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शबाना आज़मी के पिता कैफ़ी आज़मी ने पाकिस्तान के निर्माण का जश्न मनाते हुए कविताएँ लिखीं। कैफ़ी आज़मी विभाजन के समर्थक थे और उन्होंने विभाजन से ठीक पहले एक कविता लिखी थी “अगली ईद पाकिस्तान में”।
इप्टा (इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन) कम्युनिस्ट पार्टी का सांस्कृतिक मोर्चा था। शबाना आज़मी इप्टा की सक्रिय एक्टिविस्ट हैं।
कैफ़ी और साहिर लुधियानवी जैसे लेखकों की कम्युनिस्ट विचारधारा ने पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन किया। दरअसल साहिर करीब 6-7 महीने पाकिस्तान में रहे।

नसीरुद्दीन शाह के पिता ‘न्यू मदीना’ (पाकिस्तान) के पक्ष में कविताएँ लिख रहे थे और भाषण दे रहे थे।

जावेद अख्तर के परदादा मौलाना फजले हक खैराबादी ने 1855 में अयोध्या में प्रसिद्ध हनुमान गढ़ी मंदिर पर कब्जा करने और उसे गिराने के लिए फतवा दिया था।

नसीरुद्दीन शाह के परिवार, उनके परदादा जन-फिशन खान ने 1857 में अंग्रेजों का समर्थन किया। उन्हें सरधना में एक जागीर और एक हज़ार रुपये की पेंशन मिली। 1000 रुपये उन दिनों बहुत बड़ी धनराशि थी। उनके पिता अली मोहम्मद शाह यूपी के बहराइच से मुस्लिम लीग के सदस्य थे। उन्होंने पाकिस्तान को वोट दिया।
मजरूह सुल्तानपुरी ने भी पाकिस्तान की महानता पर कविताएँ लिखीं।

“पाकिस्तान की विचारधारा” शब्द का प्रयोग पहली बार याह्या खान के सूचना मंत्री मेजर जनरल शेर अली खान पटौदी द्वारा किया गया था। क्या आप जानते हैं कौन है ये पटौदी? जी हां, सैफ अली खान पटौदी के अंकल। सैफ के दादा यहाँ भारत में क्यों रुके थे? क्योंकि उनके पास यहां बड़ी संपत्ति थी। सैफ के परदादा मेजर जनरल इसफंदयार अली खान पटौदी आईएसआई के डिप्टी डायरेक्टर थे। एक और रिश्तेदार मेजर जनरल शेर अली पटौदी पाक सेना में जनरल स्टाफ के प्रमुख थे। एक और …. शहरयार अली पटौदी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष थे।
बॉलीवुड ऐसे बदमाशों से भरा पड़ा है। हमें इस बॉलीवुड का पुनर्निर्माण करने से पहले इसका पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए।
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किशोर कुमार


किशोर कुमार से नफ़रत करने वाले नौशाद

एक दिन पहले किशोर दा की जन्मवार्षिकी थी। मैं किशोर दा पर पहले लिख चुका हूं। उनके अलग-अलग गानों पर भी भाव व्यक्त करता रहा हूं। वह लिखे जाने का अच्छा सा वैविध्यपूर्ण गायन-वितान छोड़ कर गए हैं। आज किशोर कुमार के लिए अलग विषय चुना है।हम में से अधिकांश संगीत प्रेमी इस सत्य से परिचित नहीं हैं कि नौशाद ने अपने जीवन में किशोर दा से कोई गाना नहीं गवाया था। 1975 की एक फिल्म में उन्होंने किशोर-आशा का एक युगल गीत रिकॉर्ड करवाया था। जिसे सिनेमा में शामिल नहीं किया गया। फिल्म के शो रील में गायक किशोर कुमार का नाम भी नहीं आता है। उसे कथित महान संगीतकार नौशाद ने प्रोड्यूसर को यह कह कर हटवा दिया था कि रिकार्ड ठीक नहीं हुआ।

नौशाद ने किशोर कुमार की यह उपेक्षा क्यों की? या एक गाना रिकॉर्ड कर उसे फिल्म से हटा देने तक का अतिवादी कार्य क्यों किया? इसलिए कि किशोर दा अक्षम गायक थे? इसलिए कि नौशाद की बनाई धुनों में किशोर के लिए स्पेस नहीं थी? नहीं! इसलिए कि नौशाद किशोर से बेइंतहा घृणा करते थे। इस घृणा का कारण बताना आवश्यक नहीं है। स्वत: स्पष्ट है।‌ अपने प्रिय साहब के सामने उनके ही कद का दूसरा गायक उन्हें स्वीकार न था। ध्यान रहे, नौशाद ने मन्ना दा जैसे शास्त्रीय संगीत में सिद्ध गायक को भी बहुत कम अवसर दिए। कुछ गानों के लिए मन्ना दा को बुलाना उनकी विवशता थी।

किशोर कुमार के प्रति नौशाद की कुंठा के चरम का भी पता चलता है। १९८५ में मध्यप्रदेश सरकार ने संस्कृति सम्मान के लिए एक ज्यूरी गठित की। जिसमें प्रीतीश नंदी, महान गायक कुमार गंधर्व और नौशाद आदि शामिल थे। मंच से जैसे ही खंडवा के किशोर कुमार को चुने जाने का निर्णय हुआ। तमतमाए हुए नौशाद मियां मंच छोड़कर चले गए। यह बात प्रीतीश नंदी ने स्वयं लिखी है। जबकि कुमार गंधर्व जैसे महान गायक किशोर दा के नाम पर प्रसन्न थे। आप कल्पना कीजिए– कोई लब्धप्रतिष्ठ संगीतकार कितना नीचे गिर सकता है। उसमें इतना धैर्य, इतनी शिष्टता भी नहीं थी कि वह एक सरकारी सार्वजनिक फोरम की गरिमा का सम्मान करता।

नौशाद की इस कुंठा का एक ही उत्तर है मेरे पास। वह एक अत्यंत खराब मनुष्य थे। संकुचित और धर्मान्ध। एक दो वर्ष पहले भी मैंने इस पटल पर लिखा था कि जरा पता कीजिए–कथित महान नौशाद ने मन्ना दा जैसे समर्थ गायक को कितने मौके दिए। और मैं अपने इस प्राचीन मत पर आज तक कायम हूं कि नौशाद ने साहब के लिए जो भी चीखने चिल्लाने वाले महान गाने रचे थे, वो गाने परिशुद्ध सांगीतिक आभामंडल को नहीं रच पाते। एक सनसनी पैदा कर बुझ जाते हैं। सुर ना सजे में मन्ना दा गायन की जिस ऊंचाई को छूते हैं, वह साहब के लिए अलभ्य ही रही। हां, उन्होंने हाथ पांव खूब मारे। मैं इस सत्य से इन्कार नहीं करता कि उन्होंने कुछ गाने बहुत बढ़िया गाए हैं।

