Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir, हिन्दू पतन

જય પાઠક

તમને બધાને ખબર છે ?


👉 ઘણા મંદિરોમાં પૈસાથી પાસે દર્શન કરવા દે છે અને ઓછા પૈસા આપો તો દૂર થી દર્શન કરવા દેવાય છે અથવા પછી પ્રાયોરિટી ઉપર વીઆઈપી પાસ આપી અને વહેલા દર્શન કરવા દેવાય છે અને એવા બધા રૂલ્સ કે જે તમારી આસ્થા ને ઠેસ પહોંચાડે છે.

👉 એ બધા રૂલ્સ સરકારી એડ્મીનીસ્ટ્રેશન HR & CE ( Hindu Religious and Charitable Endowment ) નામનું સરકારી ડિપાર્ટમેન્ટ લાદતું હોય છે જે પૈસા મંદિરને નહીં પણ એના બોન્ડ લેવાય છે 15 વર્ષ માટે.
આ પૈસા ઉપર મંદિરના પુજારીઓ કે ધાર્મિક રખેવાળો નો કોઈ હક હોતો નથી

અને આવા નિર્ણયોમાં પુજારીઓ કે ધાર્મિક કોઈ પણ સંસ્થા કે ધર્મ નો કોઈ હાથ હોતો નથી આ નિર્ણયો તેઓ નથી લેતા

👉 આ IAS અધિકારી કોઈ માર્ક્સિસ્ટ , ખ્રિસ્તી , મુલ્સિમ કે કોઈ ભીમટો કોઈ પણ હોઈ શકે છે જે મંદિરોથી નફરત પણ કરતો હોય.

👉 સેકયુલર માનસિકતા મુજબ તિરુપતિ મંદિરમાં આજે 40 જેટલા કામદારો ખ્રિસ્તી છે અને તેઓને નોકરી ઉપર IAS ઓફિસરો એ રાખ્યા છે.

👉 એક વર્ષ પહેલા કેરળ માં જે ગાય રસ્તા વચ્ચે કાપી એ કાપનાર ત્યાંના સૌથી મોટા મંદિરના ટ્રસ્ટીઓ હતા અને જ્યાં કાપી એ શકરાચાર્ય યુનિવર્સીટી ના પ્રાંગણમાં ત્યાંના એડ્મીનીસ્ટ્રેશનના છોકરાઓ એ કાપી.

👉 આંધ્રપ્રદેશ માં આજે લાખો લોકોં ટુરિઝમ બિઝનેશ થકી રોજીરોટી મેળવે છે અને આંધ્ર પ્રદેશ ભારતમાં સૌથી પહેલા નંબર ઉપર ટુરિસ્ટ સ્પોટ તરીકે આવ્યું છે એનું મુખ્ય કારણ તિરુપતિ મંદિર છે.

જેને લીધે લાખો લોકો રોજીરોટી મેળવે છે.

👉કર્ણાટકનું સૌથી ધનાઢ્ય મંદિર કૂકે સુભ્રમનાઇયમ મંદિર આખું આદિવાસીઓના હસ્તક છે અને એ મંદિરમાં રોજનું 3 ટન અનાજ બનાવાય છે જે લાખો ગરીબો સુધી રોજ કર્ણાટકમાં પહોંચે છે. આ ખોરાક બનાવવા માટે એલપીજી ગેસ નહીં પણ લાકડા નો ઉપયોગ કરાવાય છે.

આ રોજના લાખો રૂપિયાના લાકડા મંદિરની આજુબાજુના જંગલોમાં રહેતા આદિવાસીઓ લાવી આપે છે અને તેમની સામે તેઓને પૈસા મળે છે. તેઓની મુખ્ય રોજીરોટીનો આધાર જ આ મંદિર છે.

આ મંદિર આ બધા લાખો આદિવાસીઓને મંદિર સાથે સાંકળી રાખનાર મુખ્ય સ્થાન છે.

