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सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर


सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर

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संसार में सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर माना जाता है साथ ही भारत में सबसे प्राचीन पूर्ण जीवंत हिन्दू मंदिर भी इसी मंदिर को मानते हैं.
आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने माना है कि इतिहास के मद्देनजर यह भारत देश का सबसे पुराना मंदिर है.

भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित इस मंदिर के पुरुत्थान के लिए योजनायें बन रही है.यूनेस्को की लिस्ट में भी शामिल करवाने के प्रयास जारी हैं.इस मंदिर के बारे में मैं यहाँ संक्षेप में जानकारी दे रही हूँ.

मुंडेश्वरी देवी का यह मंदिर बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है.
कैमूर जिले का नाम सुन कर आप को भी याद आ गया होगा जी हाँ ,यह वही कैमूर जिला है जहाँ हरशुब्रह्म धाम में हर साल चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रारंभ होते ही नवरात्र के अवसर पर कथित तौर पर भूतों की अदालत लगती है और कुछ लोग कथित भूतों, डायनों और चुडैलों से मुक्ति दिलाते हैं.अब इस में क्या सच्चाई है हम नहीं जानते
चलिए आप को इस देवी मंदिर के बारेमें बताते हैं .
स्थापना कब और किस ने करवाई -पुरातत्व विभाग को यहाँ ब्राह्मी लिपि में लिखित जो शिलालेख और श्रीलंका के महाराजा दुतगामनी की राजकीय मुद्रा मिली थीं. जिन पर किये ताज़ा पुरातात्विक शोधों के आधार पर इसे कुषाण युग में हुविश्क के शासनकाल में सन्‌ 108 ईस्वी में उत्कीर्ण माना जा रहा है.किस ने बनवाया यह ज्ञात नहीं है.
इस मंदिर के आस पास अवशेषों में कई अन्य भगवानो की मूर्तियाँ आदि भी मिली हैं.मुख्यत देवी मुंडेश्वरी की पूजा होती है.यहाँ शिव और पार्वती की पूजा होते रहने के भी प्रमाण मिले हैं.
कुछ और रोचक तथ्य –

१-यहाँ एक चतुर्मुखी शिवलिंग है ,कहते हैं इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम में अलग अलग दिखता है.

२-यहाँ बकरे की बलि नहीं दी जाती बल्कि बकरे को देवी के सामने लाया जाता है.उसपर मन्त्र वाले चावल पुजारी छिडकता है जिस से वह बेहोश हो जाता है और फिर उसे बाहर छोड़ दिया जाता है.

३-सालों बाद यहां तांडुलम भोग [चावल का भोग] और वितरण की परंपरा पुन: शुरू हो गई है.माना जाता है कि 108 ईस्वी में यहां यह परंपरा जारी थी.

४- यहां का अष्टाकार गर्भगृह तब से अब तक कायम है.

५- जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का रूट मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ा था.

६ -वैष्णो देवी की तर्ज पर इस मंदिर का विकास किये जाने की योजनायें राज्य सरकार ने बनाई हैं.

७-इस मंदिर का संरक्षक एक मुस्लिम है.

मुंडेश्वरी मंदिर की प्राचीनता का महत्व इस दृष्टि से और अधिक है कि यहां पर पूजा की परंपरा १९०० सालों से अविच्छिन्न रही है और आज भी यह मंदिर पूरी तरह जीवंत है

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कामेश्वर धाम कारो – बलिया – यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म


कामेश्वर धाम कारो – बलिया – यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में है कामेश्वर धाम। इस धाम के बारे में मान्यता है कि यह, शिव पुराण मे वर्णित वही जगह है जहा भगवान शिव ने देवताओं के सेनापति कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। यहाँ पर आज भी वह आधा जला हुआ, हरा भरा आम का वृक्ष (पेड़) है जिसके पीछे छिपकर कामदेव ने समाधी मे लीन भोले नाथ को समाधि से जगाने के लिए पुष्प बाण चलाया था।

कामेश्वर धाम कारो
आखिर क्यों महादेव शिव ने कामदेव को भस्म किया ? :
भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने कि कथा (कहानी) शिव पुराण मे इस प्रकार है। भगवान शिव कि पत्नी सती अपने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ मे अपने पति भोलेनाथ का अपमान सहन नही कर पाती है और यज्ञ वेदी मे कूदकर आत्मदाह कर लेती है। जब यह बात शिवजी को पता चलती है तो वो अपने तांडव से पूरी सृष्टि मे हाहाकार मचा देते है। इससे व्याकुल सारे देवता भगवान शंकर को समझाने पहुंचते है। महादेव उनके समझाने से शान्त होकर, परम शान्ति के लिए, गंगा तमसा के इस पवित्र संगम पर आकर समाधि मे लिन हो जाते है।

