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विलक्षण संन्यासी : पूज्य करपात्री जी महाराज के अवतरण दिवस पर शत शत नमन। स्वामी करपात्री जी के नाम से प्रसिद्ध संन्यासी का बचपन का नाम हरनारायण था। इनका जन्म सात जुलाई, 1907 ग्राम भटनी, उत्तर प्रदेश में पण्डित रामनिधि तथा श्रीमती शिवरानी के घर में हुआ था। सनातन धर्म के अनुयायी इनके पिता श्रीराम एवं भगवान शंकर के परमभक्त थे। वे प्रतिदिन पार्थिव पूजा एवं रुद्राभिषेक करते थे। यही संस्कार बालक हरनारायण पर भी पड़े।

बाल्यावस्था में इन्होंने संस्कृत का गहन अध्ययन किया। एक बार इनके पिता इन्हें एक ज्योतिषी के पास ले गये और पूछा कि ये बड़ा होकर क्या बनेगा ? ज्योतिषी से पहले ही ये बोल पड़े, मैं तो बाबा बनूँगा। वास्तव में बचपन से ही इनमें विरक्ति के लक्षण नजर आने लगे थे। समाज में व्याप्त अनास्था एवं धार्मिक मर्यादा के उल्लंघन को देखकर इन्हें बहुत कष्ट होता था। ये कई बार घर से चले गये; पर पिता जी इन्हें फिर ले आते थे।

जब ये कुछ बड़े हुए, तो इनके पिता ने इनका विवाह कर दिया। उनका विचार था कि इससे इनके पैरों में बेड़ियाँ पड़ जायेंगी; पर इनकी रुचि इस ओर नहीं थी। इनके पिता ने कहा कि एक सन्तान हो जाये, तब तुम घर छोड़ देना। कुछ समय बाद इनके घर में एक पुत्री ने जन्म लिया। अब इन्होंने संन्यास का मन बना लिया। इनकी पत्नी भी इनके मार्ग की बाधक नहीं बनी। इस प्रकार 19 वर्ष की अवस्था में इन्होंने घर छोड़ दिया।

गृहत्याग कर उन्होंने अपने गुरु से वेदान्त की शिक्षा ली और फिर हिमालय के हिमाच्छादित पहाड़ों पर चले गये। वहाँ घोर तप करने के बाद इन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद इन्होंने अपना शेष जीवन देश, धर्म और समाज की सेवा में अर्पित कर दिया। ये शरीर पर कौपीन मात्र पहनते थे। भिक्षा के समय जो हाथ में आ जाये, वही स्वीकार कर उसमें ही सन्तोष करते थे। इससे ये ‘करपात्री महाराज’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये।

1930 में मेरठ में इनकी भेंट स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी से हुई। वैचारिक समानता होने के कारण इसके बाद ये दोनों सन्त ‘एक प्राण दो देह’ के समान आजीवन कार्य करते रहे। करपात्री जी महाराज का मत था कि संन्यासियों को समाज को दिशा देने के लिए सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेना चाहिए। अतः इन्होंने रामराज्य परिषद, धर्मवीर दल, धर्मसंघ, महिला संघ.. आदि संस्थाएँ स्थापित कीं।

धर्मसंघ महाविद्यालय में छात्रों को प्राचीन एवं परम्परागत परिपाटी से वेद, व्याकरण, ज्योतिष, न्याय शास्त्र व कर्मकाण्ड की शिक्षा दी जाती थी। सिद्धान्त, धर्म चर्चा, सनातन धर्म विजय जैसी पत्रिकाएँ तथा दिल्ली, काशी व कोलकाता से सन्मार्ग दैनिक उनकी प्रेरणा से प्रारम्भ हुए।

1947 से पूर्व स्वामी जी अंग्रेज शासन के विरोधी थे; तो आजादी के बाद कांग्रेस सरकार की हिन्दू धर्म विरोधी नीतियों का भी उन्होंने सदा विरोध किया। उनके विरोध के कारण शासन को ‘हिन्दू कोड बिल’ टुकड़ों में बाँटकर पारित करना पड़ा। गोरक्षा के लिए सात नवम्बर, 1966 को दिल्ली में हुए विराट् प्रदर्शन में स्वामी जी ने भी लाठियाँ खाईं और जेल गये।

स्वामी जी ने शंकर सिद्धान्त समाधान; मार्क्सवाद और रामराज्य; विचार पीयूष; संघर्ष और शान्ति; ईश्वर साध्य और साधन; वेदार्थ पारिजात भाष्य; रामायण मीमाँसा; पूंजीवाद, समाजवाद और रामराज्य आदि ग्रन्थों की रचना की।

महान गोभक्त, विद्वान, धर्मरक्षक एवं शास्त्रार्थ महारथी स्वामी करपात्री जी का निधन सात फरवरी, 1982 को हुआ।


Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, Netaji Subhash Chandra Bose

सुभाष चंद्र बोस ने जब आईसीएस का पद ठुकरा दिया तो उनके पिता बहुत नाराज हुए। उन्हें सुभाष के किए की वजह ही समझ में नहीं आ रही थी। पिता की हालत देखकर उनके बड़े भाई शरतचंद्र बोस ने सुभाष को एक खत लिखा और बताया कि उनके पिता इस फैसले से बहुत नाराज हैं। पत्र पढ़कर सुभाष असमंजस में पड़ गए। लौटती डाक से उन्होंने बड़े भाई को लिखा, ‘इंग्लैंड के राजा के लिए वफादारी की कसम खाना मेरे लिए मुश्किल था। मैं खुद को देश सेवा में लगाना चाहता था। मैं देश के लिए कठिनाइयां झेलने को तैयार हूं, यहां तक कि अभाव, गरीबी और मां-पिता की नाखुशी तक सहने को तैयार हूं।’

पत्र पढ़कर शरतचंद्र समझ गए कि सुभाष पर दबाव डालना बेकार है। फिर उन्होंने सुभाष को एक और खत लिखा कि, ‘पिता रात-रात भर सोते नहीं हैं। तुम्हारे भारत लौटते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। वे ब्रिटिश राज के निशाने पर हैं। भारत सरकार उन्हें स्वतंत्र नहीं रहने देगी।’ सुभाष चंद्र बोस के मित्र दिलीप राय ने जब यह पढ़ा तो वह बोले, ‘सुभाष, अब तुम क्या करोगे? अभी भी वक्त है। तुम चाहो तो इस्तीफा वापस ले सकते हो?’

