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संजय गुप्ता

नैना देवी मंदिर इक्यावन शक्ति पीठ मंदिरों मे से एक है।

नैना देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में है। यह शिवालिक पर्वत श्रेणी की पहाड़ियो पर स्थित एक भव्य मंदिर है। यह देवी के 51 शक्ति पीठों में शामिल है। नैना देवी हिंदूओं के पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है।

यह स्थान नैशनल हाईवे न. 21 से जुड़ा हुआ है। इस स्थान तक पर्यटक अपने निजी वाहनो से भी जा सकते है। मंदिर तक जाने के लिए उड़्डनखटोले, पालकी आदि की भी व्यवस्था है। यह समुद्र तल से 11000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। मंदिर में पीपल का पेड़ मुख्य आकषर्ण का केन्द्र है जो कि अनेको शताब्दी पुराना है।

मंदिर के मुख्य द्वार के दाई ओर भगवान गणेश और हनुमान कि मूर्ति है। मुख्य द्वार के पार करने के पश्चात आपको दो शेर की प्रतिमाएं दिखाई देगी। शेर माता का वाहन माना जाता है। मंदिर के र्गभ ग्रह में मुख्य तीन मूर्तियां है। दाई तरफ माता काली की, मध्य में नैना देवी की और बाई ओर भगवान गणेश की प्रतिमा है।

पास ही में पवित्र जल का तालाब है जो मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। मंदिर के समीप ही में एक गुफा है जिसे नैना देवी गुफा के नाम से जाना जाता है। पहले मंदिर तक पहुंचने के लिए 1.25 कि॰मी॰ की पैदल यात्रा कि जाती थी परन्तु अब मंदिर प्रशासन द्वारा मंदिर तक पहुंचने के लिए उड़्डलखटोले का प्रबंध किया गया है।

दुर्गा सप्तशती और देवी महात्यमय के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच में सौ वर्षों तक युद्ध चला था। इस युद्ध में असुरो की सेना विजयी हुई। असुरो का राजा महिषासुर स्वर्ग का राजा बन गया और देवता सामान्य मनुष्यों कि भांति धरती पर विचलण करने लगे।

तब पराजित देवता ब्रहमा जी को आगे कर के उस स्थान पर गये जहां शिवजी, भगवान विष्णु के पास गए। सारी कथा कह सुनाई। यह सुनकर भगवान विष्णु, शिवजी ने बड़ा क्रोध किया उस क्रोध से विष्णु, शिवजी के शरीर से एक एक तेज उत्पन्न हुआ।

भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख, विष्णु के तेज से उस देवी की वायें, ब्रहमा के तेज से चरण तथा यमराज के तेज से बाल, इन्द्र के तेज से कटि प्रदेश तथा अन्य देवता के तेज से उस देवी का शरीर बना।

फिर हिमालय ने सिंह, भगवान विष्णु ने कमल, इंद्र ने घंटा तथा समुद्र ने कभी न मैली होने वाली माला प्रदान की। तभी सभी देवताओं ने देवी की आराधना की ताकि देवी प्रसन्न हो और उनके कष्टो का निवारण हो सके। और हुआ भी ऐसा ही।

देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं को वरदान दे दिया और कहा मै तुम्हारी रक्षा अवश्य करूंगी। इसी के फलस्वरूप देवी ने महिषासुर के साथ युद्ध प्रारंभ कर दिया। जिसमें देवी कि विजय हुई और तभी से देवी का नाम महिषासुर मर्दनी पड़ गया।

नैना देवी मंदिर शक्ति पीठ मंदिरों मे से एक है। पूरे भारतवर्ष मे कुल 51 शक्तिपीठ है। जिन सभी की उत्पत्ति कथा एक ही है। यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुऐ है। धार्मिक ग्रंधो के अनुसार इन सभी स्थलो पर देवी के अंग गिरे थे।

शिव के ससुर राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया जिसमे उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नही किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नही समझते थे। यह बात सती को काफी बुरी लगी और वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गयी। यज्ञ स्‍थल पर शिव का काफी अपमान किया गया जिसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कुद गयीं।

जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वह आये और सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे। जिस कारण सारे ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। पूरे ब्रह्माण्ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागो में बांट दिया जो अंग जहां पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया। मान्यता है कि नैना देवी मे माता सती नयन गिरे थे।

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संजय गुप्ता

मित्रो आज हम आपको हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से एक द्वारिका पुरी धाम की कथा विस्तार से बतायेंगे!!!!!!!!

भारत के पश्चिमी छोर पर गुजरात राज्य में स्थित द्वारिका को कर्मयोगी श्री कृष्ण की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। बिलकुल समुद्र तट पर, जहां अरब सागर की फेनिल लहरें मचलती रहती हैं – द्वारिकापुरी स्थित है।

इस छोटे शहर के मध्य स्थान में ऊंचाई पर बना हुआ द्वारिकाधीश का मंदिर तथा उस पर फहराती रंगीन पताका दूर से दिखाई देती है। यही पर स्थित है हमारा पावन ‘द्वारिकाधाम’।
भारत की सनातन परंपरा के अनुसार तीर्थाटन अथवा पर्यटन को सदैव विशेष महत्त्व दिया जाता रहा है।

