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श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व


श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व

लेखक:- डॉ. ओमप्रकाश पांडे
(लेखक अंतरिक्ष विज्ञानी हैं)

श्राद्ध कर्म श्रद्धा का विषय है। यह पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में प्रैति कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प्रैति ही बाद में बोलचाल में प्रेत बन गया। यह कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण हैं। आत्मा तो कहीं नहीं जाती, वह तो सर्वव्यापक है, उसे छोड़ दें तो शरीर से जब मन को निकलना होता है, तो मन प्राण के साथ निकलता है। प्राण मन को लेकर निकलता है। प्राण जब निकल जाता है तो शरीर को जीवात्मा को मोह रहता है। इसके कारण वह शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता है, कहीं जाता नहीं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है, उस समय प्राण मन को लेकर चलता है। मन कहाँ से आता है? कहा गया है चंद्रमा मनस: लीयते यानी मन चंद्रमा से आता है। यह भी कहा है कि चंद्रमा मनसो जात: यानी मन ही चंद्रमा का कारक है। इसलिए जब मन खराब होता है या फिर पागलपन चढ़ता है तो उसे अंग्रेजी में ल्यूनैटिक कहते हैं। ल्यूनार का अर्थ चंद्रमा होता है और इससे ही ल्यूनैटिक शब्द बना है। मन का जुड़ाव चंद्रमा से है। इसलिए हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती हैं।
चंद्रमा वनस्पति का भी कारक है। रात को चंद्रमा के कारण वनस्पतियों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए रात को ही पौधे अधिक बढ़ते हैं। दिन में वे सूर्य से प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन लेते हैं और रात चंद्रमा की किरणों से बढ़ते हैं। वह अन्न जब हम खाते हैं, उससे रस बनता है। रस से अशिक्त यानी रक्त बनता है। रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से मज्जा और मज्जा के बाद अस्थि बनती है। अस्थि के बाद वीर्य बनता है। वीर्य से ओज बनता है। ओज से मन बनता है। इस प्रकार चंद्रमा से मन बनता है। इसलिए कहा गया कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। मन जब जाएगा तो उसकी यात्रा चंद्रमा तक की होगी। दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी ओर अग्रसर होगा। प्राण मन को उस ओर ले जाएगा। चूंकि 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है, इसलिए चंद्रमा घूम कर अट्ठाइसवें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है। मन की यह 28 दिन की यात्रा होती है। इन 28 दिनों तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए श्राद्धों की व्यवस्था की गई है।
चंद्रमा सोम का कारक है। इसलिए उसे सोम भी कहते हैं। सोम सबसे अधिक चावल में होता है। धान हमेशा पानी में डूबा रहता है। सोम तरल होता है। इसलिए चावल के आटे का पिंड बनाते हैं। तिल और जौ भी इसमें मिलाते हैं। इसमें पानी मिलाते हैं, घी भी मिलाते हैं। इसलिए इसमें और भी अधिक सोमत्व आ जाता है। हथेली में अंगूठे और तर्जनी के मध्य में नीचे का उभरा हुआ स्थान है, वह शुक्र का होता है। शुक्र से ही हम जन्म लेते हैं और हम शुक्र ही हैं, इसलिए वहाँ कुश रखा जाता है। कुश ऊर्जा का कुचालक होता है। श्राद्ध करने वाला इस कुश रखे हाथों से इस पिंड को लेकर सूंघता है। चूंकि उसका और उसके पितर का शुक्र जुड़ा होता है, इसलिए वह उसे श्रद्धाभाव से उसे आकाश की ओर देख कर पितरों के गमन की दिशा में उन्हें मानसिक रूप से उन्हें समर्पित करता है और पिंड को जमीन पर गिरा देता है। इससे पितर फिर से ऊर्जावान हो जाते हैं और वे 28 दिन की यात्रा करते हैं। इस प्रकार चंद्रमा के तेरह महीनों में श्येन पक्षी की गति से वह चंद्रमा तक पहुँचता है। यह पूरा एक वर्ष हो जाता है। इसके प्रतीक के रूप में हम तेरहवीं करते हैं। गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं। इसलिए हर 28वें दिन पिंडदान किया जाता है। उसके बाद हमारा कोई अधिकार नहीं। चंद्रमा में जाते ही मन का विखंडन हो जाएगा।
पिंडदान कराते समय पंडित लोग केवल तीन ही पितरों को याद करवाते हैं। वास्तव में सात पितरों को स्मरण करना चाहिए। हर चीज सात हैं। सात ही रस हैं, सात ही धातुएं हैं, सूर्य की किरणें भी सात हैं। इसीलिए सात जन्मों की बात कही गई है। पितर भी सात हैं। सहो मात्रा 56 होती हैं। कैसे? इसे समझें। व्यक्ति, उसका पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध पितामह, अतिवृद्ध पितामह और सबसे बड़े वृद्धातिवृद्ध पितामह, ये सात पीढियां होती हैं। इनमें से वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश, अतिवृद्ध पितामह का तीन अंश, वृद्ध पितामह का छह अंश, प्रपितामह का दस अंश, पितामह का पंद्रह अंश और पिता का इक्कीस अंश व्यक्ति को मिलता है। इसमें उसका स्वयं का अर्जित 28 अंश मिला दिया जाए तो 56 सहो मात्रा हो जाती है। जैसे ही हमें पुत्र होता है, वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश उसे चला जाता है और उनकी मुक्ति हो जाती है। इससे अतिवृद्ध पितामह अब वृद्धातिवृद्ध पितामह हो जाएगा। पुत्र के पैदा होते ही सातवें पीढ़ी का एक व्यक्ति मुक्त हो गया। इसीलिए सात पीढिय़ों के संबंधों की बात होती है।
अब यह समझें कि 15 दिनों का पितृपक्ष हम क्यों मनाते हैं। यह तो हमने जान लिया है कि पितरों का संबंध चंद्रमा से है। चंद्रमा की पृथिवी से दूरी 385000 कि.मी. की दूरी पर है। हम जिस समय पितृपक्ष मनाते हैं, यानी कि आश्विन महीने के पितृपक्ष में, उस समय पंद्रह दिनों तक चंद्रमा पृथिवी के सर्वाधिक निकट यानी कि लगभग 381000 कि.मी. पर ही रहता है। उसका परिक्रमापथ ही ऐसा है कि वह इस समय पृथिवी के सर्वाधिक निकट होता है। इसलिए कहा जाता है कि पितर हमारे निकट आ जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा है विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति यानी विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का एक पक्ष हमारे सामने होता है जिसे हम देखते हैं। परंतु चंद्रमा का दूसरा पक्ष हम कभी देख नहीं पाते। इस समय चंद्रमा दक्षिण दिशा में होता है। दक्षिण दिशा को यम का घर माना गया है। आज हम यदि आकाश को देखें तो दक्षिण दिशा में दो बड़े सूर्य हैं जिनसे विकिरण निकलता रहता है। हमारे ऋषियों ने उसे श्वान प्राण से चिह्नित किया है। शास्त्रों में इनका उल्लेख लघु श्वान और वृहद श्वान के नाम से हैं। इसे आज केनिस माइनर और केनिस मेजर के नाम से पहचाना जाता है। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी आता है। वहाँ कहा है श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान। अथर्ववेद 8/1/19 के इस मंत्र में इन्हीं दोनों सूर्यों की चर्चा की गई है। श्राद्ध में हम एक प्रकार से उसे ही हवि देते हैं कि पितरों को उनके विकिरणों से कष्ट न हो।
इस प्रकार से देखा जाए तो पितृपक्ष और श्राद्ध में हम न केवल अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, बल्कि पूरा खगोलशास्त्र भी समझ ले रहे हैं। श्रद्धा और विज्ञान का यह एक अद्भुत मेल है, जो हमारे ऋषियों द्वारा बनाया गया है। आज समाज के कई वर्ग श्राद्ध के इस वैज्ञानिक पक्ष को न जानने के कारण इसे ठीक से नहीं करते। कुछ लोग तीन दिन में और कुछ लोग चार दिन में ही सारी प्रक्रियाएं पूरी कर डालते हैं। यह न केवल अशास्त्रीय है, बल्कि हमारे पितरों के लिए अपमानजनक भी है। जिन पितरों के कारण हमारा अस्तित्व है, उनके निर्विघ्न परलोक यात्रा की हम व्यवस्था न करें, यह हमारी कृतघ्नता ही कहलाएगी।
पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द पा रक्षणे धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।
(वार्ताधारित)
✍🏻साभार: भारतीय धरोहर
भारतीय धरोहर

