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आदि शंकराचार्य


एक बालक जिसने 4 वर्ष की उम्र में अपने पिता को खो दिया। 8 वर्ष की उम्र में अपनी मां से सन्यास की आज्ञा ले ली। 12 की उम्र में श्रुति और स्मृति शास्त्रों में निपुणता प्राप्त कर ली।

16 की उम्र में अद्वैत वेदांत का दर्शन दे दिया जिस पर आज तक सबसे ज्यादा रिसर्च हुई है और जारी है। 20 की उम्र में उपनिषद,योगसूत्र,भगवतगीता जैसी गूढ़ पुस्तकों पर टिकाएं लिख डालीं। 25 की उम्र तक तो देश के समस्त विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया।

सनातन धर्म से विमुख हो चुके लोगों को पुनश्च मुख्य धारा में लाने के लिए देश भर में मठ-मंदिर,धामों की स्थापना की,जो आज भी सनातन धर्म की दिग्दिगांत में फैली कीर्ति का मूल बने हुए हैं।

अंततः 32 की उम्र में केदारनाथ में समाधि ली।

ऐसे भगवान शंकाराचार्य की अपने जीवन काल में की गई दिग्विजय यात्राओं का मैप देखिए और कल्पना कीजिये आज से 1300 वर्ष पहले एक व्यक्ति द्वारा पूरे देश भर में भ्रमण कैसे संभव हुआ होगा।

रत्नगर्भा भारत-भूमि पर जन्में सर्वश्रेष्ठ मानव का हम सब पर ऋण है,आइए उनकी राह पर चल उस ऋषि-ऋण को कम करने का संकल्प लें।

जयतु भारतं🙏🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, जीवन चरित्र

समय सबका आता हैं , बस संयम बनाये रखें :-

साल 2004 । दिनेश कार्तिक नामक युवा विकेटकीपर ने भारतीय क्रिकेट टीम ने अपना डेब्यू किया । उनका क्रिकेट जीवन परवान चढ़ रहा था और सन 2007 में अपनी बचपन की दोस्त निकिता वंजारा से शादी कर ली।

दिनेश और निकिता अपनी शादीशुदा जिंदगी में बड़े खुश थे । दिनेश रणजी ट्रॉफी में तमिलनाडु टीम की कप्तानी भी कर रहे थे । उनके खास दोस्त थे तमिलनाडु की टीम के ओपनर ,जो बाद में भारतीय टीम का हिस्सा भी बने , मुरली विजय ।

तो एक दिन निकिता की मुलाकात दिनेश कार्तिक के इसी साथी खिलाड़ी मुरली विजय से हुई । मुरली विजय को निकिता भा गयी। भोले भाले दिनेश कार्तिक इस बात को महसूस नहीं कर पाए। निकिता और मुरली के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी और कुछ ही समय में दोनों का अफेयर शुरू हो गया । दोनों खुलकर मिलने लगे। दिनेश कार्तिक के अलावा पूरी तमिलनाडु की टीम जानती थी की मुरली विजय अपने कप्तान दिनेश की पत्नी निकिता के साथ इश्क लड़ा रहे हैं ।

फिर आया वर्ष 2012 । निकिता प्रेगनेंट हो गई । लेकिन तभी उसने धमाका करते हुए का यह बच्चा मुरली विजय का है । दिनेश कार्तिक टूट गए । उन्होंने निकिता से तलाक ले लिया । तलाक के अगले ही दिन निकिता ने मुरली विजय से शादी कर ली । और महज 3 महीने बाद उन्हें बच्चा हो गया।

दिनेश कार्तिक डिप्रेशन में चले गए। वह मानसिक तौर पर बीमार रहने लगे । वह अपनी पत्नी और दोस्त मुरली के इस धोखे को असानी से भूला नहीं पा रहे थे। वे शराबी हो गए। सुबह से लेकर शाम तक शराब पीने लगे। वे देवदास बन गए। उन्हें भारतीय टीम से बाहर कर दिया गया । रणजी ट्रॉफी में भी वे असफल हो रहे थे ।

तमिलनाडु की टीम की कप्तानी उनसे छीन ली गयी। और मुरली विजय को नया कप्तान बना दिया गया।असफलता का दौर यहीं नहीं थमा , उन्हें आईपीएल में भी टीम में नहीं खिलाया गया। उन्होंने जिम जाना भी छोड़ दिया । अंत में दिनेश इतना हताश हो गए कि आत्महत्या कर लेने तक की बात करने लगे।

तभी एक दिन जिम में उनके ट्रेनर उनके घर पहुंचे । उन्होंने दिनेश कार्तिक को बुरी अवस्था में पाया । उन्होंने कार्तिक को पकड़ा और सीधा जिम लेकर आ गए।कार्तिक ने मना किया लेकिन उनके ट्रेनर ने उनकी एक न सुनी ।

उसी जिम में भारतीय स्क्वैश की महिला चैंपियन दीपिका पल्लीकल भी आती थी । जब उन्होंने दिनेश कार्तिक की स्थिति देखी तो ट्रेनर के साथ उन्होंने भी दिनेश कार्तिक की काउंसलिंग शुरू कर दी ।

ट्रेनर और दीपिका के मेहनत रंग लाने लगी। अब दिनेश कार्तिक सुधार की राह पर थे । उधर दूसरी ओर मुरली विजय का खेल निरंतर डाउन होता जा रहा था । इधर मुरली विजय को भारतीय टीम से बाहर कर दिया गया। बाद में उनकी खराब फॉर्म को देखते हुए आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स ने भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।

दूसरी ओर दीपिका पल्लीकल के सहयोग से दिनेश कार्तिक नेट पर जोरदार अभ्यास करने लगे थे। इसका असर दिखने लगा और दिनेश कार्तिक घरेलू क्रिकेट में बड़े स्कोर बनाने लगे । शीघ्र ही उन्हें आईपीएल में भी चुन लिया गया और कोलकाता नाइट राइडर्स का कप्तान भी बना दिया गया । दीपिका पल्लीकल के वह बहुत नजदीक आ चुके थे । उन्होंने दीपिका से शादी कर ली ।

क्रिकेट की उम्र अनुसार दिनेश अब बूढ़ा चुके थे ।भारतीय क्रिकेट टीम में अब ऋषभ पंत का आगमन हो चुका था कार्तिक समझ गए कि अब उनका कैरियर समाप्त प्राय है । उन्होंने क्रिकेट से रिटायर होने का फैसला किया । इधर उनकी पत्नी दीपिका पल्लीकल प्रेग्नेंट हुई और उसने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया । दीपिका का स्क्वाश खेलना भी रुक गया ।

दीपिका और दिनेश कार्तिक की इच्छा थी कि उनका चेन्नई के संभ्रांत इलाके पोएस गार्डन एक बंगला हो । 2021 में चेन्नई के इसी इलाके में एक महलनुमा घर को खरीदने का ऑफर उनके पास आया । दिनेश ने उसे खरीदने का फैसला कर लिया । सब आश्चर्य कर रहे थे कि जब दीपिका और दिनेश दोनों ही करीब करीब खेल की दुनिया से बाहर हो चुके हैं , तब इतना महंगा सौदा वे कैसे पूरा करेंगे ?

