Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

श्राद्ध


श्राद्ध क्या है संपूर्ण जानकारी ।
†††
श्राद्ध दो प्रकार के होते है ,
1)पिंड क्रिया
2) ब्राह्मणभोज

1)पिण्डक्रिया*
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि श्राद्ध में दी गई अन्न सामग्री पितरों को कैसे मिलती है…?

नाम गौत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नम नयन्ति तम।
अपि योनिशतम प्राप्तान्सतृप्तिस्ताननुगच्छन्ति ।।
(वायुपुराण)

श्राद्ध में दिये गये अन्न को नाम , गौत्र , ह्रदय की श्रद्धा , संकल्पपूर्वक दिये हुय पदार्थ भक्तिपूर्वक उच्चारित मन्त्र उनके पास भोजन रूप में उपलब्ध
होते है ,

2)ब्राह्मणभोजन
निमन्त्रितान हि पितर उपतिष्ठन्ति तान द्विजान ।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासिनानुपासते ।।
(मनुस्मृति 3,189)

अर्थात श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मण में पितर गुप्तरूप से प्राणवायु की भांति उनके साथ भोजन करते है , म्रत्यु के पश्चात पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते है , इसिलिय वह दिखाई नही देते ,
तिर इव वै 1पितरो मनुष्येभ्यः
( शतपथ ब्राह्मण )
अर्थात सूक्ष्म शरीरधारी पितर मनुष्यों से छिपे होते है ।

धनाभाव में श्राद्ध

धनाभाव एवम समयाभाव में श्राद्ध तिथि पर पितर का स्मरण कर गाय को घांस खिलाने से भी पूर्ति होती है , यह व्यवस्था पद्मपुराण ने दी है ,
यह भी सम्भव न हो तो इसके अलावा भी , श्राद्ध कर्ता एकांत में जाकर पितरों का स्मरण कर दोनों हाथ जोड़कर पितरों से प्रार्थना करे

न मेस्ति वित्तं न धनम च नान्यच्छ्श्राद्धोपयोग्यम स्वपितृन्नतोस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयोतौ कृतौ भुजौ वर्तमनि मारुतस्य ।।
(विष्णुपुराण)

अर्थात ‘ है पितृगण मेरे पास श्राद्ध हेतु न उपयुक्त धन है न धान्य है मेरे पास आपके लिये ह्रदय में श्रद्धाभक्ति है मै इन्ही के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं आप तृप्त होइये

श्राद्ध सामान्यतः 3 प्रकार के होते है

नित्य नैमितकम काम्यम त्रिविधम श्राद्धम उच्यते
यम स्मृति में 5 प्रकार तथा , विश्वामित्र स्मृति में 12 प्रकार के श्राद्ध का वर्णन है ,किंतु 5 श्राद्ध में ही सबका अंतर्भाव हो जाता है ,

1)नित्य श्राद्ध*
प्रतिदिन किया जाने बाला श्राद्ध , जलप्रदान क्रिया से भी इसकी पूर्ति हो जाती है

2)नैमितकम श्राद्ध*
वार्षिक तिथि पर किया जाने बाला श्राद्ध ,

3)काम्यश्राद्ध*
किसी कामना की पूर्ति हेतु किया जाने वाला श्राद्घ

4)वृद्धिश्राद्ध (नान्दीश्राद्ध)*
मांगलिक कार्यों , विवाहादि में किया जाने बाला श्राद्ध

5)पावर्ण श्राद्ध*
पितृपक्ष ,अमावस्या आदि पर्व पर किया जाने बाला श्राद्ध

श्राद्ध कर्म से मनुष्य को पितृदोष-ऋण से मुक्त के साथ जीवन मे सुखशांति तो प्राप्त होती है , अपितु परलोक भी सुधरता है

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिताहि परमम् तपः।
पितरी प्रितिमापन्ने प्रियन्ते सर्व देवता।।

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।मातरं पितरं तस्मात सर्वयत्नेन पूजयेत

इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है, जैसे: रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं।

सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है, दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है, दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता, ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं।
मित्रों, पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है।

सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है, वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है, इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है, श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए।

पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्ष भर तक प्रसन्न रहते हैं, धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे, इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं, यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं, मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं,

आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं:

1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए, यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं, दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
2- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है, पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है, पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।
5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए, इससे वे प्रसन्न होते हैं, श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए, पिंड दान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।
6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं, ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।
7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटरसरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है, तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है, वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं, कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।
8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए, वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है, अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।
9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।
10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहने वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदर-पूर्वक भोजन करवाना चाहिए, जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।
12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग) में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए, धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है, अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।
13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं, श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है, अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए, दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए, दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।
15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं: गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल, केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है।
सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं, इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।
16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं, तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।
17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं, आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।
18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।
19- सनातन धर्म के भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ
20- श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार :
तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है, श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
भोजन व पिण्ड दान– पितरों

के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है, श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।
वस्त्रदान– वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
दक्षिणा दान– यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।
21 – श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें, श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।
22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है, इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें, इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं।
इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं, पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।
25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं, ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।
26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए, पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है, पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए, एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राध्दकर्म करें या सबसे छोटा ।

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

જેઠ સુદ દસમને ગંગા દશેરા


 જેઠ સુદ દસમને ગંગા દશેરા …

https://nabhakashdeep.wordpress.com/

ગંગાજીનું ઉદ્ગમ સ્થાન હિમાલયના ગંગોત્રી નામના ગ્લેશિયરમાં આવેલ છે. દેવપ્રયાગ નજીક ભાગીરથી અલકનંદા અને મંદાકિની મળે છે. આ બંને નદીઑના સંગમ પછી તે ગંગા નદીને નામે ઓળખાય છે. ગૌમુખ પહેલાનો પ્રવાહ તે ગુપ્ત ગંગાને નામે ગંગોત્રી ઉપર રહેલો છે પણ આજ પ્રવાહ તે ગૌમુખ નામના સ્થાનથી પ્રગટ રૂપથી દેખાય છે. તેથી ગૌમુખ ઉપર ગંગાજીનું ભવ્ય મંદિર બનાવવામાં આવ્યું છે, જેની સ્થાપના ૧૯મી સદીની શરૂઆતમાં ગોરખા જનરલ અમરસિંહ થાપાએ કરેલી હતી. પરંતુ સમય અનુસાર આ મંદિરને જ્યારે જીર્ણોધ્ધારની જરૂર પડી ત્યારે (વર્તમાન સમયમાં)આ મંદિર જયપુરના રાજાઓ દ્વારા બનાવવામાં આવેલ હતું તેવી માન્યતા રહેલી છે. ગૌમુખ પર રહેલ આ મંદિરમાં માતા ગંગા અને આદ્યગુરુ શંકરાચાર્યની મૂર્તિ રહેલી છે. આ મંદિરની પાસે એક વિશાળ શિલા રહેલી છે.

લોકમાન્યતા છે કે આ શિલા ઉપર બેસીને મહારાજ ભગીરથે પોતાની તપશ્ચર્યા કરેલી હતી. જ્યારે બીજી માન્યતા અનુસાર આ સ્થળ ઉપર પાંડવોએ પોતાનો છેલ્લો દેવ યજ્ઞ કર્યો હતો. ગૌમુખ ખાતે રહેલું આ મંદિર અક્ષયતૃતીયાને દિવસે ખૂલે છે અને દિવાળીને દિવસે બંધ થઈ જાય છે. મંદિર બંધ થયા બાદ માતા ગંગાની પ્રતિમાને ગામમાં પરત લાવવામાં આવે છે અહીં આ પ્રતિમા આખો શિયાળો (લગભગ ૬ માસ )રહે છે. શિયાળો પૂરો થતાં પ્રતિમાને ફરી મંદિરમાં લાવી તેની પુનઃસ્થાપના કરાય છે.

