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वीर सावरकर


कोंग्रेस के जमाने मे छुपे छुपायें हुऐ डॉक्यूमेंट वीर सावरकर ने खुद के लिए माफी नही ब्लकि सारे कैदियों के लिए दया याचिका मांगी थी : (सबूतों में ) इस समय देश में वीर सावरकर जी पर बहस चल रही है। झूठ की फैक्ट्री चलाने वाले अपनी आदत के मुताबिक बढ़ा-चढ़ा कर झुठ फैलाने में बेदम है।बार-बार हर बार साजिश के तहत यह झुठ फैलाया जाता है कि कालापानी जैसे सजा काटने वाले महान स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने अंग्रेजों से माफी थी।जबकि सच्चाई यह है वीर सावरकर ने अपने लिए नही ब्लकि अंडमान जेल में बंद सारे कैदियों के लिए माफी मांगी थी।मटमैला रंग का दस्तावेज का जो पीडीएफ फोटो है वह पुरी तरह से असली है जो संकेत कुलकर्णी ने लंदन से प्राप्त की है उसे आप स्वयं पढ़ सकते हैं।जिसमें वह साफ शब्दों में अंडमान जेल के सारे कैदियों के लिए दया याचिका की मांग कर रहे हैं।

…अब आप कहेगें कि सावरकर जी ने सारे कैदियों के लिए माफी याचिका क्यों मांगी थी तो इसके लिए आपको वीर सावरकर के लिखी अंग्रेजी में एक किताब पढ़ना होगा उस किताब का नाम है।– My Transporation Life है उस किताब में टोटल 307 पेज है।यदि आपके पास पुरी किताब पढ़ने का समय नही है तो मत पढ़ीए लेकिन इस किताब के पेज नम्बर 69,219,220 और 221 पढ़ने लायक है।मूल रुप से यह पुस्तक मराठी भाषा में थी जिसे अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है।

…खैर, सावरकर साहब को सारे कैदियों के लिए माफी की जरुरत क्यों पड़ गई थी ?तो इसका उत्तर यह किताब देता है कि वें इंदू भुषण नामक कैदी के आत्महत्या से वें इतने दुखी हो गये थें कि उन्होनें सारे कैदियों के लिए माफी याचिका लिख डाली थी।आप इसका बिवरण इस पुस्तक के Indu had hanged himself last night में पढ़ सकते हैं।

…वीर सावरकर ने एक जगह इस पुस्तक में खुद लिखा है कि मैं एक बैरिस्टर होकर ऐसी गलती कैसे कर सकता था ? यदि मैं पत्र लिखता तो अनेक अंग्रेज अफसरों के हाथों में जाती और वें इसे या तो दबा लेते नही तो फाड़ देते क्योंकी अंडमान का कालापानी के सजा मानवाधिकार के खिलाफ था और उन्हें लज्जित होना पड़ता।अब ज्यादा नही लिखुंगा यह पुस्तक आपको Pdf में गुगल पर उपलब्ध है इसे डाउनलोड कर सभी पढ़ सकते हैं।खैर इस लेख में जो फोटो अपलोड किया गया है उसमें अंडरलाइन किए हुए शब्दों को पढ़ लिजीए सावरकर साहब ने अपने लिए नही ब्लकि अंडमान जेल में बंद सारे कैदियों के लिए माफी याचिका भेजी थी।

साभार- कॉपीपोस्ट

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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के विवाह का दुर्लभ निमंत्रण पत्र..

बुन्देलो हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

1857 स्वातंत्र्य समर की महानायिका,भारत की नारी शक्ति के अदम्य साहस,अप्रतिम सामर्थ्य व अपरिमित त्याग की प्रतीक, महान वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के वर पक्ष का विवाह का दुर्लभ पत्र..

इन्हीं राजा मर्दन सिंह जूदेव को झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने आजादी की लड़ाई में शामिल होकर अंग्रेजों को देश से बाहर करने के संकल्प में भागीदारी हेतु एक ओर पत्र लिखा था जो मशहूर है और महारानी लक्ष्मीबाई ने इन्हीं राजा मर्दन सिंह जी को अंग्रेज अफसर से लड़ाई में छीनी गयी दूरबीन भी भेंट की थी ।

आज के समय में सनातन संस्कृति को भूल कर विवाह में निमंत्रण पत्र को अंग्रेजी कालीन परंपरा में लिख रहे हैं ..
किसी विद्वान ने कहा है कि किसी देश को अगर कमजोर करना है तो उसके सनातन संस्कृति खत्म कर दो अपने आप कमजोर हो जाएगा..

