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एक सच

“बहुत दिनों का बोझ था, अम्मा आज सब कुछ बता देंगे” –शास्त्री जी की पत्नी को यह कह कर शास्त्री जी के नौकर रहे रामनाथ, दिल्ली में मोतीलाल नेहरू के घर से संसद में शास्त्री जी की मृत्यु के सम्बन्ध में 1977 में जनता सरकार द्वारा बैठाई गई #रामनारायणइन्क्वायरी के समक्ष बयान देने के लिए घर से निकले। एक गाड़ी ने उन्हें टक्कर मारी, जिसमें वो बुरी तरह से घायल हुए। उनकी दोनों टांगें काटनी पड़ गयीं और उनकी याद्दाश्त चली गई।
इसी दिन मास्को दौरे पर शास्त्री जी के साथ गये उनके व्यक्तिगत चिकित्सक आर एन चुग अपना ब्यान देने दिल्ली आ रहे थे।अजीब संयोग था कि उनकी गाड़ी की भी दुर्घटनाग्रस्त हुई जिसमें उनकी, उनकी पत्नी और दो बेटोंकी मृत्यु हो गई। एक पुत्री बच गई परन्तु बहुत गम्भीर रुप से घायल हो गई।
शास्त्री जी देश को परमाणु शक्ति बनाना चाहते थे। 1966 में ही परमाणु वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की संदेहास्पद मृत्यु हो गई।अंतरिक्ष एवं परमाणु वैज्ञानिक डॉ विक्रम साराभाई की संदेहास्पद मृत्यु हो गई । लेकिन इस कांग्रेस ने कोई जेपीसी या सीबीआई इनक्वायरी नहीं करवाई।
दूसरे परिदृश्य में यही कांग्रेस उग्रवादियों के साथ की मुठभेड़ों और बाटला हाउस पर रोती है और उनकी न्यायिक जांच चाहती है।
21दिसम्बर को सीबीआई जज ने सोहराबुद्दीन और प्रजापति की एंकाउंटर को पोलिटिकली मोटिवेटेड बताते हुए कहा कि अपराधी पहले तय कर लिए गये थे फिर जांच की गयी। अपने मित्रों के बीच हृदयाघात से शांत हुए जज लोया की कांग्रेस हाई लेवल कमेटी से जांच कराना चाहती है। भ्रष्ट सीबीआई के डायरेक्टर के पीछे अपनी पूरी ताकत लगा कर कांग्रेस खड़ी है । समझ में नहीं आता ये सब कुछ सार्वजनिक होने के बाद भी लोग कांग्रेस को वोट कैसे देते हैं????
आज 11जनवरी को शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर बहुत सी ऐसी घटनाएं यूं हीं दिमाग में घूम गयीं।
शास्त्री जी को हमारा शत शत नमन।🙏🙏🙏🙏

विपिन खुराना

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છત્રપતિ શિવાજી

ઇતિહાસમાં શિવાજી વિશે શાળામાં ક્યારેય વધારે શીખવડ્યું ન હતું. ઘણા લોકો તેના વિશે શું વિચારે છે તેનાથી આશ્ચર્યચકિત થઈ જશો..:

“કાબુલથી કંદહાર સુધી મારા તૈમૂર પરિવારે મોગુલ સલ્તનતની રચના કરી. ઇરાક, ઈરાન, તુર્કિસ્તાન અને ઘણા વધુ દેશોમાં મારી સેનાએ વિકરાળ યોદ્ધાઓને પરાજિત કર્યા. પરંતુ ભારતમાં શિવાજીએ અમારા પર રોક લગાવી દીધાં. મેં મારી મહત્તમ શક્તિ શિવાજી પર ખર્ચ કરી પરંતુ હું હરાવી શક્યો નહીં.

યા અલ્લાહ, તમે મને એક બહાદુર,નિર્ભય , ઈમાનવાળો ,સ્ત્રી ઓની ઈજ્જત કરવાવાળો દુશ્મન આપ્યો, કૃપા કરીને તેમના માટે સ્વર્ગના દરવાજા ખુલ્લા રાખો કારણ કે વિશ્વનો શ્રેષ્ઠ અને મોટા દિલનો યોદ્ધા તમારી પાસે આવી રહ્યો છે. “

  • ઓરંગઝેબ
    (શિવાજી ના મ્રુત્યુ -3 એપ્રિલ 1680 પર) “તે દિવસે શિવાજીએ પૂણેમાં મારા મહેલમાં ઘુસી ને ફક્ત મારી આંગળીઓ નહીં કાપી, પણ મારું ગૌરવ કાપી નાખ્યું. મને સપનામાં પણ શિવાજી દેખાય છે.”
  • શાહિસ્તા ખાન. “મારા રાજ્યમાં શિવજીને હરાવી સકે તેવો કોઈ માણસ બાકી નથી ??”
  • હતાશ બેગમ અલી આદિલશાહ. “નેતાજી, તમારા દેશને કોઈ પણ હિટલર ની બ્રિટીશ લોકો ને કાઢી નાખવાની માટે જરૂર નથી.
    તમારે શિવાજીનો ઇતિહાસ બાળપણ થી શીખવવાની જરૂર છે.” -એડોલ્ફ હિટલર “જો શિવાજીનો જન્મ ઇંગ્લેંડમાં થયો હોત, તો આપણે ફક્ત પૃથ્વી પર જ નહીં પરંતુ સમગ્ર બ્રહ્માંડ પર શાસન કર્યું હોત.” -લોર્ડ માઉન્ટબેટન “જો શિવાજી બીજા દસ વર્ષ જીવ્યા હોત, તો અંગ્રેજોએ ભારતનો ચહેરો જોયો ન હોત.”
  • તત્કાલીન બ્રિટીશ ગવર્નર _જો ભારતને સ્વતંત્ર બનાવવાની જરૂર હોય તો એકમાત્ર રસ્તો બહાર આવે છે, ‘ દેશ વાશી શિવાજીની જેમ લડે’. “
  • નેતાજી “શિવાજી એ માત્ર નામ નથી, તે ભારતીય યુવાનો માટે એક ઉર્જા સ્ત્રોત છે, જેનો ઉપયોગ ભારતને મુક્ત બનાવવા માટે કરી શકાય છે.”
  • સ્વામી વિવેકાનંદ. “જો શિવાજીનો જન્મ અમેરિકામાં થયો હોત, તો અમે તેમને એસ.યુ.એન. તરીકે નામ આપતા.”
  • બેરેક ઓબામા ગિનિસ બુક Worldફ વર્લ્ડ રેકોર્ડ્સમાં ઉમ્બરખિંડના પ્રખ્યાત યુદ્ધનો ઉલ્લેખ છે: “ઉઝબેકિસ્તાનની કર્તાલાબ ખાનની 30,000 ના મજબૂત સૈન્યને શિવાજીના માત્ર 1000 માલવા ઓ એ પરાજિત કરી હતી. એક પણ ઉઝબેકી આક્રંતાને ઘરે પરત ફરવા માટે જીવતો બાકી નહોતો.” શિવાજી આંતરરાષ્ટ્રીય ખ્યાતિના રાજા હતા. તેની કારકિર્દીના 30 વર્ષના ગાળામાં તેણે ફક્ત બે જ યુદ્ધ ભારતીય લડવૈયાઓ સાથે લડ્યા. બીજા બધા બહારના હતા. શાહિસ્તા ખાન, જેણે સપનામાં પણ શિવજીનો ડર રાખ્યો હતો તે અબુ તાલિબાન અને તુર્કિસ્તાનનો રાજા હતો. બેહલોલખાન પઠાણ, સિકંદર પઠાણ, ચિદરખાન પઠાણ એ બધા અફઘાનિસ્તાનના યોદ્ધા સરદાર હતા. દિલરખાન પઠાણ મંગોલિયાનો મહાન યોદ્ધા હતો. તે બધાએ શિવાજીની સામે ધૂળ ખાય છે. સિદ્દી જોહર અને સલાબા ખાન ઈરાની લડવૈયા હતા, જે શિવાજીથી પરાજિત થયા. સિદ્દી જૌહરે પછીથી દરિયાઇ હુમલો કરવાની યોજના બનાવી. જેના જવાબમાં શિવાજીએ એક નૌકાદળ ઉભું કર્યું, પ્રથમ ભારતીય નૌકાદળ.
    પરંતુ કાર્ય સિદ્ધ કરતા પહેલા શિવાજીએ આ દુનિયા છોડી દીધી. (તેમને આપણા જ ગદ્દારોદ્વારા ઝેર આપવામાં આવ્યું હતું.)

