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ये है देश के दो बड़े गद्दारों की कहानी….


ये है देश के दो बड़े गद्दारों की कहानी….
जनता को नहीं पता है कि भगत सिंह के खिलाफ विरुद्ध गवाही देने वाले दो व्यक्ति कौन थे । जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो…
भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ शोभा सिंह ने गवाही दी और दूसरा गवाह था शादी लाल !
दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले।
शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले आज कनौट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है जबकि
शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है।
सर शादीलाल और सर शोभा सिंह, भारतीय जनता कि नजरों मे सदा घृणा के पात्र थे और अब तक हैं
लेकिन शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया।
शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी।
शोभा सिंह के बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया।
सर शोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है।
आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।
खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देशभक्त
दूरद्रष्टा और निर्माता साबित करने की भरसक कोशिश की।
खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की भी कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की।
खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेंका था।
बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही दी, शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में वह बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था।
हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की।
खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं,
और…
बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं
आज़ादी के दीवानों क विरुद्ध और भी गवाह थे ।

  1. शोभा सिंह
  2. शादी राम
  3. दिवान चन्द फ़ोर्गाट
  4. जीवन लाल
  5. नवीन जिंदल की
    बहन के पति का दादा
  6. भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दादा
    Sir Chotu Ram !
    दीवान चन्द फोर्गाट DLF कम्पनी का Founder था इसने अपनी पहली कालोनी रोहतक में काटी थी
    इसकी इकलौती बेटी थी जो कि K.P.Singh को ब्याही और वो मालिक बन गया DLF का ।
    अब K.P.Singh की
    भी इकलौती बेटी है जो कि कांग्रेस के नेता और गुज्जर से मुस्लिम Converted गुलाम नबी आज़ाद के बेटे सज्जाद नबी आज़ाद के साथ ब्याही गई है । अब वह DLF का मालिक बनेगा ।
    जीवन लाल मशहूर एटलस साईकल कम्पनी का मालिक था।
    बाकि मशहूर हस्तियों को तो आप जानते ही होंगे ।
    ये सन्देश देश को लूटने वाले सभी लोगों तक भी पहुँचना चाहिए, फिर चाहे वो “आप” के हों या पराए…??
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भगत सिंह


लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 कैदियों से कहा गया कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है।

अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी। जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो एक क्रांतिकारी भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, “आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया.”

भगत सिंह का जवाब था, “इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं.”

भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि ‘भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.’

मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इंक़लाब ज़िदाबाद!”

इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.

मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.

भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं. लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तीनो क्रांतिकारियों को वक़्त से पहले फांसी के लिए ले जाया गया फांसी से पहले भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ लाहौर सेंट्रल जेल के बाहर तक सुनाई दी थी.

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

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મોહમ્મદ અલી ઝીણાં ધોરાજી પાસે પાનેલી ના વતની હતા.


મોહમ્મદ અલી ઝીણાં ધોરાજી પાસે પાનેલી ના વતની હતા.

આઝાદી પહેલાં ટ્રેન મા બેસી જતાં હતાં. ગોંડલ સ્ટેશન ઉપર રાજ ના હુકમ મુજબ દરેક પ્રવાસી નું ચેકીંગ થતું.

મોહમ્મદ અલી ઝીણાં નું ચેકીંગ કરતા તેણે સામાન ચેક કરવા ની ના પાડી પોતે કોણ છે , એવો રોફ પોલીસ જમાદાર ને દેખાડશો. પોતાનો passport દેખાડી રોફ જમાવવા ની કોશિશ કરી. પોલીસે passport જોતાં એમા Nationality : Indian ચેકી ને જાતે Pakistan લખેલ જયારે પાકિસ્તાન હજી બન્યુ જ નહોતું.

પોલીસ જમાદાર એ પેલેસ મા જાણ કરી ફરીયાદ કરી કે મોહમ્મદ અલી ઝીણાં સામાન ચેક કરવા ની ના પાડે છે અને passport મા Nationality : Pakistan લખેલ છે.

ગોંડલ બાપુ નો ઓર્ડર આવ્યો કે એને પકડી ને જેલ મા નાખો , સામાન ચેક કરો અને જયા સુધી passport મા પાકિસ્તાન ચેકીં ને INDIA ન કરે ત્યા સુધી જેલ મા જ રાખો.

ચાર કલાક જેલ મા રહયા પછી પોતે સુટકેસ ખોલી ને સામાન પોલીસ ને ચેક કરાવ્યો, પાકિસ્તાન ચેકી ને INDIA કર્યુ અને ભુલ ની લેખીત માફી માગી હતી.

લેખક સ્વ. ચંદ્રકાન્ત બક્શી એ એક જગ્યાએ લખેલ કે એ સમયે ભારતમાં એવા કેટલાય રાજવી ઓ હતા કે જેમની વગ , કુનેહ , ધાક, ડહાપણ નો Congress party એ ઉપયોગ કર્યો હોત તો ભારતના ભાગલા જ ન પડયા હોત.

🙏🏻જય માતાજી 🙏🏻

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આ મેસ આયનાક સુંદર શહેરનું પુરાતત્વીય પુનર્નિર્માણ છે



આ મેસ આયનાક સુંદર શહેરનું પુરાતત્વીય પુનર્નિર્માણ છે, જે પ્રાચીન વિશ્વ માટે “ભારતના પ્રવેશદ્વાર” તરીકે ઓળખાય છે.

તે આવા તરીકે જાણીતું હતું કારણ કે તે પ્રાચીન ભારતની ઉત્તર પશ્ચિમ સીમા પર હતું. આ પુનર્નિર્માણ વૈજ્ .ાનિકોની ટીમ દ્વારા બનાવવામાં આવ્યું છે.

દિવાલવાળી શહેર 2000 વર્ષ પહેલાં જેવી દેખાતી હતી. ચીનના પ્રવાસી ઝુઆનઝંગે આ શહેરની મુલાકાત લીધી હતી અને તેને ‘ગેટવે Indiaફ ઈન્ડિયા’ કહે છે. સંસ્કૃત સ્ત્રોતોમાં જોવા મળ્યા મુજબ આ શહેરનું મૂળ નામ લેમ્પકા હતું (મેસ આઈનાક તેનું આધુનિક નામ છે). ઝુઆનઝંગ મુજબ, તે વિસ્તાર મુજબ 30 લિ. તે જાણીતું છે કે મેસ આયનાકના નાગરિકો બૌદ્ધ અને શૈવ ધર્મને અનુસરતા હતા કારણ કે ખોદકામ દરમિયાન બૌદ્ધ સ્તૂપ અને શિવ સિક્કા મળી આવ્યા છે.

