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भूमि-प्राप्तिके लिये अनुष्ठान
भूमि-प्राप्तिके लिये अनुष्ठान
किसी व्यक्तिको प्रयत्न करनेपर भी निवासके लिये
भूमि अथवा मकान न मिल रहा हो, उसे भगवान्
वराहकी उपासन करनी चाहिये । भगवान् वराहकी
उपासना करनेसे, उनके मस्तक जप करनेसे, उनकी स्तुति –
प्रार्थना करनेसे अवश्य ही निवासके योग्य भूमि या
मकान मिल जाता है ।
स्कन्दपुराणके वैष्णवखण्डमें आया है कि भूमि प्राप्त
करनेके इच्छुक मनुष्यको सदा ही इस मन्त्रका जप करना
चाहिये –
ॐ नमः श्रीवराहाय धरण्ययुद्धारणाय स्वाहा ।
ध्यान – भगवान् वराहके अंगोंकी कान्ति शुद्ध
स्फटिक गिरिके समान श्वेत है । खिले हुए लाल
कमलदलोंके समान उनके सुन्दर नेत्र हैं । उनका मुख
वराहके समान है, पर स्वरुप सौम्य है । उनकी चार
भुजाऍ हैं । उनके मस्तकपर किरीट शोभा पाता हैं और
वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्ल है । उनके चार
हाथोंमें चक्र, शङ्ख, अभय – मुद्रा और कमल सुशोभित
है । उनकी बायीं जाधपर सागराम्बरा पृथ्वीदेवी
विराजमान हैं । भगवान् वराह लाल, पीले वस्त्र पहने
तथा लाल रंगके ही आभूषणोंसे विभूषित हैं ।
श्रीकच्छपके पृष्ठके मध्य भागमें शेषनागकी मूर्ति है ।
उसके ऊपर सहस्त्रदल कमलका आसन है और उसपर
भगवान् वराह विराजमान हैं ।
उपर्युक्त मन्त्रके सङ्कर्षण ॠषि, वाराह देवता, पंक्ति
छन्द और श्री बीज है । उसके चार लाख जप करे और घी
व मधुमिश्रित खीरका हवन करे ।

विक्रम प्रकाश

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किसी भी प्रकार के दान करने से पहले इसे जरूर पढ़ें।


