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सोमनाथ का शूरवीर वीर हमीरसिंहगोहिल


सोमनाथ मंदिर के ठीक सामने एक भाला धारी घुड़सवार की प्रतिमा तिराहे पर विद्यमान है, जिस पर लिखा है कि यह हमीर जी गोहिल की मूर्ति है जो सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए शहीद हुए थे। वैसे तो सोमनाथ पर सत्रह से अधिक बार आक्रमण के कारण कई लोग शहीद हुए होंगे, जिन्होंने सोरठ की उर्वर धरा में सोमनाथ की रक्षार्थ आत्माहुति दी होगी, किंतु यह वीर कोई खास होगा यह मेरे मन में पैठ गया। चूंकि गजनवी, खिलजी, तुगलक ये तो मेरे दिमाग में घूम गए किंतु यह वीर किससे और कब लड़ा होगा यह ज्ञात करना जरूरी हो गया था। जानकारी लेने पर तो लगता है उस रण बांकुरे पर आज भी लोग बिछ जाने को तैयार है। सोरठ में एक दोहा है –
“जननी जणे तो भक्त जण जे, के दाता, के सूर।
नहीं तर रहेजे वांझणी, मत गुमावजे नूर।।”

हमीर जी गोहिल भीमजी गोहिल के पुत्र थे और तीन भाइयों में सबसे छोटे, उन्हे गढाली गांव की जागीर मिली थी, एक बार अपने मझले भाई अरजण जी के साथ मुर्गों की लड़ाई के चक्कर में उनके निकल जा कह देने पर सौराष्ट्र छोड़ मारवाड़ चले गए।

दिल्ली की गद्दी पर उस समय मोहम्मद तुगलक (द्वितीय) बैठा हुआ था, जूनागढ़ के सूबेदार शम्शुद्दीन की पराजय के बाद उसने जफरखान को नियुक्त किया था। जफरखान की सीधी नजर सोमनाथ की संपदा पर थी और साथ ही वह अपने मजहब की कुंठा के कारण बुत शिकन बनना चाहता था।

जफरखान ने इसके लिए आदेश जारी किया कि अधिक संख्या में सोमनाथ में दर्शनार्थी इकट्ठा न हो। शिवरात्रि पर्व के अवसर पर जनमेदिनी तो एकत्रित होनी ही थी। जफरखान के कारकून रसूल खान के दर्शनार्थियों को रोकने पर विवाद हुआ और विवाद इतना बढ़ा कि जनता ने सैनिकों सहित रसूल खान को समाप्त कर दिया। जफरखान का आग बबूला होना स्वाभाविक था। उसने इस बहाने तमाम दलबल के साथ सोमनाथ पर चढ़ाई करने की सोची।

सोमनाथ पर आक्रमण की आशंका के चलते गढाली से मझले भाई अरजण ने हमीर को ढूंढने के लिए माणसुर गांव के गढ़वी को भेजा। हमीर जी को भाई के दुखी होने की सूचना मिली जिसपर उनका मन तुरंत चलने को हुआ, अपने दो सौ राजपूत साथियों के साथ वे दरबार पहुंच गए। धामेल के जागीरदार उनके काका वरसंग देव और बड़े भाई दूदाजी आदि के साथ उनका समय बीतने लगा, वे दूदाजी की जागीर अरठिला आ गए। यहां उनका नित्य जीवन और खेलकूद जारी था, हमीर अभी कुंवारे थे। कड़ाके की भूख लगी थी और साथियों के साथ वे दरबारगढ़ आए और (दूदाजी की पत्नी) बड़ी भाभी से खाना मांगा, तब भाभी ने कहा कि – “क्यों देवर जी इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो, क्या खाना खाकर सोमनाथ की रक्षा के लिए साका करने जाना है?” हमीर जी ने पूछा कि भाभी क्या सोमनाथ पर संकट है? तब भाभी ने बताया कि दिल्ली का कटक निकल चुका है और सूबेदार जफरखान का दल रास्ते में है। यह बात सुनकर हमीर औचक खड़े हो गए और पूछा -“भाभी क्या बात कर रहीं हो? क्या कोई राजपूत सोमनाथ के लिए मरने निकल पड़े ऐसा नहीं? विधर्मियों की फौज चढ़ाई करेगी और रजपूती मर गई है क्या? ऐसे कई प्रश्न उन्होंने किये जिस पर भाभी ने कहा कि राजपूत तो बहुत है मगर सोमनाथ के लिए साका करे ऐसा कोई नहीं, तुम खुद राजपूत नहीं हो क्या?

भाभी की बात पर हमीर झळहला उठे। व्यंग्य भीतर तक चुभ गया। उसी समय भाभी को कहा – “मेरे दोनों बड़े भाइयों को मेरा जुहार कहना, मैं सोमनाथ मंदिर के लिए साका करने निकल रहा हूँ।” भाभी ने पछताते हुए खूब समझाया, मगर वे न माने और अपने पीछे किसी को समझाने भेजने की दुहाई देकर अपने दो सौ साथियों के साथ निकल गए। जब क्षेत्र के क्षत्रप बड़े आक्रमण से दिग्मूढ़ बने हुए थे, रजवाड़े अंतर्कलह में डूबे हुए थे तब हमीर मृत्यु का मंडप पोखने के लिए निकल पड़े।

कुंवर हमीर जी कुंवारे थे और अपने दो सौ साथियों के साथ चल पड़े, नीरव अंधेरी आधी रात को एक जगह से गुजरते हुए, जहां वायु भी रूक चुकी थी ऐसी नीरवता को चीरती एक महिला के शोकगीत गाने की आवाज सुनाई दी। झोंपड़ी में एक वृद्धा चारण गा रही थी। हमीर ने वहां जाकर पूछा कि किसके लिए यह शोकगीत गा रही हो? वृद्धा ने कहा मैं एक विधवा हूं और पन्द्रह दिन पहले दिवंगत अपने पुत्र का शोकगीत गा रही हूँ। हमीर ने कहा – “मां पुत्र के मरने के बाद भी लाड़ लड़ा कर उसका मर्शिया गा रही हो क्या तुम मेरे लिए शोकगीत गाओगी?” “मुझे मेरा शोकगीत सुनना है!” उस लाखबाई चारण ने कहा कि – “बाप यह क्या बोल रहे हो, क्या तुम्हारा जीते जी शोकगीत गाकर मुझे पाप में पड़ना है?” हमीर ने कहा – “मां हम मरण के रास्ते पर निकल चुके हैं और सोमनाथ की रक्षा के लिए साका करने जा रहे हैं। इस रास्ते से लौटना संभव नहीं है।” चारण लाखबाई उस राजपूत युवा के शौर्य की बात सुनकर अभिभूत हो गई। उसने पूछा कि – “बेटा हमीर तुम विवाहित हो?” हमीर ने ना कहा। तब वृद्धा ने कहा -” रास्ते में जो मिले उससे विवाह कर लेना। क्योंकि कुंवारों को युद्ध में अप्सरा वरण नहीं करती।” हमीर ने कहा कि -” मां हम मृत्यु के लिए जाने वालों को कौन अपनी कन्या ब्याहेगा?”
वृद्धा ने कहा कि “बाप तुम्हारी सूर वीरता देख कोई तुम्हे अपनी पुत्री ब्याहने के लिए कहे तो मना मत करना। मेरा यह कहा जरूर निभा लेना।” यह कहकर वृद्धा सोमनाथ में राह जोऊंगी बताते हुए चल पड़ी।

हमीर को रास्ते में द्रोणगढड़ा गांव में वेगड़ा भील मिल गए जो गीर के जंगल का सरदार था उसके पास भील योद्धाओं की हजार बारह सौ की टुकड़ी थी। गीर से लेकर शिहोर और सरोड के पहाड़ तक वेगड़ा के तीरों की धाक जमी हुई थी। भील जनजाति सोमनाथ में गहरी आस्था रखते थे और जूनागढ़ के राजा की सत्ता स्वीकार करते थे। वेगड़ा के पास एक युवा कन्या थी। जिसका नाम था राजबाई। एक बार जेठवा राजपूत गीर के पूर्वी हिस्से में स्थित तुलसीश्याम के मंदिर की यात्रा पर जा रहे थे, वेगड़ा के साथ उनका सामना हो गया, युद्ध में जेठवा के मरने से पहले उसने वेगड़ा को अपनी नन्ही बालिका सौंपते हुए जिम्मेदारी दी कि इसका पालन करना और योग्य होने पर किसी राजपूत के साथ विवाह कर देना। वेगड़ा ने मरते हुए जेठवा को वचन दिया और राजबाई को पुत्री की तरह पाला।