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

ગંગા દશેરા


ગંગા દશેરા હિંદુઓનો મુખ્ય તહેવાર છે. જ્યેષ્ઠ શુક્લ દશમીને દશેરા કહેવામાં આવે છે. આમાં સ્નાન, દાન, રૂપાત્મક વ્રત કરવામાં આવે છે. સ્કંદપુરાણમાં લખ્યું છે કે, જ્યેષ્ઠ શુક્લ દશમીને સંવત્સ્રમુખી માનવામાં આવે છે, તેમાં સ્નાન કરો અને ખાસ કરીને દાન કરો. અર્ઘ્ય (પુજદિક) અને તિલોદક (તીર્થયાત્રાની પ્રાપ્તિ માટે તર્પણ ) કોઈપણ નદી પર કરવું જોઈએ.

જે આવું કરે છે તે મહાન લોકો સમાન દસ પાપોથી મુક્ત થાય છે.

પુરાણો અનુસાર ગંગા દશેરાના દિવસે ગંગા સ્નાન કરવાનું વિશેષ મહત્વ છે. ગંગા આ દિવસે સ્વર્ગમાંથી ઉતરી, તેથી તે એક ઉત્સવ માનવામાં આવે છે. ગંગા દશેરાના દિવસે ભગવાન ગણેશને બધા ગંગા મંદિરોમાં અભિષેક કરવામાં આવે છે. આ દિવસે મોક્ષદાયિની ગંગાની પૂજા પણ કરવામાં આવે છે.

ગંગા દશેરાનું મહત્વ

ભગીરથીની તપસ્યા પછી, ગંગા માતા પૃથ્વી પર આવે છે તે દિવસે, જ્યેષ્ઠ શુક્લ પક્ષનો દસમો દિવસ હતો. ગંગા દશેરાની પૂજા તરીકે ગંગા માતાના વંશના દિવસે જાણીતા બન્યા. આ દિવસે ગંગા નદીમાં ઉભા રહીને ગંગા સ્તોત્ર વાંચનાર વ્યક્તિને તેના બધા પાપોથી મુક્તિ મળે છે. સ્કંદ પુરાણમાં ગંગા સ્તોત્ર દશહરા  નામ આપવામાં આવ્યૂ  છે.

ગંગા દશેરાના દિવસે, ભક્તોએ જે દાન કરવું જોઈએ તેની સંખ્યા દસ હોવી જોઈએ અને જેની સાથે તેઓ પૂજા કરે છે તે વસ્તુઓની સંખ્યા પણ દસ હોવી જોઈએ. આ કરવાથી શુભ ફળમાં વધુ વૃદ્ધિ થાય છે.

ગંગા દશેરા

જયેષ્ઠ શુક્લ દશમી પર ગંગા સ્નાન કરવાથી દસ પ્રકારના પાપ દૂર થાય છે. આ દસ પાપોમાંથી, ત્રણ પાપો શારીરિક છે, ચાર પાપ મૌખિક છે અને ત્રણ પાપો માનસિક છે. વ્યક્તિને આ બધાથી મુક્તિ મળે છે.

॥ श्रीगङ्गास्तोत्रम् ॥

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥ १॥

भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः ।
नाऽहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २॥

हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३॥

तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।
मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४॥

पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥ ५॥

कल्पलतामिव फलदाम् लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।
पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥ ६॥

तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः ।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ ७॥

पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।
इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥

रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥ ९॥ गतिर्मय

अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।
तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ १०॥

वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥ ११॥

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२॥

येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकान्तापञ्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥ १३॥

गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदम् विमलं सारम् ।
शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति सुखीस्तव इति च समाप्तः ॥ १४॥

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं गङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

ગંગા દશમી - સાત જન્મોનું પુણ્ય ...
Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

गंगा दशहरा है कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व, ऐसे करें गंगा का पूजन..


गंगा दशहरा है कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व, ऐसे करें गंगा का पूजन..

सलिल पांडेय 

गंगा दशहरा

कर्मकांड पक्ष
गंगा दशहरा: ज्येष्ठ शुक्ल की दशमी तिथि तिथि पर हस्त नक्षत्र, चन्द्रमा कन्या राशि में, सूर्य वृष राशि में और दिन मंगलवार को मां गंगा का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था । इस दिन को गंगा-दशहरा कहा जाता है। शस्त्रों के अनुसार इस दिन गंगा-स्नान एवं पूजन से दस प्रकार के दोषों से मुक्ति मिलती है । दस इंद्रियों वाले तन का पूर्णतः स्वस्थ रहने के भाव में ऐसा कहा गया है। क्योंकि तन स्वस्थ रहेगा तो मन भी उच्च भाव में होगा और हर कार्य में सफलता मिलेगी।

1 जून को गंगा दशहरा- दिन छोड़कर अन्य सारी स्थितियां इस दिन बन रही हैं । गंगा की महत्ता की दृष्टि से धर्मग्रन्थों के अनुसार यदि पुरुषोत्तम मास (मलमास) में गंगा दशहरा हो तो यह पर्व उसी अवधि में मनाना चाहिए ।

गंगा का पूजन- वैसे तो गंगा-दशहरा पूजन में 10 की संख्या में दीपक, फल और ताम्बूल चढ़ाने का विधान है लेकिन ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं है । संभव नहीं हो तो एक ही घी के दिए में 10 संख्या का मॉनसिक स्मरण कर गंगा-तट पर जलाना चाहिए । इस दिन सत्तू और गुड़ के दस पिंड बनाकर गंगा में प्रवाहित करने का विधान है। किसी धातु, मिट्टी और कुछ न हो तो आटे से मां गंगा लिखकर पूजन करने से सारे फल प्राप्त हो जाते हैं । इन दिनों गंगा में मछलियों की तादाद अधिक होती है । अतः प्रकृति संरक्षण के उद्देश्य से विधि-विधान से पूजन करना चाहिए । जहां गंगा उपलब्ध नहीं हो, वहां किसी भी बहते हुए जल में गंगा का स्मरण कर पूजन करना चाहिए ।

मंत्र-जाप :- ऊँ शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमो नमः इस मंत्र का अधिक से अधिक जप करना चाहिए । इसके अलावा गंगास्तोत्र का पाठ 10 बार करने का विधान है ।

सेतुबंध रामेश्वरं की स्थापना श्रीराम ने इसी दिन की थी।

साहित्य पक्ष
मातृ-शक्तियों की आराधना में “जले थले निवासिनीं और वने-रणे निवासिनीं” का जब प्रसंग आता है तो अभिधा अर्थों के अलावा लक्षणा अर्थों पर चिंतन-मनन किया जाए तो मानव शरीर जल-थल से निर्मित है और मन भी किसी जंगल से कम नहीं जिसमें निरन्तर युद्ध होता रहता है । शरीर में मांस-अस्थि थल ही है और इसमें 81% जल तत्व है जिससे थल हिस्सा सिंचित होता रहता है । ऋषियों ने इसी जल-थल की शुद्धता के लिए जप-तप, योग-अनुष्ठान, समुचित आहार-विहार, व्रत-उपवास का सन्देश दिया।

भगीरथ की तपस्या
गंगा दशहरा की आध्यात्मिक कथा सगर के श्रापित वंशजों की मुक्ति के लिए उसी कुल के राजा भगीरथ कठोर तपस्या करते हैं । उनकी तपस्या पर ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, दिन मंगलवार को हस्त नक्षत्र में ब्रह्मा के कमण्डल से माँ गंगा प्रकट होती हैं और पृथ्वी पर चलने की उनकी प्रार्थना स्वीकार करती हैं । लेकिन इसके पीछे ऋषियों के स्वास्थ्य-विज्ञान पर नजर डालें तो 10 इन्द्रियों वाले इस शरीर में जल-तत्व के सन्तुलित प्रवाह का भी उद्देश्य प्रकट होता है । सामान्यतया शरीर में जल-तत्व की कमी से डिहाइड्रेशन हो जाता है जिससे मृत्यु भी हो जाती है । ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी में जलीय सन्तुलन भी आवश्यक है । भावनात्मक दृष्टि से भी देखा जाए व्यक्ति स्वार्थ-लोभ, क्रोध की ऊष्मा से जब कठोर प्रवृत्ति का हो जाता है तो उसके शरीर पर बुरा असर पड़ता है । शरीर के आंतरिक तंत्र कठोर होते हैं । ऐसी स्थिति में सर्वाधिक असर रक्त-प्रवाह में बाधा के रूप में पड़ता है और हाई एवं लो ब्लडप्रेशर, ब्लड शुगर आदि बीमारियां जन्म लेती हैं । जबकि मन-मस्तिष्क में कोमलता- तरलता का भाव शरीर-गंगा को सुचारू करता है ।

