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तन्त्र मन्त्र यन्त्र ग्रुप
की सादर भेंट
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अलौकिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण ग्रुप
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हँस जैन रामनगर खण्डवा
98272 14427
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आज शनिश्चरी अमावस्या,पितृ अमावस्या पर क्या करें
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दोस्तों,

आज शनिश्चरी अमावस्या, पितृ मोक्ष अमावस्या एवं भूतड़ी अमावस्या है। आज तन्त्र विद्या में कई प्रयोग किये जाते हैं, जिसके अशुभ परिणाम हम सब पर भी हो सकते हैं ।

वर्तमान वैज्ञानिक युग में तंत्र-मंत्र और तांत्रिक क्रिया की बात बेमानी लगती है। इस पर यकीन करना वैज्ञानिक तथ्‍यों और सुबूतों के सामने बेहद मुश्‍किल है, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी भी होती है जिनका जवाब मेडिकल साइंस और विज्ञान दोनों के पास नहीं मिलता। ऐसी स्‍थिति में व्‍यक्‍ति का विश्‍वास दूसरी ओर जाता है। जीवन में कई बार ऐसा समय आता है, जब ग्रहों की स्थिती में इस कदर बदलाव आता है की व्यक्ति का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। ऐसे में वो इधर-उधर भटकता है, स्वयं का अच्छा करने के चक्कर में वो दूसरे का बुरा करने से भी नहीं चूकता।

दोस्तों की भीड़ में दुश्मनों को पहचानना मुश्किल हो जाता है. आप नहीं समझ सकते कि कब कौन आपके पीठ पीछे वार कर आपको धोखा देकर चला जाए. दोस्ती और प्यार के नाम पर दगा देने वाले भी बहुत लोग होते हैं.

आपकी कोई बात किसी को कितनी बुरी लग गई और इसका बदला लेने के लिए वो किस हद तक पहुंच जाएगा आप इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते | ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार जब अचानक से आपका अच्छा समय बुरे समय में बदल जाता है तो ऐसी संभावनाएं हो सकती हैं कि आपको या आपके घर को किसी की बुरी नजर लग गई हो। कई बार किसी की सफलता और समृद्धि से जलने वाले लोग उन्हें क्षति पहुंचाने के लिए टोने-टोटके या तंत्र-मंत्र जैसी नकारात्मक शक्तियों का उपयोग करते हैं। इन नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से एकदम ही सबकुछ गड़बड़ हो जाता है।

हम कैसे बचें
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भूत-प्रेत की अथवा बाहरी बाधा को दूर करने के लिए शनिवार के दिन करने का एक टोटका बहुत ही सरल उपाय है, जिसके करने से समुचित लाभ तुरंत मिलता है। उसके लिए दोपहर में सवा किलो बाजरे का दलिया पका लें। उसमें थोड़ा गुड़ मिला दें। उसे एक मिट्टी की हांडी में रखकर उससे सूर्यास्त के बाद प्रेत से प्रभावित व्यक्ति के पूरे शरीर पर घड़ी की विपरीत दिशा में अर्थात बाएं से दाएं सात बार घुमाते हुए नजर उतारें। लोगों की नजर बचाकर हांडी को किसी सुनसान चैराहे पर रख दें और वापस घर लाटते समय न तो पीछे मुड़कर देखें और न ही किसी के रास्ते में कोई बात करें।

कुछ और उपाय
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कई बार पूरा घर ही प्रेतात्मा की चपेट में आ जाता है और इससे घर के कई सदस्य अज्ञात परेशानियों से घिर जाते हैं। उसे दूर करने के लिए जलते हुए गोबर के उपले के साथ गुग्गल की धूनी जलाने से प्रेत-बाधा खत्म हो जाती है। परिवार के सभी सदस्य इसके भभूत का तिलक लगाएं। घर को प्रेत-बाधा से मुक्त करने के लिए ओम के प्रतीक का त्रिशूल दरवाजे पर लगाना भी एक अचूक उपाय है।