संयोग से चारण वृद्धा लाख बाई का वेगड़ा की राह से गुजरना हुआ, वेगड़ा ने उसे रोका और किसी राजपूत की जानकारी चाही लाख बाई ने हमीर जी गोहिल के सोमनाथ के लिए साका करने निकले होने की बात बताते हुए कहा कि उसी को अपनी कन्या परणा दे।

लाखबाई के कहे अनुसार वेगड़ा ने अपने तीन सौ धनुर्धर योद्धाओं के साथ गिर के काळवानेस के निकट पड़ाव डाला। उधर से चले आ रहे हमीर जी काळवानेस के पास शिंगोड़ा नदी के किनारे पहुंचे।
बहती नदी देख हमीर जी के साथी नहाने के लिए उतर गए। नहाने के दौरान किल्लोल करते कुछ को देर हुई कुछ आगे के लिए निकल गये। नहाने वाले साथियों के बाहर आने पर देखते हैं कि घोड़े गायब थे। हमीर जी ने आदेश दिया कि समीप पहाड़ी पर चढ़कर देखो कि घोड़े ले जाने वाले कौन है? खबर मिली कि घोड़े पास के पड़ाव में हिनहिना रहे हैं। वहां जाकर पूछने पर वेगड़ा सामने आया और पूछा कि हमीर जी गोहिल आप हो क्या? हम तो आपकी बांट जोह रहे हैं। प्रत्युत्तर में हमीर ने पूछा कि वे लोग कौन है तब वेगड़ा ने अपना परिचय दिया। वेगड़ा का परिचय सुनकर हमीर गदगद हुए कहा की सोमनाथ का साका करने चले और आपका मिलाप हुआ। ॥

वेगड़ा ने हमीर को दो दिनों के लिए रोक लिया। इस बीच राजबाई को हमीर से विवाह का पूछा, जेठवा कुल की कन्या राजबाई ने स्वीकृति और संकोच के साथ लज्जा का आवरण धारण किया। हमीर जी ने भी स्वीकृति दी मगर एक समस्या आ खड़ी हुई कि जितने साका करने वाले साथी थे उनका भी विवाह नहीं हुआ था उन्होंने हमीर जी के विवाह की शपथ ली थी, उन सबके लिए भील कन्याएँ ढूँढ कर सभी के सामूहिक लग्न हुए। गिर की वादियां ढोल और बांसुरी से गूंज उठी। इस तरह मौत का वरण करने वाले योद्धाओं ने पहले उन भील कन्याओं का वरण कर सिर पर केसरिया बांध लिया। द्रोणगढड़ा का गिरी प्रांतर उस विवाह का साक्षी बना। कई बातें इतिहास के पन्नों से भले ही छूट रही हो लेकिन लोक मानस ने अपने हृदय में स्थान दिया है।

इस तरह गीर के जंगल में लग्न के दूसरे दिन सब के साथ वेगड़ा ने भी अपने साथियों के साथ प्रयाण किया। अरठीला गांव के साथी माणसुर गढ़वी भी रास्ते के छोटी बस्तियों के टिंबे आदि में अपनी बबकार लगा, योद्धा तैयार कर साथ ले चला। राजपूत, भील, काठी, अहीर, मेर, भरवाड़ और रबारी जाति के जवान सोमनाथ के लिए साका करने निकल पड़े।

वेगड़ा ने अपने खबरचियों के द्वारा जफरखान की फौज की जानकारी हासिल की। उधर दिल्ली की फौज सौराष्ट्र की सीमाएं रौंदती, राजाओं और ठाकोरों को दंडित करती आ रही थी, उसकी सेना को रोकने की सामर्थ्य न होने के कारण कोई उन्हें रोक नहीं रहा था। इधर हमीर और वेगड़ा सोमनाथ के प्रांगण में उन सेनाओं का रास्ता देखने लगे। पुजारी और प्रभास के नगरजन स्तब्ध होकर खड़े थे। जफरखान को तो जैसे सोमनाथ को रौंद डालना था। उसे समाचार मिला कि कोई सिरफिरे उसका रास्ता रोकने के लिए सोमनाथ में तैयार हैं। वेगड़ा का पड़ाव सोमनाथ और प्रभास के बाहर था। हमीर ने अंदर का मोर्चा सम्हाला था।

जफरखान उन्मत्त होकर वहां आ पहुंचा, बाहर के मोर्चे पर वेगड़ा भील के योद्धाओं के तीरों के हमले ने मुस्लिम आक्रांताओं की सेना को त्राहिमाम् करवा दिया। एक तरफ देवालय को तोड़ने का जुनून था तो दूसरी तरफ मंदिर रक्षा की विजीगिषा थी। हाथी पर बैठे जफर ने सेना का संहार देख तोपों को आगे करने का हुक्म दिया।

उस समय भील योद्धाओं ने जफरखान का इरादा भांप लिया। उन्होंने घनी झाड़ियों और वृक्षों की ओट से बाणों का संधान जारी रखा। सूबेदार के तोपची चित्कार कर गिरने लगे। जफर ने गुस्से में दूसरी पंक्ति को आगे कर दी, भील योद्धा भी खेत होते कम होने लगे। जफर ने कुशल हाथी के साथ एक सरदार को वेगड़ा के पीछे किया, हाथी ने सूंड में पकड़ कर उसे पटक दिया जिससे वेगड़ा वहीं सोमनाथ रक्षा यज्ञ में समिधा बनकर काम आए। दूसरी तरफ भीतरी सुरक्षा में रत हमीर जी सचेत थे जफर का हमला सोमनाथ गढ़ की ओर हुआ। सुलगते तीरों की वर्षा हमीर जी ने शुरू की। पत्थरों से भी आक्रमण हुआ। जो सैनिक गढ़ के पास थे उन पर उबलता तेल डाला गया। इस प्रकार पहला आक्रमण असफल हुआ। सांझ हुई मंदिर में आरती हुई। सभी साथियों को एकत्रित कर अगला व्यूह समझाया।

जफरखान ने सोमनाथ को तीन तरफ से घेर लिया चौथी तरफ समुद्र था। दूसरे दिन सुबह हमीर जी ने घुड़सवार होकर आक्रमण कर दिया और हाथियों को भालों से गोदकर त्राहि त्राहि करवा दी। जफर ने गढ़ में प्रवेश के लिए सुरंग खोद डाली जिसमें हमीर जी ने पानी भरवा कर प्रवेश को अवरूद्ध कर दिया। रोज नई योजना के साथ जफर का नौ दिन तक हमीर जी ने सामना किया।

सोमनाथ गढ़ के सामने नौ दिनों से जफरखान के सैनिकों से लड़ते हमीर जी के पास योद्धा खेत रहे, नौवें दिन की रात्रि शेष बचे योद्धाओं को इकट्ठा कर व्यूह समझाया, कि जैसे ही सूर्यनारायण पूर्व दिशा से निकले गढ़ के द्वार खुले छोड़कर ‘केसरिया’ कर लेना यानी आत्माहुति दे देना। “सभी सावधान हो जाओ” इतना कहते ही हर हर महादेव के घोष गुंजायमान हुआ। पूरी रात कोई योद्धा सोया नहीं, सोमनाथ के मंदिर में मृत्यु के आलिंगन की उत्तेजना की कल्पना ही की जा सकती है, उन वीरों ने रात भर अबीर गुलाल की होली खेली, भगवान शंकर को भी जैसे सोने न दिया।

भिनसारे नहा धोकर हमीर जी ने चंद्र स्थापित भगवान सोमनाथ की पूजा की, हथियारों से सुसज्ज होकर लाख बाई को चरण स्पर्श किया और आशीष मांगा साथ ही कहा कि ‘आई अब मेरे कानों को मृत्यु के मीठे गीत सुनने की वेला आ पहुंची है। सोमनाथ के पटांगण में थोड़ी देर के लिए नीरवता फैल गई। पथारी पर बैठी ‘आई’ ने सुमीरनी फेरते हुए कहा – धन्य है वीर तुझको, तूने सोरठ की मरने पड़ी मर्दानगी का पानी रक्खा।’ आई ने गाया –

वे’लो आव्यो वीर, सखाते सोमैया तणी।
हीलोळवा हमीर, भाला नी अणिए भीमाउत।
(વે’લો આવ્યો વીર, સખાતે સોમૈયા તણી;
હીલોળવા હમીર, ભાલાની અણીએ ભીમાઉત.)