©Balveer Singh Solanki Basni ✍️

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♦️♦️♦️ रात्रि कहांनी ♦️♦️♦️

*👉🏿परोपकार की ईंट 🏵️ 🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅
*बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे. उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।*

वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी ,

“आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।”

आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।

ऋषिवर बोले , “प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है. मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें.

यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा.”

तो क्या आप सब तैयार हैं?”

” हाँ , हम तैयार हैं ”, शिष्य एक स्वर में बोले.

दौड़ शुरू हुई.

सभी तेजी से भागने लगे. वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे. वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था.

सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।

“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”, ऋषिवर ने प्रश्न किया।

यह सुनकर एक शिष्य बोला , “ गुरु जी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की.”

“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ”, ऋषिवर ने आदेश दिया.

आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे. पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे. सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे.

“मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं.” ऋषिवर बोले।

“दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।”

पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है. पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है.

अतः यहाँ से जाते -जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना कभी ना भूलें , अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी होगी।”

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जब एक आतंकवादी , यासिर अराफात ने इजराइल के विरुद्ध फिलिस्तीन राष्ट्र की घोषणा की , तो फिलिस्तीन को सबसे पहले मान्यता देने वाला देश कौन था ?

सउदी अरब ? – जी नहीं !
पाकिस्तान ? – जी नहीं !
अफगानिस्तान- जी नहीं !
इराक ? – जी नहीं !
तुर्की ? – जी नहीं !

सोचिये , फिर किस देश ने फिलिस्तीन को सबसे पहले मान्यता दी होगी ..???
सेकुलर भारत ! जी हाँ !

इंदिरा गाँधी ने मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए , सबसे पहले फिलिस्तीन को मान्यता दी , और यासिर अराफात जैसे आतंकवादी को ” नेहरु शान्ति पुरस्कार “, और राजीव गाँधी ने उसको ” इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय शान्ति पुरस्कार ” दिए ! और तो और राजीव गाँधी ने तो उसको पूरे विश्व में घूमने के लिए बोईंग ७४७ गिफ्ट में दिया था !

अब आगे जानिए , वही खुराफात , क्षमा करें, अराफात , ने OIC ( Organisation of Islamic Countries ) में काश्मीर को “” पाकिस्तान का अभिन्न भाग “‘ बताया , और उस आतंकवादी ने बोला कि ” पाकिस्तान जब भी चाहें , तब मेरे लड़ाके काश्मीर की आज़ादी के लिए लड़ेंगे !”

जी हाँ , इतना ही नहीं , जिस शख्स को दुनिया के १०३ देश आतंकवादी घोषित किये हों , और जिसने ८ विमानों का अपहरण किया हो , और जिसने दो हज़ार निर्दोष लोगों को मार डाला हो , ऐसे आतंकवादी यासिर अराफात को सबसे पहले भारत ने किसी अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा ! इंदिरा गाँधी ने उसे ” नेहरु शान्ति पुरस्कार ” दिया , जिसमें एक करोङ रूपये नगद , और दो सौ ग्राम सोने से बना एक शील्ड होता है ! आप सोचिये , १९८३ में , यानि आज से ३७ वर्षों पहले , एक करोङ रूपये की आज वैल्यू क्या होगी ! ( डेढ़ अरब से भी ऊपर ) फिर राजीव गाँधी ने उसे ” इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय शान्ति पुरस्कार ” दिया ! फिर यही यासिर अराफात काश्मीर के मामले पर खुलकर पाकिस्तान के साथ हो गया , और इसने घूम – घूमकर पूरे इस्लामिक देशों में कहा , कि फिलिस्तीन और काश्मीर दोनों जगहों के मुसलमान गैर-मुसलमानों के हाथों मारे जा रहे हैं , इसलिए पूरे मुस्लिम जगत को इन दोनों मामलों पर एकजुट होना चाहिए !

अब , वो कांग्रेस पार्टी मोदी जी को सिखा रही है , कि ” विदेश नीति कैसे की जाती है ..!”

अब आप विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं कि देशद्रोही कौन हैं और देशभक्त कौन ।

🚩 वंदे मातरम! जय हिन्द !! 🚩
हिन्दूध्वज वाहक

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अशोक कुमार शुक्ल सनातनधर्मी जी की पोस्ट से….. तूफानों पर नजर रखो, शैलाबों पर वार करो,
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर कर दरिया पार करो।

काश्मीरी हिन्दू अगर काश्मीर वापस जाएँगे तो वहाँ कैसे रहेंगे?
98% जनसँख्या जो आपके अस्तित्व से घृणा करती हो, उसके बीच में आप कैसे रहेंगे.
एक फिनोमिनल उदाहरण याद आता है…जैसे यहूदी फिलिस्तीन में अरबों के बीच जीवित रहे, लड़े और अपने लिए एक इस्राएल बनाया.
फिर ले दे कर बात इसपर आती है कि हम यहूदियों जैसे नहीं हैं…

