Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

“श्री केदारनाथ मंदिर की कथा”

केदारनाथ मंदिर एक अनसुलझी संहिता है। केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया, इसके बारे में कई बातें कही जाती हैं। पांडवों से लेकर आदि शंकराचार्य तक। लेकिन हम इसमें नहीं जाना चाहते। आज का विज्ञान बताता है कि केदारनाथ मंदिर शायद 8वीं शताब्दी में बना था। यदि आप ना भी कहते हैं, तो भी यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अस्तित्व में है। 21वीं सदी में भी केदारनाथ की भूमि भवन शिल्प के लिऐ सही नहीं है। एक तरफ 22,000 फीट ऊंची केदारनाथ पहाड़ी, दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊंची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊंचा भरतकुंड है। इन तीन पर्वतों से होकर बहने वाली पांच नदियां हैं मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदारी। इनमें से कुछ इस पुराण में लिखे गए हैं। यह क्षेत्र “मंदाकिनी नदी” का एकमात्र भूखंड है। भवन शिल्प कलाकृति कितनी गहरी रही होगी। ऐसी जगह पर भवन कलाकृति बनाना, जहां ठंड के दिन भारी मात्रा में बर्फ हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी बहता हो।
आज भी आप गाड़ी से उस स्थान तक नहीं जा सकते जहां आज “केदारनाथ मंदिर” है। इसे ऐसी जगह क्यों बनाया गया? इसके बिना 100-200 नहीं तो 1000 साल से अधिक समय तक ऐसी विकट, प्रतिकूल परिस्थितियों में मंदिर कैसे बनाया जा सकता है? हम सभी को कम से कम एक बार यह सोचना चाहिए। वैज्ञानिक अनुमान लगाते हैं कि यदि मंदिर 10वीं शताब्दी में पृथ्वी पर होता, तो यह “हिम युग” की एक छोटी अवधि में होता। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी, देहरादून ने केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर लिग्नोमैटिक डेटिंग का परीक्षण किया। यह “पत्थरों के जीवन” की पहचान करने के लिए किया जाता है। परीक्षण से पता चला कि मंदिर 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक पूरी तरह से बर्फ में दब गया था। हालांकि, मंदिर के निर्माण में कोई नुकसान नहीं हुआ। 2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ को सभी ने देखा होगा। इस अवधि के दौरान औसत से 375% अधिक वर्षा हुई थी। आगामी बाढ़ में “5748 लोग” (सरकारी आंकड़े) मारे गए और 4200 गांवों को नुकसान पहुंचा। भारतीय वायुसेना ने 1 लाख 10 हजार से ज्यादा लोगों को एयरलिफ्ट किया। सब कुछ ले जाया गया। लेकिन इतनी भीषण बाढ़ में भी केदारनाथ मंदिर का पूरा ढांचा जरा भी प्रभावित नहीं हुआ। भारतीय पुरातत्व सोसायटी के मुताबिक, बाढ़ के बाद भी मंदिर के पूरे ढांचे के ऑडिट में 99 फीसदी मंदिर पूरी तरह सुरक्षित हैं. 2013 की बाढ़ और इसकी वर्तमान स्थिति के दौरान निर्माण को कितना नुकसान हुआ था, इसका अध्ययन करने के लिए “आईआईटी मद्रास” ने मंदिर पर “एनडीटी परीक्षण” किया। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर पूरी तरह से सुरक्षित और मजबूत है। यदि मंदिर दो अलग-अलग संस्थानों द्वारा आयोजित एक बहुत ही “वैज्ञानिक और तकनीकी परीक्षण” में उत्तीर्ण नहीं होता है, तो आपको सबसे अच्छा क्या समझ आता जो यह ब्लॉग कहता है? 1200 साल बाद, आज अगर आप देशाटन पर वंहा जाते हैं तो जहां उस क्षेत्र में आप की जरूरत का सब कुछ ले जाया जाता है, वहां एक भी ढांचा खड़ा नहीं होता है। यह मंदिर मन ही मन वहीं खड़ा है और खड़ा ही नहीं, बहुत मजबूत है। इसके पीछे जिस तरीके से इस मंदिर का निर्माण किया गया है, उसे माना जा रहा है। जिस स्थान का चयन किया गया है। आज विज्ञान कहता है कि मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का इस्तेमाल किया गया है, उसी वजह से यह मंदिर इस बाढ़ में बच पाया।
यह मंदिर “उत्तर-दक्षिण” के दिशा में बनाया गया है। ध्यान दीजिए केदारनाथ को “दक्षिण-उत्तर” बनाया गया है जबकि भारत में लगभग सभी मंदिर “पूर्व-पश्चिम” हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मंदिर “पूर्व-पश्चिम” होता तो पहले ही नष्ट हो चुका होता। या कम से कम 2013 की बाढ़ में तबाह हो जाता। लेकिन इस दिशा की वजह से केदारनाथ मंदिर बच गया है। दूसरी बात यह है कि इसमें इस्तेमाल किया गया पत्थर बहुत सख्त और टिकाऊ होता है। खास बात यह है कि इस मंदिर के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया गया पत्थर वहां उपलब्ध नहीं है, तो जरा सोचिए कि उस पत्थर को वहां कैसे ले जाया जा सकता था। उस समय इतना बड़ा पत्थर ढोने के लिए इतने उपकरण भी उपलब्ध नहीं थे। इस पत्थर की विशेषता यह है कि 400 साल तक बर्फ के नीचे रहने के बाद भी इसके “गुणों” में कोई अंतर नहीं है।
इसलिए, मंदिर ने प्रकृति के विधवंसक चक्र में ही अपनी ताकत बनाए रखी है। मंदिर के बाहर से लाऐ इन मजबूत पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के “एशलर” तरीके से एक साथ चिपका दिया गया है। इसलिए पत्थर के जोड़ पर तापमान परिवर्तन के किसी भी प्रभाव के बिना मंदिर की ताकत अभेद्य है। 2013 में, वीटा घलाई के माध्यम से मंदिर के पिछले हिस्से में एक बड़ी चट्टान फंस गई और पानी की धार विभाजित हो गई और मंदिर के दोनों किनारों का पानी अपने साथ सब कुछ ले गया। लेकिन मंदिर और मंदिर में शरण लेने वाले लोग सुरक्षित रहे। जिन्हें अगले दिन भारतीय वायुसेना ने एयरलिफ्ट किया था। सवाल यह है कि आस्था पर विश्वास किया जाए या नहीं। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि मंदिर के निर्माण के लिए स्थल, उसकी दिशा, वही निर्माण सामग्री और यहां तक ​​कि प्रकृति को भी ध्यान से चुना गया था जो 1200 वर्षों तक अपनी संस्कृति और ताकत को बनाए रखेगा। टाइटैनिक के डूबने के बाद, पश्चिमी लोगों ने महसूस किया कि कैसे “एनडीटी परीक्षण” और “तापमान” विनाशकारी ज्वार को मोड़ सकते हैं। लेकिन हमारे पास उन पाश्चात्य देशों के वैज्ञानिक के विचार हैं, पर यह हमारे देश में 1200 साल पहले किया गया था। क्या केदारनाथ वही ज्वलंत उदाहरण नहीं है? कुछ महीने बारिश में, कुछ महीने बर्फ में, और कुछ साल बर्फ में भी, उन पर हमला हवा और बारिश का लगातार अभी भी समुद्र तल से 3969 फीट ऊपर ऊन को कवर करती है। हम वंहा इस्तेमाल विज्ञान की भारी मात्रा के बारे में सोचकर दंग रह गए हैं जिसका उपयोग 6 फुट ऊंचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है। आज तमाम बाढ़ों के बाद हम एक बार फिर केदारनाथ के उन वैज्ञानिकों के निर्माण के आगे नतमस्तक हैं, जिन्हें उसी भव्यता के साथ 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊंचा होने का सम्मान मिलेगा। यह एक उदाहरण है कि वैदिक हिंदू धर्म और संस्कृति कितनी उन्नत थी। उस समय हमारे ऋषि-मुनियों यानि वैज्ञानिकों ने वास्तुकला, मौसम विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्वेद में काफी तरक्की की थी। आपकी एक गौरवशाली विरासत। विश्व के हित के लिए इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

