Posted in जीवन चरित्र

जिन्नाह महान सावरकर गद्दार: भ्रम का निवारण


देवी सिंह तोमर

जिन्नाह महान सावरकर गद्दार: भ्रम का निवारण

हमारे देश में एक विशेष जमात यह राग अलाप रही है कि जिन्नाह अंग्रेजों से लड़े थे इसलिए महान थे। जबकि वीर सावरकर गद्दार थे क्यूंकि उन्होंने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी। वैसे इन लोगों को यह नहीं मालूम कि जिन्नाह इस्लाम की मान्यताओं के विरुद्ध सारे कर्म करते थे। जैसे सूअर का मांस खाना, शराब पीना, सिगार पीना आदि। वो न तो पांच वक्त के नमाजी थे। न ही हाजी थे। न ही दाढ़ी और टोपी में यकीन रखते थे। जबकि वीर सावरकर। उनका तो सारा जीवन ही राष्ट्र को समर्पित था। पहले सावरकर को जान तो लीजिये।

1. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.?

2. वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ…

3. विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में 7 अक्तूबर 1905 को वीर सावरकर ने जलाई थी…

4. वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र ‘इन्डियन ओपीनियन’ में गाँधी ने निंदा की थी…

5. सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के 16 वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया…

6. सावरकर पहले भारतीय थे जिनको 1905 में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुर्माना लगाया … इसके विरोध में हड़ताल हुई… स्वयं तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा…

7. वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफादार होने की शपथ नही ली… इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नही दिया गया…

8. वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया…

9. सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था…

10. ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंहने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी… भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी… पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी…

11. वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे…

12. सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला, मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नही मिला और बंदीबनाकर भारत लाया गया…

13. वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी…

14. सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले- “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया.”

15. वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सजा के समय 10 साल से भी अधिक समय तक आजादी के लिए कोल्हू चलाकर 30 पौंड तेल प्रतिदिन निकाला…

16. वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकड़ और कोयले से कवितायें लिखी और 6000 पंक्तियाँ याद रखी…

17. वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे, जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आजादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा…

18. आधुनिक इतिहास के वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि-‘आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका.पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः.’अर्थात समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभू है जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भू है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है…

19. वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने 30 वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद 1948 में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया… देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारोंसे डर लगता था…

20. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका 26 फरवरी 1966 को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था…

21.वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत 26 फरवरी 2003 को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधनपर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था….

22. वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया…

23. वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से UPA सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया…वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने कालापानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया….

24. महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी-देशभक्त, उच्च कोटि के साहित्य के रचनाकार, हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्थान के मंत्रदाता, हिंदुत्व के सूत्रधार वीर विनायक दामोदर सावरकर पहले ऐसे भव्य-दिव्य पुरुष, भारत माता के सच्चे सपूत थे, जिनसे अन्ग्रेजी सत्ता भयभीत थी, आजादी के बाद नेहरु की कांग्रेस सरकार भयभीत थी…

25. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया… पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर के राष्ट्रवादी विचारों का सूर्य उदय हो रहा है..

।।वन्देमातरम।।

!! जय हिन्दू राष्ट्र !!

