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शिवलिंग पहले अलग होता है, फिर स्वमेव जुड़ने भी लगता है यह शिवलिंग !!


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विजय कृष्ण पांडेय 

ॐ नमः शिवाय !

चमत्कारः (काठगढ़ महादेव)

शिवलिंग पहले अलग होता है,
फिर स्वमेव जुड़ने भी लगता है
यह शिवलिंग !!

326 ई पूर्व में जब मकदूनिया का राजा
सिकंदर विश्वविजेता बनकर अपने अंतिम
शिविर के दौरान व्यास नदी के कारण यहां
ठहरा था तो यहां स्थापित शिवलिंग की
दैवीय शक्ति के कारण उसका विजयी
अभियान अचानक रुक गया।

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा
जिले के इंदौरा उपमंडल में स्थित
काठगढ़ महादेव मंदिर लोगों की
आस्था का केंद्र है।

इस मंदिर के साथ कई
पौराणिक किंवदंतियां
जुड़ी हुई है।

लोगों के कथनानुसार मंदिर में
स्थापित शिवलिंग स्वयंभू प्रकट है।

इस शिव मंदिर में विशाल शिवलिंग दो
भागों में बंटा हुआ है,जिसे मां पार्वती
और भगवान शिव के रूपों में माना
जाता है।

खास बात यह है कि ग्रहों और नक्षत्रों
के अनुसार इनके दोनों भागों के बीच
का अंतर घटता-बढ़ता रहता है।

माता पार्वती और उनका प्रिय
सर्प भी स्वयं-भू प्रकट है।

ग्रीष्म ऋतु में यह अलग हो जाते हैं
और सर्दियों में आपस में जुड़ जाते हैं।

इसी रहस्य के कारण यह मंदिर लोगों
की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

काठगढ़ मंदिर के महत्व के
विषय में कर्इ कथाएं प्रचलित हैं।

शिव पुराण में भी है मंदिर की
व्याख्या —

कहा जाता है कि व्यास नदी के किनारे
स्थित इस मंदिर के बारे में शिव पुराण
में भी व्याख्या मिलती है।

जब श्री ब्रहमा और श्री विष्णु में आपसी बड़प्पन के कारण युद्ध हुआ था तो उन्हें शांत करने के लिए भोले नाथ ने अग्नि तुल्य स्तंभ का रूप धारण किया था।

युद्ध में दोनों(श्री ब्रहमा और श्री विष्णु)
ने एक-दूसरे को हीन सिद्ध करने के लिए
महेश्वर और पाशुपात अस्त्रा का प्रयोग
करने के लिए प्रयासरत थे।

इससे तीनों लोकों में नाश की
आशंका होने लगी और भगवान
शिव शंकर महाअग्नि तुल्य स्तंभ
के रूप में श्री ब्रहमा और श्री विष्णु
के बीच में प्रकट हो गए और युद्ध
शांत हो गया।

महाराज दशरथ ने की थी यहां पूजा–

काठगढ़ नामक यह स्थान महाराजा
दशरथ का भी पूजा स्थल रहा है।

ऐसा कहा जाता है कि त्रेता युग
में जब महाराज दशरथ का विवाह
हुआ था तब उनकी बारात पानी पीने
के लिए यहां रूकी थी और यहां एक
कुएं का निर्माण किया गया था।

जोकि आज भी यहां स्थापित हैं।

जब भी भरत व शत्रुघन अपने ननिहाल
कैकेय देश(वर्तमान कश्मीर)जाते थे तो
व्यास नदी के पवित्रा जल से स्नान करके
राजपुरोहित व मंत्रियों सहित यहां
स्थापित शिवलिंग की पूजा-अर्चना
कर आगे बढ़ते थे।

यहीं आकर रुका था सिकंदर का विजयी
अभियान एक किंवदंती में कहा गया है
कि लुटेरे सिकंदर ने भी अपना अभियान
यहीं आकर रोका था।

326 ई पूर्व में जब मकदूनिया का राजा
सिकंदर विश्वविजेता बनकर अपने अंतिम
शिविर के दौरान व्यास नदी के कारण यहां
ठहरा था तो यहां स्थापित शिवलिंग की
दैवीय शक्ति के कारण उसका विजयी
अभियान अचानक रुक गया।

भोले नाथ के इस अलौकिक स्वरूप
को देखते हुए सिकंदर ने यहां पूजा
अर्चना भी की थी।

यहां तक कि यूनानी सभ्यता की पहचान
छोड़ते हुए शिवलिंग के चारों ओर अष्ट
कोणिय चबूतरों का निर्माण करवाया था।

महाराजा रणजीत सिंह ने
बनवाया था मंदिर–

बताया जाता है कि इस मंदिर ने
महाराजा रणजीत सिंह के कार्य
काल में सर्वाधिक प्रसिद्धि प्राप्त
की थी।

क्योंकि इससे पहले यहां पर मंदिर
का निर्माण नहीं था और भगवान
भोले शंकर खुले आसमान के नीचे
बिना छत के रह रहे थे।

जब इस बात का पता महाराजा रणजीत
सिंह को चला तो उन्होंने यहां मंदिर का
निर्माण करवाया और शिवलिंग की इस
महिमा का गुणगान भी चारों ओर
करवाया।

समूचे भारतवर्ष से आते हैं श्रद्धालु
यहां सदाशिव महादेव के दर्शन के
लिए हिमाचल व पंजाब दोनों तरफ
से पहुंचा जा सकता है।

हिमचाल की तरफ से जाने के लिए
कांगड़ा से नूरपुर राजमार्ग पर जाना
पड़ता है।

इसके बाद इंदौरा जाना पड़ता है।

पठानकोट से इंदौरा कस्बे के प्रवेश
मार्ग से मात्रा 6 किलोमीटर की दूरी
पर स्थित इस मंदिर में बारह महीने
श्रद्धालु माथा टेकने के लिए आते
रहते हैं।

हर वर्ष महाशिवरात्रि के दिन से यहां
तीन दिवसीय मेले का आयोजन भी
किया जाता है।

शिव स्तुति –
यमुना प्रसाद चतुर्वेदी ‘प्रीतम’

जय जयति जगदाधार जगपति,
जय महेश नमामिते।
वाहन वृषभ वर सिद्धि दायक,
विश्वनाथ उमापते।

सिर गंग भव्य भुजंग भूसन
भस्म अंग सुसोभिते।
सुर जपति शिव,शशिधर कपाली,
भूत पति शरणागते।

जय जयति गौरीनाथ जय
काशीश जय कामेश्वरम।
कैलाशपति,जोगीश,जय
भोगीश, वपु गोपेश्वरम।

जय नील लोहित गरल-गर-
हर-हर विभो विश्वंभरम।
रस रास रति रमणीय रंजित
नवल नृत्यति नटवरम।

तत्तत्त ताता ता तताता थे
इ तत्ता ताण्डवम।
कर बजत डमरू डिमक-डिम-
डिम गूंज मृदु गुंजित भवम।

बम-बम बदत वेताल भूत
पिशाच भूधर भैरवम।
जय जयति खेचर यक्ष किन्नर
नित्य नव गुण गौरवम।

जय प्रणति जन पूरण मनोरथ
करत मन महि रंजने।
अघ मूरि हारी धूरि जटि तुम
त्रिपुर अरि-दल गंजने।

जय शूल पाणि पिनाक धर
कंदर्प दर्प विमोचने।
‘प्रीतम’ परसि पद होइ पावन
हरहु कष्ट त्रिलोचने।
#साभारसंकलित;;
=============

न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।

न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

न(मेरी)मृत्यु है,न इसकी कोई शंका
है,न मेरे लिए कोई जातिभेद है,न(मेरे)
कोई पिता है,न ही माता है,न(मेरा)
जन्म है।

न (मेरा) भाई है,न मित्र है न ही कोई
गुरु या शिष्य है,मैं कल्याणकारी,
चिदानंद रूप शिव हूँ।

समस्त चराचर प्राणियोँ एवं सकल
विश्व का कल्याण करो प्रभु !