लोहार्गल – यहां पानी में गल गए थे पांडवों के अस्त्र-शस्त्र, मिली थी परिजनों की हत्या के पाप से मुक्त!!!!!!!

राजस्थान के शेखावटी इलाके के झुंझुनूं जिले से 70 कि. मी. दूर अरावली पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है लोहार्गल। जिसका अर्थ होता है जहां लोहा गल जाए। यह राजस्थान का पुष्कर के बाद दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थ का सम्बन्ध पांडवो, भगवन परशुराम, भगवान सूर्य और भगवान विष्णु से है।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने परिजनों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों के पाप का दर्द देख श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।

घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आ पहुँचे तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्यकुण्ड में स्नान किया, उनके सारे हथियार गल गये। इसके बाद शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधि से विभूषित किया।

यहां प्राचीन काल से निर्मित सूर्य मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसके पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में एक संतान हुई।

राजा ने भूत-भविष्य के ज्ञाताओं को बुलाकर उसके पिछले जन्म के बारे में पूछा। तब विद्वानों ने बताया कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी अर्थात बंदरिया थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया, क्योंकि बंदरिया का मांस अभक्ष्य होता है।

हवा और धूप के कारण वह सूख कर लोहार्गल धाम के जलकुंड में गिर गई किंतु उसका एक हाथ पेड़ पर रह गया। बाकी शरीर पवित्र जल में गिरने से वह कन्या के रूप में आपके यहाँ उत्पन्न हुई है। विद्वानों ने राजा से कहा, आप वहां पर जाकर उस हाथ को भी पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा।

राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया। जिससे उनकी पुत्री का हाथ स्वतः ही ठीक हो गया। राजा इस चमत्कार से अति प्रसन्न हुए। विद्वानों ने राजा को बताया कि यह क्षेत्र भगवान सूर्यदेव का स्थान है। उनकी सलाह पर ही राजा ने हजारों वर्ष पूर्व यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।

यहां भगवान विष्णु ने लिया था मतस्य अवतार –यह क्षेत्र पहले ब्रह्मक्षेत्र था। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने शंखासूर नामक दैत्य का संहार करने के लिए मत्स्य अवतार लिया था। शंखासूर का वध कर विष्णु ने वेदों को उसके चंगुल से छुड़ाया था। इसके बाद इस जगह का नाम ब्रह्मक्षेत्र रखा।

परशुराम जी ने भी किया था यहां प्रायश्चित –विष्णु के छठें अंशअवतार भगवान परशुराम ने क्रोध में क्षत्रियों का संहार कर दिया था, लेकिन शान्त होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। तब उन्होंने यहां आकर पश्चाताप के लिए यज्ञ किया तथा पाप मुक्ति पाई थी।

मालकेतु बाबा की चौबीस कोसी परिक्रमा – यहाँ एक विशाल बावड़ी भी है जिसका निर्माण महात्मा चेतनदास जी ने करवाया था। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। पहाड़ी पर सूर्य मंदिर के साथ ही वनखण्डी जी का मन्दिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव मन्दिर, हनुमान मन्दिर तथा पाण्डव गुफा स्थित है।

इनके अलावा चार सौ सीढ़ियाँ चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किए जा सकते हैं। श्रावण मास में भक्तजन यहाँ के सूर्यकुंड से जल से भर कर कांवड़ उठाते हैं। यहां प्रति वर्ष माघ मास की सप्तमी को सूर्यसप्तमी महोत्सव मनाया जाता है, जिसमें सूर्य नारायण की शोभायात्रा के अलावा सत्संग प्रवचन के साथ विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।

भाद्रपद मास में श्रीकृषण जन्माष्टमी से अमावस्या तक प्रत्येक वर्ष लोहार्गल के पहाडो में हज़ारों लाखों नर-नारी 24 कोस की पैदल परिक्रमा करते हैं जो मालकेतु बाबा की चौबीस कोसी परिक्रमा के नाम से प्रसिद्ध है। पुराणों में परिक्रमा का महात्म्य अनंत फलदायी बताया है। अब यह परिक्रमा और ज्यादा प्रासंगिक है।

हरा-भरा वातावरण। औषधि गुणों से लबरेज पेड़-पौधों से आती शुद्ध-ताजा हवा और ट्रैकिंग का आनंद यहां है। और फिर खुशहाली की कामना से अनुष्ठान तो है ही। अमावस्या के दिन सूर्यकुण्ड में पवित्र स्नान के साथ यह परिक्रमा विधिवत संपन्न होती है।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

हैदराबाद से केवल सौ किमी दूर तेलंगाना के नलगोंडा जिले में स्थित 800 वर्ष प्राचीन “छाया सोमेश्वर महादेव” मंदिर की विशेषता यह है कि दिन भर इस मंदिर के शिवलिंग पर एक स्तम्भ की छाया पड़ती रहती है, लेकिन वह छाया कैसे बनती है यह आज तक कोई पता नहीं कर पाया.

