Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

●————:◆ शुभ प्रभात मित्रांनो ◆:————●

● पंढरपुरमधील पांडुरंगाच्‍या मुर्तीवर आहे शिवलिंग
● जाणुन घ्‍या त्‍यामागील कथा ◆:— 🙏

।। पंढरपूरच्या श्री पाडुरंगाच्या मूर्तीच्या मस्तकावर
।। शिवलिंग आहे, असे सांगितले जाते. त्या प्रमाणे
।। त्या शिवलिंगाला गंध वगैरे लावून रोज पूजाही केली
।। जाते. त्या संबंधीची अशी कथा सांगितली जाते की
।। एकदा भगवान शंकर श्री विठ्ठलाच्या भेटीला आले
।। व ते विठ्ठलाच्या मूर्तीत विलीन झाले. श्री विठ्ठलाने
।। त्यांना आपल्या मस्तकावर स्थान दिले.

।। पांडुरंग हे नाव शंकराचेच आहे. कारण पांडुर म्हणजे
।। पांढराशुभ्र आणि अंग म्हणजे शरीर. ज्याचे अंग
।। पांढरेशुभ्र आहे असा देव कोण आहे तर भगवान
।। शंकर. श्री विठ्ठल हा तर कृष्ण असल्यामुळे काळा
।। आहे आणि शंकर करपूरगौरवम म्हणजे कापराप्रमाणे
।। गोरा आहे. पण सावळ्या विठ्ठलाने त्यास
।। मस्तकीधारण केल्याने त्यांचे नावही धारण केले पांडुरंग

।। समर्थ रामदास स्वामींनी म्हटले आहे विठोने वाहिला
।। शिरदेव राणा म्हणजे विठ्ठलाने शंकराला मस्तकावर
।। वाहिले आहे. प्रख्यात कवी अनंतरावजी आठवले
।। शंकराच्या स्तोत्रात म्हणतात.
।। विठ्ठले धरिले शिरी शिवलिंग ते मुक्कुटा करती
।। म्हणजे विठ्ठलाने मुक्कुटाच्या आकाराचे शिवलिंग
।। धारण केले आहे.

।। पुढे ते म्हणतात.
।। शोभतो जलदापरी ( ढगापरी ) हरि इंदिरावर सावळा
।। कुंद सुंदर गौर हा हर भेद ना परी राहिला
।। पांडुरंगच बोलती गुज भाविका कळले यदा
।। म्हणजेच विठ्ठल हा मेघाप्रमाणे सावळा आहे
।। व शंकर हा कुंद कळ्याप्रमाणे शुभ्र आहे.

।। पण दोघेही एकरूप झाल्यामुळे विठ्ठलालाच लोक
।। पांडुरंग म्हणतात शिव आणि विष्णू यांचे ऐक्य
।। झालेले एकमेव तीर्थक्षेत्र म्हणजे पंढरपूर आहे.
।। संत नरहरी सोनार हे कट्टर शिवभक्त होते.
।। ते श्री विठुरायाच्या दर्शनालाही जात नव्हते. पण
।। विठ्ठलाच्या करदोड्यासाठी माप घेण्यास येथील
।। मंदिरात गेले ते डोळे बांधून. हाताने श्री विठ्ठल
।। मूर्तीच्या कमरेचे माप घेऊ लागले तो शंकराची चिन्हे
।। त्यांच्या हाताला लागली. डोळे उघडले तर श्री
।। विठ्ठलाची मूर्ती त्यांना दिसली. त्यांचा भ्रम दूर झाला
।। आणि शिव व विठ्ठल हे एकच आहेत असा त्यांना
।। साक्षात्कार झाला.

।। ही घटना सुमारे ७०० वर्षांपूर्वी घडली. त्यामुळेच
।। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश आणि सध्याचे
।। तेलंगणा राज्यातून शिवभक्त तसेच लिंगायत पथाचे
।। धर्मगुरू श्री विठ्ठलाच्या दर्शनासाठी आवर्जून येथे
।। येतात. शिवरात्रीलाही पंढरपुरात सर्व वारकरी
।। उपवास करतात. पांडुरंगाला उपवासाच्या पदार्थांचा
।। नैवेद्य दाखवतात. पंढरपुरात शिव आणि विठ्ठल
।। यामध्ये भेद नाही, हेच या क्षेत्राचे वैशिष्ट्य आहे.
।। महाशिवरात्रीचा उपवास केल्यास १२ एकादशींचे
।। पुण्य लाभते अशीदेखील वारकऱ्यांची श्रध्दा आहे.
।। त्यावरून वारकरी सांप्रदायामध्ये देखील शिवरात्रीचे
।। महत्त्व किती आहे, हे समजते.