ॐ नमः शिवाय !

कष्ट हरो,,काल हरो,,
दुःख हरो,,दारिद्रय हरो,,
हर,,हर,,महादेव,,
जयमहाकाल,
जय भवानी,
जय श्री राम,,

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रथ यात्रा के समय में पुरी के जगन्नाथ मंदिर का भी जिक्र होगा |


रथ यात्रा के समय में पुरी के जगन्नाथ मंदिर का भी जिक्र होगा | कई पुरानी किताबों में भी इस मंदिर का जिक्र है | R H Major द्वारा संकलित पुस्तक “Narratives of Voyages in India in Fifteenth Century”, नामक पुस्तक में भी पुरी के मंदिर का वर्णन है | इस किताब को आप मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं | किताब के मुताबिक उस समय तक मंदिर में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित नहीं था | यानि कोई अछूत टाइप चीज़ का जिक्र नहीं है ! इसके कारणों को देखेंगे तो आपको आर्थिक इतिहास देखना होगा |

सन 1750 तक भारत, आर्थिक रूप से , विश्व का (चीन के बाद) सबसे ताकतवर राष्ट्र था और पूरी दुनिया का 25 % GDP का उत्पादन करता था | इस दौर में अमेरिका और ब्रिटेन मिलकर मात्र 2% GDP का उत्पादन करते थे | ब्रिटिश नीतियों कि वजह 1900 आते आते भारत का हिस्सा घटकर मात्र 2% रह गया , और अमेरिका और ब्रिटेन का शेयर बढ़कर 41 % हो गया | मात्र डेढ़ सौ सालों में, भारत का per capita industrialization, 700% घट गया | जाहिर है इस से भीषण बेरोजगारी भी हुई होगी | इसी बेरोजगार और बेरोजगारी से तबाह दरिद्र जनसमुद्र को दल हित चिन्तक “दलित” बुलाते हैं |

अब अगर इतिहास लिखने के तरीके को देखिएगा तो नजर आएगा कि किताबों में जगह जगह कुछ नंबर सुपरस्क्रिप्ट में लिखे होते हैं | ये वो रिफरेन्स होते हैं जिन किताबों का सन्दर्भ इतिहासकार दे रहा होता है | जैसे मेरा ऊपर वाला पैराग्राफ Augus Madisson की किताब Contours of the World Economy I-2003 AD से लिया हुआ है | ऐसे सन्दर्भ देने में भारत का हर आर्थिक इतिहासकार डॉ. हैमिल्टन बूचनान का सन्दर्भ जरूर दे रहा होता है | उन्होंने सन 1807 मे पूरे भारत का लेखा जोखा लिया था | आश्चर्यजनक तथ्य है कि उन्होंने भी भारत में किन्हीं अछूतों का वर्णन नहीं किया है | क्यो ? क्या वो अंधे थे? कि अछूत थे ही नहीं ?

यदि यह हिन्दू धर्म की आदिकालीन परंपरा है , तो ये इन ऐतिहासिक दस्तावेजों से क्यों गायब है ?

पुराने ज़माने में शिक्षा पूरी करने का एक हिस्सा घूमना भी होता था । बिहार में कुछ समय पहले सरकारी विद्यालयों के छात्र-छात्रों को एक शैक्षणिक यात्रा पर ले जाने की भी शुरुआत हुई थी । उसके बाद से यहाँ पटना के चिड़ियाघर के बाहर कई बसें खड़ी दिखती हैं, स्कूल के बच्चों से भरी हुई । उसमें बच्चे कितना, क्या सीखते हैं ये विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन ना घूमने की वजह से भारतीय काफी कुछ नहीं सीखते ये तो पक्का है । चलिए ये देखने के लिए एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल चलते हैं । वजह ये है कि बुड्ढे होने पर आपकी प्रश्न करने की क्षमता, शौक सब कम हो जाते हैं तो जवानी में जहाँ आप देखकर सीखेंगे, वहीँ बुढ़ापे में आप सिर्फ अपनी स्थापित धारणाओं को पुष्ट कर रहे हों, इसकी संभावना बढ़ जाती है । तो हम जरा जल्दी चले गए । लेकिन इस साल क्यों सोच रहे हैं, तो 2015 में एक ख़ास बात है ।

दरअसल हिन्दुओं के कलैंडर यानि कि पञ्चांग में हर 14 से 19 साल में एक महीना जोड़ना पड़ता है । 2015 ऐसा ही एक साल है । इस साल पुरी के जग्गनाथ मंदिर में जो मूर्तियां रखी हैं उन्हें बदला जाता है । मंदिर प्रांगण में जिन मूर्तियों की पूजा होती है उन्हें लकड़ी से बनाया जाता है । मुख्यतः इसमें नीम की लकड़ी इस्तेमाल होती है । इन चारों मूर्तियों में भगवान जगन्नाथ की मूर्ती 5 फुट 7 इंच की होती है और उनके फैले हुए हाथ 12 फुट का घेरा बनाते हैं । इनका वजन इतना ज्यादा होता है कि पांच-पांच लोग इनके एक एक हाथ पर, बीस लोग उन्हें पीठ की तरफ से उठाते हैं और करीब पचास लोग उन्हें आगे से खींचते हैं । बलभद्र की मूर्ती इस से कहीं हल्की होती है । उनकी मूर्ती 5 फुट 5 इंच ऊँची होती है और उनके हाथ भी 12 फुट का घेरा बनाते हैं । सुभद्रा की मूर्ती 5 फुट से थोड़ी सी काम होती है, वो भी वजन में हलकी होती है । सुदर्शन की मूर्ती में कोई नक्काशी इत्यादि नहीं होती । लेकिन इसकी ऊंचाई 5 फुट 10 इंच होती है ।

समस्या है इसके लिए नीम का पेड़ ढूंढना । किसी भी पेड़ से मूर्ती नहीं बनाई जा सकती । भगवान जगन्नाथ सांवले हैं इसलिए उनकी मूर्ती जिस पेड़ से बनेगी उसे भी गहरे रंग का होना चाहिए । लेकिन उनके भाई और बहनों की मूर्तियों के लिए हलके रंग वाली लकड़ी ढूंढी जाती है । जिस पेड़ से भगवान जगन्नाथ की मूर्ती बनेगी, उस पेड़ में चार मुख्य डाल होनी चाहिए, जो भगवान के चार हाथों का प्रतीक हैं । पेड़ को किसी श्मशान के पास होना चाहिए । उसके पास कोई तालाब या जलाशय भी होना चाहिए । पेड़ या तो किसी तिराहे के पास हो, या वो तीन पहाड़ों से घिरा हुआ होना चाहिए । पेड़ पर कोई लताएँ चढ़ी हुई नहीं होनी चाहिए । उसके पास वरुण, सहदा और विल्व (बेल) के पेड़ भी होने चाहिए । इनके अलावा पेड़ के आस पास किसी साधु की कुटिया-आश्रम भी होनी चाहिए । कोई न कोई शिव मंदिर भी पास ही होना चाहिए । इस पेड़ पर किसी चिड़िया का घोंसला नहीं होना चाहिए । ख़ास बात ये भी है कि पेड़ की जड़ में किसी सांप की बांबी हो और पास ही कहीं चीटियों का घोंसला भी जरुरी है । अब सबसे जरूरी चीज़ ! पेड़ के तने पर प्राकृतिक रूप से बने हुए शंख और चक्र के निशान होने चाहिए । इतनी शर्तें पूरी करने वाले पेड़ के तने से ही भगवान जगन्नाथ की मूर्ती बन सकती है ।

