Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

ये दिवान टोडरमलजी की हवेली है
जिन्होंने ७८,000 मोहरें बिछाकर गुरुगोविंद सिंह जी के साहबजादों और माता गुजरी देवी जी के संस्कार के लिए ४ गज जगह खरीदी थी …!
मुगल के क्रूर राजा ने मां गुजरी और बच्चों के संस्कार के लिए जमीन देने से मना कर दिया था तब टोडरमल जी सामने आए उन्होंने मुगल क्रूर राजा को कहा राजा ने जमीन की कीमत मांगी थी सोने की मोहरों से जितनी जमीन नापी जा सके उस समय टोडरमल ने अंतिम संस्कार के लिए सोने की मोहरे बिछाकर संस्कार हो सके इतनी जमीन खरीदकर संस्कार किया …!
इतने क्रूर अत्याचार करके जो इस्लाम पनपा उसमें मानवता किस कोने में ढूंढ रहे हो …?
और आज स्थिति ये है कि खुद दिवान टोडरमल जी की हवेली को देखने वाला कोई नही …..!
इस हवेली को संगमरमर के पत्थर से दुबारा बनवाना चाहिए, ताकि उनकी चेतना उनकी स्मृतियों को सदैव याद रखा जाए …!
सरहिंद_पंजाब मैं यह हवेली है …!
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16जनवरी2020
भाग-16
ज्योति जला निज प्राण की
गढ़ आला पण सिंह गेला
सन 1947 का मार्च महीना अपने दामन में दंगों का दुर्भाग्य छिपाकर लाया। शाहआलमी दरवाजा लाहौर का प्रसिद्ध दरवाजा था। पुराने शहर से हिंदुओं के आने-जाने का वही तो एकमात्र सुरक्षित रास्ता था। इस क्षेत्र की तंग गलियोंवाली बसावट तथा दोनों ओर लगे लोहे के फाटकों ने इसे एक दुर्ग का रूप प्रदान कर दिया था। इस मोहल्ले में संघ की अच्छी शाखा थी। समाज उसके नेतृत्व में संगठित था। इस कारण इस मोहल्ले की ओर कोई तिरछी नजरों से देखने का साहस नहीं करता था। परंतु यह क्षेत्र लीगी गुंडों की नजर में खटकता था। एक दिन दोपहर मुसलमानों की भारी भीड़ दरवाजे के बाहर एकत्रित हो गई। भीड़ का नेतृत्व कुख्यात बारूदखाना मोहल्ले के छंटेछटाये खूंखार अपराधी कर रहे थे। वे हमला करने की नीयत से जमा हो गए थे। परंतु वे अभी तैयारी कर ही रहे थे कि संघ के स्वयंसेवकों की अगुआई में हिंदू नौजवानों ने पहले ही परी मोहल्ले की ओर से हमला कर दिया। नेतृत्व कर रहा था महेंद्र। इन नौजवानों के पास केवल लाठियां ही थीं। परंतु हमला अचानक था इस कारण भीड़ में भगदड़ मच गई। कई घायलों को पीछे छोड़कर भीड़ भाग खड़ी हुई। उनके हौसले पस्त हो गए।
अब अपने कारनामों के लिए कुख्यात मजिस्ट्रेट चीमा हमलावरों की मदद को आ गया। वह अपने साथ पुलिस भी लाया था। 24 घंटे के कर्फ्यू का ऐलान कर दिया गया। रात हो चुकी थी। आशंका पूरी थी कि यहां भी यह मजिस्ट्रेट सरीन मोहल्ले के समान सर्वनाश कराएगा। वही हुआ। गुंडों ने पुलिस के संरक्षण में पेट्रोल छिड़ककर आग लगानी शुरू कर दी। सारा इलाका धूं-धूं कर जलने लगा। इस क्षेत्र में घी, तेल, कपड़े के समान तुरंत आग पकड़ने वाली वस्तुओं की दुकानें थी। परिणामस्वरूप आग ने आनन-फानन में ही रौद्र रूप धारण कर लिया और इधर बिजली और फोन ही नहीं, पानी की आपूर्ति करने वाले नल भी पुलिस ने कटवा दिए थे। सर्वत्र मौत नृत्य कर रही थी। सबमें भारी घबराहट थी परंतु ऐसे विकट समय में भी संघ के स्वयंसेवक बिना घबराए दृढ़तापूर्वक, अनुशासन व धैर्य से परिस्थिति का सामना करने हेतु मैदान में उतर आए, मोहल्ले के अन्य नौजवान भी उनके साथ हो लिए। छोटे बड़े बर्तनों में कुओं से पानी खींचकर बड़े अनुशासित ढंग से आग बुझाने का काम प्रारंभ हो गया। तभी ध्यान में आया कि गांधी स्क्वेयर में पानी खींचने का इंजन है। पर वहां तक जाया कैसे जाए? पुलिस की गोलियों का खतरा था। लेकिन स्वयंसेवकों ने भय तो सीखा ही नहीं था। जुझारू कार्यकर्ता महेंद्र के नेतृत्व में उनकी टोली चल पड़ी और ले आई इंजन को। आग पर पानी फेंकने का वेग और बढ़ गया। यह भी एक अनूठा अभियान था। परंतु पूरी आग पर काबू नहीं पाया जा रहा था। तय यह हुआ कि जिन दुकानों व घरों ने आग पकड़ ली है उन्हें ध्वस्त कर आग को सीमित कर दिया जाए। ऐसा ही किया गया और शेष मोहल्ले को आग की लपटों से बचा लिया गया।
इस प्रकार उन नौजवानों के साहस, सूझबूझ व बहादुरी ने एक बार तो आपत्ति को टाल दिया। वे अपने लक्ष्य में सफल रहे। हिंदुओं की रक्षा हो गई। परंतु इस विजय का प्रमुख श्रेय जिस होनहार युवक को जाता है वह महेंद्र वीरगति को प्राप्त हो गया। जलते मकानों में घुस-घुसकर कर फंसे लोगों को निकालने में वह अन्य कई कार्यकर्ताओं की तरह बुरी तरह झुलस गया था। 3 दिन तक उपचार चला, परंतु उस वीर देशभक्त को बचाया नहीं जा सका। तीसरे दिन विजय की आभा से दमकता चेहरा लिए वह वीर चिरनिद्रा में लीन हो गया। ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’ वाला शिवाजी का कथन यहां भी सबकी जुबान पर था। मध्यमवर्गीय परिवार का 18 वर्षीय महेंद्र बी.ए. का छात्र था। अत्यंत होनहार युवक था। पूरे क्षेत्र में छोटे-बड़े सभी उसे प्यार व सम्मान में महेंद्रजी कहते थे। संघ का वह वरिष्ठ कार्यकर्ता था।
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पेशवा_बाजीराव