प्राचीन भारतीय वास्तुकला इतनी उन्नत थी कि मंदिरों में ऐसे आश्चर्य भरे पड़े हैं. उत्तर भारत के मंदिरों पर इस्लामी आक्रमण का बहुत गहरा असर हुआ था, और हजारों मंदिर तोड़े गए, लेकिन दक्षिण में शिवाजी और अन्य तमिल-तेलुगु साम्राज्यों के कारण इस्लामी आक्रान्ता नहीं पहुँच सके थे. ज़ाहिर है कि इसीलिए दक्षिण में मुगलों की अधिक हैवानियत देखने को नहीं मिलती, और इसीलिए दक्षिण के मंदिरों की वास्तुकला आज भी अपने पुराने स्वरूप में मौजूद है.

छाया सोमेश्वर महादेव मंदिर को हाल ही में तेलंगाना सरकार ने थोड़ा कायाकल्प किया है. हालाँकि 800 वर्षों से अधिक पुराना होने के कारण मंदिर की दीवार पर कई दरारें हैं, परन्तु फिर भी शिवलिंग पर पड़ने वाली रहस्यमयी छाया के आकर्षण में काफी पर्यटक इसको देखने आते हैं.

नालगोंडा के पनागल बस अड्डे से केवल दो किमी दूर यह मंदिर स्थित है. वास्तुकला का आश्चर्य यह है कि शिवलिंग पर जिस स्तम्भ की छाया पड़ती है, वह स्तम्भ शिवलिंग और सूर्य के बीच में है ही नहीं. मंदिर के गर्भगृह में कोई स्तम्भ है ही नहीं जिसकी छाया शिवलिंग पर पड़े. निश्चित रूप से मंदिर के बाहर जो स्तम्भ हैं, उन्हीं का डिजाइन और स्थान कुछ ऐसा बनाया गया है कि उन स्तंभों की आपसी छाया और सूर्य के कोण के अनुसार किसी स्तम्भ की परछाई शिवलिंग पर आती है. यह रहस्य आज तक अनसुलझा ही है.

इस मंदिर का निर्माण चोल साम्राज्य के राजाओं ने बारहवीं शताब्दी में करवाया था. इस मंदिर के सभी स्तंभों पर रामायण और महाभारत की कथाओं के चित्रों का अंकन किया गया है, और इनमें से कोई एक रहस्यमयी स्तम्भ ऐसा है जिसकी परछाई शिवलिंग पर पड़ती है.

एक भौतिक विज्ञानी मनोहर शेषागिरी के अनुसार मंदिर की दिशा पूर्व-पश्चिम है और प्राचीन काल के कारीगरों ने अपने वैज्ञानिक ज्ञान, प्रकृति ज्ञान तथा ज्यामिती एवं सूर्य किरणों के परावृत्त होने के अदभुत ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए विभिन्न स्तंभों की स्थिति ऐसी रखी है, जिसके कारण सूर्य किसी भी दिशा में हो, मंदिर के शिवलिंग पर यह छाया पड़ती ही रहेगी.

ऐसा था हमारा भारतीय संस्कृति ज्ञान एवं उच्च कोटि का वास्तु-विज्ञान।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

જય જગન્નાથ

👉 મુસ્લિમ ભક્ત સાલાબેગના માનમાં આ જગ્યાએ આજે પણ ભગવાન જગન્નાથના રથના પૈડાં થોડા સમય માટે ઉભા રખાય છે.

👉 લાલબેગ જેહાદી યુદ્ધો દરમિયાન નદીના કાંઠે ન્હાતી સુંદર બ્રાહ્મણ વિધવા સ્ત્રીનું અપહરણ કરી અને પોતાની પત્ની તો બનાવી લીધી પણ તેનાથી જન્મેલો પુત્ર સાલાબેગમાંથી બ્રાહ્મણ સંસ્કાર ના મિટાવી શક્યો.

👉 આ સાલાબેગ યુદ્ધમાં ઘાયલ થઇ અને મૃત્યુના દરવાજે ઉભો હતો ત્યારે તેની માતાએ શીખવાડ્યા મુજબ હરિનું નામ લઇ અને સાજો થયો અને હરિ કૃષ્ણની ભક્તિમાં ડૂબેલો એવો આ સાલાબેગ નામનો મુગલ સૈનિક ભગવાન જગન્નાથના દ્વારે દર્શન કરવા આવ્યો.

👉 આ સાલાબેગને હિન્દૂ નહીં હોવાને લીધે પાછો હાંકી કાઢવામાં આવ્યો જે કૃષ્ણની શોધમાં વૃંદાવન ગયો.

👉 અને ત્યાંથી એ જગન્નાથની રથયાત્રાના દિવસે એ આશાએ પુરી પરત ફર્યો કે ભગવાન આજે શહેરમાં નીકળશે અને તે જગન્નાથના દર્શન કરી લેશે.

👉 ભગવાનનો નંદીઘોષ રથ શહેરમાંથી નીકળ્યો અને જ્યાં સાલાબેગ પડેલો હતો ત્યાં પહોંચી અને અટકી ગયો અને ત્યાં સુધી હાલ્યો નહીં જ્યાં સુધી સાલાબેગ એ ભગવાનના દર્શન કરી લીધા નહીં.

👉 અને ત્યાંજ સાલાબેગે ભગવાનના ચરણોમાં પોતાના પ્રાણ ત્યજી દીધા.