पुनः मूल विषय पर लौटता हूं। हिन्दी सिनेमा में यह भेदभाव या सूक्ष्म और खुला हिन्दू विरोध कोई नयी घटना नहीं है। नौशाद ने अपने झूठे व्यक्तित्व को कितने आवरण से छुपाए रखा। हालांकि नौशाद के द्वारा किशोर कुमार की उपेक्षा या किशोर-घृणा से किशोर दा के करियर पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपनी सारी सीमाओं के साथ एक विस्तृत हृदयभूमि पर विजय प्राप्त करते हैं। पुरुष गायकों में से कोई भी उतनी बड़ी हृदयभूमि का स्वामी नहीं है। किशोर की आवाज दौर और युग का संतरण करती है। उसमें बुढ़ापा नहीं है। वह उनके अंतिम वर्षों में कुछ बोझिल अवश्य हो जाती है किन्तु उसमें जैसा मेल हीरोइक गुणधर्म और कोमलता एक साथ है, वैसा किसी और गायक की आवाज में नहीं।

देवांशु झा

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मिना कुमारी


मीना कुमारी …. फिल्मो में ट्रेजेडी रोल करते करते खुद की जिन्दगी भी ट्रेजेडी बना ली …..

मीना कुमारी की नानी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी थी, जो जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही प्यारेलाल नामक युवक के साथ भाग गई थीं। विधवा हो जाने पर उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। दो बेटे और एक बेटी को लेकर बम्बई आ गईं। नाचने-गाने की कला में माहिर थीं इसलिए बेटी प्रभावती के साथ पारसी थिएटर में भरती हो गईं।

प्रभावती की मुलाकात थिएटर के हारमोनियम वादक मास्टर अली बख्श से हुई। उन्होंने प्रभावती से निकाह कर उसे इकबाल बानो बना दिया। अली बख्श से इकबाल को तीन संतान हुईं। खुर्शीद, महजबीं बानों (मीना कुमारी) और तीसरी महलका (माधुरी)।

अली बख्श रंगीन मिजाज के व्यक्ति थे। घर की नौकरानी से नजरें चार हुईं और खुले आम रोमांस चलने लगा। और मीना कुमारी का बाप अपनी नौकरानी से भी निकाह कर लिया |

मीना कुमारी को कई लोगो से प्यार हुआ .. लेकिन सबने उन्हें इस्तेमाल करके उन्हें छोड़ दिया … धर्मेंद्र, सम्पूरन सिंह उर्फ़ गुलजार, महेश भट्ट, और शौहर कमाल अमरोही … सबने मीना कुमारी का खूब इस्तेमाल किया .. यहाँ तक की मीना कुमारी का बाप भी अपनी बेटी को सिर्फ पैसे कमाने की मशीन ही समझता था और पुरे परिवार का खर्चा मीना कुमारी से ही लेता था .. यहाँ तक की उनकी सभी बहने भी मीना कुमारी से हमेशा पैसे लेती रहती थी |

कमाल अमरोही मीना कुमारी से २७ साल बड़े थे | मीना कुमारी का पूना में एक्सीडेंट हुआ और वो अस्पताल में भर्ती थी ..कमाल अमरोही ने उनकी खूब सेवा की जिससे मीना कुमारी का दिल उस पर आ गया .. और दोनों ने निकाह कर लिया … मजे की बात ये की कमाल अमरोही की पहले से ही दो बेगमे थी ..एक उनके साथ मुंबई में और दूसरी उनके शहर यूपी के अमरोहा में रहती थी .और कमाल के आठ बच्चे थे | मीना कुमारी मुंबई की जिन्दगी से तंग आ गयी थी और कमाल अमरोही से बार बार कहती थी की कमाल तुम मुझे अपने गाँव अमरोहा ले चलो .मै वही रहना चाहती हूँ .. एक बार कमाल उन्हें साथ लेकर गये तो कमाल के घर वालो ने मीना कुमारी से बहुत दुर्व्यवहार किया और कहा कमाल तुमने तो किसी वेश्या से निकाह किया है |

बाद में उनका कमाल अमरोही से तलाक हो गया … फिर उन्होने कमाल से दुबारा निकाह किया …. इस्लामिक नियमो के अनुसार यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी को तलाक देता है तो वो दुबारा उस महिला से निकाह नही कर सकता ..पहले उस महिला को किसी अन्य पुरुष से निकाह करना होगा फिर वो पुरुष उसे तलाक देगा फिर वो महिला अपने पूर्व पति से दुबारा निकाह कर सकती है ..
मीना कुमारी ने जीनत अमान के पिता के साथ निकाह किया फिर उनसे तलाक लेकर कमाल अमरोही से दुबारा निकाह किया …लेकिन कमाल निकाह के बाद अपनी जिन्दगी में चला गया |

लेकिन बाद में उन्होंने अपने आपको शराब में डुबो लिया था .. वो हर वक्त शराब पीती रहती थी .. शराब ने उनके लीवर को खत्म कर दिया था और वो मानसिक रूप से एकदम टूट गयी थी ..उन्हें कैंसर हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा |
अस्पताल में ही उनकी मौत हो गयी .. और किसी ने भी उनके ईलाज पर १ रूपये भी नही खर्च किया ..
इसी सभ्य समाज में मशहूर फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी की लाश को लावारिश घोषित करने की नौबत आ गयी थी …उन्हें कैंसर हो गया था कई अंतिम समय में कई महीनों तक अस्पताल में रहना पड़ा था ..और उनकी अस्पताल में ही मौत हो गयी थी

मीना कुमारी के पति कमाल अमरोही ने अस्पताल में कहा की मैंने तो उन्हें तलाक दे दिया था … उसने सौतेले पुत्र ताजदार अमरोही ने कहा की मेरा उनसे कोई वास्ता नही है … उनके छोटी बहन के पति मशहूर कामेडियन महमूद ने कहा की मै क्यों ८०००० दूँ ?

और तो और जिस धर्मेन्द्र को फगवाडा से मुंबई बुलाकर स्टार बनाया वो भी बिल का नाम सुनते ही खिसक गया |

फिर जिस सम्पूरन सिंह कालरा को मीना कुमारी ने झेलम की गलियों से मुंबई बुलाकर “गुलज़ार” बनाया उस गुलज़ार ने कहा की मै तो कवि हूँ और कवि के पास इतना पैसा कहा …जबकि उसी गुलज़ार ने एक मुशायरे में जिसमे मीना कुमारी भी थी कहा था “ये तेरा अक्स है तो पड़ रहा है मेरे चेहरे पर ..वरना अंधेरो में कौन पहचानता मुझे “

हर टीवी चैनेल पर आकर मुस्लिम हितों पर बड़ी बड़ी बाते करने वाला महेश भट्ट बोला मै पैसे क्यों दूँ ?