किसी भी प्रकार के दान करने से पहले इसे जरूर पढ़ें। 💐 💐 🌷 💐 💐 🌷 💐 💐 🌷 💐 💐 🌷 💐 💐 🌷 💐 💐 ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक वस्तु का दान करने के पीछे एक उद्देश्य, उससे मिलने वाला परिणाम एवं उसमें छिपा विज्ञान है। हर वस्तु अपने दान के उपरांत उससे संबंधित परिणाम देती है। ऐसा कहा जाता है कि दान की गई वस्तुओं में कुछ ऐसी शक्ति होती है कि जिसके माध्यम से ही हमें मन मुताबिक फल की प्राप्ति होती है। आपने यह तो सुना होगा कि जन्म कुण्डली के विभिन्न ग्रहों को शांत करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के दान कर्म किए जाते हैं। जैसा हमें ज्योतिषी बताते हैं हम उसी अनुसार वस्तुओं का दान करते हैं। लेकिन क्या कभी किसी ज्योतिषी ने आपको बताया है कि किस समय कैसा दान नहीं करना चाहिए? जन्म कुण्डली में कुछ ग्रहों को मजबूत एवं दुष्ट ग्रहों को शांत करने के लिए तो हम दान-पुण्य करते ही हैं, लेकिन ग्रहों की कैसी स्थिति में हमें कैसा दान नहीं करना चाहिए, यह भी जानने योग्य बात है। 🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞 सूर्य ग्रह सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिंह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है। यदि किसी जातक की कुण्डली में सूर्य इन्हीं दो राशियों में से किसी एक में हो तो उसे लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए। इसके अलावा गुड़, आटा, गेहूं, तांबा आदि दान नहीं करना चाहिए। सूर्य की ऐसी स्थिति में ऐसे जातक को नमक कम करके, मीठे का सेवन अधिक करना चाहिए। चंद्र ग्रह 🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝🌝 चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में अपनी राशि का होता है। यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में चंद्र ग्रह ऐसी स्थिति में हो तो, उसे खाद्य पदार्थों में दूध, चावल एवं आभूषणों में चांदी एवं मोती का दान नहीं करना चाहिए। ऐसे जातक के लिए माता या अपने से बड़ी किसी भी स्त्री से दुर्व्यवहार करना हानिकारक हो सकता है। किसी स्त्री का अपमान करने पर ऐसे जातक मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं। मानसिक तनाव हो सकता है जिस जातक के लिए चंद्र ग्रह स्वराशि हो उसे किसी नल, टयूबवेल, कुआं, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग नहीं करना चाहिए। यह उस जातक के लिए आर्थिक रूप से हानिकारक सिद्ध हो सकता है। मंगल ग्रह 🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺 मंगल मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है। यदि आपकी कुण्डली में मंगल ग्रह ऐसी स्थिति में है तो, मसूर की दाल, मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान ना करें। मीठे खाद्य पदार्थ का दान निषेध आपके घर यदि मेहमान आए हों तो उन्हें कभी सौंफ खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कटु वचनों का प्रयोग करेगा। यदि मंगल ग्रह के प्रकोप से बचना चाहते हैं तो किसी भी प्रकार का बासी भोजन न तो स्वयं खाएं और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें। बुध ग्रह ✳✳✳✳✳✳✳✳ बुध मिथुन राशि में तो स्वराशि तथा कन्या राशि में हो तो उच्च राशि का कहलाता है। यदि किसी जातक की जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो, उसे हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान कभी नहीं करना चाहिए। हरे रंग के वस्त्र हरे रंग के वस्त्र, वस्तु और यहां तक कि हरे रंग के खाद्य पदार्थों का दान में ऐसे जातक के लिए निषेध है। इसके अलावा इस जातक को न तो घर में मछलियां पालनी चाहिए और न ही स्वयं कभी मछलियों को कभी दाना डालना चाहिए। बृहस्पति ग्रह 🔆🔆🔆🔆🔆🔆🔆 बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है। जिस जातक की कुण्डली में बृहस्पति ग्रह ऐसी स्थिति में हो तो, उसे पीले रंग के पदार्थ नहीं करना चाहिए। सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुओं आदि का दान नहीं करना चाहिए। इन वस्तुओं का दान करने से समाज में सम्मान कम होता है। शुक्र ग्रह ⭐🌟🌟🌟🌟🌟🌟⭐ शुक्र ग्रह वृष या तुला राशि में हो स्वराशि का एवं मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है। जिस जातक की कुण्डली में शुक्र ग्रह की ऐसी स्थिति हो, तो उसे श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में कमी आने लगती है। इसके अलावा नई खरीदी गई वस्तुओं का एवं दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान भी नहीं करना चाहिए। शनि ग्रह 🔵🔵🔵🔵🔵🔵🔵🔵 शनि यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही तथा तुला राशि में हो तो उच्च राशि का कहलाता है। यदि आपकी कुण्डली में शनि की स्थिति है तो आपको काले रंग के पदार्थों का दान कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए। इसके अलावा लोहा, लकड़ी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान नहीं करना चाहिए। काला रंग ऐसे जातक को अपने घर में काले रंग का कोई पशु जैसे कि भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि नहीं पालना चाहिए। ऐसा करने से जातक की निजी एवं सामाजिक दोनों रूप से हानि हो सकती है। राहु ग्रह ⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫⚫ राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष एवं मिथुन राशि में हो तो उच्च का होता है। जिस जातक की कुण्डली इसमें से किसी भी एक स्थिति का योग बने, तो ऐसे जातक को नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए। इसके अलावा अन्न का अनादर करने से परहेज करना चाहिए। जब भी ये खाना खाने बैठें, तो उतना ही लें जितनी भूख हो, थाली में जूठन छोड़ना इन्हें भारी पड़ सकता है। केतु ग्रह 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 केतु यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक या फिर धनु राशि में हो तो उच्चता को प्राप्त होता है। यदि आपकी कुण्डली में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो आपको घर में कभी पक्षी नहीं पालना चाहिए, अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा। इसके अलावा भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए। 💐💐🌷💐💐🌷💐💐🌷💐💐🌷💐💐🌷💐💐नोट – अपना भुत-भविष्य जानने के लिए और सटीक उपायो के लिए सम्पर्क करे मगर ध्यान रहे ये सेवाएं सशुल्क और पेड़ कंसल्टिंग के तहत है , जानने के लिए अपनी फ़ोटो, वास्तु की फ़ोटो, दोनों हथेलियो की फ़ोटो और बर्थ डिटेल्स भेजे ज्योतिषाचार्य,लाल किताब, वास्तु तज्ञ,kp, वैदिक पराशरी जैमिनी एक्सपर्ट ,तन्त्र प्रवीण ज्योतिष भास्कर त्रिवीक्रम Whats app no 9021076371 अपॉइंटमेंट लेने के बाद ही कॉल करे

