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ब्रिटिश-मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकारों ने हिन्दुओं के साथ छल किया-

पैगंबर मोहम्मद साहब का जब जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ गुफा में हो रही है पूजा-अर्चना! इसलिए इस झूठ को नकारिए कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुसलिम ने की थी

अमरनाथ का पूरा इतिहास

बाबा बर्फानी के दर्शन के अमरनाथ यात्रा शुरू हो गयी है। अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही फिर से सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने गलत इतिहास की व्याख्या शुरू कर दी है कि इस गुफा को 1850 में एक मुसलिम बूटा मलिक ने खोजा था! पिछले साल तो पत्रकारिता का गोयनका अवार्ड घोषित करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था। जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब इसलाम इस धरती पर मौजूद भी नहीं था, यानी इसलाम पैगंबर मोहम्मद पर कुरान उतरना तो छोडि़ए, उनका जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं।

कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है। श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर 3888 मीटर की उंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को तो भारतीय पुरातत्व विभाग ही 5 हजार वर्ष प्राचीन मानता है। यानी महाभारत काल से इस गुफा की मौजूदगी खुद भारतीय एजेंसियों मानती हैं। लेकिन यह भारत का सेक्यूलरिज्म है, जो तथ्यों और इतिहास से नहीं, मार्क्सवादी-नेहरूवादियों के ‘परसेप्शन’ से चलता है! वही ‘परसेप्शन’ इस बार भी बनाने का प्रयास आरंभ हो चुका है।

‘राजतरंगिणी’ में अमरनाथ

अमरनाथ की गुफा प्राकृतिक है न कि मानव नर्मित। इसलिए पांच हजार वर्ष की पुरातत्व विभाग की यह गणना भी कम ही पड़ती है, क्योंकि हिमालय के पहाड़ लाखों वर्ष पुराने माने जाते हैं। यानी यह प्राकृतिक गुफा लाखों वर्ष से है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इसका उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत शैव थे और वह पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे। ज्ञात हो कि बर्फ का शिवलिंग अमरनाथ को छोड़कर और कहीं नहीं है। यानी वामपंथी, जिस 1850 में अमरनाथ गुफा को खोजे जाने का कुतर्क गढ़ते हैं, इससे कई शताब्दी पूर्व कश्मीर के राजा खुद बाबा बर्फानी की पूजा कर रहे थे।

“नीलमत पुराण” और “बृंगेश संहिता” में अमरनाथ

नीलमत पुराण, बृंगेश संहिता में भी अमरनाथ तीर्थ का बारंबार उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में लिखा है कि अमरनाथ की गुफा की ओर जाते समय अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती में यात्री धार्मिक अनुष्ठान करते थे।

वहीं छठी में लिखे गये नीलमत पुराण में अमरनाथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख है। नीलमत पुराण में कश्मीर के इतिहास, भूगोल, लोककथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत रूप में जानकारी उपलब्ध है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गये वर्णन से पता चलता है कि छठी शताब्दी में लोग अमरनाथ यात्रा किया करते थे।

नीलमत पुराण में तब अमरनाथ यात्रा का जिक्र है जब इस्लामी पैगंबर मोहम्मद का जन्म भी नहीं हुआ था। तो फिर किस तरह से बूटा मलिक नामक एक मुसलमान गड़रिया अमरनाथ गुफा की खोज कर कर सकता है? ब्रिटिशर्स, मार्क्सवादी और नेहरूवादी इतिहासकार का पूरा जोर इस बात को साबित करने में है कि कश्मीर में मुसलमान हिंदुओं से पुराने वाशिंदे हैं। इसलिए अमरनाथ की यात्रा को कुछ सौ साल पहले शुरु हुआ बताकर वहां मुसलिम अलगाववाद की एक तरह से स्थापना का प्रयास किया गया है!

इतिहास में “अमरनाथ गुफा” का उल्लेख”

अमित कुमार सिंह द्वारा लिखित ‘अमरनाथ यात्रा’ नामक पुस्तक के अनुसार, पुराण में अमरगंगा का भी उल्लेख है, जो सिंधु नदी की एक सहायक नदी थी। अमरनाथ गुफा जाने के लिए इस नदी के पास से गुजरना पड़ता था। ऐसी मान्यता था कि बाबा बर्फानी के दर्शन से पहले इस नदी की मिट्टी शरीर पर लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। शिव भक्त इस मिट्टी को अपने शरीर पर लगाते थे।

पुराण में वर्णित है कि अमरनाथ गुफा की उंचाई 250 फीट और चौड़ाई 50 फीट थी। इसी गुफा में बर्फ से बना एक विशाल शिवलिंग था, जिसे बाहर से ही देखा जा सकता था। बर्नियर ट्रेवल्स में भी बर्नियर ने इस शिवलिंग का वर्णन किया है। विंसेट-ए-स्मिथ ने बर्नियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का संपादन करते हुए लिखा है कि अमरनाथ की गुफा आश्चर्यजनक है, जहां छत से पानी बूंद-बूंद टपकता रहता है और जमकर बर्फ के खंड का रूप ले लेता है। हिंदू इसी को शिव प्रतिमा के रूप में पूजते हैं। ‘राजतरंगिणी’ तृतीय खंड की पृष्ठ संख्या-409 पर डॉ. स्टेन ने लिखा है कि अमरनाथ गुफा में 7 से 8 फीट की चौड़ा और दो फीट लंबा शिवलिंग है। कल्हण की राजतरंगिणी द्वितीय, में कश्मीर के शासक सामदीमत 34 ई.पू से 17 वीं ईस्वी और उनके बाबा बर्फानी के भक्त होने का उल्लेख है।

यही नहीं, जिस बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित किया जाता है, उससे करीब 400 साल पूर्व कश्मीर में बादशाह जैनुलबुद्दीन का शासन 1420-70 था। उसने भी अमरनाथ की यात्रा की थी। इतिहासकार जोनराज ने इसका उल्लेख किया है। 16 वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के समय के इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईने-अकबरी’ में अमरनाथ का जिक्र एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल के रूप में किया है। ‘आईने-अकबरी’ में लिखा है- गुफा में बर्फ का एक बुलबुला बनता है। यह थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढ़ता है और यह दो गज से अधिक उंचा हो जाता है। चंद्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू हो जाता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।

वास्तव में कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामी आक्रांता के हमले के बाद हिंदुओं को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा। इसके बारण 14 वीं शताब्दी के मध्य से करीब 300 साल तक यह यात्रा बाधित रही। यह यात्रा फिर से 1872 में आरंभ हुई। इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ इतिहासकारों ने बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजक साबित कर दिया और इसे लगभग मान्यता के रूप में स्थापित कर दिया। जनश्रुति भी लिख दी गई जिसमें बूटा मलिक को लेकर एक कहानी बुन दी गई कि उसे एक साधु मिला। साधु ने बूट को कोयले से भरा एक थैला दिया। घर पहुंच कर बूटा ने जब थैला खोला तो उसमें उसने चमकता हुआ हीरा माया। वह वह हीरा लौटाने या फिर खुश होकर धन्यवाद देने जब उस साधु के पास पहुंचा तो वहां साधु नहीं था, बल्कि सामने अमरनाथ का गुफा था।

