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एक गाज़ी और लौंडी का अफसाना है तैमूर और जहांगीर


आज कल सैफ अली खान और करीना खान(कपूर) के दूसरे बेटे के जहांगीर नामकरण को लेकर बड़ी चर्चा है। मुझे सैफ द्वारा पहला तैमूर और दूसरा जहांगीर निकालना समझ आता है क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं का शासक होना और हिंदुओ को गुलाम समझना, यह सैफ अली खान के डीएनए में है। उसकी विरासत गज़वा-ए-हिन्द की जेहनियत से जुड़ी है। उसकी नसों में वह अफगानी इस्लामिया खून आज भी दौड़ रहा है जिसके के लिए हिन्दू काफिरों पर अपना धर्म मुसल्लत करना व उन पर हुक्म करना, आसमानी फरमान है। सैफ के पूर्वज क्वेटा(उस वक्त अफगानिस्तान में) के थे और इस्लाम के प्रसार में लगे थे। आज के भारत मे इनका आना 15 वी शताब्दी में हुआ था जब दिल्ली के अफगानी सुल्तान बहालुल लोदी ने उसके पूर्वज, सलामत खान भड़ैंच को दिल्ली के आसपास के मेवाती लोगों को काबू करने के लिए बुलाया था।

अफगानों के बाद जब मुगल आये तो इस सलामत खान ने मुगलों को चढ़ता सूरज समझ, अफगानियों से किनारा कर लिया और बाबर की बादशाहत कबूल कर ली। उसके बाद से ही इस परिवार का एक ही मूल मंत्र रहा है की जो भी शक्तिशाली है या जो भी दिल्ली पर बैठा है उसको अपनी सेवा देना।

19 वी शताब्दी के आते आते इस परिवार ने यह समझ लिया था कि भारत मे नई शक्ति अंग्रेज है और देर सबेर दिल्ली पर अंग्रेज हुक्मरान ही बैठेंगे, इसलिये इनके एक पूर्वज अलफ खान, मैं परिवार के, तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के कमांडर इन चीफ लार्ड जेरार्ड लेक को सलामी बजा आये और अपने परिवार की सेवाएं समर्पित कर दी। इस परिवार ने अग्रेजो की तरफ से होलकर और मराठों से युद्ध किया और इसके इनाम स्वरूप लॉर्ड जेरार्ड लेक ने 1804 में उनके बेटे फैज तलब खान को पटौदी की जागीर दी। ऊसी के बाद से ही 137 वर्ग किलोमीटर की यह जागीर पटौदी में नवाब पैदा होने लगे।

जब भारत 1947 मे स्वतंत्र हुआ तब पटौदी के नवाब इफ्तिखार अली खान थे जो की क्रिकेट के मशहूर खिलाड़ी थे और भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान भी थे। इस पटौदी रियासत का 1948 में जब भारत मे विलय हो गया तब भी इस परिवार ने अपनी खानदानी परिपाटी नही छोड़ी और दिल्ली के नए शासक भूरे अंग्रेज जवाहर लाल नेहरू को शीशे में उतारने में पीछे नही रहे। गंगा जमुनी तहजीब और सेक्युलरिज़्म की नई परिभाषा गढ़ते हुये भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तो विशेष रूप से मुस्लिम अशरफिया वर्ग के प्रति संवेदनशील थे और वे इस पटौदी परिवार से कितना करीब थे इसका पता इस बात से लगता है कि जब जनवरी 1952 में इफ्तिखार अली खान की सिर्फ 42 वर्ष की ही आयु में पोलो के खेल में घायल हो कर अकाल मृत्यु हो गई थी तो हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री भूरे अंग्रेज जवाहर लाल नेहरू ने, इफ्तिखार अली खान की सिर्फ 37 वर्ष में विधवा हुई साजिदा सुल्तान, जो नवाब भोपाल की बेटी भी थी, को लुटियंस दिल्ली में, एक ‘समाजसेविका’ के रूप में त्यागराज मार्ग पर एक बंगला आवंटित कर दिया था। इसके बाद से इस परिवार का केंद्रबिंदु 2003 तक, जब तक साजिदा सुल्तान ज़िंदा रही, यही लुटियंस बंगला रहा।

मुझे सैफ अली खान के परिवार के इतिहास को इतना विस्तार से इसलिये बताना पड़ा ताकि लोग, सैफ अली खान की मानसिकता व अपने बेटों का नाम तैमूर व जहांगीर नाम रखने के उसके मनोविज्ञान को समझ सके। वो आज भी अफगानिस्तान से उतर, भारत को लूटने और काफिरों(हिंदुओं) पर राज करने की इस्लामिक कबीलाई मानसिकता को ओढ़े हुये है। उसके अवचेतन मन मे यह बात जड़ पकड़े हुए है कि हिंदुओं का स्त्रीवर्ग उनकी लौंडी है और उनको गुलाम बना उनपर राज करना, उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।

यहां यह उत्सुकता अवश्य होती है कि सैफ की मानसिकता और उसके अवचेतन मन के मनोविज्ञान को तो समझा जासकता है लेकिन करीना कपूर का तैमूर और जहांगीर की माँ बनने का मनोविज्ञान क्या है? कोई हिन्दू स्त्री स्वतः एक बांदी, एक लौंडी बन, अपने बेटों के हिंदुहन्ता प्रतीकों से हुये नामकरण से सहज हो सकती है?

मैने इसपर काफी विचार किया और पाया कि हिंदुओं में यह करीना कपूर कोई अपवाद नही है बल्कि यह हिन्दू मुस्लिम का झालमेल बहुत पुराना है। भारत मे हिंदुओं को मुसलमान बनाना या फिर दिल्ली में मुगलों का जब तक ह्रास नही होगया, शासकों के प्रश्रय में जबरन धर्मांतरण कराया जाना होता रहा है लेकिन भारत की मुख्यभूमि में यह कभी भी सामाजिक स्तर पर स्थापित नही हो पाया था। लेकिन इसके विपरीत भारत का वह भाग, जहां से हिन्दू स्वयं शनय शनय विस्थापित हुआ है, वहां इसका समाजीकरण जरूर हुआ है।मेरा अनुभव रहा है की अखंडित भारत के पश्चिमोत्तर भाग व उत्तर में काश्मीर के हिंदुओं में, अपने इस्लामिक हंताओ के प्रति विशेष अनुराग और उनके साथ सहज रूप से सहभागिता से रहने की कल्पना का रोमांस ज्यादा पाया जाता रहा है। भारत के बंटवारे के बाद विस्थापित हुये हिंदुओं में एक ऐसा वर्ग भी रहा है जो अपनी जड़ों को पाकिस्तान के गांवो, कस्बों और शहरो में सिर्फ ढूंढता ही नही है, बल्कि उसके रोमांस में कैद, गंगा जमुनी तहजीब को वहां उतारता भी है। वो शताब्दियों से स्वयं को अफगानिस्तान से सिमटते सिमटते, पूर्व दिशा की ओर खिसकते खिसकते, अपनी खोई मिट्टी का दोष, अंग्रेज़ो और चंद राजनीतिज्ञों पर डाल देता है लेकिन वह कभी अपने हंताओ पर प्रश्न नही करता है।