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करवा चौथ की कहानी


करवा चौथ की कहानी

#परम्परागत कथा (रानी #वीरवती की कहानी)

बहुत समय
पहले वीरवती नाम की एक सुन्दर लड़की थी। वो अपने सात भाईयों की इकलौती बहन थी।
उसकी शादी एक राजा से हो गई। शादी के बाद पहले करवा चौथ के मौके पर वो अपने
मायके आ गई। उसने भी करवा चौथ का व्रत रखा लेकिन पहला करवा चौथ होने की वजह से
वो भूख और प्यास बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। वह बेताबी से चांद के उगने का
इन्तजार करने लगी। उसके सातों
भाई उसकी ये हालत देखकर परेशान हो गये। वे अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्यार करते
थे। उन्होंने वीरवती का व्रत समाप्त करने की योजना बनाई और पीपल के पत्तों के
पीछे से आईने में नकली चांद की छाया दिखा दी। वीरवती ने इसे असली चांद समझ
लिया और अपना व्रत समाप्त कर खाना खा लिया। रानी ने जैसे ही खाना खाया वैसे ही
समाचार मिला कि उसके पति की तबियत बहुत खराब हो गई है।

रानी तुरंत अपने राजा के पास भागी। रास्ते में उसे भगवान शंकर पार्वती देवी के
साथ मिले। पार्वती देवी ने रानी को बताया कि उसके पति की मृत्यु हो गई है
क्योंकि उसने नकली चांद देखकर अपना व्रत तोड़ दिया था। रानी ने तुरंत क्षमा
मांगी। पार्वती देवी ने कहा, ”तुम्हारा पति फिर से जिन्दा हो जायेगा लेकिन
इसके लिये तुम्हें करवा चौथ का व्रत कठोरता से संपन्न करना होगा। तभी तुम्हारा
पति फिर से जीवित होगा।” उसके बाद रानी वीरवती ने करवा चौथ का व्रत पूरी विधि
से संपन्न किया और अपने पति को दुबारा प्राप्त किया।

इस पर्व से संबंधित अनेक कथाएं प्रसिध्द हैं जिनमें सत्यवान और सावित्री की
कहानी भी बहुत प्रसिध्द है।…………..शास्त्रों के मुताबिक इस व्रत के
समान सौभाग्यदायक व्रत कोई दूसरा नहीं है। व्रत का ये विधान बेहद प्राचीन है।
कहा जाता है कि पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी करवाचौथ का उपवास किया था। इस
व्रत के देवता चंद्रमा माने गए हैं। इसके पीछे भी एक कहानी है। कहा जाता है कि
जब अर्जुन तप करने नीलगिरी पर्वत पर चले गए थे तो द्रौपदी परेशान हो गई। तब
कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ का व्रत रखने और चांद कि पूजा करने कि सलाह दी थी।

सैफाली अग्रवाल

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ગણપતી ઉત્સવ


*ગણપતી ઉત્સવ’ –*
*બળે છે મારું કાળજું*
*– સાંઈરામ દવે*

હે મારા પ્રીય ભકતો,

હું આજે તમને ફેસબૂક, વૉટ્સએપ અને ઈ.મેલ કરવા બેઠો છું. તમારા સુધી કોઈક તો પહોંચાડશે જ એવી આશા સાથે.
તમે લોકો છેલ્લાં ઘણાં વર્ષોથી ‘ગણપતી ઉત્સવ‘ ઉજવો છો એનાથી હું આમ તો ખુબ રાજી છું; પરન્તુ છેલ્લાં 10 વરસના ઑવરડોઝથી મારું કાળજું બળે છે. માટે જ આ લખવા પ્રેરાયો છું.

તમને યાદ તો છે ને કે .. 14મી સદીમાં સન્ત મોર્ય ગોસાવીએ પુણે પાસે મોરગાવમાં મારું પ્રથમ મન્દીર ‘મોર્યેશ્વર‘ બનાવ્યું હતું. ત્યારથી લોકો ગણપતીબાપા મોર્યને બદલે ‘મોરીયા’ બોલતા થયા.

તમે ભુલી ગયા કે મુગલો સામે હીન્દુત્વને એકઠું કરવા ઈ.સ. 1749માં
શીવાજી મહારાજે કુળદેવતા તરીકે મને (ગણપતીને) સ્થાપી પુજા શરુ કરાવી. તમને યાદ જ હશે કે ઈ.સ. 1893માં
બાળ ગંગાધર તીલકે મુમ્બઈના ગીરગાંવમાં સાર્વજનીક ગણેશ ઉત્સવથી અંગ્રેજો સામે ભારતને સંગઠીત કરવા આ ઉત્સવને ગરીમા બક્ષી.
વળી, પુણેમાં દગડુ શેઠે ઘરમાં મારી પધરામણી કરાવી, ત્યારથી દગડુશેઠ તરીકે મને પ્રસીદ્ધી મળી.

મારા આ ઉત્સવ સાથે ભારતને એક કરીને જગાડવાના કામના શ્રી ગણેશ ટીળકજીએ માંડ્યા’તા; પણ તમે લોકોએ હવે મારો તમાશો કરી નાંખ્યો છે. અરે યાર, શેરીએ–શેરીએ મારી (ગણપતીની) પધરામણી કરો છો, તમારી શ્રદ્ધાને અભિનંદન; પરન્તુ એકબીજાને બતાવી દેવા, સ્પર્ધા કરવા તમે લોકો તો મારા નામે ‘શક્તી–પ્રદર્શન‘ કરવા લાગ્યા છો.
આ ઉત્સવથી ભારતનું ભલું થાય એમ હતું એટલે આજ સુધી મેં આ બધું ચાલવા દીધું છે.
આ ગણપતી ઉત્સવનો સોસાયટીઓની ડૅકોરેશન કે જમણવારની હરીફાઈઓ માટે હરગીજ નથી. જેમને ખુરશી સીવાય બીજા એક પણ દેવતા સાથે લેવા–દેવા નથી તેઓ મારા ઉત્સવો શા માટે ઉજવી રહ્યા છે ?
આઈ એમ હર્ટ પ્લીઝ,
મારા વહાલા ભકતો, સમ્પતીનો આ વ્યય મારાથી જોવાતો નથી.

આખા દેશમાં ગણપતી ઉત્સવ દરમ્યાન
અગરબત્તીની દુકાનમાં લાઈન,
મીઠાઈની દુકાનમાં લાઈન, ફુલવાળાને ત્યાં લાઈન અરે યાર, આ બધું શું જરુરી છે?
માર્કેટની ડીમાન્ડને પહોંચી વળવા નકલી દુધ કે માવાની મીઠાઈઓ ડેરીવાળા પબ્લીકને ભટકાડે છે અને પબ્લીક મને પધરાવે છે..
હવે મારે ઈ ડુપ્લીકેટ લાડુ ખાઈને આશીર્વાદ કોને આપવા અને શ્રાપ કોને આપવા, કહો મને?

શ્રદ્ધાના આ અતીરેકથી હું ફ્રસ્ટ્રેટ થઈ ગયો છું.
એક ગામ કે શહેરમાં 50 કે 100 ગણપતી મહોત્સવ ઉજવાય એના કરતાં આખું ગામ કે શહેર કે બધી સોસાયટીઓ ભેગા મળીને ‘એક ગણપતી‘ ઉજવો તો સંત મોર્ય ગોસાવીનો, બાળ ગંગાધર ટીળકનો કે દગડુશેઠ અને શીવાજી મહારાજનો હેતુ સાર્થક થશે અને હું પણ રાજી..

