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सज्जाद जहीर


सारी गंदगी की जड़-कांग्रेस के बसाये ये गद्दार

एक था कम्युनिस्ट………नाम था कामरेड सज्जाद जहीर ……लखनऊ में पैदा हुए .

ये मियाँ साहब ,पहले तो progressive writers association यानि अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के रहनुमा बनकर उभरे ,और अपनी किताब अंगारे से इन्होने अपने लेखक होने का दावा पेश किया ………… बाद मे ये जनाब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वेसर्वा बने , मगर बाबू साहब की रूह मे तो इस्लाम बसता था , इसीलिए 1947 मे नये इस्लामी देश बने ,पाकिस्तान मे जाकर बस गये ,इनकी बेगम रजिया सज्जाद जहीर भी उर्दू की लेखिका थी …….
सज्जाद जहीर , 1948 मे कलकत्ता के कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन मे भाग लेने कलकत्ता पहुँचे ,और वहाँ कुछ मुसलमानो ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से अलग होकर CPP यानि कम्युनिस्ट पार्टी आफ पाकिस्तान का गठन कर लिया , जो बांग्लादेश मे तो फली – फूली ……

मगर पाकिस्तान मे , सज्जाद जहीर , मशहूर शायर लेखक फैज अहमद फैज , शायर अहमद फराज , रजिया सज्जाद जहीर ,और कुछ पाकिस्तानी जनरलो ने मिलकर रावलपिंडी षडयंत्र केस मे पाकिस्तान मे सैन्य तख्ता पलट का प्रयास किया और पकडे जाने पर जेल मे डाल दिये गये । सज्जाद जहीर, अहमद फराज और फैज अहमद फैज को लंबी सजाऐ सुनाई गई …….
जेल से रिहा होने के बाद सज्जाद जहीर भारत आया और खुद को शरणार्थी घोषित करके कांग्रेस सरकार से भारतीय नागरिता मांगी ..और कांग्रेस सरकार ने सज्जाद को भारतीय नागरिकता दे दिया … वो भी फटाफट ..

अब आगे की कथा सुनिये , इन मियाँ साहब, सज्जाद जहीर और रजिया जहीर की चार बेटियाँ थी .

1- नजमा जहीर बाकर , पाकिस्तानी सज्जाद जहीर की सबसे बडी बेटी , जो कि नेहरू के मदरसे ,JNU मे biochemistry की प्रोफेसर है ……..

2- दूसरी बेटी नसीम भाटिया है …………

3- सज्जाद जहीर की तीसरी बेटी है ,नादिरा बब्बर जिसने फिल्म एक्टर और कांग्रेस सांसद राज बब्बर से शादी की है, इनके दो बच्चे है , आर्य बब्बर और जूही बब्बर ……………..

4- सज्जाद जहीर की चौथी और सबसे छोटी बेटी का नाम है नूर जहीर , ये मोहतरमा भी लेखिका है , और JNU से जुडी है ..
नूर जहीर ने शादी नही की और जीवन भर अविवाहित रहने के अपने फैसले पर आज भी कायम है । चूँकि नूर जहीर ने शादी ही नही की , तो बच्चो का तो सवाल ही पैदा नही होता ….. मगर रूकिये , यहाँ आपको निराश होना पडेगा . अविवाहित होने के बावजूद , नूर जहीर के चार बच्चे है , वो भी चार अलग – अलग पुरूषो से ………………..
इन्ही नूर जहीर और ए. दासगुप्ता की दूसरी संतान है पंखुडी जहीर ,अरे नही चौंकिये मत ………
ये वही पंखुडी जहीर है ,जिसने कुछ ही वर्षो पहले दिल्ली मे संघऑफिस केशव कुञ्ज के सामने खुलेआम चूमा- चाटी के लिए , किस आफ लव ( kiss of love ) के नाम से इवेंट आयोजित किया था । जी हाँ , ये वही है जो कन्हैयाकुमार वाले मामले मे सबसे ज्यादा उछल कूद मचा रही थी । इसे JNU मे कन्हैयाकुमार की सबसे विश्वश्त सहयोगी माना जाता है । खुले आम सिगरेट , शराब , और अनेको व्यसनो की शौकीन ,इन जैसी लडकियाँ जब महिला अधिकारो के नाम पर बवंडर मचाती है। तो सच मे पूछ लेने को दिल करता है ,कि तुम्हारा खानदान क्या है ??????????

और क्या है तुम्हारे संस्कार ???????

बिन ब्याही माँ की ,दो अलग अलग पुरूषो से उत्पन्न चार संतानो मे से एक पंखुडी जहीर जैसी औरते , खुद औरतो के नाम पे जिल्लत का दाग है ………..

शायद मेरी ये पोस्ट पाकिस्तान , इस्लामियत , कम्युनिस्टो का सडन भरा अतीत , इनकी मानसिकता , इनका खानदान , और इनके संस्कार बयां करने को काफी है ……….

इन्ही जैसे लोगो ने JNU की इज्जत मे चार चाँद लगा रखे है ………………..

पाकिस्तान मे कम्युनिस्ट पार्टी आज तक 01% वोट भी नही जुटा पाये , कुल 176 वोट मिलते है इन्हे ………

और पाकिस्तानी सज्जाद जहीर की औलादे , कम्युनिस्टो का चोला पहनकर भारत की बर्बादी के नारे लगा रहे है …..

समझ मे आया ???? JNU के कामरेडो का पाकिस्तान प्रेम और कश्मीर के मुद्दे पर नौटंकी करने का असली उद्देश्य ………………….

क्या कारण है कि ये पंखुडी दासगुप्ता ना लिखकर खुद को पंखुडी जहीर लिखती है ……..?????