आप अब कहेंगे कि इतनी शर्तों को पूरा करने वाला पेड़ मिलेगा कहाँ ? तो हर बार ऐसा पेड़ मिला है । पिछले सौ साल का रिकॉर्ड आप कभी भी देख सकते हैं, लम्बा रिकॉर्ड देखना हो तो दो चार दिन का समय लगेगा ।

ऐसे नियम कायदों के बारे में ना जानने वाले एक सज्जन थे भीमराव रामजी आंबेडकर जिन्होंने अपनी किसी किताब में लिखा कि मंदिर का पुजारी बनने के लिए कोई नियम कायदे नहीं हैं । अतः मंदिर के पुजारियों की नियुक्ति के नियम होने चाहिए । वो निस्संदेह पुरी के जगन्नाथ मंदिर नहीं गए होंगे । अगर गए होते तो उन्हें पता होता की इन नियमों के श्लोक जैसे लिखे होते हैं । उन्हें याद भी करना होता है, साथ ही दर्जनों बार उनका अभ्यास भी करना होता है । मतलब जिसे minimum requirement कहते हैं वो करीब 12-15 साल की प्रैक्टिस के बाद आएगी । खैर बेचारे जा के देखते तो मुझे या मेरे जैसे अन्य लोगों को उनपर सवाल करने का मौका भी नहीं मिलता ।

ओह याद आया, इस मंदिर में गैर हिन्दुओं को प्रवेश नहीं करने दिया जाता है । मगर जो विज्ञ जन ये जानते ही कहने वाले हैं कि इस मंदिर में दलितों को प्रवेश नहीं मिलता होगा इसलिए भीमराव रामजी आंबेडकर नहीं गए यहाँ, वो अपनी आपत्ति जरूर दर्ज़ कराएं ! आपके ऐसा बोलते ही इस मंदिर के पुजारियों की भी बात होगी !

✍🏻 आनंद कुमार

#सेकुलरिज्म का नँगे स्वरूप का दर्शन कीजिये।

1806 में #रेगुलेशन V में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लुटेरों ने पहले जगन्नाथ पुरी के तीर्थयात्रियों पर टैक्स लगाया।
टैक्स का रेंज था 10 रुपये से 2 रुपये तक।
उसी में हिन्दुओ के एक वर्ग का उन्होंने मंदिर में प्रवेश वर्जित किया।
ये काम ब्रिटिश दरोगा ने किया न कि मंदिर के पुजरियों ने।
इसी तथ्य को आधार बनाकर 1932 में सवा सौ साल बाद मंदिर में शूद्रों का प्रयोग वर्जित है , का ह्ल्ला अपने लार्ड एंड मास्टर के कहने पर मचाया, जिससे हिंदुत्व की तौहीन हो और भारत में जीसस का झंडा बुलंद हो।
1810 आते आते उन्होंने उन्होंने पूरी मंदिर को हिन्दुओ के द्वारा चढ़ाए हुए धन पर कब्जा कर लिया।

उसी लूट को बाद में परतंत्र भारत के हजारो मन्दिरो पर कब्जा किया गया।
स्वतंत्र भारत में भी वो लूट जारी है।

ये कैसा सेकुलरिज्म है जो सिर्फ हिन्दुओ के मन्दिरो के दान और मंदिर की संपत्ति पर कब्जा करता है ।
और उस पैसे को हज में सब्सिडी में खर्च किया जाता है या दक्षिण भारत में द्रविड़ रेस की झूंठ कहानी रचने  वाले पादरियों की मरीना बीच पर विशाल मूर्ति बनाने में खर्च होता है।

राम मंदिर से सरकार का क्या लेना देना।
लेना देना होता तो 1806 के रेगुलेशन iv के आधार पर बना हिन्दू टेम्पल एंडोमेंट एक्ट खत्म न करती मोदी सरकार।
1806 रेगुलेशन iv को अंग्रेजों ने जगन्नाथ पुरी के मंदिर की संपत्ति हड़पने के लिए बनाया था।

“1806 में अंग्रेजो ने लूट मार की अपनी नीति और नियत के तहत एक कानून बनाया जिसके तहत मंदिर के रख रखाव के बहाने पूरी आने वाले धर्मयात्रियो से टैक्स वसूलती थी।
और वहाँ पर दान होने वाली संपत्ति को कब्जिया लेती थी ।
वहीँ से मंदिरों में शूद्रों के न घुसने देने का ड्रामाई लेख अम्बेडकर जी ने 1932 के आसपास लिखा, जो आज भी एक आजमाया हुवा हथकन्डा है ,जिसको अभी कुछ दिन पूर्व कांगेस की एक दलित सांसद ने संसद में भी आजमाया कि फला मंदिर में उसकी जाति पूँछी गयी थी जो 100% झूँठ है ।
इसी रेगुलेशन को आधार बनाकर 1952 में हिन्दू टेम्पल एंडोमेंट एक्ट बनाया गया जिसके अनुसार मंदिरों में दान का पैसा सरकारी है जबकि ईसाईयों और मुसलमानों के लिए ऐसा कोई कानून नही हैं।”

✍🏻 डॉ त्रिभुवन सिंह

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दुनिया का एकलौता मंदिर, जहां राजा राम को दिन में 5 बार दिया जाता है गार्ड ऑफ ऑनर


दुनिया का एकलौता मंदिर, जहां राजा राम को दिन में 5 बार दिया जाता है गार्ड ऑफ ऑनर,, ओरछा,बुंदेलखंड की अयोध्या है ओरछा , यह विश्व का अकेला मंदिर है जहां राम की पूजा राजा के रूप में होती है…..

भारत के इतिहास में झांसी के पास स्थित ओरछा का एक अपना महत्व है। इससे जुड़ी तमाम कहानियां और किस्से पिछली कई दशकों से लोगों की जुबान पर हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि सबसे पहले लोगों ने बुंदेलखंड में रहना शुरू किया था। यही वजह है कि इस इलाके के हर गांव और शहर के पास सुनाने को कई कहानियां हैं। बुंदेलखंड की दो खूबसूरत और दिलचस्प जगहें हैं ओरछा और कुंढार। भले ही दोनों जगहों में कुछ किलोमीटर का फासला हो, लेकिन इतिहास के धागों से ये दोनों जगहें बेहद मजबूती से जुड़ी हुई हैं। ओरछा झांसी से लगभग आधे घंटे की दूरी पर स्थित है।

इसका इतिहास 8वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज ने इसकी स्थापना की थी। इस जगह की पहली और सबसे रोचक कहानी एक मंदिर की है। दरअसल, यह मंदिर भगवान राम की मूर्ति के लिए बनवाया गया था, लेकिन मूर्ति स्थापना के वक्त यह अपने स्थान से हिली नहीं।

इस मूर्ति को मधुकर शाह के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी गनेश कुवर अयोध्या से लाई थीं। चतुर्भुज मंदिर बनने से पहले इसे कुछ समय के लिए महल में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम रखा गया राम राजा मंदिर।

आज इस महल के चारों ओर शहर बसा है और राम नवमी पर यहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। वैसे, भगवान राम को यहां भगवान मानने के साथ यहां का राजा भी माना जाता है, क्योंकि उस मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है।