माथे मुंगीपर खरू, मोसाळ वसा वीस।
सोमैया ने शीश, आप्यु अरठीला धणी।।
(માથે મુંગીપર ખરૂ, મોસાળ વસા વીસ;
સોમૈયાને શીષ, આપ્યુ અરઠીલા ધણી.)

गढ़ के दरवाजे खोल दिये और जफरखान की फौज पर योद्धा टूट पड़े। इस अचानक आक्रमण की कल्पना न होने से जफर अचकचा गया। उसने फौज को सावधान कर युद्ध आरंभ किया। इस ओर हमीर जी काला कहर बरसाते हुए लड़ रहे थे। सांझ होते होते दुश्मन फौज को बहुत पीछे धकेल दिया। हमीर जी ने देखा कि अब शेष बचे डेढ़ दो सौ योद्धाओं में किसी के हाथ, किसी के पैर, किसी की आँतें कट चुकी थी। हमीर जी ने निर्णय लिया कि अब युद्ध इसी परिसर में लड़ना है। सुबह होते ही जफरखान ने सामने से हमला किया, कारण कि वह ज्यादा समय कमजोर शत्रु को देने के लिए तैयार नहीं था। हमीर जी ने भगवान आशुतोष को जल अर्पण किया और सभी साथियों ने आपस में अंतिम जुहार करने के साथ रणांगण में उतर पड़े।

ग्यारहवें दिन की सांझ युद्ध में हमीर जी का शरीर क्षत विक्षत हो गया, तलवार का भयानक वार होने के बाद भी दुश्मन को बराबर प्रत्युत्तर दे रहे थे लेकिन ग्यारहवें दिन की सांझ शिव सेवा में उन्होंने स्वयं को अर्पित कर दिया। इस युद्ध को लाख बाई गढ़ की ड्योढ़ी से निहार रही थी और उस शूरवीर योद्धा की विरूदावली गा रही थी और गाया पहला शोकगीत –

रड़वड़िये रड़िया, पाटण पारवती तणा;
कांकण कमल पछे, भोंय ताहळा भीमाउत ।
(રડવડિયે રડિયા, પાટણ પારવતી તણા;
કાંકણ કમળ પછે, ભોંય તાહળા ભીમાઉત.)

वेळ तुंहारी वीर, आवीने उं वाटी नहीं ;
हाकम तणी हमीर, भेखड़ हुती भीमाउत।
(વેળ તુંહારી વીર, આવીને ઉં વાટી નહીં;
હાકમ તણી હમીર, ભેખડ હુતી ભીમાઉત.)

इधर चारण मां अपने शूरवीर पुत्रों के शोकागीत गा रही थी और जफरखान के सैनिकों के हाथों सोमनाथ का देवल लुट रहा था। हमीर जी इस तरह अपने अनुपम पराक्रम से इतिहास के पृष्ठ लाँघते हुए लोक जीवन के कंठ से होकर हृदय में विराजित हो चुके थे। जब सौराष्ट्र का शौर्य बिखरा हुआ था तब अपने मुट्ठी भर साथियों के साथ स्वयं का बलिदान हमीर जी को लोकमन का नायक बना गया।

सोमनाथ मंदिर के बाहर वेगड़ा जी की और मंदिर के परिसर में हमीर जी की डेरी आज भी पूजी जाती है। सोमनाथ मंदिर की लूट में भले ही आक्रांताओं ने बहुत बार प्रयास किया हो मगर तत्कालीन वीरों ने अपने बलिदानों से इस धरा को अभिषिक्त किया है।

साभार : गजेन्द्र कुमार पाटीदार

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काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के साथ करीब 250 साल बाद बदली काशी की सूरत, जानें कुछ रोचक बातें
1/8 काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में जानिए सबकुछ🙏🌹
🙏🌹काशी विश्वनाथ मंदिर से गंगा को एकाकार करने वाला काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनकर तैयार हो गया है और अब करीब 250 साल बाद काशी नगरी को एक नई काशी से रुबरू होने का मौका मिला है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी इसे राष्ट्र को भेंट कर चुके हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के जाने माने संत और साधुजन, शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, श्री महंत सहित सनातन धर्म के सभी संप्रदायों के प्रमुख और गणमान्य लोग काशी में मौजूद रहे। वहीं, विश्‍वनाथ धाम के साथ सजकर तैयार पूरी काशी मंत्रोच्चार और शंखनाद से गूंजेगी।

2/8 एकबार फिर विश्वनाथ धाम में आया ज्ञानवापी कूप

करीब ढाई सौ साल पहले महारानी अहिल्याबाई के बाद अब विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार विश्‍वनाथ धाम के रूप में सामने आया है। वास्तविक रूप से धर्म नगरी में आने और आनंद कानन का अहसास कराने वाला चुनार के गुलाबी पत्थरों की आभा से दमकता विश्‍वनाथ धाम रिकॉर्ड समय यानी 21 महीने में बनकर तैयार हुआ है। मंदिर के लिए सात तरह के पत्थरों से विश्‍वनाथ धाम को सजाया गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु रुद्र वन यानी रुद्राक्ष के पेड़ों के बीच से होकर बाबा विश्‍वनाथ का दर्शन करने पहुंचेंगे। 352 साल पहले अलग हुआ ज्ञानवापी कूप एक बार फिर से बाबा विश्वनाथ धाम परिसर में आ गया है।

काशी की मणिकर्णिका घाट, जहां रात भर नृत्य करती हैं नगर वधूएं

3/8 चारों प्रतिमाएं लगा दी गईं

विश्‍वनाथ धाम में आदि शंकराचार्य, महारानी अहिल्याबाई, भारत माता और कार्तिकेय की प्रतिमाओं को स्थापित करने का काम शनिवार रात से शुरू होकर रविवार सुबह तक पूरा हो गया। इसके लिए विशेषज्ञों की टीम लगी रही। घाट से धाम जाते समय सबसे पहले कार्तिकेय, इसके बाद भारत माता और फिर अहिल्‍याबाई की प्रतिमा लगी है। अंत में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा है। प्रधानमंत्री के बाबा के दरबार मे जाने के लिए मंदिर चौक की सीढ़ियां नहीं उतरनी होगी। उनके लिए रैंप बना उसपर शेड भी लगाया गया है।

धर्म ज्ञान: एक नहीं बल्कि पांच हैं काशी, पौराणिक और धार्मिक महत्व

4/8 मंदिर के इतिहास को संरक्षित करेगा काशी विद्वत परिषद

काशी विद्वत परिषद काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास से संबंधित दस्तावेजों को संरक्षित करेगा। मुगल शासक औरंगजेब के फरमान से 1669 में आदि विश्‍वेश्‍वर के मंदिर को ध्वस्त किए जाने के बाद 1777 में मराठा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इसके बाद वर्ष 1835 में राजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर को स्वर्ण मंडित कराया तो राजा औसानगंज त्रिविक्रम सिंह ने मंदिर के गर्भगृह के लिए चांदी के दरवाजे चढ़ाए थे।

जानिए काशी के हरिश्चंद्र घाट की ऐसी है कहानी

5/8 436 में तीसरी बार हुआ मंदिर का जीर्णाद्धार

काशी विश्‍वनाथ से संबंधित महत्वपूर्ण कालखंड पर नजर डालें तो औरंगजेब से पहले 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ मंदिर पर हमला किया था। 13वीं सदी में एक गुजराती व्यापारी ने मंदिर का नवीनीकरण कराया तो 14वीं सदी में शर्की वंश के शासकों ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया। 1585 में एक बार फिर टोडरमल द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था। अब 436 साल में तीसरी बार मंदिर का जीर्णोद्धार विश्‍वनाथ धाम के रूप में हुआ है।

काशी में मोदी ने की गंगा आरती, जानें क्या है इस आरती का महत्व

6/8 दर्शन मात्र से होती है मोक्ष की प्राप्ति

मान्यताओं के अनुसार, काशी के बाबा विश्वनाथ के दर्शन मात्र से ही पापों से मुक्ति मिल जाती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, जब संसार में प्रलय आएगी और पूरी सृष्टि का विनाश हो जाएगा तब काशी ही एकमात्र जगह होगी, जो सुरक्षित रहेगी। क्योंकि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। इसलिए देश-विदेश से भक्तजन मंदिर के दर्शन करने आते हैं। काशी में देवी मां का एक शक्तिपीठ भी स्थित है, जिससे इस जगह की पवित्रता और बढ़ जाती है।

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7/8 भगवान शिव और माता पार्वती का है प्रिय स्थान

ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के निर्माण के समय काशी में ही भगवान शिव ने अपने शरीर से नारी शक्ति रूप में देवी आदिशक्ति को प्रकट किया था। यहीं पर भगवान विष्णु का प्राकट्य हुआ था। काशी के विषय में कहा जाता है कि इस स्थान को भगवान शिव स्वयं अपने त्रिशूल पर धारण करते हैं। 5 कोश में फैली काशी की भूमि को अविमुक्तेश्वर स्थान कहा जाता है, जो भगवान शिव की राजधानी है। कहते हैं रुद्र ने भगवान शिव से इस स्थान को अपनी राजधानी बनाने का अनुरोध किया था। दूसरी ओर देवी पार्वती को हिमालय पर रहते हुए मायके में रहने का अनुभव होता था और वह किसी अन्य स्थान पर अपना निवास बनाने के लिए भगवान शिव से अनुरोध करती थीं। ऐसे में भगवान शिव ने लंका में सोने की नगरी का निर्माण करवाया लेकिन यह नगरी रावण ने भगवान शिव से दक्षिणा में मांग ली। बद्रीनाथ में भगवान शिव ने अपना ठिकाना बनाया तो भगवान विष्णु ने यह स्थान शिवजी से ले लिया। तब भगवान शिव ने काशी को अपना निवास बनाया। कहते हैं भगवान शिव से पहले यह स्थान भगवान विष्णु का स्थान हुआ करता था। काशी विश्वनाश रूप में भगवान शिव ने स्वयं अपने तेज से विश्वेश्वर शिवलिंग को स्थापित किया था। यह स्वयंभू लिंग साक्षात शिव रूप माना जाता है। बताया जाता है कि जब भगवान शिव काशी में आ गए थे तब उनके पीछे-पीछे उत्तम देव स्थान, नदियां, वन, पर्वत आदि काशी में पहुंच गए थे।

काशी में देवी का अनोखा मंदिर, दर्शन के बाद करना होगा यह काम

8/8 भगवान विष्णु ने की थी यहां तपस्या

शिव और काल भैरव की इस नगरी को सप्तपुरियों में शामिल किया गया है। काल भैरव को इस शहर का कोतवाल कहा जाता है और भैरव बाबा पूरे शहर की व्यवस्था देखते हैं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन करने होते हैं तभी दर्शन का महत्व माना जाता है। काशी दो नदियां वरुणा और असी के मध्य बसा होने की वजह से इसका नाम वारणसी पड़ा। बताया जाता है कि भगवान विष्णु ने अपने चिंतन से यहां एक पुष्कर्णी का निर्माण कराकर लगभग पचास हजार साल तक तपस्या की थी। भैरव को भगवान शिव का गण और माता पार्वती का अनुचर माना जाता है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, काशी को दुनिया का प्राचीनतम प्राचीन शहर माना जाता है

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काशी विश्वनाथ


ये कहानी है अहिल्या बाई होल्कर और श्रीकाशी विश्वनाथ की….. इसी कहानी में मोदी और श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के विरोध का रहस्य छिपा है……..

विरोध केवल मोदी का ही नहीं हो रहा है और विरोध पहली बार ही हो रहा है ऐसा भी नहीं है।विरोध तो श्रीमंत मल्हार राव होल्कर और मातोश्री अहिल्याबाई होल्कर का भी हुआ था।

बुरा लग सकता है लेकिन आज लिखना आवश्यक है: 1735 में बाजीराव पेशवा की माँ राधाबाई तीर्थयात्रा पर काशी आईं।उनके लौटने के पश्चात ‘काशी के कलंक’ को मिटा देने के संकल्प के साथ पेशवा बाज़ीराव के सेनापति मल्हार राव होल्कर 1742 में गंगा के मैदानों में आगे बढ़ रहे थे।

उस समय पेशवाओं की विजय पताका चहुँओर लहरा रही थी।काशी विश्वनाथ के मन्दिर की मुक्ति सुनिश्चित थी। 27 जून 1742 को मल्हार राव होल्कर जौनपुर तक आ चुके थे।

उस समय काशी के कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित लोग उनके पास पहुँच गए और कहा कि “आप तो मस्जिद को तोड़ देंगे लेकिन आप के चले जाने के बाद मुसलमानों से हमारी रक्षा कौन करेगा।”

इस तरह बाबा की मुक्ति के बजाय स्वयं की सुरक्षा को ऊपर रखने वाले काशी के कुछ धूर्तों ने उन्हें वापस लौटा दिया।

बाबा विश्वनाथ के मन्दिर की पुनर्स्थापना होती होती रह गई। मल्हार राव होल्कर लौट तो गए लेकिन उनके मन में कसक बनी रही।

वही कसक और पीड़ा श्रीमन्त मल्हार राव होल्कर से उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर को स्थानान्तरित हुई।

अहिल्याबाई के लिए उनके ससुर मल्हार राव होल्कर ही प्रेरणा थे क्योंकि अहिल्याबाई का जन्म किसी राजघराने में नहीं हुआ था।

उनके पिता एक गाँव के सरपंच मात्र थे। एक दिन कुमारिका अहिल्या मंदिर में सेवा कर रही थी।

भजन गाती और गरीबों को भोजन कराती अहिल्याबाई के उच्च कोटि के संस्कारों को मालवा के अधिपति मल्हारराव होल्कर ने देखा।

उसी समय उन्होंने तय कर लिया कि अहिल्या ही उनके बेटे खाण्डेराव की पत्नी बनेंगी। वर्ष 1733 में अहिल्याबाई का विवाह खाण्डेराव होल्कर से हो गया। अहिल्याबाई की आयु 8 वर्ष थी।

खाण्डेराव अहिल्याबाई से 2 साल बड़े थे।

सन 1754 में एक युद्ध के दौरान खाण्डेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। अहिल्याबाई के जीवन में अंधेरा छा गया।

अहिल्याबाई सती हो जाना चाहती थी किन्तु मल्हार राव ने अहिल्याबाई को न केवल सती होने से रोका बल्कि मानसिक तौर पर उन्हें मजबूत भी किया। शासन सञ्चालन के सूत्रों का प्रशिक्षण देकर मालवा का शासन सम्भालने के लिए तैयार किया। 1766 में मल्हार राव के मृत्योपरांत अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा का शासन अपने हाथों में ले लिया।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर महारानी अहिल्याबाई होल्कर की अमूल्य कीर्ति है। काशी के लिए अहिल्याबाई होल्कर का क्या योगदान है। इसे इतिहास का अवलोकन किए बिना नहीं समझा जा सकता।

आनन्दवन काशी को पहला आघात 1194 में लगा था। जब मोहम्मद गोरी के सिपहसलार क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ समेत यहाँ के प्रमुख मंदिरों को तोड़ दिया।

बाद के कालखण्डों में हुसैन शाह सिरकी (1447-1458) और सिकंदर लोधी (1489-1517) ने काशी विश्वनाथ और काशी के अन्य प्रमुख मंदिरों को तोड़ा।

बार-बार काशी पर इस्लामिक हमलावर आघात करते रहे लेकिन शिवनगरी काशी पुनः पुनः हिन्दुत्व के अमृततत्व से सँवरती रही।

अकबर के कालखण्ड में काशी के जगतप्रसिद्ध धर्मगुरु पण्डित नारायण भट्ट की प्रेरणा से राजा टोडरमल ने 1585 में पुनः काशी विश्वनाथ के भव्य मंदिर का निर्माण कराया।

हालाँकि इसमें अकबर का कोई योगदान नहीं था। यह बात इसलिए लिखनी पड़ रही है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने एक लेख में लिखा था और अभी फिर से लिखा है कि विश्वनाथ मंदिर के लिए अकबर ने धन दिया था।

यह सच नहीं है। इसी मन्दिर को औरंगज़ेब के 18 अप्रेल 1669 के फ़रमान से तोड़ दिया गया। मन्दिर के ध्वस्त अवशेषों से ही उसी स्थान पर वर्तमान मस्जिद खड़ी कर दी गयी। पीछे की तरफ मन्दिर का कुछ हिस्सा छोड़ दिया गया ताकि इसे देख कर ग्लानि से हिन्दु रोते रहें।

काशी विश्वनाथ का मन्दिर ध्वस्त कर दिया गया था लेकिन 1669 से ही भग्नावशेष एवं स्थान की पूजा चलती रही। मुक्ति के विभिन्न प्रयास भी चलते रहे।

मंदिर का पुनर्निर्माण और भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा करना समस्त राजा महाराजाओं और संतों के सामने प्रश्नचिह्न बना हुआ था।

