन भाँप गई.
उनके सैनिक मैदान से भागे नहीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होनी शुरू हो गई.
ब्रिटिश सैनिक
उस लड़ाई में भाग ले रहे जॉन हेनरी सिलवेस्टर ने अपनी किताब ‘रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया’ में लिखा, “अचानक रानी ज़ोर से चिल्लाई, ‘मेरे पीछे आओ.’ पंद्रह घुड़सवारों को एक जत्था उनके पीछे हो लिया. वो लड़ाई के मैदान से इतनी तेज़ी से हटीं कि अंग्रेज़ सैनिकों को इसे समझ पाने में कुछ सेकेंड लग गए. अचानक रॉड्रिक ने अपने साथियों से चिल्ला कर कहा, ‘दैट्स दि रानी ऑफ़ झाँसी, कैच हर.'”
रानी और उनके साथियों ने भी एक मील ही का सफ़र तय किया था कि कैप्टेन ब्रिग्स के घुड़सवार उनके ठीक पीछे आ पहुंचे. जगह थी कोटा की सराय.
लड़ाई नए सिरे से शुरू हुई. रानी के एक सैनिक के मुकाबले में औसतन दो ब्रिटिश सैनिक लड़ रहे थे. अचानक रानी को अपने बायें सीने में हल्का सा दर्द महसूस हुआ, जैसे किसी सांप ने उन्हें काट लिया हो.
एक अंग्रेज़ सैनिक ने, जिसे वो देख नहीं पाईं थीं, उनके सीने में संगीन भोंक दी थी. वो तेज़ी से मुड़ी और अपने ऊपर हमला करने वाले पर पूरी ताकत से तलवार से टूट पड़ी.
राइफ़ल की गोली
रानी को लगी चोट बहुत गहरी नहीं थी, लेकिन उसमें बहुत तेज़ी से ख़ून निकल रहा था. अचानक घोड़े पर दौड़ते-दौड़ते उनके सामने एक छोटा सा पानी का झरना आ गया.
उन्होंने सोचा वो घोड़े की एक छलांग लगाएंगी और घोड़ा झरने के पार हो जाएगा. तब उनको कोई भी नहीं पकड़ सकेगा.
उन्होंने घोड़े में एड़ लगाई, लेकिन वो घोड़ा छलाँग लगाने के बजाए इतनी तेज़ी से रुका कि वो करीब करीब उसकी गर्दन के ऊपर लटक गईं.
उन्होंने फिर एड़ लगाई, लेकिन घोड़े ने एक इंच भी आगे बढ़ने से इंकार कर दिया. तभी उन्हें लगा कि उनकी कमर में बाई तरफ़ किसी ने बहुत तेज़ी से वार हुआ है.
उनको राइफ़ल की एक गोली लगी थी. रानी के बांए हाथ की तलवार छूट कर ज़मीन पर गिर गई.
उन्होंने उस हाथ से अपनी कमर से निकलने वाले खून को दबा कर रोकने की कोशिश की.
रानी पर जानलेवा हमला
एंटोनिया फ़्रेज़र अपनी पुस्तक, ‘द वारियर क्वीन’ में लिखती हैं, “तब तक एक अंग्रेज़ रानी के घोड़े की बगल में पहुंच चुका था. उसने रानी पर वार करने के लिए अपनी तलवार ऊपर उठाई. रानी ने भी उसका वार रोकने के लिए दाहिने हाथ में पकड़ी अपनी तलवार ऊपर की. उस अंग्रेज़ की तलवार उनके सिर पर इतनी तेज़ी से लगी कि उनका माथा फट गया और वो उसमें निकलने वाले खून से लगभग अंधी हो गईं.”
तब भी रानी ने अपनी पूरी ताकत लगा कर उस अंग्रेज़ सैनिक पर जवाबी वार किया. लेकिन वो सिर्फ़ उसके कंधे को ही घायल कर पाई. रानी घोड़े से नीचे गिर गई.
तभी उनके एक सैनिक ने अपने घोड़े से कूद कर उन्हें अपने हाथों में उठा लिया और पास के एक मंदिर में ले लाया. रानी तब तक जीवित थीं.
मंदिर के पुजारी ने उनके सूखे हुए होठों को एक बोतल में रखा गंगा जल लगा कर तर किया. रानी बहुत बुरी हालत में थी. धीरे धीरे वो अपने होश खो रही थी.
उधर, मंदिर के अहाते के बाहर लगातार फ़ायरिंग चल रही थी. अंतिम सैनिक को मारने के बाद अंग्रेज़ सैनिक समझे कि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया है.
दामोदर के लिए…
तभी रॉड्रिक ने ज़ोर से चिल्ला कर कहा, “वो लोग मंदिर के अंदर गए है. उन पर हमला करो. रानी अभी भी ज़िंदा है.”
उधर, पुजारियों ने रानी के लिए अंतिम प्रार्थना करनी शुरू कर दी थी. रानी की एक आँख अंग्रेज़ सैनिक की कटार से लगी चोट के कारण बंद थी.
