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🙏 બધાયે વાચશો 🙏

એકભાઇ સાંજે કામ પરથી ઘરે આવ્યા. ઘરનો દરવાજો ખોલતાની સાથે જ બઈરી એ વિલાયેલા મોઢે કહ્યુ, ” ગોમડેથી તમારા બાપુજી આયાં છે. એના ચહેરા પરથી એ કંઇક તકલીફમાં હોય એમ લાગે છે”

સાંભળતાની સાથે જ પતિના હોશકોશ ઉડી ગયા.મંદીને કારણે નાનો ધંધો બંધ કરીને નોકરી ચાલુ કરી દેવી પડી હતી. અને મોંડ મોંડ ઘરનું ગુજરાન ચાલતુ તુ. એવાંમાં ગોમડેથી બાપુજી આયા છે, તો ચોક્કસ કોઇક મદદ માંગવા માટે જ
આવ્યા હશે, આ વિચાર માત્રથી એ ભાઇ ધ્રુજી ગયા. ઘરમાં પ્રવેશીને મુરઝાયેલા ચહેરે પિતાને પ્રણામ કર્યા. સાંજનું ભોજન પતાવીને, પિતાએ પુત્રને કહ્યુ, ” બેટા, તારી સાથે થોડી વાતો કરવી છે”

પિતાની વાત સંભળતા જ દિકરાના હૈયામાં ફાળ પડી “નક્કી હવે બાપુજી પૈસાની માંગણી મુકશે. મારી કેવી સ્થિતી છે એનો બાપુજીને જરા પણ વિચાર નહી આવતો હોય ? મને ફોન કર્યા વગર સીધા જ, અહીંયા પહોંચી ગયા આવતા પહેલા ફોન કર્યો હોત, તો હુ ફોન પર પણ તેમને મારી મુશ્કેલી જણાવી શકત”.

વિચારોના વાવઝોડામાં સપડાયેલા દિકરાના ખભ્ભા પર પિતાનો હાથ મુકાયો, ત્યારે દિકરાને ખબર પડી કે, પિતાજી એમની બાજુમાં આવીને બેસી ગયા છે. પિતાએ દિકરાને કહ્યુ, ” બેટા, તું મહિને એકાદ વખત ગામડે અમને ફોન કરીને વાત કરી લેતો તો. પણ છેલ્લા 4 મહિનાથી તારો કોઇ જ ફોન નથી આવ્યો. એટલે તને કંઇક તકલીફ હશે એવુ, મને અને તારી મમ્મીને લાગ્યુ. હું તને બીજી તો શુ મદદ કરી શકુ પણ મારી પાસે થોડા ઘરેણા પડેલા હતા. એ વેંચીને આ
50,000 રૂપિયા ભેગા થયા છે એ તારા માટે લાવ્યો છું. હું તો કાલે સવારે ગામડે ચાલ્યો જઇશ પણ બસ ફોન કરતો રહેજે !! તારી મમ્મી બહુ જ ચિંતા કરતી હોય છે. અને કંઇ મુશ્કેલી હોય તો બેધડક કહેજે. તારા માટે જમીન વેંચવી પડે તો એ પણ વેંચી નાંખીશું”

આટલી વાત કરીને પિતાએ, દિકરાના હાથમાં નોટોનું બંડલ મુકી દીધુ. દિકરો કંઇજ ન બોલી શક્યો માત્ર ભીની આંખોએ બાપના ચહેરાને જોઇ રહ્યો. જે બાપની ભિખારી તરીકે કલ્પના કરી હતી એ તો ભગવાન બનીને આવ્યા હતા.

મિત્રો, આપણી મુશ્કેલીના સમયે પોતાનુ સર્વસ્વ આપીને આપણને મદદ કરનાર પિતા કોઇ મુશ્કેલીમાં તો નથીને એ
જોવાની ફરજ માત્ર ભગવાનની નહી, આપણી જ છે.