देवलोक में शिव का नृत्य और गायन
देवी-पुराण की कथा के अनुसार भगवान शंकर के विवाह में अनेक विसंगतियां आयीं । विवाह की जानकारी देने शंकर जी विष्णुजी के पास गए तो भगवान विष्णु ने वातावरण को सरस बनाने के लिए कुछ गीत-संगीत सुनाने के लिए कहा । इस पर शंकरजी ने गीत गाना शुरू किया तब विष्णुजी आनन्द में इतने द्रवीभूत हुए कि वैकुण्ठ में जलप्लावन होने लगा । जिसे ब्रह्मा ने अपने कमण्डल में एकत्र कर लिया । कथा से स्पष्ट है कि तनाव के दौर में संगीत से मन प्रसन्न होता है । शरीर के रसायन (केमिकल) एवं हार्मोन्स अनुकूल होते हैं । शरीर में तरलता आती है और यह शरीर सगर-पुत्रों की तरह अभिशप्त होने से मुक्त होता है । इसीलिए लोकमान्यता है कि गंगा-तट पर गीत-संगीत, मन्त्र-भजन करना चाहिए जिसकी ध्वनि से जल का प्रदूषण दूर होता है जबकि गंगा किनारे नकरात्मक आचरण से प्रदूषण बढ़ता है । इसी प्रदूषण को दूर करने के लिए भगवान कृष्ण यमुना में कूद कर कालिया-नाग जैसे प्रदूषण को समाप्त करते हैं ।

विष्णु के पग से निकली गंगा
वामन-पुराण की कथा के अनुसार राजा बलि से 3 पग मांगने भिक्षुक बनकर विष्णुजी जाते हैं । एक पग से पृथ्वी नाप लिया, दूसरा आकाश की तरफ बढ़ते हुए ब्रह्मलोक गया । धूल-धूसरित हुए विष्णुजी के पग को जल से प्रक्षालित कर ब्रह्मा ने कमण्डल में रख लिया । वहीं गंगा हैं । इस दृष्टि से कृषि प्रधान देश में भगवान विष्णु का धरती से अनाज के रूप में जीवन पैदा करने की व्यवस्था झलकती है । एक पग से किसान के रूप में लघु बनकर धरती को उपजाऊ बनाया और दूसरी ओर आकाश से जलवर्षा की व्यवस्था की । इस गर्मी के बाद खरीफ की फसल की तैयारी का भी भाव है । तीसरा पग बलि के सिर पर रखने का आशय ही है कि मस्तिष्क दयार्द्र रहे न कि अहंकारग्रस्त । स्पष्ट है कि गंगा-दशहरा शरीर में प्रवाहित गंगा के प्रति सजगता पैदा करना है । क्योंकि जब किसी के मन से संवेदना का पानी सूख जाता है वह परिवार और समाज के लिए कठोर हो जाता है । कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व है गंगा-दशहरा ।
सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर ।


गंगा दशहरा प्रारम्भ

AZAAD BHARAT

1मां गंगा की महिमागंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जूनगंगा
नदी उत्तर भारतकी केवल जीवनरेखा नहीं, अपितु हिंदू धर्मका सर्वोत्तम तीर्थ
है । ‘आर्य सनातन वैदिक संस्कृति’ गंगाके तटपर विकसित हुई, इसलिए गंगा
हिंदुस्थानकी राष्ट्ररूपी अस्मिता है एवं भारतीय संस्कृतिका मूलाधार है ।
इस कलियुगमें श्रद्धालुओंके पाप-ताप नष्ट हों, इसलिए ईश्वरने उन्हें इस
धरापर भेजा है । वे प्रकृतिका बहता जल नहीं; अपितु सुरसरिता (देवनदी) हैं ।
उनके प्रति हिंदुओंकी आस्था गौरीशंकरकी भांति सर्वोच्च है । गंगाजी
मोक्षदायिनी हैं; इसीलिए उन्हें गौरवान्वित करते हुए पद्मपुराणमें (खण्ड ५,
अध्याय ६०, श्लोक ३९) कहा गया है, ‘सहज उपलब्ध एवं मोक्षदायिनी गंगाजीके
रहते विपुल धनराशि व्यय (खर्च) करनेवाले यज्ञ एवं कठिन तपस्याका क्या लाभ
?’ नारदपुराणमें तो कहा गया है, ‘अष्टांग योग, तप एवं यज्ञ, इन सबकी
अपेक्षा गंगाजीका निवास उत्तम है । गंगाजी भारतकी पवित्रताकी सर्वश्रेष्ठ
केंद्रबिंदु हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है ।’