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नींबू के प्रयोग
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अगर बीमारी पीछा नहीं छोड़ रही है तो तीन पके हुए नींबू लेकर एक को नीला एक को काला तथा तीसरे को लाल रंग कि स्याही से रंग दे। अब तीनों नीबुओं पर एक एक साबुत लौंग गांड दें। इसके बाद तीन मोटी चूर के लड्डू लेकर तथा तीन लाल पीले फूल लेकर एक रुमाल में बांध दें। अब प्रभावित व्यक्ति के ऊपर से सात बार उबार कर बहते जल में प्रवाहित कर दें। ध्यान रहे प्रवाहित करते समय आसपास कोई खड़ा न हो।

काले तिल के प्रयोग
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आज पूरे दिन रात काले कपड़े में काले तिल बांधकर अपनी जेब में रखें। कल उसे दिन में जलती आग में उन्हें डाल दें। इससे कोई तंत्र का प्रभाव आप पर काम नहीं करेगा।

जायफल से शत्रु नाश
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अगर आपका शत्रु परेशान कर रहा है और हर कार्य में अड़ंगा डाल रहा है तो शत्रु का नाम लेकर दो जायफल कपूर से जलाकर उसकी राख को नाले में बहा दें। ऐसा करने से शत्रु आपको परेशान करना बन्द कर देता है।

इस पोस्ट का ये उद्देश्य नही की आप भूत प्रेत बाधा ऊपरी हवा आदि से डरे। इस पोस्ट के माध्य्म से बस यही कहना चाहता हूं कि स्वयं की एवम परिवार की सुरक्षा हम करें क्योंकि आज साथ देने वाले कम और खींचने वाले ज्यादा है।आपके पीठ पीछे आपके लिये कौन सी चाल कौन चल रहा पता नही चलेगा।

हँस जैन रामनगर खण्डवा मध्यप्रदेश
98272 14427

तन्त्र मन्त्र यन्त्र ग्रुप

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सुनील त्रिवेदी

हनुमान चालीसा है चमत्कारिक::-


• हनुमान चालीसा है चमत्कारिक ऑफिस में कुछ ठीक नहीं चल रहा…
• घर पर पति-पत्नी की नहीं बनती… विद्यार्थियों को परीक्षा का टेंशन है…

• किसी को भूत-पिशाचों का भय सता रहा है… मानसिक शांति नहीं मिलती… स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं पीछा नहीं छोड़ती… ऐसी ही मानव जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं का हल है रामभक्त श्री हनुमान के पास।

• परंतु आज के दौर में जब हमारे समयाभाव है और इसी के चलते हम मंदिर नहीं जा पाते, विधि-विधान से पूजा-अर्चना नहीं कर पाते हैं। ऐसे में भगवान की कृपा कैसे प्राप्त हो? क्या किया जा जिससे कम समय में ही हमारे सारे दुख-कलेश, परेशानियां दूर हो जाए? अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता श्री हनुमान जी… जिनके हृदय में साक्षात् श्रीराम और सीता विराजमान हैं… जिनकी भक्ति से भूत-पिशाच निकट नहीं आते… हमारे सारे कष्टों और दुखों को वे क्षणांश में ही हर लेते हैं।

• ऐसे भक्तवत्सल श्री हनुमान जी की स्मरण हम सभी को करना चाहिए। ये आपकी सभी समस्या का सबसे सरल और कारगर उपाय है.

• श्री हनुमानचालीसा का जाप। कुछ ही मिनिट की यह साधना आपकी सारी मनोवांछित इच्छाओं को पूरा करने वाली है। श्री हनुमान चालिसा का जाप कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है।

• गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा अत्यंत ही सरल और सहज ही समझ में आने वाला स्तुति गान है।

• श्री हनुमान चालीसा में हनुमान के चरित्र की बहुत ही विचित्र और अद्भुत व्याख्या की गई हैं। साथ ही इसके जाप से श्रीराम का भी गुणगान हो जाता है। श्री हनुमानजी बहुत ही कम समय की भक्ति में प्रसन्न होने वाले देवता है।

• श्री हनुमान चालीसा की एक-एक पंक्ति भक्ति रस से सराबोर है जो आपको श्री हनुमान जी के उतने ही करीब पहुंचा देगी जितना आप उसका जाप करेंग। कुछ समय में इसके चमत्कारिक परिणाम आप सहज ही महसूस कर सकेंगे।

• यदि ऑफिस से सम्बंधित कोई परेशानी है तो सोमवार दोपहर को लगभग दो बजे से चार बजे के मध्य श्री हनुमान चालीसा का पाठ उत्तर दिशा की ओर मुख कर के करे.