●———:◆🌺 राम कृष्ण हरी माऊली 🌺◆:———●

● शुक्रवार ◆:— { ०६ / ०३ / २०२० } ◆:————●

🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏 🙏

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

Original Crown of Lord Venkateshwara. It is more than 500 years old and it is said that this crown was donated by Vijaynagar King Sri Krishnadevaraya.. 🙏🙏
Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

यह चित्र 1908 को लिया गया अमृतसर के हरमंदिर साहब का है जिसे अंग्रेज़ ईसाईयों व वामपंथियों ने गोल्डन टेंपल कहना शुरू किया…
अब यह चित्र देखकर आपके मन में यह प्रश्न उठेगा कि यहां हिन्दू साधु ध्यान कैसे कर रहे हैं वो भी सिक्ख तीर्थ हर मन्दिर साहब में ?
चलिए तनिक इतिहास के कुछ पन्ने पलटते हैं !

सिक्खों के पहले गुरु – श्री गुरुनानक देव जी थे
2- गुरु अंगददेव जी
3- गुरु अमरदास जी
4- गुरु रामदास जी
5- गुरु अर्जुनदेव जी
6- गुरु हरगोविंद जी
7- गुरु हरराय जी
8 – गुरु हरकिशन जी
9- गुरु तेगबहादुर जी
10- गुरु गोविंद सिंह जी

सभी गुरुओं के नाम में राम, अर्जुन, गोविंद (कृष्ण), हर(महादेव) हैं।

जब औरँगजेब ने कश्मीर के पंडितों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा तो कश्मीरी पंडितों ने गुरू तेगबहादुर जी के पास मदद के लिए गुहार लगाई तब गुरु तेगबहादुर जी ने कहा कि जाओ औरंगजेब से कहना यदि हमारे गुरु तेगबहादुर जी यदि मुसलमान बन गए तो हम भी मुसलमान बन जाएंगे ।
ये बात पंडित औरंगजेब तक पहुंचा देते हैं , तब औरंगजेब गुरु तेगबहादुर जी को दिल्ली बुलाकर मुसलमान बनने के लिए दवाब डालता है लेकिन गुरु जी द्वारा अस्वीकार करने पर उन्हें यातना देकर मार दिया जाता है।

अब प्रश्न ये है कि यदि सिक्ख , हिन्दुओं से अलग हैं तो कश्मीरी पंडितों के लिए गुरु तेगबहादुर ने अपने प्राण न्यौछावर क्यों कर दिए ?

गुरु गोविन्द सिंह का प्रिय शिष्य बंदा बहादुर (लक्ष्मण दास) भारद्वाज गोत्र का ब्राम्हण था जिसने गुरु गोविन्द सिंह जी के बाद पंजाब में मुगलों की सेना को नाकों चने चबवा दिए –
कृष्णदत्त जैसे ब्राह्मण ने गुरु के सम्मान के लिए अपने सम्पूर्ण परिवार को कुर्बान कर दिया…

राजा रणजीत सिंह कांगड़ा की ज्वालामुखी देवी के भक्त थे उन्होंने देवी मंदिर का पुर्ननिर्माण कराया….
आज भी अनेक सिक्ख व्यापारियों की दुकानों में गणेश व देवी की मूर्तियां रहती हैं, आज भी सिक्ख नवरात्रि में अपने घरों में जोत जलाते हैं, नवजोत सिंह सिद्धू के घर में शिवलिंग की पूजा होती है।


अब प्रश्न ये उठता है कि सिक्ख कब, क्यों व कैसे हिन्दुओं से अलग कर दिए गए ?

1857 की क्रांति से डरे ईसाई (अंग्रेज़) ने हिन्दू समाज को तोड़ने की साज़िश रची!
1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का गठन किया, जिसका केंद्र तत्कालीन पंजाब का लाहौर था। स्वामी दयानंद ने ही सबसे पहले स्वराज्य की अवधारणा दी। जब देश का नाम हिंदुस्तान तो ईसाईयों (अंग्रेज़) का राज क्यों!
स्वामी दयानंद के इन विचारों से पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियों की बाढ़ आ गयी। लाला हरदयाल, लाला लाजपतराय, सोहन सिंह, भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह जैसे क्रांन्तिकारी नेता आर्य समाजी थे। अतः ईसाई मिशनरियों(अंग्रेजो) ने अभियान चलाया कि सिक्ख व हिन्दू अलग हैं ताकि पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन को कमजोर किया जा सके। इसके लिए कुछ अंग्रेज़ समर्थक सिक्खों ने एक साजिश के तहत अभियान चलाया कि सिक्ख , हिन्दू नही हैं और अलग धर्म का दर्जा देने की मांग की (जैसे हाल ही में कर्नाटक के कुछ ईसाई बने लिंगायत समुदाय के लोगों ने हिन्दू धर्म से अलग करने की मांग उठाई थी)

ईसाई मिशनरियों(अंग्रेज़) ने 1922 में गुरुद्वारा एक्ट पारित कर सिक्खों को हिन्दूओं से अलग कर उन्हें अलग धर्म का घोषित कर दिया। और आजादी के बाद भी भारत के विखंडन के जिम्मेदार गुलाबी चचा ने इसे बनाये रखा…!

