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🌺पितृ पक्ष विशेषांक🌺
पितृ पक्ष (श्राद्ध करने की विधि)
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🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
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पितृलोक से पृथ्वी लोक पर पितरो के आने का मुख्य कारण उनकी पुत्र-पौत्रादि से आशा होती है की वे उन्हें अपनी यथासंभव शक्ति के अनुसार पिंडदान प्रदान करे अतएवं प्रत्येक सद्गृहस्थ का धर्म है कि स्पष्ट तिथि के अनुसार श्राद्ध अवस्य करे यदि पित्र पक्ष मे परिजनों का श्राद्ध नहीं किया गया तो वे श्राप दे देते हैं और ये परिवार के सदस्यों पर अपना प्रभाव छोड़ सकता है जिससे हानि होनी ही होनी है। अतः इस पक्ष में श्राद्ध अवश्य किया जाना चाहिये।

श्राद्ध में पंचबली की महता:
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️पित्र पक्ष में ब्राह्मण भोजन और जलमिश्रित तिल से तर्पण करने जितना ही
अनिवार्य पञ्चबलि भी है पञ्चबलि का नियम कुछ इस प्रकार है।

एक थाली के पांच भिन्न भिन्न भाग करके थोड़े थोड़े सभी प्रकार के भोजन को परोसकर हाथ मे तिल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प करते समय निम्न का उचारण करे: अद्यामुक गोत्र अमुक शर्माऽहं/वर्माऽहं/गुप्तोहं/दासोऽहं अमुकगोत्रस्य मम पितुः/मातु आदि वार्षिकश्राद्धे (महालयश्राद्धे) कृतस्य पाकस्य शुद्ध्यर्थं पंचसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पंचबलिदानं करिष्ये।

पंचबलि-विधि इस प्रकार है:
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(1)👉 गोबलि (पत्ते पर)
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ऊँ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्वन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः।। इदं गोभ्यो न मम।
सव्य होकर इस श्लोक का उचारण पश्चिम दिशा की और पुष्प और पते को दिखाकर करे। पंचबली का एक निहित भाग गाय को खिलायें।

(2)👉 श्वानबलि (पत्ते पर)
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द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोöवौ। ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ।। इदं श्वभ्यां न मम।

इस श्लोक का उचारण कुत्तों को बलि देने के लिए करे। इस पंचबलि के समय जनेऊ गले में कण्ठी करें ।

(3)👉 काकबलि (पृथ्वी पर)
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ऊँ ऐन्द्रवारूणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्वन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।। इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।
जनेऊ अपसव्य करके
इस श्लोक का उच्चारण कौओं को भूमि पर अन्न देने के लिए करे। पंचबली का एक निहित भाग कौओं के लिये छत पर रख दें।

(4)👉 देवादिबलि (पत्ते पर)
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ऊँ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।। इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।
सव्य होकर इस श्लोक का उचारण देवता आदि के लिय अन्न देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग अग्नि को समर्पित कर दें। अथवा यह भी गाय को ही खिला दें।

(5)👉 पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर)
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पिलीलिकाः कीटपतंगकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।। इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।

इस श्लोक का उच्चारण चींटी आदि को बलि देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग चींटियों के लिये रख दें पंचबलि देने के बाद एक थाल मे खाना परोस कर निम्न मंत्र का उच्चारण कर ब्राह्मणों के पैर धोकर सभी व्यंजनों का भोजन करायें।

यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे।
तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पाद सेचने।।

इसे बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करें। तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें

यजमान 👉 शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। (श्राद्ध में बचे अन्न का क्या करूँ?)

ब्राह्मण 👉 इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करें।) इसके बाद अपने परिवार वालों के साथ स्वयं भी भोजन करें तथा निम्न मंत्र द्वारा भगवान् को नमस्कार करें
👇
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई बार विधि पूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं।

श्राद्धकर्म के नियम
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1👉 श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।

2👉 श्राद्ध में चांदी के बर्तन का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

3👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए गए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

4👉 ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।

5👉 जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

6👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

7👉 श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

8👉 दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

9👉 चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।

10👉 जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।

11👉 श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।

12👉 शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

13👉 श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।

14👉 रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

15👉 श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोना, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।

16👉 तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

17👉 रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

18👉 चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।

19👉 भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ।

20👉 श्राद्ध के प्रमुख अंग
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तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान:👉 पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान👉 वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।

दक्षिणा दान👉 यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।

21👉 श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।

22👉 पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।

23👉 तैयार भोजन में से गाय, कुत्ता कौआ, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

24👉 कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।

25👉 ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

26👉 पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करें या सबसे छोटा।

भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि, पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं, और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं, इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, गुरु या नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं, जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं। पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।

सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं।

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा👉 इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।

पंचमी👉 जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।

नवमी👉 सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि, इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

एकादशी और द्वादशी👉 एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।

चतुर्दशी👉 इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है, जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।

सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या👉 किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए, यही उचित भी है।

पिंडदान करने के लिए👉 सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।
विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है।

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।। (वायु पुराण)

श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊर्ध्व कक्षा में पितृलोक है, जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है, उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संधान से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है।
सनातन मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास भ्रमण करता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है, इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है, और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते हैं तो, जीवन की बहुत सी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये जाने चाहिएं।
ऐसा कुछ भी नहीं है कि, इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है, वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर, उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है, जिस योनि में वह प्राणी इस समय है।
पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत भाग को प्राप्त करता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो, श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो, वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करता है। यदि नाग योनि में है तो, श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति देता है। दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना प्रकार के अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करता है। अगर किसी की जन्मकुंडली में पितृदोष है तो, जन्म कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें।
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🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
श्री रमा वैकुंठ आचार्य संस्कृत महाविद्यालय पुष्कर राजस्थान
8696955216🙏🏻9460611280

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🚩 શ્રાદ્ધની સમજ 🚩

આ સૃષ્ટી એટલે કે પૂરા બ્રહ્માંડને ૧૨ રાશિથી બાંધ્યું છે. તેમાં મેષ રાશિને સમગ્ર વિશ્વનું પ્રવેશદ્વાર માનવામાં આવે છે અને તેજ પ્રમાણે મીન રાશિ મોક્ષનું દ્વાર માનવામાં આવે છે.