. जिससे अस्पताल वालो को कहना पड़ा की अब हमे मीना कुमारी जी की लाश को लावारिश घोषित करके बीएमसी वालो को देना पडेगा … जब ये खबर अखबारों में छपी तबएक अनजान पारसी व्यक्ति अस्पताल आया और बिल चुकाकर मीना कुमारी के शव को सम्मान के साथ इस्लामिक विधि से कब्रिस्तान में दफन करवाया

अरुण शुक्ला

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भारत में लगे आपातकाल की ऐनिवर्सरी है- सोचा आपको कुछ मज़ेदार तथ्यों से अवगत करा दें।

नोट- जो लोग मेरी पोस्ट पिछले वर्ष से पढ़ रहे है वो जानते होंगे संजय गांधी मामलों का विशेषज्ञ हूँ।

शाहरुख़ खान की अम्मी जान लतीफ़ फ़ातिमा दिल्ली की एक मजिस्ट्रेट थी और रूखसना सुल्तान की सहेली। आपात काल में कई ऑर्डर इन्होंने दिए थे। संजय और इंदिरा के काफ़ी क़रीब थी शाहरुख़ की महतारी।

रूखसना सुल्तान की बेटी अमृता सिंह शाहरुख़ का ख़याल रखती थी जब दोनो की अम्मियाँ संजय गांधी के काम पर होती आपातकाल में।

शाहरुख़ की पहली फ़िल्म होनी थी राजू बन गया जेंटल्मन जिसमें अमृता सिंह भी थी।

फ़ोटो में – लतीफ फ़ातिमा इंदिरा के साथ!
गुरु Mann Jee की वाल से साभार।

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देविका रानी


जब भारत की प्रसिद्ध अभिनेत्री ने प्रसिद्ध रूसी चित्रकार से ब्याह किया

देविका रानी और स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ के जादुई जीवन पर एक नजर

रूसी चित्रकार स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ से विवाह करने से पहले देविका रानी एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री, फ़िल्म निर्माता और गायिका के रूप में स्थापित हो चुकी थीं। करीब पाँच दशकों तक रूसी और भारतीय कलाकारों की यह जोड़ी भारत के कला और सांस्कृतिक परिदृश्य पर छाई रही।

मसक्वा स्थित पूर्वी देशों के कला-संग्रहालय को देखने के लिए आने वाले किसी भी भारतीय दर्शक का ध्यान तुरन्त ही संग्रहालय में रखी एक पेण्टिंग की ओर आकर्षित हो जाता है, जिसमें एक बेहद ख़ूबसूरत और प्रभावशाली महिला साड़ी में दिखाई दे रही है। हम में से बहुत से लोग भारत को आज़ादी मिलने के बरसोंं बाद पैदा हुए, इसलिए हम इस पेण्टिंग में चित्रित महिला को तुरन्त नहीं पहचान पाते। यह देविका रानी रेरिख़ का तैलचित्र है, जिसे रचा है उनके रूसी चित्रकार पति स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ ने। देविका रानी को लोग आज भी भारतीय फ़िल्म जगत की उस पहली महिला के रूप में जानते हैं, जिन्हें अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जाना-पहचाना गया था।

देविका रानी उन दिनों लन्दन में पढ़ रही थीं, जब अचानक उनकी मुलाक़ात भारतीय फ़िल्म-निर्माता हिमांशु राय से हुई। हिमांशु राय को पहली ही नज़र में लड़की पसन्द आ गई और उन्होंने देविका रानी के सामने विवाह करने का प्रस्ताव रख दिया। हिमांशु राय से विवाह करके देविका रानी मुम्बई आ गईं और फ़िल्मों में अभिनय करने लगीं। फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार और देविका रानी की जोड़ी हिट हो गई और दोनों अक्सर एक साथ फ़िल्मों में दिखाई देने लगे। बाद में देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ मिलकर बॉम्बे टाकीज की स्थापना की और बॉम्बे टाकीज के बैनर तले फ़िल्में बनाने लगे। 1940 में हिमांशु राय का देहान्त हो गया। इसके बाद देविका रानी अकेले ही बॉम्बे टाकीज का कामकाज देखने लगीं और उन्होंने एक से एक बढ़कर लोकप्रिय फ़िल्में बनाईं।

1933 में भारत की पहली बोलती फ़िल्म ’कर्मा’ में काम करके देविका रानी ने एक नया रास्ता खोला। इसी फ़िल्म में उन्होंने पहली बार अँग्रेज़ी में एक गीत भी गाया।

अमर प्रेम

1943 में परदे पर आई ’हमारी बात’ देविका रानी की आख़िरी फ़िल्म थी, जिसमें उन्होंने अभिनय किया था। इसी फ़िल्म में उन्होंने राज कपूर नाम के एक नए और अनजान अभिनेता को भी एक छोटी-सी भूमिका दी थी। इसके एक साल बाद जब वे दिलीप कुमार की पहली फ़िल्म ’ज्वार-भाटा’ बना रही थीं, तभी उनकी मुलाक़ात रूसी चित्रकार स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ से हुई।

स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ के पिता निकलाई रेरिख़ दुनिया के एक जाने-माने चित्रकार, लेखक और दार्शनिक थे, जिन्हें रहस्यवादी चित्रकार और लेखक माना जाता था।

देविका रानी अपनी फ़िल्मों के सेट बनवाने के लिए किसी अनूठे और अनोखे चित्रकार की तलाश कर रही थीं। और उनकी यह तलाश स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ के स्टूडियो में पहुँचकर पूरी हुई। इस नई खोज ने तो जैसे उनके जीवन की धारा ही बदल दी। देविका रानी और स्वितअस्लाफ़ दोनों एक-दूसरे पर फ़िदा हो गए और एक साल के भीतर-भीतर उन्होंने विवाह कर लिया।

शक्ति सिंह चन्देल ने बताया — कुल्लू के लोगों ने बड़ी धूमधाम से दोनों के विवाह का उत्सव मनाया। कुल्लू घाटी के 365 देवताओं के प्रतिनिधि देविका रानी का स्वागत करने के लिए आए थे। कुल्लू के स्थानीय निवासी हर्षोल्लास से गा-बजा रहे थे और झूम-झूमकर नाच रहे थे। जिस पालकी में बैठकर देविका रानी अपनी ससुराल पहुँची, उस पर लगातार फूल बरसाए जा रहे थे।