मंदिर के पास एक बगान है जिसमें स्थित काफी ऊंचे दो मीनार (वायू यंत्र) लोगों के आकर्षण का केन्द्र हैं। जि्न्हें सावन भादों कहा जाता है कि इनके नीचे बनी सुरंगों को शाही परिवार अपने आने-जाने के रास्ते के तौर पर इस्तेमाल करता था। इन स्तंभों के बारे में एक किंवदंती प्रचलित है कि वर्षा ऋतु में हिंदु कलेंडर के अनुसार सावन के महीने के खत्म होने और भादों मास के शुभारंभ के समय ये दोनों स्तंभ आपस में जुड़ जाते थे। हालांकि इसके बारे में पुख्ता सबूत नहीं हैं। इन मीनारों के नीचे जाने के रास्ते बंद कर दिये गये हैं एवं अनुसंधान का कोई रास्ता नहीं है।

इन मंदिरों को दशकों पुराने पुल से पार कर शहर के बाहरी इलाके में ‘रॉयल एंक्लेव’ (राजनिवास्) है। यहां चार महल, जहांगीर महल, राज महल, शीश महल और इनसे कुछ दूरी पर बना राय परवीन महल हैं। इनमें से जहांगीर महल के किस्से सबसे ज्यादा मशहूर हैं, जो मुगल बुंदेला दोस्ती का प्रतीक है। कहा जाता है कि बादशाह अकबर ने अबुल फज़ल को शहजादे सलीम (जहांगीर) को काबू करने के लिए भेजा था, लेकिन सलीम ने बीर सिंह की मदद से उसका कत्ल करवा दिया। इससे खुश होकर सलीम ने ओरछा की कमान बीर सिंह को सौंप दी थी। वैसे, ये महल बुंदेलाओं की वास्तुशिल्प के प्रमाण हैं। खुले गलियारे, पत्थरों वाली जाली का काम, जानवरों की मूर्तियां, बेलबूटे जैसी तमाम बुंदेला वास्तुशिल्प की विशेषताएं यहां साफ देखी जा सकती हैं।

अब बेहद शांत दिखने वाले ये महल अपने जमाने में ऐसे नहीं थे। यहां रोजाना होने वाली नई हलचल से उपजी कहानियां आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इन्हीं में से एक है हरदौल की कहानी, जो जुझार सिंह (1627-34) के राज्य काल की है। दरअसल, मुगल जासूसों की साजिशभरी कथाओं के कारण् इस राजा का शक हो गया था कि उसकी रानी से उसके भाई हरदौल के साथ संबंध हैं। लिहाजा उसने रानी से हरदौल को ज़हर देने को कहा। रानी के ऐसा न कर पाने पर खुद को निर्दोष साबित करने के लिए हरदौल ने खुद ही जहर पी लिया और त्याग की नई मिसाल कायम की।

बुंदेलाओं का राजकाल 1783 में खत्म होने के साथ ही ओरछा भी गुमनामी के घने जंगलों में खो गया और फिर यह स्वतंत्रता संग्राम के समय सुर्खियों में आया। दरअसल, स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद यहां के एक गांव में आकर छिपे थे। आज उनके ठहरने की जगह पर एक स्मृति चिन्ह भी बना है।

जहांगीर महल ,,,बुन्देलों और मुगल शासक जहांगीर की दोस्ती की यह निशानी ओरछा का मुख्य आकर्षण है। महल के प्रवेश द्वार पर दो झुके हुए हाथी बने हुए हैं। तीन मंजिला यह महल जहांगीर के स्वागत में राजा बीरसिंह देव ने बनवाया था। वास्तुकारी से दृष्टि से यह अपने जमाने का उत्कृष्ट उदाहरण है।

राज महल ,,,यह महल ओरछा के सबसे प्राचीन स्मारकों में एक है। इसका निर्माण मधुकर शाह ने 17 वीं शताब्दी में करवाया था। राजा बीरसिंह देव उन्हीं के उत्तराधिकारी थे। यह महल छतरियों और बेहतरीन आंतरिक भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। महल में धर्म ग्रन्थों से जुड़ी तस्वीरें भी देखी जा सकती हैं।

रामराजा मंदिर ,,,यह मंदिर ओरछा का सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण मंदिर है। यह भारत का एकमात्र मंदिर है जहां भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि राजा मधुकर को भगवान राम ने स्वप्न में दर्शन दिए और अपना एक मंदिर बनवाने को कहा।

राय प्रवीण महल,,,यह महल राजा इन्द्रमणि की खूबसूरत गणिका प्रवीणराय की याद में बनवाया गया था। वह एक कवयित्री और संगीतकारा थीं। मुगल सम्राट अकबर को जब उनकी सुंदरता के बार पता चला तो उन्हें दिल्ली लाने का आदेश दिया गया। इन्द्रमणि के प्रति प्रवीन के सच्चे प्रेम को देखकर अकबर ने उन्हें वापस ओरछा भेज दिया। यह दो मंजिला महल प्राकृतिक बगीचों और पेड़-पौधों से घिरा है। राय प्रवीन महल में एक लघु हाल और चेम्बर है।

लक्ष्मीनारायण मंदिर ,,,यह मंदिर 1622 ई. में बीरसिंह देव द्वारा बनवाया गया था। मंदिर ओरछा गांव के पश्चिम में एक पहाड़ी पर बना है। मंदिर में सत्रहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के चित्र बने हुए हैं। चित्रों के चटकीले रंग इतने जीवंत लगते हैं जसे वह हाल ही में बने हों। मंदिर में झांसी की लड़ाई के दृश्य और भगवान कृष्ण की आकृतियां बनी हुई हैं।

चतुर्भुज मंदिर,राज महल के समीप स्थित चतुभरुज मंदिर ओरछा का मुख्य आकर्षण है। यह मंदिर चार भुजाधारी भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण 1558 से 1573 के बीच राजा मधुकर ने करवाया था। अपने समय की यह उत्कृष्ठ रचना यूरोपीय कैथोड्रल से समान है। मंदिर में प्रार्थना के लिए विस्तृत हॉल है जहां कृष्ण भक्त एकत्रित होते हैं।

फूलबाग ,,,बुन्देल राजाओं द्वारा बनवाया गया यह फूलों का बगीचा चारों ओर से दीवारों से घिरा है। पालकी महल के निकट स्थित यह बाग बुन्देल राजाओं का आरामगाह था। वर्तमान में यह पिकनिक स्थल के रूप में जाना जाता है। फूलबाग में एक भूमिगत महल और आठ स्तम्भों वाला मंडप है। यहां के चंदन कटोर से गिरता पानी झरने के समान प्रतीत होता है।

सुन्दर महल ,,,इस महल को राजा जुझार सिंह के पुत्र धुरभजन के बनवाया था। राजकुमार धुरभजन को एक मुस्लिम लड़की से प्रेम था। उन्होंने उससे विवाह कर इस्लाम धर्म अंगीकार कर लिया। धीर-धीर उन्होंने शाही जीवन त्याग दिया और स्वयं को ध्यान और भक्ति में लीन कर लिया। विवाह के बाद उन्होंने सुन्दर महल त्याग दिया। धुरभजन की मृत्यु के बाद उन्हें संत से रूप में जाना गया। वर्तमान में यह महल काफी क्षतिग्रस्त हो चुका है।

आवागमन ,,,ओरछा झांसी से तकरीबन 18 किलोमीटर दूर है और दिल्ली से यहां भोपाल शताब्दी-एक्सप्रेस के जरिए आसानी से पहुंचा जा सकता है।

वायु मार्ग ,,,ओरछा का नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो है जो 163 किलोमीटर की दूरी पर है। यह एयरपोर्ट दिल्ली, वाराणसी और आगरा से नियमित फ्लाइटों से जुड़ा है।

रेल मार्ग झांसी ओरछा का नजदीकी रेल मुख्यालय है। दिल्ली, आगरा, भोपाल, मुम्बई, ग्वालियर आदि प्रमुख शहरों से झांसी के लिए अनेक रेलगाड़ियां हैं। वैसे ओरछा तक भी रेलवे लाइन है जहां पैसेन्जर ट्रैन से पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग ,,,खजुराहो मार्ग पर स्थित है। नियमित बस सेवाएं ओरछा और झांसी को जोड़ती हैं। दिल्ली, आगरा, भोपाल, ग्वालियर और वाराणसी से यहां से लिए नियमित बसें चलती हैं।

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सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर


सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर

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संसार में सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर माना जाता है साथ ही भारत में सबसे प्राचीन पूर्ण जीवंत हिन्दू मंदिर भी इसी मंदिर को मानते हैं.
आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने माना है कि इतिहास के मद्देनजर यह भारत देश का सबसे पुराना मंदिर है.

भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित इस मंदिर के पुरुत्थान के लिए योजनायें बन रही है.यूनेस्को की लिस्ट में भी शामिल करवाने के प्रयास जारी हैं.इस मंदिर के बारे में मैं यहाँ संक्षेप में जानकारी दे रही हूँ.

मुंडेश्वरी देवी का यह मंदिर बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है.
कैमूर जिले का नाम सुन कर आप को भी याद आ गया होगा जी हाँ ,यह वही कैमूर जिला है जहाँ हरशुब्रह्म धाम में हर साल चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रारंभ होते ही नवरात्र के अवसर पर कथित तौर पर भूतों की अदालत लगती है और कुछ लोग कथित भूतों, डायनों और चुडैलों से मुक्ति दिलाते हैं.अब इस में क्या सच्चाई है हम नहीं जानते
चलिए आप को इस देवी मंदिर के बारेमें बताते हैं .
स्थापना कब और किस ने करवाई -पुरातत्व विभाग को यहाँ ब्राह्मी लिपि में लिखित जो शिलालेख और श्रीलंका के महाराजा दुतगामनी की राजकीय मुद्रा मिली थीं. जिन पर किये ताज़ा पुरातात्विक शोधों के आधार पर इसे कुषाण युग में हुविश्क के शासनकाल में सन्‌ 108 ईस्वी में उत्कीर्ण माना जा रहा है.किस ने बनवाया यह ज्ञात नहीं है.
इस मंदिर के आस पास अवशेषों में कई अन्य भगवानो की मूर्तियाँ आदि भी मिली हैं.मुख्यत देवी मुंडेश्वरी की पूजा होती है.यहाँ शिव और पार्वती की पूजा होते रहने के भी प्रमाण मिले हैं.
कुछ और रोचक तथ्य –

१-यहाँ एक चतुर्मुखी शिवलिंग है ,कहते हैं इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम में अलग अलग दिखता है.

२-यहाँ बकरे की बलि नहीं दी जाती बल्कि बकरे को देवी के सामने लाया जाता है.उसपर मन्त्र वाले चावल पुजारी छिडकता है जिस से वह बेहोश हो जाता है और फिर उसे बाहर छोड़ दिया जाता है.

३-सालों बाद यहां तांडुलम भोग [चावल का भोग] और वितरण की परंपरा पुन: शुरू हो गई है.माना जाता है कि 108 ईस्वी में यहां यह परंपरा जारी थी.

४- यहां का अष्टाकार गर्भगृह तब से अब तक कायम है.

५- जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का रूट मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ा था.

६ -वैष्णो देवी की तर्ज पर इस मंदिर का विकास किये जाने की योजनायें राज्य सरकार ने बनाई हैं.

७-इस मंदिर का संरक्षक एक मुस्लिम है.

मुंडेश्वरी मंदिर की प्राचीनता का महत्व इस दृष्टि से और अधिक है कि यहां पर पूजा की परंपरा १९०० सालों से अविच्छिन्न रही है और आज भी यह मंदिर पूरी तरह जीवंत है

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कामेश्वर धाम कारो – बलिया – यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म


कामेश्वर धाम कारो – बलिया – यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में है कामेश्वर धाम। इस धाम के बारे में मान्यता है कि यह, शिव पुराण मे वर्णित वही जगह है जहा भगवान शिव ने देवताओं के सेनापति कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। यहाँ पर आज भी वह आधा जला हुआ, हरा भरा आम का वृक्ष (पेड़) है जिसके पीछे छिपकर कामदेव ने समाधी मे लीन भोले नाथ को समाधि से जगाने के लिए पुष्प बाण चलाया था।

कामेश्वर धाम कारो
आखिर क्यों महादेव शिव ने कामदेव को भस्म किया ? :
भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने कि कथा (कहानी) शिव पुराण मे इस प्रकार है। भगवान शिव कि पत्नी सती अपने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ मे अपने पति भोलेनाथ का अपमान सहन नही कर पाती है और यज्ञ वेदी मे कूदकर आत्मदाह कर लेती है। जब यह बात शिवजी को पता चलती है तो वो अपने तांडव से पूरी सृष्टि मे हाहाकार मचा देते है। इससे व्याकुल सारे देवता भगवान शंकर को समझाने पहुंचते है। महादेव उनके समझाने से शान्त होकर, परम शान्ति के लिए, गंगा तमसा के इस पवित्र संगम पर आकर समाधि मे लिन हो जाते है।

कामेश्वर धाम कारो
इसी बीच महाबली राक्षस तारकासुर अपने तप से ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके ऐसा वरदान प्राप्त कर लेता है जिससे की उसकी मृत्यु केवल शिव पुत्र द्वारा ही हो सकती थी। यह एक तरह से अमरता का वरदान था क्योकि सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव समाधि मे लीन हो चुके थे।
इसी कारण तारकासुर का उत्पात दिनो दिन बढ़ता जाता है और वो स्वर्ग पर अधिकार करने कि चेष्टा करने लगता है। यह बात जब देवताओं को पता चलती है तो वो सब चिंतित हो जाते है और भगवान शिव को समाधि से जगाने का निश्चय करते है। इसके लिए वो कामदेव को सेनापति बनाकर यह काम कामदेव को सोपते है। कामदेव, महादेव के समाधि स्थल पहुंचकर अनेकों प्रयत्नो के द्वारा महादेव को जगाने का प्रयास करते है, जिसमे अप्सराओ के नृत्य इत्यादि शामिल होते है, पर सब प्रयास बेकार जाते है।
अंत में कामदेव स्वयं भोले नाथ को जगाने लिए खुद को आम के पेड़ के पत्तो के पीछे छुपाकर शिवजी पर पुष्प बाण चलाते है। पुष्प बाण सीधे भगवान शिव के हृदय मे लगता है, और उनकी समाधि टूट जाति है। अपनी समाधि टूट जाने से भगवान शिव बहुत क्रोधित होते है और आम के पेड़ के पत्तो के पिछे खडे कामदेव को अपने त्रिनेत्र से जला कर भस्म कर देते है।

आम का पेड़ , कामेश्वर धाम कारो
कई संतो कि तपोभूमि रहा है कामेश्वर धाम :
त्रेतायुग में इस स्थान पर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम लक्ष्मण आये थे जिसका उल्लेख बाल्मीकीय रामायण में भी है। अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं पर हुर्इ थी। यहां पर दुर्वासा ऋषि ने भी तप किया था।
बताते हैं कि इस स्थान का नाम पूर्व में कामकारू कामशिला था। यही कामकारू पहले अपभ्रंश में काम शब्द खोकर कारूं फिर कारून और अब कारों के नाम से जाना जाता है।

