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बॉलिवुड जिहाद

सलीम जावेद लिखित फिल्म में शोले फिल्म में वृद्ध मुसलमान (ए के हंगल) को बेटे की मौत पर नमाज के लिए जाते दिखाते हैं तो नायक वीरू (धर्मेन्द्र) को शिव मन्दिर में लडकी छेड़ते हुए दिखाना. अभी मैन्फोर्स कडोम के विज्ञापन में मंदिर दिखाना और वृद्ध महिला का अश्लील वार्तालाप सभी हिन्दू धर्मगुरुओं के मुंह पर तमाचा है

बालीवुड‬ और टीवी सीरियल के नजरिए से ‪हिन्दू‬ को कैसे देखा जाता है एक झलक:—-
ब्राह्मण – ढोंगी पंडित, लुटेरा,
‪राजपूत* – अक्खड़, मुच्छड़, क्रूर, बलात्कारी
वैश्य या साहूकार – लोभी, कंजूस,
गरीब हिन्दू दलित – कुछ पैसो या शराब की लालच में बेटी को बेच देने वाला चाचा या झूठी गवाही देने वाला
जाट* खाप पंचायत का अड़ियल बेटी और बेटे के प्यार का विरोध करने वाला और महिलाओ पर अत्याचार करने वाला

जबकि दूसरी तरफ
मुस्लिम – अल्लाह का नेक बन्दा, नमाजी, साहसी, वचनबद्ध, हीरो-हीरोइन की मदद करने वाला टिपिकल रहीम चाचा या पठान।
ईसाई – जीसस जैसा प्रेम, अपनत्व, हर बात पर क्रॉस बना कर प्रार्थना करते रहना।
ये बॉलीवुड इंडस्ट्री, सिर्फ हमारे धर्म, समाज और संस्कृति पर घात करने का सुनियोजित षड्यंत्र है और वह भी हमारे ही धन से ।

सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा.
इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.
“दीवार”* का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है.
जंजीर”* में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.
फिल्म “शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है.

क्या आपको बालीवुड की वे फिल्मे याद हैं जिनमे फादर को दया और प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप दिखाया जाता था तो हिन्दू सन्यासियों को अपराधी. जो मिडिया आशाराम पर पागल हो गया था वह आज चुप है. बॉलीवुड प्राय: सदा फिल्मों में हिन्दू पात्रों के नाम वाले कलाकारों को किसी इस्लामिक मज़ार या चर्च में प्रार्थना करते दिखाता हैं।
किसी मुसलिम या ईसाई पात्र को कभी किसी हिन्दू मंदिर में जाकर प्रार्थना करता दिखाना तो बहुत दूर की बात हैं। इसके विपरीत वह सदा हिन्दू मान्यताओं का परिहास जैसे पंडित को या भगवान की मूर्ति को रिश्वत देना, शादी के फेरे जल्दी जल्दी करवाना, मंदिर में लड़कियाँ छेड़ना, हनुमान जी अथवा श्री कृष्णा जैसे महान पात्रों के नाम पर चुटकुले छोड़ना आदि आदि दिखाता हैं। परिणाम यह निकलता है कि हिन्दुओं के लड़के लड़कियां हिन्दू धर्म को ही कभी गंभीरता से लेना बंद कर देते है।
22 साल पहले गुलशन कुमार सरे आम गोलियों से मार दिया गया क्योंकि इन्होंने दाऊद जैसे गुण्डो के आगे झुकने से मना कर दिया था। ये बॉलीवुड के इस्लामी करण में बहुत बड़ी बाधा थे। यह वह हिन्दू व्यापारी था जो अपना आयकर भरता था। कुछ वर्ष तक भारत का सबसे बड़ा आयकर देने वाला व्यक्ति रहा । क्योकि इसने दाऊद के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया था इसलिए इसे जान से मार दिया गया। परंतु न तो भारत सरकार इसके कत्ल के आरोपी नदीम को भारत ला पाई और न ही इसके परिवार को न्याय मिला।

गुलशन कुमार की हत्या के ठीक 6 महीने बाद 1998 में साईं नाम के एक नए भगवान् का अवतरण हुआ, इसके कुछ समय बाद 1999 में बीवी नंबर 1 फिल्म आई जिसमे साईं के साथ पहली बार राम को जोड़कर ॐ साईं राम गाना बनाया था, न किसी हिन्दू संगठन का इस पर ध्यान गया और न किसी ने इस पर आपत्ति की, पहला षड्यंत्र कामयाब

इस नए भगवान् की एक खासियत थी, इसे लोग धर्मनिरपेक्ष अवतार कहते थे, जिसने हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया था, वो अलग बात है की उसी चिलम बाबा उर्फ़ साईं बाबा के समय में कई दंगे हुए, बंगाल विभाजन हुआ, मोपला दंगे हुए, मालाबार में हजारो हिन्दुओ को काटा और साईं के अल्लाह का भक्त बना दिया गया, अब इस नए भगवान् की एक और खासियत थी, नाम हिन्दुओ का प्रयोग हो रहा था और जागरण में अल्लाह अल्लाह गाया जा रहा था
हिन्दुओं की संतानों की स्थिति अर्ध नास्तिक जैसी हो जाती है। जो केवल नाममात्र का हिन्दू बचता है। परन्तु उसका हिन्दू समाज की मान्यताओं एवं धर्मग्रंथों में कोई श्रद्धा नहीं रहती। ऐसी ही संतानें लव जिहाद और ईसाई धर्मान्तरण का शिकार बनती हैं।

क्या इसे हम बॉलीवुड जिहाद कहे तो कैसा रहेगा?

StopBollywoodJihad

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बॉलिवुड जिहाद

सलीम जावेद लिखित फिल्म में शोले फिल्म में वृद्ध मुसलमान (ए के हंगल) को बेटे की मौत पर नमाज के लिए जाते दिखाते हैं तो नायक वीरू (धर्मेन्द्र) को शिव मन्दिर में लडकी छेड़ते हुए दिखाना. अभी मैन्फोर्स कडोम के विज्ञापन में मंदिर दिखाना और वृद्ध महिला का अश्लील वार्तालाप सभी हिन्दू धर्मगुरुओं के मुंह पर तमाचा है

बालीवुड‬ और टीवी सीरियल के नजरिए से ‪हिन्दू‬ को कैसे देखा जाता है एक झलक:—-
ब्राह्मण – ढोंगी पंडित, लुटेरा,
‪राजपूत* – अक्खड़, मुच्छड़, क्रूर, बलात्कारी
वैश्य या साहूकार – लोभी, कंजूस,
गरीब हिन्दू दलित – कुछ पैसो या शराब की लालच में बेटी को बेच देने वाला चाचा या झूठी गवाही देने वाला
जाट* खाप पंचायत का अड़ियल बेटी और बेटे के प्यार का विरोध करने वाला और महिलाओ पर अत्याचार करने वाला

जबकि दूसरी तरफ
मुस्लिम – अल्लाह का नेक बन्दा, नमाजी, साहसी, वचनबद्ध, हीरो-हीरोइन की मदद करने वाला टिपिकल रहीम चाचा या पठान।
ईसाई – जीसस जैसा प्रेम, अपनत्व, हर बात पर क्रॉस बना कर प्रार्थना करते रहना।
ये बॉलीवुड इंडस्ट्री, सिर्फ हमारे धर्म, समाज और संस्कृति पर घात करने का सुनियोजित षड्यंत्र है और वह भी हमारे ही धन से ।

सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा.
इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.
“दीवार”* का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है.
जंजीर”* में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.
फिल्म “शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है.

