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*मृत्यु का रहस्य*  

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*किरलियान फोटोग्राफी ने मनुष्‍य के सामने कुछ वैज्ञानिक तथ्‍य उजागर किये हैं। किरलियान ने मरते हुए आदमी के फोटो लिए, उसके शरीर से ऊर्जा के छल्‍ले बाहर लगातार विसर्जित हो रहे थे, और वो मरने के तीन दिन बाद तक भी होते रहे। मरने के तीन दिन बाद जिसे हिन्‍दू तीसरा मनाता है।*
*अब तो वह जलाने के बाद औपचारिक तौर पर उसकी हड्डियाँ उठाना ही तीसरा हो गया। यानि अभी जिसे हम मरा समझते हैं वो मरा नहीं है। आज नहीं कल वैज्ञानिक कहते हैं तीन दिन बाद भी मनुष्‍य को जीवित कर सकेगें।*
*और एक मजेदार घटना किरलियान के फोटो में देखने को मिली। की जब आप क्रोध की अवस्‍था में होते हो तो तब वह ऊर्जा के छल्‍ले आपके शरीर से निकल रहे होते हैं। यानि क्रोध भी एक छोटी मृत्‍यु तुल्‍य है।*
*एक बात और किरलियान ने अपनी फोटो से सिद्ध की कि मरने से ठीक छह महीने पहले ऊर्जा के छल्‍ले मनुष्‍य के शरीर से निकलने लग जाते हैं। यानि मरने की प्रक्रिया छ: माह पहले शुरू हो जाती है, जैसे मनुष्‍य का शरीर मां के पेट में नौ महीने विकसित होने में लेता है वैसे ही उसे मिटने के लिए छ: माह का समय चाहिए। फिर तो दुर्घटना जैसी कोई चीज के लिए कोई स्‍थान नहीं रह जाता, हां घटना के लिए जरूर स्‍थान है।*
*भारत में हजारों साल से योगी मरने के छ:माह पहले अपनी तिथि बता देते थे।*
*ये छ: माह कोई संयोगिक बात नहीं है। इस में जरूर कोई रहस्‍य होना चाहिए। कुछ और तथ्‍य किरलियान ने मनुष्‍य के जीवन के सामने रखे, एक फोटो में उसने दिखाया है, छ:  महीने पहले जब उसने जिस मनुष्‍य को फोटो लिया तो उसके दायें हाथ में ऊर्जा प्रवाहित नहीं हो रही थी। यानि दाया हाथ उर्जा को नहीं दर्शा रहा था। जबकि दांया हाथ ठीक ठाक था, पर ठीक छ: माह बाद अचानक एक ऐक्सिडेन्ट के कारण उस आदमी का वह हाथ काटना पड़ा।*
*यानि हाथ की ऊर्जा छ: माह पहले ही अपना स्‍थान छोड़ चुकी थी।*
*भारतीय योग तो हजारों साल से कहता आया है कि मनुष्‍य के स्थूल शरीर में कोई भी बिमारी आने से पहले आपके सूक्ष्‍म शरीर में छ: माह पहले आ जाती है। यानि छ: माह पहले अगर सूक्ष्म शरीर पर ही उसका इलाज कर दिया जाये तो बहुत सी बिमारियों पर विजय पाई जा सकती है।*
*इसी प्रकार भारतीय योग कहता है कि मृत्‍यु की घटना भी अचानक नहीं घटती वह भी शरीर पर छ: माह पहले से तैयारी शुरू कर देती है। पर इस बात का एहसास हम क्‍यों नहीं होता।*