10 મી સદી દરમિયાન, આ શહેર પર કાબુલના રાજા, જયપાલદેવના બ્રાહ્મણ શાહીનું શાસન હતું. પરંતુ ગઝનાવિડના આક્રમણથી તે જમીન પર સળગી ગઈ. એકવાર આ દિવાલો તૂટી ગઈ અને કાબુલ શાહીઓ પડી ગયા, ગઝનવીએ હિન્દુ કુશને પાર કરીને અને મેઇનલેન્ડ ભારત પર આક્રમણ કર્યું તે ખૂબ જ સરળતાથી હતું. આજે તે સ્થાન અફઘાનિસ્તાન (કાબુલની નજીક) નું છે અને તે સ્થળ પર મળેલા એકમાત્ર અવશેષો ખંડેર અને અસ્થિર બુદ્ધો છે

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इस्लाम राजपूत युद्ध का इतिहास


प्रशांत मणि त्रिपाठी

इस्लामराजपूतयुद्धकाइतिहास

मुश्किल से मिलती हैं यह चीजें अगर याद नहीं कर पाओ तो कॉपी पेस्ट या शेयर कर देना

लेख का विषय :- पूरे विश्व पर इस्लामी अत्याचार के समय भारत का राजपुत शासन ।

622 ई से लेकर 634 ई तक मात्र 12 साल में अरब के सभी मूर्तिपूजकों को मूहम्मद साहब ने इस्लाम की तलवार से पानी पिलाकर मुसलमान बना दिया ।।

634 ईस्वी से लेकर 651 तक , यानी मात्र 16 साल में सभी पारसियों को तलवार की नोक पर इस्लाम की दीक्षा दी गयी ।।

640 में मिस्र में पहली बार इस्लाम ने पांव रखे, ओर देखते ही देखते मात्र 15 सालों में , 655 तक इजिप्ट के लगभग सभी लोग मुसलमान बना दिये गए ।।

नार्थ अफ्रीकन देश जैसे – अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को आदि देशों को 640 से 711 ई तक पूर्ण रूप से इस्लाम धर्म मे बदल दिया गया, 3 देशों का सम्पूर्ण सुख चैन लेने में मुसलमानो ने मात्र 71 साल लगाए ।

711 ईस्वी में स्पेन पर आक्रमण हुआ, 730 ईस्वी तक स्पेन की 70% आबादी मुसलमान थी । मात्र 19 सालों में ।

तुर्क थोड़े से वीर निकले, तुर्को के विरुद्ध जिहाद 651 ईस्वी में शुरू हुआ, ओर 751 ईस्वी तक सारे तुर्क मुसलमान बना दिये गए ।।

मंगौलो यानी इंडोनेशिया के विरुद्ध जिहाद मात्र 40 साल में पूरा हुआ । 1260 में मुसलमानो ने इंडोनेशिया में मार काट मचाई, ओर 1300 ईस्वी तक सारे इंडोनेशिया के मंगोल मुसलमान बन चुके थे । नाममात्र के लोगो को छोड़कर ।

फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन आदि देशों को 634 से 650 के बीच मुसलमान बना दिया गया ।।

उसके बाद 700 ईस्वी में भारत के विरुद्ध जिहाद शुरू हुआ वह अब तक चल रहा है ।।

इस्लामिक आक्रमणकारियों की क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाएं की मुसलमानो का ईरान पर आक्रमण हुआ, मुसलमानी सेना ईरानी राजा के महल तक पहुंच गई । महल में लगभग 2 या 3 साल की पारसी राजकुमारी थी । ईरान पर आक्रमण अली ने किया था, जिसे शिया मुसलमान मानते है ।

आपको लगता होगा कि अली कोई बहुत बड़ा महात्मा था, इसलिए शिया मुसलमान थोड़े ठंडे होते है, जबकि ऐसा कुछ नही है, कासिम, अकबर, औरंगजेब ओर इस अली नाम के राक्षस में सुत मात्र का भी फर्क नही था ।।

पारसी राजकुमारी को बंदी बना लिया गया, अब वह कन्या थी, तो लूट के माल पर पहला हक़ खलीफा मुगीरा इब्न सूबा का था । खलीफा को वह मासूम बच्ची भोग के लिए भेंट की गई ।लेकिन खलीफा ईरान में अली की लूट से इतना खुश हुआ कि अली को कह दिया, इसका भोग तुम करो । मुसलमानी क्रूरता , पशु संस्कृति का एक सबसे गलीच नमूना देखिये, की तीन साल की बच्ची में भी उन्हें औरत दिख रही थी । वह उनके लिए बेटी नही, भोग की वस्तु थी ।

बेटी के प्रेम में पिता को भी बंदी बनना पड़ा, इस्लाम या मौत में से एक चुनने का बिकल्प पारसी राजा को दिया गया । पारसी राजा ने मृत्यु चुनी । अली ने उस तीन साल की मासूम राजकुमारी को अपनी पत्नी बना लिया ।। अली की पत्नी Al Sahba’ bint Rabi’ah मात्र 3 साल की थी, ओर उस समय अली 30 साल ले भी ऊपर था । यह है इस्लाम, ओर यह है इस्लाम की संस्कृति ।

मेने मात्र ईरान का उदाहरण दिया है, इजिप्ट हो या अफ्रीकन देश सब जगह यही हाल है । जिस समय सीरिया आदि को जीता गया था, उसकी कहानी तो ओर दर्दनाक है । मुसलमानो ने ईसाई सैनिकों के आगे अपनी औरतों को कर दिया । मुसलमान औरते गयी ईसाइयों के पास की मुसलमानो से हमारी रक्षा करो, बेचारे मूर्ख ईसाइयों ने इन धूर्तो की बातों में आकर उन्हें शरण दे दी, फिर क्या था, सारी सुपर्णखाओ ने मिलकर रातों रात सभी सैनिकों को हलाल करवा दिया ।।

अब आप भारत की स्थिति देखिये । जिस समय आक्रमणकारी ईरान तक पहुंचकर अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर चुके थे , उस समय उनकी हिम्मत नही थी की भारत के राजपूत साम्राज्य की ओर आंख उठाकर भी देख सकें ।।

जब ईरान , सऊदी आदि को जबरन मुसलमान बना लिया गया था, तो आक्रमणकारियों का मन हुआ कि अब हिंदुस्थान के क्षत्रियों को जीता जाएं, लेकिन यह स्वपन उनके लिए काल बनकर खड़ा हो गया । 636 ईस्वी में खलीफा ने भारत पर पहला हमला बोला । एक भी आक्रांता जिंदा वापस नही जा पाया ।।