और हाँ , इसकी सगी मौसी के लडके , नादिरा बब्बर और राज बब्बर की संतान ,फिल्म एक्टर आर्य बब्बर का घर का नाम सज्जाद है ………..

।। जय हिन्द ।।

वंदेमातरम
साभार: गोपाल राजपूत

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भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?


भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?
निवेदन एक बार जरूर पढे
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बॉलीवुड ने भारत को इतना सब कुछ दिया है, तभी तो आज देश यहाँ है …

1. बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके।
2. विवाह किये बिना लड़का लड़की का शारीरिक सम्बन्ध बनाना।
3. विवाह के दौरान लड़की को मंडप से भगाना
4. चोरी डकैती करने के तरीके।
5. भारतीय संस्कारो का उपहास उडाना।
6. लड़कियो को छोटे कपडे पहने की सीख देना….
जिसे फैशन का नाम देना।
7. दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये।
8. गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना।
9. भगवान का मजाक बनाना और अपमानित करना।
10. पूजा पाठ यज्ञ करना पाखण्ड है व नमाज पढ़ना ईश्वर की सच्ची पूजा है।
11. भारतीयों को अंग्रेज बनाना।
12. भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बताना और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ बताना।
13. माँ बाप को वृध्दाश्रम छोड़ के आना।
14. गाय पालन को मज़ाक बनाना और कुत्तों को उनसे श्रेष्ठ बताना और पालना सिखाना।
15. रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गर कोल्ड ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है।
16. पंडितों को जोकर के रूप में दिखाना, चोटी रखना या यज्ञोपवीत पहनना मूर्खता है मगर बालो के अजीबो गरीब स्टाइल (गजनी) रखना व क्रॉस पहनना श्रेष्ठ है उससे आप सभ्य लगते है।
17. शुद्ध हिन्दी या संस्कृत बोलना हास्य वाली बात है और उर्दू या अंग्रेजी बोलना सभ्य पढ़ा-लिखा और अमीरी वाली बात…
हमारे देश की युवा पीढ़ी बॉलीवुड को और उसके अभिनेता और अभिनेत्रियों का अपना आदर्श मानती है…..
अगर यही बॉलीवुड देश की संस्कृति सभ्यता दिखाए ..
तो सत्य मानिये हमारी युवा पीढ़ी अपने रास्ते से कभी नही भटकेगी…
समझिये ..जानिए और आगे बढिए…

ये संदेश उन हिन्दू ,लौंडो के लिए है
जो फिल्म देखने के बाद
गले में क्रोस मुल्ले जैसी छोटी सी दाड़ी रख कर
खुद को मॉडर्न समझते हैं
हिन्दू नौजवानौं के रगो में धीमा जहर भरा जा रहा है
फिल्म जेहाद
*****
सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा. इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.

फिल्म “शोले” में धर्मेन्द्र भगवान् शिव की आड़ लेकर “हेमामालिनी” को प्रेमजाल में फंसाना चाहता है जो यह साबित करता है कि – मंदिर में लोग लडकियां छेड़ने जाते है. इसी फिल्म में ए. के. हंगल इतना पक्का नमाजी है कि – बेटे की लाश को छोड़कर, यह कहकर नमाज पढने चल देता है.कि- उसे और बेटे क्यों नहीं दिए कुर्बान होने के लिए.

“दीवार” का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है. “जंजीर” में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.

फिल्म ‘शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है. फिल्म “क्रान्ति” में माता का भजन करने वाला राजा (प्रदीप कुमार) गद्दार है और करीमखान (शत्रुघ्न सिन्हा) एक महान देशभक्त, जो देश के लिए अपनी जान दे देता है.

अमर-अकबर-अन्थोनी में तीनो बच्चो का बाप किशनलाल एक खूनी स्मग्लर है लेकिन उनके बच्चों अकबर और अन्थोनी को पालने वाले मुस्लिम और ईसाई महान इंसान है. साईं बाबा का महिमामंडन भी इसी फिल्म के बाद शुरू हुआ था. फिल्म “हाथ की सफाई” में चोरी – ठगी को महिमामंडित करने वाली प्रार्थना भी आपको याद ही होगी.

कुल मिलाकर आपको इनकी फिल्म में हिन्दू नास्तिक मिलेगा या धर्म का उपहास करता हुआ कोई कारनामा दिखेगा और इसके साथ साथ आपको शेरखान पठान, DSP डिसूजा, अब्दुल, पादरी, माइकल, डेबिड, आदि जैसे आदर्श चरित्र देखने को मिलेंगे. हो सकता है आपने पहले कभी इस पर ध्यान न दिया हो लेकिन अबकी बार ज़रा ध्यान से देखना.

केवल सलीम / जावेद की ही नहीं बल्कि कादर खान, कैफ़ी आजमी, महेश भट्ट, आदि की फिल्मो का भी यही हाल है. फिल्म इंडस्ट्री पर दाउद जैसों का नियंत्रण रहा है. इसमें अक्सर अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है और पंडित को धूर्त, ठाकुर को जालिम, बनिए को सूदखोर, सरदार को मूर्ख कामेडियन, आदि ही दिखाया जाता है.