आदि शंकराचार्य ने इसी परंपरा को नया और व्यावहारिक स्वरूप देने के लिए देश में चारों दिशाओं की ओर चार प्रमुख तीर्थों की स्थापना करके चार धाम की परिकल्पना को रूपांकित किया है। आज भी विभिन्न प्रकार के रीति-रिवाजों और क्षेत्रीय भिन्नता वाले देश को भावनात्मक एकता में बांधे रखने में इन चारों धामों बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारिका और रामेश्वरम् का विशेष योगदान रहा है।

मुख्य मंदिर:- आज के प्रमुख तीर्थ द्वारिका को पौराणिक समय में ‘द्वारवती’ के नाम से पुकारा जाता था। ऐसी मान्यता है कि देवी-देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा निर्मित और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बसाई गई इस नगरी को किसी समय कुपित होकर समुद्र ने निगल लिया लेकिन तब श्री कृष्ण का निवास स्थान नहीं डूबा था। बाद में श्री कृष्ण के वंशज वर्जनाम ने उसी स्थल पर रणछोर जी का मंदिर बनवाया जो आज तक विद्यमान है।

द्वारिकाधीश के मुख्य मंदिर को यहां के लोग ‘जगत मंदिर’ के नाम से पुकारते हैं।

स्थापत्यकाल और शिल्प की दृष्टि से देखने पर भी यह मंदिर अत्यंत गौरवमय लगता है। मंदिर के बाहरी हिस्सों पर अनेक प्रकार की कलात्मक मूर्तियां खुदी हैं जिनमें लतावितान बनाकर सुंदर सज्जा का प्रदर्शन किया गया है। पत्थर के स्तम्भों से बने ऊंचे द्वार से होकर मंदिर प्रांगण में प्रवेश किया जाता है। निर्माण की दृष्टि से मुख्य मंदिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है निज मंदिर, सभाग्रह और शिखर।

इस पांच मंजिले प्रमुख मंदिर के प्रकोष्ठ में मुख्य देवता भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। कसौटी वाले काले पत्थर से बनी बांके बिहारी की मूर्ति सबका ध्यान आकर्षित कर लेती है। शंख, चक्र, गदा और पद्मधारी प्रतिमा को मूल्यवान वस्त्रों तथा रत्नजटित आभूषणों से सुसज्जित रखा जाता है जिसकी शोभा प्रतिदिन आरती के समय देखते ही बनती है।

करीब 50 मीटर ऊंचे इस जगत मंदिर के शिखर पर रंगीन कपड़े की लंबी ध्वजा आसमान में फहराती रहती है। मुख्य मंदिर की परिक्रमा करते समय राधा, रूक्मणि, सत्यभामा और जामवंती के छोटे-छोटे मंदिरों के दर्शन होते हैं। इस मंदिर के अहाते में ही श्री शंकराचार्य का धर्मपीठ भी स्थित है।

शंकराचार्य पीठ:- पवित्र धाम द्वारकापुरी अपने शंकराचार्य पीठ के लिए पूरे हिंदू जगत में प्रसिद्ध है। राष्ट्रीय स्तर पर समाज और संस्कृति के मामलों में यहां के पीठासीन आचार्य के निर्णय को विशेष मान्यता दी जाती है। द्वारकापुरी के प्रमुख मंदिर की व्यवस्था एक धार्मिक ट्रस्ट न्यास के अधीन है।

इसी के अंतर्गत शंकराचार्य पीठ के अध्ययन के अलावा इस धार्मिक संस्थान द्वारा मंदिर में पूजा-अर्चना तथा अन्य कार्यो की देख-रेख की जाती है। मंदिर में तथा शंकराचार्य पीठ में चढ़ावा तथा दानराशि का भी हिसाब-किताब रखा जाता है। यहां भक्तजनों से दक्षिणा या दान राशि प्राप्त करने के बाद प्रसाद और प्राप्ति पत्र देने का नियम प्रचलित है।

बेट द्वारका:- श्रीकृष्ण की राजधानी द्वारिका नगरी से थोड़ी दूर ऊंची पहाड़ी पर राज-निवास था। ऐसी मान्यता है कि यहां श्रीकृष्ण जी के बालसखा सुदामा आये और उनका स्नेह और दर्शन पाकर धन्य हो गये। कालक्रम से द्वारकापुरी तथा श्रीकृष्ण निवास की भूमि धंसती गई और बीच में सागर जल लहराने लगा। फलस्वरूप अब यह निवास मंदिर एक टापू पर स्थित है जिसे ‘बेट द्वारिका’ या द्वारिका द्वीप कहते हैं।

द्वारकाद्वीप से करीब तीस किलोमीटर की दूरी पर ओखा मंदिरगाह के पास सागर में बेट द्वारका पहुंचने के लिए ओखा से मोटरबोट या नाव से करीब दो किलोमीटर की समुद्री यात्र करनी होती है। सागर की नीली लहरों पर नाव से की जाने वाली यात्र काफी आनंददायक होती है। नाव के सहारे ऊपर समुद्री पक्षियों के समूह उड़ते रहते हैं तथा नीचे जल में मछलियों की झुंड तैरते रहते हैं।

बेट द्वारका में गलियों से होकर मुख्य मंदिर में पहुंचने का रास्ता है। यहां श्रीकृष्ण के साथ महारानी रूकमणि तथा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। इस प्राचीन मंदिर में यात्रियों को दर्शन की सुविधा देने के लिए अच्छी व्यवस्था की गई हैं। बेट द्वारका तथा द्वारकापुरी द्वारकाधीश के मंदिर के निकट बाजार में अनेक छोटी-बड़ी दुकानें सजी रहती हैं जिनमें पूजा के सामान के अलावा कई प्रकार की कलात्मक और सजावट की वस्तुएं बिकती रहती हैं।

द्वारकापुरी से ओखा जाने के रास्ते में सड़क पर ही रूक्मणि देवी का प्राचीन मंदिर स्थित है जिसकी बाहरी दीवारों पर विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियां खुदी हैं किंतु सागर तट से आने वाली लवणयुक्त तेज हवाएं इन मूर्तियों को क्षीण करने लगी हैं। यहां एक ओर दूर तक फैली सागरीय-भूमि पर मछुआरों की झोपडिय़ां हैं तो दूसरी ओर रासायनिक खाद्य और नमक बनाने का टाटा का विशाल कारखाना स्थित है।

कैसे पहुंचें, कहां ठहरें?