पर यहूदी हमेशा ऐसे नहीं थे जैसे आज हैं. यहूदी 1500 सालों तक फिलिस्तीनियों से मार खाकर भागे रहे. अपना एक मुल्क नहीं था. यहूदी पूरी दुनिया में फैला रहा, उसे सिर्फ अपने पैसे कमाने से मतलब रहा. दुनिया की सबसे पढ़ी-लिखी और संपन्न कौम होने के बावजूद यहूदी पूरी दुनिया की घृणा और वितृष्णा का पात्र रहा. और यहूदी भी तब तक नहीं जागे जब तक उनका अस्तित्व खतरे में नहीं आ गया. हिटलर अकेला उन्हें नहीं मार रहा था, पूरा यूरोप उनके मार खाने पर खुश था.
इंग्लैंड की विदेश नीति में द्वितीय विश्व युद्ध तक यहूदियों के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी. आपने अगर लॉरेंस ऑफ़ अरबिया फिल्म देखी हो तो याद होगा…पहले विश्वयुद्ध में अंग्रेजों और अरबों में बहुत याराना था. यह दूसरे विश्वयुद्ध तक चला, और जब दुनिया भर के यहूदी फिलिस्तीन में छुप कर सर्वाइव करने का प्रयास कर रहे थे तब भी सरकारी ब्रिटिश नीति अरबों के पक्ष में थी. उस समय एक अँगरेज़ फौजी अफसर फिलिस्तीन में इंटेलिजेंस ऑफिसर बन कर आया. नाम था कैप्टेन ऑर्ड विनगेट. विनगेट एक अजीब सी, पर असाधारण शख्सियत था. वह एक इन्फेंट्री जीनियस था. व्यक्तिगत रूप से उसे यहूदियों से बहुत सहानुभूति थी. और सरकारी ब्रिटिश नीति के विरुद्ध जाकर उसने यहूदियों को एकत्र करना और उन्हें लड़ाई के लिए तैयार करना शुरू किया. बेन गुरिएन, ज़्वी ब्रेनर और मोशे दयान जैसे भविष्य के इसरायली मिलिट्री लीडर उसके शिष्य बने. विनगेट ने इस्राएलियों को उनकी यह आक्रामक नीति दी...उसके पहले इसरायली कैम्पों में बैठे रक्षात्मक मोर्चे लिए रहते थे. अरब गैंग आते और उनपर हमले करके चले जाते, इसरायली सिर्फ जरूरत भर रक्षात्मक कार्रवाई करते थे. एक दिन विनगेट ने ज़्वी ब्रेनर से बात करते हुए पूछा - तुम्हें पता है, इन पहाड़ियों के पार जो अरब हैं, वे तुम्हारे खून के प्यासे हैं...एक दिन ये आएंगे और तुम्हारा अस्तित्व मिटा देंगे? ब्रेनर ने कहा - वे यह आसानी से नहीं कर पाएंगे...हम बहादुरी से उनका मुकाबला करेंगे...

विनगेट ब्रेनर पर बरस पड़ा – तुम यहूदी भी ना, masochist (आत्मपीड़क) हो…तुम कहते हो – आओ, मुझे मारो…जब तक वह तुम्हारे भाई का क़त्ल नहीं कर दे, तुम्हारी बहन का रेप नहीं कर दे, तुम्हारे माँ-बाप को नाले में नहीं फेंक दे, तुम हाथ नहीं उठाओगे…
तुम लड़ कर जीत सकते हो, पर मैं तुम्हें सिखाऊंगा कि लड़ना कैसे है…
फिर विनगेट ने यहूदियों की टुकड़ियों का कई सैनिक अभियानों में नेतृत्व किया. वह अरब ठिकानों का पता लगाता, उनपर घात लगा कर हमला करता, उन्हें बेरहमी से मार डालता और कई बार अरबों की लाशें लॉरी में लादकर फिलिस्तीनी पुलिस स्टेशन के सामने फेंक आता…
विनगेट ने यहूदियों की मिलिट्री स्ट्रेटेजी ही नहीं, उनकी मानसिक अवस्था बदल दी. उन्हें रक्षात्मक से आक्रामक बनाया…इजराइल को मोशे दयान जैसे जनरल तैयार करके दिए…विनगेट अकेला एक ऐसा गैर-यहूदी है जिसकी मूर्ति इजराइल में लगाई गई है… आप भेड़ियों के बीच में भेड़ बनकर नहीं जी सकते. जान पर बनती है तो भेंड़ बना यहूदियों का झुण्ड इजराइल बन कर शेर की तरह रहना सीख लेता है...तो हम तो वह फिनोमिनल भरत वंशी हैं जिनका बचपन ही सिंह शावकों के साथ बीता था...।