विक्रम प्रकाश राइसोनि

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दुर्गा सप्तशती के सिद्ध चमत्कारी मंत्र मार्कण्डेय पुराण में


दुर्गा सप्तशती के सिद्ध चमत्कारी मंत्र मार्कण्डेय पुराण में ब्रह्माजी ने मनुष्यों के रक्षार्थ परमगोपनीय साधन, कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपाय संपूर्ण प्राणियों को बताया, जो देवी की नौ मूर्तियां-स्वरूप हैं, जिन्हें ‘नवदुर्गा’ कहा जाता है, उनकी आराधना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक की जाती है। श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता है, क्योंकि श्री दुर्गा सप्तशती दैत्यों के संहार की शौर्य गाथा से अधिक कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी हैं। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। यह देवी महात्म्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है। सप्तशती में कुछ ऐसे भी स्रोत एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत पारायण से इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। * सर्वकल्याण हेतु – सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥ * बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए इस मंत्र का जाप फलदायी है- सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः। मनुष्यों मत्प्रसादेन भव‍िष्यंति न संशय॥ * आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के चमत्कारिक फल देने वाले मंत्र को स्वयं देवी दुर्गा ने देवताओं को दिया है- देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ * विपत्ति नाश के लिए- शरणागतर्द‍िनार्त परित्राण पारायणे। सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥ * ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपदा प्राप्ति एवं शत्रु भय मुक्ति के लिए- ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः। शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥ * विघ्ननाशक मंत्र- सर्वबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी। एवमेव त्याया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्‌॥ जाप विधि- नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें। शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष या तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पांच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। पूरी नवरात्रि जाप करने से वांच्छित मनोकामना अवश्य पूरी होती है। समयाभाव में केवल दस बार मंत्र का जाप निरंतर प्रतिदिन करने पर भी मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।

विक्रम प्रकाश रसनोई

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व्यक्ति को उसके अच्छे-बुरे सभी कर्मों का फल उसके भाग्य के रूप में मिलता है।