1970/80 के दशकों में एक से एक बुद्धजीवियों को पढा व सुना है जो अपना बचपन, अपनी जवानी को पाकिस्तान की खुशनुमा वादियों में ढूंढते थे। वे अपनी पुरानी यादों में खो, न जाने कौन कौन से जुम्मन चाचाजानो, फरीदा चाचीजानो, तबस्सुम आपाओं और बाज़ीयों को फरिश्ता बना देते थे। उनकी बातों से यही लगता था कि जैसे वे स्वर्ग में थे और 1918 से 1947 के बीच हुए वहां हिंदुओं के विरुद्ध हुये अत्याचार, दंगे और इस आक्रमकता के कारण हिंदुओं का धीरे धीरे विस्थापित होना, कोई वास्तविकता न हो कर बस कोई दुर्घटना थी। यही सब कश्मीरी पंडितों का भी हुआ है। जबतक 1991 से घाटी से भगाए नही गये तब तक 370 का समर्थन करते रहे। जो इनके पूर्वजो के हन्ता थे और बाद में उनके स्वयं के हुये, उन्ही के साथ खान पान बोली पर गलबहियां करते रहे और शेष भारत के हिंदुओं पर श्रेष्ठता का भाव रखते रहे। आज भी कई कश्मीरी पंडित मिल जाएंगे जो अपने हंताओ पर कभी उंगली नही उठाते है, उनका आज भी रोमांस, उसी काल खंड में अटका हुआ है।

मुझे ऐसा ही कुछ, करीना कपूर को विरासत में मिला लगता है। वह जिस कपूर खानदान से है, उसकी जड़े ब्रिटिश राज में जमी थी। भारत मे तो इस खानदान की पहचान पृथ्वीराज कपूर से बनी, जो अखंड भारत के शहर लायलपुर, पंजाब (आज का पाकिस्तान का फैसलाबाद शहर) में पैदा हुए थे और वही उनकी पढ़ाई लिखाई हुई थी। उनके परदादा को दीवान की पदवी मिली थी और दीवान मुरली माल कपूर के नाम से जाने जाते थे। उनके दादा दीवान केशवमल कपूर वहां तहसीलदार थे और उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर, इंडियन इम्पीरियल पुलिस में अधिकारी थे। पिता के पेशावर स्थांतरण के बाद परिवार, पेशावर चला आया, जहां आज भी उनकी हवेली खड़ी है। यह कपूर परिवार, ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभावी व प्रतिष्ठित सेवक थे जो धन सम्पदा व सामाजिक प्रतिष्ठा से परिपूर्ण थे। लेकिन उसके बाद भी वहां, भारत के उस हिस्से में हिन्दू मुस्लिम को लेकर समाज मे ऐसी स्थितियां बनने लगी थी कि 1928 में पृथ्वीराज कपूर को वह सब छोड़ कर, फ़िल्म और थियेटर में काम करने के लिए मुम्बई चले आये थे। उनके विस्थापन के बाद धीरे धीरे पूरा खानदान अपना घर जयदाद छोड़ कर मुम्बई आगया था।

पृथ्वीराज कपूर के घर वालो के साथ ससुराल के लोग भी मुम्बई चले आये थे और उसमे उनके साले जुगुल किशोर मेहरा भी थे। जो फ़िल्म में अभिनेता थे लेकिन फिर बाद में मुम्बई रेडियो( बॉम्बे रेडियो) के स्टेशन डायरेक्टर बन गए थे। यह साले साहब जुगल किशोर मेहरा, जो राजकपूर के सगे मामा थे, ने तीन शादियां की और वे सब मुस्लिम थी। उनमें से एक नाम अल्लाहरखी था, उनसे हुई बेटी 1940-50 की मशहूर अभिनेत्री मुन्नवर राणा थी। जुगल किशोर मेहरा ने तीसरी शादी उस ज़माने की मशहूर अभिनेत्री और गायिका अनवरी बेगम से की थी। 1947 में जब बंटवारा हुआ तो जुगलकिशोर मेहरा ने अनवरी बेगम के साथ रिज़र्व माइग्रेशन किया और लाहौर, पाकिस्तान चले गए। वहां, पृथ्वीराज कपूर के साले और राज कपूर के मामा, जुगल किशोर ने हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम अपना लिया और अपना नया नाम अहमद सुल्तान रख लिया। पाकिस्तान में, मेहरा उर्फ सुल्तान अहमद, पाकिस्तान रेडियो जॉइन कर लिया और वहां वह मे डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद तक पहुंचे। उसके बाद वोउच्च पद पर पाकिस्तान एयरलाइन्स में चले गये।

मेहरा उर्फ अहमद सुल्तान की बीवी अनवरी बेगम की एक बेटी जरीना थी और उसने बाद में नसरीन नाम से हिंदी और पाकिस्तानी फिल्मो में काम किया था। यह ज़रीन, राज कपूर की ममेरी बहन थी जिसकी बाद में शादी करांची के कालीन व्यापारी लियाकत गुल आगा से शादी हुई। उस काल मे पाकिस्तान में यह बहुत मशहूर था कि राज कपूर की बहन की शादी करांची में आगा परिवार में हुई है। इसी ज़रीन और आगा की बेटी सलमा आगा है, जो 80 के दशक में बी आर चोपड़ा की फ़िल्म की नायिका थी। सलमा आगा का राजकपूर से भांजी का रिश्ता है और वह करीना कपूर की बुआ है।

मैं अब जब 70 और 80 के दशक की कुछ स्मृतियों को झझकोरता हूँ तो यह याद आता है कि उस काल मे जब राज कपूर के यहां कोई जश्न होता था तो ढेर सारे पाकिस्तानी मेहमान, कव्वाल, गायक महफ़िल की रंगत बढाते थे। मुझे तब कपूर परिवार का यह पाकिस्तानी प्रेम, बड़ा अजीब जरूर लगता था लेकिन मैने इस पर कुछ मनन नही किया क्योंकि कपूर खानदान की विरासत के छुपे हुये पहलुओं को बिल्कुल भी नही जानता था।

अब इन्ही सब बातों को देख और समझ कर मुझे करीना कपूर समझ मे आती है। वह उस वातावरण में पैदा और पली बढ़ी हुई है जहां उसके खानदान ने इस हिन्दू मुस्लिम झालमेल को सहेजा हुआ है। ये निमित्त मात्र हिन्दू शेष रह गए है ये लायलपुर, पेशावर की जड़ो में रोमांस से लिपटे लोग है। ये वे लोग है जो पेशावर में खड़ी दीवान विशेश्वर नाथ कपूर की हवेली के साये में, अपने हंताओ के साथ सोने में रोमानियत ढूंढते है।