उन्होंने बहुत मुश्किल से अपनी दूसरी आँख खोली. उन्हें सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था और उनके मुंह से रुक रुक कर शब्द निकल रहे थे, “….दामोदर… मैं उसे तुम्हारी… देखरेख में छोड़ती हूँ… उसे छावनी ले जाओ… दौड़ो उसे ले जाओ.”
बहुत मुश्किल से उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकालने की कोशिश की. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई और फिर बेहोश हो गई.
मंदिर के पुजारी ने उनके गले से हार उतार कर उनके एक अंगरक्षक के हाथ में रख दिया, “इसे रखो… दामोदर के लिए.”
रानी का पार्थिव शरीर
रानी की साँसे तेज़ी से चलने लगी थीं. उनकी चोट से खून निकल कर उनके फेफड़ों में घुस रहा था. धीरे धीरे वो डूबने लगी थीं. अचानक जैसे उनमें फिर से जान आ गई.
वो बोली, “अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए.” ये कहते ही उनका सिर एक ओर लुड़क गया. उनकी साँसों में एक और झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए थे. वहाँ मौजूद रानी के अंगरक्षकों ने आनन फानन में कुछ लकड़ियाँ जमा की और उन पर रानी के पार्थिव शरीर को रख आग लगा दी थी.
उनके चारों तरफ़ रायफलों की गोलियों की आवाज़ बढ़ती चली जा रही थी. मंदिर की दीवार के बाहर अब तक सैकड़ों ब्रिटिश सैनिक पहुंच गए थे.
मंदिर के अंदर से सिर्फ़ तीन रायफलें अंग्रेज़ों पर गोलियाँ बरसा रही थीं. पहले एक रायफ़ल शांत हुई… फिर दूसरी और फिर तीसरी रायफ़ल भी शांत हो गई.
चिता की लपटें
जब अंग्रेज़ मंदिर के अंदर घुसे तो वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. सब कुछ शांत था. सबसे पहले रॉड्रिक ब्रिग्स अंदर घुसा।
वहाँ रानी के सैनिकों और पुजारियों के कई दर्जन रक्तरंजित शव पड़े हुए थे. एक भी आदमी जीवित नहीं बचा था. उन्हें सिर्फ़ एक शव की तलाश थी.
तभी उसकी नज़र एक चिता पर पड़ी जिसकीं लपटें अब धीमी पड़ रही थीं. उसने अपने बूट से उसे बुझाने की कोशिश की.
तभी उसे मानव शरीर के जले हुए अवशेष दिखाई दिए. रानी की हड्डियाँ करीब करीब राख बन चुकी थीं.
इस लड़ाई में लड़ रहे कैप्टेन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखा, “हमारा विरोध ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी. बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था. कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया. हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया. बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी.”
तात्या टोपे
रानी के बेटे दामोदर को लड़ाई के मैदान से सुरक्षित ले जाया गया. इरा मुखोटी अपनी किताब ‘हिरोइंस’ में लिखती हैं, “दामोदर ने दो साल बाद 1860 में अंग्रेज़ों के सामने आत्म समर्पण किया. बाद में उसे अंग्रेज़ों ने पेंशन भी दी. 58 साल की उम्र में उनकी मौत हुई. जब वो मरे तो वो पूरी तरह से कंगाल थे. उनके वंशज अभी भी इंदौर में रहते हैं और अपने आप को ‘झाँसीवाले’ कहते हैं.”
दो दिन बाद महादजी सिधिंया ने इस जीत की खुशी में जनरल रोज़ और सर रॉबर्ट हैमिल्टन के सम्मान में ग्वालियर में भोज दिया।
रानी की मौत के साथ ही विद्रोहियों का साहस टूट गया और ग्वालियर पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया।
नाना साहब वहाँ से भी बच निकले लेकिन तात्या टोपे के साथ उनके अभिन्न मित्र नवाड़ के राजा ने ग़द्दारी की
तात्या टोपे पकड़े गए और उन्हें ग्वालियर के पास शिवपुरी ले जा कर एक पेड़ से फाँसी पर लटका दिया गया ।