*पहली बात तो मनुष्‍य मृत्‍यु के नाम से इतना भयभीत है कि वह इसका नाम लेने से भी डरता है। दूसरा वह भौतिक वस्तुओं के साथ रहते-रहते इतना संवेदन हीन हो गया है कि उसने लगभग अपनी अतीन्द्रिय शक्‍तियों से नाता तोड़ लिया है। वरन और कोई कारण नहीं है।*
*पृथ्‍वी का श्रेष्‍ठ प्राणी इतना दीन हीन। पशु पक्षी भी अतीन्द्रिय ज्ञान में उससे कहीं आगे है।*
*साइबेरिया में आज भी कुछ ऐसे पक्षी हैं जो बर्फ गिरने के ठीक 14 दिन पहले वहां से उड़ जाते हैं। न एक दिन पहले न एक दिन बाद।*
*जापान में आज भी ऐसी चिड़िया पाई जाती है जो भुकम्‍प के12 घन्‍टे पहले वहाँ से गायब हो जाती है।* 
*और भी न जाने कितने पशु-पक्षी हैं जो अपनी अतीन्द्रिय शक्‍ति के कारण ही आज जीवित हैं।*
*भारत में हजारों योगी मरने की तिथि पहले ही घोषित कर देते हैं। अभी ताजा घटना विनोबा भावे जी की है। जिन्‍होंने महीनों  पहले कह दिया था कि में शरद पूर्णिमा के दिन अपनी देह का त्‍याग करूंगा।*
*ठीक महाभारत काल में भी भीष्‍म पितामह ने भी अपने देह त्‍याग के लिए दिन चुना था। कुछ तो हमारे स्थूल शरीर के उपर ऐसा घटता है, जिससे योगी जान जाते हैं कि अब हमारी मृत्‍यु का दिन करीब आ गया है।*
*आम आदमी उस बदलाव को क्‍यों नहीं कर पाता। क्‍योंकि वह अपने दैनिक कार्यो के प्रति सोया हुआ है। योगी थोड़ा सजग हुआ है। वह जागने का प्रयोग कर रहा है। इसी से उस परिर्वतन को वह देख पाता है महसूस कर पाता है।*
*एक उदाहरण। जब आप रात को बिस्तर पर सोने के लिए जाते है। सोने ओर निंद्रा के बीच में एक संध्या काल आता है, एक न्यूटल गीयर, पर वह पल के हज़ारवें हिस्‍से के समान होता है। उसे देखने के लिए बहुत होश चाहिए। आपको पता ही नहीं चल पाता कि कब तक जागे ओर कब नींद में चले गये। पर योगी सालों तक उस पर मेहनत करता है। जब वह उस संध्‍या काल की अवस्था से परिचित हो जाता है। मरने के ठीक छ: महीने पहले मनुष्‍य के चित्त की वही अवस्‍था सारे दिन के लिए हो जाती है। तब योगी समझ जाता है अब मेरी बड़ी संध्‍या का समय आ गया। पर पहले उस छोटी संध्‍या के प्रति सजग होना पड़ेगा। तब महासंध्या के प्रति आप जान पायेंगे।*
*और हमारे पूरे शरीर का स्नायु तंत्र प्राण ऊर्जा का वर्तुल उल्‍टा कर देता है। यानि आप साँसे तो लेंगे पर उसमें प्राण तत्‍व नहीं ले रहे होगें। शरीर प्राण तत्‍व छोड़ना शुरू कर देता है। ध्यान में बैठिए व सजग हो जाइए।*
 *_में खुद से पहले सुला देता हूँ…_*

