Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

मारवाड़ के रक्षक वीर दुर्गादास राठौड़*

🌞अपनी जन्मभूमि मारवाड़ को मुगलों के आधिपत्य से मुक्त कराने वाले वीर दुर्गादास राठौड़ का जन्म १३ अगस्त, १६३८ को ग्राम सालवा में हुआ था। उनके पिता जोधपुर राज्य के दीवान श्री आसकरण तथा माता नेतकँवर थीं। आसकरण की अन्य पत्नियाँ नेतकँवर से जलती थीं। अतः मजबूर होकर आसकरण ने उसे सालवा के पास लूणवा गाँव में रखवा दिया। छत्रपति शिवाजी की तरह दुर्गादास का लालन-पालन उनकी माता ने ही किया। उन्होंने दुर्गादास में वीरता के साथ-साथ देश और धर्म पर मर-मिटने के संस्कार डाले।

👑उस समय मारवाड़ में राजा जसवन्त सिंह (प्रथम) शासक थे। एक बार उनके एक मुँहलगे दरबारी राईके ने कुछ उद्दण्डता की। दुर्गादास से सहा नहीं गया। उसने सबके सामने राईके को कठोर दण्ड दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें निजी सेवा में रख लिया और अपने साथ अभियानों में ले जाने लगे। एक बार उन्होंने दुर्गादास को‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ कहा; पर वीर दुर्गादास सदा स्वयं को मारवाड़ की गद्दी का सेवक ही मानते थे।

💂‍♀उत्तर भारत में औरंगजेब प्रभावी था। उसकी कुदृष्टि मारवाड़ के विशाल राज्य पर भी थी। उसने षड्यन्त्रपूर्वक जसवन्त सिंह को अफगानिस्तान में पठान विद्रोहियों से लड़ने भेज दिया। इस अभियान के दौरान नवम्बर १६७८ में जमरूद में उनकी मृत्यु हो गयी। इसी बीच उनकी रानी आदम जी ने पेशावर में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया।
जसवन्त सिंह के मरते ही औरंगजेब ने जोधपुर रियासत पर कब्जा कर वहाँ शाही हाकिम बैठा दिया। उसने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा घोषित करने के बहाने दिल्ली बुलाया। वस्तुतः वह उसे मुसलमान बनाना या मारना चाहता था।

😳इस कठिन घड़ी में दुर्गादास अजीत सिंह के साथ दिल्ली पहुंचे। एक दिन अचानक मुगल सैनिकों ने अजीत सिंह के आवास को घेर लिया। अजीत सिंह की धाय गोरा टांक ने पन्ना धाय की तरह अपने पुत्र को वहां छोड़ दिया और उन्हें लेकर गुप्त मार्ग से बाहर निकल गयी।
उधर दुर्गादास ने हमला कर घेरा तोड़ दिया और वे भी जोधपुर की ओर निकल गये। उन्होेंने अजीत सिंह को सिरोही के पास कालिन्दी गाँव में पुरोहित जयदेव के घर रखवा कर मुकुनदास खीची को साधु वेश में उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया। कई दिन बाद औरंगजेब को जब वास्तविकता पता लगी, तो उसने बालक की हत्या कर दी।

👊अब दुर्गादास मारवाड़ के सामन्तों के साथ छापामार शैली में मुगल सेनाओं पर हमले करने लगे। उन्होंने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह तथा मराठों को भी जोड़ना चाहा; पर इसमें उन्हें पूरी सफलता नहीं मिली।
उन्होंने औरंगजेब के छोटे पुत्र अकबर को राजा बनाने का लालच देकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह के लिए तैयार किया; पर दुर्भाग्यवश यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

♻अगले ३० साल तक वीर दुर्गादास इसी काम में लगे रहे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उनके प्रयास सफल हुए। २० मार्च, १७०७ को महाराजा अजीत सिंह ने धूमधाम से जोधपुर दुर्ग में प्रवेश किया। वे जानते थे कि इसका श्रेय दुर्गादास को है, अतः उन्होंने दुर्गादास से रियासत का प्रधान पद स्वीकार करने को कहा; पर दुर्गादास ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।
उनकी अवस्था भी अब इस योग्य नहीं थी। अतः वे अजीतसिंह की अनुमति लेकर उज्जैन के पास सादड़ी चले गये। इस प्रकार उन्होंने महाराजा जसवन्त सिंह द्वारा उन्हें दी गयी उपाधि ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ को सत्य सिद्ध कर दिखाया। उनकी प्रशंसा में आज भी मारवाड़ में निम्न पंक्तियाँ प्रचलित हैं –

👏माई ऐहड़ौ पूत जण,
जेहड़ौ दुर्गादास
मार गण्डासे थामियो,
बिन थाम्बा आकास।।

……………..✍हिन्दू समूह 🤺🔱🚩

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औरँगजेब का दरबार लगा था। मुगल सेना की बार बार हो रही हार से परेशान बादशाह अपने सब नवाबों और सिपाहसालारों के साथ मन्त्रणा में व्यस्त था। सरहिंद का सूबेदार वज़ीर खान, धन्न गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज से बहुत खार खाता था। वो किसी भी तरह गुरु गोबिंद सिंह जी को हराना या खत्म करना चाहता था लेकिन महाबली सतगुरु जी और खालसा फ़ौज के आगे उसे सदा मुँह की खानी पड़ती।

बादशाह ने एक पान का बीड़ा और तलवार अपने सिपाहसालारों के आगे रख दी और बोला –

है कोई मर्द, जो मेरे दिल में भड़कती इस नफरत की आग को ठंडा करे?

है कोई दलेर, जो उस काफिरों के हमदर्द गुरु को पकड़कर मेरे सामने पेश करे?

है कोई बली, जो मेरे उस सबसे बड़े दुश्मन का खात्मा करके मेरे दिल को ठंडक दे?