पूनम सोनी माँ

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🚩गुरु गोविंद सिंह ने औरंगजेब को जो पत्र लिखा था आज भारतीयों के लिए प्रेरणादायी है

🚩गुरु गोविन्द सिंह जी एक महान योद्धा होने के साथ साथ महान विद्वान् भी थे। वह ब्रज भाषा, पंजाबी, संस्कृत और फारसी भी जानते थे और इन सभी भाषाओँ में कविता भी लिख सकते थे। जब औरंगजेब के अत्याचार सीमा से बढ़ गए तो गुरूजी ने मार्च 1705 को एक पत्र भाई दयाल सिंह के हाथों औरंगजेब को भेजा। इसमे उसे सुधरने की नसीहत दी गयी थी। यह पत्र फारसी भाषा के छंद शेरों के रूप में लिखा गया है। इसमे कुल 134 शेर हैं। इस पत्र को “ज़फरनामा” कहा जाता है।

🚩यद्यपि यह पत्र औरंगजेब के लिए था। लेकिन इसमे जो उपदेश दिए गए है वह आज हमारे लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इसमे औरंगजेब के आलावा मुसलमानों के बारे में जो लिखा गया है, वह हमारी आँखें खोलने के लिए काफी हैं। इसीलिए ज़फरनामा को धार्मिक ग्रन्थ के रूप में स्वीकार करते हुए दशम ग्रन्थ में शामिल किया गया है।

🚩जफरनामा से विषयानुसार कुछ अंश प्रस्तुत किये जा रहे हैं। ताकि लोगों को इस्लाम की हकीकत पता चल सके —

1 – शस्त्रधारी ईश्वर की वंदना —

बनामे खुदावंद तेगो तबर, खुदावंद तीरों सिनानो सिपर।
खुदावंद मर्दाने जंग आजमा, ख़ुदावंदे अस्पाने पा दर हवा। 2 -3.

🚩अर्थ : उस ईश्वर की वंदना करता हूँ, जो तलवार, छुरा, बाण, बरछा और ढाल का स्वामी है और जो युद्ध में प्रवीण वीर पुरुषों का स्वामी है, जिनके पास पवन वेग से दौड़ने वाले घोड़े हैं।

2 – औरंगजेब के कुकर्म :-

तो खाके पिदर रा बकिरादारे जिश्त, खूने बिरादर बिदादी सिरिश्त
वजा खानए खाम करदी बिना, बराए दरे दौलते खेश रा

🚩अर्थ :- तूने अपने बाप की मिट्टी को अपने भाइयों के खून से गूँधा, और उस खून से सनी मिटटी से अपने राज्य की नींव रखी। और अपना आलीशान महल तैयार किया।

3 – अल्लाह के नाम पर छल —

न दीगर गिरायम बनामे खुदात, कि दीदम खुदाओ व् कलामे खुदात
ब सौगंदे तो एतबारे न मांद, मिरा जुज ब शमशीर कारे न मांद.

अर्थ : तेरे खु-दा के नाम पर मैं धोखा नहीं खाऊंगा, क्योंकि तेरा खु-दा और उसका कलाम झूठे हैं। मुझे उनपर यकीन नहीं है। इसलिए सिवा तलवार के प्रयोग से कोई उपाय नहीं रहा।

4 – छोटे बच्चों की हत्या —

चि शुद शिगाले ब मकरो रिया, हमीं कुश्त दो बच्चये शेर रा.
चिहा शुद कि चूँ बच्च गां कुश्त चार, कि बाकी बिमादंद पेचीदा मार.

अर्थ : यदि सियार शेर के बच्चों को अकेला पाकर धोखे से मार डाले तो क्या हुआ। अभी बदला लेने वाला उसका पिता कुंडली मारे विषधर की तरह बाकी है। जो तुझ से पूरा बदला चुका लेगा।

5 – मु-सलमानों पर विश्वास नहीं —

मरा एतबारे बरीं हल्फ नेस्त, कि एजद गवाहस्तो यजदां यकेस्त.
न कतरा मरा एतबारे बरूस्त, कि बख्शी ओ दीवां हम कज्ब गोस्त.
कसे कोले कुरआं कुनद ऐतबार, हमा रोजे आखिर शवद खारो जार.
अगर सद ब कुरआं बिखुर्दी कसम, मारा एतबारे न यक जर्रे दम.