मैं यह मानता हूँ कि ये और ऐसे ही अपनी ज़मीन छोड़, पुराने ज़माने की रोमानियत में कैद लोग, कुछ भी हो सकते है लेकिन अब हिन्दू शायद बिल्कुल भी नही रह गये है। इसीलिए जहां सैफ अली खान के लिए बेटों को तैमूर और जहांगीर नाम देना उसे गज़वा-ए-हिन्द के लिए गाज़ी होने का सुख देता है वही करीना को कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि वह एक गाज़ी की लौंडी से ज्यादा कुछ नही रह गई है।

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पर्देकेपीछेकानग्न_सत्य ***

….. राज कुंद्रा… ये कोई छोटा मोटा नाम नहीं है…. शिल्पा शेट्टी… ये नाम भी किसी पहचान का मोहताज नहीं हैं।

Alt Balaji…. वेब सीरीज़ की दुनिया का जाना माना नाम….एकता कपूर इसकी मालकिन है…. एकता कपूर…. ये नाम अपने आप में एक बॉलीवुड हैं…!!

…… ये सब एक दूसरे से जूड़े हुए हैं… राज कुंद्रा को पोर्नोग्राफी के लिए गिरफ्तार किया गया है… उसके साथ 11 और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है।

वो पोर्न फिल्म बनाते थे और कई चैनलों को बेचते थे…. जिसमें Alt Balaji का नाम मीडिया में आ चुका है… ये एकता कपूर का है……
…… मतलब एकता कपूर जानती थी कि राज कुंद्रा क्या क्या करता है….. शिल्पा शेट्टी कुंद्रा की बीवी हैं…. क्या कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि….. एक बीवी को यह नहीं पता कि उसका पति क्या काम करता है…!!!
और वो भी शिल्पा शेट्टी जैसी बीवी,,,, बॉलीवुड की एक जानी-मानी हिरोइन…!! हो ही नहीं सकता…..

….. कल एक मॉडल DNA में बता रही थी कि….. उसका ऑडिशन फिल्म के लिए हुआ था… जिसमे उसका सिलेक्शन हुआ था…. कुछ दिन शुटिंग करने के बाद उसे न्यूड सीन के लिए कहा गया,,, जब उसने मना किया तो तब तक हुई शुटिंग का पुरा खर्च उससे मांगा गया….. वर्ना केस करने और उसे बर्बाद करने की धमकी दी गई…. ऐसे कई लोग हैं जिसकी जिंदगी इन्होंने बर्बाद कर दी अपने राजनीतिक और पैसे के रसुख का उपयोग करके….ये इतने ताकतवर है कि कोई इनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता….

…… एकता कपूर बहुत सारे सिरियल बनाती
है….. पारिवारिक… सास बहू वाले…. इन सिरियल के लिए पुरे देश में ऑडिशन होते हैं….. शिल्पा शेट्टी टीवी शॉ में जज बनती है…. सिंगिग शॉ…. डांसिंग शॉ…. फूहड़ हास्य वाले शॉ…. जिनमें छोटे बच्चे और युवा आयु के बच्चे भाग लेते हैं…. इन Shows के लिए देशभर में ऑडिशन होते हैं…. उन Audition में कौन जाता है…

….. आपके हमारे घर की महिलाएं…. बच्चे…. किसको पता है कि इन ऑडिशन के पीछे क्या चल रहा होता है…. कौन जानता है कि पर्दे के पीछे कैसे गंदे घिनौने खेल चल रहे होते है….

मोदी ना आते तो इन पर्दे के पीछे की सच्चाई शायद ही कभी बाहर आ पाती….

……बॉलीवुड एक गंदा नाला हैं…. इस नाले में बहने से बचिए…. और दूसरों को भी बचाइए….

यदि आपके अंदर टेलेन्ट है…. आपके बच्चों के अंदर टेलेन्ट है…. वीडियो बनाईये….. YouTube, Facebook, Twitter…. जैसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर डालिए….. लोगों को आपका टेलेन्ट पसंद आयेगा तो लोग खुद आपको फॉलो करेंगे….

क्या जरूरत है आपको ऐसे ऑडिशन में जाने की….!! क्या जरूरत है आपको किसी के झांसे में आने की….!!

आपको अपना टेलेन्ट ही दिखाना है ना….Youtube पर अपना चैनल बनाकर विडियो पोस्ट करो…. अपनी खुद की पहचान बनाओ…..

…… मोदीजी जब कहते हैं ना कि ,,,,,, ” आत्मनिर्भर बनो “…….
तो उसका मतलब सिर्फ ” पकौड़े ” बेचना नहीं होता….. इसका मतलब अपना ” हुनर ” बेचना होता है….

उनकी बातों को समझना सीखो…. ध्रुव राठी जैसे लोग तो झूठ बोल बोल के YouTube पर सेलेब्रिटी बन गए हैं….. ये भी एक ” हुनर ” ही है…..

…..जिस दिन हम आत्मनिर्भर हो जायेंगे….. देश सोने की चिड़िया बन जायेगा…..

……..

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“Nishaan-e-Pakistan” Bollywood Actor Yusuf Khan has Passed away at the age of 98.
Some of the Highlights of his Bollywood carrier-
1.During the Indo-Pak Kargil War,Yusuf Khan refused to return the “Nishan-e-Pakistan” Civilian award Conferred to him by Pakistani Government.
2.During the whole Course of Indo-Pakistan Kargil war never Criticised Pakistan 🇵🇰.
3.During his whole Span of Bollywood Career he never spoke a Single word against Pakistan 🇵🇰 be it 1965 War,1971 Indo-Pak war, or even 1999 Kargil war.

  1. He was often Caught doing Espionage against India 🇮🇳 for Pakistan 🇵🇰 but was always released on the Context of his nearness to erstwhile “Secular” regime.
    5.He was an Dearest & Favourite Child of Urban Naxal & Secular Bollywood brigade & always was an follower of Javed Akhtar type Hidden Jihadism (Means following Jihad in name of Communism).
    6.He Celebrated Pakistan 🇵🇰 day Every year till 1995 at his Bombay(Now Mumbai) residence,it was stopped only when for the First time SS-BJP government came to power in state & then legendary Bala Sahab Thackeray personally asked him to stop it or otherwise be ready to face Consequences.

Now who so may be sad for his demise they are free to do so,But I am not,yes it’s true that I am not happy also but I also say it Clearly this fellow doesn’t deserves the type of Mourning that National Media is creating for his demise.