गुरु गोबिंद साहब जी महाराज के सामने लड़ने गए पिछले सिपाहसालारों के हश्र को याद करके किसी भी सेनानायक की हिम्मत नहीं हुई कि वो बादशाह के सामने पड़े बीड़े और शमशीर को उठाकर गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज की हत्या का संकल्प ले।

जब कोई नहीं उठा, तो बादशाह ने फिर तक़रीर की –

तो क्या मैं ये समझूँ कि मैं यहाँ खुसरों*(नामर्दों) की महफ़िल में बैठा हूँ?

ऐसी अपमानजनक बात सुनकर एक पठान की भुजाएँ फड़क उठीं। उसका जवान खून उबाल मार गया। सामने पड़ी शमशीर उठा और पान का बीड़ा उठा उसे अपने मुँह में रख चबाते हुए बोला –

मालिक-ए-हिन्द, मैं सैद खान खान कौल (प्रतिज्ञा) करता हूँ उस काफ़िरों के गुरु को ऐसे चबा जाऊँगा जैसे ये पान चबा रहा हूँ। इंशाल्लाह आनन्दपुर पर इस्लामी पताका फहरेगी। अगर उसे बन्दी न बना पाया तो कभी वापिस नही आऊँगा।

सैदखान ऊँचा लम्बा नौजवान और अव्वल दर्जे का तीरंदाज था। वो अपने हुनर से किसी भी अन्य तीरंदाज की अपेक्षा अधिक दूरी से अत्यंत सटीक निशाना लगा सकता था।

बादशाह बहुत खुश हुआ और कई सिपाहसालारों के साथ बेशुमार सेना असलहा देकर सैद खान को जंग के लिए विदा किया।

रास्ते में पहाड़ी राजा भीमचंद और अन्य राजाओं की सेना भी सैद खान के साथ मिल गयीं और एक बहुत बड़ा लश्कर आनंदपुर साहब पर धावा बोलने चल पड़ा।

रास्ते में पीर बुधुशाह का गाँव सढोरा आया। पीर बुधुशाह गुरु गोबिंद साहब जी महाराज के अनन्य प्रेमी थे। सैदखान की बहन नसीरा जिसे वो बहुत प्रेम करता था, पीर बुधुशाह की सेविका और उन्हीं के गाँव में ब्याही थी।

जंग पर जाने से पहले अपनी प्रिय बहन नसीरा से मिलने की हसरत में सैदखान, सेना को शिविर में सोता हुआ छोड़ अपनी बहन नसीरा के घर आ पहुँचा। अपने भाई से मिल नसीरा बहुत खुश हुई।

“आज आपको मेरी याद कैसे आ गई, भाईजान?”

“मैं सेना लेकर एक बागी को मारने जंग पर जा रहा हूँ, नसीरा। जंग में मौत कब किससे अपनी भूख मिटाए, कोई नहीं जानता। तेरे गाँव के पास आकर मन हुआ तुझसे मिलता चलूँ। क्या मालूम अल्लाह ने फिर मिलना लिखा है या नहीं।”

“ऐसा न कहो, भाई जान। मालिक आपको लंबी उम्र दे। ऐसा कौन बागी है जिसने मुगलिया हुकूमत की नाक में दम कर रखा है?”

“वो काफिरों का गुरु, गुरु गोबिंद सिंह, अपनी अलग सेना बनाए बैठा है, अपना किला बनवा रखा है, औरँगजेब को बादशाह नहीं मानता, अपनी पताका फहराता है, नगाड़े बजवाता है, युद्धाभ्यास करता है, मुगल सेना को कई दफ़े शिक़स्त दे चुका है। यक़ीनन वो बादशाह की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। उस बागी गुरु का सर कुचलने ही मैं आनन्दपुर जा रहा हूँ। यक़ीन करो ऐसी मार मारूँगा कि सदियों तक पंजाब की धरती पर फिर कोई बागी पैदा नहीं होगा।”

“बागी???गुरु गोबिंद सिंह?? भाईजान, आपके बादशाह और आपका दिमाग खराब हो गया है। वो अल्लाह के नूर हैं, वो हुकूमत के बागी नहीं इस क़ायनात के मालिक हैं। उनकी हसरत से आप और मैं साँस ले रहे हैं। आपके बादशाह का तख़्त क़ायम है, वो काफ़िर नहीं, वो बागी नहीं जो उनसे जंग करने आप जा रहे हैं। आप काफ़िर हैं जो अल्ल्लाह के बागी बनने जा रहे हैं।”

“नसीरा बहन, मुझे लगता है पीर बुधुशाह की तरह तेरे ऊपर भी गुरु गोबिंद की शख़्सियत असर कर गई है। आया तो था मैं तुझसे दुआ लेने लेकिन लगता है कि मैं नाहक ही गुरु गोबिंद सिंह के किसी हिमायती से मिलने आ गया।”

“रब की हिमायत कौन कर सकता है भाईजान? वो जिस पर रहमत करे, उसे अपनी सेवा बख्शता है, मैं आपकी हिमायती हूँ, अल्लाह से जंग में आपकी हार यक़ीनी है, बन्दगी करते हुए अपने मुर्शिद बुधुशाह जी, की तरह मुझे भी सदा अल्लाही नूर में गुरु गोबिंद सिंह जी के ही दर्शन होते हैं। उनसे जंग में आपकी हार पक्की है। मुर्शिद बुधुशाह जी कहते हैं – जो अल्लाह के आगे अपना मन हार जाते हैं संसार में किसी से नहीं हारते। मैं दुआ करती हूँ आपके मन को अल्लाह अपनी बख़्शीश से नवाज़े, आपको लंबी उम्र मिले, आपको सच का इल्म हो, आपको मालिक पापों से महफ़ूज़ रखे।”

