Posted in भारतीय शिक्षा पद्धति

मोहनलाल जैन

The Ancient Universities of India

प्राचीन भारत के 13 विश्वविद्यालय, जहां पढ़ने आते थे दुनियाभर के छात्र।

वैदिक काल से ही भारत में शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। इसलिए उस काल से ही गुरुकुल और आश्रमों के रूप में शिक्षा केंद्र खोले जाने लगे थे। वैदिक काल के बाद जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया। भारत की शिक्षा पद्धति भी और ज्यादा पल्लवित होती गई। गुरुकुल और आश्रमों से शुरू हुआ शिक्षा का सफर उन्नति करते हुए विश्वविद्यालयों में तब्दील होता गया। पूरे भारत में प्राचीन काल में 13 बड़े विश्वविद्यालयों या शिक्षण केंद्रों की स्थापना हुई।

8 वी शताब्दी से 12 वी शताब्दी के बीच भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केंद्र था।गणित, ज्योतिष, भूगोल, चिकित्सा विज्ञान के साथ ही अन्य विषयों की शिक्षा देने में भारतीय विश्वविद्यालयों का कोई सानी नहीं था।

हालांकि आजकल अधिकतर लोग सिर्फ दो ही प्राचीन विश्वविद्यालयों के बारे में जानते हैं पहला नालंदा और दूसरी तक्षशिला। ये दोनों ही विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध थे। इसलिए आज भी सामान्यत: लोग इन्हीं के बारे में जानते हैं, लेकिन इनके अलावा भी ग्यारह ऐसे विश्वविद्यालय थे जो उस समय शिक्षा के मंदिर थे। आइए आज जानते हैं प्राचीन विश्वविद्यालयों और उनसे जुड़ी कुछ खास बातों को..

  1. नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda university)
    यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। यह विश्वविद्यालय वर्तमान बिहार के पटना शहर से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर में स्थित था। इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज करा देते हैं।

सातवीं शताब्दी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी मिलती है। यहां 10,000 छात्रों को पढ़ाने के लिए 2,000 शिक्षक थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम 450-470 को प्राप्त है। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवद्र्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी यहां शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

इस विश्वविद्यालय की नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी। सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था। जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियां स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे।

इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक आदि रखने के लिए खास जगह बनी हुई है। हर मठ के आंगन में एक कुआं बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष और अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे व झीलें भी थी। नालंदा में सैकड़ों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था। जिसमें लाखों पुस्तकें थी।

  1. तक्षशिला विश्वविद्यालय (Takshashila university)

तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 2700 साल पहले की गई थी। इस विश्विद्यालय में लगभग 10500 विद्यार्थी पढ़ाई करते थे। इनमें से कई विद्यार्थी अलग-अलग देशों से ताल्लुुक रखते थे। वहां का अनुशासन बहुत कठोर था। राजाओं के लड़के भी यदि कोई गलती करते तो पीटे जा सकते थे। तक्षशिला राजनीति और शस्त्रविद्या की शिक्षा का विश्वस्तरीय केंद्र थी। वहां के एक शस्त्रविद्यालय में विभिन्न राज्यों के 103 राजकुमार पढ़ते थे।

आयुर्वेद और विधिशास्त्र के इसमे विशेष विद्यालय थे। कोसलराज प्रसेनजित, मल्ल सरदार बंधुल, लिच्छवि महालि, शल्यक जीवक और लुटेरे अंगुलिमाल के अलावा चाणक्य और पाणिनि जैसे लोग इसी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी थे। कुछ इतिहासकारों ने बताया है कि तक्षशिला विश्विद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय की तरह भव्य नहीं था। इसमें अलग-अलग छोटे-छोटे गुरुकुल होते थे। इन गुरुकुलों में व्यक्तिगत रूप से विभिन्न विषयों के आचार्य विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे।

  1. विक्रमशीला विश्वविद्यालय (Vikramshila University)
    विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्म पाल ने की थी। 8 वी शताब्दी से 12 वी शताब्दी के अंंत तक यह विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में से एक था। भारत के वर्तमान नक्शे के अनुसार यह विश्वविद्यालय बिहार के भागलपुर शहर के आसपास रहा होगा।

कहा जाता है कि यह उस समय नालंदा विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी था। यहां 1000 विद्यार्थीयों पर लगभग 100 शिक्षक थे। यह विश्वविद्यालय तंत्र शास्त्र की पढ़ाई के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता था। इस विषय का सबसे मशहूर विद्यार्थी अतीसा दीपनकरा था, जो की बाद में तिब्बत जाकर बौद्ध हो गया।

  1. वल्लभी विश्वविद्यालय (Vallabhi university)
    वल्लभी विश्वविद्यालय सौराष्ट्र (गुजरात) में स्थित था। छटी शताब्दी से लेकर 12 वी शताब्दी तक लगभग 600 साल इसकी प्रसिद्धि चरम पर थी। चायनीज यात्री ईत- सिंग ने लिखा है कि यह विश्वविद्यालय 7 वी शताब्दी में गुनामति और स्थिरमति नाम की विद्याओं का सबसे मुख्य केंद्र था। यह विश्वविद्यालय धर्म निरपेक्ष विषयों की शिक्षा के लिए भी जाना जाता था। यही कारण था कि इस शिक्षा केंद्र पर पढ़ने के लिए पूरी दुनिया से विद्यार्थी आते थे।
  2. उदांत पुरी विश्वविद्यालय (Odantapuri university)
    उदांतपुरी विश्वविद्यालय मगध यानी वर्तमान बिहार में स्थापित किया गया था। इसकी स्थापना पाल वंश के राजाओं ने की थी। आठवी शताब्दी के अंत से 12 वी शताब्दी तक लगभग 400 सालों तक इसका विकास चरम पर था। इस विश्वविद्यालय में लगभग 12000 विद्यार्थी थे।
  3. सोमपुरा विश्वविद्यालय (Somapura mahavihara)