कामेश्वर धाम कारो
इसी बीच महाबली राक्षस तारकासुर अपने तप से ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके ऐसा वरदान प्राप्त कर लेता है जिससे की उसकी मृत्यु केवल शिव पुत्र द्वारा ही हो सकती थी। यह एक तरह से अमरता का वरदान था क्योकि सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव समाधि मे लीन हो चुके थे।
इसी कारण तारकासुर का उत्पात दिनो दिन बढ़ता जाता है और वो स्वर्ग पर अधिकार करने कि चेष्टा करने लगता है। यह बात जब देवताओं को पता चलती है तो वो सब चिंतित हो जाते है और भगवान शिव को समाधि से जगाने का निश्चय करते है। इसके लिए वो कामदेव को सेनापति बनाकर यह काम कामदेव को सोपते है। कामदेव, महादेव के समाधि स्थल पहुंचकर अनेकों प्रयत्नो के द्वारा महादेव को जगाने का प्रयास करते है, जिसमे अप्सराओ के नृत्य इत्यादि शामिल होते है, पर सब प्रयास बेकार जाते है।
अंत में कामदेव स्वयं भोले नाथ को जगाने लिए खुद को आम के पेड़ के पत्तो के पीछे छुपाकर शिवजी पर पुष्प बाण चलाते है। पुष्प बाण सीधे भगवान शिव के हृदय मे लगता है, और उनकी समाधि टूट जाति है। अपनी समाधि टूट जाने से भगवान शिव बहुत क्रोधित होते है और आम के पेड़ के पत्तो के पिछे खडे कामदेव को अपने त्रिनेत्र से जला कर भस्म कर देते है।

आम का पेड़ , कामेश्वर धाम कारो
कई संतो कि तपोभूमि रहा है कामेश्वर धाम :
त्रेतायुग में इस स्थान पर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम लक्ष्मण आये थे जिसका उल्लेख बाल्मीकीय रामायण में भी है। अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं पर हुर्इ थी। यहां पर दुर्वासा ऋषि ने भी तप किया था।
बताते हैं कि इस स्थान का नाम पूर्व में कामकारू कामशिला था। यही कामकारू पहले अपभ्रंश में काम शब्द खोकर कारूं फिर कारून और अब कारों के नाम से जाना जाता है।

रानी पोखरा – कामेश्वर धाम कारो Image Credit
कामेश्वर धाम कारो मे तीन प्राचीन शिवलिंग व शिवालय स्थापीत है।

श्री कामेश्वर नाथ शिवालय :
यह शिवालय रानी पोखरा के पूर्व तट पर विशाल आम के वृक्ष (पेड़) के नीचे स्थित है। इसमें स्थापित शिवलिंग खुदाई में मिला था जो कि ऊपर से थोड़ा सा खंडित है।

सूर्य प्रतिमा कामेश्वर धाम कारो
श्री कवलेश्वर नाथ शिवालय :
इस शिवालय कि स्थापना अयोध्या के राजा कमलेश्वर ने कि थी। कहते है की यहां आकर उनका कुष्ट का रोग सही हो गया था इस शिवालय के पास मे हि उन्होने विशाल तालाब बनवाया जिसे रानी पोखरा कहते है।

नंदी कामेश्वर धाम कारो
श्री बालेश्वर नाथ शिवालय :
बालेश्वर नाथ शिवलिंग के बारे मे कहा जाता है कि यह एक चमत्कारिक शिवलिंग है। किवदंती है की जब 1728 में अवध के नवाब मुहम्मद शाह ने कामेश्वर धाम पर हमला किया था तब बालेश्वर नाथ शिवलिंग से निकले काले भौरो ने जवाबी हमला कर उन्हे भागने पर मजबूर कर दिया था।

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कामेश्वर धाम, कारो, बलिया

कामदहन भूमि कामाश्रम

यह तीर्थ स्थान बलिया वाराणसी रेलमार्ग पर चितबड़ागांव एवं ताजपुर डेहमा रेलवे स्टेशनों के बीच में सिथत है। मान्यता है कि कामेश्वर धाम वह स्थान है, जहां भगवान शिव ने देव सेनापति कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। यहां आज भी वह प्राचीन आम का वृृक्ष जला हुआ हरा-भरा खड़ा है। जिसके पत्तों में छिपकर कामदेव जी ने समाधिस्थ शिव पर वाण चलाया था।

त्रेतायुग में इस स्थान पर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम लक्ष्मण भी आये थे जिसका उल्लेख बाल्मीकीय रामायण में भी है। अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं पर हुर्इ थी। यहां दुर्वासा ऋषि ने भी तप किया था। यहां पहुंच कर स्वत: ही इसकी दिव्यता महसूस हो जाती है । मान्यता है कि इस तीर्थ पर त्रयोदशी युक्त शनिवार को दर्शन करने वालों की सारी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं

शिवपुराण के अनुसार महाबली तारकासुर ने तप करके ब्रह्राा जी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया जिसके तहत उसकी मृत्यु केवल शिवपुत्र के हाथों हो सकती थी। यह लगभग अमरता का वरदान था क्यों कि उस समय भगवान शिव की भार्या सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पतिदेव भगवान भोलेनाथ के अपमान से रूष्ट होकर यज्ञ भूमि में आत्मदाह कर चुकी थीं । इस घटना से क्रोधित भगवान शिव तांडव नृत्य कर देवगणों के प्रयास से शान्त होकर परम शानित के निमित्त विमुकित भूमि गंगा तमसा के पवित्र संगम पर आकर समाधिस्थ हो चुके थे।

तारकासुर के दिनों – दिन बढ़ते उत्पात के चलते देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने का निर्णय किया। इसके निमित्त भगवान कामदेव को सेनापति बनाया गया। कामदेव ने महादेव के समाधि स्थान पर पहुंच कर विभिन्न प्रकार के आयोजन किये जिसमें कि मनमोहनी अप्सराओं का नृत्य इत्यादि शामिल था लेकिन सारे प्रयास असफल रहे।

