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यमुनोत्री यानि यमुना के जन्म की कथा

भारत की सबसे पवित्र और प्राचीन नदियों में यमुना का स्मरण गंगा के साथ ही किया जाता है। इन नदियों के किनारे और दोआब की पुण्यभूमि में ही भारतीय संस्कृति का जन्म हुआ और विकास भी। यमुना केवल नदी नहीं है। इसकी परंपरा में प्रेरणा, जीवन और दिव्य भाव समाहित है। हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यमुना नदी, यमराज की बहन है। जिसका नाम यमी भी है। यमराज और यमी के पिता सूर्य हैं। यमुना नदी का जल पहले साफ, कुछ नीला, कुछ सांवला था, इसलिए इन्हें ‘काली गंगा’ भी कहते हैं। असित एक ऋषि थे। सबसे पहले यमुना नदी को इन्होंने ही खोजा था। तभी से यमुना का एक नाम ‘असित’ संबोधित किया जाने लगा। कहते हैं कि सूर्य की एक पत्नी छाया थी। छाया दिखने में श्यामल थी। इसी वजह से उनकी संतान यमराज और यमुना भी श्याम वर्ण पैदा हुए। यमराज ने यमुना को वरदान दिया था कि यमुना में स्नान करने वाला व्यक्ति को यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। संवत्सर शुरु होने के छह दिन बाद यमुना अपने भाई को छोड़ कर धरा धाम पर आ गई थी। सूर्य की पत्नी का नाम ‘संज्ञा देवी’ था। इनकी दो संतानें, पुत्र यमराज तथा कन्या यमुना थी। संज्ञा देवी पति सूर्य की उद्दीप्त किरणों को न सह सकने के कारण उत्तरी ध्रुव प्रदेश में छाया बन कर रहने लगीं। उसी छाया से ताप्ती नदी तथा शनीचर का जन्म हुआ। इधर छाया का ‘यम’ तथा ‘यमुना’ से विमाता सा व्यवहार होने लगा। इससे खिन्न होकर यम ने अपनी एक नई नगरी यमपुरी बसाई, यमपुरी में पापियों को दण्ड देने का कार्य सम्पादित करते भाई को देखकर यमुनाजी गो लोक चली आईं। कृष्णावतार के समय भी कहते हैं यमुना वहीं थी। यमुना नदी का उद्गम यमुनोत्री से है। जिस पहाड़ से यमुना निकलतीं हैं उसका एक नाम कालिंद है इसलिए यमुना को कालिंदी भी कहते हैं.
अपने उद्गम से आगे कई मील तक विशाल हिमगारों और हिम मंडित कंदराओं में अप्रकट रूप से बहती हुई पहाड़ी ढलानों पर से अत्यन्त तीव्रतापूर्वक उतरती हुई इसकी धारा दूर तक दौड़ती बहती चली जाती है। ब्रज में यमुना का महत्त्व वही है जो शरीर में आत्मा का। यमुना के बिना ब्रज की संस्कृति का कोई महत्त्व ही नहीं है।
संजय गुप्ता

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नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर की है अनोखी महिमा!!!!!!!

अगर आप कभी नेपाल घुमने जाते हैं तो आपको वहां जाकर इस बात का बिल्कुल भी एहसास नहीं होगा कि आप एक अलग देश में हैं। कुछ भारत जैसी संस्कृति और संस्कारों को देखकर आप आश्चर्यचकित जरुर हो जायेंगे। आप अगर शिव भगवान के भक्त हैं तो आपको एक बार नेपाल स्थित भगवान शिव का पशुपतिनाथ मंदिर जरूर जाना चाहिए।

नेपाल में भगवान शिव का पशुपतिनाथ मंदिर विश्वभर में विख्यात है। इसका असाधारण महत्त्व भारत के अमरनाथ व केदारनाथ से किसी भी प्रकार कम नहीं है। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है।

यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। इस अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ के दर्शन के लिए भारत के ही नहीं, अपितु विदेशों के भी असंख्य यात्री और पर्यटक काठमांडू पहुंचते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव यहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले बैठे थे। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। कहा जाता हैं इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया था। इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में यहाँ प्रकट हुए थे।

पशुपतिनाथ लिंग विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है। प्रत्येक मुखाकृति के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल है। प्रत्येक मुख अलग-अलग गुण प्रकट करता है। पहला मुख ‘अघोर’ मुख है, जो दक्षिण की ओर है। पूर्व मुख को ‘तत्पुरुष’ कहते हैं। उत्तर मुख ‘अर्धनारीश्वर’ रूप है। पश्चिमी मुख को ‘सद्योजात’ कहा जाता है। ऊपरी भाग ‘ईशान’ मुख के नाम से पुकारा जाता है। यह निराकार मुख है। यही भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख माना जाता है।

इतिहास को देखने पर ज्ञात होता है कि पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने के लिए 1747 से ही नेपाल के राजाओं ने भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया है। इसके पीछे यह तथ्य बताये जाते हैं कि भारतीय ब्राह्माण हिन्दू धर्मशास्त्रों और रीतियों में ज्यादा पारंगत होते हैं। बाद में ‘माल्ला राजवंश’ के एक राजा ने दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को ‘पशुपतिनाथ मंदिर’ का प्रधान पुरोहित नियुक्त किया। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे हैं।

मंदिर के निर्माण का कोई प्रमाणित इतिहास तो नहीं है किन्तु कुछ जगह पर यह जरुर लिखा गया है कि मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था।

कुछ इतिहासकार पाशुपत सम्प्रदाय को इस मंदिर की स्थापना से जुड़ा मानते हैं। पशुपति काठमांडू घाटी के प्राचीन शासकों के अधिष्ठाता देवता रहे हैं। 605 ईस्वी में अमशुवर्मन ने भगवान के चरण छूकर अपने को अनुग्रहीत माना था। बाद में मध्य युग तक मंदिर की कई नकलों का निर्माण कर लिया गया। ऐसे मंदिरों में भक्तपुर (1480), ललितपुर (1566) और बनारस (19वीं शताब्दी के प्रारंभ में) शामिल हैं। मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ है। इसे वर्तमान स्वरूप नरेश भूपलेंद्र मल्ला ने 1697 में प्रदान किया।

मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति की चर्चा आसपास में काफी प्रचलित है। भारत समेत कई देशों से लोग यहाँ आध्यात्मिक शांति की तलाश में आते हैं। अगर आप भी भगवान शिव के दर्शनों के अभिलाषी हैं तो यहाँ साफ़ और छल रहित दिल से आकर, आप शिव के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर की महिमा के बारे में आसपास के लोगों से आप काफी कहानियां भी सुन सकते हैं। मंदिर में अगर कोई घंटा-आधा घंटा ध्यान करता है तो वह जीव कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त भी हो जाता है।

संजय गुप्ता

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700 साल पुराना है रानी सती का यह मंदिर
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राजस्थान के झुंझुनू में स्थित है रानी सती का मंदिर। शहर के बीचों-बीच स्थित मंदिर झुंझुनू शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। बाहर से देखने में ये मंदिर किसी राजमहल सा दिखाई देता है। पूरा मंदिर संगमरमर से निर्मित है। इसकी बाहरी दीवारों पर शानदार रंगीन चित्रकारी की गई है। मंदिर में शनिवार और रविवार को खास तौर पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

रानी सती जी को समर्पित झुंझुनू का ये मंदिर 700 साल पुराना है। यह मंदिर सम्मान, ममता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। देश भर से भक्त रानी सती मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। भक्त यहां विशेष प्रार्थना करने के साथ ही भाद्रपद माह की अमावस्या पर आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में भी हिस्सा लेते हैं।

