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🧟‍♀ कामवाली बाई🧟‍♀
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सच्ची घटना पर आधारित यह बात कुछ दिनों पुरानी है, जब स्कूल बस की हड़ताल चल रही थी।

मेरे मिस्टर अपने व्यवसाय की एक आवश्यक मीटिंग में बिजी थे इसलिए मेरे 5 साल के बेटे को स्कूल से लाने के लिए मुझे टू-व्हीलर पर जाना पड़ा।

जब मैं टू व्हीलर से घर की ओर वापस आ रही थी, तब अचानक रास्ते में मेरा बैलेंस बिगड़ा और मैं एवं मेरा बेटा हम दोनों गाड़ी सहित नीचे गिर गए।

मेरे शरीर पर कई खरोंच आए लेकिन प्रभु की कृपा से मेरे बेटे को कहीं खरोंच तक नहीं आई ।

हमें नीचे गिरा देखकर आसपास के कुछ लोग इकट्ठे हो गए और उन्होंने हमारी मदद करना चाही।

तभी मेरी कामवाली बाई राधा ने मुझे दूर से ही देख लिया और वह दौड़ी चली आई।

उसने मुझे सहारा देकर खड़ा किया, और अपने एक परिचित से मेरी गाड़ी एक दुकान पर खड़ी करवा दी।

वह मुझे कंधे का सहारा देकर अपने घर ले गई जो पास में ही था।

जैसे ही हम घर पहुंचे वैसे ही राधा के दोनों बच्चे हमारे पास आ गए।

राधा ने अपने पल्लू से बंधा हुआ 50 का नोट निकाला और अपने बेटे राजू को दूध ,बैंडेज एवं एंटीसेप्टिक क्रीम लेने के लिए भेजा तथा अपनी बेटी रानी को पानी गर्म करने का बोला। उसने मुझे कुर्सी पर बिठाया तथा मटके का ठंडा जल पिलाया। इतने में पानी गर्म हो गया था।

वह मुझे लेकर बाथरूम में गई और वहां पर उसने मेरे सारे जख्मों को गर्म पानी से अच्छी तरह से धोकर साफ किए और बाद में वह उठकर बाहर गई ।

वहां से वह एक नया टावेल और एक नया गाउन मेरे लिए लेकर आई।

उसने टावेल से मेरा पूरा बदन पोंछ तथा जहां आवश्यक था वहां बैंडेज लगाई। साथ ही जहां मामूली चोट पर एंटीसेप्टिक क्रीम लगाया।

अब मुझे कुछ राहत महसूस हो रही थी।

उसने मुझे पहनने के लिए नया गाउन दिया वह बोली “यह गाउन मैंने कुछ दिन पहले ही खरीदा था लेकिन आज तक नहीं पहना मैडम आप यही पहन लीजिए तथा थोड़ी देर आप रेस्ट कर लीजिए। ”

“आपके कपड़े बहुत गंदे हो रहे हैं हम इन्हें धो कर सुखा देंगे फिर आप अपने कपड़े बदल लेना।”

मेरे पास कोई चॉइस नहीं थी । मैं गाउन पहनकर बाथरुम से बाहर आई।

उसने झटपट अलमारी में से एक नया चद्दर निकाल और पलंग पर बिछाकर बोली आप थोड़ी देर यहीं आराम कीजिए।

इतने मैं बिटिया ने दूध भी गर्म कर दिया था।

राधा ने दूध में दो चम्मच हल्दी मिलाई और मुझे पीने को दिया और बड़े विश्वास से कहा मैडम आप यह दूध पी लीजिए आपके सारे जख्म भर जाएंगे।

लेकिन अब मेरा ध्यान तन पर था ही नहीं बल्कि मेरे अपने मन पर था

मेरे मन के सारे जख्म एक एक कर के हरे हो रहे थे।।मैं सोच रही थी “कहां मैं और कहां यह राधा?