*_हर रात सारी ख्वाहिशों को_* 
 
*_कमाल यह कि हर सुबह ये_*

 *_मुझसे पहले जाग जाती हैं_*
            🙏 *जय श्री कृष्ण* 🙏

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श्री हनुमत प्रश्नावली यंत्र से जाने अपनी समस्याओं का समाधान

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अनिष्ट ग्रहों से बचाव के उपाय

सूर्य : सूर्य अनिष्ट हो तो हृदय रोग उदर संबंधी नेत्र

संबंधी ऋण मानहानी अपयश होता है। ऐसे में जातक

सूर्य उपासना, रविवार का व्रत, हरिवंश पुराण का

पाठ करें।

चंद्र : चंद्र अगर कमजोर हो तो शारीरिक आर्थिक

मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।

मिर्गी माता को कष्ट होता है। ऐसे में कुलदेवी की

उपासना चावल पानी का दान करें।

मंगल : भाई का विरोध, अचल सम्पत्ति, पुलिस

कार्रवाई अदालती अड़चने हिंसा, चोरी आदि मंगल

के कमजोर होने पर होते हैं। ऐसे में सुंदरकांड का पाठ,

हनुमान चालीसा, हनुमान जी की आराधना

फलदायक होती है।

बुध : पथरी, बवासीर, ज्वर, गुर्दा, स्नायुरोग, दंत,

विकार बुध की दुर्बलता से होता है। ऐसे में दुर्गा

सप्तशती का पाठ करें व पंता रत्न धारण करें।

गुरू : विवाह में बाधा, अपनों से वियोग घर में तनाव,

घर से विरक्ती होती है। ऐसे में श्रीमद भागवत का

पाठ, हरी पूजन व गुरुवार का व्रत करें।

शुक्र : वायु प्रकोप, संतान उत्पन्न करने में अक्षमता,

दुर्बल शरीर, अतिसार, अजीर्ण आदि शुक्र के कारण

होता है। ऐसे में मां लक्ष्मी की उपासना, खीर का

दान करें।

शनि : दाम्पत्य जीवन का कलह पूर्ण होना गुप्त रोग,

दुर्घटना, अयोग्य संतान आदि शनि के कारण होता

है। भैरव जी की आराधना शनि उपासना, मांस

मदिरा से परहेज करें।

राहु : आकस्मिक घटना भूत–प्रेत बाधा ज्वर विदेश

यात्रा टीबी, बवासीर आदि रोग होते हैं। राहु का

प्रभाव राजनीति क्षेत्र में माना जाता है। ऐसे में

कन्या दान, भैरव आराधना करें।

केतु : घुटने में दर्द मधुमेह ऐश्वर्य नाश ऋण का बढ़ना

पुत्रों पर संकट आदि होता है। कुत्ते को रोटी, कम्बल

का दान आदि किया जाता है।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹राधे राधे🙏🏻

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वास्तुशास्‍त्र की आठ प्रमुख दिशाएं एवं उनक महत्व
वास्तुशास्‍त्र में आठ प्रमुख दिशाओं का जिक्र आता है, जो मनुद्गय के समस्त कार्य-व्यवहारों को प्रभावित करती हैं। इनमें से प्रत्येक दिशा का अपना-अपना विशेष महत्व है। अगर आप घर या कार्यस्थल में इन दिशाओं के लिए बताए गए वास्तु सिद्धांतों का अनुपालन करते हैं, तो इसका सकारात्मक परिणाम आपके जीवन पर होता है। इन आठ दिद्गााओं को आधार बनाकर आवास/कार्यस्थल एवं उनमें निर्मित प्रत्येक कमरे के वास्तु विन्यास का वर्णन वास्तुशास्‍त्र में आता है।
वास्तुशास्‍त्र कहता है कि ब्रहांड अनंत है। इसकी न कोई दशा है और न दिशा। लेकिन हम पृथ्वीवासियों के लिए दिद्गााएं हैं। ये दिद्गााएं पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाने वाले गृह सूर्य एवं पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर आधारित हैं। यहां उल्लेखनीय है कि आठों मूल दिद्गााओं के प्रतिनिधि देव हैं, जिनका उस दिशा पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका विस्तृत वर्णन नीचे किया गया है।
यहां हम आठ मूलभूत दिशाओं और उनके महत्व के साथ-साथ प्रत्येक दिशा के उत्तम प्रयोग का वर्णन कर रहे हैं। चूंकि वास्तु का वैज्ञानिक आधार है, इसलिए यहां वर्णित दिशा-निर्देश पूर्णतः तर्क संगत हैं।
पूर्व दिशा :