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मोहम्मद युसुफ़ ख़ान उर्फ दिलीप कुमार गजब के मुस्लिम थे …….
पाकिस्तान के बहुत ज्यादा प्रेमी भी थे । पाकिस्तान के इस अथाह प्रेम के कारण ही उन्हें पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार ‘. निशान ए पाकिस्तान ‘ मिला था ।

कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने पाकिस्तान की निंदा करने और पाकिस्तान से मिला पुरस्कार लौटाने से इंकार कर दिया था …..इतना प्यार करते थे ये महाशय अपने मुल्क अपनी मिट्टी से और यहां कुछ सैकुलर सुबह से विलाप में ऐसे लगे हैं जैसे कोई उनका कोई अपना सगा चला गया । अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा जी की पुण्यतिथि हो आज वो भूल गये …..जो हमारे लिए वतन पर कुरबान हो गये उनको याद नहीं रखा परंतु फिल्मी भांड के लिए टसुए बहा रहे हैं नकली लोग

ऐसे व्यक्ति कभी भी देशभक्त नहीं होते ना कभी इनसे उम्मीद रखनी चाहिए ।

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यह 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्ष की बात है. कलकत्ता में खुफिया एजेंसियों और कलकत्ता पुलिस ने पाकिस्तान के जासूस को गिरफ्तार किया था उसके पास बरामद हुई डायरी में एक तत्कालीन फिल्मी सितारे का नाम दर्ज था.

उस जासूस से पूछताछ से मिली जानकारी के बाद कलकत्ता पुलिस हवाई जहाज से बम्बई पहुंच गई थी और सीधे उस सितारे के घर पहुंची थी. लेकिन तब तक इस पुलिस कार्रवाई की खबर दिल्ली की शीर्ष सत्ता के गलियारे तक पहुंच चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने हस्तक्षेप किया था.

परिणामस्वरुप कलकत्ता पुलिस उस फिल्मी सितारे के घर से यह कहते हुए खाली हाथ वापस लौटी थी कि सम्भवतः वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था और फिल्मी सितारे का उससे कोई लेनादेना नहीं.

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उस जासूस से गहन पूछताछ के बाद आनन फानन में फ्लाईट पहुंची कलकत्ता पुलिस को यह दिव्य ज्ञान उस जासूस से की गई गहन पूछताछ के दौरान नहीं हुआ.

लेकिन बम्बई में उस सितारे के घर पहुंच कर उसे वह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया था. ज्यादा शोर मचा तो पूरे प्रकरण की जांच के लिए एक सरकारी जांच कमेटी बनी. उस कमेटी ने तथाकथित जांच के बाद वही बात उगली थी, जो बात कलकत्ता पुलिस ने उगली थी, कि वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था.

इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान खुफिया एजेंसियों ने बम्बई में पाकिस्तान से सम्पर्क वाले एक रेडियो ट्रांसमीटर के सिग्नल पकड़े थे. ट्रांसमीटर बम्बई में ही सक्रिय था.

खुफिया एजेंसियों की टीम सिग्नल का पीछा करते हुए जब उस स्थान पर पहुंची थी जहां वह रेडियो ट्रांसमीटर सक्रिय था, तो बुरी तरह चौंक गयी थी. जिस मकान में वह ट्रांसमीटर बरामद हुआ था, वह घर उस समय के बहुत नामी गिरामी उसी फिल्मी सितारे का ही था जिससे पूछताछ करने के लिए उसके घर कुछ वर्ष पूर्व कलकता पुलिस पहुंची थी.

इसबार भी सितारे पर दिल्ली मेहरबान हुई. रेडियो ट्रांसमीटर के विषय में उस फिल्मी सितारे ने बहुत मासूम सफाई दी कि उसे पाकिस्तानी गाने सुनने का शौक है और क्योंकि भारत में समान्य रेडियो पर पाकिस्तान रेडियो प्रतिबंधित है इसलिए उसने यह रेडियो ट्रांसमीटर अपने घर में रखा है ताकि पाकिस्तानी गाने सुनने का अपना शौक पूरा कर सके.

आप यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि इस बार भी उस फिल्मी सितारे की ही बात को शाश्वत सत्य मान लिया गया. एक जांच कमेटी बनी और उसने भी फिल्मी सितारे के उस वक्तव्य को ही सत्य घोषित कर दिया. यह सवाल कभी पूछा ही नहीं गया, देश को कभी यह बताया ही नहीं गया कि सामान्य नागरिक के लिए पूर्णतया प्रतिबंधित और जिसे रखने पर कठोर दंड का प्रावधान था, वह रेडियो ट्रांसमीटर उस फिल्मी सितारे ने कहां से, कैसे और किस से प्राप्त किया था.?

जबकि सत्य यह है कि देश की सुरक्षा और गुप्तचर जांच एजेंसियों में जिम्मेदार पद पर कार्यरत किसी भी व्यक्ति के अतिरिक्त यदि किसी समान्य नागरिक के पास पाकिस्तान तक पहुंच वाला रेडियो ट्रांसमीटर यदि आज भी बरामद हो जाए तो पुलिस की लाठियों की बरसात उसकी हड्डियों का सत्कार पूरी लगन से करेंगी.

क्या आप जानते हैं कि कौन था वह फिल्मी सितारा, क्या नाम था उस फिल्मी सितारे का…?

तो अब जानिए कि उस फिल्मी सितारे का नाम था… दिलीप कुमार.

वही दिलीप कुमार जिसने उसे मिले सर्वोच्च पाकिस्तानी एवार्ड को वापस करने से उस समय साफ़ मना कर दिया था, जब करगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना द्वारा की गई भारतीय सेना के सैकड़ों सैनिकों की हत्याओं के विरोध में उस फिल्मी सितारे से मांग की गई थी कि… वह पाकिस्तानी एवार्ड को भारतीय विरोध के प्रतीक के रूप में वापस कर दे.

लेकिन इनकी चर्चा कहीं किसी मीडिया में आजतक सुनी आपने.? जो इक्का दुक्का समाचार आप को काफी प्रयास के बाद मिलेंगे वो इसलिए मिलेंगे क्योंकि उनमें इस फिल्मी सितारे की वकालत की गयी है.

प्रश्नों के कठघरे में नहीं खड़ा किया गया है. इसीलिए मैंने प्रारम्भ में ही लिखा है कि… बॉलीवुड के चरणों में लोटती मीडिया और चाकरी करती सरकारों की कहानी दशकों पुरानी है.