मां गंगा का #ब्रह्मांड में उत्पत्ति‘वामनावतारमें
श्रीविष्णुने दानवीर बलीराजासे भिक्षाके रूपमें तीन पग भूमिका दान मांगा ।
राजा इस बातसे अनभिज्ञ था कि श्रीविष्णु ही वामनके रूपमें आए हैं, उसने
उसी क्षण वामनको तीन पग भूमि दान की । वामनने विराट रूप धारण कर पहले पगमें
संपूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पगमें अंतरिक्ष व्याप लिया । दूसरा पग उठाते समय
वामनके ( #श्रीविष्णुके) बाएं पैरके अंगूठेके धक्केसे ब्रह्मांडका
सूक्ष्म-जलीय कवच (टिप्पणी १) टूट गया । उस छिद्रसे गर्भोदककी भांति
‘ब्रह्मांडके बाहरके सूक्ष्म-जलनेब्रह्मांडमें प्रवेश किया । यह सूक्ष्म-जल
ही गंगा है ! गंगाजीका यह प्रवाह सर्वप्रथम सत्यलोकमें गया ।ब्रह्मदेवने
उसे अपने कमंडलु में धारण किया । तदुपरांत सत्यलोकमें ब्रह्माजीने अपने
कमंडलुके जलसे श्रीविष्णुके चरणकमल धोए । उस जलसे गंगाजीकी उत्पत्ति हुई ।
तत्पश्चात गंगाजी की यात्रा सत्यलोकसे क्रमशः #तपोलोक, #जनलोक, #महर्लोक,
इस मार्गसे #स्वर्गलोक तक हुई ।पृथ्वी पर उत्पत्ति #सूर्यवंशके राजा सगरने #अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया । उन्होंने दिग्विजयके
लिए यज्ञीय अश्व भेजा एवं अपने ६० सहस्त्र पुत्रोंको भी उस अश्वकी रक्षा
हेतु भेजा । इस यज्ञसे भयभीत इंद्रदेवने यज्ञीय अश्वको कपिलमुनिके आश्रमके
निकट बांध दिया । जब सगरपुत्रोंको वह अश्व कपिलमुनिके आश्रमके निकट प्राप्त
हुआ, तब उन्हें लगा, ‘कपिलमुनिने ही अश्व चुराया है ।’ इसलिए सगरपुत्रोंने
ध्यानस्थ कपिलमुनिपर आक्रमण करनेकी सोची । कपिलमुनिको अंतर्ज्ञानसे यह बात
ज्ञात हो गई तथा अपने नेत्र खोले । उसी क्षण उनके नेत्रोंसे प्रक्षेपित
तेजसे सभी सगरपुत्र भस्म हो गए । कुछ समय पश्चात सगरके प्रपौत्र राजा
अंशुमनने सगरपुत्रोंकी मृत्युका कारण खोजा एवं उनके उद्धारका मार्ग पूछा ।
कपिलमुनिने अंशुमनसे कहा, ‘`गंगाजीको स्वर्गसे भूतलपर लाना होगा ।
सगरपुत्रोंकी अस्थियोंपर जब गंगाजल प्रवाहित होगा, तभी उनका उद्धार होगा
!’’ मुनिवरके बताए अनुसार गंगाको पृथ्वीपर लाने हेतु अंशुमनने तप आरंभ किया
।’  ‘अंशुमनकी मृत्युके पश्चात उसके सुपुत्र राजा दिलीपने भी गंगावतरणके
लिए तपस्या की । #अंशुमन एवं दिलीपके सहस्त्र वर्ष तप करनेपर भी गंगावतरण
नहीं हुआ; परंतु तपस्याके कारण उन दोनोंको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ।’
(वाल्मीकिरामायण, काण्ड १, अध्याय ४१, २०-२१)‘राजा
दिलीपकी #मृत्युके पश्चात उनके पुत्र राजा भगीरथने कठोर तपस्या की । उनकी
इस तपस्यासे प्रसन्न होकर गंगामाताने भगीरथसे कहा, ‘‘मेरे इस प्रचंड
प्रवाहको सहना पृथ्वीके लिए कठिन होगा । अतः तुम भगवान शंकरको प्रसन्न करो
।’’ आगे भगीरथकी घोर तपस्यासे भगवान शंकर प्रसन्न हुए तथा भगवान शंकरने
गंगाजीके प्रवाहको जटामें धारण कर उसे पृथ्वीपर छोडा । इस प्रकार हिमालयमें
अवतीर्ण गंगाजी भगीरथके पीछे-पीछे #हरद्वार, प्रयाग आदि स्थानोंको पवित्र
करते हुए बंगालके उपसागरमें (खाडीमें) लुप्त हुईं ।’ज्येष्ठ
मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, भौमवार (मंगलवार) एवं हस्त नक्षत्रके शुभ
योगपर #गंगाजी स्वर्गसे धरतीपर अवतरित हुईं ।  जिस दिन #गंगा पृथ्वी पर
अवतरित हुईं वह दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से जाना जाता है ।जगद्गुरु
आद्य शंकराचार्यजी, जिन्होंने कहा है : एको ब्रह्म द्वितियोनास्ति ।
द्वितियाद्वैत भयं भवति ।। उन्होंने भी ‘गंगाष्टक’ लिखा है, गंगा की महिमा
गायी है । रामानुजाचार्य, रामानंद स्वामी, चैतन्य महाप्रभु और स्वामी
रामतीर्थ ने भी गंगाजी की बड़ी महिमा गायी है । कई साधु-संतों,
अवधूत-मंडलेश्वरों और जती-जोगियों ने गंगा माता की कृपा का अनुभव किया है,
कर रहे हैं तथा बाद में भी करते रहेंगे ।अब
तो विश्व के #वैज्ञानिक भी गंगाजल का परीक्षण कर दाँतों तले उँगली दबा रहे
हैं ! उन्होंने दुनिया की तमाम नदियों के जल का परीक्षण किया परंतु गंगाजल
में रोगाणुओं को नष्ट करने तथा आनंद और सात्त्विकता देने का जो अद्भुत गुण
है, उसे देखकर वे भी आश्चर्यचकित हो उठे । #हृषिकेश में स्वास्थ्य-अधिकारियों ने पुछवाया कि यहाँ से हैजे की कोई खबर
नहीं आती, क्या कारण है ? उनको बताया गया कि यहाँ यदि किसीको हैजा हो जाता
है तो उसको गंगाजल पिलाते हैं । इससे उसे दस्त होने लगते हैं तथा हैजे के
कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है । वैसे तो हैजे के समय
घोषणा कर दी जाती है कि पानी उबालकर ही पियें । किंतु गंगाजल के पान से तो
यह रोग मिट जाता है और केवल हैजे का रोग ही मिटता है ऐसी बात नहीं है, अन्य
कई रोग भी मिट जाते हैं । तीव्र व दृढ़ श्रद्धा-भक्ति हो तो गंगास्नान व
गंगाजल के पान से जन्म-मरण का रोग भी मिट सकता है ।सन्
1947 में जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आया था । उसने वाराणसी से
#गंगाजल लिया । उस पर अनेक परीक्षण करके उसने विस्तृत लेख लिखा, जिसका सार
है – ‘इस जल में कीटाणु-रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है ।’दुनिया
की तमाम #नदियों के जल का विश्लेषण करनेवाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने
सन् 1924 में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और
#कीटाणु-रोगाणुनाशक जल घोषित कर दिया था ।‘आइने
अकबरी’ में लिखा है कि ‘अकबर गंगाजल मँगवाकर आदरसहित उसका पान करते थे ।
वे गंगाजल को अमृत मानते थे ।’ औरंगजेब और मुहम्मद तुगलक भी गंगाजल का पान
करते थे । शाहनवर के नवाब केवल गंगाजल ही पिया करते थे ।कलकत्ता
के हुगली जिले में पहुँचते-पहुँचते तो बहुत सारी नदियाँ, झरने और नाले
गंगाजी में मिल चुके होते हैं । अंग्रेज यह देखकर हैरान रह गये कि हुगली
जिले से भरा हुआ गंगाजल दरियाई मार्ग से यूरोप ले जाया जाता है तो भी कई-कई
दिनों तक वह बिगड़ता नहीं है । जबकि यूरोप की कई बर्फीली नदियों का पानी
हिन्दुस्तान लेकर आने तक खराब हो जाता है ।अभी रुड़की विश्वविद्यालय के #वैज्ञानिक कहते हैं कि ‘गंगाजल में जीवाणुनाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं ।’फ्रांसीसी
चिकित्सक हेरल ने देखा कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं । फिर
उसने गंगाजल को कीटाणुनाशक औषधि मानकर उसके इंजेक्शन बनाये और जिस रोग में
उसे समझ न आता था कि इस रोग का कारण कौन-से कीटाणु हैं, उसमें गंगाजल के वे
इंजेक्शन रोगियों को दिये तो उन्हें लाभ होने लगा !संत #तुलसीदासजी कहते हैं :गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ।।(श्रीरामचरित. अयो. कां. : 86.2)सभी
सुखों को देनेवाली और सभी शोक व दुःखों को हरनेवाली माँ गंगा के तट पर
स्थित तीर्थों में पाँच तीर्थ विशेष आनंद-उल्लास का अनुभव कराते हैं :
गंगोत्री, हर की पौड़ी (हरिद्वार),  #प्रयागराज त्रिवेणी, काशी और #गंगासागर
। #गंगादशहरे के दिन गंगा में गोता मारने से सात्त्विकता, प्रसन्नता और
विशेष पुण्यलाभ होता है ।Official Azaad Bharat Links:👇🏻🔺Youtube : https://goo.gl/XU8FPk🔺Facebook : https://www.facebook.com/AzaadBharat.Org/🔺 Twitter : https://goo.gl/he8Dib🔺 Instagram : https://goo.gl/PWhd2m🔺Google+ : https://goo.gl/Nqo5IX🔺Blogger : https://goo.gl/N4iSfr🔺 Word Press : https://goo.gl/ayGpTG🔺Pinterest : https://goo.gl/o4z4BJ



गंगा दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। ज्येष्ठ शुक्ला दशमी को दशहरा कहते हैं। इसमें स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है। स्कन्दपुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष करके करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्घ्य (पू‍जादिक) एवं तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें।
ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है।

पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना जाता है। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। वहीं इस दिन मोक्षदायिनी गंगा का पूजन-अर्चना भी किया जाता है।

गंगा दशहरे का महत्व | Importance of Ganga Dusshera
भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी थी. गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है.
गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जन जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस वस्तु से भी पूजन करें उनकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए. ऎसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.
गंगा दशहरे का फल | Results of Ganga Dusshera
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है. इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं. इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है.