👉 આ સાલાબેગએ જ્યાં પ્રાણ ત્યાગી દીધા ત્યાં પુરી શહેરના એ ગ્રાન્ટ રોડના બાલગંડી વિસ્તારમાંથી જયારે ભગવાન જગન્નાથનો રથ નીકળે છે.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

🌼आस्था की जीत…🌼

सन् 1979 में तिरुपति क्षेत्र में
भयंकर सूखा पडा…
दक्षिण-पूर्व का मानसून पूरी तरह
विफल हों गया था।
गोगर्भम् जलाशय
(जो तिरुपति में जल-आपूर्ति का प्रमुख स्त्रोत हैं) लगभग सूख चुका था।
आसपास स्थित कुँए भी लगभग सूख चुके थे…

तिरुपति ट्रस्ट के अधिकारी
बड़े भारी तनाव में थे।
ट्रस्ट अधिकारियों की अपेक्षा थी कि
सितम्बर-अक्टूबर की चक्रवाती हवाओं से
थोड़ी-बहुत वर्षा हों जाएगी ,
किन्तु नवम्बर आ पहुंचा था।
थोडा-बहुत , बस महीने भर का पानी
शेष रह गया था।
मौसम विभाग स्पष्ट कर चुका था कि
वर्षा की कोई संभावना नहीं हैं…

सरकारें हाथ खड़ी कर चुकीं थीं।
ट्रस्ट के सामने मन्दिर में दर्शन निषेध करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था।
दर्शन निषेध अर्थात् दर्शन-पूजन
अनिश्चित् काल के लिए बन्द कर देना…

ट्रस्टीयों की आत्मा स्वयं धिक्कार रही थी कि कैसे श्रद्धालुओं को कह पायेंगे कि
जल के अभाव के कारण
देवस्थान में दर्शन प्रतिबंधित कर दिए गए हैं? किन्तु दर्शन बंद करने के अतिरिक्त
कोई विकल्प नहीं बचा था…

विधर्मियों और मूर्तिपूजन के विरोधियों का आनन्द अपने चरम पर था।
नास्तिक लोग मारे ख़ुशी के झूम रहे थे।
अखबारों में ख़बरें आ रही थी कि
जो भगवान् अपने तीर्थ में जल-आपूर्ति की व्यवस्था नहीं कर सकते,
वो भगवद्भक्तमण्डल पर कृपा कैसे करेंगे?

सनातन धर्मानुयायियों को खुलेआम अन्धविश्वासी और सनातन धर्म को
अंधविश्वास कहा जा रहा था…

श्रद्धालु धर्मानुयायी रो रहे थे ,
उनके आंसू नहीं थम रहे थे…

कुछ दिन और निकल गए
किन्तु जल-आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं।

अचानक घबराए हुए ट्रस्टीयों को
कुछ बुद्धि आई और उन्होंने वेदों और शास्त्रों के धुरन्धर विद्वान् और तिरुपति ट्रस्ट के सलाहकार , 90 वर्षीय श्री उप्पुलरी गणपति शास्त्री जी महाराज से सम्पर्क किया…

ट्रस्टीयों ने महाराजश्री से पूछा कि
क्या वेदों और शास्त्रों में
इस गंभीर परिस्थिति का कोई उपाय हैं?

श्री उप्पुलरी गणपति शास्त्री जी महाराज ने
उत्तर दिया कि वेदों और शास्त्रों में
इस लोक की और अलौकिक समस्त समस्याओं का निदान हैं।
महाराजश्री ने ट्रस्टीयों को
“वरुण जप” करने का परामर्श दिया…

महाराजश्री ने ट्रस्टीयों को बता दिया कि
पूर्ण समर्पण , श्रद्धा और विश्वास से यदि
अनुष्ठान किया जाए तभी
अनुष्ठान फलीभूत होगा, अन्यथा नहीं।
श्रद्धा में एक रत्ती भर की कमी
पूरे अनुष्ठान को विफल कर देगी…

ट्रस्टीयों ने “वरुण जाप” करने का
निर्णय ले लिया और दूर-दूर से विद्वानों को निमंत्रण भेजा गया।
समय बहुत ही कम था और लक्ष्य
बहुत ही बड़ा था।
जल-आपूर्ति मात्र दस दिनों की
बाकी रह गई थीं।
1 नवम्बर को जप का मुहूर्त निकला था…

तभी बड़ी भारी समस्याओं ने
ट्रस्टीयों को घेर लिया।
जिन बड़े-बड़े विद्वानों को निमंत्रण भेजा गया था उनमे से अधिकाँश ने आने में
असमर्थता व्यक्त कर दी।
किसी का स्वास्थ्य खराब था ,
तो किसी के घर मृत्यु हों गई थी
(मरणा-शौच) ;
किसी को कुछ तो किसी को कुछ
समस्या आ गई…

“वरुण-जाप” लगभग असंभव हों गया !

इधर इन खबरों को अखबार
बड़ी प्रमुखता से चटखारे ले-लेकर
छापे जा रहे थे और सनातन धर्म ,
धर्मानुयायियों , ट्रस्टमण्डल और तिरुपति बालाजी का मज़ाक बनाए जा रहे थे।
धर्म के शत्रु सनातन धर्म को
अंधविश्वास सिद्ध करने पर तुले हुए थे…

ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री प्रसाद साहब की
आँखों में आंसू थे।
उन्होंने रो-रोकर आर्त ह्रदय से
प्रभु वेंकटेश से प्रार्थना की ।
सारे ट्रस्टी और भक्तों ने भी प्रार्थना की…

सभी ने प्रभु से प्रार्थना की –
“क्या वरुण जाप नहीं हों पाएगा?
क्या मंदिर के दर्शन बन्द हों जायेंगे?
क्या हजारों-लाखों साल की परम्परा
लुप्त हों जाएगी?

नवम्बर के महीने में रात्रीविश्राम के लिए
मंदिर के पट बंद हों चुके थे ।
मंदिर में कोई नहीं था।
सभी चिंतित भगवद्भक्त अपने-अपने घरों में
रो-रोकर प्रभु से प्रार्थना कर रहे थे…

और तभी रात्रि में 1 बजे घंटा नाद
गूंज उठा पूरे तिरुमला पर्वत पर,
मानो प्रभु सबसे कह रहे हो-
“चिंता मत करो!
मैं हूँ तुम्हारे साथ…”

दूसरे दिन सुबह से ही “वरुण जाप” हेतु अनुकूलताएँ मिलनी आरम्भ हों गई।
जिन विद्वानों ने आने में
असमर्थता व्यक्त कर दी थीं
उनकी उपलब्धि के समाचार आने लग गए।
8 नवम्बर को पुनः
मुहूर्त निर्धारित कर लिया गया।
जो विद्वान् अनुष्ठान से मुंह फेर रहे थे ,
वे पूरी शक्ति के साथ अनुष्ठान में आ डटे।