હે…
વહાલા ગણેશભકતો,
હું તમારું ઍન્ટરટેઈનમેન્ટ નથી, હું તમારા દરેક શુભ કાર્યની શરુઆતનો નીમીત્ત છું,
અને તમે મારા ઉત્સવોથી મને જ ગોટે ચડાવી દીધો છે. હું દરેક ભક્તની વાત અને સુખ–દુઃખને ‘સાગરપેટો‘ બનીને સાચવી શકું તે માટે મેં મોટું પેટ રાખ્યું છે; પરન્તુ બ
મારા મોટા પેટનું કારણ ભુખ સમજીને મારા નામે તમે લોકો લાડવા દાબવા માંડ્યા.
મેં મોટા કાન રાખ્યા જેથી હું દરેક ભકતની ઝીણામાં ઝીણી વાત પણ સાંભળી શકું; પરન્તુ તમે લોકો તો
40000 વૉટની ડી. જે. સીસ્ટમ લગાડીને મારા કાન પકાવવા લાગ્યા છો.
મેં ઝીણી આંખો રાખી જેથી હું ઝીણા ભ્રષ્ટાચાર કે અનીષ્ટને પણ જોઈ શકું; પરન્તુ તમે તો તે ભ્રષ્ટાચારીઓ પાસેથી જ ફાળો ઉઘરાવાને મારી આરતી ઉતરાવો છો.

નવરાત્રીને તો તમે અભડાવી નાખી,
હવે ગણેશ ઉત્સવને ડાન્સ કે ડીસ્કો પાર્ટી ન બનાવો તો સારું.
માતાજીએ તમને માફ કર્યા હશે; પણ મને ગુસ્સો આવશે ને તો સુંઢભેગા સાગમટે પાડી દઈશ.
ઈટસ અ વોર્નીંગ.
કંઈક તો વીચાર કરો.
ચીક્કાર દારુ પીને મારી યાત્રામાં ડીસ્કો કરતાં તમને શરમ નથી આવતી ?
વ્યસનીઓએ ગણપતીબાપા મોરીયા નહીં;
પણ ગણપતીબાપા ‘નો–રીયા‘ બોલવું જોઈએ.

કરોડો રુપીયામાં મારા ઘરેણાંની હરાજી કરી લેવાથી હું પ્રસન્ન થઈ જાઉં એમ?
હું કાંઈ ફુલણશી છું કે લાખોની મેદની જોઈને હરખઘેલો થઈ જાઉં?
અરે, મારા ચરણે એક લાખ ભકતો ભલે ન આવે; પણ એકાદ સાચો ભકત દીલમાં સાચી શ્રદ્ધા લઈને આવશે ને તો ય હું રાજી થઈ જઈશ. લાડુના ઢગલા મારી સામે કરીને અન્નનો અતીરેક કરવા કરતાં ઝુંપડપટ્ટીના કોઈ ભુખ્યા બાળકને જમાડી દો, મને પહોંચી જશે.
મારા નામે આ દેખાડો થોડો ઓછો કરો. વહાલા ભક્તો, જે દરીયાએ અનેક ઔષધીઓ અને સમ્પત્તી તમને આપી છે એમાં જ મને પધરાવી દઈને પર્યાવરણનો કચ્ચરઘાણ વાળતાં સહેજ પણ વીચાર નથી કરતાં?
મારું વીસર્જન પણ કોઈ ગરીબના ઝુંપડાનું અજવાળું થાય એવું ન કરી શકો?

આ ગણપતી ઉત્સવે મારી છેલ્લી એક વાત માનશો ?
મારા નામે દાન કરવાની નક્કી કરેલી રકમના એક નાનકડા ભાગથી કોઈ ગરીબનાં છોકરા–છોકરીની સ્કુલની ફી ભરી દો તો મારું અન્તર રાજી થશે.
આ સમ્પત્તીનો વીવેકપુર્વક ઉપયોગ કરો.
આ ગણપતી ઉત્સવે ભારતને વફાદાર રહેવાના સોગંદ લો અને ભારતનો દરેક યુવાન, માવા, ફાકી, ગુટખા, દારુ અને તીનપત્તીમાંથી બહાર નીકળવાની કસમ ખાય અને દરેક દીકરીઓ ફેશનના સફોકેશનમાંથી બહાર નીકળવાની પ્રતીજ્ઞા લે તો જ આવતા વર્ષે આવીશ.
બાકી મારા નામે છુટા પાડવાનું, છેતરવાનું અને
દેવી–દેવતાઓને ઈમોશનલી બ્લેક મેઈલીંગ કરવાનું બન્ધ કરો.

કદાચ છેલ્લીવાર
ભારત આવેલો તમારો જ,

લી. ગણેશ

‘મહાદેવ‘ કૈલાશ પર્વત, સ્વર્ગલોકની બાજુમાં.

લેખક સમ્પર્ક :
શ્રી. સાંઈરામ દવે –
લોક સાહીત્યકાર
🍀

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गणपति नहीं होते तो यह गणराज्य भी नहीं होता।

महाराष्ट्र में गणेश पूजा का विशेष महत्व है क्योंकि इसकी शुरूआत महाराष्ट्र से ही हुई थी।महाराष्ट्र में 500 साल पहले लोग अपने घरों में गणेश की छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाते थे और उसकी पूजा करते थे। ऐसी मान्यता है कि पुणे में स्थित कस्बा पेठ गणपति मंदिर सबसे पुराना है जिसकी स्थापना शिवाजी की माता जीजामाता ने की थी और इसी मंदिर में जीजामाता और शिवाजी ने आदिल शाह से महाराष्ट्र वापस लेने का प्रण किया था।
शिवाजी के बाद पेशवाओं ने भी गणेश पूजा की परंपरा को जारी रखा। जब पेशवा बाजीराव ने शनिवार वाड़ा का निर्माण करवाया तो उन्होंने किले में गणेश भगवान की स्थापना की। पेशवाओं का शासन समाप्त होने और औपनिवेशिक युग शुरू होने के बाद शनिवार वाड़ा में होने वाला गणेशोत्सव भी बंद हो गया। हालांकि, बड़ौदा के गायकवाड़, इंदौर के होल्कर और ग्वालियर के सिंधिया के महलों में गणेशोत्सव उत्साह के साथ जारी रहा लेकिन महल के भीतर ही।