આ મીન રાશિ બ્રહ્મલોક કે દેવલોક સાથે જોડાયેલી છે જ્યારે કન્યા રાશિ પિતૃલોક કે ચંદ્રલોક સાથે જોડાયેલી છે

હવે ખગોળ શાસ્ત્રના આધારે ૧૫ જુલાઈ પછી સૂર્યદેવતાની દક્ષિણયાત્રાની શરૂઆત થાય છે જેને આપણે દક્ષિણાયણના સૂર્ય કહીયે છીએ.

આ દક્ષિણાયનના સૂર્ય ધીમે ધીમે કન્યા રાશિ અને તુલા રાશિ તરફ જાય છે અને ત્યાં પિતૃલોકને જગાડે છે.

આ દક્ષિણાયનના સૂર્યની યાત્રા ૧૫ સપ્ટેમ્બર પછી કન્યા રાશિમાં પ્રવેશે છે ત્યારે પાતાળલોકમાં રહેલા પ્રેતયોનીને જાગ્રત કરે છે.

હવે સમજવાની વાત એ છે કે સંસારમાં મૃત આત્માની ગતિ બે રીતની હોય છે.

જેઓ સંતકક્ષાના અને પુણ્યશાળી જીવો હોય તેઓ મરણ બાદ દેવયાન તરફ ગતિ કરે છે અને અતૃપ્ત આત્મા પ્રેતયાન તરફ ગતિ કરે છે. દેવયાનનો સીધો સંબંધ સૂર્ય સાથે હોય છે અને પ્રેતયાનનો સબંધ ચંદ્ર સાથે હોય છે ચંદ્ર સૂક્ષ્મ જગતને સંભાળે છે અને તેથી ચંદ્રલોકને પિતૃલોક પણ કહેવાય છે.

શાસ્ત્રમાં વર્ણવ્યા મુજબ ચંદ્રની ૧૬ કળા છે આ ૧૬ કળા આપણા હિન્દૂ પંચાગની ૧૬ તીથી સાથે જોડાયેલી છે પુનમથી અમાસ ૧૬ તીથી હોય છે તેમ સુદ અને વદ ની તમામ તીથી રિપીટ થાય છે.

આમ મૃત્યુ પછી આત્મા જે તિથિએ મરણ પામે તે મુજબ ચંદ્રની કળામાં સ્થાન પામે છે. એકમનું મરણ થયું હોય તે પહેલી કળામાં, તે મુજબ જે પણ તિથિએ મરણ પામે તે ચંદ્રની કળા માં સ્થાન પામે છે.

જ્યારે સૂર્ય કન્યા રાશિમાં આવે છે ત્યારે ભાદરવા સુદ પૂનમ આવી જાય છે અને તે ચંદ્રલોકમાં પિતૃઓને જગાડે છે. તે સમયે ચંદ્રની ૧૫મી કળાના દ્વાર ઉઘડી જાય છે અને તેમાં રહેલા પિતૃ પૃથ્વી પરના તેમના સંબંધીને ત્યાં જઈ શકે તેવી વ્યવસ્થા છે. આમ પુનમથી પછી દરેક કળાના દ્વાર ખુલતા જાય છે અને તેમાં વસતા પિતૃઓ પોતપોતાના ઘરે આવવા શક્તિમાન બને છે.

ચંદ્રનું આધિપત્ય દૂધ અને ખીરનું રહેલું હોવાથી શ્રાદ્ધ પક્ષમાં દૂધપાક કે ખીરનું મહત્વ વિશેષ છે.

આમ દરેક પિતૃ તેમના નજીકના સ્વજન પુત્ર કે પૌત્રના ઘરે આવે છે અને શ્રાદ્ધ પામી સંતૃપ્ત થાય છે અને આશીર્વાદ આપતા જાય છે જે પરિવાર કુટુંબની ઉન્નતિ કરે છે. જે પિતૃનું શ્રાદ્ધ કરવામાં નથી આવતું તે અતૃપ્ત અવસ્થામાં પાછા જાય છે અને મનોમન ઉદાસ બની જાય છે તેનું વિપરીત પરિણામ કુટુંબને ભોગવવું પડતું હોય છે.

અતૃપ્ત પિતૃ ફરી એકવાર અમાવસયાને દિવસે અચૂક પાછા પોતાના સ્વજનના ઘરે આવે છે જેથી તેને આપણે સર્વપિતૃ અમાવાસ્યા કહીયે છીએ. આ દિવસે ભૂલ્યાચૂક્યાં દરેક પિતૃનું શ્રાદ્ધ નો મહિમા ઘણો છે અને તે અનાયાસે બાકી રહેલા પિતૃઓને સંતૃપ્ત કરવાનો મોકો મળે છે.