व्यक्ति को उसके अच्छे-बुरे सभी कर्मों का फल उसके भाग्य के रूप में मिलता है। अच्छे कर्मों पर अच्छा तथा बुरे कर्मों पर बुरा भाग्य बनता है। हालांकि ज्योतिष के कुछ विशेष उपायों (तांत्रिक टोने-टोटकों सहित) को अपना कर व्यक्ति अपने भाग्य में कुछ हद तक परिवर्तन कर सकता है परन्तु पूरी तरह बदलना केवल ईश्वर कृपा और अच्छे कर्मों से ही संभव हो पाता है। इस पोस्ट में हम आपके लिए लाएं हैं ऐसे ही कुछ विशेष टोने-टोटके जो आपके भाग्य को पूरी तरह तो नहीं बदल सकते परन्तु आपकी समस्या का तुरंत निराकरण अवश्य कर देंगे, रोगों से मुक्ति पाने के लिए (1) कोई असाध्य रोग हो जाए तथा दवाईयां काम करना बंद कर दें तो पीडि़त व्यक्ति के सिरहाने रात को एक तांबे का सिक्का रख दें तथा सुबह इस सिक्के को किसी श्मशान में फेंक दें। दवाईयां असर दिखाना शुरू कर देंगी और रोग जल्दी ही दूर हो जाएगा। (2) यदि व्यक्ति चिड़चिढ़ा हो रहा है तथा बात-बात पर गुस्सा हो रहा है तो उसके ऊपर से राई-मिर्ची उसार कर जला दें। तथा पीडि़त व्यक्ति को उसे देखते रहने के लिए कहें। (3) सुबह कुल्ला किए बिना पानी, दूध अथवा चाय न पिएं। साथ ही उठते ही सबसे पहले सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों के दर्शन करें। इससे स्वास्थ्य तो सही रहेगा ही, भाग्य भी चमक उठेगा। (4) यदि किसी के साथ बार-बार दुर्घटना होती हैं तो शुक्ल पक्ष (अमावस्या के तुरंत बाद का पहला) के प्रथम मंगलवार को 400 ग्राम दूध से चावल धोकर बहती नदी अथवा झरने में प्रवाहित करें। यह उपाय लगातार सात मंगलवार करें, दुर्घटना होना बंद हो जाएगा। (5) यदि कोई पुराना रोग ठीक नहीं हो रहा हो तो गोमती चक्र को लेकर एक चांदी की तार में पिरोएं तथा पलंग के सिरहाने बांध दें। रोग जल्दी ही पीछा छोड़ देगा। (6) सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करें तो नीम की नवीन कोपलें, गुड़ व मसूर के साथ पीस कर खाने से व्यक्ति पूरे वर्ष निरोग तथा स्वस्थ रहता है। धन की प्राप्ति के लिए (1) सोमवार को शिव-मंदिर में जाकर दूध मिश्रित जल शिवलिंग पर चढ़ाएं तथा रूद्राक्ष की माला से ‘ऊँ सोमेश्वराय नम:’ का 108 बार जप करें। साथ ही पूर्णिमा को जल में दूध मिला कर चन्द्रमा को अध्र्य देकर व्यवसाय में उन्नति की प्रार्थना करें, तुरन्त ही असर दिखाई देगा। (2) यदि बेहद कोशिशों के बाद भी घर में पैसा नहीं रूकता है तो एक छोटा सा उपाय करें। सोमवार या शनिवार को थोड़े से गेहूं में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर पिसवा लें। बाद में इस आटे को पूरे आटे में मिला लें। घर में बरकत रहेगी और लक्ष्मी दिन दूना रात चौगुना बढऩे लगेगी। (3) घर में लक्ष्मी के स्थाई वास के लिए एक लोहे के बर्तन में जल, चीनी, दूध व घी मिला लें। इसे पीपल के पेड़ की छाया के नीचे खड़े होकर पीपल की जड़ में डाले। इससे घर में लक्ष्मी का स्थाई वास होता है। (4) घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए एक मिट्टी के सुंदर से बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के लाल कपड़े में बांधकर रखें। इसके बाद बर्तन को गेहूं या चावल के भर कर घर के वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोने में रख दें। ऐसा करने से घर में धन का कभी कोई अभाव नहीं रहेगा। ससुराल में सुखी रहने के लिए (1) साबुत काले उड़द में हरी मेहंदी मिलाकर जिस दिशा में वर-वधू का घर हो, उस और फेंक दें, दोनों के बीच परस्पर प्रेम बढ़ जाएगा और दोनों ही सुखी रहेंगे। (2) यदि कन्या 7 साबुत हल्दी की गांठें, पीतल का एक टुकड़ा, थोड़ा सा गुड लेकर ससुराल की तरफ फेंक दें तो वह कन्या को ससुराल में सुख ही सुख मिलता है। (3) शादी के बाद जब कन्या विदा हो रही हो तो एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी सी हल्दी, एक पीला सिक्का लेकर कन्या के सिर के ऊपर से 7 बार उसार कर उसके आगे फेंक दें। उसका वैवाहिक जीवन सदा सुखी रहनोट – अपना भुत-भविष्य जानने के लिए और सटीक उपायो के लिए सम्पर्क करे मगर ध्यान रहे ये सेवाएं सशुल्क और पेड़ कंसल्टिंग के तहत है , जानने के लिए अपनी फ़ोटो, वास्तु की फ़ोटो, दोनों हथेलियो की फ़ोटो और बर्थ डिटेल्स भेजे ज्योतिषाचार्य,लाल किताब, वास्तु तज्ञ,kp, वैदिक पराशरी जैमिनी एक्सपर्ट ,तन्त्र प्रवीण ज्योतिष भास्कर त्रिवीक्रम Whats app no 9021076371 अपॉइंटमेंट लेने के बाद ही कॉल करे

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प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान


प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान Ancient Indian Astronomy ब्रह्मांड के गूढ रहस्यों की सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी भारतीयो को बहुत प्राचीन समय से रही है। सृष्टि के आदि से ही वेदों में ज्ञान-विज्ञान से आर्य लोग विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को साक्षात कर लेते है फिर चाहे वह खगोल विज्ञान हो , शरीर रचना , विमान आदि या फिर परमाणु जैसी शक्ति हो। फ्रांस निवासी जेकालयट आर्यावर्त की विज्ञान को देखकर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक (दि) बाइबल इन इंडिया में लिखता है कि “सब विद्या भलाइयों का भंडार आर्यावर्त है।” आर्यावर्त से ज्ञान विज्ञान को अरब वालों ने सीखा व तथा अरब से ही यूरोप पहुंचा। इसका एक प्रमाण यह है कि मिल साहब अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इंडिया , जिल्द-2 पृष्ठ १०७ पर लिखते है कि “खलीफा हारुरशीद और अलमामू ने भारतीय ज्योतिषियों को अरब बुलाकर उनके ग्रन्थों (वेदों, पुराणों व उपनिषदों) का अरबी में अनुवाद करवाया।” इसके अलावा मिस्टर बेबर इंडियन लिटरेचर नामक अपनी पुस्तक में लिखते है कि “आर्य ग्रीकों और अरबों के गुरु थे। आर्यभट्ट के ग्रन्थों का अनुवाद कर उनका नाम धर्मबहर रखा गया। अल्बेरूनी लिखता है कि अंकगणित शास्त्र में हिन्दू लोग संसार कि सब जतियों से बढ़कर है। संसार की कोई भी जाति हजार से आगे के अंक नहीं जानती है जबकि हिन्दू लोगों में १८ अंक तक की संख्याओं के नाम है और वे उसे परार्ध कहते है। ancient indian astronomy Ancient Vedic Arithmetic मैं यहाँ कुछ वेदों के मंत्रो से उद्धरण प्रस्तुत करके प्रमाण सहित संक्षेप में खगोल विज्ञान की सभी जानकारी वेदों में प्राचीन समय से या यूँ कहें की सृष्टि की आदि में ही ईश्वर से प्राप्त होती है , उनको यहाँ दे रहा हूँ । आर्य उच्च कोटि के विद्वान थे, इसको हम इस प्रकार सिद्ध कर सकते है :- 1. पृथ्वी के आकार का ज्ञान:- चक्राणास परीणह पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमाना । न हिन्वानाससित तिरुस्त इन्द्र परि स्पशो अद्धात् सूर्येण ॥ -ऋग्वेद१-३३-८ मंत्र से स्पष्ट है कि पृथ्वी गोल है तथा सूर्य के आकर्षण पर ठहरी है। शतपथ में जो परिमण्डल रूप है वह भी पृथ्वी कि गोलाकार आकृति का प्रतीक है। भास्कराचार्य जी ने भी पृथ्वी के गोल होने व इसमें आकर्षण (चुम्बकीय) शक्ति होने जैसे सभी सिद्धांतों वेदाध्ययन के आधार पर ही अपनी पुस्तक सिद्धान्त शिरोमणि(गोलाध्याय व ४-४) में प्रतिपादित किये। कांसे से बना प्राचीन भारतीय खगोल :- प्राचीन भारतीय खगोल प्राचीन भारतीय खगोल 2. आयं गो पृश्निर क्रमीदसवन्मातारं पुर: । पितरं च प्रयन्त्स्व ॥ – यजुर्वेद ३-६ मंत्र से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी जल सहित सूर्य के चारों ओर घूमती जाती है। भला आर्यों को ग्वार कहने वाले स्वयं जंगली ही हो सकते है। ग्रह-परिचालन सिद्धान्त को महाज्ञानी ही लिख सकते है। 3. वेद सूर्य को वृघ्न कहते है अर्थात पृथ्वी से सैकड़ो गुणा बड़ा व करोड़ो कोस दूर। क्या ग्वार जाति यह सब विज्ञान के गूढ रहस्य जान सकती है? 4. दिवि सोमो अधिश्रित -अथर्ववेद १४-९-९ जिस तरह चन्द्रलोक सूर्य से प्रकाशित होता है, उसी तरह पृथ्वी भी सूर्य से प्रकाशित होती है। 5. एको अश्वो वहति सप्तनामा । -ऋग्वेद १-१६४-२ सूर्य की सात किरणों का ज्ञान ऋग्वेद के इसी मंत्र से संसार को ज्ञात हुआ । अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मय: । – अथर्ववेद १७-१०-१७-९ सूर्य की सात किरणें दिन को उत्पन्न करती है। सूर्य के अंदर काले धब्बे होते है। 6. यं वै सूर्य स्वर्भानु स्तमसा विध्यदासुर: । अत्रय स्तमन्वविन्दन्न हयन्ये अशक्नुन ॥ – ऋग्वेद ५-४०-९ अर्थात जब चंद्रमा पृथ्वी ओर सूर्य के बीच में आ जाता है तो सूर्य पूरी तरह से स्पष्ट दिखाई नहीं देता। चंद्रमा द्वारा सूर्य को अंधकार में घेरना ही सूर्यग्रहण है । अत: स्पष्ट है कि आर्यों को सूर्य-चन्द्रग्रहण के वैज्ञानिक कारणों का परिज्ञान था तथा पृथ्वी की परिधि का भी ठीक-ठीक ज्ञान था। 7. सिद्धान्त शिरोमणि में तुरीय यंत्र (दूरबीन) का स्पष्ट पता चलता है। नीचे दी चित्र में सिद्धान्त शिरोमणि का प्रमाण :- prachin vigyan ancient indian astronomy>>> चित्र में शिल्प संहिता में लिखा है कि पहले मिट्टी को गलाकर कांच तैयार करें, फिर उसको साफ करके स्वच्छ कांच (लैंस बनाकर) को बांस या धातु की नली में (आदि, मध्य और अंत) में लगाकर फिर ग्रहणादि देखें। वेद भगवान भी कहता है कि जब चन्द्र की छाया से सूर्यग्रहण हो तब तुरीय यंत्र से आंखे देखती है। – (ऋग्वेद ५-४०-६) 8. वैदिक मंत्रों के सत्य अर्थ बताने वाले ऐतरेय और गोपथ ब्राह्मण में लिखा है कि न सूर्य कभी अस्त होता है, न उदय होता है। वह सदैव बना रहता है, परंतु जब पृथ्वी से छिप जाता है तब रात्रि हो जाती है और जब पृथ्वी से आड़ समाप्त हो जाती है तब दिन हो जाता है। (Haug’s Aitereya Brahmana, Vol. 2, p. 243) इसी प्रकार वेदों में ध्रुव प्रदेश में होने वाले छ:-छ: मास के दिन-रात का भी वर्णन है। पृथ्वी पर ऐसी कोई जगह नहीं बची जिसका परिज्ञान आर्यों को न हो। ऐसे में जो ये कहे कि खगोल विज्ञान के सभी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म आविष्कार आर्यों ने नहीं किए तो वे महामूर्ख ही कहे जाएंगे। 9. विभिन्न ग्रहों की दूरी:- महान वैदिक ज्योतिष के विद्वान आर्यभट्ट जी ने सूर्य से विविध ग्रहों की दूरी के बारे में जो आंकड़े प्रस्तुत किए थे वे आजकल के आंकड़ो ने बिलकुल मिलता-जुलते है। आज पृथ्वी से सूर्य की दूरी (१.५ * १०८ कि.मी.) है। इसे एयू (खगोलीय इकाई- astronomical unit) कहा जाता है। इस अनुपात के आधार पर निम्न सूची बनती है :- ग्रह आर्यभट्ट का मान वर्तमान मान बुध ०.३७५ एयू ०.३८७ एयू शुक्र ०.७२५ एयू ०.७२३ एयू मंगल १.५३८ एयू १.५२३ एयू गुरु ५.१६ एयू ५.२० एयू शनि