अर्थ : मुझे इस बात पर यकीन नहीं कि तेरा खुदा एक है। तेरी किताब (कु-रान) और उसका लाने वाला सभी झूठे हैं। जो भी कु-रान पर विश्वास करेगा, वह आखिर में दुखी और अपमानित होगा। अगर कोई कुरान कि सौ बार भी कसम खाए, तो उस पर यकीन नहीं करना चाहिए।

6 – दुष्टों का अंजाम —

कुजा शाह इस्कंदर ओ शेरशाह, कि यक हम न मांदस्त जिन्दा बजाह.
कुजा शाह तैमूर ओ बाबर कुजास्त, हुमायूं कुजस्त शाह अकबर कुजास्त.

अर्थ : सिकंदर कहाँ है, और शेरशाह कहाँ है, सब जिन्दा नहीं रहे। कोई भी अमर नहीं हैं, तैमूर, बाबर, हुमायूँ और अकबर कहाँ गए। सब का एकसा अंजाम हुआ।

7 – गुरूजी की प्रतिज्ञा —

कि हरगिज अजां चार दीवार शूम, निशानी न मानद बरीं पाक बूम.
चूं शेरे जियां जिन्दा मानद हमें, जी तो इन्ताकामे सीतानद हमें.
चूँ कार अज हमां हीलते दर गुजश्त, हलालस्त बुर्दन ब शमशीर दस्त.

अर्थ : हम तेरे शासन की दीवारों की नींव इस पवित्र देश से उखाड़ देंगे। मेरे शेर जब तक जिन्दा रहेंगे, बदला लेते रहेंगे। जब हरेक उपाय निष्फल हो जाएँ तो हाथों में तलवार उठाना ही धर्म है।

8 – ईश्वर सत्य के साथ है —

इके यार बाशद चि दुश्मन कुनद, अगर दुश्मनी रा बसद तन कुनद.
उदू दुश्मनी गर हजार आवरद, न यक मूए ऊरा न जरा आवरद.

अर्थ : यदि ईश्वर मित्र हो, तो दुश्मन क्या क़र सकेगा, चाहे वह सौ शरीर धारण क़र ले। यदि हजारों शत्रु हों, तो भी वह बल बांका नहीं क़र सकते है। सदा ही धर्म की विजय होती है।

🚩गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी इसी प्रकार की ओजस्वी वाणियों से लोगों को इतना निर्भय और महान योद्धा बना दिया कि अब भी शांतिप्रिय — सिखों से उलझाने से कतराते हैं। वह जानते हैं कि सिख अपना बदला लिए बिना नहीं रह सकते। इसलिए उनसे दूर ही रहो।

🚩इस लेख का एकमात्र उद्देश्य है कि आप लोग गुरु गोविन्द साहिब कि वाणी को आदर पूर्वक पढ़ें, और श्री गुरु तेगबहादुर और गुरु गोविन्द सिंह जी के बच्चों के महान बलिदानों को हमेशा स्मरण रखें। और उनको अपना आदर्श मनाकर देश धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो जाएँ। वरना यह सेकुलर और जिहा दी एक दिन हिन्दुओं को विलुप्त प्राणी बनाकर मानेंगे।

🚩गुरु गोविन्द सिंह का बलिदान सर्वोपरि और अद्वितीय है।

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, बढे धर्म हिन्दू सकल भंड भागे…।
Source-Vedic Sikhism.

🚩गुरु गोविन्द सिंह के महान संकल्प से खालसा की स्थापना हुई। हिन्दू समाज अत्याचार का सामना करने हेतु संगठित हुआ। पंच प्यारों में सभी जातियों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। इसका अर्थ यही था कि अत्याचार का सामना करने के लिए हिन्दू समाज को जात-पात मिटाकर संगठित होना होगा। तभी अपने से बलवान शत्रु का सामना किया जा सकेगा…

🚩खेद है की हिन्दुओं ने गुरु गोविन्द सिंह के सन्देश पर अमल नहीं किया। जात-पात के नाम पर बटें हुए हिन्दू समाज में संगठन भावना शुन्य हैं। गुरु गोविन्द सिंह ने स्पष्ट सन्देश दिया कि कायरता भूलकर, स्वबलिदान देना जब तक हम नहीं सीखेंगे तब तक देश, धर्म और जाति की सेवा नहीं कर सकेंगे।

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દેશ જે દિવસે “આઝાદ” થયો ત્યારે પહેલી “સહી” “ભાવનગરના મહારાજા”એ કરી. ગાંધીજી પણ એક “ક્ષણ” માટે “સ્તબ્ધ” થઈ ગયેલા. “૧૮૦૦ પાદર – ગામ” “સૌથી પહેલા આપનારા” એ “ભાવનગરના “મહારાજા કૃષ્ણકુમારસિંહજી.”