कुछ वर्ष तक तो मुस्लिम अक्रान्ताओ की हिम्मत तक नही हुई की भारत की ओर मुंह करके सोया भी जाएं, लेकिन कुछ ही वर्षो में गिद्धों ने अपनी जात दिखा ही दी ।। दुबारा आक्रमण हुआ, इस समय खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था । उसने हाकिम नाम के सेनापति के साथ विशाल इस्लामी टिड्डिडल भारत भेजा ।। सेना का पूर्णतः सफाया हो गया, ओर सेनापति हाकिम बंदी बना लिया गया । हाकिम को भारतीय राजपूतो ने बहुत मारा, ओर बड़े बुरे हाल करके वापस अरब भेजा, जिससे उनकी सेना की दुर्गति का हाल, उस्मान तक पहुंच जाएं ।।

यह सिलसिला लगभग 700 ईस्वी तक चलता रहा ।। जितने भी मुसलमानो ने भारत की तरफ मुँह किया, राजपूतो ने उनका सिर कंधे से नीचे उतार दिया ।।

उसके बाद भी भारत के वीर जवानों ने हार नही मानी ।। जब 7 वी सदी इस्लाम की शुरू हुई , जिस समय अरब से लेकर अफ्रीका, ईरान यूरोप, सीरिया , मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की यह बड़े बड़े देश जब मुसलमान बन गए, स्पेन तक कि 70% आबादी मुसलमान थी, तब आपको ज्ञात है भारत मे ” बप्पा रावल ” महाराणा प्रताप के पितामह का जन्म हो चुका था, वे पूर्णतः योद्धा बन चुके थे, इस्लाम के पंजे में जकड़ गए अफगानिस्तान तक से मुसलमानो को उस वीर ने मार भगाया, केवल यही नही, वह लड़ते लड़ते खलीफा की गद्दी तक जा पहुंचा, जहां खुद खलीफा को अपनी जान की भीख मांगनी पड़ी ।

उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नही । नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय जैसे योद्धा भारत को मिले । जिन्होंने अपने पूरे जीवन राजपूती धर्म का पालन करते हुए पूरे भारत की न केवल रक्षा की, बल्कि हमारी शक्ति का डंका विश्व मे बजाए रखा ।।

पहले बप्पा रावल में साबित किया था कि अरब अपराजित नही है, लेकिन 836 ई के समय भारत मे वह हुआ, की जिससे विश्वविजेता मुसलमान थर्रा गए । मुसलमानो ने अपने इतिहास में उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन कहा है, वह सरदार भी राजपूत ही थे । सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ।। मिहिरभोज के बारे में कहा जाता है, की उनका प्रताप ऋषि अगस्त्य से भी ज़्यादा चमका । ऋषि अगस्त्य वहीं है, जिन्होंने श्रीराम को वह अस्त्र दिया था, जिससे रावण का वध सम्भव था ।। राम के विजय अभियान के हिडन योद्धाओं में एक । उन्होंने मुसलमानो को केवल 5 गुफाओं तक सीमित कर दिया ।। यह वही समय था, जिस समय मुसलमान किसी युद्ध मे केवल जीत हासिल करते थे, ओर वहां की प्रजा को मुसलमान बना देते, भारत वीर राजपूत मिहिरभोज ने इन अक्रान्ताओ को अरब तक थर्रा दिया ।।

प्रथ्वीराज चौहान तक इस्लाम के उत्कर्ष के 400 सालों बाद तक
भारत के राजपूतो ने इस्लाम नाम की बीमारी भारत को नही लगने दी, उस युद्ध काल मे भी भारत की अर्थव्यवस्था को गिरने नही दिया ।। उसके बाद मुसलमान विजयी भी हुए, लेकिन राजपूतो ने सत्ता गंवाकर भी हार नही मानी , एक दिन वह चैन से नही बैठे, अंतिम वीर दुर्गादास जी राठौड़ ने दिल्ली को झुकाकर, जोधपुर का किला मुगलो के हलक ने निकाल कर हिन्दू धर्म की गरिमा, वीरता शौर्य को चार चांद लगा दिए ।।

किसी भी देश को मुसलमान बनाने में मुसलमानो में 20 साल नही लिए, ओर भारत मे 500 साल राज करने के बाद भी मेवाड़ के शेर महाराणा राजसिंहः ने अपने घोड़े पर भी इस्लाम की मुहर नही लगवाई ।।

महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, मिहिरभोज, दुर्गावती, चौहान, परमार लगभग सारे राजपूत अपनी मातृभूमि के लिए जान पर खेल गए ।। एक समय ऐसा आ गया था, लड़ते लड़ते राजपूत केवल 2% पर आकर ठहर गए ।।

एक बार पूरी दुनिया देखे, ओर आज अपना वर्तमान देखे । जिन मुसलमानो ने 20 साल में आधी विश्व आबादी को मुसलमान बना दिया, वह भारत मे केवल पाकिस्तान बांग्लादेश तक सिमट कर ही क्यो रह गए ?

मान लिया कि उस समय लड़ना राजपूत राजाओं का धर्म था, लेकिन जब राजाओं ने अपना धर्म निभा दिया, तो आज उनकी बेटियों, पोतियों पर काल्पनिक कहानियां गढ़कर उन योद्धाओं के वंशजो का हिंदुओ द्वारा ही अपमान , कुछ हिन्दू द्वारा ही उनका इतिहास चोरी करना, क्या यह बलिदानियों को भेंट करता है हिन्दू समाज ?