“फरहान अख्तर” की फिल्म “भाग मिल्खा भाग” में “हवन करेंगे” का आखिर क्या मतलब था ? pk में भगवान् का रोंग नंबर बताने वाले आमिर खान क्या कभी अल्ला के रोंग नंबर 786 पर भी कोई फिल्म बनायेंगे ? मेरा मानना है कि – यह सब महज इत्तेफाक नहीं है बल्कि सोची समझी साजिश है एक चाल है ।

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एथीस्ट


कुछ दिन पहले जावेद अख्तर बड़े फकर से कह रहे थे कि वे एथीस्ट हैं, एथीस्ट मने नास्तिक……. बतला रहे थे कि जवान होते होते वे एथीस्ट हो गए थे, वे किसी अल्लाह को नहीं मानते, कभी रोज़ा नहीं रखा, मस्जिद नहीं गए नमाज़ नहीं पढ़े…… टोटल एथीस्ट….,,., लेकिन जब भी मैं इनकी दीवार फ़िल्म देखता हूँ तो चक्कर खा जाता हूँ, शक होता है कि ये एथीस्ट झूठ तो नहीं बोल रहा कहीं……. फ़िल्म देखिये, फ़िल्म में क्या दिखाया है कि वर्मा जी का लौंडा विजय (अमिताभ बच्चन) बचपन से ही भगवान से रूठ जाता है, मंदिर नहीं जाता, अपनी माँ सुमित्रा (निरुपमा रॉय) के कहने पर भी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता…… जोर जबरदस्ती करने पर मंदिर का पुजारी टोक देता है, नहीं बहन भगवान् की पूजा जोर जबरदस्ती से नहीं होती श्रद्धा से होती जब इसके दिल में श्रद्धा जागेगी तब ये खुद ही मंदिर आ जाएगा……. वाह कितनी प्यारी बात कहीं पुजारी ने, खैर अच्छा था कि जगह मंदिर थी और सामने पुजारी था, कहीं मस्जिद होती और सामने मौलवी साहब होते तो पक्का फतवा जारी हो जाता…… ला हॉल विला कूवत इल्ला बिल्ला अल्लाह की तौहीन की है इस लौंडे ने, दीन को मानने से मना किया है इसने, ये काफ़िर हो चुका है, काफिरों के लिए मुताबिक ए दीन बस एक ही सजा है….. मुरतीद मुरतीद….. मने सर कलम कर फुटबॉल खेली जाए…….. हुक्म की तालीम हो…… हेहेहे….. खैर छोड़िये, पिछली बात पे वापस आते हैं, तो मामला ये है कि पूरी फ़िल्म में विजय भगवान से छत्तीस का आंकड़ा बना कर चलता है, जताया कुछ यूँ गया है कि फ़िल्म का नायक भगवान् को नहीं मानता और मंदिर नहीं जाता……… मने एथीस्ट हो चुका है पर जब डॉकयार्ड पर काम करने वाले रहीम चच्चा विजय को उसकी बांह पर बंधे 786 नंबर के लॉकेट के बारे में इल्म देते हैं कि बेटा 786 का मतलब होता है बिस्मिल्लाह, इसे हम लोगों में बड़ा मुबारक समझा जाता है……… सामन्त के आदमी की चलाई गोली जब विजय को लगती है, और बिल्ले की वजह से विजय बच जाता है तब विजय को इल्हाम होता है कि 786 नंबर तो बड़ा पावरफुल है तब वो बिल्ले को बार बार चूमता है और हमेशा अपने पास सीने से लगा कर रखता है और चूमता रहता है मने एक एथीस्ट को बिस्मिल्लाह में तो विश्वास है लेकिन भगवान में नहीं…………. सियापे की हद तो देखिये जब विजय की माँ बीमार होती है, जिंदगी और मौत से जूझ रही होती है तब विजय को मंदिर की याद आती है अल्लाह मियाँ फ्रेम से ग़ायब हो जाते हैं…… मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विजय भगवान् के सामने खड़ा है और कहता है- मैं आज तक तेरी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा…… अब कोई पूछे कि bc अब क्यों चढ़ा बे…….. मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा……. तो अब क्यों मांग रहा है भो%* के………… बताओ भला अब ये क्या बात हुयी यार, वैसे एथीस्ट हैं, मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगे पर बिस्मिल्लाह (786) को चूमेंगे दिन में दस बार, छाती से चिपका कर रखेंगे और कहीं कुछ गलत हो जाए तो भगवान् की ऐसी-तैसी करेंगे, शुरू हो जाएंगे भगवन को हूल-पट्टी देने……..

