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🌞 मकर संक्रांति2022 🌞

आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं l

मकर संक्रांति 14 जनवरी 2022 को मनाई जाएगी. इस दिन सूर्य देव की उपासना का विशेष महत्व है. इसे उत्तरायणी के नाम से भी जाना जाता है.

🌞 मकर संक्रांति मुहूर्त

14 जनवरी को सूर्यदेव का राशि परिवर्तन यानी सूर्य का मकर राशि में गोचर दोपहर 02 बजकर 43 मिनट पर होगा। इस वजह से 14 जनवरी को गंगा स्नान और सूर्य देव की पूजा का समय सुबह 08 बजकर 43 मिनट से प्रारंभ कर सकते है।

मकर संक्रांति का पुण्य काल: दोपहर 02 बजकर 43 मिनट से लेकर शाम 05 बजकर 45 मिनट तक

मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने और खाने का खास महत्व होता है. इसी कारण इस पर्व को कई जगहों पर खिचड़ी का पर्व भी कहा जाता है. संक्रांति के दिन भगवान सूर्य उत्तरायण हो जाएंगे. सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएंगे.

🌞मकर संक्रांति के दिन क्या करें ?

  1. इस दिन प्रातःकाल स्नान कर लोटे में लाल फूल और अक्षत डाल कर सूर्य को अर्घ्य दें.
  2. सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें. श्रीमदभागवद के एक अध्याय का पाठ करें या गीता का पाठ करें.
  3. नए अन्न, कम्बल, तिल और घी का दान करें.
  4. भोजन में नए अन्न की खिचड़ी बनाएं.
  5. भोजन भगवान को समर्पित करके प्रसाद रूप से ग्रहण करें.
  6. संध्या काल में अन्न का सेवन न करें.
    इस दिन किसी गरीब व्यक्ति को बर्तन समेत तिल का दान करने से शनि से जुड़ी हर पीड़ा से मुक्ति मिलती है.

🌞 मकर संक्रांति पर जपे सूर्य मंत्र

मकर संक्रांति पर सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा जाता है। इस दिन सभी तरह के शुभ कार्य दोबारा से आरंभ हो जाते हैं। ऐसे में इस दिन गंगा स्नान, दान और सूर्य उपासना जरूर करना चाहिए। स्नान के बाद सूर्यदेव को ॐ सूर्याय नम:, ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः, ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर: का जाप करते हुए अर्घ्य दें।

🌞 मकर संक्रांति पूजा विधि
मकर संक्रांति पर सुबह जल्दी उठकर अपने पास स्थित किसी पवित्र नदी में जाकर स्नान करें। फिर इसके बाद साफ वस्त्र पहनकर तांबे के लोटे में पानी भर लें और उसमें काला तिल, गुड़ का छोटा सा टुकड़ा और गंगाजल लेकर सूर्यदेव के मंत्रों का जाप करते हुए अर्घ्य दें। सूर्यदेव को अर्घ्य देने के साथ ही शनिदेव को भी जल अर्पित करें और शनि से जुड़े हुए मंत्रों का जाप करें। इसके बाद गरीबों को तिल और खिचड़ी का दान करें।

🌞मकर संक्रांति का महत्व :-

मकर संक्राति के दिन गंगा स्नान, व्रत, कथा, दान और भगवान सूर्यदेव की उपासना करने का विशेष महत्त्व है. इस दिन किया गया दान फलदायी होता है. इस दिन शनि देव के मंदिर
मै दीपक जलाना भी बहुत शुभ होता है. यह समय नई फसल काटने का होता है. इसलिए किसान इस दिन को आभार दिवस के रूप में भी मनाते हैं. इस दिन तिल और गुड़ की बनी मिठाई बांटी जाती है.

🌞संक्रांति से जुड़ी पौराणिक कथा:-

पौराणिक कथा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर फेंका था. लिहाजा भगवान की जीत को मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है. मकर संक्रांति से ही ऋतु में परिवर्तन होने लगता है. शरद ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है और इसके बाद बसंत मौसम का आगमन हो जाता है. इसके फलस्वरूप दिन लंबे और रात छोटी होने लगती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव के घर जाते हैं. ऐसे में पिता और पुत्र के बीच प्रेम बढ़ता है. ऐसे में भगवान सूर्य और शनि की अराधना शुभ फल देने वाला होता है l

🙏जय श्री हरि 🙏
🙏जय सूर्य देव 🙏

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लोहड़ी


आज माघ माह की सन्क्रांति की पूर्व सन्ध्या केवल पंजाब ही नहीं, अपितु पूरे विश्व में फैले पंजाबी लोहड़ी मना रहे हैं । पौराणिक कथाओं के अनुसार आज ही के दिन श्रीकृष्ण जी ने लोहिता राक्षसी का वध किया परन्तु पंजाब के इस पर्व के साथ अन्य संदर्भ जुड़े हैं। पंजाब आज सीमांत प्रदेश है तो विभाजन से पूर्व भी इसकी यही स्थिति थी जहां उसे लगातार विधर्मी आक्रांताओं का सामना करना पड़ता था। उस दौर में दुल्ला भट्टी नामक वीर ने आक्रांताओं का बहुत बहादुरी से सामना किया। भारत की वर्तमान सीमा से लगभग 200 किलोमीटर उस पार, पश्चिमी पंजाब में आज भी पिंडी भट्टियां (भट्टी गौत्र के राजपूतों का गांव) है। उसी गांव में 1547 में जन्में दुल्ला भट्टी। उनके जन्म से चार माह पूर्व उनके दादा सन्दल भट्टी और पिता को मुगल सम्राट हुमायूं ने मरवा कर उनकी खाल में भूसा भरवा के गांव के बाहर लटकवा दिया क्योंकि उन्होंने आक्रांता मुगलों को लगान देने से मना कर दिया था। आज भी पंजाब की लोकगाथाओं में हुमायूं की बर्बरता के किस्से सुनने को मिलते हैं। एक लोकगीत में गायक कहता है :-
तेर सान्दल दादा मारया।
दित्ता बोरे विच पा।
मुगलां पुट्ठियां खालां लाह के।
भरया नाल हवा।
वीर योद्धा दुल्ला भट्टी आक्रांताओं के पिट्ठू जमींदारों, सिपाहियों से लूट कर जरूरतमंदों में बान्टता था इसलिए वह उनकी आंख की किरकिरी था। एक प्रचलित कथा के अनुसार एक बार थोड़े से सैनिकों के साथ भटक रहे शहजादा सलीम को दुल्ला भट्टी ने पकड़ लिया परंतु उसे यह कहते छोड़ दिया कि, ‘बाप से है, बेटे से नहीं।’ पाकिस्तानी पंजाब में आज भी प्रचलित एक कथा के अनुसार दुल्ला ने अकबर को भी पकड़ा था। परंतु जब अकबर ने कहा, ‘भईया मैं शहंशाह नहीं, उसका भाण्ड हूं।’ तो दुल्ला भट्टी ने उसे भी यह कहते हुए छोड़ दिया कि, उसे क्या मारूं जो अकबर होकर खुद को भाण्ड बता रहा है।’