राजा भोज, विक्रमादित्य, नागभट्ट प्रथम और नागभट्ट द्वितीय, चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार, समुद्रगुप्त, स्कंद गुप्त, छत्रसाल बुंदेला, आल्हा उदल, राजा भाटी, भूपत भाटी, चाचादेव भाटी, सिद्ध श्री देवराज भाटी, कानड़ देव चौहान वीरमदेव चौहान, हठी हम्मीर देव चौहान, विग्रहराज चौहान, मालदेव सिंह राठौड़, विजय राव लांझा भाटी, भोजदेव भाटी, चूहड़ विजयराव भाटी, बलराज भाटी, घड़सी, रतनसिं, राणा हमीर सिंह और अमर सिंह, अमर सिंह राठौड़ दुर्गादास राठौड़ जसवंत सिंह राठौड़ मिर्जा राजा जयसिंह राजा जयचंद, भीमदेव सोलंकी, सिद्ध श्री राजा जय सिंह सोलंकी, पुलकेशिन द्वितीय सोलंकी, रानी दुर्गावती, रानी कर्णावती, राजकुमारी रत्नाबाई, रानी रुद्रा देवी, हाड़ी रानी, पद्मावती, तोगा जी वीरवर कल्लाजी जयमल जी जेता कुपा, गोरा बादल राणा रतन सिंह, पजबन राय जी कच्छावा, मोहन सिंह मंढाड़ , राजा पोरस, हर्षवर्धन बेस, सुहेलदेव बेस , राव शेखाजी, राव चंद्रसेन जी दोड़ , राव चंद्र सिंह जी राठौड़, कृष्ण कुमार सोलंकी, ललितादित्य मुक्तापीड़, जनरल जोरावर सिंह कालुवारिया, धीर सिंह पुंडीर ,बल्लू जी चंपावत, भीष्म रावत चुण्डा जी, रामसाह सिंहतोमर और उनका वंश, झाला राजा मान, महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर,
स्वतंत्रता सेनानी राव बख्तावर सिंह अमझेरा वजीर सिंह पठानिया, राव राजा राम बक्स सिंह, व्हाट ठाकुर कुशाल सिंह, ठाकुर रोशन सिंह,ठाकुर महावीर सिंह, राव बेनी माधव सिंह, डूंगजी, भुरजी , बलजी, जवाहर जी, छत्रपति शिवाजी और हमारे न जाने अनगिनत लोक देवता, और गुजरात में एक से बढ़कर एक योद्धा लोक देवताओं, संत, सती जुझार, भांजी जडेजा, अजय पाल देव जी
यह तो सिर्फ कुछ ही नाम है जिन्हें हमने गलती से किसी इतिहास सोशल मीडिया या फिर किसी पुस्तक में पढ़ लिया वरना न जाने कितने अनगिनत युद्ध हुए हैं हमारा इतिहास औरों की तरह कोई सौ 200 साल का लिए बल्कि हजारों लाखों साल से हमारे अनगिनत योद्धाओं ने इस भारत देश को भारत देश रैली में अपना बलिदान दिया है चाहे युधिष्ठिर संवत हो चाहे विक्रम संवत हो या चाहे ईसा पूर्व हो और संवत में एक से बढ़कर एक योद्धा पैदा हुए हैं जिन्होंने 18 साल की उम्र से पहले ही अपना योगदान दे दिया घर के घर गांव के गांव ढाणी की ढाणी खाली हो गई जब कोई भी पुरुष नहीं बचा किसी गांव या ढाणी में पूरा का पूरा परिवार पूरे पूरे गांव कुर्बान हो गया रणभेरी पर चल गया क्षात्र धर्म के लिए
और वह भी राजपूत है जिन्होंने सिख धर्म उत्थान के लिए अपना योगदान दिया और फिर बाद में सिख धर्म अपना लिया जैसे बाबा बंदा बहादुर सिंह, बाज सिंह पवार, बज्जर सिंह राठौड़, आलम सिंह चौहान ,महासिंह पवार, बचित्तर सिंह पवार, गुलाब सिंह राठौड़, मनीष सिंह पवार ,फूलों सिंह.

आज राजपूत इतिहास चोरी पर समझदार लोग भी या तो चुप रह जाते है, या चोरों का साथ देते है, वे अपने मन के अंदर झांककर देखे, जिन्होंने तुम्हारी सबसे कीमती चीज़ , तुम्हारा धर्म तुम्हे सुरक्षित रखकर दिया, भले ही अपनी औलादों की ही बलि देनी पड़ी हो, उस जाति के साथ ऐसा व्यवहार ?

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मुस्लिम सैनिकों के विश्वासघात से हुई थी महाराणा प्रताप की हार
नेहरू – वामपंथी गठजोड़ ने आतातायी अकबर को महान साबित किया

भील और गेडि़या लोहरों को करो वंदन, उन्हें क्षत्रीय बनाओ

…………..भारत का इतिहास देशद्रोही है। भारतीय इतिहास पर जवाहरलाल नेहरू और कम्युनिस्टों के गठजोड़ का दुष्परिणाम है। हर वीर और राष्टभक्त को आतातायी घोषित कर देना, आतातायी को महान घोषित कर देना नेहरू और कम्युनिस्टों की मानसिकता रही है जो भारत में सफल हुई।
………… अकबर जैसा आतातायी को महान घोषित कर दिया गया और महाराणा प्रताप जैसे वीर और देशभक्त की वीरता को इतिहास से बाहर कर दिया गया। महान तो महाराणा प्रताप को कहा जाना चाहिए था जिसने घास की रोटी खायी, अंतिम दम तक लडे पर आतातायी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।
………….. आधुनिक इतिहास के शोध में यह सामने आया है कि महाराणा प्रताप की सेना में मुस्लिम सैनिक भी थी। मुस्लिम सैनिकों ने मजहब के आधार पर विश्वासघात किया था और अंतिम समय में जब युद्ध निर्णायक स्थिति में था तब मुस्लिम सैनिको ने अकबर के सैनिकों के साथ मिल गये थे और युद्ध से हट गये, युद्ध सामग्री की आपूर्ति चैन को बाधित कर दिया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि महाराणा प्रताप की सेना की हार हुईं।
…………….. सिर्फ दो समूह -वर्ग ऐसे हैं जिन्होंने आज तक महाराणा प्रताप के लिए लड़ रहे हैं जिनके लिए महाराणा प्रताप ही सबकुछ हैं। एक भील हैं जो आज आदिवासी के रूप में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और नेपाल की तराई में हैं। भील महाराना प्रताप की पराजय के बाद महाराणा प्रताप के बचे-खुचे वंशव जिनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल थे लेकर जंगलों में छिप गये थे। अन्यथा आतातायी अकबर के सैनिकों के हाथों मारे जाते। दूसरा वर्ग गेडि़या लोहार हैं जो आज भी सड़कों पर लोहे की वस्तु बनाते हैें, हथियार बनाते हैं पर घर नहीं बनाते हैं, सड़कों पर ही रहते हैं। उनका कहना है कि जब तक हम महाराणा प्रताप के फर्ज को नहीं पूरा कर पायेगे तब तक अपना घर नहीं बनायेंगे। ऐसे महान भील और गेडिया लोहर हैं।
…………… हमें और खासकर महाराणा प्रताप के नाम पर बने सभी संगठनों का कर्तव्य है कि भील आदिवासियों और गेडि़या लोहारों का वंदन करें, उनको सम्मान दें, सबसे अच्छा होता कि उन्हें क्षत्रीय धर्म की शिक्षा देकर उन्हें क्षत्रीय बना दिया जाता। क्या इस कार्य के लिए क्षत्रीय लोग सामने आयेंगे?
…………… महाराणा प्रताप के प्रति सच्ची ऋधाजंलि तो तब मानी जाती जब हम आतातायी अकबर के वंशजों और आयातित मजहबी संस्कृति को जमींदोज कर अपनी सनातन संस्कृति की विजय सुनिश्चित करने का संकल्प लेते।

………. आचार्य श्री विष्णु गुप्त ……….