मित्रो, हिन्दू सिक्खों का खून एक है, हर हिन्दू को गुरूद्वारा जाना चाहिए, हर हिंदू को जीवन में एक बार अमृतसर के हरमंदिर साहिब अवश्य जाना चाहिए …!!

गुरु गोविन्द सिंह ने 1699 में खालसा (पवित्र) पंथ का गठन किया था और कहा था कि मैं चारों वर्ण के लोगों को सिंह बना दूँगा ।
” देश, धर्म व संस्कृति की रक्षा प्राण देकर ही नही, प्राण लेकर भी की जाती है”

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=776241482793731&id=463090754108807&sfnsn=mo

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

सबसे ऊँची हिंदू देवता की प्रतिमा। मुस्लिम देश इंडोनेशिया के बाली में। गरूड़ व विष्णु। 122 फुट० ऊँची, 64 फुट० चौड़े पंख, तांबे व पीतल से बनी।
वहाँ मुस्लिम लोग अभी भी अपनी मूल जड़ों से जुड़े हुए हैं, अर्थात् हिंदुत्व से।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

हिन्दू धर्म एक रहस्यमयी

सा

रे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों
Jai ho. ….
Jai Mhakal. ….
गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ”सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।’

‘ गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं।

यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है। लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकाकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है।

इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल।

मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के लिए स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं।

सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं।

कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है।

उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं।

रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया।

राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था।

अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये।

वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- ‘तुम लोग भस्म हो जाओ।

‘ शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्स्थिति समझ गया।

उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की।

लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए।

भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया।

गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा।

भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा।

जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति….radhe radhe. …

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

Nilesh kumar shukla

#ओरछाकेराजा’ #श्रीराम के धाम को मिली नई पहचान, UNESCO विश्व धरोहर में होगा शामिल

मध्यप्रदेश में भगवान राम के धाम ओरछा को दुनिया में नई पहचान मिलने जा रही है। मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में स्थित ओरछा की ऐतिहासिक धरोहर को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) के प्रस्ताव पर यूनेस्को ने विश्व धरोहरों की ‘अस्थायी’ सूची में शामिल कर लिया है। एएसआई ने यह प्रस्ताव एक माह पहले यानी 15 अप्रैल को भेजा था। 16वीं सदी में बुंदेला राजवंश द्वारा बनवाए गए स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने देखने के लिए देश-दुनिया से पर्यटक और श्रद्धालु यहाँ आते हैं और अब यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होने के बाद सभी आवश्यक प्रकिया पूरी करके यूनेस्को के पास भेजा जाएगा। दरअसल, किसी भी ऐतिहासिक स्थल, भवन या धरोहर को विश्व धरोहर की सूची में शामिल होने के लिए पहले विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में शामिल होना पड़ता है।

ओरछा स्थित रामराजा मंदिर एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ भगवान राम को भगवान के रूप में पूजने के साथ ही राजा के रूप में भी पूजा जाता है। इनको दिन में पांचों पहर सशस्त्र गार्डों द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर (सलामी) दी जाती है। गार्ड ऑफ ऑनर देने के लिए मंदिर के प्रवेश द्वार पर मध्य प्रदेश की स्पेशल आर्म्ड फ़ोर्स (SAF) के 11 जवान तैनात रहते हैं, जो तीन-तीन घंटे के अंतराल से ड्यूटी देते हैं। यह परंपरा तकरीबन 400 साल से चली आ रही है। मान्यताओं के अनुसार, यह मूर्ति मधुकर शाह के राज्यकाल के दौरान उनकी महारानी गणेश कुंवर अयोध्या से लाई थीं।

मंदिर बनने से पहले इसे कुछ समय के लिए इसे महल में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। जिसके बाद इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम राम राजा मंदिर रख दिया गया। यहाँ के लोगों का मानना है कि भगवान राम हर दिन अदृश्य रूप में इस मंदिर में आते हैं। ओरछा अपने रामराजा मंदिर, शीश महल, जहाँगीर महल, बाग-बगीचे, खुले गलियारे, पत्थरों वाली जाली का काम, वास्तुशिल्प आदि की वजह से आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और आने वाले दिनों में इसके विश्व धरोहरों की सूची में शामिल होने की संभावना है।

#ओरछा #ऐतिहासिक #यूनेस्को