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ડિલીટ મારતા પહેલા, અન્ય ગ્રુપ માં ફોરવર્ડ કરવાનું ચૂંકશો નહીં. કોઈ ની આંખો ખૂલી જાય તો, મોકલનાર ને આંગળી ચીંધવા નું પુણ્ય મળશે . ધન્યવાદ !!

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संजय गुप्ता

मैं ही राम,मैं ही रावण !

“मैं सिटी हॉस्पिटल से बोल रही हूँ ।आप मि.मुदित की माँ बोल रही हैं?”……फोन पर ये चंद शब्द सुनते ही मीरा की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा और ऐसा लगा जैसे वो अभी चक्कर खाकर गिर जाएगी। पर अगले ही पल दिल को मजबूत कर ,गला खँखारते हुए उसने पूछा ,”जी कहिए, मैं मुदित की माँ हूँ। क्या बात हुई ? “” घबराने की बात नहीं है। सुबह मि.मुदित एक एक्सीडेंट विक्टिम को लेकर अस्पताल आए थे। उन्हें मामूूूली चोटें आईं हैं पर अत्यधिक खून बह जाने के कारण विक्टिम की हालत बेहद नाजुक है।मि. मुदित ने रक्तदान किया है। वो ठीक हैंं, आप चाहें तो उन्हें आकर ले जा सकती हैंं।” मीरा का माथा ठनका।आज सुबह ही तो उसने दही चीनी खिलाकर बेटे को स्नातक परीक्षा के अंतिम पेपर के लिए विदा किया था और अभी ये अस्पताल कैसे पहुँच गया?पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद उसने बड़ी कठिनाइयों से जूझते हुए अपने इकलौते बेटे मुदित को पाल पोस कर बड़ा किया है। ईश्वर की असीम अनुकंपा रही कि बेटा शुरू से मेधावी छात्र रहा और साल दर साल अच्छे अंकों से इम्तिहान पास करते हुए आज यहाँ तक पहुँचा। कितनी मुश्किलोंं का सामना करते हुए उसने बेटे की ट्यूशन और परीक्षा फीस तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का इंतजाम किया था। पर , ना जाने जब सब कुछ सुलझता हुआ सा दिख रहा था तो कहाँ से ये घना कोहरा आ गया। अपनी फूटी किस्मत को कोसती और बेटे पर गुस्साते हुए मीरा ने वार्ड में प्रवेश किया। “ये क्या किया तुमने ? परीक्षा छूट गई तुम्हारी ? साल बर्बाद हो गया ? क्या पड़ी थी समाज सेवा करने की ?” मीरा ने भर्राए गले से बेटे सेे पूछा।”माँ, माँ, माँ ….. तुम कैसी बातें कर रही हो ? मैंने जीवन भर तुम्हें उस एक एक्सीडेंट की आग में झुलसते देखा है। काश , पापा को किसी भलेमानस ने सही समय पर अस्पताल पहुँचा दिया होता ! और तुम ऐसा बोल रही हो ?” The New Johnson’s ” पुरानी बातों को छोड़ो। वो हमारे भाग्य का दोष था। पर आज तुमने अपने सुनहरे भविष्य के बारे में और मेरे बारे में एक बार भी नहीं सोचा ?””क्या बोल रही हो माँ ? तुमने ही तो सिखाया है जेंटलमैन बनो, पढ़े लिखे विद्वान से भी ज्यादा जरूरी है सज्जन पुरूष बनो और अब तुम ही……. !” तभी कमरे में उस बच्ची के माता-पिता ने हाथ जोड़े प्रवेश किया। विगत एक घंटे ने ही उन्हें मानो सालों का वृद्ध ,बेसहारा और असहाय बना दिया था। लेकिन अभी उनकी आँखों में आशा की चमक थी। उन्होंने विनम्र शब्दों में कहा, “बिटिया खतरे से बाहर है। बेटे हम जन्म जन्मांतर के लिए तुम्हारे ऋणी हो गए। तुमने हमारे ऊपर बहुत बड़ा एहसान किया। धन्य है वो माँ जिसने ऐसे सपूत को पैदा किया। “और फिर उन दोनों ने आशीर्वादों और दुआओं की झड़ी लगा दी माँ-बेटे के लिए।मीरा निःशब्द होकर उन्हें नीहार रही थी। सहृदया और उदार मीरा को खुद अपने अस्तित्व पर क्षोभ हो रहा था। आज उसके बेटे ने माँ के दूध की सच्ची कीमत देकर “अपनी माँ” के ओहदे को गर्वान्वित कर दिया था, किसी को जीवनदान देकर। पर स्वार्थ की मारी मीरा, उसे यह पुण्य कार्य नहीं दिख रहा था। उसका मन अंदर अंदर ही अंदर आत्ममंथन कर रहा था और नेत्रों से अनवरत आँसू बह रहे थे और वह बुदबुदा रही थी ……….मैं ही ‘राम’और मैं ही ‘रावण !’……

