Posted in छोटी कहानिया - Chooti Kahaniya

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कहानी बड़ी है लेकिन पूरा पढियेगा जरूर मुझे पूरा विश्वास है कि आपको यह पसन्द जरूर आयेगी ।

एक घर के करीब से गुज़र रहा था अचानक मुझे घर के अंदर से एक दस साल के बच्चे की रोने की आवाज़ आई – आवाज़ में इतना दर्द था कि अंदर जा कर बच्चा क्यों रो रहा है यह मालूम करने से मैं खुद को रोक ना सका – अंदर जा कर मैने देखा कि माँ अपने बेटे को धीरे से मारती और बच्चे के साथ खुद भी रोने लगती – मै ने आगे हो कर पूछा ऑन्टी क्यों बच्चे को मार रही हो जबकि खुद भी रोती हो….. उसने जवाब दिया की आप तो जानते ही होंगे कि इसके पिताजी का देहांत हो गया है। हम बहुत गरीब हैं। उनके जाने के बाद मैं फैक्ट्री में मजदूरी करके घर और इसके पढ़ाई का खर्च बहुत कठिनाई के साथ उठाती हूँ यह  देर से स्कूल जाता है और देर से घर आता है – जाते हुए रास्ते मे कहीं खेल कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ ज़रा भी ध्यान नहीं देता है जिसकी वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की यूनिफार्म गन्दी कर लेता है – मै ने बच्चे और उसकी माँ को थोड़ा समझाया और चल दिया…..
कुछ दिन ही बीते थे…एक दिन सुबह सुबह कुछ काम से सब्जी मंडी गया – तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था – क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उनसे कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती वह बच्चा उसे फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता – मै यह माजरा देख कर परेशान हो रहा था कि चक्कर क्या है – मै उस बच्चे को चोरी चोरी फॉलो करने लगा – जब उसकी झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठ कर उसे ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा कर बेचने लगा – मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी , ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ कि अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिसकी दुकान के सामने उस बच्चे ने अपनी नन्ही सी दुकान लगाई थी , उसने आते ही एक जोरदार धक्का मार कर उस नन्ही दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाज़ुओं से पकड़ कर उस बच्चे को भी उठा कर धक्का दे दिया – वह बच्चा आंखों में आंसू लिए चुप चाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी एक दूसरे दुकान के सामने डरते डरते लगा ली – भला हो उस दुकानदार का जिसकी दुकान के सामने इस बार उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस ने बच्चे को कुछ नहीं कहा – थोड़ी सी सब्ज़ी थी ऊपर से दूसरी दुकानों से कम कीमत की थी इसलिए जल्द ही बिक गयी और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाले की दुकान में घुस गया और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की ओर चल पड़ा । कौतूहल वश मैं भी उसके पीछे पीछे चल रहा था – बच्चे ने रास्ते में अपना मुंह धोया और स्कूल चल दिया – मै भी उसके पीछे स्कूल चला गया – जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा लेट हो चुका था – जिस पर अध्यापक जी ने डंडे से उसे खूब मारा – मैने जल्दी से जाकर अध्यापक जी को मना किया कि छोटा बच्चा है इसे मत मारो – अध्यापक कहने लगे कि यह रोज़ाना एक डेढ़ घण्टे लेट से ही आता है मै रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल समय पर आए और कई बार मै इसके घर पर भी सुचना दे चुका हूं – खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा – मैने उसके शिक्षक का मोबाइल नम्बर लिया और घर की ओर चल दिया घर पहुंच कर ज्ञात हुआ कि जिस कार्य के लिए मैं सब्ज़ी मंडी गया था उसको तो भूल ही गया। दूसरी ओर बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई – सारी रात मेरा सर चकराता रहा  – सुबह उठकर जल्दी से तैयार हुआ और ईश्वर की आराधना के उपरांत शिक्षक महोदय को मोबाइल पर फोन कर कहा कि हर हालत में तुरंत सब्जीमंडी पहुंचें। शिक्षक महोदय ने मेरे अनुरोध को स्वीकार किया। बच्चे का स्कूल जाने का समय हुआ और बच्चा घर से सीधा सब्जीमंडी अपनी नन्ही सी दुकान की व्यवस्था करने चल पड़ा। मै ने उसके घर जाकर उसकी माँ को कहा कि ऑन्टी आप मेरे साथ चलो मै तुम्हे बताता हूँ आप का बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है – वह फौरन मेरे साथ क्रोध मे यह बड़बड़ाते हुए चल पड़ीं कि आज उस लड़के को छोडूंगी नहीं उसे आज बहुत मार मारूंगी। मंडी में बच्चे के शिक्षक भी आ चुके थे। हम तीनों सब्जीमंडी के एक स्थान पर आड़ लेकर खड़े हो गए जहाँ से उस बच्चे को देखा जा सकता था लेकिन वो हमें नहीं और उस लड़के को छुप कर देखने लगे। प्रतिदिन की भाँति उसको आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया। मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो देखता हूँ कि वो बहुत ही दर्द भरी सिसकियां लेकर रो रही थी। मै ने स्कूल के अध्यापक जी की ओर देखा तो बहुत करुणा के साथ उनके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने बहुत बड़ा  अपराध किया हो और आज उन को अपनी गलती का पछतावा हो रहा हो। मैंने दोनों को सांत्वना देते हुए वहां से विदा किया। उसकी माँ रोते रोते घर चली गयी और अध्यापक जी भी सजल नेत्रों के साथ स्कूल चले गए। पूर्व की भाँति बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने कपडे देते हुए कहा कि बेटा आज कपड़ों के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। बच्चे ने उन कपड़ों को पकड़ कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया – आज भी एक घंटा लेट था वह सीधा आचार्य जी के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए अपने हाथ आगे कर दिए कि शिक्षक डंडे से उसे मार ले। आचार्य अपनी कुर्सी से उठे और बच्चे को गले लगाकर सुबक पड़े कि मैं भी देख कर अपने आंसुओं पर नियंत्रण ना रख सका। मै ने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में कपडे हैं वो है वह किसके लिए है – बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ फैक्ट्री में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं। कोई कपडा सही ढंग से तन ढांपने वाला नहीं और और हमारे माँ के पास पैसे नही हैं इसलिये इस दिवाली पर अपने माँ के लिए यह सलवार कमीज का कपडा खरीदा है। मैंने बच्चे से पूछा तो यह कपडा अब घर ले जाकर माँ को दोगे ? परंतु उसके उत्तर ने मेरे और उस बच्चे के शिक्षक के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी…. बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास जमा किये हैं ।

