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🔰सिन्धु घाटी की लिपि : क्यों अंग्रेज़ और कम्युनिस्ट इतिहासकार नहीं चाहते थे कि इसे पढ़ाया जाए! 🔰
▪️इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी ने कहा था – विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है।
भारतीय इतिहास का प्रारम्भ सिन्धु घाटी की सभ्यता से होता है, इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है। बताया जाता है, कि वर्तमान सिन्धु नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूर्व) में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। मोहनजोदारो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि इस सभ्यता के नगर थे।

पहले इस सभ्यता का विस्तार सिंध, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता था, किन्तु अब इसका विस्तार समूचा भारत, तमिलनाडु से वैशाली बिहार तक, आज का पूरा पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान तथा (पारस) ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है। अब इसका समय 7000 BC से भी प्राचीन पाया गया है।

इस प्राचीन सभ्यता की सीलों, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिन्धु घाटी की लिपि कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है, कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है, और पढ़ी नहीं जा सकी। जबकि सिन्धु घाटी की लिपि से समकक्ष और तथाकथित प्राचीन सभी लिपियां जैसे इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई आदि सब पढ़ ली गयी हैं।

आजकल कम्प्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर मार्कोव विधि से प्राचीन भाषा को पढना सरल हो गया है।

सिन्धु घाटी की लिपि को जानबूझ कर नहीं पढ़ा गया और न ही इसको पढने के सार्थक प्रयास किये गए।
भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद (Indian Council of Historical Research) जिस पर पहले अंग्रेजो और फिर कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा, ने सिन्धु घाटी की लिपि को पढने की कोई भी विशेष योजना नहीं चलायी।

आखिर ऐसा क्या था सिन्धु घाटी की लिपि में? अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे, कि सिन्धु घाटी की लिपि को पढ़ा जाए?

अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों की नज़रों में सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्नलिखित खतरे थे –

  1. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने के बाद उसकी प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जायेगी। इजिप्ट, चीनी, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा, कि यह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। भारत का महत्व बढेगा जो अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा।
  2. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने से अगर वह वैदिक सभ्यता साबित हो गयी तो अंग्रेजो और कम्युनिस्टों द्वारा फैलाये गए आर्य- द्रविड़ युद्ध वाले प्रोपगंडा के ध्वस्त हो जाने का डर है।
  3. अंग्रेज और कम्युनिस्ट इतिहासकारों द्वारा दुष्प्रचारित ‘आर्य बाहर से आई हुई आक्रमणकारी जाति है और इसने यहाँ के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उनकी महान सभ्यता नष्ट कर दी। वे लोग ही जंगलों में छुप गए, दक्षिण भारतीय (द्रविड़) बन गए, शूद्र व आदिवासी बन गए’, आदि आदि गलत साबित हो जायेगा।
    कुछ फर्जी इतिहासकार सिन्धु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे तो कुछ इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ इनको मुंडा आदिवासियों की भाषा, और तो और, कुछ इनको ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे। ये सारे प्रयास असफल साबित हुए।

सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्लिखित समस्याए बताई जाती है –
सभी लिपियों में अक्षर कम होते है, जैसे अंग्रेजी में 26, देवनागरी में 52 आदि, मगर सिन्धु घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर चिन्ह हैं। सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में यह कठिनाई आती है, कि इसका काल 7000 BC से 1500 BC तक का है, जिसमे लिपि में अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिश वेरिएशन बहुत पाया जाता है। लेखक ने लोथल और कालीबंगा में सिन्धु घाटी व हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्षों का अवलोकन किया।
भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक लिपि है जिसे ब्राह्मी लिपि कहा जाता है। इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओँ की लिपियां बनी। यह लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिमी भारत में उपयोग की जाती थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रन्थ ब्राह्मी लिपि में प्राप्त होते है।
सम्राट अशोक ने अपने धम्म का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्राह्मी लिपि को अपनाया। सम्राट अशोक के स्तम्भ और शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए और सम्पूर्ण भारत में लगाये गए।
सिन्धु घाटी की लिपि और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं है। साथ ही ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी पारस्परिक सम्बन्ध है। इस आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि को पढने का सार्थक प्रयास सुभाष काक और इरावाथम महादेवन ने किया।
सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षर के बारे में यह माना जाता है, कि इनमे कुछ वर्णमाला (स्वर व्यंजन मात्रा संख्या), कुछ यौगिक अक्षर और शेष चित्रलिपि हैं। अर्थात यह भाषा अक्षर और चित्रलिपि का संकलन समूह है। विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिन्धु घाटी की भाषा।
बाएं लिखी जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि भी दाएं से बाएं लिखी जाती है। सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त हैं।
इनमे वैसे तो 400 अक्षर चिन्ह हैं, लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80 प्रतिशत बार हुआ है। और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर है। अब हम इन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उनकी ध्वनि पता लगा सकते हैं।

ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि पढने पर सभी संस्कृत के शब्द आते है जैसे – श्री, अगस्त्य, मृग, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु, मूषिका, पग, पंच मशक, पितृ, अग्नि, सिन्धु, पुरम, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र आदि।
निष्कर्ष यह है कि –

  1. सिन्धु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि की पूर्वज लिपि है।
  2. सिन्धु घाटी की लिपि को ब्राह्मी के आधार पर पढ़ा जा सकता है।
  3. उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिन्धु घाटी की लिपि में लिखा गया था।
  4. सिन्धु घाटी के लोग वैदिक धर्म और संस्कृति मानते थे।
  5. वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन है।
    हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन व मूल सभ्यता है, हिन्दुओं का मूल निवास सप्त सैन्धव प्रदेश (सिन्धु सरस्वती क्षेत्र) था जिसका विस्तार ईरान से सम्पूर्ण भारत देश था।वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं बाहर से नहीं आये थे और न ही वे आक्रमणकारी थे। आर्य – द्रविड़ जैसी कोई भी दो पृथक जातियाँ नहीं थीं जिनमे परस्पर युद्ध हुआ हो।

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जब जब होय धरम कै हानी, बाढहिं असुर अधम अभिमानी,।
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा,
हरहि सदा भव सज्जन पीरा,।।
अपने धर्म पर विश्वास बनाए रखना,

कण कण में विष्णु बसें जन जन में श्रीराम,
प्राणों में माँ जानकी मन में बसे हनुमान।

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श्रीकाशी विश्वनाथ


नौशाद भाई को अस्सलाम वालेकुम..नौशाद भाई आप बंगाल से उत्तर प्रदेश आये हैं तो हमारे मेहमान हुए..आपका दर्द सुना मैंने…महसूस भी किया..और हम हिंदू किसी धर्मस्थल से जुड़ा दर्द महसूस न करेंगे तो क्या अरब वाले करेंगे? नौशाद भाई , अब काशी की ट्रिप तो आपकी बेकार हो गई..आप मेरे साथ चलो घूमने..बनारस से हम लोग दिल्ली चलेंगे..वहाँ मैं तुम्हें अपने पुरखों के बनाये विष्णु स्तंभऔर जैन मंदिर कॉम्प्लेक्स दिखवाऊंगा… एक इस्लामी शासक ने उन्हें तोड़कर उनका नाम कुतुबमीनार रख दिया …वहीं एक बहुत प्राचीन मंदिर है कालका जी मंदिर…पुराना वाला तो एक इस्लामी शासक ने तुड़वा दिया था..ये वाला हमने उसके मरने के तुरंत बाद बनवा लिया था…वहां से हम मथुरा चलेंगे..वहां मेरे कृष्ण भगवान की जन्मभूमि है.. एक बहुत सुंदर मंदिर है वहां हालांकि जन्मभूमि वाली जगह पर जो ओरिजिनल मंदिर था उसे इस्लामी शासक औरंगजेब ने तुड़वा दिया था और मस्जिद बनवा दी थी. ..वहीं पास में वृंदावन है…वहां गोविंद देव मंदिर है..सात मंजिले इस मंदिर की चोटी पर जो दीपक जलते थे वे आगरा से देखे जा सकते थे..पर अब केवल 2 ही मंज़िल बची हैं क्योंकि बाकी की उसी इस्लामिक शासक औरंगजेब ने तुड़वा दी थीं. इस्लाम के नाम पर… फिर तुम मेरे शहर चलना..मेरे पुरखे बताते थे वहाँ की जामा मस्जिद को मेरा एक मंदिर तोड़कर उसके ऊपर बनाया गया है..तुम देखना उसे..वहीँ से हम जगन्नाथपुरी चलेंगे.. बहुत भव्य मंदिर है पर दिल्ली के एक इस्लामी शासक ने उसे 1670 के आस पास तुड़वा दिया था …अब तो फिर से बहुत सुंदर बन चुका है..वहीँ मैं तुम्हें एक मूर्ति दिखाउंगा.. मूर्ति माने बुत. ..जिसकी नाक उन्हीं लोगों ने तोड़ दी थी जो मंदिर तोड़ने आये थे..वहीँ पास में कोणार्क का सूर्य मंदिर देखने भी चलेंगे.. बहुत भव्य मंदिर है..बहुत विशाल..सैंकडों मूर्तियां है..सब मूर्तियों की एक खासियत है…पता है क्या? इन सब में से कोई एक भी ऐसी न है जिसकी आँख /नाक/मुंह/कान न तोड़े दिए गये हों.. ये भी इस्लाम के नाम ही टूटे थे..नौशाद भाई.. आप बताना मुझे पूछकर कि वो कौन सा खुदा है जो एक बेजुबान मूर्ति से इतना डरता है कि तुड़वा देता है? खैर कोई न ..यहां से हम नगरकोट/कांगड़ा देवी चलेंगे..ये हिमाचल प्रदेश में है..बहुत सिद्ध पीठ है..ग़ज़नवी से लेकर अकबर तक सबने लूटा है इसे..पहले बहुत बड़ा मंदिर था..200 गाये बंधी रहती थीं प्रांगड़ में…मज़हबी आक्रमणकारियों ने मंदिर लूटा.. फिर गाये काटीं.. उनका रक्त जूतों में भरकर वो जूते मंदिर की दीवारों पर फेंक दिए..खैर..फिर कश्मीर चलेंगे.. वहां अनन्त नाग जिले में हमारा मार्तण्ड सूर्य मंदिर है..मंदिर क्या है बस कुछ दीवारें हैं बची हुई..मंदिर को एक इस्लामी शासक ने तुड़वा दिया..पूरा टूट न सका तो उसमें आग लगवा दी थी…सिकन्दर बुतशिकन नाम था उसका.. और भी बहुत कुछ है दिखाने को..लंबा टूर है..नौशाद भाई आप चलोगे न मेरे साथ?सजल गुप्ता जी की वाल से