“वरुण जाप” तीन दिनों तक
चलनेवाली परम् कठिन वैदिक प्रक्रिया हैं ।
यह प्रातः लगभग तीन बजे आरम्भ हों जाती हैं। इसमें कुछ विद्वानों को तो घंटो छाती तक पुष्करिणी सरोवर में कड़े रहकर
“मन्त्र जाप” करने थे ,
कुछ भगवान् के “अर्चा विग्रहों” का
अभिषेक करते थे ,
कुछ “यज्ञ और होम” करते थे
तो कुछ “वेदपाठ” करते थे।
तीन दिनों की इस परम् कठिन
वैदिक प्रक्रिया के चौथे दिन
पूर्णाहुति के रूप में
“सहस्त्र कलशाभिषेकम्”
सेवा प्रभु “श्री वेंकटेश्वर” को
अर्पित की जानेवाली थी…

तीन दिनों का अनुष्ठान संपन्न हुआ।
सूर्यनारायण अन्तरिक्ष में पूरे तेज के साथ दैदीप्यमान हों रहे थे।
बादलों का नामोनिशान तक नहीं था…

भगवान् के भक्त बुरी तरह से
निराश होकर मन ही मन भगवन से अजस्त्र प्रार्थना कर रहे थे।
भगवान् के “अर्चा विग्रहों” को
पुष्करिणी सरोवर में स्नान कराकर
पुनः श्रीवारी मंदिर में ले जाया जा रहा था।सेक्युलर पत्रकार चारों ओर खड़े होकर
तमाशा देख रहे थे
और अट्टहास कर रहे थे !
चारों ओर विधर्मी घेरकर
चर्चा कर रहे थे कि -“ अनुष्ठान से बारिश?
ऐसा कहीं होता हैं?
कैसा अंधविश्वास हैं यह?
“ कैसा पाखण्ड हैं यह?”
ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री प्रसाद साहब
और ट्रस्टीगण मन ही मन सोच रहे थे कि
“हमसे कौनसा अपराध हों गया?” ,
“क्यों प्रभु ने हमारी पुकार अस्वीकार कर दी?” , अब हम संसार को और अपनेआप को
क्या मुंह दिखाएँगे?”

इतने में ही दो तीन पानी की बूंदे
श्री प्रसाद के माथे पर पड़ी..

उन्हें लगा कि पसीने की बूंदे होंगी और घोर निराशा भरे कदम बढ़ाते रहे मंदिर की ओर पर फिर और पाँच छह मोटी मोटी बूंदे पड़ी!

सर ऊपर उठाकर देखा तो आसमान में काले काले पानी से भरे हुए बादल उमड़ आए है और घनघोर बिजली कड़कड़ा उठी!

दो तीन सेकेण्ड में मूसलधार वर्षा आरम्भ हुई! ऐसी वर्षा की सभी लोगो को भगवान के उत्सव विग्रहों को लेकर मंदिर की ओर दौड़ लगानी पड़ी फिर भी वे सभी सर से पैर तक बुरी तरह से भीग गए थे।

स्मरण रहे,
वर्षा केवल तिरुपति के पर्वत क्षेत्र में हुई, आसपास एक बूँद पानी नहीं बरसा।
गोगर्भम् जलाशय और आसपास के कुंएं लबालब भरकर बहने लगे।
इंजिनियरों ने तुरंत आकर बताया कि
पूरे वर्ष तक जल-आपूर्ति की कोई चिंता नहीं…

सेक्युलर पत्रकार और धर्म के शत्रुओं के
मुंह पर हवाइयां उड़ने लगी
और वे बगलें झाँकने लगे।
लोगों की आँखें फटी-की-फटी रह गई। भक्तमण्डल जय-जयकार कर उठा…

यह घटना सबके सामने घटित हुई
और हज़ारों पत्रकार और प्रत्यक्षदर्शी इसके प्रमाण हैं लेकिन इस बात को दबा दिया गया…

“सनातन धर्म” की इस इतनी बड़ी जीत के
किस्से कभी टेलीविज़न ,
सिनेमा अथवा सोशल मीडिया पर
नहीं गाये जाते…

भगवान् वेंकटेश्वर श्रीनिवास
कोई मूर्ती नहीं वरन् साक्षात्
श्रीमन्नारायण स्वयं हैं।
अपने भक्तों की पुकार सुनकर वे
आज भी दौड़े चले आते हैं।
भक्त ह्रदय से पुकारें तो सही…

“वेंकटाद्री समं स्थानं ,
ब्रह्माण्डे नास्ति किंचन् ।
श्रीवेंकटेश समो देवों ,
न भूतो न भविष्यति…“

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

  1. रामेश्वरम
  2. हरिद्वार
  3. काशी ( वनारस)
  4. उज्जैन
  5. गया
  6. द्वारका
  7. मदुरै
  8. पुरी
  9. गोरखपुर
  10. कांचीपुरम
  11. नासिक
  12. अयोध्या
  13. कुरूक्षेत्र
  14. मथुरा
  15. प्रयागराज
  16. पुष्कर
  17. कोर्णाक
  18. तिरुपति
Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