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जम्बुकेश्वर मंदिर, तमिलनाडु


जम्बुकेश्वर मंदिर, तमिलनाडु 🙏

क्या कोई इससे खूबसूरत भी कुछ दिखा सकता है?

इसका निर्माण आज से 1800 साल पहले चोल राजाओं ने करवाया था। इस मंदिर में एक रहस्यमयी भूमिगत जलस्त्रोत है जिसकी वजह से मंदिर में कभी पानी की कमी नहीं पड़ती। अगर आधुनिक उपकरणों के अभाव में भी हमारे पूर्वजों ने इसे निर्मित किया तो फिर उन्नत कौन हुआ? ✨

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एकम्बरेश्वर मंदिर


कोई क्रेन नहीं, कोई आधुनिक उपकरण नहीं, कोई इंजीनियरिंग तकनीक नहीं, लेकिन हमारे पूर्वजों ने आधुनिक उपकरणों के बिना 100% सटीकता के साथ इसे बनाया ।

600 ईसवी में पल्लवों द्वारा निर्मित 1000 खंभों वाले इस मंदिर को देखिए । क्या सच में टेक्नोलॉजी नहीं थी ? या फिर वामपंथी इतिहासकारों ने हमसे झूठ बोला ताकि हम फिर से कभी गर्वित सनातनी ना बन सकें ।

(एकम्बरेश्वर मंदिर, तमिलनाडु)

क्या यह छेनी-हथौड़ी से संभव है ?

सोचिये ! छोटी से छोटी डिटेल को दर्शाने के लिए पत्थरों के बीच से पत्थरों को काटकर निकालने में छेनी पर हथौड़ी का एक गलत प्रहार महीनों की मेहनत बर्बाद कर सकता था ।

वामपंथी इतिहासकारों द्वारा लिखे हमारे इतिहास के पाठ्यक्रमों को पुनः लिखने की आवश्यकता है ।

(चेन्नकेशवा मंदिर, कर्नाटक)

आप जैसे ही हमारे पूर्वजों के रहस्यों को डिकोड करने का दावा करेंगे वो अपनी कलाओं से आपको फिर से चौंका देंगे ।

हर छोटी से छोटी डिटेल वाली कंगन पहले इस प्रतिमा को देखिए इसी मंदिर में एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसके कंगन को आप आसानी से आगे-पीछे कर सकते हैं ।

(चेन्नकेशवा मंदिर, कर्नाटक)

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धनुषकोड़ी


अखण्ड सनातन समिति🚩🇮🇳

रामेश्वरम धाम का कायापलट

रामसेतु राष्ट्रीय धरोहर है, उसका पूर्ण संरक्षण मोदी सरकार द्वारा किया जा रहा है। रामसेतु पर केंद्र सरकार द्वारा एकदम चकाचक रोड बनाया गया है। पहले रामसेतु के भारतीय अंतिम छोर तक जाने के लिए जहाज से ही जाना पड़ता था। सरकार द्वारा उस पूरे रामसेतु पर 20 किलोमीटर लम्बा हाइवे बनाया गया है जिसपर सब वाहन चल रहे हैं और अंतिम छोर तक बोट से जाने की बाध्यता खत्म हो गई है। रामसेतु पर बने इस 20 किलोमीटर रोड के दोनों तरफ उत्ताल समुद्र उछाल मारता है।

धनुषकोड़ी अर्थात “रामसेतु” का भारतीय अंतिम छोर जो जमीन तल पर है, उसके आगे का रामसेतु सागर की लहरों के नीचे है, पर धनुष्कोडी के थोड़ा आगे आगे तीन द्वीप जैसे दिखते हैं जो रामसेतु का ही अंग हैं।
पहले असली धनुष्कोडी तक जाना इतना कठिन था कि गाइड लोग तीर्थयात्रियों को विभीषण मन्दिर तक ही लेकर जाते थे, जो कि धनुष्कोडी से 11 किलोमीटर पहले ही पड़ जाता है। वो लोग उसी को रामसेतु का अंतिम छोर बता देते थे, उसी को धनुष्कोडी कह दिया करते थे, जबकि यह गलत था। ज्यादातर लोग धनुष्कोडी जा ही नहीं पाते थे। मोदी सरकार द्वारा यह अति अद्भुत और महत्वपूर्ण कार्य हुआ है।
अब आसानी से धनुष्कोडी तक रामसेतु के ऊपर बनी रोड से जा सकते हैं जिस रोड के दोनों तरफ समुद्र है। पूर्व राष्ट्रपति श्री एपीजे अब्दुल कलाम का स्मारक भी एक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में विकसित किया गया है।