Posted in जीवन चरित्र

रामगढ़ शेखावाटी को बसाने वाले सेठ


श्री चतुर्भुज पोद्दार – रामगढ़ शेखावाटी को बसाने वाले सेठ
रामगढ़ सेठान को सन् 1791 में सेठ चतुर्भुज पोद्दार ने बसाया था। सेठ जी बंसल गोत्र के अग्रवाल महाजन थे। ये राजस्थान के सीकर जिले में पड़ता है । वैसे तो शहर अपने राजा के नाम से जाने जाते हैं लेकिन राजस्थान का रामगढ़ सेठान या रामगढ़ सेठोका जाना जाता है अपने सेठों की वजह है । इसके इतिहास से एक बहुत ही दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है । पोद्दारों के 21 परिवार राजस्थान में व्यापार करते थे । वो बहुत ही सम्पन्न व्यापारी थे । उनके आलीशान हवेलियां उसमे की गई नक्काशी उनके रुतबे को दर्शाती थीं । अब वहाँ के जागीरदारों को इनकी अमीरी देख के जलन हुई उन्होंने इनपे टैक्स बड़ा दिए और वो टैक्स इतने ज्यादा थे कि पोद्दारों ने कहा ये गलत है और इसका विरोध किया । और विरोध इतना ज्यादा बढ़ गया कि पोद्दारों ने कहा “हम चुरू छोड़ के जा रहे हैं और जहाँ भी जाएंगे वहाँ इससे भव्य और आलीशान नगर बसायेंगे ।” उसके बाद पोद्दारों ने सीकर में रामगढ़ शेखावाटी या रामगढ़ सेठान बसाया । बाद में फतेहगढ़ के अग्रवाल कुल के रुइया महाजन भी यहाँ आकर बस गए।
सीकर ठिकाने के सीनियर अफसर कैप्टन वेब जो 1934 से 38 तक सीकर ठिकाने का सीनियर अफसर रहा ,ने ‘सीकर की कहानी ‘नामक अंग्रेजी में पुस्तक में अपने प्रवास के दौरान सीकर ठिकाने के संस्मरण लिखें हैं ।उसमें कैप्टन वेब ने रामगढ़ के सेठों को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बताया है है ।इसी कारण राज दरबार में भी उन्हें पूरा सम्मान मिलता था तथा विशेष कुर्सी रामगढ़ के क्षेत्रों को उपलब्ध करवाई जाती थी ।
रामगढ़ सेठान उन्नीसवीं शताब्दी का भारत के सबसे अमीर नगरों था। इसकी भव्य हवेलियां , छतरियां और मंदिर भारत की प्राचीन कला और वास्तुशास्त्र का अद्भुत उदाहरण हैं । रामगढ़ सेठान की छतरियाँ भारत की सबसे बड़ी Open Air Art Gallery है । उसमें रामायण और राधा कृष्ण की कला कृतियाँ बनी हैं
रामगढ़ सेठान के बारे में कुछ दिलचस्प चीजें –
रामगढ़ सेठान भारत के सबसे अमीर नगरों में था । इसके सेठ पोद्दार और रुइया बहुत ही उदार और दयालु थे और उन्होंने बहुत सी दिलचस्प चीजें की थी .
रामगढ़ सेठान का सारा टैक्स केवल सेठ भरते थे ।
इन्होंने काफी स्कूल , कॉलेज , हॉस्पिटल और धर्मशालाएं खोली थीं ।
रामगढ़ सेठान को उस समय #छोटा_काशी कहा जाता था क्योंकि उसमें 25 संस्कृत के विद्यालय थे , उसमे आयुर्वेद और ज्योतिष के लिए विद्यालय थे और उस समय जयपुर के अलावा केवल रामगढ़ में कॉलेज था ।
सभी विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा , मुफ्त खाना और सभी चीजें मिलती थीं ।
सेठों के लड़कों के विवाह में नगर के सभी लोग आमंत्रित होते थे और जो भी आता था उसे हेड़ा दिया जाता था जो कि बहुत प्रसिद्ध था । जो भी आता था उसे एक रुपये दिए जाते थे जाते समय कुछ लोग तो तो अपने साथ अपने मवेशी लाते थे उनके लिए भी ले जाते थे । एकबार एक आदमी लोटा भर के चीटे लाया और हर चीटे के लिए हेड़ा मांगा और उसे दिया भी गया ।
गौशाला में गायों के लिए 60-70 मन (2400 किलो)ग्वार रहता था जो कि जिसका प्रबन्द सेठों द्वारा किया जाता था ।
उनके लड़के की शादी के वक़्त खुली लूट रहती थी पूरे नगर में कोई भी जिसके घर मे शादी है उसकी दुकान से कुछ भी ले सकता था जिसका नुकसान जिस सेठ के लड़के की शादी है वो ही उठाता था ।
एकबार किसी गांव के एक गांववाले ने सीकर के महाराज से शिकायत की आप रामगढ़ वालों पे इतना ज्यादा ध्यान क्यों देते हैं । राजा ने उनकी परीक्षा ली कहा कि तुमलोग 1 करोड़ रुपये का प्रबन्द करो अभी । और पूरे सीकर में । लोगों ने मना कर दिया कहा ऐसा नहीं हो सकता है । फिर राजा ने अपने मंत्रियों से कहा कि रामगढ़ जाओ और सेठों को बोलो की महाराज को इस समय एक करोड़ रुपये चाहियें (इस समय के करीब अरबों में ) । मंत्री गए और सेठों को बताया । सेठों ने कहा कि राजा से पूछो की रुपये ,अन्ना ,पैसे किसमे चाहिए ? मंत्री आये और राजा को बताया । राजा ने कहा अब समझे मैं रामगढ़ सेठान का इतना ध्यान क्यों रखता हूँ ।
पोद्दारों ने वहाँ कुएं , तालाब , बावड़ी , मंदिर , छतरियाँ और आलीशान हवेलियां बनवाईं थीं वहीं रुइया ने कॉलेज , स्कूल और हॉस्पिटल इत्यादि ।
सेठ श्री अनंत राम पोद्दार जी जाड़ों में सियारों को लाडू और कंबल देते थे ताकि वो मर न जाएं ।
भक्तवारी देवी , सेठ श्री लक्ष्मी चंद पोद्दार जी की धर्म पत्नी गुप्त दान करतीं थीं । उन्होंने अपने मुनीम को बोल दिया था कि नगर में कोई भूखा नहीं रहना चाहिए न ही किसी को किसी बात की चिंता हो ।
बहुत से भारत के अमीर कॉरपोरेट्स यहीं से निकले हैं जैसे एस्सार ग्रुप के शशि रुइया और रवि रुइया .
भारत की पहली रजिस्टर्ड कंपनी सेठ श्री ताराचंद घनश्याम दस पोद्दार की थी जिसमे मशहूर उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला जी और स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल के पितामाह ने काम किया था ।मोहनलाल जैन
Posted in जीवन चरित्र

महाराणा प्रताप कि असली गाथा


सिद्धार्थ गुप्ता

महाराणा प्रताप कि असली गाथा👍🚩🔱🚩
क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?? इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गये हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूँकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं।

इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पाँच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है,

ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है, क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना….

महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सीमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है, वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध, महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था।

मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर आधिपत्य जमा सके, हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे,

और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा, उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था, उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे।

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फियाँ लेकर हाज़िर हुए,

इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी।

बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लड़ाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी।

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है, इसे बैटल ऑफ़ दिवेर* कहा गया गया है।

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूँक दिया।

एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे, कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है।

ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं, कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे।

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया, हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।

युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया। उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया, शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी कि मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है।

ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी।
बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया, दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया कि जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा,

यहाँ तक कि जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए, दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए।

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला कि अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा, उसका सर काट दिया जायेगा।इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मँगाई जाती थी।

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया कि अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली।

अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया।

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है”.।*
जिन्हें अब वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है।
आप भी इस प्रयास में जुड़ें।

