Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

गुजरात में सरदार पटेल की विशालकाय मूर्ति बन रही है ………….और मूर्ति का ये मुद्दा कांग्रेसियों और ओबैसियों के पेट में दर्द का कारण है ……..

फ़िलहाल आज के दिन सितंबर 1948 में सरदार पटेल ने फौजी कार्यवाही के जरिये हैदरावाद को भारत में मिला लिया था ………..उस दौर के कुछ विवरण

आज के ही दिन हैदराबाद का भारत में विलय कराया गया था। हालांकि हैदराबाद को भारत में शामिल कराना इतना आसान नहीं था और काफी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा।

-राष्ट्रीय उत्पादन की दृष्टि से हैदराबाद को देश का सबसे बड़ा राजघराना होने का रुतबा हासिल था और उसका क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी बड़ा था।

-देश की आजादी के बाद ज्यादातर रजवाड़े भारत में शामिल हो गए लेकिन जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद भारत में शामिल होने को तैयार नहीं थे। ये अलग देश के रूप में मान्यता पाने की कोशिश में थे।

-हैदराबाद के निजाम ओसमान अली खान आसिफ ने फैसला किया कि उनका रजवाड़ा न तो पाकिस्तान और न ही भारत में शामिल होगा। भारत छोड़ने के समय अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम को या तो पाकिस्तान या फिर भारत में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। अंग्रेजों ने हैदराबाद को स्वतंत्र राज्य बने रहने का भी प्रस्ताव दिया था।

-हैदराबाद में निजाम और सेना में वरिष्ठ पदों पर मुस्लिम थे लेकिन वहां की अधिसंख्य आबादी हिंदू (85%) थी। शुरू में निजाम ने ब्रिटिश सरकार से हैदराबाद को राष्ट्रमंडल देशों के अंर्तगत स्वतंत्र राजतंत्र का दर्जा देने का आग्रह किया। हालांकि ब्रिटिश निजाम के इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए।

-कहा जाता है कि निजाम भारत में हैदराबाद का विलय बिल्कुल नहीं कराना चाहते थे। निजाम ने मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की थी क्या वह भारत के खिलाफ उनके राज्य का समर्थन करेंगे।

-मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एम्आईएम) के पास उस वक्त 20 हजार रजाकार थे जो निजाम के लिए काम करते थे और हैदराबाद का विलय पकिस्तान में करवाना चाहते थे या स्वतंत्र रहना। रजाकार एक निजी सेना थी जो निजाम के शासन को बनाए रखने के लिए थी।

-हैदराबाद के निजाम के ना-नुकुर करने के बाद भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनसे सीधे भारत में विलय का आग्रह किया। लेकिन निजाम ने पटेल के आग्रह को खारिज करते हुए 15 अगस्त 1947 को हैदराबाद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।

-भारत के दिल में स्थित हैदराबाद के निजाम के इस कदम से पटेल चौंक गए और उन्होंने उस समय के गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से संपर्क किया। माउंटबेटन ने पटेल को सलाह दी कि इस चुनौती को भारत बिना बल प्रयोग के निपटे।

हालांकि पटेल इससे बिल्कुल असहमत थे। उनका कहना था कि हैदराबाद की हिमाकत को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

-इसके बाद हैदराबाद के निजाम हथियार खरीदने और पाकिस्तान के साथ सहयोग करने की कोशिश में लग गए। सरदार पटेल को जैसे ही इसकी भनक लगी तो उन्होंने कहा कि हैदराबाद भारत के पेट में कैंसर के समान है और इसका समाधान सर्जरी से ही होगा। इस समय तक भारत और हैदाराबाद के बीच बातचीत टूट चुकी थी और भारत ने उसपर हमला करने की तैयारी कर ली थी।

-जब भारत के पास कोई और विकल्प नहीं बचा है तो हैदराबाद पर सैन्य कार्रवाई का फैसला किया गया। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने हैदराबाद पर हमला कर दिया। भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे। भारतीय सेना का नेतृत्व मेजर जनरल जेएन चौधरी कर रहे थे। भारतीय सेना को पहले और दूसरे दिन कुछ परेशानी हुई और फिर विरोधी सेना ने हार मान ली। 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद की सेना ने हथियार डाल दिए। पांच दिनों तक चली कार्रवाई में 1373 रजाकार मारे गए थे। हैदराबाद के 807 जवान भी मारे गए। भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए।

— साभार पवन अवस्थी जी.

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एक षड्यंत्र और शराब की घातकता….”


एक षड्यंत्र और शराब की घातकता….”

 

कैसे हिंदुओं की सुरक्षा प्राचीर को ध्वस्त किया मुग़लों ने ??

 

जानिये और फिर सुधार कीजिये !!

 

मुगल बादशाह का दिल्ली में दरबार लगा था और हिंदुस्तान के दूर दूर के राजा महाराजा दरबार में हाजिर थे।

उसी दौरान मुगल बादशाह ने एक दम्भोक्ति की “है कोई हमसे बहादुर इस दुनिया में ?”

 

सभा में सन्नाटा सा पसर गया ,एक बार फिर वही दोहराया गया !

 

तीसरी बार फिर उसने ख़ुशी से चिल्ला कर कहा “है कोई हमसे बहादुर जो हिंदुस्तान पर सल्तनत कायम कर सके ??

 

सभा की खामोशी तोड़ती एक बुलन्द शेर सी दहाड़ गूंजी तो सबका ध्यान उस शख्स की और गया !

 

वो जोधपुर के महाराजा राव रिड़मल राठौड़  थे !