नीरज आर्य अँधेड़ी

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गुडहल का पौधा सूर्य और मंगल से संबंध रखता है


गुडहल का पौधा सूर्य और मंगल से संबंध रखता है, गुडहल का पौधा घर में कहीं भी लगा सकते हैं, परंतु ध्यान रखें कि उसको पर्याप्त धूप मिलना जरूरी है। गुडहल का फूल जल में डालकर सूर्य को अघ्र्य देना आंखों, हड्डियों की समस्या और नाम एवं यश प्राप्ति में लाभकारी होता है। मंगल ग्रह की समस्या, संपत्ति की बाधा या कानून संबंधी समस्या हो, तो हनुमान जी को नित्य प्रात: गुडहल का फूल अर्पित करना चाहिए। माँ दुर्गा को नित्य गुडहल अर्पण करने वाले के जीवन से सारे संकट दूर रहते है । गुड़हल फूल न सिर्फ देखने में खूबसूरत होता है बल्कि इइसमें छिपा है सेहत का खजाना। भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के अनुसार सफेद गुड़हल की जड़ों को पीस कर कई दवाएं बनाई जाती हैं। आयुर्वेद में इस फूल के कई प्रयोग बताएं गए हैं मुंह के छाले गुड़हल के पत्ते चबाने से लाभ होता है।