दुल्ला भट्टी और लोहड़ी
लाहौर के पास के एक गांव में सुंदर दास नामक किसान की दो बेटियों पर थीं आक्रांताओं के पिट्ठू नम्बरदार की नीयत ठीक नहीं थी। जब वह शादी का दबाव बनाने लगा तो सुंदर दास ने दुल्ला भट्टी तक संदेश पहुंचाया। दुल्ला भट्टी ने स्वयं उस गांव पहुंचकर सबसे पहले नम्बरदार के खेतों में आग लगाई और फिर बेटियों का विवाह पिता द्वारा तय लड़कों से करते हुए स्वयं उनका कन्यादान कर उन्हें शगुन में शक्कर दी। बस उसी दिन से, लोहड़ी की रात उसी तरह से शक्कर, गुड़, रेवड़ी, मुंगफली, मक्की के दाने, तिल के लड्डू आदि अग्नि को भेंट कर इनका प्रसाद वितरित किया जाता है। दुल्ला भट्टी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते आज भी गीत गाते हैं : –
सुन्दर मुन्दरिए …हो
तेरा कौन विचारा…हो
दुल्ला भट्टीवाला…हो
दुल्ले दी धी ब्याही …हो
सेर शक्कर पाई …हो
कुड़ी दा लाल पताका …हो
कुड़ी दा सालू पाटा …हो
सालू कौन समेटे …हो
मामे चूरी कुट्टी …हो
जिमींदारां लुट्टी …हो
जमींदार सुधाए …हो
गिन गिन पोले लाए …हो
इक पोला घट गया
जिमींदार वोहटी ले के नस गया
इक पोला होर आया
जिमींदार वोहटी ले के दौड़ आया
सिपाही फेर के ले गया
सिपाही नूं मारी इट्ट
भावें रो ते भावें पिट्ट
साहनूं दे लोहड़ी
तेरी जीवे जोड़ी
साहनूं दे दाणे तेरे जीण न्याणे !

अब आधुनिकता की आंधी ने बहुत कुछ बदल दिया है लेकिन कुछ वर्ष पूर्व तक गांव के बच्चे घर घर जाकर यह गीत दोहराते तो उन्हें परिवार जनों की ओर से मूंगफली रेवड़ी आदि दिए जाते थे!

अकबर की विशाल सेना भी दुल्ला भट्टी को न पकड़ पाई थी, तो उसे 1599 में धोखे से पकड़वा कर आनन-फानन फांसी दे दी गई। लाहौर के पास मियानी साहिब कब्रगाह में अब भी दुल्ला की कब्र है।

🚩 आप सभी को लोहड़ी की शुभकामनाएं 🚩

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સકલા એકાદશી


માગશર વદ અગિયારસને स-फला एकादशी કહેવાઇ છે.
પદ્મપુરાણના ઉત્તરખંડમાં જણાવેલ આ એકાદશીના કથાનકમાં,
ચંપાવતી નગરના માહિષ્મત રાજાના પાંચ પુત્રો પૈકી મોટોપુત્ર દુષ્ટબુદ્ધિ હતો, આથી રાજાએ એને દેશનિકાલ આપેલ.
આ દુષ્ટપુત્ર જંગલમાં રહીને ત્યાંથી આવનજાવન કરતી પ્રજાને લૂંટીને જીવનનિર્વાહ કરતો હતો, લોકો તેને लुम्भक નામથી સંબોધતા,

લુંભક નો અર્થ विमोहीत એટલે કે, લોભથી ભ્રમિત થયેલ…

આ કથાનક અનુસાર, લુંભક માગશર માસની કૃષ્ણપક્ષની એકાદશીએ પીપળના વૃક્ષ પાસે જંગલમાંથી પોતે એકત્ર કરેલ ફળો રાખે છે અને નિર્વસ્ત્ર હોવાથી અસહ્ય ઠંડીથી એ રાત્રી એનાથી આખી રાત જાગરણ પણ થઇ જાય છે.

આમ અનાયાસે,
પૂર્વનિર્ધારણ વિના જ એનાથી આ એકાદશીનું વ્રત થાય છે અને ફળોનું અર્ધ્ય શ્રી હરિ સ્વરૂપ પીપળાના વૃક્ષના થડમાં આપી દેવાય છે.
આમ આ એકાદશીના વ્રતના શુભકર્મફલ સ્વરૂપે લુંભકને રાજય, સ્ત્રી, પુત્ર અને શ્રીહરિની ભક્તિ પ્રાપ્ત થાય છે…

સનાતન સંસ્કૃતિમાં પીપળાના વૃક્ષને શ્રી હરિનું સ્વરૂપ જણાવવામાં આવેલ છે, આ એકાદશીએ પીપળાના વૃક્ષને,
માગશરમાસના ૠતુફળો…લીંબુ, લકુચ, બીજોરૂ, બોર, દાડમ, આંમળા સાથે નારિયેળ, સોપારી, વિગેરેનું અર્ધ્ય… અપાય છે, આમ ફળો સહીતની આ એકાદશીને સ-ફલા કહેવાઇ છે.

આ એકાદશીએ ગરુડપુરાણના અધ્યાય-234 માં આપેલ
अच्युत स्तोत्र નું પારાયણ કરવામાં આવે છે.