• ध्यान रखें कि बैठने का आसन और सिर पर लाल रंग का शुद्ध वस्त्र रख कर करे. तथा अपने सामने किसी भी साफ़ बर्तन में गुड़ या गुड़ से बनीं मिठाई जरूर रखे पाठ के बाद उसे स्वयं प्रसाद के रूप में लें.

• इसे सोमवार (शुक्ल-पक्ष) से आरम्भ कर प्रत्येक सोमवार करने से ऑफिस से सम्बंधित संकट समाप्त हो जाता है.

• यदि घर में पति-पत्नी की नहीं बनती है औए प्रतिदिन घर में क्लेश की स्थिति बनी रहती है तो भी इसका समाधान श्री हनुमान जी के पास है.

• नित्य प्रातःकाल सूर्योदय के समय पति या पत्नी एक ताम्बे के लोटे में थोडा सा गुड़ और एक छोटी इलायची डाल कर सूर्य देव के सामने बैठ कर श्री हनुमान चालीसा के दो पाठ कर सूर्य देव को अर्घ्य प्रदान कर दें.

• कुछ ही दिनों में पति व पत्नी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के मध्य सद्भावनापूर्ण व्यवहार होने लगेगा.

• प्रत्येक मंगलवार तथा शनिवार सांयकाल श्री हनुमान चालीसा के पांच पाठ सामने गुग्गल का धूप जला कर करे तो घर की सन्तान नियंत्रित होती है.

• घर में कोई संकट नहीं आता है विद्या बुद्धि बल बड़ता है समस्त दोष स्वत: ही समाप्त होने लगते है

• जो प्रतिदिन श्री हनुमान चालीसा का पाठ आसन में बैठ कर करता है उसकी समस्त कामनाये भगवान राम जी के द्वारा शीघ्र पूरी होती है.

• विदेश में सफलता नहीं मिल रही तो श्री हनुमान चालीसा के एक सौ आठ 108 पाठ नौ दिन में करें या रात को पांच पांच पाठ रोज करने से वेदेश में प्रतिष्ठा व सफलता प्राप्त होती है

• प्रतिदिन किसी भी समय श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से नवग्रह की शान्ति तो होती है और जटिल समस्याओं से छुटकारा भी मिल जाता है

• धैर्य और विश्वास के साथ किया गया पाठ आपके जीवन में सफलता कि कुंजी बन सकता है

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#रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप
से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है।
इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे #प्रभु श्रीराम आप के जीवन को
सुखमय बना देगे।

1. #रक्षा के लिए

मामभिरक्षक रघुकुल नायक |
घृत वर चाप रुचिर कर सायक ||

2. #विपत्ति दूर करने के लिए

राजिव नयन धरे धनु सायक |
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक ||

3. *#सहायता के लिए

मोरे हित हरि सम नहि कोऊ |
एहि अवसर सहाय सोई होऊ ||

4. #सब काम बनाने के लिए

वंदौ बाल रुप सोई रामू |
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू ||

5. #वश मे करने के लिए

सुमिर पवन सुत पावन नामू |
अपने वश कर राखे राम ||

6. #संकट से बचने के लिए

दीन दयालु विरद संभारी |
हरहु नाथ मम संकट भारी ||

_*7*. *#विघ्न विनाश के लिए*

सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही |
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि ||

8. #रोग विनाश के लिए

राम कृपा नाशहि सव रोगा |
जो यहि भाँति बनहि संयोगा ||

9. #ज्वार ताप दूर करने के लिए

दैहिक दैविक भोतिक तापा |
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा ||

10. #दुःख नाश के लिए

राम भक्ति मणि उस बस जाके |
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके ||

11. #खोई चीज पाने के लिए

गई बहोरि गरीब नेवाजू |
सरल सबल साहिब रघुराजू ||

12. #अनुराग बढाने के लिए

सीता राम चरण रत मोरे |
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे ||

13. #घर मे सुख लाने के लिए

जै सकाम नर सुनहि जे गावहि |
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं ||