विवाह के बाद देविका रानी ने फ़िल्मों को और अपने फ़िल्मी करियर को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी और वे कुल्लू घाटी में आकर रहने लगीं। लेकिन उन्होंने बस, चार बरस ही कुल्लू में बिताए। उसके बाद रेरिख़ दम्पती हमेशा के लिए बेंगलुरु चले गए। लेकिन कुल्लू घाटी के अनुपम दृश्य-चित्र और कुल्लू के लोगों की सरल-सहृदय छवि देविका रानी के हृदय में हमेशा के लिए अंकित हो गई।

देविका रानी ने पिछली सदी के नौवें दशक में अपनी पुरानी स्मृतियों में डूबते हुए लिखा था — कुल्लू में स्वितअस्लाफ़ का घर था। वहाँ उनके अपने लोग रहते थे। वहाँ उनके माता-पिता रहते थे — प्रोफ़ेसर रेरिख़ और मादाम रेरिख़। वहाँ उनका भाई जार्ज रेरिख़ रहता था। कुल्लू के सुन्दर दृश्य भुलाए नहीं भूलते… अनूठा हिमालय,,, हिमपात और फिर वसन्तकाल में खिलने वाले वे मनोहर अद्भुत्त फूल… वहाँ हमारा घर था, मेरा घर। पूरे घर में मुझे घर की दुलारी और प्यारी बिटिया की तरह प्यार किया जाता था और स्वितअस्लाफ़ पति होने के साथ-साथ मेरा एक बेहतरीन दोस्त भी बन गया था।

तातागुनी जागीर

रेरिख़ दम्पती ने 1949 में कुल्लू छोड़ दिया और वे बेंगलुरु के बाहरी इलाके में बनी तातागुनी जागीर में जाकर बस गए।

अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ स्मारक ट्रस्ट ने देविका रानी का परिचय इस तरह दिया है — स्वितअस्लाफ़ के लिए जनसम्पर्क का सारा काम देविका ने सँभाल लिया था। वे भारत में और विदेशों में उनके चित्रों की प्रदर्शनियों का आयोजन किया करती थीं। उन्होंने ही कुल्लू के पास नग्गर में रेरिख़ जागीर में निकलाय और स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ की कला दीर्घा की स्थापना की। उनसे मिलने वाले लगातार समर्थन और प्रेरणा की वजह से ही स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ अपना ध्यान चित्र बनाने की ओर केन्द्रित रख सके और उन्होंने हिमालय की छवियों और दक्षिण भारतीय परिदृश्यों को समर्पित अद्भु‍त्त चित्र-शृंखलाएँ बनाईं। उन्होंने देविका रानी की ऐसी अद्भुत्त शबीहें (पोर्ट्रेट) बनाईं, जिनमें देविका रानी के प्रति उनका भरपूर प्यार और स्नेह छलकता है।

स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ ने भारत की नागरिकता ले ली थी और उन्होंने अपना सारा जीवन बेंगलुरु में ही बिताया। भारतीय लोगों के बीच स्वितअस्लाफ़ इतने ज़्यादा लोकप्रिय थे कि भारत की संसद के केन्द्रीय हाल में भारत के राजनेताओं की उनके द्वारा बनाई गई तीन शबीहें लगी हुई हैं। ये शबीहें हैं — पण्डित जवाहरलाल नेहरू का पोर्ट्रेट, श्रीमती इन्दिरा गाँधी का पोर्ट्रेट और सर्वपल्ली राधाकृष्ण का पोर्ट्रेट।

हालाँकि रेरिख़ दम्पती एकान्तप्रिय थे और बहुत कम कहीं आते-जाते थे, लेकिन फिर भी वे बेंगलुरु के सांस्कृतिक और कला परिदृश्य में इतना ज़्यादा महत्व रखते थे कि उनके बिना बेंगलुरु की कोई भी सांस्कृतिक सन्ध्या अधूरी लगती थी। रेरिख़ दम्पती ने बेंगलुरु की एक मुख्य सांस्कृतिक संस्था — कर्नाटक चित्रकला परिषद — की स्थापना और उसका विकास करने में अपनी पूरी ऊर्जा और अपना पूरा जीवन लगा दिया।

देविका रानी अपने समय की सबसे ख़ूबसूरत महिला थीं

’बैंगलोर मिरर’ समाचारपत्र से बात करते हुए रेरिख़ परिवार के एक मित्र आर० देवदास ने कहा — उनसे मेरा परिचय, बस, यूँ ही हो गया था, लेकिन बाद में हमारे परिवारों के बीच गहरी मित्रता हो गई। हालाँकि देविका जी और डॉक्टर रेरिख़ अपने ही कामों में बेहद व्यस्त रहा करते थे। लेकिन फिर भी इतना तो कहना ही चाहिए कि डॉक्टर रेरिख़ एक अनूठे इनसान थे और देविका जी अपने ज़माने की सबसे ख़ूबसूरत औरत।

पिछली सदी के आख़िरी दशक में देविका जी और रेरिख़ बहुत बीमार रहने लगे थे। फिर कुछ लोगों ने उनके घर चोरियाँ कीं और उनकी सम्पत्ति पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ 1993 में गुज़रे और उनकी मौत के एक साल बाद देविका रानी ने भी यह दुनिया छोड़ दी। इस दम्पती के कोई सन्तान न थी। उनकी सम्पत्ति पर विवाद हुआ और मुक़दमेबाज़ी होने लगी। आख़िरकार भारत के उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक सरकार के पक्ष में अपना फ़ैसला दिया और 468 एकड़ वाली तातागुनी जागीर कर्नाटक की सरकार को सौंप दी गई।

उपसंहार

कर्नाटक सरकार तातागुनी जागीर को एक ऐसे संग्रहालय और सांस्कृतिक केन्द्र में बदलने के लिए काम कर रही है, जहाँ स्वितअस्लाफ़ रेरिख़ के चित्रों की अलग से एक कला दीर्घा बनी होगी। हम सिर्फ़ यही आशा कर सकते हैं कि तातागुनी जागीर के पुराने रूप और स्वरूप को सुरक्षित रखा जाएगा ताकि यहाँ भी रेरिख़ परिवार की आत्मा वैसे ही गूँजती रहे, जैसे कुल्लू घाटी में बने रेरिख़ स्मारक में गूँजती है।

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एक गाज़ी और लौंडी का अफसाना है तैमूर और जहांगीर