काशी के तीर्थपुरोहितों की बहियों से ऐसा ज्ञात होता है कि 1676 ई. में रीवा नरेश महाराजा भावसिंह तथा बीकानेर के राजकुमार सुजानसिंह काशी आए थे। इन दोनों राजाओं ने मंदिर निर्माण की पहल तो की लेकिन सफल नहीं हो पाये। उन्होंने विश्वेश्वर के निकट ही शिवलिंगों को स्थापित अवश्य किया।

इसी क्रम में मराठों के मंत्री नाना फड़नवीस के प्रयास भी असफल रहे। 1750 में जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह ने परिसर की पूरी ज़मीन ख़रीद कर विश्वनाथ मंदिर के निर्माण की योजना बनायी जो कि परवान नहीं चढ़ सकी।

7 अगस्त 1770 को महादजी सिंधिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मंदिर तोड़ने की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया परंतु तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया था।यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

इतने असफल प्रयासों के पश्चात अहिल्याबाई होलकर को सफलता प्राप्त हुई।अहिल्याबाई ने वह करके दिखा दिया जिसे समस्त हिन्दू राजा 111 वर्षों में नहीं कर सके थे।

अहिल्या बाई के प्रयासों से 1777 से प्रारंभ होकर 1781 ई. में वर्तमान मंदिर का निर्माण मूल स्थान से दक्षिण की दिशा में थोड़ा हटकर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्ण हुआ।

महारानी अहिल्याबाई ने काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के साथ-साथ जो भी धार्मिक स्थल भग्नावस्था में थे, उन सभी को शास्त्रीय मर्यादाओं के साथ पुर्नस्थापित करवाया।

वहाँ पूजा-पाठ नित्य होता रहे, इसकी व्यवस्था भी राजकीय कोष से करवायी।

किन्तु काशी ने उस समय भी महारानी का साथ नहीं दिया था। शिवलिंग की प्रतिष्ठा के लिए महारानी को माहेश्वर से पण्डितों बुलवाना पड़ा था।

मन्दिर के लिए नित्य पुजारी को लेकर भी समस्या आयी। काशी का कोई ब्राह्मण पुजारी के पद पर कार्य करने को तैयार नहीं था।

इसलिए काशी विश्वनाथ का पहला पुजारी तारापुर के एक भूमिहार ब्राह्मण को बनाया गया। ये प्रमाण आज भी इन्दौर के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।

मल्हार राव को मार्ग से भटकाने वाले और अहिल्या बाई का साथ न देने वालों धूर्तों के वंशज आज भी काशी में ही हैं। यही लोग वर्तमान में श्रीकाशी विश्वनाथ धाम का विरोध कर रहे हैं।

294 वर्षों के बाद नरेन्द्र मोदी ने अहिल्या बाई के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ा कर उन्हें सच्ची श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है। नए परिसर में मातोश्री की प्रतिमा स्थापित कर उनकी कीर्ति को सदैव के लिए अक्षय कर दिया है।

तीन हज़ार वर्गफीट में सिमटा मन्दिर आज पाँच लाख वर्ग फ़ीट के भव्य परिसर में विस्तार ले चुका है। काशी की छाती पर खड़ा हुआ ‘कलंक’ एक कोने में सिमट चुका है।

विश्व के नाथ को गलियों में सिमटा देख कर हृदय में ग्लानि लिए सदियों से रोता हिन्दू आज धाम के विस्तारीकरण से प्रफुल्लित है।

गजवा-ए-हिंद का सपना देखने वाले मुग़लों के वंशजों को भी अब विश्वनाथ धाम के दरवाज़े से ही प्रवेश लेना होगा। नरेन्द्र मोदी अपना कार्य कर चुके। अब बचे हुए कार्य को पूरा करने की ज़िम्मेदारी हिन्दू समाज के कन्धों पर है।

गोविन्द शर्मा
संगठन मन्त्री, श्रीकाशी विद्वत्परिषद्

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बभनी घाट का महायुद्ध : गया, बिहार

(सर्वेभ्योतीर्थपुरोहितेभ्यो नमः)

यह प्रश्न गंभीर है!
जब मथुरा, अयोध्या और काशी में मस्जिद बने तो गयाजी में विध्वंसित विष्णु पद मंदिर और दक्षिणार्क परिवृत में ऐसा कार्य आक्रान्ता दल क्यों नहीं कर पाये?

एक अनुश्रुति के अनुसार गयावाल पुरोहितों ने आंशिक इस्लाम स्विकृति की शपथ ले मुस्लिम सेना से आजीविका की दुहाई दे मस्जिद न बनाने का अनुरोध किया., औरंगजेब के सैनिकों से। बदले में लोकाचार बदल लिया और कुछ इस इस्लामी परंपरा को स्वीकार किया।

यह अनुश्रुति भ्रांतिमूलक है। गया की संघर्ष गाथा और मुक्ति कथा एक महावृतांत है रण का। रक्तस्नात युद्ध का। रक्तरंजित जनोन्मादित धर्म प्रज्ञा के अहर्निश प्रतिरोध शक्ति का। जिसके आगे आक्रान्ताओं के बुलंद हौसले धूलनिमग्न हुये। दाउद खां हारा और स्थानीय मगध बाभन विजयमाल धारणकर गया की विराट पितृशिला पर सगर्व ब्राह्मणोवर्चसो$जायत् लिख गये।

गया के कई आक्रमणों में ऐसी विजयों की अपनी महत्ता है। इन धर्मान्तरण और मंदिर विध्वंस युद्धों की गाथायें धीरे धीरे विस्मृति के तामिस्र में गौण हो रहीं हैं। हम शितल चौधरी और तिलक चौधरी की बम्भई और दरघा नदी युद्ध भी भूल गए।

इससे भी अधिक दुःखद है बभनी घाट के युद्ध और रक्ततांडव की रौरवगाथा भूल जाना। कम से कम गया के बाभनों और गयावालों हेतु तो यह अक्षम्य अपराध है।

आश्चर्य तब और गहरा हो जाता है जब इस रणकथा पर गोलावर और कोलकट पंडे मौन धारण कर विस्मय प्रकट करते हैं।
पहले यह जान लें गोलावर और कोलकट दोनों पंडा समूह स्थानीय बाभनों के दो वर्ग हैं जो धामी पंडा वर्ग से पृथक् हैं।

झांगी, धोकड़ी और गुरदा समूह के साथ वर्ग बोध भी उनका बाद में बना।

गोलावर पंडे तो वे हैं जो बाभन बर्खन्दाज थे और कोलकट वे जिन्होने चेरो राजाओं से युद्ध में विजय प्राप्त कर अपनी जमींदारी बनायी थी।

बुकानन ने कोलों को विजित करने वाले जमींदार ब्राह्मण के जहानाबाद और अरवल क्षेत्र में वर्चस्व को उद्घाटित किया है।

विष्णुपद में आक्रमणकारियों के विरुद्ध दक्षिणार्क प्रांगण में भयावह युद्ध हुआ। सूर्य तडाग रक्त से भर गया। पर बाभन हार नहीं माने। परिणामतः आक्रान्ताओं को पीछे हटना पड़ा।

लगातार चलते इस संघर्ष में विजय मिली महाराजा किला ए द्रुम टेकार, भारद्वाज गोत्रोत्पन्न द्रोणोद्भव ( द्रोणविद्याविभूषितभूभोक्ता ब्राह्मण) विप्रराजेन्द्रवंशयशस्तितिलक
नृपेन्द्र त्रिभुवन सिंह को। वे गया के मुक्तिनायक हैं। हां स्वतंत्र गया के।

पुनः महाराज सुन्दर ने दो युद्धों में मुगल फौजदारों को रौंद डाला। फैजुल्ला खां की भीषण पराजय हुई। महाराजा ने कामदार खां की गया विध्वंस योजना को चुनोती भेजी। गया जी को अप्रतिम स्वाभिमान का विषय बनाते हुये जो संदेश सुन्दर सिंह ने भेजी इतिहास में किसी आक्रान्ता की विधर्मी योजना का ऐसा प्रत्युत्तर हमें नहीं दिखता।
आओ! बभनी घाट की पितृशिला का वंदन करें।
ओम् विष्णवे नमः।

आनंद वर्धन

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श्री जग्गनाथ जी


हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से एक जगन्नाथपुरी धाम मंदिर के दस चमत्कार!!!!!

माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्‍वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।

हिन्दुओं की प्राचीन और पवित्र 7 नगरियों में पुरी उड़ीसा राज्य के समुद्री तट पर बसा है। जगन्नाथ मंदिर विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी के पूर्वी छोर पर बसी पवित्र नगरी पुरी उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से थोड़ी दूरी पर है। आज का उड़ीसा प्राचीनकाल में उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। यहां देश की समृद्ध बंदरगाहें थीं, जहां जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, थाईलैंड और अन्य कई देशों का इन्हीं बंदरगाह के रास्ते व्यापार होता था।

पुराणों में इसे धरती का वैकुंठ कहा गया है। यह भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है। इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं। यहां लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं की थीं। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए।

सबर जनजाति के देवता होने के कारण यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। पहले कबीले के लोग अपने देवताओं की मूर्तियों को काष्ठ से बनाते थे। जगन्नाथ मंदिर में सबर जनजाति के पुजारियों के अलावा ब्राह्मण पुजारी भी हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा तक सबर जाति के दैतापति जगन्नाथजी की सारी रीतियां करते हैं।

पुराण के अनुसार नीलगिरि में पुरुषोत्तम हरि की पूजा की जाती है। पुरुषोत्तम हरि को यहां भगवान राम का रूप माना गया है। सबसे प्राचीन मत्स्य पुराण में लिखा है कि पुरुषोत्तम क्षेत्र की देवी विमला है और यहां उनकी पूजा होती है। रामायण के उत्तराखंड के अनुसार भगवान राम ने रावण के भाई विभीषण को अपने इक्ष्वाकु वंश के कुल देवता भगवान जगन्नाथ की आराधना करने को कहा। आज भी पुरी के श्री मंदिर में विभीषण वंदापना की परंपरा कायम है।

स्कंद पुराण में पुरी धाम का भौगोलिक वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार पुरी एक दक्षिणवर्ती शंख की तरह है और यह 5 कोस यानी 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। माना जाता है कि इसका लगभग 2 कोस क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में डूब चुका है। इसका उदर है समुद्र की सुनहरी रेत जिसे महोदधी का पवित्र जल धोता रहता है। सिर वाला क्षेत्र पश्चिम दिशा में है जिसकी रक्षा महादेव करते हैं।

शंख के दूसरे घेरे में शिव का दूसरा रूप ब्रह्म कपाल मोचन विराजमान है। माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा करते हैं। शंख के तीसरे वृत्त में मां विमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान है।

मंदिर का इतिहास :इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर आदिवासी विश्‍ववसु ने नीलमाधव के रूप में इनकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है।

राजा इंद्रदयुम्न ने बनवाया था यहां मंदिर :राजा इंद्रदयुम्न मालवा का राजा था जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न को सपने में हुए थे जगन्नाथ के दर्शन। कई ग्रंथों में राजा इंद्रदयुम्न और उनके यज्ञ के बारे में विस्तार से लिखा है।

उन्होंने यहां कई विशाल यज्ञ किए और एक सरोवर बनवाया। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। ‍तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा।

उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति। विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्‍ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है। चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया।

आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी। विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए। भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राज इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा।

भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए।

अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई।

लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया था। हालांकि इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 2 में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिसा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं।

पहला चमत्कार : – हवा के विपरीत लहराता ध्वज :श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा किस कारण होता है यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं लेकिन यह निश्‍चित ही आश्चर्यजनक बात है।

यह भी आश्‍चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है।

दूसरा चमत्कार : – गुंबद की छाया नहीं बनती :यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है।

हमारे पूर्वज कितने बड़े इंजीनियर रहे होंगे यह इस एक मंदिर के उदाहरण से समझा जा सकता है। पुरी के मंदिर का यह भव्य रूप 7वीं सदी में निर्मित किया गया।

तीसरा चमत्कार : – चमत्कारिक सुदर्शन चक्र :पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।

चौथा चमत्कार : – हवा की दिशा :सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है।

अधिकतर समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की ओर आती है, लेकिन यहां हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है।

पांचवां चमत्कार : – गुंबद के ऊपर नहीं उड़ते पक्षी :मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि देखा गया है कि भारत के अधिकतर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आते हैं।

छठा चमत्कार : – दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर :500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद। लगभग 20 लाख भक्त कर सकते हैं यहां भोजन। कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है। मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती।

मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। है न चमत्कार!

सातवां चमत्कार : – समुद्र की ध्वनि :मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।

इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।

आठवां चमत्कार : – रूप बदलती मूर्ति :यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं।

यहां प्रत्येक 12 साल में एक बार होता है प्रतिमा का नव कलेवर। मूर्तियां नई जरूर बनाई जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि उन मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गई हैं।

नौवां चमत्कार : – विश्‍व की सबसे बड़ी रथयात्रा :आषाढ़ माह में भगवान रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रानी गुंडिचा के घर जाते हैं। यह रथयात्रा 5 किलो‍मीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है। रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रदयुम्न की पत्नी थी इसीलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है।

अपनी मौसी के घर भगवान 8 दिन रहते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को वापसी की यात्रा होती है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष है। देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन है और भाई बलभद्र का रक्ष तल ध्वज है। पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू बुहारते हैं जिसे छेरा पैररन कहते हैं।

दसवां चमत्कार : – हनुमानजी करते हैं जगन्नाथ की समुद्र से रक्षा :माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे।

वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमानजी की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया। यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जगड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।

अंत में जानिए मंदिर के बारे में कुछ अज्ञात बातें…

महान सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर को दिए गए स्वर्ण से कहीं अधिक था।

  • पांच पांडव भी अज्ञातवास के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने आए थे। श्री मंदिर के अंदर पांडवों का स्थान अब भी मौजूद है। भगवान जगन्नाथ जब चंदन यात्रा करते हैं तो पांच पांडव उनके साथ नरेन्द्र सरोवर जाते हैं।
  • कहते हैं कि ईसा मसीह सिल्क रूट से होते हुए जब कश्मीर आए थे तब पुन: बेथलेहम जाते वक्त उन्होंने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए थे।
  • 9वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने यहां की यात्रा की थी और यहां पर उन्होंने चार मठों में से एक गोवर्धन मठ की स्थापना की थी।
  • इस मंदिर में गैर-भारतीय धर्म के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित है। माना जाता है कि ये प्रतिबंध कई विदेशियों द्वारा मंदिर और निकटवर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ और हमलों के कारण लगाए गए हैं। पूर्व में मंदिर को क्षति पहुंचाने के प्रयास किए जाते रहे हैं।
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कृष्ण जन्म भूमि


16 हजार 500 करोड़.. #कृष्ण_जन्मभूमि पर बने उस मंदिर की कीमत जिसे 1670 में औरंगजेब ने तोड़ा #कृष्ण जन्मभूमि पर जिस मंदिर को औरंगजेब ने तोड़ा था उसकी कीमत आज के हिसाब से 16 हजार 500 करोड़ रुपए थी । ये जानकर आपको आश्चर्य होगा लेकिन ये बात एकदम सत्य है 1489 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने कृष्ण जन्मभूमि पर बना मंदिर तुड़वा दिया था । 129 साल बाद ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने यहां पर भव्य मंदिर बनवाया था पद्मश्री से सम्मानित इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपनी किताब वासुदेव कृष्ण एंड मथुरा में बताया है कि वीर सिंह बुंदेला ने उस वक्त इस मंदिर को बनाने में 3 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च किए थे

इसी किताब में मीनाक्षी जैन ने बताया है कि साल 1608 में यानी वीर सिंह बुंदेला के समय में हिंदुस्तान में सोने की कीमत 10 रुपए तोला थी ।

राजा वीर सिंह बुंदेला ने 3 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च किए थे… ये रकम उस समय के हिसाब से 33 लाख तोला सोने के बराबर थी… आज एक तोला सोना करीब 50 हजार रुपए का है… इस हिसाब से आज 33 लाख तोले सोने की कीमत करीब 16 हजार 500 करोड़ बैठती है ।

इटली के यात्री Niccolao Manucci ने वीर सिंह बुंदेला के समय मथुरा आए थे और उन्होंने अपने यात्रा विवरण में था कि मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर का शिखर सोने का था… मंदिर इतना ऊंचा था कि आगरा से भी नजर आता था।
(Source-Manucci Voulume-2 पेज नंबर 154)

लेकिन इस भव्य मंदिर जो पूरी दुनिया में धीरे धीरे प्रसिद्ध हो रहा था… औरंगजेब की आंखों में बहुत चुभ रहा था… इसलिए 1670 ईस्वी में औरंगजेब ने ओरछा के राजा के द्वारा बनवाया हुआ मंदिर तोड़वा दिया
(स्वराज भारत)

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इस तस्वीर में नजर आने वाली इमारत को अधिकांश लोग #ताजमहल के नाम से जानते हैं। और इसमें मुख्य सफेद इमारत के दौनों तरफ लाल पत्थरों से बनीं 2 छोटी इमारतों को मस्जिद कहते हैं।