बागेश्वर दर्शन

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

गंगा दशहरा


धर्म और संस्कृति ग्रुप
की सादर प्रस्तुति
🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚

हंस जैन रामनगर खंडवा
९८२७२ १४४२७
🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚

आज मनाया जायगा
गंगा दशहरा
💦💦💦💦💦💦💦

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को याने आज गंगा दशहरा मनाया जाएगा।

कोरोना महामारी के कारण श्रद्धालुओं से घर में मा गंगा की पूजा कर ले। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अगर इस तरह की परिस्थिति हो तो घर पर बाल्टी या टब में पानी के साथ गंगाजल मिलाकर मां गंगा की आराधना करते हुए स्नान करना गंगा में डुबकी लगाने के समान है।

क्या मान्यता है आज
🌟🌟🐚🌟🌟🐚

गंगा दशहरा पर स्नान-ध्यान करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है।

लेकिन इस बार कोरोना महामारी संकट की वजह से श्रद्धालु गंगा में आस्था की डुबकी नहीं लगा पाएंगे। ऐसे में श्रद्धालु घर में नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान के साथ विधिवत पूजा अर्चना कर सकते हैं।

स्नान के दौरान ‘भगवते दशपापहराये गंगाये नारायण्ये रेवत्ये शिवाये दक्षाये अमृताये विश्वरुपिण्ये नंदिन्ये ते नमो नम:’ का जप करें।

गंगा जी के स्नान मात्र से
ये पाप दूर हो जाते है
🐚💦🐚💦🐚💦💦

मान्‍यता है क‍ि गंगा दशहरा के द‍िन गंगा स्‍नान करने से दस तरह के पाप नष्‍ट हो जाते हैं। इसमें पराई स्त्री के साथ समागम, बिना आज्ञा या जबरन किसी की वस्तु लेना, कटुवचन का प्रयोग, हिंसा, किसी की शिकायत करना, असत्य वचन बोलना, असंबद्ध प्रलाप, दूसरे की संपत्ति हड़पना या हड़पने की इच्छा, दूसरें को हानि पहुंचाना या ऐसी इच्छा रखना और बेवजह की बातों पर पर‍िचर्चा शामिल है। इसलिए धर्मशास्‍त्रों में कहा गया है क‍ि अगर अपनी गलतियों का अहसास और प्रभु से माफी मांगनी हो तो गंगा दशहरा के द‍िन गंगा स्‍नान कर दान-पुण्‍य करें। वर्तमान में कोरोना वायरस के चलते गंगा स्‍नान संभव नहीं है तो घर में स्‍नान के जल में गंगाजल डालकर स्‍नान कर लें। इससे भी गंगा में डुबकी लगाने जैसा ही फल म‍िलेगा।गंगा जी की कथा

💦💦💦💦💦💦

कथा: एक बार महाराज सगर ने व्यापक यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था। परिणामतः अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ भगवान ‘महर्षि कपिल’ के रूप में तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। प्रजा उन्हें देखकर ‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगी।

महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गई। इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने ‘गंगा’ की मांग की। इस पर ब्रह्मा ने कहा- ‘राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है। इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए।’

महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा। तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका। अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया। तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी।

इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके बड़े भाग्यशाली हुए। उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों-युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देती, मुक्ति भी देती है। इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है।तो बोलो गंगा मैया की जय। कुछ खास प्रयोग

🌟🌟🌟🍭🌟🌟

यदि आप गंगा नदी किनारे नहीं जा सकते तो एक लोटे में गंगा जल भरकर उसके नजदीक घी का दीपक जलाकर गंगा माता की आरती या पूजा करे।

तत्पश्चात घर या व्यापार में उस जल को गंगा माता से प्रार्थना कर छिड़क देवें।
ध्यान रखे की पांव में जल नहीं गिरे।घर के बुजुर्ग ,बच्चे या बीमार को मां गंगा का जल पिलावे और उनका स्वास्थ्य ठीक रहे प्रार्थना करे। जय हो गंगा मां की

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

🌟💦🌟💦🌟💦🌟

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

वट सावित्री व्रत


देवी सिंग तोमर

जय श्री राधे…

वट सावित्री व्रत
व्रत विधि एवं कथा
22 मई

इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने सुहाग के दीर्घायु होने और उनकी कुशलता के लिए वट के वृक्ष की पूजा-उपासना करती हैं। ऐसा मान्यता है कि वट सावित्री व्रत कथा के श्रवण मात्र से महिलाओं के पति पर आने वाली बुरी बला टल जाती है।

#व्रत_कथा

पौरणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार, प्राचीन काल में भद्रदेश के राजा अश्वपति बड़े ही प्रतापी और धर्मात्मा थे। उनके इस व्यवहार से प्रजा में सदैव खुशहाली रहती थी, लेकिन अश्वपति स्वयं प्रसन्न नहीं रहते हैं, क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थीं। राजा अश्वपति संतान प्राप्ति हेतु नित्य यज्ञ और हवन किया करते थे, जिसमें गायत्री मंत्रोच्चारण के साथ आहुतियां दी जाती थीं।

उनके इस पुण्य प्राप्त से एक दिन माता गायत्री प्रकट होकर बोली-हे राजन! मैं तुम्हारी भक्ति से अति प्रसन्न हुई हूं। इसलिए तुम्हें मनचाहा वरदान दे रही हूं। तुम्हारे घर जल्द ही एक कन्या जन्म लेगी। यह कहकर माता गायत्री अंतर्ध्यान हो गईं। कालांतर में राजा अश्वपति के घर बेहद रूपवान कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम सावित्री रखा गया।

जब सावित्री बड़ी हुई तो उनके लिए योग्य वर नहीं मिला। इसके बाद राजा अश्वपति ने अपनी कन्या से कहा-हे देवी! आप स्वयं मनचाहा वर ढ़ूंढकर विवाह कर सकती है।

तब सावित्री को एक दिन वन में सत्यवान मिले जो राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। जो राज पाट चले जाने के कारण वन में रह रहे थे। सावित्री ने मन ही मन सत्यवान अपना पति मान लिया। यह देख नारद जी राजा अश्वपति के पास आकर बोले-हे राजन! आपकी कन्या ने जो वर चुना है, उसकी अकारण जल्द ही मृत्यु हो जाएगी। आप इस विवाह को यथाशीघ्र रोक दें।

राजा अश्वपति के कहने के बावजूद सावित्री नहीं मानी और सत्यवान से शादी कर ली। इसके अगले साल ही नारद जी के कहे अनुसार-सत्यवान की मृत्यु हो गई। उस समय सावित्री अपने पति को गोदकर में लेकर वट वृक्ष के नीचे बैठी थी। तभी यमराज आकर सत्यवान की आत्मा को लेकर जाने लगे तो सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ी।

यमराज के बहुत मनाने के बाद भी सावित्री नहीं मानीं तो यमराज ने उन्हें वरदान मांगने का प्रलोभन दिया। सावित्री ने अपने पहले वरदान में सास-ससुर की दिव्य ज्योति मांगी( ऐसा कहा जाता है कि सावित्री के सास ससुर अंधे थे)।

दूसरे वरदान में छिना राज-पाट मांगा और दूसरे तीसरे वरदान में सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा, जिसे यमराज ने तथास्तु कह स्वीकार कर लिया।

इसके बाद भी जब सावित्री यमराज के पीछे चलती रही तो यमराज ने कहा-हे देवी ! अब आपको क्या चाहिए ?

तब सावित्री ने कहा-हे यमदेव आपने सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान तो दे दिया, तब सावित्री ने कहा बिना पति के मैं मां कैसे बन सकती हूं? यह सुन यमराज स्तब्ध रह गए। इसके बाद उन्होंने सत्यवान को अपने प्राण पाश से मुक्त कर दिया। कालांतर से ही सावत्री की पति सेवा, सभी प्रकार के सुखों का भोग किया।

#पूजन_विधि

इस दिन सुबह उठकर स्नान करने के बाद सुहागिनें नए वस्त्र धारण करती हैं। वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं खूब सजती-संवरती हैं। सबसे पहले भगवान सूर्य को अर्घ्य दें, इसके बाद सभी पूजन सामग्रियों को किसी बांस से बनी टोकरी या पीतल के पात्र में इकट्ठा कर लें। अपने नजदीकी वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करें और माता सावित्री को वस्त्र व सोलह श्रृंगार चढाएं। फल-फूल अर्पित करने के बाद वट वृक्ष को पंखा झेलें।
इसके बाद धागे को पेड़ में लपेटते हुए जितना संभव हो सके 5, 11, 21, 51 या फिर 108 बार बदगद के पेड़ की परिक्रमा करें। फिर व्रत कथा को ध्यानपूर्वक सुनें। इसके बाद दिन भर व्रत रखें।

अर्घ्य देने का श्लोक

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते।।

वट सावित्री व्रत की

जय श्री राधे… जय श्री हरिदास…

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

शरद पूर्णिमा विशेष


शरद पूर्णिमा विशेष → ( 15th Oct, 2016 )

शरद पूर्णिमा की रात्रि का सेहत के लिए विशेष महत्त्व है। इस रात को चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषकशक्ति एवं शांतिरूपी अमृत की वर्षा करता है। आज की रात्रि चंद्रमा पृथ्वी के बहुत नजदीक होता है और उसकी उज्जवल किरणें पेय एवं खाद्य पदार्थों में पड़ती हैं अत: उसे खाने वाला व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता है। उसका शरीर पुष्ट होता है। भगवान ने भी कहा है –