अच्युत च अन्नत गोविंद इति नाम त्रयं हरे ।
यो जपेत् प्रयतो भकत्या प्रणवंद्य नमो अन्तकम् ।।
तस्य मृत्यो भयं न अस्ति विषरोग-अग्निजं महत् ।
नामत्रयं महामंत्र जपेद्यः प्रयत आत्मवान् ।।

આરોગ્યના દ્રષ્ટિકોણથી આ સફલા એકાદશીમાં અપાતા અર્ધ્યમાં જે ખાટાં-મીઠાં ફળોની જે યાદી દર્શાવેલ છે,
એમાંના મોટાભાગે ચરકસંહિતા સૂત્રસ્થાન અ-4 માં વર્ણવેલ हृद दशेमानी ના ફળો છે.

आम्र आम्रतक लकुच करमर्द वृक्षाम्ल अम्लवेतस कुवल ।
बदर दाडिम मातुलुङ्गानि इति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति ।।

માગશર-પોષ માસની ગાત્રો કંપાવી દેતાં,
અતિ શીત વાતાવરણમાં હૃદય અને મસ્તિષ્કમાં લોહી પહોંચાડતી નાની રક્તવાહીનીઓ થોડીક સંકોચાતી હોય છે અને એમાંય જો વધતી જતી ઉંમરના કારણે તથા અનુચિત આહાર-વિહારની ટેવોના કારણે આ નાની રક્તવાહિનીઓમાં બ્લોકેજ થઇ જવાથી શિયાળામાં heart-attack અને stroke ના કિસ્સાઓ વધુ જોવાં મળે છે.
આ વિકારો થવાં પાછળ બીજા નંબરે મુખ્ય કારણ મનનો વિષાદ પણ જોવાં મળે છે.
જગત દ્વઁદ્વાત્મક છે એટલે વ્યાધિવિકારના ઉત્પાદક કારણોમાં દ્વઁદ્વ- બે પ્રકારના કારણો જોવાં મળે, એ સ્વાભાવિક છે.

હૃદ દશેમાની ના દ્રવ્યો સ્વાદમાં અમ્લ મધુર કષાય હોય છે, એ બધા મનને પ્રસન્ન કરનારાં હોવાથી એમને હૃદ કહ્યાં છે.

આ હૃદ ફળો નાની રક્તવાહિનીઓમાં બ્લોકેઝ ના જે કારણો છે એને દૂર કરનારાં છે,
જેમ કે અમ્લ રસ રક્તવાહિનીઓમાં મળ સ્વરૂપે જમા થયેલ ચીકાશને દૂર કરે છે તથા મધુર રસ રક્તવાહીનીઓને પોષીત કરે છે,
જયારે કષાય રસ રક્તવાહિનીઓને ટોનઅપ કરી બળવાન બનાવે છે.

આથી અતિશીત બાહ્ય વાતાવરણ અને શારીરિક ચયાપચય જન્ય વિષમ પરિસ્થિતિઓમાં પણ રક્તવાહિનીઓ જે તે અંગ અવયવમાં પોતાનું રક્ત પહોંચાડવાનું કામ સુપેરે કરતી રહે છે.

ગરુડપુરાણના અચ્યુત સ્ત્રોતનું પારાયણ અને એના પરનું ચિંતન મનુષ્યનો વિષાદ દૂર કરી શ્રી હરિ પ્રત્યે એક ભરોસો – વિશ્વાસ પ્રગટાવે છે,
જેનાથી સંસારની કપરી પરિસ્થિતિઓમાં વ્યક્તિ વિષાદ ગ્રસ્ત થતો નથી.

માગશરની ગાત્રો કંપાવી દેતી કાતીલ ઠંડીમાં હૃદય અને મસ્તિષ્કને પોષણ આપતી રક્તવાહિનીઓની કામગીરી સુપેરે ચાલતી રહે એ માટે हृद दशेमानी વર્ણિત ફલોના સેવન સાથે જામફળ, નારીયેળ, સોપારીના સમ્યક આહાર પ્રયોગ સાથે વિષાદરહીત મનની પ્રસન્નતા માટે શ્રી હરિના અચ્યુત સ્વરૂપનું સતત સ્મરણ આ માગસરની કૃષ્ણ પક્ષની અગિયારસ – સફલા એકાદશીનો શુભ સંદેશ છે.

ડો. ભાવેશ મોઢ

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तुलसी पूजन


मित्रो आज तुलसी पूजन दिवस है, आज के पावन दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं। आज हम आपको बतायेगें,तुलसी की पूजा कैसे करें और क्या हैं तुलसी पूजा के नियम?????

घर में तुलसी रखने की परंपरा आज की नहीं है बल्कि प्राचीन काल से ही घर के आँगन में तुलसी पूजन की परंपरा रही है। फिर चाहे वो किसी राजा का घर हो या किसी गरीब का। घर में तुलसी का पौधा रखना केवल धार्मिक रूप से ही नहीं अपितु वैज्ञानिक रूप से भी लाभकारी माना जाता है।

शास्त्रों में तुलसी को पूजनीय, पवित्र और लक्ष्मी माता का स्वरुप माना जाता है। इसलिए घर में तुलसी का होना अनिवार्य होता है। कहते हैं जिस घर में तुलसी होती है वहां देवी-देवताओं का वास रहता है। वैज्ञानिक तौर पर तुलसी के पौधे से लाभकारी तत्व रिलीज़ होते है जो घर में मच्छरों व् अन्य कीट-पतंगों के प्रवेश को कम करते है।

तुलसी के पत्ते बहुत सी बिमारियों में काम आते है जबकि तुलसी की चाय पीने से पेट दर्द और सर दर्द छू मंतर हो जाता है। इसके अलावा भी तुलसी के ढेरों फायदे होते है इसलिए घर में तुलसी का पौधा लगाया जाता है। लेकिन तुलसी पूजा के कुछ नियम और विधि होती है जिनके बारे में सभी को नहीं पता होता। इसलिए आज हम आपको तुलसी की पूजा कैसे करें और तुलसी पूजा के नियमों के बारे में बता रहे हैं।

तुलसी की पूजा करने की विधि?