आज कल सैफ अली खान और करीना खान(कपूर) के दूसरे बेटे के जहांगीर नामकरण को लेकर बड़ी चर्चा है। मुझे सैफ द्वारा पहला तैमूर और दूसरा जहांगीर निकालना समझ आता है क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं का शासक होना और हिंदुओ को गुलाम समझना, यह सैफ अली खान के डीएनए में है। उसकी विरासत गज़वा-ए-हिन्द की जेहनियत से जुड़ी है। उसकी नसों में वह अफगानी इस्लामिया खून आज भी दौड़ रहा है जिसके के लिए हिन्दू काफिरों पर अपना धर्म मुसल्लत करना व उन पर हुक्म करना, आसमानी फरमान है। सैफ के पूर्वज क्वेटा(उस वक्त अफगानिस्तान में) के थे और इस्लाम के प्रसार में लगे थे। आज के भारत मे इनका आना 15 वी शताब्दी में हुआ था जब दिल्ली के अफगानी सुल्तान बहालुल लोदी ने उसके पूर्वज, सलामत खान भड़ैंच को दिल्ली के आसपास के मेवाती लोगों को काबू करने के लिए बुलाया था।

अफगानों के बाद जब मुगल आये तो इस सलामत खान ने मुगलों को चढ़ता सूरज समझ, अफगानियों से किनारा कर लिया और बाबर की बादशाहत कबूल कर ली। उसके बाद से ही इस परिवार का एक ही मूल मंत्र रहा है की जो भी शक्तिशाली है या जो भी दिल्ली पर बैठा है उसको अपनी सेवा देना।

19 वी शताब्दी के आते आते इस परिवार ने यह समझ लिया था कि भारत मे नई शक्ति अंग्रेज है और देर सबेर दिल्ली पर अंग्रेज हुक्मरान ही बैठेंगे, इसलिये इनके एक पूर्वज अलफ खान, मैं परिवार के, तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी के कमांडर इन चीफ लार्ड जेरार्ड लेक को सलामी बजा आये और अपने परिवार की सेवाएं समर्पित कर दी। इस परिवार ने अग्रेजो की तरफ से होलकर और मराठों से युद्ध किया और इसके इनाम स्वरूप लॉर्ड जेरार्ड लेक ने 1804 में उनके बेटे फैज तलब खान को पटौदी की जागीर दी। ऊसी के बाद से ही 137 वर्ग किलोमीटर की यह जागीर पटौदी में नवाब पैदा होने लगे।

जब भारत 1947 मे स्वतंत्र हुआ तब पटौदी के नवाब इफ्तिखार अली खान थे जो की क्रिकेट के मशहूर खिलाड़ी थे और भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान भी थे। इस पटौदी रियासत का 1948 में जब भारत मे विलय हो गया तब भी इस परिवार ने अपनी खानदानी परिपाटी नही छोड़ी और दिल्ली के नए शासक भूरे अंग्रेज जवाहर लाल नेहरू को शीशे में उतारने में पीछे नही रहे। गंगा जमुनी तहजीब और सेक्युलरिज़्म की नई परिभाषा गढ़ते हुये भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तो विशेष रूप से मुस्लिम अशरफिया वर्ग के प्रति संवेदनशील थे और वे इस पटौदी परिवार से कितना करीब थे इसका पता इस बात से लगता है कि जब जनवरी 1952 में इफ्तिखार अली खान की सिर्फ 42 वर्ष की ही आयु में पोलो के खेल में घायल हो कर अकाल मृत्यु हो गई थी तो हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री भूरे अंग्रेज जवाहर लाल नेहरू ने, इफ्तिखार अली खान की सिर्फ 37 वर्ष में विधवा हुई साजिदा सुल्तान, जो नवाब भोपाल की बेटी भी थी, को लुटियंस दिल्ली में, एक ‘समाजसेविका’ के रूप में त्यागराज मार्ग पर एक बंगला आवंटित कर दिया था। इसके बाद से इस परिवार का केंद्रबिंदु 2003 तक, जब तक साजिदा सुल्तान ज़िंदा रही, यही लुटियंस बंगला रहा।

मुझे सैफ अली खान के परिवार के इतिहास को इतना विस्तार से इसलिये बताना पड़ा ताकि लोग, सैफ अली खान की मानसिकता व अपने बेटों का नाम तैमूर व जहांगीर नाम रखने के उसके मनोविज्ञान को समझ सके। वो आज भी अफगानिस्तान से उतर, भारत को लूटने और काफिरों(हिंदुओं) पर राज करने की इस्लामिक कबीलाई मानसिकता को ओढ़े हुये है। उसके अवचेतन मन मे यह बात जड़ पकड़े हुए है कि हिंदुओं का स्त्रीवर्ग उनकी लौंडी है और उनको गुलाम बना उनपर राज करना, उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।

यहां यह उत्सुकता अवश्य होती है कि सैफ की मानसिकता और उसके अवचेतन मन के मनोविज्ञान को तो समझा जासकता है लेकिन करीना कपूर का तैमूर और जहांगीर की माँ बनने का मनोविज्ञान क्या है? कोई हिन्दू स्त्री स्वतः एक बांदी, एक लौंडी बन, अपने बेटों के हिंदुहन्ता प्रतीकों से हुये नामकरण से सहज हो सकती है?

मैने इसपर काफी विचार किया और पाया कि हिंदुओं में यह करीना कपूर कोई अपवाद नही है बल्कि यह हिन्दू मुस्लिम का झालमेल बहुत पुराना है। भारत मे हिंदुओं को मुसलमान बनाना या फिर दिल्ली में मुगलों का जब तक ह्रास नही होगया, शासकों के प्रश्रय में जबरन धर्मांतरण कराया जाना होता रहा है लेकिन भारत की मुख्यभूमि में यह कभी भी सामाजिक स्तर पर स्थापित नही हो पाया था। लेकिन इसके विपरीत भारत का वह भाग, जहां से हिन्दू स्वयं शनय शनय विस्थापित हुआ है, वहां इसका समाजीकरण जरूर हुआ है।मेरा अनुभव रहा है की अखंडित भारत के पश्चिमोत्तर भाग व उत्तर में काश्मीर के हिंदुओं में, अपने इस्लामिक हंताओ के प्रति विशेष अनुराग और उनके साथ सहज रूप से सहभागिता से रहने की कल्पना का रोमांस ज्यादा पाया जाता रहा है। भारत के बंटवारे के बाद विस्थापित हुये हिंदुओं में एक ऐसा वर्ग भी रहा है जो अपनी जड़ों को पाकिस्तान के गांवो, कस्बों और शहरो में सिर्फ ढूंढता ही नही है, बल्कि उसके रोमांस में कैद, गंगा जमुनी तहजीब को वहां उतारता भी है। वो शताब्दियों से स्वयं को अफगानिस्तान से सिमटते सिमटते, पूर्व दिशा की ओर खिसकते खिसकते, अपनी खोई मिट्टी का दोष, अंग्रेज़ो और चंद राजनीतिज्ञों पर डाल देता है लेकिन वह कभी अपने हंताओ पर प्रश्न नही करता है।