इस फोटो में आप देख सकते हैं, रेत वाला हिस्सा धनुष्कोडी है जो रामसेतु की अंतिम छोर है। इससे 11 किमी पहले विभीषण मन्दिर पड़ता है। धनुष्कोडी के आगे समुद्र के पानी में उथला हुआ रामसेतु है।

और कुछ लोग कहते हैं कि मोदी जी कुछ कर नहीं रहे।

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श्री मेहंदीपुर बालाजी मन्दिर


महानुभाव,आज हम धार्मिक यात्रा ग्रुप में यात्रा करते है श्री मेहंदीपुर बालाजी मन्दिर के दर्शन और जानकारी की।

हम हर रोज भारत एवम अन्य देश विदेश के खास धार्मिक स्थल की जानकारी और महत्व आप तक लाने का प्रयास करेगे।यदि आपके नजदीक कोई धार्मिक स्थल है एवम उसका कोई विशेष चमत्कार है तो अवश्य इस ग्रुप में शेयर करे।

पवित्र और चमत्कारिक मेहंदीपुर बालाजीमहराज की सम्पूर्ण कथा!!!!!

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे “श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर” के नाम से जाना जाता है।

भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहांँ आने वालों का ताँंता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहांँ पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं । सम्पूर्ण भारत से आने वाले लगभग एक हजार रोगी और उनके स्वजन यहाँं नित्य ही डेरा डाले रहते हैं ।

बालाजी का मन्दिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित है, इसलिए इन्हें “घाटे वाले बाबा जी” भी कहा जाता है । इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है । यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मन्दिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है ।

इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है । इस मूर्ति के सीने के बाईं तरफ़ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है जिससे पवित्र जल की धारा निरंतर बह रही है।

यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है जिसे भक्तजन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं । यह मूर्ति लगभग 1000 वर्ष प्राचीन है किन्तु मन्दिर का निर्माण इसी सदी में कराया गया है । मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की, लेकिन वे असफ़ल रहे ।

वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई । थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा । ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष पुराना चोला स्वतः ही त्याग दिया । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंँचे, जहांँ से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था ।

ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका वजन करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता । असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया ।

इसके बाद बालाजी को नया चोला चढाया गया । यज्ञ हवन और ब्राह्मण भोज एवं धर्म ग्रन्थों का पाठ किया गया । एक बार फ़िर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई । यह ज्योति सारे विश्व का अंधकार दूर करने में सक्षम है । बालाजी महाराज के अलावा यहांँ श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव ) की मूर्तियांँ भी हैं ।

प्रेतराज सरकार जहां द्ण्डाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर । यहां आने पर ही सामान्यजन को ज्ञात होता है कि भूत प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य को कष्ट पहुंँचाते हैं और किस तरह सहज ही उन्हें कष्ट बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है । दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुँचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है ।

बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं । प्रसाद हमेशा थाली या दोने में रखकर दिया जाता है।

लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है और भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर बड़बड़ाने लगते है । स्वतः ही वह हथकडी और बेड़ियों में जकड़ जाता है । कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोट पोट कर हाहाकार करता है । कभी बालाजी के इशारे पर पेड़ पर उल्टा लटक जाता है । कभी आग जलाकर उसमें कूद जाता है ।