भारत के सुदूर पश्चिमी छोर पर स्थित दर्शनीय द्वारकाधाम पहुंचने के लिए अब सड़क और रेल लाइन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। द्वारका रेलवे स्टेशन वीरमगाम और ओखा ब्रांचलाइन पर स्थित है जो मुम्बई से एक हजार किमी. तथा दिल्ली से चौदह सौ किमी. दूरी पर स्थित है द्वारका के पास जामनगर में हवाई अड्डा भी है जहां से डेढ़ सौ किलोमीटर का मार्ग तय करके द्वारका पहुंचा जा सकता है। गुजरात के मुख्यनगर में अहमदाबाद से सड़क और रेल द्वारा भी द्वारिका पहुंचा जा सकता है। यह दूरी चार सौ पचास किलोमीटर है।

द्वारकाधाम में अनेक धर्मशालाएं होटल तथा अतिथिगृह हैं। पर्यटन विभाग की ओर से भी यात्रियों के ठहरने के लिये ‘तोरण’ निवास स्थान है। यहां रहकर दर्शनीय स्थानों की सैर के अलावा सागर स्नान का आनंद भी लिया जा सकता है।

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करणी माता मंदिर एक अद्भुत रहस्यमय स्थान?

संजय गुप्ता

यदि आपके घर में आपको एक भी चूहा नज़र आ जाए तो आप बेचैन हो उठेंगे। आप उसको अपने घर से भगाने की तमाम तरकीबे लगाएंगे क्योकि चूहों को प्लेग जैसी कई भयानक बीमारियों का कारण माना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है की हमारे देश भारत में माता का एक ऐसा मंदिर भी है जहाँ पर 20000 चूहे रहते है और मंदिर में आने वालो भक्तो को चूहों का झूठा किया हुआ प्रसाद ही मिलता है।

आश्चर्य की बात यह है की इतने चूहे होने के बाद भी मंदिर में बिल्कुल भी बदबू नहीं है, आज तक कोई भी बीमारी नहीं फैली है यहाँ तक की चूहों का झूठा प्रसाद खाने से कोई भी भक्त बीमार नहीं हुआ है। इतना ही नहीं जब आज से कुछ दशको पूर्व पुरे भारत में प्लेग फैला था तब भी इस मंदिर में भक्तो का मेला लगा रहता था और वो चूहों का झूठा किया हुआ प्रसाद ही खाते थे। यह है राजस्थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलो मीटर दूर देशनोक में स्तिथ करणी माता का मंदिर जिसे चूहों वाली माता, चूहों वाला मंदिर और मूषक मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

माना जाता है माँ जगदम्बा का साक्षात अवतार

करणी माता, जिन्हे की भक्त माँ जगदम्बा का अवतार मानते है, का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रिघुबाई था। रिघुबाई की शादी साठिका गाँव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया इसलिए उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया।

जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रिघु बाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे। वर्तमान में जहाँ यह मंदिर स्तिथ है वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी इष्ट देवी की पूजा किया करती थी।

यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्तिथ है। कहते है करनी माता 151 वर्ष जिन्दा रहकर 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लिन हुई थी। उनके ज्योतिर्लिं होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना कर के उनकी पूजा शुरू कर दी जो की तब से अब तक निरंतर जारी है।

राजा गंगा सिंह ने करवाया था मंदिर का निर्माण

करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी है। कहते है की उनके ही आशीर्वाद से बीकानेर और जोधपुर रियासत की स्थापना हुई थी। करणी माता के वर्तमान मंदिर का निर्माण बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवी शताब्दी के शुरुआत में करवाया था। इस मंदिर में चूहों के अलावा, संगमरमर के मुख्य द्वार पर की गई उत्कृष्ट कारीगरी, मुख्य द्वार पर लगे चांदी के बड़े बड़े किवाड़, माता के सोने के छत्र और चूहों के प्रसाद के लिए रखी चांदी की बहुत बड़ी परात भी मुख्य आकर्षण है।

यदि हम चूहों की बात करे तो मंदिर के अंदर चूहों का एक छत्र राज है। मदिर के अंदर प्रवेश करते ही हर जगह चूहे ही चूहे नज़र आते है। चूहों की अधिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की मंदिर के अंदर मुख्य प्रतिमा तक पहुंचने के लिए आपको अपने पैर घसीटते हुए जाना पड़ता है। क्योकि यदि आप पैर उठाकर रखते है तो उसके नीचे आकर चूहे घायल हो सकते है जो की अशुभ माना जाता है। इस मंदिर में करीब बीस हज़ार काले चूहों के साथ कुछ सफ़ेद चूहे भी रहते है। इस चूहों को ज्यादा पवित्र माना जाता है। मान्यता है की यदि आपको सफ़ेद चूहा दिखाई दे गया तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