सोमपुरा विश्वविद्यालय की स्थापना भी पाल वंश के राजाओं ने की थी। इसे सोमपुरा महाविहार के नाम से पुकारा जाता था। आठवीं शताब्दी से 12 वी शताब्दी के बीच 400 साल तक यह विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध था। यह भव्य विश्वविद्यालय लगभग 27 एकड़ में फैला था। उस समय पूरे
विश्व में बौद्ध धर्म की शिक्षा देने वाला सबसे अच्छा शिक्षा केंद्र था।

  1. पुष्पगिरी विश्वविद्यालय (Pushpagiri university)
    पुष्पगिरी विश्वविद्यालय वर्तमान भारत के उड़ीसा में स्थित था। इसकी स्थापना तीसरी शताब्दी में कलिंग राजाओं ने की थी। अगले 800 साल तक यानी 11 वी शताब्दी तक इस विश्वविद्यालय का विकास अपने चरम पर था। इस विश्वविद्यालय का परिसर तीन पहाड़ों ललित गिरी, रत्न गिरी और उदयगिरी पर फैला हुआ था।

नालंदा, तशक्षिला और विक्रमशीला के बाद ये विश्वविद्यालय शिक्षा का सबसे प्रमुख केंद्र था। चायनीज यात्री एक्ज्युन जेंग ने इसे बौद्ध शिक्षा का सबसे प्राचीन केंद्र माना। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस विश्ववविद्यालय की स्थापना राजा अशोक ने करवाई थी।

अन्य विश्वविद्यालय (Other Universities)
प्राचीन भारत में इन विश्वविद्यालयों के अलावा जितने भी अन्य विश्वविद्यालय थे। उनकी शिक्षा प्रणाली भी इन्हीं विश्वविद्यालयों से प्रभावित थी। इतिहास में मिले वर्णन के अनुसार शिक्षा और शिक्षा केंद्रों की स्थापना को सबसे ज्यादा बढ़ावा पाल वंश के शासको ने दिया।

  1. जगददला, पश्चिम बंगाल में (पाल राजाओं के समय से भारत में अरबों के आने तक
  2. नागार्जुनकोंडा, आंध्र प्रदेश में।
  3. वाराणसी उत्तर प्रदेश में (आठवीं सदी से आधुनिक काल तक)
  4. कांचीपुरम, तमिलनाडु में
  5. मणिखेत, कर्नाटक
  6. शारदा पीठ, कश्मीर मे।
    साभार , वैदिक साइंस
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पंडित मनीष तिवारी

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय विवाद —


यों तो मैं उन विवादित विषयों से एकदम दूरी बना कर रखता हूँ, जिनपर स्वयं हिन्दू समाज ही एकमत न हो। किंतु अब लगता है कि ये भ्रांतिपूर्ण विवाद अपना विराट स्वरूप धारण कर रहा है। अतएव अब मौन का मार्ग दुर्गम होगा।

अव्वल तो ये प्रश्न ही भ्रामक है कि क्या एक मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकता? इसपर मैं कहूँगा कि अवश्य पढ़ा सकता है। किंतु आप इस विवाद का आखेट वहाँ कर रहे हैं, जहाँ ये है ही नहीं।

विवाद एक मुस्लिम द्वारा संस्कृत पढ़ाने को लेकर नहीं, बल्कि वेदाङ्गों में से एक “छंदशास्त्र” को पढ़ाने का है। सो, प्रश्न का आधारभूत ढाँचा बदल लीजिए।

वस्तुतः अब प्रश्न ये है : “वैदिक विषय “छंदशास्त्र” का प्रवक्ता कोई मुस्लिम क्यों नहीं हो सकता?”

इस प्रश्न का उत्तर, प्रश्न की ही भाषा में निहित है। निषिद्धि को “मुस्लिम” शब्द के साथ इंगित कर दिया गया है और इस्लामिक दर्शन के मुताबिक़ ये बात जमे जमाए तर्कों को पूर्णरूपेण श्रांति प्रदान करती है।

“छंदशास्त्र” यानी कि वैदिक ऋचाओं की गेयता को सुनिश्चित करने वाला शास्त्र। इस शास्त्र को वेद-पुरुष का चरण कहा गया है। इस वेदाङ्ग की सहायता से वेद-पुरुष पीढ़ियों दर पीढ़ियों विचरण करता है।

क्या हो, जो काशी विवि से वेदाङ्ग में स्नातक होकर आए विद्यार्थी को ये ज्ञात न हो कि निरुक्त के पञ्चम अध्याय के आरंभिक मन्त्रों-अर्धमन्त्रों में कौनसा छंद है?

यदि वो विद्यार्थी इसपर अनभिज्ञता प्रकट कर दे, तो जानिए कि महामना का स्वप्न खण्डित हो गया! और यदि मुस्लिम प्रवक्ता द्वारा ये अध्याय पढ़ाया गया तो निश्चित तौर पर ये ही होने जा रहा है।

उक्त मन्त्रों का आरम्भ कुछ कुछ इस तरह होता है :
१) वराहो मेघो भवति वराहार:।
२) अयाम्पीतरो वराह एतस्मादेव।
३) वराहमिन्द्र एमुषम्।

वैदिक विषयों की साथ प्रकट हो जाने वाली इस्लामिक ग्रंथि यही है कि वे “आदिवराह” का वर्णन किस प्रकार करेंगे। वे किस प्रकार एक “वराह” को प्रेज़ करेंगे, जबकि उन्हें तो बालपन से ही वराह-घृणा की घुट्टी पिलाई गई है।

इस और इस तरह के अगण्य परिदृश्यों का मूल कारण उनकी अपनी थियोलॉजी है, इस्लामिक थियोलॉजी!

