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नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) क्या फिरोज गांधी मुसलमान थे और इंदिरा गांधी ने निकाह के समय मुस्लिम धर्म स्वीकार किया था ? हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित उर्दू अखबार ‘दैनिक मुंसिफ ने इस तरह का दावा किया है।

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लेख में नेहरू डायनेस्टी के लेखक के एन.राव के हवाले से दावा किया गया कि इंदिरा और फिरोज ने लंदन में एक मस्जिद में जाकर निकाह कर लिया था और इंदिरा को मुसलमान धर्म स्वीकार करना पड़ा।

वैदिक पद्धति से शादी जब इस बात की सूचना महात्मा गांधी को मिली तो उन्होंने इन दोनों को भारत बुला कर वैदिक पद्धति से उनकी शादी करवा दी। फिरोज जहांगीर खान का नाम बदलकर फिरोज गांधी कर दिया गया। 1942 में राजीव के जन्म के बाद दोनों पति-पत्नी अलग हो गए थे। मोहम्मद यूनुस ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि संजय गांधी का मुसलमान ढंग से खतना किया गया था। फिरोज गांधी के पिता जहांगीर खान मुसलमान थे। जबकी उनकी मां रत्तीमाई जो कि पहले पारसी थी, बाद में मुसलमान बन गई थी। फिरोज गांधी की कब्र इलाहाबाद के कब्रिस्तान में मौजूद है जबकि पारसियों की कब्र नहीं बनाई जाती। बाबा के नाम से परहेज इस लेख में एक तरह से सवाल पूछा गया कि वरुण गांधी तक ने अपने नाम के साथ इंदिरा, नेहरू शब्द तो जोड़े पर कभी अपने बाबा के नाम से खुद को नहीं जोड़ा। वैसे कुछ कांग्रेस नेता उन्हें याद करते रहते थे और हर साल अपना पैसा खर्च करके किसी रेस्टोरेंट में उनके जन्मदिन पर छोटी सी पार्टी कर लेते थे। इनमें से एक दिवंगत ब्रजमोहनजी भी थे। फिरोज थे नापसंद मुंसिफ में छपे लेख में दावा किया गया है कि फिरोज गांधी के ससुर जवाहरलाल नेहरू उन्हें सख्त नापसंद करते थे। मूंधरा कांड, जीप घोटाले सरीखे नेहरू सरकार के भ्रष्टाचार के मामले उठाने के कारण, जवाहरलाल नेहरू उनसे काफी नाराज थे।

लेखक ने आगे यह भी दावा किया है कि 12 सितंबर 2012 को फिरोज गांधी की जन्म शताब्दी थी मगर उन्हें केंद्र में सत्तारुढ़ कांग्रेस सरकार ने याद करने की कोई जरुरत नहीं समझी। ऐसा प्रतीत होता है कि फिरोज गांधी के परिवारजनों ने उन्हें भुला दिया है या वह जानबूझकर उनका उल्लेख नहीं करना चाहते। फिरोज गांधी नदरअंदाज आखिर क्या कारण है कि राजीव गांधी और इंदिरा गांधी की वर्षगांठ पर समाचार पत्रों को 8-8 करोड़ के विज्ञापन देने वाली सरकार फिरोज गांधी को बिल्कुल नजरअंदाज क्यों करती रही। हालांकि उस समय सत्ता की बागडोर फिरोज गांधी की पुत्रवधु सोनिया के हाथों में थीं। लेखक ने इस बात पर हैरानी व्यक्त की है कि फिरोज गांधी को शुरु से ही उसका परिवार नजरअंदाज करता रहा है। उनके नाम पर न तो किसी मार्ग का नाम रखा गया है और न ही कोई योजना बनाई गई है। जबकि सैकड़ों जगहें राजीव और इंदिरा गांधी व जवाहरलाल नेहरू के नाम से जुड़ी हुई है। मगर फिरोज गांधी का कोई नाम लेने वाला नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व की बात है कि राहुल गांधी इलाहाबाद के दौरे पर गए थे तो रात के अंधेरे में वह फिरोज गांधी की कब्र भी देख आए। यह समाचार सिर्फ एक पारसी समाचारपत्र ने ही प्रकाशित किया था। फिरोज गांधी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और उनसे खुद जवाहरलाल नेहरू भयभीत रहते थे। फिरोज गांधी अनेक बार लोकसभा के सदस्य चुने गए। फिरोज गांधी को भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है। उन्होंने अपने युग के आर्थिक घोटाले का पर्दाफाश किया था और उसके कारण तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। फिरोज के इस रवैये से नेहरू बहुत परेशान थे। 1960 में जब फिरोज गांधी का निधन हुआ तो दोनों ने चैन की सांस ली।😉🤪😜

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#एकउदाहरणकिनेहरूकोकिसतरहमहानबनायागया
हर वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या ढाई लाख के करीब ही रहती है। लेकिन इस वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन करने वाले भक़्तों की संख्या ने नया रिकॉर्ड बना दिया।
बालटाल और पहलगाम मार्गों के जरिए गत 28 जून से शुरू हुई अमरनाथ तीर्थयात्रा 26 अगस्त को सम्पन्न हुई। इस दौरान 2,85,006 श्रद्धालुओं ने बाबा अमरनाथ के दर्शन किये। इनमें बहुत बड़ी संख्या महिलाओं बुजुर्गों और बच्चों की थी।
यह खबर पढ़ने के बाद मुझे कुछ याद आ गया। बात मेरे बचपन की है।
मुझे अब ठीक से याद नहीं कि वो कक्षा 7 की किताब थी या कक्षा 8 की। लेकिन हिन्दी विषय की उस किताब के पाठ्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी गयी कहानी #मेरी
अमरनाथ_यात्रा हम बच्चों को पढ़ाई जाती थी। उस कहानी का धर्म, आस्था या बाबा अमरनाथ से कोई लेनादेना नहीं था। इसके बजाय उस कहानी में ऑक्सीजन के सिलेंडरों, उनमें खत्म होती ऑक्सीजन का सनसनीखेज जिक्र करके हम बच्चों के दिमाग में यह ठूंसा जाता था कि अमरनाथ यात्रा जानलेवा जोखिमों से भरपूर अत्यन्त दुर्गम यात्रा है और जवाहरलाल नेहरू ने अपनी जान जोखिम में डालकर इतनी खतरनाक अमरनाथ यात्रा को पूरा किया। कुल मिलाकर उस कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यह सिखाना/पढ़ाना/समझाना था कि जवाहरलाल नेहरू केवल राजनेता ही नहीं बल्कि बहुत जांबाज़ और बहादुर व्यक्ति भी था।
ध्यान रहे कि आज भी बालटाल और पहलगाम के बाद अमरनाथ गुफा तक की यात्रा दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलकर ही पूर्ण की जाती है। नेहरू ने भी बालटाल और पहलगाम के बाद यह यात्रा पैदल ही की थी। सैकड़ों वर्ष से वो रास्ते ज्यों के त्यों हैं। अमरनाथ गुफा जिस स्थान पर है उसकी ऊंचाई घटी नहीं है। लाखों की संख्या में महिलाएं बुजुर्ग और बच्चे भी प्रतिवर्ष यह यात्रा करते हैं, वह भी बिना किसी ऑक्सीजन सिलेण्डर के।
अतः बचपन में सरकारी पाठ्य पुस्तक में पढ़ी गयी नेहरू की अमरनाथ यात्रा की वह कहानी याद आती है तो समझ में आता है कि आज़ादी के बाद किसतरह नेहरू परिवार को महान महामानव सिद्ध करने का सुनियोजित षड्यंत्र इस देश में दशकों तक चला। उस षड़यंत्र का शिकार स्कूली बच्चों को बनाया गया।

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इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की कहानी देश के हर नागरिक को जाननी चाहिए,

ताकि वो समझ सकें कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का गठजोड़ किस तरह से धीरे-धीरे पूरे देश की जड़ें कमजोर करने में जुटा हैं..