लगी है 16 देवियों की मूर्तियां
रानी सती मंदिर के परिसर में कई और मंदिर हैं, जो शिवजी, गणेशजी, माता सीता और रामजी के परम भक्त हनुमान को समर्पित हैं। मंदिर परिसर में षोडश माता का सुंदर मंदिर है, जिसमें 16 देवियों की मूर्तियां लगी हैं। परिसर में सुंदर लक्ष्मीनारायण मंदिर भी बना है।

राजस्थान के मारवाड़ी लोगों का दृढ़ विश्वास है कि रानी सतीजी, स्त्री शक्ति की प्रतीक और मां दुर्गा का अवतार थीं। उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मार कर बदला लिया और फिर अपनी सती होने की इच्छा पूरी की। रानी सती मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। वैसे अब मंदिर का प्रबंधन सती प्रथा का विरोध करता है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा है- हम सती प्रथा का विरोध करते हैं।

मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर एक बजे तक और शाम 3 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर के गर्भ गृह में निकर और बरमुडा पहने लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर का दफ्तर सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। राजस्थान के झुंझुनू में स्थित है रानी सती का मंदिर। शहर के बीचों-बीच स्थित मंदिर झुंझुनू शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। बाहर से देखने में ये मंदिर किसी राजमहल सा दिखाई देता है। पूरा मंदिर संगमरमर से निर्मित है। इसकी बाहरी दीवारों पर शानदार रंगीन चित्रकारी की गई है। मंदिर में शनिवार और रविवार को खास तौर पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

रानी सती जी को समर्पित झुंझुनू का ये मंदिर 400 साल पुराना है। यह मंदिर सम्मान, ममता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। देश भर से भक्त रानी सती मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। भक्त यहां विशेष प्रार्थना करने के साथ ही भाद्रपद माह की अमावस्या पर आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में भी हिस्सा लेते हैं।

रानी सती मंदिर के परिसर में कई और मंदिर हैं, जो शिवजी, गणेशजी, माता सीता और रामजी के परम भक्त हनुमान को समर्पित हैं। मंदिर परिसर में षोडश माता का सुंदर मंदिर है, जिसमें 16 देवियों की मूर्तियां लगी हैं। परिसर में सुंदर लक्ष्मीनारायण मंदिर भी बना है।

राजस्थान के मारवाड़ी लोगों का दृढ़ विश्वास है कि रानी सतीजी, स्त्री शक्ति की प्रतीक और मां दुर्गा का अवतार थीं। उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मार कर बदला लिया और फिर अपनी सती होने की इच्छा पूरी की। रानी सती मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। वैसे अब मंदिर का प्रबंधन सती प्रथा का विरोध करता है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा है- हम सती प्रथा का विरोध करते हैं।

कब खुलता है मंदिर
मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर एक बजे तक और शाम 3 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर के गर्भ गृह में निकर और बरमुडा पहने लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर का दफ्तर सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए विशाल आवास बना है, जहां 100 रुपये से लेकर 700 रुपये तक के कमरे उपलब्ध हैं। मंदिर में एक कैंटीन और एक भोजनालय भी है। कैंटीन में दक्षिण भारतीय भोजन भी उपलब्ध है। भोजन दिन में 11 बजे से 1 बजे तक और शाम को 8 बजे से 10 बजे तक उपलब्ध रहता है।

कैसे पहुंचें-

झुंझुनू बस स्टैंड से रानी सती मंदिर के लिए ऑटो रिक्शा लें। दूरी तीन किलोमीटर है। ऑटो रिक्शा वाले 10 रुपये किराया लेते हैं। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 2 किलोमीटर है। वहीं शहर के गांधी चौक से मंदिर की दूरी महज एक किलोमीटर है। आप ऑटो रिजर्व करके भी मंदिर जा सकते हैं। अगर एक दिन रुकना है तो रानी सती मंदिर के स्वागत कक्ष पर आवास के लिए भी आग्रह कर सकते हैं।

संजय गुप्ता

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वृन्दावन के प्राचीन ठाकुर श्री मदन मोहन जी मंदिर का इतिहास!