विक्रम प्रकाश राइसोनि

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जिन घरों में हर रोज पूजा की जाती है


जिन घरों में हर रोज पूजा की जाती है, वहां का वातावरण सकारात्मक (Positive) और पवित्र रहता है। दरिद्रता दूर रहती है। दीपक और अगरबत्ती के धुएं से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले सूक्ष्म कीटाणु भी मर जाते हैं। यहां जानिए कुछ. नियम जो कि घर के मंदिर में पूजा करते समय ध्यान रखना चाहिए… 1. सभी प्रकार की पूजा में चावल विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं। पूजन के लिए ऐसे चावल का उपयोग करना चाहिए जो अखंडित (पूरे चावल) हो यानी टूटे हुए ना हो। चावल चढ़ाने से पहले इन्हें हल्दी से पीला करना बहुत शुभ माना गया है। इसके लिए थोड़े से पानी में हल्दी घोल लें और उस घोल में चावल को डूबोकर पीला किया जा सकता है। 2. पूजन में पान का पत्ता भी रखना चाहिए। ध्यान रखें पान के पत्ते के साथ इलाइची, लौंग, गुलकंद आदि भी चढ़ाना चाहिए। पूरा बना हुआ पान चढ़ाएंगे तो श्रेष्ठ रहेगा। 3. पूजन कर्म में इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पूजा के बीच में दीपक बुझना नहीं चाहिए। ऐसा होने पर पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। 4. किसी भी भगवान के पूजन में उनका आवाहन (आमंत्रित करना) करना, ध्यान करना, आसन देना, स्नान करवाना, धूप-दीप जलाना, अक्षत (चावल), कुमकुम, चंदन, पुष्प (फूल), प्रसाद आदि अनिवार्य रूप से होना चाहिए। 5. देवी-देवताओं को हार-फूल, पत्तियां आदि अर्पित करने से पहले एक बार साफ पानी से अवश्य धो लेना चाहिए। 6. भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए पीले रंग का रेशमी कपड़ा चढ़ाना चाहिए। माता दुर्गा, सूर्यदेव व श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए लाल रंग का, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सफेद वस्त्र अर्पित करना चाहिए। 7. किसी भी प्रकार के पूजन में कुल देवता, कुल देवी, घर के वास्तु देवता, ग्राम देवता आदि का ध्यान करना भी आवश्यक है। इन सभी का पूजन भी करना चाहिए। 8. पूजन में हम जिस आसन पर बैठते हैं, उसे पैरों से इधर- उधर खिसकाना नहीं चाहिए। आसन को हाथों से ही खिसकाना चाहिए। 9. यदि आप प्रतिदिन घी का एक दीपक भी घर में जलाएंगे तो घर के कई वास्तु दोष भी दूर हो जाएंगे। 10. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है। 11. घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती उपयोग किया जाना चाहिए। जबकि तेल के दीपक के लिए लाल धागे की बत्ती श्रेष्ठ बताई गई है। 12. पूजन में कभी भी खंडित दीपक नहीं जलाना चाहिए। धार्मिक कार्यों में खंडित सामग्री शुभ नहीं मानी जाती है। 13. शिवजी को बिल्व पत्र अवश्य चढ़ाएं और किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए अपनी इच्छा के अनुसार भगवान को दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए, दान करना चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी। 14. भगवान सूर्य की 7, श्रीगणेश की 3, विष्णुजी की 4 और शिवजी की 3 परिक्रमा करनी चाहिए। 15. भगवान शिव को हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही शंख से जल चढ़ाना चाहिए।पूजन स्थल पर पवित्रता का ध्यान रखें। चप्पल पहनकर कोई मंदिर तक नहीं जाना चाहिए। चमड़े का बेल्ट या पर्स अपने पास रखकर पूजा न करें। पूजन स्थल पर कचरा इत्यादि न जमा हो पाए।

विक्रम प्रकाश रासनोई