इस्लामिक थियोलॉजी ने विश्व इतिहास को दो भागों में विभाजित किया है : “जाहिलिया” व “इल्म”। इन्हें क्रमशः “एज ऑफ़ इग्नोरेंस” व “एज ऑफ़ एनलाइटनमेंट” भी कहा जाता है।

(“जाहिलिया” शब्द से ही “जाहिल” शब्द का निर्माण हुआ है। इस पूरे शब्द-परिवार का अर्थ “अंधेरे” से है।)

इस्लामिक थियोलॉजी इस शब्द की सहायता से, मुहम्मद साहब के आगमन से पूर्व के विश्व को परिभाषित करते हुए कहती है कि जब तक हुज़ूर और हुज़ूर का संकलित विचार समुच्चय “क़ुरआन” इस विश्व में न था, समूचा विश्व “यौमे-जाहिलिया” था, यानी कि जाहिलों की संतति।

“हुज़ूर आए, कुरआन और इल्म लाए” — ऐसी धार्मिक विचारधारा को मानने वालों की व्यक्तिगत ज़िंदगी से हमें कोई लेना देना नहीं, वे अवश्य ताक़यामत अपनी धार्मिक अवधारणाओं को क़ायम रक्खें।

किंतु कोई अब ये बताए कि जो आदमी हुज़ूर के आगमन से पहले की हर चीज़ को “जाहिलिया” मानने वाले माहौल की परवरिश पाया हो, यानी उसके लिए सही और ग़लत की लकीर ही चौदह सौ साल पहले खिंचती हो, उसके लिए ये मान पाना और फिर अपने विद्यार्थियों को बता पाना कितना दुर्लभ होगा कि ऋग्वेद की इस ऋचा का कालखण्ड पाँच हज़ार वर्ष पूर्व है।

जबकि कुछ ऋचाएँ तो नौ हज़ार, दस हज़ार और बारह हज़ार से होते हुए पचास हज़ार वर्ष पहले तक जाती हैं! ऐसे में, एक मुस्लिम छंदशास्त्री बिना किसी “जाहिलिया” दुर्भावना के कैसे पढ़ा सकेगा?

सातवीं सदी के मध्य में, हजरत उमर ने चार हज़ार सैनिकों के साथ मिस्र पर आक्रमण किया था। उन्होंने मिस्र को जीतकर सबसे पहला काम जानते हैं क्या किया? मिस्र के समृद्ध पुस्तकालय को जला कर भस्म कर दिया था।

जब वे अग्निकाण्ड का आदेश दे रहे थे, तब उन्होंने अपने सिपाहसालार से कहा था :

“इस पूरे जखीरे में से एक भी किताब सहेजने के काबिल नहीं। ये सब “जाहिलिया” युग की हैं। अल्लाह ने क़ुरआन में कुछ भी नहीं रख छोड़ा है। अगर इसमें ऐसा कोई ज्ञान है, जो क़ुरआन में नहीं भी है, तो भी वो बेकार है। चूँकि अल्लाह ने उसे क़ुरआन में नहीं शामिल किया!”

— ऐसी विचारधारा तले पले-बढ़े एक युवा प्रवक्ता से वैदिक “छंदशास्त्र” का ठीक ठीक सम्मान करना भी न हो सकेगा, उसे पढ़ना तो बहुत दूर की बात है। वो कभी दिल से स्वीकार ही न कर सकेगा कि ये “छंदशास्त्र” पढ़ाए जाने योग्य है।

और फिर शुरू होगा उसका नेक्स्ट स्टेप : अल-तकिया!

यानी कि धीरे-धीरे विद्यार्थियों का ब्रेनवॉश। अब विद्यार्थी वैदिक विषयों में मुहम्मद साहब को खोजेंगे। बावजूद इसके कि क़ुरआन में भविष्य का आंकलन करने की कतई मनाही है। स्पष्ट लिखा है कि केवल और केवल अल्लाह ही भविष्यवाणी कर सकते हैं।

अल्लाह द्वारा साफ़ मनाही के बाद भी मुस्लिम विद्वान् क्यों वेदों में मुहम्मद साहब को खोजते रहते हैं। इस बात को मैं कभी फुरसत से समझना चाहूँगा।

फ़िलहाल, मुस्लिम प्रवक्ता के नियुक्ति विवाद पर ही बात हो!

ऐसा इस भारतभूमि में प्रथम बार नहीं हुआ है कि किसी विश्वविद्यालय में धार्मिक आधार पर आचार्य चुनने की परंपरा हो। ठीक ऐसी ही परंपरा, प्राच्यकाल में भी थी!

ऐसे ढेरों उदाहरण मौजूद हैं, जब आचार्यों की नियुक्ति में धर्म ने बाधा डाल दी हो। किन्तु यहां दो प्रसिद्व उदाहरण पर्याप्त होंगे। पहले आचार्य अश्वघोष और दूजे आचार्य कुमारिल भट्ट।

अश्वघोष और कुमारिल, दोनों ही सनातनी हिंदू जन्मे थे। दोनों प्रकांड विद्वान थे। दोनों बौद्धों के हाथों शास्त्रार्थ में पराजित हुए और दोनों बौद्धधर्म में दीक्षित हुए।

किन्तु बौद्धधर्म में ख्यातिप्राप्त विद्वान् हो जाने के पश्चात् भी उन्हें बौद्ध-भिक्षुओं को पढ़ाने का अधिकार नहीं मिला था! (हाँ, अश्वघोष का लिखा साहित्य अवश्य बौद्धों में लोकप्रिय है।)