तुलसी पूजन करने के लिए सबसे पहले पूजा की प्लेट, एक शुद्ध जल का लोटा, गंगा जल, अगरबत्ती या धुप बत्ती, घी का दीपक, हल्दी और सिंदूर इकठ्ठा कर लें। अब आँगन में रखी तुलसी के पास जाएं और सर्वप्रथम तुलसी जी को प्रणाम करें। उसके बाद जल अर्पित करते हुए इस मंत्र को पढ़ें – “महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी , आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोस्तुते।।”

मंत्र पढ़ने के बाद उन्हें सिंदूर और हल्दी अर्पित करें। क्यूंकि यह उनका श्रृंगार है। इसके बाद तुलसी जी के समक्ष घी का दीपक और धुप बत्ती – अगरबत्ती जलाएं। उसके बाद शालिग्राम और वृंदादेवी को स्मरण करके तुलसी जी का जयकारा लगाएं। अब तुलसी माँ की आरती गाएं और फिर परिवार के लिए सुख समृद्धि की कामना करें।

घर में तुलसी है तो इन नियमों का पालन करें????

अगर आपके घर में तुलसी जी है और आप उनकी नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते है तो इन नियमों को जानना आपके लिए आवश्यक है.

इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ें!!!!

शास्त्रों के अनुसार एकादशी, रविवार के दिन और सूर्य ग्रहण व् चंद्र ग्रहण के समय तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। इसके अलावा रात में और बिना उपयोग के भी तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति को दोष लग सकता है।

प्रतिदिन पूजन करें???

घर में तुलसी होने पर रोजाना नियमित रूप से तुलसी पूजन करना चाहिए। और शाम के समय तुलसी में दीपक अवश्य जलाना चाहिए। कहते हैं, जिस घर में शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलता है वहां सदैव लक्ष्मी जी विराजमान रहती हैं।

वास्तु दोष से बचाए!!!!

घर के आँगन में तुलसी होने से कई तरह के वास्तु दोष समाप्त होते है और परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहतर होती है।

बुरी नज़र से बचाए!!!!

तुलसी का पौधा होने से परिवार के सदस्यों और घर को बुरी नजर नहीं लगती और घर में किसी तरह की नकारात्मक ऊर्जा भी सक्रिय नहीं हो पाती। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

सूखा पौधा न रखें!!!!!

अगर घर में लगा हुआ तुलसी का पौधा सूख जाए तो उसे किसी नदी या बहते पानी में प्रवाहित कर देना चाहिए। क्योंकि घर में सूखा पौधा रखना अशुभ माना जाता है।

पत्ते को चबाएं नहीं!!!!!!

किसी प्रसाद या खाने-पीने की चीज में तुलसी का सेवन करते समय इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए की उन्हें चबाएं नहीं बल्कि निगल लें। इस तरह तुलसी का सेवन करने से कई रोगों में लाभ मिलता है। क्योंकि इसमें पारा धातु के कई तत्व होते है जिन्हे चबाने से दांतों को नुकसान हो सकता है। इसीलिए तुलसी के पत्ते चबाएं नहीं।

इन पर कभी न चढ़ाएं तुलसी पत्ते!!!!!

शिवलिंग और गणेश जी के पूजन में तुलसी के पत्तों का प्रयोग वर्जित होता है। जिसके पीछे अलग-अलग मान्यताएं हैं। इसलिए इन दोनों के पूजन में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाता।

रवि कांत

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गीता जयंती


करें या ना करें ?

करें तो हम क्या करें ?

यह प्रश्न जब जब आएगा…

गीताके ही शब्दों में..
हर मानव उत्तर पाएगा…

साल हजारों बीते चाहे..
युग भी बदल जाएगा…

नहीं बदलेगी वो राहें..
जो गीताकार दिखाएगा…

वो राह पे ही चलते रहें,
हमें कोई न रोक पाएगा…
मां की गोद में पलते रहें,
हर पल उत्सव बन जाएगा…

गीताजयंती की शुभकामनाएं 🙏🏻

ગીતા જયંતીની શુભેચ્છાઓ..

🌹મા ગીતા…🌹

વેદોનો વિશ્વાસ છે ગીતા..
ઋષિઓ કેરી આશ છે ગીતા…

રમતા રમતા જીવન જીવું..
એ કાવ્યનો પ્રાસ છે ગીતા…

નાચે માથે લઇને ઇમરસન..
સ્ફૂર્તીનો એવો વાસ છે ગીતા…

જન્મદિવસ જેનો માણીએ..
ગ્રંથોમાં એક ખાસ છે ગીતા…

ખેતર છે આ જીવન મારું..
ને વાવણીનો ચાસ છે ગીતા..

જીવ જગત ને જગદીશ તણી..
ઓળખ આપતો પાસ છે ગીતા…

છે જવાબ “જગત”ના પ્રશ્નોના ..
કૃષ્ણ તણો એ શ્વાસ છે ગીતા…

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ગીતા જયંતિ


આજે ગીતા જયંતી, દુનિયાનો માત્ર એક ગ્રંથ જેની જયંતી ઉજવાય છે

2ડિસેમ્બરને મંગળવારના રોજ સર્વને મોક્ષ આપનારી મોક્ષદા એકાદશી છે. દિવસે કુરુક્ષેત્રમાં શ્રીકૃષ્ણ ભગવાને ગીતા જ્ઞાન આપ્યું હતું. આથી અગિયારસને ગીતા જયંતી કહેવામાં આવે છે. ભગવાન કૃષ્ણના મુખથી ગીતા જ્ઞાન પ્રગટ કર્યું. દરેક અવતારોની જયંતી ઊજવાય પણ એકમાત્ર ગ્રંથ છે જેની જયંતી ઊજવાય છે.