वीर शिरोमणि #महाराणा प्रताप जी की जयंती पर उनके चरणों में शत शत नमन 🚩🙏🌹

Posted in जीवन चरित्र

शंकरो शंकर साक्षात्


शंकरो शंकर साक्षात्

Smita Singh

                    शंकरो शंकर साक्षात् दक्षिण भारत में स्थित केरल राज्य का कालड़ी गांव…जहां सन् 788ईं में एक ऐसी दिव्य आत्मा अवतरित हुई… जिसके ज्ञान रूपी दिव्य प्रकाश ने पूरे भारत से अज्ञानता के अंधकार को हमेशा-हमेशा के लिए दूर कर दिया…कहा जाता है कि इस महाज्ञानी शक्तिपुंज के रूप में स्वयं भगवान शंकर इस धरती पर प्रकट हुए थे…
शिवगुरू नामपुद्रि के यहां विवाह के कईं साल बाद भी कोई संतान नहीं हुई…भगवान भोलेनाथ शिवगुरू के ईष्ट गुरू थे.. इसलिए उसने पुत्र प्राप्ति की कामना के लिए अपनी पत्नी विशिष्टादेवी के साथ कईं सालों तक भगवान शंकर की कठोर आराधना की…
शिवगुरू और विशिष्टादेवी की भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने शिवगुरू को स्वप्न में दर्शन दिए और वर मांगने को कहा…शिवगुरु ने अपने ईष्ट गुरू से वरदान स्वरूप एक दीर्घायु सर्वज्ञ पुत्र मांगा…लेकिन भगवान शंकर ने उन्हें कहा कि… वत्स दीर्घायु पुत्र सर्वज्ञ नहीं होगा और सर्वज्ञ पुत्र दीर्घायु नहीं होगा…बोलो तुम कौन सा पुत्र चाहते हो…तब धर्मप्राण शिवगुरू ने सर्वज्ञ पुत्र की याचना की…औघड़दानी भगवान शिव ने कहा कि वत्स तुम्हें सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति होगी…और मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहां जन्म लूंगा…
 वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन मध्यकाल में विशिष्टादेवी की कोख से परम प्रकाशरूप, अति सुंदर बालक का जन्म हुआ…देवज्ञ ब्राह्मणों ने बालक के मस्तक पर चक्र, ललाट पर नेत्र और स्कंध पर शूल परिलक्षित कर उसे शिवावतार घोषित कर दिया…और बालक का नाम शंकर रख दिया…
जिस समय जगदगुरू शंकराचार्य का जन्म हुआ उस समय भारत में वैदिक धर्म पतन की ओर जा रहा था… मानवता नाम की कोई चीज़ समाज में नहीं थी…ऐसे में आचार्य शंकर मानव धर्म के लिए प्रकाश स्तंभ बनकर उभरे…
शंकराचार्य की शिक्षा
अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित्षोडशे कृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात् अर्थात…आठ वर्ष की आयु में चारो वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत ,सोलह साल की आयु में शांकरभाष्य और 32 वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया…
भगवान शंकर के अवतार आदिगुरू शंकराचार्य बचपन से पढ़ाई में काफी तेज़ थे… तीन साल की आयु में ही बालक शंकर ने मलयालम सीख चुके थे..पर पिता शिवगुरू चाहते थे कि शंकर संस्कृत का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें…लेकिन पिता की अकाल मृत्यु से बालक शंकर के सिर से बचपन में ही पिता की छत्रछाया उठ गई और सारा बोझ उनकी माता विशिष्टादेवी के कंधों पर आ गया…पांच वर्ष की आयु में बालक शंकर को यज्ञोपवीत संस्कार करवाकर वेद अध्ययन के लिए गुरुकुल भेज दिया गया…असीमित प्रतिभा के धनी बालक शंकर को महज दो साल के समय में ही वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण और महाभारत जैसे सभी ग्रंथ कठस्थ हो गए…गुरू का आशीर्वाद पाकर बालक शंकर घर लौट आए और माता की सेवा करने लगे…कुछ समय बाद इनकी माता ने इनका विवाह करने की सोची… लेकिन बालक शंकर गृहस्थी के झंझट से दूर रहना चाहते थे…इसी बीच एक ज्योतिषी से जब बालक शंकर को ये पता चला कि अल्पायु में ही इनकी मृत्यु का योग है तो उनके मन में संन्यास लेकर लोक-सेवा की भावना और ज्यादा प्रबल हो गई…और मां से हठ कर शंकर महज 7 वर्ष की आयु में संन्यासी बन गए…
शंकराचार्य का भारत भ्रमणसंन्यासी बनने के बाद बालक शंकर ने सबसे पहला काम भारत भ्रमण का किया.. मां से आशीर्वाद लेकर घर से निकले बालक शंकर ने केरल से अपनी यात्रा की शुरुआत की.. और उनका सबसे पहला पड़ाव था नर्मदा नदी के तट पर स्थित ओंकारनाथ….यहां बालक शंकर ने गुरू गोविंदपाद के सानिध्य में योग शिक्षा और अद्वैत ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया…तीन साल तक आचार्य शंकर अद्वैत तत्व की कठिन साधना करते रहे…इसके बाद गुरू का आशीर्वाद पाकर आदिगुरू शंकराचार्य काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े…इस यात्रा के दौरान आचार्य शंकर ने अपने अलग-अलग स्थानों पर अपने दिव्य ज्ञान से बड़े-बड़े ज्ञानी पंडितों को भी शास्त्रार्थ में हरा दिया…और गुरू पद पर प्रतिष्ठित हुए… शंकराचार्य का दर्शनदेश भ्रमण के दौरान प्राप्त हुए ज्ञान के बाद आचार्य शंकर ऐसे महासागर बन गए… जिसमें अद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टा द्वैतवाद और निर्गुण ब्रह्म ज्ञान के साथ सगुण साकार की भक्ति की धाराएं हिलोरें लेने लगी..उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है..उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुंचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना… ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर ये भी अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है…आचार्य शंकर ने…