यह सुनकर सुभाष गुस्से से लाल हो गए। वह बोले, ‘तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो?’ दिलीप राय ने शांत स्वर में कहा, ‘इसलिए, क्योंकि तुम्हारे पिता बीमार हैं।’ मित्र की बात काटकर सुभाष बोले, ‘मैं जानता हूं, पर अगर हम अपने परिवार की प्रसन्नता के आधार पर अपने आदर्श निर्धारित करते हैं तो क्या ऐसे आदर्श वास्तव में आदर्श होंगे?’ सुभाष चंद्र बोस की यह बात सुनकर दिलीप राय उन्हें देखते रह गए। उनके मुंह से सिर्फ यही निकल पाया, ‘धन्य हैं तुम्हारे माता-पिता, जिन्होंने ऐसे पुत्र को जन्म दिया है जो पिता की खुशी से भी ऊंचा स्थान मातृभूमि की सेवा को देता है।’

Posted in Netaji Subhash Chandra Bose

आज़ाद हिन्द फौज के स्थापना की घोषणा हो चुकी थी…….. सैनिकों की नियुक्ति चालू थी…….सेना के कपडे, भोजन, हथियार, दवा आदि के लिए धन की सख्त जरूरत थी…… कुछ धन जापानियों ने दिया लेकिन वो जरूरत के जितना नहीं था……… नेताजी ने आह्वान किया…………

लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सिक्को और गहनों में तौल रहे थे………एक महिला आई जिसने फोटो फ्रेम तोड़ा, फ्रेम सोने का था और अंदर मृत पुत्र का फोटो था…… फ्रेम तराजू पर रख दिया……..!!

एक ग्वाला आया और उसने सारी गाय आज़ाद हिन्द फौज को दे दिया जिससे सैनिकों को दूध मिल सके….
कुछ जवान आये जिन्होंने पुछा वर्दी कहाँ है और बन्दूक कहाँ है……….. कुछ बुजुर्ग आए और अपने इकलोते पुत्र को नेताजी के छाया में रख दिया……..!!!

बुजुर्ग घायल सैनिकों की सेवा और कुली के काम करने को प्रवेश ले लिए…….

कुछ युवतियाँ आईं और उन्होंने रानी झाँसी रेजिमेंट में प्रवेश लिया………………

कुछ 45 पार महिलाऐं आई और रानी झाँसी रेजिमेंट में सीधे प्रवेश नहीं पाने के जगह पर रसोइया और नर्स बन गईं……….!!
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आखिर कौन थे ये लोग…….?? यही थे आम लोग….!! मलेशिया, सिंगापुर, बर्मा, फिजी, थाईलैंड और अन्य दक्षिणी एशिया में रहने वाले भारतीय थे……. जिन्होंने भारत के बारे में अपने उन बुजुर्गों से सुना था जिनको अँगरेज़ गुलाम बनाकर लाए थे……..!! जो कुली, मजदूर, जमादार आदि के रूप में काम करते थे……! जो वर्षों से अपने देश नहीं जा सके थे……. लेकिन अपने बच्चों – पीढ़ियों के दिल में भारत बसा दिया था उन्होंने अपने गाँव, कसबे शहर की कहानियाँ बताकर…..!

आज उन कहानियों ने चमत्कार कर दिया था……! वो कहानियाँ नहीं थी – देश की माटी का बुलावा था जो सीने में छिपा था….! आज नेताजी के आह्वान ने उस जवालामुखी को फोड़ दिया है…………………………..
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किसी की कोई जात नहीं थी…..!! बस सब भारतीय थे…..! दासता का दंश झेलते हुए….! अपने देश से पानी के जहाज़ में ठूँस कर जबरदस्ती यहाँ लाए गए थे…………… जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया था…………………… बस भारत और अपने माटी को जिन्दा रखा था दिल में…….!!

भारत को आज़ादी दिलाने में हज़ारों उन भारतोयों का लहू शामिल है जो कभी लौट नहीं पाए………….वहीँ वीरगति को प्राप्त हो गए………..जिनके भारत में रहे वाले परिवारों को आज तक नहीं पता कि उनका एक लाल देश के लिए बलिदान हो गया था कब का……….!!

जिनका नाम हमें आपको पता ही नहीं……!! जिनको अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ…………. जो न ही उन विदेश की धरती पर अपना घर या छाप बना पाए थे कि उनका कोई रिकॉर्ड रखता………………….!!!!!

ये पोस्ट समर्पित है उन अनाम आज़ादी पाने के दीवाने, बलिदानी और महान सैनिकों को…….! उनके ऋणी हैं हम…….! न उनका नाम पता है, न जात पता है……………………..तो हे आज़ाद भारत के लोगों एक हो जाओ……..!

आओ नेता जी के सपनो का भारत बनाए………. आओ उन अनाम बलिदानियों के लहू का ऋण चुकाएँ……….!!!

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एक विधवा जो मालवा की रानी बनी। हमारे देश की रक्षा की और व्यक्तिगत रूप से युद्ध में सेनाओं का नेतृत्व किया। कभी किसी को नहीं लूटा। मालवा को एक समृद्ध राज्य के रूप में विकसित किया। मुगलों द्वारा नष्ट किए गए मंदिरों का पुनर्निर्माण। तीर्थों में धर्मशालाओं का निर्माण किया।

अफगानों, नवाबों और अंग्रेजों के शासन वाले क्षेत्रों को छोड़कर, उसने हर जगह मंदिर बनवाए। उसके बिना, लगभग सभी तीर्थ खंडहर हो चुके होते और कोई भी खड़ा मंदिर नहीं होता। लोगों के कल्याण के लिए कई टैंकों का निर्माण किया।

अहिल्याबाई जिन्होंने पूरे भारत में मंदिरों, अनाथालयों, आवासों और सिंचाई टैंकों का निर्माण किया, उन्होंने एक मामूली निजी जीवन व्यतीत किया। वह महेश्वर के इस छोटे से आवास में रहती थी। अपने लिए कभी कुछ नहीं बनाया। संत रानी फर्श पर सोती थीं। उसके होंठ हमेशा “शिव” कहते थे।

अहिल्याबाई ने कभी मृत्युदंड जारी नहीं किया। बंदियों से व्यक्तिगत शपथ ली और उन्हें रिहा कर दिया। बहुतों ने ईमानदार जीवन अपनाया। उसने 7/12 योजना की शुरुआत की। किसान समृद्ध हुए। सीमा शुल्क से परे कोई व्यापारी कर नहीं। उसकी प्रजा धन प्रदर्शित करने से नहीं डरती थी। उसने काशी विश्वनाथ का पुनर्निर्माण किया!