यानी कि इतिहास ये कहता है, यदि प्रोफ़ेसर साहब फ़िरोज़ खान किसी हिन्दू विद्वान् से पराजित होकर हिन्दूधर्म ग्रहण भी कर लें, तब भी वे धर्माचार्य बनने की योग्यता न पा सकेंगे।

हालाँकि, यदि फ़िरोज़ साहब परधर्म में प्रवृत्त होने की अश्वघोष जितनी क्षमता रखते होंगे तो उन्हें अवश्य संस्कृत के कला व साहित्य विभाग में पढ़ाने का अवसर मिलेगा।

किन्तु धर्म के संकाय में वे केवल विद्यार्थियों की पङ्क्ति में बैठ सकते हैं! इससे अधिक उन्हें एक भाषा कुछ भी नहीं दे सकती। इससे आगे की व्याप्तियों पर धर्म अपना अधिकार कर लेता है।

और समग्र हिन्दू समाज यही चाहता है कि धर्म के अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण न किया जावै!

इति।

✍️साभार संकलन् ©®

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मोहनलाल जैन

नेहरु के शिक्षा मंत्री – मौलाना अबुल कलाम आज़ाद…!

बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि मौलाना अबुल कलाम किसी विश्वविद्यालय की देन नहीं अपितु एक मदरसे की देन थे…

उनकी बड़ी उपलब्धि कोई शैक्षिक डिग्री नहीं अपितु नेहरू के संग नजदीकियां थी…
इसीलिए जिस कुर्सी पर किसी वैदिक विद्वान को देश का पाठयक्रम निर्धारित करने के लिए बैठाना था उस पर एक मदरसे के मौलवी को बैठाया गया…

यह भारतीय शिक्षा के विकृतीकरण को नेहरू की एक मुख्य देन है…
आइए इस पर विचार करें…

११ नवम्बर १८८८ को पैदा हुए मक्का में, वालिद का नाम “मोहम्मद खैरुद्दीन” और अम्मी मदीना (अरब) की थीं,नाना शेख मोहम्मद ज़ैर वत्री,मदीना के बहुत बड़े विद्वान थे
मौलाना आज़ाद अफग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे ये सज्जन जब दो साल के थे तो इनके वालिद कलकत्ता आ गए सब कुछ घर में पढ़ा और कभी स्कूल कॉलेज नहीं गए बहुत ज़हीन मुसलमान थे

इतने ज़हीन कि इन्हे मृत्युपर्यन्त “भारत रत्न” से भी नवाज़ा गया इतने काबिल कि कभी स्कूल कॉलेज का मुंह नहीं देखा और बना दिए गए भारत के पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री…
इस शख्स का नाम था “मौलाना अबुल कलम आज़ाद” इन्होने इस बात का ध्यान रखा कि विद्यालय हो या विश्वविद्यालय कहीं भी इस्लामिक अत्याचार को ना पढ़ाया जाए, इन्होने भारत के इतिहास को ही नहीं अन्य पुस्तकों को भी इस तरह लिखवाया कि उनमे भारत के गौरवशाली अतीत की कोई बात ना आए

आज भी इतिहास का विद्यार्थी भारत के अतीत को गलत ढंग से समझता है…
हमारे विश्वविद्यालयों में – गुरु तेग बहादुर,गुरु गोबिंद सिंह,बन्दा बैरागी,हरी सिंह नलवा,राजा सुहेल देव पासी,दुर्गा दास राठौर के बारे में कुछ नहीं बताया जाता…!

आज की तारीख में इतिहास हैं…
हिन्दू सदैव असहिष्णु थे,मुस्लिम इतिहास की साम्प्रदायिकता को सहानुभूति की नज़र से देखा जाये
भारतीय संस्कृति की रीढ़ की हड्डी तोड़ने तथा लम्बे समय तक भारत पर राज करने के लिए १८३५ में ब्रिटिश संसद में भारतीय शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त करने के लिए मैकाले ने क्या रणनीति सुझायी थी तथा उसी के तहत Indian Education Act-१८५८ लागु कर दिया गया…

अंग्रेज़ों ने “Aryan Invasion Theory” द्वारा भारतीय इतिहास को इसलिए इतना तोडा मरोड़ा कि भारतियों कि नज़र में उनकी संस्कृति निकृष्ट नज़र आये और आने वाली पीढ़ियां यही समझें कि अँगरेज़ बहुत उत्कृष्ट प्रशासक थे
आज जो पढाया जा रहा है उसका सार है –

हिन्दू आर्यों की संतान हैं और वे भारत के रहने वाले नहीं हैं वे कहीं बाहर से आये हैं और यहाँ के आदिवासियों को मार मार कर तथा उनको जंगलों में भगाकर उनके नगरों और सुन्दर हरे-भरे मैदानों में स्वयं रहते हैं…!
हिन्दुओं के देवी देवता राम,कृष्ण आदि की बातें झूठे किस्से कहानियां हैं हिन्दू महामूर्ख और अनपढ़ हैं…!

हिन्दुओं का कोई इतिहास नहीं है और यह इतिहास अशोक के काल से आरम्भ होता है…!
हमारे पूर्वज जातिवादी थे मानवता तो उनमे थी ही नहीं…!
वेद,जो हिन्दुओं की सर्व मान्य पूज्य पुस्तकें हैं,गड़रियों के गीतों से भरी पड़ी हैं…!

हिन्दू सदा से दास रहे हैं कभी शकों के,कभी हूणों के,कभी कुषाणों के और कभी पठानों तुर्कों और मुगलों के…!
रामायण तथा महाभारत काल्पनिक किस्से कहानियां हैं…!