महादेव की समाधि पर कोर्इ प्रभाव नहीं पड़ा। विफल होने पर कामदेव ने आम के पेड़ के पत्तों में खुद को छुपाकर महादेव भगवान शिव पर पुष्प धनुष से प्रहार किया। शिव के हृदय में पुष्प मोहिनी बाण लगते ही उनकी समाधि भंग हो गयी।

इस प्रकार संक्रोधित भगवान शिव ने कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। इस दिव्य घटना का साक्षी यह पवित्र धाम सभी के लिए पूजनीय है । बताते हैं कि इस स्थान का नाम पूर्व में कामकारू कामशिला था। यही कामकारू पहले अपभ्रंश में काम शब्द खोकर कारूं फिर कारून और अब कारों के नाम से जाना जाता है।

कारों के दक्षिण गंगिया के छाडन मोहन आदि स्थल एवं उत्तर में प्रवाहित तमसा छोटी सरयू और दक्षिण में प्रवाहित गंगा नदी की भू परिसिथतियां इंगित करती हैं कि काफी समय तक कारों में ही इन नदियों का संगम स्थल रहा है । बाल्मीकीय रामयण के बाल खण्ड में भी कामदहन भूमि की प्रमाणिकता मिलती है।

कामेश्वर धाम पहुंचने का मार्ग

बलिया जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण पशिचम दिशा में बलिया वाराणसी मार्ग पर सिथत है । बलिया से आटो रिक्शा चलते हैं, जो बहेरी पुल बलिया से चितबड़ागांव होकर जाते हैं।

सड़क मार्ग से फेफना चितबड़ागांव होकर धर्मापुर पहुंचने पर कामेश्वर धाम के दिव्य स्वागत द्वार के दर्शन हो जाते हैं रेल मार्ग से यहां आने हेतु ताजपुर स्टेशन उतरना होगा। यहां से कामेश्वर धाम 3 किलोमीटर दक्षिण पूर्व दिशा में सिथत है। चितबड़ागांव रेलवे स्टेशन उतरना भी उपयुक्त होगा। यहां से कामेश्वर धाम जाने के लिए आटो रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं।

कामेश्वर धाम दर्शन

श्री कामेष्वरनाथ षिवालय एवं प्राचीन आम वृक्ष

कामाश्रम का यह प्रसिद्ध शिवलिंग रानी पोखरा के पूर्व तट पर पांच फीट गडडे में विशाल आम वृक्ष की जड़ में अवसिथत है। यह शिवलिंग खुदार्इ में मिला था। यह उपर से खंडित है । इस शिवलिंग एक पवित्र आम के पेड़ के विषय में कारों के बुजुर्ग नागरिकों का कहना हे कि बचपन में भी हमने इस आम के पेड़ एवं शिव लिंग को ज्यों का त्यों देखा है । काफी हद तक जला किन्तु हरा भरा यह आम वृक्ष एक दिव्य स्थान है काबिले गौर हे कि इस प्राचीन आम वृक्ष पर अब भी आम लगते हैं ।

श्री कामेश्वर धाम झील एवं कवलेश्वर ताल

मंदिर क्षेत्र के प्रवेश द्वार के पास ही इस सुरम्य झील के दर्शन होते हैं । गंगा तमसा सरयू द्वारा खराद कर बनी यह झील प्रकृति के मनोहर दृश्यों से सजिजत है । लाल कमल फूलों के लिए झील काफी प्रसिद्ध है ।

श्री कवलेश्वर नाथ शिवालय

प्राचीन शिवलिंग के ठीक सामने सिथत इस देवालय की स्थापना अध्योध्या के राजा कवलेश्वर ने कराया था। बताते हैं कि यहां आकर उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया था। उन्होंने शिवालय के पास ही विशाल तालाब बनवाया जिसे रानी पोखरा कहा जाता है।

जिसका वर्तमान में सुन्दर तरिके से जीर्णोद्धार 2001 र्इ. से शुरु कराया गया। जो आज भी जारी है।

श्री बालेश्वर नाथ शिवालय

कामेश्वर धाम कारों में सिथत बालेश्वर नाथ शिवलिंग एक चमत्कारी देवालय है। इस मनिदर के सभी प्रतिमायें लाल पत्थर की बनी हैं।

बताते हैं कि सन 1728 में मुहम्मदशाह नामक एक शासक अवध का नबाब बना। उसने एक बार कामेश्वर धाम पर हमला बोल दिया तब श्री बालेश्वर महादेव शिवलिंग से लोगों की संख्या में निकले काले भौंरो ने नबाब की सेना पर हमला बोल दिया। सेना को मुंह छुपा कर भागना पड़ा

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भगवान शिव की साधना स्थली कारो कामेश्वर धाम,पुराणों में वर्णित यह वही स्थान है जहां भगवान भोले नाथ ने कामदेव को भष्म किया था ………………..और भी बहुत कुछ है धर्म की इस महा गाथा में , ज़रूर पढ़ें !!