80 साल की उम्र के राजपूत राजा छत्रसाल जब मुगलो से घिर गए,
और बाकी राजपूत राजाओं से कोई उम्मीद ना थी तो उम्मीद का एक मात्र सूर्य था “ब्राह्मण बाजीराव बलाड़ पेशवा”
एक राजपूत ने एक ब्राह्मण को खत लिखा:-

जोगतिग्राहगजेंद्रकी

सोगतिभईहैआज!

बाजी जात बुन्देल की बाजी राखो लाज!

(जिस प्रकार गजेंद्र हाथी मगरमच्छ के जबड़ो में फँस गया था ठीक वही स्थिति मेरी है, आज बुन्देल हार रहा है, बाजी हमारी लाज रखो) ये खत पढ़ते ही बाजीराव खाना छोड़कर उठे उनकी पत्नी ने पूछा खाना तो खा लीजिए तब बाजीराव ने कहा…

अगर मुझे पहुँचने में देर हो गई तो इतिहास लिखेगा कि एक क्षत्रिय_राजपूत ने मदद माँगी और ब्राह्मण भोजन करता रहा”-

ऐसा कहते हुए भोजन की थाली छोड़कर बाजीराव अपनी सेना के साथ राजा छत्रसाल की मदद को बिजली की गति से दौड़ पड़े। दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पाँच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके आते ही

ब्राह्मण योद्धा बाजीराव बुंदेलखंड आया और फंगस खान की गर्दन काट कर जब राजपूत राजा छत्रसाल के सामने गए तो छत्रसाल से बाजीराव बलाड़ को गले लगाते हुए कहा:-

जगउपजेदोब्राह्मणपरशुओरबाजीराव।

एकडाहिराजपुतियाएकडाहि_तुरकाव।

धरती पर 2 ही ब्राह्मण आये है एक परशुराम जिसने अहंकारी क्षत्रियों का मर्दन किया और दूसरा बाजीराव_बलाड़ जिसने म्लेच्छ लुटेरे मुगलो का सर्वनाश किया है।

अपराजेय_योद्धा

पेशवाबाजीरावकेजंयतीपरशतशत_नमन।

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शिवाजी को वीर शिवाजी बनाने वाली माँ #जीजाबाई का आज जन्मदिवस है ! नमन वंदन ऐसी मातृशक्ति को…!!