पुष्णमि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।

‘रसस्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।’ (गीताः15.13)

चन्द्रमा की किरणों से पुष्ट खीर पित्तशामक, शीतल, सात्त्विक होने के साथ वर्ष भर प्रसन्नता और आरोग्यता में सहायक सिद्ध होती है। इससे चित्त को शांति मिलती है और साथ ही पित्तजनित समस्त रोगों का प्रकोप भी शांत होता है ।

आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो चन्द्र का मतलब है, शीतलता। बाहर कितने भी परेशान करने वाले प्रसंग आए लेकिन आपके दिल में कोई फरियाद न उठे। आप भीतर से ऐसे पुष्ट हों कि बाहर की छोटी-मोटी मुसीबतें आपको परेशान न कर सकें ।

इस रात हजार काम छोड़कर 15 मिनट चन्द्रमा को एकटक निहारना सेहत की दृष्टि से अति उत्तम है।

एक आध मिनट आंखें पटपटाना यानी झपकाना चाहिए।

कम से कम 15 मिनट चन्द्रमा की किरणों का फायदा लेना चाहिए, ज्यादा भी करें तो कोई नुकसान नहीं। इससे 32 प्रकार की पित्त संबंधी बीमारियों में लाभ होगा।

चांद के सामने छत पर या मैदान में ऐसा आसन बिछाना चाहिए जो विद्युत का कुचालक हो।

चन्द्रमा की तरफ देखते-देखते अगर मन हो तो आप लेट भी सकते हैं।

श्वासोच्छवास के साथ भगवान का नाम और शांति को भीतर भरते जाएं।

ऐसा करते-करते आप विश्रान्ति योग में चले जाए तो सबसे अच्छा होगा।

जिन्हें नेत्रज्योति बढ़ानी हो, वे शरद पूनम की रात को सुई में धागा पिरोने की कोशिश करें।

इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त 64 कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है।

चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है, जिसका सेवन रात्रि 12 बजे बाद किया जाता है। मान्यता है कि इस खीर के सेवन से अस्थमा रोगी रोगमुक्त होता है। इसके अलावा खीर देवताओं का प्रिय भोजन भी है।

#ShreemadBhagvatRahasya#Bhagvat#SBR#श्रीमदभागवतरहस्य

#SharadPoonam#KojagiriSpecial#ForEyeSight#Sui_Dhaga

ⓁⒾⓀⒺ —-►►https://web.facebook.com/BhagvatR

FOLLOW —-►► @SBhagvatR

Visit Us On → http://only4hinduism.blogspot.in/

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav, यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

भारतीय संस्कृति में मां के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है


सुनील शास्त्री

भारतीय संस्कृति में मां के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा रही है, लेकिन आज आधुनिक दौर में जिस तरह से मदर्स डे मनाया जा रहा है, उसका इतिहास भारत में बहुत पुराना नहीं है। इसके बावजूद दो-तीन दशक से भी कम समय में भारत में मदर्स डे काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

अलौकिक शब्द है माँ

मातृ दिवस-समाज में माताओं के प्रभाव व सम्मान का उत्सव है। मां शब्द में संपूर्ण सृष्टि का बोध होता है। मां के शब्द में वह आत्मीयता एवं मिठास छिपी हुई होती है, जो अन्य किसी शब्दों में नहीं होती। मां नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। मां के आगे सभी रिश्ते बौने पड़ जाते हैं। मातृत्व की छाया में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका सहारा बन जाती है। समाज में मां के ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने अकेले ही अपने बच्चों की जिम्मेदारी निभाई। मातृ दिवस सभी माताओं का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। एक बच्चे की परवरिश करने में माताओं द्वारा सहन की जाने वालीं कठिनाइयों के लिये आभार व्यक्त करने के लिये यह दिन मनाया जाता है। कवि रॉबर्ट ब्राउनिंग ने मातृत्व को परिभाषित करते हुए कहा है- सभी प्रकार के प्रेम का आदि उद्गम स्थल मातृत्व है और प्रेम के सभी रूप इसी मातृत्व में समाहित हो जाते हैं। प्रेम एक मधुर, गहन, अपूर्व अनुभूति है, पर शिशु के प्रति मां का प्रेम एक स्वर्गीय अनुभूति है।

‘मां!’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘मां’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। ‘मां’ की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। जिन्होंने आपको और आपके परिवार को आदर्श संस्कार दिए। उनके दिए गए संस्कार ही मेरी दृष्टि में आपकी मूल थाती है। जो हर मां की मूल पहचान होती है।

माँ से ही मिलता है संस्कार

हर संतान अपनी मां से ही संस्कार पाता है। लेकिन मेरी दृष्टि में संस्कार के साथ-साथ शक्ति भी मां ही देती है। इसलिए हमारे देश में मां को शक्ति का रूप माना गया है और वेदों में मां को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। श्रीमद् भगवद् पुराण में उल्लेख मिलता है कि माता की सेवा से मिला आशीष सात जन्मों के कष्टों व पापों को दूर करता है और उसकी भावनात्मक शक्ति संतान के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है।

माँ के बारे में महान लोगों का कथन

प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने मां की महिमा को उजागर करते हुए कहा है कि जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मां के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं। अब्राहम लिंकन का मां के बारे में मार्मिक कथन है कि जो भी मैं हूँ, या होने की उम्मीद है, मैं उसके लिए अपने प्यारी माँ का कर्जदार हूँ। किसी औलाद के लिए ‘माँ’ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए माँ शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है।

मुसीबत में माँ ही क्यों याद आती है?

क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है क्योंकि वो माँ ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्मे होते हैं। बचपन में हमारा रातों का जागना, जिस वजह से कई रातों तक माँ सो भी नहीं पाती थी। वह गिले में सोती और हमें सूखे में सुलाती। जितना माँ ने हमारे लिए किया है उतना कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। जाहिर है माँ के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी, कई सदियां भी कम है।
इसे भी पढ़ें: पीएम मोदी ने मां के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, फिर अहमदाबाद में डाला वोट
‘मां’-इस लघु शब्द में प्रेम की विराटता/समग्रता निहित है। अणु-परमाणुओं को संघटित करके अनगिनत नक्षत्रों, लोक-लोकान्तरों, देव-दनुज-मनुज तथा कोटि-कोटि जीव प्रजातियों को मां ने ही जन्म दिया है। मां के अंदर प्रेम की पराकाष्ठा है या यूं कहें कि मां ही प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम की यह चरमता केवल माताओं में ही नहीं, वरन् सभी मादा जीवों में देखने को मिलती है। अपने बच्चों के लिए भोजन न मिलने पर हवासिल (पेलिकन) नाम की जल-पक्षिनी अपना पेट चीर कर अपने बच्चों को अपना रक्त-मांस खिला-पिला देती है।

माँ के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?

कितनी दयनीय बात है कि देश ने स्त्री की शक्ति के रूप में अवधारणा दी, जिसने पुराणों के पृष्ठों में देवताओं को 4 या 8 हाथ दिये किन्तु देवियों को 108 हाथ दिये, उसी ने स्त्रियों को पुरुषों से नीचा स्थान दिया और उन्हें वेद पढ़ने के अधिकार से वंचित कर दिया और सबसे शोचनीय बात यह है कि उन्हें चारदिवारी में बंद कर दिया।’’ ‘मां’ को देवी सम्मान दिलाना वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता में से एक है। मां प्राण है, मां शक्ति है, मां ऊर्जा है, मां प्रेम, करुणा और ममता का पर्याय है। मां केवल जन्मदात्री ही नहीं जीवन निर्मात्री भी है। मां धरती पर जीवन के विकास का आधार है। मां ने ही अपने हाथों से इस दुनिया का ताना-बाना बुना है। सभ्यता के विकास क्रम में आदिमकाल से लेकर आधुनिककाल तक इंसानों के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार, मस्तिष्क में लगातार बदलाव हुए। लेकिन मातृत्व के भाव में बदलाव नहीं आया। उस आदिमयुग में भी मां, मां ही थी। तब भी वह अपने बच्चों को जन्म देकर उनका पालन-पोषण करती थीं। उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा करना सिखाती थी। आज के इस आधुनिक युग में भी मां वैसी ही है। मां नहीं बदली। विक्टर ह्यूगो ने मां की महिमा इन शब्दों में व्यक्त की है कि एक मां की गोद कोमलता से बनी रहती है और बच्चे उसमें आराम से सोते हैं।
इसे भी पढ़ें: माँ के प्रति बच्चों के प्यार के इजहार का दिन है ‘मदर्स डे’