१५अगस्त १९४७,को आज़ादी मिली,क्या बदला…?
रंगमंच से सिर्फ अंग्रेज़ बदले बाकि सब तो वही चला अंग्रेज़ गए तो सत्ता उन्ही की मानसिकता को पोषित करने वाली कांग्रेस और नेहरू के हाथ में आ गयी नेहरू के कृत्यों पर तो किताबें लिखी जा चुकी हैं
पर सार यही है की वो धर्मनिरपेक्ष कम और मुस्लिम हितैषी ज्यादा था न मैकाले की शिक्षा नीति बदली और न ही शिक्षा प्रणाली शिक्षा प्रणाली जस की तस चल रही है

और इसका श्रेय स्वतंत्र भारत के प्रथम और दस वर्षों (१९४७-५८) तक रहे शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलम आज़ाद को दे ही देना चाहिए बाकि जो कसर बची थी वो नेहरू की बिटिया इन्दिरा गाँधी ने तो आपातकाल में विद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला इतिहास भी बदल कर पूरी कर दी
जिस आज़ादी के समय भारत की १८.७३% जनता साक्षर थी उस भारत के प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण “tryst With Destiny”अंग्रेजी में दिया था

आज का युवा भी यही मानता है कि यदि अंग्रेजी न होती तो भारत इतनी तरक्की नहीं कर पाता और हम यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि पता नहीं जर्मनी,जापान,चीन इजराइल ने अपनी मातृभाषाओं में इतनी तरक्की कैसे कर ली…?
आज तक हम इससे उबर नही सके हैं २०१८ में NCERT की वे किताबें हैं जो २००५ का संस्करण हैं-यह पढाया जा रहा है विद्यार्थियों को…ICSE एक सरकारी परीक्षा संस्थान है जो CBSE की तरह पूरे भारत में मान्य है. संयोग से इसकी २०१६ की इतिहास की पुस्तकें देखी…

नमूना देखें
कक्षा छह –
१.इतिहास की घटनाओं के समय का माप केवल ईसा के जन्म से पूर्व (BC बिफोर क्राईस्ट) या ईसा के बाद (AC आफ्टर क्राईस्ट) जैसे भारत का तो कोई समय था ही नहीं…?

२.सिंधु घाटी में एक महान सभ्यता अस्तित्व में थी,जिसे आक्रान्ता आर्यों ने तहस नहस कर दिया…?

३.आक्रमण के बाद आर्य भ्रमित थे कि वे अपने वेदों के साथ यहाँ बसें या यहाँ से चले जाएँ…?

४.उसके बाद सम्राट अशोक आते हैं हर जगह बौद्ध धर्म का उल्लेख उस समय तक मानो हिन्दू थे ही नहीं…?

५.गुप्तकाल…मानो समुद्रगुप्त पहला हिंदू शासक हो क्योंकि वह सहिष्णु था और वह भी अपवादस्वरुप…पल्लव,चोल,चेर या तो वैष्णव थे अथवा शैव,हिन्दू नहीं पूरी किताब में हिंदुओं का उल्लेख सिर्फ तीन बार…?

६.मुखपृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक छठवीं क्लास के आईसीएसई के इतिहास में हिन्दू कहीं मौजूद ही नहीं है कुछ है तो आर्यों द्वारा किया गया सभ्यताओं का सफाया
तथा बौद्धों पर जाति थोपने का उल्लेख इन ४० पृष्ठों में ५००० से अधिक वर्षों पुरानी धार्मिक सभ्यता का उल्लेख तक नहीं है पूरे ३०० वर्ष के राजवंशों का इतिहास एक पैरा में निबटा दिया गया…?

कक्षा ७ संक्षेप में…
कक्षा सात की इतिहास की पुस्तक में ईसामसीह का प्रचार है और वह केवल इसी के लिए ही लिखी गई है…
दुनिया भर में इस्लाम का खूनी विजय अभियान,अरबों द्वारा किया गया “एकीकरण” का प्रयास था,जिसने अनेक लेखक,विचारक और वैज्ञानिक दिए तुर्की के आक्रमण से पहले भारत क्या था,इसका उल्लेख केवल दो पृष्ठों में हैं

जबकि हर क्रूर मुग़ल बादशाह पर पूरा अध्याय है भारत पर अरब आक्रमण एक अच्छी बात थी,उन्होंने हमें सांस्कृतिक पहचान दी महमूद लुटने इसलिए आया क्योंकि उसे पैसे की जरूरत थी जिस कट्टरपंथी कुतबुद्दीन ऐबक ने २७ मंदिरों को नष्ट कर कुतुब मीनार बनबाई वह एक दयालु और उदार आदमी था…
बाबर ने अपने शासनकाल में धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति शुरू की औरंगजेब एक रूढ़िवादी और भगवान से डरने वाला मुस्लिम संत था जो अपने जीवन यापन के लिए टोपियां सिलता था वह अदूरदर्शी शासक अवश्य था…!

कक्षा ८ से दस तक संक्षेप में…
मराठा साम्राज्य अस्तित्व में आने के पूर्व ही समाप्त हो गया
यहाँ भी ईसाई उत्पीड़न घुसाने का प्रयास, बाइबल पढ़ने वाले गुलामों को निर्दयतापूर्वक दंडित किया जाता था सिखाया जाता है कि गोरों का राष्ट्रवाद एक अच्छी बात है,किन्तु जब भारतीय राष्ट्रवादी हों तो वे अतिवादी हैं

जाटों का उल्लेख महज सात लाइनों में,और राजपूतों का १२ में मिलता है पंजाब का उल्लेख सीधे गुरु गोबिंद सिंह से शुरू होता है
उम्मीद के मुताबिक़ हैदर अली और टीपू सुल्तान को बेहतर दिखाया गया है मैसूर किंगडम की शुरूआत हैदर अली से