इस मंदिरो के चूहों की एक विशेषता और है की मंदिर में सुबह 5 बजे होने वाली मंगला आरती और शाम को 7 बजे होने वाली संध्या आरती के वक़्त अधिकांश चूहे अपने बिलो से बाहर आ जाते है। इन दो वक़्त चूहों की सबसे ज्यादा धामा चौकड़ी होती है। यहां पर रहने वाले चूहों को काबा कहा जाता कहां जाता है। माँ को चढ़ाये जाने वाले प्रसाद को पहले चूहे खाते है फिर उसे बाटा जाता है। चील, गिद्ध और दूसरे जानवरो से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानो पर बारीक जाली लगी हुई है।

करणी माता के बेटे माने जाते है चूहे, करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहे माँ की संतान माने जाते है करनी माता की कथा के अनुसार एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र ( उसकी बहन गुलाब और उसके पति का पुत्र ) लक्ष्मण, कोलायत में स्तिथ कपिल सरोवर में पानी पीने की कोशिश में डूब कर मर गया। जब करणी माता को यह पता चला तो उन्होंने, मृत्यु के देवता याम को उसे पुनः जीवित करने की प्राथना की। पहले तो यम राज़ ने मन किया पर बाद में उन्होंने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुनर्जीवित कर दिया।

हालॉकि बीकानेर के लोक गीतों में इन चूहों की एक अलग कहानी भी बताई जाती है जिसके अनुसार एक बार 20000 सैनिकों की एक सेना देशनोक पर आकर्मण करने आई जिन्हे माता ने अपने प्रताप से चूहे बना दिया और अपनी सेवा में रख लिया।

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जानिए क्या है इस रहस्यमयी पवित्र गुफा का इतिहास मान्यता है कि इस गुफा से काशी तक मार्ग जाता है!!!!!!

संजय गुप्त

हमारे देश में कई स्थान व भवन ऐसे हैं जो स्थापत्य कला की अनोखी मिसाल हैं। उसी कला को समृद्ध करती ऐसी ही एक गुफा है पाताल भुवनेश्वर गुफा। उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों के बीच बनी ये गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। 33 कोटि देवी-देवताओं के इस रहस्यमयी स्थल के बारे में यहां हम आपको बताने जा रहे हैं –

पूरे भारत में संभवत: पाताल भुवनेश्वर जैसा अद्भुत स्थल कहीं भी नहीं है। पिथौरागढ़ जिले के सरयू तथा पूर्वी रामगंगा के मध्य स्थित यह स्थल समुद्र तल से 1350 मी. ऊंचाई पर है। स्कन्द पुराण के मानस खंड के 103वें अध्याय में इस स्थल का वर्णन है।

वल्कलाख्यो महादेवं प्रकाशयति भूतलो।
ना गमिष्यन्ति मनुजास्तावन पाताल मण्डले।
सत्क्रियो देवेदेवस्य बल्कलाख्य: करिष्यति।
सदां प्रमति मत्र्याना गुहा गम्या भविष्यति॥

गुफा के रहस्य से जुड़ी है ये कहानी
इस जगह का दिव्य दर्शन पहली बार सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण को हुआ। ऋतुपर्ण राजा का समय भगीरथ से 7 पीढ़ी पूर्व का माना जाता है। इस दिव्य दर्शन की कथा भी अत्यन्त रोचक है। अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण का एक शौक था चौपड़ खेलना। उनके चौपड़ के साथी थे राजा नल।

एक बार राजा नल पुष्करराज तीर्थ पर ऋतुपर्ण के साथ चौपड़ खेल रहे थे। वह अपनी दमयन्ती को चौपड़ के खेल में हार गए। शर्म के मारे उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से कहा कि मुझे ले जाकर घने जंगल में छुपा दो और मेरा मुंह भी रंगकर ले जाना ताकि दमयन्ती मुझे पहचान न सके। ऋतुपर्ण नल को लेकर जब हिमालय के घोर जंगलों में जा रहे थे तो उन्हें एक अलौकिक हिरण नजर आया।

हिरण का पीछा करते-करते ऋतुपर्ण पाताल भुवनेश्वर जा पहुंचे। हिरण तो जंगल में नहीं मिला लेकिन रात्रि को थक कर सोते हुए ऋतुपर्ण को सपने में हिरण के दर्शन हुए। सपने में हिरण ने कहा कि हे राजन मेरा पीछा मत करो मैं हिरण नहीं हूं।

ऋतुपर्ण ने जब हिरण का वास्तविक परिचय जानना चाहा तो हिरण ने उस स्थल के क्षेत्ररक्षक से प्रार्थना करने का सुझाव दिया। दो माह की तपस्या से क्षेत्रपाल प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष हुए और उन्होंने स्पष्ट किया कि इस स्थान पर एक गुफा है जिसमें तैंतीस कोटि देवी-देवता भगवान शंकर के साथ स्थापित हैं।

क्षेत्रपाल ने ही ऋतुपर्ण की प्रार्थना पर उन्हें गुफा के रक्षक शेषनाग तक पहुंचा दिया। शेषनाग ने अपने फन पर बैठाकर ऋतुपर्ण को छह माह तक गुफा के प्रत्येक भाग के न केवल दर्शन कराए वरन जाते समय उन्हें ढेर सारे मणिरत्न देकर इस निर्देश के साथ विदा किया कि वह इस रहस्य को किसी को न बताए अन्यथा उनकी मृत्यु हो जाएगी।