આથી દરેક પરિવારે શ્રાદ્ધ કરવું જ જોઈએ તે દિવસે બ્રાહ્મણ, બહેન દીકરી અને ભાણેજોને જમાડી શક્તિમુજબ દક્ષિણા આપવાથી અને કાગવાસ નાખવાથી પિતૃને પહોંચે છે .
આ હકીકત શાસ્ત્ર આધારિત છે અને સૌ જન આમાં શ્રધ્ધા રાખી કરે તે માટે તેને શ્રાદ્ધ નામ આપવામાં આવ્યું છે.

શક્ય છે કે આજ ના દિવસો માં ઉપરોક્ત જ્ઞાન જો હોય તો કદાચ શ્રાદ્ધ ની પ્રવૃત્તિ નું માહાત્મ્ય ખબર પડે….

🙏🏻 પિતૃ દેવો ભવઃ 🙏🏻

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🌹 पद्मा एकादशी : 17 सितंबर 2021
🎥https://youtu.be/x0yOImm4ZfQ

🌹 युधिष्ठिर ने पूछा : केशव ! कृपया यह बताइये कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है, उसके देवता कौन हैं और कैसी विधि है?

🌹 भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें आश्चर्यजनक कथा सुनाता हूँ, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद से कहा था ।

🌹 नारदजी ने पूछा : चतुर्मुख ! आपको नमस्कार है ! मैं भगवान विष्णु की आराधना के लिए आपके मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

🌹 ब्रह्माजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । क्यों न हो, वैष्णव जो ठहरे ! भादों के शुक्लपक्ष की एकादशी ‘पधा’ के नाम से विख्यात है । उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा होती है । यह उत्तम व्रत अवश्य करने योग्य है । सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि हो गये हैं । वे अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया करते थे । उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था, मानसिक चिन्ताएँ नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था । उनकी प्रजा निर्भय तथा धन धान्य से समृद्ध थी । महाराज के कोष में केवल न्यायोपार्जित धन का ही संग्रह था । उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने अपने धर्म में लगे रहते थे । मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देनेवाली थी । उनके राज्यकाल में प्रजा को बहुत सुख प्राप्त होता था ।

🌹 एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर राजा के राज्य में तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई । इससे उनकी प्रजा भूख से पीड़ित हो नष्ट होने लगी । तब सम्पूर्ण प्रजा ने महाराज के पास आकर इस प्रकार कहा :

🌹 प्रजा बोली: नृपश्रेष्ठ ! आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए । पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नार’ कहा है । वह ‘नार’ ही भगवान का ‘अयन’ (निवास स्थान) है, इसलिए वे ‘नारायण’ कहलाते हैं । नारायणस्वरुप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापकरुप में विराजमान हैं । वे ही मेघस्वरुप होकर वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है । नृपश्रेष्ठ ! इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, अत: ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे हमारे योगक्षेम का निर्वाह हो ।

🌹 राजा ने कहा : आप लोगों का कथन सत्य है, क्योंकि अन्न को ब्रह्म कहा गया है । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जगत जीवन धारण करता है । लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराण में भी बहुत विस्तार के साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है, किन्तु जब मैं बुद्धि से विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं दिखायी देता । फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूर्ण प्रयत्न करुँगा ।

🌹 ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने गिने व्यक्तियों को साथ ले, विधाता को प्रणाम करके सघन वन की ओर चल दिये । वहाँ जाकर मुख्य मुख्य मुनियों और तपस्वियों के आश्रमों पर घूमते फिरे । एक दिन उन्हें ब्रह्मपुत्र अंगिरा ॠषि के दर्शन हुए । उन पर दृष्टि पड़ते ही राजा हर्ष में भरकर अपने वाहन से उतर पड़े और इन्द्रियों को वश में रखते हुए दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनि ने भी ‘स्वस्ति’ कहकर राजा का अभिनन्दन किया और उनके राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी । राजा ने अपनी कुशलता बताकर मुनि के स्वास्थय का समाचार पूछा । मुनि ने राजा को आसन और अर्ध्य दिया । उन्हें ग्रहण करके जब वे मुनि के समीप बैठे तो मुनि ने राजा से आगमन का कारण पूछा ।

🌹 राजा ने कहा : भगवन् ! मैं धर्मानुकूल प्रणाली से पृथ्वी का पालन कर रहा था । फिर भी मेरे राज्य में वर्षा का अभाव हो गया । इसका क्या कारण है इस बात को मैं नहीं जानता ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! सब युगों में उत्तम यह सत्ययुग है । इसमें सब लोग परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं तथा इस समय धर्म अपने चारों चरणों से युक्त होता है । इस युग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे लोग नहीं । किन्तु महाराज ! तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या करता है, इसी कारण मेघ पानी नहीं बरसाते । तुम इसके प्रतिकार का यत्न करो, जिससे यह अनावृष्टि का दोष शांत हो जाय ।

🌹 राजा ने कहा : मुनिवर ! एक तो वह तपस्या में लगा है और दूसरे, वह निरपराध है । अत: मैं उसका अनिष्ट नहीं करुँगा । आप उक्त दोष को शांत करनेवाले किसी धर्म का उपदेश कीजिये ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! यदि ऐसी बात है तो एकादशी का व्रत करो । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो ‘पधा’ नाम से विख्यात एकादशी होती है, उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय ही उत्तम वृष्टि होगी । नरेश ! तुम अपनी प्रजा और परिजनों के साथ इसका व्रत करो ।

🌹 ॠषि के ये वचन सुनकर राजा अपने घर लौट आये । उन्होंने चारों वर्णों की समस्त प्रजा के साथ भादों के शुक्लपक्ष की ‘पधा एकादशी’ का व्रत किया । इस प्रकार व्रत करने पर मेघ पानी बरसाने लगे । पृथ्वी जल से आप्लावित हो गयी और हरी भरी खेती से सुशोभित होने लगी । उस व्रत के प्रभाव से सब लोग सुखी हो गये ।