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जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि वे शुरू से एथीस्ट रहे हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी लिखते समय इस्लाम की ओर झुक जाते हैं, उनका नायक एथीस्ट है, भगवान को नहीं मानता लेकिन अल्लाह और 786 को पूरी शिद्दत से मानता है, ये कैसा एथिस्टपना हुआ…….. ये तो बिलकुल वैसा ही हुआ जैसे उमर खालिद की बहन कहती है कि उसका भाई किसी इस्लाम को नहीं मानता लेकिन नारे वो JNU में इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के लगवाता है और पूरी शिद्दत से अपनी कौम के प्रति पूरी निष्ठा निभाते हुए हर मुस्लिम की तरह दूसरे मुस्लिम (अफज़ल गुरु) के प्रति पूरी वफादारी रखता है………… पिताजी जब ज़िंदा थे तो वे बताते थे कि जब ये फ़िल्म दीवार आई थी तब बहुत से लौंडे खुद को अमिताभ बच्चन समझकर मंदिर की सीढ़ियों पर मुंह फुलाये बैठे देखे जाते थे, मेले ठेलों से 786 के लॉकेट और बिल्ले खरीदकर अपनी चौड़े कॉलर की नीली शर्ट की ऊपरी जेब जो दिल के पास होती है उसमें खूब रखते देखे जाते थे……… खैर मैं फ़िल्में बहुत देखता हूँ और फिल्मों में अक्सर देखता है कि फ़िल्म का हिन्दू नायक भगवान में विश्वास नहीं रखता, मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता, प्रसाद नहीं खाता वगैरह वगैरह लेकिन आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई नायक को अल्लाह या गॉड की खिलाफत करते नहीं देखा……… मस्जिद या गिरजे की सीढ़ियों पर बैठे नहीं देखा…… अल्लाह या गॉड से मुंह फुलाये नहीं बल्कि अपने मजहब के प्रति पूरी निष्ठा रखते जरूर देखा है……. दिखाया जाता है कि फ़िल्म के मुस्लिम या ईसाई नायक का अपने रिलिजन में पूरा पूरा फेथ रखता है बस असली गड़बड़ तो हीरो को भगवान् से है…….. ये फिल्मों का ही असर है कि जब मैंने कई सुतियों को खुद को किसी फ़िल्मी नायक की तरह आज भी भगवान से मुंह फुलाये मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे देखा है……. एथीस्ट होना तो जैसे आजकल फैशन हो गया है वैसे ही जैसे JNU में हो गया है….. मैं फ़िल्मी एथीस्ट और JNU छाप एथीस्ट में बहुत समानता पाता हूँ…….. फ़िल्मी एथीस्ट की लड़ाई सिर्फ भगवान से है बाकी अल्लाह और गॉड से उसे कोई दिक्कत नहीं, ठीक ऐसे ही JNU छाप एथीस्ट भी भगवान् के पीछे लठ्ठ लिए फिरते हैं……. देवी दुर्गा एक हिन्दू मिथक है लेकिन महिषासुर वास्तविकता है, माँ दुर्गा की पूजा करना अन्धविश्वास है लेकिन महिषासुर को पूजना आधुनिकता है……… राम राम बोलना कट्टरता है लेकिन इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह बोलना धार्मिकता है, दिवाली होली मनाना बुजुरुआ बोडमता का प्रतीक है लेकिन ईद और क्रिसमस मनाना साम्यवादिता का लोगो है, JNU कम्युनिस्ट कहते हैं कि वे एथीस्ट हैं धर्म उनके लिए अफीम है लेकिन उनका एथीसिस्म इस्लाम और ईसाईयत को रसगुल्ला समझता है और हिंदुत्व को अफीम, गांजा, चरस, कोकीन, हेरोइन……… सारी हूल-पट्टी भगवान् के लिए रख जोड़ी हैं बाकी अल्लाह या गॉड के लिए चूमा चाटी का इल्हाम है, बड़ा अजीब एथीसिस्म है यार इनका……..

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मैंने दुनिया में कई एथीस्ट ऐसे देखे हैं जिनका एथीस्टपना सभी मजहब के लिए बराबर होता है, वे जिनती ईमानदारी से दूसरे धर्म की कमियां निकालते हैं उससे अधिक ईमानदारी दिखाते हुए वे अपने धर्म की बखिया उधेड़ देते हैं लेकिन JNU में एथीस्ट होने के मायने थोड़ा अलग है बिकुल दीवार फ़िल्म के नायक के जैसे……….. भगवान् से रूठकर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाइए लेकिन जैसे ही 786 का बिल्ला मिले तो उसको चुमिये, माथे से लगाइये……….

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दरअसल JNU ही नहीं पूरे देश में एथीस्ट होने का मतलब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दुज्म का आलोचक होना है गोया हिन्दुज्म न हुआ एथीस्टों की प्रेक्टिस के लिए पंचिंग बेग हो गया……….

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किरण राव


सुनने में आ रहा है कि..
आमिर खान अपने पांव की पुरानी “जूती” किरण राव को उतारकर! !…”नई जूती” फातिमा शेख को पहनने जा रहा है…!!!…
इससे पहले भी! !..रीमा नाम की पुरानी ” जूती” को हटाकर!..”नई जूती” किरण राव को पहना था!!…

सैफ अली ने भी अमृता सिंह को उताकर करीना कपूर को पहन रखा है !!..कुछ सालों बाद वो भी नई जूती पसन्द आने पर करीना को उतार फेकेगा !!!….

दोष सिर्फ इन जैसे लोगों का ही नहीं !..बल्कि हमारे समाज में ही ऐसी बेगेरत औरतें है!!..जिन्हें इज्जतदार बहू बनने की बजाय “पांव की जूती” बनना पसन्द है!!!

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किरण राव


ये खबर मशहूर अखबार इंडियन एक्सप्रेस में छपा है …शायद आमिर खान ने सना फातिमा शेख से निकाह कर लिया है ..वैसे इस्लाम इसकी इजाजत देता है आमिर खान चाहे तो पांच निकाह और कर सकते हैं

मुझे याद आता है 1987 में मैंने दूरदर्शन पर आमिर खान और उनकी पहली पत्नी रीना दत्ता का इंटरव्यू देखा था आमिर खान ने अपनी पत्नी की आंखों में देखते हुए कहा था आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी पत्नी रीना दत्ता की वजह से हूं उन्होंने और भी बहुत सी बातें बताई थी कि कैसे वह 8 घंटे तक खिड़की पर खड़े खड़े रहते थे सिर्फ इसलिए कि उन्हें एक झलक रीना दत्ता की मिल जाए अंत में उनके सामने यह परेशानी आई कि रीना दत्ता के मां-बाप एक मुस्लिम से शादी नहीं करना चाहते थे रीना दत्ता के पिताजी ने मुझसे (आमिर खान) से कहा कि तुम मुस्लिम हो तुम्हारे घर में कभी भी महिलाओं को तलाक दे दिया जाता है फिर मैंने यानी आमिर खान ने रीना दत्ता के पिताजी से कहा कि मैं कुरान-ए-पाक की कसम खाकर कहता हूं कि मैं कभी भी रीना दत्ता का साथ नहीं छोडूंगा और फिर रीना दत्ता के पिता ने हमारी शादी के लिए हामी भर ली