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संजय गुप्ता

(((( स्वामी रामअवध दास ))))
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लगभग सौ वर्ष पहले की बात है

। भगवान् श्री राघवेंद्र के परम भक्त क्षेत्रसन्यासी स्वामी रामअवध दास जी वैरागी साधू थे।
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बरसों से मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचंद्र जी की राजधानी अयोध्यापुरी मे रहते थे। अहर्निश श्री सीताराम नाम का कीर्तन करना उनका सहज स्वभाव हो गया था।
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रात को कठिनता से केवल दो घंटे सोते। सरयू जी के तीर पर एक पेड़ के नीचे धूनी रात – दिन जलती रहती। बरसात के मौसम में भी कोई छाया नहीं करते थे।
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आश्चर्य तो यह कि मूसलधार वर्षा में भी उनकी धूनी ठंडी नहीं हाती थी। जब देखो तभी स्वामी जी के मुखारविन्द से बड़े मधुर स्वर में श्री सीताराम नाम की ध्वनि सुनायी पड़ती।
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आसपास के सभी मनुष्य -जीव – जंतु तक सीताराम ध्वनि करना सीख गये थे। वहाँ के पक्षियों की बोली में श्री सीताराम की ध्वनि सुनायी पड़ती,
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वहाँ के कुत्ते – बिल्ली की बोली में श्री सीताराम स्वर आता, वहाँ के वृक्षों की खड़खड़ाहट में श्री सीताराम नाम सुनायी देता और वहाँ की पवित्र सरयू धारा श्री सीताराम गान करती। तमाम वातावरण सीताराममय हो गया था।
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स्वामी जी कभी कभी सत्संग भी करते, कोई ख़ास अधिकारी आने पर उस समय वे जिन तर्क युक्तियो और शास्त्रप्रमाणों को अपने अनुभव के समर्थन में रखते, उनसे पता लगता कि वे षड्दर्शन के बहुत बड़े पण्डित है,
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परंतु इन ज्ञान की बातो को छोड़कर भजन में लगे रहते। सत्संग भी व भजन का ही उपदेश करते और कहते की मनुष्य और कर ही क्या सकता है ?
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भगवान् ने कृपा करके जीभ दी है; इससे उनका नाम रटता रहे तो बस, इसीसे प्रभु कृपा करके उसे अपने आश्रय मे ले लेते है।
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स्वामी जी वैष्णव साधु थे, पर किसी भी सम्प्रदाय और मत से उनका विरोध नहीं था। वे सब को अपने ही रामजी के विभिन्न स्वरूपो के उपासक मानकर उनसे प्रेम करते।
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खण्डन तो कभी किसीका करते ही नही। मधुर मुस्कान उनके होठो पर सदा खेलती रहती। वृद्ध होने पर भी उनके चेहरे पर जो तेज छाया रहता, उसे देखकर लोग चकित हो जाते।
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उन्होने एक बार अपने श्री मुख से अपने पूर्वजीवन का वृत्तान्त एक संत को सुनाया था। उन्होंने श्री अयोध्या जी के एक संत से उसको इस प्रकार कहा था।
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स्वामी श्री राम अवधदास जी जौनपुर के समीप के ब्राह्मण थे। इनका नाम था- रामलगन। पिता के इकलौते पुत्र थे। माता बडी साध्वी और भक्तिमति थी।
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माता ने ही इन्हें श्री सीताराम कीर्तन सिखाया था और प्रतिदिन वह इन्हें भगवान् के चरित्रो की मधुर कथा सुनाया करती थी।
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एक बार जब ये आठ वर्ष के थे, तब रात को एक दिन कुछ डाकू इनके घर मे आ पहुंचे।
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इनके पिता पंडित सत्यनारायण जी काशी मे पढ़ें हुए विद्वान् थे। पुरोहिती का काम था। सम्पन्न घर था।
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जिस दिन डाकू आये, उस दिन इनके पिता घर पर नही थे। किसी यजमान के घर विवाह में गये हुए थे। घर पर इनकी मा थीं और ये थे।
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दोनों माता पुत्र घर के अंदर आँगन में सो रहे थे। गरमी के दिन थे, इसलिये सब किवाड खुले थे। एक ओर गौएँ खुली खड़ी थीं।