🌹 भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! इस कारण इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए । ‘पधा एकादशी’ के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढकँकर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए, साथ ही छाता और जूता भी देना चाहिए । दान करते समय निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए :

*नमो नमस्ते गोविन्द *बुधश्रवणसंज्ञक ॥*
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव ।
भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥

‘बुधवार और श्रवण नक्षत्र के योग से युक्त द्वादशी के दिन बुद्धश्रवण नाम धारण करनेवाले भगवान गोविन्द ! आपको नमस्कार है… नमस्कार है ! मेरी पापराशि का नाश करके आप मुझे सब प्रकार के सुख प्रदान करें । आप पुण्यात्माजनों को भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा सुखदायक हैं |’

राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।


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🙏🙏 ઋષિપાંચમ 🙏🙏

આજે ઋષિપાંચમ છે. આપણાં સુખ અને સમૃદ્ધિની સતત ચિંતા કરનારા આપણાં મહાન ઋષિઓ અને આપણાં પ્રતાપી પૂર્વજોનું સ્મરણ કરવાનો દિવસ.

સપ્તમ મનવન્તરના 7 ઋષિઓએ માનવજાતને સુખી અને સમૃદ્ધ બનાવવા માટે અદ્વિતીય યોગદાન આપ્યું છે. આજે આ સાત ઋષિઓનું સ્મરણ કરી એમના જીવનમાંથી પ્રેરણા પ્રાપ્ત કરવાનું પર્વ છે. નવી પેઢીને આ સાત ઋષિનો પાતળો પરિચય જરૂરથી આપજો.

1. કશ્યપ ઋષિ🙏
બ્રહ્માજીના માનસપુત્ર એવા મરીચિ ઋષિના તેઓ પુત્ર છે. સૃષ્ટિના સર્જનમાં એમણે આપેલા યોગદાનને લીધે એમને પ્રજાપતિ તરિકે પણ ઓળખવામાં આવે છે. આજે પણ ધાર્મિક વિધિ વખતે જો કોઈને એના ગોત્રની જાણ ન હોય તો કશ્યપ ગોત્ર તરીકે ઓળખ અપાય છે.

2. અત્રિ ઋષિ🙏
અત્રિ ઋષિના પત્ની અનસૂયાની કથા સૌ કોઈએ સાંભળી જ હશે જેમને બ્રહ્મા, વિષ્ણુ અને મહેશને પોતાના તપના પ્રભાવથી નાના બાળક બનાવી દીધા હતા. મહાન અત્રિ ઋષિ ભગવાન દત્તાત્રેય અને દુર્વાસા ઋષિના પિતા છે. એમના ત્રીજા પુત્ર સોમે સોમનાથ જ્યોતિર્લિંગની સ્થાપના કરી હતી.

3.વસિષ્ઠ ઋષિ🙏
વસિષ્ઠજી રઘુવંશના કુલગુરુ હતા એ રીતે તેઓ ભગવાન શ્રીરામના કુલ ગુરુ હતા. તેઓ મહાન ઋષિ પરાસરના દાદા અને મહાભારત સહિત અનેક ગ્રંથોના રચયિતા વેદવ્યાસજીના પરદાદા થાય.

4.વિશ્વામિત્ર ઋષિ🙏
વિશ્વામિત્ર રાજવી હતા અને રાજપાટ છોડીને સન્યાસી થયા હતા. ભગવાન પરશુરામના પિતા એવા જમદગ્નિ ઋષિના તેઓ મામા થાય. જમદગ્નિ ઋષિના માતા સત્યવતી અને વિશ્વામિત્ર બંને ગાઘી રાજાના સંતાનો હતા.

5.ગૌતમ ઋષિ🙏
ગૌતમ ઋષિને ન્યાયશાસ્ત્રના પંડિત કહેવામાં આવે છે. રસાયણ વિજ્ઞાન સહિતના જુદા જુદા વિષયોના તેઓ જ્ઞાતા હતા. એમના દીકરી અંજની એટલે હનુમાનજીના માતા. આમ ગૌતમ ઋષિ હનુમાનજીના નાના થાય.

6.જમદગ્નિ ઋષિ🙏
તેઓ રુચિક ઋષિના પુત્ર હતા. વિશ્વામિત્રના બહેન સત્યવતીના સંતાન એટલે વિશ્વામિત્ર ઋષિના ભાણેજ થાય. માતા સત્યવતી તેઓને તપસ્વી બનાવવા માંગતા હતા પરંતુ તેનામાં ક્ષત્રિય જેવા શૂરવીરના લક્ષણો હતા. ભગવાન પરશુરામ એમના પુત્ર હતા.

7. ભરદ્વાજ ઋષિ🙏
ભરદ્વાજ ઋષિ યંત્ર વિજ્ઞાનના નિષ્ણાત હતા. તેઓએ લખેલા ‘વૈમાનિકમ્’ નામના ગ્રંથમાં વિમાન બનાવવાની પદ્ધતિનું વિગતવાર વર્ણન કરેલ છે. ‘યંત્ર સર્વસ્વમ’ નામના ગ્રંથમાં યંત્રોના વિજ્ઞાનની વાતો લખી છે. ભરદ્વાજ ઋષિના પુત્ર દ્રોણ કૌરવો અને પાંડવોના ગુરુ હતા.