क्या आपको बालीवुड की वे फिल्मे याद हैं जिनमे फादर को दया और प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप दिखाया जाता था तो हिन्दू सन्यासियों को अपराधी. जो मिडिया आशाराम पर पागल हो गया था वह आज चुप है. बॉलीवुड प्राय: सदा फिल्मों में हिन्दू पात्रों के नाम वाले कलाकारों को किसी इस्लामिक मज़ार या चर्च में प्रार्थना करते दिखाता हैं।
किसी मुसलिम या ईसाई पात्र को कभी किसी हिन्दू मंदिर में जाकर प्रार्थना करता दिखाना तो बहुत दूर की बात हैं। इसके विपरीत वह सदा हिन्दू मान्यताओं का परिहास जैसे पंडित को या भगवान की मूर्ति को रिश्वत देना, शादी के फेरे जल्दी जल्दी करवाना, मंदिर में लड़कियाँ छेड़ना, हनुमान जी अथवा श्री कृष्णा जैसे महान पात्रों के नाम पर चुटकुले छोड़ना आदि आदि दिखाता हैं। परिणाम यह निकलता है कि हिन्दुओं के लड़के लड़कियां हिन्दू धर्म को ही कभी गंभीरता से लेना बंद कर देते है।
22 साल पहले गुलशन कुमार सरे आम गोलियों से मार दिया गया क्योंकि इन्होंने दाऊद जैसे गुण्डो के आगे झुकने से मना कर दिया था। ये बॉलीवुड के इस्लामी करण में बहुत बड़ी बाधा थे। यह वह हिन्दू व्यापारी था जो अपना आयकर भरता था। कुछ वर्ष तक भारत का सबसे बड़ा आयकर देने वाला व्यक्ति रहा । क्योकि इसने दाऊद के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया था इसलिए इसे जान से मार दिया गया। परंतु न तो भारत सरकार इसके कत्ल के आरोपी नदीम को भारत ला पाई और न ही इसके परिवार को न्याय मिला।

गुलशन कुमार की हत्या के ठीक 6 महीने बाद 1998 में साईं नाम के एक नए भगवान् का अवतरण हुआ, इसके कुछ समय बाद 1999 में बीवी नंबर 1 फिल्म आई जिसमे साईं के साथ पहली बार राम को जोड़कर ॐ साईं राम गाना बनाया था, न किसी हिन्दू संगठन का इस पर ध्यान गया और न किसी ने इस पर आपत्ति की, पहला षड्यंत्र कामयाब

इस नए भगवान् की एक खासियत थी, इसे लोग धर्मनिरपेक्ष अवतार कहते थे, जिसने हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया था, वो अलग बात है की उसी चिलम बाबा उर्फ़ साईं बाबा के समय में कई दंगे हुए, बंगाल विभाजन हुआ, मोपला दंगे हुए, मालाबार में हजारो हिन्दुओ को काटा और साईं के अल्लाह का भक्त बना दिया गया, अब इस नए भगवान् की एक और खासियत थी, नाम हिन्दुओ का प्रयोग हो रहा था और जागरण में अल्लाह अल्लाह गाया जा रहा था
हिन्दुओं की संतानों की स्थिति अर्ध नास्तिक जैसी हो जाती है। जो केवल नाममात्र का हिन्दू बचता है। परन्तु उसका हिन्दू समाज की मान्यताओं एवं धर्मग्रंथों में कोई श्रद्धा नहीं रहती। ऐसी ही संतानें लव जिहाद और ईसाई धर्मान्तरण का शिकार बनती हैं।

क्या इसे हम बॉलीवुड जिहाद कहे तो कैसा रहेगा?

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सलीम जावेद लिखित फिल्म में शोले फिल्म में वृद्ध मुसलमान (ए के हंगल) को बेटे की मौत पर नमाज के लिए जाते दिखाते हैं तो नायक वीरू (धर्मेन्द्र) को शिव मन्दिर में लडकी छेड़ते हुए दिखाना. अभी मैन्फोर्स कडोम के विज्ञापन में मंदिर दिखाना और वृद्ध महिला का अश्लील वार्तालाप सभी हिन्दू धर्मगुरुओं के मुंह पर तमाचा है

बालीवुड‬ और टीवी सीरियल के नजरिए से ‪हिन्दू‬ को कैसे देखा जाता है एक झलक:—-
ब्राह्मण – ढोंगी पंडित, लुटेरा,
‪राजपूत* – अक्खड़, मुच्छड़, क्रूर, बलात्कारी
वैश्य या साहूकार – लोभी, कंजूस,
गरीब हिन्दू दलित – कुछ पैसो या शराब की लालच में बेटी को बेच देने वाला चाचा या झूठी गवाही देने वाला
जाट* खाप पंचायत का अड़ियल बेटी और बेटे के प्यार का विरोध करने वाला और महिलाओ पर अत्याचार करने वाला

जबकि दूसरी तरफ
मुस्लिम – अल्लाह का नेक बन्दा, नमाजी, साहसी, वचनबद्ध, हीरो-हीरोइन की मदद करने वाला टिपिकल रहीम चाचा या पठान।
ईसाई – जीसस जैसा प्रेम, अपनत्व, हर बात पर क्रॉस बना कर प्रार्थना करते रहना।
ये बॉलीवुड इंडस्ट्री, सिर्फ हमारे धर्म, समाज और संस्कृति पर घात करने का सुनियोजित षड्यंत्र है और वह भी हमारे ही धन से ।

सलीम – जावेद की जोड़ी की लिखी हुई फिल्मो को देखे, तो उसमे आपको अक्सर बहुत ही चालाकी से हिन्दू धर्म का मजाक तथा मुस्लिम / इसाई / साईं बाबा को महान दिखाया जाता मिलेगा.
इनकी लगभग हर फिल्म में एक महान मुस्लिम चरित्र अवश्य होता है और हिन्दू मंदिर का मजाक तथा संत के रूप में पाखंडी ठग देखने को मिलते है.
“दीवार”* का अमिताभ बच्चन नास्तिक है और वो भगवान् का प्रसाद तक नहीं खाना चाहता है, लेकिन 786 लिखे हुए बिल्ले को हमेशा अपनी जेब में रखता है और वो बिल्ला भी बार बार अमिताभ बच्चन की जान बचाता है.
जंजीर”* में भी अमिताभ नास्तिक है और जया भगवान से नाराज होकर गाना गाती है लेकिन शेरखान एक सच्चा इंसान है.
फिल्म “शान” में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर साधू के वेश में जनता को ठगते है लेकिन इसी फिल्म में “अब्दुल” जैसा सच्चा इंसान है जो सच्चाई के लिए जान दे देता है.

क्या आपको बालीवुड की वे फिल्मे याद हैं जिनमे फादर को दया और प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप दिखाया जाता था तो हिन्दू सन्यासियों को अपराधी. जो मिडिया आशाराम पर पागल हो गया था वह आज चुप है. बॉलीवुड प्राय: सदा फिल्मों में हिन्दू पात्रों के नाम वाले कलाकारों को किसी इस्लामिक मज़ार या चर्च में प्रार्थना करते दिखाता हैं।
किसी मुसलिम या ईसाई पात्र को कभी किसी हिन्दू मंदिर में जाकर प्रार्थना करता दिखाना तो बहुत दूर की बात हैं। इसके विपरीत वह सदा हिन्दू मान्यताओं का परिहास जैसे पंडित को या भगवान की मूर्ति को रिश्वत देना, शादी के फेरे जल्दी जल्दी करवाना, मंदिर में लड़कियाँ छेड़ना, हनुमान जी अथवा श्री कृष्णा जैसे महान पात्रों के नाम पर चुटकुले छोड़ना आदि आदि दिखाता हैं। परिणाम यह निकलता है कि हिन्दुओं के लड़के लड़कियां हिन्दू धर्म को ही कभी गंभीरता से लेना बंद कर देते है।
22 साल पहले गुलशन कुमार सरे आम गोलियों से मार दिया गया क्योंकि इन्होंने दाऊद जैसे गुण्डो के आगे झुकने से मना कर दिया था। ये बॉलीवुड के इस्लामी करण में बहुत बड़ी बाधा थे। यह वह हिन्दू व्यापारी था जो अपना आयकर भरता था। कुछ वर्ष तक भारत का सबसे बड़ा आयकर देने वाला व्यक्ति रहा । क्योकि इसने दाऊद के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया था इसलिए इसे जान से मार दिया गया। परंतु न तो भारत सरकार इसके कत्ल के आरोपी नदीम को भारत ला पाई और न ही इसके परिवार को न्याय मिला।

गुलशन कुमार की हत्या के ठीक 6 महीने बाद 1998 में साईं नाम के एक नए भगवान् का अवतरण हुआ, इसके कुछ समय बाद 1999 में बीवी नंबर 1 फिल्म आई जिसमे साईं के साथ पहली बार राम को जोड़कर ॐ साईं राम गाना बनाया था, न किसी हिन्दू संगठन का इस पर ध्यान गया और न किसी ने इस पर आपत्ति की, पहला षड्यंत्र कामयाब

इस नए भगवान् की एक खासियत थी, इसे लोग धर्मनिरपेक्ष अवतार कहते थे, जिसने हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया था, वो अलग बात है की उसी चिलम बाबा उर्फ़ साईं बाबा के समय में कई दंगे हुए, बंगाल विभाजन हुआ, मोपला दंगे हुए, मालाबार में हजारो हिन्दुओ को काटा और साईं के अल्लाह का भक्त बना दिया गया, अब इस नए भगवान् की एक और खासियत थी, नाम हिन्दुओ का प्रयोग हो रहा था और जागरण में अल्लाह अल्लाह गाया जा रहा था
हिन्दुओं की संतानों की स्थिति अर्ध नास्तिक जैसी हो जाती है। जो केवल नाममात्र का हिन्दू बचता है। परन्तु उसका हिन्दू समाज की मान्यताओं एवं धर्मग्रंथों में कोई श्रद्धा नहीं रहती। ऐसी ही संतानें लव जिहाद और ईसाई धर्मान्तरण का शिकार बनती हैं।

क्या इसे हम बॉलीवुड जिहाद कहे तो कैसा रहेगा?