नंबी नारायणन को 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट टेक्नोलॉजी दुश्मन देश को बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

तब ये मामला कई दिन अखबारों की सुर्खियों में रहा था, मीडिया ने बिना जांचे-परखे पुलिस की थ्योरी पर भरोसा करते हुए उन्हें गद्दार मान लिया था।

गिरफ्तारी के समय नंबी नारायणन रॉकेट में इस्तेमाल होने वाले स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने के बेहद करीब पहुंच चुके थे
इस गिरफ्तारी ने देश के पूरे रॉकेट और क्रायोजेनिक प्रोग्राम को कई दशक पीछे धकेल दिया था।

उस घटना के करीब 24 साल बाद इस महान वैज्ञानिक को अब जाकर इंसाफ मिला है।

वैसे तो नंबी नारायणन 1996 में ही आरोपमुक्त हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपने सम्मान की लड़ाई जारी रखी और अब 24 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ के सारे नेगेटिव रिकॉर्ड को हटाकर उनके सम्मान को दोबारा बहाल करने का आदेश दिया है
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने ने केरल सरकार को आदेश दिया है कि नारायणन को उनकी सारी बकाया रकम, मुआवजा और दूसरे लाभ दिए जाएं
ये रकम केरल सरकार देगी और इसकी रिकवरी उन पुलिस अधिकारियों से की जाएगी जिन्होंने उन्हें जासूसी के झूठे मामले में फंसाया , साथ ही सभी सरकारी दस्तावेजों में नंबी नारायणन के खिलाफ दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने का आदेश दिया गया है।

कोर्ट ने कहा कि उन्हें हुए नुकसान की भरपाई पैसे से नहीं की जा सकती है, लेकिन नियमों के तहत उन्हें 75 लाख रुपये का भुगतान किया जाए। कोर्ट का आदेश सुनने के लिए 76 साल के नंबी नारायणन खुद कोर्ट में मौजूद थे।
नंबी नारायण के खिलाफ लगे आरोपों की जांच सीबीआई से करवाई गई थी और सीबीआई ने 1996 में उन्हें सारे आरोपों से मुक्त कर दिया था
जांच में यह बात सामने आ गई कि भारत के स्पेस प्रोग्राम को डैमेज करने की नीयत से केरल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने नंबी नारायण को फंसाया था, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था
सीबीआई की जांच में ही इस बात के संकेत मिल गए थे कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के इशारे पर केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने नंबी को साजिश का शिकार बनाया
एक इतने सीनियर वैज्ञानिक को न सिर्फ गिरफ्तार करके लॉकअप में बंद किया गया, बल्कि उन्हें टॉर्चर किया गया कि वो बाकी वैज्ञानिकों के खिलाफ गवाही दे सकें

ये सारी कवायद भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने की नीयत से हो रही थी, ये वो दौर था जब भारत जैसे देश अमेरिका से स्पेस टेक्नोलॉजी करोड़ों रुपये किराये पर लिया करते थे
भारत के आत्मनिर्भर होने से अमेरिका को अपना कारोबारी नुकसान होने का डर था। जिसके लिए सीआईए ने वामपंथी पार्टियों को अपना हथियार बनाया
एसआईटी के जिस अधिकारी सीबी मैथ्यूज़ ने नंबी के खिलाफ जांच की थी, उसे कम्युनिस्ट सरकार ने बाद में राज्य का डीजीपी बना दिया , सीबी मैथ्यूज के अलावा तब के एसपी केके जोशुआ और एस विजयन के भी इस साजिश में शामिल होने की बात सामने आ चुकी है

केरल सरकार के अलावा तब केंद्र की कांग्रेस सरकार की भूमिका भी संदिग्ध है, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के खिलाफ साजिश पर अांखें बंद कर ली थीं। बताया जाता है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने इसके लिए ऊपर से नीचे तक नेताओं और अफसरों को मोटी रकम पहुंचाई थी।
अगर नंबी नारायण के खिलाफ साजिश नहीं हुई होती तो भारत को अपना पहला क्रायोजेनिक इंजन 15 साल पहले मिल गया होता और इसरो आज पूरी दुनिया से पंद्रह वर्ष आगे होता
उस दौर में भारत क्रायोजेनिक इंजन को किसी भी हाल में पाना चाहता था। अमेरिका ने इसे देने से साफ इनकार कर दिया। जिसके बाद रूस से समझौता करने की कोशिश हुई, रूस से बातचीत अंतिम चरण में थी, तभी अमेरिका के दबाव में रूस मुकर गया
इसके बाद नंबी नारायणन ने सरकार को भरोसा दिलाया कि वो और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएंगे
उनका ये मिशन सही रास्ते पर चल रहा था कि तब तक वो साजिश के शिकार हो गए नंबी नारायण ने अपने साथ हुई साजिश पर ‘रेडी टु फायर’ नाम से एक किताब भी लिखी
Wall Nelesh pandey

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लोग इंदिरा गाँधी की आलोचना करते है क्योंकि उसने आपातकाल लगाया था जनता से उनके फंडामेंटल राइट्स छीनकर नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए और अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली थी, विरोध करने वालों को बंदी बनाया था,
किंतु क्या आप जानते हैं कि जिनकी कभी आलोचना नहीं की जाती, लुटियंस पत्रकारों के प्रिय लिब्र्लिज्म व् सेक्युलरिज्म के चैम्पियन, भारतीय मिडिया के अनुसार अभिव्यक्ति की आजादी के देवता, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु अपने शासनकाल में फ्रीडम ऑफ़ स्पीच एंड एक्सप्रेशन को किन ऊँचाइयों पर ले गए थे ?