સ્રોત ગૂગલ “શિવાજી, મેનેજમેન્ટ ગુરુ.” તે બોસ્ટન યુનિવર્સિટીનો સંપૂર્ણ વિષય છે.
આપણા અભ્યાસ ક્રમ મા ક્યારે આવશે ?

તેમ છતાં, આપણે ભારતીયો તેના વિશે ખૂબ જ ઓછું જાણીએ છીએ ….. કેટલી દુખ ની વાત છે…… ઓછામાં ઓછું. ચાલો આપણે આપણી ભાવિ પેઢીને આ મહાન ભારત અને તેના મહાન યોદ્ધા ઓ વિશે જાણીવિયે..70 સાલ વિદેશી એજન્ટો હીન્દુસ્થાનમા રાજ કરનારા ઓ એ ક્યાય અભ્યાસ મા કેમ ન લીધુ ? પણ તેણે તો હીન્દુ સંસ્કૃતિને નષ્ટ કરવા પ્રયત્ન કર્યા છે જાગો હીન્દુઓ જાગો

એક રાષ્ટ્ર ભક્ત, અને હીન્દુસંસ્ક્રતિ ના મુળ રખેવાળ બારોટ સમાજ ના એક હીન્દુ સંસ્કૃતિ ના પ્રેમી અમરૂભાઈ બારોટ ની સાચી વેદના સાચી હોય તો આગળ મોકલજ્યો જય શ્રી રામ
ભારત માતા કી જય…
🚩🚩🚩

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“ओम जय जगदीश हरे” के लेखक श्रद्धाराम फिल्लौरी के जन्मदिन ३०दिसंबर पर उनको शत-शत नमन।

भारत के उत्तरी भाग में किसी भी धार्मिक समारोह के अन्त में प्रायः ओम जय जगदीश हरे… आरती बोली जाती है। कई जगह इसके साथ ‘कहत शिवानन्द स्वामी’ या ‘कहत हरीहर स्वामी’ सुनकर लोग किन्हीं शिवानन्द या हरिहर स्वामी को इसका लेखक मान लेते हैं, पर सच यह है कि इसके लेखक पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी थे। आरती में आयी एक पंक्ति ‘श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ…’ में उनके नाम का उल्लेख होता है।

श्रद्धाराम जी का जन्म पंजाब में सतलुज नदी के किनारे बसे फिल्लौर नगर में 30 दिसम्बर, 1837 को पंडित जयदयालु जोशी एवं श्रीमती विष्णुदेवी के घर में हुआ था। उनके पिताजी कथावाचक थे। अतः बचपन से ही श्रद्धाराम जी को धार्मिक संस्कार मिले। उनका कण्ठ भी बहुत अच्छा था। भजन कीर्तन के समय वे जब मस्त होकर गाते थे, तो लोग झूमने लगते थे।

आगे चलकर श्रद्धाराम जी ने जब स्वयं भजन आदि लिखने लगे, तो फिल्लौर के निवासी होने के कारण वे अपने नाम के आगे ‘फिल्लौरी’ लिखने लगे। श्रद्धाराम जी हिन्दी, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, गुरुमुखी आदि अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। इनमें उन्होंने धर्मिक पुस्तकें भी लिखीं। उन दिनों अंग्रेजी शासन का लाभ उठाकर मिशनरी संस्थाएँ पंजाब में लोगों का धर्म बदल रही थीं। ऐसे में श्रद्धाराम जी ने धर्म प्रचार के माध्यम से इनका सामना किया।

एक बार महाराजा रणधीर सिंह मिशनरियों के जाल में फँसकर धर्म बदलने को तैयार हो गये। जैसे ही श्रद्धाराम जी को यह पता लगा, वे तुरन्त वहाँ गये और महाराज से कई दिन तक बहस कर उनके विचार बदल दिये।

श्रद्धाराम जी मुख्यतः कथावाचक थे। श्रेष्ठ वक्ता होने के कारण गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदि पर प्रवचन करते समय उनमें वर्णित युद्ध के प्रसंगों का वे बहुत जीवन्त वर्णन करते थे। श्रोताओं को लगता था कि वे प्रत्यक्ष युद्ध क्षेत्र में बैठे हैं, परन्तु इस दौरान वे लोगों को विदेशी और विधर्मी अंग्रेजों का विरोध करने के लिए भी प्रेरित करते रहते थे।

एक बार युद्ध का प्रसंग सुनाते हुए वे 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की मार्मिक कहानी बताने लगे। कथा में कुछ सिपाही भी बैठे थे। उनकी शिकायत पर श्रद्धाराम जी को पकड़कर महाराज के किले में बन्द कर दिया गया। पर उन्होंने कोई सीधा अपराध तो किया नहीं था। फिर उनकी लोकप्रियता को देखते हुए पुलिस वाले उन्हें जेल भेजना भी नहीं चाहते थे। इसलिए उन पर क्षमा माँगने के लिए दबाव डाला गया, पर श्रद्धाराम जी इसके लिए तैयार नहीं हुए। झक मारकर प्रशासन को उन्हें छोड़ना पड़ा।

इसके बाद श्रद्धाराम जी फिल्लौर छोड़कर पटियाला रियासत में आ गये। वहाँ कई दिन प्रतीक्षा करने के बाद उनकी भेंट महाराजा से हुई। महाराज उनकी विद्वत्ता से प्रभावित हुए। इस प्रकार उन्हें पटियाला में आश्रय मिल गया। अब उन्होंने फिर से अपना धर्म प्रचार का काम शुरू कर दिया।

पर पटियाला में वे लम्बे समय तक नहीं रह सके और तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। इस यात्रा के दौरान उन्होंने धर्मग्रन्थों का गहन अध्ययन किया और अनेक पुस्तकें भी लिखीं। ऐसे विद्वान कथावाचक पंडित श्रद्धाराम जी का केवल 44 वर्ष की अल्पायु में 24 जून 1881 को देहान्त हो गया। लेकिन ‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती रचकर उन्होंने स्वयं को अमर कर लिया।(अपनी धरती अपने लोग से साभार)

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अहिल्याबाई होल्कर


आज 31 मई को तपस्वी राजमाता अहिल्याबाई होल्कर (Devi Ahilyabai Holkar) की जन्मजयंती है।

भारत में जिन महिलाओं का जीवन आदर्श, वीरता, त्याग तथा देशभक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें #रानी_अहिल्याबाई_होल्कर का नाम प्रमुख है। उनका जन्म 31 मई, 1725 को ग्राम छौंदी (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री मनकोजी राव शिन्दे परम शिवभक्त थे। अतः यही #संस्कार बालिका अहल्या पर भी पड़े।

