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रानीपद्मिनी


#रानीपद्मिनीएकअद्भुतवीरांगना

वर्षभर चित्तौड़गढ़ किले को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। विदेशों तक इस किले की बनावट एवं खूबसूरती का जिक्र होता है। किले के एक-एक भाग को बारीकी से देखने एवं समझने के लिए पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन इसी किले का एक हिस्सा ऐसा है, जहां जाने की कोई हिम्मत नहीं
करता।

चित्तौड़गढ़ किले का ‘जौहर कुंड’, जहां जाना तो दूर, कोई ख्याल में भी इस जगह के पास जाने की नहीं सोचता। यदि कुछ लोगों ने कोशिश भी की है, तो वे आखिर तक इस कुंड तक पहुंचने में असफल हो जाते हैं। वो जोहर की चीख ओर साधारण जनता का विलाप आज भी किले में गूंजता है, ऐसा कुछ लोगो का कहना है !

रानी पद्मिनी, चित्तौड़ की रानी थीं। वे सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी थीं। बचपन से ही उनके माथे के तेज और खूबसूरती के चर्चे हर जगह होते थे। बड़े होने पर जब विवाह का समय आया तो, अपनी सुंदर-सुशील पुत्री के लिए राजा ने स्वयंवर का प्रबंध किया।

किंतु यह कोई सामान्य स्वयंवर नहीं था। कहते हैं कि भारत के इतिहास में आज तक हुए सभी स्वयंवर में सबसे चर्चित स्वयंवर है राजकुमारी पद्मिनी का। क्योंकि इस स्वयंवर में स्वयं राजकुमारी ने जो शर्त रखी थी, उसे जान वहां आए सभी राजा-महाराजा चकित रह गए थे।

राजकुमारी के अनुसार वे उसी से विवाह करेंगी जो उनके द्वारा मैदान में उतारे हुए योद्धा को पराजित कर सकेगा। आश्चर्य तो तब हुआ जब बाद में सबको यह ज्ञात हुआ कि वह योद्धा कोई और नहीं, वरन् स्वयं राजकुमारी पद्मिनी ही थीं।

स्वयंवर आरंभ हुआ, एक के बाद दावेदार उस योद्धा को हराने के लिए आगे आए। लेकिन किसी में इतना कौशल नहीं था कि वे उसे पराजित कर सकें। तब आए चित्तौड़ के राजा रतन सिंह और उन्होंने उस योद्धा को हराकर शर्त जीत ली। ओर रानी पद्मिनी से उनका विवाह हुआ !

अल्लाउद्दीन खिलजी के व्यभिचार की अग्नि जब रानी पद्मिनी को पाने को आतुर हो हो जब चितोड़ पर विशाल सेना के साथ जब आ धमकी, तो रानी पद्मिनी ने भी तब तक हथियारों के साथ दुर्ग की रक्षा के लिए हथियार चलाये जब तक राणा रतनसिंहः जीवित रहे थे !! उनके वीरगति का समाचार पा रानी पद्मिनी ओर 16000 राजपूत रमणीया जोहर की आग में अपनी संतानों ओर सम्पति को लेकर कूद गई, जिससे मुसलमानो के हाथों कुछ ऐसा ना लगे कि वे हिन्दू समाज का अहित कर सके !!

ऐसे महान ओर बलिदानी चरित्र पर दाग लगाना, क्या बर्दास्त के काबिल है ? क्या रानी पद्मिनी जगदंबा के अवतार से कम थी ??

( सबसे खेदजनक बात यह है कि पद्मावती पर फिल्म बन रही है जिसमें जिद्दी ख़िलजी को पद्मावती का प्रेमी दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। जो हिन्दू यह सन्देश पढ़ रहे है। वे इस लेख को सोशल मीडिया में शेयर तो करेंगे मगर साथ में 500-500 रुपये की टिकट खरीद कर इसी पिक्चर को देखने PVR भी जायेंगे।)

Niraj aarya

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इन गीतों को सुनकर खड़े हो जाएंगे रोंगटे