चलिये आज हम आपको बताते हैं की इंदिरा को आपातकाल लगाकर पुरे देश को बंदी बनाने और लोगों को अपने विचार व्यक्त करने हेतु जेल में डालने की प्रेरणा व् सीख अपने पिता जवाहरलाल नेहरु से ही मिली थी और स्वतंत्र भारत में अभिव्यक्ति की आजादी पर सबसे पहला हमला और दमन नेहरू ने ही किया था

अब हम आपको उदाहरण व् प्रमाण सहित नेहरु द्वारा रचे गये अभिव्यक्ति की आजादी के कीर्तिमानों से अवगत करवाते है (पोस्ट के साथ संलग्न फोटो प्रमाणों को अवश्य देखिएगा)

भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री “स्टेट्समैन” जवाहरलाल नेहरू उर्फ़ “चचा” नेहरु ने:-

o मजरूह सुल्तानपुरी को उसके ऊपर कविता लिखने के अपराध में जेल भेज दिया था, 1 साल तक उन्हें जेल में रखा था

o रमेश सहगल से जबरदस्ती उनकी फिल्म काफिला के डायलॉग डिलीट करवाएं गए थे

o साहिर लुधियानवी का गाना सेंसर कर दिया गया था

o प्रदीप की फिल्म से साहिर लुधियानवी का का पूरा पूरा गाना “अमर रहे प्यार” काट दिया गया था

o फिर सुबह होगी फिल्म से दो गाने प्रतिबंधित कर दिए गए थे

oएरिया ऑफ डार्कनेस किताब प्रतिबंधित कर दी गई थी

o मार्क रोबसन की फिल्म “नाइन आवर्स टू रामा” जो स्टैनले वॉलपार्ट की नोवेल नाइन आवर्स टू रामा पर बेस्ड थी वह किताब और फिल्म दोनों प्रतिबंधित कर दी गयी थी

o नोबेल विजेता वी एस नायपॉल कि किताब “एरिया ऑफ डार्कनेस” प्रतिबंधित कर दी गई थी
ओबरी मेनन की किताब “दी रामायण” प्रतिबंधित कर दी थी

o अलेक्जेंडर कैंपबेल कि “द हार्ट ऑफ इंडिया” प्रतिबंधित कर दी थी

o आर्थर कोएस्टलर की “द लोटस एंड द रोबोट” प्रतिबंधित कर दी थी

o 1960 से लेकर 1964 तक किताबों को इंपोर्ट करने पर ब्लैंकेट बैन लगा दिया गया था

o कर्ट फ्रीशलर की किताब “आयशा” पर गजेटेड नोटिफिकेशन निकाल कर प्रतिबंधित किया गया था

o नोबेल विजेता बर्ट्रेंड रसेल की १९६२ भारत-चीन युद्ध पर लिखी किताब “अनआर्म्ड विक्ट्री” पर प्रतिबंध लगा दिया गया था

o “चंद्र मोहिनी और मार्का ए सोमनाथ” के इंपोर्ट पर प्रतिबंध लगा दिया गया था

o रॉबर्ट टेलर की किताब “द डार्क अर्ज” पर प्रतिबंध लगा दिया गया था

o डी एच लॉरेंस की किताब “लेडी चैटर्लीज़ लवर” पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और एक आदमी को उसे बेचने के लिए जेल भेज दिया गया था

o “व्हाट हैज रिलिजन डन फॉर मैनकाइंड” नामक किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था

o क्लुवंक रावत्वंक की किताब “भूपत सिंह” प्रतिबंधित कर दी थी

o अजीज़ बेग की किताब “कैप्टिव कश्मीर” के इंपोर्ट पर बैन लगा दिया था

o मृणाल सेन की फिल्म “नील अक्षर नीचे” प्रतिबंधित कर दी गई थी

o ऑब्रे मेनन की किताब “रामा रिटोल्ड” प्रतिबंधित कर दी गई थी

o स्विस जियोलॉजिस्ट और ह्यूमनिटेरियन टोनी हगेन की किताब “नेपाल” को प्रतिबंधित कर दिया था

o RSS ऑर्गेनाइजर की किताब “प्रॉसिक्यूटर” को प्रतिबंधित कर दिया था

o “गोकुल शंकर” नाम की फिल्म जिसमें गोडसे को दर्शाया गया था उसे प्रतिबंधित कर दिया गया

o नाथूराम गोडसे द्वारा कोर्ट में दिया गया बयान नेहरू ने प्रतिबंधित करवा दिया था

o एस सी गोस्वामी कि फिल्म “रूनुमि” जो कि इब्सेन के प्ले पर बेस्ड थी, को प्रतिबंधित करवा दिया था

o कई उन इतिहासकारों और लेखकों को नेहरू ने बंदी बनाकर जेल में डलवा दिया था जिन्होंने भारत-चीन युद्ध के बाद नेहरू की आलोचना की थी

o जवाहरलाल नेहरु ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिए थे कि सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में वे ना जायें

o नेहरू ने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को कड़े शब्दों में कहा था कि सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में ना जाएं किंतु राष्ट्रपति ने नेहरू की बात अनसुनी कर दी थी

o नेहरू ने 1962 की हिट फिल्म “भूल ना जाना” को प्रतिबंधित कर दिया था जिसके कारण दाना सिंह सदा के लिए नेपथ्य में चले गए

o नेहरू ने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की स्पीच को संसद के रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया था

o नेहरू ने राष्ट्रपति राधाकृष्णन को डॉ राजेंद्र प्रसाद के अंतिम संस्कार में ना जाने के लिए कहा था और नेहरु खुद भी नहीं गए थे

o नेहरू ने विदेशों से कॉस्मेटिक्स का आयात प्रतिबंधित कर दिया था, नेहरु की बेटी ने इसका विरोध किया और तब नेहरू ने जेआरडी टाटा से कहा था कि एक कॉस्मेटिक ब्रैंड शुरू करें और उसका नाम रखा गया लैक्मे

o नेहरू को हारमोनियम की आवाज से चिड़ थी और इसीलिए नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो से वर्षों तक हारमोनियम की आवाज को प्रतिबंधित कर दिया था

o नेहरू ने 1951 में ऑब्जेक्शनएबल मैटर एक्ट बनाकर मीडिया की आजादी को इस तुगलकी कानून द्वारा छीन लिया था

o नेहरू ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया का एक कॉलम भी बंद करा दिया था क्योंकि वह नेहरू के प्रति आलोचनात्मक था

o नेहरू ने “क्रॉसरोड्स” नाम की मैगजीन को प्रतिबंधित कर दिया था

o नेहरू ने ऐतिहासिक प्ले “निंगलेन कम्युनिस्तकी” प्रतिबंधित करा दिया था और अभिनेताओं को बंदी बना दिया था

o नेहरू ने एक समय पर ऑल इंडिया रेडियो पर फिल्मी सॉन्ग प्ले करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था

o नेहरू ने “पराशक्ति” नामक फिल्म पर प्रतिबंध लगवा दिया था

o नेहरू ने “नास्तिक” फिल्म प्रतिबंधित करा दी थी

o नेहरू ने पश्चिमी पॉप और रॉक बैंड और म्यूजिक को ऑल इंडिया रेडियो पर प्रतिबंधित करा दिया था