Courtesy: Vimla Pandey

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बॉलीवुड का पाकिस्तानी कनेक्शन


बॉलीवुड का पाकिस्तानी कनेक्शन60 के दशक की शुरुआत में, खुफिया एजेंसियों और कलकत्ता पुलिस के संयुक्त अभियान में भारत में घुसे एक पाकिस्तानी जासूस को गिरफ्तार किया गया। उस जासूस से एक डायरी बरामद की गई और डायरी में दर्ज नामों में से एक बंबई फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर फिल्म स्टार का था। कलकत्ता पुलिस बॉम्बे में उस फिल्म स्टार के घर भी गई थी लेकिन कुछ लोगों के हस्तक्षेप के कारण मामले को वहीं दबा दिया गया और यह निष्कर्ष निकाला गया कि पकड़ा गया पाकिस्तानी जासूस सिर्फ उस फिल्म स्टार का एक प्रशंसक था। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि किसी पूछताछ के दौरान कलकत्ता पुलिस को यह ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ बल्कि हस्तक्षेप करने वालों द्वारा यही सफाई बोलने को कहा गया।लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। बॉम्बे में खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तान के साथ संपर्क करते हुए एक रेडियो ट्रांसमीटर के कुछ संकेतों को पकड़ा। ट्रांसमीटर बॉम्बे में ही सक्रिय था। एजेंसी ने जल्दी ही उस उपकरण का ठिकाना ढूंढ निकाला ………जिस घर से यह उपकरण बरामद किया गया था, वह घर भी उसी फिल्म स्टार का था।लेकिन दिल्ली उन पर मेहरबान थी।ट्रांसमीटर के बारे में, फिल्म स्टार ने बहुत ही निर्दोष सा स्पष्टीकरण दिया कि वह पाकिस्तानी संगीत के शौकीन हैं और चूंकि भारत में पाकिस्तानी रेडियो पर प्रतिबंध है, इसलिए उन्होंने इस ट्रांसमीटर को अपने घर में रखा हुआ है।लेकिन मामला गंभीर था और इस बार यूं ही रफा दफा करना मुश्किल लग रहा था। तो आनन फानन में एक जांच समिति का गठन किया गया जिसने तुरंत ही जांच कर यह घोषणा कर दी कि फिल्म स्टार का बयान सच था।यह सवाल कभी नहीं पूछा गया कि उस फिल्मी सितारे को इतनी खास फ्रिक्वेंसी पर काम करने वाला ऐसा रेडियो ट्रांसमीटर कहां से मिला?मशहूर फिल्मस्टार यूसुफ खान है। बाद में पाकिस्तान ने इस अभिनेता को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ से नवाजा। कारगिल युद्ध के दौरान, लोगों ने उनसे पुरस्कार लौटाने की पुरजोर मांग की लेकिन अभिनेता ने उन सार्वजनिक भावनाओं को अनसुना कर दिया। (दिलीप कुमार 1998 में पाकिस्तान में सम्मान लेनेअपने साथ सुनील दत्त को भी ले गए)लेकिन क्या आपने कभी इससे संबंधित कोई चर्चा मीडिया में कहीं सुनी ?? नहीं न …….क्योंकि बिकाऊ और चापलूस मीडिया कोई नई घटना नहीं है। यह बहुत लंबे समय से है।अंतर केवल इतना है कि अबकी इस भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हिजड़ी मीडिया का मुकाबला राष्ट्रवादी मीडिया और सोशल मीडिया के धड़े से ही गया है .. जो इनके कुकृत्यों का पर्दाफाश करने को दृढ़ संकल्प है ।जय श्री राम 

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यह 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्ष की बात है. कलकत्ता में खुफिया एजेंसियों और कलकत्ता पुलिस ने पाकिस्तान के जासूस को गिरफ्तार किया था उसके पास बरामद हुई डायरी में एक तत्कालीन फिल्मी सितारे का नाम दर्ज था.

उस जासूस से पूछताछ से मिली जानकारी के बाद कलकत्ता पुलिस हवाई जहाज से बम्बई पहुंच गई थी और सीधे उस सितारे के घर पहुंची थी. लेकिन तब तक इस पुलिस कार्रवाई की खबर दिल्ली की शीर्ष सत्ता के गलियारे तक पहुंच चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने हस्तक्षेप किया था.

परिणामस्वरुप कलकत्ता पुलिस उस फिल्मी सितारे के घर से यह कहते हुए खाली हाथ वापस लौटी थी कि सम्भवतः वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था और फिल्मी सितारे का उससे कोई लेनादेना नहीं.

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उस जासूस से गहन पूछताछ के बाद आनन फानन में फ्लाईट पहुंची कलकत्ता पुलिस को यह दिव्य ज्ञान उस जासूस से की गई गहन पूछताछ के दौरान नहीं हुआ.

लेकिन बम्बई में उस सितारे के घर पहुंच कर उसे वह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया था. ज्यादा शोर मचा तो पूरे प्रकरण की जांच के लिए एक सरकारी जांच कमेटी बनी. उस कमेटी ने तथाकथित जांच के बाद वही बात उगली थी, जो बात कलकत्ता पुलिस ने उगली थी, कि वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था.

इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान खुफिया एजेंसियों ने बम्बई में पाकिस्तान से सम्पर्क वाले एक रेडियो ट्रांसमीटर के सिग्नल पकड़े थे. ट्रांसमीटर बम्बई में ही सक्रिय था.

खुफिया एजेंसियों की टीम सिग्नल का पीछा करते हुए जब उस स्थान पर पहुंची थी जहां वह रेडियो ट्रांसमीटर सक्रिय था, तो बुरी तरह चौंक गयी थी. जिस मकान में वह ट्रांसमीटर बरामद हुआ था, वह घर उस समय के बहुत नामी गिरामी उसी फिल्मी सितारे का ही था जिससे पूछताछ करने के लिए उसके घर कुछ वर्ष पूर्व कलकता पुलिस पहुंची थी.

इसबार भी सितारे पर दिल्ली मेहरबान हुई. रेडियो ट्रांसमीटर के विषय में उस फिल्मी सितारे ने बहुत मासूम सफाई दी कि उसे पाकिस्तानी गाने सुनने का शौक है और क्योंकि भारत में समान्य रेडियो पर पाकिस्तान रेडियो प्रतिबंधित है इसलिए उसने यह रेडियो ट्रांसमीटर अपने घर में रखा है ताकि पाकिस्तानी गाने सुनने का अपना शौक पूरा कर सके.

आप यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि इस बार भी उस फिल्मी सितारे की ही बात को शाश्वत सत्य मान लिया गया. एक जांच कमेटी बनी और उसने भी फिल्मी सितारे के उस वक्तव्य को ही सत्य घोषित कर दिया. यह सवाल कभी पूछा ही नहीं गया, देश को कभी यह बताया ही नहीं गया कि सामान्य नागरिक के लिए पूर्णतया प्रतिबंधित और जिसे रखने पर कठोर दंड का प्रावधान था, वह रेडियो ट्रांसमीटर उस फिल्मी सितारे ने कहां से, कैसे और किस से प्राप्त किया था.?