कभी फाँसी या सूली पर लटक जाता है । मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वतः ही बालाजी के चरणों में आत्मसमर्पण कर देते हैं अन्यथा समाप्त कर दिये जाते हैं । बालाजी उन्हें अपना दूत बना लेते हैं। संकट टल जाने पर बालाजी की ओर से एक दूत मिलता है जोकि रोग मुक्त व्यक्ति को भावी घटनाओं के प्रति सचेत करता रहता है।

बालाजी महाराज के मन्दिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है । पूजा में भजन आरतियों और चालीसों का गायन होता है। इस समय भक्तगण जहांँ पंक्तिबद्ध हो देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं वहीं भूत प्रेत से ग्रस्त रोगी चीखते चिल्लाते उलट पलट होते अपना दण्ड भुगतते हैं ।

बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है ।

भक्ति-भाव से उनकी आरती, चालीसा, कीर्तन, भजन आदि किए जाते हैं । बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है।

पृथक रूप से उनकी आराधना – उपासना कहीं नहीं की जाती, न ही उनका कहीं कोई मंदिर है। वेद, पुराण, धर्म ग्रन्थ आदि में कहीं भी प्रेतराज सरकार का उल्लेख नहीं मिलता। प्रेतराज श्रद्धा और भावना के देवता हैं।

कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चाैंक पड़ते हैं। उनका मानना है कि भूत-प्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहाँ जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी – जो बालाजी के प्रति भक्ति-भाव रखने वाला है, इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।
किसी ने सच ही कहा है—”नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं, मेंहदीपुर दरबार में ।”

प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है, किन्तु भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं और प्रेम-श्रद्धा से चढ़ा हुआ प्रसाद बाबा सहर्ष स्वीकार भी करते हैं।

कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं । भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पाँचवाँ कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं, लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं । उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है ।

शास्त्र और लोककथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं। श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं । भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं।

इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं । प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के बड़े और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं ।

सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूत-प्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं, जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।

कलियुग में बालाजी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं , जो अपने भक्त को सहज ही अष्टसिद्धि, नवनिधि तदुपरान्त मोक्ष प्रदान कर सकते हैं।

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

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माँ वैष्णो देवी मंदिर की कहानी और महिमा 🙏🙏🙏

यह माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण करीबन 700 साल पहले पंडित श्रीधर द्वारा हुआ था, जो एक ब्राह्मण पुजारी थे जिन्हें मां के प्रति सच्ची श्रद्धा भक्ति थी जबकि वह गरीब थे। उनका सपना था कि वह एक दिन भंडारा (व्यक्तियों के समूह के लिए भोजन की आपूर्ति) करें।

माँ वैष्णो देवी को समर्पित भंडारे के लिए एक शुभ दिन तय किया गया और श्रीधर ने आस पास के सभी गांव वालो को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया। भंडारे वाले दिन पुनः श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बना कर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके।

जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे। जैसे-जैसे भंडार का दिन नजदीक आता जा रहा था, पंडित श्रीधर की मुसीबतें भी बढ़ती जा रही थी। वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे,इतनी कम सामग्री और इतनी कम जगह.. दोनों ही समस्या थी।

वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी माँ से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए,दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी से कुटिया में आसानी से बैठ गए और अभी भी काफी जगह बाकी थी।

श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था।

भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह माँ वैष्णो देवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे सनसनी गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया।

श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े, जब उन्हें वह गुफा मिली तो उसने तय किया की वह अपना सारा जीवन मां की सेवा करेंगे। जल्द ही पवित्र गुफा प्रसिद्ध हो गई और भक्त झुंड में मां के प्रति आस्था प्रकट करने आने लगे।

आज इस वैष्णो देवी के मंदिर में पुरे भारत वर्ष से भक्त आते हैं। माता रानी का यह असीम ऊर्जावान केंद्र है।
🚩🚩 जय माता दी !🚩🚩🙏🙏🙏