o नेहरू ने इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन को प्रतिबंधित कर दिया था

o नेहरू ने प्रसिद्ध प्ले “हरिपद मास्टर” को प्रतिबंधित कर दिया था

o नेहरू ने दिलीप कुमार की फिल्म गंगा जमुना को प्रतिबंधित कर दिया था

o नेहरू ने शरद चंद्र चट्टोपाध्याय के “महेश” और रविंद्र नाथ टैगोर के प्ले “गोरा” और
“विसर्जन” को प्रतिबंधित कर दिया था

o नेहरु ने बलराज साहनी के ऐतिहासिक प्ले “जादू की कुर्सी” को प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि इसमें नेहरू को दर्शाया गया था

o नेहरू ने प्रदीप की फिल्म से पूरा एक गाना ही कटवा दिया था क्योंकि उसको शब्दों पर आपत्ति थी

o नेहरू ने “फिर सुबह होगी” नामक फिल्म से दो गाने कटवा दिए था

o नेहरू ने “द मराठा” के एडिटर प्रल्हाद केशव अत्रे को एक आर्टिकल लिखने के लिए जेल भिजवा दिया था

o नेहरू ने दिलीप कुमार की फिल्म जुगनू को भी प्रतिबंधित कर दिया था

o नेहरू ने “झरना” नामक फिल्म प्रतिबंधित कर दी थी

o नेहरू ने टाइम्स ऑफ इंडिया को इश्तिहार प्राप्त करने से प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार ने नेहरू की सरकार की कुछ पॉलिसियों का विरोध किया था

o नेहरु ने अपने कैबिनेट के सभी मंत्रियों को निर्देश दे रखे थे कि यदि कोई भी नेहरू की आलोचना करता है तो वह उसके विरुद्ध कड़ा प्रतिकार करें और इस बात पर जोर दें कि जो भी नेहरु की आलोचना कर रहे हैं वह देशद्रोही व गद्दार हैं

o नेहरु ने अपने घर में टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार का आना ही बंद करवा दिया था क्योंकि उसे लगता था कि टाइम्स ऑफ इंडिया उसकी आलोचना करता है और टाइम्स ऑफ इंडिया के एक लेख जो की एम.ओ मथाई की किताब से उठाया गया था जिसमें दावा किया गया था कि नेहरु की बेटी इंदिरा को किसी अनाम बिजनेसमैन ने साड़ियां उपहार में दी थी उस लेख के विरुद्ध नेहरू ने टाइम्स ऑफ इंडिया से क्षमा पत्र मांगा था

o नेहरू ने हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर से कहा था कि तुम सबसे निचले दर्जे के मनुष्य हो और उसके बाद हिंदुस्तान टाइम्स के मालिकों से कहकर उन्होंने उस एडिटर को नौकरी से निकलवा दिया था और उसका कॉलम प्रतिबंधित करा दिया था

आशा है की अब सागरिका rajdeep रविश शेखर गुप्ता बरखा, स्वाति चतुर्वेदी जैसे नेहरु को पूजने वाले अगली बार अभिव्यक्ति की आजादी और नेहरु शब्द कभी एक साथ इस पंक्ति में प्रयोग नहीं करेंगे
:Rohan Sharma

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निओ दिप

“नेहरू बहादुर” और चीन


~Sushobhit Saktawat

1947-49 में जब आज़ाद हिंदुस्तान का संविधान बनाया जा रहा था, तभी चीन में 1949 की क्रांति हो गई और हुक़ूमत को माओत्से तुंग की “पीपुल्स रिवोल्यूशन” ने उखाड़ फेंका।

नेहरू हमेशा से चीन से बेहतर ताल्लुक़ चाहते थे और च्यांग काई शेक से उनकी अच्छी पटरी बैठती थी, लेकिन इस माओत्से तुंग का क्या करें! कौन है यह माओत्से तुंग और कैसा है इसका मिजाज़, यह जानना नेहरू के लिए ज़रूरी था। लिहाज़ा, उन्होंने अपने राजदूत को माओ से मिलने भेजा।

ये राजदूत वास्तव में एक इतिहासकार थे। प्रख्यात इतिहासविद् केएम पणिक्कर। वे इस भावना के साथ माओ से मिलने पहुंचे कि प्रधानमंत्री चीन के साथ अच्छे रिश्ते बरक़रार रखने के लिए बेताब हैं। लिहाज़ा, उन्होंने माओ से मिलने के बाद जो रिपोर्ट नेहरू को सौंपी, वो कुछ इस तरह से थी :

“मिस्टर चेयरमैन का चेहरा बहुत कृपालु है और उनकी आंखों से तो जैसे उदारता टपकती है। उनके हावभाव कोमलतापूर्ण हैं। उनका नज़रिया फ़िलॉस्फ़रों वाला है और उनकी छोटी-छोटी आंखें स्वप्न‍िल-सी जान पड़ती हैं। चीन का यह लीडर जाने कितने संघर्षों में तपकर यहां तक पहुंचा है, फिर भी उनके भीतर किसी तरह का रूखापन नहीं है। प्रधानमंत्री महोदय, मुझे तो उनको देखकर आपकी याद आई! वे भी आप ही की तरह गहरे अर्थों में “मानवतावादी” हैं!”

मनुष्यता के इतिहास के सबसे दुर्दान्त तानाशाहों में से माओत्से तुंग के बारे में यह निहायत ही हास्यास्पद और झूठी रिपोर्ट पणिक्कर महोदय द्वारा नेहरू बहादुर को सौंपी जा रही थी!

नेहरू बहादुर मुतमुईन हो गए!

महज़ एक साल बाद चीन ने तिब्बत पर चढ़ाई कर दी और उस पर बलात कब्ज़ा कर लिया।

तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के ग़ुस्से का कोई ठिकाना नहीं था और उन्होंने प्रधानमंत्री को जाकर बताया कि चीन ने आपके राजदूत को बहुत अच्छी तरह से मूर्ख बनाया है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन अब पहले से ज़्यादा मज़बूत हो गया है और उससे सावधान रहने की ज़रूरत है। नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा और कहा, “तिब्बत के साथ चीन ने जो किया, वह ग़लत था, लेकिन हमें डरने की ज़रूरत नहीं। आख़िर हिमालय पर्वत स्वयं हमारी रक्षा कर रहा है। चीन कहां हिमालय की वादियों में भटकने के लिए आएगा!”

यह अक्तूबर 1950 की बात है। दिसंबर आते-आते सरदार पटेल चल बसे। अब नेहरू को मनमानी करने से रोकने वाला कोई नहीं था।

भारत और चीन की मीलों लंबी सीमाएं अभी तक अनिर्धारित थीं और किसी भी समय टकराव का कारण बन सकती थीं, ख़ासतौर पर चीन के मिजाज़ को देखते हुए। 1952 की गर्मियों में भारत सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल बीजिंग पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कौन कर रहा था? प्रधानमंत्री नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित!