मराठाओं को बस एक पेज में लपेट दिया, शिवाजी को महज एक पंक्ति में संभाजी कौन तो बस एक कमजोर उत्तराधिकारी…मराtha सिर्फ एक क्षेत्रीय शक्ति थे,जबकि मुगल और ब्रिटिश साम्राज्य थे मुगल साम्राज्य के पतन से अराजकता और अव्यवस्था फैली जिन महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य पंजाब, कश्मीर और पार तक था,उनका उल्लेख केवल चार लाइनों में हो गया…
कसाई टीपू को मैसूर का टाइगर बताया गया गया एक प्रबुद्ध शासक जो अपने समय से आगे का विचार करता था तो औरंगजेब एक संत था और कुतबुद्दीन ऐबक एक दयालु,उदार व्यक्ति और टीपू तो निश्चित रूप से धर्मनिरपेक्ष,उदार और सहिष्णु था ही मुरदान खान और खलील जैसे ठग देवी काली के उपासक थे जिन्होंने दो लाख से अधिक लोगों की हत्याएं कीं…

भारतीय समाज गड्ढे में पड़ा हुआ था इसलिए दमनकारी था १८४३ में अंग्रेजों ने यहाँ गुलामी को अवैध घोषित किया (है ना हैरत की बात उन्होंने भारत में गुलामी को अवैध घोषित किया अफ्रीका में नहीं)
भारतीय शिक्षा…?

मिशनरियों के आने के पूर्व केवल कुछ गिने चुने शिक्षक अपने घर में ही पढाया करते थे
जबकि सचाई यह है कि अकेले बिहार में ब्रिटेन से कहीं ज्यादा स्कूल और विश्वविद्यालय थे बिटिश ने अपनी स्वयं की शिक्षा प्रणाली भारत के अनुसार बनाई…

हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने वाली सुधारक केवल एनी बेसेंट थीं…
संयोग से एक सच्चाई जरूर सामने आ गई,वह यह कि ह्यूम ने कांग्रेस का गठन १८५७ जैसी घटनाएँ रोकने के लिए किया था,
और यह काम कांग्रेस ने बहुत अच्छी तरह से किया भी युवाओं ने अभिनव भारत जैसी गुप्त गतिविधियों का संचालन किया,जिन्होंने भारत के बाहर काम किया,यहाँ भी वीर सावरकर का उल्लेख नहीं क्रांतिकारी आंदोलन का उल्लेख केवल एक पेज से भी कम में किया गया है

क्योंकि असली नायकों(गांधी,नेहरू) को ज्यादा स्थान की जरूरत है…नेहरू – गांधी को स्वतंत्रता का पूरा श्रेय दिया गया है…!

गांधी-इरविन समझौते को इतना महत्व दिया गया है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का बलिदान पूरी तरह गौण हो गया है…

नेताजी और आजाद हिंद फौज का उल्लेख मात्र एक चौथाई पृष्ठ में मिलता है…!

तो यह है हमारी आज की इतिहास शिक्षा का कच्चा चिट्ठा…
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी सेना को एक चौथाई पेज,शिवाजी को एक लाइन,लेकिन चाचा जी का स्तवन भरपूर और हाँ क्रिकेट तो भूल ही गए इस औपनिवेशिक खेल को पूरे दो पृष्ठ,आखिर बोस,भगत सिंह और मराठा साम्राज्य की तुलना में यह अधिक महत्वपूर्ण जो हैं…!

मोदी जी धारा ३७०,ट्रिपल तलाक और राम मंदिर पर आपने प्रशंसनीय कार्य किया है…आपको नमन…!
कृपया देश के शिक्षा तंत्र में भी सर्जिकल स्ट्राइक कीजिये…!!!

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अरुण सुक्ला

भारत में 7 लाख 32 हज़ार गुरुकुल एवं विज्ञान की 20 से अधिक शाखाएं थीं
“गुरुकुल” के बारे में बहुत से लोगों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो की गलत है। भारत में विज्ञान की 20 से अधिक शाखाएं रही है जो की बहुत पुष्पित पल्लवित रही है जिसमें प्रमुख
1. खगोल शास्त्र
2. नक्षत्र शास्त्र
3. बर्फ़ बनाने का विज्ञान
4. धातु शास्त्र
5. रसायन शास्त्र
6. स्थापत्य शास्त्र
7. वनस्पति विज्ञान
8. नौका शास्त्र
9. यंत्र विज्ञान आदि इसके अतिरिक्त शौर्य (युद्ध) शिक्षा आदि कलाएँ भी प्रचुरता में रही है।
संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाए जाते थे।
18 शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी,
300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में 7 लाख 32 सहस्त्र गुरुकुल होने चाहिए।
अब रोचक बात यह भी है की अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसी के अनुसार 1822 में लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग 7 लाख 32 सहस्त्र थी,
अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल। 16 से 17 वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी 18 वी शताब्दी में यहीं लिखा की “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं”।
राजा की सहायता के अपितु, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण 18 शताब्दी तक भारत में साक्षरता 97% थी,
बालक के 5 वर्ष, 5 माह, 5 दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था।
प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विध्यार्जन का क्रम 14 वर्ष तक चलता था। जब बालक सभी वर्गों के बालको के साथ निशुल्कः 20 से अधिक विषयों का अध्यन कर गुरुकुल से निकलता था।
तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था
थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले)
जब भारत आया तो कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गया की अंग्रेजो, यवनों, मुगलों के द्वारा सम्पूर्ण भारत पर शासन करना क्यों सम्भव न हो सका
क्योकि इसकी जड इनकी संस्कृति,सभ्यता और शिक्षा व्यवस्था है यही से शूरवीर योधाओ और क्रांतिकारि बनते है
यदि हम इनकी संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश करे तो इन्हें पराधीन किया जा सकता है
इसी कारण “Indian (British) Education Act” बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। जो आज भी चल रहा है
आज के राजनेताओ में वो साहस ही नहीं है जो भारत को उसके पूर्व शिखर पर बिठा सके
आप सोच रहे होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी,
तो सामान्य बच्चों के लिए सार्वजानिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैण्ड में सन 1868 में हुई थी,
उसके बाद बाकी यूरोप अमेरिका में अर्थात जब भारत में प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल था, 97% साक्षरता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे?
होते थे परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी की शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए बाकी सब को तो सेवा करनी है।
“दुर्भाग्य है की भारत में हम अपने श्रेष्ठतम सृजनात्मक पुरुषों को भूल चुके है। इसका कारण विदेशियत का प्रभाव और अपने बारे में हीनता बोध की मानसिकता से देश के बुद्धिमान लोग ग्रस्त है”