ઋષિપંચમીના પાવન પર્વે આ સપ્તર્ષિ સહિત આપણાં દિવંગત પૂર્વજોના ચરણોમાં
🙏🙏🙏 🙏🙏
@જયેશભાઈ માલવી (પ્રજાપતિ)

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आज मनाई जाएगी ऋषि पंचमी
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🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
8696955216
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जय श्री कृष्णा दोस्तों
आज यानी 11 सितम्बर को ऋषि पंचमी है। ऋषि पंचमी का व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी को किया जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। यह व्रत गणेश चतुर्थी के अगले दिन और हरतालिका तीज के दूसरे दिन किया जाता है। इस व्रत के बारे में ब्रह्माजी ने राजा सिताश्व को बताया था। एक बार राजा सिताश्व ने ब्रह्माजी से ऐसे व्रत के बारे में जानना चाहा जिसके करने से प्राणियों के समस्त पापों का नाश हो जाता है। तब ब्रह्माजी ने उन्हें ऋषि पंचमी के व्रत के बारे में बताया।

ऋषि पंचमी व्रत कथा


विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे।

एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है?
उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं।
धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी।

पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।

ऋषि पंचमी पूजा विधि

ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं घर में साफ-सफाई करके पूरे विधि विधान से सात ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करती हैं। सप्त ऋषियों की हल्दी, चंदन, पुष्प अक्षत आदि से पूजा करके उनसे क्षमा याचना कर सप्तऋषियों की पूजा की जाती है। पूरे विधि- विधान से पूजा करने के बाद ऋषि पंचमी व्रत कथा सुना जाता है तथा पंडितों को भोजन करवाकर कर व्रत का उद्यापन किया जाता है।

ऋषि पंचमी पूजा में इन मंत्रों का करें जाप

कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:।।
गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।

ऋषि पंचमी व्रत फल

इस दिन व्रत रखकर पूरे विधि- विधान से सप्तर्षियों की पूजा करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। अविवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत बेहद महत्त्वपूर्ण और फलकारी माना जाता है। इस दिन हल से जोते हुए अनाज को नहीं खाया जाता अर्थात जमीन से उगने वाले अन्न ग्रहण नहीं किए जाते हैं।
ऋषि पंचमी का व्रत करने से अत्यंत लाभ प्राप्त होता है, यह व्रत करने से महिलाओं को मासिक धर्म में हुई जाने अनजाने में हुई गलतियों के दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है। ऋषि पंचमी का व्रत करके महिलाएं जान- अनजाने में हुए पापों से मुक्ति पा सकती है। वैसे भी यह व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए ही है। यह व्रत करके महिलाएं अपने जीवन के कई दोषों से मुक्ति पा सकते हैं। इस दिन सप्तऋषियों के साथ- साथ गुरु वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती है।

ऋषि पंचमी व्रत के लाभ

  1. ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाएं मासिक धर्म में हुई धार्मिक गलतियों और दोषों से रक्षा के लिए करती हैं। माना जाता है यह व्रत करने से इन सभी दोषों से मुक्ति मिल जाती है।
  2. ऋषि पंचमी के व्रत में अपामार्ग (आंधीझाड़ा)के पौधे को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन अपामार्ग के पौधे से दातुन और स्नान करने के उपरातं ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है। ऋषि पंचमी का यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।
  3. ऋषि पंचमी का व्रत प्रत्येक वर्ग की महिला कर सकती है। इस व्रत के पुण्यफल से सभी प्रकार के पापों का क्षय होता है। इसलिए यह व्रत महिलाओं के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
  4. ऋषि पंचमी का यह व्रत सुहागन स्त्रियों के साथ-साथ कुंवारी कन्याएं भी कर सकती है लेकिन यह व्रत मनोवांछित और योग्य वर पाने के लिए नहीं किया जाता बल्कि अन्य दोषों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है।
  5. ऋषि पंचमी के दिन गंगा स्नान को अधिक महत्व दिया जाता है। इसलिए गंगा स्नान अवश्य करें और उसके बाद ही सप्तऋषि की पूजा करें।
  6. ऋषि पंचमी के दिन जमीन से बोया हुआ अनाज नहीं खाया जाता अगर कोई महिला ऐसा करती है तो उसे सप्तऋषियों का श्राप मिलता हैं और उसे जीवन में अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ता है।
  7. ऋषि पंचमी के दिन ऋषि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती है। इसलिए सप्तऋषि के साथ- साथ देवी अरुंधति की भी पूजा अवश्य करें। ऐसा करने से आपको मासिक धर्म में होने वाली पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।
  8. ऋषि पंचमी के सात वर्षों के बाद आठवें वर्ष में सप्त ऋषियों की सोने की प्रतिमा बनाकर ब्राह्मण को दान दी जाती है। ऐसा करने से ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है।
  9. मासिक धर्म में किसी ब्राह्मण को भोजन कराने के पाप से मुक्ति दिलाता है ऋषि पंचमी का व्रत।
  10. ऋषि पंचमी का व्रत मासिक धर्म में किसी पूजा के समान को हाथ लगाने के पाप से भी मुक्ति दिलाता है।
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    🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
    श्री रमा वैकुंठ आचार्य संस्कृत महाविद्यालय पुष्कर राजस्थान
    8696955216🍁9460611280
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बछ बारस : पौराणिक कथा

गोवत्स द्वादशी/बछ बारस की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में भारत में सुवर्णपुर नामक एक नगर था। वहां देवदानी नाम का राजा राज्य करता था। उसके पास एक गाय और एक भैंस थी।

उनकी दो रानियां थीं, एक का नाम ‘सीता’ और दूसरी का नाम ‘गीता’ था। सीता को भैंस से बड़ा ही लगाव था। वह उससे बहुत नम्र व्यवहार करती थी और उसे अपनी सखी के समान प्यार करती थी।