 

रिड़मल जी राठौड़ ने कहा, “मुग़लों में बहादुरी नहीँ कुटिलता है…, सबसे बहादुर तो राजपूत है दुनियाँ में !

 

मुगलो ने राजपूतो को आपस में लड़वा कर हिंदुस्तान पर राज किया !

कभी सिसोदिया राणा वंश को कछावा जयपुर से

 

तो कभी राठोड़ो को दूसरे राजपूतो से…।

 

बादशाह का मुँह देखने लायक था ,

 

ऐसा लगा जैसे किसी ने चोरी करते रंगे हाथो पकड़ लिया हो।

 

“बाते मत करो राव…उदाहरण दो वीरता का।”

 

रिड़मल राठौड़  ने कहा “क्या किसी कौम में देखा है किसी को सिर कटने के बाद भी लड़ते हुए ??”

 

बादशाह बोला ये तो सुनी हुई बात है देखा तो नही ,

 

रिड़मल राठौड़ बोले ” इतिहास उठाकर देख लो कितने वीरो की कहानिया है सिर कटने के बाद भी लड़ने की … ”

 

बादशाह हसा और दरबार में बेठे कवियों की और देखकर बोला

“इतिहास लिखने वाले तो मंगते होते है ।  मैं भी १०० मुगलो के नाम लिखवा दूँ इसमें क्या ?

मुझे तो जिन्दा ऐसा राजपूत बताओ जो कहे की मेरा सिर काट दो में फिर भी लड़ूंगा।”

 

राव रिड़मल राठौड़ निरुत्तर हो गए और गहरे सोच में डूब गए।

 

रात को सोचते सोचते अचानक उनको रोहणी ठिकाने के जागीरदार का ख्याल आया।

 

रात को ११ बजे रोहणी ठिकाना (जो की जेतारण कस्बे जोधपुर रियासत) में दो घुड़सवार बुजुर्ग जागीरदार के पोल पर पहुंचे और मिलने की इजाजत मांगी।

 

ठाकुर साहब काफी वृद्ध अवस्था में थे फिर भी उठ कर मेहमान की आवभगत के लिए बाहर पोल पर आये ,,

 

घुड़सवारों ने प्रणाम किया और वृद्ध ठाकुर की आँखों में चमक सी उभरी और मुस्कराते हुए बोले

” जोधपुर महाराज… आपको मैंने गोद में खिलाया है और अस्त्र शस्त्र की शिक्षा दी है.. इस तरह भेष बदलने पर भी में आपको आवाज से पहचान गया हूँ।

 

हुकम आप अंदर पधारो…मैं आपकी रियासत का छोटा सा जागीरदार, आपने मुझे ही बुलवा लिया होता।

 

राव रिड़मल राठौड़ ने उनको झुककर प्रणाम किया और बोले एक समस्या है , और बादशाह के दरबार की पूरी कहानी सुना दी

 

अब आप ही बताये की जीवित योद्धा का कैसे पता चले की ये लड़ाई में सिर कटने के बाद भी लड़ेगा ?

 

रोहणी जागीदार बोले ,” बस इतनी सी बात..

 

मेरे दोनों बच्चे सिर कटने के बाद भी लड़ेंगे

 

और आप दोनों को ले जाओ दिल्ली दरबार में ये आपकी और राजपूती की लाज जरूर रखेंगे ”

 

राव रिड़मल राठौड़ को घोर आश्चर्य हुआ कि एक पिता को कितना विश्वास है अपने बच्चो पर.. , मान गए राजपूती धर्म को।

 

सुबह जल्दी दोनों बच्चे अपने अपने घोड़ो के साथ तैयार थे!

 

उसी समय ठाकुर साहब ने कहा ,” महाराज थोडा रुकिए !!

 

मैं एक बार इनकी माँ से भी कुछ चर्चा कर लूँ इस बारे में।”

 

राव रिड़मल राठौड़  ने सोचा आखिर पिता का ह्रदय है

कैसे मानेगा !

अपने दोनों जवान बच्चो के सिर कटवाने को ,

 

एक बार रिड़मल जी ने सोचा की मुझे दोनों बच्चो को यही छोड़कर चले जाना चाहिए।

 

ठाकुर साहब ने ठकुरानी जी को कहा

 

” आपके दोनों बच्चो को दिल्ली मुगल बादशाह के दरबार में भेज रहा हूँ सिर कटवाने को ,

दोनों में से कौनसा सिर कटने के बाद भी लड़ सकता है ?

 

आप माँ हो आपको ज्यादा पता होगा !

 

ठकुरानी जी ने कहा

“बड़ा लड़का तो क़िले और क़िले के बाहर तक भी लड़ लेगा पर

 

छोटा केवल परकोटे में ही लड़ सकता है क्योंकि पैदा होते ही इसको मेरा दूध नही मिला था। लड़ दोनों ही सकते है, आप निश्चित् होकर भेज दो”

 

दिल्ली के दरबार में आज कुछ विशेष भीड़ थी और हजारो लोग इस दृश्य को देखने जमा थे।

 

बड़े लड़के को मैदान में लाया गया और

मुगल बादशाह ने जल्लादो को आदेश दिया की इसकी गर्दन उड़ा दो..

 

तभी बीकानेर महाराजा बोले “ये क्या तमाशा है ?

 

राजपूती इतनी भी सस्ती नही हुई है , लड़ाई का मौका दो और फिर देखो कौन बहादुर है ?