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बाबा विश्वनाथ


बाबा विश्वनाथ के नवीन प्रांगण को देखकर फारसी भाषा में लिखे गए कुल्लियात-ए-बरहमन नामक औरंगजेब कालीन दस्तावेज में दर्ज एक बूढ़े ब्राह्मण से जुड़ी घटना फिर से कागज़ों से बाहर झांकने लगी है । संभवतः इसका प्रामाणिक उल्लेख काशी का इतिहास नामक ग्रंथ में अथवा कुबेर शुकुल द्वारा लिखित वाराणसी इतिहास-वैभव में मिलता है।

कथा के अनुसार, ईस्वी सन् 1669 में अप्रैल महीने की 18 तारीक को औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को ज़मींदोज़ करने का फरमान जारी किया। इसके पहले अविमुक्तेश्वर काशीविश्वनाथ मंदिर तोड़ने की शुरूआत मुहम्मद गोरी ने की थी। ई. सन1194 में पहली बार कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गोरी के आदेश पर विश्वनाथ जी के मंदिर समेत एक हजार से ज्यादा मंदिरों को ध्वस्त करते हुए पूरे उत्तर भारत को बरबाद कर रख दिया। लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ। यही समय था कि पृथ्वीराज चौहान और जयचंद आपसी कटुता में खुद के साथ देश की राजनीति का सारा दांव मुस्लिम हमलावरों के सामने हार चुके थे। इस्लाम की खूनी तलवार ई. सन 1002-1024 के दरम्यान सोमनाथ मंदिर को पूरी तरह से कई बार लूटमारकर ध्वस्त कर चुकी थी। सौराष्ट्र, गुजरात में यह खूनी खेल पूरा कर चुकने के करीब 170 साल बाद गंगा के मैदान में चारों ओर रक्त ही रक्त फैल गया था। जिंदा रहने की एक आस बची, और कुछ भी तो नहीं बचा।

फिर तो आने वाली हर सदी में मानो एक खेल हो गया। गणराज्य बार बार इस्लाम की खूनी तलवार से भिड़ते रहे। कटते रहे, लड़ते रहे लेकिन गिरकर भी फिर फिर उठने की जिजीविषा खत्म नहीं हुई। यही कारण है कि काशी में विश्वनाथ जी मौका देखते ही फिर से मौके पर अपनी जगह बना लेते थे, टूटने और बनने का सिलसिला हर सदी और दशक में चलने लगा। दिल्ली और आगरे में इंतजामों से इस्लाम की सियासी तलवार को जब भी फुरसत मिलती, वह फिर से विश्वनाथ मंदिर समेत हर मंदिर को ज़मींदोज करने में कसर नहीं छोड़ते। कुतुबुद्दीन के बाद रजिया सुल्तान, फिर खिलजी, उसके बाद फिरोज तुगलक(1351-1388), उसके बाद शरकी बादशाहों ने, फिर सिकन्दर लोदी( ई.1494) आदि ने वाराणसी समेत उत्तर भारत को तहस-नहस कर सारे बड़े केंद्रों को बरबाद कर डाला।

वो बार-बार तोड़ते जाते थे लेकिन हार न मानने वाला समाज और उसका नेतृत्व हर बार मौका देखते ही विश्वनाथ मंदिर को मिट्टी से उठाकर फिर से उसका ध्वज आसमान तक तान देते थे। अस्तित्व बचाने के इस विकट संघर्ष में अकबर का समय ही अपवाद था। अकबर के समय ईस्वी सन 1580-85 के आस-पास राजा मान सिंह और राजा टोडरमल ने विश्वनाथ मंदिर का भव्यतम मंदिर शिखर फिर से वहीं पर खड़ा कर दिया, जहां आज ज्ञानवापी मस्जिद है। मस्जिद के पीछे के मंदिर के खंडहर मानसिंह और टोडरमल के बनाए मंदिर के प्राचीन अवशेष हैं। लेकिन यह शिखर भी लंबे समय तक मुस्लिम सूबेदारों को सहन नहीं हुआ। औरगंजेब के समय 18 अप्रैल 1669 ई. सन में मुगलिया स्टेट यानी सरकार के द्वारा दिया गया ये छठवां आदेश था कि विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त कर दिया जाए।

और सूबेदार ने बेहद तेजी दिखाते हुए ध्वस्तीकरण का सारा काम फरमान के मुताबिक पूरा कर दिया। हजारों निरपराध हिन्दुओं का कत्लेआम करते हुए सूबेदार ने माधवराव का धौरहरा, काशी विश्वनाथ समेत बिन्दु माधव का धौरहरा और हरतीरथ में एक अन्य भव्य मंदिर तोड़कर आलमगीर के नाम से तीन-तीन मस्जिदों का निर्माण पूरा कर दिया। इस काम की पूरी विस्तृत खबर सूबेदार ने जहांपनाह की खिदमत में लिखकर भेज दी। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को दरबार में पूरी सूचना मिली कि सरकार के आदेशानुसार, उसके अमलों ने विश्वनाथ मंदिर समेत पूरा शहर ही नेस्तनाबूद कर दिया है।

खबर सुनकर औरंगजेब खुशी से फूला न समाया। उस समय औरंगजेब के दरबार में एक बूढ़े 80-90 साल के ब्राह्मण जिनका असल नाम चंद्रभानु था और उन्हें जहांगीर, शाहजहां के समय से दरबार में फारसी शेरो शायरी और साहित्य आदि के सिलसिले में रखा गया था। औरंगजेब के समय भी वह दरबार में फारसी खतो-किताबत में जुटे रहते थे किन्तु धरम के पक्के थे। 90 साल की उम्र थी, मौत का कोई भय भी नहीं था। दरबार के कितने ही हाकिम उन्हें मुसलमान बना पाने में नाकाम थे, इसीलिए औरंगजेब हमेशा उन्हें चिढ़ाने के लिए कुछ ना कुछ व्यंग्य बोलता था।

काशी विश्वनाथ की जगह मस्जिद तामीर की खबर पाते ही इन्हीं बरहमन से औरंगजेब ने उछलते हुए पूछा-‘अरे बरहमन, तुम्हारे काशी विश्वनाथ की जगह अब मस्जिदे आलमगीर बन चुकी है। अपने विश्वनाथ के बारे में अब तुम्हारा क्या ख्याल है?’ उस बूढ़े ब्राह्मण ने बेधड़क उत्तर दिया-‘जहांपनाह शेर हाजिर है, आपका हुक्म हो तो अर्ज कर दूं।’ औरंगजेब का हुक्म मिलते ही बरहमन फारसी भाषा में ही भरे दरबार में गरज उठे-

बेबीन करामातेबुतखान-ए-मरा ऐ शेख, कि चूं खराबशवद खान-ए-खुदा गरदद। (कुल्लियात-ए- बरहमन से उद्धृत)

अर्थात, ऐ शेख, हमारे विश्वनाथ का यह कौतुक तो देखिए कि उनके हट जाने पर ही आपके खुदा की वहां तक पहुंच हो पाई। जहांपनाह ये समझ लें कि उस जमीन पर विश्वनाथ के मौजूद रहते पहुंचने की हिम्मत खुदा में है ही नहीं।

बरहमन की बात सुनते ही औरगंजेब गुस्से में दांत पीसने लगा। उसके कारिंदे बरहमन को घूरने लगे। कितनों की मुट्ठियां म्यान के हत्थे से टकरा उठीं कि अब नहीं तब बादशाह का आदेश हो।
बरहमन को लेकिन मौत का भय नहीं था। बोलते रहे कि-एक दिन आएगा और देख लीजिएगा कि विश्वनाथ फिर से अपनी जगह आ विराजेंगे और आपके खुदा उनकी ओर देखकर शरम से मुंह चुराते घूमेंगे। और जो तोड़ना है तो तोड़ते रहिए। मुझ बूढ़े को चिढ़ाना बंद कर दीजिए। क्योंकि आपके बापजान शाहजहां साहेब भी अक्सर मुझे ऐसे ही चिढ़ाते थे, लेकिन उनका क्या हुआ? आपसे बेहतर कौन जानता है। तब भी मैंने उनसे कहा था-