नर्मदा


#_नर्मदा_के_अनेक_नाम #_जय_नर्मदा_मैया ➖➖➖➖➖🕉️➖➖➖➖➖ हम सब की जीवन रेखा कहलाने वाली नर्मदा नदी प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भारत की सात सर्वाधिक पवित्र नदियों में से एक है । हिन्दुओं के छोटे-बडे सभी धार्मिक संस्कारों और देवी-देवताओं के पूजन में स्नान के लिए चढाए जाने वाले जल को अभिमंत्रित करने के लिए छः अन्य पवित्र नदियों के साथ नर्मदा का भी आव्हान किया जाता है । यद्यपि ऋग्वेद में नर्मदा का उल्लेख नहीं मिलता, परन्तु इस बारे में विद्वानों का मत है कि उत्तर भारत में आर्यों का जो पहला दल आया था वह सघन वनों के कारण सम्भवतः प्रायद्वीप में गंगा-सिन्धु के मैदान से आगे नहीं बढ सका था। अतः ऋग्वेद के रचयिता आर्यों ने नर्मदा देखी ही नहीं थी । ऋग्वेद की बात छोड जी जाए तो अन्य अनेक प्राचीन ग्रंथों में नर्मदा का उल्लेख मिलता है । कई पुराणों में नर्मदा की उत्पत्ति और महिमा के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है जबकि प्रसिद्ध स्कंद पुराण का रेवा खण्ड तो पूरी तरह से नर्मदा की उत्पत्ति और महिमा के वर्णन को ही समर्पित है । नर्मदा पुराण तो नर्मदा को लेकर अलग से रचा गया ग्रन्थ है ही । इसके अतिरिकत अनेक अन्य प्राचीन ग्रंथों में जिनमें वाल्मीकि रामायण और कालिदास का मेघदूत सम्मिलित हैं, नर्मदा का वर्णन आता है । यूनानी विद्वान टॉलमी ने इसे नोम्माडोस या नम्माडियस कहा है । नर्मदा को उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच की सीमा भी माना जाता है। नर्मदा की उत्पत्ति के संबंध में अनेक किंवदंतियाँ हैं । कहीं इसे भगवान शिव के शरीर से बहे स्वेद (पसीने) से उत्पन्न मानते हुए शांकरी कहा गया है तो कहीं मैकल पर्वत से उत्पन्न होने के कारण ऋक्षपादप्रसूता या मैकलसुता भी कहा गया है । चन्द्रमा से उत्पन्न होने की मान्यता के कारण कुछ लोगों ने इसे सोमोद्भवा का नाम भी दिया है । देवताओं को आह्लाद देने वाली होने के कारण इसे ’नर्म-ददाति इति नर्मदा‘ कहा गया है । स्कंदपुराण में ही अन्यत्र इसे सात कल्पों के क्षय होने पर भी नष्ट न होने वाली ’सप्तकल्पक्षयेक्षीणे न मृता तेन नर्मदा‘ (न मृता या न मरने वाली अतः नर्मदा) कहा गया है । इस प्रकार हम देखते हैं कि उत्पत्ति और गुणों के आधार पर इस महान नदी को समय-समय पर अनेक नामों से पुकारा गया । पन्द्रह नाम तो स्ंकद पुराण के रेवाखण्ड में ’नर्मदापंचदशनामवर्णन‘ में एक साथ मिलते हैं । डा0 अयोध्या प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ’संस्कृति स्त्रोतस्विनी नर्मदा‘ (1987) तथा डा0 के0 शंकरन उन्नी (1996) ने भी नर्मदा के अनेक नामों की उत्पत्ति पर प्रकाश डाला है । कुछ संशयात्मक या विरोधाभाषी नामों को छोड कर नर्मदा के जितने नाम ज्ञात हो सके हैं वे निम्नानुसार हैं ः- नर्मदा ’नर्म ददाति‘ इति नर्मदा आनन्द या हर्ष पैदा करने वाली । नर्मदा को देखकर विषादग्रस्त देवताओं को अत्यन्त हर्ष हुआ अतः हर्षदायिनी । उमारूद्रांगसंभूता उमा और शिव के स्वेद (पसीने) से उत्पन्न चित्रकूटा/त्रिकूटा चित्रकूट या त्रिकूट पर्वत से उत्पन्न रेवा ’रेवते इति रेवा‘ जो उचक-उचक कर, उछल-उछल कर गमन करे वह रेवा है /’रव‘ या शब्द करने वाली। ऋक्षपादप्रसूता ऋक्ष पर्वत से उत्पन्न सोमोद्भवा सोमवंशी राजा पुरूरवा के द्वारा धरती पर अवतारित होने के कारणों / सोम अर्थात अमृत जिस नदी से उत्पन्न होता है । चन्द्र पर्वत से निकली होने के कारण / सोम अर्थात चन्द्रमा से उत्पन्न / भगवान शिव की सोमकला से बने जल बिन्दु से प्रकट । दशार्णा दशों दिशाओं में प्रवाहित होने के कारण । शांकरी भगवान शंकर की पुत्री । दक्षिणगंगा दक्षिण में गंगा जैसी पापमोचिनी होने से । मुरन्दला संस्कृत हिन्दी कोष में उल्लेखित नाम । मुरला अमरकंटक से समीप क्षेत्र में प्रचलित नाम । इन्दुभवा चन्द्रमा से उत्पन्न / चन्द्र की पुत्री । महार्णवा महासमुद्र को पार कर शीघ्रता से मृत्युलोक में आने वाली । तमसा नीली जलराशि वाली नर्मदा जो प्रलय की निबिड निशा में भी अवस्थित रहती है । विदशा अन्य नदियों की अपेक्ष विशिष्ट दशा वाली । करभा हाथियों के साहचर्य से युक्त / चन्द्र कि किरणों के समान शीतल जल से विश्व को प्रमुदित करने वाली। मुना गहरे नीले जल वाली नदी (उत्तर भारत की यमुना नदी से भिन्न ) चित्रोत्पला विचित्र सुंदर कमलों से युक्त । विपाशा अनेक दुःखद पाशों में बंधे मनुष्यों को बंधन से मुक्त करने वाली । रंजना संपूर्ण लोक का रंजन (प्रसन्न) करने वाली । बालुवाहिनी बालू (रेत) बहाकर लाने वाली । कृपा सभी के ऊपर कृपा करने वाली । विपापा अनेक पापों को काटने वाली नर्मदा । विमला स्वच्छ जलराशि वाली । अमृता कभी नष्ट न होने वाली । शोण भगवान शंकर के त्रिशूल के अग्रभाग से जल बिन्दु गिरने से उत्पन्न । महानद महादेव की अनुमति से तीव्र वेग से प्रवाहित / महान पापों को नष्ट करने वाली । सरसा/सुरसा सुंदर स्वादिष्ट, स्वच्छ जल वाली । मन्दाकिनी सारे संसार के जल निमग्न हो जाने पर सतयुग के समय दिव्य मदारपुष्यों से अलंकृत / मन्थर गति से प्रवाहित । भारत माता के कटि प्रदेश को सुंदर करधनी की भांति सुशोभित करने वाली अनेक नामधारी नर्मदा को देश की पवित्रतम नदियों की गिनती में शामिल होने के साथ-साथ यह गौरव भी प्राप्त है कि वह किसी स्थान विशेष में पुण्यदायिनी न होकर सर्वत्र पुण्य प्रदान करती है । मत्स्य पुराण में उल्लेख है कि गंगा कनखल में और सरस्वती कुरूक्षेत्र में पुण्य प्रदान करने वाली है परन्तु नर्मदा तो ग्राम हो या वन, सर्वत्र पुण्य प्रदान करने वाली है । लोक मान्यता यह भी है कि यमुना का जल सात दिनों में, गंगा का जल उसी समय परन्तु नर्मदा का जल तो दर्शन मात्र से पवित्र कर देता है । गंगा से भी करोडों वर्ष पुरानी नदी नर्मदा के बारे में वर्णन आता है कि यह कभी नष्ट नहीं होती । कई बाद अत्यन्त विषम परिस्थितियों में जब पूरी धरती पर अनावृष्टि और अकाल से जीवन समाप्तप्रायः हो चला और सारे जलस्त्रोत सूख गए तब भी नर्मदा बनी रही। नर्मदा पुराण में यह विवरण आता है कि एक समय सभी लोकों में हाहाकार मचाने वाला बहुत लंबा विनाशकारी सूखा पडा। एक शताब्दी से अधिक समय तक वर्षा न होने से संपूर्ण लोक नष्ट हो गया, वृक्षों, लताओं आदि का विनाश हो गया, समुद्र, नदी, तालाब आदि सब सूख गए तथा समस्त जंगल जलने लगा । इस काल में सारी सृष्टि भस्म हो गई, परन्तु नर्मदा फिर भी बनी रही । स्कंद पुराण में उल्लेख है कि गंगा आदि नदियाँ कल्पों के बीत जाने पर समाप्त होकर पुनः उत्पन्न होती हैं, परन्तु नर्मदा तो सात कल्पों तक भी क्षय नहीं होती । मत्स्य पुराण में उल्लेख है कि नर्मदा नदियों में श्रेष्ठ और सब पापों का नाश करने वाली है । वह चर-अचर सभी को तारने वाली है । 🔰🕉️🔰