लोकमान्य तिलक और सार्वजनिक गणेश उत्सव

वह लोकमान्य तिलक ही थे जिन्होंने महल और घरों के बंद दरवाजों तक सीमित गणेश पूजा को सार्वजनिक उत्सव में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की और इसे महाराष्ट्र के घर घर का उत्सव बना दिया।1857 में अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम को कुचल कर क्रांतिकारियों को मार डाला था। अंग्रेजों के इस कदम से लोगों के दिलों में भय व्याप्त हो गया था। लोग एक जगह एकत्रित नहीं होते थे। लोकमान्य तिलक ने लोगों में व्याप्त भय को महसूस किया और माना कि जब तक लोग एक जगह एकत्रित होने की हिम्मत नहीं करेंगे तो अंग्रेजों से कैसे
लड़ेगे और देश को स्वतंत्रता कैसे मिलेंगी?
इस कारण लोगों को साथ में आने, सार्वजनिक स्थान में एकत्रित करने और उनमें आनंद, उर्जा और उमंग का संचार करने के साथ डर को मिटाने के लिए हर घर में होने वाली गणेश पूजा को सार्वजनिक पूजा में तब्दील कर दिया।
बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र के पुणे में 1893 में पहले सार्वजनिक गणेश उत्सव का आयोजन किया था। गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का माध्यम बनाया। गणेश उत्सव को उन्होंने एक आंदोलन का स्वरूप दे दिया।
तिलक के शुरू किए गणेशोत्सव ने सामाजिक चेतना और राष्ट्र के प्रति एकता जागृत करने का काम किया। तिलक के शुरू किए गए गणेशोत्सव की एक विशेषता यह भी रही कि इस उत्सव में हिन्दुओं के साथ सभी धर्मो, क्षेत्रों और जाति संप्रदायों के लोग शामिल हुए और इस कारण महाराष्ट्र में गणेशोत्सव एक सर्वव्यापी त्योहार बन गया। तिलक द्वारा शुरू किए गए गणेशोत्सव ने लोगों को एकजुट करने और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज महाराष्ट्र में गणेशोत्सव सबसे बड़ा त्योहार है। महाराष्ट्र गणपति को मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। लेकिन अंग्रेज तिलक के सार्वजनिक गणेशोत्सव को अंग्रेज शासन के लिए खतरा मानते थे।
भारतीय समाज को एक दूसरे के खिलाफ तलवार लिए खड़े सम्प्रदायों में तो अंग्रेजों ने बांटा ही। हमारे मंगल के प्रतीकों का भी उन्होंने सांप्रदायीकरण किया। वो जानते थे कि भारतीय समाज के मंगल में उनका अमंगल था। इसलिए उन्होंने तिलक के शुरू किए गए सार्वजनिक गणेशोत्सव को रोकने और उसमें व्यवधान डालने की कोशिश की,लेकिन वह सफल नहीं हो सके।
तिलक के कारण गणपति घर घर के देवता बन गए और सिर्फ हिन्दुओं के ही नहीं, हर धर्म के लोग गणपति में अपना मंगल देखने लगे। हर वर्ग में सब काम बिना किसी विध्न के सम्पन्न हों और चारों तरफ मांगल्य रहे इसलिए गणपति को सबसे पहले पूजा जाता है।
बच्चों को भी सबसे पहले ॐ श्री गणेशायनम: से लिखना पढ़ना सिखाया जाता है और विवाह की पत्रिका सबसे पहले गणपति को ही दी जाती है।
गणपति का ऐसा स्थान और महत्व हमारे धार्मिक ही नहीं सांस्कृतिक जीवन में भी है। घर घर मनते एक धार्मिक उत्सव को सार्वजनिक जीवन का मंगल उत्सव बनाने का श्रेय लोकमान्य तिलक को जाता है। लेकिन दस दिन तक मनने वाले इस सार्वजनिक उत्सव के आखिरी दिन जब गणपति का विसर्जन कर गणेश भक्त घर लौटते है तो घर में एक अजीब सा खालीपन महसूस करते हैं। जैसे बेटी की विदाई के बाद घर में खालीपन और मन उदास महसूस होता है वैसे ही गणपित बप्पा के विसर्जन के बाद अनुभव होता हैं।
गणपति विसर्जन के बाद जैसे घर के सामान्य जीवन का क्रम भी उदासी में डूबकर थम जाता है। ऐसा महसूस होता है जैसे जीवन का सारा उत्सव अपने ही हाथों नदी में विसर्जित करके बहा आए हों।हालांकि गणेश जी का महत्व और महात्म्य पूरे देश में है लेकिन महाराष्ट्र के लिए गणेश उत्सव क्या है यह दिल्ली या शेष भारत के लोग तब तक नहीं समझ पायेंगे जब तक खुद महाराष्ट्र जाकर नहीं देखेंगे। दिल्ली या देश के दूसरे हिस्सों में गणेशोत्सव की वो जातीय स्मृतियां नहीं हैं जो इस उत्सव को लगभग हर घर और हर वर्ग का उत्सव बना दें। ऐसा सिर्फ महाराष्ट्र में ही होता है।
गणपति की जितनी जरूरत हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन को है उतनी ही देश की राजनीति को भी है। जैसे महाराष्ट्र में गणपति ने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी वैसे ही आज हमारे नेताओं को कोई सद्बुद्धि दे सकता है तो वह बुद्धि और मंगल के देवता गणपति ही दे सकते हैं। हमारे गणराज्य को बचाने के लिए अग्रदूत के रूप में गणपति ही चाहिए क्योंकि गणपति नहीं होते तो यह गणराज्य भी नहीं होता।

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ગણપતી ઉત્સવ



* –*
*બળે છે મારું કાળજું*
*– સાંઈરામ દવે*

હે મારા પ્રીય ભકતો,

હું આજે તમને ફેસબૂક, વૉટ્સએપ અને ઈ.મેલ કરવા બેઠો છું. તમારા સુધી કોઈક તો પહોંચાડશે જ એવી આશા સાથે.
તમે લોકો છેલ્લાં ઘણાં વર્ષોથી ‘ગણપતી ઉત્સવ‘ ઉજવો છો એનાથી હું આમ તો ખુબ રાજી છું; પરન્તુ છેલ્લાં 10 વરસના ઑવરડોઝથી મારું કાળજું બળે છે. માટે જ આ લખવા પ્રેરાયો છું.

તમને યાદ તો છે ને કે .. 14મી સદીમાં સન્ત મોર્ય ગોસાવીએ પુણે પાસે મોરગાવમાં મારું પ્રથમ મન્દીર ‘મોર્યેશ્વર‘ બનાવ્યું હતું. ત્યારથી લોકો ગણપતીબાપા મોર્યને બદલે ‘મોરીયા’ બોલતા થયા.

તમે ભુલી ગયા કે મુગલો સામે હીન્દુત્વને એકઠું કરવા ઈ.સ. 1749માં
શીવાજી મહારાજે કુળદેવતા તરીકે મને (ગણપતીને) સ્થાપી પુજા શરુ કરાવી. તમને યાદ જ હશે કે ઈ.સ. 1893માં
બાળ ગંગાધર તીલકે મુમ્બઈના ગીરગાંવમાં સાર્વજનીક ગણેશ ઉત્સવથી અંગ્રેજો સામે ભારતને સંગઠીત કરવા આ ઉત્સવને ગરીમા બક્ષી.
વળી, પુણેમાં દગડુ શેઠે ઘરમાં મારી પધરામણી કરાવી, ત્યારથી દગડુશેઠ તરીકે મને પ્રસીદ્ધી મળી.

મારા આ ઉત્સવ સાથે ભારતને એક કરીને જગાડવાના કામના શ્રી ગણેશ ટીળકજીએ માંડ્યા’તા; પણ તમે લોકોએ હવે મારો તમાશો કરી નાંખ્યો છે. અરે યાર, શેરીએ–શેરીએ મારી (ગણપતીની) પધરામણી કરો છો, તમારી શ્રદ્ધાને અભિનંદન; પરન્તુ એકબીજાને બતાવી દેવા, સ્પર્ધા કરવા તમે લોકો તો મારા નામે ‘શક્તી–પ્રદર્શન‘ કરવા લાગ્યા છો.
આ ઉત્સવથી ભારતનું ભલું થાય એમ હતું એટલે આજ સુધી મેં આ બધું ચાલવા દીધું છે.
આ ગણપતી ઉત્સવનો સોસાયટીઓની ડૅકોરેશન કે જમણવારની હરીફાઈઓ માટે હરગીજ નથી. જેમને ખુરશી સીવાય બીજા એક પણ દેવતા સાથે લેવા–દેવા નથી તેઓ મારા ઉત્સવો શા માટે ઉજવી રહ્યા છે ?
આઈ એમ હર્ટ પ્લીઝ,
મારા વહાલા ભકતો, સમ્પતીનો આ વ્યય મારાથી જોવાતો નથી.

આખા દેશમાં ગણપતી ઉત્સવ દરમ્યાન
અગરબત્તીની દુકાનમાં લાઈન,
મીઠાઈની દુકાનમાં લાઈન, ફુલવાળાને ત્યાં લાઈન અરે યાર, આ બધું શું જરુરી છે?
માર્કેટની ડીમાન્ડને પહોંચી વળવા નકલી દુધ કે માવાની મીઠાઈઓ ડેરીવાળા પબ્લીકને ભટકાડે છે અને પબ્લીક મને પધરાવે છે..
હવે મારે ઈ ડુપ્લીકેટ લાડુ ખાઈને આશીર્વાદ કોને આપવા અને શ્રાપ કોને આપવા, કહો મને?

શ્રદ્ધાના આ અતીરેકથી હું ફ્રસ્ટ્રેટ થઈ ગયો છું.
એક ગામ કે શહેરમાં 50 કે 100 ગણપતી મહોત્સવ ઉજવાય એના કરતાં આખું ગામ કે શહેર કે બધી સોસાયટીઓ ભેગા મળીને ‘એક ગણપતી‘ ઉજવો તો સંત મોર્ય ગોસાવીનો, બાળ ગંગાધર ટીળકનો કે દગડુશેઠ અને શીવાજી મહારાજનો હેતુ સાર્થક થશે અને હું પણ રાજી..

હે…
વહાલા ગણેશભકતો,
હું તમારું ઍન્ટરટેઈનમેન્ટ નથી, હું તમારા દરેક શુભ કાર્યની શરુઆતનો નીમીત્ત છું,
અને તમે મારા ઉત્સવોથી મને જ ગોટે ચડાવી દીધો છે. હું દરેક ભક્તની વાત અને સુખ–દુઃખને ‘સાગરપેટો‘ બનીને સાચવી શકું તે માટે મેં મોટું પેટ રાખ્યું છે; પરન્તુ બ
મારા મોટા પેટનું કારણ ભુખ સમજીને મારા નામે તમે લોકો લાડવા દાબવા માંડ્યા.
મેં મોટા કાન રાખ્યા જેથી હું દરેક ભકતની ઝીણામાં ઝીણી વાત પણ સાંભળી શકું; પરન્તુ તમે લોકો તો
40000 વૉટની ડી. જે. સીસ્ટમ લગાડીને મારા કાન પકાવવા લાગ્યા છો.
મેં ઝીણી આંખો રાખી જેથી હું ઝીણા ભ્રષ્ટાચાર કે અનીષ્ટને પણ જોઈ શકું; પરન્તુ તમે તો તે ભ્રષ્ટાચારીઓ પાસેથી જ ફાળો ઉઘરાવાને મારી આરતી ઉતરાવો છો.

નવરાત્રીને તો તમે અભડાવી નાખી,
હવે ગણેશ ઉત્સવને ડાન્સ કે ડીસ્કો પાર્ટી ન બનાવો તો સારું.
માતાજીએ તમને માફ કર્યા હશે; પણ મને ગુસ્સો આવશે ને તો સુંઢભેગા સાગમટે પાડી દઈશ.
ઈટસ અ વોર્નીંગ.
કંઈક તો વીચાર કરો.
ચીક્કાર દારુ પીને મારી યાત્રામાં ડીસ્કો કરતાં તમને શરમ નથી આવતી ?
વ્યસનીઓએ ગણપતીબાપા મોરીયા નહીં;
પણ ગણપતીબાપા ‘નો–રીયા‘ બોલવું જોઈએ.

કરોડો રુપીયામાં મારા ઘરેણાંની હરાજી કરી લેવાથી હું પ્રસન્ન થઈ જાઉં એમ?
હું કાંઈ ફુલણશી છું કે લાખોની મેદની જોઈને હરખઘેલો થઈ જાઉં?
અરે, મારા ચરણે એક લાખ ભકતો ભલે ન આવે; પણ એકાદ સાચો ભકત દીલમાં સાચી શ્રદ્ધા લઈને આવશે ને તો ય હું રાજી થઈ જઈશ. લાડુના ઢગલા મારી સામે કરીને અન્નનો અતીરેક કરવા કરતાં ઝુંપડપટ્ટીના કોઈ ભુખ્યા બાળકને જમાડી દો, મને પહોંચી જશે.
મારા નામે આ દેખાડો થોડો ઓછો કરો. વહાલા ભક્તો, જે દરીયાએ અનેક ઔષધીઓ અને સમ્પત્તી તમને આપી છે એમાં જ મને પધરાવી દઈને પર્યાવરણનો કચ્ચરઘાણ વાળતાં સહેજ પણ વીચાર નથી કરતાં?
મારું વીસર્જન પણ કોઈ ગરીબના ઝુંપડાનું અજવાળું થાય એવું ન કરી શકો?

આ ગણપતી ઉત્સવે મારી છેલ્લી એક વાત માનશો ?
મારા નામે દાન કરવાની નક્કી કરેલી રકમના એક નાનકડા ભાગથી કોઈ ગરીબનાં છોકરા–છોકરીની સ્કુલની ફી ભરી દો તો મારું અન્તર રાજી થશે.
આ સમ્પત્તીનો વીવેકપુર્વક ઉપયોગ કરો.
આ ગણપતી ઉત્સવે ભારતને વફાદાર રહેવાના સોગંદ લો અને ભારતનો દરેક યુવાન, માવા, ફાકી, ગુટખા, દારુ અને તીનપત્તીમાંથી બહાર નીકળવાની કસમ ખાય અને દરેક દીકરીઓ ફેશનના સફોકેશનમાંથી બહાર નીકળવાની પ્રતીજ્ઞા લે તો જ આવતા વર્ષે આવીશ.
બાકી મારા નામે છુટા પાડવાનું, છેતરવાનું અને
દેવી–દેવતાઓને ઈમોશનલી બ્લેક મેઈલીંગ કરવાનું બન્ધ કરો.

કદાચ છેલ્લીવાર
ભારત આવેલો તમારો જ,

લી. ગણેશ

‘મહાદેવ‘ કૈલાશ પર્વત, સ્વર્ગલોકની બાજુમાં.

લેખક સમ્પર્ક :
શ્રી. સાંઈરામ દવે –
લોક સાહીત્યકાર અને હાસ્યકલાકાર
🍀

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મોળાકત વ્રત


અષાઢ શુદ અગિયારસથી પુર્ણિમા સુધી હિંદુ કુમારીકા મોળાકતનુ વ્રત કરે છે અને પુર્ણિમાનની રાત્રે જાગરણ કર્યા પછી સવારથી પુરણાહુતી
કરે છે ….
…કુમારિકાઓ આ વ્રતમા દેદો કુટવાનો રિવાજ ચાલ્યો આવ્યો છે આ રિવાજ શી રીતે ચાલુ થયો અને એની પાછળ નું સત્ય કારણ તમને જણાવા માંગુ છુ…
…કાઠીયાવાડમાં આવેલા લાઠી ગામ પાસે એક વખતે આર્ય કુમારિકાઓ એકથી મળીને રાસ ગરબા રમતી હતી
અષાઢ માસની પુર્ણિમાની રાત્રી એ મધુર કંઠે ગવાતા રાસ ગરબા સંભાળતા હતા સામસામી તાળી દેતા સુંદર સુકોમળ હાથની હિરાજડીત ચુડલીઓની ઘુઘરીઓનો રણઝણી રહી હતી એ વખતે કોણ જાણે ક્યાંથી એક બાદશાહ ત્યાથી પસાર થતો હતો તેણે આ દશ્ય જોયુ કુમારિકાઓની કંકુવર્ણી કાયા જોઇ તેમના યૌવન પર નજર ઠરી …
તેણે સરદાર ને હુકમ કર્યો ગરબે રમતી તમામ કુમારિકા ને કોટમા પુરો
સરદાર ને તેની દેખરેખ સોપી બાદશાહ આગળ ચાલતો થયો…
કુમારિકાઓ એ કાળો કકળાટ મચાવ્યો તેમનું આ કરૂણ આક્રદ અને હૈયાફાટ રૂદન સાંભળીને ..એક યુવાન અંગે હજી પીઠી ચોળેલી જેના હાથમાં હજી મીઢોળ બાંધાયો હતો હજી લગ્નજીવનનો આનંદ માણવાનો બાકી હતો..
તેણે આ કુમારિકાઓની રાડ સાંભળી તેનું યૌવન ઊકળી ઊઠ્યું
..હાથ મીંડોળ ને અંગ પીઠી ભર્યુ
લગનનો હરખ હૈયે ભરેલો
વીર દેદારમલ દેવના દુત સમો
એ સ્થળે આજ આવી ચડેલો
આર્યબાળાતંણું કથન કાને ધર્યુ…..
એ યુવાન નુ નામ હતું દેદારમલ તેણે તલવાર મ્યાનમાંથી કાઢી અને કિલ્લાના દરવાજે ચોકી કરતા સરદાર સાથે જંગે ચડીયો સરદાર અને એના સૈનિકોને મારી દેદારમલ પોતે મરાયો પણ અંતે તેણે કુમારિકાઓને મુક્તિ અપાવી
…આર્ય કુમારિકાઓને મોળાકત નું જાગરણ હતું તેમને મુક્તિ મળતાં જ બાકીની રાત રાસ ગરબાને બદલે પોતાને યવનોના પંજામાંથી છોડાવનાર રાજપુત યુવાન વીર દેદારમલના છાજિયા લઇને(દેદો કુટીને) પસાર કરી છાજિયા એટલા માટે કે એ યુવાનનાં લગ્નના કોડ અધુરા રહી ગયા.મીંઢળબંધો અને પીઠી ચોળેલ એ યુવાન લગનને માંડવે જવાના બદલે મોતને માંડવે જઇ પોહોચ્યો
. આર્ય કુમારીકા ગીત ગાતી પછી
નામ દેદારમલ વીર જાણી
ગામ લાઠી તણા ચોકમાં છે ખડી
યાદ ગીરી વદે લોકવાણી
ધન્ય હો ધન્ય રણવીર દેદારમલ
વિણ સ્વાર્થ ભલું કામ કીધું
એક પળવાર મા ઇન્દ્ર દરબારમા
…….કહેવાનું તાત્પર્ય
ઊચ્ચ કોટી તણુ સ્થાન લીધું .

કહેવાનું તાત્પર્ય એટલું કે આપણા વાર તહેવાર વ્રતનો રિવાજો પાછળ કુરબાની ના આવાં કેટલાય કિસ્સાઓ છુપાયા હશે ..
…કુમારીકાઓના મોળાકતના વ્રત કદાચ વખત જતા ભુલાઇ જશે ..પણ આ વ્રત કથા પાછળ એક રજપુત યુવાન વીર ની કુરબાની ની કથા છે તે ભુલવા સરખી છે ખરી???
•● સંત શુરા અને સતીઓ ગ્રુપ ●

卐 વિરમદેવસિહ પઢેરીયા 卐
卐…………..ॐ………….卐

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શીતળા સાટમ

શીતળા સાતમની ‘કુલેર’…
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શીતળા સાતમની સવાર પડે એટલે અમુ શેઠની દુકાને નાળિયેર લેવા જવાનું મારા ભાગે આવતું. મારી પાસે બે નાળિયેર મંગાવવામાં આવતા. એક શીતળા માતાનું અને બીજું બળિયાદેવ નું… અમુશેઠની દુકાને કોથળો ભરીને નાળિયેર પડ્યા હોય. મારી જેમ ત્યાં ઘણાલોકો નાળિયેર લેવા આવ્યા હોય અને કોથળામાંથી નાળિયેર કાઢીને કાનપાસે લઈ જઈ અને હલાવતા. એ વખતે મારી ઉંમર નાની એટલે એ જોઈને કૌતુક થતું. યંત્રવત હું પણ નાળિયેરને કાન પાસે લઈ જઈને હલાવતો. પરંતુ, બીજા બધા જેમ કરતા હતા તેમનું અનુકરણ હું કરતો હતો. થેલીમાં નાળિયેર લઈને હું દોડતો ઘેર જતો. નાળિયેરની ચોટલી ઉતારવાનું બહુ કપરું કામ હોય તેવું એ વખતે મને લાગતું. ચોટલી ઉતારનારને બહુ પરિશ્રમ પડતો હોય તેવું તેમના ચહેરા ઉપર જોયા પછી લાગતું. નાળિયેર ઉપર થોડીક ચોટલી રહેવા દેવામાં આવતી. બા પાણીયારે દીવો કરતી. બાજરાના લોટમાં ઘી ગોળ ભેળવીને કુલેર બનાવતી. નાળિયેર અને કુલેર લઈને સહુ તળાવ જતા. તળાવના આરે એક છત્રી નીચે ગામના રાવળદેવ શીતળામાતાનું સ્થાપન કરતા. મહિલાઓ ગલોટિયા ખાઈને માતાજીના સ્થાપનથી તળાવના પાણી સુધી જતી. અડધું નાળિયેર શીતળા માતા પાસે મુકવામા આવતું અને અડધું પાછું આપતા એ સાથે ઘેર લઈ જતા. તળાવના આરે મહિલાઓને ગલોટિયા ખાતા જોઈ આશ્ચર્ય થતું. કશું સમજાતું નહોતું છતાંય એ બધું બાળપણમાં જોવુ ગમતું. આ સહુ માટે શ્રદ્ધાનો વિષય હતો. દરેક મહિલા શીતળા માતા પાસે પોતાના પરિવારને હેમખેમ અને તંદુરસ્ત રાખવા અરજ કરતી હશે કદાચ… પણ, અમને તો ઉતાવળ રહેતી હતી ઝડપથી ઘેર પહોંચી ટોપરું અને કુલેર ખાવાની… કુલેર સાથે ટોપરાનો એવો અનોખો સ્વાદ આવતો હતો કે એ આજે પણ ભુલાયો નથી. આખું વરસ ચૂલા ઉપર રાંધીને પેટ ભરતા સહુ માટે આજે ચૂલો સદંતર બંધ રહેતો. અને એ ચૂલો બંધ રહેતો છતાંય ભૂખ તો સહુને ટાઇમસર જ લાગતી હતી. એટલે ચૂલા વગર કુલેર બનાવી શકાય એટલે કુલેર બનાવવામાં આવતી. ચોમાસાનો સમય હોય એટલે પેટને લગતા ઘણા રોગ થવાની સંભાવના વધી જાય. ત્યારે , કુલેર ખાવાથી પેટને ટાઢક વળે અને પેટની ગરમીના રોગ ન થાય તેવી ગુણકારી કુલેર હતી. ઘરના ઘી અને શુદ્ધ અનાજને કારણે કુલરનો સ્વાદ બેવડાઈ જતો. આખું વરસ ભર્યા ભાણે જમનાર વ્યક્તિ પણ સાતમના દિવસે ટોપરું અને કુલેર હોંશે હોંશે ખાતા હતા. આપણી સંસ્કૃતિમાં ઋતુઓના બદલાવ પ્રમાણે આહાર વ્યવસ્થા હતી. અને એ શરીર માટે ઉપકારક પણ હતી. અમારા ગામની બહાર પુરણ સ્વામીની જગ્યામાં શીતળામાતાનું મંદિર હતું. એ મંદિરની આગળના ભાગમાં એક પાંચ ફૂટ ઊંચાઈનો એક સહેજ ઘડતર કરેલો પથ્થર ઉભો કરેલો હતો. સહુ કહેતા કે એ બળિયાદેવ છે.તેમના ઉપર વાટકો ભરીને લોટ ચડાવવામાં આવતો. આવું કેમ કરવામાં આવતું હશે તેની પડપૂછ માં પડ્યા વગર ઘેરથી પિત્તળિયું ભરી લોટ લઈને બળિયાદેવ જતા. શીતળા સાતમ હોય કે ગોકુળ આઠમ પરંતુ આ બધું લોકજીવન હતું. આ લોકજીવન પરંપરાઓ સામે સહેજ પણ શંકા નહોતું કરતું. તર્કને ખીંટીએ ભેરવીને સહજતાથી સહુનું જીવન પસાર થઈ જતું. સાંજે શીતળા માતાની આરતી થતી. સહુ ગામલોકો કુલેર અને ટોપરાનો પ્રસાદ લઈને છુટા પડતા. વરસભર કેલેન્ડરના પાના ઉપર દિવસો અફળાયા કરતા. એક પછી બીજા તહેવારો આવતા રહેતા. ગ્રામીણ જીવન તહેવારોને દિલથી વધાવતું .અને આખરે આ તહેવારો જ સહુ માટે વરસભરનો વિસામો થઈ ને આવતા. અને એ વિસામાં પછી જિંદગીની દોડમાં ફરીથી ઝુઝવા બળ પૂરું પાડતા…

# આલેખન : અંબુ પટેલ (ખારાઘોડા)
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અતીતની યાદ…..
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नाग पंचमी की व्रत कथा


#नाग_पंचमी_की_व्रत_कथा
🌹🙏🌹 #हर_हर_महादेव 🌹🙏🌹
प्राचीन काल में किसी नगर में एक सेठ जी रहा करते थे। उनके 7 पुत्र थे और सबका विवाह हो चुका था। सेठ जी के सबसे छोटे पुत्र की पत्नी काफी सुशील थी लेकिन उसका कोई भाई नहीं था।

एक दिन घर की बड़ी बहू ने सभी बहुओं को घर लीपने के लिए पीली मिट्टी लाने के लिए कहा। जब मिट्टी लाने के लिए उन्होंने खुरपी से खुदाई शुरू की तो एक सांप वहां निकल आया। यह देखकर बड़ी बहू घबरा गई और खुरपी से उस सांप को मारने लगी।

इसे देखकर सबसे छोटी बहू ने कहा कि यह जीव तो निर्दोष है, आप कृप्या करके इसकी हत्या न करें।
छोटी बहू की बात सुनकर बड़ी बहू ने उस सांप को छोड़ दिया और छोटी बहू ने सर्प से एक जगह बैठकर उसका इंतज़ार करने के लिए कहा।

छोटी बहू इसके बाद घर के कामों में व्यस्त हो गई और सांप को बोली हुई बात भूल गई। अगले दिन जब उसे याद आया तो वह सांप के पास दूध लेकर गई और बोली, “मुझे माफ कर दो भैया, मुझसे भूल हो गई”। यह सुनकर सांप बोला कि “तूमने मुझे भैया बोला है, इसलिए मैं तुम्हे छोड़ रहा हूं, वरना झूठ बोलने के लिए अभी डस लेता”।

ऐसा कहकर सांप ने दूध पिया और बोला कि आज से तुम मेरी बहन हुई, तुम्हें जो चाहिए मांग लो। छोटी बहू बोली, “भैया मेरा कोई भाई नहीं है, आपने मुझे अपनी बहन बना लिया, यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है, मुझे कुछ और नहीं चाहिए। बस मैं जब भी आपको मन से याद करूं, आप मेरे पास आ जाना”।

कुछ दिनों के बाद सावन का महीना आया और सेठ जी की सभी बहुएं अपने-अपने मायके जाने लगीं। जाने से पहले वह छोटी बहू से बोलीं कि तेरा तो कोई पीहर नहीं है, तू कहां जाएगी?

इस बात से छोटी बहू को बहुत दुख हुआ और रोते हुए उसने अपने सर्प भाई को याद किया। सर्पदेव ने अपने कहे अनुसार, मनुष्य का रूप धारण किया और उसके घर पहुंच गए। वहां पहुंचकर सर्प ने छोटी बहू के ससुराल वालों से आग्रह किया कि वे छोटी बहू को उसके साथ भेज दें। इस पर सेठ जी बोले, लेकिन इसका तो कोई भी भाई नहीं है, तुम कहां से आए हो?

इस पर सर्पदेव ने कहा कि मैं इसका दूर का भाई हूं और इसे घर ले जाने आया हूं। यह सुनकर घरवालों ने छोटी बहू को सर्पदेव के साथ भेज दिया।

रास्ते में सर्पदेव ने छोटी बहू को बताया कि वह उसे नागलोक ले जा रहा है, अगर उसे डर लगे तो वह उसकी पूंछ पकड़ ले। इस तरह वह दोनों नाग लोक पहुंच गए। नाग लोक में धन, ऐश्वर्य और रत्नों को देखकर छोटी बहू चकित रह गई।वहां सर्पदेव ने उसका परिचय अपनी माँ से करवाया और कहा, माँ इसने मेरी जान बचाई थी और मैंने इसे अपनी छोटी बहन माना है, यह हमारे साथ यहां कुछ दिनों तक रहेगी। यह जानकर सर्पदेव की माँ ने छोटी बहू का स्वागत सत्कार किया और छोटी बहू वहां आरामपूर्वक रहने लगी।

नागलोक में शेषनाग के छोटे-छोटे बच्चे भी रहते थे, जिन्हें सर्प की माँ रोज़ दूध पिलाया करती थीं। वह पहले दूध को ठंडा करती थीं और फिर घंटी बजाकर उन नन्हें-नन्हें सापों को दूध पीने के लिए बुलाती थीं।

एक दिन छोटी बहू ने माँ से कहा कि वो उन छोटे सांपों को दूध पिला देगी। उसने एक पात्र में दूध डाला और जल्दबाज़ी में दूध के ठंडा होने से पहले ही घंटी बजा दी, घंटी की आवाज़ सुनते ही छोटे सांप दूध पीने आ गए और गरम दूध पीने से उनके फन जल गए। इस पर वह क्रोधित हो गए और बोले हम इसे डसेंगे, यह सुनकर छोटी बहू ने उनसे माफी मांगी और सर्पदेव की माँ ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

इसके पश्चात् जब छोटी बहू का वहां रहने का समय पूरा हो गया तो सर्पदेव और उसकी माँ ने उसे बहुत सारा धन, दौलत, रत्न और आभूषण देकर विदा कर दिया।

जब इतना सारा धन लेकर वह अपने ससुराल पहुंची तो उसकी जेठानियों को जलन होने लगी। बड़ी बहू ने उससे कहा कि तुम्हारे भाई ने इतना कुछ दिया तो साथ में सोने का झाड़ू भी देता।

यह सुनकर सर्पदेव वहां मनुष्य के रूप में आए और अपनी बहन को सोने की झाड़ू भी दे दी। साथ में उसने अपनी बहन को मणि और हीरों से सुसज्जित एक बेहद खूबसूरत हार भी उपहार में दिया। वह हार इतना अनोखा और खूबसूरत था कि उसकी चर्चा पूरे गांव में होने लगी।

धीरे-धीरे यह बात राजा के महल में रानी तक पहुंच गई। रानी ने राजा से उस हार को मंगवाने के लिए कहा। राजा ने अपने सिपाही भेजकर वह हार मंगवा लिया। सेठ जी भी राजा के आदेश के समाने कुछ नहीं बोल पाए और इससे छोटी बहू को बहुत दुख हुआ। दुखी मन से उसने अपने भाई सर्पदेव को याद किया और उन्होंने वहां आकर यह आश्वासन दिया कि राजा स्वयं उसे वह हार लौटाएंगे।वहीं दूसरी ओर, जैसे ही रानी ने वह हार पहना, वह सांप में बदल गया। रानी ने डरकर उसे उताकर फेंक दिया। यह देखकर राजा ने छोटी बहू और सेठ जी को दरबार में बुलाया और पूछा कि तुमने इस हार पर क्या काला जादू किया है। छोटी बहू बोली, “हे राजन, यह एक विशेष प्रकार का हार है और यह मुझे मेरे भाई सर्पदेव ने दिया है।”

इतनी देर में सर्पदेव वहां खुद प्रकट हुए और बोले कि मैंने इसे अपनी बहन माना है और यह हार मैंने इसे उपहार में दिया है। यह देखकर सभी लोगों ने नाग देवता को प्रणाम किया। ऐसा माना जाता है कि उस दिन पंचमी तिथी थी, इसलिए तब से नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है और नाग देवता को भाई के रूप में पूजा जाता है।