राजा की दूसरी रानी गीता गाय से सखी-सहेली के समान और बछडे़ से पुत्र समान प्यार और व्यवहार करती थी।

यह देखकर भैंस ने एक दिन रानी सीता से कहा- गाय-बछडा़ होने पर गीता रानी मुझसे ईर्ष्या करती है। इस पर सीता ने कहा- यदि ऐसी बात है, तब मैं सब ठीक कर लूंगी।

सीता ने उसी दिन गाय के बछडे़ को काट कर गेहूं की राशि में दबा दिया। इस घटना के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं चलता। किंतु जब राजा भोजन करने बैठा तभी मांस और रक्त की वर्षा होने लगी। महल में चारों ओर रक्त तथा मांस दिखाई देने लगा। राजा की भोजन की थाली में भी मल-मूत्र आदि की बास आने लगी। यह सब देखकर राजा को बहुत चिंता हुई।

उसी समय आकाशवाणी हुई- ‘हे राजा! तेरी रानी ने गाय के बछडे़ को काटकर गेहूं की राशि में दबा दिया है। इसी कारण यह सब हो रहा है। कल ‘गोवत्स द्वादशी’ है। इसलिए कल अपनी भैंस को नगर से बाहर निकाल दीजिए और गाय तथा बछडे़ की पूजा करें।

इस दिन आप गाय का दूध तथा कटे फलों का भोजन में त्याग करें। इससे आपकी रानी द्वारा किया गया पाप नष्ट हो जाएगा और बछडा़ भी जिंदा हो जाएगा। अत: तभी से गोवत्स द्वादशी के दिन गाय-बछड़े की पूजा करने का ‍महत्व माना गया है तथा गाय और बछड़ों की सेवा की जाती है।

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कल #रक्षाबंधन पर सुबह पूजा के समय माँ ने कहा, ” द्वार पर श्रवण कुमार तो बनाया ही नहीं, न उसको राखी ही बांधी “, तो मैंने पूछा कि श्रवण कुमार का रक्षा बंधन से क्या सम्बंध , वो कारण तो बता न पायीं किन्तु बोली पुरखों के समय की रीति है अब तक चल रही है ! बहन सुरेखा पूनम और आशा ही इस कार्य को करती थीं तो उनसे पूछा, उन्होंने वे चित्र भेज दिए, तब ध्यान आया कि उनके बड़े होने से पहले मै भी यह कार्य कर चुका हुँ ?

अब शुरू हुई खोज कि रक्षा बंधन में #श्रवण_कुमार कहाँ से आ गए तो अनेक प्रकार के key word Google में डाले तब मिला वास्तविक कारण चूँकि कारण थोड़ा दुःखद है तो शायद लोक परम्परा ने कारण को भुला दिया किंतु वचन को जिंदा रखा !
तो मूल घटना इस प्रकार है

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को नेत्रहीन माता पिता का एकमात्र पुत्र श्रवण कुमार अपने माता पिता को कांवड में बिठा कर तीर्थ यात्रा कर रहे थे, मार्ग में प्यास लगने पर वे एक बार रात्रि के समय जल लाने गए थे, वहीं कहीं हिरण की ताक में #दशरथ जी छुपे थे। उन्होंने घड़े के में पानी भरने से हवा के बुलबुलों के निकलने के शब्द को पशु का शब्द समझकर शब्द भेदी बाण छोड़ दिया, जिससे श्रवण की मृत्यु हो गई।

श्रवण कुमार ने मरने से पहले दशरथ से वचन लिया कि वे ही अब उनके बदले माता पिता को जल पिलाएँगे। दशरथ ने जब यह कार्य करना चाहा तो नेत्रहीन माता पिता ने अपने पुत्र के अनुपस्थित रहने का कारण पूछा तो दशरथ ने उन्हें सत्य बताया। यह सुनकर उनके माता-पिता बहुत दुखी हुए। तब दशरथ जी ने अज्ञान वश किए हुए अपराध की क्षमा याचना की।

श्रवण कुमार के माता पिता ने अपने एक मात्र पुत्र के मर जाने पर अपना वंश नष्ट हो जाने का शोक व्यक्त किया तब दशरथ ने श्रवण के माता-पिता को आश्वासन दिया कि वे श्रावणी को श्रवण पूजा का प्रचार प्रसार करेंगे। अपने वचन के पालन में उन्होंने श्रावणी को श्रवण पूजा का सर्वत्र प्रचार किया।

उस दिन से संपूर्ण सनातनी श्रवण पूजा करते हैं और उक्त रक्षा सूत्र सर्वप्रथम श्रवण को अर्पित करते हैं।

भारतीय लोक परम्परा पर प्रश्न उठाने वाले अनेक इतिहास कार अक्सर यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि यह सत्य है तो प्रमाण क्या है।राम जन्म भूमि के संदर्भ में न्यायालय में यह प्रश्न बार बार उठा विद्वान वकीलों ने मुक़द्दमा जीतने के लिए यहाँ तक घोषणा कर डाली कि राम कभी हुए ही नहीं !