वृन्दावन! मंदिरों की नगरी वृन्दावन में सैंकड़ो मंदिर हैं! यमुना तट पर स्थित मदन मोहन मंदिर यहाँ का प्राचीन एवं एतिहासिक मंदिर है! मदनमोहन भगवान कृष्ण का ही एक नाम है! आज जिस मंदिर में उनकी पूजा होती है, उसका निर्माण बंगाल के नंदलाल बोस ने करवाया था! लेकिन मदनमोहन जी का वास्तविक मंदिर उससे बहुत पहले 1580 में बनवाया गया था! वह मंदिर आज भी 50 फीट ऊँचे आदित्य टीले पर स्थित है!

कहते हैं की आदित्य टीला वह पवित्र स्थान है जहाँ कालिया मर्दन के बाद भगवान कृष्ण ने विश्राम किया था! यहाँ प्राचीन मंदिर का निर्माण मुल्तान के एक व्यवसायी रामदास कपूर ने करवाया था! कहते हैं एक बार रामदास नौका द्वारा अपने व्यापर के लिए यमुना नदी से जा रहे थे! एक स्थान पर उनकी नौका रेत में फँस गयी! उन्हें नौका के साथ उसमें रखे कीमती सामन के नष्ट होने का भय सताने लगा! वहीँ यमुना तट पर उन्हें सनातन गोस्वामी की भजन कुटी नज़र आई! उन्होंने अपनी परेशानी सनातन गोस्वामी जी से कही तो उन्होंने मदनमोहन जी के विग्रह से प्रार्थना करने को कहा!

कहते हैं भगवान से प्रार्थना करने के बाद जब वह व्यवसाई पुनः अपनी नौका को बढ़ाने का प्रयास करने लगा तो वह तुरंत रेत से निकल आयी! बाद में रामदास कपूर ने उसी भव्य स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया! जिसके बाद मदनमोहन का वह पावन विग्रह उस मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया!

बाद में 1819 में श्री नन्दलाल बोस द्वारा टीले के साथ ही नए मंदिर का निर्माण कराया गया! वर्तमान में यहीं मदनमोहन जी की पूजा की जाती है! आज मंदिर के गर्भग्रह में मदनमोहनजी के मूल विग्रह के स्थान पर प्रतिभू विग्रह उपस्थित है! विग्रह के दांये में ललिता जी एवं बाएं में राधिका जी उपस्थित हैं! ललिता सखी का विग्रह बड़ा है, छोटा वाला विग्रह राधिका जी का है! यहाँ दोनों प्रतिमा उड़ीसा के राजकुमार पुरषोत्तमजाना ने भिजवायीं थी!

पुराने मंदिर की एक दिशा में सनातन गोस्वामी की भजन कुटी, उनकी समाधी एवं ग्रन्थ समाधी है! परिसर में चैतन्य महाप्रभु का मंदिर भी है! उन्होंने कुछ समय यहाँ व्यतीत किया था! आज दूर-दूर से नित्य सैंकड़ो श्रद्धालु दोनों मंदिर देखने आते हैं! यहाँ मंदिर वृन्दावन में कालियादह के समीप स्थित है!

जय हो मदनमोहनजी की जय हो ।

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जानिए क्या है इस रहस्यमयी पवित्र गुफा का इतिहास मान्यता है कि इस गुफा से काशी तक मार्ग जाता है!!!!!!

हमारे देश में कई स्थान व भवन ऐसे हैं जो स्थापत्य कला की अनोखी मिसाल हैं। उसी कला को समृद्ध करती ऐसी ही एक गुफा है पाताल भुवनेश्वर गुफा। उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों के बीच बनी ये गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। 33 कोटि देवी-देवताओं के इस रहस्यमयी स्थल के बारे में यहां हम आपको बताने जा रहे हैं –

पूरे भारत में संभवत: पाताल भुवनेश्वर जैसा अद्भुत स्थल कहीं भी नहीं है। पिथौरागढ़ जिले के सरयू तथा पूर्वी रामगंगा के मध्य स्थित यह स्थल समुद्र तल से 1350 मी. ऊंचाई पर है। स्कन्द पुराण के मानस खंड के 103वें अध्याय में इस स्थल का वर्णन है।