मरा दिलेस्त बकुफ्रआश्ना कि सदबारश, बकाबा बर्दम व बाजश बरहमन आबुर्दम।। (कुल्लियात-ए- बरहमन)
यानि कि मेरा दिल मेरे हिन्दू धर्म में इतना डूबा हुआ है कि यदि सौ बार काबा जाऊं तो भी वहां से ब्राह्मण रहकर ही लौटूंगा। मुझे मुसलमान बनाकर काबा भेजने की कोशिश मत करिए। काबा जाऊंगा तो भी जाने कब लौटकर विश्वनाथ की शरण में ही चला जाऊंगा।

फिर क्या था। औरंगजेब दांत पीसता हुआ भरे दरबार से उठकर चला गया। चाहता तो एक 90 साल के बूढ़े बरहमन की गर्दन धड़ से उड़वा सकता था लेकिन संभवतः उसे अहसास हो गया था कि तलवार की धारों और अत्याचारों से यह धर्म झुकने वाला नहीं। जिस विश्वनाथ को मानने वाले ऐसे निडर आस्था से भरे लोग हैं तो फिर इस सनातन हिन्दू धर्म और इनके भगवान विश्वनाथ को तलवार की धार से मिटा पाना किसी भी भांति संभव नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कलश में गंगाजल भरकर भगवान विश्वनाथ के भव्य प्रांगण की ओर बढ़ते सबने देखा। सबका मनआंगन आनन्द से भर उठा।

गर्भगृह में पंडितों ने उन्हें इस महानतम ऐतिहासिक कार्य के लिए शुभकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री ने भी विनत भाव से बाबा भोलेनाथ की ओर संकेत कर दिया। सब यही विश्वनाथ जी कर और करवा रहे हैं, इसमें मेरा कुछ नहीं है।

प्रधानमंत्री जी का यह विचार सुनते ही मुझे महाभारत का एक बहुत ही महत्व का आख्यान याद आ गया। यह आख्यान भगवान विश्वेश्वर काशी विश्वनाथ से ही जुड़ा बताया जाता है। द्रोण पर्व में इसका वर्णन आता है।

दरअसल, द्रोणाचार्य के मारे जाने के बाद आगबबूला द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामा आपे में नहीं रहे। वह पाण्डवों की सेना पर वज्र बनकर बरस पड़े। उन्होंने ऐसे दिव्य आग्नेय अस्त्र अर्जुन और उनकी सेना पर फेंके जो कि अकाट्य थे, और किसी का भी जान बचा पाना मुश्किल था। अर्जुन ने किसी तरह से उस हमले में अपनी और सेना के प्रमुख योद्धाओं की जान बचाई।

रात में अर्जुन जब अगले दिन के युद्ध की योजना बना रहे थे तो उन्हें बार बार दिन के युद्ध की स्मृति हो आती। वह हैरान व परेशान थे कि आखिर उनकी जान कैसे बच गई क्योंकि हमला भयानक और खतरनाक था। वह सोच में पड़े थे कि तभी महर्षि वेदव्यास मिलने आ पहुंचे। अर्जुन ने तब अश्वत्थामा के शस्त्र प्रयोग के बारे में महर्षि को जानकारी देते हुए एक आश्चर्यजनक अनुभव साझा किया।

अर्जुन ने भगवान वेदव्यास को बताया कि -गुरुदेव जब मैं युद्धभूमि में चारों ओर से घिर गया था तब मैंने देखा कि एक अग्नि के समान तेजस्वी पुरुष मेरे आगे आगे हाथ में जलता हुआ त्रिशूल लेकर चल रहा है।

अर्जुन जैसे कोई स्वप्न सुना रहा था कि मैं जिस दिशा में कौरवों को रोकने बढ़ता कि वह ज्योतिर्मय पुरुष पहले ही मैदान साफ कर देता था। उसके पैर पृथ्वी पर नहीं थे, उसका त्रिशूल उनसे कभी अलग नहीं होता था, उनके एक त्रिशूल से हजारों त्रिशूल निकलकर शत्रू सेना पर कहर ढा रहे थे।

हे व्यासजी सच कहता हूं कि लोगों को लग रहा था कि मैं शत्रुओं को मार रहा हूं लेकिन असल में तो मैं अवाक् होकर उस ज्योतिर्मय सूर्य से भी ज्यादा प्रखर उस पुरुष को ही देख रहा था, मैं तो केवल उनके पीछे पीछे चल रहा था, वह आगे आगे चलकर मेरे सारे शत्रुओं का सर्वनाश कर रहे थे। उन्होंने ही मुझे अश्वत्थामा के शस्त्रों से बचा लिया। वह कौन थे, मैं नहीं जान सका।

हे भगवान व्यास जी, मुझे बताइए कि आखिर वह महापुरुष कौन थे? कहां से आए थे, क्यों आए थे? जैसे मेरे धनुष और बाणों की दिशा वही तय कर रहे थे, अरे वही तो सब कर रहे थे, वो कौन थे।

अर्जुन ने जो कहा, उसे व्यासमुनि ने द्रोण पर्व में ज्यों का त्यों दर्ज किया था।
अग्रतो लक्षये यान्तं पुरुषं पावकप्रभम्।…ज्वलन्तं शूलमुद्यम्य यां दिशं प्रतिपद्यते। तस्यां दिशि विदीर्यन्ते शत्रवो मे महामुुने।..

अर्थात..मेरे आगे आगे वह अग्नि जैसे विराट पुरुष चल रहे थे…जिनका जलता त्रिशूल जिधर जाता, उधर ही शत्रूसेना साफ हो जाती थी…

को वै स पुरुषोत्तमः। शूलपाणिर्मया दृष्टस्तेजसा सूर्यसंनिभः। न पदभ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति…।।

आखिर वह महापुरुष कौन थे। हे व्यासजी, मैंने उस अग्निमय महापुरुष के हाथ में में जलता त्रिशूल देखा था, उनके पैर भूमि पर नहीं थे, त्रिशूल से हजारों त्रिशूल निकलकर शत्रुओँ को समाप्त कर रहे थे…वह मेरे आगे थे, मैं तो कुछ कर ही नहीं रहा था, सब कुछ वही कर रहे थे, आखिर वो कौन थे।

भगवान वेदव्यास ने बड़े भाव से हैरान हुए अर्जुन को देखा, मन ही मन बुदबुदाने लगे, अरे तुमने नहीं पहचाना, वही तो विश्वनाथ थे। कुछ देर तक अर्जुन की आंखों में झांककर फिर व्यासजी बोलने लगे कि अर्जुन, रणभूमि में जो तुम्हारे आगे आगे चलकर शत्रुओं का नाश कर रहे थे, वह साक्षात हर हर महादेव थे…। वह वही विश्वेश्वर महादेव थे…।..वह साक्षात वही शंकर थे जो श्मशानभूमि काशीपुरी में निवास करते हैं…।

महादेवं हरं स्थाणु वरदं…।.विश्वेश्वरम् विश्वनरं कर्मणामीश्वरं प्रभुम…। स महादेवः पूज्यमानो महेश्वरः…। दृष्टवानसि शंकरम्..।..एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः।।
हरहर महादेव हैं वो, विश्वेश्वर विश्वनाथ, सब कर्मों के ईश्वर मेरे प्रभु वही महादेव, सब देवों के देव, पूज्य वही महेश्वर जिन्हें यह संसार शंकर के नाम से देखता और जानता है, वही जो काशीपुरी के महाश्मशान में निवास करते हैं।…अर्जुन समझ लो कि कौन तुम्हारे साथ युद्धभूमि में खड़ा था।

भगवान वेदव्यास ने अर्जुन को बताया कि तुम्हारी विजय के लिए भोलेनाथ साक्षात रणभूमि में उतर पड़े हैं। इस संग्राम में जो तुम्हारे सामने शत्रुओँ का कोई वश नहीं चल पा रहा है तो ये पिनाकधारी भगवान महादेव ही तुम्हारे आगे आगे चल रहे हैं।

एष देवो महादेवो योअसौ पार्थ तवाग्रतः। संग्रामे शात्रवान् निघ्नंस्त्वया दृष्टः पिनाकधृक्।।।
अरे, वह महादेव तेरे आगे आगे चल रहे हैं अर्जुन। वही पिनाक धनुष को धारण करने वाले, संग्राम में सारे शत्रुओँ का विनाश करने वाले, उन्हीं महादेव की अर्चना करो अर्जुन।

काशी विश्वेश्वर महादेव विश्वनाथ की महिमा का यह संकेत भगवान वेदव्यास ने महाभारत के द्रोणपर्व में संकेतों में किया है। वेदव्यास ने अर्जुन को कहा कि जहां धर्म है वहीं महादेव हैं, श्रीकृष्ण तो है हीं, जो साक्षात तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। तुम निर्भीक होकर रणभूमि में पराक्रम करो।

गच्छ युद्धयस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजयः। यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दनः।।।
जाओ कुन्तीपुत्र, जाकर युद्ध करो, अब तुम्हारी पराजय नहीं हो सकेगी क्योंकि साक्षात श्रीकृष्ण तुम्हारे साथ विराजमान है…और महादेव शिव तुम्हारे आगे आगे चल ही रहे हैं जो चराचर जगत के कारण और स्वामी हैं…। चराचरस्य जगतः प्रभुः स भगवान हरः।। नमस्कुरुष्व कौन्तेय तस्मै शान्ताय वै सदा..।