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शाहजहाँ ने बताया था… हिंदूक्योंगुलाम_हुआ ?


शाहजहाँ ने बताया था… हिंदूक्योंगुलाम_हुआ ?

मुग़ल बादशाह शाहजहाँ लाल किले में तख्त-ए-ताऊस पर बैठा हुआ था। तख्त-ए-ताऊस काफ़ी ऊँचा था । उसके एक तरफ़ थोड़ा नीचे अग़ल-बग़ल दो और छोटे-छोटे तख्त लगे हुए थे । एक तख्त पर मुगल वज़ीर दिलदार खां बैठा हुआ था और दूसरे तख्त पर मुगल सेनापति सलावत खां बैठा था । सामने सूबेदार-सेनापति -अफ़सर और दरबार का खास हिफ़ाज़ती दस्ता मौजूद था ।

उस दरबार में इंसानों से ज्यादा क़ीमत बादशाह के सिंहासन तख्त-ए-ताऊस की थी । तख्त-ए-ताऊस में 30 करोड़ रुपए के हीरे और जवाहरात लगे हुए थे । इस तख्त की भी अपनी कथा-व्यथा थी । तख्त-ए-ताऊस का असली नाम मयूर सिंहासन था । 300 साल पहले यही मयूर सिंहासन देवगिरी के यादव राजाओं के दरबार की शोभा था । यादव राजाओं का सदियों तक गोलकुंडा के हीरों की खदानों पर अधिकार रहा था । यहां से निकलने वाले बेशक़ीमती हीरे, मणि, माणिक, मोती..मयूर सिंहासन के सौंदर्य को दीप्त करते थे । लेकिन समय चक्र पलटा.. दिल्ली के क्रूर सुल्तान अलाउदद्दीन खिलजी ने यादव राज रामचंद्र पर हमला करके उनकी अरबों की संपत्ति के साथ ये मयूर सिंहासन भी लूट लिया। इसी मयूर सिंहासन को फारसी भाषा में तख्त-ए-ताऊस कहा जाने लगा।

दरबार का अपना सम्मोहन होता है और इस सम्मोहन को राजपूत वीर अमर सिंह राठौर ने अपनी पद चापों से भंग कर दिया । अमर सिंह राठौर.. शाहजहां के तख्त की तरफ आगे बढ़ रहे थे । तभी मुगलों के सेनापति सलावत खां ने उन्हें रोक दिया ।

सलावत खां- ठहर जाओ… अमर सिंह जी… आप 8 दिन की छुट्टी पर गए थे और आज 16वें दिन तशरीफ़ लाए हैं ।

अमर सिंह- मैं राजा हूँ । मेरे पास रियासत है फौज है.. किसी का गुलाम नहीं ।

सलावत खां- आप राजा थे… अब हम आपके सेनापति हैं… आप मेरे मातहत हैं । आप पर जुर्माना लगाया जाता है… शाम तक जुर्माने के सात लाख रुपए भिजवा दीजिएगा ।

अमर सिंह- अगर मैं जुर्माना ना दूँ !

सलावत खां- (तख्त की तरफ देखते हुए) हुज़ूर… ये काफिर आपके सामने हुकूम उदूली कर रहा है।

अमर सिंह के कानों ने काफिर शब्द सुना । उनका हाथ तलवार की मूंठ पर गया… तलवार बिजली की तरह निकली और सलावत खां की गर्दन पर गिरी । मुगलों के सेनापति सलावत खां का सिर जमीन पर आ गिरा… अकड़ कर बैठा सलावत खां का धड़ धम्म से नीचे गिर गया । दरबार में हड़कंप मच गया… वज़ीर फ़ौरन हरकत में आया वो बादशाह का हाथ पकड़कर भागा और उन्हें सीधे तख्त-ए-ताऊस के पीछे मौजूद कोठरीनुमा कमरे में ले गया । उसी कमरे में दुबक कर वहां मौजूद खिड़की की दरार से वज़ीर और बादशाह दरबार का मंज़र देखने लगे ।

दरबार की हिफ़ाज़त में तैनात ढाई सौ सिपाहियों का पूरा दस्ता अमर सिंह पर टूट पड़ा था । देखते ही देखते… अमर सिंह ने शेर की तरह सारे भेड़ियों का सफ़ाया कर दिया ।

बादशाह- हमारी 300 की फौज का सफ़ाया हो गया… या खुदा !

वज़ीर- जी जहाँपनाह

बादशाह- अमर सिंह बहुत बहादुर है… उसे किसी तरह समझा बुझाकर ले आओ… कहना हमने माफ किया !

वज़ीर- जी जहाँपनाह ! हुजूर… लेकिन आँखों पर यक़ीन नहीं होता… समझ में नहीं आता… अगर हिंदू इतना बहादुर है तो फिर गुलाम कैसे हो गया ?

बादशाह- अच्छा… सवाल वाजिब है… जवाब कल पता चल जाएगा ।

अगले दिन फिर बादशाह का दरबार सजा ।

शाहजहां- अमर सिंह का कुछ पता चला ।

वजीर- नहीं जहाँपनाह… अमर सिंह के पास जाने का जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता है ।

शाहजहां- क्या कोई नहीं है जो अमर सिंह को यहां ला सके ?

दरबार में अफ़ग़ानी, ईरानी, तुर्की… बड़े बड़े रुस्तम-ए-जमां मौजूद थे । लेकिन कल अमर सिंह के शौर्य को देखकर सबकी हिम्मत जवाब दे रही थी।

आखिर में एक राजपूत वीर आगे बढ़ा.. नाम था… अर्जुन सिंह।

अर्जुन सिंह- हुज़ूर आप हुक्म दें… मैं अभी अमर सिंह को ले आता हूँ ।

बादशाह ने वज़ीर को अपने पास बुलाया और कान में कहा.. यही तुम्हारे कल के सवाल का जवाब है… हिंदू बहादुर है लेकिन इसीलिए गुलाम हुआ.. देखो.. यही वजह है।

अर्जुन सिंह… अमर सिंह के रिश्तेदार थे । अर्जुन सिंह ने अमर सिंह को धोखा देकर उनकी हत्या कर दी । अमर सिंह नहीं रहे लेकिन उनका स्वाभिमान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में प्रकाशित है । इतिहास में ऐसी बहुत सी कथाएँ हैं जिनसे सबक़ लेना आज भी बाकी है ।