“ભાવનગર મહારાજે” વલ્લભભાઈ પટેલને પૂછ્યું , વલ્લભભાઈ મને “પાંચ મિનીટ”નો સમય આપશો?

“વલ્લભભાઈ”એ “મહારાજા”ને કહ્યું કે, “પાંચ મિનીટ” નહીં “બાપુ”, તમે કહો એટલો સમય આપું.

ભાવનગર “મહારાજે” વલ્લભભાઈને વાત કરી કે, આ “રાજ” તો “મારા બાપ”નું છે, “મારું” છે. “સહી” કરું એટલી વાર છે. દેશ આઝાદ થઈ જશે, પણ “મહારાણી”નો જે “કરિયાવર” આવ્યો છે એનો “હું માલિક” નથી. મારે “મહારાણી”ને પુછાવવું છે કે એ “સંપત્તિ”નું શું કરવું?
એક માણસ “મહારાણી”ને પૂછવા ગયો.

માણસે “મહારાણી”ને કહ્યું કે, “મહારાજ” સાહેબે પૂછાવ્યું છે કે પોતે સહી કરે એટલી વાર છે, “રજવાડાં” ખતમ થશે, “દેશ આઝાદ” થશે, પણ તમારા “દાયજા”નું શું કરવું ?
ત્યારે “ગોહિલવાડ”ની આ “રાણી” એ જવાબ આપ્યો કે, “મહારાજ”ને કહી દો કે આખો “હાથી” જતો હોય ત્યારે એનો “શણગાર” ઉતારવાનો “ના” હોય, “હાથી “શણગાર” સમેત આપો તો જ સારો લાગે.

આરપાર : દેશ આઝાદ થઈ ગયો પછી મહારાજા “કૃષ્ણકુમારસિંહજી” એ મદ્રાસનું “ગવર્નર” પદ શોભાવ્યું, અને એ પણ “૧” રૂપિયાના “માનદ વેતન”ની શરતે.”

ઘણી વખત વિચાર આવે છે કે કેવા લોકો પાસે થી આપણે સત્તા, સંપતિ છોડાવી અને કેવા લોકો ના હાથ માં સોપી દીધી…!!!!

Proud for such nationalists.