वल्कलाख्यो महादेवं प्रकाशयति भूतलो।
ना गमिष्यन्ति मनुजास्तावन पाताल मण्डले।
सत्क्रियो देवेदेवस्य बल्कलाख्य: करिष्यति।
सदां प्रमति मत्र्याना गुहा गम्या भविष्यति॥

गुफा के रहस्य से जुड़ी है ये कहानी
इस जगह का दिव्य दर्शन पहली बार सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण को हुआ। ऋतुपर्ण राजा का समय भगीरथ से 7 पीढ़ी पूर्व का माना जाता है। इस दिव्य दर्शन की कथा भी अत्यन्त रोचक है। अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण का एक शौक था चौपड़ खेलना। उनके चौपड़ के साथी थे राजा नल।

एक बार राजा नल पुष्करराज तीर्थ पर ऋतुपर्ण के साथ चौपड़ खेल रहे थे। वह अपनी दमयन्ती को चौपड़ के खेल में हार गए। शर्म के मारे उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से कहा कि मुझे ले जाकर घने जंगल में छुपा दो और मेरा मुंह भी रंगकर ले जाना ताकि दमयन्ती मुझे पहचान न सके। ऋतुपर्ण नल को लेकर जब हिमालय के घोर जंगलों में जा रहे थे तो उन्हें एक अलौकिक हिरण नजर आया।

हिरण का पीछा करते-करते ऋतुपर्ण पाताल भुवनेश्वर जा पहुंचे। हिरण तो जंगल में नहीं मिला लेकिन रात्रि को थक कर सोते हुए ऋतुपर्ण को सपने में हिरण के दर्शन हुए। सपने में हिरण ने कहा कि हे राजन मेरा पीछा मत करो मैं हिरण नहीं हूं।

ऋतुपर्ण ने जब हिरण का वास्तविक परिचय जानना चाहा तो हिरण ने उस स्थल के क्षेत्ररक्षक से प्रार्थना करने का सुझाव दिया। दो माह की तपस्या से क्षेत्रपाल प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष हुए और उन्होंने स्पष्ट किया कि इस स्थान पर एक गुफा है जिसमें तैंतीस कोटि देवी-देवता भगवान शंकर के साथ स्थापित हैं।

क्षेत्रपाल ने ही ऋतुपर्ण की प्रार्थना पर उन्हें गुफा के रक्षक शेषनाग तक पहुंचा दिया। शेषनाग ने अपने फन पर बैठाकर ऋतुपर्ण को छह माह तक गुफा के प्रत्येक भाग के न केवल दर्शन कराए वरन जाते समय उन्हें ढेर सारे मणिरत्न देकर इस निर्देश के साथ विदा किया कि वह इस रहस्य को किसी को न बताए अन्यथा उनकी मृत्यु हो जाएगी।

राज्य वापस आकर रानी के बहुत जिद करने पर न चाहते हुए भी राजा ऋतुपर्ण ने रानी को गुफा का रहस्य बता दिया और उनकी तत्काल मृत्यु हो गई। रानी अत्यन्त दुखी हुई किन होनी को कौन टाल सकता है। अन्त्येष्टि के बाद रानी पाताल भुवनेश्वर पहुंची। उसे गुफा में प्रतिमाएं तो मिलीं किंतु उन प्रतिमाओं में दिव्य अनुभूति का अभाव था।

इसके बाद हजारों वर्षों तक यह स्थान गोपनीय ही रहा। बाद में पुराणों के आधार पर चन्द एवं कत्यूरी राजाओं ने इस स्थल का पता लगाया और यहां कई अन्य मंदिर भी बनवाए। द्वापर युग में पांडव जहां अज्ञातवास के दौरान भ्रमण करते हुए आए और सन् 1191 में आदि शंकराचार्य ने इस स्थल का विधिवत पूजन-अर्चन कर इसे पुन: आध्यात्मिक स्तर पर महिमा मंडित किया।