आज भी अमरनाथ में जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसका एक भाग बूटा मलिक के परिवार को दिया जाता है

चढ़ावा देने से हमारा विरोध नहीं है, लेकिन झूठ के बल पर इसे दशक-दर-दशक स्थापित करने का यह जो प्रयास किया गया है, उसमें बहुत हद तक इन लोगों को दसफलता मिल चुकी है। आज भी किसी हिंदू से पूछिए, वह नीलमत पुराण का नाम नहीं बताएगा, लेकिन एक मुसलिम गरेडि़ए ने अमरनाथ गुफा की खोज की, तुरंत इस फर्जी इतिहास पर बात करने लगेगा। यही फेक विमर्श का प्रभाव होता है।

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सन्‌ १६४८ ई. में जब वह शहजादा था, गुजरात में सीताराम जौहरी द्वारा बनवाया गया चिन्तामणि मंदिर उसने तुड़वाया। उसके स्थान पर ‘कुव्वतुल इस्लाम’ मस्जिद बनवाई गई और वहाँ एक गार्य कुर्बान की गई।

सन्‌ १६४८ ई. में मीर जुमला को कूच बिहार भेजा गया। उसने वहाँ के तमाम मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बना दी।

सन्‌ १६६६ ई. में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा में दारा द्वारा लगाई गई पत्थर की जाली हटाने का आदेश दिया-‘इस्लाम में मंदिर को देखना भी पाप है और इस दारा ने मंदिर में जाली लगवाई?’

सन्‌ १६६९ ई. में ठट्‌टा, मुल्तान और बनारस में पाठशालाएँ और मंदिर तोड़ने के आदेश दिये। काशी में विद्गवनाथ का मंदिर तोड़ा गया और उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया।

सन्‌ १६७० ई. में कृष्णजन्मभूमि मंदिर, मथुरा, तोड़ा गया। उस पर मस्जिद बनाई गई। मूर्तियाँ जहाँनारा मस्जिद, आगरा, की सीढ़ियों पर बिछा दी गई।

सोरों में रामचंद्र जी का मंदिर, गोंडा में देवी पाटन का मंदिर, उज्जैन के समस्त मंदिर, मेदनीपुर बंगाल के समस्त मंदिर, तोड़े गये।

सन्‌ १६७२ ई. में हजारों सतनामी कत्ल कर दिये गये। गुरु तेग बहादुर का काद्गमीर के ब्राहम्णों के बलात्‌ धर्म परिवर्तन का विरोध करने के कारण वध करवाया गया।

सन्‌ १६७९ ई. में हिन्दुओं पर जिजिया कर फिर लगा दिया गया जो अकबर ने माफ़ कर दिया था। दिल्ली में जिजिया के विरोध में प्रार्थना करने वालों को हाथी से कुचलवाया गया। खंडेला में मंदिर तुड़वाये गये।

जोधपुर से मंदिरों की टूटी मूर्तियों से भरी कई गाड़ियाँ दिल्ली लाई गईं और उनको मस्जिदों की सीढ़ियों पर बिछाने के आदेश दिये गये।

सन्‌ १६८० ई. में ‘उदयपुर के मंदिरों को नष्ट किया गया। १७२ मंदिरों को तोड़ने की सूचना दरबार में आई। ६२ मंदिर चित्तौड़ में तोड़े गये। ६६ मंदिर अम्बेर में तोड़े गये। सोमेद्गवर का मंदिर मेवाड़ में तोड़ा गया। सतारा में खांडेराव का मंदिर तुड़वायागया।

सन्‌ १६९० ई. में एलौरा, त्रयम्वकेद्गवर, नरसिंहपुर एवं पंढारपुर के मंदिर तुड़वाये गये।

सन्‌ १६९८ ई. में बीजापुर के मंदिर ध्वस्त किये गये। उन पर मस्जिदें बनाई गई।(११२)

अरुण शुक्ला

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शिख श्रीअमृतसर साहब


पंजाब में सिखों की जो तीन पवित्र नगरियाँ हैं उनमें से एक है सुल्तानपुर लोधी। बाकी दो हैं – श्री अमृतसर साहब और श्री आनंदपुर साहब।

‘सुल्तानपुर लोधी’ वो जगह है जहाँ गुरु नानकदेव जी १४ बरस रहे थे। सुल्तानपुर लोधी सिख बाहुल्य क्षेत्र है।
उस इलाके में स्कूलों में 90% बच्चे सिख हैं।

पिछले वर्ष 20 से 30 दिसंबर के बीच एक अभियान चला के स्कूल के बच्चों को गौरवशाली सिख इतिहास से अवगत कराया गया।
स्कूल में ‘चार साहिबजादे’ फिल्म दिखाई गयी। पूरे 10 दिन तक कार्यक्रम चले। बच्चों ने Project बनाये। Google और Youtube खंगाला गया।

बच्चों को Homework दिया गया कि अपने दादा-दादी, नाना-नानी, मम्मी-पापा से चार साहिबज़ादों की शहादत की कहानी सुनो और फिर उसे अपने शब्दों में लिखो।
जो परिणाम आये वो स्तब्धकारी थे। बच्चों ने स्कूल आकर बताया कि अधिकाँश बुज़ुर्गों और माँ-बाप को स्वयं नहीं पता कुछ भी… यहाँ तक कि चारों साहिबज़ादों के नाम तक याद नहीं।

प्रधानाचार्या के अनुसार… इतने बड़े स्कूल में एक भी बच्चे का नाम अजीत सिंह’, जुझार सिंह, जोरावर सिंह या फ़तेह सिंह नहीं!! पूरे स्कूल में सिर्फ एक बच्चे का नाम जुझार सिंह है।

इस जूझार सिंह नामक बच्चे के Parents NRI हैं और इटली में रहते हैं। जुझार की बहन का नाम Olivia है। पूरे स्कूल में एक भी बच्चे का नाम गोविंद सिंह या हरिकिशन सिंह नहीं है। जबकि ये वो लोग हैं जिन्होंने अपनी गर्दनें वार दीं कौम और धर्म की रक्षा में।

ये हाल है सुल्तानपुर लोधी के एक स्कूल का जहाँ 14 बड़े गुरुद्वारे हैं और ये सिखों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।…. शेष पंजाब का अंदाज़ा आप स्वयं लगा लीजिये।

आखिर ऐसा क्यों है?
क्या ये हमारे Education System का Failure नहीं है??
क्यों हमने अपना इतिहास भुला दिया???