स्पष्ट है कि काशी विश्वनाथ जब चाहते हैं, अपनी इच्छा से हर खेल पलट देते है। जैसे कि वह स्वयं अर्जुन के आगे आगे चलकर महाभारत का युद्ध लड़ रहे थे। अब किसी को अगर यही गलतफहमी है कि काशी विश्वनाथ केवल जीवन के अन्तकाल में ही याद किए जाते हैं तो उसे तत्काल अपनी बुद्धि दुरुस्त कर लेनी चाहिए। और जिन्होंने हिन्दू और हिन्दुत्व के वामपाठ को ही हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व का पैमाना मान रखा है, उन्हें क्या कहें? कहीं सचमुच ही तो शिव ने पहले ही बुद्धि विपरीतकर युद्ध एकतरफा तो नहीं कर दिया है? खैर, रणनीति ही महत्वपूर्ण होती है, वही पार लगाती है या फिर डुबा डालती है।

किन्तु यहां सवाल चुनावी रण में राजनीतिक लिहाज से सफलता के स्वप्न देखते हुए कुछ भी अंटशंट बकने का नहीं है, सवाल है कि सांस्कृतिक विषयों को राजनीतिक विषवमन से अलग क्यों नहीं रखा जा सकता? सदबुद्धि और विवेक क्यों इसी वक्त हमारे नेताओं का साथ छोड़कर दूर चला जाता है? जाहिर तौर पर ऐसे तत्वों को शिव के सम्मुख जाकर अपने पिताई और खुद की गलतबयानी और तीर्थ की अवहेलना पर पश्चाताप अवश्य प्रकट करना चाहिए ताकि सम्मानजनक हार मिल सके। गलतियों के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।

लेकिन क्या शिव मानेंगे और क्षमा प्रदान करेंगे? यह तो शिव ही जाने और सचमुच शिव ही जानते हैं क्योंकि वह तो सबके नाथ और विश्वनाथ हैं। कर्मों के अनुसार वह जीव के साथ रहते या उसका साथ छोड़ते हैं। और क्षमायाचना करने का समय भी तो अब कहां शेष है? चुनाव तो सर्वोपरि है ना।

जो भी हो, संकेत समझिए कि ज्योतिर्मय शिव तो अपने जलते त्रिशूल को लेकर आगे आगे चलने का संकेत दे रहे हैं। 2022, 2024, 2027 और 2029 का अब सवाल ही कहां है। इससे भी बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है जिसमें उत्तर बनकर एक बीज पड़ा है।

यह तो अपने मन-आंगन में 2047 में स्वतंत्रता के 100 सालों की तस्वीर लेकर उग रहा और निरंतर बढ़ रहा यह भारत है। जितने घाव विगत एक हजार साल में शरीर पर लगे हैं, सबका परिमार्जन करते हुए सभी कुटिल चालों को ध्वस्त करने के लिए अग्निपथ पर निकल पड़ा यह भारत है।

किसी को भ्रम नहीं रहना चाहिए। आज से ठीक एक हजार साल पहले 1002 से 1024 तक आतंकी हमलावरों की जिहादी रक्तरंजित तलवार सोमनाथ से लेकर विश्वनाथ तक कहर ढा रही थी, तब शिव शांत भाव से सब सह रहे थे। लेकिन अब इतिहास की धारा उलट चुकी है, 2019 से 2021 के दो सालों में ही शिव भी काशी से कश्मीर तक कुछ करवट ले चुके हैं और कुछ अभी लेने वाले हैं। जाहिर है, इसके नतीजे कुछ ही वर्षों में काल के भाल पर भारत के उज्जवलतम रूप के साक्षी बनेंगे।

जबतक शिव की आंखें बंद और ध्यानमग्न थीं, जिसे जो करना व कहना था वो कर और कह रहा था, किन्तु अब आंखे खुल चुकी हैं, अब जो होगा, होने जा रहा है, समय चक्र ने ऐसी तस्वीर न देखी होगी। 13 दिसंबर 2021 की तारीख इतिहास में दर्ज हो चुकी है।

लेखक : प्रो.राकेश उपाध्याय, बीएचयू

Vijaykant Kant जी की वाल से।

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मिर्जा राजे जयसिंह


यह औरंगजेब का असली आर्डर है जब वह अजमेर आया था फिर अजमेर से वह बुरहानपुर गया उसके बाद वह अपने सेनापति को आदेश दिया की अजमेर तथा आसपास के सभी हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया जाए

आजकल बहुत से मुस्लिम इतिहासकार औरंगजेब को मंदिरों की रक्षा करने वाला बताते हैं

दरअसल औरंगजेब की सेना में एक बड़े सेनापति थे जो आमेर के राजा भी थे उनका नाम था जय सिंह

उनकी बहादुरी से प्रसन्न होकर औरंगजेब ने उन्हें मिर्जा की उपाधि दी थी और इतिहास में उन्हें मिर्जा राजा जयसिंह कहा जाता है वह काफी बहादुर थे और हिंदूवादी थे

औरंगजेब के ऊपर मराठे हमला करते रहते थे और उसका जवाब मिर्जा राजा जयसिंह देते थे जब तक मिर्जा राजा जयसिंह जिंदा रहे तब तक औरंगजेब ने किसी भी हिंदू मंदिर को नहीं तोड़ा ना ही उसने जबर्दस्ती इस्लामीकरण किया क्योंकि वह मिर्जा राजा जयसिंह को नाराज करके खतरा मोल नहीं लेना चाहता था क्योंकि उसे मालूम था कि मराठे दिल्ली की गद्दी पर कब्जा कर लेंगे

लेकिन जब मिर्जा राजा जयसिंह की मौत हो गई उसके बाद औरंगजेब ने हजारों नहीं बल्कि लाखों मंदिरों को तोड़े बीकानेर के राजकीय अभिलेखागार में उसके कई आदेश मौजूद है जिसमें उसने अपनी राजस्थान यात्रा के दौरान तमाम हिंदू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था

जब उसने डेक्कन यानी दक्षिण पर विजय प्राप्त किया और औरंगाबाद शहर को तहस-नहस किया तब वह वहां मौजूद ज्योतिर्लिंग को भी तोड़ना चाहता था लेकिन कुछ हिंदुओं के निवेदन पर यदि आपने इस ज्योतिर्लिंग को तोड़ा तब मराठे अपनी आन बान शान की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं तब उसने ज्योतिर्लिंग तो नहीं तोड़ा लेकिन वहां पर एक जजिया कर वसूलने का कमरा बनवाया जो आज भी मौजूद है और वहां एक मुगल सरदार हमेशा मौजूद रहता था जो ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने आए हिंदुओं से जजिया कर वसूलता था

मुस्लिम इतिहासकार बड़ी सफाई से औरंगजेब के कालखंड को दो भागों में बांट देते हैं एक कालखंड जो आमेर के राजा और औरंगजेब के मुख्य सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह के दरम्यान का है और दूसरा कार्यकाल जो मिर्जा राजा जयसिंह के मरने के बाद का है

और वह सिर्फ औरंगजेब के उसी कामों के बारे में लिखते हैं जो उसने अपने सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह के जिंदा रहते किया था
साभार 🙏

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आज के जोधपुरवासियो को इनकी जानकारी भी नहीं है…..

कैसे मेजर जनरल सगत सिंह राठौड़ की ज़िद्द ने भारत को चीन के विरुद्ध सबसे अप्रत्याशित सैन्य जीत दिलाई….

सैनिक पराक्रम राष्ट्रप्रेम का प्रतिबिंब होता है और सेना राष्ट्र शक्ति का एकमात्र स्रोत। वनस्पति और रश्मिरथी भी जहां पहुंचने को मना करते है, राष्ट्र लक्ष्य हेतु ये नरसिंह वहां खड़े होते हैं। अगर इन्हें वर्दी में अवतरित ईश्वर की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज हम आपको एक ऐसे ही राष्ट्र वीर की वास्तविक कहानी सुनाने जा रहे हैं।

नाथू ला जैसा दुर्गम क्षेत्र। चीन जैसी महाशक्ति। 1962 की हार से टूटा मनोबल। सैन्य संसाधन की कमी। चीन के मुकाबले संख्या बल में घोर अनुपातिक कमी। इन सारे परिस्थितिजन्य चक्रव्युह से घिरे होने के बावजूद भी, मजाल कि एक जवान भी पीछे हटा हो।

लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह को भारत का सबसे निर्भिक जनरल माना जाता है। जनरल सगत एकमात्र सैन्य अधिकारी है जिन्होंने तीन युद्ध में जीत हासिल की। उनके नेतृत्व में गोवा को पुतर्गाल से मुक्त कराया गया। वहीं वर्ष 1967 में उनके ही नेतृत्व में चीनी सेना पर जबरदस्त हमला किया गया।

इसके बाद वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को दरकिनार कर जनरल सगत ढाका पर जा चढ़े। इसकी बदौलत पाकिस्तानी सेना को हथियार डालने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि, इन्हें हमेशा ही उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। यही कारण है कि उन्हें कभी किसी तरह का वीरता सम्मान नहीं मिला। अब भारतीय सेना उनकी जन्म शताब्दी मनाने जा रही है। इस अवसर पर जोधपुर में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा।

जनरल सगत चीन सीमा पर नाथु ला में तैनात थे। नाथुला में भारत व चीन के सैनिकों के बीच हमेशा टकराव रहती थी। रोजाना की झड़प बंद करने के लिए जनरल सगत के आदेश पर नाथु ला सेक्टर में 11 सितम्बर 1967 को तारबंदी लगाना शुरू कर दिया।