हिंदू

  • शाहजहाँ के दरबारी, इतिहासकार और यात्री अब्दुल हमीद लाहौरी की किताब बादशाहनामा से ली गईं ऐतिहासिक कथा।

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मैंने कभी किसी पोस्ट को शेयर करने का निवेदन नही किया, पर आदरणीय Preetam Thakur जी की यह पोस्ट अधिक से अधिक लोग कॉपी करके अपने स्वयं द्वारा पोस्ट करिये

70 साल में हिंदू नहीं समझा कि एक परिवार देश को मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाहता है
😡
5 साल में मुसलमान समझ गया कि मोदी हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता हैं।
😷😷

देश के दो टुकड़े कर दिए गये, मगर कही से कोई आवाज नहीं आई?😒

आधा कश्मीर चला गया कोई शोर नहीं?😒

तिब्बत चला गया कही कोई विद्रोह नहीं हुआ?😒

आरक्षण, एमरजेंसी, ताशकंद, शिमला, सिंधु जैसे घाव दिए गये मगर किसी ने उफ्फ नहीं की ?😒

2G स्पेक्ट्रम, कोयला, CWG, ऑगस्टा वेस्टलैंड, बोफोर्स जैसे कलंक लगे मगर किसी ने चूँ नहीं की?😒

वीटो पावर चीन को दे आये कही ट्रेन नहीं रोकी.😒

लाल बहादुर जैसा लाल खो दिया किसी ने मोमबत्ती जलाकर सीबीआई जाँच की मांग नहीं की?😒

माधवराव, राजेश पायलट जैसे नेता मार दिये, कोई फर्क नहीं?😒

परन्तू जैसे ही गौ मांस बंद किया, प्रलय आ गई..🙁

जैसे ही राष्ट्रगान अनिवार्य किया चींख पड़े..😕

वंदे मातरम्, भारत माता की जय बोलने को कहा तो जीभ सिल गई..🙁

नोटबंदी, GST पर तांडव करने लगे..🙁

आधार को निराधार करने की होड़ मच गई..😕

अपने ही देश में शरणार्थी बने कश्मीर के पंडितो पर किसी को दर्द नहीं हुआ..☹

रोहिंग्या मुसलमानो के लिये दर्द फूट रहा हैं।😠

किसी ने सच ही कहा था:
देश को डस लिया ज़हरीले नागो ने, घर को लगा दी आग घर के चिरागों ने।

विचार करना…… काग्रेस ने हिन्दूओ को नामर्द बना दिया है👆

आतंकवाद के कारण कश्मीर में बंद हुए व तोड़े गए कुल 50 हजार मंदिर खोले व बनवाये जाएंगे*

  • केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी

बहुत अच्छी खबर है,
पर 50 हजार? 😳
ये आंकड़ा सुनकर ही मन सुन्न हो गया
एक चर्च की खिड़की पर पत्थर पड़े या मस्जिद पर गुलाल पड़ जाए
तो मीडिया सारा दिन हफ्तों तक बताएगी
पर एक दो एक हजार नहीं,,,
बल्कि पूरे 50 हजार मंदिर बंद हो गए
इसकी भनक तक किसी हिन्दू को न लगी ? 😒

पहले हिन्दुओ को घाटी से जबरन भगा देना,
फिर हिंदुत्व के हर निशान को मिटा देना,
सोचिए कितनी बड़ा षड्यंत्र था..
पूरी घाटी से पूरे धर्म को जड़ से खत्म कर देने का ? 😕🙁

अगर मोदी सरकार न आती तो शायद ही ये बात किसी को पता चलती !😞

वामपंथी पत्रकारों, मुस्लिम बुद्धिजीवियों और कांग्रेस और उसके चाटुकारो ने कभी इस मुद्दे को देश के समक्ष क्यो नही रखा?🙁

यह है कांग्रेस की उपलब्धि और वामपंथी पत्रकारों और मुस्लिम बुद्धिजीवियों की चतुराई कि आम हिन्दू अपने इतिहास से अनभिज्ञ रहा.🙁

ऐसा लगता है की पूरी कायनात जैसे साज़िशें कर रही थी और इतनी शांति से कि हमें पता न चले।।..😞

Think Hard about it & share this eye-opener message to all your contacts – an appeal to Nationalists

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जानिए उस प्रेम कहानी को जिसने भारत, रूस और अमेरिका के राजनीतिक व कूटनीतिक संबंधों में तनाव पैदा कर दिया था :-

साल था 1963 । भारत मे उत्तर प्रदेश राज्य के कालाकांकर (प्रतापगढ़) के राजकुमार बृजेश सिंह
अपना इलाज कराने उस जमाने के सोवियत संघ (रूस) की राजधानी मॉस्को पहुंचे । वे अपनी ब्रोन्किइक्टेसिस नामक बीमारी के इलाज के लिए मॉस्को के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती हुए । उसी अस्पताल में सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता और तानाशाह जोसेफ स्टालिन की बेटी स्वेतलाना भी टांसिल के आपरेशन के लिए भर्ती हुई।

पहली ही नजर में दोनों को प्यार हो गया। बृजेश सिंह के व्यवहार और व्यक्तित्व से स्वेतलाना काफी प्रभावित थीं।बृजेश सिंह काफी पढ़े-लिखे, नफ़ीस और सौम्य थे। सिंह उस जमाने मे युवाओ के आदर्श हुआ करते थे। बिल्कुल गोरे-चिट्टे, सूट-बूट पहनने और धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलने वाले बृजेश बहुत सहज थे और हर किसी को प्रभवित कर लिया करते थे । उनसे मिलते ही स्वेतलाना उनके प्यार में दीवानी हो गईं।

दोनों ने संग जीने-मरने की कसमें खा लीं, लेकिन सोवियत संघ की सरकार ने शादी की अनुमति नहीं दी। बावजूद दोनों ने सरहदों का बंधन तोड़कर शादी कर ली, लेकिन तकनीकी तौर पर उस शादी को मंजूरी नहीं मिली। व्यवहारिक रूप से 1964 से दोनों पति-पत्नी की तरह साथ-साथ रहते थे।

स्वेतलाना न सिर्फ बृजेश सिंह से प्यार करती थीं, बल्कि उन्हें भारतीय वेशभूषा, परम्परा, रीति-रिवाजों और उनकी भाषा से बेहद मोहब्ब थी। उन्होंने बृजेश से प्रेम के चलते हिंदी बोलना भी सीख लिया था।

लेकिन ईश्वर को कुछ और मंजूर था । बीमारी के चलते बृजेश सिंह की 31 अक्टूबर, 1966 को मॉस्को में मौत हो गई. स्वेतलाना अपने पति की अस्थियां गंगा में प्रवाहित करने भारत आईं. वे उनके असामयिक निधन से बहुत आहत थीं और भारत आकर बसना चाहती थीं. स्वेतलाना ने कालाकांकर में गंगा के किनारे रहने की बात भी कही .लेकिन इसमें एक पेंच फंस गया.