इस दिशा के प्रतिनिधि देवता सूर्य हैं। सूर्य पूर्व से ही उदित होता है। यह दिशा शुभारंभ की दिशा है। भवन के मुखय द्वार को इसी दिद्गाा में बनाने का सुझाव दिया जाता है। इसके पीछे दो तर्क हैं। पहला- दिशा के देवता सूर्य को सत्कार देना और दूसरा वैज्ञानिक तर्क यह है कि पूर्व में मुखय द्वार होने से सूर्य की रोशनी व हवा की उपलब्धता भवन में पर्याप्त मात्रा में रहती है। सुबह के सूरज की पैरा बैंगनी किरणें रात्रि के समय उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को खत्म करके घर को ऊर्जावान बनाएं रखती हैं।
उत्तर दिशा :

इस दिशा के प्रतिनिधि देव धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा ध्रूव तारे की भी है। आकाश में उत्तर दिशा में स्थित धू्रव तारा स्थायित्व व सुरक्षा का प्रतीक है। यही वजह है कि इस दिशा को समस्त आर्थिक कार्यों के निमित्त उत्तम माना जाता है। भवन का प्रवेश द्वार या लिविंग रूम/ बैठक इसी भाग में बनाने का सुझाव दिया जाता है। भवन के उत्तरी भाग को खुला भी रखा जाता है। चूंकि भारत उत्तरी अक्षांश पर स्थित है, इसीलिए उत्तरी भाग अधिक प्रकाशमान रहता है। यही वजह है कि उत्तरी भाग को खुला रखने का सुझाव दिया जाता है, जिससे इस स्थान से घर में प्रवेश करने वाला प्रकाश बाधित न हो।
उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) :

यह दिशा बाकी सभी दिशाओं में सर्वोत्तम दिशा मानी जाती है। उत्तर व पूर्व दिशाओं के संगम स्थल पर बनने वाला कोण ईशान कोण है। इस दिशा में कूड़ा-कचरा या शौचालय इत्यादि नहीं होना चाहिए। ईशान कोण को खुला रखना चाहिए या इस भाग पर जल स्रोत बनाया जा सकता है। उत्तर-पूर्व दोनों दिशाओं का समग्र प्रभाव ईशान कोण पर पडता है। पूर्व दिशा के प्रभाव से ईद्गाान कोण सुबह के सूरज की रोद्गानी से प्रकाशमान होता है, तो उत्तर दिशा के कारण इस स्थान पर लंबी अवधि तक प्रकाश की किरणें पड ती हैं। ईशान कोण में जल स्रोत बनाया जाए तो सुबह के सूर्य कि पैरा-बैंगनी किरणें उसे स्वच्छ कर देती हैं।
पश्चिम दिशा :

यह दिशा जल के देवता वरुण की है। सूर्य जब अस्त होता है, तो अंधेरा हमें जीवन और मृत्यु के चक्कर का एहसास कराता है। यह बताता है कि जहां आरंभ है, वहां अंत भी है। शाम के तपते सूरज और इसकी इंफ्रा रेड किरणों का सीधा प्रभाव पश्चिमी भाग पर पड ता है, जिससे यह अधिक गरम हो जाता है। यही वजह है कि इस दिद्गाा को द्गायन के लिए उचित नहीं माना जाता। इस दिशा में शौचालय, बाथरूम, सीढियों अथवा स्टोर रूम का निर्माण किया जा सकता है। इस भाग में पेड -पौधे भी लगाए जा सकते हैं।
उत्तर- पश्चिम (वायव्य कोण) :