…. आचार्य जी और मैं यह सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों और विधवाओं के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे होली-दिवाली जैसी खुशियों को मानाने के लिए कठोर परीक्षाओं का परिश्रम के साथ सामना करते रहेंगे आखिर कब तक!

क्या ईश्वर ने इन जैसे गरीब अनाथ बच्चों और विधवाओं को त्योहारों को प्रसनन्ता के साथ मनाने का कोई हक नहीं दिया? क्या हम चन्द रुपयों का मन्दिर में चढ़ावा या दान दे कर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से हट सकते हैं?
क्या हम अपनी खुशियों के अवसरों पर अपनी व्यर्थ की इच्छाओं को कम कर थोड़े पैसे, थोड़ी खुशियां उनके साथ नहीं बाँट सकते?!!!
सोचना ज़रूर ।

अगर आपको अच्छा लगा हो तो शेयर जरूर करे ।

अभिषेक अग्रवाल

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माँ आज दादा जी के पास किसी को सुला देना , अकेले नहीं सोने देना ,कोई नहीं सोये तो मुझे बता देना ,मैं सो जाऊँगा।”

पंकज ने माँ से अपनी इच्छा व्यक्त की । माँ भी चौंक गयी । आखिर आज क्या बात है ,पंकज दादा जी की इतनी चिंता कर रहा है । माँ से रहा नहीं गया । आखिर माँ ने पूछ ही लिया ।