किसी ज़माने में पंजाब में ये परंपरा थी कि इस एक हफ्ते में (20 से 27 Dec) लोग ‘भूमिशयन’ करते थे (क्योंकि माता गूजरी के साथ दोनों छोटे साहिबज़ादों को सरहिंद के किले में ठंडी बुर्ज में कैद कर रखा गया था और आपने ये तीनों ठंडी रातें ठिठुरते हुए बितायी थीं) उनके शोक या सम्मान में पंजाब के लोग ये एक सप्ताह ज़मीन पर सोते थे पर अब पंजाबियों ने इसे भी भुला दिया है। इस एक हफ्ते में कोई शादी-ब्याह का उत्सव नहीं होते थे पर उस दिन जब कि दोनों छोटे साहिबज़ादों का बलिदान दिवस था, जालंधर की एक पार्टी में सिखों को सिर पर शराब के गिलास रखकर नाचते देखा।

अब समझ में आया कि सैफ़ अली खान ने अपने बच्चों का नाम तैमूर क्यों रखा!!

जब हम स्वयं ही अपने पूर्वजों के गौरव को भुलाते जा रहे हैं तो क्या हमें किसी और को दोष देने का कोई हक़ है!!?

पुरानी पोस्ट ……..
Ajit Singh

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कैलाश मंदिर

सन १६८२ में उस मुस्लिम शासक ने १००० मजदूरों को इकट्ठा किया और इस मंदिर को तोड़ने का काम दिया।
मजदूरों ने १ वर्ष तक इसे तोड़ा,१ वर्ष लगातार तोड़ने के बाद वो सब इसकी कुछ मूर्तियाँ ही तोड़ सके,हार कर उस मुस्लिम शासक ने उन्हें वापस बुला लिया।
वो शासक था औरंगजेब।जिसकी मूर्ख सेना ये समझ बैठी थी कि ये कोई ईंट और मिटटी से बना साधारण मंदिर है;
लेकिन उन्हें कहाँ पता था की ये मंदिर हमारे पूर्वजों ने धरती की सबसे कठोर चट्टान को चीरकर बनाया है।
ये वही पत्थर है जो करोड़ों साल पहले धरती के गर्भ से लावे के रूप में निकला था और बाद में ठंडा होकर जमने से,इसने पत्थर का रूप लिया

कैलास मंदिर को U आकार में ऊपर से नीचे काटा गया है। जिसे पीछे की तरफ से ५९ मीटर गहरा खोदा गया है,पर आप सोचिये इतनी कठोर और मजबूत चट्टान को किस चीज़ से काटा गया होगा?
हथोड़े और छेनी से?
आपको मंदिर की दीवारों पर छेनी के निशान दिख जायेंगे, पर वहां के आध्यत्मिक गुरुओं का कहना है कि ये छेनी के निशान बाद के हैं,जब पूरा मंदिर बना दिया गया।
यह बस किनारों को निर्बाध करने के लिए उपयोग की गयीं थी।इतनी कठोर बेसाल्ट चट्टान को खोद कर उसमे से इस मंदिर को बना देना,कहाँ तक संभव है?
कुछ खोजकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की जटिल संरचना का आधुनिक तकनीक की मदद से निर्माण करना आज भी असंभव है।

क्या वो लोग जिन्होंने इस मंदिर को बनाया आज से भी ज्यादा आधुनिक थे?
ये एक उचित प्रश्न है।
यहाँ कुछ वैज्ञानिक आंकड़ों पर बात कर लेते हैं।
पुरातात्विदों का कहना है कि इस मंदिर को बनाने के लिए ४००,००० टन पत्थर को काट कर हटाया गया होगा और ऐसा करने में उन्हें १८ वर्ष का समय लगा होगा।

तो आइये एक सरल गणित की कैलकुलेशन करते हैं:
माना की इस काम को करने के लिए वहां काम कर रहे श्रमिक १२ घंटे प्रतिदिन एक मशीन की तरह कार्य कर रहे होंगे,जिसमें उन्हें कोई विराम या आराम नहीं मिलता होगा,वो पूर्ण रूप से मशीन बन गये होंगे।
तो अगर ४००,००० टन पत्थर को १८ वर्ष में हटाना है,तो उन्हें हर वर्ष २२,२२२ टन पत्थर हटाना होगा,जिसका अर्थ हुआ कि ६० टन हर दिन और ५ टन हर घंटे।
ये समय तो हुआ मात्र पत्थर को काट कर अलग करने का। उस समय का क्या जो इस मंदिर की डिजाईन,नक्काशी और इसमें बनाई गयीं सेकड़ों मुर्तियों में लगा होगा।

एक प्रश्न जो और है वो ये है कि जो पत्थर काट कर बाहर निकाला गया वो कहाँ गया?
उसका इस मंदिर के आसपास कोई ढेर नहीं मिलता,ना ही उस पत्थर का इस्तेमाल किसी दूसरे मंदिर को बनाने या अन्य किसी संरचना में किया गया,आखिर वो गया तो गया कहाँ?
क्या आप को अभी भी लगता है कि ये चमत्कार आज से हजारों वर्ष पहले मात्र छेनी और हथोड़े की सहायता से निर्माण किया गया होगा।

राष्ट्रकूट राजाओं ने वास्तुकला को चरम पर लाकर रख दिया,जैसा की बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम (७५६-७७३) ने करवाया था।
यह मंदिर उस भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है,जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में आज भी कोई नहीं कर सकता।
ये उस मुस्लिम शासक की बर्बरता और इस मंदिर के विरले कारीगरों की कुशलता दोनों को साथ में लिए आज भी खड़ा है और हमारे पूर्वजों के कौशल और पुरुषार्थ के सबूत देते हुए आधुनिक मानव को उसकी औकात दिखाते हुए कह रहा है कि दम है तो मुझे फिर से बनाकर दिखाओ!!

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गोल्डन टेम्पल


अमृतसर में हिन्दुओं का गोल्डन टेम्पल – श्री दुर्गियाना तीर्थ

जी हां, अमृतसर में एक गोल्डन टेम्पल नही अपितु 2 गोल्डन टेम्पल हैं।

एक हिन्दुओं का और दूसरा सिक्खों के।

हिन्दू लोग जाते हैं पंजाब, अमृतसर तो सिखों के गोल्डन टेम्पल तो जयेंगी परन्तु उन्हें नही ज्ञात कि अमृतसर में ही श्री दुर्गियाना तीर्थ के रूप में हिंदुओं का भी गोल्डन टेम्पल है।

जिसके बाहर 24 अवतारों की आकृतियां भी सुंदरता से उकेरी गई हैं।

सरोवर के बीचो बीच बनाया गया यह मंदिर अपनी भव्यता स्वयं बताता है।

30 क्विटल मछलियां आज तक निकाली जा चुकी हैं सरोवर से जो व्यास नदी (विपाशा नदी पुराणों में वर्णित) में छोड़ दी जाती हैं।

बात उन दिनों की है जब अंग्रेजो के कुचक्रों के तहत सिक्खों में खालिस्तान के बीज बोए जा रहे थे।

सभी गुरुद्वारों का केन्द्रीयकरण करने की नीयत से गुरुद्वारों पर कब्जा करने की योजना बनाई गई थी।

उससे पहले तक सभी गुरुद्वारों में हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां और महंत भी होते थे जो कि गुरु नानक के बड़े सुपुत्र श्रीचंद जी द्वारा शैव मत आधारित उदासीन सम्प्रदाय से नियुक्त किये जाते थे।