ગીતામાં કુલ 18 અધ્યાયો અને 700 શ્લોક છે. અનુષ્ટુપ છંદમાં ગીતાના શ્લોકોની રચના થયેલી છે. મહર્ષિ વેદવ્યાસે ગીતા નામ આપ્યું છે. જ્ઞાન, કર્મ, શ્રદ્ધા, સંયમ, નવપ્રકારની ભક્તિ, કાળકર્મ, જીવન માયા ઇશ્વર પ્રકૃતિ, જીવનને બંધન અને મોક્ષ કેવીરીતે થાય છે. તેના પર પ્રતિપાદન કરાયું છે. આશરે 5 હજાર વર્ષ પહેલાં ગીતાનું સર્જન થયેલું છે. દુનિયાભરમાં વસતા હિંદુ ધર્મ પાળતા લોકોના ઘરમાં ગ્રંથ રહેલો છે. 100થી વધુ ભાષાઓમાં તેનું ભાષાંતર થયેલું છે. પ્રજ્ઞાચક્ષુ કૃણાલ શાસ્ત્રીના જણાવ્યાનુસાર,ગીતાજીમાં કોઇ એવો વિષય બાકી નથી દરેક વિષયો જ્ઞાન ભક્તિ અને કર્મ સાધકને જરૂરૂ તમામ વિષયો પર ચર્ચા કરી છે. સાંપ્રત સમયમાં માણસ જ્યારે નિષ્ક્રિય બની જાય તે તો તેને આધાર મળી જાય છે. ગીતાનો સાર માત્ર એક વાક્યમાં છે કે ફળની ઇચ્છા રાખ્યા વિના કર્મ કરવું જોઇએ. સમાજમાં અંધશ્રદ્ધાઓ ને મુક્ત બનીને સાચી શ્રદ્ધાને ધારણ કરે છે. માણસને કશું નહિ તેણે કરેલા કર્મોનું ફળ ભોગવવું પડે છે. નિરાશા હિંમત બની જાય છે. મહાત્મા ગાંધીજી પણ એવું કહેતા હતાં કે, હું શ્રીમદ્ ભગવત ગીતાજીનો અધ્યયન કરતો તો હિંમત મળતી હતી. સ્વામી વિવેકાનંદ યાત્રા કરવા નીકળ્યાં ત્યારે ગીતા સાથે રાખી. માણસને અભયત્વ પ્રાપ્ત કરવાની છે તેના જીવનમાંથી ભય દૂર થાય છે.

આજેમોક્ષદા એકાદશી

મણિનગરસ્વામિનારાયણ મંદિર કુમકુમના સાધુ પ્રેમવત્સલદાસજીએ જણાવ્યું હતું કે, માગશર સુદ અગિયારસનો ઉપવાસ કરવાથી વાજપેય યજ્ઞનું ફળ મળે છે. એકાદશીના દિવસે નકોરડો ઉપવાસ કરવામાં આવે તો તેનું ફળ નર્કમાં ગયેલી વ્યક્તિને અર્પણ કરવામાં આવે તો તેનો મોક્ષ થાય છે. એકાદશીનું વિશેષ મહાત્મ્ય બ્રહ્માંડપુરાણમાં વર્ણવવામાં આવ્યું છે.

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🌺पितृ पक्ष विशेषांक🌺
पितृ पक्ष (श्राद्ध करने की विधि)
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🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
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पितृलोक से पृथ्वी लोक पर पितरो के आने का मुख्य कारण उनकी पुत्र-पौत्रादि से आशा होती है की वे उन्हें अपनी यथासंभव शक्ति के अनुसार पिंडदान प्रदान करे अतएवं प्रत्येक सद्गृहस्थ का धर्म है कि स्पष्ट तिथि के अनुसार श्राद्ध अवस्य करे यदि पित्र पक्ष मे परिजनों का श्राद्ध नहीं किया गया तो वे श्राप दे देते हैं और ये परिवार के सदस्यों पर अपना प्रभाव छोड़ सकता है जिससे हानि होनी ही होनी है। अतः इस पक्ष में श्राद्ध अवश्य किया जाना चाहिये।

श्राद्ध में पंचबली की महता:
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️पित्र पक्ष में ब्राह्मण भोजन और जलमिश्रित तिल से तर्पण करने जितना ही
अनिवार्य पञ्चबलि भी है पञ्चबलि का नियम कुछ इस प्रकार है।

एक थाली के पांच भिन्न भिन्न भाग करके थोड़े थोड़े सभी प्रकार के भोजन को परोसकर हाथ मे तिल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प करते समय निम्न का उचारण करे: अद्यामुक गोत्र अमुक शर्माऽहं/वर्माऽहं/गुप्तोहं/दासोऽहं अमुकगोत्रस्य मम पितुः/मातु आदि वार्षिकश्राद्धे (महालयश्राद्धे) कृतस्य पाकस्य शुद्ध्यर्थं पंचसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पंचबलिदानं करिष्ये।

पंचबलि-विधि इस प्रकार है:
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(1)👉 गोबलि (पत्ते पर)
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ऊँ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्वन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः।। इदं गोभ्यो न मम।
सव्य होकर इस श्लोक का उचारण पश्चिम दिशा की और पुष्प और पते को दिखाकर करे। पंचबली का एक निहित भाग गाय को खिलायें।

(2)👉 श्वानबलि (पत्ते पर)
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द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोöवौ। ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ।। इदं श्वभ्यां न मम।

इस श्लोक का उचारण कुत्तों को बलि देने के लिए करे। इस पंचबलि के समय जनेऊ गले में कण्ठी करें ।

(3)👉 काकबलि (पृथ्वी पर)
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ऊँ ऐन्द्रवारूणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्वन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।। इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।
जनेऊ अपसव्य करके
इस श्लोक का उच्चारण कौओं को भूमि पर अन्न देने के लिए करे। पंचबली का एक निहित भाग कौओं के लिये छत पर रख दें।

(4)👉 देवादिबलि (पत्ते पर)
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ऊँ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।। इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।
सव्य होकर इस श्लोक का उचारण देवता आदि के लिय अन्न देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग अग्नि को समर्पित कर दें। अथवा यह भी गाय को ही खिला दें।

(5)👉 पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर)
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पिलीलिकाः कीटपतंगकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।। इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।

इस श्लोक का उच्चारण चींटी आदि को बलि देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग चींटियों के लिये रख दें पंचबलि देने के बाद एक थाल मे खाना परोस कर निम्न मंत्र का उच्चारण कर ब्राह्मणों के पैर धोकर सभी व्यंजनों का भोजन करायें।

यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे।
तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पाद सेचने।।

इसे बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करें। तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें

यजमान 👉 शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। (श्राद्ध में बचे अन्न का क्या करूँ?)