” पंकज आज क्या बात है , तू दादा जी की बहुत चिंता कर रहा है । इससे पहले तूने कभी ये चिंता व्यक्त नहीं की ।”

“माँ ,मैं भले ही अभी पढ़ाई में व्यस्त हूँ ,लेकिन पापा और दादा जी की बातें सुनता रहता हूँ । कभी प्याज का लागत मूल्य भी नहीं निकला ,कभी सोयाबीन गल गयी । कभी गेंहू को ओलों ने बर्बाद कर दिया । कभी टमाटर और आलू की बम्फर पैदावार होने से उनके भाव दो रुपया किलो तक गिर गए ।”

“ये तो किसानी की बातें हैं इससे तुझे क्यों हैरानी हो रही है, पंकज” माँ ने पंकज को समझाने की कोशिस की।

” माँ जब से पड़ोसी प्रदेश में किसानों की मौत और एक- एक करोड़ की राशि देने की घोषणा हुई है ,अखबार की खबर को दादा जी कई बार पढ़ते हैं और अखबार सिरहाने रखे हैं । कहते है , अब मेरी जरूरत क्या है घर को ? घर का कर्ज ही उतार कर जाना चाहता हूँ ”

माँ दौड़ कर गयी और दादा जी के सिरहाने से अखबार खीच लायी । दादा जी को एकांत अकेले कमरे से बाहर ला ड्राइंग रूम में बैठा दिया ,जहां चहल पहल थी ।

Copied

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🙏 *प्रणाम का महत्व* 🙏

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महाभारत का युद्ध चल रहा था –

एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर “भीष्म पितामह” घोषणा कर देते हैं कि –
“मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा”
उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई –
भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|
तब –
श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो –
श्री कृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए –
शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि – अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो –
द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने – 

“अखंड सौभाग्यवती भव” का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!
“वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो, क्या तुमको श्री कृष्ण यहाँ लेकर आये है” ?
तब द्रोपदी ने कहा कि –
“हां और वे कक्ष के बाहर खड़े हैं” तब भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया –
भीष्म ने कहा –
“मेरे एक वचन को मेरे ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते है”
शिविर से वापस लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि –
*”तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है “* –
*” अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, आदि को प्रणाम करती होती और दुर्योधन- दुःशासन, आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंती, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती “* –

……तात्पर्य्……
वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याए हैं उनका भी मूल कारण यही है कि –
*”जाने अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है “*
*” यदि घर के बच्चे और बहुएँ प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर में कभी कोई क्लेश न हो “*
बड़ों के दिए आशीर्वाद कवच की तरह काम करते हैं उनको कोई “अस्त्र-शस्त्र” नहीं भेद सकता –
“निवेदन 🙏 सभी इस संस्कृति को सुनिश्चित कर नियमबद्ध करें तो घर स्वर्ग बन जाय।”
*क्योंकि*:-
*प्रणाम प्रेम है।*

*प्रणाम अनुशासन है।*

प्रणाम शीतलता है।              

प्रणाम आदर सिखाता है।

*प्रणाम से सुविचार आते है।*

प्रणाम झुकना सिखाता है।

प्रणाम क्रोध मिटाता है।

प्रणाम आँसू धो देता है।

*प्रणाम अहंकार मिटाता है।*

*प्रणाम हमारी संस्कृति है।*
        🙏🙏🙏

    

🙏 *सबको प्रणाम*  🙏

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डा. मार्क एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट हैं, एक बार किसी सम्मेलन में भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे। वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य  के लिए पुरुस्कृत किया जाना था। वे बड़े उत्साहित थे व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी। बड़ा उतावलापन था, उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।

 उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई, जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे, इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए। उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है। टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।

 जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया। रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए। लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे, भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे। कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।

 झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी। परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया। एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला। डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है। फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए। मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर, आगे चले जाना।

 भूखे, भीगे और थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी। उस औरत ने उन्हें बिठाया, बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया। साथ ही उसने कहा, “आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें और उनका धन्यवाद कर दें।”

 डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,”मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता। मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं। आप अपनी प्रार्थना कर लें।” 

 टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी। उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो, इस स्त्री को कुछ समस्या है। जैसे ही वह औरत अपने पूजा के स्थान से उठी, तो डाक्टर ने पूछा,”आपको भगवान से क्या चाहिेए? क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?”

 उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,”ये मेरा लड़का है और इसको एक रोग है जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैंं उन तक, उनके शहर जा सकूं क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं। यह सच है की कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है कि भगवान एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे। वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे। वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।”

 डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए। वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए। आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,”भगवान बहुत महान हैं।” 

 (उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था। कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी। कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)

 वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था बल्कि भगवान उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे कि वे भौतिक जीवन में धन कमाने, प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें। वे समझ गए की भगवान चाहते हैं कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है।

मित्रों:- हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है की जो हो रहा है वो उस पर उसका कण्ट्रोल है और वह इन्सान ही सब कुछ कर रहा है ।।

पर अचानक ही कोई अनजानी ताकत सबकुछ बदल देती है कुछ ही सेकण्ड्स लगते हैं सबकुछ बदल जाने में फिर हम याद करते हैं भगबान को।
लष्मीकांत वर्शनय

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पंडित जी और नाविक की कहानी।
आज गंगा पार होनेके लिए कई लोग एक नौकामें बैठे, धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी,एक पंडित जी भी उसमें सवार थे। पंडित जी ने नाविक से पूछा “क्या तुमने भूगोल पढ़ी है 
भोला- भाला नाविक बोला “भूगोल क्या है इसका मुझे कुछ पता नहीं।
पंडितजी ने पंडिताई का प्रदर्शन करते कहा, “तुम्हारी पाव भर जिंदगी पानी में गई।
फिर पंडित जी ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या इतिहास जानते हो? महारानी लक्ष्मीबाई कब और कहाँ हुई तथा उन्होंने कैसे लडाई की
नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो  पंडित जी ने विजयीमुद्रा में कहा “ ये भी नहीं जानते तुम्हारी तो आधी जिंदगी पानी में गई।
फिर विद्या के मद में पंडित जी ने तीसरा प्रश्न पूछा “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण का केवट और भगवान श्रीराम का संवाद जानते हो 
अनपढ़ नाविक क्या कहे, उसने इशारे में ना कहा, तब पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले “तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।
तभी अचानक गंगा में प्रवाह तीव्र होने लगा। नाविक ने सभी को तूफान की चेतावनी दी, और पंडितजी से पूछा “नौका तो तूफान में डूब सकती है, क्या आपको तैरना आता है
पंडित जी गभराहट में बोले “मुझे तो तैरना-वैरना नहीं आता है 
नाविक ने स्थिति भांपते हुए कहा ,“तब तो समझो आपकी पूरी जिंदगी पानी में गयी। ”
कुछ ही देर में नौका पलट गई। और पंडित जी बह गए।
मित्रों ,विद्या वाद-विवाद के लिए नहीं है और ना ही दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है। लेकिन कभी-कभी ज्ञान के अभिमान में कुछ लोग इस बात को भूल जाते हैं और दूसरों का अपमान कर बैठते हैं। याद रखिये शाश्त्रों का ज्ञान समस्याओं के समाधान में प्रयोग होना चाहिए शश्त्र बना कर हिंसा करने के लिए नहीं।
कहा भी गया है, जो पेड़ फलों से लदा होता है उसकी डालियाँ झुक जाती हैं। धन प्राप्ति होने पर सज्जनों में शालीनता आ जाती है। इसी तरह , विद्या जब विनयी के पास आती है तो वह शोभित हो जाती है। इसीलिए संस्कृत में कहा गया है , ‘विद्या विनयेन शोभते। ’