मित्रों आमिर खान और रीना दत्ता का इंटरव्यू का टेप आज भी दूरदर्शनन के आर्काइव में है

फिर वक्त के साथ रीना दत्ता का हुस्न ढलने लगा तो आमिर खान को अपनी सह निर्देशक किरण राव से प्यार हो गया फिर 6 सालों तक किरण राव को भोगने के बाद जब किरन राव का भी हुस्न ढलने लगा तो आमिर खान को अपनी फिल्म की अभिनेत्री सना फातिमा शेख से प्यार हो गया
यही इस्लाम का सच्चा दर्शन है
साभार जीतेंद्र प्रताप सिंह जी..
….
वैसे इन सेकुलर हिन्दू कुतियो के साथ ऐसा ही होना चाहिए ।

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तैमुर


कहते है जब नादिर शाह ने दिल्ली पे कब्ज़ा किया था तो जामा मस्जिद के ऊपर चढ़कर एक तलवार छत पर गाड़ी थी और अपने जिहादियों को हुक्म दिया की जब तक ये तलवार ना उठे, क़त्ल-ए-आम ना रुके … और रुका भी नहीं|

अहमद शाह अब्दाली जब लाहौर से निकला तो ये हुक्म दिया की वापिस आऊं तो शहर के चारो तरफ छकड़ों में नरमुंड का सैलाब हो …

और ये हुआ भी|

इनको सिर्फ लुटेरा बताके इतिहास ख़त्म कर देने वाले वामी दोगले, औरंगजेब को माननीय बताने लगते है तो हैरानी क्या ?

ये तो इनके नायक है |

दिल्ली में एक लाख लोगो को काटने वाला तैमुर हो या राजपूतो के खून का प्यासा अल्लौद्दीन खिलजी … ये सब इनके नायक है|

तारिक-बिन-जियाद से लेकर ओसामा बिन लादेन तक सब माननीय है|

किसको फर्क पड़ता है के गुरु तेग बहादुर के साथ क्या हुआ या संभाजी के साथ क्या हुआ ?

सहिष्णुता सिखाता है ना हिंदुत्व तो ये सब स्वीकार करो!! अपने कातिलो को अपना भगवान स्वीकार करो और तब तक करो जब तक ख़त्म ना हो जाओ!!

तुम्हारे पास गंधार नहीं रहा, लाहौर नहीं रहा, सिंध, ननकाना साहिब, हिंगलाज भी नहीं, और तुम्हारा वहम हट जाए तो जानोगे की कश्मीर, बंगाल और केरल भी छिन चुके है|

मगर जाने दो, कौन बेवकूफ सोचे!
टी.वी खोलो रे……… तैमुर की अम्मी करीना की फिल्म आ रही है !

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बाहुबली


Forwarded:
A very interesting article: Must Read 
बाहुबली ने बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए ! क्या इसको लेकर कोई शोर हुआ ? नहीं !

किसी फिल्म के सौ करोड़ पार करने मात्र से उछलकूद मचाने वाले एक हजार करोड़ का आकड़ा पहली बार पार करने पर भी चुप है ! आश्चर्य होता है, घोर आश्चर्य ! और तो और बाहुबली की ऐतिहासिक सफलता के बीच में अचानक दंगल के कलेक्शन की चर्चा की गई !

इसमें मजेदार बात यह थी की दंगल के करोड़ो का कलेक्शन चीन में दिखाया गया ! मानो चीन के खिलाड़ी आमिर खान से प्रेरित होकर अगले ओलिम्पिक में अपना पहला पदक जीतेंगे ! सब कुछ कितना हास्यासपद है !

मगर भारत की जनता इन खबरों को पढ़ने के लिए मजबूर है ! लेकिन इन बातों के पीछे के कारणों को नजरअंदाज कर देना ही हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है ! मीडिया में एक मिनट का स्लॉट या एक कॉलम की खबर के कितने पैसे लगते हैं, इसका हमें शायद अंदाज नहीं मगर प्रेस्टीट्यूट के नाम से बदनाम खबरवाली ने ये खबर मुफ्त में चलाई होगी, ऐसा हो नहीं सकता , उलटा बाहुबली की खबर ना बनने देने के भी उसने अलग से पैसे लिए होंगे ! और अगर पैसे नहीं लिए होंगे तो नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया होगा !

कोई पूछ सकता है की आखिरकार ये सब क्यों और किसलिए ? क्योंकि भारत में मीडिया को पढ़ने-सुनने वालो में एक वर्ग सदा ही ऐसा होता है जो हर खबर को सच मानता है ! ये खबरे आप के मन मस्तिष्क पर गहरे तक प्रभाव डालती है और धीरे धीर आपको नियंत्रित करने लगती हैं ! ऐसी खबर निरंतर दिखाते रहने से खबर प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है !

इस संख्या को बढ़ाना ही उद्देश्य है, उन लोगों का जो भारत के खिलाफ एक परसेप्शन बनाने का खेल बड़ी चतुराई से खेल रहे हैं !

यह परसेप्शन की लड़ाई, दशकों से लड़ी जा रही है !

इसका सबसे खतरकनाक पहलू यह है की हम-आम लोगों को इसका पता ही नहीं की हम पर निरंतर आक्रमण हो रहा है, जिसमे हर पल हमारा बहुत कुछ तबाह किया जा रहा है !

जेएनयू से लेकर जाधवपुर यूनिवर्सिटी में भारत के टुकड़े के नारे यूं ही नहीं लगते ! यह उसी षड्यंत्र का अंतिम लक्ष्य है जो इन गिरोह के सदस्यों के मुख से चीख चीख कर बोलता है !