 

बादशाह ने खुद के सबसे मजबूत और कुशल योद्धा बुलाये और कहा ये जो घुड़सवार मैदान में खड़ा है उसका सिर् काट दो…

 

२० घुड़सवारों को दल रोहणी ठाकुर के बड़े लड़के का सिर उतारने को लपका और देखते ही देखते उन २० घुड़सवारों की लाशें मैदान में बिछ गयी।

 

दूसरा दस्ता आगे बढ़ा और उसका भी वही हाल हुआ ,

 

मुगलो में घबराहट और झुरझरि फेल गयी ,

 

इसी तरह बादशाह के ५०० सबसे ख़ास योद्धाओ की लाशें मैदान में पड़ी थी और उस वीर राजपूत योद्धा के तलवार की खरोंच भी नही आई।

 

ये देख कर मुगल सेनापति ने कहा

 

” ५०० मुगल बीबियाँ विधवा कर दी आपकी इस परीक्षा ने अब और मत कीजिये हजुर , इस काफ़िर को गोली मरवाईए हजुर…

तलवार से ये नही मरेगा…

 

कुटिलता और मक्कारी से भरे मुगलो ने उस वीर के सिर में गोलिया मार दी।

 

सिर के परखचे उड़ चुके थे पर धड़ ने तलवार की मजबूती कम नही करी

 

और मुगलो का कत्लेआम खतरनाक रूप से चलते रहा।

 

बादशाह ने छोटे भाई को अपने पास निहत्थे बैठा  रखा था

 

ये सोच कर की  ये बड़ा यदि बहादुर निकला तो इस छोटे को कोई जागीर दे कर अपनी सेना में भर्ती कर लूंगा

 

लेकिन जब छोटे ने ये अंन्याय देखा तो उसने झपटकर बादशाह की तलवार निकाल ली।

 

उसी समय बादशाह के अंगरक्षकों ने उनकी गर्दन काट दी फिर भी धड़ तलवार चलाता गया और अंगरक्षकों समेत मुगलो का काल बन गए।

 

बादशाह भाग कर कमरे में छुप गया और बाहर मैदान में बड़े भाई और अंदर परकोटे में छोटे भाई का पराक्रम देखते ही बनता था।

 

हजारो की संख्या में मुगल हताहत हो चुके थे और आगे का कुछ पता नही था।

 

बादशाह ने चिल्ला कर कहा अरे कोई रोको इनको..।

 

एक मौलवी आगे आया और बोला इन पर शराब छिड़क दो।

 

राजपूत का इष्ट कमजोर करना हो तो शराब का उपयोग करो।

 

दोनों भाइयो पर शराब छिड़की गयी ऐसा करते ही दोनों के शरीर ठन्डे पड़ गए।

 

मौलवी ने बादशाह को कहा ” हजुर ये लड़ने वाला इनका शरीर नही बल्कि इनकी कुल देवी है और ये राजपूत शराब से दूर रहते है और अपने धर्म और इष्ट को मजबूत रखते है।

 

यदि मुगलो को हिन्दुस्तान पर शासन करना है तो इनका इष्ट और धर्म भ्रष्ट करो और इनमे दारु शराब की लत लगाओ।

 

यदि मुगलो में ये कमियां हटा दे तो मुगल भी मजबूत बन जाएंगे।

 

उसके बाद से ही राजपूतो में मुगलो ने शराब का प्रचलन चलाया और धीरे धीरे राजपूत शराब में डूबते गए और अपनी इष्ट देवी को आराधक से खुद को भ्रष्ट  करते गए।

 

और मुगलो ने मुसलमानो को कसम खिलवाई की शराब पीने के बाद नमाज नही पढ़ी जा सकती। इसलिए इससे दूर रहिये।

माँसाहार जैसी राक्षसी प्रवृत्ति पर गर्व करने वाले राजपूतों को यदि ज्ञात हो तो बताएं और आत्म मंथन करें कि महाराणा प्रताप की बेटी की मृत्यु जंगल में भूख से हुई थी क्यों …?

 

यदि वो मांसाहारी होते तो जंगल में उन्हें जानवरों की कमी थी क्या मार खाने के लिए…?

 

इसका तात्पर्य यह है कि राजपूत हमेशा शाकाहारी थे केवल कुछ स्वार्थी राजपूतों ने जिन्होंने मुगलों की आधिनता स्वीकार कर ली थी वे मुगलों को खुश करने के लिए उनके साथ मांसाहार करने लगे और अपने आप को मुगलों का विश्वासपात्र साबित करने की होड़ में गिरते चले गये हिन्दू भाइयो ये सच्ची घटना है और हमे हिन्दू समाज को इस कुरीति से दूर करना होगा।

 

तब ही हम पुनः खोया वैभव पा सकेंगे और हिन्दू धर्म की रक्षा कर सकेंगे।

(तथ्य एवं श्रुति पर आधारित)

 

🚩🚩🚩🚩

🙏🙏नमन ऐसी वीर परंपरा को नमन 🚩🚩🚩🚩.

 

“आग्रह शराब से दूर रहे सभी”

—–संजीव कु पुण्डीर

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મહારાજ,આખો હાથી જતો હોય તો એનો શણગાર ઉતારવાનો ના હોય! વાંચો એક રાજપૂતાણીએ ભાવનગર મહારાજને આપેલો જબરદસ્ત જવાબ


મહારાજ,આખો હાથી જતો હોય તો એનો શણગાર ઉતારવાનો ના હોય! વાંચો એક રાજપૂતાણીએ ભાવનગર મહારાજને આપેલો જબરદસ્ત જવાબ

ભાવનગરના છેલ્લાં રાજવી મહારાજા કૃષ્ણકુમારસિંહજી ગોહિલના નામ આગળ માત્ર મહારાજા કે રાજા નહી, પરંતુ ‘પ્રાત:સ્મરણીય’ જેવો પરમ આદરભાવી શબ્દ લગાડવામાં આવે છે. આ વાત પરથી સાફ જણાય આવે કે, કૃષ્ણકુમારસિંહજીએ કેટલી લોકચાહના મેળવી હશે?! ઉલ્લેખનીય છે કે, આઝાદ ભારતના સંધાણ માટે બધાં રજવાડાંને એકસંઘમાં વિલીન કરવાના દસ્તાવેજ પર પ્રથમ સહી ભાવનગર રાજ કૃષ્ણકુમારસિંહજીએ જ કરેલી.