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जिस समय डाकू आये, उस समय इनकी माता इनको हनुमान जी के द्वारा लंका दहन की कथा सुना रही थी।
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इसी समय लगभग पंद्रह – सोलह डाकू सशस्त्र घर में घुस आये। उन्हें देखकर इनकी माँ डर गयी, पर इन्होंने कहा – माँ ! तू डर क्यो गयी ?
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देख, अभी हनुमान जी लंका जला रहे है। उनको पुकारती क्यों नहीं ? वे तेरे पुकारते ही हमारी मदद को आएंगे। इन्होंने बिलकुल निडर होकर यह बात कही परंतु माँ तो भय से काँप रही थीं।
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उसे इस बात का विश्वास नहीं था कि सचमुच पुकारने से श्रीहनुमान जी मदद को आ जायेंगे।
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जब माँ कुछ नहीं बोली तब इन्होने स्वयं पुकारकर कहा -हनुमान जी ! ओ हनुमान जी !! हमारे घर में ये कौन लोग लाठी ले-लेकर आ गये हैं ! मेरी माँ डर रही है । आओं, जल्दी आओं, लंका बाद में जलाना।
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डाकू घर में घुसे ही थे की उसी क्षण सचमुच एक विशाल वानर कूदता -फाँदता आ रहा है; डाकू उसकी ओर लाठी तान ही रहे थे कि उसने आकर दो तीन डाकुओं को तो ऐसी चपत लगायी कि वे गिर पड़े।
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डाकुओ का सरदार आगे आया तो उसे गिराकर उसकी दाढ़ी पकडकर इतनी जोर से खींची कि वह चीख मारकर बेहोश हो गया।
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डाकुओं की लाठियां तनी ही गिर पड़ी। वानर को एक भी लाठी नहीं लगी।
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मारपीट की शोरगुल से आसपड़ोस के लोग आने लगे और लोगो से पीटने के भय से कुछ डाकू भागे। सरदार बेहोश था, उसे तीन-चार डाकुओं ने कंधे पर उठाया और भाग निकले ।
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बालक रामलगन जी और उसकी माँ बड़े आश्चर्य से इस दृश्य को देख रहे थे। डाकुओं के भागनेपर वह वानर भी लापता हो गया।
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बालक हंसकर कह रहा था -देखा नहीं माँ ! हनुमान जी मेरी आवाज़ सुनते ही आ गये और बदमाशो को मार भगाया। माँ के भी आश्चर्य और हर्ष का पार नहीं था।
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गाँव वालो में यह घटना सुनी तो सब-के-सब आश्चर्य में डूब गये। रामलगन की माँ ने बताया कि इतना बडा और बलवान वानर उसने जीवन में कभी नहीं देखा था।
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दो-तीन दिन बाद पण्डित सत्यनारायण जी घर लौटे। उन्होंने जब यह बात सुनी तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ।
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डाकू घर से चले गये, यह आनंद तो था ही; सबसे बडा आनंद तो इस बात से हुआ कि स्वयं श्री हनुमान जी ने पधार कर घर को पवित्र किया और ब्राह्मणी तथा बालक को बचा लिया।
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वे भगवान् में श्रद्धा तो रखते ही थे, अब उनकी भक्ति और भी बढ़ गयी। उन्होंने यजमानों के यहां आना-जाना प्राय: बंद कर दिया था। दिनभर भजन-साधन मे रहने लगे।
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बालक रामलगन को व्याकरण ओर कर्मकाण्ड पढ़ाने का काम उन्ही के गाँव के पंडित श्री विनायक जी के जिम्मे था। प्रात:काल तीन-चार घंटे पढ़ते। बाकी समय माता-पिता के साथ वे भी भगवान् का भजन करते।
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भजन में इनका चित्त रमने लगा। जब इनकी उम्र बारह वर्ष की हुई तब तो ये घंटो भगवान् श्री रामचंद्र जी के ध्यान मे बेठने लगे। उस समय इनकी समाधि-सी लग जाती। नेत्रो से अश्रुओ की धारा बहती। बह्यज्ञान नहीं रहता।
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समाधि टूटने पर ये माता-पिता को बतलाते कि भगवान् श्री रामचंद्र जी श्री जनक नंदिनी जी तथा लखन लाल जी के साथ यहाँ बहुमूल्य राजसिंहासनपर विराज रहे थे।
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बालक की इस स्थिति से भाग्यवान माता-पिता को बड़ा सुख होता। वे अपने को बड़ा सौभाग्यशाली समझते।