भगवान शिव की साधना स्थली कारो कामेश्वर धाम,पुराणों में वर्णित यह वही स्थान है जहां भगवान भोले नाथ ने कामदेव को भष्म किया था।पुराणों में, वेदों में और शास्त्रों में भगवान शिव-महाकाल के महात्म्य को प्रतिपादित किया गया है। भगवान शिव हिन्दू संस्कृति के प्रणेता आदिदेव महादेव हैं। हमारी सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार 33 करोड़ देवताओं में ‘शिरोमणि’ देव शिव ही हैं। सृष्टि के तीनों लोकों में भगवान शिव एक अलग, अलौकिक शक्ति वाले देव हैं।
भगवान शिव पृथ्वी पर अपने निराकार-साकार रूप में निवास कर रहे हैं। भगवान शिव सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान हैं। महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिवशंकर के प्रदोष तांडव नृत्य का महापर्व है। शिव प्रलय के पालनहार हैं और प्रलय के गर्भ में ही प्राणी का अंतिम कल्याण सन्निहित है। शिव शब्द का अर्थ है ‘कल्याण’ और ‘रा’ दानार्थक धातु से रात्रि शब्द बना है, तात्पर्य यह कि जो सुख प्रदान करती है, वह रात्रि है।
शिवस्य प्रिया रात्रियस्मिन व्रते अंगत्वेन विहिता तदव्रतं शिवरात्र्‌याख्याम्‌।’
इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है और जिसका शिव के साथ विशेष संबंध है। शिवरात्रि, जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को है, उसमें शिव पूजा, उपवास और रात्रि जागरण का प्रावधान है। इस महारात्रि को शिव की पूजा करना सचमुच एक महाव्रत है।
ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के व्रत पर भगवान शिव की भक्ति, दर्शन, पूजा, उपवास एवं व्रत नहीं रखता, वह सांसारिक माया, मोह एवं आवागमन के बँधन से हजारों वर्षों तक उलझा रहता है। यह भी कहा गया है कि जो शिवरात्रि पर जागरण करता है, उपवास रखता है और कहीं भी किसी भी शिवजी के मंदिर में जाकर भगवान शिवलिंग के दर्शन करता है, वह जन्म-मरण पुनर्जन्म के बँधन से मुक्ति पा जाता है। शिवरात्रि के व्रत के बारे में पुराणों में कहा गया है कि इसका फल कभी किसी हालत में भी निरर्थक नहीं जाता है।
शिवरात्रि व्रत धर्म का उत्तम साधन :
शिवरात्रि का व्रत सबसे अधिक बलवान है। भोग और मोक्ष का फलदाता शिवरात्रि का व्रत है। इस व्रत को छोड़कर दूसरा मनुष्यों के लिए हितकारक व्रत नहीं है। यह व्रत सबके लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सांसारिक सभी मनुष्य, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, पुरुषों, बालक-बालिकाओं तथा देवता आदि सभी देहधारियों के लिए शिवरात्रि का यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक है।
शिवरात्रि के दिन प्रातः उठकर स्नानादि कर शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का विधिवत पूजन कर नमन करें। रात्रि जागरण महाशिवरात्रि व्रत में विशेष फलदायी है।
गीता में इसे स्पष्ट किया गया है-
या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।
यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्चतो सुनेः
तात्पर्य यह कि विषयासक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते हैं और जहाँ शिवपूजा का अर्थ पुष्प, चंदन एवं बिल्वपत्र, धतूरा, भाँग आदि अर्पित कर भगवान शिव का जप व ध्यान करना और चित्त वृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा शिव के साथ एकाकार होना ही वास्तविक पूजा है। शिवरात्रि में चार प्रहरों में चार बार अलग-अलग विधि से पूजा का प्रावधान है।
महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान शिव की ईशान मूर्ति को दुग्ध द्वारा स्नान कराएँ, दूसरे प्रहर में उनकी अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएँ और तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएँ व चौथे प्रहर में उनकी सद्योजात मूर्ति को मधु द्वारा स्नान करवाएँ। इससे भगवान आशुतोष अतिप्रसन्न होते हैं। प्रातःकाल विसर्जन और व्रत की महिमा का श्रवण कर अमावस्या को निम्न प्रार्थना कर पारण करें –
संसार क्लेश दग्धस्य व्रतेनानेन शंकर।
प्रसीद समुखोनाथ, ज्ञान दृष्टि प्रदोभव
तात्पर्य यह कि भगवान शंकर! मैं हर रोज संसार की यातना से, दुःखों से दग्ध हो रहा हूँ। इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न हों और प्रभु संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।
ॐ नमः शिवाय’ कहिए और देवाधिदेव प्रसन्न होकर सब मनोरथ पूर्ण करेंगे। शिवरात्रि के दिन शिव को ताम्रफमल (बादाम), कमल पुष्प, अफीम बीज और धतूरे का पुष्प चढ़ाना चाहिए एवं अभिषेक कर बिल्व पत्र चढ़ाना चाहिए।जनगण के देवाधिदेव शिव ने यहीं भस्म किया था कामदेव को॥ जन गण मन के आराध्य भगवान शिव एवं शिवरात्रि सहज उपलब्धता और समाज के आखरी छोर पर खडे ब्यक्ति के लिए भी सिर्फ कल्याण की कामना यही शिव है, किरात भील जैसे आदिवासी एवं जनजाति से लेकर कुलीन एवम अभिजात्य वर्ग तक अनपढ़ गंवार से लेकर ज्ञानी अज्ञानी तक सांसारिक मोहमाया में फंसे लोगो से लेकर तपस्वियों, योगियों, निर्धन, फक्कडों, साधन सम्पन्न सभी तबके के आराध्य देव है भगवान शिव, भारत वर्ष में अन्य देवी देवताओं के मन्दिरों की तुलना में शिव मन्दिर सर्वाधिक है।
हर गली मुहल्ले गांव देहात घाट अखाडे बगीचे पर्वत नदी जलाशय के किनारे यहां तक की बियाबान जंगलों मे भी शिवलिंग के दर्शन हो जाते है। यह इस बात का साक्ष्य है कि हमारे श्रृजनता का भगवान शिव में अगाध प्रेम भरा है। वस्तुत: इनका आशुतोष होना अवघडदानी होना केवल वेलपत्र या जल चढानें मात्र से ही प्रशन्न होना आदि कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो इनको जन गण मन का देव अर्थात् महादेव बनाती है। हिन्दू धर्म में भगवान शिव को मृत्युलोक का देवता माना गया है। शिव को अनादि अनन्त अजन्मां माना गया है। यानि उनका न आरम्भ है न अन्त ।न उनका जन्म हुआ है न वे मृत्यु को प्राप्त होते है। इस तरह से भगवान शिव अवतार न होकर साक्षात ईश्वर है। शिव की साकार यानि मुर्ति रूप एवम निराकार यानि अमूर्त रूप में आराधना की जाती है। शास्त्रों में भगवान शिव का चरित्र कल्याण कारी माना गया है।
धार्मिक आस्था से इन शिव नामों का ध्यान मात्र ही शुभ फल देता है। शिव के इन सभी रूप और नामों का स्मरण मात्र ही हर भक्त के सभी दु:ख और कष्टों को दूर कर उसकी हर इच्छा और सुख की पूर्ति करने वाला माना गया है।इसी का एक रूप गाजीपुर जनपद के आखिरी छोर पर स्थित कामेश्वर नाथ धाम कारो (जनपद बलिया) का है।रामायण काल से पूर्व में इस स्थान पर गंगा सरजू का संगम था और इसी स्थान पर भगवान शिव समाधिस्थ हो तपस्यारत थे। उस समय तारकासुर नामक दैत्य राज के आतंक से पूरा ब्रम्हांड व्यथित था। उसके आतंक से मुक्ति का बस एक ही उपाय था कि किसी तरह से समाधिस्थ शिव में काम भावना का संचार हो और शिव पुत्र कार्तिकेय का जन्म हो जिनके हाथो तारकासुर का बध होना निश्चित था। देवताओं के आग्रह पर देव सेनापति कामदेव समाधिस्थ शिव की साधना भूमिं कारो की धरती पर पधारे।
सर्वप्रथम कामदेव ने अप्सराओं ,गंधर्वों के नृत्य गान से भगवान शिव को जगाने का भरपूर प्रयास किया ।विफल होने पर कामदेव ने आम्र बृक्ष के पत्तों मे छिपकर अपने पुष्प धनुष से पंच बाण हर्षण प्रहस्टचेता सम्मोहन प्राहिणों एवम मोहिनी का शिव ह्रदय में प्रहार कर शिव की समाधि को भंग कर दिया। इस पंच बाण के प्रहार से क्रोधित भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। तभी से वह जला पेंड युगो युगो से आज भी प्रमाण के रूप में अपनी जगह पर खडा है।आज भी उस आम के पेंड की उम्र के बारे में किसी को जानकारी नहीं है। पिढी दर पिढी इस आम के पेंड के मौजूद रहने की सभी को जानकारी है।इस कामेश्वर नाथ का वर्णन बाल्मीकि रामायण के बाल सर्ग के 23 के दस पन्द्रह में मिलता है। जिसमे अयोध्या से बक्सर जाते समय महर्षि विश्वामित्र भगवान राम को बताते है की देखो रघुनंदन यही वह स्थान है जहां तपस्या रत भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था।
कन्दर्पो मूर्ति मानसित्त काम इत्युच्यते बुधै: तपस्यामि: स्थाणु: नियमेन समाहितम्।इस स्थान पर हर काल हर खण्ड में ऋषि मुनी प्रत्यक्ष एवम अप्रत्यक्ष रूप से साधना रत रहते है। इस स्थान पर भगवान राम अनुज लक्ष्मण एवम महर्षि विश्वामित्र के साथ रात्रि विश्राम करने के पश्चात बक्सर गये थे।स्कन्द पुराण के अनुसार महर्षि दुर्वासा ने भी इसी आम के बृक्ष के नीचे तपस्या किया था।महात्मां बुद्ध बोध गया से सारनाथ जाते समय यहां पर रूके थे। ह्वेन सांग एवम फाह्यान ने अपने यात्रा बृतांत में यहां का वर्णन किया है। शिव पुराण देवीपुराण स्कंद पुराण पद्मपुराण बाल्मीकि रामायण समेत ढेर सारे ग्रन्थों में कामेश्वर धाम का वर्णन मिलता है।
महर्षि वाल्मीकि गर्ग पराशर अरण्य गालव भृगु वशिष्ठ अत्रि गौतम आरूणी आदि ब्रह्म वेत्ता ऋषि मुनियों से सेवित इस पावन तीर्थ का दर्शन स्पर्श करने वाले नर नारी स्वयं नारायण हो जाते है। मन्दिर के ब्यवस्थापक रमाशंकर दास के देख रेख में करोणो रूपये खर्च कर धाम का सुन्दरीकरण किया गया है। शिव रात्रि के अवसर पर और सावन में लाखो लोग यहा आकर बाबा कामेश्वर नाथ का दर्शन पूजन करते है।शिवरात्रि के दिन यहां पर बिशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
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उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है , जिसके कपाट साल में बस एक बार रक्षाबंधन के दिन खुलते हैं।


उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है , जिसके कपाट साल में बस एक बार रक्षाबंधन के दिन खुलते हैं। इस वजह से भगवान बंशीनारायण के इस मंदिर में केवल एक ही दिन पूजा होती है। ये मंदिर समुद्रतल से बारह फीट की ऊचाई पर है। रक्षाबंधन पर आसपास के इलाकों में रहने वाले बहनें भगवान बंशीनारायण को राखी बांधती है। इसके बाद ही भाइयों की कलाई पर प्यार की डोर बांधती हैं। सूर्यास्त होते ही मंदिर के कपाट एक साल के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं। चोली जिले के उच्च हिमालय क्षेत्र में स्थित इस दस फुट ऊंचे मंदिर में भगवान चतुर्भज की मूर्ति विराजमान है।परंपरा के अनुसार मंदिर के पुजारी राजपूत हैं। पुजारी पुराण का हवाला देते हुए बताते हैं कि बामन अवतार धारण कर भगवान विष्णु ने दानवीर राजा बलि का अभिमान चूर करके उसे पाताल लोक भेजा।बलि ने भगवान से अपनी सुरक्षा का आग्रह किया। इस पर विष्णु भगवान स्वयं पाताल लोक में बलि के खरपाल हो गए। ऐसे में पति को मुक्त कराने के लिए देवी लक्ष्मी पाताल लोक पहुंची और राजा बलि को राखी बांधकर भगवान को मुक्त कराया। मान्यता है कि पाताल लोक से भगवान यहीं प्रकट हुए थे। भगवान को राखी बांधने से स्वंय भगवान हरि उनकी रक्षा करत