तभी दिनेश को सूचना मिली की चेन्नई सुपर किंग्स की ओर से महेंद्र सिंह धोनी उन्हें विकेटकीपर के रूप में वापस टीम में देखना चाह रहे हैं । 2022 का आईपीएल का ऑक्शन शुरू हुआ । लेकिन इस बार चेन्नई की जगह रॉयल चैलेंजर बेंगलुरु ने उन्हें खरीद लिया । दिनेश की पत्नी दीपिका ने भी खेलना शुरू किया और अपनी जुड़वा बच्चों के जन्म के महज 6 महीने बाद उन्होंने स्क्वैश की वर्ल्ड चैंपियनशिप में , ग्लास्गो शहर में , मिक्स्ड डबल के साथ महिला युगल का खिताब जीत लिया । उनकी पार्टनर थी जोशना पुनप्पा।

पत्नी की सफलता और नई टीम के साथ जोड़कर दिनेश कार्तिक में भी ऊर्जा का संचार हुआ और उन्होंने 2022 के आईपीएल में कमाल दिखाना शुरू कर दिया । एक के बाद एक मैच जिताऊ पारियां खेली और उन्हें इस आईपीएल का सबसे बड़ा फिनिशर माने जाने लगा । अभी परसों ही हुए मैच में उन्होंने 8 गेंदों पर तीन छक्कों की सहायता से 30 रन ठोक डाले । मैच समाप्ति पर जब दिनेश ड्रेसिंग रूम पहुंचे तो विराट कोहली ने उन्हें झुककर सम्मान दिया । आज दिनेश कार्तिक भारतीय टी20 की टीम में आने के सबसे बड़े दावेदार बन गए हैं। 37 साल की उम्र में दिनेश कार्तिक इस वर्ष के आईपीएल के सबसे धमाकेदार खिलाड़ी हैं ।

उनकी यह सफलता की कहानी सभी को जाननी चाहिए। नीचे गिरकर उठना किसे कहते है यह कार्तिक का जीवन बताता है। सदैव संयम बनाये रखिये । परिस्थितियों से लड़ते रहिए । आप अपनी मंजिल तक अवश्य पहुंचेंगे।

सादर

सुधांशु टाक जी से साभार

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लता मगेशकरजी


लता जी का शरीर पूरा हो गया। कल सरस्वती पूजा थी, आज माँ विदा हो रही हैं। लगता है जैसे माँ सरस्वती इस बार अपनी सबसे प्रिय पुत्री को ले जाने ही स्वयं आयी थीं।
मृत्यु सदैव शोक का विषय नहीं होती। मृत्यु जीवन की पूर्णता है। लता जी का जीवन जितना सुन्दर रहा है, उनकी मृत्यु भी उतनी ही सुन्दर हुई है।
93 वर्ष का इतना सुन्दर और धार्मिक जीवन विरलों को ही प्राप्त होता है। लगभग पाँच पीढ़ियों ने उन्हें मंत्रमुग्ध हो कर सुना है, और हृदय से सम्मान दिया है।
उनके पिता ने जब अपने अंतिम समय में घर की बागडोर उनके हाथों में थमाई थी, तब उस तेरह वर्ष की नन्ही जान के कंधे पर छोटे छोटे चार बहन-भाइयों के पालन की जिम्मेवारी थी। लता जी ने अपना समस्त जीवन उन चारों को ही समर्पित कर दिया। और आज जब वे गयी हैं तो उनका परिवार भारत के सबसे सम्मानित प्रतिष्ठित परिवारों में से एक है। किसी भी व्यक्ति का जीवन इससे अधिक सफल क्या होगा?
भारत पिछले अस्सी वर्षों से लता जी के गीतों के साथ जी रहा है। हर्ष में, विषाद में,ईश्वर भक्ति में, राष्ट्र भक्ति में, प्रेम में, परिहास में… हर भाव में लता जी का स्वर हमारा स्वर बना है।
लता जी गाना गाते समय चप्पल नहीं पहनती थीं। गाना उनके लिए ईश्वर की पूजा करने जैसा ही था। कोई उनके घर जाता तो उसे अपने माता-पिता की तस्वीर और घर में बना अपने आराध्य का मन्दिर दिखातीं थीं। बस इन्ही तीन चीजों को विश्व को दिखाने लायक समझा था उन्होंने। सोच कर देखिये, कैसा दार्शनिक भाव है यह… इन तीन के अतिरिक्त सचमुच और कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता संसार में। सब आते-जाते रहने वाली चीजें हैं।
कितना अद्भुत संयोग है कि अपने लगभग सत्तर वर्ष के गायन कैरियर में लगभग 36भाषाओं में हर रस/भाव के 50 हजार से भीअधिक गीत गाने वाली लता जी ने अपना पहले और अंतिम हिन्दी फिल्मी गीत के रूप में भगवान भजन ही गाया है। ‘ज्योति कलश छलके’ से ‘दाता सुन ले’ तक कि यात्रा का सौंदर्य यही है कि लताजी न कभी अपने कर्तव्य से डिगीं न अपने धर्म से! इस महान यात्रा के पूर्ण होने पर हमारा रोम रोम आपको प्रणाम करता है लता जी।

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सुभाष बोस की वापसी


  1. ………………………………………1960

सुभाष बोस की वापसी

इतिहास का उतार—चढ़ाव देखें। साथ में वक्त की करवट भी।

पांच दशक बीते, नयी दिल्ली के हृदय स्थल इंडिया गेट से अपने विशाल भारत साम्राज्य को निहारती रही ब्रिटिश बादशाह जॉर्ज पंचम की पथरीली मूर्ति। अब उसके हटने से रिक्त पटल पर (23 मार्च 2022) उनकी 125वीं जयंती पर अंग्रेज राज के महानतम सशस्त्र बागी सुभाष चन्द बोस की प्रतिमा स्थापित होगी। नरेन्द्र मोदी करेंगे। शायद बागी बोस फिर अपने हक से वंचित रह जाते क्योंकि वहां इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाने की बेसब्र योजना रची गयी थी। स्वाधीन भारत के दो दशकों (नेहरु राज के 17वर्ष मिलाकर) यह गुलामी का प्रतीक सम्राट का बुत राजधानी को ”सुशोभित” करता रहा। मानों गोरे अबतक दिल्ली में ही रहे! वह बादशाह जिसके विश्वव्यापी राज में सूरज कभी नहीं डूबता था, (किसी न किसी गुलामदेश में दिखता था) को अस्त कराने में नेताजी बोस की भूमिका का सम्यक वर्णन अभी बाकी है। इतिहास की दरकार है। युग का न्याय भी कितना वाजिब रहा! आज दिल्ली का कोरोनेशन पार्क (जहां जॉर्ज पंचम का पुतला 1968 से पड़ा है।) उत्तरी दिल्ली में खाली पड़ा एक मैदान मात्र है। इस जॉर्ज पंचम का वैभवी पुतला गत अर्ध सती से इस मैदान के जंगली झांड़ियों से आच्छादित वीरान कोने में पड़ा है। हर मौसम के थपेड़े खाता रहा। लंदन अजायबघर भी इसे लेने में दिलचस्पी नहीं रखता। कभी निपुण ब्रिटिश शिल्पियों की हस्तकला का यह नायाब नमूना रहा होगा। जब शरीर में प्राण थे यह जॉर्ज पंचम अपनी महारानी मैरी के साथ दिसम्बर 1911 में भारतीय उपनिवेश में आये थे। कोहिनूर जो गुलाम भारत से छीन कर ले जाया गया था, ब्रिटिश मुकुट की शोभा बढ़ा रहा था। नयी दिल्ली में राजकीय दरबार लगा। तब दो ऐतिहासिक घोषणायें हुयीं। बंग भंग (बंगाल का पूर्वी—पश्चिमी भूभाग में विभाजन) वाला निर्णय निरस्त कर फिर से संयुक्त बंगाल बना। भारत की नयी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लायी गयी। इसी राजतिलक के पर्व पर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपना जानामाना गीत ''जनगण मन अधिनायक'' इस गोरे सम्राट के लिये पेश किया था। इस जलसे में प्रत्येक शासक (राजकुमार, महाराजा एवं नवाब) तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति, भारत इस शोषक को अपना सलाम करने पहुंचे। सम्राट—युगल अपनी शाही राजतिलक वेशभूषा में आये थे। सम्राट ने आठ मेहराबों युक्त भारत का इम्पीरियल मुकुट पहना, जिसमें छः हजार एक सौ सत्तर उत्कृष्ट तराशे हीरे थे, जिनके साथ नीलम, पन्ना और माणिक्य जड़े थे। साथ ही एक शनील और मिनिवर टोपी भी थी, जिन सब का भार 965 ग्राम था। फिर वे लाल किले के एक झरोखे में दर्शन के लिये आये, जहां दस लाख से अधिक लोग दर्शन हेतु उपस्थित थे। दिल्ली दरबार मुकुट के नाम से सम्राज्ञी का एक भव्य मुकुट था। उन्हें पटियाला की महारानी की ओर से गले का खूबसूरत हार भेंट किया गया था। यह भारत की सभी स्त्रियों की ओर से महारानी की पहली भारत यात्रा के स्मारक स्वरूप था। सम्राज्ञी की विशेष आग्रह पर, यह हार, उनकी दरबार की पन्ने युक्त वेशभूषा से मेल खाता बनवाया गया था। 1912 में गेरार्ड कम्पनी ने इस हार में एक छोटा सा बदलाव किया, जिससे कि पूर्व पन्ने का लोलक (पेंडेंट) लगा था। उसके स्थान पर एक दूसरा हटने योग्य हीरे का लोलक लगाया गया। यह एक 8.8 कैरेट का मार्क्यूज़ हीरा था। गरीब भारत की सब संपत्ति थी। दिल्ली दरबार 1911 में लगभग 26,800 पदक दिये गये, जो कि अधिकांशतः ब्रिटिश रेजिमेंट के अधिकारी एवं सैनिकों को मिले थे। भारतीय रजवाड़ों के शासकों और उच्च पदस्थ अधिकारियों को भी एक छोटी संख्या में स्वर्ण पदक दिये गये थे।