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

मध्यप्रदेश में आगर मालवा नाम का जिला हैं। वहाँ के न्यायालय में सन 1932 ई. में जयनारायण शर्मा नाम के वकील थे। उन्हें लोग आदर से बापजी कहते थे। वकील साहब बड़े ही धार्मिक स्वभाव के थे और रोज प्रातःकाल उठकर स्नान करने के बाद स्थानीय बैजनाथ मन्दिर में जाकर बड़ी देर तक पूजा व ध्यान करते थे। इसके बाद वे वहीं से सीधे कचहरी जाते थे।

घटना के दिन बापजी का मन ध्यान में इतना लीन हो गया कि उन्हें समय का कोई ध्यान ही नहीं रहा। जब उनका ध्यान टूटा तब वे यह देखकर सन्न रह गये कि दिन के तीन बज गये थे। वे परेशान हो गये क्योंकि उस दिन उनका एक जरूरी केस बहस में लगा था और सम्बन्धित जज बहुत ही कठोर स्वभाव का था। इस बात की पूरी सम्भावना थी कि उनके मुवक्किल का नुकसान हो गया हो। ये बातें सोचते हुए बापजी न्यायालय पहुँचे और जज साहब से मिलकर निवेदन किया कि यदि उस केस में निर्णय न हुआ हो तो बहस के लिए अगली तारीख दे दें।

जज साहब ने आश्चर्य से कहा :- यह क्या कह रहे हैं। सुबह आपने इतनी अच्छी बहस की। मैंने आपके पक्ष में निर्णय भी दे दिया और अब आप बहस के लिए समय ले रहे हैं।

जब बापजी ने कहा कि मैं तो था ही नहीं तब जजसाहब ने फाइल मँगवाकर उन्हें दिखायी। वे देखकर सन्न रह गये कि उनके हस्ताक्षर भी उस फाइल पर बने थे। न्यायालय के कर्मचारियों, साथी वकीलों और स्वयं मुवक्किल ने भी बताया कि आप सुबह सुबह ही न्यायालय आ गये थे और अभी थोड़ी देर पहले ही आप यहाँ से निकले हैं।

बापजी की समझ में आ गया कि उनके रूप में कौन आया था। उन्होंने उसी दिन संन्यास ले लिया और फिर कभी न्यायालय या अपने घर नहीं आये।

इस घटना की चर्चा अभी भी आगर मालवा के निवासियों और विशेष रूप से वकीलों तथा न्यायालय से सम्बन्ध रखनेवाले लोगों में होती है। न्यायालय परिसर में बापजी की मूर्ति स्थापित की गयी है। न्यायालय के उस कक्ष में बापजी का चित्र अभी भी लगा हुआ है जिसमें कभी भगवान बापजी का वेश धरकर आये थे। यही नहीं लोग उस फाइल की प्रतिलिपि कराकर ले जाते हैं जिसमें बापजी के रूप मे आये भगवान ने हस्ताक्षर किये थे और उसकी पूजा करते हैं।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

मेघनाद का कटा शीश क्यों हंसा था?

जब लक्ष्मण जी ने मेघनाद का वध किया था तो उसकी भुजाएं काटकर रावण के महल में पहुंचा दी थी।
मेघनाद की पत्नी को यकीन नहीं हुआ इसलिए उन्होंने भुजा से कहा यदि तुम मेरे पति की भुजा हो तो लिखकर बताओं आपका वध किसने किया?
कहा जाता है कि भुजा ने (कमैलडू) खड़िया से लखन जी का गुणगान किया था।
बाद में वह श्री राम के पास मेघनाद के वीरगति प्राप्त शरीर लेने पहुंची क्योंकि वह अब सती होना चाहती थी क्योंकि वह मेघनाद से अत्यंत प्रेम करती थी।
जब वानर सेना ने भुजा के लिखने की घटना सुनी तो यकीं नहीं किया और सुग्रीव जी ने कहा हम तभी विश्वास मानेंगे जब मेघनाद का मृत मुंड हंसेगा।
अपने सतीत्व के बल पर मेघनाद की पत्नी ने मेघनाद के मुंड को हंसने के लिए आग्रह किया और मेघनाद का मुंड अपने पत्नी के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए जोर जोर से हंसने लगा।
मेघनाद की मृत्यु के बाद जब उसका कटा हुआ सिर राम के सामने रखा गया तो उसी समय ससुर रावण की आज्ञा लेकर सती सुलोचना सिर लेने आई थी और बताया कि उनकी कटी हुई भुजा ने लिखकर बताया था कि उसे किसने मारा था।इस बात पर सुग्रीव को शंका हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है। अतः उन्होंने एक शर्त रख दिया कि अगर यह कटा हुआ सिर हंस दे तो विश्वास हो जाएगा। सुलोचना ने हंसाने का बहुत प्रयास किया पर सिर नहीं हंसा। खीजकर सुलोचना ने कहा कि अगर मैं जानती कि आपकी मृत्यु ऐसे होगी तो मैं अपने पिता शेषनाग को युद्ध के लिए बुला लेती।इसी बात पर सिर ठठाकर हंस उठा कि पगली तुम्हारे पिताजी ने ही तो मुझे मारा है।यह तो हुई कथा जिसे आप लोग जानते हैं और बताया है पर यही एकमात्र मेरा उद्देश्य नहीं था। श्रीलंका और दक्षिण भारत में सुलोचना को महासती यों ही नहीं कहा जाता है बल्कि वह थी भी। जैसा कि राक्षसों में प्रथा थी कि वह ब्राह्म विवाह में विश्वास नहीं करते थे।वे राक्षस विवाह करते थे। इसमें सुंदर कन्या के पिता को हराकर या मारकर विवाह किया जाता है। रावण के तीनों विवाह ऐसे ही हुए थे।
१- मंदोदरी का विवाह उसके पिता मय दानव को हराकर जबरन किया था।
२- धान्यमालिनी ‌इसके पिता
शंबरासुर को मारकर किया था जिसके पुत्र अतिकाय अकंपन और त्रिसिरा थे
३- नाम अज्ञात। इसे किसी यक्षराज को हराकर किया था जिसके पुत्र नारांतक और देवांतक थे
इसी प्रकार सुलोचना के पिता शेषनाग को हराकर मेघनाद ने किया था।
अब जानिए हैं उसके सतीत्व की महिमा पर उसने पूर्ण पातिव्रत धर्म का पालन किया और मेघनाद से अटूट प्यार किया।यही कारण रहा कि मेघनाद ने एक राक्षस कुल में एक नया कीर्तिमान बनाते हुए किसी और कन्या से विवाह नहीं किया और
सती सुलोचना के प्रति पूर्ण समर्पित रहा और सुलोचना के इसी सतीत्व के कारण वह अजेय रहा। कथा तो आपको ज्ञात थी यहां सती सुलोचना के गुणों के विषय में परिचित कराना उद्देश्य रहा ‌।