पाताल भुवनेश्वर गुफा आज भी अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही है। गुफा के द्वार से नीचे की ओर उबड़-खाबड़ सीढियां हैं। सैकड़ों वर्षों पूर्व इन सीढ़ियों को किसी अप्रशिक्षित ग्रामीण अथवा मजदूरों ने बनाया होगा। कहीं पतली, कहीं लंबी, मार्ग भी कहीं-कहीं तो इतना संकरा कि दो स्वस्थ आदमी एक साथ न निकल सकें। इन सीढ़ियों की कुल संख्या 82 है।

अग्रभाग में एक हवनकुंड है। कहते हैं कि राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित के उद्धार हेतु उलंग ऋषि के निर्देशानुसार इसी हवन कुंड में सर्प यज्ञ किया था। कुण्ड के ऊपर तक्षक नाग की मूर्ति स्पष्ट नजर आती है। अन्दर आगे बढ़ने पर तो पर्वत में उभरी स्वनिर्मित (प्राकृतिक) मूर्तियों का इतना विशाल भंडार है कि उन्हें देखते-देखते महीनों बीत जाएं।

अष्टदल कमल ऊपर छत में नजर आ रहा है। नीचे गणेश जी का धड़ है, जिस पर अष्टदल कमल से जल गिर रहा है। निकट ही महान धाम केदारनाथ, बद्रीनाथ एवं अमरनाथ लिंगों के रूप में विराजमन हैं। इन लिंगों के निकट ही काल भैरव की जीभ नजर आती है। काल भैरव का मुख छोटी संकरी गुफा के समान है।

कहा जाता है कि यदि कोई मानव मुख से प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाए तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

कुछ आगे बढ़ने पर शिव का आसन एवं चंडी वाहन शेर का मुख सामने है। यहीं 4 द्वार बने हैं (गुफा द्वार है जो लगभग 10 फीट ऊंचाई पर है) इन्हें पाप द्वार, रणद्वार, धर्मद्वार एवं मोक्ष के रूप में परिभाषित किया गया है।

स्कन्द पुराण के अनुसार पाप द्वार त्रेता युग में रावण की मृत्यु के साथ बन्द हो गया, रणद्वार द्वापर में महाभारत के पश्चात बन्द हो गया, धर्मद्वार अभी खुला है। कहते हैं कि यह कलियुग की समाप्ति पर बन्द होगा। मोक्ष द्वार सतयुग की समाप्ति पर बन्द होगा। मान्यता है कि मोक्ष द्वार से यदि धर्मप्राण मनुष्य प्रवेश कर ले तो उसे मुक्ति मिल जाती है।

पौराणिक संदर्भ के दृश्यों को प्रकृति ने इस कुशलता से और इतने रूपों में रचा है कि यह 500-600 मीटर लंबी गुफा इन प्राकृतिक दृश्यों का अद्भुत संग्रहालय ही बन गई है।

ऊपर दीवार में भगवान शंकर की जटाएं, उनसे निकलती गंगा धारा और नीचे तैंतीस कोटि देवी-देवता अत्यन्त सूक्ष्म लिंगों के रूप में आराधना की मुद्रा में मध्य में नर्मदेश्वर और निकट ही नन्दी एवं विश्वकर्मा कुंड सभी कुछ सहज, नयनों को बांध लेने वाला है।

आगे दाहिनी ओर शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्राकृतिक लिंग त्रिमूर्ति ब्रह्म, विष्णु, महेश हैं। इन पर ऊपर से तीन गंगाओं की जलधारा बारी-बारी से गिर रही है। यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। सामने ऊंचाई पर एक गुफा है। अनगढ़ पत्थरों द्वारा ऊपर चढ़ने पर एक ओर शिवपार्वती एवं पांच पांडव (लिंग रूप में) चौपड़ खेल रहे हैं।

