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प्रत्येक वर्ष भारत में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया जाता है। भारत के लोकों के लिये ये दिवस अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। वर्षों की गुलामी के बाद ब्रिटिश शासन से इसी दिवस भारत को आजादी मिली। 15 अग्स्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्य से देश की स्वतंत्रता को सम्मान देने के लिये पूरे भारत में राष्ट्रीय और राजपत्रित अवकाश के रुप में इस दिन को घोषित किया गया है। आपको पता है ? “डोमिनियन स्टेट” के रूप में स्वतंत्र भारत के पहले गर्वनर जनरल लार्ड माउन्टबेटन तथा दूसरे गर्वनर जनरल राजगोपालचारी थे। दोनों ने ही “ब्रिटिश क्राउन” के प्रति वफादारी की शपथ ली थी। भारत में गणतंत्र स्थापना के सन्दर्भ में पहली विस्तृत चर्चा 22 अप्रैल, 1949 को लन्दन में “ब्रिटिश कामनवेल्थ” के प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में हुई थी। इसमें भारत के प्रधानमंत्री के नाते पं. जवाहर लाल नेहरू भी उपस्थित थे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई। यह सम्मेलन 6 दिन तक चला। अंतिम दिन, 29 अप्रैल को भारत के गणतंत्र की स्थापना की “अनुमति” दी गई तथा सभी प्रधानमंत्रियों की ओर से एक “संयुक्त घोषणा”, ब्रिटिश प्रधानमंत्री के एक “नोट” के साथ प्रकाशित हुई। इस संयुक्त घोषणा द्वारा भारत को प्रभुता सम्पन्न गणतंत्र की स्वीकृति दी गई। साथ ही भारत के “ब्रिटिश कामनवेल्थ” का सदस्य बने रहने तथा “ब्रिटिश क्राउन” की प्रमुखता स्वीकार करने की भी बात की गई। :-► इण्डिया कॉन्सीकुवैनशियल (प्रोवीजन्स) एक्ट क्या है ? :-►”ब्रिटिश कामनवेल्थ देशों” की व्याख्या क्या है ? :-► इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट १९४७ कलम २ इस धारा के अंतर्गत कलम ८ ( २ ) क्या है ? :-► ब्रिटिश सदन में पारित गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट १९३५ हम पर क्या असर करता है ? :-► भारत आज भी कितने विद्यमान ब्रिटिश कानूनों से बंधा है ? :-► किस संधि के आधार पर हमें स्वतंत्रता मिली ? :-► हमारे देश का आधिकारिक नाम + राष्ट्रीय भाषा क्या है ? :-► १९५०, २६ जनवरी को भारत प्रजासत्ताक हुवा फिर १९५८ तक हमारी सेना के प्रमुख ब्रिटिशर क्यों थे ? :-► ९ जून १९५२ को जापान से शान्ति करार क्यों करना पड़ा ? :- ► डोमिनियन की व्याख्या क्या है ? :-► अधिराज्य + उपनिवेश का अर्थ क्या है ? भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ (Indian Independence Act 1947) युनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट द्वारा पारित वह विधान है जिसके अनुसार ब्रिटेन शासित भारत का दो भागों (भारत तथा पाकिस्तान) में विभाजन किया गया। यह अधिनियम को 18 जुलाई 1947 को स्वीकृत हुआ और १५ अगस्त १९४७ को भारत बंट गया। क्या हमारा वर्तमान संविधान इसे स्वीकारता है ? प्रधानमंत्री की सपथ : भारत के संविधा प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा। में भारत की प्रभुता और अखण्डता का अक्षुण्ण रखूंगा। में संघ के प्रधानमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।’ ‘मैं, ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि जो विषय संघ के प्रधानमंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को, तब के सिवाय जबकि प्रधान मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक्‌ निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूँगा।’ मित्रों इस सपथ विधि के शब्दों में कही पर भारत देश / हिन्दुस्थान / या देश का नाम नहीं लिया जाता ! और संघ के प्रधान मंत्री शब्द का उपयोग किया होता है ! यह संघ शब्दों की व्याख्या कया ? क्यों भारत देश ऐसा नहीं बोला या लिखा जाता ? अत: भारत में गणतंत्र की स्थापना “ब्रिटिश कामनवेल्थ देशों” के संयोग तथा “ब्रिटिश क्राउन” की सहमति से हुई। साथ ही विद्यमान ब्रिटिश कानूनों का प्रतिबन्ध लगा, जब तक कि उन्हें कानूनी प्रक्रिया द्वारा भंग न कर दिया जाए। इस दृष्टि से भारत एक प्रभुसत्ता सम्पन्न गणतंत्र होने पर भी ब्रिटिश कानून मानने के लिए बाध्य रहा। तो क्या हमारा राष्ट्र ‘ भारत ‘ सम्पूर्ण स्वततंत्र है ? क्या हम आजाद है ? या हम आज भी ब्रिटिश के ‘ प्रादेशिक शासन स्वतंत्रता ‘ के अंतर्गत आते है ? डोमिनियन status शब्द की परिभाषा क्या है ? मीडिया को इस विषय पर डिबेट करनी चाहिए। राष्ट्र की हर नागरिक को इस सत्य से परिचित करने का राष्ट्र केे चौथे स्तंभ का दायित्व है। जय श्री कृष्ण …… भारत माता की जय ……. वंदे मातरम् ……. :-►

नीलेश जयपाल

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मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत के टॉप मोस्ट 5 गद्दार..


मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत के टॉप मोस्ट 5 गद्दार…..*

 

यू तो हमारे बच्चों के इतिहास की किताबों में यह चैप्टर होना चाहिए था…

ताकि आने वाली पीढ़ी इन गद्दारो को जान पाती समझ पाती…

खैर …छोड़िये

आप इस आर्टिकल को पढ़िए और अपने बच्चों को बताइये।

 

 

❌भारतीय इतिहास के ये #5 गद्दार कभी भुलाए नहीं जा सकते

 

 

 

#712 AD में इस्लामिक आक्रमणकारी भारत में आने शुरू हुए और #1600 में अंग्रेज व्यापार के नाम पर भारत आये.

जिस कारण भारत लगातार विदेशियों के निशाने पर था.

 

बेशक भारत पूर्ण गुलाम कभी न हुआ और कभी कोई क्षेत्र गुलाम होता था तो कभी कोई आजाद भी करवा लिया जाता था.

 

मगर इस दौरान विदेशियों को समर्थन मिला भारत के अंदर छिपे बैठे कुछ गद्दारों का,

जिन्होंने अपना जमीर गिरवी रख कर अपने ही देश के साथ गद्दारी की.

 

कहा जा सकता है कि अगर ये गद्दार न होते तो आज भारत का इतिहास गुलामी की जंजीरों की बजाय समृद्धि की कथा कहता. इन्हीं में से 5 गद्दारों के बारे में आज हम जानेंगे ….!!

 

 

❌1) *#जयचंद*

जब-जब इतिहास के पन्नों में राजा पृथ्वीराज चौहान का नाम लिया जाता है,

तब-तब उनके नाम के साथ एक नाम और जुड़ता है, वो नाम है जयचंद. किसी भी धोखेबाज, गद्दार या देश द्रोही के लिए जयचंद का नाम तो मानो मुहावरे की तरह प्रयोग किया जाता है.

 

साथ ही जयचंद को लेकर तो एक मुहावरा खूब चर्चित है कि… “जयचंद तुने देश को बर्बाद कर दिया गैरों को लाकर हिंद में आबाद कर दिया…”

 

बता दें कि जयचंद कन्नौज का साम्राज्य का राजा था.

बेशक पृथ्वीराज चौहान और राजा जयचंद की दुश्मनी बहुत पुरानी थी और उन दोनों के बीच कई बार भयंकर युद्ध भी हो चुके थे.

बावजूद इसके पृथ्वीराज ने जयचंद की पुत्री संयोगिता से विवाह रचाया था.

मगर जयचंद अब भी अंदर ही अंदर पृथ्वीराज को दुश्मन मानता था और मौके की तलाश में रहता था.

एक बार जयचंद को पता चला कि मोहम्मद गौरी भी पृथ्वीराज से अपनी हार का बदला लेना चाहता है.

 

जयचंद ने दिल्ली की सत्ता के लालच में मोहम्मद गौरी का साथ दिया और युद्ध में गौरी को अपनी सेना देकर पृथ्वीराज को हरा दिया.

मगर युद्ध जीतने के बाद गौरी ने राजा जयचंद को भी मार दिया✔

और उसके बाद गौरी ने कन्नौज और दिल्ली समेत कई अन्य राज्यों पर कब्जा कर लिया. जयचंद ने सिर्फ पृथ्वी राज को ही धोखा नहीं दिया

बल्कि समस्त भारत को धोखा दिया क्यूंकि गौरी के के बाद देश में इस्लामिक आक्रमणकारी हावी होते चले गये थे.

 

 

 

❌2) *#मानसिंह*

पृथ्वी राज चौहान और महाराणा प्रताप में कौन अधिक महान इस पर चर्चाएँ कितनी भी हो सकती है,

वहीं उनके समकालीन राजद्रोही मानसिंह और जयचंद के बीच भी गद्दारी की क्षमता में मुकाबला कड़ा मिलेगा.

 

एक तरफ जहाँ महाराणा प्रताप संपूर्ण भारत वर्ष को आज़ाद कराने के लिए दर-दर भटक रहे थे और जंगलो में रहकर घास की रोटियां खाकर देश को मुगलों से बचाने की कोशिश कर रहे थे तो

वहीं मानसिंह मुगलों का साथ दे रहे थे.

 

राजा मानसिंह मुगलों के सेना प्रमुख थे और वह आमेर के राजा थे.

यही नहीं महाराणा प्रताप और मुगलों की सेना के बीच लड़े गए हल्दी घाटी के युद्ध में वो मुगल सेना के सेनापति भी बने थे,

मगर महाराणा ने मान सिंह को मार कर उसकी गद्दारी की सजा उसे दी थी.

 

मानसिंह की गद्दारी के कारण एक बार महाराणा इतने घायल हो गये थे कि उन्हें बचकर जंगलों में काफी समय गुजारना पड़ा था. मगर इस दौरान एक वीर योद्धा की तरह उन्होंने अपने अंदर ज्वाला जलाए रखी थी.