शर्मा हरीश

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रामेश्वरमतीर्थकीयात्रामेंआंखोंदेखाअविश्वसनीयचमत्कार

वर्ष 1986 में हम दक्षिण भारत की यात्रा पर गए, यात्रा में रामेश्वरम तीर्थ रेल से गए, भारत की मुख्य भूमि से रामेश्वरम को तब एक रेलवे का पुल जोड़ता था, इस पुल के साथ 10 -10 फुट के चकोर पत्थरो की एक पंक्ति भारत की मुख्य भूमि धुनष कोटी से रामेश्वरम तक जाती है।
हर पत्थर और दूसरे पत्थर की बीच में 10 फूट का अंतर है ताकि सागर की जल राशि मे अवरोध नहीं हो,इन्ही पत्थरों से भगवान राम की सेना धुनष कोटी से रामेश्वरम पहुंची थी ।
सागर की उत्थाल तरंगें इन पत्थरों को आज तक हिला नही पायी जबकिं 1915 में बना रेलवे पुल जिस से हम गए थे , आज से कुछ वर्ष पूर्व एक बड़े झंजावत में नष्ट हो गया अब वहां सड़क सेतु से तीर्थ यात्री जाते है।

दूसरा_आश्चर्य

रामेश्वरम धाम से पूर्व 22 तीर्थों के जल से स्नान यहां पर सुबह भक्तों के दर्शन कराने से पहले 22 तीर्थों के जल से स्नान कराया जाता है।

  • पहले सभी इस मंदिर के किनारे अग्नि तीर्थ के समुद्र में स्नान करते हैं फिर मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं।
    इसी तरह सभी तीर्थों के कुंड से स्नान करने के बाद कपड़े बदले जाते हैं, फिर उस शिवलिंग के दर्शन होते हैं, जिसे श्रीराम ने अपने हाथों से रेत से बनाया था।
    इस पूरी प्रक्रिया में करीब 2 घंटे लगते हैं, तब जाकर शिवलिंग के दर्शन होते हैं।

खारे पानी के किनारे पर कुंडों में मीठा जल कहते हैं कि भगवान श्रीराम ने अपने बाणों से इन कुंडों का निर्माण किया था। समु्द्र के खारे पानी के किनारे पर कुंडों में मीठा जल निकलता है।
आश्चर्य इस बात का है सभी कुओं का जल अलग अलग है । किसी का ठंडा तो किसी का गर्म। स्वाद भी अलग अलग है लेकिन मीठा ।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, कुंडों के पानी से स्नान करने से शरीर के कई रोगों से छुटकारा भी मिलता है।
  • यहां कुल 24 कुंड हैं जिनमें से दो कुंड सूख गए हैं।
  • 22 कुंडों में पानी है, पर स्नान 21 कुंडों पर करवाया जाता है, क्योंकि 22वें कुंड मे सभी कुंडों का पानी है ।
    प्रस्तुति ओम प्रकाश त्रेहन
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●————:◆ शुभ प्रभात मित्रांनो ◆:————●

● पंढरपुरमधील पांडुरंगाच्‍या मुर्तीवर आहे शिवलिंग
● जाणुन घ्‍या त्‍यामागील कथा ◆:— 🙏

।। पंढरपूरच्या श्री पाडुरंगाच्या मूर्तीच्या मस्तकावर
।। शिवलिंग आहे, असे सांगितले जाते. त्या प्रमाणे
।। त्या शिवलिंगाला गंध वगैरे लावून रोज पूजाही केली
।। जाते. त्या संबंधीची अशी कथा सांगितली जाते की
।। एकदा भगवान शंकर श्री विठ्ठलाच्या भेटीला आले
।। व ते विठ्ठलाच्या मूर्तीत विलीन झाले. श्री विठ्ठलाने
।। त्यांना आपल्या मस्तकावर स्थान दिले.