जिस राधा को मैं फटे पुराने कपड़े देती थी, उसने आज मुझे नया टावेल दिया, नया गाउन दिया और मेरे लिए नई बेडशीट लगाई। धन्य है यह राधा

एक तरफ मेरे दिमाग में यह सब चल रहा था तब दूसरी तरफ राधा गरम गरम चपाती और आलू की सब्जी बना रही थी।
थोड़ी देर मे वह थाली लगाकर ले आई। वह बोली “आप और बेटा दोनों खाना खा लीजिए।”

राधा को मालूम था कि मेरा बेटा आलू की सब्जी ही पसंद करता है और उसे गरम गरम रोटी चाहिए। इसलिए उसने रानी से तैयार करवा दी थी।

रानी बड़े प्यार से मेरे बेटे को आलू की सब्जी और रोटी खिला रही थी और मैं इधर प्रायश्चित की आग में जल रही थीसोच रही थी कि जब भी इसका बेटा राजू मेरे घर आता था मैं उसे एक तरफ बिठा देती थी, उसको नफरत से देखती थी और इन लोगों के मन में हमारे प्रति कितना प्रेम है

यह सब सोच सोच कर मैं आत्मग्लानि से भरी जा रही थी। मेरा मन दुख और पश्चाताप से भर गया था।

तभी मेरी नज़र राजू के पैरों पर गई जो लंगड़ा कर चल रहा था।

मैंने राधा से पूछा “राधा इसके पैर को क्या हो गया तुमने इलाज नहीं करवाया ?”
राधा ने बड़े दुख भरे शब्दों में कहा मैडम इसके पैर का ऑपरेशन करवाना है जिसका खर्च करीबन ₹ 10000 रुपए है।

मैंने और राजू के पापा ने रात दिन मेहनत कर के ₹5000 तो जोड़ लिए हैं ₹5000 की और आवश्यकता है। हमने बहुत कोशिश की लेकिन कहीं से मिल नहीं सके ।

ठीक है, भगवान का भरोसा है, जब आएंगे तब इलाज हो जाएगा। फिर हम लोग कर ही क्या सकते हैं?
तभी मुझे ख्याल आया कि राधा ने एक बार मुझसे ₹5000 अग्रिम मांगे थे और मैंने बहाना बनाकर मना कर दिया था।

आज वही राधा अपने पल्लू में बंधे सारे रुपए हम पर खर्च कर के खुश थी और हम उसको, पैसे होते हुए भी मुकर गए थे और सोच रहे थे कि बला टली।

आज मुझे पता चला कि उस वक्त इन लोगों को पैसों की कितनी सख्त आवश्यकता थी।

मैं अपनी ही नजरों में गिरती ही चली जा रही थी।

अब मुझे अपने शारीरिक जख्मों की चिंता बिल्कुल नहीं थी बल्कि उन जख्मों की चिंता थी जो मेरी आत्मा को मैंने ही लगाए थे। मैंने दृढ़ निश्चय किया कि जो हुआ सो हुआ लेकिन आगे जो होगा वह सर्वश्रेष्ठ ही होगा।

मैंने उसी वक्त राधा के घर में जिन जिन चीजों का अभाव था उसकी एक लिस्ट अपने दिमाग में तैयार की। थोड़ी देर में मैं लगभग ठीक हो गई।

मैंने अपने कपड़े चेंज किए लेकिन वह गाउन मैंने अपने पास ही रखा और राधा को बोला “यह गाऊन अब तुम्हें कभी भी नहीं दूंगी यह गाऊन मेरी जिंदगी का सबसे अमूल्य तोहफा है।”

राधा बोली मैडम यह तो बहुत हल्की रेंज का है। राधा की बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं घर आ गई लेकिन रात भर सो नहीं पाई ।

मैंने अपनी सहेली के मिस्टर, जो की हड्डी रोग विशेषज्ञ थे, उनसे राजू के लिए अगले दिन का अपॉइंटमेंट लिया। दूसरे दिन मेरी किटी पार्टी भी थी । लेकिन मैंने वह पार्टी कैंसिल कर दी और राधा की जरूरत का सारा सामान खरीदा और वह सामान लेकर में राधा के घर पहुंच गई।

राधा समझ ही नहीं पा रही थी कि इतना सारा सामान एक साथ में उसके घर मै क्यों लेकर गई।