अहिल्याबाई ने विरासत में मिली संपत्ति से मंदिरों का निर्माण कराया न कि राज्य के कोष से। उसने व्यापारियों और कारीगरों को पूंजी प्रदान करने के लिए राज्य के धन का इस्तेमाल किया। उनका मानना ​​​​था कि उनकी प्रजा द्वारा अर्जित धन पर उनका कोई अधिकार नहीं था।

उनकी बदौलत इंदौर 18वीं सदी में दुनिया के सबसे समृद्ध शहरों में से एक बन गया।

भारत माता की वह बहादुर बेटी, जो हमारे इतिहास की किताबों में कभी नहीं मिली…

और हम जानते हैं क्यों !!

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The Facts about Life of the Great Hero of India
Son of India Shahid Bhagat Singh

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे

वर्ष 1927 में पहली बार गिरफ़्तारी के बाद जेल में खींची गई भगत सिंह की फ़ोटो (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी.

लेकिन जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब सा लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.

उनके मुंह से सिर्फ़ ये निकला कि आदेश ऊपर से है. अभी क़ैदी सोच ही रहे थे कि माजरा क्या है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है.

उस क्षण की निश्चिंतता ने उनको झकझोर कर रख दिया. क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.

सॉन्डर्स मर्डर केस में जज ने इसी कलम से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के लिए फांसी की सज़ा लिखी थी
बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया.

लाहौर कॉन्सपिरेसी केस
अब सब क़ैदी चुप हो चले थे. उनकी निगाहें उनकी कोठरी से गुज़रने वाले रास्ते पर लगी हुई थी. भगत सिंह और उनके साथी फाँसी पर लटकाए जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रने वाले थे.

एक बार पहले जब भगत सिंह उसी रास्ते से ले जाए जा रहे थे तो पंजाब कांग्रेस के नेता भीमसेन सच्चर ने आवाज़ ऊँची कर उनसे पूछा था, “आप और आपके साथियों ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस में अपना बचाव क्यों नहीं किया.”

भगत सिंह का जवाब था, “इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपील से नहीं.”

भगत सिंह की खाकी रंग की कमीज
वॉर्डेन चरत सिंह भगत सिंह के ख़ैरख़्वाह थे और अपनी तरफ़ से जो कुछ बन पड़ता था उनके लिए करते थे. उनकी वजह से ही लाहौर की द्वारकादास लाइब्रेरी से भगत सिंह के लिए किताबें निकल कर जेल के अंदर आ पाती थीं.

जेल की कठिन ज़िंदगी
भगत सिंह को किताबें पढ़ने का इतना शौक था कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल के साथी जयदेव कपूर को लिखा था कि वो उनके लिए कार्ल लीबनेख़्त की ‘मिलिट्रिज़म’, लेनिन की ‘लेफ़्ट विंग कम्युनिज़म’ और आप्टन सिंक्लेयर का उपन्यास ‘द स्पाई’, कुलबीर के ज़रिए भिजवा दें.

भगत सिंह जेल की कठिन ज़िंदगी के आदी हो चले थे. उनकी कोठरी नंबर 14 का फ़र्श पक्का नहीं था. उस पर घास उगी हुई थी. कोठरी में बस इतनी ही जगह थी कि उनका पाँच फ़ुट, दस इंच का शरीर .
भगत सिंह के जूते जिसे उन्होंने अपने साथी क्रांतिकारी जयदेव कपूर को तोहफ़े में दे दिया था
भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि ‘भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.’

‘इंक़लाब ज़िदाबाद!’
उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हें किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.

मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इंक़लाब ज़िदाबाद!”

इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.

भगत सिंह की घड़ी. इसे उन्होंने अपने साथी क्रांतिकारी जयदेव कपूर को तोहफे में दे दिया था
राजगुरु के अंतिम शब्द थे, “हम लोग जल्द मिलेंगे.” सुखदेव ने मेहता को याद दिलाया कि वो उनकी मौत के बाद जेलर से वो कैरम बोर्ड ले लें जो उन्होंने उन्हें कुछ महीने पहले दिया था.

तीन क्रांतिकारी
मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.

भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, “क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?”

भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.

असेंबली बम केस में लाहौर की सीआईडी ने ये गोला बरामद किया था
लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके, क्योंकि भगत सिंह को बारह घंटे पहले फांसी देने का फ़ैसला ले लिया गया और बेबे जेल के गेट के अंदर ही नहीं घुस पाया.

आज़ादी का गीत
थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-

कभी वो दिन भी आएगा

कि जब आज़ाद हम होंगें

ये अपनी ही ज़मीं होगी

ये अपना आसमाँ होगा.

फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.

भगत सिंह के सिर पर पगड़ी हो या हैट?

पाकिस्तान में बना भगत सिंह चौक

भगत सिंह की भूख हड़ताल का पोस्टर जिस पर उनके ही नारे छपे हैं. पोस्टर नेशनल आर्ट प्रेस, अनारकली, लाहौर ने प्रिंट किया था
चरत सिंह ने भगत सिंह के कान में फुसफुसा कर कहा कि वाहे गुरु को याद करो.

फांसी का तख़्ता
भगत सिंह बोले, “पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है.”

जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाया, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़ें भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…”

सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ और ‘हिंदुस्तान आज़ाद हो’ के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया.
भगत सिंह इन तीनों के बीच में खड़े थे. भगत सिंह अपनी माँ को दिया गया वो वचन पूरा करना चाहते थे कि वो फाँसी के तख़्ते से ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा लगाएंगे.

लाहौर सेंट्रल जेल
लाहौर ज़िला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोंधी का घर लाहौर सेंट्रल जेल से बिल्कुल लगा हुआ था. भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सोंधी के घर तक सुनाई दी.