अब विजयलक्ष्मी पंडित ने नेहरू को चिट्ठी लिखकर माओ के गुण गाए। उन्होंने कहा, “मिस्टर चेयरमैन का हास्यबोध कमाल का है और उनकी लोकप्रियता देखकर तो मुझे महात्मा गांधी की याद आई!” उन्होंने चाऊ एन लाई की भी तारीफ़ों के पुल बांधे।

नेहरू बहादुर फिर मुतमईन हुए!

1954 में भारत ने अधिकृत रूप से मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है और चीन के सा‍थ “पंचशील” समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए।

लेकिन नेहरू के आत्मघाती तरक़श में केएम पणिक्कर और विजयलक्ष्मी पंडित ही नहीं थे। नेहरू के तरक़श में वी कृष्णा मेनन भी थे। भारत के रक्षामंत्री, जिनका अंतरराष्ट्रीय समुदाय में ख़ूब मज़ाक़ उड़ाया जाता था और जो एक बार “टाइम” मैग्ज़ीन के कवर पर संपेरे के रूप में भी चित्र‍ित किए जा चुके थे। भारत में भी उन्हें कोई पसंद नहीं करता था। लेकिन, जैसा कि स्वीडन के तत्कालीन राजदूत अल्वा मिर्डल ने चुटकी लेते हुए कहा था, “वीके कृष्णा मेनन केवल इसीलिए प्रधानमंत्री नेहरू के चहेते थे, क्योंकि एक वे ही थे, जिनसे प्रधानमंत्री कार्ल मार्क्स और चार्ल्स डिकेंस के बारे में बतिया सकते थे!”

रामचंद्र गुहा ने आधुनिक भारत का जो इतिहास लिखा है, उसमें उन्होंने तफ़सील से बताया है कि तब “साउथ ब्लॉक” में एक सर गिरिजा शंकर वाजपेयी हुआ करते थे, जो प्रधानमंत्री को लगातार आगाह करते रहे कि चीन से चौकस रहने की ज़रूरत है, लेकिन प्रधानमंत्री को लगता था कि सब ठीक है। वो “हिंदी चीनी भाई भाई” के नारे बुलंद करने के दिन थे।

1956 में चीन ने “अक्साई चीन” में सड़कें बनवाना शुरू कर दीं, नेहरू के कान पर जूं नहीं रेंगी। भारत-चीन के बीच जो “मैकमोहन” रेखा थी, उसे अंग्रेज़ इसलिए खींच गए थे ताकि असम के बाग़ानों को चीन ना हड़प ले, लेकिन “अक्साई चीन” को लेकर वैसी कोई सतर्कता भारत ने नहीं दिखाई। 1958 में चीन ने अपना जो नक़्शा जारी किया, उसमें “अक्साई चीन” में जहां-जहां उसने सड़कें बनवाई थीं, उस हिस्से को अपना बता दिया। 1959 में भारत ने दलाई लामा को अपने यहां शरण दी तो माओत्से तुंग ग़ुस्से से तमतमा उठा और उसने भारत की हरकतों पर कड़ी निगरानी रखने का हुक्म दे दिया।

1960 में चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई हिंदुस्तान आए और नेहरू से ऐसे गर्मजोशी से मिले, जैसे कोई बात ही ना हो। आज इंटरनेट पर चाऊ की यात्रा के फ़ुटेज उपलब्ध हैं, जिनमें हम इस यात्रा के विरोध में प्रदर्शन करने वालों को हाथों में यह तख़्‍ति‍यां लिख देख सकते हैं कि “चीन से ख़बरदार!” ऐसा लग रहा था कि जो बात अवाम को मालूम थी, उससे मुल्क के वज़ीरे-आज़म ही बेख़बर थे!

1961 में भारत की फ़ौज ने कुछ इस अंदाज़ में “फ़ॉरवर्ड पॉलिसी” अपनाई, मानो रक्षामंत्री मेनन को हालात की संजीदगी का रत्तीभर भी अंदाज़ा ना हो। लगभग ख़ुशफ़हमी के आलम में “मैकमोहन रेखा” पार कर चीनी क्षेत्र में भारत ने 43 चौकियां तैनात कर दीं। चीन तो जैसे मौक़े की ही तलाश में था। उसने इसे उकसावे की नीति माना और हिंदुस्तान पर ज़ोरदार हमला बोला। नेहरू बहादुर हक्के बक्के रह गए। “हिंदी चीनी भाई भाई” के शगूफ़े की हवा निकल गई। पंचशील “पंक्चर” हो गया। भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। चीन ने अक्साई चीन में अपना झंडा गाड़ दिया।

कहते हैं 1962 के इस सदमे से नेहरू आख़िर तक उबर नहीं पाए थे।

पणिक्कर, विजयलक्ष्मी पंडित और वी कृष्णा मेनन : नेहरू की चीन नीति के ये तीन पिटे हुए मोहरे थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री को चीन के बारे में भ्रामक सूचनाएं दीं, क्योंकि प्रधानमंत्री हक़ीक़त सुनने के लिए तैयार नहीं थे। और जो लोग उन्हें हक़ीक़त बताना चाहते थे, उनकी अनसुनी की जा रही थी।

नेहरू बहादुर की पोलिटिकल, कल्चरल और डिप्लोमैटिक लेगसी में जितने भी छेद हैं, यह उनकी एक तस्वीर है। ऐसे ही छेद कश्मीर, पाकिस्तान, सुरक्षा परिषद, कॉमन सिविल कोड, महालनोबिस मॉडल, फ़ेबियन समाजवाद, रूस से दोस्ती और अमरीका से दूरी, आदि अनेक मामलों से संबंधित नेहरू नीतियों में आपको मिलेंगे।

मेरा स्पष्ट मत है कि नेहरू बहादुर को हिंदुस्तान की पहली हुक़ूमत में “एचआरडी मिनिस्टर” होना चाहिए था। उनका इतिहासबोध आला दर्जे का था, लेकिन वर्तमान पर नज़र उतनी ही कमज़ोर। हुक़ूमत चलाना उनके बूते का रोग नहीं था। और हिंदुस्तान की पहली हुक़ूमत में जो जनाब “एचआरडी मिनिस्टर” थे, उन्हें होना चाहिए था अल्पसंख्यक मामलों का मंत्री, ताकि स्कूली किताबों में “अकबर क्यों महान था” और “हिंदू धर्म की पांच बुराइयां बताइए”, ऐसी चीज़ें नहीं पढ़ाई जातीं। और देश का प्रधानमंत्री आप राजगोपालाचारी या वल्लभभाई पटेल में से किसी एक को चुन सकते थे। राजाजी इसलिए कि उनकी नज़र बहुत “मार्केट फ्रेंडली” थी और “लाइसेंस राज” की जो समाजवादी विरासत नेहरू बहादुर चालीस सालों के लिए अपने पीछे छोड़ गए, उससे वे बहुत शुरुआत में ही मुक्त‍ि दिला सकते थे। और सरदार पटेल इसलिए कि हर लिहाज़ से वे नेहरू की तुलना में बेहतर प्रशासक थे!