ब्रह्मं सत्यं जगन्मिथ्या का उद्घोष किया यानि ब्रह्मं ही सत्य है और ये संपूर्ण जग महज एक भ्रम है…यही नहीं आदि गुरू शंकराचार्य ने शिव, पार्वती,गणेश और भगवान विष्णु के भक्तिरस स्तोत्र की रचना भी की…इन रचनाओं में ग्राफिक्स इन-सौन्दर्य लहरी और विवेक चूड़ामणि जैसे श्रेष्ट ग्रंथ में शामिल थे…ये आदिगुरू शंकराचार्य ही थे जिन्होंने अपने अकाट्य तर्कों से शैव-शाक्त और वैष्णवों का द्वंद्व समाप्त कर दिया और पंचदेवोपासना का मार्ग प्रशस्त किया..
चार मठों की स्थापनासमस्त ज्ञान अर्जन और उसके दर्शन के बाद अब बारी थी संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने का…मूर्ति पूजा जैसी कुरीतियों से समाज को छुटकारा दिलाने का…आदिगुरू शंकराचार्य ने ऐसा ही किया… उन्होंने चार मठों की स्थापना कर पूरे देश को सांस्कृतिक, धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक और भौगोलिक एकता के अविच्छिन्न सूत्र में बाँध दिया।इन चार मठों में से सबसे पहला मठ था श्रंगेरी मठ… श्रंगेरी मठआदिगुरू ने सनातन संस्कृति के सामाजिक विकास के लिए जिस तंत्र की स्थापना की उसमें सबसे पहला मठ है… श्रृंगेरी पीठ…जगतगुरूशंकराचार्य ने दक्षिण भारत के कर्नाटकराज्यमें मंगलौर से 104 किलोमीटर दूर श्रृंगेरी में इस मठ को स्थापित किया… श्रृंगेरी तुंगभद्रा नदी के तट परसह्या पर्वत की तलहटी में बसा है… श्रृंगेरी सात पुरियों में से एक है…उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी में स्थित दूसरा मठ था…सनातन संस्कृति में वैदिक दर्शन के सूत्रधार हैं आदिगुरू इसीलिए श्रृंगेरी मठ की शाखा यजुर्वेद है… साथ ही इस मठ का सूत्र वाक्य है अहं ब्रह्मास्मि…अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूं… आदिदेव शंकरऔर आदि वाराह इस मठ के देवता माने जाते हैं… देवी कामाक्षी को इस मठ की आदि देवी माना जाता है… मठ के गुरू अद्वैत दर्शन को मानते हैं..गोवर्धन मठकहते हैं भारत भ्रमण पर जब जगतगुरू निकले तो आध्यात्मिक विजय के लिए शंकराचार्य पुरी भी पहुंचे…आदिगुरू का तो बस एक ही सिंद्धांत था कि परमात्मा तो हर रूप में मिलता है….और जीवन को प्रकाश वेद के सूत्रों से मिलता है….वैदिक ज्ञान ही आपके जीवन को सदगति प्रदान करता है….वैदिक ज्ञान से ही आदि अगोचर ब्रह्म को जाना जा सकता है और मोक्ष के लिए रास्ते बनाए जा सकते हैं…अपनी इस विचार धारा से शंकराचार्य ने पुरी के बौद्ध मठाधीशों को भी प्रभावित किया और उनको सनातन संस्कृति को अपनाने के लिए प्रेरित किया…इसी धार्मिक प्रचार को आगे बढ़ाने के लिए शंकराचार्य ने पुरी में गोवर्धन पीठ का स्थापना की…आदि शंकराचार्य के चार शिष्यों में से पहले शिष्य पद्मपाद इस मठ के पहले मठाधीश बने…इस मठ की शाखा ऋग्वेद है तथा सूत्र वाक्य प्रज्ञानं ब्रह्म है…इसलिए इसे पूर्वमन्या श्री गोवर्धन भोगवर्धन पीठम भी कहते हैं…इस मठ का संबंध संन्यासियों के आरण्य सम्प्रदाय से है…इस पीठ के देवता भगवान जगन्नाथ और बलभद्र जी हैं साथ ही इस मठ की देवी विमला (लक्ष्मी जी) हैं…कहते हैं कि ये स्थान 51 शक्ति पीठों में से एक है यहां मां सती का नवल भाग गिरा था…शारदा मठपूर्व में पुरी के बाद जगतगुरू का अगला पड़ाव पश्चिम में था गुजरात प्रदेश…राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए पश्चिम में एक धार्मिक स्तंभ का होना आवश्यक था…लिहाजा आदिगुरू शंकराचार्य ने शारदा पीठ की स्थापना की….गुजरात के द्वारका में है शारदा पीठ…सनातन धर्म के चार धामों में से एक द्वारका धाम भी यहीं पर है….इस पीठ का संबंध साधु और संन्यासियों के तीर्थ और आश्रम संप्रदाय से है। इस पीठ की शाखा सामवेद है और इस पीठ का सूत्र वाक्य तत्त्वमसि है….तत्वमसि का अर्थ है…तुम वही हो…अर्थात सभी जीवों में ब्रह्म का वास है…ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी को इस मठ का देवता माना जाता है…शिवजी को ही सिद्धेश्वरदेवता कहा जाता है….देवा भद्र काली एक मठ की आदिदेवी मानी गई है…शारदा मठ के प्रथम पीठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) बने…हस्तामलक का नाम भगवान शंकराचार्य के मुख्य चार शिष्यों में लिया जाता है…ज्योर्तिमठदेवों की नगरी देवभूमि है उत्तराखंड…आदिगुरू शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति के विकास और संधान के लिए जो सबसे आखिरी ठिकाना चुना वो था बद्रिकाश्रम… आदिगुरू ने यहां ज्योर्तिमठ की स्थापना की…इस मठ का संबंध साधु-संन्यासियों के गिरि, पर्वत और सागर पंथ से है…इस पीठ का सूत्रवाक्य अयमात्मा ब्रह्म है…इस पीठ का संबंध अथर्ववेद शाखा से है…इस मठ के पहले पीठाधीश आचार्य तोटक बने…ज्योर्तिमठ के देवता नर-नारायण माने गए हैं…साथ ही इस पीठ की आदिदेवी देवी पुन्नगिरी (पुण्य गिरि) को माना गया है…अलकनन्दा नदी को इसपीठ का मुख्य तीर्थ कहा जाता है….जो मुक्ति मोक्ष का क्षेत्र मानी जाती है…इस पीठ के संबंध जिस सम्प्रदाय से है उसे आनन्दवार कहते है…योगियों का वह सम्प्रदाय, जिसनेभोगों तथा विलासों का परित्याग कर दिया है,’आनन्दवार सम्प्रदाय’ कहलाता है..
आदिगुरू ने ना सिर्फ इन चार मठों की स्थापना कर धार्मिक सौहार्द का संदेश दिया… बल्कि संपूर्ण मानव जाति को जीवन मुक्ति का सिर्फ एक सूत्र दिया… और वो सूत्र था…‘दुर्जन: सज्जनो भूयात सज्जन: शांतिमाप्नुयात्।शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्त: चान्यान् विमोच्येत्॥’अर्थात दुर्जन सज्जन बनें, सज्जन शांति बनें। शांतजन बंधनों से मुक्त हों और मुक्त अन्य जनों को मुक्त करें।शंकराचार्य एक महान समन्वयवादी थे। उन्हें हिन्दू धर्म को पुनः स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है।शंकर के मायावाद पर महायान बौद्ध चिंतन का प्रभाव माना जाता है…इसीलिए उन्हें प्रछन्न बुद्ध भी कहा जाता है…
अपने अद्वैत चिंतन से सनातन हिंदू धर्म के दार्शनिक आधार में जान फूंकने के बाद इस दिव्यात्मा ने महज 34 साल की अल्पायु में पवित्र केदारनाथ धाम में अपने प्राण त्याग दिये…लेकिन छोटी सी उम्र में बालक शंकर से आदि गुरू शंकराचार्य बनने तक के जीवन सफर में उन्होंने जिस जीवन दर्शन की व्याख्या की… वो आज भी सनातन धर्म को मज़बूती प्रदान कर रहा है…उनको याद करते हुए सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है…श्रुतिस्मृतिपुराणानामालयं करुणालयम् ।नमामि भगवत्पादं शंकरं लोकशंकरम् ।।अर्थात… श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों में जिनका वास है वो करुणा के सागर हैं औसे भगवान शंकर को जो समस्त संसार का कल्याण करते हैं उनके पादपंकज को मैं प्रणाम करता हूं….