ब्राह्मण 👉 इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करें।) इसके बाद अपने परिवार वालों के साथ स्वयं भी भोजन करें तथा निम्न मंत्र द्वारा भगवान् को नमस्कार करें
👇
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई बार विधि पूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं।

श्राद्धकर्म के नियम
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1👉 श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।

2👉 श्राद्ध में चांदी के बर्तन का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

3👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए गए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

4👉 ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।

5👉 जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

6👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

7👉 श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

8👉 दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

9👉 चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।

10👉 जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।

11👉 श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।

12👉 शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

13👉 श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।

14👉 रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

15👉 श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोना, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।

16👉 तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

17👉 रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

18👉 चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।

19👉 भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ।

20👉 श्राद्ध के प्रमुख अंग
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तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान:👉 पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान👉 वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।

दक्षिणा दान👉 यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।

21👉 श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।

22👉 पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।

23👉 तैयार भोजन में से गाय, कुत्ता कौआ, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

24👉 कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।

25👉 ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

26👉 पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करें या सबसे छोटा।

भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि, पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं, और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं, इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, गुरु या नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं, जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं। पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।

सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं।

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा👉 इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।

पंचमी👉 जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।

नवमी👉 सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि, इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

एकादशी और द्वादशी👉 एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।

चतुर्दशी👉 इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है, जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।

सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या👉 किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए, यही उचित भी है।

पिंडदान करने के लिए👉 सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।
विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है।

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।। (वायु पुराण)

श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊर्ध्व कक्षा में पितृलोक है, जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है, उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संधान से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है।
सनातन मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास भ्रमण करता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है, इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है, और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते हैं तो, जीवन की बहुत सी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये जाने चाहिएं।
ऐसा कुछ भी नहीं है कि, इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है, वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर, उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है, जिस योनि में वह प्राणी इस समय है।
पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत भाग को प्राप्त करता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो, श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो, वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करता है। यदि नाग योनि में है तो, श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति देता है। दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना प्रकार के अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करता है। अगर किसी की जन्मकुंडली में पितृदोष है तो, जन्म कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें।
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🙏🏻आर के शास्त्री🙏🏻
श्री रमा वैकुंठ आचार्य संस्कृत महाविद्यालय पुष्कर राजस्थान
8696955216🙏🏻9460611280

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🚩 શ્રાદ્ધની સમજ 🚩

આ સૃષ્ટી એટલે કે પૂરા બ્રહ્માંડને ૧૨ રાશિથી બાંધ્યું છે. તેમાં મેષ રાશિને સમગ્ર વિશ્વનું પ્રવેશદ્વાર માનવામાં આવે છે અને તેજ પ્રમાણે મીન રાશિ મોક્ષનું દ્વાર માનવામાં આવે છે.

આ મીન રાશિ બ્રહ્મલોક કે દેવલોક સાથે જોડાયેલી છે જ્યારે કન્યા રાશિ પિતૃલોક કે ચંદ્રલોક સાથે જોડાયેલી છે

હવે ખગોળ શાસ્ત્રના આધારે ૧૫ જુલાઈ પછી સૂર્યદેવતાની દક્ષિણયાત્રાની શરૂઆત થાય છે જેને આપણે દક્ષિણાયણના સૂર્ય કહીયે છીએ.

આ દક્ષિણાયનના સૂર્ય ધીમે ધીમે કન્યા રાશિ અને તુલા રાશિ તરફ જાય છે અને ત્યાં પિતૃલોકને જગાડે છે.

આ દક્ષિણાયનના સૂર્યની યાત્રા ૧૫ સપ્ટેમ્બર પછી કન્યા રાશિમાં પ્રવેશે છે ત્યારે પાતાળલોકમાં રહેલા પ્રેતયોનીને જાગ્રત કરે છે.

હવે સમજવાની વાત એ છે કે સંસારમાં મૃત આત્માની ગતિ બે રીતની હોય છે.

જેઓ સંતકક્ષાના અને પુણ્યશાળી જીવો હોય તેઓ મરણ બાદ દેવયાન તરફ ગતિ કરે છે અને અતૃપ્ત આત્મા પ્રેતયાન તરફ ગતિ કરે છે. દેવયાનનો સીધો સંબંધ સૂર્ય સાથે હોય છે અને પ્રેતયાનનો સબંધ ચંદ્ર સાથે હોય છે ચંદ્ર સૂક્ષ્મ જગતને સંભાળે છે અને તેથી ચંદ્રલોકને પિતૃલોક પણ કહેવાય છે.

શાસ્ત્રમાં વર્ણવ્યા મુજબ ચંદ્રની ૧૬ કળા છે આ ૧૬ કળા આપણા હિન્દૂ પંચાગની ૧૬ તીથી સાથે જોડાયેલી છે પુનમથી અમાસ ૧૬ તીથી હોય છે તેમ સુદ અને વદ ની તમામ તીથી રિપીટ થાય છે.

આમ મૃત્યુ પછી આત્મા જે તિથિએ મરણ પામે તે મુજબ ચંદ્રની કળામાં સ્થાન પામે છે. એકમનું મરણ થયું હોય તે પહેલી કળામાં, તે મુજબ જે પણ તિથિએ મરણ પામે તે ચંદ્રની કળા માં સ્થાન પામે છે.

જ્યારે સૂર્ય કન્યા રાશિમાં આવે છે ત્યારે ભાદરવા સુદ પૂનમ આવી જાય છે અને તે ચંદ્રલોકમાં પિતૃઓને જગાડે છે. તે સમયે ચંદ્રની ૧૫મી કળાના દ્વાર ઉઘડી જાય છે અને તેમાં રહેલા પિતૃ પૃથ્વી પરના તેમના સંબંધીને ત્યાં જઈ શકે તેવી વ્યવસ્થા છે. આમ પુનમથી પછી દરેક કળાના દ્વાર ખુલતા જાય છે અને તેમાં વસતા પિતૃઓ પોતપોતાના ઘરે આવવા શક્તિમાન બને છે.

ચંદ્રનું આધિપત્ય દૂધ અને ખીરનું રહેલું હોવાથી શ્રાદ્ધ પક્ષમાં દૂધપાક કે ખીરનું મહત્વ વિશેષ છે.

આમ દરેક પિતૃ તેમના નજીકના સ્વજન પુત્ર કે પૌત્રના ઘરે આવે છે અને શ્રાદ્ધ પામી સંતૃપ્ત થાય છે અને આશીર્વાદ આપતા જાય છે જે પરિવાર કુટુંબની ઉન્નતિ કરે છે. જે પિતૃનું શ્રાદ્ધ કરવામાં નથી આવતું તે અતૃપ્ત અવસ્થામાં પાછા જાય છે અને મનોમન ઉદાસ બની જાય છે તેનું વિપરીત પરિણામ કુટુંબને ભોગવવું પડતું હોય છે.