मैंने धीरे से उसको पास में बिठाया और बोला मुझे मैडम मत कहो मुझे अपनी बहन ही समझो यह सारा सामान मैं तुम्हारे लिए नहीं लाई हूं मेरे इन दोनों प्यारे बच्चों के लिए लाई हूं और हां मैंने राजू के लिए एक अच्छे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया है अपन को शाम 7:00 बजे उसको दिखाने चलना है उसका ऑपरेशन जल्द से जल्द करवा लेंगे और तब राजू भी अच्छी तरह से दोड़ने लग जाएगा।

राधा यह बात सुनकर खुशी के मारे रो पड़ी लेकिन यह भी कहती रही कि “मैडम यह सब आप क्यों कर रहे हो?” हम बहुत छोटे लोग हैं हमारे यहां तो यह सब चलता ही रहता है। वह मेरे पैरों में गिरने लगी। यह सब सुनकर और देखकर मेरा मन भी द्रवित हो उठा और मेरी आंखों से भी आंसू के झरने फूट पड़े। मैंने उसको दोनों हाथों से ऊपर उठाया और गले लगा लिया मैंने बोला बहन रोने की जरूरत नहीं है अब इस घर की सारी जवाबदारी मेरी है।

मैंने मन ही मन कहा राधा तुम क्या जानती हो कि मैं कितनी छोटी हूं और तुम कितने बड़ी हो आज तुम लोगों के कारण मेरी आंखे खुल सकीं।

मेरे पास इतना सब कुछ होते हुए भी मैं भगवान से और अधिक की भीख मांगती रही मैंने कभी संतोष का अनुभव नहीं किया। लेकिन आज मैंने जाना के असली खुशी पाने में नहीं देने में है

🙏प्रणाम🙏

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‌( एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों? -एक प्रेरक कथा

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि-
“ मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ? इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये ..क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं ?
सब सोच में पड़ गये कि अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले – महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर यहां भला कौन दे सकता है ? आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है ।
राजा की जिज्ञासा बढ़ी और घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं , सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है ,मैं भूख से पीड़ित हूँ ।तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”
राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे ।
राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है , आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है ”
सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, उत्सुकता प्रबल थी। कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ ,वहाँ भी जाकर देखता हूँ ,क्या होता है ।
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और *शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया ।
राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो –
तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले के चारों भाई व राजकुमार थे । एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।जैसे-तैसे हमने चार बाटी सेंकी और
अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये । अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
“बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो , जिससे मेरा भी जीवन बच जाय , इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी ।”
इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ? चलो भागो यहां से ….।
वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा ? ”
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये , मुझसे भी बाटी मांगी… तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि ” चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?”।
बालक बोला “अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !आपके पास भी आये,दया की याचना की, सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी ।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा । ”
बालक ने कहा “इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं ,धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं,किन्तु सबके फल रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद में भिन्न होते हैं।”
इतना कहकर वह बालक मर गया । राजा अपने महल में पहुंचा और माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ-ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र । एक ही मुहूर्त में अनेकों जातक जन्मते हैं किन्तु सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं । जैसा भोग भोगना होगा वैसे ही योग बनेंगे । जैसा योग होगा वैसा ही भोग भोगना पड़ेगा यही है जीवन
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..
तो सोचो..
गलत कर्मो से स्वर्ग के दरवाजे कैसे खुलेंगे ”
~जय श्री कृष्णा~

संजय गुप्ता

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सम्राट चंद्रगुप्त अपने मंत्रियों के साथ एक विशेष मंत्रणा में व्यस्त
थे कि प्रहरीने सूचित किया कि आचार्य चाणक्य राजभवन में पधार रहे हैं । सम्राट चकित रह गए । इस असमय में गुरू का आगमन ! वह घबरा भी गए । अभी वह कुछ सोचते ही कि लंबे-लंबे डग भरते चाणक्य ने सभा में प्रवेश किया । सम्राट चंद्रगुप्त सहित सभी सभासद सम्मान में उठ गए । सम्राट ने गुरूदेव को सिंहासन पर आसीन होने को कहा ।