NCRTE की कक्षा 1 से 5 तक कि किस किताब में जीजाबाई का जीवन चरित्र पढ़ाया जाता है ओर यदि पढ़ाया भी जाता है तो मात्र इतना कि शिवजी की माँ जीजा बाई थी 12 जनवरी/जन्म-दिवस शिवाजी की निर्माता माँ जीजाबाई !!

यों तो हर माँ अपनी सन्तान की निर्माता होती है; पर माँ जीजा ने अपने पुत्र शिवाजी के केवल शरीर का ही निर्माण नहीं किया, अपितु उनके मन और बुद्धि को भी इस प्रकार गढ़ा कि वे आगे चलकर भारत में मुगल शासन की चूलें हिलाकर हिन्दू साम्राज्य की स्थापना में सफल हुए।

जीजा का जन्म महाराष्ट्र के सिन्दखेड़ ग्राम में 12 जनवरी, 1602 (पौष शुक्ल पूर्णिमा) को हुआ था। उनके पिता लखूजी जाधव अन्य मराठा सरदारों की तरह निजामशाही की सेवा करते थे। इन सरदारों को निजाम से जमींदारी तथा उपाधियाँ प्राप्त थीं; पर ये सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। इनमें परस्पर युद्ध भी होते रहते थे।

एक बार रंगपंचमी पर लखूजी के घर में उत्सव मनाया जा रहा था। अनेक सरदार वहाँ सपरिवार आये थे। लखूजी की पुत्री जीजा तथा उनके अधीन कार्यरत शिलेदार मालोजी के पुत्र शहाजी आपस में खूब खेल रहे थे। लखूजी ने कहा – वाह, इनकी जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है। मालोजी ने लखूजी से कहा, इसका अर्थ है कि हम आपस में समधी हो गये।

इस पर लखूजी बिगड़ गये। उन्होंने कहा कि मैंने तो यह मजाक में कहा था। मेरे जैसे सरदार की बेटी तुम्हारे जैसे सामान्य शिलेदार की बहू कैसे बन सकती है ?
इस पर मालोजी नाराज हो गये। उन्होंने कहा, अब मैं यहाँ तभी आऊँगा, जब मेरा स्तर भी तुम जैसा हो जाएगा। मालोजी ने लखूजी की नौकरी भी छोड़ दी।

अब वे अपने गाँव आ गये; पर उनका मन सदा उद्विग्न रहता था। एक रात उनकी कुलदेवी जगदम्बा ने स्वप्न में उन्हें आशीर्वाद दिया। अगले दिन जब वे अपने खेत में खुदाई कर रहे थे, तो उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से भरे सात कलश मिले। इससे उन्होंने 2,000 घोड़े खरीदे और 1,000 सैनिक रख लिये। उन्होंने ग्रामवासियों तथा यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक मन्दिर, धर्मशाला तथा कुएँ बनवाये। इससे उनकी ख्याति सब ओर फैल गयी।

यह देखकर निजाम ने उन्हें ‘मनसबदार’ का पद देकर शिवनेरी किला तथा निकटवर्ती क्षेत्र दे दिया।

अब वे मालोजी राव भोंसले कहलाने लगे। उधर लखूजी की पत्नी अपने पति पर दबाव डाल रही थी कि जीजा का विवाह मालोजी के पुत्र शहाजी से कर दिया जाये। लखूजी ने बड़ी अनिच्छा से यह सम्बन्ध स्वीकार किया। कुछ समय बाद मालोजी का देहान्त हो गया और उनके बदले शहाजी निजाम के अधीन सरदार बनकर काम करने लगे।

जीजाबाई के मन में यह पीड़ा थी कि उसके पिता और पति दोनों मुसलमानों की सेवा कर रहे हैं; पर परिस्थिति ऐसी थी कि वह कुछ नहीं कर सकती थी।
जब वह गर्भवती हुई, तो उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने पुत्र को ऐसे संस्कार देंगी, जिससे वह इस परिस्थिति को बदल सके।

शहाजी प्रायः युद्ध में व्यस्त रहते थे, इसलिए उन्होंने जीजाबाई को शिवनेरी दुर्ग में पहुँचा दिया।
वहाँ उन्होंने रामायण और महाभारत के युद्धों की कथाएँ सुनीं। इससे गर्भस्थ बालक पर वीरता के संस्कार पड़े।

19 फरवरी, 1630 को शिवाजी का जन्म हुआ। आगे चलकर छत्रपति शिवाजी ने मुगल राजशाही को परास्त कर 6 जून, 1674 को भारत में हिन्दू पद पादशाही की स्थापना की।
जीजाबाई मानो इसी दिन के लिए जीवित थीं। शिवाजी को सिंहासन पर विराजमान देखने के बारहवें दिन 17 जून, 1674 (ज्येष्ठ कृष्ण 9) को उन्होंने आँखें मूँद लीं।