14. #सुधार करने के लिए

मोहि सुधारहि सोई सब भाँती |
जासु कृपा नहि कृपा अघाती ||

15. #विद्या पाने के लिए

गुरू गृह पढन गए रघुराई |
अल्प काल विधा सब आई ||

16. #सरस्वती निवास के लिए

जेहि पर कृपा करहि जन जानी |
कवि उर अजिर नचावहि बानी ||

17. #निर्मल बुद्धि के लिए

ताके युग पदं कमल मनाऊँ |
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ ||

18. #मोह नाश के लिए

होय विवेक मोह भ्रम भागा |
तब रघुनाथ चरण अनुरागा ||

19. #प्रेम बढाने के लिए

सब नर करहिं परस्पर प्रीती |
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती ||

20. #प्रीति बढाने के लिए

बैर न कर काह सन कोई |
जासन बैर प्रीति कर सोई ||

21. #सुख प्रप्ति के लिए

अनुजन संयुत भोजन करही |
देखि सकल जननी सुख भरहीं ||

22. #भाई का प्रेम पाने के लिए

सेवाहि सानुकूल सब भाई |
राम चरण रति अति अधिकाई ||

23. #बैर दूर करने के लिए

बैर न कर काहू सन कोई |
राम प्रताप विषमता खोई ||

24. #मेल कराने के लिए

गरल सुधा रिपु करही मिलाई |
गोपद सिंधु अनल सितलाई ||

25. #शत्रु नाश के लिए

जाके सुमिरन ते रिपु नासा |
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा ||

26. #रोजगार पाने के लिए

विश्व भरण पोषण करि जोई |
ताकर नाम भरत अस होई ||

27. #इच्छा पूरी करने के लिए

राम सदा सेवक रूचि राखी |
वेद पुराण साधु सुर साखी ||

28. #पाप विनाश के लिए

पापी जाकर नाम सुमिरहीं |
अति अपार भव भवसागर तरहीं ||

29. #अल्प मृत्यु न होने के लिए

अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा |
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा ||

30. #दरिद्रता दूर के लिए

नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना |
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना |

31. प्रभु दर्शन पाने के लिए

अतिशय प्रीति देख रघुवीरा |
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा ||

32. शोक दूर करने के लिए

नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी |
आए जन्म फल होहिं विशोकी ||

33. #क्षमा माँगने के लिए

अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता |
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता ||