पर जब द्वेष, वैमनस्य बढ़ने लगा तो सवर्ण मन्दिर से एक दिन हिन्दू देवी देवताओं की प्रतिमाएं निकाल कर सड़क पर फेंक दी गईं।

वहां से फिर एक लाला जी गुजर रहे थे जिन्होंने सङ्कल्प लिया कि एक नवीन सवर्ण मन्दिर की स्थापना की जाएगी और तुरन्त एक ट्रक बुलाकर सभी प्रतिमाओं को विधिवत दुर्गियाना तीर्थ मन्दिर में स्थापित किया गया।

अमृतसर रेलवे स्टेशन के समीप ही लोहगढ़ गेट के पास स्थित माता दुर्गा को समर्पित है यह दुर्गियाना मंदिर ।

स्टेशन से दुर्गियाना मंदिर की दूरी मात्र डेढ़ किलोमीटर है।

मंदिर को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है; लक्ष्मी नारायण मंदिर, दुर्गा तीर्थ और शीतला मंदिर।

वास्तव में सबसे पहले मंदिर का निर्माण 16 वीं शताब्दी में ही हो गया था जिसे फिर से सन् 1921 में हरसाई मल कपूर द्वारा स्वर्ण मंदिर की वास्तुशैली की तर्ज़ पर निर्मित किया गया, और इसका उद्घाटन अखिल भारत हिन्दू महासभा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष महान समाज सुधारक व राजनेता महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी द्वारा किया गया।

सरोवर के बोचोबीच संगमरमर से बने इस मंदिर तक पहुँचने के लिए एक पुल बनाया गया है। मंदिर में काँगड़ा शैली की चित्रकला और शीशे का अद्भुत कार्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला है जिसमे मन्दिर के बाहरी स्वरुओ में स्वर्ण कार्य पर भगवान विष्णु के 24 अवतारों को उकेरा गया है।

दुर्गियाना तीर्थ को लव-कुश मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है और यहां एक वृक्ष भी है जिससे भगवान बजरंग बली को लव-कुश द्वारा बांधा गया था।

यहाँ माँ दुर्गा के अलावा कई अन्य देवी देवताओं को भी पूजा जाता है, जिनमें प्रमुख देवी देवता हैं; लक्ष्मी माता, भगवान श्रीकृष्णा और भगवान विष्णु।

तो इस बार आप सब जब अमृतसर जाएं तो दुर्गियाना तीर्थ भी अवश्य जाएं।

पंजाब सरकार की हिन्दू विरोधी अनीति और मानसिकता के चलते पंजाब Tourism के अंतर्गत इस मंदिर का प्रचार प्रसार नही किया जाता।

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Archaeology: Temple Under Sand
बालू के नीचे दबी मंदिर

सेटेलाइट ने अंगोकर मंदिर, कम्बोडिया तथा सूर्यकुंड का चित्रण लिया है। इसने पहली बार बालू के नीचे दबी उस पुरातात्विक प्राचीन मंदिर को भी खोजा जो आज बालू के नीचे दबे हैं। इसने स्पस्टतः बतलाया की सेटेलाइट का प्रयोग कैसे बालू के नीचे दबी सभ्यता को खोजने के लिए प्रयोग हो सकती है। इस तकनीक ने द्वारका खोज के लिए एनालॉग तकनीक प्रणाली बनाने का रास्ता बहुत कुछ साफ़ कर दिया। मोहनजोदड़ो का भी मंदिर और सूर्यकुंड कभी कम्बोडिया की तरह थी। हमारे पुरातात्विक जिन्हें हिन्दू आस्था का ज्ञान नहीं वे मोहनजोदड़ो के मंदिर को “बौद्ध स्तूप” और “जल कुंड” को “स्वीमिंग पूल” बतलाते हैं। स्वीमिंग-पूल बतला कर वे इसे हिन्दू इतर सभ्यता बतलाना चाहते हैं। ये १५०० ईस्वी पूर्व में भारत में आर्य आक्रमण की मूर्खता पूर्ण सिद्धांत मानते हैं इसलिए मोहन-जोदड़ो के “सूर्य-कुंड” को स्वीमिंग पूल मानना इनकी मूर्खता और लाचारी है।
This is one of the best examples how satellite can penetrate sand and discover the Archaeological material. This technique helped to develop the analogue technique in the Dwarka Discovery. The photo shown here is the satellite image of Angokar Temple, Cambodia. The blue-purple area slightly north of Angkor Temple (the bright square area), are vast sand dumped undiscovered structures of Hindu Temples. The image was acquired by the Spaceborne Imaging Radar-C/X-band Synthetic Aperture Radar (SIR-C/X-SAR) on September 30, 1994. The large black rectangles shown here is the ancient “Soorya-Kund” of the Hindu temple. The temple from the town of Mohan-Jodaro with “Soorya-Kund” is exactly like the Combodian Temple with the “Soorya-Kund”. Confuged archaeologists, who have no respect for science and Hindu tradition, call the Mohan-Jodaro’s “Soorya-Kund”, as swimming pool. They paint the Mohan-Jodaro “Soorya-Kund” as swimming pool to satisfy their foolishness for establishing the dirty theory of the Aryan Invasion at 1500 BCE.

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द्वारका


गुजरात हाई कोर्ट ने Bet Dwarka के 2 द्वीपों पर कब्जा जमाने के सुन्नी वक्फ बोर्ड के सपने को चकनाचूर कर दिया है।।

इस समय गुजरात का यह विषय बहुत चर्चा में है।। सोशल मीडिया के माध्यम से हम लोगों को मालूम पड़ गया वरना पता ही नहीं चलता।
कैसे पलायन होता है और कैसे कब्जा होता है, क्या लैंड जिहाद होता है वह समझने के लिए आप बस बेट द्वारिका टापू का अध्यन करलें तो सब प्रक्रिया समझ आ जायेगी।
कुछ साल पहले तक यहाँ कि लगभग पूरी आबादी हिन्दू थी।
यह ओखा नगरपालिका के अन्तर्गत आने वाला क्षेत्र है जहाँ जाने का एकमात्र रास्ता पानी से होकर जाता है।इसलिए बेट द्वारिका से बाहर जाने के लिए लोग नाव का प्रयोग करते हैं।।
यहाँ द्वारिकाधीश का प्राचीन मंदिर स्थित है।
कहते हैं कि 5हजार साल पहले यहाँ रुक्मिणी ने मूर्ति स्थापना करी थी।
समुद्र से घिरा यह टापू बड़ा शांत रहता था।
लोगो का मुख्य पेशा मछली पकड़ना था।
धीरे धीरे यहाँ बाहर से मछली पकड़ने वाले मुस्लिम आने लगे।
दयालु हिन्दू आबादी ने इन्हें वहाँ रहकर मछली पकड़ने की अनुमती दे दी।
धीरे धीरे मछली पकडने के पूरे कारोबार पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया।
बाहर से फंडिंग के चलते इन्होंने बाजार में सस्ती मछली बेची जिससे सब हिन्दू मछुआरे बेरोजगार हो गये।
अब हिन्दू आबादी ने रोजगार के लिए टापू से बाहर जाना शुरू किया।
लेकिन यहां एक और चमत्कार हो गया।
बेट द्वारिका से ओखा तक जाने के लिए नाव में 8 रुपये किराया लगता था।
अब क्योंकि सब नावों पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया था तो उन्होंने किराये का नया नियम बनाया।
जो हिन्दू नाव से ओखा जायेगा वह किराये के 100 रुपये देगा और मुस्लिम वही 8 रुपये देगा।
अब कोई दिहाड़ी हिन्दू केवल आवाजाही के 200 रुपये देगा तो वह बचायेगा क्या ?
इसलिए रोजगार के लिए हिन्दुओ ने वहाँ से पलायन शुरू कर दिया।
अब वहाँ केवल 15 प्रतिशत हिन्दू आबादी रहती है।
आपने पलायन का पहला कारण यहाँ पढ़ा।
रोजगार के 2 मुख्य साधन मछली पकड़ने का काम और ट्रांसपोर्ट दोनो हिन्दुओ से छीन लिया गया।