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जनरल सैम मानेकशॉ और जनरल याहिया खान दोनों अविभाजित भारत की ब्रिटिश आर्मी में ब्रिगेडियर थे

47 में जब देश का बंटवारा हुआ और जब याहिया खान पाकिस्तान जा रहे थे तब उन्होंने सैम मानेक्शा से उनकी उस जमाने की शानदार लाल रंग की जेम्स मोटरसाइकिल मांगी और दोनों में उस जमाने में ₹1000 में सौदा तय हुआ और जनरल याहिया खान ने कहा कि मैं पाकिस्तान जाते ही तुम्हें पैसे दे दूंगा लेकिन जनरल याहिया खान तो ठहरा ईमान वाला शांतिदूत उसने पैसे नहीं दिए

अब पढ़िए जनरल सैम मानेक्शा ने अपनी मोटरसाइकिल के पैसे जनरल याहिया से कैसे वसूले थे

इस घटना के 24 साल बाद सन 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध होना निश्चित हो गया. उस समय सैम मानेकशॉ भारत के और याह्या खान पाकिस्तान के आर्मी चीफ थे और युद्ध में अपने अपने देश का नेतृत्व कर रहे थे.

1971 का घमासान युद्ध हुआ. युद्ध में भारत ने जीत हासिल की और पाकिस्तान को भारी हार और हानि का सामना करना पड़ा. इस युद्ध में ही पूर्वी पाकिस्तान का विघटन हुआ.

सैम मानेकशॉ ने इस युद्ध के बात जो यादगार बात बोली, वो ये है – याह्या ने मेरे Bike के 1000 रुपये मुझे कभी नहीं दिए, लेकिन अब उसने अपना आधा देश देकर हिसाब पूरा किया.

Sam Manekshaw भारतीय सेना और जनता के हमेशा अविस्मरणीय हीरो रहेंगे. हम सभी भारतीय उनकी देशभक्ति और बहादुरी को प्रणाम करते हैं.

https://hi.quora.com/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE?fbclid=IwAR3hos-PXJqtQCnwX-M_6Ing-WZuwVdJwg3IdxO51g_RMjfviO8Z5mJXHPI

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कुमार अवधेश सिंह

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ..

इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं.
इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है.

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..
महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे.

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है.

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे.

कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।
युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया.उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया.
दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।
साभार…

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शीतला दुबे

अकबर और ध्यानु भगत की कथा…..
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हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलो मीटर दूर स्तिथ है, ज्वाला देवी मंदिर। इसे जोता वाली का मंदिर भी कहा जाता है। यहाँ पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग अलग जगह से ज्वाला निकल रही है जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया हैं। इन नौ ज्योतियां को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है।

इस जगह के बारे में एक कथा अकबर और माता के परम भक्त ध्यानु भगत से जुडी है। जिन दिनों भारत में मुगल सम्राट अकबर का शासन था,उन्हीं दिनों की यह घटना है। हिमाचल के नादौन ग्राम निवासी माता का एक सेवक धयानू भक्त एक हजार यात्रियों सहित माता के दर्शन के लिए जा रहा था। इतना बड़ा दल देखकर बादशाह के सिपाहियों ने चांदनी चौक दिल्ली मे उन्हें रोक लिया और अकबर के दरबार में ले जाकर ध्यानु भक्त को पेश किया।

बादशाह ने पूछा तुम इतने आदमियों को साथ लेकर कहां जा रहे हो। ध्यानू ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया मैं ज्वालामाई के दर्शन के लिए जा रहा हूं मेरे साथ जो लोग हैं, वह भी माता जी के भक्त हैं, और यात्रा पर जा रहे हैं।

अकबर ने सुनकर कहा यह ज्वालामाई कौन है ? और वहां जाने से क्या होगा? ध्यानू भक्त ने उत्तर दिया महाराज ज्वालामाई संसार का पालन करने वाली माता है। वे भक्तों के सच्चे ह्रदय से की गई प्राथनाएं स्वीकार करती हैं। उनका प्रताप ऐसा है उनके स्थान पर बिना तेल-बत्ती के ज्योति जलती रहती है। हम लोग प्रतिवर्ष उनके दर्शन जाते हैं।

अकबर ने कहा अगर तुम्हारी बंदगी पाक है तो देवी माता जरुर तुम्हारी इज्जत रखेगी। अगर वह तुम जैसे भक्तों का ख्याल न रखे तो फिर तुम्हारी इबादत का क्या फायदा? या तो वह देवी ही यकीन के काबिल नहीं, या फिर तुम्हारी इबादत झूठी है। इम्तहान के लिए हम तुम्हारे घोड़े की गर्दन अलग कर देते है, तुम अपनी देवी से कहकर उसे दोबारा जिन्दा करवा लेना। इस प्रकार घोड़े की गर्दन काट दी गई।