मान्यता है कि इस गुफा से काशी तक मार्ग जाता है। वापसी पर फिर एक छोटी गुफा सम्मुख है जहां विशाल प्रस्तर खंड पर 4 लिंग स्थापित हैं। ये चार लिंग 4 युगों सतयुग त्रेता, द्वापर एवं कलियुग का स्वरूप हैं। कलियुग लिंग अपेक्षाकृत बड़ा है। कहते हैं कि यह लिंग समय के साथ ऊपर बढ़ रहा है और जब यह बढ़ते-बढ़ते छत को स्पर्श कर लेगा तब कलियुग का अन्त हो जाएगा।

आगे फिर मुख्य मार्ग मिल जाता है। आगे ऐरावत हाथी एवं शिव कमंडल है। शिव कमंडल से श्रद्धालु मनोवांछित फल की इच्छा कर सकते हैं।

मान्यता है कि इस गुफा के दर्शन मात्र से चार धामों का पुण्य मिल जाता है। शिवरात्रि को तो इस स्थल पर विशाल मेला लगता ही है अन्य धार्मिक अवसरों पर भी यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

संजय गुप्ता

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” केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी ”
एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की – कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा – बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।
बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला – कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा – तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा – नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।

उन्होंने कहा – लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था – लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते है।
#जयबाबाकेदारनाथ

सअजय गुप्ता

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त्रियुगी नारायण मंदिर, उत्तराखंड।

उत्तराखंड का त्रियुगीनारायण मंदिर पवित्र और विशेष पौराणिक मंदिर है। इस मंदिर के अंदर सदियों से अग्नि जल रही है। शिव-पार्वती जी ने इसी पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर विवाह किया था। यह स्थान रुद्रप्रयाग जिले का एक भाग है।

त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में ही यह कहा जाता है कि यह भगवान शिव जी और माता पार्वती का शुभ विवाह स्थल है। मंदिर के अंदर प्रज्वलित अग्नि कई युगों से जल रही है। इसलिए इस स्थल का नाम त्रियुगी हो गया यानी अग्नि जो तीन युगों से जल रही है।

त्रियुगीनारायण हिमावत की राजधानी थी। यहां शिव पार्वती के विवाह में विष्णु ने पार्वती के भाई के रूप में सभी रीतियों का पालन किया था। जबकि ब्रह्मा इस विवाह में पुरोहित बने थे। उस समय सभी संत-मुनियों ने इस समारोह में भाग लिया था। विवाह स्थल के नियत स्थान को ब्रहम शिला कहा जाता है जो कि मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इस मंदिर के महात्म्य का वर्णन स्थल पुराण में भी मिलता है।

विवाह से पहले सभी देवताओं ने यहां स्नान भी किया और इसलिए यहां तीन कुंड बने हैं जिन्हें रुद्र कुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्मा कुंड कहते हैं। इन तीनों कुंड में जल सरस्वती कुंड से आता है। सरस्वती कुंड का निर्माण विष्णु की नासिका से हुआ था और इसलिए ऐसी मान्यता है कि इन कुंड में स्नान से संतानहीनता से मुक्ति मिल जाती है।

जो भी श्रद्धालु इस पवित्र स्थान की यात्रा करते हैं वे यहां प्रज्वलित अखंड ज्योति की भभूत अपने साथ ले जाते हैं ताकि उनका वैवाहिक जीवन शिव और पार्वती के आशीष से हमेशा मंगलमय बना रहे। वेदों में उल्लेख है कि यह त्रियुगीनारायण मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है। जबकि केदारनाथ व बदरीनाथ द्वापरयुग में स्थापित हुए। यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर विष्णु भगवान ने वामन देवता का अवतार लिया था। पौराणिक कथा के अनुसार इंद्रासन पाने के लिए राजा बलि को सौ यज्ञ करने थे, इनमें से बलि 99 यज्ञ पूरे कर चुके थे तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर रोक दिया जिससे कि बलि का यज्ञ भंग हो गया। यहां विष्णु भगवान वामन देवता के रूप में पूजे जाते हैं।

संजय गुप्ता