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बिलाड़ा – मंदिर


यह मंदिर बिलाड़ा नगर से 4 किमी. दूर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। यहीं वह स्थान है जहा असुर राजा बलि ने अपना 100 वाँ यज्ञ किया। यहीं पर साक्षात् भगवान विष्णु वामन (बामन) अवतार के रूप में आये थे। राजा बलि द्वारा किये गए यज्ञ के अवशेष आज भी अपभ्रंश के रूप में यहाँ मौजूद है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा के पास किसी गड्ढे को एक बड़े पत्थर से ढका हुआ प्रतीत होता है। कहा जाता है इसी जगह पर राजा बलि को पाताललोक भेजा गया था।

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12वीं सदी का यह शिव मंदिर आज भी है विज्ञान की समझ से परे


12वीं सदी का यह शिव मंदिर आज भी है विज्ञान की समझ से परे

‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। विज्ञान जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है।

प्राचीन सनातन हिन्दू मन्दिर भी विज्ञान के लिए हमेशा से रहस्य बने हुए हैं। भारतीय वैज्ञानिकों समेत विदेशी वैज्ञानिक भी इन मन्दिरों के रहस्यों पर माथापच्ची करते रहते हैं। यूनेस्को द्वारा वैश्विक धरोहर घोषित तमिलनाड़ु के कुंभकोणम के पास दारासुरम में स्थित ‘एरावतेश्वर मंदिर’ भी एक ऐसा ही रहस्यमयी मंदिर है।

12वीं सदी में राजराजा चोल द्वितीय द्वारा निर्मित इस मंदिर को तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर तथा गांगेयकोंडा चोलापुरम के गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर के साथ यूनेस्को द्वारा वैश्विक धरोहर स्थल बनाया गया है। इन मंदिरों को महान जीवंत चोल मंदिरों के रूप में जाना जाता है। एरावतेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। भगवान शिव को यहां ऐरावतेश्वर के रूप में जाना जाता है।

मंदिर की सीढियों में बजता है संगीत

एरावतेश्वर मंदिर कला और स्थापत्य कला का भंडार है और इसमें पत्थरों पर शानदार नक्काशी देखने को मिलती है। बेशक यह मंदिर बृहदीश्वर मंदिर या गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर से बहुत छोटा है, मगर विस्तार में अधिक उत्तम है। मान्यता है कि यह मंदिर नित्य-विनोद, सतत मनोरंजन, को ध्यान में रखकर बनाया गया था।

मंदिर स्थित विमाना (स्तंभ) 24 मीटर (80फीट) उंचा है। वहीं सामने के मण्डपम का दक्षिणी भाग पत्थर के बड़े पहियों वाले एक विशाल रथ के रूप में है जिसे घोड़ें द्वारा खींचा जा रहा है। मंदिर के भीतरी आंगन के पूर्व में बेहतरीन नक्काशीदार इमारतों का एक समूह स्थित है जिनमें से एक को बलिपीट (बलि देने का स्थान) कहा जाता है। बलीपीट की चौकी पर एक छोटा मंदिर बना है जिसमें गणेश जी की छवि अंकित है।

चौकी के दक्षिणी तरफ शानदार नक्काशी से युक्त 3 सीढ़ियों का एक समूह है, जिन्हें चढ़ते समय विभिन्न प्रकार की संगीत ध्वनियां उत्पन्न होती हैं। मंदिर के आंगन के दक्षिण-पश्चिमी कोने में 4 तीर्थ वाला एक मंडपम है। जिनमें से एक पर यम की छवि बनी है। इस मंदिर के पास एक विशाल पत्थर की शिला मौजूद है जिस पर सप्तमाताओं (सात आकाशीय देवियां) की आकृतियां बनी हैं।

मंदिर का इतिहास

मन्दिर को भगवान शिव को यहां ऐरावतेश्वर के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस मंदिर में देवताओं के राजा इंद्र के सफेद हाथी एरावत द्वारा भगवान शिव की पूजा की गई थी। मान्याता है कि ऐरावत हाथी सफेद था मगर ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण हाथी का रंग बदल जाने से बहुत दुःखी था, उसने इस मंदिर के पवित्र जल में स्नान करके अपना सफेद रंग पुनः प्राप्त किया।