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असल मे वे ही माता पिता धन्य है, जिनकी सन्तान भगवद्भक्त हो और जो अपनी संतान को भगवान् की सेवा में समर्पण कर सके।
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रामलगन जी के माता- पिता सच्चे पुत्रस्नेही थे, वे अपने बालक को नर्क में न जाने देकर भगवान् के परमधाम का यात्री बनाने मे ही अपना सच्चा कर्तव्य पालन समझते थे;
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इसलिये उन्हाने पुत्र की भक्ति देखकर सुख माना तथा उसे और भी उत्साह दिलाया।
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गाँव के तथा सम्बन्ध के लोग जब रामलगन के विवाह के लिये कहते, तब माता पिता उन्हें डराकर उत्तर देते – यह रामलगन हमारा पुत्र नहीं है, यह तो प्रभु श्री रामचन्द्र जी का है; विवाह करना न करना उन्ही के अधिकार में है। हम कुछ नहीं जानते !
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उनकी ऐसी बाते सुनकर कुछ लोग चिढते, कुछ प्रसन्न होते और कुछ उनकी मूर्खता समझते। जैसी जिसकी भावना होती, वह वैसी ही आलोचना करता।
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रामलगन जी की उम्र ज्यो ज्यो बढने लगी, त्यों-ही-त्यों उनका भगवत्प्रेम भी बढने लगा।
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एक बार रामनवमी के मेले पर रामलगन जी ने श्री अयोध्या जी जानेकी इच्छा प्रकट की।
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पंडित सत्यनारायण जी और उनकी पत्नी ने सोचा – अब श्री अयोध्या जी में ही रहा जाय तो सब तरह से अच्छा है। शेष जीवन वही बीते। रामलगन भी वहीं पास रहे।
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इससे इसकी भी भक्ति बढ़ेगी और हमलोगो का भी जीवन सुधरेगा। ऐसा निश्चय करके पत्नी की सलाह से पण्डित सत्यनारायण जी ने घर का सारा सामान तथा अधिकांश खेत-जमीन वगैरह दान कर दिया। इतनी-सी जमीन रखी, जिससे अन्न वस्त्र का काम चलता रहे।
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एक कास्तकार को खेत दे दिया और हर साल उससे अमुक हिस्से का अन्न लेने की शर्त करके सब लोग श्री अयोध्या जी चले गये।
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इस समय रामलगन जी की उम्र साढ़े पंद्रह वर्ष की थी। माता, पिता और पुत्र तीनो अवध वासी बनकर भगवान् श्रीसीताराम जी का अनन्य भजन करने लगे।
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पुरे चार वर्ष के बाद पिता माता का देहान्त हो गया। दोनो का एक ही दिन ठीक रामनवमी के दिन शरीर छुटा। दोनों ही अन्तसमयतक सचेत थे और भजन मे निरत थे।
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शरीर छूटने के कुछ ही समय दोनों को भगचान् श्री रामचन्द्र जी का ने साक्षात् दर्शन देकर कृतार्थ किया।
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श्री रामलगन जी की उम्र उस समय साढे उन्नीस साल की थी। माता पिता की श्रद्धा क्रिया भलीभाँति सम्पन्न करने के बाद इन्होंने अवध के एक भजनानन्दी संत से दीक्षा ले ली। तबसे इनका नाम स्वामी रामअवधदास हुआ ।
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स्वामी जी मे उत्कट वैराग्य था। ये अपने पास कुछ भी संग्रह नहीं रखते थे। योगक्षेम का निर्वाह श्रीसीताराम जी अपने आप करते थे।
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इन्होंने न कोई कुटिया बनवायी, न चेला बनाया और न किसी अन्य आडम्बर मे रहे। दिन रात कीर्तन करना और भगवान् के ध्यान में मस्त रहते, यही इनका एकमात्र कार्य था। इन्हे जीवन मे बहुत बार श्री हनुमान जी ने प्रत्यक्ष दर्शन दिये थे ।
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भगवान् श्री रामचन्द्र जी के भी इनको सात बार दर्शन हुए। अन्तकाल में श्री रामचंद्र जी की गोद में सिर रखकर इन्होने शरीर छोड़ा।
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लोगो को विश्वास था कि ये बहुत उच्च श्रेणी के संत है। ये बहुत ही गृप्त रूप से रहा करते थे और बहुत गुप्त रूप से भजन भी किया करते थे।
साभार :- श्री भक्तमाल कथा