કૃષ્ણકુમારસિંહના લગ્ન ગોંડલના મહારાજ ભોજરાજના દિકરી વિજયાકુંવરબા સાથે ૧૯૩૧માં થયેલાં. દેશ આઝાદ થયો અને કૃષ્ણકુમારસિંહજીએ વિલીનીકરણના દસ્તાવેજ પર હસ્તાક્ષર કર્યાં એ વખતનો એક પ્રસંગ જાણવા જેવો છે.

માનવામાં આવે છે કે, હસ્તાક્ષર કરતા પહેલાં મહારાજા કૃષ્ણકુમારસિંહજીએ સરદાર પટેલ પાસે થોડી ક્ષણોની પરવાનગી માંગેલી. મહારાજાએ કહેલ, “મને થોડી મિનીટોની પરવાનગી આપો તો મારે મહારાણી સાથે વાત કરવી છે.”

“મહારાજ! તમારે પરવાનગી લેવાની ના હોય. તમારે કારણે જ આ કાર્ય શક્ય બન્યું છે.” સરદાર ભાવુક થઈ ઉઠ્યાં. સરદાર પટેલ મહારાજાના ખાસ મિત્ર હતા.

એ પછી કૃષ્ણકુમારસિંહજી મહારાણી વિજયાકુંવરબાના કક્ષમાં ગયાં. મહારાણીને જણાવ્યું કે,

“રાજ્ય વિલીનીકરણના દસ્તાવેજો પર હું સહી કરું છું, એ સાથે જ રાજ્યની સંપત્તિ પણ હું સરકારને હસ્તક કરું છું.”

“મહારાજ! એ જ તો આપના સંસ્કાર છે. એમાં મને પૂછવાની શું જરૂર છે?” વિજયાકુંવરબાના મુખ પર ઓજસ્વી નારીના તેજ હતા.

“એમ નહી પણ તમે ગોંડલથી કરિયાવરમાં જે દાગીના ને સંપત્તિ લાવ્યાં છો તેના પર તો મારો કે રાજનો કોઇ હક્ક ના કહેવાય. એ તમારા પિયરની છે માટે એના પર આપનો જ અધિકાર છે. એટલે હું એમ કહેવા માંગું છું કે, એ સંપત્તિનું શું કરવું છે?”

એ વખતે ભાવનગર ધણીના આ પ્રશ્નથી મહારાણી મૃદુ હસી પડ્યાં અને એણે ઉત્તર આપ્યો,

“મહારાજ, આખો હાથી જતો હોય ને તો એનો શણગાર ઉતારવાનો ના હોય…!”

આને કહેવાય ખાનદાની..! લોહીમાં આવે છે આવી ખાનદાની, જેને મેળવવી દોહ્યલી હોય છે. મિત્રો! ખાસ વિનંતી છે કે, આ વાતો જો નાનપણથી જ તમારા સંતાનને દૂધ ભેગી પાશો તો ચોક્કસપણે એ કોલેજ જવા જેવડાં થશે ત્યાં સુધીમાં એ જાણી જશે કે, કેવો હતાં બાપદાદા..! કેવી હતી આ ધરતીની ખાનદાની! એક હાકલે આખું ભાવેણું કુરબાન કરી દેતાં મહારાજની વાતો કહેશો તો એનામાં ભવિષ્યમાં કોઇ નોધારાને પાંચ રૂપિયાં આપવાની પ્રેરણા થશે. થોથાંમાંથી ભણીને પેટીયું તો રળી લેશે પણ આ લોહીની વાતો તો તમારે જ રેડવી પડશે.

આર્ટીકલ સારો લાગ્યો હોત તો આપના મિત્રો સાથે પણ જરૂરથી શેર કરજો. અને આવી જ વાતો જાણવા લેતાં રહો મુલાકાત આપણા પેજની. ધન્યવાદ!

લેખક: કૌશલ બારડ GujjuRocks Team
દરરોજ આવી અનેક લાગણીસભર વાર્તાઓ વાંચો ફક્ત ગુજ્જુરોક્સ પેજ પર.

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सरदार मोहन सिंह


ये हैं सरदार मोहन सिंह, जिन्होने 2nd विश्व युद्ध में जर्मन के लिए लड़ाई लड़ी थी । युद्ध के बाद हिटलर ने उन्हें इनाम देना चाहा तो सरदार जी ने कहा कि हमें अच्छे से अच्छे हथियार दीजिए, क्योंकि हमें अपने देश को आजाद करवाना है । हिटलर ने फिर उन्हें जो हथियार दिये , वही हथियार आजाद हिन्द फौज ने इस्तेमाल किए और सही मायने मे इस लड़ाई में र॔गून में 50 हजार से ज्यादा अंग्रेजी फौज के मारे जाने क बाद ही अंग्रेजो ने भारत छोड़ने का फैसला लिया था । इसमें गाँधी और काँग्रेस का कोई योगदान नहीं था । बाद में इन काँग्रेसियो ने आजादी का सारा credit गाँधी के चरखे को दिया । इन काँग्रेसियो ने सरदार मोहन सिंह जैसे महान योद्धा का नाम भारत के इतिहास से गायब कर दिया ।
लानत है तुम सब काँग्रेसियो पर ।वंदे मातरम

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निओ दिप

#आदिवासी_योद्धा

क्या आप जानते है कि अगर ब्रह्मपुत्र नदी और असम के वीर हिन्दू क्षत्रिय वनवासी योद्धा न होते तो असम से लेकर म्यामार , कम्बोडिया तक इस्लाम काफी समय पहले खिलजी के आक्रमण से ही फैल चुका होता ?