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बॉलीवुड का इस्लामीकरण कैसे हुआ….? ध्यान से पढ़ें…

सभी जानते हैं कि संजय दत्त के पिता सुनील दत्त एक हिंदू थे और उनकी पत्नी फातिमा राशिद यानी नर्गिस एक मुस्लिम थीं।

लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि संजय दत्त ने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन वह इतना चतुर भी है कि अपना फिल्मी नाम नहीं बदला।

जरा सोचिए कि हम सभी लोग इन कलाकारों पर हर साल कितना धन खर्च करते हैं। सिनेमा के मंहगा टिकटों से लेकर केबल टीवी के बिल तक।

हमारे नादान बच्चे भी अपने जेबखर्च में से पैसे बचाकर इनके पोस्टर खरीदते हैं और इनके प्रायोजित टीवी कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए हजारों रुपए के फोन करते हैं।

एक विचारणीय बिन्दू यह भी है कि बाॅलीवुड में शादियों का तरीका ऐसा क्यों है कि शाहरुख खान की पत्नी गौरी छिब्बर एक हिंदू है।

आमिर खान की पत्नियां रीमा दत्ता /किरण राव और सैफ अली खान की पत्नियाँ अमृता सिंह / करीना कपूर दोनों हिंदू हैं।

इसके पिता नवाब पटौदी ने भी हिंदू लड़की शर्मीला टैगोर से शादी की थी।

फरहान अख्तर की पत्नी अधुना भवानी और फरहान आजमी की पत्नी आयशा टाकिया भी हिंदू हैं।

अमृता अरोड़ा की शादी एक मुस्लिम से हुई है जिसका नाम शकील लदाक है।

सलमान खान के भाई अरबाज खान की पत्नी मलाइका अरोड़ा हिंदू हैं और उसके छोटे भाई सुहैल खान की पत्नी सीमा सचदेव भी हिंदू हैं।

अनेक उदाहरण ऐसे हैं कि हिंदू अभिनेत्रियों को अपनी शादी बचाने के लिए धर्म परिवर्तन भी करना पड़ा है।

आमिर खान के भतीजे इमरान की हिंदू पत्नी का नाम अवंतिका मलिक है। संजय खान के बेटे जायद खान की पत्नी मलिका पारेख है।

फिरोज खान के बेटे फरदीन की पत्नी नताशा है। इरफान खान की बीवी का नाम सुतपा सिकदर है। नसरुद्दीन शाह की हिंदू पत्नी रत्ना पाठक हैं।

एक समय था जब मुसलमान एक्टर हिंदू नाम रख लेते थे क्योंकि उन्हें डर था कि अगर दर्शकों को उनके मुसलमान होने का पता लग गया तो उनकी फिल्म देखने कोई नहीं आएगा।

ऐसे लोगों में सबसे मशहूर नाम युसूफ खान का है जिन्हें दशकों तक हम दिलीप कुमार समझते रहे।

महजबीन अलीबख्श मीना कुमारी बन गई और मुमताज बेगम जहाँ देहलवी मधुबाला बनकर हिंदू ह्रदयों पर राज करतीं रहीं।

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी को हम जॉनी वाकर समझते रहे और हामिद अली खान विलेन अजित बनकर काम करते रहे।

हममें से कितने लोग जान पाए कि अपने समय की मशहूर अभिनेत्री रीना राय का असली नाम सायरा खान था।

आज के समय का एक सफल कलाकार जॉन अब्राहम भी दरअसल एक मुस्लिम है जिसका असली नाम फरहान इब्राहिम है।

जरा सोचिए कि पिछले 50 साल में ऐसा क्या हुआ है कि अब ये मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि उनका मुस्लिम नाम उनका ब्रांड बन गया है।

यह उनकी मेहनत का परिणाम है या हम लोगों के अंदर से कुछ खत्म हो गया है?

जरा सोचिए कि हम कौनसी फिल्मों को बढ़ावा दे रहे हैं?
क्या वजह है कि बहुसंख्यक बॉलीवुड फिल्मों में हीरो मुस्लिम लड़का और हीरोइन हिन्दू लड़की होती है?

क्योंकि ऐसा फिल्म उद्योग का सबसे बड़ा फाइनेंसर दाऊद इब्राहिम चाहता है। टी-सीरीज का मालिक गुलशन कुमार ने उसकी बात नहीं मानी और नतीजा सबने देखा।

आज भी एक फिल्मकार को मुस्लिम हीरो साइन करते ही दुबई से आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाता है। इकबाल मिर्ची और अनीस इब्राहिम जैसे आतंकी एजेंट सात सितारा होटलों में खुलेआम मीटिंग करते देखे जा सकते हैं।

सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों की सफलता की गारंटी बना दिए गए हैं।

अक्षय कुमार, मनोज कुमार और राकेश रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं।

तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहा अली खान और जरीन खान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम हैं और इस्लामी कठमुल्लाओं को उनका काम गैरमजहबी लगता है।

फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी – बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है।

इन फिल्मों के गीतकार और संगीतकार भी मुस्लिम हों तभी तो एक गाना मौला के नाम का बनेगा और जिसे गाने वाला पाकिस्तान से आना जरूरी है।

इन अंडरवर्ड के हरामखोरों की असिलियत को पहचानिये और हिन्दू समाज को संगठित करिये तब ही हम अपने धर्म की रक्षा कर पाएंगे ।

इस पोस्ट को हर हिन्दू तक पहुँचाना हम सब हिन्दुओं की प्राथमिकता है।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

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Photo from Harshad Ashodiya


सवेरे टीवी खोला तो देखा तो पता चला कि गिरीश कर्नाड मर गया।
न्यूजचैनलों पर यह भी याद दिलाया जा रहा है कि इस देश ने गिरीश कर्नाड को पद्मश्री, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित भी किया था।
लेकिन उन्हीं न्यूजचैनलों द्वारा यह नहीं बताया जा रहा कि इसी गिरीश कर्नाड ने पाकिस्तान परस्त देशद्रोही अरुंधति रॉय के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु की फांसी की सज़ा के खिलाफ बड़ी जोरदार ज़ंग भी लड़ी थी।

न्यूजचैनलों द्वारा यह नहीं बताया जा रहा कि इसी गिरीश कर्नाड ने कर्नाटक के महान योद्धा और अत्यधिक सम्मानित शासक रहे केम्पेगौड़ा के नाम पर बने बंगलुरू एयरपोर्ट का नाम बदलकर टीपू सुल्तान एयरपोर्ट कर देने की मांग का अभियान इसलिए चलाया था क्योंकि उसके अनुसार केम्पेगौड़ा और छत्रपति शिवा जी तथा महाराणा प्रताप से भी बड़ा और महान योद्धा टीपू सुल्तान था। गिरीश कर्नाड की इस कुकर्मी मांग के खिलाफ कर्नाटक की जनता सड़कों पर उतर आई थी और हज़ारों की संख्या में उसके पुतले फूंक कर, उसके घर पर अद्धे गुम्मों की जमकर बरसात की थी। परिणामस्वरूप इस गिरीश कर्नाड को हाथ पांव जोड़कर माफी मांगनी पड़ी थी।

न्यूजचैनलों द्वारा यह नही

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, बॉलीवुड - Bollywood

गिरीश कर्नाड का वास्तविक चेहरा….