ध्यानू भक्त ने कोई उपाए न देखकर बादशाह से एक माह की अवधि तक घोड़े के सिर व धड़ को सुरक्षित रखने की प्रार्थना की। अकबर ने ध्यानू भक्त की बात मान ली और उसे यात्रा करने की अनुमति भी मिल गई।

बादशाह से विदा होकर ध्यानू भक्त अपने साथियों सहित माता के दरबार मे जा उपस्थित हुआ। स्नान-पूजन आदि करने के बाद रात भर जागरण किया। प्रात:काल आरती के समय हाथ जोड़ कर ध्यानू ने प्राथना की कि मातेश्वरी आप अन्तर्यामी हैं। बादशाह मेरी भक्ती की परीक्षा ले रहा है, मेरी लाज रखना, मेरे घोड़े को अपनी कृपा व शक्ति से जीवित कर देना। कहते है की अपने भक्त की लाज रखते हुए माँ ने घोड़े को फिर से ज़िंदा कर दिया।

यह सब कुछ देखकर बादशाह अकबर हैरान हो गया। उसने अपनी सेना बुलाई और खुद मंदिर की तरफ चल पड़ा। वहाँ पहुँच कर फिर उसके मन में शंका हुई। उसने अपनी सेना से मां की ज्योतियों को बुझाने के लिए अकबर नहर बनवाया लेकिन मां के चमत्कार से ज्योतियां नहीं बुझ पाईं। इसके बाद अकबर मां के चरणों में पहुंचा लेकिन उसको अहंकार हुआ था कि उसने सवा मन (पचास किलो) सोने का छत्र हिंदू मंदिर में चढ़ाया है। इसलिये ज्वाला माता ने वह छतर कबूल नहीं किया, इसे लोहे का बना (खंडित) दिया था।

आप आज भी वह बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में देख सकते हैं जब माँ ने अकबर का घम्मंड दूर कर दिया था और अकबर भी माँ का सेवक बन गया था,तब अकबर ने भी माँ के भगतो के लिए वहाँ सराय बनवाए।

पृत्वी के गर्भ से इस तरह की ज्वाला निकलना वैसे कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि पृथ्वी की अंदरूनी हलचल के कारण पूरी दुनिया में कहीं ज्वाला कहीं गरम पानी निकलता रहता है। कहीं-कहीं तो बाकायदा पावर हाऊस भी बनाए गए हैं, जिनसे बिजली उत्पादित की जाती है। लेकिन यहाँ पर ज्वाला प्राकर्तिक न होकर चमत्कारिक है क्योंकि अंग्रेजी काल में अंग्रेजों ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा दिया कि जमीन के अन्दर से निकलती ‘ऊर्जा’ का इस्तेमाल किया जाए। कुछ वर्ष पहले ONGC ने भी Gas Resources ढूंढे, लेकिन लाख कोशिश करने पर भी वे इस ‘ऊर्जा’ के श्रोत को नहीं ढूंढ पाए। वही अकबर लाख कोशिशों के बाद भी इसे बुझा न पाए। यह दोनों बाते यह सिद्ध करती है की यहां ज्वाला चमत्कारी रूप से ही निकलती है ना कि प्राकृतिक रूप से, नहीं तो आज यहां मंदिर की जगह मशीनें लगी होतीं और बिजली का उत्पादन होता।

अंधविश्वास ठहराने वालों को जबाब

अगर घोड़े का सर नही जुड़ा होता तो, अकबर जैसा कट्टर मुसलमान दिल्ली से हिमाचल प्रदेश क्यों जायेगा छत्र चढ़ाने ? गया भी तो दुबारा ज्वाला माँ का परीक्षा लेने ही ! अगर आप कहते हैं की अकबर बड़ा धार्मिक था तो वो आगरा से करीब वाराणसी मे कभी भोलेनाथ को जल चढ़ने क्यों नही गया ? इतनी दूर ज्वाला मंदिर ही क्यों गया ?

नीच अकबर दो बार ज्वाला माता का परीक्षा लिया अपने समर्थ्या भर उसने उन्हे हराने की कोशिस भी की जब उसका बस नही चला तो हार मान माता की शरण मे छात्र चढ़ाने गया ! इसमे माता की महिमा है और अकबर की नीचता ! इसी तरह कभी अपने पीर-मजर दरगाह या कुरान की परीक्षा क्यों नही लिया अकबर ?