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✨दिल को छूने वाली कहानी- भगवान आज तो भोजन दे दो✨
हम उस समय गंगा अपार्टमेंट बस स्टैंड गुड़गांव के पास रहते थे, मेरी नाईट शिफ़्ट होती है, मैं सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल हूँ, अक्सर घर से ही अमेरिकन MNC के लिए काम करती हूँ, रात को पौने दस पर मुझे एलर्जी हो गयी और घर पर दवाई नहीं थी, ड्राईवर भी अपने घर जा चुका था और बाहर हल्की बारिश की बूंदे जुलाई महीने के कारण बरस रही थी। दवा की दुकान ज्यादा दूर नहीं थी पैदल जा सकते थे लेकिन बारिश की वज़ह से मैंने रिक्शा लेना उचित समझा। बगल में राम मन्दिर बन रहा था एक रिक्शा वाला भगवान की प्रार्थना कर रहा था। मैंने उससे पूंछा चलोगे तो उसने सहमति में सर हिलाया और हम बैठ गए। काफ़ी बीमार लग रहा था और उसकी आँखों में आँशु भी थे। 
मैंने पूंछा क्या हुआ भैया रो क्यूँ रहे हो और तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं लग रही, उसने बताया बारिश की वजह से तीन दिन से सवारी नहीं मिली और वह भूखा है बदन दर्द कर रहा है, अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा था क़ि मुझे आज भोजन दे दो, मेरे रिक्शे के लिए सवारी भेज दो।
मैं बिना कुछ बोले रिक्शा रोककर दवा की दूकान पर चली गयी, खड़े खड़े सोच रही थी कहीं मुझे भगवान ने तो इसकी मदद के लिए नहीं भेजा। क्योंकि यदि यही एलर्जी आधे घण्टे पहले उठती तो मैं ड्राइवर से दवा मंगाती, रात को बाहर निकलने की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं थी, और पानी न बरसता तो रिक्शे पर भी न बैठती। मन ही मन गुरुदेव को याद किया और कहा मुझे बताइये क्या आपने रिक्शे वाले की मदद के लिए भेजा है। मन में जवाब मिला हाँ। मैंने गुरुदेव को धन्यवाद् दिया, अपनी दवाई के साथ क्रोसीन की टेबलेट भी ली, बगल की दुकान से छोले भटूरे ख़रीदे और रिक्शे पर आकर बैठ गयी। जिस मन्दिर के पास से रिक्शा लिया था वहीँ पहुंचने पर मैंने रिक्शा रोकने को कहा। 
उसके हाथ में रिक्शे के 20 रुपये दिए, गर्म छोले भटूरे दिए और दवा देकर बोली। खाना खा के ये दवा खा लेना, एक गोली आज और एक कल। मन्दिर में नीचे सो जाना। 
वो रोते हुए बोला, मैंने तो भगवान से दो रोटी मांगी थी मग़र भगवान ने तो मुझे छोले भटूरे दे दिए। कई महीनों से इसे खाने की  इच्छा थी। आज भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली।और जो मन्दिर के पास उसका बन्दा रहता था उसको मेरी मदद के लिए भेज दिया। कई बातें वो बोलता रहा और मैं स्तब्ध हो सुनती रही।
घर आकर सोचा क़ि उस मिठाई की दुकान में बहुत सारी चीज़े थीं, मैं कुछ और भी ले सकती थी समोसा या खाने की थाली पर मैंने छोले भटूरे ही क्यों लिए? क्या भगवान ने मुझे रात को अपने भक्त की मदद के लिए भेजा था? 
हम जब किसी की मदद करने सही वक्त पर पहुँचते हैं तो इसका मतलब उस व्यक्ति की भगवान ने प्रार्थना सुन ली और आपको अपना प्रतिनिधि बना, देवदूत बना उसकी मदद के लिए भेज दिया।