 

उन्होंने घास की रोटी तक खानी पड़ी, मगर उनके अंदर अकबर के साथ मानसिंह को लेकर भी ज्वाला भभक रही थी. बस जब वो योजनाबद्ध तरीके के साथ जंगल से बाहर आये और अपनी सेना को इक्कठा कर फिर से युद्ध किया तो उन्होंने हल्दी घाटी में अकबर को पटखनी दे दी,

जिसके बाद अकबर कई साल तक छिप कर रहा था.

 

 

 

❌3) *#मीर जाफ़र, #मीर कासिम, #टीपू सुल्तान और #मीर सादिक*

वैसे तो किसी को गद्दार कहने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथी काफी है,

मगर मीर जाफ़र कहना भी कम नहीं होता है.

क्यूंकि उसी के राज को भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की शुरुआत माना जाता है.

 

मीर जाफर ने अंग्रेजों की मदद से बैटल ऑफ़ प्लासी में रोबर्ट क्लाइव के साथ मिल कर जाफ़र ने अपने ही राजा सिराजुद्दौला को धोखा दिया था

और भारत में अंग्रेजों की पूर्ण नींव रखी थी.

 

मीर जाफ़र वर्ष #1757 से #1760 तक बंगाल के नवाब रहा था.

माना जाता है कि इसी घटना के बाद भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना की शुरुआत माना जाता है.

 

मगर मीर जाफर को हटाने के लिए अंग्रेजों ने एक और गद्दार का सहारा लिया,

वो था मीर कासिम.

 

मगर मीर कासिम जब तक समझ पता कि उसने अंग्रेजों का साथ देकर गलती की,

तब तक उसे भी मार दिया गया.

 

मीर कासिम को #1764 में बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों ने मार गिराया.

 

टीपू सुल्तान दक्षिण भारत का औरंगजेब था.

वो हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार करता था. ✔

 

मगर हर बार की तरह एक इस्लामिक शासन में एक मुस्लिम द्वारा ही खंजर घोंपने की प्रथा जारी थी

और मीर सादिक नामक उसके एक मंत्री ने अंग्रेजों का साथ देकर उसके साथ गद्दारी की.

और दक्षिण भारत में अंग्रेजों का आगमन हुआ क्यूंकि मीर सादिक को अंग्रेजों ने आसानी से अपने रास्ते से हटा दिया.

 

 

 

❌4) *#फणीन्द्र नाथ घोष*

वैसे इस कड़ी में फणीन्द्र नाथ घोष नामक उस गद्दार का नाम सबसे ऊपर माना जायेगा जिसने सैण्डर्स-वध कांड और असेम्बली बम कांड में

भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी

और *इसी गवाही के आधार पर*

*भगत सिंह,*

*राजगुरू एवं*

*सुखदेव को*

*आरोपी बनाकर उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई.*

 

फणीन्द्र नाथ घोष ने ही *सरकारी गवाह के तौर पर पंडित आज़ाद के शव की शिनाख्त* की थी.

लेकिन घोष की गद्दारी से गुस्साए भगत सिंह के साथी जो जेल में डाल दिए गये,

योगेन्द्र शुक्ल व

गुलाब चन्द्र गुलाली #1932 में दीवाली की रात खुफिया तरीक़े से भाग निकले.

 

जेल से निकलते ही उन्होंने गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष को सज़ा देने की क़सम खा ली.

 

इस क़सम को पूरा किया योगेन्द्र शुक्ल के भतीजे बैकुंठ शुक्ल ने, जिसने खुखरी से घोष को मार डाला.

वार इतने जानलेवा थे कि घोष चीखें मारता ज़मीन पर लोट गया.

बेतिया अस्पताल में क़रीब सप्ताह भर ज़िन्दगी व मौत के बीच जूझते हुए फणीन्द्र नाथ घोष की कहानी ख़त्म हो गयी.

 

बेशक बैकुंठ शुक्ल #6 जुलाई, #1933 को हाजीपुर पुल के सोनपुर वाले छोर से गिरफ़्तार कर लिए गए और

फांसी पर लटका दिए गये.

मगर वे अपना काम बखूबी कर चुके थे.

 

 

 

❌5) *#कांग्रेस👹*

गद्दारी की बात हो और भारत की सबसे पुरानी पार्टी को भूल जाएँ, ऐसा असंभव है.

कोई एक नेता की बात हो तो नाम लिया जाए,

मगर जिस पार्टी के नेताओं ने समय समय पर देश और हिन्दुओं की पीठ में खंजर घोंपा,

 

उसमें किसी एक व्यक्ति का नाम लेना बाकियों के साथ अन्याय होगा.

 

*इसलिए #1885 में स्थापना से लेकर आज तक कांग्रेस के नेताओं का इतिहास दागदार रहा है,*

जिसमें नेहरु से लेकर गांधी तक सब नेताओं के दामन हिन्दुओं और देशवासियों के खून से सटे हुए हैं…

 

कांग्रेस की देश को जो देन है वह मुख्यतः

यह है –

  1. 1947 में देश विभाजन,
  2. कश्मीर समस्या और
  3. 1962 में चीन से लड़ाई में भारत की पराजय…

 

*देश के बँटवारे वाले प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नेहरू के थे,*

सुभाष चंद्र बोस की गुमनामी पर चुप्पी साधने वाले नेहरू थे

और इतिहास में कहा तो ये भी जाता है कि

*चंद्रशेखर आजाद को यदि किसी नें छल से मरवाया तो वे नेहरू ही थे,*

क्यूंकि माना जाता है कि अंत समय में आजाद नेहरु से ही मिले थे जिसके बाद अंग्रेजो ने उन्हें घेर लिया और जिसके बाद उन्हें खुद को गोली मारनी पड़ी.. !!