ये तमाम बातें मौजूदा हालात में फिर याद हो आईं। चीन के साथ फिर से सीमाओं पर तनाव है और किसी भी तरह की ख़ुशफ़हमी नुक़सानदेह है। चीन आपसे गर्मजोशी से हाथ मिलाने के फ़ौरन बाद आप पर हमला बोल सकता है, ये उसकी फ़ितरत रही है। इतिहास गवाह है और वो इतिहासबोध किस काम का, जिससे हम सबक़ नहीं सीख सकते।

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शेयर करे मित्रो ताकि ये सच्चाई हर हिन्दुस्तानी जान सके …

दो घंटे युद्ध और चलता ! तो भारत की सेना ने लाहोर तक कब्जा कर लिया होता !!
लेकिन तभी पाकिस्तान को लगा कि जिस रफ्तार से भारत की सेना आगे बढ़ रही
हमारा तो पूरा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा !

( भारत और पाकिस्तान के बीच १९६५ का युद्ध
भारत पाक युद्ध का भाग
तिथि – अगस्त – सितम्बर 23, 1965
स्थान -भारतीय उपमहाद्वीप
परिणाम-संयुक्त राष्ट्र के घोषनापत्र के द्वारा युद्धविराम .)

तभी पाकिस्तान ने अमेरिका से कहा कि वो किसी तरह से युद्ध रुकवा दे !!
अमेरिका जानता था कि शास्त्री जी इतनी जल्दी नहीं मानने वाले !! क्यूँ कि वो
पहले भी दो -तीन बार भारत को धमका चुका था !!

धमका कैसे चुका था ??

अमेरिका से गेहूं आता था भारत के लिए PL 48 स्कीम के अंडर ! ! PL मतलब
public law 48 ! जैसे भारत मे सविधान मे धराए होती है ऐसे अमेरिका मे PL
होता है ! तो बिलकुल लाल रंग का सड़ा हुआ गेंहू अमेरिका से भारत मे आता था !
और ये समझोता पंडित नेहरू ने किया था !!

जिस गेंहू को अमेरिका मे जानवर भी नहीं खाते थे उसे भारत के लोगो के लिए
आयात करवाया जाता था ! आपके घर मे कोई बुजुर्ग हो आप उनसे पूछ सकते हैं
कितना घटिया गेहूं होता था वो !!तो अमेरिका ने भारत को धमकी दी कि हम भारत को गेहूं देना बंद कर देंगे !
तो शास्त्री जी ने कहा हाँ कर दो ! फिर कुछ दिन बाद अमेरिका का ब्यान आया
कि अगर भारत को हमने गेंहू देना बंद कर दिया ! तो भारत के लोग भूखे मर जाएँगे !!

शास्त्री जी ने कहा हम बिना गेंहू के भूखे मारे या बहुत अधिक खा के मरे !
तुम्हें क्या तकलीफ है !???
हमे भूखे मारना पसंद होगा बेशर्ते तुम्हारे देश का सड़ा हुआ गेंहू खाके !! एक तो हम
पैसे भी पूरे दे ऊपर से सड़ा हुआ गेहूं खाये ! नहीं चाहीये तुम्हारा गेंहू !!

फिर शास्त्री ने दिल्ली मे एक रामलीला मैदान मे लाखो लोगो से निवेदन किया कि
एक तरफ पाकिस्तान से युद्ध चल रहा है ! ऐसे हालातो मे देश को पैसे कि बहुत जरूरत
पड़ती है ! सब लोग अपने फालतू खर्चे बंद करे ! ताकि वो domestic saving से देश
के काम आए ! या आप सीधे सेना के लिए दान दे ! और हर व्यति सप्ताह से एक दिन
सोमवार का वर्त जरूर रखे !!

तो शास्त्री जी के कहने पर देश के लाखो लोगो ने सोमवार को व्रत रखना शुरू कर दिया !
हुआ ये कि हमारे देश मे ही गेहु बढ्ने लगा ! और शास्त्री जी भी खुद सोमवार का व्रत
रखा रखते थे !!शास्त्री जी ने जो लोगो से कहा पहले उसका पालन खुद किया ! उनके घर मे बाई
आती थी !! जो साफ सफाई और कपड़े धोती थी ! तो शास्त्री जी उसको हटा दिया और
बोला ! देश हित के लिए मैं इतना खर्चा नहीं कर सकता ! मैं खुद ही घर कि सारी सफाई
करूंगा !क्यूंकि पत्नी ललिता देवी बीमार रहा करती थी !
और शास्त्री अपने कपड़े भी खुद धोते थे ! उनके पास सिर्फ दो जोड़ी धोती कुरता ही थी !!

उनके घर मे एक ट्यूटर भी आया करता था जो उनके बच्चो को अँग्रेजी पढ़ाया करता
था ! तो शास्त्री जी ने उसे भी हटा दिया ! तो उसने शास्त्री जी ने कहा कि आपका अँग्रेजी
मे फेल हो जाएगा ! तब शास्त्री जी ने कहा होने दो ! देश के हजारो बच्चे अँग्रेजी मे ही
फेल होते है तो इसी भी होने दो ! अगर अंग्रेज़ हिन्दी मे फेल हो सकते है तो भारतीय
अँग्रेजी मे फेल हो सकते हैं ! ये तो स्व्भविक है क्यूंकि अपनी भाषा ही नहीं है ये !!

एक दिन शास्त्री जी पत्नी ने कहा कि आपकी धोती फट गई है ! आप नहीं धोती ले
आईये ! शास्त्री जी ने कहा बेहतर होगा ! कि सोई धागा लेकर तुम इसको सिल दो !
मैं नई धोती लाने की कल्पना भी नहीं कर सकता ! मैंने सब कुछ छोड़ दिया है पगार
लेना भी बंद कर दिया है !! और जितना हो सके कम से कम खर्चे मे घर का खर्च चलाओ !!अंत मे शास्त्री जी युद्ध के बाद समझोता करने ताशकंद गए ! और फिर जिंदा कभी वापिस
नहीं लौट पाये !! पूरे देश को बताया गया की उनकी मृत्यु हो गई ! जब कि उनकी ह्त्या
कि गई थी !!

भारत मे शास्त्री जी जैसा सिर्फ एक मात्र प्रधानमंत्री हुआ ! जिसने अपना पूरा जीवन
आम आदमी की तरह व्तीत किया ! और पूरी ईमानदारी से देश के लिए अपना फर्ज
अदा किया !!
जिसने जय जवान और जय किसान का नारा दिया !!

क्यूंकि उनका मानना था देश के लिए अनाज पैदा करने वाला किसान और सीमा कि
रक्षा करने वाला जवान बहुत दोनों देश ले लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है !!

स्वदेशी की राह पर उन्होने देश को आगे बढ़ाया ! विदेशी कंपनियो को देश मे घुसने
नहीं दिया ! अमेरिका का सड़ा गेंहू बंद करवाया !!