1970/80 के दशकों में एक से एक बुद्धजीवियों को पढा व सुना है जो अपना बचपन, अपनी जवानी को पाकिस्तान की खुशनुमा वादियों में ढूंढते थे। वे अपनी पुरानी यादों में खो, न जाने कौन कौन से जुम्मन चाचाजानो, फरीदा चाचीजानो, तबस्सुम आपाओं और बाज़ीयों को फरिश्ता बना देते थे। उनकी बातों से यही लगता था कि जैसे वे स्वर्ग में थे और 1918 से 1947 के बीच हुए वहां हिंदुओं के विरुद्ध हुये अत्याचार, दंगे और इस आक्रमकता के कारण हिंदुओं का धीरे धीरे विस्थापित होना, कोई वास्तविकता न हो कर बस कोई दुर्घटना थी। यही सब कश्मीरी पंडितों का भी हुआ है। जबतक 1991 से घाटी से भगाए नही गये तब तक 370 का समर्थन करते रहे। जो इनके पूर्वजो के हन्ता थे और बाद में उनके स्वयं के हुये, उन्ही के साथ खान पान बोली पर गलबहियां करते रहे और शेष भारत के हिंदुओं पर श्रेष्ठता का भाव रखते रहे। आज भी कई कश्मीरी पंडित मिल जाएंगे जो अपने हंताओ पर कभी उंगली नही उठाते है, उनका आज भी रोमांस, उसी काल खंड में अटका हुआ है।

मुझे ऐसा ही कुछ, करीना कपूर को विरासत में मिला लगता है। वह जिस कपूर खानदान से है, उसकी जड़े ब्रिटिश राज में जमी थी। भारत मे तो इस खानदान की पहचान पृथ्वीराज कपूर से बनी, जो अखंड भारत के शहर लायलपुर, पंजाब (आज का पाकिस्तान का फैसलाबाद शहर) में पैदा हुए थे और वही उनकी पढ़ाई लिखाई हुई थी। उनके परदादा को दीवान की पदवी मिली थी और दीवान मुरली माल कपूर के नाम से जाने जाते थे। उनके दादा दीवान केशवमल कपूर वहां तहसीलदार थे और उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर, इंडियन इम्पीरियल पुलिस में अधिकारी थे। पिता के पेशावर स्थांतरण के बाद परिवार, पेशावर चला आया, जहां आज भी उनकी हवेली खड़ी है। यह कपूर परिवार, ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभावी व प्रतिष्ठित सेवक थे जो धन सम्पदा व सामाजिक प्रतिष्ठा से परिपूर्ण थे। लेकिन उसके बाद भी वहां, भारत के उस हिस्से में हिन्दू मुस्लिम को लेकर समाज मे ऐसी स्थितियां बनने लगी थी कि 1928 में पृथ्वीराज कपूर को वह सब छोड़ कर, फ़िल्म और थियेटर में काम करने के लिए मुम्बई चले आये थे। उनके विस्थापन के बाद धीरे धीरे पूरा खानदान अपना घर जयदाद छोड़ कर मुम्बई आगया था।

पृथ्वीराज कपूर के घर वालो के साथ ससुराल के लोग भी मुम्बई चले आये थे और उसमे उनके साले जुगुल किशोर मेहरा भी थे। जो फ़िल्म में अभिनेता थे लेकिन फिर बाद में मुम्बई रेडियो( बॉम्बे रेडियो) के स्टेशन डायरेक्टर बन गए थे। यह साले साहब जुगल किशोर मेहरा, जो राजकपूर के सगे मामा थे, ने तीन शादियां की और वे सब मुस्लिम थी। उनमें से एक नाम अल्लाहरखी था, उनसे हुई बेटी 1940-50 की मशहूर अभिनेत्री मुन्नवर राणा थी। जुगल किशोर मेहरा ने तीसरी शादी उस ज़माने की मशहूर अभिनेत्री और गायिका अनवरी बेगम से की थी। 1947 में जब बंटवारा हुआ तो जुगलकिशोर मेहरा ने अनवरी बेगम के साथ रिज़र्व माइग्रेशन किया और लाहौर, पाकिस्तान चले गए। वहां, पृथ्वीराज कपूर के साले और राज कपूर के मामा, जुगल किशोर ने हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम अपना लिया और अपना नया नाम अहमद सुल्तान रख लिया। पाकिस्तान में, मेहरा उर्फ सुल्तान अहमद, पाकिस्तान रेडियो जॉइन कर लिया और वहां वह मे डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद तक पहुंचे। उसके बाद वोउच्च पद पर पाकिस्तान एयरलाइन्स में चले गये।

मेहरा उर्फ अहमद सुल्तान की बीवी अनवरी बेगम की एक बेटी जरीना थी और उसने बाद में नसरीन नाम से हिंदी और पाकिस्तानी फिल्मो में काम किया था। यह ज़रीन, राज कपूर की ममेरी बहन थी जिसकी बाद में शादी करांची के कालीन व्यापारी लियाकत गुल आगा से शादी हुई। उस काल मे पाकिस्तान में यह बहुत मशहूर था कि राज कपूर की बहन की शादी करांची में आगा परिवार में हुई है। इसी ज़रीन और आगा की बेटी सलमा आगा है, जो 80 के दशक में बी आर चोपड़ा की फ़िल्म की नायिका थी। सलमा आगा का राजकपूर से भांजी का रिश्ता है और वह करीना कपूर की बुआ है।

मैं अब जब 70 और 80 के दशक की कुछ स्मृतियों को झझकोरता हूँ तो यह याद आता है कि उस काल मे जब राज कपूर के यहां कोई जश्न होता था तो ढेर सारे पाकिस्तानी मेहमान, कव्वाल, गायक महफ़िल की रंगत बढाते थे। मुझे तब कपूर परिवार का यह पाकिस्तानी प्रेम, बड़ा अजीब जरूर लगता था लेकिन मैने इस पर कुछ मनन नही किया क्योंकि कपूर खानदान की विरासत के छुपे हुये पहलुओं को बिल्कुल भी नही जानता था।

अब इन्ही सब बातों को देख और समझ कर मुझे करीना कपूर समझ मे आती है। वह उस वातावरण में पैदा और पली बढ़ी हुई है जहां उसके खानदान ने इस हिन्दू मुस्लिम झालमेल को सहेजा हुआ है। ये निमित्त मात्र हिन्दू शेष रह गए है ये लायलपुर, पेशावर की जड़ो में रोमांस से लिपटे लोग है। ये वे लोग है जो पेशावर में खड़ी दीवान विशेश्वर नाथ कपूर की हवेली के साये में, अपने हंताओ के साथ सोने में रोमानियत ढूंढते है।