🙏जयश्रीराम🙏
साभार

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संजय गुप्ता

आज बात करते है कूछ उपाय और टोटके की ज़रूर आजमाए ये सब कार्य सिद्धि मे सहायक है ये चमत्कारी टोटके
चुटकी भर हींग अपने सिर से घुमाकर (उतारा कर) दक्षिण दिशा में फ़ेंक कर जाए
एक हरी इलायची या एक लौंग शिवजी के चरणों में रखकर जाए
शनिवार के दिन एक रुपये का सिक्का या सरसों का तेल किसी कोढ़ी को दान करे.
पीली सरसों के कुछ दाने व्यापार स्थल के द्वार पर फ़ेंक कर जाए
रसायन रहित गुड या चमेली का तेल मंगलवार को हनुमान जी के आगे रखकर जाए.
महाकाली का पूजन शुद्ध घी के दीपक से करे.
काम में जाने से पहले पूजा घर में रखे जल कलश को प्रणाम करके जाए.
दर्पण में स्वयं का चेहरा देखकर जाए.
हर बुधवार एक कटोरी चावल दान कर गणेशजी पर एक सुपारी एक वर्ष तक चढ़ाये
हनुमान जी की मूर्ति से सिंदूर ले माँ सीता के चरणों में एक ही सांस में लगा दे और ये खास ज़रूर करे जिस सघन वृक्ष पर चमगादड़ों का स्थाई वास होता है, उसकी छोटी-
सी लकड़ी ग्रहण काल में तोड़ लाएं।
इसे अपने कर्म स्थल की कुर्सी अथवा गद्दी के निचे रखे इससे कभी धन का अभाव नही होगा जै शंकर.
धन संबंधित टोटके …
यदि धन कहीं फंस गया हो या कोई उधार न लौटा रहा हो तो रोजाना सुबह 11 बीज लाल मिर्च के जल में डालकर सूर्य भगवान को अर्ध्य देना चाहिये और
‘‘ऊँ आदित्याय नमः’’
मंत्र का जाप करते हुये सूर्य भगवान से धन वापसी की प्रार्थना करनी चाहिये, धन जरूर वापस आता है।
यदि धन की कमी हो या धन कहीं फंस गया हो तो शुक्ल पक्ष के किसी गुरूवार से शुरू कर अपने माथे पर रोजाना केसर व चंदन का तिलक लगाना शुरू कर देना चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रत्येक गुरूवार को राम दरबार के सामने दंडवत प्रणाम कर अपनी इच्छा जाहिर करनी चाहिये, शीघ्र धन लाभ होता है।
यदि हमेशा ही धन की कमी परेशान करती हो तो शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार से शुरू कर 21 शुक्रवार तक आठ वर्ष तक की 5 कन्याओं को खीर व मिश्री खिलाना चाहिये और उनके चरण छूकर माता रानी से धन लाभ की प्रार्थना करनी चाहिये। मां की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
यदि धन संबंधित कष्ट अधिक हा रहे हों तो किसी भी मंदिर में किसी शुभ मुहूर्त में केले के दो नर व मादा पौधे लगाने चाहिये और उनकी देखभाल करनी चाहिये। जब वे पौधे फल देने लगेंगे तो धन संबंधित कष्ट स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।
घर या कार्यालयमें लक्ष्मी प्राप्ति के लिये उत्तर दिशा की दीवार के साथ एक सुंदर सा फव्वारा रखना चाहिये या एक एक्वेरियम रखना चाहिये जिसमें आठ सुनहरी व एक काली मछली हो।
यदि आय से अधिक व्यय हो या बचत न हो रही हो तो ध्यान दें कि घर पर कोई भी नल लीक न कर रहा हो व दूध या चाय उबलते समय गिरे नहीं वरना अनावश्यक खर्च होने लगता है।
यदि आर्थिक स्थिति ठीक न हो तो शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को हरे हकीक की 54 नगों की माला माँ लक्ष्मी जी को चढ़ानी चाहिये, आर्थिक स्थिति ठीक होने लगती है।
यदि धन टिकता न हो तो शुक्ल पक्ष के किसी शनिवार से शुरू कर प्रत्येक शनिवार को काले कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी खिलानी चाहिये ।

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श्री दुर्गासप्तशती के अदबुध मंत्र

सब प्रकार के कल्याण के लिये..*
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”

धन के लिए मंत्र..*
“दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता॥”

आकर्षण के लिए मंत्र..*
“ॐ क्लींग ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती ही सा,
बलादाकृष्य मोहय महामाया प्रयच्छति ”

विपत्ति नाश के लिए मंत्र..*
“शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”

शक्ति प्राप्ति के लिए मंत्र..*
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्ति भूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥

रक्षा पाने के लिए मंत्र*
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥

आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए मंत्र..*
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

भय नाश के लिए मंत्र..*
“सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्याहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

महामारी नाश के लिए मंत्र..*
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

सुलक्षणा पत्‍‌नी की प्राप्ति के लिए मंत्र..*
पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥

पाप नाश के लिए मंत्र..*
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव॥

भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति के लिए मंत्र..*
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

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संजय गुप्ता

धन बढ़े, आरोग्य बढ़े, आयु बढ़ता जाय, देव-पितर खुश होत रहें, जो इस विधि भोजन खाय
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सभी जीवों के लिए भोजन जीवन का क्या महत्व है, इसे सब जानते हैं। यह भी प्रमाणित है कि जो जैसा भोजन करता है वैसा ही उसका स्वास्थ्य और विचार हो जाता है और इसमें की गयी लापरवाही बहुतही महँगा पड़ता है। दूसरी ओर, यदि रुचिकर, स्वास्थ्यवर्धक, पवित्र भोजन अच्छे गुणों का भंडार होता है।

इस तथ्य को ऋषि-मुनिओं ने बहुत नजदीक से जाँचा-परखा और लोकहित के लिए बिभिन्न शास्त्र-पुराणों के माध्यम से सामने रखा। सुख-समृद्धि चाहनेवाले को अवश्य ही इन पर ध्यान देना चाहिए।