जैसे बाकी सब जगह राज मिस्त्री,कारपेंटर, इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री , ड्राइवर ,नाई व अन्य हाथ के काम 90% तक हिन्दुओ ने उनके हवाले कर दिये हैं।

अब बेट द्वारिका में तो 5 हजार साल पुराना मंदिर है जिसके दर्शन के लिए हिन्दू जाते थे तो इसमे वहां के जिहादियों ने नया करने तरीका निकाला।
क्योंकि आवाजाही के साधनों पर उनका कब्जा हो चुका था तो उन्होंने आने वाले श्रद्धालुओं से केवल 20-30 मिनट की जल यात्रा के 4 हजार से 5 हजार रुपये मांगने शुरू कर दिये।
इतना महंगा किराया आम व्यक्ति कैसे चुका पायेगा इसलिए लोगो ने वहां जाना बंद कर दिया।
अब वहाँ पूर्ण रूप से जिहादियों की पकड़ हो गई थी तो उन्होंने जगह जगह मकान बनाने शुरू किये, देखते ही देखते प्राचीन मंदिर चारो तरफ से अपने मजारों से घिर गया।

वहाँ की बची खुची हिन्दू आबादी सरकार को अपनी बात कहते कहते हार चुकी थी, फिर कुछ हिन्दू समाजसेवियों ने इसका संज्ञान लिया और सरकार को चेताया।
सरकार ने ओखा से बेट द्वारिका तक सिग्नेचर ब्रिज बनाने का काम शुरू करवाया। बाकी विषयो की जांच शुरू हुई तो जांच एजेंसी चौंक गई।

गुजरात में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका स्थित बेट द्वारिका के दो टापू पर अपना दावा ठोका है। वक्फ बोर्ड ने अपने आवेदन में दावा किया कि बेट द्वारका टापू पर दो द्वीपों का स्वामित्व वक्फ बोर्ड का है। गुजरात उच्च न्यायालय ने इस पर आश्चर्य जताते हुए पूछा कि कृष्ण नगरी पर आप कैसे दावा कर सकते हैं और इसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया।

बेट द्वारका में करीब आठ टापू है, जिनमें से दो पर भगवान कृष्ण के मंदिर बने हुए हैं। प्राचीन कहानियां बताती हैं कि भगवान कृष्ण की आराधना करते हुए मीरा यहीं पर उनकी मूर्ति में समा गई थी। बेट द्वारका के इन दो टापू पर करीब 7000 परिवार रहते हैं, इनमें से करीब 6000 परिवार मुस्लिम हैं। यह द्वारका के तट पर एक छोटा सा द्वीप है और ओखा से कुछ ही दूरी पर स्थित है। वक्फ बोर्ड इसी के आधार पर इन दो टापू पर अपना दावा जताता है।

यहां अभी इस साजिश का शुरुआती चरण ही था कि इसका खुलासा हो गया. सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इस चरण में कुछ लोग, ऐसी जमीनों पर कब्जा करके अवैध निर्माण बना रहे थे, जो रणनीतिक रूप से, भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता था.

अब जाकर सब अवैध कब्जे व मजारे तोड़ी जा रही हैं।
बेट द्वारिका में आने वाला कोई भी मुसलमान वहाँ का स्थानीय नही है सब बाहर के हैं।
फिर भी उन्होंने धीरे धीरे कुछ ही वर्षों में वहां के हिन्दुओ से सब कुछ छीन लिया और भारत के गुजरात जैसे एक राज्य का टापू सीरिया बन गया।
*सावधान व सजग रहना अत्यंत आवश्यक है ।।*
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हिंगलाज माता मंदिर


#हिंगलाज मातामंदिर ,पाकिस्तान
इसे पाकिस्तान में कहते हैं ‘नानी पीर’,,,,,

माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान में स्थित है। इस शक्तिपीठ की देखरेख मुस्लिम करते हैं और वे इसे चमत्कारिक स्थान मानते हैं। इस मंदिर का नाम है माता हिंगलाज का मंदिर। हिंगोल नदी और चंद्रकूप पहाड़ पर स्थित है माता का ये मंदिर। सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित यह गुफा मंदिर इतना विशालकाय क्षेत्र है कि आप इसे देखते ही रह जाएंगे। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि यह मंदिर 2000 वर्ष पूर्व भी यहीं विद्यमान था।

मां हिंगलाज मंदिर में हिंगलाज शक्तिपीठ की प्रतिरूप देवी की प्राचीन दर्शनीय प्रतिमा विराजमान हैं। माता हिंगलाज की ख्याति सिर्फ कराची और पाकिस्तान ही नहीं अपितु पूरे भारत में है। नवरात्रि के दौरान तो यहां पूरे नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन होता है। सिंध-कराची के लाखों सिंधी हिन्दू श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं। भारत से भी प्रतिवर्ष एक दल यहां दर्शन के लिए जाता है।

इस मंदिर पर गहरी आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि हिन्दू चाहे चारों धाम की यात्रा क्यों ना कर ले, काशी के पानी में स्नान क्यों ना कर ले, अयोध्या के मंदिर में पूजा-पाठ क्यों ना कर लें, लेकिन अगर वह हिंगलाज देवी के दर्शन नहीं करता तो यह सब व्यर्थ हो जाता है। वे स्त्रियां जो इस स्थान का दर्शन कर लेती हैं उन्हें हाजियानी कहते हैं। उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान के साथ देखा जाता है।

एक बार यहां माता ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो भक्त मेरा चुल चलेगा उसकी हर मनोकामना पुरी होगी। चुल एक प्रकार का अंगारों का बाड़ा होता है जिसे मंदिर के बहार 10 फिट लंबा बनाया जाता है और उसे धधकते हुए अंगारों से भरा जाता है जिस पर मन्नतधारी चल कर मंदिर में पहुचते हैं और ये माता का चमत्कार ही है की मन्नतधारी को जरा सी पीड़ा नहीं होती है और ना ही शरीर को किसी प्रकार का नुकसान होता है, लेकीन आपकी मन्नत जरूर पुरी होती है। हालांकि आजकल यह परंपरा नहीं रही।