धरती की विधाता है माँ

मां को धरती पर विधाता की प्रतिनिधि कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सच तो यह है कि मां विधाता से कहीं कम नहीं है। क्योंकि मां ने ही इस दुनिया को सिरजा और पाला-पोशा है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा किसी को नजर आये न आए मां हर किसी को हर जगह नजर आती है। कहीं अण्डे सेती, तो कहीं अपने शावक को, छोने को, बछड़े को, बच्चे को दुलारती हुई नजर आती है। मां एक भाव है मातृत्व का, प्रेम और वात्सल्य का, त्याग का और यही भाव उसे विधाता बनाता है।

मां विधाता की रची इस दुनिया को फिर से, अपने ढंग से रचने वाली विधाता है। मां सपने बुनती है और यह दुनिया उसी के सपनों को जीती है और भोगती है। मां जीना सिखाती है। पहली किलकारी से लेकर आखिरी सांस तक मां अपनी संतान का साथ नहीं छोड़ती। मां पास रहे या न रहे मां का प्यार दुलार, मां के दिये संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं। मां ही अपनी संतानों के भविष्य का निर्माण करती हैं। इसीलिए मां को प्रथम गुरु कहा गया है। स्टीव वंडर ने सही कहा है कि मेरी माँ मेरी सबसे बड़ी अध्यापक थी, करुणा, प्रेम, निर्भयता की एक शिक्षक। अगर प्यार एक फूल के जितना मीठा है, तो मेरी माँ प्यार का मीठा फूल है।
इसे भी पढ़ें: माता-पिताओं को बच्चों की पढ़ाई के लिए निकालना चाहिए अधिक समय: सर्वेक्षण

कन्याभ्रूणों की हत्या नृशंस

प्रथम गुरु के रूप में अपनी संतानों के भविष्य निर्माण में मां की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मां कभी लोरियों में, कभी झिड़कियों में, कभी प्यार से तो कभी दुलार से बालमन में भावी जीवन के बीज बोती है। इसलिए यह आवश्यक है कि मातृत्व के भाव पर नारी मन के किसी दूसरे भाव का असर न आए। जैसाकि आज कन्याभ्रूणों की हत्या का जो सिलसिला बढ़ रहा है, वह नारी-शोषण का आधुनिक वैज्ञानिक रूप है तथा उसके लिए मातृत्व ही जिम्मेदार है। महान् जैन आचार्य एवं अणुव्रत आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य तुलसी की मातृ शक्ति को भारतीय संस्कृति से परिचित कराती हुई निम्न प्रेरणादायिनी पंक्तिया पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं- ‘‘भारतीय मां की ममता का एक रूप तो वह था, जब वह अपने विकलांग, विक्षिप्त और बीमार बच्चे का आखिरी सांस तक पालन करती थी। परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा की गई उसकी उपेक्षा से मां पूरी तरह से आहत हो जाती थी। वही भारतीय मां अपने अजन्मे, अबोल शिशु को अपनी सहमति से समाप्त करा देती है। क्यों? इसलिए नहीं कि वह विकलांग है, विक्षिप्त है, बीमार है पर इसलिए कि वह एक लड़की है। क्या उसकी ममता का स्रोत सूख गया है? कन्याभ्रूणों की बढ़ती हुई हत्या एक ओर मनुष्य को नृशंस करार दे रही है, तो दूसरी ओर स्त्रियों की संख्या में भारी कमी मानविकी पर्यावरण में भारी असंतुलन उत्पन्न कर रही है।’’ अन्तर्राष्ट्रीय मातृ-दिवस को मनाते हुए मातृ-महिमा पर छा रहे ऐसे अनेक धुंधलों को मिटाना जरूरी है, तभी इस दिवस की सार्थकता है।

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

सीता माता जन्म महोत्सव बधाई


॥ श्रीसीतारामाभ्याँ नम : ॥
उद्भव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम्।।

अनंतकोटि ब्रहमांड जननी पराम्बा रामचंद्र राघवेन्द्र सरकार की ह्रद्येश्वरि श्रीजानकी जी के मंगलमय प्राकट्य उत्सव पर युगल सरकार के श्री चरणों में कोटि-कोटि साष्टांग दंडवत प्रणाम।
युगल सरकार से प्रार्थना है कि हमारे हृदय कमल पर सदा विराजमान रहे, अपनी चरणों की रस रूपा प्रेम लक्षणा भक्ति हमें प्रदान करें।

श्रीराम प्राण वल्लभा,विदेहराज नंदनी श्री किशोरी जी के प्राकट्य उत्सव जी समस्त वैष्णव जगत को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥

ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥

माँ सीता
सीता रामायण और रामचरितमानस की मुख्य पात्र है। हिंदू धर्म में इनकी देवी के रूप में पूजा की जाती है। सीता मिथिला के राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थी। इनका विवाह अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम से स्वयंवर में शिवधनुष को भंग करने के उपरांत हुआ था। इनकी स्त्री व पतिव्रता धर्म के कारण इनका नाम आदर से लिया जाता है। त्रेता युग में इन्हें सौभाग्य की देवी लक्ष्मी का अवतार मानते हैं। राजा जनक की पुत्री का नाम सीता इसलिए था कि वे जनक को हल कर्षित रेखाभूमि से प्राप्त हुई थीं। बाद में उनका विवाह भगवान राम से हुआ। वाल्मीकि रामायण में जनक जी सीता की उत्पत्ति की कथा इस प्रकार कहते हैं:

अथ मे कृषत: क्षेत्रं लांगलादुत्थिता तत:।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता॥
भूतकादुत्त्थिता सा तु व्यवर्द्धत ममात्मजा।
दीर्यशुक्लेति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा॥
मिथिला प्रदेश के राजा जनक के राज्य में एक बार अकाल पड़ने लगा। वे स्वयं हल जोतने लगे। तभी पृथ्वी को फोड़कर सीता निकल आयी। जब राजा बीज बो रहे थे तब सीता को धूल में पड़ी पाकर उन्होंने उठा लिया। उन्होंने आकाशवाणी सुनी – ‘यह तुम्हारी धर्मकन्या है।‘ तब तक राजा की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने उसे पुत्रीवत पाला और अपनी बड़ी रानी को सौंप दिया।

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

महाशिवरात्रि


महाशिवरात्रि

धर्म – देव् चर्चा से साभार

🚩शिवरात्रि क्यों मनाते हैं..?

🚩शिवरात्रि पर भगवान शिव को कैसे करें प्रसन्न..??

🚩आइये जाने #शिवरात्रि का प्राचीन इतिहास..!!

🚩तीनों लोकों के मालिक #भगवान #शिव का सबसे बड़ा त्यौहार #महाशिवरात्रि है। #महाशिवरात्रि #भारत के साथ कई अन्य देशों में भी धूम-धाम से मनाई जाती है।

🚩‘स्कंद पुराण के ब्रह्मोत्तर खंड में शिवरात्रि के #उपवास तथा #जागरण की महिमा का वर्णन है :
‘‘शिवरात्रि का उपवास अत्यंत दुर्लभ है । उसमें भी जागरण करना तो मनुष्यों के लिए और भी दुर्लभ है । लोक में ब्रह्मा आदि देवता और वशिष्ठ आदि मुनि इस चतुर्दशी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं । इस दिन यदि किसी ने उपवास किया तो उसे सौ यज्ञों से अधिक पुण्य होता है।

🚩शिवलिंग का प्रागट्य!!