आचार्य चाणक्य बोले – ”भावुक न बनो सम्राट, अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं, तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है, मुझे कुछ
याचना करनी है ।”चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं। बोले – ” आप
आज्ञा दें, समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं ।” चाणक्य ने
कहा – ” मैंने आपसे कहा भावना में न बहें, मेरी याचना सुनें । ” गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए । बोले -” आज्ञा दें ।
चाणक्य ने कहा – ” आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं
किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं । दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए । आप भी नहीं । मेरा उचित प्रबंध करा दें ।
चंद्रगुप्त ने कहा – ” सब कुछ स्वीकार है । ” दूसरे दिन प्रबंध कर
दिया गया । चाणक्य वन चले गए । अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह
भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस (सिकन्दर का सेनापति) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे । उनकी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था । दो – चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी । सेल्युकस ने कहा – ”सम्राट, आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें । उन्हें मेरे बारे में कहें । वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे ।“ अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया। गुप्तचर भेज दिए गए । चाणक्य ने उत्तर दिया – ”ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं, मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी ।”

सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे । औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्यने पूछा – ”मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ । ”इस पर सेल्युकस ने कहा – ”भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा ? आपने मेरा बहुत ख्याल रखा ।“

न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे – “हां, सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा ।”इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं । उसे इतना तक
बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की, एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं । मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा ।

सेल्युकस व्यथित हो गए । बोले – ”इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई । मेरा इतना अपमान ।“
चाणक्य ने कहा – ”न तो अपमान, न अविश्वास और न ही गुप्तचरी । अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन
दो महीनों में शायद न मिल पाते । आप हमारे अतिथि हैं । रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा ”राष्ट्रधर्म” है । आप कुछ भी हों, पर
विदेशी हैं । अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है, वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती । यह स्वाभाविक भी है । मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं । मेरे इस ‘धर्म‘ को अन्यथा न लें । मेरी भावना समझें ।“

सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा ।
उसने कहा – ” जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों, उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता ।” सेल्युकस वापस लौट गया ।

मित्रों… क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है???

कुलदीप सकसेना

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बहुत सुंदर प्रसंग,, बड़े भाव से पढ़े
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भक्त नरसी जी भगवान के अनन्य भक्त थे, वे सत्संग करते हुए ठाकुर जी को केदारा राग सुनाया करते थे।
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जिसे सुनकर ठाकुर जी के गले की माला अपने आप नरसी जी के गले में आ जाया करती थी।
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एक बार भक्त नरसी जी के घर संतों की मंडली आई तो नरसी जी एक सेठ से राशन उधार लेने गये, पर सेठ ने राशन के बदले कुछ गिरवी रखने को कहा,
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नरसी जी ने अपना केदारा राग का भजन गिरवी रख दिया और सेठ को वादा किया कि उधार चुकाने तक इस राग को नही गाऊंगा और सेठ से राशन लाकर संतो को भोजन करवाया।
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उधर राजा को नरसी जी से जलने वाले पंडितो ने भड़काया कि नरसी जी सब ढोंग करते है।
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भजन गाते हुए माला को कच्ची डोर से बांधते है जिससे माला अपने आप गिरती है।
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राजा ने परीक्षा लेने के लिए नरसी जी को उनके भक्त समाज सहित महल में भजन सत्संग करने के लिए बुलाया और कहा कि हम भी ठाकुर जी की कृपा के दर्शन करना चाहते है।
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नरसी जी संतो के साथ राजा के महल में आये और सत्संग शुरू कर दिया।
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राजा ने अभिमान में आकर रेशम की मजबूत डोर मंगाई और उसमें हार पिरोकर ठाकुर जी को पहनाया।
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नरसी जी ने कीर्तन आरंभ किया.. आनंद बरसने लगा.. नरसी जी ने बहुत से भावपूर्ण भजन गाये पर माला नही गिरी।
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नरसी जी के विरोधी बहुत प्रसन्न हुए कि अब राजा नरसी जी को दंड देगा।
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क्यूंकि ठाकुर जी की माला केदारा राग सुनने से ही गिरती थी और नरसी जी केदारा राग को गिरवी रखे हुए थे।
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अब नरसी जी ठाकुर जी को उलाहना देते हुए गाने लगे.. कि ठाकुर जी आप माला पहने रखो, भक्तो की लाज जाती है तो जाये, माला संभाले रखो आप।
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ठाकुर जी की लीला देखिये,नरसी जी का रूप बनाकर सेठ के घर गये और दरवाजा खटखटाया।
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सेठ जी सो रहे थे पत्नी ने कहा कि नरसी जी भजन छुड़वाने आये है। सेठ ने सोते सोते ही कहा कि पैसे ले लो और रसीद बनाकर भजन सहित दे दो।
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उधर नरसी जी भाव से कीर्तन कर ऱहे थे.. पर सब संत हैरान थे कि आज नरसी जी केदारा राग क्यूं नही गा रहे..
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पर नरसी जी के मन की तो भगवान ही जानते थे।
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भगवान ने एक भक्त का रूप बनाया और नरसी जी के पास जाकर उनकी गोद में सेठ की पत्नी द्वारा दी हुई भजन की रसीद डाल दी।
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बस फिर क्या था नरसी जी जान गये कि ये ठाकुर जी की लीला है.. उन्होने उसी समय भाव से केदारा राग का वो भजन गाना शुरू किया।
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सब समाज आनंद से भर गया और इस बार ठाकुर जी सिहांसन से उठे.. नुपुरों की झन्न झन्न ध्वनि करते हुए स्वयं जाकर नरसी जी के गले में हार पहनाया.. और अपने भक्त का मान बढ़ाया।
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राजा और नरसी जी के विरोधी पंडित नरसी जी की भक्ति से प्रभावित हुए और नरसी जी के संग से वो भी ठाकुर जी के भक्त बन गये।