बहन से गुरु साहब की तारीफे सुन, खिन्न मन से सैदखान वापिस अपने शिविर को चल पड़ा। अपनी बहन के गुरु प्रेम से हताश सैदखान अगले ही दिन सेना सहित आनन्दपुर के लिए कूच कर गया।

आनन्दपुर साहब पहुँचकर उसने आनँदगढ़ किले की घेराबन्दी कर दी और दूरबीन लगाकर किले की सेना व्यवस्था का मुआयना करने लगा। तभी उसको किले के बुर्ज़ पर एक आलौकिक पुरुष अपने केश सुखाते हुए नजर आया। उनके सिर पर एक छोटा-सा खुला साफ़ा था और केश खुले हुए थे। और उनकी आलौकिकता किसी अन्य मनुष्य से कहीं अधिक थी।

साथ खड़े अन्य सिपहसलार को दूरबीन से वो पुरुष दिखाने पर उसने बताया – ये धन्न गुरु गोबिंद साहब जी महाराज हैं!

“गुरु गोबिंद सिंह, बुर्ज पर अकेले!! वो भी निहत्थे… इससे अच्छा मौक़ा नहीं मिलेगा। एक ही तीर उनका काम तमाम कर देगा। जंग तो मैं शुरू होने से पहले ही जीत जाऊँगा।”

फौरन सैदखान ने अपना धनुष उठाया और भागकर उस जगह पहुँचा जहाँ से गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज उसकी तीर की ज़द में आ जाएं। एक चुनिंदा मारक तीर उसने अपने तरकश से निकाला और गुरुजी के गले की तरफ निशाना लगाया।

लेकिन ये क्या, गुरु गोबिंद सिंह जी की जगह उसे अपनी बहन नसीरा का चेहरा नज़र आने लगा।

उसने तीर नीचे किया फिर अपने बिखरते मनोयोग को एकत्र किया, फिर निशाना लगाया, इस बार भी उसे अपनी बहन नसीरा का चेहरा नज़र आया। गुरु करामाती है, ऐसा सोच सैदखान ने अपना तीर तरकश में वापिस रख लिया और उस मोर्चे से बहुत दूर हटकर एक पहाड़ी के टीले पर मंजे पर बैठकर दूसरे सिपाहसालारों के साथ चौसर खेलने लगा।

“ख़ान साहब, आपने तीर साधा तो चलाया क्यों नहीं?”, साथी सिपाहसलार ने सवाल किया।

“मैंने सुना है गुरु गोबिंद सिंह भी बड़ा तीरंदाज है। मैंने सोचा बिना उसको अपना जौहर दिखाए मार दूँ, ये कहाँ की बहादुरी है?”, सैदख़ाँ ने बात बनाई।

“अपनी बात कहकर चुप हुआ ही था कि एक तीर सर्र से करता हुआ उसके मंजे के दाएं पावे में आ लगा।”

“ये गुरु गोबिंद सिंह का तीर है!”, एक चिल्लाया।

“तुम्हें कैसे पता?”, सैदखान ने पूछा।

“देखो, इस पर सोना लगा है, ऐसे तीर बस वही चलाता है और देखो, उस पर एक चिट्ठी भी लगी है!”

सैदखान ने वो तीर निकाला उस चिट्ठी को पढ़ा –

सैदख़ान, अगर निशाना बनाया था तो तीर चला देना था!

‘क्या गुरु ने मुझे देख लिया था, जितनी दूरी पर उस बुर्ज़ से मैं बैठा हूँ, वहाँ से मुझ तक तीर मारना!! गुरु नि:संन्देह करामाती है’, सैदखान ने सोचा।

अभी सोच ही रहा था कि एक और तीर सर्र से करता हुआ उसकी छाती के आगे से निकलता हुआ मंजे के बाएं पावे में आ लगा।

“गुरु ने हमला कर दिया”, ऐसा कहकर सब सिपाहसलार जान बचाने को अपने अपने शिविर में भाग गए।

‘ये तीर निश्चय ही मेरी जान ले जाता’, सैदख़ान पसीने से तरबतर हो गया। इस तीर पर भी एक चिट्ठी थी –

सैदख़ान, मेरे निशानों को करामात न समझ। तीर ने हमारे बाहुबल से दूरी तय की है और तेरे मंजे के पावों पर निशाना हमारी कला है।

‘गुरु मेरे मन की बात सुन रहा है! जो मैंने सोचा गुरु उसका जवाब चिट्ठी में लिख रहा है! क्या नसीरा सच कहती है? गुरु क्या सच में अल्लाह का नूर है?’, सैदखान को सारी रात नींद न आई। गुरु जी के बारे में सोचते सोचते ही दिन चढ़ गया।

जंग के मोर्चे लग गए। खालसा और मुगल फ़ौज में भीषण जंग शुरू हो गया। काल की देवी वीरों के लहू से अपनी प्यास बुझाने लगीं।

‘अगर गुरु सच में अल्लाह का नूर है तो एक ही पल में मेरे सामने आकर मुझे दर्शन दें!’, सैदखान ने मन में सोचा।

अगले ही पल दल को चीरते दुष्ट दमन सतगुरु अपने घोड़े पर सवार सैदख़ान के सामने खड़े थे।

“ले सैदखान, हम आ गए। अब कर अपने मन की मुराद पूरी।”, गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा।

सैदख़ान की आँखों से आँसू बहने लगे, वो घोड़े से नीचे उतर कर सतगुरु जी के श्रीचरणों से लिपट गया और कहने लगा –

“नसीरा ठीक कहती है, आप सच में अल्लाह के नूर हो।”

“सैदख़ान, शैदाई न बन,तू क़ौल कर के आया है कि हमें एक ही तीर से मार देगा। तीर चला… वचन से टूटा तो काफ़िर कहलाएगा!”