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ज्ञानवर्धक- एक कहानी
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🌹ॐ श्री जयदयाल गोयन्दका जी की पुस्तक शिक्षाप्रद कहानियाँ से।🌹 ((श्री गीताप्रेस गोरखपुर के संस्थापक))
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ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय💐 सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी पी कर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा―
हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा, लकड़हारे ने कहा―बहुत अच्छा।इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा―

मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था,!

राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि- इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ?

अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान (बाग) उसको सौंप दिया।

लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा।

यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा।

थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।

राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया। चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आएँ। चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा। यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला।

उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है।

दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा।

राजा ने आते ही कहा― भाई ! यह तूने क्या किया ?

लकड़हारा बोला― आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया।

कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।

राजा मुस्कुराया और कहा― अच्छा, मैं यहाँ खड़ा होता हूँ। तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ।

लकड़हारे ने दो गज [ लगभग पौने दो मीटर ] की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया।

लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे।

लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आय और जोर-जोर से रोता हुआ अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा।

इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक स्वास चन्दन के वृक्ष हैं पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में तब्दील कर रहे हैं।

लोगों के साथ बैर, द्वेष, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मनमुटाव, को लेकर खिंच-तान आदि की अग्नि में हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं।

जब अंत में स्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे तब अहसास होगा कि व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे।

पर अभी भी देर नहीं हुई है हमारे पास जो भी चन्दन के पेड़ बचे है उन्ही से नए पेड़ बन सकते हैं।अर्थात अमूल्य शेष जीवन का सदुपयोग हो सकता है।