एक बार #इन्दौर के राजा मल्हारराव होल्कर ने वहां से जाते हुए मन्दिर में हो रही आरती का मधुर स्वर सुना। वहां पुजारी के साथ एक बालिका भी पूर्ण मनोयोग से आरती कर रही थी। उन्होंने उसके पिता को बुलवाकर उस बालिका को अपनी पुत्रवधू बनाने का प्रस्ताव रखा। मनकोजी राव भला क्या कहते; उन्होंने सिर झुका दिया। इस प्रकार वह आठ वर्षीय बालिका इन्दौर के राजकुंवर खांडेराव की पत्नी बनकर राजमहलों में आ गयी।

इन्दौर में आकर भी अहिल्या पूजा एवं आराधना में रत रहती। कालान्तर में उन्हें दो पुत्री तथा एक पुत्र की प्राप्ति हुई। 1754 में उनके पति खांडेराव एक युद्ध में मारे गये। 1766 में उनके ससुर मल्हार राव का भी देहांत हो गया। इस संकटकाल में रानी ने तपस्वी की भांति श्वेत वस्त्र धारण कर राजकाज चलाया; पर कुछ समय बाद उनके पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधू भी चल बसे। इस वज्राघात के बाद भी रानी अविचलित रहते हुए अपने कर्तव्यमार्ग पर डटी रहीं।

ऐसे में पड़ोसी राजा पेशवा राघोबा ने इन्दौर के दीवान गंगाधर यशवन्त चन्द्रचूड़ से मिलकर अचानक हमला बोल दिया। रानी ने धैर्य न खोते हुए पेशवा को एक मार्मिक पत्र लिखा। रानी ने लिखा कि “यदि युद्ध में आप जीतते हैं, तो एक विधवा को जीतकर आपकी कीर्ति नहीं बढ़ेगी। और यदि हार गये, तो आपके मुख पर सदा को कालिख पुत जाएगी। मैं मृत्यु या युद्ध से नहीं डरती। मुझे राज्य का लोभ नहीं है, फिर भी मैं अन्तिम क्षण तक युद्ध करूंगी।”

इस पत्र को पाकर पेशवा राघोबा चकित रह गया। इसमें जहां एक ओर रानी अहिल्याबाई ने उस पर कूटनीतिक चोट की थी, वहीं दूसरी ओर अपनी कठोर संकल्पशक्ति का परिचय भी दिया था। रानी ने देशभक्ति का परिचय देते हुए उन्हें अंग्रेजों के षड्यन्त्र से भी सावधान किया था। अतः उसका मस्तक रानी के प्रति श्रद्धा से झुक गया और वह बिना युद्ध किये ही पीछे हट गया।

रानी के जीवन का लक्ष्य राज्यभोग नहीं था। वे प्रजा को अपनी सन्तान समझती थीं। वे घोड़े पर सवार होकर स्वयं जनता से मिलती थीं। उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण राज्य और धर्म के उत्थान में लगाया। एक बार गलती करने पर उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को भी हाथी के पैरों से कुचलने का आदेश दे दिया था; पर फिर जनता के अनुरोध पर उसे कोड़े मार कर ही छोड़ दिया।

धर्मप्रेमी होने के कारण रानी ने अपने राज्य के साथ-साथ देश के अन्य तीर्थों में भी मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि बनवाईं। काशी का वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर 1780 में उन्होंने ही बनवाया था। उनके राज्य में कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों का विकास हुआ।

13 अगस्त, 1795 ई0 को 70 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ। उनका जीवन धैर्य, साहस, सेवा, त्याग और कर्तव्यपालन का पे्ररक उदाहरण है। इसीलिए एकात्मता स्तोत्र के 11वें श्लोक में उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा जैसी वीर नारियों के साथ याद किया जाता है।

(संदर्भ : राष्ट्रधर्म मासिक, मई 2011)

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રાજમાતા અહિલ્યાબાઈ હોલકર


આજે 31 મે એ તપસ્વી રાજમાતા અહિલ્યાબાઈ હોલકરની જન્મજયંતિ છે.

# રાણી_અહિલ્યાબાઈ_હોલકરનું નામ એવી સ્ત્રીઓમાં અગ્રણી છે જેમના જીવનને હંમેશા તેમના આદર્શો, પરાક્રમ, બલિદાન અને દેશભક્તિ માટે યાદ કરવામાં આવે છે. તેનો જન્મ 31 મે 1725 ના રોજ છૌંડી (અહમદનગર, મહારાષ્ટ્ર) ગામમાં એક સામાન્ય ખેડૂત પરિવારમાં થયો હતો. તેમના પિતા શ્રી માનકોજી રાવ શિંદે પરમ ભક્ત હતા. તો એ જ # સંસ્કાર પણ અહલ્યા પર પડ્યા.

એકવાર, # ભારતના રાજા મલ્હારરાવ હોલકરે ત્યાંથી મંદિરમાં આરતીનો મધુર અવાજ સાંભળ્યો. ત્યાં એક યુવતી પુજારી સાથે પૂરા ભક્તિભાવથી આરતી પણ કરી રહી હતી. તેણે તેના પિતાને ફોન કર્યો અને તે છોકરીને પુત્રવધૂ બનાવવાનો પ્રસ્તાવ મૂક્યો. માનકોજી રાવ શું કહેશે? તેણે માથું નમાવ્યું. આમ, આઠ વર્ષની બાળકી ઈન્દોરના રાજકુમાર ખંડેરાવની પત્ની બની અને મહેલોમાં પ્રવેશ કરી.

ઈન્દોર આવ્યા પછી પણ અહલ્યા પૂજા-અર્ચના કરતા. પાછળથી, તેને બે પુત્રી અને એક પુત્ર થયો. 1754 માં, તેના પતિ ખંડેરાવ યુદ્ધમાં માર્યા ગયા. 1766 માં તેમના સસરા મલ્હાર રાવનું પણ અવસાન થયું. આ કટોકટીમાં, રાણી, એક સંન્યાસીની જેમ, સફેદ ઝભ્ભો પહેરીને રાજગાદી પર ગઈ; પરંતુ થોડા સમય પછી તેનો પુત્ર, પુત્રી અને વહુનું પણ અવસાન થયું. આ વાવાઝોડા પછી પણ, રાણી નિ .શંકર રહી અને તેની ફરજ પર રહી.

આવી સ્થિતિમાં પડોશી રાજા પેશ્વા રાઘોબા અચાનક ઈન્દોરના દિવાન ગંગાધર યશવંત ચંદ્રચુડને મળ્યા અને તેના પર હુમલો કર્યો. રાણીએ પેશ્વાને એક ધૈર્યપૂર્ણ પત્ર લખ્યો, ધીરજ ન ગુમાવી. રાણીએ લખ્યું છે કે “જો તમે યુદ્ધમાં જીતશો તો વિધવાને જીતવાથી તમારી ખ્યાતિ વધશે નહીં. અને જો તમે હારી જાઓ છો, તો તમે હંમેશા તમારા ચહેરા પર પલટા ખાઈ જશો. હું મૃત્યુ અથવા યુદ્ધથી ડરતો નથી. મને રાજ્યની લાલચ નથી. હું હજી પણ અંતિમ ક્ષણ સુધી લડું છું. “

આ પત્ર મળતાં પેશ્વા રાઘોબા સ્તબ્ધ થઈ ગયા હતા. આમાં, એક તરફ, મહારાણી અહિલ્યાબાઈએ તેમના પર રાજદ્વારી ઈજા પહોંચાડી હતી, તો બીજી તરફ, તેમણે પોતાનો કડક સંકલ્પ પણ દર્શાવ્યો હતો. દેશભક્તિ દર્શાવતી વખતે રાણીએ તેમને બ્રિટીશરોના કાવતરા સામે સાવધ પણ કરી દીધું. તેથી તેનું કપાળ રાણી પ્રત્યે આદર સાથે નમી ગયું અને તે લડ્યા વિના પાછો ગયો.

દેવી અહિલ્યા બાઇ હોલકર

હોલકર પરિવારની વિશેષતા એ હતી કે તેઓ તેમના વ્યક્તિગત અને કૌટુંબિક ખર્ચને પહોંચી વળવા જાહેર ભંડોળનો ઉપયોગ કરતા નહોતા. તેમની પાસે તેમની ખાનગી મિલકતોમાંથી તેમના વ્યક્તિગત ભંડોળ એકઠા હતા. દેવી અહિલ્યાને એક વ્યક્તિગત ભંડોળ વારસામાં મળ્યું જે તે સમયે આશરે સોળ કરોડ રૂપિયા જેટલું હતું. અહલ્યાબાઈએ તેના તમામ સખાવતી કાર્યો માટે તેના વ્યક્તિગત ભંડોળનો ઉપયોગ કર્યો.

ભારતભરમાં તેના કામો:

આલમપુર (MP) � હરિહરેશ્વર, બટુક, મલ્હરિમાર્થંડ, સૂર્ય, રેણુકા, રામ હનુમાન મંદિરો, શ્રીરામ મંદિર, લક્ષ્મી નારાયણ મંદિર, મારૂતિ મંદિર, નરસિંહ મંદિર, ખંડેરાવ માર્ટંદ મંદિર, મલ્હારરાવનું સ્મારક (I)

અમરકંથક- શ્રી વિશ્વેશ્વર મંદિર, કોટિથિથ મંદિર, ગોમુખી

મંદિર, ધર્મશાળા, વંશ કુંડ

અંબા ગામ �મંદિર માટે દીવા

આનંદ કાનન � વિશ્વેશ્વર મંદિર

અયોધ્યા (યુ.પી.) Shri શ્રી રામ મંદિર, શ્રી ત્રેતા રામ મંદિર, શ્રી ભૈરવ મંદિર, નાગેશ્વર / સિદ્ધનાથ મંદિર, શારાયુ ઘાટ, કૂવો, સ્વર્ગદ્વારી મોહતાજખાના, ધર્મશાળાઓ.

બદ્રીનાથ મંદિર (યુપી) � શ્રી કેદારેશ્વર અને હરિ મંદિરો, ધર્મશાળાઓ (રંગદાતી, બિદારતી, વ્યાસગંગા, તંગનાથ, પાવલી), મનુ કુંડ (ગૌરકુંડ, કુંડચત્રિ), ગાર્ડન અને ગરમ પાણીના કુંડ, ગાય માટે પશુપાલન

બીડ � એક ઘાટનો જિર્ણોધર.

બેલુર (કર્ણાટક) � ગણપતિ, પાંડુરંગ, જલેશ્વર,

ખંડોબા, તીર્થરાજ અને અગ્નિ મંદિરો, કુંડ

ભાનપુરા � નવ મંદિરો અને ધર્મશાળા

ભરતપુર � મંદિર, ધર્મશાળા, કુંડ

ભીમાશંકર � ગરીબખાના

ભુસાવાલ � ચાંગદેવ મંદિર

બિટ્થર � ભ્રમઘાટ

બુરહાનપુર (એમ. પી. ) � રાજ ઘાટ, રામ ઘાટ, કુંડ

ચાંદવાડ વાફેગાંવ � વિષ્ણુ મંદિર અને રેણુકા મંદિર

ચૌંડી – ચૌદેશ્વરદેવી મંદિર, સિનેશ્વર મહાદેવ મંદિર,

અહિલ્યેશ્વર મંદિર, ધર્મશાળા, ઘાટ,

ચિત્રકૂટ � શ્રી રામચંદ્રનો પ્રાણપ્રતિષ્ઠા

સિખાલ્ડા � અન્નક્ષેત્ર

દ્વારકા (ગુજરાથ) � મોહતાજખાના, પૂજા હાઉસ અને કેટલાક ગામો પૂજારીને આપ્યા

એલોરા – લાલ સ્ટોનનું કૃષ્ણેશ્વર મંદિર

ગંગોત્રી � વિશ્વનાથ, કેદારનાથ, અન્નપૂર્ણા, ભૈરવ

મંદિરો, અનેક ધર્મશાળાઓ

ગયા (બિહાર) � વિષ્ણુપદ મંદિર

ગોકર્ણ – રેવાલેશ્વર મહાદેવ મંદિર, હોલકર વાડા, બગીચો અને ગરીબખાના

ગ્રુનેશ્વર (વેરૂલ) � શિવાલય તીર્થ

હાંડિયા � સિદ્ધનાથ મંદિર, ઘાટ અને ધર્મશાળા

હરિદ્વાર (ઉત્તરાખંડ) કે કુશાવર્થ ઘાટ અને વિશાળ ધર્મશાળા

ઋષિકેશ � ઘણા મંદિરો, શ્રીનાથજી અને ગોવર્ધન રામ મંદિરો

ઈન્દોર � ઘણા મંદિરો અને ઘાટ

જગન્નાથ પુરી (ઓરિસ્સા) શ્રી શ્રી રામચંદ્ર મંદિર, ધર્મશાળા અને બગીચો

જલગાંવ � રામ મંદિર

જામઘાટ � ભૂમિ દ્વાર

જામવગાંવ � રામદાસ સ્વામી મઠ માટે દાન આપ્યું

જેજુરી � મલ્હારગૌતમેશ્વર, વિઠ્ઠલ, માર્ટંડ મંદિર, જનાઈ મહાદેવ અને મલ્હાર તળાવો

કર્મનાસિની નદી � બ્રિજ

કાશી (બનારસ) � કાશી વિશ્વનાથ મંદિર, શ્રી તારકેશ્વર, શ્રી ગંગાજી, અહિલ્યા દ્વારકેશ્વર, ગૌતમેશ્વર, ઘણાં મહાદેવ મંદિરો, મંદિર ઘાટ, મણિકર્ણિકા ઘાટ, દશસ્વમેઘ ઘાટ, જનાના ઘાટ, અહિલ્યા ઘાટ, ઉત્તરકશી ધર્મશાળા, રામેશ્વર પંચકોશી ધર્મશાળા, કપિલા ધારા ધર્મશાળા, શીતળા ઘાટ

કેદારનાથ �ધર્મશાળા અને કુંડ

કોલ્હાપુર � મંદિર પૂજા માટેની સુવિધાઓ

કુમ્હેર � પ્રિન્સ ખંડેરાવનું વેલ એન્ડ મેમોરિયલ

કુરુક્ષેત્ર (હરિયાણા) � શિવ શાંતનુ મહાદેવ મંદિર, પંચકુંડ ઘાટ, લક્ષ્મીકુંડ ઘાટ

મહેશ્વર � સેંકડો મંદિરો, ઘાટ, ધર્મશાળાઓ અને મકાનો

મામાલેશ્વર મહાદેવ હિમાચલ પ્રદેશ � દીવડાઓ

મનસા દેવી � સાત મંદિરો

માંડલેશ્વર � શિવ મંદિર ઘાટ

મીરી (અહમદનગર) � 1780 માં ભૈરવ મંદિર

નૈમાબાર (એમ. પી.) � મંદિર

નંદુરબાર [1] � મંદિર, સારું

નાથદ્વાર � અહિલ્યા કુંડ, મંદિર, કૂવો

નીલકંઠ મહાદેવ � શિવાલય અને ગોમુખ

નેમિશરણ્ય (યુપી) � મહાદેવ માડી, નિમ્સાર ધર્મશાળા, ગો-ઘાટ, કakક્રીથિથ કુંડ

નીમગાંવ (નાસિક) � કૂવો

ઓમકારેશ્વર (સાંસદ) � મામલેશ્વર મહાદેવ, અમલેશ્વર,

ત્રંબકેશ્વર મંદિરો (જિર્ણોધર), ગૌરી સોમનાથ મંદિર, ધર્મશાળાઓ, કૂવાઓ

ઓઝર (અહમદનગર) � 2 કુવાઓ અને કુંડ

પંચવટી, નાસિક � શ્રી રામ મંદિર, ગોરા મહાદેવ મંદિર, ધર્મશાળા, વિશ્વાશ્વર મંદિર, રામઘાટ, ધર્મશાળા

પંઢરપુર (મહારાષ્ટ્ર) � શ્રી શ્રી રામ મંદિર, તુલસીબાગ, હોલકર વાડા, સભા મંડપ, ધર્મશાળા અને મંદિર માટે ચાંદીના વાસણો આપ્યા, જે બગીરાવ સારી રીતે ઓળખાય છે.

પિમ્પ્લાસ (નાસિક) � કૂવાઓ

પ્રયાગ (અલ્હાબાદ યુપી) � વિષ્ણુ મંદિર, ધર્મશાળા, ગાર્ડન, ઘાટ, મહેલ

પુણે � ઘાટપુંટંબે (મહારાષ્ટ્ર) �ગોદાવરી નદી પર ઘાટ

પુષ્કર – � ગણપતિ મંદિર, ધર્મશાળા, બગીચો

રામેશ્વર (ટીએન) � હનુમાન મંદિર, શ્રી રાધા કૃષ્ણ મંદિર, ધર્મશાળા, કૂવો, બગીચો વગેરે.

રામપુરા � ચાર મંદિરો, ધર્મશાળા અને મકાનો

રાવર � કેશવ કુંડ

સાકરગાંવ � કૂવાઓ

સંભલ � લક્ષ્મી નારાયણ મંદિર અને બે કૂવા

સંગમનેર � રામ મંદિર

સપ્તશ્રૃંગી �ધર્મશાળા

સરધાન મેરઠ � ચંડી દેવી મંદિર

સૌરાષ્ટ્ર (ગુજ) � 1785 માં સોમનાથ મંદિર. (જિર્ણોધ્ધર અને પ્રાણ પ્રતિષ્ઠા)

અહમદનગર જિલ્લાના સિદ્ધેતિક ખાતે સિદ્ધિવિનાયક મંદિરનું આંતરિક અભયારણ્ય

શ્રી નાગનાથ (દરુખવન) � 1784 માં પૂજા શરૂ થઈ

શ્રીસૈલામ મલ્લિકાર્જુન (કુર્નૂલ, એપી) � ભગવાન શિવનું મંદિર

શ્રી શંભુ મહાદેવ પર્વત શિંગનાપુર (મહારાષ્ટ્ર) � સારું

શ્રી વૈજેનાથ (પરાલી, મહા) � 1784 માં બાઇજેનાથ મંદિરનો જિર્ણોધર

શ્રી વિગ્નેશ્વર � દીવડાઓ

સિંહપુર � શિવ મંદિર અને ઘાટ

સુલપેશ્વર � મહાદેવ મંદિર, અન્નક્ષેત્ર

સુલતાનપુર (ખાનેશ) � મંદિર

તારાણા � ટીલાભંડેશ્વર શિવ મંદિર, ખેડાપતિ, શ્રીરામ મંદિર, મહાકાળી મંદિર

તેહરી (બુંદેલખંડ) � ધર્મશાળા

ત્ર્યંબકેશ્વર (નાસિક) � કુશાવર્થ ઘાટ પર પુલ

ઉજ્જૈન (એમ. પી.) � ચિંતામન ગણપતિ, જનાર્દન, શ્રીલિલા પુરુષોત્તમ, બાલાજી તિલકેશ્વર, રામજાનકી રાસ મંડળ, ગોપાલ, ચિટનીસ, બાલાજી, અંકપાલ, શિવ અને અન્ય ઘણા મંદિરો, 13 ઘાટ, કૂવો અને ઘણા ધર્મશાળાઓ વગેરે.

વારાણસી � કાશી વિશ્વનાથ મંદિર 1780.

વૃંદાવન (મથુરા) � ચેઇન બિહારી મંદિર, કાઠીયાદેહ ઘાટ, ચિરઘાટ અને બીજા ઘણા ઘાટ, ધર્મશાળા, અન્નકસ્ત્ર

વાફેગાંવ (નાસિક) � હોલકર વાડા અને એક કૂવો

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अहिल्याबाई होल्कर


आज 31 मई को तपस्वी राजमाता अहिल्याबाई होल्कर (Devi Ahilyabai Holkar) की जन्मजयंती है।

भारत में जिन महिलाओं का जीवन आदर्श, वीरता, त्याग तथा देशभक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें #रानी_अहिल्याबाई_होल्कर का नाम प्रमुख है। उनका जन्म 31 मई, 1725 को ग्राम छौंदी (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री मनकोजी राव शिन्दे परम शिवभक्त थे। अतः यही #संस्कार बालिका अहल्या पर भी पड़े।

एक बार #इन्दौर के राजा मल्हारराव होल्कर ने वहां से जाते हुए मन्दिर में हो रही आरती का मधुर स्वर सुना। वहां पुजारी के साथ एक बालिका भी पूर्ण मनोयोग से आरती कर रही थी। उन्होंने उसके पिता को बुलवाकर उस बालिका को अपनी पुत्रवधू बनाने का प्रस्ताव रखा। मनकोजी राव भला क्या कहते; उन्होंने सिर झुका दिया। इस प्रकार वह आठ वर्षीय बालिका इन्दौर के राजकुंवर खांडेराव की पत्नी बनकर राजमहलों में आ गयी।

इन्दौर में आकर भी अहिल्या पूजा एवं आराधना में रत रहती। कालान्तर में उन्हें दो पुत्री तथा एक पुत्र की प्राप्ति हुई। 1754 में उनके पति खांडेराव एक युद्ध में मारे गये। 1766 में उनके ससुर मल्हार राव का भी देहांत हो गया। इस संकटकाल में रानी ने तपस्वी की भांति श्वेत वस्त्र धारण कर राजकाज चलाया; पर कुछ समय बाद उनके पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधू भी चल बसे। इस वज्राघात के बाद भी रानी अविचलित रहते हुए अपने कर्तव्यमार्ग पर डटी रहीं।

ऐसे में पड़ोसी राजा पेशवा राघोबा ने इन्दौर के दीवान गंगाधर यशवन्त चन्द्रचूड़ से मिलकर अचानक हमला बोल दिया। रानी ने धैर्य न खोते हुए पेशवा को एक मार्मिक पत्र लिखा। रानी ने लिखा कि “यदि युद्ध में आप जीतते हैं, तो एक विधवा को जीतकर आपकी कीर्ति नहीं बढ़ेगी। और यदि हार गये, तो आपके मुख पर सदा को कालिख पुत जाएगी। मैं मृत्यु या युद्ध से नहीं डरती। मुझे राज्य का लोभ नहीं है, फिर भी मैं अन्तिम क्षण तक युद्ध करूंगी।”

इस पत्र को पाकर पेशवा राघोबा चकित रह गया। इसमें जहां एक ओर रानी अहिल्याबाई ने उस पर कूटनीतिक चोट की थी, वहीं दूसरी ओर अपनी कठोर संकल्पशक्ति का परिचय भी दिया था। रानी ने देशभक्ति का परिचय देते हुए उन्हें अंग्रेजों के षड्यन्त्र से भी सावधान किया था। अतः उसका मस्तक रानी के प्रति श्रद्धा से झुक गया और वह बिना युद्ध किये ही पीछे हट गया।

रानी के जीवन का लक्ष्य राज्यभोग नहीं था। वे प्रजा को अपनी सन्तान समझती थीं। वे घोड़े पर सवार होकर स्वयं जनता से मिलती थीं। उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण राज्य और धर्म के उत्थान में लगाया। एक बार गलती करने पर उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को भी हाथी के पैरों से कुचलने का आदेश दे दिया था; पर फिर जनता के अनुरोध पर उसे कोड़े मार कर ही छोड़ दिया।

धर्मप्रेमी होने के कारण रानी ने अपने राज्य के साथ-साथ देश के अन्य तीर्थों में भी मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि बनवाईं। काशी का वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर 1780 में उन्होंने ही बनवाया था। उनके राज्य में कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों का विकास हुआ।

13 अगस्त, 1795 ई0 को 70 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ। उनका जीवन धैर्य, साहस, सेवा, त्याग और कर्तव्यपालन का पे्ररक उदाहरण है। इसीलिए एकात्मता स्तोत्र के 11वें श्लोक में उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा जैसी वीर नारियों के साथ याद किया जाता है।

(संदर्भ : राष्ट्रधर्म मासिक, मई 2011)

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Devi Ahilya Bai Holkar


Devi Ahilya Bai Holkar

It was the speciality of Holkar family that they did not use public funds to meet their personal and family expenses. They had their personal funds accruing from their private properties. Devi Ahilya inherited a personal fund which at that time was estimated to be around sixteen crore rupees. Ahilyabai used her personal funds for all her charitable works.

Her works throughout India:

Alampur (MP) � Harihareshwar, Batuk, Malharimarthand, Surya, Renuka, Ram Hanuman Temples, Shriram Temple, Laxmi Narayan Temple, Maruti Temple, Narsinh Temple, Khanderao Martand Temple, Memorial of Malharrao (I)

Amarkanthak- Shri Vishweshwar Temple, Kotithirth Temple, Gomukhi Temple, Dharamshala, Vansh Kund

Amba Gaon � Lamps for temple

Anand Kanan � Vishweshwar Temple

Ayodhya (U.P)� Built Shri Ram Temple, Shri Treta Ram Temple, Shri Bhairav Temple, Nageshwar/Siddhnath Temple, Sharayu Ghat, well, Swargadwari Mohatajkhana, Dharamshalas

Badrinath Temple (UP) � Shri Kedareshwar and Hari Temples, Dharamshalas (Rangdachati, Bidarchati, Vyasganga, Tanganath, Pawali), Manu kunds (Gaurkund, Kundachatri), Garden and Warm Water Kund at Dev Prayag, Pastoral land for cows

Beed � Jirnnodhar of a Ghat.

Belur (Karnataka) � Ganpati, Pandurang, Jaleshwar,
Khandoba, Tirthraj and Fire temples, Kund

Bhanpura � Nine Temples and Dharmashala

Bharatpur � Temple, Dharmashala, Kund

Bhimashankar � Garibkhana

Bhusawal � Changadev Temple

Bitthur � Bhramaghat

Burhanpur (MP) � Raj Ghat, Ram Ghat, Kund

Chandwad Waphegaon � Vishnu Temple and Renuka Temple

Chaundi � Chaudeshwaridevi Temple, Sineshwar Mahadev temple,

Ahilyeshwar Temple, Dharamshala, Ghat,

Chitrakoot � Pranpratishta of Shri Ramchandra

Cikhalda � Annakshetra

Dwarka(Gujrath) � Mohatajkhana, Pooja House and gave some villages to priest

Ellora �Grishneshwar Temple of Red Stone

Gangotri � Vishwanath, Kedarnath, Annapurna, Bhairav

Temples, many Dharmashalas

Gaya (Bihar) � Vishnupad Temple

Gokarn � Rewaleshwar Mahadev temple, Holkar wada, Garden and Garibkhana

Gruneshwar (Verul) � Shivalaya Tirth

Handiya � Siddhanath Temple, ghat and dharmashala

Haridwar (Uttarakhand) � Kushawarth Ghat and a Huge Dharmashala

Hrishikesh � Many temples, Shrinathji and Govardhan ram temples

Indore � Many Temples and ghats

Jagannath Puri (Orrisa) � Shri Ramchandra Temple, Dharmashala and Garden

Jalgaon � Ram Mandir

Jamghat � Bhumi dwar

Jamvgaon � Donated for Ramdas swami Math

Jejuri � Malhargautameshwar, Vitthal, Martand Temple, Janai Mahadev and Malhar lakes

Karmanasini River � Bridge

Kashi (Benaras) � Kashi Vishwanath Temple, Shri Tarakeshwar, Shri Gangaji, Ahilya Dwarkeshwar, Gautameshwar, Many Mahadev Temples, Temple Ghats, Manikarnika Ghat, Dashaaswamegh Ghat, Janana Ghat, Ahilya Ghat, UttarKashi Dharmashala, Rameshwar Panchkoshi Dharmashala, Kapila Dhara Dharmashala, Shitala Ghat

Kedarnath � Dharmashala and Kund

Kolhapur � Facilities for temple pooja

Kumher � Well and Memorial of Prince Khanderao

Kurukshetra (Haryana) � Shiv Shantanu Mahadev Temple,
Panchkund Ghat, Laxmikund Ghat

Maheshwar � Hundreds of temples, ghats, dharmashalas and houses

Mamaleshwar Mahadev Himachal Pradesh � Lamps

Manasa Devi � Seven temples

Mandaleshwar � Shiv Temple Ghat

Miri (Ahmednagar) � Bhairav Temple in 1780

Naimabar(MP) � Temple

Nandurbar[1] � Temple, Well

Nathdwara � Ahilya Kund, Temple, Well

Neelkantha Mahadev � Shivalaya and Gomukh

Nemisharanya(UP) � Mahadev Madi, Nimsar Dharmashala, Go-ghat, Cakrithirth kund

Nimgaon (Nashik) � Well

Omkareshwar (MP) � Mamaleshwar Mahadev, Amaleshwar, Trambakeshwar Temples (Jirnnodhar), Gauri Somnath Temple, Dharmashalas, Wells

Ozar (Ahmednagar) � 2 wells and kund

Panchawati, Nasik � Shri Ram Temple, Gora Mahadev temple, Dharmashala, Vishweshwar Temple, Ramghat, Dharmashala

Pandharpur (Maharashtra) � Shri Ram Temple, Tulsibag, Holkar wada, Sabha Mandap, Dharmashala and gave silver utensil for the temple,Well-Which known by Bagirao well.

Pimplas(Nashik) � well

Prayag (Allahabad UP) � Vishnu Temple, Dharmashala, Garden, Ghat, Palace

Pune � Ghat

Puntambe (Maharashtra) � Ghat on Godavari river

Pushkar � Ganpati Temple, Dharmashala, Garden

Rameshwar (TN) � Hanuman Temple, Shri Radha Krishna Temple, Dharmashala, Well, Garden etc.

Rampura � Four Temples, Dharmashala and houses

Raver � Keshav Kund

Sakargaon � well

Sambhal � Laxmi Narayan Temple and two wells

Sangamner � Ram Temple

Saptashrungi � Dharmashala

Sardhana Meerut � Chandi Devi Temple

Saurashtra (Guj) � Somnath Temple in 1785. (Jirnnodhdhar and Pran Prathistha)

Siddhivinayak temple’s inner sanctum at Siddhatek in Ahmednagar District

Shri Nagnath (Darukhvan) � Started pooja in 1784

Srisailam Mallikarjun (Kurnool, AP) � Temple of Lord Shiva

Shri Shambhu Mahadev Mountain Shingnapur (Maharashtra) � Well

Shri Vaijenath (Parali, Maha) � Jirnnodhar of Baijenath Temple in 1784

Shri Vhigneshwar � Lamps

Sinhpur � Shiv Temple and ghat

Sulpeshwar � Mahadev Temple, annakshetra

Sultanpur (Khandesh) � Temple

Tarana � Tilabhandeshwar Shiv temple, Khedapati, Shriram Temple, Mahakali Temple

Tehari (Bundelkhand) � Dharmashala

Trimbakeshwar (Nashik) � Bridge on Kushawarth Ghat

Ujjain (MP) � Chintaman Ganapati, Janardhan, Shrilila Purushottam, Balaji Tilakeshwar, Ramjanaki Ras Mandal, Gopal, Chitnis, Balaji, Ankpal, Shiv and many other temples, 13 ghats, well and many Dharmashalas etc.

Varanasi, Kashi Vishwanath Temple 1780.[13]

Vrindavan (Mathura) � Chain Bihari Temple, Kaliyadeha Ghat, Chirghat and many other ghats, Dharmashala, Annakstra

Waphegaon (Nashik) � Holkar wada and one well

Source: Wikipedia

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अहिल्याबाई होल्कर


आज 31 मई को तपस्वी राजमाता अहिल्याबाई होल्कर (Devi Ahilyabai Holkar) की जन्मजयंती है।

भारत में जिन महिलाओं का जीवन आदर्श, वीरता, त्याग तथा देशभक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें #रानी_अहिल्याबाई_होल्कर का नाम प्रमुख है। उनका जन्म 31 मई, 1725 को ग्राम छौंदी (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री मनकोजी राव शिन्दे परम शिवभक्त थे। अतः यही #संस्कार बालिका अहल्या पर भी पड़े।

एक बार #इन्दौर के राजा मल्हारराव होल्कर ने वहां से जाते हुए मन्दिर में हो रही आरती का मधुर स्वर सुना। वहां पुजारी के साथ एक बालिका भी पूर्ण मनोयोग से आरती कर रही थी। उन्होंने उसके पिता को बुलवाकर उस बालिका को अपनी पुत्रवधू बनाने का प्रस्ताव रखा। मनकोजी राव भला क्या कहते; उन्होंने सिर झुका दिया। इस प्रकार वह आठ वर्षीय बालिका इन्दौर के राजकुंवर खांडेराव की पत्नी बनकर राजमहलों में आ गयी।

इन्दौर में आकर भी अहिल्या पूजा एवं आराधना में रत रहती। कालान्तर में उन्हें दो पुत्री तथा एक पुत्र की प्राप्ति हुई। 1754 में उनके पति खांडेराव एक युद्ध में मारे गये। 1766 में उनके ससुर मल्हार राव का भी देहांत हो गया। इस संकटकाल में रानी ने तपस्वी की भांति श्वेत वस्त्र धारण कर राजकाज चलाया; पर कुछ समय बाद उनके पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधू भी चल बसे। इस वज्राघात के बाद भी रानी अविचलित रहते हुए अपने कर्तव्यमार्ग पर डटी रहीं।

ऐसे में पड़ोसी राजा पेशवा राघोबा ने इन्दौर के दीवान गंगाधर यशवन्त चन्द्रचूड़ से मिलकर अचानक हमला बोल दिया। रानी ने धैर्य न खोते हुए पेशवा को एक मार्मिक पत्र लिखा। रानी ने लिखा कि “यदि युद्ध में आप जीतते हैं, तो एक विधवा को जीतकर आपकी कीर्ति नहीं बढ़ेगी। और यदि हार गये, तो आपके मुख पर सदा को कालिख पुत जाएगी। मैं मृत्यु या युद्ध से नहीं डरती। मुझे राज्य का लोभ नहीं है, फिर भी मैं अन्तिम क्षण तक युद्ध करूंगी।”

इस पत्र को पाकर पेशवा राघोबा चकित रह गया। इसमें जहां एक ओर रानी अहिल्याबाई ने उस पर कूटनीतिक चोट की थी, वहीं दूसरी ओर अपनी कठोर संकल्पशक्ति का परिचय भी दिया था। रानी ने देशभक्ति का परिचय देते हुए उन्हें अंग्रेजों के षड्यन्त्र से भी सावधान किया था। अतः उसका मस्तक रानी के प्रति श्रद्धा से झुक गया और वह बिना युद्ध किये ही पीछे हट गया।

रानी के जीवन का लक्ष्य राज्यभोग नहीं था। वे प्रजा को अपनी सन्तान समझती थीं। वे घोड़े पर सवार होकर स्वयं जनता से मिलती थीं। उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण राज्य और धर्म के उत्थान में लगाया। एक बार गलती करने पर उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को भी हाथी के पैरों से कुचलने का आदेश दे दिया था; पर फिर जनता के अनुरोध पर उसे कोड़े मार कर ही छोड़ दिया।

धर्मप्रेमी होने के कारण रानी ने अपने राज्य के साथ-साथ देश के अन्य तीर्थों में भी मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि बनवाईं। काशी का वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर 1780 में उन्होंने ही बनवाया था। उनके राज्य में कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों का विकास हुआ।

13 अगस्त, 1795 ई0 को 70 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ। उनका जीवन धैर्य, साहस, सेवा, त्याग और कर्तव्यपालन का पे्ररक उदाहरण है। इसीलिए एकात्मता स्तोत्र के 11वें श्लोक में उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा जैसी वीर नारियों के साथ याद किया जाता है।

(संदर्भ : राष्ट्रधर्म मासिक, मई 2011)

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हिन्दू राष्ट्रवादी

31 मई
तपस्वी राजमाता अहल्याबाई होल्कर जन्म दिवस

भारत में जिन महिलाओं का जीवन आदर्श, वीरता, त्याग तथा देशभक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें रानी अहल्याबाई होल्कर का नाम प्रमुख है। उनका जन्म 31 मई, 1725 को ग्राम छौंदी (अहमदनगर, महाराष्ट्र) में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री मनकोजी राव शिन्दे परम शिवभक्त थे। अतः यही संस्कार बालिका अहल्या पर भी पड़े।

एक बार इन्दौर के राजा मल्हारराव होल्कर ने वहां से जाते हुए मन्दिर में हो रही आरती का मधुर स्वर सुना। वहां पुजारी के साथ एक बालिका भी पूर्ण मनोयोग से आरती कर रही थी। उन्होंने उसके पिता को बुलवाकर उस बालिका को अपनी पुत्रवधू बनाने का प्रस्ताव रखा। मनकोजी राव भला क्या कहते; उन्होंने सिर झुका दिया। इस प्रकार वह आठ वर्षीय बालिका इन्दौर के राजकुंवर खांडेराव की पत्नी बनकर राजमहलों में आ गयी।

इन्दौर में आकर भी अहल्या पूजा एवं आराधना में रत रहती। कालान्तर में उन्हें दो पुत्री तथा एक पुत्र की प्राप्ति हुई। 1754 में उनके पति खांडेराव एक युद्ध में मारे गये। 1766 में उनके ससुर मल्हार राव का भी देहांत हो गया। इस संकटकाल में रानी ने तपस्वी की भांति श्वेत वस्त्र धारण कर राजकाज चलाया; पर कुछ समय बाद उनके पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधू भी चल बसे। इस वज्राघात के बाद भी रानी अविचलित रहते हुए अपने कर्तव्यमार्ग पर डटी रहीं।

ऐसे में पड़ोसी राजा पेशवा राघोबा ने इन्दौर के दीवान गंगाधर यशवन्त चन्द्रचूड़ से मिलकर अचानक हमला बोल दिया। रानी ने धैर्य न खोते हुए पेशवा को एक मार्मिक पत्र लिखा। रानी ने लिखा कि यदि युद्ध में आप जीतते हैं, तो एक विधवा को जीतकर आपकी कीर्ति नहीं बढ़ेगी। और यदि हार गये, तो आपके मुख पर सदा को कालिख पुत जाएगी। मैं मृत्यु या युद्ध से नहीं डरती। मुझे राज्य का लोभ नहीं है, फिर भी मैं अन्तिम क्षण तक युद्ध करूंगी।