#पौराणिक तथ्य : पौराणिक कथानुसार जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य करने लगे, तो ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया। मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था। इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता व्याप्त है। कहा जाता है कि हर रात इस स्थान पर सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं और दिन निकलते हिंगलाज माता के भीतर समा जाती हैं।

कई महान लोगों ने टेका है यहां माथा : जनश्रुति है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम भी यात्रा के लिए इस सिद्ध पीठ पर आए थे। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तप किया था। उनके नाम पर आसाराम नामक स्थान अब भी यहां मौजूद है। कहा जाता है कि इस प्रसिद्ध मंदिर में माता की पूजा करने को गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव, दादा मखान जैसे महान आध्यात्मिक संत आ चुके हैं।

ऐसा है मंदिर का स्वरूप : यहां का मंदिर गुफा मंदिर है। ऊंची पहाड़ी पर बनी एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई दरवाजा नहीं। मंदिर की परिक्रमा यात्री गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती हैं।

यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान भोलेनाथ भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं। इस आदि शक्ति की पूजा हिंदुओं द्वारा तो की ही जाती है इन्हें मुसलमान भी काफी सम्मान देते हैं।

हिंगलाज मंदिर में दाखिल होने के लिए पत्थर की सीढिय़ां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में सबसे पहले श्री गणेश के दर्शन होते हैं जो सिद्धि देते हैं। सामने की ओर माता हिंगलाज देवी की प्रतिमा है जो साक्षात माता वैष्णो देवी का रूप हैं।

मुसलमानों के लिए ‘नानी पीर’ है माता : जब पाकिस्तान का जन्म नहीं हुआ था और भारत की पश्चिमी सीमा अफगानिस्तान और ईरान थी, उस समय हिंगलाज तीर्थ हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ तो था ही, बलूचिस्तान के मुसलमान भी हिंगला देवी की पूजा करते थे, उन्हें ‘नानी’ कहकर मुसलमान भी लाल कपड़ा, अगरबत्ती, मोमबत्ती, इत्र-फलुल और सिरनी चढ़ाते थे।

हिंगलाज शक्तिपीठ हिन्दुओं और मुसलमानों का संयुक्त महातीर्थ था। हिन्दुओं के लिए यह स्थान एक शक्तिपीठ है और मुसलमानों के लिए यह ‘नानी पीर’ का स्थान है।

प्रमुख रूप से यह मंदिर चारण वंश के लोगों की कुल देवी मानी जाती है। यह क्षे‍त्र भारत का हिस्सा ही था तब यहां लाखों हिन्दू एकजुट होकर आराधना करते थे।

कई बार मंदिर को तोड़ना का हुआ प्रयास : मुस्लिम काल में इस मंदिर पर मुस्लिम आक्रांतानों ने कई हमले किए लेकिन स्थानीय हिन्दू अरौ मुसलमानों ने इस मंदिर को बचाया। कहते हैं कि जब यह हिस्सा भारत के हाथों से जाता रहा तब कुछ आतंकवादियों ने इस मंदिर को क्षती पहुंचाने का प्रयास किया था लेकिन वे सभी के सभी हवा में लटके गए थे।

कैसे जाएं माता हिंगलाज के मंदिर दर्शन को

इस सिद्ध पीठ की यात्रा के लिए दो मार्ग हैं- एक पहाड़ी तथा दूसरा मरुस्थली। यात्री जत्था कराची से चल कर लसबेल पहुंचता है और फिर लयारी। कराची से छह-सात मील चलकर “हाव” नदी पड़ती है। यहीं से हिंगलाज की यात्रा शुरू होती है।

यहीं शपथ ग्रहण की क्रिया सम्पन्न होती है, यहीं पर लौटने तक की अवधि तक के लिए संन्यास ग्रहण किया जाता है। यहीं पर छड़ी का पूजन होता है और यहीं पर रात में विश्राम करके प्रात:काल हिंगलाज माता की जय बोलकर मरुतीर्थ की यात्रा प्रारंभ की जाती है।
रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी मिलते हैं। इसके आगे रेत की एक शुष्क बरसाती नदी है। इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ हैं। चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के मध्य लगभग 15 मील का फासला है। हिंगोल में यात्री अपने सिर के बाल कटवा कर पूजा करते हैं तथा यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसके बाद गीत गाकर अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं।

मंदिर की यात्रा के लिए यहां से पैदल चलना पड़ता है क्योंकि इससे आगे कोई सड़क नहीं है इसलिए ट्रक या जीप पर ही यात्रा की जा सकती है। हिंगोल नदी के किनारे से यात्री माता हिंगलाज देवी का गुणगान करते हुए चलते हैं। इससे आगे आसापुरा नामक स्थान आता है। यहां यात्री विश्राम करते हैं।

यात्रा के वस्त्र उतार कर स्नान करके साफ कपड़े पहन कर पुराने कपड़े गरीबों तथा जरूरतमंदों के हवाले कर देते हैं। इससे थोड़ा आगे काली माता का मंदिर है।

इस मंदिर में आराधना करने के बाद यात्री हिंगलाज देवी के लिए रवाना होते हैं। यात्री चढ़ाई करके पहाड़ पर जाते हैं जहां मीठे पानी के तीन कुएं हैं। इन कुंओं का पवित्र जल मन को शुद्ध करके पापों से मुक्ति दिलाता है। बस इसके पास ही माता का मंदिर है।

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ઘેલો વાણીયો અને ઘેલા સોમનાથ


૭ દિવસ સુધી માથા વગર લડ્યો હતો ઘેલો વાણિયો

સૌરાષ્ટ્રની પાંચાળ પંથકનાં રાજકોટ જીલ્લાનાં જસદણથી 20 કિ.મી. દુર ઘેલો નદીનાં કિનારે બિરાજમાન શ્રીઘેલાસોમનાથ મહાદેવ યાત્રાધામના અનોખા શિવલિંગની કથા આજે અમે તમને જણાવશું. કેવી રીતે શિવલિંગના રક્ષણ કરતા ઘેલો વાણિયો માર્યો ગયો તેની યાદમાં નામ પડયું સોમનાથમાંથી ઘેલાસોમનાથ. આવો અમે તમને જણાવીએ આ મંદિરનો આશરે 15મી સદી 1457ની આસપાસનો ઇતિહાસ છે.

વેરાવળ પ્રભાસપાટણ પાસે આવેલા સોમનાથ મંદિરને લુંટવા તથા મંદિરનો નાશ કરવા માટે એ સમયે મહમદ ગઝનીએ બે-ત્રણ વાર હુમલો કર્યો હતો.પરંતુ તેને તેમાં નિષ્ફળતા મળી હતી. એ સમયે જુનાગઢ ઉપર કુંવર મહિપાલની કુંવરી મીનળદેવી કે જે શિવભક્તિમાં તલ્લીન હતા અને મુસ્લિમ રાજાઓથી બચવા તેમણે શિવલિંગની સ્થાપનાં ભુગર્ભમાં કરી હતી અને ત્યાં જ પૂજા કરતા હતાં. આમ મીનળદેવીને ભોળાનાથમાં અપાર શ્ર્ધ્ધા હતી.