चीनी सेना बगैर किसी चेतावनी के जोरदार फायरिंग करने लगी। तब भारतीय सैनिक खुले में खड़े थे, ऐसे में बड़ी संख्या में सैनिक हताहत हो गए। इसके बाद जनरल सगत ने नीचे से तोपों को ऊपर मंगाया। उस समय तोप से गोलाबारी करने का आदेश सिर्फ प्रधानमंत्री ही दे सकता था। दिल्ली से कोई आदेश मिलता नहीं देख जनरल सगत ने तोपों के मुंह खोलने का आदेश दे दिया।

देखते ही देखते भारतीय जवानों ने चीन के तीन सौ सैनिक मार गिराए। इसके बाद चीनी सेना पीछे हट गई। इसे लेकर काफी हंगामा मचा, लेकिन चीनी सेना पर इस जीत ने भारतीय सैनिकों के मन में वर्ष 1962 से समाए भय को बाहर निकाल दिया। अब भारतीय सेना यह जान चुकी थी कि चीनी सेना को पराजित किया जा सकता है। इसके बाद जनरल सगत का वहां से तबादला कर दिया गया।

गोवा को पुर्तगाल के कब्जे से मुक्त कराने के लिए भारतीय सेना के तीनों अंग थल, वायु और नौ सेना ने मिलकर संयुक्त ऑपरेशन चलाया। उनकी जीवनी में मेजर जनरल वीके सिंह के अनुसार गोवा मुक्ति के लिए दिसम्बर 1961 में भारतीय सेना के ऑपरेशन विजय में 50 पैरा को सहयोगी की भूमिका में चुना गया, लेकिन उन्होंने इससे कहीं आगे बढ़ इतनी तेजी से गोवा को मुक्त कराया कि सभी दंग रह गए।

18 दिसम्बर को 50 पैरा को गोवा में उतारा गया। 19 दिसम्बर को उनकी बटालियन गोवा के निकट पहुंच गई। पणजी के बाहर पूरी रात डेरा जमा रखने के बाद उनके जवानों ने तैरकर नदी को पार कर शहर में प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने ही पुर्तगालियों को आत्मसमर्पण करने को मजबूर किया। पुर्तगाल के सैनिकों सहित 3306 लोगों ने आत्मसमर्पण किया। इसके साथ ही गोवा पर 451 साल से चला रहा पुर्तगाल का शासन समाप्त हुआ और वह भारत का हिस्सा बन गया।

जनरल सगत वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान अगरतला सेक्टर की तरफ से हमला बोला था और अपनी सेना को लेकर आगे बढ़ते रहे। जनरल अरोड़ा ने उन्हें मेघना नदी पार नहीं करने का आदेश दिया, लेकिन हेलिकॉप्टरों की मदद से चार किलोमीटर चौड़ी मेघना नदी को पार कर उन्होंने पूरी ब्रिगेड उतार दी और आगे बढ़ गए। जनरल सगत सिंह ने अपने मित्र जो कि बाद में एयर वाइस मार्शल बने चंदन सिंह राठौड़ की मदद से इस असंभव लगने वाले काम को अंजाम दिया। तब देश के रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम और पीएम इंदिरा गांधी हैरत में पड़ गए थे कि भारतीय सेना इतनी जल्दी ढाका कैसे पहुंच गई।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सेना के ढाका में प्रवेश करने की प्लानिंग सेना और सरकार के स्तर पर बनी ही नहीं थी, जबकि सगत सिंह ने उसे अंजाम भी दे दिया। जनरल सगत के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ढाका को घेर लिया और जनरल नियाजी को आत्मसमर्पण का संदेश भेजा। इसके बाद 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का उदय अपने आप में इतिहास बन गया। हालांकि, इसमें भी जनरल सगत को कोई श्रेय नहीं मिलाl

अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय, अतुलनीय!!! सगत के साहस का स्वरुप इतना वृहद् और विशाल है कि विशेषण की परिधि से बाहर हो जायेl पुर्तगाल, चीन और पाकिस्तान को परास्त करनेवाला एकमात्र योद्धाl

सगत सिंह ने सेना के मन से चीनियों का भय निकालाl कहते है जीत सुनिश्चित हो तो ‘कायर’ भी लड़ते है लेकिन जब हार प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़ा हो जो उस समय भी चक्रव्यूह भेदन करे असली अभिमन्यु वही हैl

सगत सिंह को तो हार के भय से नाथुला में लड़ने की आज्ञा भी नहीं दी गयी, लेकिन भारत माता की आन और मान-सम्मान के लिए इस शेर नें सिर्फ विजय के विकल्प को ही चुनाl

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भारत के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे राधाकृष्णन की सारी प्रसिद्धि उनकी पुस्तक इंडियन फिलॉसॉफी के कारण है। आपको यह जानकारी हैरानी होगी कि ये दोनों भाग चुराए गए थे। राधाकृष्णन के लिखे नहीं थे।

मूल रूप से वह एक छात्र जदुनाथ सिन्हा की थीसिस थी। राधाकृष्णन उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। थीसिस उनके पास चेक होने आई थी. उन्होंने थीसिस पास करने में दो साल की देरी कर दी। बड़े प्रोफेसर थे, इसलिए किसी ने उन पर शक नहीं किया।

इन्हीं दो सालों में उन्होंने इंग्लैंड में अपनी किताब इंडियन फिलॉसॉफी प्रकाशित करवाई, जो कि उसे बेचारे जदुनाथ सिन्हा की थीसिस ही थी। उस छात्र की थीसिस से राधाकृष्णन की किताब बिलकुल हूबहू है…एक कॉमा तक का अंतर नहीं है। जब उनकी किताब छप गई तभी उस छात्र को पीएचडी की डिग्री दी गई। यानी राधाकृष्णन की किताब पहले छपी…अब कोई यह नहीं कह सकता था कि उन्होंने चोरी की। अब तो चोरी का आरोप छात्र पर ही लगता।

हालांकि जदुनाथ सिन्हा ने हार नहीं मानी। उसने कलकत्ता हाईकोर्ट में केस कर दिया। छात्र का कहना था, “मैंने दो साल पहले विश्वविद्यालय में थीसिस जमा करा दी थी। विश्वविद्यालय में इसका प्रमाण है। अन्य प्रोफेसर भी गवाह हैं क्योंकि वह थीसिस तीन प्रोफेसरों से चेक होनी थी – दो अन्य एक्जामिनर भी गवाह हैं। वह थीसिस मेरी थी और इसलिए यह किताब भी मेरी है। मामला एकदम साफ है…इसे पढ़कर देखिए….”

राधाकृष्णन की किताब में अध्याय पूरे के पूरे वही हैं जो थीसिस में हैं। वे जल्दबाजी में थे, शायद इसलिए थोड़ी बहुत भी हेराफेरी नहीं कर पाए। किताब भी बहुत बड़ी थी- दो भागों में थी। कम से कम दो हजार पेज। इतनी जल्दी वे बदलाव नहीं कर पाए…अन्यथा समय होता तो वे कुछ तो हेराफेरी कर ही देते।

मामला एकदम साफ था लेकिन छात्र जदुनाथ सिन्हा ने कोर्ट के निर्णय के पहले ही केस वापस ले लिया क्योंकि उसे पैसा दे दिया गया था। मामला वापस लेने के लिए छात्र को राधाकृष्णन ने उस समय दस हजार रुपए दिए थे। वह बहुत गरीब था और दस हजार रुपए उसके लिए बहुत मायने रखते थे। दूसरी बात, राधाकृष्णन इतने प्रभावशाली हस्ती थे कि कोई उनसे बुराई मोल नहीं लेना चाहता था। ऐसे में वास्तविक न्याय की उम्मीद जदुनाथ को नहीं रही।

राधाकृष्णन ने अपने छात्र की थीसिस चुराकर इंडियन फिलॉसफी किताब छपवाई। इसमें कलकत्ता की मॉडर्न रिव्यू में छात्र जदुनाथ सिन्हा और उनके बीच लंबा पत्र व्यवहार छपा। राधाकृष्णन सिर्फ यह कहते रहे कि यह इत्तफाक है…क्योंकि शोध का विषय एक ही था..राधाकृष्णन पर लिखी तमाम किताबों में इस विवाद का जिक्र है..एक अन्य प्रोफेसर बी एन सील के पास भी थीसिस भेजी गई थी..

ब्रजेंद्रनाथ सील….उन्होंने पूरे मामले से अपने को अलग कर लिया था…बहुत मुश्किल से राधाकृष्णन ने मामला सेट किया..जज को भी पटाया…जदुनाथ को समझाया …तब मामला निपटा..पहले तो ताव में उन्होंने भी मानहानि का केस कर दिया था…

पर समझ में आ गया कि अब फजीहत ही होनी है…इसलिए कोर्ट के बाहर सेटलमेंट करने में जुट गए..बड़े बड़े लोगों से पैरवी कराई,मध्यस्थता कराई। मध्यस्थता कराने वाले एक बड़े दिग्गज श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे, जो तब कलकत्ता यूनिवर्सिटी के कुलपति थे। इतने दबाव के बीच गरीब जदुनाथ सिन्हा कहां टिकते।

थीसिस चोरी के जवाब में राधाकृष्णन सिर्फ इतना ही कहते रहे कि इत्तफाक से जदु्नाथ की थीसिस और मेरी किताब की सामग्री मिलती है..तर्क वही कि स्रोत एक था, विषय एक था…आदि आदि…अपनी किताब को जदुनाथ की थीसिस से अलग साबित नहीं कर पाए…

ये मॉडर्न रिव्यू में छपे जदुनाथ के लेखों और राधाकृष्णन के प्रकाशित जवाबों से स्पष्ट होता है। अदालत के बाहर मामला सेटल करा लिया लेकिन जदुनाथ सिन्हा की थीसिस और राधाकृष्णन की किताब में पूरी पूरी समानता ऑन द रिकॉर्ड है। इससे वे इन्कार कर ही नहीं सकते थे। बाद में उन्होंने प्रकाशक से मिलकर (बहुत बाद में, एकदम शुरू में नहीं) यह साबित कराने की कोशिश की, कि किताब पहले छपने के लिए दे दी थी…पर प्रकाशक ने काम बाद में शुरू किया।

यानी सामग्री उनकी किताब की वही थी जो जदुनाथ की थीसिस में थी। एक अन्य प्रोफेसर बी एन सील को भी थीसिस एक्जामिन करने के लिए दी गई थी। उन्होंने पूरे मामले से खुद को अलग कर लिया..