।। पांडुरंग हे नाव शंकराचेच आहे. कारण पांडुर म्हणजे
।। पांढराशुभ्र आणि अंग म्हणजे शरीर. ज्याचे अंग
।। पांढरेशुभ्र आहे असा देव कोण आहे तर भगवान
।। शंकर. श्री विठ्ठल हा तर कृष्ण असल्यामुळे काळा
।। आहे आणि शंकर करपूरगौरवम म्हणजे कापराप्रमाणे
।। गोरा आहे. पण सावळ्या विठ्ठलाने त्यास
।। मस्तकीधारण केल्याने त्यांचे नावही धारण केले पांडुरंग

।। समर्थ रामदास स्वामींनी म्हटले आहे विठोने वाहिला
।। शिरदेव राणा म्हणजे विठ्ठलाने शंकराला मस्तकावर
।। वाहिले आहे. प्रख्यात कवी अनंतरावजी आठवले
।। शंकराच्या स्तोत्रात म्हणतात.
।। विठ्ठले धरिले शिरी शिवलिंग ते मुक्कुटा करती
।। म्हणजे विठ्ठलाने मुक्कुटाच्या आकाराचे शिवलिंग
।। धारण केले आहे.

।। पुढे ते म्हणतात.
।। शोभतो जलदापरी ( ढगापरी ) हरि इंदिरावर सावळा
।। कुंद सुंदर गौर हा हर भेद ना परी राहिला
।। पांडुरंगच बोलती गुज भाविका कळले यदा
।। म्हणजेच विठ्ठल हा मेघाप्रमाणे सावळा आहे
।। व शंकर हा कुंद कळ्याप्रमाणे शुभ्र आहे.

।। पण दोघेही एकरूप झाल्यामुळे विठ्ठलालाच लोक
।। पांडुरंग म्हणतात शिव आणि विष्णू यांचे ऐक्य
।। झालेले एकमेव तीर्थक्षेत्र म्हणजे पंढरपूर आहे.
।। संत नरहरी सोनार हे कट्टर शिवभक्त होते.
।। ते श्री विठुरायाच्या दर्शनालाही जात नव्हते. पण
।। विठ्ठलाच्या करदोड्यासाठी माप घेण्यास येथील
।। मंदिरात गेले ते डोळे बांधून. हाताने श्री विठ्ठल
।। मूर्तीच्या कमरेचे माप घेऊ लागले तो शंकराची चिन्हे
।। त्यांच्या हाताला लागली. डोळे उघडले तर श्री
।। विठ्ठलाची मूर्ती त्यांना दिसली. त्यांचा भ्रम दूर झाला
।। आणि शिव व विठ्ठल हे एकच आहेत असा त्यांना
।। साक्षात्कार झाला.

।। ही घटना सुमारे ७०० वर्षांपूर्वी घडली. त्यामुळेच
।। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश आणि सध्याचे
।। तेलंगणा राज्यातून शिवभक्त तसेच लिंगायत पथाचे
।। धर्मगुरू श्री विठ्ठलाच्या दर्शनासाठी आवर्जून येथे
।। येतात. शिवरात्रीलाही पंढरपुरात सर्व वारकरी
।। उपवास करतात. पांडुरंगाला उपवासाच्या पदार्थांचा
।। नैवेद्य दाखवतात. पंढरपुरात शिव आणि विठ्ठल
।। यामध्ये भेद नाही, हेच या क्षेत्राचे वैशिष्ट्य आहे.
।। महाशिवरात्रीचा उपवास केल्यास १२ एकादशींचे
।। पुण्य लाभते अशीदेखील वारकऱ्यांची श्रध्दा आहे.
।। त्यावरून वारकरी सांप्रदायामध्ये देखील शिवरात्रीचे
।। महत्त्व किती आहे, हे समजते.

●———:◆🌺 राम कृष्ण हरी माऊली 🌺◆:———●

● शुक्रवार ◆:— { ०६ / ०३ / २०२० } ◆:————●

🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏

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Original Crown of Lord Venkateshwara. It is more than 500 years old and it is said that this crown was donated by Vijaynagar King Sri Krishnadevaraya.. 🙏🙏