अगर अकबर अपने प्रयास मे सफल हो गया होता, तो आज आप पढ रहे होते की वहाँ ज्वाला माता का मंदिर हुआ करता था जिसे तोड मस्जिद बना दिया गया !
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ओम प्रकाश त्रेहन

हिन्दू को अपने अस्तित्व को प्रखर और मुखर बनाना है तो शिवाजी को राष्ट्र के महा नायक के रूप में स्थापित किया जाना है

शिवाजी की लड़ाइयों में से एक लड़ाई उंबरखिंड की लड़ाई थी, जो तीन फ़रवरी 1661 को लड़ी गयी थी। इस लड़ाई के बारे में बहुत कम जानकारी है।
शायस्ता खान जो बाद में उँगलियाँ कटवाकर ही दुम दबाकर भागा था, उसने एक उज़बेक सरदार को शिवाजी को मारने के लिए रवाना किया। करतलब खान कोंकण के इलाके को फतह करने के हुक्म के साथ 30,000 सिपाहियों को लेकर रवाना हुआ। उसका इरादा खंडाला घाट की तरफ से पनवेल की ओर बढ़कर शिवाजी को चौंका देने का था। मजबूत गुप्तचर दल रखने वाले शिवाजी तक जब ये खबर पहुंची तो उन्होंने घोषणा की कि वो पनवेल की तरफ बढ़ रहे हैं।

जासूसों के मार्फ़त करतलब खान को ये खबर मिली तो उसने एक दूसरा, कम इस्तेमाल होने वाला रास्ता चुना। करतलब खान चिंचवड़, तलेगाओं, और मालवली से होता हुआ लोहागढ़ की तरफ मुड़ा। ये वो घाटी है जिसे छोड़कर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने कोंकण की तरफ से रेलवे लाइन बिछाई थी। उंबरखिंड की ये घाटी, कोंकण की तुलना में काफी संकरी है। खान तक जब ये खबर पहुंची कि शिवाजी और उसके सेना पेन नाम की जगह पर हैं, जो लोनावला से मुश्किल से पांच किलोमीटर होगी तो वो तेजी से फ़ौज लेकर जंगलों को पार करके शिवाजी को चौंकाने चला।

उंबरखिंड की पहाड़ियों पर शिवाजी अपने करीब 1000 मावला सैनिकों के साथ पहले ही तैयार थे! जबतक करतलब खान की फ़ौज घाटी के निचले हिस्से तक आई तबतक शिवाजी के सैनिक सामने की पहाड़ियों पर पत्थरों के साथ तैनात थे। अब आगे की तरफ से करतलब खान के तीस हजार सिपाहियों पर पत्थर बरस रहे थे, और पीछे हटने की कोशिश में उनपर तीर और बंदूकों की मार पड़ती थी। मुश्किल से तीन-चार घंटे चले युद्ध में ही करतलब खान की फौज़ का सफाया हो गया।

बची-खुची फौज़ के साथ जब करतलब खान ने आत्मसमर्पण किया तो उसके सैनिकों को मराठा सेना में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था। वो हथियार, घोड़े या रसद लेकर वापस नहीं जा सकते थे। इस तरह 1000 मावला सैनिकों के साथ शिवाजी ने उंबरखिंड की लड़ाई में इस्लामिक हमलावरों को छठी का दूध याद दिलाया था।
हिन्दू को अपने अस्तित्व को प्रखर और मुखर बनाना है तो शिवाजी को राष्ट्र के महा नायक के रूप में स्थापित किया जाना है

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कश्मीर के आखिरी राजा हरिसिह ने शेखअब्दुल्ला को देशद्रोह के आरोप मे जेल मे डाला था,शेखअब्दुल्ला के वकील
जवाहर लाल नेहरु
थे !

कश्मीर के हिंदू राजा हरिसिंह ने भरे दरबार में जवाहरलाल नेहरु को थप्पड़ भी मारा था
पूरी कहानी पढ़िए …. ————

आप लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील था लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केस नहीं लड़ा ॥

बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया ॥

शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी , जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं , वह बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं , महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं ॥

राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है , बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते , अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं ॥

नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने गुस्सा में आकर नेहरु को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा ॥ तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया ॥

कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा इसीलिए बताते हैं कि कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था ॥

सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 1955 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा —- नहीं अभी वह परिस्थितियां नहीं आई है कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके ॥ इस प्रकार उस पत्र को प्रधानमंत्री नेहरू ने ठुकरा दिया था और उसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहा है ॥

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रानी वेलु नचियार और आत्मघाती हमले
By :- Anand Kumar