कल दिन भर के प्रयास मात्र से मिली यह कथा बताती है कि
मुख और कान से ज़िंदा रखा गया इतिहास कितना शक्ति शाली है कि राम जन्म से पूर्व एक साधारण ग़रीब पितृभक्त बालक की गाथा को कितने चतुराई से ज़िंदा रखा है ।

आज यह स्केच मुझे एक प्रतिष्ठित वेब साइट से मिला है
हमारे द्वारा बनाए जाने वाला चित्र भी लगभग ऐसा ही है किंतु यह अधिक श्रेष्ठ है। इसे गेरू और रुई लिपटी सींक से द्वार के ओर बनाते हैं और इसे ही तिलक पूजा कर राखी अभिमंत्रित कलावा बांधा चिपकाया जाता है। इसके बाद वही पूजा की थाली भाई को राखी बांधने के लिए प्रयुक्त होती है।

इसमें अधिक ध्यान देने की बात यह है कि इसे सरल ज्यामितिक figure त्रिकोण, आयत वर्ग और वृत द्वारा ही बनाया गया ताकि चित्रकारी विशेषज्ञ की आवश्यकता न हो रंगोली बनाने वाली गृहणी ही आसानी से इसे बना सके !

एक प्रकार से देखा जाए तो यही कार्टून कला का प्रारम्भ भी कहा जा सकता है। भारत के हर प्रदेश में हर उत्सव पर रंगोली,मंडवा, गणगौर, सांझी आदि अनेक चित्र बनाए जाते हैं ,दिए गए वेब site पर मध्य प्रदेश मालव क्षेत्र में बनाए जाने वाले रेखा चित्र दिए गए हैं

सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा और बच्चों को संस्कारी करने के लिए उपयोगी परम्परा है। भाई दीर्घायु हो इतना ही काफ़ी नहीं है। वह माता पिता की सेवा करने वाला भी हो।

राजा दशरथ का धर्म और वचन निभाने का उदाहरण देखिए कि मुझे जानें या न जाने लेकिन श्रवण कुमार को सब जानें !
आइए इस धरोहर को पुष्पित पल्लवित करें

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बट सावित्री पूजन,,❣️शुभकामनाएं ग्रुप की समस्त नारी शक्ति को हमारा प्रणाम,

सृंगार किया सजना के लिये ,
और मांगी लंबी उम्र भी है,
सजना के बिन जीवन सूना,
सृंगार बिना यह उम्र भी है,

बट की पूजा करके देखो,
है आयु बढ़े पति की देखो,
न उम्र की कोई सीमा है,
है सास बहू भी करे देखो,

दिन रात जो लड़ती रहती है,
वह भी देखो पूजन करती,
लंबी आयु पतिदेव की हो
ब्रत कठिन रूप में यह करती,

सावित्री ने की थी पूजा,
पति देव के प्राण बचाने को,
पड़ गई परम्परा तब से ही,
सुहाग की रक्षा करने को,

पर इतना देखो याद रहे,
थी पतिव्रता नारी थी वह,
सपने में भी परपुरुष कभी,
ना आये ऐसी नारी थी वह,

बस सावित्री जैसी नारी की ,
प्रार्थना है सुनता है ईश्वर,
बट के ही रूप में देता बर,
सुहाग रहे तेरा ही अमर,।।

गोविन्द

वट सावित्री व्रत कथा

विवाहित महिलाओं की बीच अत्यधिक प्रचलित ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन आने वाले सावित्री व्रत की कथा निम्न प्रकार से है:
भद्र देश के एक राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी।

उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा।

इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि: राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने के कारण से कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा।

सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया।

ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा कि हे राजन! यह क्या कर रहे हैं आप? सत्यवान गुणवान हैं, धर्मात्मा हैं और बलवान भी हैं, पर उसकी आयु बहुत छोटी है, वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी।

ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए। सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा, पुत्री तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना है वह अल्पायु हैं। तुम्हे किसी और को अपना जीवन साथी बनाना चाहिए।

इस पर सावित्री ने कहा कि पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती हैं, राजा एक बार ही आज्ञा देता है और पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है।

सावित्री हठ करने लगीं और बोलीं मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी। राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया।

सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा करने लगी। समय बीतता चला गया। नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगीं। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया।

हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल चले गये साथ में सावित्री भी गईं। जंगल में पहुंचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गये। तभी उसके सिर में तेज दर्द होने लगा, दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गये। सावित्री अपना भविष्य समझ गईं।

सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री सत्यवान का सिर सहलाने लगीं। तभी वहां यमराज आते दिखे। यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की कि यही विधि का विधान है। लेकिन सावित्री नहीं मानी।

सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देख कर यमराज ने सावित्री से कहा कि हे देवी, तुम धन्य हो। तुम मुझसे कोई भी वरदान मांगो।

1) सावित्री ने कहा कि मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं, उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें। यमराज ने कहा ऐसा ही होगा। जाओ अब लौट जाओ।
लेकिन सावित्री अपने पति सत्यवान के पीछे-पीछे चलती रहीं। यमराज ने कहा देवी तुम वापस जाओ। सावित्री ने कहा भगवन मुझे अपने पतिदेव के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है। यह सुनकर उन्होने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिए कहा।

2) सावित्री बोलीं हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे पुन: वापस दिला दें।
यमराज ने सावित्री को यह वरदान भी दे दिया और कहा अब तुम लौट जाओ। लेकिन सावित्री पीछे-पीछे चलती रहीं।

यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने को कहा।
3) इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्य का वरदान मांगा। यमराज ने इसका वरदान भी सावित्री को दे दिया।

सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। यमराज अंतध्यान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गई जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था।

सत्यवान जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे।

अतः पतिव्रता सावित्री के अनुरूप ही, प्रथम अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वो टल जाता है।

ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नमः

गोविंद गुप्ता

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આપણી_પરંપરાઓ….