“गिरीश कर्नाड की मौत मुझे अपने बचपन की ओर ले गयी… शायद कक्षा 4 या 5 में पढ़ते होंगे कि पिक्चरों में अरुचि रखने वाले पिता जी ने एक इतवार को कहा कि हिन्द टाकीज में एक बढ़िया पिक्चर ‘मंथन’ लगी है ,चलो देखने चलते थे… घर के सभी सदस्य 3 रिक्शों पर सवार होकर हिन्द टाकीज पहुचे.. पिता के उत्साह का रहस्य खुला… पिक्चर एक कला फ़िल्म थी और साथ मे टैक्सफ्री भी ! शायद ढाई रुपये का ड्रैस सर्किल का टिकिट था ! बालकनी में कितने लोग होंगे…मगर ड्रैस सर्किल में हमारा ही परिवार था ! हाल खाली पड़ा था…
पिक्चर गुजरात की दुग्ध क्रांति Operation Flood पर थी… हीरो गिरीश कर्नाड थे… हीरोइन पिक्चर में आदिवासी बनी हुई… स्मिता पाटिल थीं ! पिक्चर में कोऑपरेटिव,दूध उत्पादन और गांव वगैरा था… मगर हमे स्मिता पाटिल और गिरीश कर्नाड का नैन मटक्का ही अच्छा लगा… एक कोई गाना भी था पिक्चर में ” मोरे घर आँगड़ा ” टाइप का ! मगर धीर -गंभीर गिरीश कर्नाड हमे भा गए ! स्मिता पाटिल की शक्ल हमारे घर की महरी से मिलती जुलती लगी तो उनसे हमारा लगाव आगे न बढ़ सका !… पिक्चर के बाद हम सभी भाई -बहन और मां… पिता जी से नाराज़ हो गए ! हम सब समझे थे कि कोई धर्मेंद्र – माला सिन्हा जैसे किसी हीरो -हीरोइन की फ़िल्म देखने को मिलेगी !
बाद में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में ‘मालगुडी डेज़’ में गिरीश कर्नाड ‘स्वामी’ के पिता के रूप में दिखाई दिए .. जनाब, यह वह सीरियल था जो आज भी दक्षिणी भारत के घर,पोस्ट ऑफिस,गाँव का रेलवे स्टेशन… हरे भरे खेत, बारिश, जंगल और स्वामी के बालमन से उत्पन्न परिस्थियों से उपजी कहानियों की याद दिला देता है !…
मगर असली ज़िन्दगी में गिरीश कर्नाड एक गुस्सैल,दंभी,वामपंथी साम्यवादी थे ! तीन विषयों में ऑक्सफोर्ड से परास्नातक थे ! अनेक किताबे भी लिखी… वी बी कारंत के बाद सबसे लब्धप्रतिष्ठ नाट्यकार थे… लिखते भी थे… अभिनय क्या बात थी ,वाह ! मगर सनातन संस्कृति से उनकी नफरत इस हद तक थी वह इसके खत्म हो जाने की कामना करते थे ! हिंदुहन्ता टीपू सुल्तान के नाम से बंगलौर हवाई अड्डे का नामकरण चाहते थे ! गौरी लंकेश,तीस्ता सीतलवाड़,जावेद आनंद ,प्रकाशराज और प्रशांत भूषण जैसों से उनका याराना था ! JNU में गिरीश कर्नाड पूजे जाते थे !…
टाटा लिटरेरी फेस्टिवल 2012 का मुम्बई में आयोजन था ! विश्व-प्रसिद्ध बुकर और नोबल पुरस्कार विजेता सर वी एस नायपाल का स्वागत होना था, उनका व्याख्यान भी था ! उनसे पहले गिरीश कर्नाड को थियेटर में योगदान हेतु 20 मिनट के व्याख्यान के लिए बुलाया गया ! दरअसल कर्नाड… सर नायपाल की पुस्तक ‘A Wounded Civilization ‘ से बहुत नाराज थे ! Wounded Civilization में सर नायपाल ने कर्नाटक में हम्पी नगर को मुस्लिम बादशाहों द्वारा नष्ट करने का भावपूर्ण वर्णन किया था ! साथ ही साथ बाबरी ध्वंस को हिंदुओं का साहसिक कार्य बताया था… मुम्बई दंगों में मुस्लिम आतंक की चर्चा की थी ! यह किताब पूरी दुनिया मे सराही गई… हिंदुओं के पक्ष को दुनिया ने जाना ! गिरीश कर्नाड एक वामपंथी और नक्सली समर्थक होने के नाते हिंदु सभ्यता की तारीफ या बाबरी ध्वंस का महिमा मंडन कैसे सुन सकते थे ?..
कार्यक्रम में वी एस नायपाल अपनी पत्नी के साथ मौजूद थे ! जैसे ही गिरीश कर्नाड को भाषण का मौका मिला, उन्होंने अपना विषय छोड़… सर वी एस नायपाल पर चढ़ाई कर दी ! उन्हें वस्तुतः गलियों से नवाजा… उन्हें गद्दार कहा… एक नोबिल पुरुस्कार विजेता… जिसका सम्मान पूरी दुनिया करती थी ,इंग्लैंड ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी थी… उनकी पत्नी लेडी नादिरा नायपाल भी कार्यक्रम में अपने पति का… उनके पुरखों के देश मे सम्मान होते देखने साथ आईं हुई थी ! गिरीश कर्नाड ने 40 मिनट तक सर नायपाल को सैकड़ो राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के सामने गलियाया… आयोजक अनिल धारकर ने भी गिरीश की बदतमीज़ी को चालू रहने दिया….
अंततः विश्वप्रसिद्ध दर्जनों किताबों के लेखक नोबिल पुरुस्कार विजेता, जो खुद को भारत की संतान कहता था… फफक- फफक कर रो पड़ा… उनकी पत्नी भी अपमान के सन्निपात से जड़ रह गईं… अपमानित और रोते हुए… सर वी एस नायपाल कार्यक्रम छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो गए ! गिरीश कर्नाड हंसते हुए मंच से उतरे ! उसके बाद मृत्यु होने तक सर वी एस नायपाल ने भारत की ओर कभी मुख उठा कर नहीं देखा !! …
गिरीश कर्नाड !! यह लेख… मैंने आपको श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं… वरन सर वी एस नायपाल को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा है ! कर्नाड साहेब आपकी तुलना मैं वी पी सिंह से करूँगा जो 26/11 के दौरान दुखदायी मौत को प्राप्त हुए थे और उनको श्रद्धांजलि देने की फुरसत किसी के पास नहीं थी ….”

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#संजू

लखनऊ में एक तवायफ थी #जद्दनबाई।
नामचीन हस्तियों की रातें गुलज़ार होतीं थीं उसके कोठे पर।

ये भारत की आज़ादी के पहले की बात है।
आते रहे नवाबज़ादे, सेठ, ठाकुर, अंग्रेज साहब और देखते ही देखते जद्दनबाई की गोद में तीन फूल खिला गए।
जद्दनबाई तवायफ थी मगर दूरदर्शी महिला थी। उसने वक्त की नब्ज़ पढ़ ली कि दो बेटे और एक बेटी के साथ इस कोठे पर कोई भविष्य नहीं है। कल बेटी तवायफ बनेगी और उसके भाई उसकी दलाली खाएंगे। जद्दनबाई ने मुंबई की गाड़ी पकड़ ली और बच्चों के साथ मुंबई आ गई। स्थानीय मुस्लिम समाज की सहायता से उसे सर छुपाने की जगह मिल गई और धंधा भी, वही पुराना वाला।