नीलेश दवे

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કોડભરી કન્યાઓને કન્યા દાન

ધન્ય છે તળાજા ના ધણી એભલ વાળાને
……………
કૈંક કોડભરી કન્યાઓ વિનાં વાંકે ઘરમાં પુરાઈ બેઠી હતી તેમ હજારો યુવાનો મીંઢોળ વગરના જાણે ધડપણનો ટોડલો ઝાલી બેઠાં હતાં મુવા પછી પીંડ મૂકનારૂ કોઈ નહીં એ જીવતર હારી બેઠાં. પણ આજ એ બધાયના કરમાતા મનોરથોનો મુક્તિ દિન હતો
તળાજા ડુંગર ઉપર સુકા ભઠ્ઠ પહાડ પર ભાતીગળ માનવવૃક્ષો ના નંદનવન ઝુમી ઉઠ્યા છે હજારો ચુદડીઆળી કન્યાઓના છેડલા હવામાં લહેરાય રહ્યા છે મોડબંધા જુવાનિયાઓની જુવાની જાણે ફૂટી નીકળી લગ્નના લ્હાવા સ્વપ્નેય જોવાં નહીં પામીએ એવાં હતાશ હૈયાંનો હરખ હેલે ચડ્યા છે ચારેકોરથી ચુદડીઆળીઓની કતારો રંગબેરંગી પાઘડીઓ લંગારો હાલી આવે છે ડુંગર ટોચે લગ્નવેદી રચી છે બેય પડખે જબરા કુંડોમા ઘી દુધના ઘડા ઠલવાય છે આહુતિઓ હોમાઈ છે જવતલના ગોટેગોટા આભે ચડ્યા છે વેદી પાસે તળાજાનો રાજા બાપ એભલ ઉભો છે વેદી ફરતાં વરઘોડીઓના જોડલા એક પછી એક પરણી ઊતરે છે મંડપમા પગ મુકવાની જગ્યા નથી એટલો મનખો રાજા એભલ કન્યાઓના કિલ્લોલ થી શેર લોહી ચડે છે જુવાની એળે ગયાને સ્થાને લહાવ લેતાં જુવાનિયાઓને ભાળી છાતી ગજ ગજ ફુલે છે બ્રાહ્મણશાહીના સતાના મહા અનર્થ સામે હામ ભીડનારી રાણી એભલને હજારો હૈયાં લાખ લાખ કુંવારા કોડો અંતરના આશિષ વરસે છે
..સાત સૈકા પેહલા બ્રાહ્મણી સતા એટલી બધી વકરેલી કે એક એક કન્યા પરણાવવાના સો સો રૂપિયા બ્રાહ્મણ પુરોહિતો વસુલ કરતાં વળા શહેરમાં એ કાળે એક હજાર વાલમ બ્રાહ્મણોના ઘર આ વાલ્યમો ત્યાં વસ્તી કાયસ્થ જ્ઞાતિનાં ગોર હતાં એથી મો માંગી દિક્ષા યજમાન પાસે પડાવતા ગમેતે વેચીને પણ ગોરનો લાગો ચૂકવતા.એથી અનેક દિકરીઓના માવતરો આ બ્રાહ્મણનો બરડાતોડ લાગો ન ચુકવી શકવાને કારણે પોતાની પુત્રીઓને ત્રીસ ત્રીસ વરસની કરી બેઠાં હતાં આ દંડ સામે કાયસ્થો કાકલુદી કરતાં કે ગોર મહારાજ લાગો ઓછો કરો બાપ એવડો મોટો કર અમથી શેં ભરાઇ દયા કરો. પણ વાલ્યમો જરાય ચસ ન દિધો પરીણામે કાયસ્થ જ્ઞાતિ લગ્નો બંધ કરી બેઠી દિકરા દિકરીઓનો લગ્ન સંસાર ભસ્મ થવાં બેઠો પણ વાલ્યમો પથ્થર કાળજા ન પીગળ્યા. ઊલટા એતો ધમકી આપતાં લગ્ન નહીં કરો તો અમે ત્રાગા કરીશું ટોડલે લોહી છાટીશુ બ્રાહ્મહત્યાનુ પાપ ચોટશે ને ધનોતપનોત નીકળી જશે વાલ્યમોના ત્રાસથી કાયસ્થો ત્રાહી ત્રાહી પોકારી ગયા. એમને ભયનાં માર્યા રાજા એભલ પાસે ધા નાંખી. રાજા એભલ ધા સાંભળી દંગ રહી ગયો એમને કીધું ચિંતા ના કરશો તમારી દિકરી એ મારી દિકરીઓ તમતમારે લગ્ન કરો. હું સૌના લાગા બ્રાહ્મણોને ચુકવીશ તોય વાલમનો મદ ન ગળ્યો એમણે રોકડું પરખાવ્યું પેલાં પૈસા પછી ફેરા. આવું વર્તન જોઈ એભલ ને પણ ભવા ચઢયા એણે કાયસ્થો ને કહ્યું સૌ પોતપોતાની કન્યા લઇને ચાલો તળાજે ત્યાં હું રાજના રાજપુરોહિતો ને બોલાવી ફેરા ફેરવીશુ ને કન્યાદાન દઇશ કાયસ્થો પોતાની પુત્રીઓને લઇ તળાજા ગયાં એભલે તાલધ્વજાગીરી પર વિશાળ લગ્નમંડપ ઊભો કરી હજારો કન્યાનાં બાપ બની કન્યાદાન દીધાં કરમાયેલા જીવતરને નંદનવન બનાવી દીધું કાયસ્થો એ દિકરીઓ હેમખેમ પરણાવી પોતાને ગામ આવ્યા ત્યારે ગોરોએ તેમને દબાવ્યા ધમકાવ્યા કે અમારા લાગા ચુકવો નહીંતર ત્રાગા કરીશું લોહી છાટીશુ .એભલે વાલ્યમોને સમાધાન માટે જેહમત કરી પણ એકના બે ન થયાં ઊલટા એભલ ની સામે થયાં શ્રાપ આપવા મંડ્યા એભલ વાલ્યમોની અવળચંડાઇ થી ઊકળી ઊઠ્યો તેણે ચોખ્ખું કહી દીધું તમે હવે મારી રૈયત તરીકેનો હક અને રક્ષણ ગુમાવો છો તમને છુટ છે જાઓ.વાલ્યમો એભલને શ્રાપ દેતાં નીકળી ગયા અને કાયસ્થોએ સાધેલા ભીલોએ વાલમો પર હુમલો કર્યો ભાલા તીરોએ સોથ વાળ્યો બચ્યાં એટલાં ભાગ્યા વળામા વાલમનુ બીજ પણ ન રહ્યું

સાત સૈકા પેહલાની આ ઘટનાની સાક્ષીરૂપી આજે પણ તળાજાના ડુંગર પર એભલ મંડપ ઉભો છે

卐 વિરમદેવસિહ પઢેરીયા 卐
卐………….ॐ…………..卐

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

अलवर महाराजा जयसिंह जी नरुका, जिन्हें अपने महल में कुत्ते रखना कतई पसंद नहीं था। एक बार लेडी वायसराय अपने कुत्ते के साथ महाराजा के शिविर में भोजन के लिए आई, तो महाराजा ने उनसे कहलवाया कि कुत्ते को बाहर छोड़कर फिर भोजन के लिए आवें, पर लेडी वायसराय अपनी ज़िद पर अड़ी रही। आख़िरकार लेडी वायसराय को बिना भोजन किए ही जाना पड़ा।