वेलु नचियार रामनद राज्य की राजधानी रामनाथपुरम से शासन करने वाले राजा चेल्लामुथु सेथुपरी और रानी सकंधीमुथल की इकलौती बेटी थी। वलारी और सिलंबम जैसी युद्ध कलाओं के अलावा वो अंग्रेजी फ्रेंच, उर्दू जैसी कई भाषाएँ भी जानती थी। उनकी शादी शिवगंगे के राजा से हुई जिस से उन्हें एक बेटी थी। आजादी के लिए इसाई हमलावरों के खिलाफ लड़ने वाली पहली रानी, दक्षिण भारत की वेलु नचियार थी। वो 1750-1800 के दौर की थीं, यानि भारत के पहले बड़े स्वतंत्रता संग्राम से करीब सौ साल पहले लड़ रही थीं।

अर्कोट के नवाब के साथ मिलकर इसाई हमलावरों ने उनके पति को मार डाला तो उन्हें युद्ध में शामिल होना पड़ा। अपनी बेटी के साठ वो कोपल्ला नायक्कर के संरक्षण में डिंडीगुल भाग गई और आठ साल वहीँ से संघर्ष किया। इसी दौरान उन्होंने गोपाल नायक्कर और हैदर अली से भी संधि की और 1780 में उनके आक्रमण कामयाब होने लगे। ये हमले महत्वपूर्ण क्यों हैं ? इसलिए क्योंकि इन आक्रमणों में पहले आधुनिक काल के युद्धों में पहले हिन्दू आत्मघाती हमले का जिक्र यहीं मिलता है। फिरंगियों से अपना राज्य वापस लेने के लिए रानी वेलु नचियार ने सबसे पहले आत्मघाती हमले और महिलाओं की सैन्य टुकड़ियों का इस्तेमाल किया था।

अपनी गोद ली हुई बेटी उदैयाल के नाम पर ही उनकी स्त्री सैन्य टुकड़ी का नाम उदैयाल था। उन्होंने ढूंढ निकाला कि फिरंगियों ने अपना गोला बारूद किले में कहाँ इकठ्ठा कर रखा है। रानी की बेटी, उदैयाल ने शरीर पर तेल डाला और गोला बारूद के गोदाम में खुद को आग लगा कर घुस गई। बारूद का भयावह विस्फोट और तोपों के नाकाम होते ही रानी की जीत पक्की हो गई थी। रानी वेलु नचियार इसलिए भी महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि तमिल लोककथाओं और लोकगीतों की ये नायिका भारत की वो इकलौती रानी थी जिसने फिरंगी भेड़ियों के जबड़े से अपना राज्य वापस छीन लिया था। उनके अलावा किसी ने अपना राज्य फिरंगियों से वापस जीतने में कामयाबी नहीं पाई थी।
1780 में ही मरुदु बंधुओं को उनके इलाके के काम-काज सम्बन्धी अधिकार उन्होंने दिए थे। बाद में उनकी बेटी वेल्लाची ने 1790 में उनके उत्तराधिकारी के रूप में शासन संभाला। रानी वेलु नचियार की मृत्यु 25 दिसम्बर, 1796 को हुई थी।

रानी वेलु नचियार और उनकी बेटी उदैयाल की कहानी इसलिए याद आई क्योंकि भारतीय हिन्दू बार बार आत्मघाती फिदायीनों का हमला झेलते तो हैं, लेकिन खुद उसका इस्तेमाल करना, या उसे पहचानना भूल जाते हैं। वो भूल जाते हैं कि जो खुद के पेट पर बम बांध कर लोगों को मारने पर तुला हो, उसके मानवाधिकारों की बात करना मतलब उसके दर्जनों शिकारों के मानवाधिकारों से इनकार करना है। मानवाधिकार हैं भी तो पहले किसके हैं ? शोषित-पीड़ित आम नागरिक के जो कानूनों का पालन करता देश का संविधान मान रहा है या उसके जो कानूनों को ताक पर रखकर कत्ले-आम पर अमादा है ? अपराधों पर जेल जाता तो भी वोट देने जैस नागरिक अधिकार नहीं रहते, ऐसे व्यक्ति के मानवाधिकारों की जिम्मेदारी राज्य पर कैसे है ?

फिदायीन हमलावर को पहचानना इसलिए भी ज्यादा जरूरी है क्योंकि वो आतंक फैलाने के लिए आम लोगों की निहत्थी भीड़ पर ही हमला करेगा। वो अपने आकाओं को बचाने के लिए ऐसे हमले कर रहा है। उसे अपनी जिहादी सोच फैलाकर ज्यादा से ज्यादा लोगों को डराना है। वो विरोध के हर स्वर को कुचल कर खामोश कर देना चाहता है। वो मीडिया मुगलों जैसा है जो आज अंकित सक्सेना की हत्या पर दोमुंहा रवैया दिखा कर आपका निशाना बदलना चाहते हैं। मुद्दा था कि ऑटो रिक्शा वाले रविन्द्र, डॉ. नारंग, चन्दन गुप्ता सबकी हत्या में जो सच दिख रहा है, उसे देखने से इनकार क्यों किया जा रहा है ? आई.एस.आई.एस. जैसा सर कलम करने की घटनाओं में इस्लामिक जिहाद के सच की तरफ आँखे खुलती क्यों नहीं हैं ?