पर सत्य तो ये है कि ना तो ये सफेद इमारत कोई #कब्रगाह (ताजमहल) है और ना हीं ये 2 मस्जिदें हैं… बल्कि इस तस्वीर में दिखने वाली सफेद इमारत के बायें तरफ की इमारत ही मस्जिद है। दायें तरफ वाली इमारत को मेहमानखाना कहा जाता है।

यहां गौर करने वाली बात निम्न हैं :

1▪ मस्जिद में नमाज़ अता करते समय नमाजी का मुहं ठीक पश्चिम दिशा की ओर होता है, जबकि pस्लाम के मुताबिक नमाजी का मुहं ठीक काबा की तरफ होना चाहिये, और काबा इस इमारत के “उत्तर पश्चिम” में है — ना कि ठीक पश्चिम में, इससे नमाजी का मुहं काबा की तरफ नहीं बल्कि अफ्रीका के केन्या या घाना की तरफ होता है।

2▪ दूसरी (दाहिनी) तरफ की इमारत को #मेहमानखाना कहा जाता है और बताया जाता है कि इसका प्रयोग इस प्रांगण में आने वाले मेहमानों को ठहराने के लिये होता था। अब ये तो जाहिर है कि इस इमारत में शाही मेहमानों के अलावा तो किसी और को ठहराया नहीं जाता होगा, भला शाही इमारत में किसी और की क्या औकात जो आकर रुके? और भला किसी कब्र के पास कोई मेहमान क्यों रुकेगा? जबकि थोड़ी सी ही दूरी पर लाल किला है। जिस किले में 500 से ज्यादा महल हों, और पूरा शाही कुनबा रहता हो, उससे दूर आकर कब्रिस्तान में कोई मेहमान भला क्यों रुकेगा ?

3▪ पॉइंट नंबर 1 में जिस मस्जिद पर बात हुई है अगर आप गौर से देखें तो वो, बादशाह खुर्रम और बेगम अर्जुंमंद की कब्रों से करीब 20 फीट नीचे है, लगभग 2 मंजिल नीचे। क्या pस्लाम में अल्लाह के घर (मस्जिद) से ऊपर किसी और को जगह दी जा सकती है? क्या वाकई ये संभव है कि खुर्रम की शैतानी औलाद औरंगजेब, जो कट्टर pस्लामी था, जिसके लिये pस्लाम से ऊपर कुछ नहीं था, जिसनें अपने बाप को 8 साल पानी तक के लिये तड़पा दिया था, कैद करके सत्ता हथिया ली थी, अपने उसी बाप को किसी मस्जिद से 20 फीट ऊपर जगह दे ?

4 ▪सफेद इमारत के सफेद चबूतरे से पहले और सामनें और लाल रंग के मुख्य दरवाजे के बीच, जो बगीचा है, उसके ठीक बीच के दौनों तरफ 2 और इमारतें हैं। इनमें से एक में वर्तमान में म्यूजियम बनाया हुआ है और एक में कुछ प्रशासनिक कार्यालय। दस्तावेजों में इनको #नक्कारखाना और #आरामघर बताया गया है। अब आप ही सोचिये, नक्कारखाना – अर्थात वो जगह जहाँ ढोल और नगाड़े बजाये जाते हों, और आरामघर अर्थात जहां आप आराम कर सकते हों, की किसी कब्रिस्तान में क्या जगह ? क्या कब्रों पर ढोल, नगाड़े, शहनाई बजाई जाती है कहीं? जब मेहमानखाना बनाया हुआ है तो आरामघर अलग से किसके लिये बनाया गया होगा?

5▪ दुनिया के किसी भी अन्य मकबरे को गौर से देखियेगा कभी, कब्रें हमेशा बीच में मिलेंगी और बगीचे उनके चारों तरफ। आगरा में ही एत्माद्दौला, सिकंदरा को देख लीजिये, दिल्ली में हुमायूं का मकबरा देख लीजिये या कोई भी अन्य मकबरा, सभी कब्रें बीच में और बगीचे चारों तरफ ही मिलेंगे। जबकि यहां ? मुख्य मकबरा एक सिरे के ठीक बीच में, और बगीचा उसके ठीक सामनें जैसे कि दरबार में राजा की सीट और बाकी खुला दरबार।

6▪ वर्तमान में जो 3 प्रवेष द्वार हैं, वो तीनों जिस चौक में आकर खुलते हैं, उसके चारों तरफ़ छोटी-छोटी दुकानें जैसी बनी हैं। गाईड उनको हाथी और घोड़ों की पार्किंग बताते हैं पर ग्राउंड लेवल से उनकी उंचाई और आकार देखने से साफ पता चलता है कि ये हाथी-घोड़ों-गधों-खच्चरों-बैलों इत्यादि की पार्किंग नहीं हो सकती। ये बिल्कुल दुकानों या कार्यालयों जैसा है।

उक्त सभी पॉइंट बताते हैं कि ये भवन-प्रांगण – pस्लामी नहीं है। पॉइंट 1 और 2 में जिस मस्जिद और मेहमानखाना का जिक्र किया है मैनें वो असल में किसी भी अन्य शिव मंदिर की भांति, अन्य देवों के मंदिर थे। इनमें मुख्य रूप से श्री लक्ष्मीनारायण, श्री राधाकृष्ण और श्रीराम-जानकी के मंदिर थे।

नक्कार खाना और आरामघर असल में वही थे जो आज बताये जाते हैं। नक्कार खाने मेँ सदैव आरती के समय ढोल नगाड़े बजते रहते थे और भगवान की स्तुती, भजन होते रहते थे। आरामघर, मंदिर के पुजारियों, सेवकों इत्यादी के लिये रहने, भोजन करने की जगह और भक्तों के लिये प्रसाद तैय्यार करने की रसोई थी।

घोड़ों, हाथियों और अन्य जानवरों की पार्किंग असल में पूजा की सामग्री सहित अन्य वस्तुओं के विक्रय हेतू दुकानें थीं।

और सबसे मुख्य इमारत – मेरे महादेव का भव्य – विशाल, हिम की भांति श्वेत — #तेजोमहालय था।

विश्व के किसी भी पुराने शिव मंदिरर का प्रांगण देखीए, उसका नक्शा और इस प्रांगण का नक्शा एक दम समान मिलेगा आपको। दक्षिणी भारत के किसी भी मंदिर का नक्शा अभी गूगल कीजिये, वृहदेश्वर मंदिर हो, मदुरै मीनाक्षी मंदिर हो या अन्य कोई शिव मंदिर, चाहे कम्बोडिया स्थित अंगकोर वाट (विश्व के सबसे बड़े हिंदू मंदिर) का नक्शा देखिये, आपको तेजोमहालय का नक्शा भी एक दम वही मिलेगा।

आज बताया जाता है कि मुख्य सफेद इमारत मेँ खुर्रम और अर्जुमंद की 2 -2 कब्रें हैं। ऊपर की मंजिल मेँ नकली और ठीक नीचे की मंजिल पर हू-ब- हू असली। अब भला आप ही बताइए कि किसी भी मकबरे में 1 ही मुर्दे की 2 कब्रें देखी हैं कभी ? असल में इस इमारत में गुंबद के ठीक बीचोंबीच महादेव की पिन्डी स्थित है, जिसके चारों ओर शिव परिवार स्थापित था। पहले खुर्रम और बाद में औरंगजेब नें पिण्डी को ढकने के लिये कब्र के आकार में पैक कर दिया और अन्य प्रतिमाओं को हटा के नीचे की अन्य मंजिलों में (मुख्य सफेद इमारत 6 मंजिला है) रखवा के बंद कर दिया है। खुर्रम की कब्र, पिण्डी से एक मंजिल ऊपर एक नया प्लेटफॉर्म बना के इस पर बनवाई गई है।

इसके अलावा भी अनेकों ऐसे भौतिक साक्ष्य आज भी वहां जीवित हैं जो इस प्रांगण को ताजमहल नहीं अपितु तेजोमहालय होने की बात को सत्यापित करते हैं।

आर्यावर्तकाअघोर_अतीत

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महाप्रभु जगन्नाथ


भगवान् कृष्ण ने जब देह छोड़ी तो उनका अंतिम संस्कार किया गया , उनका सारा शरीर तो पांच तत्त्व में मिल गया,लेकिन उनका हृदय बिलकुल सामान्य एक जिन्दा आदमी की तरह धड़क रहा था और वो बिलकुल सुरक्षित था , उनका हृदय आज तक सुरक्षित है, जो भगवान् जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के अंदर रहता है और उसी तरह धड़कता है , ये बात बहुत कम लोगो को पता है,

महाप्रभु का महा रहस्य
सोने की झाड़ू से होती है सफाई……

महाप्रभु जगन्नाथ(श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है…. पुरी(उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते है, मगर रहस्य ऐसे है कि आजतक कोई न जान पाया,

हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है, यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है,लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है,उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता,

मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है…पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है…पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है..वो पुरानी मूर्ती से “ब्रह्म पदार्थ” निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है…ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आजतक किसी को नही पता…इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है,

ये एक अलौकिक पदार्थ है जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए… इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है…मगर ये क्या है ,कोई नही जानता,भगवान जगन्नाथ और अन्य प्रतिमाएं उसी साल बदली जाती हैं, जब साल में आसाढ़ के दो महीने आते हैं। 19 साल बाद यह अवसर आया है,वैसे कभी-कभी 14 साल में भी ऐसा होता है, इस मौके को नव-कलेवर कहते हैं,

मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया की महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ???