“नसीरा ठीक कहती है, सतगुरु! जो अल्लाह की नेकियों के ख़िलाफ़ हैं, जो अल्लाह की मेहरबानियों से मुनकर हैं वो काफिर हैं। आपके खिलाफ शस्त्र उठाकर मुझे काफ़िर नहीं बनना!”

“फिर तेरा निशाना हम कैसे देखेंगे?”

“मेरे रहबर, ये आपकी बख़्शीश है कि आपने मेरे हृदय को अपना निशाना बनाया। आपके पहले तीर ने मेरा बेहतरीन निशानेबाज होने का घमंड तोड़ दिया और आपके दूसरे तीर ने मेरे हृदय से आपके प्रति वैर निकाल दिया। नसीरा ने मुझे चलते हुए सुमति मिलने की दुआ की थी इसलिए जब मैंने आपका निशाना लगाया तो मुझे आपके अक़्स में बहन नसीरा का चेहरा दिखा। मुझे समझ आ गया मेरे मन की हर बात की तरह मेरी बहन और इस सारे संसार की बन्दगी आपके चरणों में ही पहुँचती है!”

सतगुरु जी ने सैदखान को सीने से लगा लिया और कहा –

“तू सच में बेहतरीन निशानेबाज़ है सैदख़ान, विरले ही संसार में गुरु की तरफ अपने जीवन का निशाना लगाते हैं!”

“और जो लगाते हैं, मेरे मालिक़, वो आपकी बख़्शीश से ही लगाते हैं।”, सैदखान ने उत्तर दिया।.

सैदखान ने गुरु जी से बन्दगी की दात प्राप्त की और अपना रहता जीवन अल्लाह की बन्दगी में व्यतीत किया।

सतनाम श्री वाहेगुरु

—–✍विकास खुराना 👳‍♂🔱🚩

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प्राचीन भारत के इन छह युद्धों ने बदल दिया था विश्व का इतिहास!!!!!!

संजय गुप्ता

प्राचीन भारत में यूं तो कई युद्ध हुए लेकिन छह युद्ध ऐसे थे जिन्होंने संपूर्ण धरती को चपेट में ले लिया था। देखा जाए तो यह युद्ध विश्व की अन्य संस्कृति और धर्मों के इतिहास में किसी न किसी रूप में आज भी दर्ज है। तो आओ जानते हैं प्राचीन भारत के वे छह प्रमुख युद्ध।

1.इंद्र और वृत्तासुर युद्ध : जम्बूद्वीप के इलावर्त क्षे‍त्र में 12 बार देवासुर संग्राम हुआ। अंतिम बार हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद के पुत्र राजा बलि के साथ इंद्र का युद्ध हुआ और देवता हार गए तब संपूर्ण जम्बूद्वीप पर असुरों का राज हो गया। इस जम्बूद्वीप के बीच के स्थान में था इलावर्त राज्य।

देवासुर संग्रामों का परिणाम यह रहा कि असुरों और सुरों ने धरती पर भिन्न-भिन्न संस्कृतियों और धर्मों को जन्म दिया और धरती को आपस में बांट लिया। इन संघर्षों में देवता हमेशा कमजोर ही सिद्ध हुए और असुर ताकतवर।

यह सतयुग की बात है जब कालकेय नाम के एक राक्षस का संपूर्ण धरती पर आतंक था। वह वत्रासुर के अधीन रहता था। दोनों से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने मिलकर सोचा वृत्रासुर का वध करना अब जरूरी हो गया। इस वृत्तासुर के वध के लिए ही दधीचि ऋषि की हड्डियों से एक हथियार बनाया जिसका नाम वज्र था।

वृत्रासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने आर्यों के नगरों पर कई बार आक्रमण करके उनकी नाक में दम कर रखा था। अंत में इन्द्र ने मोर्चा संभाला और उससे उनका घोर युद्ध हुआ जिसमें वृत्रासुर का वध हुआ। इन्द्र के इस वीरतापूर्ण कार्य के कारण चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी थी।

शोधकर्ता मानते हैं कि वृत्रासुर का मूल नाम वृत्र ही था, जो संभवतः असीरिया का अधिपति था। पारसियों की अवेस्ता में भी उसका उल्लेख मिलता है।

वृत्र ने आर्यों पर आक्रमण किया था तथा उन्हें पराजित करने के लिए उसने अद्विशूर नामक देवी की उपासना की थी। इन्द्र और वृत्रासुर के इस युद्ध का सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर गहरा असर पड़ा था। तभी तो होमर के इलियड के ट्राय-युद्ध और यूनान के जियॅस और अपोलो नामक देवताओं की कथाएं इससे मिलती-जुलती हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन विश्व पर इन्द्र-वृत्र युद्ध का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था।

2.हैहय-परशुराम युद्ध : – भगवान राम के जन्म से सैकड़ों वर्ष पूर्व हैहय वंश के लोगों का परशुराम से युद्ध हुआ था। यह भारत के ज्ञात इतिहास का तीसरा सबसे बड़ा युद्ध था। जमदग्नि परशुराम का जन्म हरिशचन्द्रकालीन विश्वामित्र से एक-दो पीढ़ी बाद का माना जाता है। यह समय प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ‘अष्टादश परिवर्तन युग’ के नाम से जाना गया है।

इस युग में एक और जहां उत्तर में वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच संघर्ष चल रहा था तो पश्चिम में हैहयों और भार्गवों के बीच युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। अयोध्या में सत्यव्रत नामक राजा त्रिशुंक सबसे शक्तिशाली राजा था तो दूसरी ओर आनर्त (गुजरात) में कार्तवीर्य की दुदुंभि बज रही थी।