  1. दोनों हाथ, दोनों पैर और मुँह — इन पाँचो अंगो को धोकर ही भोजन करना चाहिए। इससे आदमी की आयु बढ़ती है। (स्कंदपुराण,पद्मपुराण,सुश्रुतसंहिता,आदि) )
  2. अँन्धेरे में भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन में कुछ खतरनाक जीव-जंतु गिर जाय तो वह दिखता नहीं और उसे खा लेने पर वह जानलेवा हो सकता है। (पद्मपुराण

  3. भोजन की वस्तु को गोद में रखकर खाना वर्जित है। इसीप्रकार बिछावन पर बैठकर, हाथमें लेकर और आसन पर रखकर भोजन करने से रोग और दरिद्रता आती है। (वशिष्ठस्मृति, बौद्धयनस्मृति, कूर्मपुराण, पद्मपुराण, आदि )

  4. फूटे हुए बर्तनमें भोजन करने से यह अपवित्र हो जाता है, जिसे खाने से खानेवाला भारी पाप का भागी होता है। ( व्याघ्रपादस्मृति, सुश्रुतसंहिता, मनुस्मृति,स्कंदपुराण, आदि )

  5. ढीक आधी रातमें, मध्यान्ह(दिंनके बारहबजे के आस-पास ) में, गीले वस्त्र धारणकर, सोते हुए और दूसरे के लिए रखे गए आसन पर खाना खाने से देव-पितृगण तो रस्ट होते ही हैं वातरोग भी हो जाता है। (कूर्मपुराण)

  6. अजीर्णता (जब भोजन नहीं पचा हो और कंठदाह, खट्टी डकार आदि आती हो) होने पर भोजन करना विष के समान मानाजाता है, जो प्राणलेवा भी हो जाता है। अत:ऐसी स्थितिमें भोजन करना पूर्णत:मना है। ( कूर्मपुराण )

  7. ग्रहणकाल (सूर्य अथवा चन्द्र ) में भोजन करना भयंकर दुखदायी है, अत:बुद्धिमान लोगों को इससे एकदमही बचना चाहिए। इससे आँख की बीमारी, दाँतों का नष्ट होना, पेटमें बिभिन्न प्रकार के रोगों की संभावना तो रहती ही है व्यक्ति भारी पाप का भागी भी होता है। (आपस्तम्बस्मृति, देवीभागवत, आदि )

  8. मल-मूत्र के वेग होनेपर भोजन नही करना चाहिए। (सुश्रुतसंहिता )

  9. जो कोई व्यक्ति भोजन करनेवाले में प्रेम न रखता हो उसका दिया हुआ भोजन नहीं ही करना चाहिए। यह किसी दुर्घटना का कारण हो सकता है।(चरकसंहिता )

  10. बहुत थका हुआ होनें पर आराम करने के बाद ही भोजन करना चाहिए, नहीं तो बुखार या वमन (वोमिटिंग) हो सकता है। (नीतिवक्यामृतम् )

  11. जोभी भोजन परोसा गया है उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए। सामने जोभी आगया उसे प्रेमसे खाना चाहिये। इससे वह अच्छी तरह पच जाता है और बल में वृद्धि करता है।

निंदित भोजन स्वास्थ्यकर तो नहीं ही होता है, देवी अन्नपूर्णा को भी क्रुद्ध कर देता है, फलत:आदमी दरिद्रता की और बढ़ने लगता है। (चरकसंहिता, महाभारत, तैत्तरीयोपनिषद्, वृद्धगौतमस्मृति, आदि )
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संजय गुप्ता

पंच तत्वों का महत्व

प्राचीन समय से ही विद्वानों का मत रहा है कि इस सृष्टि की संरचना पांच तत्वों से मिलकर हुई है. सृष्टि में इन पंचतत्वों का संतुलन बना हुआ है।

यदि यह संतुलन बिगड़ गया तो यह प्रलयकारी हो सकता है. जैसे यदि प्राकृतिक रुप से जलतत्व की मात्रा अधिक हो जाती है तो पृथ्वी पर चारों ओर जल ही जल हो सकता है अथवा बाढ़ आदि का प्रकोप अत्यधिक हो सकता है. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को पंचतत्व का नाम दिया गया है।