उनकी आवाज़ सुनते ही जेल के दूसरे क़ैदी भी नारे लगाने लगे. तीनों युवा क्रांतिकारियों के गले में फांसी की रस्सी डाल दी गई. उनके हाथ और पैर बांध दिए गए. तभी जल्लाद ने पूछा, सबसे पहले कौन जाएगा?

सुखदेव ने सबसे पहले फांसी पर लटकने की हामी भरी. जल्लाद ने एक-एक कर रस्सी खींची और उनके पैरों के नीचे लगे तख़्तों को पैर मार कर हटा दिया. काफी देर तक उनके शव तख़्तों से लटकते रहे.

असेंबली बम केस में भगत सिंह के खिलाफ उर्दू में लिखा गया एफआईआर
अंत में उन्हें नीचे उतारा गया और वहाँ मौजूद डॉक्टरों लेफ़्टिनेंट कर्नल जेजे नेल्सन और लेफ़्टिनेंट कर्नल एनएस सोधी ने उन्हें मृत घोषित किया.

अंतिम संस्कार
एक जेल अधिकारी पर इस फांसी का इतना असर हुआ कि जब उससे कहा गया कि वो मृतकों की पहचान करें तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसे उसी जगह पर निलंबित कर दिया गया. एक जूनियर अफ़सर ने ये काम अंजाम दिया.

पहले योजना थी कि इन सबका अंतिम संस्कार जेल के अंदर ही किया जाएगा, लेकिन फिर ये विचार त्यागना पड़ा जब अधिकारियों को आभास हुआ कि जेल से धुआँ उठते देख बाहर खड़ी भीड़ जेल पर हमला कर सकती है.

इसलिए जेल की पिछली दीवार तोड़ी गई. उसी रास्ते से एक ट्रक जेल के अंदर लाया गया और उस पर बहुत अपमानजनक तरीके से उन शवों को एक सामान की तरह डाल दिया गया.

भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
पहले तय हुआ था कि उनका अंतिम संस्कार रावी के तट पर किया जाएगा, लेकिन रावी में पानी बहुत ही कम था, इसलिए सतलज के किनारे शवों को जलाने का फैसला लिया गया.

लाहौर में नोटिस
उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.

अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.

अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया

पाकिस्तान का वो हिंदुस्तानी क्रांतिकारी ‘
नेशनल कॉलेज लाहौर की फ़ोटो. पगड़ी पहने भगत सिंह (दाहिने से चौथे) खड़े नज़र आ रहे हैं (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
इस ख़बर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया आई और लोगों ने कहा कि इनका अंतिम संस्कार करना तो दूर, उन्हें पूरी तरह जलाया भी नहीं गया. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने इसका खंडन किया लेकिन किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया.

भगत सिंह का परिवार
इस तीनों के सम्मान में तीन मील लंबा शोक जुलूस नीला गुंबद से शुरू हुआ. पुरुषों ने विरोधस्वरूप अपनी बाहों पर काली पट्टियाँ बांध रखी थीं और महिलाओं ने काली साड़ियाँ पहन रखी थीं.

लगभग सब लोगों के हाथ में काले झंडे थे. लाहौर के मॉल से गुज़रता हुआ जुलूस अनारकली बाज़ार के बीचोबीच रुका.

अचानक पूरी भीड़ में उस समय सन्नाटा छा गया जब घोषणा की गई कि भगत सिंह का परिवार तीनों शहीदों के बचे हुए अवशेषों के साथ फिरोज़पुर से वहाँ पहुंच गया है.

बदल रही है लाहौर की रवायत?

कई तालों में कैद है आजादी के मतवाले सुखदेव का घर

जालंधर के देशभगत यादगार हॉल में लगाई गई भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की एक पुरानी तस्वीर (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)
जैसे ही फूलों से ढंके तीन ताबूतों में उनके शव वहाँ पहुंचे, भीड़ भावुक हो गई. लोग अपने आँसू नहीं रोक पाए.

ब्रिटिश साम्राज्य
वहीं पर एक मशहूर अख़बार के संपादक मौलाना ज़फ़र अली ने एक नज़्म पढ़ी जिसका लब्बोलुआब था, ‘किस तरह इन शहीदों के अधजले शवों को खुले आसमान के नीचे ज़मीन पर छोड़ दिया गया.’

उधर, वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने.

किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 16 साल बाद उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित होगी और भारत की ज़मीन से सभी ब्रिटिश सैनिक हमेशा के लिए चले जाएंगे.

(ये लेख मालविंदर सिंह वडाइच की किताब ‘इटर्नल रेबल’, चमनलाल की ‘भगत सिंह डॉक्यूमेंट्स’ और कुलदीप नैयर की किताब ‘विदाउट फियर’ में प्रकाशित सामाग्री पर आधारित है.)

(बीबीसी हिन्दी)

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આજે શહિદ દિને

એક વખત એવું બન્યું કે……….

સરદાર ભગતસિંહે પોતાના પિતા કિશનસિંહને એક પત્રમાં લખ્યું કે…

“પિતાજી તમે મારી પીઠમાં ખંજર ભોકવાનું કામ કર્યું છે”

સરદાર ભગતસિંહ નું કુટુંબ ત્રણ ત્રણ પેઢીઓથી આઝાદીના જંગમાં પોતાનુ યોગદાન આપી રહ્યુ હતુ.

તેમના વડવાઓ કાશ્મીરના પ્રતાપી રાજા મહારાજ રણજીતસિંહ ની
સેનામાં ફરજ બજાવતા હતા.

તેમના દાદા અર્જુનસિંહ દયાનંદ સરસ્વતીના શિષ્ય અને આર્યસમાજી હતા.તેમણે અંગ્રેજો સામે લડત ચાલુ કરેલી જે પછી દરેક પેઢીએ જાળવી રાખી.

ભગતસિંહ ના પિતા સરદાર કિશનસિંહ તેમજ તેમના કાકા અજીતસિંહ અને સ્વર્ણસિંહ બધા “ગદર પાર્ટી” પાર્ટીના સભ્યો હતા. જે આઝાદીનાં જંગમાં સક્રિય હતી.જેના માટે તેમના કાકાને દેશનિકાલની સજા પણ થયેલી.