राज्य वापस आकर रानी के बहुत जिद करने पर न चाहते हुए भी राजा ऋतुपर्ण ने रानी को गुफा का रहस्य बता दिया और उनकी तत्काल मृत्यु हो गई। रानी अत्यन्त दुखी हुई किन होनी को कौन टाल सकता है। अन्त्येष्टि के बाद रानी पाताल भुवनेश्वर पहुंची। उसे गुफा में प्रतिमाएं तो मिलीं किंतु उन प्रतिमाओं में दिव्य अनुभूति का अभाव था।

इसके बाद हजारों वर्षों तक यह स्थान गोपनीय ही रहा। बाद में पुराणों के आधार पर चन्द एवं कत्यूरी राजाओं ने इस स्थल का पता लगाया और यहां कई अन्य मंदिर भी बनवाए। द्वापर युग में पांडव जहां अज्ञातवास के दौरान भ्रमण करते हुए आए और सन् 1191 में आदि शंकराचार्य ने इस स्थल का विधिवत पूजन-अर्चन कर इसे पुन: आध्यात्मिक स्तर पर महिमा मंडित किया।

पाताल भुवनेश्वर गुफा आज भी अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही है। गुफा के द्वार से नीचे की ओर उबड़-खाबड़ सीढियां हैं। सैकड़ों वर्षों पूर्व इन सीढ़ियों को किसी अप्रशिक्षित ग्रामीण अथवा मजदूरों ने बनाया होगा। कहीं पतली, कहीं लंबी, मार्ग भी कहीं-कहीं तो इतना संकरा कि दो स्वस्थ आदमी एक साथ न निकल सकें। इन सीढ़ियों की कुल संख्या 82 है।

अग्रभाग में एक हवनकुंड है। कहते हैं कि राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित के उद्धार हेतु उलंग ऋषि के निर्देशानुसार इसी हवन कुंड में सर्प यज्ञ किया था। कुण्ड के ऊपर तक्षक नाग की मूर्ति स्पष्ट नजर आती है। अन्दर आगे बढ़ने पर तो पर्वत में उभरी स्वनिर्मित (प्राकृतिक) मूर्तियों का इतना विशाल भंडार है कि उन्हें देखते-देखते महीनों बीत जाएं।

अष्टदल कमल ऊपर छत में नजर आ रहा है। नीचे गणेश जी का धड़ है, जिस पर अष्टदल कमल से जल गिर रहा है। निकट ही महान धाम केदारनाथ, बद्रीनाथ एवं अमरनाथ लिंगों के रूप में विराजमन हैं। इन लिंगों के निकट ही काल भैरव की जीभ नजर आती है। काल भैरव का मुख छोटी संकरी गुफा के समान है।

कहा जाता है कि यदि कोई मानव मुख से प्रवेश कर पूंछ तक पहुंच जाए तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है।

कुछ आगे बढ़ने पर शिव का आसन एवं चंडी वाहन शेर का मुख सामने है। यहीं 4 द्वार बने हैं (गुफा द्वार है जो लगभग 10 फीट ऊंचाई पर है) इन्हें पाप द्वार, रणद्वार, धर्मद्वार एवं मोक्ष के रूप में परिभाषित किया गया है।

स्कन्द पुराण के अनुसार पाप द्वार त्रेता युग में रावण की मृत्यु के साथ बन्द हो गया, रणद्वार द्वापर में महाभारत के पश्चात बन्द हो गया, धर्मद्वार अभी खुला है। कहते हैं कि यह कलियुग की समाप्ति पर बन्द होगा। मोक्ष द्वार सतयुग की समाप्ति पर बन्द होगा। मान्यता है कि मोक्ष द्वार से यदि धर्मप्राण मनुष्य प्रवेश कर ले तो उसे मुक्ति मिल जाती है।

पौराणिक संदर्भ के दृश्यों को प्रकृति ने इस कुशलता से और इतने रूपों में रचा है कि यह 500-600 मीटर लंबी गुफा इन प्राकृतिक दृश्यों का अद्भुत संग्रहालय ही बन गई है।

ऊपर दीवार में भगवान शंकर की जटाएं, उनसे निकलती गंगा धारा और नीचे तैंतीस कोटि देवी-देवता अत्यन्त सूक्ष्म लिंगों के रूप में आराधना की मुद्रा में मध्य में नर्मदेश्वर और निकट ही नन्दी एवं विश्वकर्मा कुंड सभी कुछ सहज, नयनों को बांध लेने वाला है।

आगे दाहिनी ओर शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्राकृतिक लिंग त्रिमूर्ति ब्रह्म, विष्णु, महेश हैं। इन पर ऊपर से तीन गंगाओं की जलधारा बारी-बारी से गिर रही है। यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। सामने ऊंचाई पर एक गुफा है। अनगढ़ पत्थरों द्वारा ऊपर चढ़ने पर एक ओर शिवपार्वती एवं पांच पांडव (लिंग रूप में) चौपड़ खेल रहे हैं।

मान्यता है कि इस गुफा से काशी तक मार्ग जाता है। वापसी पर फिर एक छोटी गुफा सम्मुख है जहां विशाल प्रस्तर खंड पर 4 लिंग स्थापित हैं। ये चार लिंग 4 युगों सतयुग त्रेता, द्वापर एवं कलियुग का स्वरूप हैं। कलियुग लिंग अपेक्षाकृत बड़ा है। कहते हैं कि यह लिंग समय के साथ ऊपर बढ़ रहा है और जब यह बढ़ते-बढ़ते छत को स्पर्श कर लेगा तब कलियुग का अन्त हो जाएगा।

आगे फिर मुख्य मार्ग मिल जाता है। आगे ऐरावत हाथी एवं शिव कमंडल है। शिव कमंडल से श्रद्धालु मनोवांछित फल की इच्छा कर सकते हैं।

मान्यता है कि इस गुफा के दर्शन मात्र से चार धामों का पुण्य मिल जाता है। शिवरात्रि को तो इस स्थल पर विशाल मेला लगता ही है अन्य धार्मिक अवसरों पर भी यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।

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द्वारिका पुरी धाम


मित्रो आज हम आपको हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से एक द्वारिका पुरी धाम की कथा विस्तार से बतायेंगे!!!!!!!!