रानी पोखरा – कामेश्वर धाम कारो Image Credit
कामेश्वर धाम कारो मे तीन प्राचीन शिवलिंग व शिवालय स्थापीत है।

श्री कामेश्वर नाथ शिवालय :
यह शिवालय रानी पोखरा के पूर्व तट पर विशाल आम के वृक्ष (पेड़) के नीचे स्थित है। इसमें स्थापित शिवलिंग खुदाई में मिला था जो कि ऊपर से थोड़ा सा खंडित है।

सूर्य प्रतिमा कामेश्वर धाम कारो
श्री कवलेश्वर नाथ शिवालय :
इस शिवालय कि स्थापना अयोध्या के राजा कमलेश्वर ने कि थी। कहते है की यहां आकर उनका कुष्ट का रोग सही हो गया था इस शिवालय के पास मे हि उन्होने विशाल तालाब बनवाया जिसे रानी पोखरा कहते है।

नंदी कामेश्वर धाम कारो
श्री बालेश्वर नाथ शिवालय :
बालेश्वर नाथ शिवलिंग के बारे मे कहा जाता है कि यह एक चमत्कारिक शिवलिंग है। किवदंती है की जब 1728 में अवध के नवाब मुहम्मद शाह ने कामेश्वर धाम पर हमला किया था तब बालेश्वर नाथ शिवलिंग से निकले काले भौरो ने जवाबी हमला कर उन्हे भागने पर मजबूर कर दिया था।

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कामेश्वर धाम, कारो, बलिया

कामदहन भूमि कामाश्रम

यह तीर्थ स्थान बलिया वाराणसी रेलमार्ग पर चितबड़ागांव एवं ताजपुर डेहमा रेलवे स्टेशनों के बीच में सिथत है। मान्यता है कि कामेश्वर धाम वह स्थान है, जहां भगवान शिव ने देव सेनापति कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। यहां आज भी वह प्राचीन आम का वृृक्ष जला हुआ हरा-भरा खड़ा है। जिसके पत्तों में छिपकर कामदेव जी ने समाधिस्थ शिव पर वाण चलाया था।

त्रेतायुग में इस स्थान पर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम लक्ष्मण भी आये थे जिसका उल्लेख बाल्मीकीय रामायण में भी है। अघोर पंथ के प्रतिष्ठापक श्री कीनाराम बाबा की प्रथम दीक्षा यहीं पर हुर्इ थी। यहां दुर्वासा ऋषि ने भी तप किया था। यहां पहुंच कर स्वत: ही इसकी दिव्यता महसूस हो जाती है । मान्यता है कि इस तीर्थ पर त्रयोदशी युक्त शनिवार को दर्शन करने वालों की सारी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं

शिवपुराण के अनुसार महाबली तारकासुर ने तप करके ब्रह्राा जी से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया जिसके तहत उसकी मृत्यु केवल शिवपुत्र के हाथों हो सकती थी। यह लगभग अमरता का वरदान था क्यों कि उस समय भगवान शिव की भार्या सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पतिदेव भगवान भोलेनाथ के अपमान से रूष्ट होकर यज्ञ भूमि में आत्मदाह कर चुकी थीं । इस घटना से क्रोधित भगवान शिव तांडव नृत्य कर देवगणों के प्रयास से शान्त होकर परम शानित के निमित्त विमुकित भूमि गंगा तमसा के पवित्र संगम पर आकर समाधिस्थ हो चुके थे।

तारकासुर के दिनों – दिन बढ़ते उत्पात के चलते देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने का निर्णय किया। इसके निमित्त भगवान कामदेव को सेनापति बनाया गया। कामदेव ने महादेव के समाधि स्थान पर पहुंच कर विभिन्न प्रकार के आयोजन किये जिसमें कि मनमोहनी अप्सराओं का नृत्य इत्यादि शामिल था लेकिन सारे प्रयास असफल रहे।

महादेव की समाधि पर कोर्इ प्रभाव नहीं पड़ा। विफल होने पर कामदेव ने आम के पेड़ के पत्तों में खुद को छुपाकर महादेव भगवान शिव पर पुष्प धनुष से प्रहार किया। शिव के हृदय में पुष्प मोहिनी बाण लगते ही उनकी समाधि भंग हो गयी।

इस प्रकार संक्रोधित भगवान शिव ने कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। इस दिव्य घटना का साक्षी यह पवित्र धाम सभी के लिए पूजनीय है । बताते हैं कि इस स्थान का नाम पूर्व में कामकारू कामशिला था। यही कामकारू पहले अपभ्रंश में काम शब्द खोकर कारूं फिर कारून और अब कारों के नाम से जाना जाता है।

कारों के दक्षिण गंगिया के छाडन मोहन आदि स्थल एवं उत्तर में प्रवाहित तमसा छोटी सरयू और दक्षिण में प्रवाहित गंगा नदी की भू परिसिथतियां इंगित करती हैं कि काफी समय तक कारों में ही इन नदियों का संगम स्थल रहा है । बाल्मीकीय रामयण के बाल खण्ड में भी कामदहन भूमि की प्रमाणिकता मिलती है।

कामेश्वर धाम पहुंचने का मार्ग

बलिया जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दक्षिण पशिचम दिशा में बलिया वाराणसी मार्ग पर सिथत है । बलिया से आटो रिक्शा चलते हैं, जो बहेरी पुल बलिया से चितबड़ागांव होकर जाते हैं।

सड़क मार्ग से फेफना चितबड़ागांव होकर धर्मापुर पहुंचने पर कामेश्वर धाम के दिव्य स्वागत द्वार के दर्शन हो जाते हैं रेल मार्ग से यहां आने हेतु ताजपुर स्टेशन उतरना होगा। यहां से कामेश्वर धाम 3 किलोमीटर दक्षिण पूर्व दिशा में सिथत है। चितबड़ागांव रेलवे स्टेशन उतरना भी उपयुक्त होगा। यहां से कामेश्वर धाम जाने के लिए आटो रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं।

कामेश्वर धाम दर्शन

श्री कामेष्वरनाथ षिवालय एवं प्राचीन आम वृक्ष

कामाश्रम का यह प्रसिद्ध शिवलिंग रानी पोखरा के पूर्व तट पर पांच फीट गडडे में विशाल आम वृक्ष की जड़ में अवसिथत है। यह शिवलिंग खुदार्इ में मिला था। यह उपर से खंडित है । इस शिवलिंग एक पवित्र आम के पेड़ के विषय में कारों के बुजुर्ग नागरिकों का कहना हे कि बचपन में भी हमने इस आम के पेड़ एवं शिव लिंग को ज्यों का त्यों देखा है । काफी हद तक जला किन्तु हरा भरा यह आम वृक्ष एक दिव्य स्थान है काबिले गौर हे कि इस प्राचीन आम वृक्ष पर अब भी आम लगते हैं ।

श्री कामेश्वर धाम झील एवं कवलेश्वर ताल

मंदिर क्षेत्र के प्रवेश द्वार के पास ही इस सुरम्य झील के दर्शन होते हैं । गंगा तमसा सरयू द्वारा खराद कर बनी यह झील प्रकृति के मनोहर दृश्यों से सजिजत है । लाल कमल फूलों के लिए झील काफी प्रसिद्ध है ।

श्री कवलेश्वर नाथ शिवालय

प्राचीन शिवलिंग के ठीक सामने सिथत इस देवालय की स्थापना अध्योध्या के राजा कवलेश्वर ने कराया था। बताते हैं कि यहां आकर उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया था। उन्होंने शिवालय के पास ही विशाल तालाब बनवाया जिसे रानी पोखरा कहा जाता है।