मैं यह मानता हूँ कि ये और ऐसे ही अपनी ज़मीन छोड़, पुराने ज़माने की रोमानियत में कैद लोग, कुछ भी हो सकते है लेकिन अब हिन्दू शायद बिल्कुल भी नही रह गये है। इसीलिए जहां सैफ अली खान के लिए बेटों को तैमूर और जहांगीर नाम देना उसे गज़वा-ए-हिन्द के लिए गाज़ी होने का सुख देता है वही करीना को कोई फर्क नही पड़ता क्योंकि वह एक गाज़ी की लौंडी से ज्यादा कुछ नही रह गई है।

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पर्देकेपीछेकानग्न_सत्य ***

….. राज कुंद्रा… ये कोई छोटा मोटा नाम नहीं है…. शिल्पा शेट्टी… ये नाम भी किसी पहचान का मोहताज नहीं हैं।

Alt Balaji…. वेब सीरीज़ की दुनिया का जाना माना नाम….एकता कपूर इसकी मालकिन है…. एकता कपूर…. ये नाम अपने आप में एक बॉलीवुड हैं…!!

…… ये सब एक दूसरे से जूड़े हुए हैं… राज कुंद्रा को पोर्नोग्राफी के लिए गिरफ्तार किया गया है… उसके साथ 11 और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है।

वो पोर्न फिल्म बनाते थे और कई चैनलों को बेचते थे…. जिसमें Alt Balaji का नाम मीडिया में आ चुका है… ये एकता कपूर का है……
…… मतलब एकता कपूर जानती थी कि राज कुंद्रा क्या क्या करता है….. शिल्पा शेट्टी कुंद्रा की बीवी हैं…. क्या कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि….. एक बीवी को यह नहीं पता कि उसका पति क्या काम करता है…!!!
और वो भी शिल्पा शेट्टी जैसी बीवी,,,, बॉलीवुड की एक जानी-मानी हिरोइन…!! हो ही नहीं सकता…..

….. कल एक मॉडल DNA में बता रही थी कि….. उसका ऑडिशन फिल्म के लिए हुआ था… जिसमे उसका सिलेक्शन हुआ था…. कुछ दिन शुटिंग करने के बाद उसे न्यूड सीन के लिए कहा गया,,, जब उसने मना किया तो तब तक हुई शुटिंग का पुरा खर्च उससे मांगा गया….. वर्ना केस करने और उसे बर्बाद करने की धमकी दी गई…. ऐसे कई लोग हैं जिसकी जिंदगी इन्होंने बर्बाद कर दी अपने राजनीतिक और पैसे के रसुख का उपयोग करके….ये इतने ताकतवर है कि कोई इनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता….

…… एकता कपूर बहुत सारे सिरियल बनाती
है….. पारिवारिक… सास बहू वाले…. इन सिरियल के लिए पुरे देश में ऑडिशन होते हैं….. शिल्पा शेट्टी टीवी शॉ में जज बनती है…. सिंगिग शॉ…. डांसिंग शॉ…. फूहड़ हास्य वाले शॉ…. जिनमें छोटे बच्चे और युवा आयु के बच्चे भाग लेते हैं…. इन Shows के लिए देशभर में ऑडिशन होते हैं…. उन Audition में कौन जाता है…

….. आपके हमारे घर की महिलाएं…. बच्चे…. किसको पता है कि इन ऑडिशन के पीछे क्या चल रहा होता है…. कौन जानता है कि पर्दे के पीछे कैसे गंदे घिनौने खेल चल रहे होते है….

मोदी ना आते तो इन पर्दे के पीछे की सच्चाई शायद ही कभी बाहर आ पाती….

……बॉलीवुड एक गंदा नाला हैं…. इस नाले में बहने से बचिए…. और दूसरों को भी बचाइए….

यदि आपके अंदर टेलेन्ट है…. आपके बच्चों के अंदर टेलेन्ट है…. वीडियो बनाईये….. YouTube, Facebook, Twitter…. जैसे किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर डालिए….. लोगों को आपका टेलेन्ट पसंद आयेगा तो लोग खुद आपको फॉलो करेंगे….

क्या जरूरत है आपको ऐसे ऑडिशन में जाने की….!! क्या जरूरत है आपको किसी के झांसे में आने की….!!

आपको अपना टेलेन्ट ही दिखाना है ना….Youtube पर अपना चैनल बनाकर विडियो पोस्ट करो…. अपनी खुद की पहचान बनाओ…..

…… मोदीजी जब कहते हैं ना कि ,,,,,, ” आत्मनिर्भर बनो “…….
तो उसका मतलब सिर्फ ” पकौड़े ” बेचना नहीं होता….. इसका मतलब अपना ” हुनर ” बेचना होता है….

उनकी बातों को समझना सीखो…. ध्रुव राठी जैसे लोग तो झूठ बोल बोल के YouTube पर सेलेब्रिटी बन गए हैं….. ये भी एक ” हुनर ” ही है…..

…..जिस दिन हम आत्मनिर्भर हो जायेंगे….. देश सोने की चिड़िया बन जायेगा…..

……..

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“Nishaan-e-Pakistan” Bollywood Actor Yusuf Khan has Passed away at the age of 98.
Some of the Highlights of his Bollywood carrier-
1.During the Indo-Pak Kargil War,Yusuf Khan refused to return the “Nishan-e-Pakistan” Civilian award Conferred to him by Pakistani Government.
2.During the whole Course of Indo-Pakistan Kargil war never Criticised Pakistan 🇵🇰.
3.During his whole Span of Bollywood Career he never spoke a Single word against Pakistan 🇵🇰 be it 1965 War,1971 Indo-Pak war, or even 1999 Kargil war.

  1. He was often Caught doing Espionage against India 🇮🇳 for Pakistan 🇵🇰 but was always released on the Context of his nearness to erstwhile “Secular” regime.
    5.He was an Dearest & Favourite Child of Urban Naxal & Secular Bollywood brigade & always was an follower of Javed Akhtar type Hidden Jihadism (Means following Jihad in name of Communism).
    6.He Celebrated Pakistan 🇵🇰 day Every year till 1995 at his Bombay(Now Mumbai) residence,it was stopped only when for the First time SS-BJP government came to power in state & then legendary Bala Sahab Thackeray personally asked him to stop it or otherwise be ready to face Consequences.

Now who so may be sad for his demise they are free to do so,But I am not,yes it’s true that I am not happy also but I also say it Clearly this fellow doesn’t deserves the type of Mourning that National Media is creating for his demise.