Posted in जीवन चरित्र

आदि शकराचार्य


ओम प्रकाश त्रेहन

आदि शंकराचार्य जी के पिता शिव गुरु जी तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे । उनके विवाह के कई वर्ष बाद भी उनकी से सन्तान नहीं हुई । उन्होंने अपनी पत्नी के साथ से संतान प्राप्ति के लिए कठोर साधना की। अंततः भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और कहा , ” वर मांगो “
शिव गुरु ने एक दीघ्र आयु वाला सर्वज्ञ पुत्र मांगा ।

भगवान शंकर ने कहा, दीघ्र आयु वाला सर्वज्ञ नही होगा और सर्वज्ञ दीघ्र आयु का नही होगा ।
तब धर्म प्रेमी शिव गुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की प्रार्थना की ।
भगवान शिवने पुनः कहा कि मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहां अवतीर्ण होऊंगा ।
वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी के दिन मध्यकाल में दिव्य प्रकाश रूप , अति सुंदर , दिव्य , कान्तियुक्त बालक ने जन्म लिया आदि शकराचार्य जी ने 3 वर्ष की आयु में संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया । पिता के असमय निधन होने पर भी मां ने अपने उत्तरदायित्व के निर्वाह में कोई कमी नही आने दी । 5 वर्ष की आयु में यज्ञोपावित के बाद गुरुकुल भेज दिया गया । 2 वर्ष के कम समय मे कई शास्त्र कंठस्त कर लिए ।
गुरु घर मे एक बार वह परंपरानुसार भिक्षा मांगने एक ब्राह्मण के घर गए , वहां खाने के लिए एक दाना भी नहीं था ब्राह्मण की पत्नी ने शंकर के हाथ मे एक आंवला रख कर अपनी गरीबी के बारे में बताया । इसकी ऐसी स्थिति देख कर शंकर का मन द्रवित हो उठा , तब द्रवित मन से उन्हों ने मां लक्ष्मी का स्तोत्र रच निर्धन ब्राह्मण की निर्धनता दूर कर ने की प्रार्थना की । उसकी प्रार्थना से घर सोने के आंवलो की वर्षा हुई
इनके बारे में एक विस्मयपूर्ण कथा आती है कि इनकी मां स्नान के लिए दूर पूर्णा नदी जाना पड़ता था लेकिन वह मार्ग बदल कर इनके घर के पास बहने लगी ।
बालक शंकर वैदिक ज्ञान की संपदा से कंठस्थ हो अब 7 वर्ष के हो गए , उन्होंने मां से सन्यास के लिए आज्ञा मांगी । मां द्वारा मना करने पर उदास हो गए । एक दिन वह गांव के तालाब में नहा रहे थे कि एक मगरमच्छ की पकड़ में आ गए। बालक शंकर चिल्लाए और कहने लगे मां मेरा जीवन समाप्त होने वाला है, में बच सकता हूँ अगर शेष जीवन के लिए सन्यास में जाने की मुझे अनुमति दे दो ।
अब मां के पास कोई भी अन्य विकल्प था। मां ने कहा कि तुम्हारे पिता जी नहीं रहे , मेरी मृत्य पर मुझे अग्नि कौन देगा । बालक शंकर ने मां को आश्वस्त किया कि मां में जहां भी हूंगा लेकिन ऐसे समय तुम्हारे पास ही होगा ।
मां की अनुमति मिलने पर बालक शंकर ने 7 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर घर छोड़ दिया ।
सात वर्षीय सन्यासी बालक शंकर ने अपने भारत के सदूर दक्षिण के केरल गांव कलाड़ी से भारत की विलुप्त होती सनातन धर्म की बहती धारा को पुनः प्रवाह देने के लिए अपनी आध्यात्मिक यात्रा के लिए पैदल निकल पड़े और नर्मदा नदी के तट पर ओंकारनाथ पहुंचे। वहां तीन वर्ष गुरु गोविंद पाद से योग शिक्षा और अद्वेत ज्ञान प्राप्त करने लगे । तत्पश्चात वह गुरु आज्ञा से वह कांशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े ।
जब वह कांशी जा रहे थे कि एक चांडाल मार्ग में आ गया, उन्होंने चंडाल को मार्ग से हटने को कहा। चांडाल ने उत्तर दिया कि मेरे अंदर भी वही परमात्मा है जो तुम्हारे अंदर है , फिर तुम किसे हटने को कह रहे हो ?
शंकर पीछे हटे और साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और कहा कि आपने जो मुझे ज्ञान दिया है, उससे आप मेरे गुरु हुए । शंकर की आध्यत्मिक चेतना से उन्हें शिव और चार देवो के दर्शन हुए ।
ब्रह्म और जीव मूल् में एक ही है इसमें जो अन्तर दिखाई देता है वह हमारा अज्ञान है । ज्ञान का यह अनुभव और उसकी अनुभूति शंकर को एक चांडाल से मिली ।
आदि शंकराचार्य के जीवन के एक महत्वपूर्ण घटना मंडन मिश्र से शास्त्रर्थ है । मंडन मिश्र की विद्वता की चर्चा सर्वत्र थी , यहां तक पिंजरे मे बन्द पालतू मैना भी संस्कृत बोलती थी । शास्त्रार्थ आरम्भ हुआ , आदि शंकराचार्य ने अपने तर्कों से पराजित कर ही दिया था तभी उनकी पत्नी भारती देवी बोली कि अभी आप की आधी विजय है , क्योंकि अभी आप ने आधे ही अंग को ही जीता है , मुझे हरा कर दिखाओ।
मंडन मिश्र की पत्नी ने ब्रह्मचारी आदिशंकराचार्य से कामशास्त्र पर प्रश्न पूछने आरम्भ कर दिए । वह भला कैसे उत्तर देते । आचार्य शंकर ने उत्तर देने की लिए समय मांगा ।
आचार्य ने तब एक मृत काया में प्रवेश किया और सारी अपेक्षित जानकारी के साथ अपने शरीर मे पुनः प्रवेश किया और मंडन मिश्र की पत्नी को उत्तर दिया और उन्हें पराजित किया । आचार्य शंकर ने सनातन धर्म की पुनः स्थापना के लिए अनेक शास्त्रार्थ और सम्पूर्ण भारत मे सनातन धर्म को शास्त्र सम्मत स्वरूप दिया ।
महर्षि वेदव्यास जानते थे कि कलयुग में लोगों के लिए स्मृति (स्मरण रखना) और श्रुति ( सुनना ) बहुत कठिन होगा इसीलिए सभी धर्म ग्रंथों को लिपिबद्ध किया ।
कलयुग के 2500 वर्ष बाद बुद्ध मत और जैन मत के प्रादुर्भाव से सनातन धर्म और उसके ग्रंथ लुप्त हो गए ।
तब आदि शंकराचार्य जी ने सम्पूर्ण भारत के बौद्धमत और जैन मत के धर्मचारियों को सनातन धर्म के तर्कों और तथ्यों से परास्त कर पुनः सनातन धर्म को स्थापित किया ।
भारत को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार कोनों में चार वेदों के लिए चार मठ स्थापित किया । हर मठ को एक वेद वाक्य के उदघोष से जोड़ा गया ।
भारत की आध्यात्मिक एकता का आधार है चार वेदों पर चार मठ।
आगे का विवरण अगली बार

Posted in जीवन चरित्र

हठयोग के आचार्य गुरु गोरखनाथ जी महाराज

हठयोग के आचार्य गुरु गोरखनाथ जी महाराज
गोरखनाथ या गोरक्षनाथ जी महाराज इस युग के साथ ही चारों युग के नाथ योगी थे। गुरु गोरखनाथ जी ने पूरे भारत का भ्रमण किया और अनेकों ग्रन्थों की रचना की। गोरखनाथ जी का मन्दिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर मे स्थित है। गोरखनाथ के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पडा है। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) थे। इन दोनों ने नाथ सम्प्रदाय को सुव्यवस्थित कर इसका विस्तार किया। इस सम्प्रदाय के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। गुरु गोरखनाथ हठयोग के आचार्य थे। कहा जाता है कि एक बार गोरखनाथ समाधि में लीन थे। इन्हें गहन समाधि में देखकर माँ पार्वती ने भगवान शिव से उनके बारे में पूछा। शिवजी बोले, लोगों को योग शिक्षा देने के लिए ही उन्होंने गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया है। इसलिए गोरखनाथ को शिव का अवतार भी माना जाता है।

इन्हें चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। इनके उपदेशों में योग और शैव तंत्रों का सामंजस्य है। ये नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखनाथ की लिखी गद्य-पद्य की चालीस रचनाओं का परिचय प्राप्त है। इनकी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को अधिक महत्व दिया है। गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात् समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है। गोरखनाथ के जीवन से सम्बंधित एक रोचक कथा इस प्रकार है- एक राजा की प्रिय रानी का स्वर्गवास हो गया। शोक के मारे राजा का बुरा हाल था। जीने की उसकी इच्छा ही समाप्त हो गई। वह भी रानी की चिता में जलने की तैयारी करने लगा। लोग समझा-बुझाकर थक गए पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। इतने में वहां गुरु गोरखनाथ आए। आते ही उन्होंने अपनी हांडी नीचे पटक दी और जोर-जोर से रोने लग गए। राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि वह तो अपनी रानी के लिए रो रहा है, पर गोरखनाथ जी क्यों रो रहे हैं। उसने गोरखनाथ के पास आकर पूछा, श्महाराज, आप क्यों रो रहे हैं?श् गोरखनाथ ने उसी
तरह रोते हुए कहा, श्क्या करूं? मेरा सर्वनाश हो गया। मेरी हांडी टूट गई है। मैं इसी में भिक्षा मांगकर खाता था। हांडी रे हांडी।श् इस पर राजा ने कहा, श्हांडी टूट गई तो इसमें रोने की क्या बात है? ये तो मिट्टी के बर्तन हैं। साधु होकर आप इसकी इतनी चिंता करते हैं।श् गोरखनाथ बोले, श्तुम मुझे समझा रहे हो। मैं तो रोकर काम चला रहा हूं तुम तो मरने के लिए तैयार बैठे हो।श् गोरखनाथ की बात का आशय समझकर राजा ने जान देने का विचार त्याग दिया। कहा जाता है कि राजकुमार बप्पा रावल जब किशोर अवस्था में अपने साथियों के साथ राजस्थान के जंगलों में शिकार करने के लिए गए थे, तब उन्होंने जंगल में संत गुरू गोरखनाथ को ध्यान में बैठे हुए पाया। बप्पा रावल ने संत के नजदीक ही रहना शुरू कर दिया और उनकी सेवा करते रहे। गोरखनाथ जी जब ध्यान से जागे तो बप्पा की सेवा से खुश होकर उन्हें एक तलवार दी जिसके बल पर ही चित्तौड़ राज्य की स्थापना हुई।

गोरखनाथ जी ने नेपाल और पाकिस्तान में भी योग साधना की। पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित गोरख पर्वत का विकास एक पर्यटन स्थल के रूप में किया जा रहा है। इसके निकट ही झेलम नदी के किनारे राँझा ने गोरखनाथ से योग दीक्षा ली थी। नेपाल में भी गोरखनाथ से सम्बंधित कई तीर्थ स्थल हैं। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर शहर का नाम गोरखनाथ जी के नाम पर ही पड़ा है। यहाँ पर स्थित गोरखनाथ जी का मंदिर दर्शनीय है। गुरु गोरखनाथ जी के नाम से ही नेपाल के गोरखाओं ने नाम पाया। नेपाल में एक जिला है गोरखा, उस जिले का नाम गोरखा भी इन्ही के नाम से पड़ा। माना जाता है कि गुरु गोरखनाथ सबसे पहले यही दिखे थें। गोरखा जिला में एक गुफा है जहाँ गोरखनाथ का पग चिन्ह है और उनकी एक मुर्ती भी है। यहाँ हर साल वैशाख पुर्णिमा को एक उत्सव मनाया जाता है जिसे रोट महोत्सव कहते है और यहाँ मेला भी लगता है। हिन्दू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों और मत-मतान्तरों में प्रमुख स्थान रखने वाले नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति आदिनाथ भगवान शिव द्वारा मानी जाती है। शिव से जो तत्वज्ञान मत्स्येन्द्र नाथ ने प्राप्त किया उसे ही शिष्य बन कर शिवावतार महायोगी गुरु गोरक्षनाथ ने ग्रहण किया

महाकालयोग शास्त्र में स्वयं शिव ने कहा है-श्अहमेवास्मि गोरक्षो मद्रूपं तन्निबोधत! योग-मार्ग प्रचाराय मयारूपमिदं धृतम्श्। भारतीय धर्म साधक-सम्प्रदायों की पतनोन्मुख और विकृत स्थिति के दौर में वामाचारी तांत्रिक साधना चरम पर थी। तब पंचमकारों का खुल कर प्रयोग होता था। भोगवाद शीर्ष पर था। ऐसे समय में महायोगी गोरक्षनाथ ने ब्रह्मचर्य प्रधान योगयुक्त ज्ञान का व्यापक प्रचार-प्रसार किया। उनका मानना था कि
सिद्धियों का प्रयोग सर्वजन हिताय के लिए ही होना चाहिए। उनके आचार सम्बन्धी उपदेश योग के सैद्धान्तिक अष्टांग योग की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक हैं। नाथ पंथी योगी महायोगी गुरु गोरक्षनाथ को चारों युगों में विद्यमान, अयोनिज, अमरकाय और सिद्ध महापुरुष मानते हैं। उन्होंने भारत के अलावा तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफगानिस्तान, नेपाल, सिंघल को अपने योग महाज्ञान से आलोकित किया। नाथ सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार गोरक्षनाथ सतयुग में पेशावर, त्रेता में गोरखपुर, द्वापर में हरमुज (द्वारिका) और कलियुग में गोरखमढ़ी (महाराष्ट्र) में आविभरूत हुए। जोधपुर नरेश महाराजा मानसिंह द्वारा विरचित श्श्रीनाथ तीर्थावलीश् के अनुसार प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह में कंकण बंधन गुरु गोरक्षनाथ की कृपा से ही हुआ था। यद्यपि वैदिक साधना के साथ समानान्तर रूप से प्रवाहित तांत्रिक साधना का समान रूप से शैव, शाक्त, जैन, वैष्णव आदि पर प्रभाव पड़ा, तथापि उनसे सदाचार के नियमों का पालन यथाविधि नहीं हो सकता। चतुर्दिक फैले हुए अनाचार को देख कर गोरखनाथ ने ब्रह्मचर्य प्रधान योगयुक्त ज्ञान का व्यापक प्रचार किया। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास को लिखना पड़ा- गोरख भगायो जोगु, भगति भगायो लोगु। भक्ति को भगाने वाले संबोधन से तात्पर्य कदाचित
साकारोपासना से है। गुरु गोरखनाथ की भक्ति मुख्य रूप से केवल गुरु तक सीमित है। उन्होंने भक्ति का कहीं विरोध नहीं किया। तुलसी दास के कथन से एक बात स्पष्ट है कि यदि गोरखनाथ जी न होते तो संत साहित्य न होता। गुरु गोरक्षनाथ और नाथ पंथ की योग साधना एवं क्रिया कलापों की प्रतिक्रिया ही सभी निगरुण एवं सगुणमार्गी सन्तों के साहित्य में स्पष्ट होती है। उस प्रतिक्रिया के प्रवाह में प्राचीन जातिवाद, वर्णाश्रम धर्म, अस्पृश्यता, ऊँचनीच का भेदभाव मिट गया। योग मार्ग के गुह्य सिद्धान्तों को साकार करके जन भाषा में व्यक्त एवं प्रचलित करना गोरखनाथ जी का समाज के प्रति सबसे बड़ा योगदान था। उनके विराट व्यक्तित्व के कारण ही अनेक भारतीय तथा अभारतीय सम्प्रदाय नाथ पंथ में अन्तर्मुक्त हो गए। उनके योग द्वारा सिद्धि की प्राप्ति संयमित जीवन और प्राणायाम से परिपक्व देह की प्राप्ति, अन्त में नादावस्था की स्थिति में दिव्य अनुभूति और सबसे समत्व का भाव आदि विशिष्टताओं ने तत्कालीन समाज एवं साधना पद्धतियों को अपने में लपेट लिया। यही कारण था कि जायसी ने गुरु गोरक्षनाथ की महिमा में कहा- श्जोगी सिद्ध होई तब जब गोरख सौ भेंटश्। कबीर ने भी गोरक्षनाथ जी की अमरता का वर्णन इस प्रकार किया- श्कांमणि अंग विरकत भया, रत भया हरि नाहि। साषी गोरखनाथ ज्यूं,अमर भये कलि माहिश्।। गोरखनाथ जी एवं नाथ सन्तों का ज्ञान किसी शास्त्र-पुराण नहीं अपितु सहज लोकानुभव और लोक व्यवहार का था, जिसे वह जी और भोग रहे थे क्योंकि ब्रह्मचर्य, आसन, प्राणायाम, मुद्राबन्ध, सिद्धावस्था के विविध अनुभव ऐसा कुछ भी नहीं जिसके व्यवहार को छोड़ कर शास्त्र का आधार लेना पड़े। उनका लोकानुभव यज्ञ और पण्डित, ऊंच-नीच आदि की विभाजक रेखा नहीं खींचता। वह मनुष्य मात्र के लिए है। गोरखनाथ जी द्वारा विर्निदिष्ट तत्वविचार तथा योग साधना को आज भी उसी रूप में समझा जा सकता है। नाथ सम्प्रदाय को गुरु गोरक्षनाथ ने भारतीय मनोवृत्त के अनुकूल बनाया। उसमें जहाँ एक ओर धर्म को विकृत करने वाली समस्त परम्परागत रूढि़यों का कठोरता से विरोध किया, वहीं सामान्य जन को अधिकाधिक संयम और सदाचार के अनुशासन में रख कर आध्यात्मिक अनुभूतियों के लिए योग मार्ग का प्रचार-प्रसार किया। उनकी साधना पद्धति का संयम एवं सदाचार से सम्बन्धित व्यावहारिक स्वरूप जन-जन मे ंइतना लोकप्रिय हो गया था कि विभिन्न धर्मावलम्बियों, मतावलम्बियों ने अपने धर्म एवं मत को लोकप्रिय बनाने के लिए नाथ पंथ की साधना का मनचाहा प्रयोग किया।नाथ पंथ की योग साधना आज भी प्रासंगिक है। विभिन्न प्रकार की सामाजिक-शारीरिक समस्याओं से मुक्ति दिलाने में सक्षम

Guru Gorakhnath ji (गुरु गोरखनाथ जी)

सिद्ध गोरक्षनाथ को प्रणाम
सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। कहा यह भी जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं।

गुरु गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी का मानते हैं। नाथ परम्परा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है।

गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। इनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर है। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखपंथी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं भगवान शिव को माना जाता है। शिव की परम्परा को सही रूप में आगे बढ़ाने वाले गुरु मत्स्येन्द्रनाथ हुए। ऐसा नाथ सम्प्रदाय में माना जाता है।

गोरखनाथ से पहले अनेक सम्प्रदाय थे, जिनका नाथ सम्प्रदाय में विलय हो गया। शैव एवं शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा वैष्णव योग मार्गी भी उनके सम्प्रदाय में आ मिले थे।

गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणीधान को अधिक महत्व दिया है। इनके माध्‍यम से ही उन्होंने हठयोग का उपदेश दिया। गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग करते थे।

जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठ‍िन (आड़े-त‍िरछे) आसनों का आविष्कार भी किया। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अ‍चम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि ‘यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।’

गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।

सिद्ध योगी : गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं :- चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव आदि। 13वीं सदी में इन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे।

नाथ सम्प्रदाय गुरु गोरखनाथ से भी पुराना है। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। पूर्व में इस समप्रदाय का विस्तार असम और उसके आसपास के इलाकों में ही ज्यादा रहा, बाद में समूचे प्राचीन भारत में इनके योग मठ स्थापित हुए। आगे चलकर यह सम्प्रदाय भी कई भागों में विभक्त होता चला गया।

गोरखनाथ जी की जानकारी
Om Siva Goraksa Yogi
गोरक्षनाथ जी
नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोरक्षनाथ जी के बारे में लिखित उल्लेख हमारे पुराणों में भी मिलते है। विभिन्न पुराणों में इससे संबंधित कथाएँ मिलती हैं। इसके साथ ही साथ बहुत सी पारंपरिक कथाएँ और किंवदंतियाँ भी समाज में प्रसारित है। उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, बंगाल, पश्चिमी भारत, सिंध तथा पंजाब में और भारत के बाहर नेपाल में भी ये कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसे ही कुछ आख्यानों का वर्णन यहाँ किया जा रहा हैं।

  1. गोरक्षनाथ जी के आध्यात्मिक जीवन की शुरूआत से संबंधित कथाएँ विभिन्न स्थानों में पाई जाती हैं। इनके गुरू के संबंध में विभिन्न मान्यताएँ हैं। परंतु सभी मान्यताएँ उनके दो गुरूऑ के होने के बारे में एकमत हैं। ये थे-आदिनाथ और मत्स्येंद्रनाथ। चूंकि गोरक्षनाथ जी के अनुयायी इन्हें एक दैवी पुरूष मानते थे, इसीलिये उन्होनें इनके जन्म स्थान तथा समय के बारे में जानकारी देने से हमेशा इन्कार किया। किंतु गोरक्षनाथ जी के भ्रमण से संबंधित बहुत से कथन उपलब्ध हैं। नेपालवासियों का मानना हैं कि काठमांडु में गोरक्षनाथ का आगमन पंजाब से या कम से कम नेपाल की सीमा के बाहर से ही हुआ था। ऐसी भी मान्यता है कि काठमांडु में पशुपतिनाथ के मंदिर के पास ही उनका निवास था। कहीं-कहीं इन्हें अवध का संत भी माना गया है।

4.वर्तमान मान्यता के अनुसार मत्स्येंद्रनाथ को श्री गोरक्षनाथ जी का गुरू कहा जाता है। कबीर गोरक्षनाथ की ‘गोरक्षनाथ जी की गोष्ठी ‘ में उन्होनें अपने आपको मत्स्येंद्रनाथ से पूर्ववर्ती योगी थे, किन्तु अब उन्हें और शिव को एक ही माना जाता है और इस नाम का प्रयोग भगवान शिव अर्थात् सर्वश्रेष्ठ योगी के संप्रदाय को उद्गम के संधान की कोशिश के अंतर्गत किया जाता है।

  1. गोरक्षनाथ के करीबी माने जाने वाले मत्स्येंद्रनाथ में मनुष्यों की दिलचस्पी ज्यादा रही हैं। उन्हें नेपाल के शासकों का अधिष्ठाता कुल गुरू माना जाता हैं। उन्हें बौद्ध संत (भिक्षु) भी माना गया है,जिन्होनें आर्यावलिकिटेश्वर के नाम से पदमपवाणि का अवतार लिया। उनके कुछ लीला स्थल नेपाल राज्य से बाहर के भी है और कहा जाता है लि भगवान बुद्ध के निर्देश पर वो नेपाल आये थे। ऐसा माना जाता है कि आर्यावलिकिटेश्वर पद्मपाणि बोधिसत्व ने शिव को योग की शिक्षा दी थी। उनकी आज्ञानुसार घर वापस लौटते समय समुद्र के तट पर शिव पार्वती को इसका ज्ञान दिया था। शिव के कथन के बीच पार्वती को नींद आ गयी, परन्तु मछली (मत्स्य) रूप धारण किये हुये लोकेश्वर ने इसे सुना। बाद में वहीं मत्स्येंद्रनाथ जी के नाम से जाने गये।
  2. एक अन्य मान्यता के अनुसार श्री गोरक्षनाथ जी के द्वारा आरोपित बारह वर्ष से चले आ रहे सूखे से नेपाल की रक्षा करने के लिये मत्स्येंद्रनाथ को असम के कपोतल पर्वत से बुलाया गया था।

7.एक मान्यता के अनुसार मत्स्येंद्रनाथ को हिंदू परंपरा का अंग माना गया है। सतयुग में उधोधर नामक एक परम सात्विक राजा थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनका दाह संस्कार किया गया परंतु उनकी नाभि अक्षत रही। उनके शरीर के उस अनजले अंग को नदी में प्रवाहित कर दिया गया, जिसे एक मछली ने अपना आहार बना लिया। तदोपरांत उसी मछ्ली के उदर से मत्स्येंद्रनाथ का जन्म हुआ। अपने पूर्व जन्म के पुण्य के फल के अनुसार वो इस जन्म में एक महान संत बने।

8.एक और मान्यता के अनुसार एक बार मत्स्येंद्रनाथ लंका गये और वहां की महारानी के प्रति आसक्त हो गये। जब गोरक्षनाथ जी ने अपने गुरु के इस अधोपतन के बारे में सुना तो वह उसकी तलाश मे लंका पहुँचे। उन्होंने मत्स्येंद्रनाथ को राज दरबार में पाया और उनसे जवाब मांगा । मत्स्येंद्रनाथ ने रानी को त्याग दिया,परंतु रानी से उत्पन्न अपने दोनों पुत्रों को साथ ले लिया। वही पुत्र आगे चलकर पारसनाथ और नीमनाथ के नाम से जाने गये,जिन्होंने जैन धर्म की स्थापना की।

9.एक नेपाली मान्यता के अनुसार, मत्स्येंद्रनाथ ने अपनी योग शक्ति के बल पर अपने शरीर का त्याग कर उसे अपने शिष्य गोरक्षनाथ की देखरेख में छोड़ दिया और तुरंत ही मृत्यु को प्राप्त हुए और एक राजा के शरीर में प्रवेश किया। इस अवस्था में मत्स्येंद्रनाथ को लोभ हो आया। भाग्यवश अपने गुरु के शरीर को देखरेख कर रहे गोरक्षनाथ जी उन्हें चेतन अवस्था में वापस लाये और उनके गुरु अपने शरीर में वापस लौट आयें।

आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र