माना जाता है कि मानव शरीर भी इन्हीं पंचतत्वों से मिलकर बना है।

वास्तविकता में यह पंचतत्व मानव की पांच इन्द्रियों से संबंधित है. जीभ, नाक, कान, त्वचा और आँखें हमारी पांच इन्द्रियों का काम करती है. इन पंचतत्वों को पंचमहाभूत भी कहा गया है. इन पांचो तत्वों के स्वामी ग्रह, कारकत्व, अधिकार क्षेत्र आदि भी निर्धारित किए गये हैं

(1) आकाश

आकाश तत्व का स्वामी ग्रह गुरु है. आकाश एक ऎसा क्षेत्र है जिसका कोई सीमा नहीं है. पृथ्वी के साथ्-साथ समूचा ब्रह्मांड इस तत्व का कारकत्व शब्द है. इसके अधिकार क्षेत्र में आशा तथा उत्साह आदि आते हैं. वात तथा कफ इसकी धातु हैं। वास्तु शास्त्र में आकाश शब्द का अर्थ रिक्त स्थान माना गया है. आकाश का विशेष गुण “शब्द” है और इस शब्द का संबंध हमारे कानों से है. कानों से हम सुनते हैं और आकाश का स्वामी ग्रह गुरु है इसलिए ज्योतिष शास्त्र में भी श्रवण शक्ति का कारक गुरु को ही माना गया है। शब्द जब हमारे कानों तक पहुंचते है तभी उनका कुछ अर्थ निकलता है. वेद तथा पुराणों में शब्द, अक्षर तथा नाद को ब्रह्म रुप माना गया है। वास्तव में आकाश में होने वाली गतिविधियों से गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश, ऊष्मा, चुंबकीय़ क्षेत्र और प्रभाव तरंगों में परिवर्तन होता है. इस परिवर्तन का प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ता है. इसलिए आकाश कहें या अवकाश कहें या रिक्त स्थान कहें, हमें इसके महत्व को कभी नहीं भूलना चाहिए. आकाश का देवता भगवान शिवजी को माना गया है।

(2) वायु

वायु तत्व के स्वामी ग्रह शनि हैं. इस तत्व का कारकत्व स्पर्श है. इसके अधिकार क्षेत्र में श्वांस क्रिया आती है. वात इस तत्व की धातु है. यह धरती चारों ओर से वायु से घिरी हुई है. संभव है कि वायु अथवा वात का आवरण ही बाद में वातावरण कहलाया हो। वायु में मानव को जीवित रखने वाली आक्सीजन गैस मौजूद होती है. जीने और जलने के लिए आक्सीजन बहुत जरुरी है. इसके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यदि हमारे मस्तिष्क तक आक्सीजन पूरी तरह से नहीं पहुंच पाई तो हमारी बहुत सी कोशिकाएँ नष्ट हो सकती हैं. व्यक्ति अपंग अथवा बुद्धि से जड़ हो सकता है।
प्राचीन समय से ही विद्वानों ने वायु के दो गुण माने हैं. वह है – शब्द तथा स्पर्श. स्पर्श का संबंध त्वचा से माना गया है. संवेदनशील नाड़ी तंत्र और मनुष्य की चेतना श्वांस प्रक्रिया से जुड़ी है और इसका आधार वायु है. वायु के देवता भगवान विष्णु माने गये हैं।

(3) अग्नि

सूर्य तथा मंगल अग्नि प्रधान ग्रह होने से अग्नि तत्व के स्वामी ग्रह माने गए हैं. अग्नि का कारकत्व रुप है. इसका अधिकार क्षेत्र जीवन शक्ति है. इस तत्व की धातु पित्त है. हम्सभी जानते हैं कि सूर्य की अग्नि से ही धरती पर जीवन संभव है। यदि सूर्य नहीं होगा तो चारों ओर सिवाय अंधकार के कुछ नहीं होगा और मानव जीवन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती है. सूर्य पर जलने वाली अग्नि सभी ग्रहों को ऊर्जा तथा प्रकाश देती है। इसी अग्नि के प्रभाव से पृथ्वी पर रहने वाले जीवों के जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं. शब्द तथा स्पर्श के साथ रुप को भी अग्नि का गुण माना जाता है. रुप का संबंध नेत्रों से माना गया है. ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत अग्नि तत्व है। सभी प्रकार की ऊर्जा चाहे वह सौर ऊर्जा हो या आणविक ऊर्जा हो या ऊष्मा ऊर्जा हो सभी का आधार अग्नि ही है. अग्नि के देवता सूर्य अथवा अग्नि को ही माना गया है।

(4) जल

चंद्र तथा शुक्र दोनों को ही जलतत्व ग्रह माना गया है. इसलिए जल तत्व के स्वामी ग्रह चंद्र तथा शुक्र दोनो ही हैं. इस तत्व का कारकत्व रस को माना गया है. इन दोनों का अधिकार रुधिर अथवा रक्त पर माना गया है क्योंकि जल तरल होता है और रक्त भी तरल होता है. कफ धातु इस तत्व के अन्तर्गत आती है। विद्वानों ने जल के चार गुण शब्द, स्पर्श, रुप तथा रस माने हैं. यहाँ रस का अर्थ स्वाद से है. स्वाद या रस का संबंध हमारी जीभ से है. पृथ्वी पर मौजूद सभी प्रकार के जल स्त्रोत जल तत्व के अधीन आते हैं। जल के बिना जीवन संभ्हव नहीं है. जल तथा जल की तरंगों का उपयोग विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है. हम यह भी भली-भाँति जानते हैं कि विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं. जल के देवता वरुण तथा इन्द्र को माना गया है. मतान्तर से ब्रह्मा जी को भी जल का देवता माना गया है।

(5) पृथ्वी

पृथ्वी का स्वामी ग्रह बुध है. इस तत्व का कारकत्व गंध है. इस तत्व के अधिकार क्षेत्र में हड्डी तथा माँस आता है. इस तत्व के अन्तर्गत आने वाली धातु वात, पित्त तथा कफ तीनों ही आती हैं. विद्वानों के मतानुसार पृथ्वी एक विशालकाय चुंबक है. इस चुंबक का दक्षिणी सिरा भौगोलिक उत्तरी ध्रुव में स्थित है. संभव है इसी कारण दिशा सूचक चुंबक का उत्तरी ध्रुव सदा उत्तर दिशा का ही संकेत देता है। पृथ्वी के इसी चुंबकीय गुण का उपयोग वास्तु शास्त्र में अधिक होता है. इस चुंबक का उपयोग वास्तु में भूमि पर दबाव के लिए किया जाता है. वास्तु शास्त्र में दक्षिण दिशा में भार बढ़ाने पर अधिक बल दिया जाता है. हो सकता है इसी कारण दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना गया है. यदि इस बात को धर्म से जोड़ा जाए तो कहा जाता है कि दक्षिण दिशा की ओर पैर करके ना सोएं क्योंकि दक्षिण में यमराज का वास होता है। पृथ्वी अथवा भूमि के पाँच गुण शब्द, स्पर्श, रुप, स्वाद तथा आकार माने गए हैं. आकार तथा भार के साथ गंध भी पृथ्वी का विशिष्ट गुण है क्योंकि इसका संबंध नासिका की घ्राण शक्ति से है। उपरोक्त विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि पंचतत्व मानव जीवन को अत्यधिक प्रभावित करते हैं. उनके बिना मानव तो क्या धरती पर रहने वाले किसी भी जीव के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। इन पांच तत्वों का प्रभाव मानव के कर्म, प्रारब्ध, भाग्य तथा आचरण पर भी पूरा पड़ता है. जल यदि सुख प्रदान करता है तो संबंधों की ऊष्मा सुख को बढ़ाने का काम करती है और वायु शरीर में प्राण वायु बनकर घूमती है. आकाश महत्वाकांक्षा जगाता है तो पृथ्वी सहनशीलता व यथार्थ का पाठ सिखाती है. यदि देह में अग्नि तत्व बढ़ता है तो जल्की मात्रा बढ़ाने से उसे संतुलित किया जा सकता है. यदि वायु दोष है तो आकाश तत्व को बढ़ाने से यह संतुलित रहेगें।