इन महाराजा के इसी तरह बर्ताव के कारण अंग्रेज इनसे काफी तंग आ गए थे। अंग्रेजों ने इनको गद्दी से खारिज करके विदेश भेज दिया था और इनका देहांत भी पेरिस में हुआ।

अंग्रेजों ने इनके चरित्र पर कीचड़ उछालने के लिए कई भ्रामक खबरें फैलाई जिनमें से एक ये भी थी कि इन महाराजा ने एक बार अपने घोड़े पर पेट्रोल छिड़कर उसे मार डाला।

बहरहाल, ये वही महाराजा हैं जिन्होंने प्रसिद्ध रॉल्स रॉयस कंपनी की कारों का प्रयोग कचरा उठाने में करवाया, क्योंकि वहां साधारण कपड़ों में जाने पर कर्मचारियों ने इनको बाहर निकाल दिया था।

alwar #naruka #Rajwade

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एक समय की बात है कि एक आदमी के पास बहुत कीमती घोड़ा था। उसको प्रतिपल यह चिन्ता लगी रहती थी कि कहीं कोई उस घोड़े को चुरा न ले जाए।

एक दिन वह ऐसे नौकर की खोज में निकला जो कि रात भर जाग कर घोड़े का पहरा दे सके। रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिला जिसने उस आदमी से कहा कि आपके घोड़े की रक्षा के लिए मुझ जैसा उपयुक्त नौकर आपको और कोई नहीं मिल सकता।

क्योंकि मैं रात भर सोता नहीं हूँ। मुझे सोचने की आदत है। मैं हर समय कुछ न कुछ सोचता ही रहता हूँ। घोड़े का मालिक प्रसन्न हुआ और उस व्यक्ति को अपने घर ले आया। उसने घोड़े को कमरे में बंद कर बाहर से ताला लगा दिया और चाबी नौकर को दे दी।

रात्रि के 12 बजे मालिक ने सोचा कि कहीं नौकर सो तो नहीं गया। इस बात की पुष्टि कर लेने के लिए वह नौकर के पास पहुंचा और पूछा- “क्या कर रहे हो भाई, सो तो नहीं रहे हो।” नौकर ने कहा कि नहीं, मैं सोया नहीं, मैं तो सोच रहा हूँ। मालिक आश्वस्त हुआ और बोला- “क्या सोच रहे हो?”

नौकर ने कहा कि मैं यह सोच रहा हूँ कि जब दीवार में कील ठोकी जाती हैं तो जिस स्थान पर कील लगती है वहाँ की मिट्टी कहाँ चली जाती हैं?

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मालिक उसकी मूर्खता पर मुस्कुराया और साथ ही साथ आश्वस्त भी हुआ कि चलो नौकर तो ठीक मिल गया जो सोचता ही रहेगा, सोयेगा नहीं। मालिक ने कहा- ठीक है सोचते रहो। और वह वापस अपने घर में आ गया।

रात्रि के दूसरे पहर मालिक पुनः उस नौकर के पास यह देखने के लिए पहुंचा कि कहीं वह अब तो नहीं सो गया। परन्तु मालिक ने पाया कि नौकर अभी भी किसी गहन चिंतन में डूबा हुआ है।

मालिक ने पूछा- “अरे भाई, अब क्या सोच रहे हो?” नौकर बोला- “मैं यह सोच रहा हूँ कि जब टूथपेस्ट को दबाया जाता है तब पेस्ट बाहर क्यों आ जाता है, भीतर की ओर क्यों नहीं जाता?

मालिक ने कहा- हाँ, ठीक है। इसी तरह सोचते रहो। सुबह चार बजे मालिक फिर आया और व्यक्ति से उसके चिन्तन का विषय पूछा। तो व्यक्ति ने कहा कि अब मैं एक अत्यंत गंभीर विषय पर विचार कर रहा हूँ। मालिक बोला- “वह कौन सा गंभीर विषय हैं?”

नौकर ने कहा- “मैं यहाँ सारी रात बैठा रहा, सोया भी नहीं, कमरे को ताला भी लगा हुआ था, फिर घोड़ा गायब हुआ तो कैसे?”

कहीं हम भी उस व्यक्ति की तरह सोचते ही न रह जायें और बिना ब्रह्मज्ञान(ईश्वर दर्शन) के हमारा समय पूर्ण हो जाएँ, और फिर से चौरासी के चक्कर में पड़ना पड़े! ॐ नमः शिवाय

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