ऐसा प्रधानमंत्री भारत को शायद ही कभी मिले ! अंत मे जब उनकी paas book
चेक की गई तो सिर्फ 365 रुपए 35 पैसे थे उनके बैंक आकौंट मे ! !

शायद आज कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसा नेता भारत मे हुआ !!

मेरे आदर्श लालबहादुर शास्त्री ।।

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Marriage invitation card of Pandit Jawaharlal Nehru


Marriage invitation card of Pandit Jawaharlal Nehru. Where is “Om” ? Where is Ganesha and his Stotra ? Where is Swastika ? Where is Kalasha ? Is this the card of a Pandit ?  Urdu mixed Persian is the language not Sanskrit or Hindi is the language without any auspicious symbol or words of Hindus. Whereas during those times, in my area, all bramhin’s marriage invitation cards were in Sanskrit. (Please draw your own conclusions about Giyasuddin Gazi and his successors. 😀)

पहले कार्ड में ये लिखा है – इल्तिजा है कि बरोज़ शादीबरखुर्दार जवाहर लाल नेहरूतारीख 7 फरवरी सन् 1916, बवक़्त 4 बजे शामजनाब मआ अज़ीज़ानग़रीब ख़ाना पर चा नोशी फ़रमा करब हमरही नौशादौलत ख़ाना समधियान पर तशरीफ़ शरीफ़अरज़ानी फ़रमाएंबंदा मोती लाल नेहरूनेहरू वेडिंग कैम्पअलीपुर रोड, दिल्ली

दूसरा दावत नामा जो कि मोतीलाल नेहरू की तरफ से मेहमानों को आनंद भवन (इलाहाबाद) में बुलाते हुए छपवाया गया था, उसे भी देखियेःतमन्ना है कि बतक़रीब शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरूसाथदुख़्तर पंडित जवाहर मल कौलबमुक़ाम देहलीबतारीख़ 7 फरवरी, सन् 1916 व तक़ारीबमाबाद बतवारीख़8 और 9 फरवरी, सन् 1916जनाब मआ अज़ीज़ान शिरकत फ़रमा करमुसर्रत और इफ़्तेख़ार बख़्शेंबंदा मोती लाल नेहरूमुंतज़िर जवाबआनंद भवन इलाहाबाद

तीसरा कार्ड बहुरानी यानी कमला कौल के स्वागत कार्यक्रम से संबंधित था जिसमें खाने के इंतेजाम का जिक्र था और अजीज लोगों से दावत में शामिल होने की गुजारिश थी। ये कार्ड दो पन्नों में छपा था। कार्ड के शब्द इस प्रकार से हैः शादीबरख़ुर्दार जवाहर लाल नेहरूसाथदुख़्तर पंडित जवाहर मल कौल साहब, आरज़ू है कि बतक़रीब आमदन बहूरानीतारीख़ 9 फ़रवरी, सन् 1916 बवक़्त 8 बजे शामजनाब मअ अज़ीज़ान ग़रीबख़ाना पर तनावुल मा हज़र फ़रमा करमुसर्रत व इफ़्तेख़ार बख़्शेंबंदा मोती लाल नेहरूनेहरू वेडिंग कैम्प अलीपुर रोड, देहली

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मियां नेहरू उर्फ़ मुबारक अली का गन्दा सच
…………यादों के झरोखे से………….
जब मियाँ नेहरू ने खरबपति डालमिया को मिट्टी में मिला दिया
देश के प्रथम प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप में अपने विरोधियों को निपटाने में माहिर था…..इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस व्यक्ति ने नेहरू के सामने सिर उठाया उसी को नेहरू ने मिट्टी में मिला दिया। देशवासी प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद और सुभाष बाबू के साथ उनके निर्मम व्यवहार के बारे में वाकिफ होंगे मगर इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपनी जिद्द के कारण देश के उस समय के सबसे बड़े उद्योगपति सेठ रामकृष्ण डालमिया को बड़ी बेरहमी से मुकदमों में फंसाकर न केवल कई वर्षों तक जेल में सड़ा दिया बल्कि उन्हें कौड़ी-कौड़ी का मोहताज कर दिया।
जहां तक रामकृष्ण डालमिया का संबंध है वे राजस्थान के एक कस्बा चिड़ावा में एक गरीब घर में पैदा हुए थे और मामूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने मामा के पास कोलकाता चले गए थे। वहां पर बुलियन मार्केट में एक दलाल के रूप में उन्होंने अपने व्यापारिक जीवन का श्रीगणेश किया था। भाग्य ने डंटकर डालमिया का साथ दिया और कुछ ही वर्षों के बाद वे देश के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए। उनका औद्योगिक साम्राज्य देशभर में फैला हुआ था जिसमें समाचारपत्र, बैंक, बीमा कम्पनियां, विमान सेवाएं, सीमेंट, वस्त्र उद्योग, खाद्य पदार्थ आदि सैंकड़ों उद्योग शामिल थे।
डालमिया सेठ के दोस्ताना रिश्ते देश के सभी बड़े-बड़े नेताओं से थी और वे उनकी खुले हाथ से आर्थिक सहायता किया करते थे। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना उनके व्यक्तिगत और गहरे मित्रों में थे। पाकिस्तान के निर्माण के बाद सेठ डालमिया ने जिन्ना के नई दिल्ली स्थित बंगले को दस लाख रूपये में खरीदा था जो उस वक्त एक बड़ी रकम मानी जाती थी। जिन्ना के साथ डालमिया की दोस्ती नेहरू को फूटी आंख नहीं भाती थी। इसके बाद एक घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया। कहा जाता है कि डालमिया एक कट्टर सनातनी हिन्दू थे और उनके विख्यात हिन्दू संत स्वामी करपात्री जी महाराज से घनिष्ट संबंध थे। कृपात्री जी महाराज ने 1948 में एक राजनीतिक पार्टी राम राज्य परिषद स्थापित की थी। 1952 के चुनाव में यह पार्टी लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी और उसने 18 सीटों पर विजय प्राप्त की। हिन्दू कोड बिल और गोवध पर प्रतिबंध लगाने के प्रश्न पर डालमिया से नेहरू की ठन गई। पंडित नेहरू अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को उनके पति फिरोज गांधी से तलाक दिलाने के लिए हिन्दू कोड बिल पारित करवाना चाहते थे जबकि स्वामी करपात्री जी महाराज और डालमिया सेठ इसके खिलाफ थे। हिन्दू कोड बिल और गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्वामी करपात्रीजी महाराज ने देशव्यापी आंदोलन चलाया जिसे डालमिया जी ने डंटकर आर्थिक सहायता दी। नेहरू के दबाव पर लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पारित हुआ जिसमें हिन्दू महिलाओं के लिए तलाक की व्यवस्था की गई थी। कहा जाता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद हिन्दू कोड बिल के सख्त खिलाफ थे इसलिए उन्होंने इसे स्वीकृति देने से इनकार कर दिया। जिद्दी मियां नेहरू ने इसे अपना अपमान समझा और इस विद्येयक को संसद के दोनों सदनों से पुनः पारित करवाकर राष्ट्रपति के पास भिजवाया। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति को इसकी स्वीकृति देनी पड़ी।
इस घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया। कहा जाता है कि नेहरू ने अपने विरोधी सेठ राम कृष्ण डालमिया को निपटाने की एक योजना बनाई। नेहरू के इशारे पर डालमिया के खिलाफ कंपनियों में घोटाले के आरोपों को लोकसभा में जोरदार ढंग से उछाला गया। इन आरोपों के जांच के लिए एक विविन आयोग बना। बाद में यह मामला स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिसमेंट को जांच के लिए सौंप दिया गया। नेहरू ने अपनी पूरी सरकार को डालमिया के खिलाफ लगा दिया। उन्हें हर सरकारी विभाग में प्रधानमंत्री के इशारे पर परेशान और प्रताड़ित करना शुरू किया। उन्हें अनेक बेबुनियाद मामलों में फंसाया गया। नेहरू की कोप दृष्टि ने एक लाख करोड़ के मालिक डालमिया को दिवालिया बनाकर रख दिया। उन्हें टाइम्स आॅफ इंडिया और अनेक उद्योगों को औने-पौने दामों पर बेंचना पड़ा। अदालत में मुकदमा चला और डालमिया को तीन साल कैद की सजा सुनाई गई। तबाह हाल और अपने समय के सबसे धनवान व्यक्ति डालमिया को मियां नेहरू की वक्र दृष्टि के कारण जीवन के अन्तिम दिनों में जेल के कालकोठरी में ही गुजारनी पड़ी।
व्यक्तिगत जीवन में डालमिया बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने अच्छे दिनों में करोड़ों रुपये धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए दान में दिये। इसके अतिरिक्त उन्होंने यह संकल्प भी लिया था कि जबतक इस देश में गोवध पर कानूनन प्रतिबंध नहीं लगेगा वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। उन्होंने इस संकल्प को अंतिम सांस तक निभाया। पुत्र रत्न को प्राप्त करने के लिए डालमिया ने अपने जीवन में छह विवाह किए मगर लाख अनुष्ठान करने के बावजूद वे पुत्र रत्न का मूंह न देख पाए। उनके घर केवल लड़कियां ही पैदा हुईं। नेहरू की कोप दृष्टि के कारण एक लाख करोड़ का मालिक अपने अन्तिम दिनों में कौड़ी-कौड़ी का मोहताज हो गया। उसकी सारी सम्पत्ति और सभी उद्योग बिक गए। गरीबी की हालत में 1978 में 85 वर्ष की आयु में उनका दिल्ली में निधन हो गया।