उस समय सुल्तान की सेना का मुकाबला असम के हिन्दू क्षत्रिय वनवासी राजाओ ने किया ।

ऐसा माना जाता है कि विश्व के इतिहास में पहली जलसेना का प्रयोग भारत वर्ष में असम में हिन्दू वनवासी राजाओ ने ही किया ।

असम को प्राचीन काल में प्राग्ज्योतिषपुर कहा जाता था। असम का अर्थ विद्वानों ने जिसकी कोई समता न हो, जो सर्वदा अपराजेय रहे और विषम (अ+सम=समतल नही है जो) भूमि वाला लिया है।

संभव है कि दिन का शुभारंभ यहीं से होने के कारण हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इस क्षेत्र को ज्योतिष और ज्योतिष संबंधी ज्ञान विज्ञान का केन्द्र बनाया था।

इसलिए इसे प्राग्ज्योतिषपुर का सार्थक नाम दिया गया। यह भी मान्यता है कि रामायणकाल में कुश के पुत्र अमुर्थराज ने कामरूप राज्य की स्थापना की थी। उसके पश्चात अमुर्थराज की पीढिय़ों ने यहां शासन किया।

इस काल में यहां वैदिक संस्कृति का दिव्य-दिवाकर अपनी पुण्य आभा से जग को आलोकित करता रहा और असम भारत के ज्योतिष शास्त्र के एक प्रमुख गढ़ के रूप में स्थापित हो गया।

आसाम ने 1205 ई. में नालंदा विश्वविद्यालय को जलाने वाले बख्तियार खिलजी को हराकर अपना इतिहास बनाया था। जिसका उल्लेख हम प्रसंगवश पूर्व में कर चुके हैं। जब दिल्ली की सल्तनत स्थापित होकर हिंदुस्तान को अपने झण्डे तले लाकर इसके धर्म संस्कृति और क्षात्रशक्ति का पददलन करने के लिए प्रतिक्षण कोई न कोई दुष्ट उपाय खोज रही थी, तभी की बात है कि 1228 ई. में असम का शासन हिंदू राजा संध्या के हाथों में था। उसे भली प्रकार ज्ञात था कि 1205 ई. में आसाम की धरती ने हिंदुत्व के हत्यारे और संस्कृति के भक्षक खिलजी की क्या दुर्दशा की थी? इसलिए वीरता और शौर्य में संपन्न इस राजा के हृदय में भी भारत के शासकों की परंपरागत धर्मशक्ति, ईश्वर भक्ति और राष्ट्रभक्ति की त्रिवेणी बह रही थी, जो उसे निज राष्ट्र के लिए कुछ करने की प्रेरणा देती थी।

इस शासक के समय में दिल्ली के सुल्तान इल्तमश के पुत्र नासिरूद्दीन महमूद ने 1228 ई. में आसाम पर आक्रमण कर दिया। नासिरूद्दीन भूल गया था कि आसाम की वीरभूमि ने किस प्रकार खिलजी का प्राणांत कराके ही सांस लिया था। उसके आक्रमण का तब आसाम के शासक संध्या ने सफलतापूर्वक सामना किया, कितने ही हिंदूवीरों ने अपना बलिदान दे दिया, पर आसाम की एक इंच भूमि शत्रु को नही दी। सचमुच एक-एक इंच भूमि के लिए घोर संघर्ष हुआ, पर सफलता भारत माता के सपूतों को ही मिली, अर्थात हिंदुत्व के धर्म ध्वजवाहक विजयी रहे। राजा संध्या ने न केवल नासिरूद्दीन को परास्त किया अपितु उसका वध करके शत्रु को सदा-सदा के लिए ही समाप्त कर दिया।

संध्या का यह एक दूरदर्शी निर्णय था, कि उसने शत्रु को युद्घ क्षेत्र में ही परास्त कर दिया। क्योंकि ऐसे कई अवसर आये जब हमारे शासकों ने हाथ में आये शत्रु को बिना उसके प्राण लिये छोड़ दिया। जैसे राणा हम्मीर ने 1326 ई. में दिल्ली के बादशाह मुहम्मद तुगलक को सिंगौली के समीप परास्त कर बंदी बना लिया था और दिल्ली उस समय राजा विहीन थी। यदि हम्मीर शत्रु का अंत कर दिल्ली पर अधिकार कर लेता तो उसे कोई रोकने वाला नही था। इसी प्रकार 1433 ई. में मेवाड़ के राणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान को परास्त कर बंदी भी बना लिया और पूरे छह माह अपने बंदी ग्रह में रखा, पर बाद में उसे यूं ही छोड़ दिया। यदि राणा भी उस समय मालवा को अपने आधीन कर लेता तो भारत का इतिहास भी कुछ और ही होता। ऐसे ही और भी उदाहरण हैं। कहने का अभिप्राय केवल ये है कि राजा को शत्रु के प्रति सदा भविष्य को दृष्टि में रखकर ही निर्णय लेना चाहिए।