कुछ पुजारियों का कहना है कि जब हमने उसे हाथ में लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था…आंखों में पट्टी थी…हाथ मे दस्ताने थे तो हम सिर्फ महसूस कर पाए,
आज भी हर साल जगन्नाथ यात्रा के उपलक्ष्य में सोने की झाड़ू से पुरी के राजा खुद झाड़ू लगाने आते है,

भगवान जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती, जबकि आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देंगी,

आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे-उड़ते देखे होंगे, लेकिन जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता,झंडा हमेशा हवा की उल्टी दिशामे लहराता है,
दिन में किसी भी समय भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती,

भगवान जगन्नाथ मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदला जाता है, ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा,

इसी तरह भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है, जो हर दिशा से देखने पर आपके मुंह आपकी तरफ दीखता है,

भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, जिसे लकड़ी की आग से ही पकाया जाता है, इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है।

भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है और भी कितनी ही आश्चर्यजनक चीजें हैं, हमारे सनातन धर्म की।
जय हो सनातन धर्म की 🙏🙏

🚩 श्री जगन्नाथ जी की जय 🚩

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श्रीखंड महादेव


भगवान शिव की वो यात्रा जो अमरनाथ से भी कठिन है

हिमालय पर्वत की बर्फीली चोटिओं पर भगवान शिव का निवास स्थान है. आपने अमरनाथ केदारनाथ और कैलाश मानसरोवर के बारे में तो सुना होगा लेकिन इन सबसे भी आगे पर्वतों की चोटी पर स्थित भगवान शिव के इस रोचक स्थान श्रीखंड महादेव के बारे में नहीं सुना होगा. यहां हर कोई जाना चाहता है. यह वह स्थान हैं जहां भगवान शिव भस्मासुर से बचने के लिए छिपे थे.

कहते हैं कि भस्मासुर राक्षस ने कई वर्षों तक भगवान शिव की कड़ी तपस्या की थी. उसकी तपस्या से खुश होकर भगवान भोलेनाथ ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा.

भगवान शिव का यह प्रश्न सुनकर भस्मासुर ने कहा कि मुझे ऐसा वरदान चाहिए कि जिस जीव के सिर पर वह हाथ रखे वह उसी समय भस्म हो जाए. भगवान भोलेनाथ ने उसे यह वरदान दे दिया.

यह वरदान पाने के बाद भस्मासुर घमंड से भर गया और उसने भगवान शिव को ही जलाने की सोच ली. इससे बचने के लिए भगवान शिव को निरंमंड के देओढ़ांक में स्थित एक गुफा में छिपना पड़ा. कई महीनों तक भगवान शिव इसी गुफा में रहे.

उधर, भगवान विष्णु ने भगवान शिव को बचाने और भस्मासुर का अंत करने के लिए मोहिनी नाम की एक सुंदर महिला का रूप धारण कर लिया. भस्मासुर मोहिनी के सौंदर्य को देखकर मोहित हो गया. मोहिनी ने भस्मासुर को अपने साथ नृत्य करने को कहा. भस्मासुर भी तैयार हो गया. वह मोहिनी के साथ नृत्य करने लगा. इसी बीच चतुराई दिखाते हुए मोहिनी ने नृत्य के दौरान अपना हाथ सिर पर रखा. इसे देखकर भस्मासुर ने जैसे ही अपना हाथ अपने सिर पर रखा वही उसी समय राख में बदल गया.

भस्मासुर का नाश होने के बाद सभी देवता ढांक पहुंचे और भगवान शिव से बाहर आने की प्रार्थना की. महर भोलेनाथ एक गुफा में फंस गए. यहां से वह बाहर नहीं निकल पा रहे थे. वह एक गुप्त रास्ते से होते हुए इस पर्वत की चोटी पर शक्ति रूप में प्रकट हो गए.

जब भगवान शिव यहां से जाने लगे तो यहां एक धमाका हुआ उस धमाके में एक विशाल आकार की एक शिला बच गई. इसे शिवलिंग मानकर पूजा जाने लगा. इसके साथ ही दो बड़ी चट्टाने हैं जिन्हें मां पार्वती और भगवान गणेश के नाम से पूजा जाता है.

इस मार्ग में पार्वती बाग नाम की जगह आती है. ऐसा माना जाता है कि सबसे दुर्लभ ब्रह्म कमल भी यहीं पाए जाते हैं.

यहां पार्वती झरना भी दर्शनीय है। मां पार्वती इस झरने का स्नानागार के रूप में इस्तेमाल करती थीं।
श्रीखंड महादेव जाते वक्त रास्ते में खास तरह की चट्टानें भी मिलती हैं जिन पर कुछ लेख लिखे हैं। कहा जाता है भीम ने स्वर्ग जाने के लिए सीढ़ियां बनाने के लिए इनका इस्तेमाल किया था। मगर समय की कमी के कारण पूरी सीढ़ियां नहीं बन पाई।

ओली अमित

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कृष्ण जन्म भूमि


16 हजार 500 करोड़…. कृष्ण जन्मभूमि पर बने उस मंदिर की कीमत जिसे 1670 में औरंगजेब ने तोड़ा था

-कृष्ण जन्मभूमि पर जिस मंदिर को औरंगजेब ने तोड़ा था उसकी कीमत आज के हिसाब से 16 हजार 500 करोड़ रुपए थी । ये जानकर आपको आश्चर्य होगा लेकिन ये बात एकदम सत्य है

-1489 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने कृष्ण जन्मभूमि पर बना मंदिर तुड़वा दिया था । 129 साल बाद ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने यहां पर भव्य मंदिर बनवाया था

-पद्मश्री से सम्मानित इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपनी किताब वासुदेव कृष्ण एंड मथुरा में बताया है कि वीर सिंह बुंदेला ने उस वक्त इस मंदिर को बनाने में 3 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च किए थे

  • इसी किताब में मीनाक्षी जैन ने बताया है कि साल 1608 में यानी वीर सिंह बुंदेला के समय में हिंदुस्तान में सोने की कीमत 10 रुपए तोला थी ।
  • राजा वीर सिंह बुंदेला ने 3 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च किए थे… ये रकम उस समय के हिसाब से 33 लाख तोला सोने के बराबर थी… आज एक तोला सोना करीब 50 हजार रुपए का है… इस हिसाब से आज 33 लाख तोले सोने की कीमत करीब 16 हजार 500 करोड़ बैठती है ।
  • इटली के यात्री Niccolao Manucci ने वीर सिंह बुंदेला के समय मथुरा आए थे और उन्होंने अपने यात्रा विवरण में था कि मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर का शिखर सोने का था… मंदिर इतना ऊंचा था कि आगरा से भी नजर आता था।
    (Source-Manucci Voulume-2 पेज नंबर 154)
  • लेकिन इस भव्य मंदिर जो पूरी दुनिया में धीरे धीरे प्रसिद्ध हो रहा था… औरंगजेब की आंखों में बहुत चुभ रहा था… इसलिए 1670 ईस्वी में औरंगजेब ने ओरछा के राजा के द्वारा बनवाया हुआ मंदिर तोड़वा दिया ।
  • मित्रों… मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि पर छोटे-छोटे लेखों की एक सीरीज़ हम व्हाट्सएप पर प्रकाशित करवा रहे हैं… आपसे अनुरोध है कि आप इसे अपने सभी मित्रों… रिश्तेदारों… पारिवारिक ग्रुपों और व्हाट्सएप ग्रुपों में जरूर भेंजें

धन्यवाद
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