क्या करते..राधाकृष्णन के पक्ष में बड़े बड़े लोग थे, सबसे दुश्मनी हो जाती..और अंतरात्मा ने जदुनाथ के दावे का विरोध करने नहीं दिया। नववेदांत के दार्शनिक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य भी जदुनाथ सिन्हा के रीडर थे,पर राधाकृष्णन से कौन टकराए।

जदुनाथ के साथ तो अन्याय हुआ, पर जब वो खुद पीछे हट गए तो मामला खत्म ..हमारी आपत्ति ऐसे व्यक्ति को भारत रत्न देने और उसके जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाने पर है। थीसिस चोर डा. सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन के जन्‍मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिन्‍हें ब्रिटिश सरकार से ठीक उसी वर्ष ‘सर’ की उपाधि मिली थी, जिस वर्ष भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सज़ा हुई थी। राष्‍ट्रीय आंदोलन में तो यह व्‍यक्ति पूरी तरह से नदारद था ही। 1892 में वीरभूम जिले में जन्मे जदुनाथ सिन्हा का देहांत 1979 में हुआ।

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

शिवाजी महाराज द्वारा अफ़ज़ल खान के वध की सूचना जब नगर के लोगो को मिली तब व्यापारियों का एक समूह उनसे मिलने गया, उनमे से एक व्यापारी ने पूछा कि आपको अफ़ज़ल के इस धोखे से निपटने का सुझाव कैसे मिला???

तब शिवाजी ने कहा – “मैं जानता हूं कि मुस्लिम सैनिक ताकतवर और कपटी होते है, मैंने अफ़ज़ल को पहले कभी देखा नही था इसलिये उसके कद और शक्ति की परख करने अपने गुप्तचर भेजे। फिर उसी के समान शारीरिक योग्यता वाले विशाजी मोरम्बक के साथ हर प्रकार के युद्धों का अभ्यास किया, तब जाकर मैं अफ़ज़ल का वध कर सका।

फिर व्यापारी ने पूछा – ‘यदि अफ़ज़ल छल कपट नही करता तो आपकी इतनी मेहनत का क्या होता। ‘

शिवाजी ने कहा – यदि वो मुझ पर आक्रमण नही भी करता तब भी उसकी मौत निश्चित ही थी क्योकि जब वो हमारी सीमा में घुसा था तब उसने कई मंदिर और शिवालय ध्वस्त कर दिए थे, मेरे हाथों उसका वध तब ही अटल हो चुका था। जिस प्रकार श्री राम ने सुबाहु का वध करके विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा की थी उसी तर्ज पर मैंने स्वराज की रक्षा अफ़ज़ल को मारकर की। अधर्मियों के लिए हिन्दू स्वराज्य में कोई स्थान नही हो सकता।

शिवाजी के रणकौशल, सामर्थ्य, धर्मपरायणता तथा शस्त्र और शास्त्र की समझ देख व्यापारी उनसे बेहद प्रभावित हुए और अफ़ज़ल द्वारा तोड़े गए मंदिरों के लिये शिवाजी को धन उपलब्ध करवाया साथ ही उनकी प्रशंसा करते रह गए।

नमन मराठा साम्राज्य के प्रथम छत्रपति महाराज शिवाजी शाहजी राजे भौसले को।

🙏🙏🙏

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इतिहास की वीरता की सत्य घटना

पाटण की रानी रुदाबाई जिसने सुल्तान बेघारा के सीने को फाड़ कर दिल निकाल लिया था, और कर्णावती शहर के बिच में टांग दिया था, ओर धड से सर अलग करके पाटन राज्य के बीचोबीच टांग दिया था।

गुजरात से कर्णावती के राजा थे, राणा वीर सिंह सोलंकी ईस राज्य ने कई तुर्क हमले झेले थे, पर कामयाबी किसी को नहीं मिली, सुल्तान बेघारा ने सन् 1497 पाटण राज्य पर हमला किया राणा वीर सिंह सोलंकी के पराक्रम के सामने सुल्तान बेघारा की 40000 से अधिक संख्या की फ़ौज 2 घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाई, सुल्तान बेघारा जान बचाकर भागा।

असल मे कहते है सुलतान बेघारा की नजर रानी रुदाबाई पे थी, रानी बहुत सुंदर थी, वो रानी को युद्ध मे जीतकर अपने हरम में रखना चाहता था। सुलतान ने कुछ वक्त बाद फिर हमला किया।

राज्य का एक साहूकार इस बार सुलतान बेघारा से जा मिला, और राज्य की सारी गुप्त सूचनाएं सुलतान को दे दी, इस बार युद्ध मे राणा वीर सिंह सोलंकी को सुलतान ने छल से हरा दिया जिससे राणा वीर सिंह उस युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए।

सुलतान बेघारा रानी रुदाबाई को अपनी वासना का शिकार बनाने हेतु राणा जी के महल की ओर 10000 से अधिक लश्कर लेकर पंहुचा, रानी रूदा बाई के पास शाह ने अपने दूत के जरिये निकाह प्रस्ताव रखा,

रानी रुदाबाई ने महल के ऊपर छावणी बनाई थी जिसमे 2500 धर्धारी वीरांगनाये थी, जो रानी रूदा बाई का इशारा पाते ही लश्कर पर हमला करने को तैयार थी, सुलतान बेघारा को महल द्वार के अन्दर आने का न्यौता दिया गया।

सुल्तान बेघारा वासना मे अंधा होकर वैसा ही किया जैसे ही वो दुर्ग के अंदर आया राणी ने समय न गंवाते हुए सुल्तान बेघारा के सीने में खंजर उतार दिया और उधर छावनी से तीरों की वर्षा होने लगी जिससे शाह का लश्कर बचकर वापस नहीं जा पाया।

सुलतान बेघारा का सीना फाड़ कर रानी रुदाबाई ने कलेजा निकाल कर कर्णावती शहर के बीचोबीच लटकवा दिया।और..उसके सर को धड से अलग करके पाटण राज्य के बिच टंगवा दिया साथ ही यह चेतावनी भी दी की कोई भी आक्रांता भारतवर्ष पर या हिन्दू नारी पर बुरी नज़र डालेगा तो उसका यही हाल होगा।

इस युद्ध के बाद रानी रुदाबाई ने राजपाठ सुरक्षित हाथों में सौंपकर कर जल समाधि ले ली, ताकि कोई भी तुर्क आक्रांता उन्हें अपवित्र न कर पाए।

ये देश नमन करता है महान वीरांगना रानी रुदाबाई को,

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। । 3 सितम्बर 1857 । ।

बिठूर में एक पेड़ से बंधी 13 वर्ष की लड़की को, ब्रिटिश सेना ने जिंदा ही आग के हवाले किया, धूँ धूँ कर जलती वो लड़की, उफ़ तक न बोली और जिंदा लाश की तरह जलती हुई, राख में तब्दील हो गई।

ये लड़की थी नाना साहब पेशवा की दत्तक पुत्री मैना कुमारी।
जिसे 160 वर्ष पूर्व, आज ही के दिन, आउटरम नामक ब्रिटिश अधिकारी ने जिंदा जला दिया था।

जिसने 1857 क्रांति के दोरान, अपने पिता के साथ जाने से इसलिए मना कर दिया, की कही उसकी सुरक्षा के चलते, उस के पिता को देश सेवा में कोई समस्या न आये।
और बिठूर के महल में रहना उचित समझा।
नाना साहब पर ब्रिटिश सरकार इनाम घोषित कर चुकी थी।
और जैसे ही उन्हें पता चला नाना साहब महल से बाहर है, ब्रिटिश सरकार ने महल घेर लिया, जहाँ उन्हें कुछ सैनिको के साथ बस मैना कुमारी ही मिली।

मैना कुमारी, ब्रटिश सैनिको को देख कर महल के गुप्त स्थानों में जा छुपी, ये देख ब्रिटिश अफसर आउटरम ने महल को तोप से उड़ने का आदेश दिया।
और ऐसा कर वो वहां से चला गया पर अपने कुछ सिपाहियों को वही छोड़ गया।
रात को मैना को जब लगा की सब लोग जा चुके है, और वो बहार निकली तो 2 सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और फिर आउटरम के सामने पेश किया।

आउटरम ने पहले मैना को एक पेड़ से बंधा, फिर मैना से नाना के बारे में और क्रांति की गुप्त जानकारी जाननी चाही।
पर उस से मुह नही खोला।