जिसका वर्तमान में सुन्दर तरिके से जीर्णोद्धार 2001 र्इ. से शुरु कराया गया। जो आज भी जारी है।

श्री बालेश्वर नाथ शिवालय

कामेश्वर धाम कारों में सिथत बालेश्वर नाथ शिवलिंग एक चमत्कारी देवालय है। इस मनिदर के सभी प्रतिमायें लाल पत्थर की बनी हैं।

बताते हैं कि सन 1728 में मुहम्मदशाह नामक एक शासक अवध का नबाब बना। उसने एक बार कामेश्वर धाम पर हमला बोल दिया तब श्री बालेश्वर महादेव शिवलिंग से लोगों की संख्या में निकले काले भौंरो ने नबाब की सेना पर हमला बोल दिया। सेना को मुंह छुपा कर भागना पड़ा

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भगवान शिव की साधना स्थली कारो कामेश्वर धाम,पुराणों में वर्णित यह वही स्थान है जहां भगवान भोले नाथ ने कामदेव को भष्म किया था ………………..और भी बहुत कुछ है धर्म की इस महा गाथा में , ज़रूर पढ़ें !!

भगवान शिव की साधना स्थली कारो कामेश्वर धाम,पुराणों में वर्णित यह वही स्थान है जहां भगवान भोले नाथ ने कामदेव को भष्म किया था।पुराणों में, वेदों में और शास्त्रों में भगवान शिव-महाकाल के महात्म्य को प्रतिपादित किया गया है। भगवान शिव हिन्दू संस्कृति के प्रणेता आदिदेव महादेव हैं। हमारी सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार 33 करोड़ देवताओं में ‘शिरोमणि’ देव शिव ही हैं। सृष्टि के तीनों लोकों में भगवान शिव एक अलग, अलौकिक शक्ति वाले देव हैं।
भगवान शिव पृथ्वी पर अपने निराकार-साकार रूप में निवास कर रहे हैं। भगवान शिव सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान हैं। महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिवशंकर के प्रदोष तांडव नृत्य का महापर्व है। शिव प्रलय के पालनहार हैं और प्रलय के गर्भ में ही प्राणी का अंतिम कल्याण सन्निहित है। शिव शब्द का अर्थ है ‘कल्याण’ और ‘रा’ दानार्थक धातु से रात्रि शब्द बना है, तात्पर्य यह कि जो सुख प्रदान करती है, वह रात्रि है।
शिवस्य प्रिया रात्रियस्मिन व्रते अंगत्वेन विहिता तदव्रतं शिवरात्र्‌याख्याम्‌।’
इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है, वह रात्रि जो आनंद प्रदायिनी है और जिसका शिव के साथ विशेष संबंध है। शिवरात्रि, जो फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को है, उसमें शिव पूजा, उपवास और रात्रि जागरण का प्रावधान है। इस महारात्रि को शिव की पूजा करना सचमुच एक महाव्रत है।
ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के व्रत पर भगवान शिव की भक्ति, दर्शन, पूजा, उपवास एवं व्रत नहीं रखता, वह सांसारिक माया, मोह एवं आवागमन के बँधन से हजारों वर्षों तक उलझा रहता है। यह भी कहा गया है कि जो शिवरात्रि पर जागरण करता है, उपवास रखता है और कहीं भी किसी भी शिवजी के मंदिर में जाकर भगवान शिवलिंग के दर्शन करता है, वह जन्म-मरण पुनर्जन्म के बँधन से मुक्ति पा जाता है। शिवरात्रि के व्रत के बारे में पुराणों में कहा गया है कि इसका फल कभी किसी हालत में भी निरर्थक नहीं जाता है।
शिवरात्रि व्रत धर्म का उत्तम साधन :
शिवरात्रि का व्रत सबसे अधिक बलवान है। भोग और मोक्ष का फलदाता शिवरात्रि का व्रत है। इस व्रत को छोड़कर दूसरा मनुष्यों के लिए हितकारक व्रत नहीं है। यह व्रत सबके लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सांसारिक सभी मनुष्य, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, पुरुषों, बालक-बालिकाओं तथा देवता आदि सभी देहधारियों के लिए शिवरात्रि का यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक है।
शिवरात्रि के दिन प्रातः उठकर स्नानादि कर शिव मंदिर जाकर शिवलिंग का विधिवत पूजन कर नमन करें। रात्रि जागरण महाशिवरात्रि व्रत में विशेष फलदायी है।
गीता में इसे स्पष्ट किया गया है-
या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।
यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्चतो सुनेः
तात्पर्य यह कि विषयासक्त सांसारिक लोगों की जो रात्रि है, उसमें संयमी लोग ही जागृत अवस्था में रहते हैं और जहाँ शिवपूजा का अर्थ पुष्प, चंदन एवं बिल्वपत्र, धतूरा, भाँग आदि अर्पित कर भगवान शिव का जप व ध्यान करना और चित्त वृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा शिव के साथ एकाकार होना ही वास्तविक पूजा है। शिवरात्रि में चार प्रहरों में चार बार अलग-अलग विधि से पूजा का प्रावधान है।
महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में भगवान शिव की ईशान मूर्ति को दुग्ध द्वारा स्नान कराएँ, दूसरे प्रहर में उनकी अघोर मूर्ति को दही से स्नान करवाएँ और तीसरे प्रहर में घी से स्नान कराएँ व चौथे प्रहर में उनकी सद्योजात मूर्ति को मधु द्वारा स्नान करवाएँ। इससे भगवान आशुतोष अतिप्रसन्न होते हैं। प्रातःकाल विसर्जन और व्रत की महिमा का श्रवण कर अमावस्या को निम्न प्रार्थना कर पारण करें –
संसार क्लेश दग्धस्य व्रतेनानेन शंकर।
प्रसीद समुखोनाथ, ज्ञान दृष्टि प्रदोभव
तात्पर्य यह कि भगवान शंकर! मैं हर रोज संसार की यातना से, दुःखों से दग्ध हो रहा हूँ। इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न हों और प्रभु संतुष्ट होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।
ॐ नमः शिवाय’ कहिए और देवाधिदेव प्रसन्न होकर सब मनोरथ पूर्ण करेंगे। शिवरात्रि के दिन शिव को ताम्रफमल (बादाम), कमल पुष्प, अफीम बीज और धतूरे का पुष्प चढ़ाना चाहिए एवं अभिषेक कर बिल्व पत्र चढ़ाना चाहिए।जनगण के देवाधिदेव शिव ने यहीं भस्म किया था कामदेव को॥ जन गण मन के आराध्य भगवान शिव एवं शिवरात्रि सहज उपलब्धता और समाज के आखरी छोर पर खडे ब्यक्ति के लिए भी सिर्फ कल्याण की कामना यही शिव है, किरात भील जैसे आदिवासी एवं जनजाति से लेकर कुलीन एवम अभिजात्य वर्ग तक अनपढ़ गंवार से लेकर ज्ञानी अज्ञानी तक सांसारिक मोहमाया में फंसे लोगो से लेकर तपस्वियों, योगियों, निर्धन, फक्कडों, साधन सम्पन्न सभी तबके के आराध्य देव है भगवान शिव, भारत वर्ष में अन्य देवी देवताओं के मन्दिरों की तुलना में शिव मन्दिर सर्वाधिक है।
हर गली मुहल्ले गांव देहात घाट अखाडे बगीचे पर्वत नदी जलाशय के किनारे यहां तक की बियाबान जंगलों मे भी शिवलिंग के दर्शन हो जाते है। यह इस बात का साक्ष्य है कि हमारे श्रृजनता का भगवान शिव में अगाध प्रेम भरा है। वस्तुत: इनका आशुतोष होना अवघडदानी होना केवल वेलपत्र या जल चढानें मात्र से ही प्रशन्न होना आदि कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो इनको जन गण मन का देव अर्थात् महादेव बनाती है। हिन्दू धर्म में भगवान शिव को मृत्युलोक का देवता माना गया है। शिव को अनादि अनन्त अजन्मां माना गया है। यानि उनका न आरम्भ है न अन्त ।न उनका जन्म हुआ है न वे मृत्यु को प्राप्त होते है। इस तरह से भगवान शिव अवतार न होकर साक्षात ईश्वर है। शिव की साकार यानि मुर्ति रूप एवम निराकार यानि अमूर्त रूप में आराधना की जाती है। शास्त्रों में भगवान शिव का चरित्र कल्याण कारी माना गया है।
धार्मिक आस्था से इन शिव नामों का ध्यान मात्र ही शुभ फल देता है। शिव के इन सभी रूप और नामों का स्मरण मात्र ही हर भक्त के सभी दु:ख और कष्टों को दूर कर उसकी हर इच्छा और सुख की पूर्ति करने वाला माना गया है।इसी का एक रूप गाजीपुर जनपद के आखिरी छोर पर स्थित कामेश्वर नाथ धाम कारो (जनपद बलिया) का है।रामायण काल से पूर्व में इस स्थान पर गंगा सरजू का संगम था और इसी स्थान पर भगवान शिव समाधिस्थ हो तपस्यारत थे। उस समय तारकासुर नामक दैत्य राज के आतंक से पूरा ब्रम्हांड व्यथित था। उसके आतंक से मुक्ति का बस एक ही उपाय था कि किसी तरह से समाधिस्थ शिव में काम भावना का संचार हो और शिव पुत्र कार्तिकेय का जन्म हो जिनके हाथो तारकासुर का बध होना निश्चित था। देवताओं के आग्रह पर देव सेनापति कामदेव समाधिस्थ शिव की साधना भूमिं कारो की धरती पर पधारे।
सर्वप्रथम कामदेव ने अप्सराओं ,गंधर्वों के नृत्य गान से भगवान शिव को जगाने का भरपूर प्रयास किया ।विफल होने पर कामदेव ने आम्र बृक्ष के पत्तों मे छिपकर अपने पुष्प धनुष से पंच बाण हर्षण प्रहस्टचेता सम्मोहन प्राहिणों एवम मोहिनी का शिव ह्रदय में प्रहार कर शिव की समाधि को भंग कर दिया। इस पंच बाण के प्रहार से क्रोधित भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। तभी से वह जला पेंड युगो युगो से आज भी प्रमाण के रूप में अपनी जगह पर खडा है।आज भी उस आम के पेंड की उम्र के बारे में किसी को जानकारी नहीं है। पिढी दर पिढी इस आम के पेंड के मौजूद रहने की सभी को जानकारी है।इस कामेश्वर नाथ का वर्णन बाल्मीकि रामायण के बाल सर्ग के 23 के दस पन्द्रह में मिलता है। जिसमे अयोध्या से बक्सर जाते समय महर्षि विश्वामित्र भगवान राम को बताते है की देखो रघुनंदन यही वह स्थान है जहां तपस्या रत भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था।
कन्दर्पो मूर्ति मानसित्त काम इत्युच्यते बुधै: तपस्यामि: स्थाणु: नियमेन समाहितम्।इस स्थान पर हर काल हर खण्ड में ऋषि मुनी प्रत्यक्ष एवम अप्रत्यक्ष रूप से साधना रत रहते है। इस स्थान पर भगवान राम अनुज लक्ष्मण एवम महर्षि विश्वामित्र के साथ रात्रि विश्राम करने के पश्चात बक्सर गये थे।स्कन्द पुराण के अनुसार महर्षि दुर्वासा ने भी इसी आम के बृक्ष के नीचे तपस्या किया था।महात्मां बुद्ध बोध गया से सारनाथ जाते समय यहां पर रूके थे। ह्वेन सांग एवम फाह्यान ने अपने यात्रा बृतांत में यहां का वर्णन किया है। शिव पुराण देवीपुराण स्कंद पुराण पद्मपुराण बाल्मीकि रामायण समेत ढेर सारे ग्रन्थों में कामेश्वर धाम का वर्णन मिलता है।
महर्षि वाल्मीकि गर्ग पराशर अरण्य गालव भृगु वशिष्ठ अत्रि गौतम आरूणी आदि ब्रह्म वेत्ता ऋषि मुनियों से सेवित इस पावन तीर्थ का दर्शन स्पर्श करने वाले नर नारी स्वयं नारायण हो जाते है। मन्दिर के ब्यवस्थापक रमाशंकर दास के देख रेख में करोणो रूपये खर्च कर धाम का सुन्दरीकरण किया गया है। शिव रात्रि के अवसर पर और सावन में लाखो लोग यहा आकर बाबा कामेश्वर नाथ का दर्शन पूजन करते है।शिवरात्रि के दिन यहां पर बिशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
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उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है , जिसके कपाट साल में बस एक बार रक्षाबंधन के दिन खुलते हैं।


उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है , जिसके कपाट साल में बस एक बार रक्षाबंधन के दिन खुलते हैं। इस वजह से भगवान बंशीनारायण के इस मंदिर में केवल एक ही दिन पूजा होती है। ये मंदिर समुद्रतल से बारह फीट की ऊचाई पर है। रक्षाबंधन पर आसपास के इलाकों में रहने वाले बहनें भगवान बंशीनारायण को राखी बांधती है। इसके बाद ही भाइयों की कलाई पर प्यार की डोर बांधती हैं। सूर्यास्त होते ही मंदिर के कपाट एक साल के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं। चोली जिले के उच्च हिमालय क्षेत्र में स्थित इस दस फुट ऊंचे मंदिर में भगवान चतुर्भज की मूर्ति विराजमान है।परंपरा के अनुसार मंदिर के पुजारी राजपूत हैं। पुजारी पुराण का हवाला देते हुए बताते हैं कि बामन अवतार धारण कर भगवान विष्णु ने दानवीर राजा बलि का अभिमान चूर करके उसे पाताल लोक भेजा।बलि ने भगवान से अपनी सुरक्षा का आग्रह किया। इस पर विष्णु भगवान स्वयं पाताल लोक में बलि के खरपाल हो गए। ऐसे में पति को मुक्त कराने के लिए देवी लक्ष्मी पाताल लोक पहुंची और राजा बलि को राखी बांधकर भगवान को मुक्त कराया। मान्यता है कि पाताल लोक से भगवान यहीं प्रकट हुए थे। भगवान को राखी बांधने से स्वंय भगवान हरि उनकी रक्षा करत

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बिलाड़ा – मंदिर


यह मंदिर बिलाड़ा नगर से 4 किमी. दूर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। यहीं वह स्थान है जहा असुर राजा बलि ने अपना 100 वाँ यज्ञ किया। यहीं पर साक्षात् भगवान विष्णु वामन (बामन) अवतार के रूप में आये थे। राजा बलि द्वारा किये गए यज्ञ के अवशेष आज भी अपभ्रंश के रूप में यहाँ मौजूद है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा के पास किसी गड्ढे को एक बड़े पत्थर से ढका हुआ प्रतीत होता है। कहा जाता है इसी जगह पर राजा बलि को पाताललोक भेजा गया था।