ઇ.સ.1457ની વાત છે. જ્યારે સોમનાથ મહાદેવ પર આક્રમણ થયું ત્યારે સોમનાથ દાદાએ સપનમાં આવી ને કહ્યું હતું કે મને પાલખીમાં લઇ જાવ. પરંતુ 1457ની આસપાસ ગુજરાત ઉપર મહમદ જાફરની આણ વરતાતી હતી તેણે ભુગભર્ગમાં જ્યોતિર્લિંગ છે તેની જાણ થતા આક્રમણ કર્યુ, પરંતુ તેની કુંવરી હુરલ મીનળદેવી સાથે મળી ગયેલ અને તેને મીનળદેવીને તેનાં પિતાશ્રીનાં મનસુબાની જાણ કરી દીધી હતી. એજ સમયે મીનળદેવીને સ્વપ્નમાં આવ્યું અને તે મુજબ મીનળદેવી શિવની પાલખી અને ઘેલો વાણિયો પાલખી લઇને ત્યાંથી ભાગી નીકળેલા. આમ સોમનાથ દાદાની પાલખી દુર દુર નીકળી ગયેલ ત્યારે સુલ્તાનને ખરબ પડી કે શિવલિંગ તો સોમનાથમાં રહ્યું નથી. તેથી તેણે તેનું સૈન્ય સોમનાથ દાદાની પાલખી પાછળ દોડાવ્યું જયાં જયાં ગામ આવે ત્યાં તે ગામનાં ક્ષત્રિયો અને બ્રાહ્મણો શિવલિંગ બચાવવા સૈન્ય સાથે યુધ્ધે ચડયા. આમ શિવજીની પાલખી સોમનાથની આશરે અઢીસો કિલોમીટર દૂર જસદણ તાલુકાનાં કાળાસર અને મોઢુકા ગામની વચ્ચે આવેલ નદી કિનારા સુધી પહોંચ્યું અહીં શિવલિંગની સ્થાપનાં થઇ. સાથો સાથ આ મંદિરની સામે જ ડુંગર ઉપર મીનળદેવીએ સમાધિ લીધી.

આ યુધ્ધ દરમ્યાન ઘેલા વાણીયાનું મસ્તક કપાય જવા છતાં સાત દિવસ સુધી લડ્યા બાદ મર્યો હતો. સોમનાથ દાદાના શિવલિંગનાં રક્ષણ કાજે આવેલ અનેક લોકો માર્યા ગયા હતા. છેલ્લે જ્યારે યુધ્ધ મહમદ જાફર સૈન્યએ બધાં જ શિવભક્તોને ખતમ કરવાની આરે હતા. ત્યારે મહમદ જાફરે શિવલિંગ પર તલવારનાં ઘા મારીને શિવલિંગ ખંડીત કરી નાંખુ તેવું વિચાર્યું પરંતુ શિવલિંગ પર તલવારનો ઘા મારતાની સાથે સોમનાથ દાદાના શિવલિંગ માંથી ભમરા નીકળ્યા હતા. તેણે મહમંદ જાફર અને તેના સૈન્ય ને ખતમ કરી નાંખ્યું હતું. સોમનાથ દાદાનાં શિવલિંગને બચાવવા ઘેલો વાણિયાનું મસતક ઘડથી અલગ હોવા છતા જાફરનાં સૈન્ય સામે લડયા હતા. તેથી મંદિરનું નામ ઘેલાસોમનાથ રાખવામાં આવ્યું. તેમજ નદીનું નામ પણ ઘેલો નદી રાખવામાં આવ્યું. આ યુધ્ધમાં હજારો બ્રાહ્મણો મરાયા હતા. આમ આ જગ્યા અતિ પૌરાણિક ઇતિહાસ સાથે સંકળાયેલ છે.

ઘેલાસોમનાથ મહાદેવનાં મંદિર સામે ડુંગર પર શ્રીમીનળદેવી બિરાજમાન છે. અહીંની એક લોક વાયકા મુજબ ઘેલાસોમનાથ દાદાની આરતી ચાલીતી હોય છે. ત્યારે પૂજારીએ મીનળદેવીની પણ આરતી ઉતારવી પડે છે. જો મીનળદેવનાં મંદિર તરફ જો આરતીનું ધુપેલ્યુ ન કરવામાં આવે તો એ દિવસની આરતીનું ફળ નથી મળતું. સાથે જ જો તમે ઘેલાસોમનાથ મહાદેવનાં દર્શન કરો અને મીનળદેવીના દર્શન ના કરો તો તમારી યાત્રા અધુરી ગણાય છે.

ઘેલાસોમનાથ મહાદેવ ના દર્શન કરવા માટે જો તમારે મંદિર ના ગર્ભગૃહ માં જવું હોય તો ફરજીયાત તમારે ધોતી પહેરવી પડે અને સાથે જ જળા અભિષેક કરવો હોય તો મંદિરનાં ટ્રસ્ટ દ્વારા શુદ્ધ પાણી પણ રાખવામાં આવે છે. જેનો કોઇ ચાર્જ લેવામાં આવતો નથી. સાથે જ પ્રાસદ માટે પણ કોઇ પણ પ્રાકરનો ચાર્જ લેવામાં આવતો નથી.

જો તમારે ઘેલાસોમનાથ દાદાનાં દર્શને જવું હોય તો રાજકોટથી 80 કિલોમીટરનો રસ્તો છે અને જો તમે સુરત વડોદરા કે અમદાવાદ તરફથી આવો છો તો તમારે રોજકોટ નથી જવાનું, બગોદરાથી ધંધુકા અને પાળીયાદ થઇ ને વિંછીયા થી તમે ઘેલા સોમનાથ જઇ શકો છો.

શત શત નમન શુરવીરો ને જય ભોલેનાથ જય માતાજી

પરેશ વાવલિયા

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સોમનાથ


11 મે 1951 ના દિવસે સોમનાથ મહાદેવની પ્રાણપ્રતિષ્ઠા થઇ હતી.

તા.11 મેં 1951, વૈશાખ શુક્લ પાંચમના દિને પ્રથમ રાષ્ટ્રપતિ ડો.રાજેન્દ્રપ્રસાદ દ્વારા ગર્ભગૃહનુ ઉદ્ઘાટન કરવામાં આવ્યું હતું. સમુદ્રમાં શણગારેલી બોટમાં રાખવામાં આવેલી 21 તોપની સલામી સાથે ભક્તોએ જય સોમનાથના નાદ સાથે સોમનાથ મંદિર પર ધ્વજારોહણ કર્યું હતું. આ પ્રસંગે સરદાર સાથે સોમનાથ નિર્માણમાં મહત્વની ભુમીકા અદા કરનાર લોકો તરીકે દિગ્વિજયસિંહ, કાકાસાહેબ ગાડગીલ, મોરારજીભાઇ દેસાઇ, કનૈયાલાલ મુનશી સામેલ હતા.