मंदिर में कई शिलालेख हैं। इन लेखों में एक में कुलोतुंगा चोल तृतीय द्वारा मंदिरों का नवीकरण कराए जाने के बारे में जानकारी मिलती है। गोपुरा के पास एक अन्य शिलालेख से पता चलता है कि एक आकृति कल्याणी से लाई गई, जिसे बाद में राजाधिराज चोल प्रथम द्वारा कल्याणपुरा नाम दिया गया, पश्चिमी चालुक्य राजा सोमेश्वर प्रथम से उसकी हार के बाद उनके पुत्र विक्रमादित्य षष्ठम और सोमेश्नर द्वितीय ने चालुक्यों की राजधानी पर कब्जा कर लिया।

वर्ष 2004 में एरावतेश्वर मंदिर को महान चोल जीवंत मंदिरों की यूनेस्को वैश्विक धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया। बता दें कि महान चोल जीवंत मंदिरों की सूची में तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, गांगेयकोंडा चोलापुरम का गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर शामिल हैं। मान्यता है कि इन सभी मंदिरों को 10वीं और 12वीं सदी के बीच चोलों द्वारा बनाया गया था।

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ब्रज 84 कोस में ही मौजूद हैं


ब्रज 84 कोस में ही मौजूद हैं 4 धाम अधिक मास यानी मलमास या पुरुषोत्तम मास में ब्रज के मठ मंदिरों में यूं तो अनेक धार्मिक कार्यक्रम और अनुष्ठान होते हैं, लेकिन ब्रज के प्रमुख स्थलों मथुरा, वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि इस समय में जो भी पूजा या धार्मिक कार्य किए जाते हैं उसका कई गुणा पुण्य मिलता है। इस माह में ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा का भी अपना अलग महत्व है। इस परिक्रमा में कृष्ण काल के तमाम लीला स्थल और देवालय शामिल हैं जो पूरे ब्रज में चौरासी कोस में फैले हुए हैं। मान्यता है कि अधिक मास में इनकी परिक्रमा करके श्रद्धालु पुण्य कमाते हैं। ब्रज चौरासी कोस की यह परिक्रमा हरियाणा और राजस्थान के गांवों से भी होकर गुजरती है। 1300 गावों से गुजरती हैं परिक्रमा करीब 268 किलोमीटर परिक्रमा मार्ग में करीब 1300 के आसपास गांव पड़ते हैं। कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी 1100 सरोवरें, 36 वन-उपवन, पहाड़-पर्वत पड़ते हैं। बालकृष्ण की लीलाओं के साक्षी उन स्थल और देवालयों के दर्शन भी परिक्रमार्थी करते हैं जिनके दर्शन शायद ही पहले कभी किए हों। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं को यमुना नदी को भी पार करना होता है। सभी तीर्थों को ब्रज में बुलाया मान्यता है कि जब यशोदा मैया और नंद बाबा ने भगवान श्री कृष्ण से 4 धाम की यात्रा की इच्छा जाहिर की तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि आप बुजुर्ग हो गए हैं, इसलिए मैं आप के लिए यहीं सभी तीर्थों और चारों धामों को आह्वान कर बुला देता हूं। उसी समय से केदरनाथ और बद्रीनाथ भी यहां मौजूद हो गए। 84 कोस के अंदर राजस्थान की सीमा पर मौजूद पहाड़ पर केदारनाथ का मंदिर है। पर्वत पर नंदी स्वरूप में दिखने वाली विशालकाय शिला के नीचे शिव जी का छोटा सा मंदिर है। इसके अलावा बद्रीनाथ भी 84 कोस में ही विराजमान हैं। जिन्हें बूढ़े बद्री के नाम से जाना जाता है। मंदिर के पास ही अलकनंदा कुंड भी है। इसके अलावा गुप्त काशी, यमुनोत्री और गंगोत्री के भी दर्शन यहां श्रद्धालुओं को होते हैं। शॉर्टकट पर अधूरी मानी जाती है परिक्रमा 84 कोस परिक्रमा के लिए स्थान, गांव और इसकी जद में आने वाले मंदिर और परिक्रमा मार्ग पहले से ही तय हैं और उसी रास्ते से होकर श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं। कीचड़, कंकड़-पत्थर के रास्तों पर ही चलकर श्रद्धालु परिक्रमा पूरी करते हैं। कोई भी श्रद्धालु दूरी कम करने के लिए शॉर्टकट या दूसरे रास्तों से होकर नहीं गुजरता और ऐसा करने पर उसकी परिक्रमा अधूरी मानी जाती है। प्रमुख सरोवर कृष्ण की लीलाओं की साक्षी और उनसे जुड़ी प्रमुख सरोवरों में जो प्रमुख सरोवरें है, उनमें सूरज सरोवर, कुसुम सरोवर, विमल सरोवर, चंद्र सरोवर, रूप सरोवर, पान सरोवर, मान सरोवर, प्रेम सरोवर, नारायण सरोवर, नयन सरोवर आदि हैं। परिक्रमाथी इन सरोवरों के दर्शन करने के साथ ही आचमन लेकर और इनमें स्नान कर स्वयं को धन्य मानते हैं। ब्रज में विद्यमान 16 देवियां कात्यायनी देवी, शीतला देवी, संकेत देवी, ददिहारी, सरस्वती देवी, वृंदादेवी, वनदेवी, विमला देवी, पोतरा देवी, नरी सैमरी देवी, सांचैली देवी, नौवारी देवी, चौवारी देवी, योगमाया देवी, मनसा देवी, बंदी की आनंदी देवी। ब्रज क्षेत्र के प्रमुख महादेव मंदिर भूतेश्वर महादेव, केदारनाथ, आशेश्वर महादेव, चकलेश्वर महादेव, रंगेश्वर महादेव, नंदीश्वर महादेव, पिपलेश्वर महादेव, रामेश्वर महादेव, गोकुलेश्वर महादेव, चिंतेश्वर महादेव, गोपेश्वर महादेव, चक्रेश्वर महादेव। ऐसे होती है परिक्रमा वाहनों से : आजकल लोगों के पास समय का अभाव है। उनके लिए तमाम आश्रमों और संस्थाओं की ओर से ब्रज चौरासी कोस की यात्रा वाहनों के जरिए करवाई जाती है। इसके लिए परिक्रमा कराने वाले संचालकों की तरफ से सुविधानुसार एक तय शुल्क प्रति श्रद्धालु लिया जाता है। इसमें वाहन का किराया, खाना-पीना, ठहरना शामिल होता है। वाहनों से कराई जाने वाली ब्रज चौरासी कोस यात्रा में 3 से 5 दिन का समय लगता है। इसमें श्रद्धालुओं को प्रमुख स्थलों, वनों, मंदिरों के दर्शन कराए जाते हैं। पैदल परिक्रमा पैदल यात्रा का अपना अलग ही आनंद है। इसमें श्रद्धालु किसी मंदिर या आश्रम की ओर से कराई जाने वाली यात्रा में शामिल होकर अपने रुकने और ठहरने का शुल्क आश्रम या मंदिर संचालक को देता है, जो बहुत कम होता है। सारे इंतजाम आश्रम या मंदिर संचालक करते हैं। रुकने के लिए टेंट और खाने के लिए भोजन की व्यवस्था रहती है। इस परिक्रमा को पूरा करने में 30 दिन का समय लगता है। चलने वाले जत्थे के ऊपर तय होता है कि वह एक दिन में कितनी दूरी तय कर सकता है। देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां इस परिक्रमा के लिए आते हैं। आचार्य विकाश शर्मा