અતૃપ્ત પિતૃ ફરી એકવાર અમાવસયાને દિવસે અચૂક પાછા પોતાના સ્વજનના ઘરે આવે છે જેથી તેને આપણે સર્વપિતૃ અમાવાસ્યા કહીયે છીએ. આ દિવસે ભૂલ્યાચૂક્યાં દરેક પિતૃનું શ્રાદ્ધ નો મહિમા ઘણો છે અને તે અનાયાસે બાકી રહેલા પિતૃઓને સંતૃપ્ત કરવાનો મોકો મળે છે.

આથી દરેક પરિવારે શ્રાદ્ધ કરવું જ જોઈએ તે દિવસે બ્રાહ્મણ, બહેન દીકરી અને ભાણેજોને જમાડી શક્તિમુજબ દક્ષિણા આપવાથી અને કાગવાસ નાખવાથી પિતૃને પહોંચે છે .
આ હકીકત શાસ્ત્ર આધારિત છે અને સૌ જન આમાં શ્રધ્ધા રાખી કરે તે માટે તેને શ્રાદ્ધ નામ આપવામાં આવ્યું છે.

શક્ય છે કે આજ ના દિવસો માં ઉપરોક્ત જ્ઞાન જો હોય તો કદાચ શ્રાદ્ધ ની પ્રવૃત્તિ નું માહાત્મ્ય ખબર પડે….

🙏🏻 પિતૃ દેવો ભવઃ 🙏🏻

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🌹 पद्मा एकादशी : 17 सितंबर 2021
🎥https://youtu.be/x0yOImm4ZfQ

🌹 युधिष्ठिर ने पूछा : केशव ! कृपया यह बताइये कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है, उसके देवता कौन हैं और कैसी विधि है?

🌹 भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इस विषय में मैं तुम्हें आश्चर्यजनक कथा सुनाता हूँ, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद से कहा था ।

🌹 नारदजी ने पूछा : चतुर्मुख ! आपको नमस्कार है ! मैं भगवान विष्णु की आराधना के लिए आपके मुख से यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है?

🌹 ब्रह्माजी ने कहा : मुनिश्रेष्ठ ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । क्यों न हो, वैष्णव जो ठहरे ! भादों के शुक्लपक्ष की एकादशी ‘पधा’ के नाम से विख्यात है । उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा होती है । यह उत्तम व्रत अवश्य करने योग्य है । सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि हो गये हैं । वे अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया करते थे । उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था, मानसिक चिन्ताएँ नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था । उनकी प्रजा निर्भय तथा धन धान्य से समृद्ध थी । महाराज के कोष में केवल न्यायोपार्जित धन का ही संग्रह था । उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने अपने धर्म में लगे रहते थे । मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देनेवाली थी । उनके राज्यकाल में प्रजा को बहुत सुख प्राप्त होता था ।

🌹 एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर राजा के राज्य में तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई । इससे उनकी प्रजा भूख से पीड़ित हो नष्ट होने लगी । तब सम्पूर्ण प्रजा ने महाराज के पास आकर इस प्रकार कहा :

🌹 प्रजा बोली: नृपश्रेष्ठ ! आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए । पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नार’ कहा है । वह ‘नार’ ही भगवान का ‘अयन’ (निवास स्थान) है, इसलिए वे ‘नारायण’ कहलाते हैं । नारायणस्वरुप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापकरुप में विराजमान हैं । वे ही मेघस्वरुप होकर वर्षा करते हैं, वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है । नृपश्रेष्ठ ! इस समय अन्न के बिना प्रजा का नाश हो रहा है, अत: ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे हमारे योगक्षेम का निर्वाह हो ।

🌹 राजा ने कहा : आप लोगों का कथन सत्य है, क्योंकि अन्न को ब्रह्म कहा गया है । अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जगत जीवन धारण करता है । लोक में बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराण में भी बहुत विस्तार के साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओं के अत्याचार से प्रजा को पीड़ा होती है, किन्तु जब मैं बुद्धि से विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई अपराध नहीं दिखायी देता । फिर भी मैं प्रजा का हित करने के लिए पूर्ण प्रयत्न करुँगा ।

🌹 ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने गिने व्यक्तियों को साथ ले, विधाता को प्रणाम करके सघन वन की ओर चल दिये । वहाँ जाकर मुख्य मुख्य मुनियों और तपस्वियों के आश्रमों पर घूमते फिरे । एक दिन उन्हें ब्रह्मपुत्र अंगिरा ॠषि के दर्शन हुए । उन पर दृष्टि पड़ते ही राजा हर्ष में भरकर अपने वाहन से उतर पड़े और इन्द्रियों को वश में रखते हुए दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनि ने भी ‘स्वस्ति’ कहकर राजा का अभिनन्दन किया और उनके राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी । राजा ने अपनी कुशलता बताकर मुनि के स्वास्थय का समाचार पूछा । मुनि ने राजा को आसन और अर्ध्य दिया । उन्हें ग्रहण करके जब वे मुनि के समीप बैठे तो मुनि ने राजा से आगमन का कारण पूछा ।

🌹 राजा ने कहा : भगवन् ! मैं धर्मानुकूल प्रणाली से पृथ्वी का पालन कर रहा था । फिर भी मेरे राज्य में वर्षा का अभाव हो गया । इसका क्या कारण है इस बात को मैं नहीं जानता ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! सब युगों में उत्तम यह सत्ययुग है । इसमें सब लोग परमात्मा के चिन्तन में लगे रहते हैं तथा इस समय धर्म अपने चारों चरणों से युक्त होता है । इस युग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे लोग नहीं । किन्तु महाराज ! तुम्हारे राज्य में एक शूद्र तपस्या करता है, इसी कारण मेघ पानी नहीं बरसाते । तुम इसके प्रतिकार का यत्न करो, जिससे यह अनावृष्टि का दोष शांत हो जाय ।

🌹 राजा ने कहा : मुनिवर ! एक तो वह तपस्या में लगा है और दूसरे, वह निरपराध है । अत: मैं उसका अनिष्ट नहीं करुँगा । आप उक्त दोष को शांत करनेवाले किसी धर्म का उपदेश कीजिये ।