ભગતસિંહનો જન્મ લયાલપુર જિલ્લાના બંગા નામના ગામમાં થયેલો જે અત્યારે પાકિસ્તાનમાં છે. દાદાએ અંગ્રેજોની સ્કૂલમાં મોકલવાને બદલે ભગતસિંહ ને “દયાનંદ એન્ગલો વેદિક હાઈસ્કૂલ” માં દાખલ કર્યા અને ત્યારબાદ નેશનલ કોલેજ લાહોરમાં દાખલ થયા. ત્યાં તેમને તેના જેવા નારબંકાઓ મળ્યા અને “નવજવાન ભારત સભા” ની રચના કરી,

દરમ્યાન ચંદશેખર આઝાદ , રામપ્રસાદ બિસ્મિલ,શહીદ અસફાકુલ્લા ખાન એક ગુપ્ત ક્રાંતિકારી સંગઠન ચલાવતા તેમાં પણ જોઈન થયા. તેનું નામ ” હિન્દુસ્તાન રિપબ્લિક એસોસિએશન” હતું.

દરમ્યાન તેમણે “કીર્તિ કિસાન પાર્ટી”
તેમજ “હિન્દુસ્તાન સોશ્યલિસ્ટ રિપબ્લિકન એસોસિએશન” નામની રાજકીય પાર્ટીઓની રચના આઝાદીની લડત ચલાવવા માટે કરી.

ભગતસિંહ ફક્ત બૉમ્બ ફેકનાર અને ગોળી ચલાવી જાણનાર યુવાન જ નહોતા પણ એક પ્રખર વૈચારિક પ્રતિભા પણ તેનામા સોળે કળાએ ખીલેલી હતી. તેમણે અઢળક પુસ્તકો વાંચ્યા હતા. ખાસ કરીને માર્કસવાદી પુસ્તકો લેનીનની જીવની રશિયાની ક્રાંતિ વગેરેના પુસ્તકો ખૂબ વાંચતા. જેલમાં તેમને પુસ્તકો પુરા પાડનાર તેમના વકીલ પુસ્તકો લાવીને થકી જતા પણ ભગતસિંહ વાંચતા થાકતા નહીં.

ભગતસિંહે આઝાદી ,સમાજ,રાજ્ય,ભાષા,જાતિવાદ વગેરે વિશે ખૂબ લખ્યું પણ છે. જે લખાણ ખુબજ ઉચ્ચ દરજ્જાનું છે. કમનસીબે તેમણે જેલમાંથી લખેલ ચાર પુસ્તકો હવે આપણી પાસે ઉપલબ્ધ નથી.

નાનપણમાં સતત ગાયત્રીમંત્રનો જાપ કરનાર આર્યસમાજી ભગતસિંહ યુવાન બનતા વેચારિક રીતે પુખ્ત થતા “નાસ્તિક” બન્યા. જે વિશે તેમણે લખેલ લેખ
“મેં નાસ્તિક કયો હું ?” અદભુત અને વાંચવા લાયક છે.

તો આવા આ ભગતસિંહ કે જેના પિતા પણ પ્રખર ક્રાન્તિવીર હતા તેમણે પોતાના પિતાને શા માટે તેવું લખ્યું હશે ???

વાત જાણે એમ હતી કે ભગતસિંહ અને તેમના સાથીઓએ અંગ્રેજ પોલીસ ઓફિસર “જ્હોન સોન્ડર્સ” ને ગોળીએ દીધો તે “લાહોર કોન્સપીરન્સી” કેસમાં અંગ્રેજ સરકારે ભગતસિંહ, સુખદેવ અને રાજ્યગુરુને એકતરફી કેસ ચલાવી ફાંસીની સજા ફટકારી હતી.

ભગતસિંહ ને ફાંસીની સજાથી બચાવવા માટે ગાંધીજી સહિતના લોકો કોશિશ કરી રહ્યા હતા.

પણ ભગતસિંહે પોતાના પરિવાર તેમજ અન્ય લોકોએ પોતાનો બચાવ ન કરવા માટે કહેલું હતું તેમણે બ્રિટિશ ગર્વમેન્ટ ને એક પત્ર લખેલો કે મને વોર પ્રિઝનર માનવામાં આવે અને મને ફાંસી નહિ પણ ફાયરિંગ સ્કોડની સામે ઉભો રાખી ગોળી મારી સજા દેવામાં આવે. કારણકે ભગતસિંહ માનતા હતા કે કાંતિકારીઓએ તો બલિદાન જ દેવાનું હોઈ તેમણે કોઈ બચાવ કરવાનો ના હોઈ.

પણ બાપનું દિલ તો બાપ નું દિલ છે.

એમણે અંગ્રેજ સરકાર ને ભગતસિંહ ને માફી આપવા અરજ કરતો પત્ર લખ્યો હતો.

જેની જાણ થવાથી ભગતસિંહે પોતાના પિતાને કહેલું કે તમે અંગ્રેજી સરકારને માફીની દરકાર કરતો પત્ર લખી “મારી પીઠ પર ખંજર ભોક્યું છે.” અને ફાંસીના દિવસે પણ ગીત ગાતા ગાતા ખુશીથી ફાંસીના ફંદે જુલી ગયા.

28 સપ્ટેમ્બર 1907માં જન્મેલા આવા આ નરકેશરીને આજે નક્કી કરેલા દિવસ કરતા એક દિવસ આગાઉ પોતાના બે ક્રાંતિકારી મિત્રો રાજ્યગુરુ અને સુખદેવ સાથે ફાંસી આપી દેવામાં આવેલી.

ત્યારે તેમને શત: શત: નમન કરીને એટલુ જ કહેવાનું કે આ સરકાર કે તેના પછીની કોઈપણ પક્ષની સરકાર તમને ભારતરત્ન આપે કે ના આપે અમારા હૃદયમાં તમે હંમેશા…….

ભારત રત્ન હતા.

ભારતરત્ન છો.

અને ભારતરત્ન રહેવાના.