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क्या आप 1500 वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं


क्या आप 1500 वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं? ‘ वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ। एक वैभवशाली सुंदर शिवलिंग। इतना समृध्द कि उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी। अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए उसे लूटा गया। सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए। इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था। लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है। सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है और हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है! न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है। इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है। यह ‘बाणस्तंभ’ नाम से जाना जाता है। यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ माना जाता है। यह एक दिशादर्शक स्तंभ है जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है इस बाणस्तंभ पर लिखा है – ‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग’ इसका अर्थ हुआ कि ‘इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है।’ अर्थात ‘इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है। जब मैंने पहली बार इस स्तंभ के बारे में पढ़ा तो सिर चकरा गया। यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था। कैसे संभव है? और यदि यह सच हैं तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं। संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं इस पंक्ति का सरल अर्थ यह है, कि ‘सोमनाथ मंदिर के इस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक (अर्थात अंटार्टिका तक) एक सीधी रेखा खिंची जाए, तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है।’ क्या यह सच है? आज के इस तंत्र विज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं। गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ करते हुए आगे गये। यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम है लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड (अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड) नहीं आता है। अर्थात हम पूर्ण रूप से मान कर चलें कि उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है! किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है अगर मान कर भी चलते हैं कि सन 600 ई० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था,। तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव है यह ज्ञान हमारे पास कहां से आया? अच्छा दक्षिण ध्रुव ज्ञात था, यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी भूखंड नहीं आता है यह ‘मैपिंग’ किसने किया? कैसे किया? सब कुछ अद्भुत।। इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं पृथ्वी का दक्षिण ध्रुव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था। यह कैसे संभव हुआ? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कौन सा साधन उपलब्ध था? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था? नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं) कहते है। यह प्राचीन शास्त्र है ईसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे। परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है। हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड ईसा पूर्व 611 से 546 वर्ष था किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है। इसलिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण ध्रुव दिखने का कोई कारण ही नहीं था। आज की दुनिया के वास्तविक रूप के करीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन 1490 के आसपास तैयार किया था। ऐसा माना जाता हैं की कोलंबस और वास्कोडिगामा ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था। ‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था! ‘एनेक्सिमेंडर’ ईशा के पूर्व 600 वर्ष पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था! ‘एरिस्टोटल’ (ईसा पूर्व 384– ईसा पूर्व 322) ने भी पृथ्वी को गोल माना था। लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था जिसके प्रमाण भी मिलते है! इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन 500 के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास 4967 योजन हैं! (अर्थात नए मापदंडों के अनुसार 39668 किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया। आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास 40068 किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र 0.26% का अंतर आ रहा है जो निगलेक्लट किया जा सकता है। लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया? सन 2008 में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया था कि ईसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष भारत में नक्शाशास्त्र अत्यंत विकसित था। नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे! भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण एशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं उससे यह ज्ञात होता है की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा,सुमात्रा, यवनद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे। सन 1955 में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं! इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं। सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन उस समय के भारतीयों को था यह निश्चित है। लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता है की दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है! ऐसा बाद में खोज निकाला या दक्षिण ध्रुव से भारत के पश्चिम तट पर बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया?