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આપણી_પરંપરાઓ….

#દેદો_કૂટવો

મિત્રો….આજે પણ ધણા ગામમાં નાની છોકરીઓના જયારે ગૌરીવ્રત આવે છે , ત્યારે બધી દિકરીઓ ગામની બહાર નદી કાંઠે જઈને, રેતીમાં દેદાનું પૂતળું બનાવી , અથવા દેદાને મારનારના ટીમા બનાવીને એને કૂટેછે.

પણ શું આપણે જાણીએ છીએ, કે આ દેદો કોણ હતો? કન્યાઓ દેદો કેમ કૂટે છે?

આની પાછળ નો ઈતિહાસ
કંઈક આવો છે….

અરઠીલા ગામની બહાર છાવણી નાંખી પડેલ મહમદ બેગડાના સૈનિકોએ આપા દેદા આહીરને એકલા હાથે કત્લેઆમ કરતો જોઈ તેને મારવા ઉમટી પડ્યા. અરઠીલા કિલ્લાની બહાર દેદા આહીર અને બાદશાહની સેના વચ્ચે જીવ સટોસટનો જંગ ખેલાયો. દેદો આહીર બંને હાથથી તલવાર વીંઝતો જેમ જુવારના કણસલા લણતો હોય તેમ દુશ્મનોના માથા વાઢતો એકલો મુસ્લિમ સેના વચ્ચે આગળ વધી રહ્યો હતો. જલ્લાલુદ્દીને તેની પીઠ પાછળથી સૈનિકોને આક્રમણ કરવા ઈશારો કર્યો. દેદાએ સેંકડો સૈનિકોને રહેંસી નાખ્યા.

દેદો બેય હાથથી લોહી નીતરતી તલવારોથી દુશ્મન સેનામાં કહેર વર્તાવી રહ્યો હતો. ત્યારે દેદાની પીઠ પાછળથી ગરદન ઉપર તલવારનો ઘા કરવામાં આવતા તેનું માથું ધડથી અલગ થઈ ગયું. દેદાનું માથું કપાતા ધડ ઝનૂને ચડ્યું, એમ કહેવાય છે, કે માથા વગરનું ધડ ઝનૂને ચડતા મહમદ બેગડાની સેનામાં હાહાકાર મચી જવા પામ્યો હતો. માથા વગરના ધડને આંખો હોઈ તેમ બાદશાહની સેના વચ્ચે જઈ અનેક સૈનિકોનો કચ્ચરઘાણ બોલાવી દેતા સેનામાં ભાગદોડ મચી ગઈ. અરઠીલાના એક યુવાને કરેલી ખુવારી જોઈ બાદશાહની સેના ભયભીત થઈ ગઈ હતી. બેગડાની સેનાને અગમચેતીનો આભાસ થતા વિચારવા લાગી, કે જો અરઠીલાનો એક યુવાન આટલા સૈનિકોની ખુંવારી કરી શકે, તો અરઠીલા ના હજારો આહીરો એક સાથે આવી ચડશે તો શું થશે ? એવું વિચારી સેનાને પરત ફરવું જ યોગ્ય લાગ્યું.

પરંપરા

આજથી આશરે સાડા પાંચસો વર્ષ પહેલા અષાઢ માસની પૂનમની અજવાળી રાત્રીએ ખેલાયેલ આ જંગમાં બેગડાની સેનાને દેદા આહીરે એકલા હાથે ભગાડી હતી અને એ સાથે ગામની દીકરીઓની લાજ બચાવતા પોતે વીરગતિ પામ્યો. દેદા આહીરની કથા-લોકકથાઓ, બારોટોના ચોપડાઓ અને દેદા ગોહિલના પાળિયારૂપે સાક્ષી પૂરે છે. આજેય સૌરાષ્ટ્રની કુંવારી કન્યાઓ દર વર્ષની અષાઢી પૂનમે દેદા આહીરની શહીદીને અશ્રુભરી શ્રદ્ધાંજલી આપવા ગામની ભાગોળે ભેગા થઈ દેદો કૂટવાની પરંપરા જાળવતી જોવા મળે છે. જેેેેમાં કુુંવારી કન્યાઓ મરશીયા ગાય છે.

ભારતીય સંસ્કૃતમાં મરણને પણ સોળ સંસ્કાર પૈકીનો એક સંસ્કાર ગણવામાં આવ્યો છે. કન્યાઓ પોતાના ભાવી જીવનમાં મરણ પ્રસંગે કૂટવાનું શીખે, મરશિયા ગાતા શીખે એ ભાવના પણ આ પરંપરા પાછળ રહી છે.

બાળપણમાં મરણ પ્રસંગે સગા વહાલા કાણ લઈને આવે અને ગામના ચોકે ચોકે કાણે આવેલી બહેનો ધડામ ધડામ છાજીયા લેતા લેતા જે મરશિયા ગાય એ મરશિયા ભલભલા મૂછાળાઓની આંખમાં આંસું લાવી દેતી એ પ્રસંગની સ્મૃતિ હજીય
માનસપટ્ટ પર એવી ને એવી હજુય
અકબંધ છે.

મરશું રણ મેદાનમાં ધરશુ લીલુડા શીશ,
આપા છીએ ગાંડી ગરનાં કરશું ઉજડા નીર.

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वट सावित्री


वट_सावित्री पर्व ..!!!

… #सावित्री और #सत्यवान की मूर्ति ( red sand stone).. .. कालखंड 11वीं सदी ..!!
… यहाँ दर्शाया गया दृश्य . वह क्षण है जब #यमदेवता द्वारा सती-सावित्री को तीन वरदान देने के बाद सत्यवान सावित्री की गोद में उठते हैं ..!!
… #वटवृक्ष की पत्तियों से तो आप पहचान / देख ही पा रहे होंगे ..??

  • सादर प्रणाम
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વેટ સાવિત્રી


http://www.gujaratistory.in/vat-savitri/

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निर्जला एकादशी व्रत


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

निर्जला एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं ।

तब वेदव्यासजी कहने लगे : दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए ।

यह सुनकर भीमसेन बोले : परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी ।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना ।

भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा ।

व्यासजी ने कहा : भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे । वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है ।’

एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते । अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं । अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो । स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है । जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है । उसे एक एक प्रहर में कोटि कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है । मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है । निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है । इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है ।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं ।

कुन्तीनन्दन ! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं । जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है । निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए । जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है । चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है । पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि : ‘मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा ।’ द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए । गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे :

देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक ।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

‘संसारसागर से तारनेवाले हे देवदेव ह्रषीकेश ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये ।’

भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए । उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है । तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे । जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है ।

यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया । तबसे यह लोक मे ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई ।

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आंतर्राष्ट्रीय योग दिवस


योग का मूल भी वेद ही है

लेखक: डाॅ0 विवेक आर्य
संपादक – श्री सहदेव ‘समर्पित’,

(कॉनरेड एल्स्ट (Konared Elst )महोदय योगरूपी वृक्ष के पत्ते ही गिनते रह गए। उसकी जड़ जो वेदों तक जाती हैं, उसे पहचान ही नहीं पाए।)

सृष्टि के आदिकाल से मनुष्य वेदोक्त योगविधि से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करता आया है। स्वामी दयानन्द ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करते हुए हर व्यक्ति को योगाभ्यासी बनने की प्रेरणा देते थे। वर्तमान काल में योग विषयक अनेक भ्रांतियां वेदों के सत्य सन्देश के प्रचार की कमी के चलते प्रचलित हो रही हैं। ऐसी ही एक भ्रान्ति काॅनरेड एल्स्ट (ज्ञव्म्छत्।।क् म्स्ैज्) (बेल्जियम निवासी लेखक) द्वारा प्रसारित हुई है जो हमारे समक्ष प्रस्तुत हुई है।
प्रायः हर विदेशी लेखक संस्कृत से अनभिज्ञ होता है, इसलिए वह विदेशी अन्य लेखकों द्वारा अंग्रेजी में लिखित पुस्तकों पर निर्भर होता है। इन पुस्तकों के अधकचरे विवरण प्रायः सत्य से दूर होते हैं और खास करके आज के नवबौद्ध इनके बहुत ढोल पीटते हैं। लेखक की योग विषयक हास्यास्पद रिसर्च पर एक दृष्टि डालिये-

‘Around the middle of the first millennium BCE“means that yoga does not predate the age of the Buddha. Anything of value should be denied to Hinduism, and if it exists, it has to be borrowed from „another religion“, viz. Buddhism. In reality, the Buddha himself already learned at the feet of several yoga teachers, who in turn did not claim to be innovative.’
[Ref.http://koenraadelst.blogspot.com/2013/12/yoga-in-transformation.html%5D

अर्थात् ईसा से एक शताब्दी पूर्व बुद्ध के काल से पहले योग का प्रचार नहीं था। जो भी योग विषय में उपलब्ध था वह हिन्दुओं ने बुद्ध से ग्रहण किया। बुद्ध ने अनेक योगियों के चरणों में बैठकर योग सीखा जो यह कभी नहीं कहते थे कि योग उनका आविष्कार है।

एल्स्ट महोदय योग रूपी वृक्ष के पत्ते ही गिनते रह गए। उस वृक्ष की जड़ जो वेदों तक जाती हैं, उसे पहचान ही नहीं पाए। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। अन्य विद्याओं की तरह योग का उद्भव भी वेदों से हुआ है। प्रमाण देखिये-

योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे।
सखायऽइन्द्रमूतये।। -यजु0 11/14
अर्थात बार-बार योगाभ्यास करते और बार-बार मानसिक और शारीरिक बल बढ़ाते हुये हम सब परस्पर मित्रभाव से युक्त होकर अपनी रक्षा के लिये अनन्त बलवान्, ऐश्वर्यशाली ईश्वर का ध्यान करते हैं। उसी से सब प्रकार की सहायता मांगते हैं।

यु॒ञ्जा॒नः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्नेज्र्योतिर्निचाय्य पृथिव्याऽअध्याभरत्।।11/1
अर्थात् जो पुरुष योगाभ्यास और भूगर्भविद्या किया चाहे, वह यम आदि योग के अङ्ग और क्रिया-कौशलों से अपने हृदय को शुद्ध करके तत्त्वों को जान, बुद्धि को प्राप्त और इन को गुण, कर्म तथा स्वभाव से जान के उपयोग लेवे।

युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे।
स्वग्र्याय शक्त्या।-यजुर्वेद 11/2
अर्थात् जो मनुष्य परमेश्वर की इस सृष्टि में समाहित हुए योगाभ्यास ओर तत्त्वविद्या को यथाशक्ति सेवन करें, उनमें सुन्दर आत्मज्ञान के प्रकाश से युक्त हुए योग और पदार्थविद्या का अभ्यास करें, तो अवश्य सिद्धियों को प्राप्त हो जावें।

युक्त्वाय सविता देवान्त्स्वय्र्यतो धिया दिवम्।
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान्।। यजुर्वेद 11/3

अर्थात् जो पुरुष योग और पदार्थविद्या का अभ्यास करते हैं, वे अविद्या आदि क्लेशों को हटानेवाले शुद्ध गुणों को प्रकट कर सकते हैं। जो उपदेशक पुरुष से योग और तत्त्वज्ञान को प्राप्त हो के ऐसा अभ्यास करे, वह भी इन गुणों को प्राप्त होवे।

युजे वां ब्रह्म पूव्र्यं नमोभिर्वि श्लोकऽएतु पथ्येव सूरेः।
शृण्वन्तु विश्वेऽअमृतस्य पुत्राऽआ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः। -यजुर्वेद 11/5

अर्थात् योगाभ्यास के ज्ञान को चाहने वाले मनुष्यों को चाहिये कि योग में कुशल विद्वानों का सङ्ग करें। उनके सङ्ग से योग की विधि को जान के ब्रह्मज्ञान का अभ्यास करें। इस प्रकार से वेद में अनेक मन्त्र ‘योग’ विषय पर प्रकाश डालते हैं।
द्वितीय महर्षि पतंजलि द्वारा वर्णित अष्टाङ्ग योग के आठ अङ्ग ब्रह्मरूपी सर्वोच्च शिखर पर चढ़ने के लिए आठ सीढ़ियाँ हैं। उनका मूल भी वेद ही है। उनके नाम हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
1- यम पाँच हैं-
(1) अहिंसा- अहिंसा का अर्थ केवल किसी की हत्या न करना ही नहीं अपितु मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार कष्ट न देना, किसी को हानि न पहुंचाना और किसी के प्रति वैरभाव न रखना अहिंसा है।
वेद अनेकत्र अहिंसा का सन्देश देते हैं- मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे। -यजुर्वेद 36/18 अर्थात् हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें।
(2) सत्य- सत्य द्वितीय यम है। साधक मन, वचन और कर्म से सत्य जाने, सत्य माने, सत्य बोले और सत्य ही लिखे, मिथ्या -असत्य न बोले, न मिथ्या व्यवहार ही करे। वेद सत्य के विषय में कहते हैं-‘इदं अहमनृतात्सत्यमुपैमि।’ -यजु0 1/5 अर्थात मैं असत्य को त्याग कर जीवन में सत्य को ग्रहण करता हूँ।
(3) अस्तेय- यमों में तीसरा यम है- अस्तेय। स्तेय का अर्थ है चोरी करना। अस्तेय का अर्थ है- मन, वचन और कर्म से चोरी न करना। साधक चोरी न करे, सत्य व्यवहार करे। स्वामी की आज्ञा के बिना किसी पदार्थ का उपयोग न करे। वेद अस्तेय की शिक्षा देते हुए कहते हैं-‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।’ यजु0 40/1 अर्थात् किसी के धन का लालच मत कर।
(4) ब्रह्मचर्य- ब्रह्मचर्य दो शब्दों के मेल से बना है-ब्रह्म और चर्य। ब्रह्म का अर्थ है- ईश्वर, वेद, ज्ञान और वीर्य। चर्य का अर्थ है चिन्तन, अध्ययन, उपार्जन और रक्षण। इस प्रकार ब्रह्मचर्य का अर्थ होगा-साधक ईश्वर का चिन्तन करे, ब्रह्म में विचरे, वेद का अध्ययन करे, ज्ञान का उपार्जन करे और वीर्य का रक्षण करे।
वेद कहते हैं -’ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत।’ -अथर्व0 11/5/19 अर्थात् ब्रह्मचर्य और तप के द्वारा विद्वान् मौत को भी मार भगाते हैं।
(5) अपरिग्रह- अपरिग्रह का अर्थ है-आवश्यकता से अधिक पदार्थों का संग्रह न करना। साधक उतने ही पदार्थों का संग्रह करे जितने सादा जीवन के लिए आवश्यक हैं। किसी भी वस्तु को क्रय करने से पहले गम्भीरतापूर्वक सोच लो। यदि उनके बिना काम न चलता हो तभी खरीदो। वेद अपरिग्रह का सन्देश देते हुए कहते हैं कि- ‘शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर। -अथर्व0 3/24/5 अर्थात् सौ हाथों से कमाओ, हजार हाथ से दान करो।

2- नियम भी पांच हैं-

(1) शौच- शौच का अर्थ है पवित्रता। साधक अन्दर और बाहर से पवित्र रहे। राग-द्वेष के त्याग से आन्तरिक और जलादि के द्वारा बाह्य शुद्धि सम्पादित करनी चाहिए। शरीर की दशा का मन पर बहुत प्रभाव पड़ता है, अतः शरीर को स्नानादि से पवित्र करना चाहिए। वेशभूषा व रहने का स्थान भी साफ-सुथरा हो। वेदानुकूल मनुस्मृति में कहा है-
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिज्र्ञानेन शुध्यति। -मनुस्मृति 5/109
अर्थात् जल से शरीर के बाहर के अवयव, सत्य आचरण से मन; विद्या और तप अर्थात् कष्ट सहकर भी धर्म अनुष्ठान से आत्मा तथा ज्ञान अर्थात् पृथ्वी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों के विवेक से बुद्धि शुद्ध होती है।

(2) सन्तोष- सन्तोष का अर्थ बहुत गलत समझा गया है। सन्तोष का अर्थ हाथ पर हाथ रखकर निठल्ला बैठना नहीं है। सन्तोष का अर्थ है- आलस्य छोड़कर सदा पुरुषार्थ करना। धर्मपूर्वक पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिये। वेद के अनेक मन्त्रों के पीछे ‘स्वाहा’ पद आता हैं। जैसे यजुर्वेद 32/14 मन्त्र में मेधाविनं कुरु ‘स्वाहा’ आया है। ‘स्वाहा’ पद का अर्थ निरुक्त के अनुसार स्वं प्राहेति बनता है। जिसका अर्थ स्वामी दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में करते है कि- जितना-जितना धर्मयुक्त पुरुषार्थ से पदार्थ प्राप्त हो, उतने ही में सदा संतोष करें। इससे स्वाहा शब्द के अर्थ में संतोष का मूल सन्देश विद्यमान है।

(3) तप-तप का वास्तविक अर्थ है-‘द्वन्द्वसहनं तपः’-कष्ट आने पर भी धर्मकार्यों को करते जाना तप है। हानि-लाभ, जीवन-मरण, सुख-दुःख, भूख-प्यास, हर्ष-शोक में सम रहने का नाम तप है।वेद में कहा है- अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते। -ऋ0 ९/८३/१ अर्थात् जिसने तप की भट्टी में अपने शरीर को तपाया नहीं है, ऐसा कच्चा व्यक्ति उस प्रभु को नहीं पा सकता।

(4) स्वाध्याय-स्वाध्याय का अर्थ है-वेद का अध्ययन-अध्यापन और ऋषि-मुनियों द्वारा लिखित सत्यशास्त्रों को पढ़ना-पढ़ाना। वेद परमात्मा का दिव्यज्ञान है। यह मानव-कत्र्तव्यों का बोधक शास्त्र है, ज्ञान और विज्ञान का अगाध भण्डार है। अपने कत्र्तव्यों के ज्ञान हेतु वेद का स्वाध्याय करना ही चाहिए।
स्वाध्याय का एक और अर्थ है-प्रतिदिन परमात्मा के सर्वोत्तम नाम ‘ओ3म्’ का अर्थपूर्वक जप करना। वेद में कहा है- ओ3म् क्रतो स्मर। -यजु0 40/15 अर्थात् हे कर्मशील जीव! तू ओ3म् का स्मरण कर और ‘ओ3म् प्रतिष्ठ।’ -यजु0 २/१३ अर्थात् तू ओ3म् में प्रतिष्ठित हो जा अथवा ओ3म् को=ओ3म् नामक परमात्मा को अपने हृदय-मन्दिर में बिठा ले।

(5) ईश्वरप्रणिधान- ईश्वर प्रणिधान के दो अर्थ हैं-एक, बिना किसी इच्छा, आकांक्षा और मांग के अपने-आपको, अपने सब कामों को, अपने सब संकल्पों को प्रभु को समर्पित कर देना। जो परमात्मा से कुछ मांगते हैं, उन्हें तो प्रभु केवल वही वस्तु देता है, जो वे मांगते हैं, परन्तु जो कुछ नहीं मांगते, उन्हें परमेश्वर सब-कुछ देता है। और अन्त में अपने आपको भी दे देता है, अपना साक्षात् भी करा देता है। दूसरा अर्थ है-हृदय में ईश्वर का प्रेम रखते हुए, ईश्वर की विशेष भक्ति या उपासना करते हुए ईश्वर की कृपा, दया और प्रसन्नता का पात्र बनना।
वेद में कहा है- यस्मै हस्ताभ्यां पादाभ्यां वाचा श्रोत्रेण चक्षुषा। यस्मै देवाः सदा बलिं प्रयच्छन्ति विमितेऽमितं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः। अथर्व0 10/7/39
अर्थात् देव लोग अपने हाथों, पैरों, श्रोत्र और चक्षु आदि की शक्तियों को तथा इनके द्वारा किये गये कर्मों तथा उपार्जनों को सम्पूर्ण रूप में महादेव के प्रति भेंट रूप में समर्पित कर देते हैं। यह उच्च कोटि का समर्पण ही ईश्वर प्रणिधान कहलाता हैं।

  1. आसन: यह योग का तीसरा अंग है। शरीर न हिले, न डुले, न दुखे और चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग न हो, ऐसी अवस्था में दीर्घकाल तक सुख से बैठने को आसन कहते हैं। यजुर्वेद में कहा है- स्थिरो भव वी॒ड्वङ्ग॒।। 11/44

4 प्राणायाम: प्राणायाम योग का चैथा अङ्ग है। प्राण और मन का घनिष्ठ सम्बन्ध है। जहां-जहां प्राण जाता है, वहाँ-वहाँ मन भी जाता है। यदि प्राण वश में हो जाए तो मन बिना प्रयास के स्वयं वश में हो जाता है।

वेद में कहा है-
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः ।
रोचन्ते रोचना दिवि ॥ ऋग्वेद 1/6/1 अर्थात् सब पदार्थों की सिद्धि का मुख्य हेतु जो प्राण है उसको प्राणायाम की रीति से अत्यन्त प्रीति के साथ परमात्मा में युक्त करते हैं।
5: प्रत्याहार- मन को एक लक्ष्य पर एकाग्र करने के लिए उसे बाह्य विषयों से समेटने का नाम प्रत्याहार है। बाह्य विषयों से हटने पर ही मन को ध्यान-लक्ष्य पर केन्द्रित किया जा सकता है। प्रत्याहार वह महान् कुंजी है जो द्दारणा, ध्यान और समाधि के द्वारों को खोल देती है। ऋग्वेद 7/11/1 में आया है- न ऋते त्वदमृता मादयन्ते।। अर्थात् तेरे बिना मुक्त आत्मा आनन्दित नहीं होते। परमेश्वर में अवस्थित होकर जीवात्मा अपने आपको भूल जाता है और आनंद में भरकर कह उठता है- तू मैं और मैं तू हैं। यह अवस्था बाह्य इन्द्रियों को समेटने की क्रिया के पश्चात् ही होती है।
6: धारणा- धारणा का अर्थ है-मन को एकाग्र करना, मन को किसी एक विषय पर केन्द्रित करना। वेद कहते हैं-यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।
यजुर्वेद 34/1 अर्थात् वेद जाग्रत ही नहीं अपितु सुषुप्त अवस्था में भी मन को शुभ संकल्प वाला बनाने का सन्देश देते हैं। यह शुभ संकल्प केवल एकाग्र मन में ईश्वर द्वारा ही स्थापित हो सकता है।
7- ध्यान- धारणा की परिपक्वता का नाम ही ध्यान है। धारणा में प्रत्यय-ज्ञान का एक-सा बना रहना ही ध्यान है। जिस स्थान पर चित्त को एकाग्र किया गया है, उस एकाग्रता का ज्ञान तैलद्दारावत् निरन्तर एक-सा बना रहे और उस समय अन्य किसी प्रकार का ज्ञान या विचार चित्त में न आने पाए, इस अवस्था को ही ध्यान कहते हैं।
वेद कहते है-सीरा यु×जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथक्। धीरा देवेषु सुम्नया। यजुर्वेद 12/67 अर्थात् जो विद्वान् योगी लोग और (धीरा) ध्यान करने वाले हैं, वे यथायोग्य विभाग से नाड़ियों में अपने आत्मा से परमेश्वर की धारणा करते हैं।
8: समाधि- निरन्तर अभ्यास और वैराग्य में सम्यक् अवस्थिति होने से एकाग्रता बढ़ती है तथा अखण्ड क्रम से गतिमान् रहती है, फिर अन्ततः प्रगाढ़ ध्यान में निमग्न होने की अवस्था आती है, जो राज-योग की आठवीं अवस्था है। इसी को समाधि कहते हैं।
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।।
-अथर्व0 10/2/31
भावार्थः- आठ चक्रोंवाली, नौ इन्द्रियाँ- द्वारोंवाली इस शरीररूप अयोध्या नामक देवनगरी में एक ज्योतिर्मय मनोमय कोश है, जो आह्लाद व प्रकाश से परिपूर्ण है। इसे हम राग-द्वेष से मलिन न करें। इसी कोष में आत्मा विद्यमान है। इसी हृदय कोष में आत्मा का परमात्मा से मिलन होता हैं। यह मिलन समाधि अवस्था में ही होता है।
इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि योग का उद्गम वेदों से है।

i(शांतिधर्मी मासिक, हिंदी पत्रिका, जुलाई,2020 अंक से साभार। शांतिधर्मी पत्रिका के सदस्य बनने के लिए इस नंबर पर संपर्क कीजिये-)

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आंतर्राष्ट्रीय योग दिवस


૨૧ મી જુન, વર્ષ દરમિયાન સૂર્યોદય થી સૂર્યાસ્ત સુધીનો
સૌથી લાંબો સમયગાળો, વિશ્વ યોગ દિવસ,
ગ્રિષ્મની સમાપ્તિ સાથે વર્ષાૠતુનો પ્રારંભ,
સૂર્યનું દક્ષિણાયન ની શરૂઆત. ..
હવે પછીના દિવસો બળ પ્રાપ્તિના… विसर्गकाल,
શરૂઆત યોગ દિવસથી… कर्मेषु कौशलम् …योगः

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥

व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं॥

Exercise results in good health, long life, strength and happiness. Good health is the greatest blessing. Health is means of everything.

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आंतरराष्ट्रीय योग दिवस


योग: कर्मसु कौशलम्’ यह श्लोकांश योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्गीरित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के पचासवें श्लोक से उद्धृत है। श्लोक इस प्रकार है –

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्”।।इति।।

श्लोक के उत्तरार्ध पर यदि गौर करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली योग की परिभाषा एवं दूसरी योग हेतु प्रभु का स्पष्ट निर्देश। उनका उपदेश है कि ‘योगाय’ अर्थात् योग के लिए अथवा योग में, ‘युज्यस्व’ अर्थात् लग जाओ। कहने का तात्पर्य है कि ‘योग में प्रवृत्त हो जाओ’ यानि कि ‘योग करो’। अब प्रश्न यह है कि क्यूँ करें योग? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने श्लोक के पूर्वार्ध में दिया है कि बुद्धिमान व्यक्ति अर्थात् योगी, वर्तमान में ही अथवा इस संसार में ही ‘सुकृत’ एवं ‘दुष्कृत’ अर्थात् पुण्य एवं पाप से मुक्त हो जाता है।
गीता में ‘योग’ शब्द के तीन अर्थ हैं – १. समता; जैसे – ‘समत्वं योग उच्यते’ (२/४८); २. सामर्थ्य, ऐश्वर्य या प्रभाव; जैसे – ‘पश्य मे योगमैश्वर्यम्’ (९/५); और ३ समाधि; जैसे – ‘यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया’ (६/२०)। यद्यपि गीता में ‘योग’ का अर्थ मुख्य रूप से समता ही है तथापि ‘योग’ शब्द के अंतर्गत तीनों ही अर्थ स्वीकार्य हैं। इसके अतिरिक्त गीता में योग की तीन परिभाषाएं भी मिलती हैं जो कि दूसरे अध्याय के क्रमश: ४८वें एवं ५०वें श्लोक में तथा छठे अध्याय के २३वें श्लोक में निर्दिष्ट हैं। ये परिभाषाएं क्रमश: इस प्रकार हैं –

“योग: कर्मसु कौशलम्” (गीता २/५०)

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता ६/२३)

“योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते”।। (गीता २/४८)

अर्थात्हे धनञ्जय! तुम योग में स्थित होकर शास्त्रोक्त कर्म करते जाओ। केवल कर्म में आसक्ति का त्याग कर दो और कर्म सिद्ध हो या असिद्ध अर्थात् उसका फल मिले या फिर न मिले, इन दोनों ही अवस्थाओं में अपनी चित्तवृत्ति को समान रखो। अर्थात् सिद्ध होने पर हर्ष एवं असिद्ध होने पर विषाद अपने चित्त में मत आने दो। यह सिद्धि एवं असिद्धि में सम-वृत्ति रखना ही योग है ।

यहाँ ‘योग’ शब्द कर्मयोग का ही बोधक है। यहाँ न केवल कर्म के स्वर्गादि फलों के छोड़ने की बात कही गयी है अपितु प्रातिस्विक फल की आशा छोड़कर कर्म करने से जो चित्त-शुद्धि या भगवत्प्रसाद आदि फल प्राप्त होते हैं, उनकी सिद्धि-असिद्धि में भी सामान भाव रखने की बात कही गयी है अर्थात् यह विचार मत करो कि इतने दिन मुझे कर्मयोग में लग गए अभी तक मेरी चित्त-शुद्धि कुछ नहीं हुई या भगवत्प्रसाद के कुछ लक्षण मुझे दिखाई नहीं दिए। तुम तो केवल कर्त्तव्य समझकर कर्म करते जाओ, इस कर्म का फल क्या हो रहा है इस ओर कोई दृष्टि ही न दो। इसी का नाम योग या कर्मयोग है।

डॉ श्यामदेव मिश्र

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गंगा दशहरा


गंगा
विष्णुपदा, देवनदी, ध्रुवनन्दा, सुरसरिता, अमर तरंगिरीणी, त्रिपथगा, भागीरथी, जाह्नवी, इत्यादि नामों से जानी जानेवाली भारत की भाग्यरेखा गंगा का स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर अवतरण आज याने ज्येष्ठ शुक्ला दशमी के दिन हुआ था।

सागरपुत्र भागीरथ के भागीरथी प्रयासों से जिस दिन गंगा मैया का धरती पर अवतरण हुआ उस दिन का दिव्ययोग इस प्रकार था : ज्येष्ठ-माह, शुक्ल-पक्ष, दशमी-तिथि, बुद्धवार, हस्त-नक्षत्र, व्यतिपात-योग, गर-करण, आनन्दयोग, कन्या राशि का चन्द्रमा एवं वृषभ राशि का सूर्य था।

गंगा दशमी या गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान या गंगाजल मिश्रित जल के स्नान का बहुत महत्व है। 10डुबकी, 10मंत्र, 10फूल,10फल, 10दीपक, 10तरह की पूजा सामग्री, 10तरह की दान सामग्री, 10 पण्डितों को दान , 10गरीबों को भोजन व 10संकल्प याने सबकुछ दस का महत्व है।

पितर-तारण, पाप-मुक्ति, संतान-सुख, संताप-समाप्ती व समृद्धि-संवर्धन के लिये लाखों लोग आज गंगा स्नान करना चाहते हैं। मत्स्य, गरूङ व पद्म पुराण के अनुसार आज हरिद्वार, प्रयाग व सागर-संगम स्नान सर्वश्रेष्ठ स्नान माना गया है।

पाप मुक्ति मिले या नहीं, यह पापियों की समस्या है परन्तु यह सौ प्रतिशत सत्य है कि गंगा संस्कृति का पालना, विकास-धारा व करोङों जीवों का जीवन प्राण है। गंगा संस्कृति संरक्षक व समृद्धि संवर्धक है। गंगा सच्चे अर्थों में हर भारतीय की माँ है।
जय श्रीकृष्ण जय सीयाराम।

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गंगा दशहरा


Gangāvataraṇaगंगा नदी का वंशस्वर्ग से पृथ्वी तक । आकाशीय गंगा नदी का क्रिस्टल साफ पानी, जब धरती पर उतरता है, एक देवी के रूप में प्रकट हुआ, पवित्र धर्मों, दार्शनिकों और कलाकारों द्वारा सुंदर मैदान । उसकी माचिस क्रिस्टल स्पष्ट चमकदार सुंदरता सभी प्राणियों के निर्माता थी । वह पानी है, वह सब कुछ है; उसके बिना, कुछ भी नहीं है । गंगा पृथ्वी पर नदी । आप एक इच्छा पूर्ति करने वाली रेंग कलपलाता है जो दुनिया को फल प्रदान करता है । आप दुखों के नाशक हैं । तुम समुद्र में बह जाओ एक युवा पुरुष की खुशी के साथ, भंवर दूर एक तरफ झलक के साथ ।कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥६॥ (गंगा स्तोत्र)प्राचीन साहित्य से प्रेरणा है पेंटिंग, स्वर्गीय गंगा नदी की स्तुति । भारत की मनाई गई नदी । बरसने वाले बादल शक्तिशाली हाथियों के रूप में देखे जा सकते हैं, बारिश में पिघलते हुए, दिव्य गूस (हंस) स्वर्ग से दिव्य कमल पर ओस की बूंदों को चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं । आसमान में उड़ते हुए गूज ला रहे हैं बादलों की माला गंगा मैया का अभिवादन करने के लिएरेशम सफेद नौ यार्ड मराठी साड़ी में सुरुचिपूर्ण गंगा चढ़ी हुई है । खिले सफ़ेद कमल पकड़े हैं नाथ, प्रसिद्ध मराठी नाक के आभूषण । उसके कान के गहने मत्स्य कुंडल, कंठार, हेर और मेखला मोती हैं । उसके लंबे काले बाल सुबह के ओस के मोतियों को प्लमेट करते हुए नजर आते हैं । वो पानी है तो बदन भीगा भीगा हुआ है उसके उतरने की कोमल गीत सभी एनिमैट, जागरूक और फलती फूलती है । मकर, उसकी वान, और यक्ष दोनों प्रजनन और समृद्धि के प्रतीक हैं । दोनों को उसकी सबसे खुशी की नज़र मिल रही है । सभी सरीसृप, जलीय जानवर, आश्चर्यजनक रूप से उसके वंश को देखते हैं । पेंटिंग का हर हिस्सा आकाशीय से सांसारिक दुनिया अमुर्ता से मुरता तक उसके आगमन का आनंद ले रहा है । जीवन को पानी ।IIश्रीIIPainting © by Dr. Shriikant Pradhan कैनवास पर 4 फीट एक्स 3 फीट एक्रिलिक ।

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गंगा दशहरा


गंगा जल पीकर प्रेत की हुई मुक्ति
एक ब्राह्मण प्रयागराज से 5 कोस (1 कोस = करीब2 मील) की दूरी पर रहता था । वह प्रत्येक संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए प्रयाग में जाया करता था । माघ मास की संक्रांति के दिन तो वह अपने परिवारसहित अवश्य ही वहाँ जाता था ।

जब वह ब्राह्मण बूढ़ा और चलने में असमर्थ हो गया, तब एक बार माघ की संक्रांति आने पर उसने अपने पुत्र को बुलाकर कहा : ‘‘हे पुत्र ! तुम प्रयागराज जाओ, त्रिवेणी में स्नान करके मेरे लिए भी त्रिवेणी के जल की गागर भरकर लाना और संक्रांति के पुण्यकाल में मुझे स्नान कराना, देर मत करना ।

पिता के वचन का पालन करते हुए उसका पुत्र प्रयाग के लिए चल पड़ा । त्रिवेणी में स्नान कर जब वह जल से भरी गागर पिता के स्नान के लिए ला रहा था तो रास्ते में उसे एक प्रेत मिला । वह प्यास के कारण बहुत व्याकुल हो रहा था और गंगाजल पीने की इच्छा से रास्ते में पड़ा था ।

लड़के ने प्रेत से कहा : ‘‘मुझे रास्ता दो । प्रेत : ‘‘तुम कहाँ से आये हो ? तुम्हारे सिर पर क्या है ?
‘‘त्रिवेणी का जल है ।‘‘
“मैं इसी इच्छा से रास्ते में पड़ा हूँ कि कोई दयालु मुझे गंगाजल पिलाये तो मैं इस प्रेत-योनि से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि मैंने गंगाजल का प्रभाव अपने नेत्रों से देखा है ।
‘‘क्या प्रभाव देखा है ?”

एक ब्राह्मण बड़ा विद्वान था । उसने शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय प्राप्त करके बहुत धन उपार्जित कर रखा था । लेकिन क्रोधवश उसने किसी ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण को मार दिया । उस पाप के कारण मरने पर वह ब्रह्मराक्षस हुआ और हमारे साथ 8 वर्षों तक रहा । 8 वर्षों के बाद उसके पुत्र ने उसकी हड्डियाँ लाकर श्रीगंगाजी के निर्मल तीर्थ कनखल में डालकर गंगाजी से प्रार्थना की : ‘हे पापनाशिनी गंगा माते ! मेरे पिता को सद्गति प्रदान कीजिये । तब तत्काल ही वह ब्राह्मण ब्रह्मराक्षस भाव से मुक्त हो गया ।

उसीने मरते समय मुझे गंगाजल का माहात्म्य सुनाया था । मैं उसको मुक्त हुआ देखकर गंगाजल-पान की इच्छा से यहाँ पड़ा हूँ । अतः मुझको भी गंगाजल पिलाकर मुक्त कर दे, तुझे महान पुण्य होगा ।

‘‘मैं लाचार हूँ क्योंकि मेरे पिता बीमार हैं और उनका संक्रांति के स्नान का नियम है । यदि मैंने यह गंगाजल तुझे पिला दिया तो स्नान के पुण्यकाल तक न पहुँचने के कारण मेरे पिता का नियम भंग हो जायेगा ।”
‘‘तुम्हारे पिता का नियम भी भंग न हो और मेरी भी सद्गति हो जाय, ऐसा उपाय करो । पहले मुझे जल पिला दो,फिर नेत्रबंद करने पर मैं तुम्हें तत्काल श्रीगंगाजी के तट पर पहुँचाकर,तुम्हारे पिता के पास पहुँचा दूँगा ।”

ब्राह्मणपुत्र ने प्रेत की दुर्दशा पर दया करके उसे जल पिला दिया । तब प्रेत ने कहा : ‘‘अब नेत्रबंद करो और त्रिवेणी का जल लिये हुए स्वयं को अपने पिता के पास पहुँचा हुआ पाओ । ब्राह्मणपुत्र ने नेत्रबंद किये, फिर देखा कि वह त्रिवेणी के जल से गागर भरकर पिताजी के पास पहुँच गया है ।

गंगाजी की महिमा के विषय में भगवान व्यासजी ‘पद्म पुराण में कहते हैं : ‘‘अविलंब सद्गति का उपाय सोचनेवाले सभी स्त्री-पुरुषों के लिए गंगाजी ही एक ऐसा तीर्थ हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

भगवान शंकर नारदजी से कहते हैं : ‘‘समुद्रसहित पृथ्वी का दान करने से मनीषी पुरुष जो फल पाते हैं, वही फल गंगा-स्नान करनेवाले को सहज में प्राप्त हो जाता है । राजा भगीरथ ने भगवान शंकर की आराधना करके गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था । जिस दिन वे गंगाजी को पृथ्वी पर लेकर आये वही दिन ‘गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है ।

हर हर गंगे🙏🙏