यह दिशा वायु देवता की है। उत्तर- पश्चिम भाग भी संध्या के सूर्य की तपती रोशनी से प्रभावित रहता है। इसलिए इस स्थान को भी शौचालय, स्टोर रूम, स्नान घर आदी के लिए उपयुक्त बताया गया है। उत्तर-पद्गिचम में शौचालय, स्नानघर का निर्माण करने से भवन के अन्य हिस्से संध्या के सूर्य की उष्मा से बचे रहते हैं, जबकि यह उष्मा द्गाौचालय एवं स्नानघर को स्वच्छ एवं सूखा रखने में सहायक होती है।
दक्षिण दिशा :

यह दिशा मृत्यु के देवता यमराज की है। दक्षिण दिशा का संबंध हमारे भूतकाल और पितरों से भी है। इस दिशा में अतिथि कक्ष या बच्चों के लिए शयन कक्ष बनाया जा सकता है। दक्षिण दिशा में बॉलकनी या बगीचे जैसे खुले स्थान नहीं होने चाहिएं। इस स्थान को खुला न छोड़ने से यह रात्रि के समय न अधिक गरम रहता है और न ज्यादा ठंडा। लिहाजा यह भाग शयन कक्ष के लिए उत्तम होता है।
दक्षिण- पश्चिम (नैऋत्य कोण) :

यह दिशा नैऋुती अर्थात स्थिर लक्ष्मी (धन की देवी) की है। इस दिद्गाा में आलमारी, तिजोरी या गृहस्वामी का शयन कक्ष बनाना चाहिए। चूंकि इस दिशा में दक्षिण व पश्चिम दिशाओं का मिलन होता है, इसलिए यह दिशा वेंटिलेशन के लिए बेहतर होती है। यही कारण है कि इस दिशा में गृह स्वामी का द्गायन कक्ष बनाने का सुझाव दिया जाता है। तिजोरी या आलमारी को इस हिस्से की पश्चिमी दीवार में स्थापित करें।
दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) :

इस दिशा के प्रतिनिध देव अग्नि हैं। यह दिशा उष्‍मा, जीवनशक्ति और ऊर्जा की दिशा है। रसोईघर के लिए यह दिशा सर्वोत्तम होती है। सुबह के सूरज की पैराबैंगनी किरणों का प्रत्यक्ष प्रभाव पडने के कारण रसोईघर मक्खी-मच्छर आदी जीवाणुओं से मुक्त रहता है। वहीं दक्षिण- पश्चिम यानी वायु की प्रतिनिधि दिशा भी रसोईघर में जलने वाली अग्नि को क्षीण नहीं कर पाती

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क्या हवन के माध्यम से बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है ?