आसाम की भूमि को सुल्तान गयासुद्दीन उजबेग ने 1255 ई. में पददलित करने हेतु आक्रमण किया। उजबेग का आक्रमण ब्रह्मपुत्र के उत्तरी किनारे पर आगे बढ़ते हुए कामरूप पर किया गया। उजबेग निस्संकोच आगे बढ़ रहा था, भारत की इस वीर भूमि का शासक उस समय भी संध्या ही था। संध्या की ओर से कोई प्रतिरोध होता न देखकर उजबेग का मनोबल बढ़ता जा रहा था, जो उसे निरंतर आगे बढऩे की प्रेरणा दे रहा था।

उधर आसाम का युद्घ प्रवीण शासक संध्या असम के राजाओं की परंपरागत युद्घ शैली को अपनाते हुए शत्रु को निरंतर आगे बढऩे दे रहा था, उसने शत्रु को अपनी योजना की कोई भनक नही लगने दी। इसके विपरीत उसे इस भ्रांति में रखा कि जैसे उसका प्रतिरोध करने की क्षमता अब आसाम की भूमि में नही रही है।

जब शत्रु अपेक्षानुरूप जाल में फंस गया तो संध्या ने अपनी सेना को पूर्ण प्रबलता से प्रहार करने का संकेत दे दिया। हिंदूवीरों की योजना सफल रही। शत्रु सारी चतुराई भूल गया और उसे हिंदू वीरों के जाल से निकलने का कोई मार्ग भी नही सूझा। मूर्ख शत्रु संध्या के चक्रव्यूह में पड़ा-पड़ा छटपटा रहा था। उसकी सारी सेना ने समर्पण कर दिया था। इससे पूर्व आसाम की धरती ने शत्रु के रक्त से अपनी प्यास बुझाई और शत्रु सेना के प्रमुख उजबेग का भी वध कर दिया गया। इस प्रकार एक और शत्रु ने असम की धरती पर आकर संसार को विदा कह दिया। उजबेग का सारा परिवार भी संध्या के द्वारा बंदी बना लिया गया था। असम की धरती धन्य हो गयी, क्योंकि संध्या ने ब्रह्मबल (बुद्घिबल) और क्षात्रबल (बाहुबल) की ऐसी अदभुत संधि करा दी थी कि थोड़े से अंतराल में ही आसाम की धरती पर दो प्रबल शत्रुओं का आकर अंत हो गया था।

आसाम 13वीं शताब्दी के पूर्वाद्र्घ में अहोम शासकों ने अपने आधिपत्य में लेना आरंभ किया। अहोम मूलत: शान जाति के थे। उस समय आसाम में बोडो जाति के लोगों का शासन था। अहोम लोग उत्तर बर्मा से यहां आये। अहोम वंश के संस्थापक सुकाफा ने 1228 ई. में असम के पूर्वी भाग पर आक्रमण कर बड़े क्षेत्रफल पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।

इन अहोम शासकों ने अपना शासन दूर-दूर तक स्थापित किया। उन्होंने आसाम को कभी के प्राग्ज्योतिषपुर के वैभव में ले जाने का प्रयास किया। बड़ी सावधानी से इन वीर शासकों ने अपनी योजना को मूत्र्तरूप देना प्रारंभ किया। उन्होंने बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन तक अपनी सीमाएं बढ़ा लीं अब मुसलमानों को अपने राज्य पर आक्रमण करने से रोकने की बारी थी। अत: इसके लिए भी इन शासकों ने जिस योग्यता और बुद्घिमत्ता का परिचय दिया उससे मुस्लिम सुल्तान को इन शासकों के आक्रमणों को रोकने में असफलता ही हाथ लगी।

मुहम्मद तुगलक के विषय में हम पूर्व में बता चुके हैं कि वह एक ऐसा शासक था जो अपनी योजनाओं के कारण इतिहास में उपहास का पात्र रहा है। उसने भी असम के इस अपराजित क्षेत्र को अपने आधीन लाने का प्रयास अपने शासन काल में किया था। बात 1333 ई. की है। दिल्ली सल्तनत अपने अत्याचारों से उस समय हिंदुस्तान को पूर्णत: हिला रही थी। तब दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के मन मस्तिष्क में असम को अपने आधीन करने की महत्वाकांक्षाएं जन्म लेने लगीं। यद्यपि उसके समक्ष पूर्व में उन शासकों के कटु-अनुभवों का इतिहास भी था जो असम में सफल नही हो पाये थे और असम की असमता (ऊंची नीची पहाडिय़ों) में ही अपना जीवनान्त कर गये थे।
पर कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि मनुष्य अपने पूर्ववत्र्तियों के कटु अनुभवों को सुखद अनुभूति में परिवर्तित करने के लिए और इस प्रकार एक इतिहास बनाने के लिए भी किसी पूर्ववर्ती के अनुभवों से कुछ सीखने का प्रयास नही किया करता है। सौ में से पिच्चानवें प्रतिशत लोग गतानुगतिक स्थिति के भंवर जाल में फंस जाते हैं, मात्र पांच प्रतिशत लोग किसी के अनुभवों से कुछ सीखने का प्रयास करते हैं। अत: मुहम्मद बिन तुगलक ने भी जगत की रीति का ही अनुकरण किया और वह एक लाख की बड़ी भारी सेना लेकर असम की ओर चल दिया। उसने कामरूप राज्य पर आक्रमण किया।