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मोहम्मद युसुफ़ ख़ान उर्फ दिलीप कुमार गजब के मुस्लिम थे …….
पाकिस्तान के बहुत ज्यादा प्रेमी भी थे । पाकिस्तान के इस अथाह प्रेम के कारण ही उन्हें पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार ‘. निशान ए पाकिस्तान ‘ मिला था ।

कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने पाकिस्तान की निंदा करने और पाकिस्तान से मिला पुरस्कार लौटाने से इंकार कर दिया था …..इतना प्यार करते थे ये महाशय अपने मुल्क अपनी मिट्टी से और यहां कुछ सैकुलर सुबह से विलाप में ऐसे लगे हैं जैसे कोई उनका कोई अपना सगा चला गया । अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा जी की पुण्यतिथि हो आज वो भूल गये …..जो हमारे लिए वतन पर कुरबान हो गये उनको याद नहीं रखा परंतु फिल्मी भांड के लिए टसुए बहा रहे हैं नकली लोग

ऐसे व्यक्ति कभी भी देशभक्त नहीं होते ना कभी इनसे उम्मीद रखनी चाहिए ।

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यह 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्ष की बात है. कलकत्ता में खुफिया एजेंसियों और कलकत्ता पुलिस ने पाकिस्तान के जासूस को गिरफ्तार किया था उसके पास बरामद हुई डायरी में एक तत्कालीन फिल्मी सितारे का नाम दर्ज था.

उस जासूस से पूछताछ से मिली जानकारी के बाद कलकत्ता पुलिस हवाई जहाज से बम्बई पहुंच गई थी और सीधे उस सितारे के घर पहुंची थी. लेकिन तब तक इस पुलिस कार्रवाई की खबर दिल्ली की शीर्ष सत्ता के गलियारे तक पहुंच चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने हस्तक्षेप किया था.

परिणामस्वरुप कलकत्ता पुलिस उस फिल्मी सितारे के घर से यह कहते हुए खाली हाथ वापस लौटी थी कि सम्भवतः वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था और फिल्मी सितारे का उससे कोई लेनादेना नहीं.

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उस जासूस से गहन पूछताछ के बाद आनन फानन में फ्लाईट पहुंची कलकत्ता पुलिस को यह दिव्य ज्ञान उस जासूस से की गई गहन पूछताछ के दौरान नहीं हुआ.

लेकिन बम्बई में उस सितारे के घर पहुंच कर उसे वह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया था. ज्यादा शोर मचा तो पूरे प्रकरण की जांच के लिए एक सरकारी जांच कमेटी बनी. उस कमेटी ने तथाकथित जांच के बाद वही बात उगली थी, जो बात कलकत्ता पुलिस ने उगली थी, कि वह जासूस उस फिल्मी सितारे का प्रशंसक मात्र था.

इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान खुफिया एजेंसियों ने बम्बई में पाकिस्तान से सम्पर्क वाले एक रेडियो ट्रांसमीटर के सिग्नल पकड़े थे. ट्रांसमीटर बम्बई में ही सक्रिय था.

खुफिया एजेंसियों की टीम सिग्नल का पीछा करते हुए जब उस स्थान पर पहुंची थी जहां वह रेडियो ट्रांसमीटर सक्रिय था, तो बुरी तरह चौंक गयी थी. जिस मकान में वह ट्रांसमीटर बरामद हुआ था, वह घर उस समय के बहुत नामी गिरामी उसी फिल्मी सितारे का ही था जिससे पूछताछ करने के लिए उसके घर कुछ वर्ष पूर्व कलकता पुलिस पहुंची थी.

इसबार भी सितारे पर दिल्ली मेहरबान हुई. रेडियो ट्रांसमीटर के विषय में उस फिल्मी सितारे ने बहुत मासूम सफाई दी कि उसे पाकिस्तानी गाने सुनने का शौक है और क्योंकि भारत में समान्य रेडियो पर पाकिस्तान रेडियो प्रतिबंधित है इसलिए उसने यह रेडियो ट्रांसमीटर अपने घर में रखा है ताकि पाकिस्तानी गाने सुनने का अपना शौक पूरा कर सके.

आप यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि इस बार भी उस फिल्मी सितारे की ही बात को शाश्वत सत्य मान लिया गया. एक जांच कमेटी बनी और उसने भी फिल्मी सितारे के उस वक्तव्य को ही सत्य घोषित कर दिया. यह सवाल कभी पूछा ही नहीं गया, देश को कभी यह बताया ही नहीं गया कि सामान्य नागरिक के लिए पूर्णतया प्रतिबंधित और जिसे रखने पर कठोर दंड का प्रावधान था, वह रेडियो ट्रांसमीटर उस फिल्मी सितारे ने कहां से, कैसे और किस से प्राप्त किया था.?

जबकि सत्य यह है कि देश की सुरक्षा और गुप्तचर जांच एजेंसियों में जिम्मेदार पद पर कार्यरत किसी भी व्यक्ति के अतिरिक्त यदि किसी समान्य नागरिक के पास पाकिस्तान तक पहुंच वाला रेडियो ट्रांसमीटर यदि आज भी बरामद हो जाए तो पुलिस की लाठियों की बरसात उसकी हड्डियों का सत्कार पूरी लगन से करेंगी.

क्या आप जानते हैं कि कौन था वह फिल्मी सितारा, क्या नाम था उस फिल्मी सितारे का…?

तो अब जानिए कि उस फिल्मी सितारे का नाम था… दिलीप कुमार.

वही दिलीप कुमार जिसने उसे मिले सर्वोच्च पाकिस्तानी एवार्ड को वापस करने से उस समय साफ़ मना कर दिया था, जब करगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना द्वारा की गई भारतीय सेना के सैकड़ों सैनिकों की हत्याओं के विरोध में उस फिल्मी सितारे से मांग की गई थी कि… वह पाकिस्तानी एवार्ड को भारतीय विरोध के प्रतीक के रूप में वापस कर दे.

लेकिन इनकी चर्चा कहीं किसी मीडिया में आजतक सुनी आपने.? जो इक्का दुक्का समाचार आप को काफी प्रयास के बाद मिलेंगे वो इसलिए मिलेंगे क्योंकि उनमें इस फिल्मी सितारे की वकालत की गयी है.

प्रश्नों के कठघरे में नहीं खड़ा किया गया है. इसीलिए मैंने प्रारम्भ में ही लिखा है कि… बॉलीवुड के चरणों में लोटती मीडिया और चाकरी करती सरकारों की कहानी दशकों पुरानी है.

Courtesy: Vimla Pandey