प्रश्न :- क्या हवन के माध्यम से बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है ?
उत्तर :- हाँ ! हवन में विशेष प्रकार के पदार्थों की आहुति देने से कई प्रकार के रोग नष्ट होते हैं, इसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में यज्ञ चिकित्सा कहते हैं | विश्व के कई देशों में रोगों को दूर करने के लिए यज्ञ चिकित्सा का प्रचलन बढ़ रहा है | कुछ रोगों के सन्दर्भ में नीचे दिए उपायों को पढ़ें –
# टाइफाईड – नीम, चिरायता, पितपापडा, त्रिफला सम्भाग शुद्ध गौ घृत मिश्रित आहुति दें
# ज्वरनाशक – अजवाइन की आहुति हवन में दें
# नजला, जुकाम, सिरदर्द – मुनक्का की आहुति हवन में दें
# नेत्रज्योति वर्धक – शहद की आहुति हवन में दें
# मस्तिष्क बलवर्धक – शहद व सफ़ेद चन्दन की आहुति दें
# वातरोग नाशक – पिप्पली की आहुति दें
# मनोविकार नाशक – गुग्गल और अपामार्ग की आहुति दें
# मानसिक उन्माद नाशक – सीताफल के बीज एवं जटामासी चूर्ण की आहुति दें
# पीलिया नाशक – देवदारु, चिरायत, नागरमोथा, कुटकी और वायविडग्ग की आहुति दें
# मधुमेह नाशक – गुग्गल, लोभान, जामुन के वृक्ष की छाल और करेला के डंठल संभाग की आहुति दें
# चित्त भ्रम नाशक – कचूर, खस, नागरमोथा महुआ, सफ़ेद चन्दन, गुग्गल, अगर, बड़ी इलायची, नरवी और शहद की आहुति दें
# क्षय नाशक – गुग्गल, सफ़ेद चन्दन, गिलोय बांसा का चूर्ण और कपूर की आहुति दें
# मलेरिया नाशक – गुग्गल, लोभान, कपूर, कचूर, हल्दी, दारुहल्दी, अगर, वायविडग्ग, जटामासी, वच, देवदारु, कठु, अजवाइन, नीम पत्ते, समभागचूर्ण, की आहुति दें
# सर्वरोग नाशिनी – गुग्गल, वच, गंध, नीम पत्ते, आक पत्ते, अगर, राल, देवदारु, छिलका सहित मसूर की आहुति दें
# जोड़ों का दर्द – निर्गुन्डी के पत्ते, गुग्गल, सफ़ेद सरसों, नीम पत्ते और राल संभाग चूर्ण की आहुति दें
# निमोनिया नाशक – पोहकर मूल, वच, लोभान, गुग्गल और अडूसा संभाग चूर्ण की आहुति दें
# जुकाम नाशक – खुरासानी अजवाइन, जटामासी, पशमीना कागज, लाल बूरा और संभाग चूर्ण की आहुति दें
# पीनस – बरगद पत्ते, तुलसी पत्ते, नीम पत्ते, वायविडग्ग, सहजने की छाल संभाग चूर्ण में धूप का चूरा मिलाकर आहुति दें
# कफ नाशक – बरगद पत्ते, तुलसी पत्ते, वच, पोहकर मूल, अडूसा पत्र सम्भाग चूर्ण की आहुति दें
# सिर दर्द नाशक – काले तिल और वायविडग्ग चूर्ण की आहुति दें
# चेचक, खसरा नाशक – गुग्गल, लोभान, नीम पत्ते, गंधक, कपूर, काले तिल और वायविडग्ग चूर्ण की आहुति दें
# जिव्हा तालू रोग नाशक – मुलहटी, देवदारु, गंधाविरोजा, राल, गुग्गल, पीपल, कुलंजन, कपूर और लोभान की आहुति दें
# कैंसर नाशक – गूलर फूल, अशोक छाल, अर्जन छाल, लोध्र, माजूफल, दारुहल्दी, हल्दी, खोपरा, तिल, जौ चिकनी सुपारी, शतावर, काकजंघा, मोचरस, खस, मंजीष्ठ, अनारदाना, सफ़ेद चन्दन, लाल चन्दन, गंधा, विरोजा, नरवी, जामुन पत्ते, धाय के पत्ते सम्भाग चूर्ण में दस गुना शक्कर औ एक गुना केसर से दिन में तीन बार हवन करें |

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शमी :

शमी के पौधे के बारे में तमाम भ्रांतियां मौजूद हैं और

लोग आम तौर पर इस पौधे को लगाने से डरते-बचते हैं।

ज्योतिष में इसका संबंध शनि से माना जाता है और शनि

की कृपा पाने के लिए इस पौधे को लगाकर

इसकी पूजा-उपसना की जाती

है।

पूजन-लाभ : इसका पौधा घर के मुख्य द्वार के बाईं ओर लगाना

शुभ है। शमी वृक्ष के नीचे नियमित रूप

से सरसों के तेल का दीपक जलाएं, इससे शनि का

प्रकोप और पीड़ा कम होगी और आपका

स्वास्थ्य बेहतर बना रहेगा।

विजयादशमी के दिन शमी की

विशेष पूजा-आराधना करने से व्यक्ति को कभी

भी धन-धान्य का अभाव नहीं होता।

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