इन गीतों को सुनकर खड़े हो जाएंगे रोंगटे, फडफ़ड़ाने लगेंगी भुजाएं

कहा जाता है, आल्हा ऊदल जैसा देवी भक्त दूसरा नहीं हो सकता है। ये जितने लड़ाकू और शक्तिशाली थे उतने ही बड़े देवी भक्त भी थे।
सतना। आल्हा-ऊदल बड़े लड़ईया…से प्रसिद्ध पंक्तियां सुनने वालों को रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कहा जाता है कि आल्हा ऊदल जैसा देवी भक्त दूसरा नहीं हो सकता है। ये जितने लड़ाकू और शक्तिशाली थे उतने ही बड़े देवी भक्त भी थे। इनका अखाड़ा अब भी सतना जिले के मैहर में स्थित है। क्षेत्रीय लोग बताते हैं कि आल्हा और ऊदल दोनों इस अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे।

इनके लोकगीत में जादू ऐसा कि देखते ही देखते चारो ओर न सिर्फ भीड़ इकट्ठी हो जाती है, बल्कि सुनने वालों के बाजू फड़कने लगते हैं-

रन में दपक -दप बोले तलवार,
पन-पन-पन-पन तीर बोलत है,
कह-कह कहे अगिनिया बाण,
कट-कट मुंड गिरे धरती पर।

जोश भर देनेवाली इस गायिकी को आल्हा कहते है जब इस गायकी के बोल चरम पर होते हैं तो सुनने वाले की खून की गति बढ़ जाती है, देश पर बलिदान हो जाने की इच्छा बलवती हो जाती है, कहते है की इन गीतों के नायक आल्हा और ऊदल ने अपना सर्वस्व मातृभूमि को अर्पित कर दिया था।

आल्हा ऊदल 11 वीं सदी में चंदेल शासक के सेनानायक थे, जिनकी वीरता का वर्णन कालिंजर के परमार राजाओं के दरबारी कवि जयनिक ने गेय काव्य के रूप में किया है। इन्होने महोबे के विख्यात वीर आल्हा-ऊदल की कथा आल्हा नामक छंद में लिखी है। यह छंद इतना लोकप्रिय हो गया कि पुस्तक का नाम ही आल्हा पड़ गया। इसके बाद जो भी कविता इस छंद में लिखी गयी उसे आल्हा कहा जाने लगा। दोनों भाइयों आल्हा और ऊदल ने किस प्रकार अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पृथ्वीराज से भीषण युद्ध किया था।

जगनिक के लोककाव्य आल्ह-खण्ड की लोकप्रियता देशव्यापी है. महोबा के शासक परमाल के शूरवीर आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं। मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है, जिसे लगभग सन 1250 में लिखा गाया था। आल्हा लोक गाथा है, जिसे भारत के लगभग सारे हिंदी प्रदेश में गाया जाता है। हालांकि क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव इन पर पड़ा है।
आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं 52 तो कहीं 56 लड़ाइयां वर्णित हैं। इस लोक महाकाव्य की गायिकी की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। एक लोककवि के अनुसार, आल्हा-गायन में प्रमुख संगति वाद्य ढोलक, झांझ, मंजीरा आदि है। विभिन्न क्षेत्रों में संगति-वाद्य बदलते भी हैं। ब्रज क्षेत्र की आल्हा-गायकी में सारंगी के लोक-स्वरूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध क्षेत्र के आल्हा-गायन में सुषिर वाद्य का प्रयोग भी किया जाता है।

आल्हा का मूल छन्द कहरवा ताल में होता है। प्रारम्भ में आल्हा गायन विलम्बित लय में होता है। धीरे-धीरे लय तेज होती जाती है। आल्हा गानेवाले गायक के पास एक ढोल होता है। गाने की गति ज्यों-ज्यों तीव्र होती जाती है, ढोल बजने की गति में वैसा ही परिवर्तन होता जाता है। आल्हा और ऊदल की अपार श्रद्धा और भक्ति से ही उन्हें देवी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। जिससे आज भी उनके मौजूद होने की कथाएं प्रचलित हैं।

प्रस्तुत हैं बघेलखण्ड और बुन्देलखण्ड क्षैत्र में प्रचलित लोकप्रिय आल्हा गीत के कुछ अंश

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एक समय था, ज्यादा पुरानी बात नहीं, लगभग 50-60 साल पहले, अफ्रीकी काले लोगों को zoo में रखा जाता था


एक समय था, ज्यादा पुरानी बात नहीं, लगभग 50-60 साल पहले, अफ्रीकी काले लोगों को zoo में रखा जाता था, बंदरों की तरह, लेकिन उन्होंने हथियार नहीं उठाए, कोई आतंकवादी संगठन नहीं बनाया, उन्होंने नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग पैदा किये, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई, और जिस देश अमेरिका में उनपर सबसे ज्यादा अत्याचार हुए, उन्हें human zoo में रखा गया, वहां 8 साल तक एक अश्वेत बराक ओबामा ने राज किया।

लेकिन कुछ  शान्तिप्रिय लोग, जिनकी दुनिया की आबादी में 1एक तिहाई हिस्सेदारी है, 50 से ज्यादा देशों में उनका राज है, वो आज दुनिया के सबसे बड़े शिकार बनकर आतंकवाद की हिमायत!! करते हैं।

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जब कभी जीवन मे किसी बड़ी असफलता का सामना करना पड़े


जब कभी जीवन मे किसी बड़ी असफलता का सामना करना पड़े , सबकुछ बिल्कुल विपरीत हो , निराशा आपको आकर घेर ले तो इस व्यक्ति का चरित्र पढो आपमे आत्मविश्वास जागेगा !
1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध मे मराठो को दुरानी ,रोहिलों और बंगाल की संयुक्त सेना द्वारा बड़ी हार का सामना करना पड़ा ,मराठो की लगभग एक पीढ़ी इस युद्ध मे वीरगती को प्राप्त हो गयी !
उस वक्त शायद ही किसीने सोचा हो कि मराठा इस शब्द का जिक्र भी कोई उत्तर भारत में करेंगा !

पर बिल्कुल इसके विपरीत , इस युद्ध मे गंभीर जख्मी होकर बच निकले प्रस्तुत योद्धा ने दस वर्ष बाद उत्तर भारत मे किसी भूखे शेर की तरह धड़क दी !
पानीपत में अहमदशाह अब्दाली को न्यौता देने वाले नजीबखान रोहले के रोहिलखंड को पूरी तरह तहस नहस कर डाला, उसकी राजधानी नजीबाबाद लूट ली , नजीबखान तो पहले ही मर गया था सो उसकी कब्र खोद डाली, उसके बेटे झबिता खान को मुल्क छोड़कर भागना पड़ा !
आगे बढ़कर इस महान योद्धा ने लाहौर लूट लिया , वहाँकी लूट से सोमनाथ मंदिर के द्वार ले आये जो आज भी उज्जैन के गोपाल मंदिर की शोभा बढाते है !

इतना सब होने के बाद भी वो चुप नही बैठा ।
उभरते हुए विदेशी अंग्रेजो को भी मध्य भारत मे परास्त कर जीत हासिल की !
उत्तर और मध्य भारत मे अपना केसरिया लहराने के बाद उसने दक्षिण में एक के बाद एक निजाम और हैदर अली दोनों को मात देते हुए अपना एकछत्र राज कायम किया !!
विदेशी इतिहासकार उसे उस समय का दक्षिण एशिया का सबसे शक्तिशाली राजा मानते है ।
इसप्रकार अपनी हार होनेपर भी टूटने की बजाय इस व्यक्ति ने नया दम भर कर चारो दिशाओं में जोरदार जीत हासिल की 👍
अफगान,रोहिले,मुगल,निजाम,टिपू सुल्तान,अंग्रेज कोई भी उस योद्धा के आत्मबल के आगे नही टिक पाया !
इसमें कोई शक नही की यदी वो 10 साल और जी लेता तो इतिहास कुछ और होता , पर 1794 इस महान रनसूर्य का अस्त हुआ और लगभग 25 साल बाद भारत अंग्रेजो का गुलाम हो गया !!
आप सभी जानते है इस महान योद्धा का नाम था –
महादजी सिंधिया

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गाँधीजी द्वारा किया गया परिवर्तन और असली भजन


गाँधीजी द्वारा किया गया परिवर्तन और असली भजन

गाँधीजी का भजन

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम
सीताराम सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान…

असली राम धुन भजन…

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालीग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम

‘श्रीराम को सुमिरन’ करने के इस भजन को जिन्होंने बनाया था उनका नाम था लक्ष्मणाचार्य

“श्री नमः रामनायनम”
नामक हिन्दू-ग्रन्थ से लिया गया है।

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हम सब जानते हैं कि जब 1972 में इजराइल के  ओलिंपिक खिलाड़ियों को आतंकवादियों ने मार दिया था


हम सब जानते हैं कि जब 1972 में इजराइल के  ओलिंपिक खिलाड़ियों को आतंकवादियों ने मार दिया था तब इस्राएल ने भी सबको खोज खोज कर मारा… लेकिन इसमें कई आश्चर्यजनक जानकारी भी है.. जैसे कि जिन आतंकियों ने इसरायली खिलाड़ियों के ऊपर हमला किया था.. उन सबको तो एयरपोर्ट पर ही मार दिया गया था… फिर खोज खोज कर किसको मारा गया था ? ?

 

कहानी तो वहीं एयरपोर्ट पर खत्म हो जानी चाहिए थी…  जब मुस्लिम आतंकियों को भागते समय इस्राएली कमांडो ने एयरपोर्ट पर घेर लिया.. उसी वक़्त खुद को घिरा देख एयरपोर्ट पर ही बंधक खिलाड़ियों को आतंकियों ने भून डाला.. इसके बाद इसरायली कमाण्डो ने 8 आआतंकवादियों को वहीं मार डाला..खेल खत्म हो चुका था… लेकिन नहीं इजराइल ने तो इसका बदला सैकड़ों को मार कर लिया..

 

उसने अपनी खुफिया एजेंसी मोसाद की मदद से उन सभी लोगों के कत्ल की योजना बनाई, जिनका वास्ता ऑपरेशन ब्लैक सेंप्टेंबर से था। इस मिशन को नाम दिया गया  ‘रैथ ऑफ गॉड’ यानी ईश्वर का कहर।

 

दो दिन के बाद इजरायली सेना ने सीरिया और लेबनान में मौजूद फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के 10 ठिकानों पर बमबारी की और करीब 200 आतंकियों को तो मारा ही सैकड़ों आम नागरिकों को भी मौत के घाट उतार दिया।

 

मिशन शुरू होने के कुछ ही महीनों के अंदर मोसाद एजेंट्स ने वेल ज्वेटर और महमूद हमशारी का कत्ल कर सनसनी मचा दी।

 

हुसैन अल बशीर नाम का ये शख्स होटल में रहता था, और होटल में वो सिर्फ रात को आता था और दिन शुरू होते ही निकल जाता था। मोसाद की टीम ने उसे खत्म करने के लिए उसके बिस्तर में बम लगाने का प्लान बनाया।

 

बम लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था, ये काम तो आसानी से हो गया। मुश्किल ये था कि कैसे ये पता किया जाए कि हुसैन अल बशीर बिस्तर पर है  तभी धमाका किया जा सकता है। इसके लिए एक मोसाद एजेंट ने बशीर के ठीक बगल वाला कमरा किराए पर ले लिया। वहां की बालकनी से बशीर के कमरे में देखा जा सकता था। रात को जैसे ही बशीर बिस्तर पर सोने के लिए गया। एक धमाके के साथ उसका पूरा कमरा उड़ गया।

 

इसके बाद फलस्तीनी आतंकियों को हथियार मुहैया कराने के शक में बेरूत के प्रोफेसर बासिल अल कुबैसी को गोली मार दी गई। मोसाद के दो एजेंट्स ने उसे 12 गोलियां मारीं।

 

9 अप्रैल 1973 को इजराय़ल के कुछ कमांडो लेबनान के समुद्री किनारे पर स्पीडबोट के जरिए पहुंचे। इन कमांडोज को मोसाद एजेंट्स ने कार से टार्गेट के करीब पहुंचाया। कमांडो आम लोगों की पोशाक में थे, और कुछ ने महिलाओं के कपड़े पहन रखे थे। पूरी तैयारी के साथ इजरायली कमांडोज की टीम ने इमारत पर हमला किया। इस ऑपरेशन के दौरान लेबनान के दो पुलिस अफसर, एक इटैलियन नागरिक भी मारा गया।।इनमें साइप्रस में जाइद मुचासी को एथेंस के एक होटल रूम में बम से उड़ा दिया गया।

 

इतने लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद मोसाद कुछ समय के लिए रुका क्योंकि कमांडोज में दो तीन घायल भी थे और थक गए थे.. नए कमांडोज शामिल हुए.. क्योंकि अभी मुस्लिम आतंकियों की लिस्ट में नाम बाकी थे..

 

28 जून 1973 को ब्लैक सेप्टेंबर से जुड़े मोहम्मद बउदिया को उसकी कार की सीट में बम लगाकर उड़ा दिया।

15 दिसंबर 1979 को दो फलस्तीनी अली सलेम अहमद और इब्राहिम अब्दुल अजीज की साइप्रस में हत्या हो गई।

-17 जून 1982 को पीएलओ के दो वरिष्ठ सदस्यों को इटली में अलग-अलग हमलों में मार दिया गया।

23 जुलाई 1982 को पेरिस में पीएलओ के दफ्तर में उप निदेशक फदल दानी को कार बम से उड़ा दिया गया।

-21 अगस्त 1983 को पीएलओ का सदस्य ममून मेराइश एथेंस में मार दिया गया।

-10 जून 1986 को ग्रीस की राजधानी एथेंस में पीएलओ के डीएफएलपी गुट का महासचिव खालिद अहमद नजल मारा गया।

-21 अक्टूबर 1986 को पीएलओ के सदस्य मुंजर अबु गजाला को काम बम से उड़ा दिया गया।

-14 फरवरी 1988 को साइप्रस के लीमासोल में कार में धमाका कर फलस्तीन के दो नागरिकों को मार दिया गया।

 

मोसाद के एजेंट्स दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर करीब 20 साल तक हत्याओं को अंजाम देते रहे।

अगली नंबर था अली हसन सालामेह का, वो शख्स जो म्यूनिख कत्ल-ए-आम का मास्टरमाइंड था लेकिन अबतक इसने अपनी सुरक्षा काफी बढ़ा ली थी…

 

मोसाद ने सलामेह को लेबनान की राजधानी बेरूत में ढूंढ़ निकाला। 22 जनवरी 1979 को एक कार बम धमाका कर सलामेह को भी मौत के घाट उतार दिया गया।

 

इन कमांडोज में एक बेंजामिन नेतन्याहू भी था।

 

बदले की ये भावना कि आप 20 साल तक अपना इंतकाम पूरा करते रहें.. ये सिर्फ इजराइल में हो सकता था.. भारत के सेक्युलर और डरपोक नेताओं से तो ऐसी कोई कल्पना ही नहीं कि जा सकती।।

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बाबर और राणा सांगा में भयानक युद्ध चल रहा था ।


बाबर और राणा सांगा में भयानक युद्ध चल रहा था ।
बाबर ने युद्ध में पहली बार तोपों का इस्तेमाल किया था । उन दिनों युद्ध केवल दिन में लड़ा जाता था, शाम के समय दोनों तरफ के सैनिक अपने अपने शिविरों
में आराम करते थे । फिर सुबह युद्ध होता था !
लड़ते लड़ते शाम हो चली थी , दोनों तरफ के सैनिक अपने शिविरों में भोजन तैयार कर रहे थे ।
बाबर टहलते हुए अपने शिविर के बाहर खड़ा दुश्मन सेना के कैम्प को देख रहा था तभी उसे राणा सांगा की सेना के शिविरों से कई जगह से धुँआ उठता दिखाई दिया।
बाबर को लगा कि दुश्मन के शिविर में आग लग गई है, उसने तुरंत अपने सेनापति मीर बांकी को बुलाया और पूछा कि देखो दुश्मन के शिविर में आग लग गई है क्या ? शिविर में पचासों जगहों से धुँआ निकल रहा हैं ।
सेनापति ने अपने गुप्तचरों को आदेश दिया -जाओ पता लगाओं कि दुश्मन के सैन्य शिविर से इतनी बड़ी संख्या में इतनी जगहों से धुँओ का गुब्बार क्यों निकल रहा है ?
गुप्तचर कुछ देर बाद लौटे उन्होंने बताया हुजूर दुश्मन सैनिक सब हिन्दू हैं वो एक साथ एक जगह बैठकर खाना नहीं खाते ।सेना में कई जात के सैनिक है जो
एक दूसरे का छुआ नहीं खाते इसलिए सब अपना अपना भोजन अलग अलग बनाते हैं अलग अलग खाते हैं ।एक दूसरे
का छुआ पानी तक नहीं पीते।
यह सुनकर बाबर खूब जोर से हँसा काफी देर हँसने के बाद उसने अपने सेनापति से कहा .मीर बांकी फ़तेह हमारी ही होगी !
ये क्या हमसे लड़ेंगे, जो सेना एक साथ
मिल बैठकर खाना तक नहीं खा सकती, वो एक साथ मिलकर दुश्मन के खिलाफ कैसे लड़ेगी ?
बाबर सही था।
तीन दिनों में राणा सांगा की सेना मार दी गई और बाबर ने मुग़ल शासन की नीव रखी।
भारत की गुलामी का कारण जातिवाद छुआछूत भेदभाव था जो आज भी जारी है जागो रे ….जागो जरा