जबकि सत्य यह है कि देश की सुरक्षा और गुप्तचर जांच एजेंसियों में जिम्मेदार पद पर कार्यरत किसी भी व्यक्ति के अतिरिक्त यदि किसी समान्य नागरिक के पास पाकिस्तान तक पहुंच वाला रेडियो ट्रांसमीटर यदि आज भी बरामद हो जाए तो पुलिस की लाठियों की बरसात उसकी हड्डियों का सत्कार पूरी लगन से करेंगी.

क्या आप जानते हैं कि कौन था वह फिल्मी सितारा, क्या नाम था उस फिल्मी सितारे का…?

तो अब जानिए कि उस फिल्मी सितारे का नाम था… दिलीप कुमार.

वही दिलीप कुमार जिसने उसे मिले सर्वोच्च पाकिस्तानी एवार्ड को वापस करने से उस समय साफ़ मना कर दिया था, जब करगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना द्वारा की गई भारतीय सेना के सैकड़ों सैनिकों की हत्याओं के विरोध में उस फिल्मी सितारे से मांग की गई थी कि… वह पाकिस्तानी एवार्ड को भारतीय विरोध के प्रतीक के रूप में वापस कर दे.

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🏳️ध्यान से पढ़ियेगा👇
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एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि
ये फिल्म अभिनेता (या अभिनेत्री) ऐसा क्या करते हैं कि इनको एक फिल्म के लिए 50 करोड़ ‘–
या 100 करोड़ रुपये मिलते हैं?

सुशांत सिंह की मृत्यु के बाद यह चर्चा चली थी कि
जब वह इंजीनियरिंग का टॉपर था तो फिर उसने फिल्म का क्षेत्र क्यों चुना?

जिस देश में शीर्षस्थ वैज्ञानिकों , डाक्टरों , इंजीनियरों , प्राध्यापकों , अधिकारियों इत्यादि को प्रतिवर्ष 10 लाख से 20 लाख रुपये मिलता हो,
जिस देश के राष्ट्रपति की कमाई प्रतिवर्ष
1 करोड़ से कम ही हो-
उस देश में एक फिल्म अभिनेता प्रतिवर्ष
10 करोड़ से 100 करोड़ रुपए तक कमा लेता है। आखिर ऐसा क्या करता है वह?
देश के विकास में क्या योगदान है इनका? आखिर वह ऐसा क्या करता है कि वह मात्र एक वर्ष में इतना कमा लेता है जितना देश के शीर्षस्थ वैज्ञानिक को शायद 100 वर्ष लग जाएं?

आज जिन तीन क्षेत्रों ने देश की नई पीढ़ी को मोह रखा है, वह है – सिनेमा , क्रिकेट और राजनीति।
इन तीनों क्षेत्रों से सम्बन्धित लोगों की कमाई और प्रतिष्ठा सभी सीमाओं के पार है।

यही तीनों क्षेत्र आधुनिक युवाओं के आदर्श हैं,
जबकि वर्तमान में इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगे हैं। स्मरणीय है कि विश्वसनीयता के अभाव में चीजें प्रासंगिक नहीं रहतीं और जब चीजें
महँगी हों, अविश्वसनीय हों, अप्रासंगिक हों –
तो वह देश और समाज के लिए व्यर्थ ही है,
कई बार तो आत्मघाती भी।

सोंचिए कि यदि सुशांत या ऐसे कोई अन्य
युवक या युवती आज इन क्षेत्रों की ओर आकर्षित होते हैं तो क्या यह बिल्कुल अस्वाभाविक है?
मेरे विचार से तो नहीं।
कोई भी सामान्य व्यक्ति धन , लोकप्रियता और चकाचौंध से प्रभावित हो ही जाता है ।

बॉलीवुड में ड्रग्स वा वेश्यावृत्ति,
क्रिकेट में मैच फिक्सिंग,
राजनीति में गुंडागर्दी – भ्रष्टाचार
इन सबके पीछे मुख्य कारक धन ही है
और यह धन उन तक हम ही पहुँचाते हैं।
हम ही अपना धन फूँककर अपनी हानि कर रहे हैं। मूर्खता की पराकाष्ठा है यह।

*70-80 वर्ष पहले तक प्रसिद्ध अभिनेताओं को
सामान्य वेतन मिला करता था।

*30-40 वर्ष पहले तक क्रिकेटरों की कमाई भी
कोई खास नहीं थी।

*30-40 वर्ष पहले तक राजनीति भी इतनी पंकिल नहीं थी। धीरे-धीरे ये हमें लूटने लगे
और हम शौक से खुशी-खुशी लुटते रहे।
हम इन माफियाओं के चंगुल में फँस कर हम
अपने बच्चों का, अपने देश का भविष्य को
बर्बाद करते रहे।

50 वर्ष पहले तक फिल्में इतनी अश्लील और फूहड़ नहीं बनती थीं। क्रिकेटर और नेता इतने अहंकारी नहीं थे – आज तो ये हमारे भगवान बने बैठे हैं।
अब आवश्यकता है इनको सिर पर से उठाकर पटक देने की – ताकि इन्हें अपनी हैसियत पता चल सके।

एक बार वियतनाम के राष्ट्रपति
हो-ची-मिन्ह भारत आए थे।
भारतीय मंत्रियों के साथ हुई मीटिंग में उन्होंने पूछा –
” आपलोग क्या करते हैं ?”

इनलोगों ने कहा – ” हमलोग राजनीति करते हैं ।”

वे समझ नहीं सके इस उत्तर को।
उन्होंने दुबारा पूछा-
“मेरा मतलब, आपका पेशा क्या है?”

इनलोगों ने कहा – “राजनीति ही हमारा पेशा है।”

हो-ची मिन्ह तनिक झुंझलाए, बोला –
“शायद आपलोग मेरा मतलब नहीं समझ रहे।
राजनीति तो मैं भी करता हूँ ;
लेकिन पेशे से मैं किसान हूँ ,
खेती करता हूँ।
खेती से मेरी आजीविका चलती है।
सुबह-शाम मैं अपने खेतों में काम करता हूँ।
दिन में राष्ट्रपति के रूप में देश के लिए
अपना दायित्व निभाता हूँ ।”

भारतीय प्रतिनिधिमंडल निरुत्तर हो गया
कोई जबाब नहीं था उनके पास।
जब हो-ची-मिन्ह ने दुबारा वही वही बातें पूछी तो प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने झेंपते हुए कहा – “राजनीति करना ही हम सबों का पेशा है।”

स्पष्ट है कि भारतीय नेताओं के पास इसका कोई उत्तर ही न था। बाद में एक सर्वेक्षण से पता चला कि भारत में 6 लाख से अधिक लोगों की आजीविका राजनीति से चलती थी। आज यह संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है।