माना जाता है कि परशुराम के नेतृत्व में आनर्त (गुजरात) के हैहय राजवंश के विरुद्ध यह युद्ध सत्ययुग अर्थात कृतयुग के अंत में लड़ा गया। हैहयों से हुए इस महासंग्राम में परशुराम ने हैहयों को एक के बाद एक 21 बार पराजित किया। परशुराम भृगुवंश से थे और परंपरागत रूप से नर्मदा (नैमिषारण्य) के किनारे रहा करते थे। आपको यह बताना जरूरी है कि राम के काल में जो परशुराम थे वे दूसरे थे और महाभारत काल में जो परशुराम थे वे तीसरे थे।

3.राम-रावण युद्ध : – राम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र थे तो रावण लंका का राजा था। राम के जन्म को हुए 7,128 वर्ष हो चुके हैं। राम एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। राम का जन्म 5,114 ईस्वी पूर्व हुआ था। राम और रावण का युद्ध 5076 ईसा पूर्व हुआ था यानी आज से 7090 वर्ष पूर्व। तब भगवान राम 38 वर्ष के थे।

यह युद्ध 72 दिन चला था। राम और रावण युद्ध की छाप संपूर्ण दक्षिण एशिया के देश और शहरों में देखी जा सकती है। मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम और लागोस में तो इससे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

4.दशराज युद्ध : – दाशराज्ञ का युद्ध भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच हुआ था। दसराज्य युद्ध त्रेतायुग के अंत में लड़ा गया। माना जाता है कि राम-रावण युद्ध के 150 वर्ष बाद यह युद्ध हुआ था। हलांकि इसके समय को लेकर मतभेद है। इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान हैं।

इसे बैटल ऑफ टेन किंग कहा जाता है। ऋग्वेद के सातवें मंडल में इस युद्ध का वर्णन है। इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तान के पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास लगभग 5200 ईसा पूर्व हुआ था। अर्थात राम और रावण युद्ध के पूर्व यह युद्ध लड़ा गया था।

इस युद्ध में जहां एक ओर पुरु नामक आर्य समुदाय के योद्धा थे, तो दूसरी ओर ‘तृत्सु’ नामक समुदाय के योद्धा युद्ध लड़ रहे थे। दोनों ही हिन्द-आर्यों के ‘भरत’ नामक समुदाय से संबंध रखते थे। हालांकि पुरुओं के नेतृत्व में से कुछ को अनार्य माना जाता था। तुत्सु समुदाय का नेतृत्व राजा सुदास ने किया। सुदास दिवोदास के पुत्र थे, जो स्वयं सृंजय के पुत्र थे। सृंजय के पिता का नाम देवव्रत था। सुदास के युद्ध में सलाहकार ऋषि वशिष्ठ थे। सुदास के विरुद्ध दस राजा युद्ध लड़ रहे थे जिनका नेतृत्व पुरु कबीले के राजा संवरण कर रहे थे। जिनके सैन्य सलाहकार ऋषि विश्वामित्र थे। यह लड़ाई भी सत्ता और विचारधारा की लड़ाई थी।

ऋग्वेद का सुविख्यात नायक सुदास भारतों का नेता था और पुरोहित वसिष्ठ उसके सहायक थे। इनके शत्रु थे, पांच प्रमुख जनजातियां-, अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वशस् और पुरु तथा पांच गौण जनजातियां- अलिन, पक्थ, भलानस्, शिव और विषाणिन के दस राजा। विरोधी गुट के सूत्रधार ऋषि विश्वामित्र थे और उसका नेतृत्व पुरुओं ने किया था। ऋग्वेद में दासराज युद्ध को एक दुर्भाग्यशाली घटना कहा गया है। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्‍वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा।

5.महाभारत युद्ध : – कुरुक्षेत्र में पांडवों और कौरवों के बीच आज से 5000 वर्ष पूर्व महाभारत युद्ध हुआ था। 18 दिन तक चले इस युद्ध में भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश अर्जुन को दिया था। कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज से 5121 वर्ष पूर्व) हुआ। महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। उस वक्त भगवान कृष्ण 55-56 वर्ष के थे। इस युद्ध का सबसे भयानक परिणाम हुआ। धर्म और संस्कृति का लगभग नाश हो गया। लाखों लोग मारे गए, उसी तरह लाखों महिलाएं विधवाएं हो गईं और उतने ही अनाथ।

6.सिकंदर और पोरस युद्ध : – पोरस के राज्य के आसपास दो छोटे राज्य थे तक्षशिला और अम्भिसार। तक्षशिला, जहां का राजा अम्भी था और अम्भिसार का राज्य कश्मीर के चारों ओर फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया। अम्भिसार ने तटस्थ रहकर सिकंदर की राह आसान कर दी। दूसरी ओर धनानंद का राज्य था वह भी तटस्थ था।

पोरस से पहले युद्ध में सिकंदर को हार का मुंह देखना पड़ा। पोरस से दूसरे युद्ध में पोरस का पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ। फिर पोरस से तीसरा युद्ध हुआ जिसमें भी सिकंदर को हार का सामना करने पड़ा। अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की।

इसके पश्चात संधि पर हस्ताक्षर हुए। अंतत: इतिहास में दर्ज सिर्फ उस युद्ध की ही चर्चा होती है जिसमें पुरुवास (पोरस) हार गए थे। स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सिकंदर भारत के एक भी राज्य को नहीं जीत पाया। फिर भी उसे महान माना जाता है जबकि चंद्रगुप्त मौर्य ने उसके सेनापति सेल्युकस को हराकर बंधक बना लिया था।

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बात 1947 से पहले की है…..यह कहानी एक जर्मन महिला की है, जिनका नाम था (Emilie_Schenkl) एमिली शेंकल ……

मुझे नहीं पता आपमें से कितनों ने ये नाम सुना है….और अगर नहीं सुना है तो आप दोषी नहीं । इस नाम को इतिहास से खुरच कर निकाल फेंका गया…..

श्रीमती एमिली शेंकल ने 1937 में भारत माँ के लाड़ले बेटे “सुभाष चन्द्र बोस” से विवाह किया और एक ऐसे देश को ससुराल के रूप में चुना जिसने कभी इस बहू का स्वागत नहीं किया….न बहू के आगमन में किसी ने मंगल गीत गाये और न उसकी बेटी के जन्म पर कोई सोहर गायी गयी…….कभी कहीं जन मानस में चर्चा तक नहीं हुई कि वो कैसे जीवन गुजार रही हैं…….

सात साल के कुल वैवाहिक जीवन में सिर्फ 3 साल ही उन्हें अपने पति के साथ रहने का अवसर मिला फिर उन्हें और नन्हीं सी बेटी को छोड़ पति देश के लिए लड़ने चला आए…….. इस वायदे के साथ कि पहले देश को आज़ाद करा लूँ…………… फिर तो सारा जीवन तुम्हारे साथ बिताना ही है…..

पर ऐसा हुआ नहीं औऱ 1945 में एक कथित विमान दुर्घटना में वो लापता हो गए……!

उस समय एमिली शेंकल बेहद युवा थीं ………….चाहतीं तो यूरोपीय संस्कृति के हिसाब से दूसरा विवाह कर सकतीं थीं……… पर उन्होंने ऐसा नहीं किया और सारा जीवन बेहद कड़ा संघर्ष करते हुए बिताया….एक तारघर की मामूली क्लर्क की नौकरी और बेहद कम वेतन के साथ वो अपनी बेटी को पालती रहीं……….ऋ… न किसी से शिकायत की न कुछ माँगा…….

भारत भी तब तक आज़ाद हो चुका था ………….और वे चाहतीं थीं कि कम से कम एक बार उस देश में आएँ जिसकी आजादी के लिए उनके पति ने जीवन न्योछावर कर दिया था………..

भारत का एक अन्य राजनीतिक (नेहरू/गाँधी) परिवार इतना भयभीत था ……… इस एक महिला से कि जिसे सम्मान सहित यहाँ बुलाकर देश की नागरिकता देनी चाहिए थी………. उसे कभी भारत का वीज़ा तक नहीं दिया गया…….

आखिरकार बेहद कठिनाइयों भरे और किसी भी तरह की चकाचौंध से दूर रहकर बेहद साधारण जीवन गुजार कर श्रीमती एमिली शेंकल बोस ने मार्च 1996 में गुमनामी में ही जीवन त्याग दिया……
जो इस देश के सबसे लोकप्रिय जन नेता नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की धर्मपत्नी थीं ! और जिन्हें नेहरू/ गाँधी कुनबे ने कभी इस देश में पैर नहीं रखने दिया……….नेहरू/गाँधी परिवार यह जानता था कि ये देश सुभाष बाबू की पत्नी को सर आँखों पर बिठा लेगा…………इसीलिए उन्हें एमिली बोस का इस देश में पैर रखना अपनी सत्ता के लिए चुनौती लगा…..

काँग्रेसी और उनके जन्मजात अंध चाटुकार, कुछ पत्रकार, और इतिहासकार (?) अक्सर विदेशी मूल की राजीव की बीबी सोनिया गाँधी को देश की बहू का ख़िताब दे डालते हैं……….उसकी कुर्बानियों का बखान बेहिसाब कर डालते हैं……

क्या एंटोनिया माइनो (सोनिया गाँधी ) कभी भी श्रीमती एमिली बोस की मौन कुर्बानियों के सामने कहीं भी ठहर सकती हैं……..!!!!

कोटिशः नमन

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Reality of mahmud Ghaznavi 17 invasions in India.

महमूद गजनवी के सत्रह आक्रमणों का पूरा सच

महमूद गजनवी के सत्रह आक्रमणों का पूरा सच

अंग्रेजो से प्रभावित भारतीय इतिहासकारों ने विदेशी आक्रमणकारियों को सदैव महिमा मंडित किया है। इसी परम्परा में गजनी के महमूद के द्वारा भारत किये गए सत्रह सफल आक्रमणो की गौरव गाथा भी गायी गयी है।

1025 ईसवीं में महमूद का सोलहवां बहु चर्चित प्रसिद्ध आक्रमण सोमनाथ मन्दिर पर हुआ। मन्दिर को लूटा गया लेकिन इस घटना को इतना तुच्छ समझा गया कि समसामयिक भारतीय इतिहास लेखकों हेमचन्द्र, सोमेश्वर और मेरुतुंग आदि ने चर्चा तक न की। कीर्ति कौमुदी, कुमार पाल चरित, सुकृत संकीर्तन , आदि समसामयिक पुस्तको में इसका उल्लेख भी नहीं हुआ। गुजरात की सत्ता और सम्रद्धि में कुछ भी कमी नहीं आई, क्यों कि 1026 ईसवी में ही भीमदेव प्रथम ने पाटन गुजरात पर अधिकार कर लिया और 1026 में ही सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कर पुनः प्रतिष्ठित कर दिया। और इस के सात वर्ष बाद ही 1032 में मंत्रीश्वर विमल देव शाह ने आबू पर खर्च हुए ”भगवान आदि नाथ” का मंदिर बनवाया जिस में उस जामाने में बारह करोड़ मुद्रा खर्च हुए थे।

आज फिर से देखते है सत्रह आक्रमण:

पहला आक्रमण 1000 ईसवीं में हुआ था। यह किसी राजा पर नहीं , खैबर दर्रे के कुछ अरक्षित किलों पर अधिकार था।

दूसरा आक्रमण…1001 ईसवीं….पेशावर में राजा जयपाल पर….. राजा जयपाल के 15-20 पुत्र पौत्र एवं परिजनों को बंदी बना लिया गया , जिन्हें फिरौती में 250000 दीनार मिलने पर छोड़ा गया उसके बाद भी 15000 हिन्दुओं का क़त्ल किया गया |
अपमानित राजा ने आत्महत्या कर ली,… क्यों ? यह खुला युद्ध नहीं था महमूद ने मित्रता का प्रस्ताव रख ,धोखे से राजा को और उसके परिजनों को बंदी बना लिया और फिरौती मांगी |महमूद के वापस जाते ही जयपाल के बेटे आनंद आनन्दपाल ने गद्दी पर कब्ज़ा कर लिया।

तीसरा आक्रमण…1006 ईसवीं… मुल्तान , सात दिन के घेरे के बाद वहां के शासक अबुल फतह को बंदी बनाकर मुल्तान पर अधिकार कर लिया , और राजा जयपाल के पुत्र सुखपाल को ” नवाब शाह ” के नाम से राजा बनाया , महमूद के वापस जाते ही सुखपाल ने इस्लाम त्याग अपने को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया।

चौथा आक्रमण……1008 ईसवीं.. मुल्तान.. सुखपाल का विद्रोह दमन किया।

पांचवां आक्रमण…..1008 ईसवीं पेशावर के राजा आनंद पाल के नेत्रत्व में उज्जैन ग्वालियर कन्नौज कालिंजर के राजाओं ने मोर्चा बनाया। ओहिंद के मैदान में सामना हुआ। खोखरो ने भी हिन्दू राजाओं का साथ दिया। पहले धावे में ही खोखरों ने 5000 मुसलमानों को मार दिया। महमूद की सेना भागने को ही थी की आनंद पाल का हाथी बिगड़ गया और भागने लगा , फिर भी दो दिन तक युद्ध चला , आनंद पाल पराजित हुआ।

छठा आक्रमण……1009 ईसवीं… नगरकोट काँगड़ा… छोटा राज्य ,हिन्दुओं द्वारा आत्मसमर्पण ……बड़ी लूट , मन्दिरों को लूटा गया इस लूट में महमूद को सात हजार सोने के दीनार ,700 मन सोने चांदी के बर्तन 200 मन सोना और 200 हीरे मिले।

सातवाँ आक्रमण…..1014 ईसवीं… में थानेश्वर. पर आक्रमण , मन्दिरों को लूटा गया।

आठवां आक्रमण……1015 ईसवीं… में कश्मीर पर अभियान…. असफल आक्रमण तौसी मैदान में महमूद ने डेरा डाला ,महमूद की बुरी हार हुई ….वह अस्त बस्त हालत में बहुत मुशकिल से गजनी पहुँच पाया।

नवां आक्रमण……1018-1019 मथुरा वृन्दावन और कन्नौज मन्दिरों को लूटा गया।

दसवां आक्रमण……1021 ईसवीं.. में फिर कश्मीर पर ….. असफल अभियान … महमूद की बुरी हार हुई।

11 वां आक्रमण……1021-1022 ग्वालियर और कालिंजर असफल अभियान — मुस्लिम लेखक “ अबू गाडिर्जी” ने अपनी किताब” जैनुल अकबर “में लिखा है कि 1019 में कालिंजर पर आक्रमण में राजपूतों ने इतना प्रबल युद्ध किया की महमूद को उलटे पांव वापस गजनी जाना पड़ा। 1022 ईसवीं. में महमूद फिर इस हार का बदला लेने के लिए गजनी से चला, रास्ते में ग्वालियर पर चार दिन चार रात घेरा डालने पर भी जीत की सम्भावना न देख , शांति संधि (हार) कर वह कालिंजर के लिए आगे बढ़ गया। कालिंजर का किला इतनी ऊंचाई पर था कि उस पर सीधे आक्रमण करना संभव नहीं था न ही आधार के पत्थर काटकर घुसा जा सकता था। गाडिर्जी आगे लिखता है कि महमूद ने विद्याधर को धन रत्न कपडे औरतें “ भेट “ में भेजी और कई किलों पर बातचीत कर (अधिकार मान कर ) गजनी प्रस्थान किया। यह मुस्लिम लेखको द्वारा अपने संरक्षकों को ”हारा हुआ” न दिखाने का तरीका था। महमूद को” दो बार” हराने के बाद विद्याधर ने खजुराहो में कंडारिया महादेव का मंदिर बनवाया।

12वां, 13वां ,14वां और 15वां आक्रमण… कुछ विवरण नहीं मिलता

सोलहवां आक्रमण—— 1025 ईसवीं में महमूद का सोलहवां बहु चर्चित आक्रमण सोमनाथ पर हुआ। मन्दिर को लूटा। सोमनाथ की लूट महमूद के जीवन की सबसे बड़ी लूट कही गयी सैकड़ों मन सोना, चांदी , हीरे जवाहरात, दास, दासी गजनी ले जाये गए।

अंतिम आक्रमण…… 1026 ईसवीं में जाटों पर आक्रमण—–कहते है सोमनाथ आक्रमण से वापसी में जाटों ने बहुत तंग किया था अतः उन्हें दंड देने के लिए यह आक्रमण किया सोचने वाली बात है किस तरह तंग किया होगा…..वस्तुतः जाटों ने सोमनाथ की लूट का खजाना महमूद से छीन लिया था , उसे वापस पाने के लिए यह आक्रमण किया, पर उस के हाथ न खजाना ,न विजय हाथ लगी।

इस प्रकार हम देखते है कि पहले से पांच आक्रमण एक ही राज्य /राज परिवार … राजा जयपाल व उनके पुत्रों पर हुए… अतः ”एक ही“ राजनीतिक जीत गिनी जायगी। नगरकोट काँगड़ा ,थानेश्वर, मथुरा (वृन्दावन) और कन्नौज पर अभियान। मंदिरों की लूट के लिए किये कश्मीर पर “दो बार” महमूद की बुरी तरह हार हुई। कालिंजर पर “दो बार“ और ग्वालियर पर “एक बार” बुरी तरह हार का मुह देखना पड़ा। इस प्रकार एक ही राजनीतिक जीत और चार बार मंदिरों की लूट तथा पांच बार “हार” के सच पर महमूद को कितना महत्व दिया जाय यह सोचने की बात है।

महमूद गजनवी जिसके आक्रमणों का कोई राजनीतिक परिणाम न आया हो, जिससे भारतीय समाज और जन जीवन जरा भी प्रभावित न हुआ हो , उसके वापस जाते ही सब कुछ यथावत चलने लगे। इतनी महत्वहीन घटना कि सम सामयिक भारतीय लेखको ने इसका जिक्र तक न किया हो , उसे आज के भारतीय इतिहास में एक महत्व पूर्ण घटना दिखाना क्या सही है?

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अपराध अक्षम्य है..।

Devendra Sharma

एक बार जरूर पढ़ें

बटुकेश्वर दत्त !

नाम याद है या भूल गए ??

हाँ, ये वही बटुकेश्वर दत्त हैं जिन्होंने भगतसिंह के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेंका था और गिरफ़्तारी दी थी।
अपने भगत पर तो जुर्म संगीन थे लिहाज़ा उनको सजा-ए-मौत दी गयी । पर बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी (अंडमान निकोबार) भेज दिया गया और मौत उनको करीब से छू कर गुज़र गयी। वहाँ जेल में भयंकर टी.बी. हो जाने से मौत फिर एक बार बटुकेश्वर पर हावी हुई लेकिन वहाँ भी वो मौत को गच्चा दे गए।

कहते हैं जब भगतसिंह, राजगुरु सुखदेव को फाँसी होने की खबर जेल में बटुकेश्वर को मिली तो वो बहुत उदास हो गए।इसलिए नहीं कि उनके दोस्तों को फाँसी की सज़ा हुई,बल्कि इसलिए कि उनको अफसोस था कि उन्हें ही क्यों ज़िंदा छोड़ दिया गया !

1938 में उनकी रिहाई हुई और वो फिर से गांधी जी के साथ आंदोलन में कूद पड़े लेकिन जल्द ही फिर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए और वो कई सालों तक जेल की यातनाएं झेलते रहे।बहरहाल 1947 में देश आजाद हुआ और बटुकेश्वर को रिहाई मिली।

लेकिन इस वीर सपूत को वो दर्जा कभी ना मिला जो हमारी सरकार और भारतवासियों से इसे मिलना चाहिए था।आज़ाद भारत में बटुकेश्वर नौकरी के लिए दर-दर भटकने लगे। कभी सिगरेट बेची तो कभी टूरिस्ट गाइड का काम करके पेट पाला। कभी बिस्किट बनाने का काम शुरू किया लेकिन सब में असफल रहे।कहा जाता है कि एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे ! उसकेलिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया ! परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने इस 50 साल के अधेड़ की पेशी हुई तो उनसे कहा गया कि वे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लेकर आएं..!!! भगत के साथी की इतनी बड़ी बेइज़्ज़ती भारत में ही संभव है।

हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चलीतो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफ़ी मांगी थी ! 1963 में उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया । लेकिन इसके बाद वो राजनीति कीचकाचौंध से दूर गुमनामी में जीवन बिताते रहे । सरकार ने इनकी कोई सुध ना ली।

1964 में जीवन के अंतिम पड़ाव पर बटुकेश्वर दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में कैंसर से जूझ रहे थे तो उन्होंने अपने परिवार वालोंसे एक बात कही थी-“कभी सोचा ना था कि जिस दिल्ली में मैंने बम फोड़ा था उसी दिल्ली मेंएक दिन इस हालत में स्ट्रेचर पर पड़ा होऊंगा।”इनकी दशा पर इनके मित्र चमनलाल ने एक लेख लिख कर देशवासियों का ध्यान इनकी ओर दिलाया कि-“किस तरह एक क्रांतिकारी जो फांसी से बाल-बाल बच गया जिसने कितने वर्ष देश के लिए कारावास भोगा , वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है।”बताते हैं कि इस लेख के बाद सत्ता के गलियारों में थोड़ी हलचल हुई !

सरकार ने इन पर ध्यान देना शुरू किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।भगतसिंह की माँ भी अंतिम वक़्त में उनसे मिलने पहुँची।भगतसिंह की माँ से उन्होंने सिर्फ एक बात कही-“मेरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार भगत की समाधि के पास ही किया जाए।उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई.

17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया !भारत पाकिस्तान सीमा के पास पंजाब के हुसैनीवाला स्थान पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की समाधि के साथ ये गुमनाम शख्स आज भी सोया हुआ है।

मुझे लगता है भगत ने बटुकेश्वर से पूछा तो होगा- दोस्त मैं तो जीते जी आज़ाद भारत में सांस ले ना सका, तू बता आज़ादी के बाद हम क्रांतिकारियों की क्या शान है भारत में।”

*********आज सोचा कि कुछ इतर लिखूं और बटुकेश्वर दत्त से आपका परिचय करवाऊं!!

साभार
Indian history real truth

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मनोज शर्मा

तथाकथित मुस्लिम पार्टी कांग्रेस ने षड्यंत्र पूर्वक वामपंथी इतिहासकारों से सिर्फ मुगलों को महान दर्शाने वाला इतिहास लिखवाया और हमें पढ़वाया ताकि मुसलमानों की गजबाए हिंद की दीर्घकालीन योजना के फलीभूत होने में आसानी हो।हिन्दुओं की नस्लों का मनोबल गिर जावे और वे धर्मांतरण का विरोध न करें अपितु धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्मांतरण का सहयोग करें ।जब इस नकली इतिहास को बदलने की बात चलती है तो मुस्लिम पार्टी कांग्रेस शिक्षा के भगवा करण का आरोप लगाती है ।