इस पत्र को पाकर पेशवा राघोबा चकित रह गया। इसमें जहां एक ओर रानी अहल्याबाई ने उस पर कूटनीतिक चोट की थी, वहीं दूसरी ओर अपनी कठोर संकल्पशक्ति का परिचय भी दिया था। रानी ने देशभक्ति का परिचय देते हुए उन्हें अंगे्रजों के षड्यन्त्र से भी सावधान किया था। अतः उसका मस्तक रानी के प्रति श्रद्धा से झुक गया और वह बिना युद्ध किये ही पीछे हट गया।

रानी के जीवन का लक्ष्य राज्यभोग नहीं था। वे प्रजा को अपनी सन्तान समझती थीं। वे घोड़े पर सवार होकर स्वयं जनता से मिलती थीं। उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण राज्य और धर्म के उत्थान में लगाया। एक बार गलती करने पर उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को भी हाथी के पैरों से कुचलने का आदेश दे दिया था; पर फिर जनता के अनुरोध पर उसे कोड़े मार कर ही छोड़ दिया।

धर्मप्रेमी होने के कारण रानी ने अपने राज्य के साथ-साथ देश के अन्य तीर्थों में भी मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि बनवाईं। काशी का वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर 1780 में उन्होंने ही बनवाया था। उनके राज्य में कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों का विकास हुआ।

13 अगस्त, 1795 ई0 को 70 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ। उनका जीवन धैर्य, साहस, सेवा, त्याग और कर्तव्यपालन का पे्ररक उदाहरण है। इसीलिए एकात्मता स्तोत्र के 11वें श्लोक में उन्हें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा जैसी वीर नारियों के साथ याद किया जाता है।

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रासबिहारी बोस


रासबिहारी बोस

13 August 2010 at 14:03 सरफ़रोशी-की-तमन्ना

रासबिहारी बोस (बांग्ला: রাসবিহারী বসু ) (25 मई,1886- 21 जनवरी, 1945) भारत के एक क्रान्तिकारी नेता थे जिन्होने ब्रिटिश राज के विरुद्ध गदर षडयंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के संगठन का कार्य किया। इन्होंने न केवल भारतमें कई क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिकानिभाई, बल्कि विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतंत्रता दिलाने के प्रयासमें आजीवन लगे रहे। दिल्ली में वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेस लीग और आजाद हिंद फौजकी स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि देशको आजाद करने के लिए किए गए उनके ये प्रयास सफल नहीं हो पाए, लेकिन इससेस्वतंत्रता संग्राम में निभाई गई उनकी भूमिका का महत्व बहुत ऊंचा है।

रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1986 को बंगाल में बर्धमान के सुबालदह गांव में हुआ। इनकी आरंभिक शिक्षा चंदननगर में हुई, जहां उनके पिता विनोदबिहारी बोस नियुक्त थे।[१]रासबिहारी बोस बचपन से ही देश की स्वतंत्रता के स्वप्न देखा करते थे औरक्रांतिकारी गतिविधियों में उनकी गहरी दिलचस्पी रही थी। प्रारंभ मेंरासबिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में काम किया। उसी दौरान उनका क्रांतिकारी जतिन मुखर्जी के अगुवाई वाले युगातंर के अमरेन्द्र चटर्जी से परिचय हुआ और वह बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए। बाद में वह अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर संयुक्त प्रांत, (वर्तमान उत्तर प्रदेश), और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रांतिकारियों के निकट आए।

दिल्ली में जार्ज पंचम के 12 दिसंबर १९११ को होने वाले दिल्ली दरबार के लिए निकाली गई शोभायात्रा पर वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही थी।[२]अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसंत कुमार विश्वास ने उन पर बम फेंका लेकिननिशाना चूक गया। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे लग गई औरवह बचने के लिए रात में रेलगाडी से देहरादूनभाग गए और आफिस में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। अगलेदिन उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा भी बुलाई, जिसमें उन्होंनेवायसराय पर हुए हमले की निन्दा की। इस प्रकार उन पर इस षडयंत्र और कांड काप्रमुख संदिग्ध होने का संदेह उन पर किंचितमात्र भी नहीं हुआ।[१] 1913 में बंगालमें बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क मेंआए, जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया। रासबिहारी बोस इसके बाददोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रांतिकारी गतिविधियों के संचालन में लग गए।भारत को स्वतंत्र कराने के लिए उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनाई। फरवरी १९१५ में अनेक भरोसेमंद क्रांतिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गई।

जुगांतरके कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूंकि अभी अधिकतरसैनिक देश से बाहर गए हुए हैं, इसलिए बाकी को आसानी से हराया जा सकता हैलेकिन यह प्रयास भी असफल रहा और कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लियागया। ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रासबिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश कीलेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और भागकर विदेश से हथियारों की आपूर्ति केलिए जून १९१५ में राजा पी. एन. टैगोर के नाम से जापान के शंघाई में पहुंचे और वहां देश की आजादी के लिए काम करने लगे।[२]वहां उन्होंने कई वर्ष निर्वासन में बिताए। जापान में भी रासबिहारी बोसचुप नहीं बैठे और वहां के अपने जापानी क्रांतिकारी मित्रों के साथ मिलकरदेश की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करते रहे। उन्होंने जापान में अंग्रेजीके अध्यापन के साथ लेखक व पत्रकार के रूप में काम शुरू किया। उन्होंनेवहां में न्यू एशिया नामक समाचार पत्र शुरू किया। जापानी भाषा सीखी और इसमें १६ पुस्तकें लिखीं।[२] ब्रिटिश सरकारअब भी उनके पीछे लगी हुई थी और वह जापान सरकार से उनके प्रत्यर्पण की मांगकर रही थी, इसलिए वह लगभग एक साल तक अपनी पहचान और आवास बदलते रहे। १९१६ में जापान में ही रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर लिया और १९२३ में वहां के नागरिक बन गए।[१] जापान में वह पत्रकार और लेखकके रूप में रहने लगे। जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्षमें खड़ा करने और देश की आजादी के आंदोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलानेमें भी रासबिहारी बोस की भूमिका अहम रही। उन्होंने २८ मार्च १९४२ को टोक्योमें एक सम्मेलन बुलाया जिसमें इंडियन इंडीपेंडेंस लीग की स्थापना कानिर्णय किया गया। इस सम्मेलन में उन्होंने भारत की आजादी के लिए एक सेनाबनाने का प्रस्ताव भी पेश किया।

22जून 1942 को रासबिहारी बोस ने बैंकाक में लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। जापान ने मलय और बर्मा के मोर्चे पर कई भारतीय युद्धबंदियों को पकड़ा था। इन युद्धबंदियों को इंडियन इंडीपेंडेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) का सैनिक बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया। आईएनए का गठन रासबिहारी बोस की इंडियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितंबर १९४२ को किया गया। बोस ने एक झंडे का भी चयन किया जिसे आजाद नाम दिया गया। इस झंडे को उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया।[१]रासबिहारी बोस शक्ति और यश के शिखर को छूने ही वाले थे कि जापानी सैन्यकमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आईएनए के नेतृत्व से हटा दिया लेकिनआईएनए का संगठनात्मक ढांचा बना रहा। बाद में इसी ढांचे पर सुभाष चंद्र बोसने आजाद हिन्द फौज के नाम से आईएनएस का पुनर्गठन किया।

भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने की जीतोड़ मेहनत करते हुए किन्तु इसकी आस लिए ही21 जनवरी 1945 को इनका निधन हो गया।[१] उनके निधन से कुछ समय पहले जापानी सरकार ने उन्हें आर्डर आफ द राइजिंग सन के सम्मान से अलंकृत किया था।rash bihari boserash bihari bose