ચંદ્રએ કરી હતી સોમનાથ મહાદેવની સ્થાપના

શાસ્ત્રોમાં ઉલ્લેખ પ્રમાણે હજારો વર્ષો પહેલા ચંદ્રએ પોતાને મળેલા શ્રાપમાંથી મુક્તિ મેળવવા આ જગ્યાએ મહાદેવની ઉગ્ર તપશ્ચર્યા કરી સોમનાથ મહાદેવને પ્રસન્ન કરી શ્રાપમાંથી આંશિક મુક્તિ મેળવી હતી. ચંદ્રનું બીજું નામ સોમ. અને સોમના નાથ એટલે સોમનાથ. ચંદ્રએ બ્રહ્માજીની હાજરીમાં અહીં મહાદેવની સ્થાપના કરી હતી. ઇતિહાસમાં ઉલ્લેખ છે તે મુજબ આ મંદિર સુવર્ણ અને રત્નોથી જડિત હતું. મલેચ્છ મહંમદ ઘોરી દ્વારા લૂંટનાં ઈરાદાથી વારંવાર આક્રમણ કરી સોમનાથ મંદિરને લૂંટી અને ખંડિત કરવામાં આવ્યું હતું. આઝાદી બાદ સરદાર વલ્લભભાઈ પટેલએ સોમનાથના નવનિર્માણનો સંકલ્પ કર્યો હતો.

ભારતના પ્રથમ રાષ્ટ્રપતિ ડો. રાજેન્દ્ર પ્રસાદના હસ્તે સોમનાથ મંદિરનો જીર્ણોદ્ધાર _ પ્રાણપ્રતિષ્ઠા

સમગ્ર વિશ્વનાં કરોડો શ્રધ્ધાળુઓની આસ્થાનું કેન્દ્ર એવા સોમનાથ મહાદેવ મંદિરનો આજે 70મો પ્રાણ પ્રતિષ્ઠા દીવસ સોમનાથમાં ઊજવાઇ રહ્યો છે. 1951ના વેશાખસુદ પાંચમના દીવસે ભારતના પ્રથમ રાષ્ટ્રપતી ડો. રાજેન્દ્ર પ્રસાદના વરદ હસ્તે સવારે 9.46 મીનીટે સોમનાથ મંદિરનાં જીર્ણોધ્ધાર બાદ સોમનાથ મહાદેવની પ્રાણપ્રતિષ્ઠા કરવામાં આવી હતી. આજે એજ સમયે સોમનાથ ટ્રસ્ટ સ્થાનીક ભુદેવો સાથે યાત્રીકોએ ભગવાન સોમનાથની મહાપુજા અને આરતી કરી ધ્વજા પુજન ધ્વજા રોહણ કર્યું હતુ. બાદ સોમનાથ મંદીરના સ્વપ્ન દ્રષ્ટા એવા સરદાર પટેલને પણ શ્રધ્ધાસુમન અર્પણ કર્યા હતા.

સોમનાથ મંદિરને આક્રમણખોરોએ અનેક વખત કર્યું ધ્વસ્ત

પ્રાગ ઐતિહાસિક કાળમાં નિર્માણ પામેલું સોમનાથ મંદિર સાત વખત વિદેશી આક્રમણખોરો સામે લડીને ધ્વસ થઈને પુનઃ નિર્માણ બાદ આજે ભારતના ઇતિહાસમાં આજે પણ અજયે અને અડીખમ જોવા મળી રહ્યું છે. ઈસ્વીસન પહેલા સૈકામાં લકુવિસે પ્રથમ મંદિરના નિર્માણમાં બહુમૂલ્ય ભાગ ભજવ્યો હતો. સોમનાથ ખાતે આવેલા છઠ્ઠા મંદિરનું નિર્માણ 13મી સદીમાં થયેલું હોવાનું માનવામાં આવે છે. ત્યાર બાદ 1325 થી 1469ની વચ્ચે જૂનાગઢના રાખેંગારે મંદિરમાં લિંગનીની સ્થપના કરી ત્યાર બાદ 1469 માં અમદાવાદના સુલતાન મહમદ બેગડાએ મંદિર પર ચડાઈ કરીને મંદિરને ધ્વસ્ત કર્યું હતું. ત્યારબાદ 12 નવેમ્બરના 1947ના દિવસે સોમનાથ આવેલા ભારતના લોખંડી પુરૂષ સરદાર પટેલે સોમનાથ મંદિરની જીર્ણ હાલત જોઈને સમુદ્રના જળથી મંદિરના પુનઃનિર્માણની પ્રતિજ્ઞા લીધી હતી. 13 નવેમ્બર 1947ના દિવસે કનૈયાલાલ મુન્સીને મંદિર નિર્માણની જવાબદારી સોંપી હતી. ત્યાર બાદ ગાંધીજી દ્વારા આ મંદિરનું નિર્માણ લોકભાગીદારીથી કરવાનું સુચન આવતા સરદાર પટેલે સોમનાથ ટ્રસ્ટની સ્થાપના કરીને 11મી મે 1951ના દિવસે દેશના પ્રથમ રાષ્ટ્ર પ્રમુખ ડો રાજેન્દ્ર પ્રસાદના હસ્તે શિવલિંગનું સ્થાપન કરવામાં આવ્યું. આ મંદિર મહામેરુ પ્રાસાદ પૂર્ણ સ્વરૂપે બનીને આજે અડીખમ જોવા મળી રહ્યું છે.

હમીરજી ગોહિલ અને વેગડાજી ભીલ સોમનાથને તુટતુ બચાવવાની લડાઈમાં વીરગતિ પામ્યા

સોમનાથની સખાતે નીકળેલા હમીરજી ગોહિલ અને વેગડાજી ભીલની સેનાએ મહમદ બેગડાની સેનાએ સામે લડાઈ લડીને સોમનાથને તુટતુ બચાવવાની લડાઈમાં વીરગતિ પામ્યા ત્યારથી સોમનાથની સાથે હમીરજી ગોહિલ અને વેગડાજી ભીલને પણ યાદ કરવામાં આવે છે. આજે વેગડાજી ભીલની સોમનાથ ખાતે આવેલી ડેરીમાં તેમના વંશજો દ્વારા તેમની વીરગતિને યાદ કરવામાં આવે છે. સોમનાથના ગૌરવપૂર્ણ ઇતિહાસની સાથે હમીરજી ગોહિલ અને વેગડાજી ભીલને આજે પણ યાદ કરવામાં આવે છે. સૌરાષ્ટ્રના આ બે વીર સપૂતોને કારણે સોમનાથ મંદિર આજે આસ્થાનું પ્રતીક બની રહ્યું છે.

🚩🚩જય સોમનાથ જય ભોલેનાથ જય હિન્દ🚩🚩

આહીર ભુપતભાઇ જળું