हमारे ठाकुर जी का स्वभाव कुछ ऐसा ही है।

  अपना मान टले टल जाये
 भक्त का मान ना टलते देखा।

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देव शर्मा

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मूर्ख कौन? – बोध कथा


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સર્વશ્રેષ્ઠ વડો કોણ ?

રાજા અકબરનો દરબાર ભરાયો હતો. સોનાના સિંહાસન પર રાજા અકબર બિરાજમાન છે. બાજુમાં પડદા પાછળ રાજાની રાણીઓ બેઠેલી છે. રાજાના દરબારના નવરત્નો પોતપોતાના આસન પર ગોઠવાયેલા છે.

રાજાનું સમગ્ર પ્રધાનમંડળ, અધિકારીઓ બધા આજની સભામાં હાજર છે. બધા નગરજનો શાંતિ જળવાય તેમ બેસી ગયા છે. આજની સભા અતિ મહત્ત્વની છે. કારણ કે આ વાર્ષિક સભા છે. રાજા પોતાના મંત્રીઓ પાસેથી તેમણે કરેલાં કાર્યોની માહિતી મેળવવા માંગતા હતા. આજે અહીં નગરજનોની ફરિયાદો પર ચર્ચા વિચારણા થવાની છે.

રાજા અકબરે બધાનું અભિવાદન ઝીલી કાર્યવાહી આગળ વધારવા સૂચન કર્યું. વારાફરતી દરેક પ્રધાન ઊભાં થઈને તેમણે કરેલા કાર્યોની વિગત રજુ કરવા લાગ્યા. ભવિષ્યમાં કયા નવા કાર્યો કરવા, નવી યોજનાને કેવું સ્વરૃપ આપવું તેની ચર્ચા થઈ. રાજાની ચતુર અને દીર્ઘદ્રષ્ટિવાળી રાણી જોધાબાઈ અને હોંશિયાર બીરબલ જરૃર મુજબ સૂચન કરતા ગયા. પછી પ્રજાજનોની ફરિયાદો અંગે ચર્ચા વિચારણા ચાલી. રાજા અકબરે પોતાના પ્રધાનોને સલાહ સૂચન પણ આપી દીધા.