उस समय कामरूप का शासक दुर्लभ नारायण सिंह था। वह वीरता में ‘दुर्लभ,’ धर्म परायणता में ‘नारायण’ और शौर्य में ‘सिंह’ था। उसने समय को पहचान लिया और बड़ी विनम्रता से अहोम शासक से उसकी सेना का सहयोग प्राप्त करने में भी राजा दुर्लभ नारायण सिंह सफल रहा। राजा ने सुल्तान की सेना का सामना राज्य की सीमा पर ही किया। अनेकों राष्ट्रभक्त हिंदू वीरों ने अपना बलिदान दिया और शत्रु के प्राण ले लेकर उसे यमराज का ताण्डव दिखाने लगे। शत्रु सेना हिंदू वीरों की इस अदभुत वीरता को देखकर भाग खड़ी हुई। इसके पश्चात मुहम्मद बिन तुगलक जीवन भर अपने घावों को सहलाता रहा और पुन: कभी असम जाकर वहां अपना झण्डा फहराने का प्रयास उसने नही किया। जो दूसरों के अनुभवों से शिक्षा नही लेते हैं, उन्हें अपने अनुभव बहुत कुछ सिखा जाते हैं।

1400-1415 ई. का काल असम के शुक्रांक नामक शासक का काल है। यह शासक भी एक अच्छा प्रजाहित चिंतक और राष्ट्र प्रेमी शासक था। उसके काल में बंगाल के शासक सुल्तान गयासुद्दीन आजमशाह ने कामरूप पर आक्रमण किया था। राजा शुक्रांक ने उस समय दुर्लभ नारायण सिंह के उदाहरण का अनुसरण किया और उसने अहोम के राजा से सहायता का निवेदन किया। अहोम के शासक ने कामरूप के अधीश्वर के निवेदन को अपना परम कत्र्तव्य और राष्ट्रभक्ति का परिचायक मानकर सहजता से स्वीकार कर लिया। फलस्वरूप कामरूप और अहोम की सम्मिलित सेनाओं ने आजमशाह को परास्त कर भगा दिया।
असम ने पुन: अपनी अपराजेयता स्थापित की और अपनी स्वतंत्रता को हड़पने के एक गंभीर प्रयास को पुन: असफल कर दिया।

ऐसे वीर शासकों के वीर कृत्यों और उनके द्वारा स्वतंत्रता के लिए किये गये अथक प्रयासों को देखते हुए ही वीर सावरकर ने लिखा है-‘‘कोई भी विदेशी सत्ता संपूर्ण भारत पर कभी भी अधिकार न कर सकी। भारत पर सिकंदर का आक्रमण, ‘भारत पर शकों का आक्रमण’ इस प्रकार के वाक्य पढ़ते ही सर्व सामान्य विदेशी अथवा भारतीय पाठक की यही धारणा बनती है कि मानो इस विदेशी शत्रु ने संपूर्ण भारत पर आक्रमण करके उसकी स्वतंत्रता का अपहरण कर लिया हो। ऐसी भ्रांत धारणा के कारण अनेक शत्रु और विदेशी आक्षेप लगाते हैं कि भारतीय राष्ट्र अर्थात हिंदू राष्ट्र का संपूर्ण जीवन विदेशियों की दासता में ही व्यतीत हुआ है। यह आक्षेप सर्वथा निराधार तथा शरारत पूर्ण है।

नेपाल से लेकर पूर्व समुद्र तक संपूर्ण भारत एवं दक्षिण भारत अर्थात भारत खण्ड का 3/4 सुविशाल भाग इन 1300 वर्षों की प्रदीर्घ अवधि में पूर्णत: स्वतंत्र रहा है। भूभाग अथवा सिंधु मार्ग से उस पर कोई भी विदेशी आक्रमण नही हो सके।
शेष बचे हुए भारत के एक चौथाई पश्चिमोत्तर भाग में जो विदेशी आक्रमण हुए उनमें एक बार यवन शत्रु अवश्य ही पंजाब से अयोध्या तक आगे बढऩे में सफल हो गया था। साथ ही कुछ काल तक पंजाब से गुजरात तक की पश्चिमोत्तर पट्टी भी शक कुशाणों के अधिकार में चली गयी थी। हूण तो किसी प्रकार पंजाब से उज्जयिनी तक ही आ सके थे। इन सब आक्रमणकारी शत्रुओं की हिंदू राष्ट्र ने कैसी दुर्गति की, यह इतिहास के पृष्ठों में है।’’

#हिमांशु_सुक्ला

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कबर की महानता का गुणगान तो कई इतिहासकारों ने किया है लेकिन….

अकबर की ओछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है….!

अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज़ का मेला आयोजित करवाता था….!

इसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था….!

अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती….
उसे दासियाँ छल कपट से अकबर के सम्मुख ले जाती थी….!

एक दिन नौरोज़ के मेले में महाराणा प्रताप सिंह की भतीजी, छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री मेले की सजावट देखने के लिए आई….!

जिनका नाम
बाईसा किरणदेवी था….!
जिनका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज जी से हुआ था!

बाईसा किरणदेवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर क़ाबू नहीं रख पाया….
और
उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से ज़नाना महल में बुला लिया….!

जैसे ही अकबर ने बाईसा किरणदेवी को स्पर्श करने की कोशिश की….

किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटक कर उसकी छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी….!
और कहा
नींच….नराधम, तुझे पता नहीं मैं उन महाराणा प्रताप की भतीजी हूँ….
जिनके नाम से तेरी नींद
उड़ जाती है….!

बोल तेरी आख़िरी इच्छा क्या है….?

अकबर का ख़ून सूख गया….!

कभी सोचा नहीं होगा कि सम्राट अकबर आज एक राजपूत बाईसा के चरणों में होगा….!

अकबर बोला: मुझसे पहचानने में भूल हो गई….
मुझे माफ़ कर दो देवी….!