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हरदिनपावन

“12 जनवरी/जन्म-दिवस”
शिवाजी की निर्माता माँ जीजाबाई

यों तो हर माँ अपनी सन्तान की निर्माता होती है; पर माँ जीजा ने अपने पुत्र शिवाजी के केवल शरीर का ही निर्माण नहीं किया, अपितु उनके मन और बुद्धि को भी इस प्रकार गढ़ा कि वे आगे चलकर भारत में मुगल शासन की चूलें हिलाकर हिन्दू साम्राज्य की स्थापना में सफल हुए।

जीजा का जन्म महाराष्ट्र के सिन्दखेड़ ग्राम में 12 जनवरी, 1602 (पौष शुक्ल पूर्णिमा) को हुआ था। उनके पिता लखूजी जाधव अन्य मराठा सरदारों की तरह निजामशाही की सेवा करते थे। इन सरदारों को निजाम से जमींदारी तथा उपाधियाँ प्राप्त थीं; पर ये सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। इनमें परस्पर युद्ध भी होते रहते थे।

एक बार रंगपंचमी पर लखूजी के घर में उत्सव मनाया जा रहा था। अनेक सरदार वहाँ सपरिवार आये थे। लखूजी की पुत्री जीजा तथा उनके अधीन कार्यरत शिलेदार मालोजी के पुत्र शहाजी आपस में खूब खेल रहे थे। लखूजी ने कहा – वाह, इनकी जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है। मालोजी ने लखूजी से कहा, इसका अर्थ है कि हम आपस में समधी हो गये।

इस पर लखूजी बिगड़ गये। उन्होंने कहा कि मैंने तो यह मजाक में कहा था। मेरे जैसे सरदार की बेटी तुम्हारे जैसे सामान्य शिलेदार की बहू कैसे बन सकती है ? इस पर मालोजी नाराज हो गये। उन्होंने कहा, अब मैं यहाँ तभी आऊँगा, जब मेरा स्तर भी तुम जैसा हो जाएगा। मालोजी ने लखूजी की नौकरी भी छोड़ दी।

अब वे अपने गाँव आ गये; पर उनका मन सदा उद्विग्न रहता था। एक रात उनकी कुलदेवी जगदम्बा ने स्वप्न में उन्हें आशीर्वाद दिया। अगले दिन जब वे अपने खेत में खुदाई कर रहे थे, तो उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से भरे सात कलश मिले। इससे उन्होंने 2,000 घोड़े खरीदे और 1,000 सैनिक रख लिये। उन्होंने ग्रामवासियों तथा यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक मन्दिर, धर्मशाला तथा कुएँ बनवाये। इससे उनकी ख्याति सब ओर फैल गयी।

यह देखकर निजाम ने उन्हें ‘मनसबदार’ का पद देकर शिवनेरी किला तथा निकटवर्ती क्षेत्र दे दिया। अब वे मालोजी राव भोंसले कहलाने लगे। उधर लखूजी की पत्नी अपने पति पर दबाव डाल रही थी कि जीजा का विवाह मालोजी के पुत्र शहाजी से कर दिया जाये। लखूजी ने बड़ी अनिच्छा से यह सम्बन्ध स्वीकार किया। कुछ समय बाद मालोजी का देहान्त हो गया और उनके बदले शहाजी निजाम के अधीन सरदार बनकर काम करने लगे।

जीजाबाई के मन में यह पीड़ा थी कि उसके पिता और पति दोनों मुसलमानों की सेवा कर रहे हैं; पर परिस्थिति ऐसी थी कि वह कुछ नहीं कर सकती थी। जब वह गर्भवती हुई, तो उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने पुत्र को ऐसे संस्कार देंगी, जिससे वह इस परिस्थिति को बदल सके।

शहाजी प्रायः युद्ध में व्यस्त रहते थे, इसलिए उन्होंने जीजाबाई को शिवनेरी दुर्ग में पहुँचा दिया। वहाँ उन्होंने रामायण और महाभारत के युद्धों की कथाएँ सुनीं। इससे गर्भस्थ बालक पर वीरता के संस्कार पड़े।

19 फरवरी, 1630 को शिवाजी का जन्म हुआ। आगे चलकर छत्रपति शिवाजी ने मुगल राजशाही को परास्त कर 6 जून, 1674 को भारत में हिन्दू पद पादशाही की स्थापना की। जीजाबाई मानो इसी दिन के लिए जीवित थीं। शिवाजी को सिंहासन पर विराजमान देखने के बारहवें दिन 17 जून, 1674 (ज्येष्ठ कृष्ण 9) को उन्होंने आँखें मूँद लीं।
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क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ..

इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं.
इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है.

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..
महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे.

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है.

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे.

कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।
युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया.उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया.
दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है। आप भी इस प्रयास में जुड़े 🙏

संकलन *वेदिका*

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लष्मीकांत विजयघढिया

अप्रतिम मराठा योद्धा को अविस्मरणीय श्रद्धांजलि है तान्हा जी…
औरंगज़ेब के मनसबदार के 5000 की फौज पर अपने 385 सैनिकों के साथ काल बनकर टूट पड़े और इतिहास प्रसिद्ध कोंढाना दुर्ग पर विजय प्राप्ति का अविश्वसनीय इतिहास रचने वाले अप्रतिम मराठा योद्धा तान्हा जी के शौर्य साहस पराक्रम और बलिदान को अविस्मरणीय श्रद्धांजलि है उनपर बनी फिल्म तान्हा जी। आधुनिक तकनीक के माध्यम से उस ऐतिहासिक युद्ध को जिस कुशलता के साथ तथा औरंगजेब के अत्याचारी साम्प्रदायिक शासन में हिन्दूओं के राक्षसी उत्पीड़न को जिस बेबाकी के साथ सिनेमा के पर्दे पर जीवंत किया गया है उसके लिए अजय देवगन को कोटि कोटि साधुवाद। आज के दौर में जिस भगवे को अपमानजनक सम्बोधन का पर्याय बना देने के पतित प्रयासों की बाढ़ सी आई हुई है उस भगवे की महानता और महत्व को जिस जिस गौरवपूर्ण शैली में फ़िल्म में जीवंत किया गया है वह शैली अभिनंदनीय है। प्रत्येक भारतीय, विशेषकर नई पीढ़ी के देखने योग्य है यह फ़िल्म।

सारागढ़ी युद्ध पर बनी फ़िल्म “केसरी” के 10 माह पश्चात आई ‘तान्हा जी” दूसरी ऐसी फिल्म है जो उन महावीरों के प्रचण्ड पराक्रम और शौर्य की उस यशगाथा को मुक्तकंठ से सुनाती है, जिन यशगाथाओं पर स्वतन्त्र भारत में सिर्फ इसलिए पर्दा डालकर रखा गया ताकि आज़ाद भारत की पीढ़ियों को यह अफीम चटाने में आसानी हो कि मुगल शासक बहुत “सेक्युलर” न्यायप्रिय और महावीर थे। इसीलिए उन्होंने 5-7 सौ साल हम पर शासन किया। भारतीयों को यह अफीम इसतरह चटाई जाती रही है कि उनमें स्थायी रूप से यह हीन ग्रन्थि घर बना ले कि भारतीय समाज, विशेषकर हिन्दू, अत्यन्त शौर्यहीन साहसहीन पराक्रमहीन समाज रहा है। ऐसा इसलिए किया गया ताकि भारतीयों को बहुत सहजता से यह भांग पिलाई जा सके कि हमें हमारी आज़ादी अहिंसा के सहारे “बिना खड्ग बिना ढाल” मिली है। उस अहिंसा का डिस्ट्रीब्यूटर/ठेकेदार एक परिवार को बना दिया गया।
जबकि तान्हा जी, हरिसिंह नलवा, हवलदार ईशर सिंह, असम के अहोम सेनापति लचित बोरफूकन सरीखे उन भारतीय योद्धाओं की सूची बहुत समृद्ध है जिन्होंने मुगलों विशेषकर सबसे बहादुर और युद्धकुशल मुगल शासक कहे जाने वाले औरंगज़ेब के दांत अपनी तलवारों से बुरी तरह खट्टे किये थे। लेकिन 70 वर्षों में इनपर कभी कोई फ़िल्म क्यों नहीं बनी.? यह सवाल बहुत कुछ कह देता है, क्योंकि उन्हीं 70 वर्षों के दौरान डकैत फूलन देवी, पुतलीबाई, सुल्ताना डाकू सरीखे अपराधी असामाजिक तत्वों का महिमामण्डन करती अनेकानेक फिल्में बनी।
उम्मीद की जानी चाहिए कि पहले केसरी और अब तान्हा जी के साथ ही भारतीय संस्कृति समाज इतिहास के उन गुमनाम शूरवीर महानायकों की यशगाथाओं का गान करती अन्य अनेक फिल्में हमें निकट भविष्य में देखने को मिलेंगी।