आज भारत विरोधी षड्यंत्र का एक मुख्य केंद्र चीन बन चुका है ! जो विश्वशक्ति बनने के अपने सपने पर तेजी से काम कर रहा है ! पाकिस्तान को तो वो अपने कब्जे में पूरी तरह ले चुका है ! एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल को इस ड्रेगन ने निगल लिया और हम देखते रहे ! मगर यह ना सोचे की हम बचे हुए हैं ! हमारे उपभोग का हर दूसरा सामान अब चीन से आ रहा है ! हमारी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण के साथ साथ अब वो भारत के परसेप्शन की लड़ाई में भी अपनी सक्रियता बड़ा रहा है ! जिसमे उसका साथ दे रहा है हमारा स्थाई पड़ोसी और उसका ए बी सी डी गैंग !

इनके कई स्लीपर सेल हमारे देश में अनेक मुखौटा लगा कर उनके काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं ! ये राजनीति से लेकर धर्म कला साहित्य और बॉलीवुड में भी प्लांट किये गए हैं !और ये सब मिल कर देश के भीतर- बाहर से एक खतरनाक खेल खेल रहे हैं !

ये दंगल की चीन में अचानक ५०० करोड़ की कमाई उसी खेल का एक छोटा सा हिस्सा है ! क्योंकि परसेप्शन की लड़ाई में वे नहीं चाहते की १००० करोड़ का आकड़ा पार करने वाली एकमात्र भारतीय फिल्म वो हो जिसमे भारत के गौरवशाली इतिहास का प्रस्तुतिकरण हो !

इसलिए दंगल को भी १००० का आकड़ा पार करवाया गया और उसकी चर्चा अधिक की गयी ! उसमे भी दंगल से अधिक आमिर का परसेप्शन बनाये रखा गया जो उनका ब्रांड एम्बेसडर बन कर आगे भी उनके काम आता रहेगा !

बाहुबली में हिन्दुस्तान की अनेक सांस्कृतिक व परम्पराओं का भव्य प्रदर्शन किया गया है , जिसे हमारा दुश्मन कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता ! वो कभी नहीं चाहेगा की देश की जनता की निगाह में कोई ऐसी फिल्म बसी रहे जो उन के आत्मविश्वास और जोश को बढ़ाये और भारत की सभ्यता की जड़े मजबूत हो !

हमारे नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर बॉलीवुड ने कैसे धीरे से प्रहार कर नुकसान किया है, यह हम कम ही समझ पाते हैं ! तीन बौने खानों का कद लार्जर देन लाइफ बना देना कोई उनकी मात्र योग्यता के कारण नहीं हुआ , ना ही यह कोई महज संयोग है !

फिल्म पीके के द्वारा हिन्दुओं की कुरीतियों की बात करने वाले तथाकथित मिस्टर परफेक्शनिस्ट अगर ट्रिपल तलाक और हलाला पर चुप है , फिर भी आप इस दोगले कागजी समाज सुधारक को समझ नहीं पाते हैं तो आप मूर्ख हैं !और मूर्ख की चिंता करना उससे बड़ी मूर्खता है !

अब तक पीके ही सबसे सफल फिल्म के शिखर पर विराजमान कर रखी गई थी अर्थात शिव को दूध पिलाने वाले की हँसी उड़ाने वाला आप के मन मष्तिष्क पर राज कर रहा था, अब उसकी जगह कोई शिव की पूजा करने वाला बाहुबली ले ले, यह उन षड्यंत्रकारी लोगों को कैसे मंजूर हो सकता है !

उनका दशकों से जमाया गया सारा खेल ही मिनटों में खत्म हो जाए वो यह कैसे बर्दास्त कर सकते हैं ! ऐसे में जब आज अब पीके को तो फिर से पिक्चर हॉल में चलाया नहीं जा सकता तो उन्होंने दंगल को चला दिया ,वो भी चीन में, क्योंकि भारत के सिनेमा घरों से दंगल को उतरे हुए भी महीनो हो गए थे ! और आननफानन में चीन में उसके ५०० करोड़ के कलेक्शन की चर्चा करा दी गई ! जिसका परिणाम ये हुआ की अब बाहुबली अकेले १००० करोड़ की फिल्म नहीं रही !

अब क्या आप चीन के बॉक्स ऑफिस में कलेक्शन गिनने जाएंगे ? नहीं ! जिस देश से कोई सामान्य खबर भी बाहर नहीं आ पाती वहाँ हमारे एक फिल्म के कलेक्शन की खबर तुरंत आ जाती है , क्या मजेदार खेल है, वाह ! वो तो इस गिरोह का बस नहीं चल रहा वरना आज ये दंगल को बाहुबली से अधिल कलेक्शन दिखा कर नंबर एक कर दें ! दो चार हजार रूपये का कलेक्शन दिखाना इनके लिए बाएं हाथ का मैल है ! अब इनकी भी मजबूरी है क्योंकि जमीनी हकीकत कुछ और बयान कर रही है और बाहुबली भारत में ही नहीं विश्व के अनेक देशों में तीसरे सप्ताह भी फुल चल रही है !

ऐसे में कोई पूछ सकता है की एक आम आदमी क्या करे ? और क्यों ?

अब इस क्यों का जवाब तो संक्षिप्त में सिर्फ इतना कहा जा सकता है की अरे भाई आप की लड़ाई कोई और लड़ेगा क्या ? वैसे भी आपको अगर अपनी सांस्कृतिक विरासत और पारम्परिक स्वतंत्रता से प्यार है, अपनी मिट्टी की सुगंध में ही जीना-मरना चाहते हो तो तो आप को उसके लिए सतत संघर्ष करना होगा ! वरना आप जल्द ही एक कट्टर विचारधारा, क्रूर शासन व्यवस्था या कबीली धर्म के आतंक में जीने के लिए तैयार रहें !