उन दिनों सोवियत संघ में स्टालिन की आलोचक ख्रुश्चेव की सरकार थी और वह न सिर्फ़ स्टालिन के परिवार को प्रताड़ित कर रहा था बल्कि उनका नामोनिशान मिटाने पर तुला था. इसलिए भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने स्वेतलाना को भारत में बसने देने का विरोध किया. उन्हें सोवियत संघ की नाराज़गी का डर था.प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कुछ नहीं बोलीं जबकि दिवंगत बृजेश सिंह के भतीजे और कांग्रेस के बड़े नेता दिनेश सिंह ने स्वेतलाना से कहा कि अगर सोवियत संघ सरकार इजाज़त दे तो भारत सरकार भी उन्हें इजाज़त देगी यानी परोक्ष रूप से इनकार.

इसके बाद स्वेतलाना विपक्ष के नेता राम मनोहर लोहिया से मिलीं. लोहिया ने स्वेतलाना के पक्ष में संसद में भाषण दिया. वे इस बात से दुखी थे कि भारत ने अपनी बहु को ठुकरा दिया है. हालांकि लोहिया को अपने प्रयासों में सफलता नहीं मिली और स्वेतलाना को भारत छोड़ना पड़ा.

स्वेतलाना ने दिल्ली से ही अमेरिका में शरण लेने की ठानी. सोवियत संघ ने भारत से इसका कड़ा विरोध जताया. स्वेतलाना बेहद योजनाबद्ध तरीके से अमेरिकी दूतावास में चली गईं. अमेरिका उस समय हर सोवियत संघ से भागे व्यक्ति को शरण देता था. स्वेतलाना को वहां से सुरक्षित अमेरिका पहुंचा दिया गया.

अमेरिका पहुंचकर स्वेतलाना ने कालाकांकर में बृजेश अस्पताल का निर्माण कराने का निश्चय किया.उनका उद्देश्य था कि बृजेश सिंह स्मारक चिकित्सालय में गरीबों का अच्छे से अच्छा इलाज हो सके. इसके लिए उन्होंने बहुत सारे पैसे भेजे. साहित्यकार सुमित्रा नंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे लोगों ने अस्पताल का उद्घाटन किया था. उस समय यह इलाके का सबसे आधुनिक अस्पताल था. इसके लिए विदेशों से उपकरण मंगाए गए थे.

लेकिन स्थानीय धनलोलुप और मक्कार नेताओ के चलते एक दशक बाद यह अस्पताल बंद हो गया. फिलहाल अब अस्पताल की जगह इस इमारत में कोई निजी स्कूल चल रहा है. 22 नवंबर, 2011 को स्वेतलाना की 85 साल की उम्र में मृत्यु हो गई ।

Copied..

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महाराजा छत्रशाल – છત્રશાલ


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बुन्देलखण्ड का शेर:छत्रसाल

3 जून/जन्म-दिवस

झाँसी के आसपास उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की विशाल सीमाओं में फैली बुन्देलखण्ड की वीर भूमि में तीन जून, 1649 (ज्येष्ठ शुक्ल 3,विक्रम संवत 1706) को चम्पतराय और लालकुँवर के घर में छत्रसाल का जन्म हुआ था। चम्पतराय सदा अपने क्षेत्र से मुगलों को खदेड़ने के प्रयास में लगे रहते थे। अतः छत्रसाल पर भी बचपन से इसी प्रकार के संस्कार पड़ गये।

जब छत्रसाल केवल 12 साल के थे, तो वह अपने मित्रों के साथ विन्ध्यवासिनी देवी की पूजा के लिए जा रहे थे। रास्ते में कुछ मुस्लिम सैनिकों ने उनसे मन्दिर का रास्ता जानना चाहा। छत्रसाल ने पूछा कि क्या आप लोग भी देवी माँ की पूजा करने जा रहे हैं ? उनमें से एक क्रूरता से हँसते हुए बोला- नहीं, हम तो मन्दिर तोड़ने जा रहे हैं। यह सुनते ही छत्रसाल ने अपनी तलवार उसके पेट में घोंप दी। उसके साथी भी कम नहीं थे। बात की बात में सबने उन दुष्टों को यमलोक पहुँचा दिया।

बुन्देलखण्ड के अधिकांश राजा और जागीरदार मुगलों के दरबार में हाजिरी बजाते थे। वे अपनी कन्याएँ उनके हरम में देकर स्वयं को धन्य समझते थे। उनसे किसी प्रकार की आशा करना व्यर्थ था। एकमात्र शिवाजी ही मुगलों से टक्कर ले रहे थे। छत्रसाल को पता लगा कि औरंगजेब के आदेश पर मिर्जा राजा जयसिंह शिवाजी को पकड़ने जा रहे हैं, तो वे जयसिंह की सेना में भर्ती हो गये और मुगल सेना की कार्यशैली का अच्छा अध्ययन किया।

जब शिवाजी आगरा जेल से निकलकर वापस रायगढ़ पहुँचे, तो छत्रसाल ने उनसे भेंट की। शिवाजी के आदेश पर फिर से बुन्देलखण्ड आकर उन्होंने अनेक जागीरदारों और जनजातियों के प्रमुखों से सम्पर्क बढ़ाया और अपनी सेना में वृद्धि की। अब उन्होंने मुगलों से अनेक किले और शस्त्रास्त्र छीन लिये। यह सुनकर बड़ी संख्या में नवयुवक उनके साथ आ गये।

उधर औरंगजेब को जब यह पता लगा, तो उसने रोहिल्ला खाँ और फिर तहव्वर खाँ को भेजा; पर हर बार उन्हें पराजय ही हाथ लगी। छत्रसाल के दो भाई रतनशाह और अंगद भी वापस अपने भाई के साथ आ गये। अब छत्रसाल ने दक्षिण की ओर से जाने वाले मुगलों के खजाने को लूटना शुरू किया। इस धन से उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि की। एक बार छत्रसाल शिकार के लिए जंगल में घूम रहे थे, तो उनकी स्वामी प्राणनाथ से भेंट हुई। स्वामी जी के मार्गदर्शन में छत्रसाल की गतिविधियाँ और बढ़ गयीं। विजयादशमी पर स्वामी जी ने छत्रसाल का राजतिलक कर उसे‘राजाधिराज’ की उपाधि दी।