🌹 ॠषि बोले : राजन् ! यदि ऐसी बात है तो एकादशी का व्रत करो । भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष में जो ‘पधा’ नाम से विख्यात एकादशी होती है, उसके व्रत के प्रभाव से निश्चय ही उत्तम वृष्टि होगी । नरेश ! तुम अपनी प्रजा और परिजनों के साथ इसका व्रत करो ।

🌹 ॠषि के ये वचन सुनकर राजा अपने घर लौट आये । उन्होंने चारों वर्णों की समस्त प्रजा के साथ भादों के शुक्लपक्ष की ‘पधा एकादशी’ का व्रत किया । इस प्रकार व्रत करने पर मेघ पानी बरसाने लगे । पृथ्वी जल से आप्लावित हो गयी और हरी भरी खेती से सुशोभित होने लगी । उस व्रत के प्रभाव से सब लोग सुखी हो गये ।

🌹 भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! इस कारण इस उत्तम व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए । ‘पधा एकादशी’ के दिन जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढकँकर दही और चावल के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिए, साथ ही छाता और जूता भी देना चाहिए । दान करते समय निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए :

*नमो नमस्ते गोविन्द *बुधश्रवणसंज्ञक ॥*
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव ।
भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥

‘बुधवार और श्रवण नक्षत्र के योग से युक्त द्वादशी के दिन बुद्धश्रवण नाम धारण करनेवाले भगवान गोविन्द ! आपको नमस्कार है… नमस्कार है ! मेरी पापराशि का नाश करके आप मुझे सब प्रकार के सुख प्रदान करें । आप पुण्यात्माजनों को भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले तथा सुखदायक हैं |’

राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।


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🙏🙏 ઋષિપાંચમ 🙏🙏

આજે ઋષિપાંચમ છે. આપણાં સુખ અને સમૃદ્ધિની સતત ચિંતા કરનારા આપણાં મહાન ઋષિઓ અને આપણાં પ્રતાપી પૂર્વજોનું સ્મરણ કરવાનો દિવસ.

સપ્તમ મનવન્તરના 7 ઋષિઓએ માનવજાતને સુખી અને સમૃદ્ધ બનાવવા માટે અદ્વિતીય યોગદાન આપ્યું છે. આજે આ સાત ઋષિઓનું સ્મરણ કરી એમના જીવનમાંથી પ્રેરણા પ્રાપ્ત કરવાનું પર્વ છે. નવી પેઢીને આ સાત ઋષિનો પાતળો પરિચય જરૂરથી આપજો.

1. કશ્યપ ઋષિ🙏
બ્રહ્માજીના માનસપુત્ર એવા મરીચિ ઋષિના તેઓ પુત્ર છે. સૃષ્ટિના સર્જનમાં એમણે આપેલા યોગદાનને લીધે એમને પ્રજાપતિ તરિકે પણ ઓળખવામાં આવે છે. આજે પણ ધાર્મિક વિધિ વખતે જો કોઈને એના ગોત્રની જાણ ન હોય તો કશ્યપ ગોત્ર તરીકે ઓળખ અપાય છે.

2. અત્રિ ઋષિ🙏
અત્રિ ઋષિના પત્ની અનસૂયાની કથા સૌ કોઈએ સાંભળી જ હશે જેમને બ્રહ્મા, વિષ્ણુ અને મહેશને પોતાના તપના પ્રભાવથી નાના બાળક બનાવી દીધા હતા. મહાન અત્રિ ઋષિ ભગવાન દત્તાત્રેય અને દુર્વાસા ઋષિના પિતા છે. એમના ત્રીજા પુત્ર સોમે સોમનાથ જ્યોતિર્લિંગની સ્થાપના કરી હતી.

3.વસિષ્ઠ ઋષિ🙏
વસિષ્ઠજી રઘુવંશના કુલગુરુ હતા એ રીતે તેઓ ભગવાન શ્રીરામના કુલ ગુરુ હતા. તેઓ મહાન ઋષિ પરાસરના દાદા અને મહાભારત સહિત અનેક ગ્રંથોના રચયિતા વેદવ્યાસજીના પરદાદા થાય.

4.વિશ્વામિત્ર ઋષિ🙏
વિશ્વામિત્ર રાજવી હતા અને રાજપાટ છોડીને સન્યાસી થયા હતા. ભગવાન પરશુરામના પિતા એવા જમદગ્નિ ઋષિના તેઓ મામા થાય. જમદગ્નિ ઋષિના માતા સત્યવતી અને વિશ્વામિત્ર બંને ગાઘી રાજાના સંતાનો હતા.

5.ગૌતમ ઋષિ🙏
ગૌતમ ઋષિને ન્યાયશાસ્ત્રના પંડિત કહેવામાં આવે છે. રસાયણ વિજ્ઞાન સહિતના જુદા જુદા વિષયોના તેઓ જ્ઞાતા હતા. એમના દીકરી અંજની એટલે હનુમાનજીના માતા. આમ ગૌતમ ઋષિ હનુમાનજીના નાના થાય.

6.જમદગ્નિ ઋષિ🙏
તેઓ રુચિક ઋષિના પુત્ર હતા. વિશ્વામિત્રના બહેન સત્યવતીના સંતાન એટલે વિશ્વામિત્ર ઋષિના ભાણેજ થાય. માતા સત્યવતી તેઓને તપસ્વી બનાવવા માંગતા હતા પરંતુ તેનામાં ક્ષત્રિય જેવા શૂરવીરના લક્ષણો હતા. ભગવાન પરશુરામ એમના પુત્ર હતા.

7. ભરદ્વાજ ઋષિ🙏
ભરદ્વાજ ઋષિ યંત્ર વિજ્ઞાનના નિષ્ણાત હતા. તેઓએ લખેલા ‘વૈમાનિકમ્’ નામના ગ્રંથમાં વિમાન બનાવવાની પદ્ધતિનું વિગતવાર વર્ણન કરેલ છે. ‘યંત્ર સર્વસ્વમ’ નામના ગ્રંથમાં યંત્રોના વિજ્ઞાનની વાતો લખી છે. ભરદ્વાજ ઋષિના પુત્ર દ્રોણ કૌરવો અને પાંડવોના ગુરુ હતા.

ઋષિપંચમીના પાવન પર્વે આ સપ્તર્ષિ સહિત આપણાં દિવંગત પૂર્વજોના ચરણોમાં
🙏🙏🙏 🙏🙏
@જયેશભાઈ માલવી (પ્રજાપતિ)