किताबों में दर्ज है कि अपनी रियासत के रक्त पिपासु राजेमहाराजे बेगैरत रीति से सम्राट के कृपापात्र बनने की होड़ में रहते थे। सन 1857 के गोरे हत्यारों की मिन्नत में। अब बारी आ गयी नेताजी की। नेहरु वंश की हर कोशिश, बल्कि साजिश के बावजूद सुभाष चन्द्र बोस को नैसर्गिक अधिकार हासिल हो ही गया। हालांकि बोस की रहस्यात्मक मृत्यु की अभी तक गुत्थी सुलझी नहीं। नेताजी की मृत्यु के विषय में प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना कई बार मांगी गयी, पर कोई भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला। जवाहरलाल नेहरु से लेकर मनमोहन सिंह सरकारों से पूछा जा चुका है। एक रपट के अनुसार ढाई दशक पूर्व (1995) में मास्को अभिलेखागार में तीन भारतीय शोधकर्ताओं ने चंद ऐसे दस्तावेज थे जिनसे अनुमान होता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस कथित वायुयान दुर्घटना के दस वर्ष बाद तक जीवित थे। वे स्टालिन के कैदी के नाते साइबेरिया के श्रम शिविर में नजरबंद रहे होंगे। सुभाष बाबू के भतीजे सुब्रत बोस ने प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव से इसमें तफ्तीश की मांग भी की थी। इसी आधार पर टोक्यो के रेणकोटी मंदिर में नेताजी की अनुमानित अस्थियां कलकत्ता लाने का विरोध होता रहा।

सुभाषचंद्र बोस पर मिली इन अभिलेखागार वाली सूचनाओं पर खुले दिमाग से गौर करने की तलब होनी चाहिए थी। प्रधानमंत्री से राष्ट्र की मांग है। यह भारत के साथ द्रोह और इतिहास के साथ कपट होगा यदि नेहरू युग से चले आ रहे सुभाष के प्रति पूर्वाग्रहों और छलभरी नीतियों से मोदी सरकार के सदस्य और जननायक भी ग्रसित रहेंगे और निष्पक्ष जांच से कतराते रहेंगे। संभव है कि यदि विपरीत प्रमाण मिल गए तो जवाहलाल नेहरू का भारतीय इतिहास में स्थान बदल सकता है, पुनर्मूल्यांकन हो सकता है। एक खोजपूर्ण दृष्टि तो अब भी डाली जा सकती है। भारत की स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों की राजनीतिक स्थिति और संघर्ष के दौरान की घटनाओं का विश्लेषण करें तो पूरा दृश्य कुछ स्पष्ट होता लगेगा। जैसे आजाद भारत के कांग्रेसी नेताओं का सुभाषचंद्र बोस की जीवित वापसी से बड़ा खतरा महसूस करना। यह इस परिवेश में भी समचीन लगता है कि राज्य सत्ता हासिल करने की लिप्सा में तब के राष्ट्रीय कर्णधारों ने राष्ट्रपिता को ही दरकिनार कर जल्दबाजी में देश का विभाजन स्वीकार कर लिया था। फिर वे सत्ता में सुभाष बोस की भागीदारी कैसे बर्दाश्त करते? देश कृतज्ञ है नरेन्द्र मोदी का कि सरदार पटेल के बाद सुभाष बोस को राष्ट्र के समक्ष पेश कर, उनकी भव्य प्रतिमा लगवाकर एक परिवार द्वारा ढाये जुल्म का अंत हो रहा है। मूर्ति लगाने से नेताजी को न्याय दिलाने की प्रक्रिया की शुरुआत हो गयी है। अब इसका तार्किक अंत भी हो।

अरुण सिंह

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સિંધુ તાઈ


અનેક અનાથ બાળકોની માતા સિંધુતાઈ સપકાલે આ જગતમાંથી વિદાય લીધી . સિંધુતાઈ કોણ હતા ? વાંચો હિમતવાન નારીની આ અદભૂત કથા.

મહારાષ્ટ્રના વર્ધા જીલ્લામાં પીંપરી નામનું એક ગામ છે. આ ગામમાં એક સામાન્ય પરિવારમાં એક દિકરીનો જન્મ થયો. છોકરીને ભણવાની ખુબ ઇચ્છા પરંતું પરિવારની નબળી આર્થિક પરીસ્થિતીને કારણે માત્ર 4 ધોરણ સુધીનો અભ્યાસ જ કર્યો. હજુ તો 10 વર્ષની ઉંમર થઇ ત્યાં તેના લગ્ન કરી દેવામાં આવ્યા અને તે પણ ઉંમરમાં તેના કરતા 20 વર્ષ મોટા પુરુષ સાથે. 10 વર્ષની આ છોકરીએ પોતાનું નસીબ સમજીને 30 વર્ષના પતિને સ્વિકારી લીધો અને પિયરમાંથી સાસરીયે પ્રસ્થાન કર્યુ.

આ છોકરી 20 વર્ષની થઇ અને એના જીવનમાં સુખનો સુરજ ઉગ્યો. ભગવાને એની કુખમાં સંતાનનું સુખ રોપ્યુ. જેમ જેમ મહીના ચઢવા લાગ્યા તેમ તેમ આ યુવતીના ચહેરા પરનું તેજ વધવા લાગ્યુ. 9મો મહીનો પુરો થવા આવ્યો હવે બાળકના જન્મની ઘડીઓ ગણાતી હતી. આવા દિવસોમાં કોઇપણ સ્ત્રીને સૌથી વધુ સહકાર એના પતિ તરફથી મળતો હોય એ સ્વાભાવિક છે. પતિના પ્રેમને કારણે બધી તકલીફોને એ સહજતાથી સહી લેતી હોય છે પરંતું આ યુવતિનું નસિબ કંઇક જુદી રીતે જ લખાયુ હશે એટલે જે સમયે પતિ એમની સાથે હોવો જોઇએ એવા સમયે પતિએ તેણીને ઘરની બહાર કાઢી મુકી. કોઇ જાતના વાંક વગર આ ગર્ભવતી મહિલાને ઉપાડીને ઘરની બહાર ફેંકી દેવામાં આવી. ચાલી શકવાની કોઇ ક્ષમતા નહોતી એટલે ઘરના ફળીયામાં જ ઢોરને બાંધવાની જગ્યા સુધી એ માંડ પહોંચી શકી અને ત્યાં એક બાળકીને એણે જન્મ આપ્યો.

ડોકટર અને નર્સની સેવા તો એકબાજુ રહી અહીંયા તો મદદ માટે આજુ બાજુમાં કોઇ જ નહોતું. તાજી જન્મેલી બાળકીની નાળ કાપવા માટે કોઇ સાધન ન હોવાના કારણે બાજુમાં પડેલા ધારદાર પથ્થરનો ઉપયોગ કરીને તેનાથી નાળ કાપી. બાળકના જન્મ પછી માતાને ખુબ નબળાઇ રહે તે સ્વાભાવિક છે આવી પરિથિતીમાં પણ બાળકીને પોતાની સાથે લઇને આ યુવતી અમુક કીલોમીટર ચાલીને એના પિતાના ઘરે પહોંચી. બાપના ઘર સુધી પહોંચતા એને કેવી પીડા થઇ હશે તેની કલ્પના માત્ર પણ આપણને ધુજાવી દે છે તો જેણે આ પીડા અનુભવી હોય એની સ્થિતી કેવી હશે. પિતાના ઘરે પણ દિકરીને આવી ગંભીર હાલત હોવા છતા કોઇ અગમ્ય કારણસર સહારો ના મળ્યો. બાપના ઘરનો દરવાજો પણ બંધ થઇ જતા આ યુવતી સાવ પડીભાંગી અને એને આત્મહત્યા કરવાનો વિચાર આવ્યો. વિચાર એના પર કબજો જમાવે એ પહેલા થોડી જ ક્ષણોમાં એણે આ નબળા વિચારને મનમાંથી હાંકી કાઢ્યો.

પોતાની અને દિકરીની ભૂખ ભાંગવા માટે એણે રેલ્વે સ્ટેશન પર ભીખ માંગવાની શરુઆત કરી. ભીખમાંગવાની આ પ્રવૃતી ચાલુ કર્યા પછી એના ધ્યાન પર આવ્યુ કે બીજા કેટલાય અનાથ બાળકો માતા-પિતાનું છત્ર ગુમાવવાના કારણે ભીખ માંગવાનું કામ કરે છે અને નરકથી પણ બદતર જીવન જીવે છે. એકલતા અને સમાજમાંથી તિરસ્કૃત થવાની પીડા આ યુવતીએ ખુદ અનુભવી હતી એટલે એણે આવા અનાથ બાળકો માટે અનુકંપા જાગી. આ મા વગરના બાળકની મા બનીને એમના માટે કંઇક કામ કરવાની પ્રેરણા થઇ. એણે આવા અનાથ બાળકોને દતક લેવાનું ચાલુ કર્યુ. પરિવારથી તિરસ્કૃત થયેલી આ યુવતીએ ભીખ માંગીને બચાવેલી રકમમાંથી આ બાળકોના અભ્યાસ માટેની વ્યવસ્થા કરી. જે બાળકો ભીખ માંગતા હતા તે હવે ભણવા લાગ્યા. ધીમે ધીમે બાળકોની સંખ્યા વધતી ગઇ અને આ યુવતીનો પરિવાર મોટો થતો ગયો.

સિંઘુતાઈ સપકાલે કોઇ પાસેથી કોઇ પ્રકારની મદદ લીધા વગર એકાદ બે નહી પરંતું 1400થી વધુ બાળકોને મા બનીને સાચવ્યા છે. એમના કેટલાય દિકરા-દિકરીઓ આજે ડોકટર, એન્જીનિયર, વકીલ, ચાર્ટર્ડ એકાઉન્ટન્ટ કે સરકારી અમલદારો બની ગયા છે. ભીખ માંગવાનું બંધ કરીને ભણવાની શરુઆત કરનાર આ બાળકો સમાજમાં આજે સન્માનનિય સ્થાને પહોંચ્યા છે. સિન્ધુતાઇ માત્ર બાળકોને દતક લેવાનું જ કામ નથી કરતા પરંતું તેના અભ્યાસની બધી જ વ્યવસ્થા કરે છે. ઉંમર લાયક થાય ત્યારે દિકરા-દિકરીને પરણાવે છે. સુન્ધુતાઇને ૨૦૦થી વધુ જમાઇ છે અને ૪૦થી વધુ પુત્રવધુઓ છે. એમની પોતાની દિકરીને બીજા બાળકો કરતા વધુ પ્રેમ કરીને ભૂલથી પણ બીજા બાળકોને અન્યાય ન થઇ જાય એ માટે સિન્ધુતાઇએ એની દિકરીને પોતાનાથી દુર કરી જે દિકરી પણ આજે માના રસ્તે ચાલીને અનાથ બાળકો માટેની સંસ્થા ચલાવતા હતા.

આ જગદંબાએ અનેક અનાથ બાળકોના અંધારિયા જીવનમાં અજવાળા પાથરીને પ્રભુના ઘરે જવા વિદાય લીધી છે. તાઈ આપણા સંઘર્ષ, સમર્પણ અને સેવાને કોટી કોટી વંદન.

~ શૈલેષભાઇ સગપરીયાની વોલ પરથી

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ધ્યાનચંદ


ધ્યાનચાંદ સ્પેશિયલ !!!!
………….
આઝાદ ભારતમાં શિક્ષણ પણ કઈહદે કોંગ્રેસી ચમચાગીરીનો ભોગ બનેલું એ જુઓ.
આપણે ગાંધીની બકરી ચરખો નહેરુના જાકિટમાં ગુલાબ , અને નહેરુને બાળકો બવ વ્હાલા આટલું ભણયા , પણ એક ચેપટર તો ઠીક એક પેજ પણ ધ્યાન ચાંદ વિષે કોઈ ધોરણમાં ભણવામાં ના આવ્યું. !!!
…………….
ઉપર “ચાંદ ” લખ્યું છે એ ભૂલથી નથી લખ્યું. પણ ચાંદ એ એમને અપાયેલી તખલ્લુસ હતી. એમનું નામ ધ્યાનસિંગ હતું.
ધ્યાનસિંગ ના પિતા બ્રિટિશ આર્મીમાં હતા અને ધ્યાનસિંગ પણ 16 વર્ષની ઉંમરે સેનામાં ભરતી થયેલા. એ વખતે કવાયતો અને ટ્રેનિંગ બાદ ફુરસદમાં પરેડ ગ્રાઉન્ડમાં હોકી ફૂટબોલ વગેરે રમતો આર્મીના જવાનો રમતા , એમાં ધ્યાનસીંગ પણ ખરા.
પણ ધ્યાનસિંગને રમત દરમિયાન કેટલીક ભૂલો સમજાતા પરફેક્સન માટે રાત્રે ચાંદની રાતોમાં ચંદ્રના અજવાળામાં પરેડ ગ્રાઉન્ડ પર એકલા એકલા હોકી રમ્યા કરતા , કલાકો સુધી રમતા રમતા એમને પરફેક્ટ ટાઈમિંગ થી પરફેક્ટ એન્ગલે પરફેકટ્ શોટ મારવાની મહારથ કેળવી લીધેલી( જે અગાઉ ક્યારે કોઈએ જોઈ કે શીખી નહતી )
ત્યારબાદ આર્મીની અલગ અલગ રેજિમેન્ટની હોકી ટોર્નામેન્ટમાં સતત ધ્યાનસિંગની
જ ટિમ જીતતી. ધ્યાનસિંગને ચાંદના અજવાળે રાત્રે પ્રેક્ટિસ કરવાની ટેવ હતી એટલે ટીમના અન્ય ખેલાડીઓએ એમને ધ્યાન ” ચાંદ ” તરીકે ઓળખવું શરુ કરેલું. . ( ઓલમ્પિક માં ગયા ત્યાં સુધી ધ્યનસિંગને કોઈ ખ્યાતિ નહતી મળી પણ ઓલમ્પિક પછી ટાઈમ્સ હેરાલ્ડ અને અન્ય અંગ્રેજી અખબારો માં ધ્યાન ચાંદ તરીકે છપાયું એટલે ભારતના અખબારો અને પાઠ્યપુસ્તકના પોપટિયા ઇતિહાસકારોએ ધ્યાન ચાંદ ને ધ્યાન ચન્દ બનાવી દીધા જે આપણે હજુય સાચું માનીએ છીએ. !!!!
……………..
માણીલો કે ભારતની ક્રિકેટ ટિમ વલ્ડ કપ રમવા ગઈ હોય અને વિન્ડીઝ , ઓઝી ઈંગ્લીશ અને શ્રીલનકન્સ ને એકપણ વિકેટ આપ્યા વગર વલ્ડકપ જીતી લાવે તો માહોલ કેવો કલ્પનાતીત ફેસ્ટિવ હોય ?
યસ , ધ્યાનસિંગની ટીમનો આવોજ જાદુ હતો ઓલમ્પિકમાં
1928 માં નેધરલેન્ડ માં ધ્યાનસિંગની ટીમે પ્રથમ દિવસે ઓસ્ટ્રિયાને 6-0 થી હરાવ્યું બીજા દિવસે બેલ્જીયમને 9-0 થી હરાવ્યું , પાછું ત્રીજા દિવસે ડેન્માર્કને 5-0 થી હરાવ્યું , ચોથા દિવસે સેમિફાઇનલમાં સ્વિત્ઝર્લેન્ડને 6-0 થી હરાવ્યું અને પાંચમા દિવસે નેધરલેન્ડની ટીમને એમનાજ હોમગ્રાઉન્ડ પર 3-0 થી પરાજિત કરીને તમામ ટીમોના ઝીરો ગોલમા સૂપડા સાફ કરીને વિશ્વવિજેતા બનવાનું જ્વલન્ત ગૌરવ ઓલમ્પિકમાં ગોલ્ડ મેડલ જીતીને અપાવ્યું.
( આ અગાઉ આવું ક્યારેય બન્યું નહતું )
ત્યારથી ધ્યાનસિંગ હોકીના જાદુગર તરીકે વિશ્વભરના અખબારો અને મીડિયામાં પ્રખ્યાત થયા .
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ઓલમ્પિક ની શ્ફ્ળતા પછી આર્મીમાં એમની બઢતી લાન્સ નાયક તરીકે થઇ . ત્યારબાદ 1932 માં જાપાન ને 11-1 થી હરાવીને ફાઇનલમાં અમેરિકાની ટીમને એમનાજ હોમ ગ્રાઉન્ડ પર 24-1 થી હરાવીને અમેરિકાની ટીમના ચીથરા ફાડી નાખીને ફરી ગોલ્ડ મેડલ જીતી આવ્યા.

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ધ્યાનસિંગની કરીઅરની સૌથી કપરી પળો 1936 ની ઓલમ્પિક વખતે હતી.
પ્રથમ વિશ્વયુદ્ધમાં પોણું યુરોપ જીતી બેઠેલા હિટલરનો સૂર્ય મધ્યાહ્ને હતો અને 36 નો ઓલમ્પિક પર્વ બર્લિનમાં જર્મની દ્વારા હોસ્ટ થવાનો હતો. જર્મની હોકી ટિમ બે વાર સલન્ગ વિશ્વવિજેતા બનેલી ઇન્ડિયાની ટીમને હરાવીને કોઈપણ ભોગે હરાવીને ફ્યુહરર હિટલર અને જર્મનીને વિજેતા bnvaa ભારે તૈયારી કરતી હતી
આખા જર્મનીની શેરીઓમાં ધ્યનસિંગની તસ્વીર વાળા પોસ્ટરો લાગ્યા હતા ” જીવતો જાદુ જોવા ઓલમ્પિક સ્ટેડિયમ પધારો ” !!!!
( કદાચ આટલી ખ્યાતિ ગાંધી નહેરુ ને ય આખા જીવનમાં નહતી મળી – કદાચ ધય્નચાંદ ની ખ્યાતિને ઇતિહાસમાં એટલેજ હાંસિયામાં મૂકી હશે.
હિટલર પોતે હોકીનો રસિયો હતો ફાઇનલ જોવા હિટલર આવવાનો હતો એટલે જબબરજ્સ્ત માહોલ હતો.
( ભારતીય ટિમ માર્સેલ્સ થી થર્ડક્લાસ માં ટ્રેઈનમાં ટ્રાવેલ કરીને બર્લિન પહોંચેલી !!! )
પ્ર્થમદિવસે હંગેરીને 4-0 થી હરાવી , બીજાદિવસે યુએસ ને 7-0 થી હરાવ્યું !! ત્રીજા દિવસે japan ના 9-0 થી હરાવીને છોતરા કાઢી નાખ્યા!! સેમિફાઇનલ માં ચોથા દિવસે ફ્રાન્સ ને 10-0 થી હરાવીને ભુકા કાઢી નાખ્યા !!!!
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એક કયામતની રાત પછી હિટલરની મહ્તકાંક્ષી ટિમ સામે ભારત ફાઇનલ રમવાની હતી .
ભારતનો 28 ઓલમ્પિક નો બધી ટીમના ઝીરો ગૉલ માં સૂપડા સાફ કરવાનો record ધ્યાનસિંગ ની ટીમે જર્મનીમાં 36 માં રિપીટ કરેલો
વિશ્વનું હોકી જગત અને જર્મની એ રાત કાલે શું થશે એની ફિકરમાં સુઈ નહતું શક્યું.
બીજે દિવસે ખચોખચ ભરેલા સ્ટેડિયમ માં ધ્યાનસિંગની ટિમ તિરંગાને સલામ કરીને આવી.
અભૂતપૂર્વ રસાકસી અને હણગામાં વચ્ચે ભારતની ટીમે 4 ગૉલ કર્યા , જર્મન ટિમ એકપણ ગૉલ નહતી કરી શકી .
પ્રથમ અંતરાલ થઇ ગયો
નેક્સ્ટ હાફ શરૂ થયો
સેન્ટર પર ધ્યાનસિંગ નો અભૂતપૂર્વ જાદુ ચાલી રહ્યો હતો ધ્યાનસિંગે બીજા બે ગૉલ કર્યા .
સમય પૂરો થવા નજીક હતો
લોકો બેઠક પરથી ઉભા થઈને ઇન્ડિયાને એપ્લોઝ કરીને ચીયર અપ કરી રહયા હતા.
ખુદ હિટલર પેવેલિયનમાં પોતાની બેઠક છોડીને રેલિંગ સુધી પહોંચી ગયો અને નિર્ણાયક ઘડીઓને જોઈ રહ્યો હતો. !!!!
જર્મની એ એકપણ ગૉલ હજુ નોંધાવ્યો નહતો.
( હિટલરે એ ક્ષણોને એના જીવનની સુધી અઘરી ક્ષણો ગણેલી )
ધ્યાનસિંગ છેકસુધી પરફેકટ્ જ રમ્યા પણ છેલ્લી ઘડીએ ઇન્ડિયન ટીમના એક ખેલાડીની ભૂલથી બોલ જર્મન્સ તરફ પાસ થયો અને અંતે જર્મની 1 ગૉલ કરીને ઇજ્જતના કાંકરા થતા બચ્યા પણ ભારત સામે 8-1 થી હાર્યા અને ભારત સલન્ગ ત્રીજીવાર વિશ્વવિજેતા બનીને ઓલમ્પિકમાં ગોલ્ડ મેડાલીસ્ટ બન્યું. !!!!

જર્મનીની હાર થયેલી છતાં હજારો પ્રેક્ષકો સાથે હિટલર પણ રેલિંગ પર ઊભાઊભા ધ્યાનસિંગના જાદુ પર તાળીઓ વરસાવતો હતો , આ તસ્વીર બીજે દિવસે વિશ્વભરના અખબારોમાં છપાઈ હતી
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તે રાત્રે હિટલરે ધ્યાનચાંદ ને મળવા મેસેજ મોકલ્યો.
બીજે દિવસે હિટલરે મોકલેલી કારમાં ss એસ્કો્ટ્સ સાથે ધ્યાનસિંગ ને હિટલર ની ચેમ્બરમાં લઇ જવાયા જ્યા પેસેજમાં એસએસ ના ટોપ બ્રાસ ગણાતા લોકો જાદુગર ધ્યનસિંગ ને જોવા લાઈનમાં ઉભા હતા. !!!
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સામે ચાલીને હિટલરે ધ્યાનસિંગનું અભિવાદન કર્યું અને એસએસ ના વડાઓ નીહાજરીમાં પૂછ્યું ” તમે હોકી ના રમતા હોવ ત્યારે શું કરો છો ?”
ધ્યાનચાંદ એ જવાબ આપ્યો ” હું ઇન્ડિયન આર્મીમાં છું “
હિટલરે પૂછ્યું ” તમારો રેન્ક શું છે ?”
ધ્યાનસિંગએ જણાવ્યું ” હું ત્યાં લાન્સનાયક છું “
હિટલરે સીધો પાસો ફેંક્યો ” તમે જર્મની આવી જાઓ જર્મન સિટીઝનશિપ આપીને હું તમને ઈમમીડિએટ ઇફેક્ટ થી જર્મન આર્મીમાં ફિલ્ડ માર્શલ બનાવીશ.
હોલમાં પીંનડ્રોપ સાયલેન્સ છવાઈ ગઈ . હિટલર સાથે ઉભેલા જર્મન આર્મી એરફોર્સ અને અને
નેવીના ટોપબ્રાસ ના ધબકારા વધી ગયા કે આ માણસ ફ્યુહરરની ઓફર સ્વીકારી લે તો સીધો આપણૉ સમકક્ષ બની જશે.
થોડીવાર વિચારીને ધ્યાનસિંગ બોલ્યા ” આભાર, પણ હું ઇન્ડિયાની આર્મીમાં ખુશ છું અને ત્યાંજ રહેવા માગું છું “
………
એક કોહીનોર ઘુમાવવાનો હોય એવી ખિન્નતા સાથે હિટલર એ જણાવ્યું ” ભલે , જેવી તમારી ઇચ્છા”
ઔપચારિક વાતો સાથે મુલાકાત પુરી થઇ.
…………..
આવી વિશ્વવિખ્યાત વ્યક્તિ ધ્યાનસિંગ ને આઝાદીની લડતમાં તો બહુ કવરેજ ના મળ્યું પણ આઝાદી પછીય નહેરુ ગાંધીની ચમચાગીરી કરતા અખબારી મીડિયાએ ધ્યાનસિંગ ની કોઈ પ્રસસ્તી ના કરી. નેહરુના ચમચા શિક્ષણવિદોએ આજસુધી ધ્યાનચાંદની સિદ્ધિઓ અને સ્કિલ્સ ને બિરદાવતું એકેય ચેપટર પાઠ્યપુસ્તકોમાં ના રાખ્યું , ના કોઈ ડોક્યુમેન્ટરી બની ( ફિલ્મ ડિવિઝન તરફથી ગાંધી નેહરુની બ્લેક એન્ડ વહાઇટ ડોક્યુમેન્ટરી થિયેટરોમાં બતાવવી ફરજીયાત હતી !!! )
ધ્યાનચાંદ રિટાયર્ડ થઈને ઝાંસી માં સેટલ થયેલા પણ સરકારે પેન્સનથી વિશેષ કઈ નહતું આપ્યું. ( સચિનને ભારત રત્ન અપાયો , ધ્યાનસિંગને ના અપાયો !! ઇવન ઇન્દિરા અને નેહરુએ નહેરુએ જાતેજ પોતાને ભારત રત્ન આપી દીધા હતા !!! )
……….
મેજર ધ્યાન ચાંદને સત સત સલામ !!!

(મિત્ર રાકેશભાઇ પંચાલની પોસ્ટ)..

Posted in जीवन चरित्र, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

27 जुलाई चटगाँव शस्त्रागार केस से प्रसिद्द और उस दौर में आज़ादी की लड़ाई में हथियार उठाने वाली, जब लड़कियां घर से भी बाहर नहीं निकलती थी, कल्पना दत्त का जन्मदिवस है पर अफ़सोस हममें से किसी ने उन्हें याद नहीं किया | उनका जन्म वर्तमान बंग्लादेश के चटगांव ज़िले के श्रीपुर गांव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में 27 जुलाई 1913 को हुआ था| 1929 में चटगाँव से मैट्रिक पास करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए ये कलकत्ता आ गयीं| यहाँ अनेकों प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों की जीवनियाँ पढ़कर वह प्रभावित हुईं और शीघ्र ही स्वयं भी कुछ करने के लिए आतुर हो उठीं।

कल्पना और उनके साथियों ने क्रान्तिकारियों का मुकदमा सुनने वाली अदालत के भवन को और जेल की दीवार उड़ाने की योजना बनाई। लेकिन पुलिस को सूचना मिल जाने के कारण इस पर अमल नहीं हो सका। पुरुष वेश में घूमती कल्पना दत्त गिरफ्तार कर ली गईं, पर अभियोग सिद्ध न होने पर उन्हें छोड़ दिया गया। उनके घर पुलिस का पहरा बैठा दिया गया, लेकिन अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इन्होनें प्रसिद्द क्रांतिकारी मास्टर सूर्यसेन के दल से नाता जोड़ लिया।

वह वेश बदलकर क्रांतिकारियों को गोला-बारूद आदि पहुँचाया करती थीं। इस बीच उन्होंने सटीक निशाना लगाने का भी अभ्यास कर लिया। 18 अप्रैल 1930 ई. को मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में रोंगटे खड़े कर देने वाली ‘चटगांव शस्त्रागार लूट’ की घटना होते ही कल्पना दत्त कोलकाता से वापस चटगांव चली गईं और उनके अभिन्न साथी तारकेश्वर दस्तीदार जी के साथ मास्टर दा को अंग्रेजों से छुड़ाने की योजना बनाई लेकिन योजना पर अमल होने से पहले ही यह भेद खुल गया और सन 1933 में तारकेश्वर, कल्पना दत्ता व अपने अन्य साथियों के साथ पकड़ लिए गए|

सरकार ने मास्टर सूर्य सेन जी, तारकेश्वर दा और कल्पना दत्त पर मुकद्दमा चलाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की और 12 जनवरी 1934 को मास्टर सूर्य सेन को तारकेश्वर दा के साथ फांसी दे दी गयी| लेकिन फांसी से पूर्व उन्हें ऐसी अमानवीय यातनाएं दी गयीं कि रूह काँप जाती है|
निर्दयतापूर्वक हथोड़े से उनके दांत तोड़ दिए गए , नाखून खींच लिए गए , हाथ-पैर तोड़ दिए गए और जब वह बेहोश हो गए तो उन्हें अचेतावस्था में ही खींच कर फांसी के तख्ते तक लाया गया| क्रूरता और अपमान की पराकाष्टा यह थी कि उनकी मृत देह को भी उनके परिजनों को नहीं सोंपा गया और उसे धातु के बक्से में बंद करके बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया गया |

21 वर्षीया कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी| 1937 ई. में जब पहली बार प्रदेशों में भारतीय मंत्रिमंडल बने, तब कुछ प्रमुख नेताओं के प्रयासों से 1939 में कल्पना जेल से बाहर आ सकीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वह कम्युनिस्ट पार्टी में सम्मिलित हो गईं | 1943 ई. में उनका कम्युनिस्ट नेता पी.सी. जोशी से विवाह हो गया और वह कल्पना जोशी बन गईं। बाद में कल्पना बंगाल से दिल्ली आ गईं और ‘इंडो सोवियत सांस्कृतिक सोसायटी’ में काम करने लगीं। सितम्बर 1979 ई. में कल्पना जोशी को पुणे में ‘वीर महिला’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 8 फरबरी 1995 को कोलकाता में उनका निधन हो गया|

बहुत कम लोग जानते होंगे कि पूरन चंद जोशी और कल्पना जोशी के दो पुत्र थे- चाँद जोशी और सूरज जोशी| चाँद जोशी अंग्रेजी के एक प्रसिद्द पत्रकार थे और उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए काम किया| इन्हीं चाँद जोशी की पत्नी मानिनी (चटर्जी ) के द्वारा चटगाँव शस्त्रागार केस पर एक बहुत ही प्रसिद्द पुस्तक लिखी गयी थी, जिसका नाम है डू एंड डाई: दि चटगाँव अपराइजिंग 1930-34। इसी पुस्तक को आधार बनाकर कुछ दिन पहले एक फिल्म आई थी ‘खेलें हम जी जान से’, जिसमे दीपिका पादुकोने ने कल्पना दत्त की भूमिका निभाई थी।

हालाँकि बाडीगार्ड, दबंग, राऊडी राठोड़, रेडी और इसी तरह की बेसिर पैर फिल्मों के ज़माने में ‘खेलें हम जी जान से’ देखने कौन जाता और किसको फुर्सत है कि ये जाने कि आज़ादी की लड़ाई बिना खड्ग, बिना ढाल नहीं, खून बहाकर और खुद को गलाकर मिली है। पर ना हो किसी को फुर्सत, ना हो किसी को परवाह; इससे कल्पना दत्त जैसी क्रांतिकारियों का निस्वार्थ योगदान कम तो नहीं हो जाता| उनको कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

abhaar विशाल अग्रवाल jee

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, जीवन चरित्र

मीराबाई चानू की कहानी

उस समय उसकी उम्र 10 साल थी। इम्फाल से 200 किमी दूर नोंगपोक काकचिंग गांव में गरीब परिवार में जन्मी और छह भाई बहनों में सबसे छोटी मीराबाई चानू अपने से चार साल बड़े भाई सैखोम सांतोम्बा मीतेई के साथ पास की पहाड़ी पर लकड़ी बीनने जाती थीं।

एक दिन उसका भाई लकड़ी का गठ्ठर नहीं उठा पाया, लेकिन मीरा ने उसे आसानी से उठा लिया और वह उसे लगभग 2 किमी दूर अपने घर तक ले आई।

शाम को पड़ोस के घर मीराबाई चानू टीवी देखने गई, तो वहां जंगल से उसके गठ्ठर लाने की चर्चा चल पड़ी। उसकी मां बोली, ”बेटी आज यदि हमारे पास बैल गाड़ी होती तो तूझे गठ्ठर उठाकर न लाना पड़ता।”

”बैलगाड़ी कितने रूपए की आती है माँं ?” मीराबाई ने पूछा

”इतने पैसों की जितने हम कभी जिंदगीभर देख न पाएंगे।”

”मगर क्यों नहीं देख पाएंगे, क्या पैसा कमाया नहीं जा सकता ? कोई तो तरीका होगा बैलगाड़ी खरीदने के लिए पैसा कमाने का ?” चानू ने पूछा तो तब गांव के एक व्यक्ति ने कहा, ”तू तो लड़कों से भी अधिक वजन उठा लेती है, यदि वजन उठाने वाली खिलाड़ी बन जाए तो एक दिन जरूर भारी—भारी वजन उठाकर खेल में सोना जीतकर उस मैडल को बेचकर बैलग़ाड़ी खरीद सकती है।”

”अच्छी बात है मैं सोना जीतकर उसे बेचकर बैलगाड़ी खरीदूंगी।” उसमें आत्मविश्वास था।

उसने वजन उठाने वाले खेल के बारे में जानकारी हासिल की, लेकिन उसके गांव में वेटलिफ्टिंग सेंटर नहीं था, इसलिए उसने रोज़ ट्रेन से 60 किलोमीटर का सफर तय करने की सोची।

शुरुआत उन्होंने इंफाल के खुमन लंपक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से की।

एक दिन उसकी रेल लेट हो गयी.. रात का समय हो गया। शहर में उसका कोई ठिकाना न था, कोई उसे जानता भी न था। उसने सोचा कि किसी मन्दिर में शरण ले लेगी और कल अभ्यास करके फिर अगले दिन शाम को गांव चली जाएगी।

एक अधूरा निर्माण हुआ भवन उसने देखा जिस पर आर्य समाज मन्दिर लिखा हुआ था। वह उसमें चली गई। वहां उसे एक पुरोहित मिला, जिसे उसने बाबा कहकर पुकारा और रात को शरण मांगी।

”बेटी मैं आपको शरण नहीं दे सकता, यह मन्दिर है और यहां एक ही कमरे पर छत है, जिसमें मैं सोता हूँ । दूसरे कमरे पर छत अभी डली नहीं, एंगल पड़ गई हैं, पत्थर की सिल्लियां आई पड़ी हैं लेकिन पैसे खत्म हो गए। तुम कहीं और शरण ले लो।”

”मैं रात में कहाँ जाउँगी बाबा,” मीराबाई आगे बोली, ”मुझे बिन छत के कमरे में ही रहने की इजाजत दे दो।”

”अच्छी बात है, जैसी तेरी मर्जी।” बाबा ने कहा।

वह उस कमरे में माटी एकसार करके उसके उपर ही सो गई, अभी कमरे में फर्श तो डला नहीं था। जब छत नहीं थी तो फर्श कहां से होता भला। लेकिन रात के समय बूंदाबांदी शुरू हो गई और उसकी आंख खुल गई।

मीराबाई ने छत की ओर देखा। दीवारों पर उपर लोहे की एंगल लगी हुई थी, लेकिन सिल्लियां तो नीचे थी। आधा अधूरा जीना भी बना हुआ था। उसने नीचे से पत्थर की सिल्लिया उठाई और उपर एंगल पर जाकर रख ​दी और फिर थोड़ी ही देर में दर्जनों सिल्लियां कक्ष की दीवारों के उपर लगी एंगल पर रखते हुए कमरे को छाप दिया।

उसके बाद वहां एक बरसाती पन्नी पड़ी थी वह सिल्लियों पर डालकर नीचे से फावड़ा और तसला उठाकर मिट्टी भर—भरकर उपर छत पर सिल्लियो पर डाल दी। इस प्रकार मीराबाई ने छत तैयार कर दी।

बारिश तेज हो गई,और वह अपने कमरे में आ गई। अब उसे भीगने का डर न था, क्योंकि उसने उस कमरे की छत खुद ही बना डाली थी।

अगले दिन बाबा को जब सुबह पता चला कि मीराबाई ने कमरे की छत डाल दी तो उसे आश्चर्य हुआ और उसने उसे मन्दिर में हमेशा के लिए शरण दे दी, ताकि वह खेल की तैयारी वहीं रहकर कर सके, क्योंकि वहाँं से खुमन लंपक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स निकट था।

बाबा उसके लिए खुद चावल तैयार करके खिलाते और मीराबाई ने कक्षों को गाय के गोबर और पीली माटी से लिपकर सुन्दर बना दिया था।

समय मिलने पर बाबा उसे एक किताब थमा देते,जिसे वह पढ़कर सुनाया करती और उस किताब से उसके अन्दर धर्म के प्रति आस्था तो जागी ही साथ ही देशभक्ति भी जाग उठी।

इसके बाद मीराबाई चानू 11 साल की उम्र में अंडर-15 चैंपियन बन गई और 17 साल की उम्र में जूनियर चैंपियन का खिताब अपने नाम किया।

लोहे की बार खरीदना परिवार के लिए भारी था। मानसिक रूप से परेशान हो उठी मीराबाई ने यह समस्या बाबा से बताई, तो बाबा बोले, ”बेटी चिंता न करो, शाम तक आओगी तो बार तैयार मिलेगा।”

वह शाम तक आई तो बाबा ने बांस की बार बनाकर तैयार कर दी, ताकि वह अभ्यास कर सके।

बाबा ने उनकी भेंट कुंजुरानी से करवाई। उन दिनों मणिपुर की महिला वेटलिफ़्टर कुंजुरानी देवी स्टार थीं और एथेंस ओलंपिक में खेलने गई थीं।