बेटी नरगिस को उसने फिल्मों में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और अपने पहचान के लोगों से मदद लेकर उभरते हुए बॉलीवुड में प्रवेश करवा दिया।
नरगिस एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री साबित हुई और नई दूकान अच्छी तरह चल निकली। भाई लोगों को भी जूनियर आर्टिस्ट टाइप रोल मिलने लगे।
इसी समय लाहौरी लाला राज कपूर के नैना नरगिस से लड़ गए और फिर ये कहानी लंबी चली।
पृथ्वीराज कपूर को तवायफ की बेटी अपनी बहू के रूप में स्वीकार नहीं हुई और ये इश्क आधे रास्ते में ही निपट गया। तबतक राज कपूर और नरगिस के संबंध में बस विवाह की औपचारिकता बाकी थी। बाकी सब कुछ हो चुका था।
जबलपुर की घरेलू लड़की कृष्णा से विवाह कर राज कपूर ने कल्टी मार ली। नरगिस फोकट में लुटीपिटी भौंचक्की देखती रही।
इसके बाद उसका कैरियर ढलान पर आने लगा । अपनी संध्या वेला में उसने ख़्वाजा अहमद अब्बास की कालजयी रचना #मदरइंडिया की। इसमें उसके पुत्र की भूमिका निभाई थी तब के दमदार अभिनेता #सुनीलदत्त ने। फिल्म के एक दृश्य में आग में घिरने का सीन शूट करते हुए नरगिस सचमुच आग में घिर गई।
तब सुनील दत्त ने जान पर खेल कर उसको बचाया। इसके बाद परदे पर मां बेटे को प्यार हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली। नरगिस सुनील दत्त से उम्र में खासी बड़ी थी।

सुनील दत्त पंजाब के हुसैनी ब्राह्मण परिवार से हैं। हुसैनी ब्राह्मण वो लोग हैं जो कर्बला के युद्ध में हसन हुसैन की तरफ से वीरता से लड़े थे। ये भारत से वहाँ गए थे।

सुनील दत्त के परिवार को ये बेहूदा रिश्ता हजम नहीं हो सका होगा इसलिये आजतक उनके बारे में कोई चर्चा नहीं होती।
दो मुसलमान मामाओं और उनके मित्रों की परवरिश से सुनील दत्त का बेटा #संजय_दत्त हिंदुओं के प्रति घृणा पालते हुए बड़ा हुआ। नरगिस की मौत पर इन लोगों ने उसे हिंदू सुहागिन की तरह अंत्येष्टि प्राप्त नहीं होने दी और जद्दनबाई की कब्र के पास दफनाने को लेकर शवयात्रा में ही बवाल खड़ा कर दिया।
संजय दत्त अपने मामाओं के साथ था।

बाबरी विध्वंस के समय संजय दत्त के मन में हिंदुओं के लिए घृणा का उफान था और उसने दाउद इब्राहिम के विस्फोटक सामग्री से लदे दो ट्रक एक रात भर के लिए अपने यहाँ छुपाए। बदले में उसे दो ए.के. 47 गिफ्ट दी गई।
बमकाण्ड में गिरफ्तारी के बाद जेलयात्रा के लंबे अनुभव से उसे कुछ अकल आई होगी ऐसा सोचना मूर्खता होगी।

अभी जम्मू के कठुआ में एक मुस्लिम बच्ची के पाशविक बलात्कार पर जम्मू कश्मीर पुलिस के हिंदुओं पर थोपे झूठे केस में ये महान अभिनेता हिंदू होने पर शर्मसार होता दिखाई दिया था।
किंतु मंदसौर में साफ साफ इस्लामी बलात्कार के खिलाफ बोलने की न इसमें हिम्मत है और न इसे कोई संवेदना है।

ऐसे लोगों पर फिल्में बन रही हैं और हम मरे जा रहे हैं देखने के लिए। फिल्म बनाने वाले #राजकुमार_हीरानी की तारीफ़ में क्या कहें??? इतना ही पर्याप्त है कि इनकी पिछली फिल्म #पीके हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने के लिए ही बनी थी और हमने उसे भी ५००+ करोड़ की कमाई दी थी।
राष्ट्रवादी भविष्य में संन्यासी ही होंगे। दीमक अंदर तक घुस गई है। अब इस वृक्ष को आग लगा कर ही समस्त वन को बचाया जा सकता है।
#BoycottMovie”SANJU”

निओ डीप

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पहली पत्नी :- वानी गनपती (1978-1988)

दुसरी पत्नी :- सारिका ठाकुर (1988-2004)

तीसरी पत्नी :- गौतमी  (2015-2016)

इन 👆👆👆तीन महिलाओं को तलाक देने वाला गिरगिट एवं नमकहराम का नाम है “कमल हसन”।

2013 में रोकर कमल हसन ने कहा था, “मुझे कट्टरपंथी मुस्लिमो से बचाओ, वरना देश छोड़ दूंगा”।

दैनिक भारत इस बात को अच्छे से समझता है कि भारत में हिन्दुओ की याददास्त बहुत ही कमजोर होती है, वो तो ये भी भूल गया है कि वो हिन्दू है या नहीं, अधिकतर हिन्दुओ से पूछो तो वो कहेंगे “आई एम ह्यूमन”, अरे भैया हिन्दू भी ह्यूमन ही होता है, अगर कोई हिन्दू है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो एनिमल हो गया है, वो भी ह्यूमन ही होता है, खैर

आज कमल हसन हिन्दुओ को आतंकवादी बता रहे है, असहिष्णु बता रहे है, हिंसक बता रहे है, पर हमे कमल हसन की 2013 वाली शक्ल याद आ गयी, आपकी याददास्त को दुरुस्त करते हुए हम विस्तारपूर्वक बताते है।

बात है साल 2013 की, कमल हसन ने एक फिल्म बनाई थी, जिसके निर्माता भी वही थे, इस फिल्म का नाम था विश्वरूपम, इस फिल्म में आतंकवाद के दृश्य थे, आतंकवाद की कहानी पर ये फिल्म आधारित थी, कमल हसन ने इस फिल्म को बनाने में मार्किट से भी बहुत पैसा उठाया था, काफी खर्चा किया था

विश्वरूपम का विरोध करते मुस्लिम संगठन, फिल्म के बारे में जैसे ही तमिलनाडु और केरल में मुस्लिम संगठनो को पता चला, उन्होंने इसका विरोध शुरू कर दिया, जगह जगह कमल हसन के पुतले जलाये जाने लगे, राजनितिक दबाव बनाया जाने लगा, कांग्रेस और वामपंथी नेता साथ ही PFI, मुस्लिम लीग जैसे जिहादी संगठन कमल हसन का विरोध करने लगे, कमल हसन को जान से मारने की धमकी के अलावा बेटी से बलात्कार की भी धमकियाँ दी जाने लगी

पहले से फिल्म में बहुत पैसा लगा चुके कमल हसन की स्तिथि टाइट होने लगी, कट्टरपंथियों के साथ तो वैसे भी राजनेता होते है, कमल हसन की फिल्म को बैन करने की भी बातें होने लगी, फिल्म के रिलीज से पहले बहुत बुरी स्तिथि हो गयी थी कमल हसन की

और इसी के बाद कमल हसन एक दिन सामने आये और रोते हुए उन्होंने कहा की, मैंने इस फिल्म में अपना सबकुछ लगा दिया है, और मुझे कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनो से बचाओ, वरना मैं देश छोड़ने पर मजबूर हो जाऊंगा, 2013 में रो रो कर कमल हसन ने खुद को कट्टरपंथी मुस्लिमो से बचाने की अपील की थी

जैसे तैसे कमल हसन की फिल्म रिलीज हुई और सभी मुस्लिमो ने उसका बहिष्कार किया, कमल हसन को सुरक्षा तक देना पड़ा, केरल और तमिलनाडु के मुस्लिम बहुल इलाकों में तो उनकी फिल्म कभी रिलीज ही नहीं हो सकी, हिन्दुओ ने कमल हसन की फिल्म देखि और फिल्म हिट हुई, और कमल हसन की की कमाई हुई अन्यथा उनकी आर्थिक स्तिथि टाइट हो गयी थी

और आज वो कमल हसन जो 2013 में कट्टरपंथी मुस्लिमो के कारण रो रहे थे, देश छोड़ने की बात कर रहे थे, वो राजनीती में आने के लिए हिन्दुओ को आतंकी बता रहे है, साफ़ होता है कि 2013 में हिन्दुओ ने जो कमल हसन का साथ दिया था, हिन्दुओ से वो बड़ी भूल हो गयी थी

क्यूंकि जिस शख्स को हम मनोरंजन का चाची 420 समझकर बैठे हुए थे, वो तो अब्दुल 786 निकला.  