अब सवाल उठता है की इस परसेप्शन की लड़ाई आखिर एक आम आदमी कैसे लड़े ? इस युद्ध में लड़ने के लिए सीमा पर जाने की जरूरत नहीं ,बन्दूक चलाने बम फोड़ने या सीने पर गोली खाने की भी जरूरत नहीं, बस दुश्मन को उसी के खेल में उसी के अस्त्र शस्त्र से मारना होगा !

तो क्यों ना जिन्होंने बाहुबली अब तक नहीं देखी है वो सपरिवार देखें , और जिन्होंने पहले ही देख रखी है वो दूसरी तीसरी चौथी बार देखें ! और इस परसेप्शन के युद्ध में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं !

बाहुबली को उस ऊंचाई तक पहुंचा दें की कोई रईस या सुलतान चाहे जितना पीके भी दंगल करे उस तक ना पहुंच पाए ! वैसे भी लगता है की बाहुबली अगर २००० करोड़ का आकड़ा पार कर जाये तो कोई आश्चर्य नहीं होगा !

हमें ऐसा होने देने में मदद करनी चाहिए ,क्योंकि अभी कोई और नहीं है जो वहां तक जल्द पहुंच सके ! यह हमारे परसेप्शन की लड़ाई की पहली जीत होगी, जिसकी गूँज कई दिनों तक बॉलीवुड के कुछ रहस्यमयी परदों को चीर कर परदे के पीछे बैठे शैतान के कानों में बजती रहेगी !

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जस्टिन बीबर – Thakur Ram Kumar Rana


ये था वो चमगादड़ जिसको देखने के लिए ₹75000 का टिकट था….!

जस्टिन बीबर की आधी उतरी पेण्ट देखने के लिए भारतियों ने खर्च डाले 250 करोड़ ? इनमें से अधिकतर बॉलीवुड, उच्च वर्ग के सेकुलर प्रगतिशील बुद्धिजीवी | और यही लोग हिन्दू धर्म पे कटाक्ष करते बोलते हैं कि शिवलिंग में आधा किलो दूध चढ़ाना पैसे की बर्बादी है ।

जस्टिन बीबर को एक टिकट के 75000 में खरीदकर हम उसे एक रात में 250 करोड़ लेकर भेज देते हैं | वहीं जब बाढ़ राहत कोष, सैनिक सहायता कोष या विधवा राहत फंड के नाम पर सौ रूपए देने में साँस फूल जाती है, फेफड़ों में पानी भर जाता है हमारे |

90 मिनट होठ हिलाकर 250 करोड़ ले गया, ये वही देश है जहाँ बीस रूपए किलो के प्याज अगर 30 के हो जाए तो अच्छे अच्छो के गणित गड़बड़ा जाते हैं |

ध्यान से सोचिए प्राथमिकता किसे देनी चाहिए ? मेरे इस संदेश को आपसे साधुवाद की अपेक्षा नहीं है ! फिर भी गौर करना.

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दाऊद के इशारे पर बॉलीवुड में घुसाये जा रहे पाकिस्तानी, निकाले जा रहे हिन्दू कलाकार…..


दाऊद के इशारे पर बॉलीवुड में घुसाये जा रहे पाकिस्तानी,
निकाले जा रहे हिन्दू कलाकार…..

कुमार शानू ,उदित नारायण, अभिजीत, शान, सुखविंदर सिंह, सोनू निगम, अरजीत सिहं ।

आपने कभी ध्यान दिया है कि फ़िल्मों मे 92 के बाद से गायकों का करियर ग्राफ़ कैसा रहा है ??

याद है कुमार शानू जो करियर में पीक पर चढ़कर अचानक ही धुँध में खो गये ।

फिर आये अभिजीत, जिन्हे टाप पर पहुँचकर अचानक
ही काम मिलना बद हो गया

उदित नारायण भी उदय होकर समय से पहले अस्त हो गये।

उसके बाद सुखविंदर अपनी धमाकेदार आवाज से फलक पर छा गये और फिर अचानक ही ग्रहण लग गया

उसके बाद आये शान,और बुलंदियों को छूने के अचानक बाद ही कब नीचे आये पता ही नही लगा।

फिर सोनू निगम कब काम मिलना बंद हुआ, लोग समझ ही नही पाये ।

उसके बाद अरजीत सिंह जिनकी मखमली आवाज ने दिलो मे जगह बनानी शुरू ही की थी कि सलमान ने उन्हें पब्लिकली माफ़ी माँगने के बाद भी फिल्म सुलतान में उनके द्वारा गाया हुआ ‘जग घूमया’ जैसा गाना बाहर निकलवा दिया अौर उसी गाने को पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खान से गवाया, अौर सिर्फ़ यही नहीं बाद में धीरे धीरे उसका करियर खतम करने की साज़िश चल रही है।

सारे ही गायकों को असमय बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

इसके उल्टा पहले चीख़ कर गाने वाले, क़व्वाली
गायक नुसरत फ़तेह अली खान क़व्वाली गाने के
लिये बुलाया जाता है, और पाकिस्तानी गायकों के लिये दरवाज़े खोल दिये जाते हैं। उसके बाद राहत फ़तेह अली खान आते हैं और बॉलीवुड में उन्हे लगातार काम मिलने लगता है और बॉलीवुड की वजह से सुपरहिट हो जाते है।

फिर नये स्टाईल के नाम पर आतिफ़ असलम आते हैं जिनको एक के बाद एक अच्छे गाने मिलने लगते हैं।