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जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ जो किया वो इतना भयावह था की जान कर आप नेहरु से नफरत करने लगेंगे..

टीवी चैनेल पर कांग्रेस पार्टी के नेताओ के द्वारा अक्सर ये आरोप लगते हुए सुना जाता है की प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया.

लेकिन क्या आप को यह पता है जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पत्नी के साथ क्या किया ?
जवाहरलाल नेहरु की पत्नी कमला नेहरु को टीबी हो गया था .. उस जमाने में टीबी की दहशत ठीक ऐसा ही थी जैसे आज एड्स की है .. क्योंकि तब टीबी का इलाज नही था और इन्सान तिल तिल तडप तडप कर पूरी तरह गलकर हड्डी का ढांचा बनकर मरता था … और कोई भी टीबी मरीज के पास भी नहीं जाता था क्योंकि टीबी सांस से फैलती थी … लोग मरीजोंको पहाड़ी इलाके में बने टीबी सेनिटोरियम में भर्ती कर देते थे ..

नेहरु ने अपनी पत्नी को युगोस्लाविया [आज चेक रिपब्लिक] के प्राग शहर में दुसरे इन्सान के साथ सेनिटोरियम में भर्ती कर दिया ..

कमला नेहरु पुरे दस सालो तक अकेले टीबी सेनिटोरियम में पल पल मौत का इंतजार करती रही.. लेकिन नेहरु दिल्ली में एडविना बेंटन के साथ इश्क करते थे.. सबसे शर्मनाक बात तो ये है की इस दौरान नेहरु कई बार ब्रिटेन गये लेकिन एक बार भी उन्होंने प्राग जाकर अपनी धर्मपत्नी का हालचाल नही लिया .

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को जब पता चला तब वो प्राग गये .. और डाक्टरों से और अच्छे इलाज के बारे में बातचीत की .. प्राग के डाक्टरों ने बोला की स्विट्जरलैंड के बुसान शहर में एक आधुनिक टीबी होस्पिटल है जहाँ इनका अच्छा इलाज हो सकता है..

तुरंत ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उस जमाने में 70 हजार रूपये इकट्ठे किये और उन्हें विमान से स्विटजरलैंड के बुसान शहर में होस्पिटल में भर्ती किया ..

लेकिन कमला नेहरु असल में मन से बेहद टूट चुकी थी.. उन्हें इस बात का दुःख था की उनका पति उनके पास पिछले दस सालो से हाल चाल लेने तक नही आया और गैर लोग उनकी देखभाल कर रहे है..दो महीनों तक बुसान में भर्ती रहने के बाद 28 February 1936 को बुसान में ही कमला नेहरु की मौत हो गयी..

उनके मौत के दस दिन पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र ने नेहरु को तार भेजकर तुरंत बुसान आने को कहा था .. लेकिन नेहरु नही आये..फिर नेहरु को उनकी पत्नी की मौत की खबर भेजी गयी .. फिर भी नेहरु अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में भी नही आये ..

अंत में स्विटजरलैंड के बुसान शहर में ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नेहरु की पत्नी कमला नेहरु का अंतिम संस्कार करवाया. जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार किया उसे हम चाचा नेहरू कहते हैं।
यह मेसेज इतना फैलाओ की लोग असलियत को जाने और इनकी फर्जी चाचा की पदवी निकाल ली जाये।।।

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अपना अमूल्य समय देकर इस पोस्ट का अवश्य पाठन करें, डॉ होमी भामा, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक भी कहे जाते है — પ્રહલાદ પ્રજાપતિ


‎Santosh Kumar Hande‎ to I SUPPORT .P. M. MODI (BJP) 2019 अपना अमूल्य समय देकर इस पोस्ट का अवश्य पाठन करें, डॉ होमी भामा, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक भी कहे जाते है डॉक्टर भाभा ने युद्ध से बहुत पहले ही ये बता दिया था कि, मैंने वो टेक्नॉलॉजी खोज ली है जो मेरे देश […]

via अपना अमूल्य समय देकर इस पोस्ट का अवश्य पाठन करें, डॉ होमी भामा, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक भी कहे जाते है — પ્રહલાદ પ્રજાપતિ