રાજા અકબરના રાજ્યમાં જુદી જુદી જાતિ, ભાષા અને ધર્મના લોકો રહેતા હતા. દરેક ધર્મના લોકોમાં તેમનો એક વડો પણ હતો. દરેક ધર્મના વડાઓમાં એક વિખવાદ જાગ્યો હતો અને તે એ કે બધા ધર્મના વડાઓમાં સર્વશ્રેષ્ઠ વડો કોને ગણવો ? બધા ધર્મના વડાઓ અનેકવાર ભેગા થતા હતા, ચર્ચાવિચારણાની સાથે સાથે બોલાબોલી પણ થતી હતી અને કોઈપણ નક્કર પરિણામ વગર તેમની સભા વિખરાઈ જતી હતી.

વડાઓના આ પ્રશ્નથી અકબર ખુદ મૂંઝવણમાં પડી ગયા હતા. અકબરે પોતાના મુખ્ય અને ચતુર પ્રધાન બીરબલને આનો રસ્તો કાઢવા સૂચન કર્યું. બીરબલે આ પ્રશ્નનાં નિરાકરણ માટે મુદત માંગી રાજા અકબર બીરબલની સાથે સહમત થયા એટલે બધા દરબારીઓ અને પ્રજાજનો વિખરાયા.

બીરબલ તો રાત દિવસ એ જ વિચારવા લાગ્યો કે આ પ્રશ્નનું નિરાકરણ કેવી રીતે લાવવું ? આખરે બીરબલે એક ઉપાય વિચારી લીધો. બીરબલની યોજના મુજબ જુદા જુદા ધર્મના વડાઓને રાજમહેલની પાછળ આવેલા બાગમાં ભોજન ગ્રહણ કરવા માટે આમંત્રિત કરવામાં આવ્યા. બધા વડાની આગતા સ્વાગતા ખૂબ જ ધૂમધામથી કરવામાં આવી.

પછી બધા વડાઓને બેસવા માટે ચાંદીના બાજોઠ ઢાળવામાં આવ્યા. ભોજન માટે ચાંદીના વાસણોની વ્યવસ્થા હતી. જાતજાતની વાનગીઓ પીરસવામાં આવ્યા. બધાની બાજોઠની પાસે ફળફળાદિની ટોપલીઓ અને સૂકામેવાના ડબ્બા ગોઠવવામાં આવી. બીરબલે બધાના ભોજન લેવાનો આગ્રહ કર્યો. એવામાં એક ભિખારી વૃદ્ધ યુગલ આવીને બાગના ખૂણામાં સંકોચાતું સંકોચાતું બેસી ગયું અને ઈશારાથી ભોજન માંગવા લાગ્યું.

આ ભિખારી યુગલને જોઈને ધર્મના વડાઓનાં તેવર ચઢી ગયા. એક વડા બરાડી ઊઠયા, ‘અમારા જેવી પવિત્ર અને મહાન વ્યક્તિઓના ભોજન સમયે આ ભિખારીઓ…’ બીજા વડાએ સૂર પુરાવ્યો, ‘પેલા ભિખારીઓને કાઢો અહીંથી, નહીં તો અમે ભોજનનો ત્યાગ કરીશું.’

એક વડાએ ભોજનની થાળીમાં હાથ જ ધોઈ નાંખ્યા અને બોલ્યા, ‘આ તો અમારું અપમાન છે, હું તો અહીંથી જાઉં છું.’

આમ દરેક વડા કંઈ ને કંઈ અપશબ્દો બોલીને ભિખારી યુગલનું અપમાન કરતા રહ્યા. છેલ્લે બેઠેલા એક વડા ચૂપચાપ બેઠા હતા. જેમણે ક્યારેય વડા હોવાનો દાવો કર્યો જ નહોતો.

બીરબલ તેમની નજીક ગયો અને કહ્યું, ‘આ વિશે તમારે કશું નથી કહેવું ?’

‘અરે, તેને ધર્મ વિશે બહુ જ્ઞાન જ ક્યાં છે તે દલીલ કરશે ?’ બીજા વડાઓ બોલી ઊઠયા.