एक बार मुगलों की शह पर हिरदेशाह, जगतपाल और मोहम्मद खाँ बंगश ने बुन्देलखण्ड पर तीन ओर से हमला कर दिया। वीर छत्रसाल की अवस्था उस समय 80 वर्ष की थी। उन्हें शिवाजी का वचन याद आया कि संकट के समय में हम तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे। इसे याद कर छत्रसाल ने मराठा सरदार बाजीराव पेशवा को सन्देश भेजा। सन्देश मिलते ही बाजीराव ने तुरन्त ही वहाँ पहुँचकर मुगल सेना को खदेड़ दिया। इस प्रकार छत्रसाल ने जीवन भर मुगलों को चैन नहीं लेने दिया।
जिन महाकवि भूषण ने छत्रपति शिवाजी की स्तुति में ‘शिवा बावनी’लिखी, उन्होंने ही ‘छत्रसाल दशक’ में आठ छन्दों में छत्रसाल की वीरता और शौर्य का वर्णन किया है। आज भी बुन्देलखण्ड के घर-घर में लोग अन्य देवी देवताओं के साथ छत्रसाल को याद करते हैं। – छत्रसाल महाबली, करियों भली-भली।।

(कवि भूषण ने महाराज छत्रसाल की प्रशंसा में ‘छत्रसाल दशक’ की रचना की थी | यह कविता उसी का अंश है | इन पंक्तियों में युद्धरत छत्रसाल की तलवार और बरछी के पराक्रम का वर्णन किया है | )

निकसत म्यान तें मयूखैं प्रलैभानु कैसी, फारैं तमतोम से गयंदन के जाल कों|

लागति लपटि कंठ बैरिन के नागिनी सी,रुद्रहिं रिझावै दै दै मुंडन के माल कों|

लाल छितिपाल छत्रसाल महाबाहु बली,कहाँ लौं बखान करों तेरी कलवार कों|

प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि,कालिका सी किलकि कलेऊ देति काल कों|

भुज भुजगेस की वै संगिनी भुजंगिनी – सी,खेदि खेदि खाती दीह दारुन दलन के|

बखतर पाखरन बीच धँसि जाति मीन,पैरि पार जात परवाह ज्यों जलन के|

रैयाराव चम्पति के छत्रसाल महाराज,भूषन सकै करि बखान को बलन के|

पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर,तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के|


Rajputana Community

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बुंदेला राजपूत महाराजा छत्रशाल की जयंती पर शुभकामनाएं(4 मई 1649)
कहानी एक ऐसे राजपूत वीर की जिन्होंने छत्रपति शिवजी से प्रेरित होकर मुगलो से लोहा लिया शुरुवात की केवल पांच चुने हुए घुड़सवार और पच्चीस योद्धा राजपूतो से और धीरे धीरे पुरे बुंदेलखंड में आपने परचम लहराया मुगलो के ठाणे तबाह किये स्वराज्य की खातिर अपनी खुद की रियासत बना डाली जिसका नाम था “पन्ना” वहा के महाराजा बने
इन्हे बारे में मशहूर है

“‘छत्ता तेरे राज में,धक-धक धरती होय।
जित-जित घोड़ा मुख करे,तितर-तित फत्ते होय।’

वीर छत्रसाल ने मुगलो से कुल ५२ युद्ध लड़े और मुगलो के सैकड़ो ठाणे तबाह किये औरंगज़ेब के दस से ज्यादा बड़े विश्वनीय मनसबदार ,सैन्य अधिकारियो को काट डाला बुंदेलखंड में मुग़ल आने से डरने लगे

आज ही दिन वीर छत्रशाल का जन्म हुए था और ये शिवाजी को अपना आदर्श मानते थे सोलह वर्ष में छत्रशाल के सर से पिता का साया उठ चूका था उनकी जागीर दुश्मनो ने kabje में ले ली थी उनकी माता श्री लाल कँवर ने अपने गहने बेच कुछ स्वाभिमानी राजपूतो की छोटी सी सेना खड़ी की। धीरे धीरे बुंदोलो की कीर्ति चारो फैलने लगे एक समय ऐसा भी आया जब दिल्ली तख्त पर बैठे औरंगजेब भी छत्रसाल के पौरुष और उसकी बढ़ती सैनिक शक्ति को देखकर चिंतित हो उठा एक बार छत्रसाल, छत्रपति शिवाजी महाराज से मिले। दक्षिण क्षेत्र में मुगलों के लिए शिवाजी के नाम से पसीना छूटता था। शिवाजी ने कहा – ‘छत्रसाल तुम बुंदेलखंड में जाकर वहां की देखभाल करो।’ छत्रसाल, शिवाजी से मंत्रणा करके बुंदेलखंड क्षेत्र में मुगलों को परास्त कर अपना शासन चलाते रहे। छत्रसाल को ज्ञात था कि जहां शस्त्र से राष्ट्र की रक्षा होती है वहां शास्त्र सुरक्षित रहते हैं

छत्रसाल ने पहला युद्ध अपने माता-पिता के साथ विश्वासघात करने वाले सेहरा के धंधेरों से किया हाशिम खां को मार डाला और सिरोंज एवं तिबरा लूट डाले गये लूट की सारी संपत्ति छत्रसाल ने अपने सैनिकों में बाँटकर पूरे क्षेत्र के लोगों को उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए आकर्षित किया। कुछ ही समय में छत्रसाल की सेना में भारी वृद्धि होने लगी और उन्हेांने धमोनी, मेहर, बाँसा और पवाया आदि जीतकर कब्जे में कर लिए। ग्वालियर-खजाना लूटकर सूबेदार मुनव्वर खां की सेना को पराजित किया, बाद में नरवर भी जीता।

ग्वालियर की लूट से छत्रसाल को सवा करोड़ रुपये प्राप्त हुए पर औरंगजेब इससे छत्रसाल पर टूट-सा पड़ा। उसने सेनपति रुहल्ला खां के नेतृत्व में आठ सवारों सहित तीस हजारी सेना भेजकर गढ़ाकोटा के पास छत्रसाल पर धावा बोल दिया। घमासान युद्ध हुआ पर दणदूल्हा (रुहल्ला खां) न केवल पराजित हुआ वरन भरपूर युद्ध सामग्री छोड़कर जन बचाकर उसे भागना पड़ा।

* इनकी एक अवैध पुत्री (हैदराबाद की मुस्लिम औरत /दासी/पासवान की लड़की “मस्तानी”) मस्तानी की शादी बाजीराव पेशवा प्रथम से हुयी थी


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महाराणा प्रताप