 

*जागो भारत जागो !! 🚩🚩*

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His Highness कॉपी-पेस्टिया बाबा के सूत्रों द्वारा चीन का सन्


His Highness कॉपी-पेस्टिया बाबा के सूत्रों द्वारा चीन का सन् 1962 में भारत पर आक्रमण करने का वास्तविक कारण का रहस्योद्घाटन ******************************** सन् 1962 के भारत और चीन के बीच युद्ध का एक ऐसा कारण है जिसे तत्कालीन भारत सरकार नहीं जानती थी। हो सकता कि परिवर्ती सरकारें भी न जानती हों। आज की N D A सरकार भी जानती है यह बात भी आवश्यक नहीं। सन् 1962 के चीन के भारत पर आक्रमण का वास्तविक कारण था–‘सांग्रीला घाटी’। सांग्रीला घाटी तवांग मठ के निकट वह घाटी है जहां तृतीय और चतुर्थ आयामों की संधि स्थली है। यह वह दिव्य घाटी है जहाँ कोई साधारण व्यक्ति भी अचानक पहुंच जाए तो वह अमर हो जाता है। उस सांग्रीला घाटी की दिव्यता का रहस्य चीन के शासकों को ‘हिब्रू’ ग्रंथों और ‘भारतीय ग्रंथों’ से पता चल गया था। तिब्बत्त पर अधिकार करना चीन की उसी मंशा का परिणाम था। जब तिब्बत्त पर अधिकार करने के बाद वहां वह घाटी नहीं मिली तो सन् 1962 में अरुणांचल प्रदेश स्थित तवांग मठ के नजदीक हमला करना, वहां के भूभाग पर कब्जा करना उनकी उसी योजना का हिस्सा था। लेकिन उन्हें तब भी सांग्रीला घाटी नहीं मिलनी थी, नहीं मिली। आज जो चीन भारत को आंखें दिखा रहा है, उसके पीछे भी वही एकमात्र कारण वही सांग्रीला घाटी है। भूटान के पास का वह क्षेत्र तो मात्र बहाना है। उसे तो वही दिव्य सांग्रीला घाटी चाहिए। सांग्रीला घाटी वह घाटी है जहां भारत के 64 तंत्र, योग और भारत की प्राच्य विद्यायों को सिखाने के लिए संसार के कोने कोने से पात्र व्यक्तियों को खोज खोज कर बुलाया जाता है और शिक्षा-दीक्षा देने के बाद उसके विस्तार के लिए आचार्यों को घाटी के बाहर भेज दिया जाता है। उस घाटी की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चतुर्थ आयाम में स्थित होने के कारण इन चर्म चक्षुओं से दृष्टिगोचर नहीं होती। वहां उस घाटी में सैकड़ों हज़ारों की संख्या में उच्चकोटि योगी, साधक, सिद्ध तपस्यारत हैं। वहां हमारे इस तीन आयामों वाले संसार की तरह समय की गति तेज नहीं है, बल्कि वह समय मन्द है। वहाँ पहुंच जाने वाला व्यक्ति हज़ारों साल तक वैसा का वैसा ही बना रहता है युवा, स्वस्थ और अक्षुण्ण। यही कारण है कि उस विशेषता के कारण चीनियों की नीयत उस क्षेत्र के लिये हमेशा से कब्जा करने की रही है और आज भी वह भूटान के बहाने से वही निशाना साधने पर आमादा है।

अविनाश कुमार सिंग

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एक_करोड़_की_साड़ी #रक्षाबंधन_स्पेशल


#एक_करोड़_की_साड़ी #रक्षाबंधन_स्पेशल “ये ले छुटकी तेरी राखी का तोहफा…देख कितनी सुन्दर साड़ी है..साड़ी वाड़ी पहना कर..निक्कर पहन के..ये तेरा इधर उधर घूमना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आता” अजय ने राखी बंधवाने के बाद अपने बैग से साड़ी निकालकर हाथ नचाते हुए कहा “मुक्केबाजी की प्रैक्टिस क्या..साड़ी पहन के होती है…आप भी न भइया…बस कमाल हो…अरे.वाह!.. भइया साड़ी तो बहुत ही अच्छी है…” कहकर विजया ने साड़ी खोल के खुद पे लगाई और शीशे में अलट पलट के खुद को देखने लगी अजय अभिमान से बोला “अच्छी क्यों नहीं होगी…पूरे चार हजार की है” फिर उसने पास ही खड़े अपने छोटे भाई अमर को देखते हुए कहा “इन लाट साहब को कितनी बार कहा…मेरे साथ सूरत चलें…अपनी तरह हीरे का काम सिखा दूँगा…पर नहीं इनको यहीं इस कस्बे में सर फोड़ना है…चल तू इसे राखी बाँध मैं जाकर जरा अम्मा के पास बैठता हूँ” “सब अगर सूरत चले गए तो माधव पुर का क्या होगा…और मुझे छुटकी को स्टेट लेवल से आगे की एक बढ़िया मुक्केबाज भी बनाना है..इसे ओलम्पिक में भेजना है” अमर ने बुदबुदाते हुए कहा,अजय उसकी बात सुन दोनों को देख एक व्यंग्यात्मक मुस्कान छोड़ता है और कमरे से निकल जाता है विजया अमर को राखी बाँधती है और अपने हाथ से सिवइयाँ खिलाती है अजय अपने हाथ में लिया चमकीली पन्नी का एक पैकेट पीछे छुपाने लगता है विजया उसे सकुचाते हुए देख लेती है और उससे कहती है “भइया क्या छुपा रहे हो” “कुछ नहीं..अ… वो…मैं…तेरे लिए…” वो आँखों में शर्मिन्दिगी लिए कुछ बोल नहीं पाता,विजया उसके हाथ से पैकेट छीन लेती है और खोलती है उसमें एक बहुत साधारण सी साड़ी होती है वो फिर भी साड़ी की खूब तारीफ करती है “मैं बस…आज…यही ला सका….ढाई सौ की है….” अमर की आवाज रुंधी हुई थी “लेकिन बस जरा मेरा काम जम जाने दे… छुटकी…देखना एक दिन मैं तेरे लिए एक करोड़ की साड़ी लाऊँगा… पूरे माधवपुर क्या सूरत के किसी रईस ने भी वैसी साड़ी न देखी होगी कभी” दोनों भाई बहन की आँखे भीग गईं दिन बीतते जाते हैं अमर का काम बस ठीक ठाक ही चल रहा है वो चाहे खुद आधा पेट रहे पर अपनी छुटकी को कोई कमी नहीं होने देता विजया की सेहत और खानपान की चीजें,बॉक्सिंग के सारे सामान, कोच के पैसे,आना जाना आदि आदि उसकी जितनी भी जरूरतें होती सब पूरी करता उसका हौसला बढ़ाता और पैसे कमाने के लिए दिन रात खटता रहता था इसी कारण उसकी तबियत खराब रहने लगी पर वो विजया के सामने कुछ जाहिर नहीं होने देता था आखिरकार विजया ओलम्पिक के लिये चुन ली जाती है और विदेश में जहाँ ओलम्पिक का आयोजन होता है चली जाती है,इधर अमर को डॉक्टर बताते हैं कि उसे कैंसर है वो भी अंतिम अवस्था में और वो उसे तुरंत सूरत के बड़े अस्पताल जाने को कहते हैं पर पैसे के अभाव में वह जा नहीं पाता और एक दिन इस संसार से विदा हो जाता है विजया बॉक्सिंग मुकाबले के फाइनल में पहुँच जाती है अगले दिन उसे स्वर्ण पदक के लिए कोरिया की बॉक्सर से लड़ना है उसे अमर का आखिरी संदेश मिलता है “छुटकी तुझे फाइनल में जीतना ही होगा मेरे लिए नहीं…बड़ी बिंदी वाली उस महिला के लिए जिसने कहा था कि शक्ल सूरत तो इन जैसी लड़कियो की कुछ खास होती नहीं.. ओलम्पिक में इसलिए जाती हैं कि चड्ढी पहनकर उछलती कूदती टीवी पे दिखाई दें और अपने गाँव में हीरोइन बन जाएं….छुटकी ये जन्म तो चला गया एक करोड़ की साड़ी अगले जनम दिलाऊँगा…तू बस सोना जीत के आना” विजया अमर की मौत से टूट के रह जाती है पर किसी तरह खुद को समेट के वो फाइनल लड़ती है और जीतती है उसके गले में गोल्ड मैडल है उसकी आँखों के सामने तिरंगा ऊपर उठाया जा रहा है उसे लग रहा है जैसे उसके अमर भइया तिरंगे की डोर खींच रहे हैं और झंडे को सबसे ऊपर उठा रहे हैं,उसकी आँख से आंसू बहते ही जा रहे हैं पूरे देश में विजया का डंका बज जाता है कुछ दिनों बाद एक नामी सामाजिक कल्याण (सोशल वर्क) संस्था कैंसर मरीजों के उपचार के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य से देश के तमाम बड़े फ़िल्मी और खेल सितारों की चीजों की नीलामी करवाती है “देवियों और सज्जनों..अब पेश है ओलम्पिक गोल्ड मैडल विनर बॉक्सर विजया की समाज कल्याण के इस कार्य के लिए दी गई अपनी सबसे अनमोल साड़ी जो उनके स्वर्गीय भाई ने उन्हें रक्षाबंधन पे दी थी” भीड़ से पहली ही बोली आती है “एक करोड़”

Laxmikant varshnay

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देश के ग़द्दारों की दास्ताँ.