NOTE यह कहानी दूसरे ग्रुप की है अच्छी लगी तो शेयर कर रहा हूँ..  🙏🏻

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एक था राजा।

उसने एक तोता पाला था। 

एक दिन तोता मर गया। 

राजाने मंत्री को कहा: मंत्रीप्रवर! हमारा तोते का पिंजरा सूना हो गया है।

इसमें पालने के लिए एक तोता लाओ। 

अब, तोते सदैव तो मिलते नहीं। 

लेकिन राजा पीछे पड़ गये तो मंत्री एक संत के पास गये और कहा: भगवन्! राजा साहब एक तोता लाने की जिद कर रहे हैं। आप अपना तोता दे दें तो बड़ी कृपा होगी। 
संत ने कहा: ठीक है, ले जाओ। 
राजा ने सोने के पिंजरे में बड़े स्नेह से तोते की सुख-सुविधा का प्रबन्ध किया।

ब्रह्ममुहूर्त होते ही तोता बोलने लगता: ओम् तत्सत्….ओम् तत्सत् … उठो राजा! उठो महारानी! दुर्लभ मानव-तन मिला है। यह सोने के लिए नहीं, भजन करने के लिए मिला है। 
‘चित्रकूट के घाट पर ,

भई संतन की भीर।

तुलसीदास चंदन घिसै, 

तिलक देत रघुबीर।।’
कभी रामायण की चौपाई तो कभी गीता के श्लोक तोते के मुँह से निकलते। 
पूरा राजपरिवार बड़े सवेरे उठकर उसकी बातें सुना करता था। 
राजा कहते थे कि सुग्गा क्या मिला, एक संत मिल गये।
हर जीव की एक निश्चित आयु होती है। 

एक दिन वह सुग्गा मर गया। राजा, रानी, राजपरिवार और पूरे राष्ट्र ने हफ़्तों शोक मनाया। झण्डा झुका दिया गया। 

किसी प्रकार राजपरिवार ने शोक संवरण किया और राजकाज में लग गये।
पुनः राजा साहब ने कहा– मंत्रीवर! खाली पिंजरा सूना-सूना लगता है, एक तोते की व्यवस्था हो जाती!
मंत्री ने इधर-उधर देखा, एक कसाई के यहाँ वैसा ही तोता एक पिंजरे में टँगा था।
मंत्री ने कसाई से कहा कि इसे राजा साहब चाहते हैं।
कसाई ने कहा कि आपके राज्य में ही तो हम रहते हैं। हम नहीं देंगे तब भी आप उठा ही ले जायेंगे। 
मंत्री ने कहा– नहीं, हम तो प्रार्थना करेंगे। 

कसाई ने बताया कि किसी बहेलिये ने एक वृक्ष से दो सुग्गे पकड़े थे। एक को उसने महात्माजी को दे दिया था और दूसरा मैंने खरीद लिया था।

राजा को चाहिये तो आप ले जायँ।
अब कसाईवाला तोता राजा के पिंजरे में पहुँच गया।
राजपरिवार बहुत प्रसन्न हुआ।
सबको लगा कि वही तोता जीवित होकर चला आया है। दोनों की नासिका, पंख, आकार, चितवन सब एक जैसे थे। 

………लेकिन बड़े सवेरे तोता उसी प्रकार राजा को बुलाने लगा जैसे वह कसाई अपने नौकरों को उठाता था कि -उठ! हरामी के बच्चे! राजा बन बैठा है। मेरे लिए ला अण्डे, नहीं तो पड़ेंगे डण्डे! 
राजा को इतना क्रोध आया कि उसने तोते को पिंजरे से निकाला और गर्दन मरोड़कर किले से बाहर फेंक दिया।
दोनों तोते सगे भाई थे। एक की गर्दन मरोड़ दी गयी, तो दूसरे के लिए झण्डे झुक गये, भण्डारा किया गया, शोक मनाया गया।
आखिर भूल कहाँ हो गयी?

अन्तर था तो संगति का!

सत्संग की कमी थी।
‘संगत ही गुण होत है

, संगत ही गुण जाय।

बाँस फाँस अरु मीसरी, 

एकै भाव बिकाय।।’
सत्य क्या है और असत्य क्या है?

उस सत्य की संगति कैसे करें?
‘पूरा सद्गुरु ना मिला, 

मिली न सच्ची सीख।

भेष जती का बनाय के, 

घर-घर माँगे भीख।।’

 रामचंडी आर्य