‘બીરબલજી, મારે કશું કહેવું નથી, પરંતુ આપ જો મંજૂરી આપો તો કંઈક કરવું જરૃર છે.’ બીરબલે માથું હલાવી મંજુરી આપી એટલે તે વડા ઊભા થયા, પોતાના ભોજનની થાળી લઈને વૃદ્ધ યુગલને ધરી દીધી. આ જોઈને બીજા બધા વડાઓ ક્રોધે ભરાયા અને બડબડાટ કરવા લાગ્યા.

વૃદ્ધ યુગલ તો ભૂખ્યું હોય તેમ ભોજન પર તૂટી પડયું અને સઘળું ભોજન સ્વાહા કરીને સંતોષનો ઓડકાર ખાધો. આ જોઈને એક વડા બોલ્યા, ‘એય, ભિખારા હવે તો તમારું પેટ ભરાયું ને ? જાવ અહીંથી…’ બીરબલે તેમને શાંત પાડતા કહ્યું, ‘એ કોઈ ભિખારી નથી. એ તો આપણાં….’ આટલું બોલતાં ભિખારી યુગલને તેમનો વેશ હટાવવા જણાવવામાં આવ્યું. વેશ હટાવાયો ત્યારે ખબર પડી કે એ તો રાજા અકબર અને રાણી જોધા હતા.

રાજા અકબર બોલ્યા, ‘ધર્મને નામે આખો દિવસ તમે બધા લડો છો, ધર્મપરિષદમાં પણ તમારા બધાના અહમને કારણે નિષ્ફળતા મળે છે. મને સમજાવો કે સાચો ધર્મ કયો ? જૂની પ્રણાલિકા પકડી રાખીને પોતાના અહમને પોષવો એ શું સાચો ધર્મ છે ? કયું ધર્મપુસ્તક ધર્મને નામે લડતાં શિખવાડે છે ? કયો ધર્મ માણસ ઊંચો છે કે નીચો તે નક્કી કરે છે ?

કોઈ ધર્મ ઊંચો કે નીચો નથી, ભૂખ્યાને ભોજન, તરસ્યાને પાણી, અસહાયને સહાય અને સત્યની રાહે ચાલવું એ જ સાચો ધર્મ છે. સાચો ધર્મ સેવા અને માનવતાનો છે. ધર્મનો વડો તે જ છે જે કોઈને ભૂખ્યા કે દુ:ખી નથી જોઈ શકતો. માનવતાનો સાચો પૂજારી એ ખરા અર્થમાં ધર્મનો વડો છે.’

રાજા અકબરની વાત સાંભળી બધા ધર્મના વડા શરમના માર્યા ઝૂકી ગયા. અકબર રાજાએ ભિખારીને ભોજન આપનાર વડાની ‘સર્વશ્રેષ્ઠ વડા’ તરીકે નિમણૂક કરી.

हरेश मंगुकिया

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फूटा घड़ा

फूटा घड़ा

बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में एक किसान रहता था .
वह रोज़ भोर में उठकर दूर झरनों से स्वच्छ पानी लेने जाया करता था .

इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाता था , जिन्हें वो डंडे में बाँध कर अपने कंधे पर दोनों ओर लटका लेता था .
उनमे से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था ,
और दूसरा एक दम सही था . इस वजह से रोज़ घर पहुँचते -पहुचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था .
ऐसा दो सालों से चल रहा था .

सही घड़े को इस बात का घमंड था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है ,

वहीँ दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है .

फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया ,
उसने किसान से कहा ,
“ मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ ?”
“क्यों ? “ ,
किसान ने पूछा , “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”
“शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ ,
और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुँचाना चाहिए था बस उसका आधा ही पहुंचा पाया हूँ ,
मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है , और इस वजह से आपकी मेहनत बर्वाद होती रही है .”
फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा.

किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुःख हुआ और वह बोला , “ कोई बात नहीं ,
मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो .”
घड़े ने वैसा ही किया ,

वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया ,
ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुँचते – पहुँचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था,
वो मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा .
किसान बोला ,” शायद तुमने ध्यान नहीं दिया पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे ,
सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था .
ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था ,
और मैंने उसका लाभ उठाया . मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग -बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे ,
तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया . आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूँ
और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ .
तुम्ही सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ?”

दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है ,
पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं .
उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए,
और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा……!!
Haresh Mangukiya