श्रावण

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नाग पंचमी की व्रत कथा


#नाग_पंचमी_की_व्रत_कथा
🌹🙏🌹 #हर_हर_महादेव 🌹🙏🌹
प्राचीन काल में किसी नगर में एक सेठ जी रहा करते थे। उनके 7 पुत्र थे और सबका विवाह हो चुका था। सेठ जी के सबसे छोटे पुत्र की पत्नी काफी सुशील थी लेकिन उसका कोई भाई नहीं था।

एक दिन घर की बड़ी बहू ने सभी बहुओं को घर लीपने के लिए पीली मिट्टी लाने के लिए कहा। जब मिट्टी लाने के लिए उन्होंने खुरपी से खुदाई शुरू की तो एक सांप वहां निकल आया। यह देखकर बड़ी बहू घबरा गई और खुरपी से उस सांप को मारने लगी।

इसे देखकर सबसे छोटी बहू ने कहा कि यह जीव तो निर्दोष है, आप कृप्या करके इसकी हत्या न करें।
छोटी बहू की बात सुनकर बड़ी बहू ने उस सांप को छोड़ दिया और छोटी बहू ने सर्प से एक जगह बैठकर उसका इंतज़ार करने के लिए कहा।

छोटी बहू इसके बाद घर के कामों में व्यस्त हो गई और सांप को बोली हुई बात भूल गई। अगले दिन जब उसे याद आया तो वह सांप के पास दूध लेकर गई और बोली, “मुझे माफ कर दो भैया, मुझसे भूल हो गई”। यह सुनकर सांप बोला कि “तूमने मुझे भैया बोला है, इसलिए मैं तुम्हे छोड़ रहा हूं, वरना झूठ बोलने के लिए अभी डस लेता”।

ऐसा कहकर सांप ने दूध पिया और बोला कि आज से तुम मेरी बहन हुई, तुम्हें जो चाहिए मांग लो। छोटी बहू बोली, “भैया मेरा कोई भाई नहीं है, आपने मुझे अपनी बहन बना लिया, यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है, मुझे कुछ और नहीं चाहिए। बस मैं जब भी आपको मन से याद करूं, आप मेरे पास आ जाना”।

कुछ दिनों के बाद सावन का महीना आया और सेठ जी की सभी बहुएं अपने-अपने मायके जाने लगीं। जाने से पहले वह छोटी बहू से बोलीं कि तेरा तो कोई पीहर नहीं है, तू कहां जाएगी?

इस बात से छोटी बहू को बहुत दुख हुआ और रोते हुए उसने अपने सर्प भाई को याद किया। सर्पदेव ने अपने कहे अनुसार, मनुष्य का रूप धारण किया और उसके घर पहुंच गए। वहां पहुंचकर सर्प ने छोटी बहू के ससुराल वालों से आग्रह किया कि वे छोटी बहू को उसके साथ भेज दें। इस पर सेठ जी बोले, लेकिन इसका तो कोई भी भाई नहीं है, तुम कहां से आए हो?

इस पर सर्पदेव ने कहा कि मैं इसका दूर का भाई हूं और इसे घर ले जाने आया हूं। यह सुनकर घरवालों ने छोटी बहू को सर्पदेव के साथ भेज दिया।

रास्ते में सर्पदेव ने छोटी बहू को बताया कि वह उसे नागलोक ले जा रहा है, अगर उसे डर लगे तो वह उसकी पूंछ पकड़ ले। इस तरह वह दोनों नाग लोक पहुंच गए। नाग लोक में धन, ऐश्वर्य और रत्नों को देखकर छोटी बहू चकित रह गई।वहां सर्पदेव ने उसका परिचय अपनी माँ से करवाया और कहा, माँ इसने मेरी जान बचाई थी और मैंने इसे अपनी छोटी बहन माना है, यह हमारे साथ यहां कुछ दिनों तक रहेगी। यह जानकर सर्पदेव की माँ ने छोटी बहू का स्वागत सत्कार किया और छोटी बहू वहां आरामपूर्वक रहने लगी।

नागलोक में शेषनाग के छोटे-छोटे बच्चे भी रहते थे, जिन्हें सर्प की माँ रोज़ दूध पिलाया करती थीं। वह पहले दूध को ठंडा करती थीं और फिर घंटी बजाकर उन नन्हें-नन्हें सापों को दूध पीने के लिए बुलाती थीं।

एक दिन छोटी बहू ने माँ से कहा कि वो उन छोटे सांपों को दूध पिला देगी। उसने एक पात्र में दूध डाला और जल्दबाज़ी में दूध के ठंडा होने से पहले ही घंटी बजा दी, घंटी की आवाज़ सुनते ही छोटे सांप दूध पीने आ गए और गरम दूध पीने से उनके फन जल गए। इस पर वह क्रोधित हो गए और बोले हम इसे डसेंगे, यह सुनकर छोटी बहू ने उनसे माफी मांगी और सर्पदेव की माँ ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

इसके पश्चात् जब छोटी बहू का वहां रहने का समय पूरा हो गया तो सर्पदेव और उसकी माँ ने उसे बहुत सारा धन, दौलत, रत्न और आभूषण देकर विदा कर दिया।

जब इतना सारा धन लेकर वह अपने ससुराल पहुंची तो उसकी जेठानियों को जलन होने लगी। बड़ी बहू ने उससे कहा कि तुम्हारे भाई ने इतना कुछ दिया तो साथ में सोने का झाड़ू भी देता।

यह सुनकर सर्पदेव वहां मनुष्य के रूप में आए और अपनी बहन को सोने की झाड़ू भी दे दी। साथ में उसने अपनी बहन को मणि और हीरों से सुसज्जित एक बेहद खूबसूरत हार भी उपहार में दिया। वह हार इतना अनोखा और खूबसूरत था कि उसकी चर्चा पूरे गांव में होने लगी।

धीरे-धीरे यह बात राजा के महल में रानी तक पहुंच गई। रानी ने राजा से उस हार को मंगवाने के लिए कहा। राजा ने अपने सिपाही भेजकर वह हार मंगवा लिया। सेठ जी भी राजा के आदेश के समाने कुछ नहीं बोल पाए और इससे छोटी बहू को बहुत दुख हुआ। दुखी मन से उसने अपने भाई सर्पदेव को याद किया और उन्होंने वहां आकर यह आश्वासन दिया कि राजा स्वयं उसे वह हार लौटाएंगे।वहीं दूसरी ओर, जैसे ही रानी ने वह हार पहना, वह सांप में बदल गया। रानी ने डरकर उसे उताकर फेंक दिया। यह देखकर राजा ने छोटी बहू और सेठ जी को दरबार में बुलाया और पूछा कि तुमने इस हार पर क्या काला जादू किया है। छोटी बहू बोली, “हे राजन, यह एक विशेष प्रकार का हार है और यह मुझे मेरे भाई सर्पदेव ने दिया है।”

इतनी देर में सर्पदेव वहां खुद प्रकट हुए और बोले कि मैंने इसे अपनी बहन माना है और यह हार मैंने इसे उपहार में दिया है। यह देखकर सभी लोगों ने नाग देवता को प्रणाम किया। ऐसा माना जाता है कि उस दिन पंचमी तिथी थी, इसलिए तब से नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है और नाग देवता को भाई के रूप में पूजा जाता है।

श्रावण

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शिव


ये: करोति महेशस्य तस्मै तुष्टो भवेच्छिव: l
प्रदक्षिणास्वशक्तोऽपि ये: स्वान्तेचिन्तयेच्छिवम्॥
(श्री शिवगीता आ-१-श्लोक-२६)

भाषांतर:-
जो मनुष्य नित्य नियम पूर्वक नमस्कार या प्रदक्षिणा शिवजी को करते हैं, उसके उपर भी शिवजी प्रसन्न होते हैं, और जो प्रदक्षिणा करने के लिए असमर्थ है वह लोग भी जो केवल मनोमन शिवजी का अंत:करण पूर्वक ध्यान करता है ,उसके उपर भी शिवजी अवश्य प्रशन्न होते हैं॥
(श्री शिवगीता आ-१-श्लोक-२६)
अतीत… ✍

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