कुछ महीनों पहले ही जब कोरोना से यूरोप तबाह हो रहा था , डाक्टरों को लगातार कई महीनों से थोड़ा भी अवकाश नहीं मिल रहा था ,
तब पुर्तगाल की एक डॉक्टरनी ने खीजकर कहा था –
“रोनाल्डो के पास जाओ न ,
जिसे तुम करोड़ों डॉलर देते हो।
मैं तो कुछ हजार डॉलर ही पाती हूँ।”

मेरा दृढ़ विचार है कि जिस देश में युवा छात्रों के आदर्श वैज्ञानिक , शोधार्थी , शिक्षाशास्त्री आदि न होकर अभिनेता, राजनेता और खिलाड़ी होंगे , उनकी स्वयं की आर्थिक उन्नति भले ही हो जाए ,
देश की उन्नत्ति कभी नहीं होगी। सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, रणनीतिक रूप से देश पिछड़ा ही रहेगा हमेशा। ऐसे देश की एकता और अखंडता हमेशा खतरे में रहेगी।

जिस देश में अनावश्यक और अप्रासंगिक क्षेत्र का वर्चस्व बढ़ता रहेगा, वह देश दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जाएगा।
देश में भ्रष्टाचारी व देशद्रोहियों की संख्या बढ़ती रहेगी, ईमानदार लोग हाशिये पर चले जाएँगे व राष्ट्रवादी लोग कठिन जीवन जीने को विवश होंगे।

सभी क्षेत्रों में कुछ अच्छे व्यक्ति भी होते हैं।
उनका व्यक्तित्व मेरे लिए हमेशा सम्माननीय रहेगा ।
आवश्यकता है हम प्रतिभाशाली,ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, समाजसेवी, जुझारू, देशभक्त, राष्ट्रवादी, वीर लोगों को अपना आदर्श बनाएं।

नाचने-गानेवाले, ड्रगिस्ट, लम्पट, गुंडे-मवाली, भाई-भतीजा-जातिवाद और दुष्ट देशद्रोहियों को जलील करने और सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से बॉयकॉट करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी हमें।

यदि हम ऐसा कर सकें तो ठीक, अन्यथा देश की अधोगति भी तय है।🙏 आप स्वयं तय करो सलमान खान,आमिर खान,अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, जितेंद्र,हेमा,रेखा, जया देश के विकास में इनका योगदान क्या है हमारे बच्चे मूर्खों की तरह इनको आइडियल बनाए हुए है।

जिसने भी लिखा है शानदार लिखा है। सभी को पढ़ना चाहिए ।

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मीना कुमारी …. फिल्मो में ट्रेजेडी रोल करते करते खुद की जिन्दगी भी ट्रेजेडी बना ली …..

मीना कुमारी की नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं। विधवा हो जाने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं। नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर में भरती हो गईं।

प्रभावती की मुलाकात थिएटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली बख्श से हुई। उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया। अली बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं। खुर्शीद, महजबीं बानों (मीना कुमारी) और तीसरी महलका (माधुरी)।

अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे। घर की नौकरानी से नजरें चार हुईं और खुले आम रोमांस चलने लगा। और मीना कुमारी का बाप अपनी नौकरानी से भी निकाह कर लिया |

मीना कुमारी को कई लोगो से प्यार हुआ .. लेकिन सबने उन्हें इस्तेमाल करके उन्हें छोड़ दिया … धर्मेंद्र, सम्पूरन सिंह उर्फ़ गुलजार, महेश भट्ट, और शौहर कमाल अमरोही … सबने मीना कुमारी का खूब इस्तेमाल किया .. यहाँ तक की मीना कुमारी का बाप भी अपनी बेटी को सिर्फ पैसे कमाने की मशीन ही समझता था और पुरे परिवार का खर्चा मीना कुमारी से ही लेता था .. यहाँ तक की उनकी सभी बहने भी मीना कुमारी से हमेशा पैसे लेती रहती थी |

कमाल अमरोही मीना कुमारी से २७ साल बड़े थे | मीना कुमारी का पूना में एक्सीडेंट हुआ और वो अस्पताल में भर्ती थी ..कमाल अमरोही ने उनकी खूब सेवा की जिससे मीना कुमारी का दिल उस पर आ गया .. और दोनों ने निकाह कर लिया … मजे की बात ये की कमाल अमरोही की पहले से ही दो बेगमे थी ..एक उनके साथ मुंबई में और दूसरी उनके शहर यूपी के अमरोहा में रहती थी .और कमाल के आठ बच्चे थे | मीना कुमारी मुंबई की जिन्दगी से तंग आ गयी थी और कमाल अमरोही से बार बार कहती थी की कमाल तुम मुझे अपने गाँव अमरोहा ले चलो .मै वही रहना चाहती हूँ .. एक बार कमाल उन्हें साथ लेकर गये तो कमाल के घर वालो ने मीना कुमारी से बहुत दुर्व्यवहार किया और कहा कमाल तुमने तो किसी वेश्या से निकाह किया है |

बाद में उनका कमाल अमरोही से तलाक हो गया … फिर उन्होने कमाल से दुबारा निकाह किया …. इस्लामिक नियमो के अनुसार यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को तलाक देता है तो वो दुबारा उस महिला से निकाह नही कर सकता ..पहले उस महिला को किसी अन्य पुरुष से निकाह करना होगा फिर वो पुरुष उसे तलाक देगा फिर वो महिला अपने पूर्व पति से दुबारा निकाह कर सकती है ..
मीना कुमारी ने जीनत अमान के पिता के साथ निकाह किया फिर उनसे तलाक लेकर कमाल अमरोही से दुबारा निकाह किया …लेकिन कमाल निकाह के बाद अपनी जिन्दगी में चला गया |

लेकिन बाद में उन्होंने अपने आपको शराब में डुबो लिया था .. वो हर वक्त शराब पीती रहती थी .. शराब ने उनके लीवर को खत्म कर दिया था और वो मानसिक रूप से एकदम टूट गयी थी ..उन्हें कैंसर हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा |
अस्पताल में ही उनकी मौत हो गयी .. और किसी ने भी उनके ईलाज पर १ रूपये भी नही खर्च किया ..
इसी सभ्य समाज में मशहूर फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी की लाश को लावारिश घोषित करने की नौबत आ गयी थी …उन्हें कैंसर हो गया था कई अंतिम समय में कई महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा था ..और उनकी अस्पताल में ही मौत हो गयी थी

मीना कुमारी के पति कमाल अमरोही ने अस्पताल में कहा की मैंने तो उन्हें तलाक दे दिया था … उसने सौतेले पुत्र ताजदार अमरोही ने कहा की मेरा उनसे कोई वास्ता नही है … उनके छोटी बहन के पति मशहूर कामेडियन महमूद ने कहा की मै क्यों ८०००० दूँ ?