यहाँ तक की आउटरम ने मैना कुमारी को जिंदा जलने की धमकी भी दी, पर उसने कहा की वो एक क्रांतिकारी की बेटी है, मोत से नही डरती।
ये देख आउटरम तिलमिला गया और उसने मैना कुमारी को जिंदा जलने का आदेश दे दिया।
इस पर भी मैना कुमारी, बिना कुछ बोले चुपचाप इसलिए आग में जल गई, ताकि क्रांति की मसाल कभी न बुझे।

।।नमन है इस महान वीरांगना को।।

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मुंबई के पास एक स्थान है वसई जहाँ समुद्र किनारे पुर्तगालियो द्वारा बनवाया एक किला है,
इस किले पर पहुँचने के लिए आपको एक बस स्टॉप पर उतरना होता है जिसका नाम है चिमाजी अप्पा जंक्शन।

किसी भी स्थान के नाम के पीछे उस जगह का इतिहास छिपा होता है, यह बात थोड़ी जिज्ञासा पैदा करती है कि आखिर पुर्तगालियो के किले का चिमाजी अप्पा से क्या लेना देना होगा।

चिमाजी अप्पा एक ब्राह्मण, पेशवा बाजीराव के छोटे भाई और मराठा सेना के जनरल थे।
उत्सुकता में इस किले का इतिहास निकालना पड़ा और जो सच सामने आया उसने झकझोर कर रख दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर चिमाजी अप्पा जैसे महापुरुष इतिहास में कहाँ गुमनाम हो गए।

नेहरूजी पर दोषारोपण कर भी दिया जाए तो हिंदूवादियों ने भी इन्हें प्रसिद्धि दिलाने का क्या प्रयास किया??

भारत को गुलाम बनाने का सपना सबसे पहले पुर्तगालियो ने ही देखा था ये मुगलो से पहले भारत मे आ गए थे।
सन 1738 तक इन्होंने मुंबई और गोवा पर कब्जा कर लिया साथ ही एक अलग राष्ट्र की घोषणा कर दी।
उस समय मराठा साम्राज्य बेहद शक्तिशाली हो चुका था। ठीक एक साल पहले पेशवा बाजीराव दिल्ली और भोपाल में सारे रणबांकुरों को धूल चटाकर लौटे थे।

बाजीराव ने पुर्तगालियो को संदेश भेजा कि आप मुंबई और गोवा में व्यापार करें मगर ये दोनो मराठा साम्राज्य और भारत के अंग हैं इसलिए मुगलो की तरह आप भी हमारी अधीनता स्वीकार करें।
जब पुर्तगाली नही माने तो बाजीराव ने अपने छोटे भाई और मराठा जनरल श्री चिमाजी अप्पा को युद्ध का आदेश दिया।
चिमाजी अप्पा ने पहले गोवा पर हमला किया और वहाँ के चर्चो को तहस नहस कर दिया इससे पुर्तगालियो की आर्थिक कमर टूट गयी।
फिर वसई आये जहाँ ये किला है।

चिमाजी अप्पा ने 2 घंटे लगातार किले पर बमबारी की और पुर्तगालियो ने सफेद झंडा दिखाया, चिमाजी अप्पा ने किले पर मराठा ध्वज फहराया और पुर्तगालियो ने समझौता किया कि वे सिर्फ व्यापार करेंगे और अपने लाभ का एक चौथाई हिस्सा मराठा साम्राज्य को कर के रुप में देंगे।

चिमाजी अप्पा ने सारे हथियार, गोला, बारूद जब्त कर लिए।
इस युद्ध ने पुर्तगालियो की शक्ति का अंत कर दिया और भारत पर राज करने का सपना आखिर सपना ही बनकर रह गया।

हिन्दू धर्म मे यह बेहद दुर्लभ है कि किसी व्यक्ति को शस्त्र के साथ शास्त्र का भी ज्ञान हो, चिमाजी अप्पा उन्ही लोगो मे से एक थे।
वसई का किला खण्डहर हो चुका है कुछ सालो में शायद खत्म भी हो जाये मगर उस बस स्टॉप का नाम हमेशा भारत के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराता रहेगा कि एक भरतवंशी योद्धा इस जगह आया था जिसने मातृभूमि को पराधीनता में जकड़े जाने से पहले ही आज़ाद कर लिया और इतिहास में अमर हो गया।

नीचे किले में बनी चिमाजी अप्पा की मूर्ति है।
चिमाजी अप्पा अपनी विजयी मुद्रा में खड़े आज अपने अस्तित्व का युद्ध भी लड़ रहे है क्योकि राष्ट्रवादी व्यस्त है अपनी राजनीति में।।
✍🏻परख सक्सेना

कोलाचेल युद्ध में डचों को हराने वाले राजा मार्तण्ड वर्मा : इतिहास की पुस्तकों से गायब

डच वर्तमान नीदरलैंड (यूरोप) के निवासी हैं. भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से इन लोगों ने 1605 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी बनायीं और ये लोग केरल के मालाबार तट पर आ गए. ये लोग मसाले, काली मिर्च, शक्कर आदि का व्यापार करते थे.
धीरे धीरे इन लोगों ने श्रीलंका, केरल, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा और सूरत में अपना व्यवसाय फैला लिया. इनकी साम्राज्यवादी लालसा के कारण इन लोगों ने अनेक स्थानों पर किले बना लिए और सेना बनायीं. श्रीलंका और ट्रावनकोर इनका मुख्य गढ़ था. स्थानीय कमजोर राजाओं को हरा कर डच लोगों ने कोचीन और क्विलोन (quilon) पर कब्ज़ा कर लिया.
उन दिनों केरल छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था. मार्तण्ड वर्मा एक छोटी सी रियासत वेनाद का राजा था. दूरदर्शी मार्तण्ड वर्मा ने सोचा कि यदि मालाबार (केरल) को विदेशी शक्ति से बचाना है तो सबसे पहले केरल का एकीकरण करना होगा. उसने अत्तिंगल, क्विलोन (quilon) और कायामकुलम रियासतों को जीत कर अपने राज्य की सीमा बढाई.
अब उसकी नज़र ट्रावनकोर पर थी जिसके मित्र डच थे. श्रीलंका में स्थित डच गवर्नर इम्होफ्फ़ (Gustaaf Willem van Imhoff) ने मार्तण्ड वर्मा को पत्र लिख कर कायामकुलम पर राज करने पर अप्रसन्नता दर्शायी. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने जबाब दिया कि ‘राजाओं के काम में दखल देना तुम्हारा काम नहीं, तुम लोग सिर्फ व्यापारी हो और व्यापार करने तक ही सीमित रहो’.
कुछ समय बाद मार्तण्ड वर्मा ने ट्रावनकोर पर भी कब्ज़ा कर लिया. इस पर डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने कहा कि मार्तण्ड वर्मा ट्रावनकोर खाली कर दे वर्ना डचों से युद्ध करना पड़ेगा. मार्तण्ड वर्मा ने उत्तर दिया कि ‘अगर डच सेना मेरे राज्य में आई तो उसे पराजित किया जाएगा और मै यूरोप पर भी आक्रमण का विचार कर रहा हूँ’. [‘I would overcome any Dutch forces that were sent to my kingdom, going on to say that I am considering an invasion of Europe’- Koshy, M. O. (1989). The Dutch Power in Kerala, 1729-1758) ]
डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने पराजित ट्रावनकोर राजा की पुत्री स्वरूपम को ट्रावनकोर का शासक घोषित कर दिया. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने मालाबार में स्थित डचों के सारे किलों पर कब्ज़ा कर लिया.
अब डच गवर्नर इम्होफ्फ़ की आज्ञा से मार्तण्ड वर्मा पर आक्रमण करने श्रीलंका में स्थित और बंगाल, कोरमंडल, बर्मा से बुलाई गयी 50000 की विशाल डच जलसेना लेकर कमांडर दी-लेननोय कोलंबो से ट्रावनकोर की राजधानी पद्मनाभपुर के लिए चला. मार्तण्ड वर्मा ने अपनी वीर नायर जलसेना का नेतृत्व स्वयं किया और डच सेना को कन्याकुमारी के पास कोलाचेल के समुद्र में घेर लिया.
कई दिनों के भीषण समुद्री संग्राम के बाद 31 जुलाई 1741 को मार्तण्ड वर्मा की जीत हुई. इस युद्ध में लगभग 11000 डच सैनिक बंदी बनाये गए, शेष डच सैनिक युद्ध में हताहत हो गए.
डच कमांडर दी-लेननोय, उप कमांडर डोनादी तथा 24 डच जलसेना टुकड़ियों के कप्तानो को हिन्दुस्तानी सेना ने बंदी बना लिया और राजा मार्तण्ड वर्मा के सामने पेश किया. राजा ने जरा भी नरमी न दिखाते हुए उनको आजीवन कन्याकुमारी के पास उदयगिरी किले में कैदी बना कर रखा.
अपनी जान बचाने के लिए इनका गवर्नर इम्होफ्फ़ श्रीलंका से भाग गया. पकडे गए 11000 डच सैनिकों को नीदरलैंड जाने और कभी हिंदुस्तान न आने की शर्त पर वापस भेजा गया, जिसे नायर जलसेना की निगरानी में अदन तक भेजा गया, वहां से डच सैनिक यूरोप चले गए.
कुछ वर्षों बाद कमांडर दी-लेननोय और उप कमांडर डोनादी को राजा ने इस शर्त पर क्षमा किया कि वे आजीवन राजा के नौकर बने रहेंगे तथा उदयगिरी के किले में राजा के सैनिकों को प्रशिक्षण देंगे. इस तरह नायर सेना यूरोपियन युद्ध कला में निपुण हुई. उदयगिरी के किले में कमांडर दी-लेननोय की मृत्यु हुई, वहां आज भी उसकी कब्र है.
केरल और तमिलनाडु के बचे खुचे डचों को पकड़ कर राजा मार्तण्ड सिंह ने 1753 में उनको एक और संधि करने पर विवश किया जिसे मवेलिक्कारा की संधि कहा जाता है. इस संधि के अनुसार डचों को इंडोनेशिया से शक्कर लाने और काली मिर्च का व्यवसाय करने की इजाजत दी जायेगी और बदले में डच लोग राजा को यूरोप से उन्नत किस्म के हथियार और गोला बारूद ला कर देंगे.
राजा ने कोलाचेल में विजय स्तम्भ लगवाया और बाद में भारत सरकार ने वहां शिला पट्ट लगवाया.
मार्तण्ड वर्मा की इस विजय से डचों का भारी नुकसान हुआ और डच सैन्य शक्ति पूरी तरह से समाप्त हो गयी. श्रीलंका, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा एवं सूरत में डचो की ताकत क्षीण हो गयी.
राजा मार्तण्ड वर्मा ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा लेकर अपनी सशक्त जल सेना बनायीं थी.
तिरुवनन्तपुरम का प्रसिद्द पद्मनाभस्वामी मंदिर राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया और अपनी सारी संपत्ति मंदिर को दान कर के स्वयं भगवान विष्णु के दास बन गए. इस मंदिर के 5 तहखाने खोले गए जिनमे बेशुमार संपत्ति मिली. छठा तहखाना खोले जाने पर अभी रोक लगी हुई है.
यह दुख की बात है कि महान राजा मार्तण्ड वर्मा और कोलाचेल के युद्ध को NCERT की इतिहास की पुस्तकों में कोई जगह न मिल सकी.
1757 में अपनी मृत्यु से पूर्व दूरदर्शी राजा मार्तण्ड वर्मा ने अपने पुत्र राजकुमार राम वर्मा को लिखा था – ‘जो मैंने डचों के साथ किया वही बंगाल के नवाब को अंग्रेजों के साथ करना चाहिए. उनको बंगाल की खाड़ी में युद्ध कर के पराजित करें, वर्ना एक दिन बंगाल और फिर पूरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजो का कब्ज़ा हो जाएगा’.