इसके बाद तो मीराबाई ने कुंजुरानी को अपना आदर्श मान लिया और कुंजुरानी ने बाबा के आग्रह पर इसकी हर संभव सहायता करने का बीड़ा उठाया।

जिस कुंजुरानी को देखकर मीरा के मन में विश्व चैंपियन बनने का सपना जागा था, अपनी उसी आइडल के 12 साल पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को मीरा ने 2016 में तोड़ा, वह भी 192 किलोग्राम वज़न उठाकर।

2017 में विश्व भारोत्तोलन चैम्पियनशिप, अनाहाइम, कैलीफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका में उसे भाग लेने का अवसर मिला।

मुकाबले से पहले एक सहभोज में उसे भाग लेना पड़ा। सहभोज में अमेरिकी राष्ट्रपति मुख्य अतिथि थे।

राष्ट्रपति ने देखा कि मीराबाई को उसके सामने ही पुराने बर्तनों में चावल परोसा गया, जबकि सब होटल के शानदार बर्तनों में शाही भोजन का लुत्फ ले रहे थे।

राष्ट्रपति ने प्रश्न किया, ”इस खिलाड़ी को पुराने बर्तनों में चावल क्यों परोसा गया, क्या हमारा देश इतना गरीब है कि एक लड़की के लिए बर्तन कम पड़ गए, या फिर इससे भेदभाव किया जा रहा है, यह अछूत है क्या ?”

”नहीं महामहिम ऐसी बात नहीं है,” उसे खाना परोस रहे लोगों से जवाब मिला, ” इसका नाम मीराबाई है। यह जिस भी देश में जाती है, वहाँं अपने देश भारत के चावल ले जाती है। यह विदेश में जहाँ भी होती है, भारत के ही चावल उबालकर खाती है।. Copied

Posted in जीवन चरित्र

क्या आज आपने ऐसा कुछ देखा सुना की जिसको जानने पर सभी को गर्व हो ?

व्यक्ति विशेष….क्या आप इन्हें जानते हैं??
देश कन्हैय्या जैसे कुपात्र को जानता है पर इन्हें नहीं…यही विडंबना है

” अद्भुत अकल्पीय व्यक्तित्व “
आपसे कोई पूछे भारत के सबसे पढ़े लिखे व्यक्ति का नाम बताइए जो, डॉक्टर भी रहा हो, बैरिस्टर भी रहा हो,
IPS अधिकारी भी रहा हो, IAS अधिकारी भी रहा हो,
विधायक, मंत्री, सांसद भी रहा हो, चित्रकार, फोटोग्राफर भी रहा हो, मोटिवेशनल स्पीकर भी रहा हो, पत्रकार भी रहा हो, कुलपति भी रहा हो, संस्कृत, गणित का विद्वान भी रहा हो, इतिहासकार भी रहा हो,समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र का भी ज्ञान रखता हो, जिसने काव्य रचना भी की हो !

अधिकांश लोग यही कहेंगे,”क्या ऐसा संभव है, आप एक व्यक्ति की बात कर रहे हैं या किसी संस्थान की ?” पर भारतवर्ष में ऐसा एक व्यक्ति मात्र 49 वर्ष की अल्पायु में भयंकर सड़क हादसे का शिकार हो, इस संसार से विदा भी ले चुका है !

उस व्यक्ति का नाम है श्रीकांत जिचकर ! श्रीकांत जिचकर का जन्म 1954 में संपन्न मराठा कृषक परिवार में हुआ था ! वह भारत के सर्वाधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, जो गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है ! श्रीकांत जी ने 20 से अधिक डिग्री हासिल की थीं ! कुछ रेगुलर व कुछ पत्राचार के माध्यम से ! वह भी फर्स्ट क्लास, गोल्डमेडलिस्ट, कुछ डिग्रियां तो उच्च शिक्षा में नियम ना होने के कारण उन्हें नहीं मिल पाई जबकि इम्तिहान उन्होंने दे दिया था !

उनकी डिग्रियां/ शैक्षणिक योग्यता इस प्रकार थीं…
MBBS,MD gold medalist,
LLB,LLM,
MBA,
Bachelor in journalism ,
संस्कृत में डी.लिट. की उपाधि यूनिवर्सिटी टॉपर ,
M. A इंग्लिश,
M.A हिंदी,
M.A हिस्ट्री,
M.A साइकोलॉजी,
M.A सोशियोलॉजी,
M.A पॉलिटिकल साइंस,
M.A आर्कियोलॉजी,
M.A एंथ्रोपोलॉजी,
श्रीकान्तजी 1978 बैच के आईपीएस व 1980 बैच आईएएस अधिकारी भी रहे !
1981 में महाराष्ट्र में विधायक बने,
1992 से लेकर 1998 तक राज्यसभा सांसद रहे !
श्रीकांत जिचकर ने वर्ष 1973 से लेकर 1990 तक तमाम यूनिवर्सिटी के इम्तिहान देने में समय गुजारा !
1980 में आईएएस की केवल 4 महीने की नौकरी कर इस्तीफा दे दिया !
26 वर्ष की उम्र में देश के सबसे कम उम्र के विधायक बने, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी बने,
14 पोर्टफोलियो हासिल कर सबसे प्रभावशाली मंत्री रहे !
महाराष्ट्र में पुलिस सुधार किये !
1992 से लेकर 1998 तक बतौर राज्यसभा सांसद संसद की बहुत सी समितियों के सदस्य रहे, वहाँ भी महत्वपूर्ण कार्य किये !
1999 में भयंकर कैंसर लास्ट स्टेज का डायग्नोज हुआ, डॉक्टर ने कहा आपके पास केवल एक महीना है !
अस्पताल पर मृत्यु शैया पर पड़े हुए थे…लेकिन आध्यात्मिक विचारों के धनी श्रीकांत जिचकर ने आस नहीं छोड़ी उसी दौरान कोई सन्यासी अस्पताल में आया उसने उन्हें ढांढस बंधाया संस्कृतभाषा, शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया कहा तुम अभी नहीं मर सकते…अभी तुम्हें बहुत काम करना है…!
चमत्कारिक तौर से श्रीकांत जिचकर पूर्ण स्वस्थ हो गए…!
स्वस्थ होते ही राजनीति से सन्यास लेकर…संस्कृत में डी.लिट. की उपाधि अर्जित की ! वे कहा करते थे संस्कृत भाषा के अध्ययन के बाद मेरा जीवन ही परिवर्तित हो गया है ! मेरी ज्ञान पिपासा अब पूर्ण हुई है ! पुणे में संदीपनी स्कूल की स्थापना की, नागपुर में कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की जिसके पहले कुलपति भी बने ! उनका पुस्तकालय किसी व्यक्ति का निजी सबसे बड़ा पुस्तकालय था जिसमें 52000 के लगभग पुस्तकें थीं !

उनका एक ही सपना बन गया था, भारत के प्रत्येक घर में कम से कम एक संस्कृत भाषा का विद्वान हो तथा कोई भी परिवार मधुमेह जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का शिकार ना हो ! यूट्यूब पर उनके केवल 3 ही मोटिवेशनल हेल्थ फिटनेस संबंधित वीडियो उपलब्ध हैं !
ऐसे असाधारण प्रतिभा के लोग, आयु के मामले में निर्धन ही देखे गए हैं, अति मेधावी, अति प्रतिभाशाली व्यक्तियों का जीवन ज्यादा लंबा नहीं होता, शंकराचार्य महर्षि दयानंद सरस्वती, विवेकानंद भी अधिक उम्र नहीं जी पाए थे !
2 जून 2004 को नागपुर से 60 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र में ही भयंकर सड़क हादसे में श्रीकांत जिचकर का निधन हो गया !
संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार व Holistic health को लेकर उनका कार्य अधूरा ही रह गया !
🙏ऐसे शिक्षक, चिकित्सक, विधि विशेषज्ञ, प्रशासक व राजनेता के मिश्रित व्यक्तित्व को शत शत नमन !🙏🚩

मुझे गर्व है 🙏🙏