#દેદો_કૂટવો

મિત્રો….આજે પણ ધણા ગામમાં નાની છોકરીઓના જયારે ગૌરીવ્રત આવે છે , ત્યારે બધી દિકરીઓ ગામની બહાર નદી કાંઠે જઈને, રેતીમાં દેદાનું પૂતળું બનાવી , અથવા દેદાને મારનારના ટીમા બનાવીને એને કૂટેછે.

પણ શું આપણે જાણીએ છીએ, કે આ દેદો કોણ હતો? કન્યાઓ દેદો કેમ કૂટે છે?

આની પાછળ નો ઈતિહાસ
કંઈક આવો છે….

અરઠીલા ગામની બહાર છાવણી નાંખી પડેલ મહમદ બેગડાના સૈનિકોએ આપા દેદા આહીરને એકલા હાથે કત્લેઆમ કરતો જોઈ તેને મારવા ઉમટી પડ્યા. અરઠીલા કિલ્લાની બહાર દેદા આહીર અને બાદશાહની સેના વચ્ચે જીવ સટોસટનો જંગ ખેલાયો. દેદો આહીર બંને હાથથી તલવાર વીંઝતો જેમ જુવારના કણસલા લણતો હોય તેમ દુશ્મનોના માથા વાઢતો એકલો મુસ્લિમ સેના વચ્ચે આગળ વધી રહ્યો હતો. જલ્લાલુદ્દીને તેની પીઠ પાછળથી સૈનિકોને આક્રમણ કરવા ઈશારો કર્યો. દેદાએ સેંકડો સૈનિકોને રહેંસી નાખ્યા.

દેદો બેય હાથથી લોહી નીતરતી તલવારોથી દુશ્મન સેનામાં કહેર વર્તાવી રહ્યો હતો. ત્યારે દેદાની પીઠ પાછળથી ગરદન ઉપર તલવારનો ઘા કરવામાં આવતા તેનું માથું ધડથી અલગ થઈ ગયું. દેદાનું માથું કપાતા ધડ ઝનૂને ચડ્યું, એમ કહેવાય છે, કે માથા વગરનું ધડ ઝનૂને ચડતા મહમદ બેગડાની સેનામાં હાહાકાર મચી જવા પામ્યો હતો. માથા વગરના ધડને આંખો હોઈ તેમ બાદશાહની સેના વચ્ચે જઈ અનેક સૈનિકોનો કચ્ચરઘાણ બોલાવી દેતા સેનામાં ભાગદોડ મચી ગઈ. અરઠીલાના એક યુવાને કરેલી ખુવારી જોઈ બાદશાહની સેના ભયભીત થઈ ગઈ હતી. બેગડાની સેનાને અગમચેતીનો આભાસ થતા વિચારવા લાગી, કે જો અરઠીલાનો એક યુવાન આટલા સૈનિકોની ખુંવારી કરી શકે, તો અરઠીલા ના હજારો આહીરો એક સાથે આવી ચડશે તો શું થશે ? એવું વિચારી સેનાને પરત ફરવું જ યોગ્ય લાગ્યું.

પરંપરા

આજથી આશરે સાડા પાંચસો વર્ષ પહેલા અષાઢ માસની પૂનમની અજવાળી રાત્રીએ ખેલાયેલ આ જંગમાં બેગડાની સેનાને દેદા આહીરે એકલા હાથે ભગાડી હતી અને એ સાથે ગામની દીકરીઓની લાજ બચાવતા પોતે વીરગતિ પામ્યો. દેદા આહીરની કથા-લોકકથાઓ, બારોટોના ચોપડાઓ અને દેદા ગોહિલના પાળિયારૂપે સાક્ષી પૂરે છે. આજેય સૌરાષ્ટ્રની કુંવારી કન્યાઓ દર વર્ષની અષાઢી પૂનમે દેદા આહીરની શહીદીને અશ્રુભરી શ્રદ્ધાંજલી આપવા ગામની ભાગોળે ભેગા થઈ દેદો કૂટવાની પરંપરા જાળવતી જોવા મળે છે. જેેેેમાં કુુંવારી કન્યાઓ મરશીયા ગાય છે.

ભારતીય સંસ્કૃતમાં મરણને પણ સોળ સંસ્કાર પૈકીનો એક સંસ્કાર ગણવામાં આવ્યો છે. કન્યાઓ પોતાના ભાવી જીવનમાં મરણ પ્રસંગે કૂટવાનું શીખે, મરશિયા ગાતા શીખે એ ભાવના પણ આ પરંપરા પાછળ રહી છે.

બાળપણમાં મરણ પ્રસંગે સગા વહાલા કાણ લઈને આવે અને ગામના ચોકે ચોકે કાણે આવેલી બહેનો ધડામ ધડામ છાજીયા લેતા લેતા જે મરશિયા ગાય એ મરશિયા ભલભલા મૂછાળાઓની આંખમાં આંસું લાવી દેતી એ પ્રસંગની સ્મૃતિ હજીય
માનસપટ્ટ પર એવી ને એવી હજુય
અકબંધ છે.

મરશું રણ મેદાનમાં ધરશુ લીલુડા શીશ,
આપા છીએ ગાંડી ગરનાં કરશું ઉજડા નીર.

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वट सावित्री


वट_सावित्री पर्व ..!!!

… #सावित्री और #सत्यवान की मूर्ति ( red sand stone).. .. कालखंड 11वीं सदी ..!!
… यहाँ दर्शाया गया दृश्य . वह क्षण है जब #यमदेवता द्वारा सती-सावित्री को तीन वरदान देने के बाद सत्यवान सावित्री की गोद में उठते हैं ..!!
… #वटवृक्ष की पत्तियों से तो आप पहचान / देख ही पा रहे होंगे ..??

  • सादर प्रणाम