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारतीय शिक्षा पद्धति

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

जिन मनुष्यों में न विद्या का निवास है, न मेहनत का भाव, न दान की इच्छा, और न ज्ञान का प्रभाव, न गुणों की अभिव्यक्ति और न धर्म पर चलने का संकल्प, वे मनुष्य नहीं, वे मनुष्य रूप में जानवर ही धरती पर विचरते हैं।

मित्रो हमारे जीवन मे शिक्षा का बड़ा महत्व है। शिक्षा मनुष्य के सम्यक् विकास के लिए उसके विभिन्न ज्ञान तंतुओ को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया है, इसके द्वारा लोगों में आत्मसात करने, ग्रहण करने, रचनात्मक कार्य करने, दूसरों की सहायता करने और राष्ट्र स्वाभिमान को बढ़ाने में सहयोग देने की भावना का विकास होता है, इसका उद्देश्य व्यक्ति को परिपक्व बनाना है।

नीति शास्त्र की उक्ति है ‘‘ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः” अर्थात् ज्ञान के बगैर मनुष्य पशु के तुल्य है, ज्ञान की प्राप्ति शिक्षा या विद्या से होती है, ऋषियों की दृष्टि में विद्या वही है जो हमें अज्ञान के बंधन से मुक्त कर दे “सा विद्या सा विमुक्तये” भगवान श्री कृष्ण ने गीता में “अध्यात्म विद्यानाम्” कहकर इसी सिद्धांत का समर्थन किया है।

शिक्षा की प्रक्रिया युग सापेक्ष होती है, युग की गति और उसके नए-नये परिवर्तनों के आधार पर प्रत्येक युग में शिक्षा की परिभाषा और उद्देश्य के साथ ही उसका स्वरूप भी बदल जाता है, यह मानव इतिहास की सच्चाई है, मानव के विकास के लिए खुलते नित नये आयाम शिक्षा और शिक्षाविदों के लिए चुनौती का कार्य करते है।

उन आयामों के अनुरूप ही शिक्षा की नयी परिवर्तित-परिवर्धित रूप-रेखा की आवश्यकता होती है, शिक्षा की एक बहुत बड़ी भूमिका यह भी है कि वह अपनी संस्कृति, धर्म तथा अपने इतिहास को अक्षुण्ण बनाए रखें, जिससे की राष्ट्र का गौरवशाली अतीत भावी पीढ़ी के समक्ष द्योतित हो सके और युवा पीढ़ी अपने अतीत से कटकर न रह जायें।

वर्तमान समय में शिक्षक को चाहियें कि सामाजिक परिवर्तन को देखते हुये उच्च शिक्षा में गुणवत्ता को बनाये रखें, और केवल अक्षर एवम् पुस्तक ज्ञान का माध्यम न बनाकर शिक्षित को केवल भौतिक उत्पादन-वितरण का साधन न बनाया जायें, अपितु नैतिक मूल्यों से अनुप्राणित कर आत्मसंयम, इंद्रियनिग्रह, प्रलोभनोपेक्षा, तथा नैतिक मूल्यों का केंद्र बनाकर भारतीय समाज की सुख-शान्ति और समृध्दि को माध्यम तथा साधन बनाया जायें।

ऐसी शिक्षा निश्चित ही “स्वर्ग लोके च कामधुग् भवति” यानी कामधेनु बनकर सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली और सुख-समृध्दि तथा शान्ति का संचार करने वाली होगी, वर्तमान शिक्षा में नैतिक मूल्यों का महती आवश्यकता है, वैदिक शिक्षा प्रणाली का मानना है कि समस्त ज्ञान मनुष्य के अंतर में स्थित है।

भारतीय ऋषियों के अनुसार आत्मा ज्ञान रूप है, ज्ञान आत्मा का प्रकाश है, मनुष्य को बाहर से ज्ञान प्राप्त नहीं होता प्रत्युत आत्मा के अनावरण से ही ज्ञान का प्रकटीकरण होता है, मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है, ज्ञान मनुष्य में स्वभाव सिद्ध है कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता सब अंदर ही है।

यथार्थ में मानव शास्त्र संगत भाषा में हमें कहना चाहियें की वह अविष्कार करता है, अनावृत ज्ञान को प्रकट करता है, अतः समस्त ज्ञान चाहे वह भौतिक हो, नैतिक हो अथवा आध्यात्मिक मनुष्य की आत्मा में है, बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढका रहता है और जब आवरण धीरे-धीरे हट जाता है तब हम कहते है कि हम सीख रहे है, जैसे-जैसे इस अनावरण की क्रिया बढ़ती जाती है हमारे ज्ञान में वृद्धि होती जाती है।

इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य नये सिरे से कुछ निर्माण करना नहीं अपितु मनुष्य में पहले से ही सुप्त शक्तियों का अनावरण और उसका विकास करना है, शिक्षा मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता का विकास है, वह शिक्षा जो जनसमुदाय को जीवन संग्राम के उपयुक्त नहीं बना सकती।