छत्रपति संभाजी महाराज ने शस्त्र युक्त नौ जहाज का निर्माण किया यह कहना गलत नही होगा संभाजी महाराज नौ वैज्ञानिक तो थे ही साथ में शस्त्र विशेषज्ञ भी थे उन्हें ज्ञात था कौनसा नौके में कितने वजन का तोप ले जा सकता हैं ।
छत्रपति शिवाजी महाराज नौसेना के जनक थे केवल भारत ही नही अपितु पुरे विश्व को नौ सेना बनाने का विचार सूत्र दिया नौका को केवल वाहन रूप में इस्तेमाल किया जाता था शिवाजी महाराज प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने साधारण नौका को समंदर का रक्षक का रूप दे दिया शस्त्रयुक्त लड़ाकू जहाज बनाकर । शिवपुत्र संभाजी महाराज समंदर के अपराजय योद्धा थे समंदर की रास्ता उन्हें अपनी हथेलियों की लकीर जैसी मालूम थी , इसलिए पुर्तगालियों के पसीने छूटते थे संभाजी महाराज के नाम से केवल।

पुर्तगाली साथ युद्ध-:
‘छत्रपति संभाजी महाराजने गोवामें पुर्तगालियों से किया युद्ध राजनीतिक के साथ ही धार्मिक भी था । हिंदुओं का धर्मांतरण करना तथा धर्मांतरित न होनेवालों को जीवित जलाने की शृंखला चलानेवाले पुर्तगाली पादरियों के ऊपरी वस्त्र उतार कर तथा दोनों हाथ पीछे बांधकर संभाजी महाराज ने गांव में उनका जुलूस निकाला ।’ – प्रा. श.श्री. पुराणिक (ग्रंथ : ‘मराठ्यांचे स्वातंत्र्यसमर (अर्थात् मराठोंका स्वतंत्रतासंग्राम’ डपूर्वार्ध़) छत्रपति संभाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हुए क्योंकि गोवा में पुर्तगाली हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के साथ साथ मंदिरों को ध्वंश भी कर रहे थे। छत्रपति संभाजी महाराज द्वारा किये जा रहे हमले से अत्यंत भयभीत होगे थे जो पोर्तुगाली के लिखे चिट्ठी में दर्शाता हैं : “ संभाजी आजके सबसे पराक्रमी व्यक्ति हैं और हमें इस बात का अनुभव हैं” ।
यह रहा पोर्तुगाली इसाई कसाइयों द्वारा लिखा हुआ शब्द-: (The Portuguese were very frightened of being assaulted by Sambhaji Maharaj, and this reflects in their letter to the British in which they wrote, ‘Now-a-days Sambhaji is the most powerful person and we have experienced it’. )

संभाजी महाराज गोवा की आज़ादी एवं हिन्दुओ के उप्पर हो रहे अत्याचारों का बदला लेने के लिए 7000 मावले इक्कट्ठा किया और पुर्तगालीयों पर आक्रमण कर दिया पुर्तगाली सेना जनरल अल्बर्टो फ्रांसिस के पैरो की ज़मीन खिसक गई महाराज संभाजी ने 50,000 पुर्तगालीयों सेना को मौत के घाट उतार दिया बचे हुए पुर्तगाली अपने सामान उठाकर चर्च में जाकर प्रार्थना करने लगे और कोई चमत्कार होने का इंतेज़ार कर रहे थे संभाजी महाराज के डर से समस्त पुर्तगाली लूटेरे पंजिम बंदरगाह से 500 जहाजों पर संभाजी महाराज के तलवारों से बच कर कायर 25000 से अधिक पुर्तगाली लूटेरे वापस पुर्तगाल भागे ।

संभाजी महाराज ने पुरे गोवा का शुद्धिकरण करवाया एवं ईसाइयत धर्म में परिवर्तित हुए हिंदुओं को हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया ।

पुर्तगाली सेना के एक सैनिक मोंटिरो अफोंसो वापस पुर्तगाल जाकर किताब लिखा (Drogas da India) लिखता हैं संभाजी महाराज को हराना किसी पहाड़ को तोड़ने से ज्यादा मुश्किल था महाराज संभाजी के आक्रमण करने की पद्धति के बारे में से ब्रिटिश साम्राज्य तक भयभीत होगया गया था अंग्रेजो और हम (पुर्तगाल) समझ गए थे भारत को गुलाम बनाने का सपना अधुरा रह जायेगा।
संभाजी महाराज की युद्धनिति थी अगर दुश्मनों की संख्या ज्यादा हो या उनके घर में घुसकर युद्ध करना हो तो घात लगा कर वार करना चाहिए जिसे आज भी विश्व के हर सेना इस्तेमाल करती हैं जिसे कहते हैं Ambush War Technic। पुर्तगाल के सैनिक कप्तान अफोंसो कहता हैं संभाजी महाराज के इस युद्ध निति की कहर पुर्तगाल तक फैल गई थी संभाजी महाराज की आक्रमण करने का वक़्त होता था रात के ८ से ९ बजे के बीच और जब यह जान बचाकर पुर्तगाल भागे तब वहा भी कोई भी पुर्तगाली लूटेरा इस ८ से ९ बजे के बीच घर से नहीं निकलता था in लूटेरो को महाराज संभाजी ने तलवार की वह स्वाद चखाई थी जिससे यह अपने देश में भी डर से बहार नहीं निकलते थे घर के ।

हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया गया :
हम सभी जानते हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के निकट साथी, सेनापति नेताजी पालकर जब औरंगजेब के हाथ लगे और उसने उनका जबरन धर्म परिवर्तन कर उसका नाम मोहम्मद कुलि खान रख दिया । शिवाजी महाराज ने मुसलमान बने नेताजी पालकर को ब्राम्हणों की सहायता से पुनः हिन्दू बनाया और उनको हिन्दू धर्म में शामिल कर उनको प्रतिष्ठित किया।
हालांकि, यह ध्यान देने की बात हैं संभाजी महाराज ने हिंदुओं के लिए अपने प्रांत में एक अलग विभाग स्थापित किया था जिसका नाम रखा गया ‘पुनः परिवर्तन समारोह’ दुसरे धर्म में परिवर्तित होगये हिन्दुओ के लिए इस समारोह का आयोजन किया गया था ।
हर्षुल नामक गाँव में कुलकर्णी ब्राह्मण रहता था संभाजी महाराज पर लिखे इतिहास में इस वाकया का उल्लेख हैं कुलकर्णी नामक ब्राह्मण को ज़बरन इस्लाम में परिवर्तित किया था मुगल सरदारों ने कुलकर्णी मुगल सरदारों की कैद से रिहा होते ही संभाजी महाराज के पास आकर उन्होंने अपनी पुन: हिन्दू धर्म अपनाने की इच्छा जताई संभाजी महाराज ने तुरंत ‘पुनः धर्म परिवर्तन समारोह का योजन करवाया और हिन्दू धर्म पुनःपरिवर्तित किया ।
✍🏻मनीषा सिंह