ये 👆 कमल हसन एक वामपंथी सेकुलर है जिस थाली में खाता है उसी में छेद करता है।

बालिवुड के 👆ऐसे सेकुलर बहरुपियों से सावधान।

ऐसे 👆👆रंग बदलने वाले गिरगिटों से सावधान।

कॉपी पेस्ट।

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कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन,


कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, बीते हुए दिन,,,वो प्यारे पल छिन, कोई लौटा दे मेरे……. भारतीय सिने जगत के महान पार्श्व गायक किशोर कुमार जी की आज पावन जयंती है,,,,सुरों के उस महान सम्राट को कोटि कोटि नमन,,,वंदन,,,, उनके गीत आज भी गली गली गूंजते हैं,,,, “झुमरू” फिल्म का प्रसिद्द गीत,,,”मैं झुम झुम झुमरू” को कोई भी आज तक नहीं गा सका है,,,उनकी आवाज में गाने वाले बहुत हुए,,,,, कलकत्ता के एक स्टेज शो में (१९६०) ”बम चिक,बम चिक,चिक चिक बम बम,,चिक बम,चिक बम,,” केवल दो शब्दों को विभिन्न सुरों में किशोर दा ने निरंतर लगभग आधे घंटे तक गाकर एक इतिहास रच दिया था,,सुरों का संयोजन भी उन्होंने स्वयं किया था,,,किसी संगीतकार ने नहीं,,,, किशोर कुमार (अंग्रेज़ी: Kishore Kumar, जन्म: 4 अगस्त 1929 – मृत्यु: 13 अक्टूबर, 1987) भारतीय संगीत के इतिहास में अमर गायक, अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और गीतकार थे। किशोर कुमार का असली नाम ‘आभास कुमार गांगुली’ था। जीवन परिचय किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त, 1929 ई. को खंडवा, मध्य प्रदेश में एक बंगाली परिवार में हुआ था। किशोर कुमार एक विलक्षण शख़्सियत रहे हैं। हिन्दी सिनेमा की ओर उनका बहुत बड़ा योगदान है। किशोर कुमार के पिता कुंजीलाल खंडवा शहर के जाने माने वक़ील थे। किशोर चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। सबसे छोटा होने के नाते किशोर कुमार को सबका प्‍यार मिला। इसी चाहत ने किशोर को इतना हंसमुख बना दिया था कि हर हाल में मुस्कुराना उनके जीवन का अंदाज बन गया। उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार मुंबई में एक अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे और उनके एक और भाई अनूप कुमार भी फ़िल्मों में काम कर रहे थे। किशोर कुमार बचपन से ही एक संगीतकार बनना चाहते थे, वह अपने पिता की तरह वक़ील नहीं बनना चाहते थे। किशोर कुमार ने 81 फ़िल्मों में अभिनय किया और 18 फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। फ़िल्म ‘पड़ोसन’ में उन्होंने जिस मस्त मौला आदमी के किरदार को निभाया वही किरदार वे ज़िंदगी भर अपनी असली ज़िंदगी में निभाते रहे। हिन्दी सिनेमा में इलैक्ट्रिक संगीत लाने का श्रेय किशोर कुमार को जाता है। अभिनेता के रूप में शुरुआत किशोर कुमार के. एल. सहगल के गानों से बहुत प्रभावित थे, और उनकी ही तरह गायक बनना चाहते थे। किशोर कुमार के भाई अशोक कुमार की चाहत थी कि किशोर कुमार नायक के रूप में हिन्दी फ़िल्मों के हीरो के रूप में जाने जाएं, लेकिन किशोर कुमार को अदाकारी की बजाय पा‌र्श्व गायक बनने की चाहत थी। किशोर कुमार ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा कभी किसी से नहीं ली थी। किशोर कुमार की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में फ़िल्म ‘शिकारी’ (1946) से हुई। इस फ़िल्म में उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने प्रमुख भूमिका की थी। किशोर कुमार ने 1951 में फणी मजूमदार द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘आंदोलन’ में हीरो के रूप में काम किया मगर फ़िल्म फ्लॉप हो गई। 1954 में किशोर कुमार ने बिमल राय की ‘नौकरी’ में एक बेरोज़गार युवक की संवेदनशील भूमिका कर अपनी अभिनय प्रतिभा से भी परिचित किया। इसके बाद 1955 में बनी ‘बाप रे बाप’, 1956 में ‘नई दिल्ली’, 1957 में ‘मि. मेरी’ और ‘आशा’, और 1958 में बनी ‘चलती का नाम गाड़ी’ जिस में किशोर कुमार ने अपने दोनों भाईयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ काम किया और उनकी अभिनेत्री मधुबाला थी। गायकी की शुरुआत किशोर कुमार को पहली बार गाने का मौक़ा 1948 में बनी फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में मिला। फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में किशोर कुमार ने देव आनंद के लिए गाना गाया था। ‘जिद्दी’ की सफलता के बावज़ूद उन्हें न तो पहचान मिली और न कोई ख़ास काम मिला। किशोर कुमार ने गायकी का एक नया अंदाज बनाया जो उस समय के नामचीन गायक रफ़ी, मुकेश और सहगल से काफ़ी अलग था। किशोर कुमार सन् 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फ़िल्म ‘आराधना’ के ज़रिये गायकी के दुनिया में सबसे सफल गायक बन गये। किशोर कुमार को शुरू में एस डी बर्मन और अन्य संगीतकारों ने अधिक गंभीरता से नहीं लिया और उनसे हल्के स्तर के गीत गवाए गए, लेकिन किशोर कुमार ने 1957 में बनी फ़िल्म “फंटूस” में ‘दुखी मन मेरे’ गीत को गाकर अपनी ऐसी धाक जमाई कि जाने माने संगीतकारों को किशोर कुमार की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ा। किशोर कुमार को इसके बाद एस डी बर्मन ने अपने संगीत निर्देशन में कई गीत गाने का मौक़ा दिया। आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने मुनीम जी, टैक्सी ड्राइवर, फंटूश, नौ दो ग्यारह, पेइंग गेस्ट, गाईड, ज्वेल थीफ़, प्रेमपुजारी, तेरे मेरे सपने जैसी फ़िल्मों में अपनी जादुई आवाज़ से फ़िल्मी संगीत के दीवानों को अपना दीवाना बना लिया। एक अनुमान के मुताबिक किशोर कुमार ने वर्ष 1940 से वर्ष 1980 के बीच के अपने करियर के दौरान क़रीब 574 से अधिक गाने गाए। अन्य भाषाओं में गीत किशोर कुमार ने हिन्दी के साथ ही तमिल, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी गीत गाए। फ़िल्म फेयर पुरस्कार किशोर कुमार को आठ फ़िल्म फेयर अवार्ड मिले हैं। किशोर कुमार को पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड 1969 में ‘अराधना’ फ़िल्म के गीत ‘रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना’ के लिए दिया गया था। किशोर कुमार की ख़ासियत यह थी कि उन्होंने देव आनंद से लेकर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन के लिए अपनी आवाज़ दी और इन सभी अभिनेताओं पर उनकी आवाज़ ऐसी रची बसी मानो किशोर ख़ुद उनके अंदर मौजूद हों। वैवाहिक जीवन किशोर कुमार की पहली शादी रुमा देवी के से हुई थी, लेकिन जल्दी ही शादी टूट गई और इस के बाद उन्होंने मधुबाला के साथ विवाह किया। उस दौर में दिलीप कुमार जैसे सफल और शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचे अभिनेता जहाँ मधुबाला जैसी रूप सुंदरी का दिल नहीं जीत पाए वही मधुबाला किशोर कुमार की दूसरी पत्नी बनी। 1961 में बनी फ़िल्म ‘झुमरु’ में दोनों एक साथ आए। यह फ़िल्म किशोर कुमार ने ही बनाई थी और उन्होंने ख़ुद ही इसका निर्देशन किया था। इस के बाद दोनों ने 1962 में बनी फ़िल्म ‘हाफ टिकट’ में एक साथ काम किया जिस में किशोर कुमार ने यादगार कॉमेडी कर अपनी एक अलग छवि पेश की। 1976 में उन्होंने योगिता बाली से शादी की मगर इन दोनों का यह साथ मात्र कुछ महीनों का ही रहा। इसके बाद योगिता बाली ने मिथुन चक्रवर्ती से शादी कर ली। 1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बड़ी थीं। किशोर कुमार की आवाज़ की पुरानी के साथ-साथ नई पीढ़ी भी दीवानी है। किशोर जितने उम्दा कलाकार थे, उतने ही रोचक इंसान भी थे। उनके कई किस्से हिन्दी सिनेमा जगत में प्रचलित हैं। किशोर कुमार को अटपटी बातों को अपने चटपटे अंदाज में कहने का फ़ितूर था। ख़ासकर गीतों की पंक्ति को दाएँ से बाएँ गाने में किशोर कुमार ने महारत हासिल कर ली थी। नाम पूछने पर वह कहते थे- रशोकि रमाकु। किशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनकी आवाज़ के जादू से देव आनंद सदाबहार हीरो कहलाए। राजेश खन्ना को सुपर सितारा कहा जाने लगा और अमिताभ बच्चन महानायक हो गए। किशोर कुमार ने बारह साल की उम्र तक गीत-संगीत में महारत हासिल कर ली थी। किशोर कुमार रेडियो पर गाने सुनकर उनकी धुन पर थिरकते थे। किशोर कुमार फ़िल्मी गानों की किताब जमा कर उन्हें कंठस्थ करके गाते थे। घर आने वाले मेहमानों को किशोर कुमार अभिनय सहित गाने सुनाते तो ‘मनोरंजन-कर’ के रूप में कुछ इनाम भी माँग लेते थे। एक दिन अशोक कुमार के घर अचानक संगीतकार सचिन देव वर्मन पहुँच गए। बैठक में उन्होंने गाने की आवाज़ सुनी तो दादा मुनि से पूछा, ‘कौन गा रहा है?’ अशोक कुमार ने जवाब दिया- ‘मेरा छोटा भाई है’। जब तक गाना नहीं गाता, उसका नहाना पूरा नहीं होता।’ सचिन-दा ने बाद में किशोर कुमार को जीनियस गायक बना दिया। मोहम्मद रफ़ी ने पहली बार किशोर कुमार को अपनी आवाज़ फ़िल्म ‘रागिनी’ में गीत ‘मन मोरा बावरा’ के लिए उधार दी। दूसरी बार शंकर-जयकिशन की फ़िल्म ‘शरारत’ में रफ़ी ने किशोर के लिए- ‘अजब है दास्ताँ तेरी ये ज़िंदगी’ गीत गाया। महमूद ने फ़िल्म ‘प्यार किए जा’ में कॉमेडियन किशोर कुमार, शशि कपूर और ओमप्रकाश से ज़्यादा पैसे वसूले थे। किशोर को यह बात अखर गई। किशोर कुमार ने इसका बदला महमूद से फ़िल्म ‘पड़ोसन’ में दुगुना पैसा लेकर लिया। किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे- ‘मेरे दादा-दादियों।’ मेरे नाना-नानियों। मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवे वाले किशोर कुमार का राम-राम। नमस्कार। किशोर कुमार का बचपन तो खंडवा में बीता, लेकिन जब वे किशोर हुए तो इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ने आए। हर सोमवार सुबह खंडवा से मीटरगेज की छुक-छुक रेलगाड़ी में इंदौर आते और शनिवार शाम लौट जाते। सफर में वे हर स्टेशन पर डिब्बा बदल लेते और मुसाफ़िरों को नए-नए गाने सुनाकर मनोरंजन करते थे। किशोर कुमार ज़िंदगीभर कस्बाई चरित्र के भोले मानस बने रहे। मुंबई की भीड़-भाड़, पार्टियाँ और ग्लैमर के चेहरों में वे कभी शामिल नहीं हो पाए। इसलिए उनकी आख़िरी इच्छा थी कि खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाए। इस इच्छा को पूरा किया गया, वे कहा करते थे- ‘फ़िल्मों से संन्यास लेने के बाद वे खंडवा में ही बस जाएँगे और रोजाना दूध-जलेबी खाएँगे। लता मंगेशकर को किशोर कुमार गायकों में सबसे ज़्यादा अच्छे लगते थे। लता जी ने कहा कि किशोर कुमार हर तरह के गीत गा लेते थे और उन्हें ये मालूम था कि कौन सा गाना किस अंदाज़ में गाना है। किशोर कुमार लता जी की बहन आशा भोंसले के भी सबसे पसंदीदा गायक थे और उनका मानना है कि किशोर अपने गाने दिल और दिमाग़ दोनों से ही गाते थे। आज भी उनकी सुनहरी आवाज़ लाखों संगीत के दीवानों के दिल में बसी हुई है और उसका जादू हमारे दिलों दिमाग़ पर छाया हुआ है। वर्ष 1987 में किशोर कुमार ने मुंबई की भागम-दौड़ वाली ज़िंदगी से उब कर यह फैसला किया कि वह फ़िल्मों से संन्यास लेने के बाद वापस अपने गाँव खंडवा जाकर रहेंगे। लेकिन उनका यह सपना भी अधूरा ही रह गया। 13 अक्टूबर 1987 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह पूरी दुनिया से विदा हो गये।भले ही वो आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन अपनी सुरमयी आवाज़ और बेहतरीन अदायगी से वो हमेशा हमारे बीच रहेंगे। किशोर कुमार के प्रसिद्ध गाने कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन….दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना…. अगर तुम न होते…आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ…आदमी जो कहता है… आने वाला पल जाने वाला है…ऐ ख़ुदा हर फ़ैसला तेरा मुझे मंज़ूर है… ओ मेरे दिल के चैन…कोई हमदम न रहा…खाईके पान बनारस वाला… ख्वाब हो तुम या कोई हक़ीकत कौन हो तुम बतलाओ…गीत गाता हूँ मैं… घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं…चलते चलते मेरे ये गीत…चिंगारी कोई भड़के… छूकर मेरे मन को…जीवन से भरी तेरी आँखें…तेरी दुनिया से, होके मजबूर चला… दिल आज शायर है…दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा… दीवाना लेके आया है…दुखी मन मेरे, सुन मेरा कहना…प्यार दीवाना होता है… फिर वोही रात है…फूलों का तारों का…माना जनाब ने पुकारा नहीं… मुसाफ़िर हूँ यारो…मेरा जीवन कोरा काग़ज़ कोरा ही रह गया… मेरी भीगी भीगी सी…मेरे नैना सावन भादों… मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू…ये जीवन है…ये दिल न होता बेचारा… ये शाम मसतानी…रिम झिम गिरे सावन…रोते हुए आते हैं सब… सागर जैसी आँखों वाली…हम हैं राही प्यार के…हमें तुमसे प्यार कितना… ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना…ज़िंदगी प्यार का गीत है… श्रोत-#भारत_कोश(साभार) सुरों के इस महान पुरौन्धा को पुनः नमन,,वंदन,,,,,, जय श्री राम,,