शिवनंदन मिश्रा

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

बद्रीनाथ के बारे में यह 10 बातें सभी को जानना चाहिए……

1:👉 बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के साथ ही साथ देश के चार धामों में से भी एक है। इस धाम के बारे में यह कहावत है कि ‘जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी’ यानी जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे पुनः माता के उदर यानी गर्भ में फिर नहीं आना पड़ता है। इसलिए शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य को जीवन में कम से कम एक बार बद्रीनाथ के दर्शन जरूर करना चाहिए।

2:👉 यह है ब्रदीनाथ के चरण पखरती अलकनंदा। पुराणों में बताया गया है कि बद्रीनाथ में हर युग में बड़ा परिवर्तन। सतयुग तक यहां पर हर व्यक्ति को भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हुआ करते थे। त्रेता में यहां देवताओं और साधुओं को भगवान के साक्षात् दर्शन मिलते थे। द्वापर में जब भगवान श्री कृष्ण रूप में अवतार लेने वाले थे उस समय भगवान ने यह नियम बनाया कि अब से यहां मनुष्यों को उनके विग्रह के दर्शन होंगे। तब से भगवान के उस विग्रह के दर्शन प्राप्त होते हैं।

3:👉 बद्रीनाथ को शास्त्रों और पुराणों में दूसरा बैकुण्ठ कहा जाता है। एक बैकुण्ठ क्षीर सागर है जहां भगवान विष्णु निवास करते हैं और विष्णु का दूसरा निवास बद्रीनाथ है जो धरती पर मौजूद है। बद्रीनाथ के बारे यह भी माना जाता है कि यह कभी भगवान शिव का निवास स्थान था। लेकिन विष्णु भगवान ने इस स्थान को शिव से मांग लिया था।

4:👉 चार धाम यात्रा में सबसे पहले गंगोत्री के दर्शन होते हैं यह है गोमुख जहां से मां गंगा की धारा निकलती है। इस यात्रा में सबसे अंत में बद्रीनाथ के दर्शन होते हैं। बद्रीनाथ धाम दो पर्वतों के बीच बसा है। इसे नर नारायण पर्वत कहा जाता है। कहते हैं यहां पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी। नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण हुए।

5:👉 बद्रीनाथ की यात्रा में दूसरा पड़ाव यमुनोत्री है। यह है देवी यमुना का मंदिर। यहां के बाद केदारनाथ के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि जब केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं उस समय मंदिर एक दीपक जलता रहता है। इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाजे के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं।

6:👉 यह है जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर। इस मंदिर का संबंध बद्रीनाथ से माना जाता है। ऐसी मान्यता है इस मंदिर भगवान नृसिंह की एक बाजू काफी पतली है जिस दिन यह टूट कर गिर जाएगा उस दिन नर नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और बद्रीनाथ के दर्शन वर्तमान स्थान पर नहीं हो पाएंगे।

7:👉 बद्रीनाथ तीर्थ का नाम बद्रीनाथ कैसे पड़ा यह अपने आप में रोचक कथा है। कहते हैं एक बार देवी लक्ष्मी जब भगवान विष्णु से रूठ कर मायके चली गई तब भगवान विष्णु यहां आकर तपस्या करने लगे। जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई तो भगवान विष्णु को ढूंढते हुए यहां आई। उस समय यहां बदरी का वन यानी बेड़ फल का जंगल था। बदरी के वन में बैठकर भगवान ने तपस्या की थी इसलिए देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को बद्रीनाथ नाम दिया।

8:👉 यहा सरस्वती नदी के उद्गम पर स्थित सरस्वती मंदिर जो बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर की दूरी पर माणा गांव में स्थित है। सरस्वती नदी अपने उद्गम से महज कुछ किलोमीटर बाद ही अलकनंदा में विलीन हो जाती है। कहते हैं कि बद्रीनाथ भी कलियुग के अंत में वर्तमान स्थान से विलीन हो जाएंगे और इनके दर्शन नए स्थान पर होंगे जिसे भविष्य बद्री के नाम से जाना जाता है।

9:👉 यह है बद्रीनाथ का भव्य नजारा। मान्यता है कि बद्रीनाथ में में भगवान शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। इस घटना की याद दिलाता है वह स्थान जिसे आज ब्रह्म कपाल के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मकपाल एक ऊंची शिला है जहां पितरों का तर्पण श्रद्घ किया जाता है। माना जाता है कि यहां श्राद्घ करने से पितरों को मुक्ति मिल जाती है।

10:👉 बद्रीनाथ के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते हैं जो रावल कहलाते हैं। यह जब तक रावल के पद पर रहते हैं इन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। रावल के लिए स्त्रियों का स्पर्श भी पाप माना जाता है।