इस पर किरण देवी ने कहा:
आज के बाद दिल्ली में नौरोज़ का मेला नहीं लगेगा….!
और
किसी भी नारी को परेशान नहीं करेगा….!

अकबर ने हाथ जोड़कर कहा आज के बाद कभी मेला नहीं लगेगा….!

उस दिन के बाद कभी मेला नहीं लगा….!

इस घटना का वर्णन
गिरधर आसिया द्वारा रचित सगत रासो में 632 पृष्ठ संख्या पर दिया गया है।

बीकानेर संग्रहालय में लगी एक पेटिंग में भी इस घटना को एक दोहे के माध्यम से बताया गया है!

किरण सिंहणी सी चढ़ी
उर पर खींच कटार..!
भीख मांगता प्राण की
अकबर हाथ पसार….!!

अकबर की छाती पर पैर रखकर खड़ी वीर बाला किरन का चित्र आज भी जयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित है,

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मारवाड़ के रक्षक वीर दुर्गादास राठौड़*

🌞अपनी जन्मभूमि मारवाड़ को मुगलों के आधिपत्य से मुक्त कराने वाले वीर दुर्गादास राठौड़ का जन्म १३ अगस्त, १६३८ को ग्राम सालवा में हुआ था। उनके पिता जोधपुर राज्य के दीवान श्री आसकरण तथा माता नेतकँवर थीं। आसकरण की अन्य पत्नियाँ नेतकँवर से जलती थीं। अतः मजबूर होकर आसकरण ने उसे सालवा के पास लूणवा गाँव में रखवा दिया। छत्रपति शिवाजी की तरह दुर्गादास का लालन-पालन उनकी माता ने ही किया। उन्होंने दुर्गादास में वीरता के साथ-साथ देश और धर्म पर मर-मिटने के संस्कार डाले।

👑उस समय मारवाड़ में राजा जसवन्त सिंह (प्रथम) शासक थे। एक बार उनके एक मुँहलगे दरबारी राईके ने कुछ उद्दण्डता की। दुर्गादास से सहा नहीं गया। उसने सबके सामने राईके को कठोर दण्ड दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें निजी सेवा में रख लिया और अपने साथ अभियानों में ले जाने लगे। एक बार उन्होंने दुर्गादास को‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ कहा; पर वीर दुर्गादास सदा स्वयं को मारवाड़ की गद्दी का सेवक ही मानते थे।

💂‍♀उत्तर भारत में औरंगजेब प्रभावी था। उसकी कुदृष्टि मारवाड़ के विशाल राज्य पर भी थी। उसने षड्यन्त्रपूर्वक जसवन्त सिंह को अफगानिस्तान में पठान विद्रोहियों से लड़ने भेज दिया। इस अभियान के दौरान नवम्बर १६७८ में जमरूद में उनकी मृत्यु हो गयी। इसी बीच उनकी रानी आदम जी ने पेशावर में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया।
जसवन्त सिंह के मरते ही औरंगजेब ने जोधपुर रियासत पर कब्जा कर वहाँ शाही हाकिम बैठा दिया। उसने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा घोषित करने के बहाने दिल्ली बुलाया। वस्तुतः वह उसे मुसलमान बनाना या मारना चाहता था।

😳इस कठिन घड़ी में दुर्गादास अजीत सिंह के साथ दिल्ली पहुंचे। एक दिन अचानक मुगल सैनिकों ने अजीत सिंह के आवास को घेर लिया। अजीत सिंह की धाय गोरा टांक ने पन्ना धाय की तरह अपने पुत्र को वहां छोड़ दिया और उन्हें लेकर गुप्त मार्ग से बाहर निकल गयी।
उधर दुर्गादास ने हमला कर घेरा तोड़ दिया और वे भी जोधपुर की ओर निकल गये। उन्होेंने अजीत सिंह को सिरोही के पास कालिन्दी गाँव में पुरोहित जयदेव के घर रखवा कर मुकुनदास खीची को साधु वेश में उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया। कई दिन बाद औरंगजेब को जब वास्तविकता पता लगी, तो उसने बालक की हत्या कर दी।

👊अब दुर्गादास मारवाड़ के सामन्तों के साथ छापामार शैली में मुगल सेनाओं पर हमले करने लगे। उन्होंने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह तथा मराठों को भी जोड़ना चाहा; पर इसमें उन्हें पूरी सफलता नहीं मिली।
उन्होंने औरंगजेब के छोटे पुत्र अकबर को राजा बनाने का लालच देकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह के लिए तैयार किया; पर दुर्भाग्यवश यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

♻अगले ३० साल तक वीर दुर्गादास इसी काम में लगे रहे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उनके प्रयास सफल हुए। २० मार्च, १७०७ को महाराजा अजीत सिंह ने धूमधाम से जोधपुर दुर्ग में प्रवेश किया। वे जानते थे कि इसका श्रेय दुर्गादास को है, अतः उन्होंने दुर्गादास से रियासत का प्रधान पद स्वीकार करने को कहा; पर दुर्गादास ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।
उनकी अवस्था भी अब इस योग्य नहीं थी। अतः वे अजीतसिंह की अनुमति लेकर उज्जैन के पास सादड़ी चले गये। इस प्रकार उन्होंने महाराजा जसवन्त सिंह द्वारा उन्हें दी गयी उपाधि ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ को सत्य सिद्ध कर दिखाया। उनकी प्रशंसा में आज भी मारवाड़ में निम्न पंक्तियाँ प्रचलित हैं –

👏माई ऐहड़ौ पूत जण,
जेहड़ौ दुर्गादास
मार गण्डासे थामियो,
बिन थाम्बा आकास।।

……………..✍हिन्दू समूह 🤺🔱🚩