અસ્તુ

નિલેશ વૈષ્ણવ

નિલેશ વૈશ્નવ

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।।ओ३म्।।
भगत सिंह राजगुरु सुखदेव जी की शहीद दिवस पर सभी को श्रद्धा पूर्वक भावभीनी श्रद्धांजलि

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उस समय उनके चाचा अजीत सिंह और श्‍वान सिंह भारत की आजादी में अपना सहयोग दे रहे थे। ये दोनों करतार सिंह सराभा द्वारा संचालित गदर पाटी के सदस्‍य थे। भगत सिंह पर इन दोनों का गहरा प्रभाव पड़ा था। इसलिए ये बचपन से ही अंग्रेजों से घृणा करने लगे थे।

भगत सिंह करतार सिंह सराभा और लाला लाजपत राय से अत्यधिक प्रभावित थे। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला।

लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने 1920 में भगत सिंह महात्‍मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे अहिंसा आंदोलन में भाग लेने लगे, जिसमें गांधी जी विदेशी समानों का बहिष्कार कर रहे थे।

14 वर्ष की आयु में ही भगत सिंह ने सरकारी स्‍कूलों की पुस्‍तकें और कपड़े जला दिए। इसके बाद इनके पोस्‍टर गांवों में छपने लगे।

भगत सिंह पहले महात्‍मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन और भारतीय नेशनल कॉन्फ्रेंस के सदस्‍य थे। 1921 में जब चौरा-चौरा हत्‍याकांड के बाद गांधीजी ने किसानों का साथ नहीं दिया तो भगत सिंह पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। उसके बाद चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्‍व में गठित हुई गदर दल के हिस्‍सा बन गए।

उन्‍होंने चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। 9 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर से लखनऊ के लिए चली 8 नंबर डाउन पैसेंजर से काकोरी नामक छोटे से स्टेशन पर सरकारी खजाने को लूट लिया गया। यह घटना काकोरी कांड नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है।

इस घटना को अंजाम भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और प्रमुख क्रांतिकारियों ने साथ मिलकर अंजाम दिया था।

काकोरी कांड के बाद अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के क्रांतिकारियों की धरपकड़ तेज कर दी और जगह-जगह अपने एजेंट्स बहाल कर दिए। भगत सिंह और सुखदेव लाहौर पहुंच गए। वहां उनके चाचा सरदार किशन सिंह ने एक खटाल खोल दिया और कहा कि अब यहीं रहो और दूध का कारोबार करो।

वे भगत सिंह की शादी कराना चाहते थे और एक बार लड़की वालों को भी लेकर पहुंचे थे। भगतसिंह कागज-पेंसिल ले दूध का हिसाब करते, पर कभी हिसाब सही मिलता नहीं। सुखदेव खुद ढेर सारा दूध पी जाते और दूसरों को भी मुफ्त पिलाते।

भगत सिंह को फिल्में देखना और रसगुल्ले खाना काफी पसंद था। वे राजगुरु और यशपाल के साथ जब भी मौका मिलता था, फिल्म देखने चले जाते थे। चार्ली चैप्लिन की फिल्में बहुत पसंद थीं। इस पर चंद्रशेखर आजाद बहुत गुस्सा होते थे।

भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अफसर जेपी सांडर्स को मारा था। इसमें चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी।

क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेंट्रल असेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे।

भगत सिंह क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशीरल विचारक, कलम के धनी, दार्शनिक, चिंतक, लेखक, पत्रकार और महान मनुष्य थे। उन्होंने 23 वर्ष की छोटी-सी आयु में फ्रांस, आयरलैंड और रूस की क्रांति का विषद अध्ययन किया था।

हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंगला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ चिंतक और विचारक भगतसिंह भारत में समाजवाद के पहले व्याख्याता थे। भगत सिंह अच्छे वक्ता, पाठक और लेखक भी थे। उन्होंने ‘अकाली’ और ‘कीर्ति’ दो अखबारों का संपादन भी किया।

जेल में भगत सिंह ने करीब दो साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उस दौरान उनके लिखे गए लेख व परिवार को लिखे गए पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं।

अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूंजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’? जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूख हड़ताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिए थे।

23 मार्च 1931 को भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे ‘बिस्मिल’ की जीवनी पढ़ रहे थे जो सिंध (वर्तमान पाकिस्तान का एक सूबा) के एक प्रकाशक भजन लाल बुकसेलर ने आर्ट प्रेस, सिंध से छापी थी।

पाकिस्तान में शहीद भगत सिंह के नाम पर चौराहे का नाम रखे जाने पर खूब बवाल मचा था। लाहौर प्रशासन ने ऐलान किया था कि मशहूर शादमान चौक का नाम बदलकर भगत सिंह चौक किया जाएगा। फैसले के बाद प्रशासन को चौतरफा विरोध झेलना पड़ा था।

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एक सच

“बहुत दिनों का बोझ था, अम्मा आज सब कुछ बता देंगे” –शास्त्री जी की पत्नी को यह कह कर शास्त्री जी के नौकर रहे रामनाथ, दिल्ली में मोतीलाल नेहरू के घर से संसद में शास्त्री जी की मृत्यु के सम्बन्ध में 1977 में जनता सरकार द्वारा बैठाई गई #रामनारायणइन्क्वायरी के समक्ष बयान देने के लिए घर से निकले। एक गाड़ी ने उन्हें टक्कर मारी, जिसमें वो बुरी तरह से घायल हुए। उनकी दोनों टांगें काटनी पड़ गयीं और उनकी याद्दाश्त चली गई।
इसी दिन मास्को दौरे पर शास्त्री जी के साथ गये उनके व्यक्तिगत चिकित्सक आर एन चुग अपना ब्यान देने दिल्ली आ रहे थे।अजीब संयोग था कि उनकी गाड़ी की भी दुर्घटनाग्रस्त हुई जिसमें उनकी, उनकी पत्नी और दो बेटोंकी मृत्यु हो गई। एक पुत्री बच गई परन्तु बहुत गम्भीर रुप से घायल हो गई।
शास्त्री जी देश को परमाणु शक्ति बनाना चाहते थे। 1966 में ही परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की संदेहास्पद मृत्यु हो गई।अंतरिक्ष एवं परमाणु वैज्ञानिक डॉ विक्रम साराभाई की संदेहास्पद मृत्यु हो गई । लेकिन इस कांग्रेस ने कोई जेपीसी या सीबीआई इनक्वायरी नहीं करवाई।
दूसरे परिदृश्य में यही कांग्रेस उग्रवादियों के साथ की मुठभेड़ों और बाटला हाउस पर रोती है और उनकी न्यायिक जांच चाहती है।
21दिसम्बर को सीबीआई जज ने सोहराबुद्दीन और प्रजापति की एंकाउंटर को पोलिटिकली मोटिवेटेड बताते हुए कहा कि अपराधी पहले तय कर लिए गये थे फिर जांच की गयी। अपने मित्रों के बीच हृदयाघात से शांत हुए जज लोया की कांग्रेस हाई लेवल कमेटी से जांच कराना चाहती है। भ्रष्ट सीबीआई के डायरेक्टर के पीछे अपनी पूरी ताकत लगा कर कांग्रेस खड़ी है । समझ में नहीं आता ये सब कुछ सार्वजनिक होने के बाद भी लोग कांग्रेस को वोट कैसे देते हैं????
आज 11जनवरी को शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर बहुत सी ऐसी घटनाएं यूं हीं दिमाग में घूम गयीं।
शास्त्री जी को हमारा शत शत नमन।🙏🙏🙏🙏