विजय कृष्णा पांडेय

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जरूर देखे बाहुबली फिल्म 


जरूर देखे बाहुबली फिल्म
#बाहुबली की सफलता के पीछे अगर सब से बड़ी कोई बात है तो वो है, उसमे किया गया हिंदुत्व का सम्मान !
फिल्म शुरू होते ही गणेश जी की पूजा, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और भजन, जय भवानी का नारा, महादेव जी को किया गया रक्ताभिषेक और जलाभिषेक, संस्कृत में किया गया राज्याभिषेक, महिष्मति साम्र्याज्य का संस्कृत में राष्ट्रगान आदि कई प्रकार से हिंदुत्व का सम्मान किया गया है फिल्म में
कृपया बाहुबली हर हिंदू कई कई बार ज़रूर देखो ताकि विश्व रिकार्ड बने और ये सब मुल्ला ख़ान कंपनी  परदे पर बहुत कमज़ोर हो जाय ।
हर हर महादेव का जयकारा और भव्य शिवलिंग, शिव भक्ति , कृष्ण पूजा का पूरा 5 मिनट का सीन , सब अद्भुत हैं । सम्पूर्ण भारतीयता । शुद्ध हिंदी और संस्कृत के संवाद । देखकर लगता है शायद पुराने वीर राजा महाराजा और उनके साम्राज्य ऐसे ही होते होंगे
बाहुबली 2 _लोगों को सिर्फ इसलिए पसंद आ रही है कि