… देश के ग़द्दारों की दास्ताँ…! . जी न्यूज़ पर ओबैसी का इंटरव्यू देखा … बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था .. बोला कि कोई मुस्लिम कभी गैर मुस्लिम के आगे सर नहीं झुका सकता ..! . काश इसने बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा डॉटर ऑफ़ ईस्ट [पूरब की बेटी] पढ़ी होती …! . अपनी आत्मकथा में बेजनीर ने बड़ी तफसील से अपने पिता के द्वारा इंदिरा गाँधी के सामने किये गये समर्पण को बिना किसी लाग लपेट के लिखा है …! . जुल्फिकार अली भुट्टो भाषण कला में बहुत ही माहिर था .. उसे पूरा कुरआन याद था और वो अपने भाषणों में खूब भड़काऊ बातें कहता था और भारत के खिलाफ चीखता चिल्लता था तथा बीच-बीच में कुरआन की आयतें भी बोलता था .. वो बार-बार कहता था कि हम घास की रोटी खायेंगे लेकिन कश्मीर के लिए ताउम्र लड़ेंगे .. . फिर जब लड़ाई में पोर्किसों की करारी हार हुई और भारतीय सेनाएं लाहौर में घुस गयीं और लाहौर को अपने कब्जे में ले लिया ..तब अमेरिका के दबाव में शिमला समझौता हुआ .. बेनजीर अपने पिता के साथ शिमला आई थी … बेनजीर ने लिखा है कि पिताजी बड़े चिंतित थे कि अब हमारे हाथ से पूरा कश्मीर भी जायेगा और साथ में लाहौर भी निकल जाएगा ..वो अपने दूतों के द्वारा मैमूना बेगम तक बार-बार संदेश भिजवाते थे कि समझौता कुछ इस तरह से कीजिये ताकि मैं अपने देश वापस लौटकर शर्मिंदा न हो जाऊं.. . लेकिन जब समझौता हुआ तब ज़ुल्फ़िकार ने होटल वापस आकर बेनजीर से कहा कि भारत तो बड़ा ही उदार निकला ..लाहौर तो छोड़ो पाक कब्जे वाली कश्मीर से भी मैमूना जी अपनी सेनाएं हटाने को तैयार है .. . शायद भारत ही इस धरती का एकमात्र ऐसा देश है जो युद्ध में जीती गयी जमीन को भी वापस कर चुका है .. लेकिन कभी युद्ध में छिनी गयी अपनी जमीन चीन से वापस नहीं ले सका .. . पाकिस्तान वापस जाने पर जुल्फिकार भुट्टो से पाक सेना बहुत नाराज थी .. सेना प्रमुख जनरल जिया उल हक ने तख्ता पलट करते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो को पुरे खानदान सहित गिरफ्तार कर लिया .. बाद में बच्चों और पत्नी को छोड़ दिया और जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दे दी. . पूरे विश्व की सेना में सबसे ज्यादा प्रोमोशन का रिकार्ड पोर्क सेना के जनरल ज़िया उल हक़ का है जो मात्र एक मामूली बटलर [खाना पकाने और सैनिकों का ख्याल रखने वाले] से शुरू करके सेना प्रमुख तक पहुँच गया था. . मज़े की बात ये है जी कि ज़ुल्फिकार अली भुट्टो, जिनकी मेहरबानी ने उसे बिना किसी ट्रेनिंग, योग्यता आदि के जनरल बनाया …सत्ता में आते ही सबसे पहले उसने अपने ही आका ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को ही फांसी पर चढ़ा दिया ..! ज़ुल्फिकार अली भुट्टो, ज़िया उल हक़ की इनकी स्वामिभक्ति से इतने खुश था कि वो इसको हर महीने एक रैंक प्रोमोशन देता चला गया …! . जेल से जुल्फिकार अली ने ने कई बार भारतीय दूतावास तक संदेश भिजवाया था कि मैमूना जी, मुझे कैद से आजाद करवाइए … लेकिन मैमूना ने उन्हें संदेश दिया था कि भारत किसी भी आज़ाद देश के अंदरूनी मामलों में कोई दखल नहीं देता..! . असल में मैमूना भी जानती थी कि पाकिस्तान को कश्मीर ने नाम पर भुट्टो खानदान ने ही भड़काया है … पाक राजनीति में कश्मीर और भारत से दुश्मनी को मुद्दा बनाकर जुल्फिकार अली भुट्टो सबसे पहले सत्ता तक पहुंचा था ..! . कमीना सुवर,,,,लटक गया न फांसी के फंदे पर,,,,,, और कल्ले कश्मीर आधारित और भारत विरोधी राजनीति…. सुवर की औलाद,,,! :p . इसी बात पर सेकुलर सुवरों धीरे से बोलो सुभानल्लाह…😜😜😜 .

विपिन खुराना

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कुतुबुद्दीन ऐबक और क़ुतुबमीनार—


कुतुबुद्दीन ऐबक और क़ुतुबमीनार—

किसी भी देश पर शासन करना है तो उस देश के लोगों का ऐसा ब्रेनवाश कर दो कि वो अपने देश, अपनी संसकृति और अपने पूर्वजों पर गर्व करना छोड़ दें. इस्लामी हमलावरों और उनके बाद अंग्रेजों ने भी भारत में यही किया. हम अपने पूर्वजों पर गर्व करना भूलकर उन अत्याचारियों को महान समझने लगे जिन्होंने भारत पर बे हिसाब जुल्म किये थे।
अगर आप दिल्ली घुमने गए है तो आपने कभी विष्णू स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को भी अवश्य देखा होगा. जिसके बारे में बताया जाता है कि उसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनबाया था. हम कभी जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं कि कुतुबुद्दीन कौन था, उसने कितने बर्ष दिल्ली पर शासन किया, उसने कब विष्णू स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को बनवाया या विष्णू स्तम्भ (कुतूबमीनार) से पहले वो और क्या क्या बनवा चुका था ?
कुतुबुद्दीन ऐबक, मोहम्मद गौरी का खरीदा हुआ गुलाम था. मोहम्मद गौरी भारत पर कई हमले कर चुका था मगर हर बार उसे हारकर वापस जाना पडा था. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की जासूसी और कुतुबुद्दीन की रणनीति के कारण मोहम्मद गौरी, तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को हराने में कामयाबी रहा और अजमेर / दिल्ली पर उसका कब्जा हो गया।

अजमेर पर कब्जा होने के बाद मोहम्मद गौरी ने चिश्ती से इनाम मांगने को कहा. तब चिश्ती ने अपनी जासूसी का इनाम मांगते हुए, एक भव्य मंदिर की तरफ इशारा करके गौरी से कहा कि तीन दिन में इस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना कर दो. तब कुतुबुद्दीन ने कहा आप तीन दिन कह रहे हैं मैं यह काम ढाई दिन में कर के आपको दूंगा।
कुतुबुद्दीन ने ढाई दिन में उस मंदिर को तोड़कर मस्जिद में बदल दिया. आज भी यह जगह “अढाई दिन का झोपड़ा” के नाम से जानी जाती है. जीत के बाद मोहम्मद गौरी, पश्चिमी भारत की जिम्मेदारी “कुतुबुद्दीन” को और पूर्वी भारत की जिम्मेदारी अपने दुसरे सेनापति “बख्तियार खिलजी” (जिसने नालंदा को जलाया था) को सौंप कर वापस चला गय था।
कुतुबुद्दीन कुल चार साल (१२०६ से १२१० तक) दिल्ली का शासक रहा. इन चार साल में वो अपने राज्य का विस्तार, इस्लाम के प्रचार और बुतपरस्ती का खात्मा करने में लगा रहा. हांसी, कन्नौज, बदायूं, मेरठ, अलीगढ़, कालिंजर, महोबा, आदि को उसने जीता. अजमेर के विद्रोह को दबाने के साथ राजस्थान के भी कई इलाकों में उसने काफी आतंक मचाया।
जिसे क़ुतुबमीनार कहते हैं वो महाराजा वीर विक्रमादित्य की वेदशाला थी. जहा बैठकर खगोलशास्त्री वराहमिहर ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों का अध्ययन कर, भारतीय कैलेण्डर “विक्रम संवत” का आविष्कार किया था. यहाँ पर २७ छोटे छोटे भवन (मंदिर) थे जो २७ नक्षत्रों के प्रतीक थे और मध्य में विष्णू स्तम्भ था, जिसको ध्रुव स्तम्भ भी कहा जाता था।
दिल्ली पर कब्जा करने के बाद उसने उन २७ मंदिरों को तोड दिया।विशाल विष्णु स्तम्भ को तोड़ने का तरीका समझ न आने पर उसने उसको तोड़ने के बजाय अपना नाम दे दिया। तब से उसे क़ुतुबमीनार कहा जाने लगा. कालान्तर में यह यह झूठ प्रचारित किया गया कि क़ुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ने बनबाया था. जबकि वो एक विध्वंशक था न कि कोई निर्माता।

अब बात करते हैं कुतुबुद्दीन की मौत की।इतिहास की किताबो में लिखा है कि उसकी मौत पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने पर से हुई. ये अफगान / तुर्क लोग “पोलो” नहीं खेलते थे, पोलो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया. अफगान / तुर्क लोग बुजकशी खेलते हैं जिसमे एक बकरे को मारकर उसे लेकर घोड़े पर भागते है, जो उसे लेकर मंजिल तक पहुंचता है, वो जीतता है।

कुतबुद्दीन ने अजमेर के विद्रोह को कुचलने के बाद राजस्थान के अनेकों इलाकों में कहर बरपाया था. उसका सबसे कडा विरोध उदयपुर के राजा ने किया, परन्तु कुतुबद्दीन उसको हराने में कामयाब रहा. उसने धोखे से राजकुंवर कर्णसिंह को बंदी बनाकर और उनको जान से मारने की धमकी देकर, राजकुंवर और उनके घोड़े शुभ्रक को पकड कर लाहौर ले आया।
एक दिन राजकुंवर ने कैद से भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया. इस पर क्रोधित होकर कुतुबुद्दीन ने उसका सर काटने का हुकुम दिया. दरिंदगी दिखाने के लिए उसने कहा कि बुजकशी खेला जाएगा लेकिन इसमें बकरे की जगह राजकुंवर का कटा हुआ सर इस्तेमाल होगा. कुतुबुद्दीन ने इस काम के लिए, अपने लिए घोड़ा भी राजकुंवर का “शुभ्रक” चुना।
कुतुबुद्दीन “शुभ्रक” घोडे पर सवार होकर अपनी टोली के साथ जन्नत बाग में पहुंचा. राजकुंवर को भी जंजीरों में बांधकर वहां लाया गया. राजकुंवर का सर काटने के लिए जैसे ही उनकी जंजीरों को खोला गया, शुभ्रक घोडे ने उछलकर कुतुबुद्दीन को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से उसकी छाती पर कई बार किये, जिससे कुतुबुद्दीन वहीं पर मर गया।
इससे पहले कि सिपाही कुछ समझ पाते राजकुवर शुभ्रक घोडे पर सवार होकर वहां से निकल गए. कुतुबुदीन के सैनिको ने उनका पीछा किया मगर वो उनको पकड न सके. शुभ्रक कई दिन और कई रात दौड़ता रहा और अपने स्वामी को लेकर उदयपुर के महल के सामने आ कर रुका. वहां पहुंचकर जब राजकुंवर ने उतर कर पुचकारा तो वो मूर्ति की तरह शांत खडा रहा।
वो मर चुका था, सर पर हाथ फेरते ही उसका निष्प्राण शरीर लुढ़क गया. कुतुबुद्दीन की मौत और शुभ्रक की स्वामिभक्ति की इस घटना के बारे में हमारे स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है लेकिन इस घटना के बारे में फारसी के प्राचीन लेखकों ने काफी लिखा है. *धन्य है भारत की भूमि जहाँ इंसान तो क्या जानवर भी अपनी स्वामी भक्ति के लिए प्राण दांव पर लगा देते हैं।

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आखिरी पलों तक रानी लक्ष्मीबाई के साथ पीठ पर बंधे बेटे के साथ हिंदुस्तानियों ने क्या किया?


आखिरी पलों तक रानी लक्ष्मीबाई के साथ पीठ पर बंधे बेटे के साथ हिंदुस्तानियों ने क्या किया?
हिंदुस्तानियों के व्यवहार से परेशान दामोदर राव को क्यों अंग्रेजों की मदद पर पलना पड़ा??
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी…

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी.
सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी इन पंक्तियों के साथ ही हमारे लिए लक्ष्मीबाई नेवलकर (झांसी की रानी का पूरा नाम) की कहानी खत्म हो जाती हैं. झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है. रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ? वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुलाकर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी.
अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी. ज्यादातर हिंदुस्तानियों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली. 1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘#इतिहासाच्य_सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा. महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया. उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी बराबरी से थे.
15 नवंबर 1849 को नेवलकर राजपरिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ. ज्योतिषी ने बताया कि मेरी कुंडली में राज योग है और मैं राजा बनूंगा. ये बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई. तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया. गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे.
मां साहेब (महारानी लक्ष्मीबाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहॉजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए. मगर ऐसा नहीं हुआ.
डलहॉजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा. मां साहेब को 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी. इसके साथ ही महाराज की सारी सम्पत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी. मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा. इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे. फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वो पैसा मुझे दे दिया जाएगा.
मां साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली. मेरे सेवकों (रामचंद्र राओ देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था. मुझे खुद ये ठीक से याद नहीं. इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे.
नन्हें खान रिसालेदार, गनपत राओ, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राओ देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई. 22 घोड़े और 60 ऊंटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े. हमारे पास खाने, पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था. किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली. मई-जून की गर्मी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे. शुक्र था कि जंगल के फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई.
घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया. किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली. रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे. मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपए, 9 घोड़े और चार ऊंट तय की. हम जिस जगह पर रहे वो किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी.
देखते-देखते दो साल निकल गए. ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपए थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे. मेरी तबियत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा. मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें.
मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया. मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपए दिए और जानवर वापस मांगे. उसने हमें सिर्फ 3 घोड़े वापस दिए. वहां से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए. ग्वालियर के शिप्री में गांव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया. वहां तीन दिन उन्होंने हमें बंद रखा, फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया. मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया. वो एक-एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे.
हमारे ज्यादातर लोगों को पागलखाने में डाल दिया गया. मां साहेब के रिसालेदार नन्हें खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की. उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है. रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है. बच्चे से तो सरकार को कोई नुक्सान नहीं. इसे छोड़ दीजिए पूरा मुल्क आपको दुआएं देगा. फ्लिंक एक दयालु आदमी थे, उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की.
अब कोई पैसा बाकी नहीं था. सफर का खर्च और खाने के जुगाड़ के लिए मां साहेब के 32 तोले के दो तोड़े हमें देने पड़े. मां साहेब से जुड़ी वही एक आखिरी चीज हमारे पास थी.
इसके बाद 5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में 10,000 सालाना की पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी. उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली. ब्रिटिश सरकार ने सात लाख रुपए लौटाने से भी इंकार कर दिया. दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया. 1879 में उनके एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ. 1906 में 58 साल की उम्र में दामोदर राव की मौत हो गई. इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में ‘झांसीवाले’ सरनेम के साथ रहते हैं. रानी के एक सौतेला भाई चिंतामनराव तांबे भी था. तांबे परिवार इस समय पूना में रहता है.
महारानी लक्ष्मीबाई के ऊपर अब फिल्म बन रही है. सतारा में पैदा होने वाली मनु की फिल्म का प्रमोशन कंगना रनौत ने बनारस के मणिकर्णिका से शुरू किया है. बनारस का अपना एक रस है, आज के भारत में मेवाड़, सिंधिया पटियाला और गायकवाड़ जैसे घरानों के किस्सों का एक रस है. जफर, मनु, टात्या टोपे और वाजिद अली शाह जैसों की कहानी का रस उनके गुजर जाने के साथ खत्म हो गया था तो उसमें किसी की कोई दिलचस्पी नहीं है. झांसी की रानी पर बन रही इस फिल्म में कितना सच कितना गल्प होगा पता नहीं पर दामोदर राव की ये कहानी निश्चित रूप से नहीं होगी, सनद रखिएगा.