विपिन खुराना

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છત્રપતિ શિવાજી

ઇતિહાસમાં શિવાજી વિશે શાળામાં ક્યારેય વધારે શીખવડ્યું ન હતું. ઘણા લોકો તેના વિશે શું વિચારે છે તેનાથી આશ્ચર્યચકિત થઈ જશો..:

“કાબુલથી કંદહાર સુધી મારા તૈમૂર પરિવારે મોગુલ સલ્તનતની રચના કરી. ઇરાક, ઈરાન, તુર્કિસ્તાન અને ઘણા વધુ દેશોમાં મારી સેનાએ વિકરાળ યોદ્ધાઓને પરાજિત કર્યા. પરંતુ ભારતમાં શિવાજીએ અમારા પર રોક લગાવી દીધાં. મેં મારી મહત્તમ શક્તિ શિવાજી પર ખર્ચ કરી પરંતુ હું હરાવી શક્યો નહીં.

યા અલ્લાહ, તમે મને એક બહાદુર,નિર્ભય , ઈમાનવાળો ,સ્ત્રી ઓની ઈજ્જત કરવાવાળો દુશ્મન આપ્યો, કૃપા કરીને તેમના માટે સ્વર્ગના દરવાજા ખુલ્લા રાખો કારણ કે વિશ્વનો શ્રેષ્ઠ અને મોટા દિલનો યોદ્ધા તમારી પાસે આવી રહ્યો છે. “

  • ઓરંગઝેબ
    (શિવાજી ના મ્રુત્યુ -3 એપ્રિલ 1680 પર) “તે દિવસે શિવાજીએ પૂણેમાં મારા મહેલમાં ઘુસી ને ફક્ત મારી આંગળીઓ નહીં કાપી, પણ મારું ગૌરવ કાપી નાખ્યું. મને સપનામાં પણ શિવાજી દેખાય છે.”
  • શાહિસ્તા ખાન. “મારા રાજ્યમાં શિવજીને હરાવી સકે તેવો કોઈ માણસ બાકી નથી ??”
  • હતાશ બેગમ અલી આદિલશાહ. “નેતાજી, તમારા દેશને કોઈ પણ હિટલર ની બ્રિટીશ લોકો ને કાઢી નાખવાની માટે જરૂર નથી.
    તમારે શિવાજીનો ઇતિહાસ બાળપણ થી શીખવવાની જરૂર છે.” -એડોલ્ફ હિટલર “જો શિવાજીનો જન્મ ઇંગ્લેંડમાં થયો હોત, તો આપણે ફક્ત પૃથ્વી પર જ નહીં પરંતુ સમગ્ર બ્રહ્માંડ પર શાસન કર્યું હોત.” -લોર્ડ માઉન્ટબેટન “જો શિવાજી બીજા દસ વર્ષ જીવ્યા હોત, તો અંગ્રેજોએ ભારતનો ચહેરો જોયો ન હોત.”
  • તત્કાલીન બ્રિટીશ ગવર્નર _જો ભારતને સ્વતંત્ર બનાવવાની જરૂર હોય તો એકમાત્ર રસ્તો બહાર આવે છે, ‘ દેશ વાશી શિવાજીની જેમ લડે’. “
  • નેતાજી “શિવાજી એ માત્ર નામ નથી, તે ભારતીય યુવાનો માટે એક ઉર્જા સ્ત્રોત છે, જેનો ઉપયોગ ભારતને મુક્ત બનાવવા માટે કરી શકાય છે.”
  • સ્વામી વિવેકાનંદ. “જો શિવાજીનો જન્મ અમેરિકામાં થયો હોત, તો અમે તેમને એસ.યુ.એન. તરીકે નામ આપતા.”
  • બેરેક ઓબામા ગિનિસ બુક Worldફ વર્લ્ડ રેકોર્ડ્સમાં ઉમ્બરખિંડના પ્રખ્યાત યુદ્ધનો ઉલ્લેખ છે: “ઉઝબેકિસ્તાનની કર્તાલાબ ખાનની 30,000 ના મજબૂત સૈન્યને શિવાજીના માત્ર 1000 માલવા ઓ એ પરાજિત કરી હતી. એક પણ ઉઝબેકી આક્રંતાને ઘરે પરત ફરવા માટે જીવતો બાકી નહોતો.” શિવાજી આંતરરાષ્ટ્રીય ખ્યાતિના રાજા હતા. તેની કારકિર્દીના 30 વર્ષના ગાળામાં તેણે ફક્ત બે જ યુદ્ધ ભારતીય લડવૈયાઓ સાથે લડ્યા. બીજા બધા બહારના હતા. શાહિસ્તા ખાન, જેણે સપનામાં પણ શિવજીનો ડર રાખ્યો હતો તે અબુ તાલિબાન અને તુર્કિસ્તાનનો રાજા હતો. બેહલોલખાન પઠાણ, સિકંદર પઠાણ, ચિદરખાન પઠાણ એ બધા અફઘાનિસ્તાનના યોદ્ધા સરદાર હતા. દિલરખાન પઠાણ મંગોલિયાનો મહાન યોદ્ધા હતો. તે બધાએ શિવાજીની સામે ધૂળ ખાય છે. સિદ્દી જોહર અને સલાબા ખાન ઈરાની લડવૈયા હતા, જે શિવાજીથી પરાજિત થયા. સિદ્દી જૌહરે પછીથી દરિયાઇ હુમલો કરવાની યોજના બનાવી. જેના જવાબમાં શિવાજીએ એક નૌકાદળ ઉભું કર્યું, પ્રથમ ભારતીય નૌકાદળ.
    પરંતુ કાર્ય સિદ્ધ કરતા પહેલા શિવાજીએ આ દુનિયા છોડી દીધી. (તેમને આપણા જ ગદ્દારોદ્વારા ઝેર આપવામાં આવ્યું હતું.)