🚩पुराणों में आता है कि ब्रह्मा जी जब सृष्टि का निर्माण करने के बाद घूमते हुए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो देखा कि भगवान विष्णु आराम कर रहे हैं। ब्रह्मा जी को यह अपमान लगा ‘संसार का स्वामी कौन?’ इस बात पर दोनों में युद्ध की स्थिति बन गई तो देवताओं ने इसकी जानकारी देवाधिदेव #भगवान #शंकर को दी।

🚩भगवान शिव युद्ध रोकने के लिए दोनों के बीच प्रकाशमान #शिवलिंग के रूप में प्रकट हो गए। दोनों ने उस #शिवलिंग की पूजा की। यह विराट शिवलिंग ब्रह्मा जी की विनती पर बारह ज्योतिलिंगो में विभक्त हुआ। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवलिंग का पृथ्वी पर प्राकट्य दिवस महाशिवरात्रि कहलाया।

🚩बारह ज्योतिर्लिंग (प्रकाश के लिंग) जो पूजा के लिए भगवान शिव के पवित्र धार्मिक स्थल और केंद्र हैं। वे स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है “स्वयं उत्पन्न”।

🚩1. #सोमनाथ यह शिवलिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है।

🚩2. #श्री शैल मल्लिकार्जुन मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है।

🚩3. #महाकाल उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहां शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।

🚩4. #ॐकारेश्वर मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदान देने हेतु यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया।

🚩5. #नागेश्वर गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।

🚩6. #बैजनाथ बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग।

🚩7. #भीमाशंकर महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।

🚩8. #त्र्यंम्बकेश्वर नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।

🚩9. #घुश्मेश्वर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग।

🚩10. #केदारनाथ हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। हरिद्वार से 150 पर मिल दूरी पर स्थित है।

🚩11. #काशी विश्वनाथ बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।

🚩12. #रामेश्वरम्‌ त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग।

🚩दूसरी पुराणों में ये कथा आती है कि सागर मंथन के समय कालकेतु विष निकला था उस समय भगवान शिव ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा करने के लिये स्वयं ही सारा विषपान कर लिया था। विष पीने से #भोलेनाथ का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ के नाम से पुकारे जाने लगे। पुराणों के अनुसार विषपान के दिन को ही महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाने लगा।

🚩कई जगहों पर ऐसा भी वर्णन आता है कि #शिव पार्वती का उस दिन #विवाह हुआ था इसलिए भी इस दिन को #शिवरात्रि के रूप में मनाने की परंपरा रही है।

🚩पुराणों अनुसार ये भी माना जाता है कि #सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन #मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया।

🚩शिवरात्रि वैसे तो प्रत्येक मास की चतुर्दशी (कृष्ण पक्ष) को होती है परन्तु फाल्गुन (कृष्ण पक्ष) की शिवरात्रि (महाशिवरात्रि) नाम से ही प्रसिद्ध है।

🚩महाशिवरात्रि से संबधित पौराणिक कथा!!

🚩एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ‘ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?’

🚩उत्तर में #शिवजी ने पार्वती को ‘शिवरात्रि’ के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- ‘एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था । पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।’

🚩शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। #चतुर्दशी को उसने #शिवरात्रि व्रत की #कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

🚩पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरी। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और #शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

🚩कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी!’ मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

🚩शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

🚩मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

🚩मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी #रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें #विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।’ उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

🚩थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार #शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए’।

🚩परंपरा के अनुसार, #इस रात को ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है जिससे मानव प्रणाली में ऊर्जा की एक शक्तिशाली प्राकृतिक लहर बहती है। इसे भौतिक और आध्यात्मिक रूप से लाभकारी माना जाता है इसलिए इस रात जागरण की सलाह भी दी गयी है ।

🚩शिवरात्री व्रत की महिमा!!

🚩इस व्रत के विषय में यह मान्यता है कि इस व्रत को जो जन करता है, उसे सभी भोगों की प्राप्ति के बाद, मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह #व्रत सभी पापों का क्षय करने वाला है ।

🚩महाशिवरात्री व्रत की विधि!!

🚩इस व्रत में चारों पहर में पूजन किया जाता है. प्रत्येक पहर की पूजा में “ॐ नम: शिवाय” व ” शिवाय नम:” का जप करते रहना चाहिए।#अगर शिव #मंदिर में यह जप करना संभव न हों, तो घर की पूर्व दिशा में, किसी शान्त स्थान पर जाकर इस मंत्र का जप किया जा सकता हैं ।चारों पहर में किये जाने वाले इन मंत्र जपों से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उपवास की अवधि में #रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।

🚩फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात् #महाशिवरात्रि पृथ्वी पर #शिवलिंग के #प्राकट्य का दिवस है और प्राकृतिक नियम के अनुसार जीव-शिव के एकत्व में मदद करनेवाले ग्रह-नक्षत्रों के योग का दिवस है । इस दिन रात्रि-जागरण कर ईश्वर की आराधना-उपासना की जाती है ।
‘शिव से तात्पर्य है ‘कल्याणङ्क अर्थात् यह रात्रि बडी कल्याणकारी रात्रि है ।

🚩महाशिवरात्रि का पर्व अपने अहं को मिटाकर लोकेश्वर से मिलने के लिए है । #आत्मकल्याण के लिए पांडवों ने भी शिवरात्रि #महोत्सव का आयोजन किया था, जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका से हस्तिनापुर आये थे । जिन्हें संसार से सुख-वैभव लेने की इच्छा होती है वे भी शिवजी की आराधना करते हैं और जिन्हें सद्गति प्राप्त करनी होती है अथवा आत्मकल्याण में रुचि है वे भी शिवजी की आराधना करते हैं ।

🚩शिवपूजा में वस्तु का मूल्य नहीं, भाव का मूल्य है । भावो हि विद्यते देवः ।
आराधना का एक तरीका यह है कि उपवास रखकर पुष्प, पंचामृत, बिल्वपत्रादि से चार प्रहर पूजा की जाये । दूसरा तरीका यह है कि #मानसिक पूजा की जाये ।

🚩 हम #मन-ही-मन भावना करें :
ज्योतिर्मात्रस्वरूपाय निर्मलज्ञानचक्षुषे । नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये ।।
‘ज्योतिमात्र (ज्ञानज्योति अर्थात् सच्चिदानंद, साक्षी) जिनका स्वरूप है, निर्मल ज्ञान ही जिनके नेत्र है, जो लिंगस्वरूप ब्रह्म हैं, उन परम शांत कल्याणमय भगवान शिव को नमस्कार है ।

🚩‘ईशान संहिता में भगवान शिव पार्वतीजी से कहते हैं :
फाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथिः स्याच्चतुर्दशी । तस्या या तामसी रात्रि सोच्यते शिवरात्रिका ।।
तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति मां ध्रुवम् । न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया ।
तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः ।।

🚩‘फाल्गुन के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को आश्रय करके जिस अंधकारमयी रात्रि का उदय होता है, उसीको ‘शिवरात्रि’ कहते हैं । उस दिन जो #उपवास करता है वह निश्चय ही मुझे संतुष्ट करता है । उस दिन उपवास करने पर मैं जैसा प्रसन्न होता हूँ, वैसा स्नान कराने से तथा वस्त्र, धूप और पुष्प के अर्पण से भी नहीं होता ।

🚩शिवरात्रि व्रत सभी पापों का नाश करनेवाला है और यह योग एवं मोक्ष की प्रधानतावाला व्रत है ।

🚩महाशिवरात्रि बड़ी कल्याणकारी रात्रि है । #इस रात्रि में किये जानेवाले जप, तप और व्रत हजारों गुणा पुण्य प्रदान करते हैं ।

🚩#स्कंद पुराण में आता है : ‘शिवरात्रि व्रत परात्पर (सर्वश्रेष्ठ) है, इससे बढकर श्रेष्ठ कुछ नहीं है । जो जीव इस रात्रि में त्रिभुवनपति भगवान महादेव की भक्तिपूर्वक पूजा नहीं करता, वह अवश्य सहस्रों वर्षों तक जन्म-चक्रों में घूमता रहता है ।

🚩यदि आज ‘बं बीजमंत्र का सवा लाख जप किया जाय तो जोडों के दर्द एवं वायु-सम्बंधी रोगों में विशेष लाभ होता है ।

🚩#व्रत में #श्रद्धा, उपवास एवं प्रार्थना की प्रधानता होती है । व्रत नास्तिक को आस्तिक, भोगी को योगी, स्वार्थी को परमार्थी, कृपण को उदार, अधीर को धीर, असहिष्णु को सहिष्णु बनाता है । जिनके जीवन में व्रत और नियमनिष्ठा है, उनके जीवन में निखार आ जाता है ।