Sanajy Gupta

भारत के पश्चिमी छोर पर गुजरात राज्य में स्थित द्वारिका को कर्मयोगी श्री कृष्ण की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। बिलकुल समुद्र तट पर, जहां अरब सागर की फेनिल लहरें मचलती रहती हैं – द्वारिकापुरी स्थित है।

इस छोटे शहर के मध्य स्थान में ऊंचाई पर बना हुआ द्वारिकाधीश का मंदिर तथा उस पर फहराती रंगीन पताका दूर से दिखाई देती है। यही पर स्थित है हमारा पावन ‘द्वारिकाधाम’।
भारत की सनातन परंपरा के अनुसार तीर्थाटन अथवा पर्यटन को सदैव विशेष महत्त्व दिया जाता रहा है।

आदि शंकराचार्य ने इसी परंपरा को नया और व्यावहारिक स्वरूप देने के लिए देश में चारों दिशाओं की ओर चार प्रमुख तीर्थों की स्थापना करके चार धाम की परिकल्पना को रूपांकित किया है। आज भी विभिन्न प्रकार के रीति-रिवाजों और क्षेत्रीय भिन्नता वाले देश को भावनात्मक एकता में बांधे रखने में इन चारों धामों बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारिका और रामेश्वरम् का विशेष योगदान रहा है।

मुख्य मंदिर:- आज के प्रमुख तीर्थ द्वारिका को पौराणिक समय में ‘द्वारवती’ के नाम से पुकारा जाता था। ऐसी मान्यता है कि देवी-देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा निर्मित और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बसाई गई इस नगरी को किसी समय कुपित होकर समुद्र ने निगल लिया लेकिन तब श्री कृष्ण का निवास स्थान नहीं डूबा था। बाद में श्री कृष्ण के वंशज वर्जनाम ने उसी स्थल पर रणछोर जी का मंदिर बनवाया जो आज तक विद्यमान है।

द्वारिकाधीश के मुख्य मंदिर को यहां के लोग ‘जगत मंदिर’ के नाम से पुकारते हैं।

स्थापत्यकाल और शिल्प की दृष्टि से देखने पर भी यह मंदिर अत्यंत गौरवमय लगता है। मंदिर के बाहरी हिस्सों पर अनेक प्रकार की कलात्मक मूर्तियां खुदी हैं जिनमें लतावितान बनाकर सुंदर सज्जा का प्रदर्शन किया गया है। पत्थर के स्तम्भों से बने ऊंचे द्वार से होकर मंदिर प्रांगण में प्रवेश किया जाता है। निर्माण की दृष्टि से मुख्य मंदिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है निज मंदिर, सभाग्रह और शिखर।

इस पांच मंजिले प्रमुख मंदिर के प्रकोष्ठ में मुख्य देवता भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। कसौटी वाले काले पत्थर से बनी बांके बिहारी की मूर्ति सबका ध्यान आकर्षित कर लेती है। शंख, चक्र, गदा और पद्मधारी प्रतिमा को मूल्यवान वस्त्रों तथा रत्नजटित आभूषणों से सुसज्जित रखा जाता है जिसकी शोभा प्रतिदिन आरती के समय देखते ही बनती है।

करीब 50 मीटर ऊंचे इस जगत मंदिर के शिखर पर रंगीन कपड़े की लंबी ध्वजा आसमान में फहराती रहती है। मुख्य मंदिर की परिक्रमा करते समय राधा, रूक्मणि, सत्यभामा और जामवंती के छोटे-छोटे मंदिरों के दर्शन होते हैं। इस मंदिर के अहाते में ही श्री शंकराचार्य का धर्मपीठ भी स्थित है।

शंकराचार्य पीठ:- पवित्र धाम द्वारकापुरी अपने शंकराचार्य पीठ के लिए पूरे हिंदू जगत में प्रसिद्ध है। राष्ट्रीय स्तर पर समाज और संस्कृति के मामलों में यहां के पीठासीन आचार्य के निर्णय को विशेष मान्यता दी जाती है। द्वारकापुरी के प्रमुख मंदिर की व्यवस्था एक धार्मिक ट्रस्ट न्यास के अधीन है।

इसी के अंतर्गत शंकराचार्य पीठ के अध्ययन के अलावा इस धार्मिक संस्थान द्वारा मंदिर में पूजा-अर्चना तथा अन्य कार्यो की देख-रेख की जाती है। मंदिर में तथा शंकराचार्य पीठ में चढ़ावा तथा दानराशि का भी हिसाब-किताब रखा जाता है। यहां भक्तजनों से दक्षिणा या दान राशि प्राप्त करने के बाद प्रसाद और प्राप्ति पत्र देने का नियम प्रचलित है।