સ્રોત ગૂગલ “શિવાજી, મેનેજમેન્ટ ગુરુ.” તે બોસ્ટન યુનિવર્સિટીનો સંપૂર્ણ વિષય છે.
આપણા અભ્યાસ ક્રમ મા ક્યારે આવશે ?

તેમ છતાં, આપણે ભારતીયો તેના વિશે ખૂબ જ ઓછું જાણીએ છીએ ….. કેટલી દુખ ની વાત છે…… ઓછામાં ઓછું. ચાલો આપણે આપણી ભાવિ પેઢીને આ મહાન ભારત અને તેના મહાન યોદ્ધા ઓ વિશે જાણીવિયે..70 સાલ વિદેશી એજન્ટો હીન્દુસ્થાનમા રાજ કરનારા ઓ એ ક્યાય અભ્યાસ મા કેમ ન લીધુ ? પણ તેણે તો હીન્દુ સંસ્કૃતિને નષ્ટ કરવા પ્રયત્ન કર્યા છે જાગો હીન્દુઓ જાગો

એક રાષ્ટ્ર ભક્ત, અને હીન્દુસંસ્ક્રતિ ના મુળ રખેવાળ બારોટ સમાજ ના એક હીન્દુ સંસ્કૃતિ ના પ્રેમી અમરૂભાઈ બારોટ ની સાચી વેદના સાચી હોય તો આગળ મોકલજ્યો જય શ્રી રામ
ભારત માતા કી જય…
🚩🚩🚩

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“ओम जय जगदीश हरे” के लेखक श्रद्धाराम फिल्लौरी के जन्मदिन ३०दिसंबर पर उनको शत-शत नमन।

भारत के उत्तरी भाग में किसी भी धार्मिक समारोह के अन्त में प्रायः ओम जय जगदीश हरे… आरती बोली जाती है। कई जगह इसके साथ ‘कहत शिवानन्द स्वामी’ या ‘कहत हरीहर स्वामी’ सुनकर लोग किन्हीं शिवानन्द या हरिहर स्वामी को इसका लेखक मान लेते हैं, पर सच यह है कि इसके लेखक पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी थे। आरती में आयी एक पंक्ति ‘श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ…’ में उनके नाम का उल्लेख होता है।

श्रद्धाराम जी का जन्म पंजाब में सतलुज नदी के किनारे बसे फिल्लौर नगर में 30 दिसम्बर, 1837 को पंडित जयदयालु जोशी एवं श्रीमती विष्णुदेवी के घर में हुआ था। उनके पिताजी कथावाचक थे। अतः बचपन से ही श्रद्धाराम जी को धार्मिक संस्कार मिले। उनका कण्ठ भी बहुत अच्छा था। भजन कीर्तन के समय वे जब मस्त होकर गाते थे, तो लोग झूमने लगते थे।

आगे चलकर श्रद्धाराम जी ने जब स्वयं भजन आदि लिखने लगे, तो फिल्लौर के निवासी होने के कारण वे अपने नाम के आगे ‘फिल्लौरी’ लिखने लगे। श्रद्धाराम जी हिन्दी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, गुरुमुखी आदि अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। इनमें उन्होंने धर्मिक पुस्तकें भी लिखीं। उन दिनों अंग्रेजी शासन का लाभ उठाकर मिशनरी संस्थाएँ पंजाब में लोगों का धर्म बदल रही थीं। ऐसे में श्रद्धाराम जी ने धर्म प्रचार के माध्यम से इनका सामना किया।

एक बार महाराजा रणधीर सिंह मिशनरियों के जाल में फँसकर धर्म बदलने को तैयार हो गये। जैसे ही श्रद्धाराम जी को यह पता लगा, वे तुरन्त वहाँ गये और महाराज से कई दिन तक बहस कर उनके विचार बदल दिये।

श्रद्धाराम जी मुख्यतः कथावाचक थे। श्रेष्ठ वक्ता होने के कारण गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदि पर प्रवचन करते समय उनमें वर्णित युद्ध के प्रसंगों का वे बहुत जीवन्त वर्णन करते थे। श्रोताओं को लगता था कि वे प्रत्यक्ष युद्ध क्षेत्र में बैठे हैं, परन्तु इस दौरान वे लोगों को विदेशी और विधर्मी अंग्रेजों का विरोध करने के लिए भी प्रेरित करते रहते थे।

एक बार युद्ध का प्रसंग सुनाते हुए वे 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की मार्मिक कहानी बताने लगे। कथा में कुछ सिपाही भी बैठे थे। उनकी शिकायत पर श्रद्धाराम जी को पकड़कर महाराज के किले में बन्द कर दिया गया। पर उन्होंने कोई सीधा अपराध तो किया नहीं था। फिर उनकी लोकप्रियता को देखते हुए पुलिस वाले उन्हें जेल भेजना भी नहीं चाहते थे। इसलिए उन पर क्षमा माँगने के लिए दबाव डाला गया, पर श्रद्धाराम जी इसके लिए तैयार नहीं हुए। झक मारकर प्रशासन को उन्हें छोड़ना पड़ा।

इसके बाद श्रद्धाराम जी फिल्लौर छोड़कर पटियाला रियासत में आ गये। वहाँ कई दिन प्रतीक्षा करने के बाद उनकी भेंट महाराजा से हुई। महाराज उनकी विद्वत्ता से प्रभावित हुए। इस प्रकार उन्हें पटियाला में आश्रय मिल गया। अब उन्होंने फिर से अपना धर्म प्रचार का काम शुरू कर दिया।

पर पटियाला में वे लम्बे समय तक नहीं रह सके और तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। इस यात्रा के दौरान उन्होंने धर्मग्रन्थों का गहन अध्ययन किया और अनेक पुस्तकें भी लिखीं। ऐसे विद्वान कथावाचक पंडित श्रद्धाराम जी का केवल 44 वर्ष की अल्पायु में 24 जून 1881 को देहान्त हो गया। लेकिन ‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती रचकर उन्होंने स्वयं को अमर कर लिया।(अपनी धरती अपने लोग से साभार)