जो उनकी चारित्रिक शक्ति का विकास नहीं कर सकती, जो उनके मन में परहित भावना और शेर के समान साहस पैदा नहीं कर सकती , क्या उसे भी हम शिक्षा नाम दे सकते है? सज्जनों! सभी शिक्षाओं का, अभ्यासों का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना है, जिस अभ्यास के द्वारा मनुष्य की इच्छा शक्ति का प्रवाह और आविष्कार संयमित होकर फलदायी बन सकें।

शिक्षार्थी के जीवन में नैतिक मूल्य पूरक उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि नैतिक मूल्यों वाली उच्च शिक्षा लोगों को एक अवसर प्रदान करती है जिससे वे मानवता के सामने आज शोचनीय रूप से उपस्थित सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक मसलों पर सोच-विचार कर सकें।

अपने विशिष्ट ज्ञान और कौशल के प्रसार द्वारा उच्च शिक्षा समाज और राष्ट्रीय विकास में योगदान करती है, इस कारण हमारे अस्तित्व के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है, उच्च शिक्षा का संबंध जीवन में गुणात्मक मूल्यों के विस्तार से है, जिससे सभ्यता के विकास क्रम में अर्जित मानवता के दीर्घकालिक अनुभवों को आत्मलब्धि की दिशा में समाजीकरण के साथ अग्रसारित किया जा सके।

ऐसे अनुभवों के समुच्चय ही कालान्तर में मूल्य बनते हैं जिन्हें अपनाने की परम्परा ही संक्षेप में संस्कृति कहलाती है, और इस संस्कृति के निर्माण में एक शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका है, आज के बदलते सामाजिक परिवेश में शिक्षा, शिक्षा के प्रकार और शिक्षा प्राप्त करने के तरीकों में कई परिवर्तन आये है, जो शुभ संकेत नहीं है।

साथ ही शिक्षक की भूमिका में भी बदलाव आया है, श्रेष्ठ शिक्षक वही है जिसकी अपने विषय में गहरी पैठ हो, उसका अपने विषय पर तो अधिकार होना ही चाहिये, अध्यापन क्षमता भी उत्कृष्ट कोटि की होनी चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ ज्ञान का लाभ मिल सके।

संजय गुप्ता

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जापान में परीक्षा से पहले प्रिंसिपल ने बच्चों के पैरेंट्स को एक लेटर भेजा जिसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है :-

डियर पैरेंट्स
मैं जानता हूं आप इसको लेकर बहुत बेचैन हैं कि आपका बेटा इम्तिहान में अच्छा प्रदर्शन करें

लेकिन ध्यान रखें कि यह बच्चे जो इम्तिहान दे रहे हैं इनमें भविष्य के अच्छे कलाकार भी हैं जिन्हें गणित समझने की बिल्कुल जरूरत नहीं,

इनमें बड़ी बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि भी बैठे हैं, जिन्हें इंग्लिश लिटरेचर और इतिहास समझने की जरूरत नहीं है,

इन बच्चों में भविष्य के बड़े-बड़े संगीतकार भी हैं जिनकी नजर में केमिस्ट्री के कम अंकों का कोई महत्व नहीं,

इन सबका इनके भविष्य पर कोई असर नहीं पड़ने वाला इन बच्चों में भविष्य के एथलीट्स भी हैं जिनकी नजर में उनके मार्क्स से ज्यादा उन की फिटनेस जरूरी है|

लिहाजा अगर आपका बच्चा ज्यादा नंबर लाता है तो बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर वह ज्यादा नंबर नहीं ला सका तो तो आप बच्चे से उसका आत्मविश्वास और उसका स्वाभिमान ना छीन ले

अगर वह अच्छे नंबर ना ला सके तो आप उन्हें हौसला दीजिएगा की कोई बात नहीं यह एक छोटा सा इम्तिहान हैl

वह तो जिंदगी में इससे भी कुछ बड़ा करने के लिए बनाए गए हैं l

अगर वह कम मार्क्स लाते हैं तो आप उन्हें बता दें कि आप फिर भी इनसे प्यार करते हैं और आप उन्हें उन के कम अंको की वजह से जज नहीं करेंगे l

ईश्वर के लिए ऐसा ही कीजिएगा और जब आप ऐसा करेंगे फिर देखिएगा कि आपका बच्चा दुनिया भी जीत लेगा l

एक इम्तिहान और कम नंबर आपके बच्चे से इसके सपने और इसका टैलेंट नहीं छीन सकते

और हां प्लीज ऐसा मत सोचिएगा कि इस दुनिया में सिर्फ डॉक्टर और इंजीनियर ही खुश रहते हैं
(यह सब तो क्लब 99 की रेस में लगे घोडे है)

“अपने बच्चों को एक. अच्छा इंसान बनने की शिक्षा दीजिये.

केवल अंक ही बच्चों की योग्यता का मापदंड नही

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कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है.


*कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है…….🙏🏼*
*सोना*
सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।
*चाँदी*
चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है  इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।
*कांसा*
काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में  शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।
*तांबा*
तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।
*पीतल*
पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।
*लोहा*
लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से  शरीर  की  शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और  पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।
*स्टील*
स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी  नहीं पहुँचता।
*एलुमिनियम*
एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।
*मिट्टी*
मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैमिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।
पानी पीने के पात्र के विषय में ‘भावप्रकाश ग्रंथ’ में लिखा है….
*जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।*

*पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।*

*काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।*

(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)
अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।
*जय श्री राधे….🌸💐👏🏼*

*जय श्री कृष्ण….🌸💐👏🏼*