आप सोचते हैं कि तैरना नहीं आता तो क्या ? आपको कौन सा समंदर में जाकर गोता लगाना है ! लेकिन यहाँ समंदर तो घर में घुस आया है मियां ! सवाल ये भी है कि मियां अब तैरना सीखेंगे या सेकुलरिज्म की पट्टी आँख पर बांधे रखनी है !

दिल्ली के अंकित सक्सेना की मौत और पेड मीडिया के बर्ताव पर अजित भारती का लेख

“पति को मारकर ले जाना मंजरी को ! ऐसे तो नहीं ले जाने दूँगी”, मंजरी की माँ ने कहा। ये भोजपुरी लोककथा की नायिका, मंजरी, मेहरा नाम के एक यादव सरदार की बेटी थी। ये लोककथा कहीं ना कहीं ये भी दर्शा देती है कि “उठा ले जाने” से बचाने के लिए विवाह कर देने की परंपरा कैसे शुरू हुई होगी। इस लोककथा के शुरू होने का समय करीब वही रहा होगा जो आज के महाराष्ट्र-गुजरात के कुछ इलाकों में यादव राजवंश के शासन का काल था। करीब इसी से थोड़ा पहले राजा सुहेलदेव राजभर ने गज़नवी के भांजे-भतीजे, “गाज़ी सलार मसूद” और उसकी फौज़ को खदेड़ कर गाजर-मूलियों की तरह काटा था।

कहानी कुछ यूँ है कि अगोरी नाम के राज्य में मोलागत नाम के राजा का शासन था। मेहरा नाम का सरदार शायद सत्ता को चुनौती देने लायक शक्तिशाली हो चला होगा, तो ऐसी ही किसी वजह से राजा मोलागत, मेहरा से जलते थे। उसे नीचा दिखाने के लिए उन्होंने मेहरा तो जूआ खेलने का न्योता भेजा। उम्मीद के मुताबिक राजा मोलागत जीत नहीं पाए, उल्टा अपना राज-पाट भी हार गए। निराश हारे हुए राजा जब अपने भूतपूर्व हो चुके राज्य से जा रहे थे, तो भेष बदले ब्रह्मा, उनपर तरस खा के, उनके पास आये। उन्होंने राजा को कुछ सिक्के दिए और कहा इनको दांव पर लगाओ तो जीतोगे।

राजा मोलागत वापस आये और मेहरा से फिर से एक बाजी खेली। इस बार मेहरा हारने लगे, हारते हारते वो अपनी गर्भवती पत्नी के पेट में पल रहे बच्चे को भी हार गए। राजा मोलागत को अपना राज्य वापस मिल गया था तो ज्यादा लालच करने की जरुरत नहीं रह गई थी। उन्होंने कहा कि अगर होने वाली संतान लड़का हुआ तो वो अस्तबल में काम करेगा, अगर लड़की हुई तो उसे रानी की सेवा में रखा जाएगा। हारा मेहरा लौट गया। समय बीतने पर जब संतान का जन्म हुआ तो वो एक अद्भुत सी लड़की थी। राजा के आदमी जब उसे लेने आये तो इस लड़की की माँ ने कहा, इसे ऐसे नहीं ले जा सकते ! इसके पति को युद्ध में जीतकर मार देना तो इसे ले जा कर नौकर रखना।

समाजशास्त्रियों की कथाओं को मानें तो उस काल में ऐसा होना नहीं चाहिए था। स्त्रियों को बोलने, अपनी राय रखने, या संपत्ति पर अधिकार जैसा कुछ नहीं जताना चाहिए। आश्चर्यजनक ये भी है कि इस लोककथा के काफी बाद के यानि मराठा काल तक भी जब मंदिरों का निर्माण देखें तो भूमि और बनाने-जीर्णोद्धार की आज्ञा रानी अहिल्याबाई होल्कर और कई अन्य रानियों की निकल आती है। पता नहीं क्यों पैत्रिक संपत्ति में स्त्रियों के हिस्से के लिए दायभाग और सम्बन्धियों में “दायाद” या “दियाद” जैसे शब्द भी मिल जाते हैं। हो सकता है समाजशास्त्री कल्पनाओं में पूरा सच ना बताया गया हो।