और तो और जिस धर्मेन्द्र को फगवाडा से मुंबई बुलाकर स्टार बनाया वो भी बिल का नाम सुनते ही खिसक गया |

फिर जिस सम्पूरन सिंह कालरा को मीना कुमारी ने झेलम की गलियों से मुंबई बुलाकर “गुलज़ार” बनाया उस गुलज़ार ने कहा की मै तो कवि हूँ और कवि के पास इतना पैसा कहा …जबकि उसी गुलज़ार ने एक मुशायरे में जिसमे मीना कुमारी भी थी कहा था “ये तेरा अक्स है तो पड़ रहा है मेरे चेहरे पर ..वरना अंधेरो में कौन पहचानता मुझे “

हर टीवी चैनेल पर आकर मुस्लिम हितों पर बड़ी बड़ी बाते करने वाला महेश भट्ट बोला मै पैसे क्यों दूँ ?

. जिससे अस्पताल वालो को कहना पड़ा की अब हमे मीना कुमारी जी की लाश को लावारिश घोषित करके बीएमसी वालो को देना पडेगा … जब ये खबर अखबारों में छपी तबएक अनजान पारसी व्यक्ति अस्पताल आया और बिल चुकाकर मीना कुमारी के शव को सम्मान के साथ इस्लामिक विधि से कब्रिस्तान में दफन करवाया

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बॉलिवुड जिहाद

सलीम जावेद लिखित फिल्म में शोले फिल्म में वृद्ध मुसलमान (ए के हंगल) को बेटे की मौत पर नमाज के लिए जाते दिखाते हैं तो नायक वीरू (धर्मेन्द्र) को शिव मन्दिर में लडकी छेड़ते हुए दिखाना. अभी मैन्फोर्स कडोम के विज्ञापन में मंदिर दिखाना और वृद्ध महिला का अश्लील वार्तालाप सभी हिन्दू धर्मगुरुओं के मुंह पर तमाचा है

बालीवुड‬ और टीवी सीरियल के नजरिए से ‪हिन्दू‬ को कैसे देखा जाता है एक झलक:—-
ब्राह्मण – ढोंगी पंडित, लुटेरा,
‪राजपूत* – अक्खड़, मुच्छड़, क्रूर, बलात्कारी
वैश्य या साहूकार – लोभी, कंजूस,
गरीब हिन्दू दलित – कुछ पैसो या शराब की लालच में बेटी को बेच देने वाला चाचा या झूठी गवाही देने वाला
जाट* खाप पंचायत का अड़ियल बेटी और बेटे के प्यार का विरोध करने वाला और महिलाओ पर अत्याचार करने वाला

जबकि दूसरी तरफ
मुस्लिम – अल्लाह का नेक बन्दा, नमाजी, साहसी, वचनबद्ध, हीरो-हीरोइन की मदद करने वाला टिपिकल रहीम चाचा या पठान।
ईसाई – जीसस जैसा प्रेम, अपनत्व, हर बात पर क्रॉस बना कर प्रार्थना करते रहना।
ये बॉलीवुड इंडस्ट्री, सिर्फ हमारे धर्म, समाज और संस्कृति पर घात करने का सुनियोजित षड्यंत्र है और वह भी हमारे ही धन से ।

सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा.
इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.
“दीवार”* का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है.
जंजीर”* में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.
फिल्म “शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है.

क्या आपको बालीवुड की वे फिल्मे याद हैं जिनमे फादर को दया और प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप दिखाया जाता था तो हिन्दू सन्यासियों को अपराधी. जो मिडिया आशाराम पर पागल हो गया था वह आज चुप है. बॉलीवुड प्राय: सदा फिल्मों में हिन्दू पात्रों के नाम वाले कलाकारों को किसी इस्लामिक मज़ार या चर्च में प्रार्थना करते दिखाता हैं।
किसी मुसलिम या ईसाई पात्र को कभी किसी हिन्दू मंदिर में जाकर प्रार्थना करता दिखाना तो बहुत दूर की बात हैं। इसके विपरीत वह सदा हिन्दू मान्यताओं का परिहास जैसे पंडित को या भगवान की मूर्ति को रिश्वत देना, शादी के फेरे जल्दी जल्दी करवाना, मंदिर में लड़कियाँ छेड़ना, हनुमान जी अथवा श्री कृष्णा जैसे महान पात्रों के नाम पर चुटकुले छोड़ना आदि आदि दिखाता हैं। परिणाम यह निकलता है कि हिन्दुओं के लड़के लड़कियां हिन्दू धर्म को ही कभी गंभीरता से लेना बंद कर देते है।
22 साल पहले गुलशन कुमार सरे आम गोलियों से मार दिया गया क्योंकि इन्होंने दाऊद जैसे गुण्डो के आगे झुकने से मना कर दिया था। ये बॉलीवुड के इस्लामी करण में बहुत बड़ी बाधा थे। यह वह हिन्दू व्यापारी था जो अपना आयकर भरता था। कुछ वर्ष तक भारत का सबसे बड़ा आयकर देने वाला व्यक्ति रहा । क्योकि इसने दाऊद के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया था इसलिए इसे जान से मार दिया गया। परंतु न तो भारत सरकार इसके कत्ल के आरोपी नदीम को भारत ला पाई और न ही इसके परिवार को न्याय मिला।

गुलशन कुमार की हत्या के ठीक 6 महीने बाद 1998 में साईं नाम के एक नए भगवान् का अवतरण हुआ, इसके कुछ समय बाद 1999 में बीवी नंबर 1 फिल्म आई जिसमे साईं के साथ पहली बार राम को जोड़कर ॐ साईं राम गाना बनाया था, न किसी हिन्दू संगठन का इस पर ध्यान गया और न किसी ने इस पर आपत्ति की, पहला षड्यंत्र कामयाब

इस नए भगवान् की एक खासियत थी, इसे लोग धर्मनिरपेक्ष अवतार कहते थे, जिसने हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया था, वो अलग बात है की उसी चिलम बाबा उर्फ़ साईं बाबा के समय में कई दंगे हुए, बंगाल विभाजन हुआ, मोपला दंगे हुए, मालाबार में हजारो हिन्दुओ को काटा और साईं के अल्लाह का भक्त बना दिया गया, अब इस नए भगवान् की एक और खासियत थी, नाम हिन्दुओ का प्रयोग हो रहा था और जागरण में अल्लाह अल्लाह गाया जा रहा था
हिन्दुओं की संतानों की स्थिति अर्ध नास्तिक जैसी हो जाती है। जो केवल नाममात्र का हिन्दू बचता है। परन्तु उसका हिन्दू समाज की मान्यताओं एवं धर्मग्रंथों में कोई श्रद्धा नहीं रहती। ऐसी ही संतानें लव जिहाद और ईसाई धर्मान्तरण का शिकार बनती हैं।

क्या इसे हम बॉलीवुड जिहाद कहे तो कैसा रहेगा?

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