अली जाफ़र जैसे औसत गायक को भी काम मिलने में कोई दिक़्क़त नही आती ।

धीरे धीरे पाकिस्तानी हीरो हीरोइन को भी बॉलीवुड मे लाकर स्थापित किया जाने लगा और भारतियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा

उरी हमले के बाद बैक डोर से चुपके से उन्हे लाने की चाल, कुछ भारतियों की नज़र मे आ गया और उन्होंने निंदा करने की माँग करने की, हिमाक़त कर डाली जो उन्हे नागवार गुज़री और वो पाकिस्तान वापस चले गये।

क्या आपको लगता है कि यह महज इत्तिफ़ाक़ है तो आप से बडा भोला कोइ नही

पूरा बॉलीवुड डी-कंपनी या पी-कंपनी (पाकिस्तान) के इशारों पर चलता है, और इसका इलाज है टोटल बॉयकाट।

सिर्फ़ देशभक्त कलाकारों का समर्थन करें।।

हम हमारे देश के लिए इतना तो कर सकते है। हम अपने रूपये को आतंकियो के हाथ मे न जाने दे।
हमारे ही रुपयो से हमारे ही बच्चो के लिए कफन का इन्तजाम तो न करें!!
अपने पैसे देश की बर्बादी में न लगा के देश के विकास अपने समाज के विकास में लगाएं साल में 100 फ़िल्में न देख के अच्छी 1 ही फिल्म देखें ,जेहादी सोच वाले शाहरुख़, महेश भट्ट, कपूर खानदान का बॉयकॉट करें जिन प्रोडक्ट की जेहादी ऐड करते हैं उसका बॉयकॉट करें, पर ध्यान रखें ये सब गुस्से या अराजकता से नहीं धैर्य से करना है।

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बॉलीवुड


षड़यंत्र
बॉलीवुड में घुसाये जा रहे पाकिस्तानी कलाकार व गायक और निकाले जा रहे हिन्दू कलाकार ।।
कुमार शानू ,उदित नारायण, अभिजीत, शान, सुखविंदर सिंह, सोनू निगम, अरजीत सिहं ।

*आपने कभी ध्यान दिया है कि फ़िल्मों मे 92 के बाद से गायकों का करियर ग्राफ़ कैसा रहा है ??*

याद है *कुमार शानू* जो करियर में पीक पर चढ़कर अचानक ही धुँध में खो गये ।

फिर आये *अभिजीत*, जिन्हे टाप पर पहुँचकर अचानक

ही काम मिलना बद हो गया

*उदित नारायण* भी उदय होकर समय से पहले अस्त हो गये।

उसके बाद *सुखविंदर* अपनी धमाकेदार आवाज से फलक पर छा गये और फिर अचानक ही ग्रहण लग गया

उसके बाद आये शान,और बुलंदियों को छूने के अचानक बाद ही कब नीचे आये पता ही नही लगा।

फिर *सोनू निगम* कब काम मिलना बंद हुआ, लोग समझ ही नही पाये ।

उसके बाद *अरजीत सिंह* जिनकी मखमली आवाज ने दिलो मे जगह बनानी शुरू ही

की थी कि 💥 *सलमान ने उनहे पब्लिकली माफ़ी माँगने के बाद भी फिल्म सुलतान में उनके द्वारा गाया हुआ ‘जग घूमया’ जैसा गाना बाहर निकलवा दिया अौर उसी गाने को पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खान से गवाया*, अौर सिर्फ़ यही नहीं बाद में धीरे धीरे उसका करियर

खतम करने की साज़िश चल रही है।

सारे ही गायकों को असमय बाहर का रास्ता दिखा दिया गया ।

इसके उल्टा पहले चीख़ कर गाने वाले, क़व्वाली

गायक *नुसरत फ़तेह अली खान* क़व्वाली गाने के

लिये बुलाया जाता है, और पाकिस्तानी गायकों के लिये दरवाज़े खोल दिये जाते हैं। उसके बाद राहत *फ़तेह अली खान* आते हैं और बॉलीवुड में उन्हे लगातार काम मिलने लगता है और बॉलीवुड की वजह से सुपरहिट हो जाते है।

फिर नये स्टाईल के नाम पर *आतिफ़ असलम* आते हैं जिनको एक के बाद एक अच्छे गाने मिलने लगते हैं।

*अली जाफ़र* जैसे औसत गायक को भी काम मिलने में कोई दिक़्क़त नही आती ।

धीरे धीरे *पाकिस्तानी हीरो*

*हीरोइन* को भी बॉलीवुड मे लाकर स्थापित किया जाने लगा और भारतियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा

*उरी हमले के बाद* बैक डोर से चुपके से उन्हे लाने की चाल, कुछ भारतियों की नज़र मे आ गया और उन्होंने निंदा करने की माँग करने की, हिमाक़त कर डाली जो उन्हे नागवार गुज़री और फिर  हमारे ही देश के गद्दार सेकुलर-वामपंथियों ने उन पाकिस्तानी कलाकारों  के पक्ष और अपने ही देश के विरोध में आकाश-पाताल एक कर दिया किंन्तु अन्ततोगत्वा उन्हें  *पाकिस्तान* वापस जाना ही पड़ा ।

क्या आपको लगता है कि यह महज इत्तिफ़ाक़ है तो आप से बडा भोला कोइ नही

*पूरा बॉलीवुड डी-कंपनी या पी-कंपनी (पाकिस्तान) के इशारों पर चलता है, और इसका इलाज है टोटल बॉयकाट ( *बहिष्कार*)

*सिर्फ़ देशभक्त कलाकारों का* *समर्थन करें ।।*

Manu kumar