खैर तो लोककथा में आगे कुछ यूँ हुआ कि मेहरा की ये सातवीं संतान अनोखी थी। उसे अपने पूर्वजन्मों की याद थी और उसके आधार पर उसने अपनी माँ को बताया कि आप लोग बलिया नाम की जगह पर लोरिक को ढूंढें। मेहरा लोरिक के घर जाते हैं और शादी भी तय हो जाती है। लोककथा की अतिशयोक्ति जैसा ही लोरिक डेढ़ लाख बारातियों के साथ मंजरी से शादी के लिए आते हैं। राजा मोलागत को जब इसका पता चलता है तो उनकी सेना भी युद्ध के लिए सजती है। लड़ाई होती है मगर लोरिक जीत नहीं पा रहे थे। उनकी हार की संभावना देखकर मंजरी फिर से सलाह देती है।

वो बताती है कि अगोरी के किले के पास ही गोठानी गाँव है जहाँ भगवान शिव का मंदिर है। अगर लोरिक वहां शिव की उपासना करे तो उसे जीत का वर मिल सकता है। लोरिक ऐसा ही करता है और जीत जाता है। दोनों की शादी होती है और विदाई से पहले मंजरी कहती है कि कुछ ऐसा करो जिस से लोग लोरिक-मंजरी के प्रेम को सदियों याद रखें। कुछ कथाएँ कहती हैं कि मंजरी देखना चाहती थी कि आखिर तलवार का वो कैसा वार था जिसने राजा को हरा दिया ? उसके पूछने पर लोरिक वहीँ पास की चट्टान पर तलवार चला देता है। कहते हैं पहले वार में चट्टान का एक टुकड़ा नीचे खाई में जा गिरा और मंजरी उतने से खुश नहीं हुई। दूसरी बार फिर से वार करने पर चट्टान आधी कटी।

मंजरी-लोरिक की कहानी के ये पत्थर जमाने से यहीं खड़े हैं। कहते हैं यहाँ से प्रेमी कभी मायूस नहीं लौटते। हर साल गोवर्धन पूजा पर उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले में यहाँ पर मेला लगता है। रोबर्ट्सगंज नाम क्यों और कैसे, किसने रख दिया, ये हमें मालूम नहीं। जहाँ तक कला का प्रश्न है, कुछ लोगों को पिकासो जैसों की ना समझ में आती ऐबस्ट्रैक्ट पेंटिंग पसंद आती है, कुछ को माइकल एंजेलो जैसों की स्पष्ट कहानियों पर बनी तस्वीरें अच्छी लगती है। कला का ही मामला देखें तो आप ताजमहल पर अकाल के दौर में करोड़ों के खर्च में विद्रूपता भी देख सकते हैं। प्रेम की निशानी इस साधारण से आधे कटे चट्टान में सौन्दर्य भी दिख सकता है।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी अब्बक्का जैसी अंग्रेजों की गुलामी से ठीक पहले की रानियों का जिक्र होते ही एक सवाल दिमाग में आता है | युद्ध तलवारों से, तीरों से, भाले – फरसे जैसे हथियारों से लड़ा जाता था उस ज़माने में तो ! इनमे से कोई भी 5-7 किलो से कम वजन का नहीं होता | इतने भारी हथियारों के साथ दिन भर लड़ने के लिए stamina भी चाहिए और training भी |

रानी के साथ साथ उनकी सहेलियों, बेटियों, भतीजियों, दासियों के भी युद्ध में भाग लेने का जिक्र आता है | इन सब ने ये हथियार चलाने सीखे कैसे ? घुड़सवारी भी कोई महीने भर में सीख लेने की चीज़ नहीं है | उसमे भी दो चार साल की practice चाहिए | ढेर सारी खुली जगह भी चाहिए इन सब की training के लिए | Battle formation या व्यूह भी पता होना चाहिए युद्ध लड़ने के लिए, पहाड़ी और समतल, नदी और मैदानों में लड़ने के तरीके भी अलग अलग होते हैं | उन्हें सिखाने के लिए तो कागज़ कलम से सिखाना पड़ता है या बरसों युद्ध में भाग ले कर ही सीखा जा सकता है |

अभी का इतिहास हमें बताता है की पुराने ज़माने में लड़कियों को शिक्षा तो दी ही नहीं जाती थी | उनके गुरुकुल भी नहीं होते थे ! फिर ये सारी महिलाएं युद्ध लड़ना सीख कैसे गईं ? ब्राम्हणों के मन्त्र – बल से हुआ था या कोई और तरीका था सिखाने का ?

लड़कियों की शिक्षा तो नहीं होती थी न ? लड़कियों के गुरुकुल भी नहीं ही होते थे ?
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आनन्द कुमार