बेट द्वारका:- श्रीकृष्ण की राजधानी द्वारिका नगरी से थोड़ी दूर ऊंची पहाड़ी पर राज-निवास था। ऐसी मान्यता है कि यहां श्रीकृष्ण जी के बालसखा सुदामा आये और उनका स्नेह और दर्शन पाकर धन्य हो गये। कालक्रम से द्वारकापुरी तथा श्रीकृष्ण निवास की भूमि धंसती गई और बीच में सागर जल लहराने लगा। फलस्वरूप अब यह निवास मंदिर एक टापू पर स्थित है जिसे ‘बेट द्वारिका’ या द्वारिका द्वीप कहते हैं।

द्वारकाद्वीप से करीब तीस किलोमीटर की दूरी पर ओखा मंदिरगाह के पास सागर में बेट द्वारका पहुंचने के लिए ओखा से मोटरबोट या नाव से करीब दो किलोमीटर की समुद्री यात्र करनी होती है। सागर की नीली लहरों पर नाव से की जाने वाली यात्र काफी आनंददायक होती है। नाव के सहारे ऊपर समुद्री पक्षियों के समूह उड़ते रहते हैं तथा नीचे जल में मछलियों की झुंड तैरते रहते हैं।

बेट द्वारका में गलियों से होकर मुख्य मंदिर में पहुंचने का रास्ता है। यहां श्रीकृष्ण के साथ महारानी रूकमणि तथा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। इस प्राचीन मंदिर में यात्रियों को दर्शन की सुविधा देने के लिए अच्छी व्यवस्था की गई हैं। बेट द्वारका तथा द्वारकापुरी द्वारकाधीश के मंदिर के निकट बाजार में अनेक छोटी-बड़ी दुकानें सजी रहती हैं जिनमें पूजा के सामान के अलावा कई प्रकार की कलात्मक और सजावट की वस्तुएं बिकती रहती हैं।

द्वारकापुरी से ओखा जाने के रास्ते में सड़क पर ही रूक्मणि देवी का प्राचीन मंदिर स्थित है जिसकी बाहरी दीवारों पर विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियां खुदी हैं किंतु सागर तट से आने वाली लवणयुक्त तेज हवाएं इन मूर्तियों को क्षीण करने लगी हैं। यहां एक ओर दूर तक फैली सागरीय-भूमि पर मछुआरों की झोपडिय़ां हैं तो दूसरी ओर रासायनिक खाद्य और नमक बनाने का टाटा का विशाल कारखाना स्थित है।

कैसे पहुंचें, कहां ठहरें?

भारत के सुदूर पश्चिमी छोर पर स्थित दर्शनीय द्वारकाधाम पहुंचने के लिए अब सड़क और रेल लाइन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। द्वारका रेलवे स्टेशन वीरमगाम और ओखा ब्रांचलाइन पर स्थित है जो मुम्बई से एक हजार किमी. तथा दिल्ली से चौदह सौ किमी. दूरी पर स्थित है द्वारका के पास जामनगर में हवाई अड्डा भी है जहां से डेढ़ सौ किलोमीटर का मार्ग तय करके द्वारका पहुंचा जा सकता है। गुजरात के मुख्यनगर में अहमदाबाद से सड़क और रेल द्वारा भी द्वारिका पहुंचा जा सकता है। यह दूरी चार सौ पचास किलोमीटर है।

द्वारकाधाम में अनेक धर्मशालाएं होटल तथा अतिथिगृह हैं। पर्यटन विभाग की ओर से भी यात्रियों के ठहरने के लिये ‘तोरण’ निवास स्थान है। यहां रहकर दर्शनीय स्थानों की सैर के अलावा सागर स्नान का आनंद भी लिया जा सकता है।

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माया देवी मंदिर


माया देवी मंदिर”

Sanjay Gupta

यह मंदिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के हरिद्वार शहर मे स्थित है, जिसे एक शक्तिपीठ के रुप में माना जाता है, हालांकि यहां देवी सती के नाभि या नाड़ी के साथ ह्रदय गिरने की भी मान्यता है। माया देवी हरिद्वार शहर की अधिष्ठात्री देवी हैं। उत्तर भारत का यह प्रसिद्ध मंदिर ११वीं शताब्दी में बना है, जो माया देवी को समर्पित है। यहां देश के कोने-कोने से लोग मां माया देवी का पवित्र दर्शन करने के लिए आते हैं और मनचाही मुराद प्राप्त करते हैं। हिंदुओं में इस मंदिर के प्रति असीम श्रद्धा है। पुराणों के अनुसार देवी सती ने हरिद्वार शहर के कनखल नामक स्थान पर ही यज्ञ की वेदी में आत्मदाह किया था। माया देवी मंदिर के साथ ही विविध धार्मिक आयोजनों के लिए भी हरिद्वार शहर का एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो भारत के एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रुप में प्रसिद्ध है। माया देवी के शहर हरिद्वार से थोड़ी दूर उत्तर प्रदेश राज्य के सहारनपुर जनपद में स्थित मां शाकम्भरी देवी मंदिर को भी स्थानीय लोगों द्वारा एक शक्तिपीठ के रुप में पूजा जाता है, हालांकि यहां देवी सती के गिरे अंग या आभूषण के संबंध में कोई प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। देवी शाकम्भरी मंदिर उत्तर प्रदेश राज्य के सहारनपुर के उत्तर दिशा में लगभग ४० किमी. दूर जसमौर गांव में स्थित है। यहां २ मुख्य मंदिर विराजमान हैं, जिनमें से एक मां शाकम्भरी देवी को समर्पित मां शाकम्भरी देवी मंदिर तथा दूसरा इस मंदिर से लगभग १ किमी. दूर भूरा देव मंदिर है, जो भगवान भैरव को समर्पित है, जिन्हें मां शाकम्भरी देवी का रक्षक माना जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी शाकम्भरी ने महिषासुर राक्षस का संहार किया था। साथ ही देवी शाकम्भरी ने यहां लगभग १०० वर्षो तक हर माह के आखिरी दिन केवल एक बार शाकाहार भोजन करके तपस्या किया था। इस दौरान यहां प्रसिद्ध महात्माओं एवं ऋषि-मुनियों ने देवी शाकम्भरी को शाकाहार भोजन का चढ़ावा अर्पित कर इनकी अराधना की थी। इसलिए इस मंदिर का नाम शाकम्भरी देवी मंदिर के नाम से विख्यात है। यह मंदिर लगभग १३०० वर्षो पुराना माना जाता है। आश्विन एवं चैत्र नवरात्रि में यहां प्रसिद्ध शाकम्भरी मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। शाकम्भरी देवी मंदिर पहली बार आने वाले श्रद्धालु सबसे पहले भूरा देव मंदिर भाग लेते है। शाकम्भरी देवी मंदिर पहली बार आने वाले श्रद्धालु सबसे पहले भूरा देव मंदिर जाते हैं। इसके बाद मां शाकम्भरी देवी का पवित्र दर्शन कर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं।