इसमें या अल्लाह या मौला

जुम्मे की रात चुम्मे की बात

ऐसे शब्द सुनने को नहीं मिल रहा है
इसमे केवल हमारी संस्कृती हमारी विरासत ,

और हमारे मे कितना बाहुबल था_ और अब भी है वो दिखाया है
जाईये देखिये , और ये तीनो खानो के_ ये लात मारने जैसा अनुभव रहेगा।।
बाहुबली की सफलता अच्छा संकेत हैं

भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा और ऊर्जा दे रही है और ये दक्षिण भारतीय सिनेमा का वो शंखनाद है जो पूरे बॉलीवुड के तमाम निकृष्ट लोगों की नींद हराम कर रहा है..!
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दाऊद के इशारे पर बॉलीवुड में घुसाये जा रहे पाकिस्तानी,

निकाले जा रहे हिन्दू कलाकार
कुमार शानू ,उदित नारायण, अभिजीत, शान, सुखविंदर सिंह, सोनू निगम, अरजीत सिहं ।
आपने कभी ध्यान दिया है कि फ़िल्मों मे 92 के बाद से गायकों का करियर ग्राफ़ कैसा रहा है ??
याद है कुमार शानू जो करियर में पीक पर चढ़कर अचानक ही धुँध में खो गये ।
फिर आये अभिजीत, जिन्हे टाप पर पहुँचकर अचानक

ही काम मिलना बद हो गया
उदित नारायण भी उदय होकर समय से पहले अस्त हो गये।
उसके बाद सुखविंदर अपनी धमाकेदार आवाज से फलक पर छा गये और फिर अचानक ही ग्रहण लग गया
उसके बाद आये शान,और बुलंदियों को छूने के अचानक बाद ही कब नीचे आये पता ही नही लगा।
फिर सोनू निगम कब काम मिलना बंद हुआ, लोग समझ ही नही पाये ।
उसके बाद अरजीत सिंह जिनकी मखमली आवाज ने दिलो मे जगह बनानी शुरू ही

की थी कि सलमान ने उनहे पब्लिकली माफ़ी माँगने के बाद भी फिल्म सुलतान में उनके द्वारा गाया हुआ ‘जग घूमया’ जैसा गाना बाहर निकलवा दिया अौर उसी गाने को पाकिस्तानी गायक राहत फतेह अली खान से गवाया, अौर सिर्फ़ यही नहीं बाद में धीरे धीरे उसका करियर

खतम करने की साज़िश चल रही है।
सारे ही गायकों को असमय बाहर का रास्ता दिखा दिया गया ।
इसके उल्टा पहले चीख़ कर गाने वाले, क़व्वाली

गायक नुसरत फ़तेह अली खान क़व्वाली गाने के

लिये बुलाया जाता है, और पाकिस्तानी गायकों के लिये दरवाज़े खोल दिये जाते हैं। उसके बाद राहत फ़तेह अली खान आते हैं और बॉलीवुड में उन्हे लगातार काम मिलने लगता है और बॉलीवुड की वजह से सुपरहिट हो जाते है।
फिर नये स्टाईल के नाम पर आतिफ़ असलम आते हैं जिनको एक के बाद एक अच्छे गाने मिलने लगते हैं।
अली जाफ़र जैसे औसत गायक को भी काम मिलने में कोई दिक़्क़त नही आती ।
धीरे धीरे पाकिस्तानी हीरो

हीरोइन को भी बॉलीवुड मे लाकर स्थापित किया जाने लगा और भारतियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा
उरी हमले के बाद बैक डोर से चुपके से उन्हे लाने की चाल, कुछ भारतियों की नज़र मे आ गया और उन्होंने निंदा करने की माँग करने की, हिमाक़त कर डाली जो उन्हे नागवार गुज़री और वो पाकिस्तान वापस चले गये
क्या आपको लगता है कि यह महज इत्तिफ़ाक़ है तो आप से बडा भोला कोइ नही
पूरा बॉलीवुड डी-कंपनी या पी-कंपनी (पाकिस्तान) के इशारों पर चलता है, और👆👆 इसका इलाज है टोटल बॉयकाट
सिर्फ़ देशभक्त कलाकारों का 💪💪💪💪💪समर्थन करें
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पहली बार फिल्मकार #S_S_राजामौली साहब ने समूची दुनिया को बताया है कि अपने सांस्कृतिक मूल्यों में लोकप्रिय होने की कितनी ताकत है…फिल्म की शुरुवात समंदर में तैरती बिकनी वाली हीरोइन से नहीं…झरने में आदी योगी शिव की आराधना करने वाले हीरो से भी शूरु हो सकती है..हिट करने के लिए बादशाह और हनी सिंह का फूहड़ रैप की जरूरत नहीं…वैदिक मंत्रोंच्चारण पर भी लोग मन्त्र मुग्ध हो सकतें हैं…क्लीवेज नचाती सनी लियोनी का आइटम साँग जबरदस्ती घुसाना जरुरी नहीं..नादस्वरम और मृदंगम के साथ भरतनाट्यम करती लड़कियां भी दर्शकों में रोमांच पैदा कर सकतीं हैं ..
आज निकलिए घर से बाहर..जाइये अपने घर-परिवार के साथ… क्योंकि आप फिल्म देखने नहीं जा रहें हैं..आप भारतीय सिनेमा का बदलता इतिहास देखने जा रहें हैं..आप भारतीय सिनेमा में पहली बार भारत को देखने जा रहें हैं..बाहुबली मात्र एक फिल्म नहीं…ये अश्लीलता और फूहड़ता के पश्चिमी शोर में अकेले गूंजता हुआ भारतीय शँखनाद है …

#बाहुबली

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अंडरवर्ल्ड के आतंकवादियों की कृपा से चल रहा बालीवुड के कुछ तथाकथित सुपर स्टार, फिल्म रिलीज करने के लिए ईद और क्रिसमस की छुट्टियों का इंतजार करते हैं और “बाहुबली” एक आम सप्ताह में release होकर super-duper हिट साबित होती है …..चलो कोई आश्चर्य नही
जब देश में क्रिकेट का वार्षिक मेला IPL लगा हो, आता है और पहले दिन ही 120 करोड़ कमाती है ….चलो कोई आश्चर्य नही
जब एक आम हिंदुस्तानी परिवार फिल्मो से मुंह फेर रहा हो ….उन्हें फ़िल्म देखने के लिए मजबूर कर रही है ये फ़िल्म ……चलो कोई आश्चर्य नही
पर आश्चर्य की बात ये है कि, इस फ़िल्म ने उन तथाकथित फ़िल्म निर्माताओ और खान बंधुओ को सरे बाजार नंगा कर दिया कि, हिन्दू देवी देवताओं के अपमान से फिल्मे हिट हो जाती है …..जहाँ PK में शिवजी को toilet में छुपते हुवे दिखाया ….वही बाहुबली में शिव लिंग का अभिषेक नायक अपने रक्त से करता है …..शिव लिंग को अपने सर पे उठाता है साथ ही ये फ़िल्म भाषाओ की सीमाओं को भी लांघ रही है
धन्यवाद के पात्र है हमारे दक्षिण के निर्माता-निर्देशक जिन्होंने दिखा दिया कि हिन्दू रीति रिवाजों , हिन्दू पद्धतियों को अगर बारीकी से दिखाए तो जनता सर आंखों पे बिठा लेगी…..
वन्दे मातरम् 💪💪💪
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बाहुबली बेहद जबरदस्त मुवी बिना किसी महिला के अंगो कि नुमाइश के फिल्म बनी और सारे रिकार्ड तोड दिये ……
सोच रहा हु फिर बाॅलीवुड वाली इतनी जांघे दिखाती हे, कभी-कभी टाॅपलेस सीन भी हो जाता है,
अच्छा स्पेश्यली महिलाओं के उपर लेट कर पलंग हिलने वाला सीन और आह! आह! कि ध्वनि ,कामुक दृश्य इत्यादि महिलाओं के गौरवमयी सम्मान को मटियामेट करने वाली रंडियो कि फिल्मे इतनी कोशिशो के बावजूद कभी इतनी कमाई ना कर पाई ।
ना कोई मौला मौला वाला संगीत , ना किसी मस्जिद मजार मे माथा टेकते हिरो हिरोइन का दृश्य।
फ़िल्मी खानों और कटुओं में _और दुबई प्रेमी गैंग में भगदड़ !
जय महाकाल ! हर हर महादेव ! हर हर महादेव !