आपसी प्रेम, प्रसन्नता, सौहार्द, शांति, भाईचारा, और विश्वास, के द्वारा अभी भी जीवन ॐ आनन्दमय भगवान के सत्संग द्वारा सँवारा जा सकता है।🕉
🕉💐🌹🌻🔮🕉💐🌹🌻🔮

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🙏🙏वृद्धावस्था 🙏🙏

एक बार एक बुजुर्ग की तबियत खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा।

पता लगा कि उन्हें कोई गम्भीर बीमारी है हालांकि ये छूत की बीमारी नही है, पर फिर भी इनका बहुत ध्यान रखना पड़ेगा।

कुछ समय बाद वो घर आए। पूरे समय के लिए नौकर और नर्स रख लिए गए।

धीरे-धीरे पोतों ने कमरे में आना बंद कर दिया। बेटा-बहू भी ज्यादातर अपने कमरे में रहते।

बुजुर्ग को अच्छा नहीं लगता था लेकिन कुछ कहते नही थे।

ऐक दिन वो कमरे के बाहर टहल रहे थे तभी उनके बेटे-बहू की आवाज़ आई।
बहू कह रही थी कि पिताजी को किसी वृद्धाश्रम या किसी अस्पताल के प्राइवेट कमरे एडमिट करा दें कहीं बच्चे भी बीमार न हो जाए,

बेटे ने कहा कह तो तुम ठीक रही हो , आज ही पिताजी से बात करूंगा!

पिता चुपचाप अपने कमरे में लौटा,
सुनकर दुख तो बहुत हुआ पर उन्होंने मन ही मन कुछ सोच लिया।

शाम जब बेटा कमरे में आया तो पिताजी बोले अरे मैं तुम्हें ही याद कर रहा था कुछ बात करनी है।
बेटा बोला पिताजी मुझे भी आपसे कुछ बात करनी है।आप बताओ क्या बात हैं

पिताजी बोले तुम्हें तो पता ही है कि मेरी तबियत ठीक नहीं रहती, इसलिए अब मै चाहता हूं कि मैं अपना बचा जीवन मेरे जैसे बीमार, असहाय , बेसहारा बुजुर्गों के साथ बिताऊं।

सुनते ही बेटा मन ही मन खुश हो गया कि उसे तो कहने की जरूरत नहीं पड़ी। पर दिखावे के लिए उसने कहा, ये क्या कह रहे हो पिताजी आपको यहां रहने में क्या दिक्कत है?

तब बुजुर्ग बोले नही बेटे, मुझे यहां रहने में कोई तकलीफ नहीं लेकिन यह कहने में मुझे तकलीफ हो रही है कि तुम अब अपने रहने की व्यवस्था कहीं और कर लो, मैने निश्चय कर लिया है कि मै इस बंगले को वृद्धाश्रम बनाऊंगा ।
और असहाय और बेसहारों की देखरेख करते हुए अपना जीवन व्यतीत करूंगा। अरे हाँ तुम भी कुछ कहना चाहते थे बताओ क्या बात थी…!!!!

कमरे में चुप्पी छा गई थी…

कभी-कभी जीवन में सख्त कदम उठाने की जरूरत होती है…!!!😍😘😘👌👍👍👍👏

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प्रासंगिक- एक कहानी
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सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी पी कर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा―
हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा, लकड़हारे ने कहा―बहुत अच्छा।इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा―
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मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था,
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राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि- इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ?
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अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान (बाग) उसको सौंप दिया।
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लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा।
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यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा।
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थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।
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राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया। चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आएँ। चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा। यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला।
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उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है।
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दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा।
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राजा ने आते ही कहा― भाई ! यह तूने क्या किया ?
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लकड़हारा बोला― आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया।
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कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।
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राजा मुस्कुराया और कहा― अच्छा, मैं यहाँ खड़ा होता हूँ। तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ।
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लकड़हारे ने दो गज [ लगभग पौने दो मीटर ] की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया।
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लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे।
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लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आय और जोर-जोर से रोता हुआ अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा।


इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक स्वास चन्दन के वृक्ष हैं पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में तब्दील कर रहे हैं।
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लोगों के साथ बैर, द्वेष, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मनमुटाव, को लेकर खिंच-तान आदि की अग्नि में हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं।
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जब अंत में स्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे तब अहसास होगा कि व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे,
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पर अभी भी देर नहीं हुई है हमारे पास जो भी चन्दन के पेड़ बचे है उन्ही से नए पेड़ बन सकते हैं।
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आपसी प्रेम, सहायता, सौहार्द, शांति, भाईचारा, और विश्वास, के द्वारा अभी भी जीवन सँवारा जा सकता है।

JAI JINENDRA

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक व्यापारी अकबर के समय मे बिजनेस करता था।
महाराणा प्रताप से लडाई की वजह से अकबर कंगाल हो गया और व्यापारी से कुछ सहायता मांगी।
व्यापारी ने अपना सब धन अकबर को दे दिया।
तब अकबर ने उससे पुछा कि तुमने इतना धन कैसे कमाया, सच सच बताओ नहीं तो फांसी दे दुंगा।

व्यापारी बोला-जहांपनाह मैंने यह सारा धन कर चोरी और मिलावट से कमाया है।
यह सुनकर अकबर ने बीरबल से सलाह करके व्यापारी को घोडो के अस्तबल मे लीद साफ करने की सजा सुनाई।
व्यापारी वहां काम करने लगा।

दो साल बाद फिर अकबर लडाई मे कं
गाल हो गया तो बीरबल से पूछा अब धन की व्यवस्था कौन करेगा?
बीरबल ने कहा बादशाह उस व्यापारी से बात करने से समस्या का समाधान हो सकता है। तब अकबर ने फिर व्यापारी को बुलाकर अपनी परेशानी बताई तो व्यापारी ने फिर बहुत सारा धन अकबर को दे दिया।

अकबर ने पुछा तुम तो अस्तबल मे काम करते हो फिर तुम्हारे पास इतना धन कहां से आया सच सच बताओ नहीं तो सजा मिलेगी।

व्यापारी ने कहा यह धन मैने आप के आदमी जो घोडों की देखभाल करते है उन से यह कहकर रिश्वत लिया है कि घोडे आजकल लीद कम कर रहे है। मैं इसकी शिकायत बादशाह को करुगां क्योंकि तुम घोडो को पुरी खुराक नहीं देते हौ ओर पैसा खजाने से पूरा उठाते हो।

अकबर फिर नाराज हुआ और व्यापारी से कहा कि तुम कल से अस्तबल में काम नही करोगे। कल से तुम समुन्दर् के किनारे उसकी लहरे गिनो और मुझे बताऔ।

दो साल बाद

अकबर फिर लडाई में कंगाल।
चारो तरफ धन का अभाव।
किसी के पास धन नहीं।

बीरबल और अकबर का माथा काम करना बंद। अचानक बीरबल को व्यापारी की याद आई। बादशाह को कहा आखरी उम्मीद व्यापारी दिखता है आप की इजाजत हो तो बात करू।

बादशाह का गरूर काफुर बोला किस मुंह से बात करें दो बार सजा दे चुकें हैं।

दोस्तो व्यापारी ने फिर बादशाह को इतना धन दिया कि खजाना पूरा भर दिया।
बादशाह ने डरते हुऐ धन कमाने का तरीका पूछा तो व्यापारी ने बादशाह को धन्यवाद दिया और कहा इस बार धन विदेश से आया है क्योकि मैने उन सब को जो विदेश से आतें हैं आप का फरमान दिखाया कि जो कोई मेरे लहरे गिनने के काम में अपने नाव से बाधा करेगा बादशाह उसे सजा देंगें।
सब डर से धन देकर गये और जमा हो गया।

कहानी का सार
सरकार व्यापारी से ही चलती है
चाहे अकबर के जमाने की हो या आज की

इसलिये प्लीज

व्यापारियों को तंग ना करे

😊😊