कैसे पहुंचे-
देहरादून से लगभग ३५ किमी. दूर स्थित जॉली-ग्राण्ट हवाई-अड्डा यहां का निकटतम हवाई-अड्डा है, जो हरिद्वार से लगभग ३५ किमी. तथा ऋषिकेश से लगभग १७ किमी. दूर स्थित है, हालांकि हरिद्वार पहुंचने के लिए रेल या सड़कमार्ग अपनान अधिक सुविधाजनक है। हरिद्वार अपनी तरह का एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है, जो भारत के सभी महत्वपूर्ण नगरों से जुड़ा हुआ है। मुंबई, दिल्ली, वाराणसी और कोलकाता से बहुत सारी रोजाना आने-जाने वाली रेलगाड़ियां हरिद्वार स्टेशन हैं, जिनमें देहरादून जाने वाले रेलगाड़ियों का हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर भी ठहराव होता है। दिल्ली से लगभग २१२ किमी. दूर स्थित हरिद्वार उत्कृष्ट राजमार्ग और सड़क यातायात व्यवस्था से युक्त है, जो भारत के सभी प्रमुख शहरों से सड़कमार्ग द्वार भलीप्रकार जुड़ा है। राष्ट्रीय राजमार्ग- ५८ द्वारा आप दिल्ली से हिरद्वार बड़ी आसानी से पहुंच सकते हैं।

हरिद्वार एवं ऋषिकेश स्थित विभिन्न होटल, आश्राम, टूरिस्ट लॉज एवं धर्मशालाए इत्यादि। माता के दर्शन के लिए अनुकूल मौसम सितंबर से जून है।

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संजय गुप्ता

नमस्कार दोस्तों
एक धार्मिक स्थल की जानकारी

जानें इस सैकड़ो वर्ष पुराने मंदिर में भगवान करतें हैं बातें, वैज्ञानिक भी हैं हैरान

इसे आप चमत्कार नही कहेंगे तो क्या कहेंगें बिहार के बक्सर जिले में एक ऐसा मंदिर है। जहाँ मुर्तियां आपस में बातें करती हैं। इसकी पुष्टि वैज्ञानिक भी कर चुके हैं।

तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध बिहार के इकलौते राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी मंदिर में साधकों की हर मनोकामना पूरी होती है। देर रात तक साधक इस मंदिर में साधना में लीन रहते हैं।
मंदिर में प्रधान देवी राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी के अलावा बंगलामुखी माता, तारा माता के साथ दत्तात्रेय भैरव, बटुक भैरव, अन्नपूर्णा भैरव, काल भैरव व मातंगी भैरव की प्रतिमा स्थापित की गई है।
राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी मंदिर की सबसे अनोखी मान्यता यह है कि निस्तब्ध निशा में यहां स्थापित मूर्तियों से बोलने की आवाजें आती हैं। मध्य-रात्रि में जब लोग यहां से गुजरते हैं तो उन्हें आवाजें सुनाई पड़ती हैं।

वैज्ञानिकों की मानें, तो यह कोई वहम नहीं है। इस मंदिर के परिसर में कुछ शब्द गूंजते रहते हैं।
मंदिर में काली, त्रिपुर भैरवी, धुमावती, तारा, छिन्न मस्ता, षोडसी, मातंगड़ी, कमला, उग्र तारा, भुवनेश्वरी आदि दस महाविद्याओं की भी प्रतिमाएं हैं।
इस कारण तांत्रिकों की आस्था इस मंदिर के प्रति अटूट है। कहा जाता है कि यहां किसी के नहीं होने पर भी आवाजें सुनाई देती हैं।
यहां पर वैज्ञानिकों की एक टीम भी गई थी, जिन्होंने रिसर्च करने के बाद कहा कि यहां पर कोई आदमी नहीं है। इस कारण यहां पर शब्द भ्रमण करते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी मान लिया है कि हां पर कुछ न कुछ अजीब घटित होता है, जिससे कि यहां पर आवाज आती है।

जय माता दी