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एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे। सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था। तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है। सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा।
सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है की महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा हैं की वो आजाद कब होगा? संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है जो वो बेहोश होकर गिर जाते है। सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाते है।
घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा। सेठजी कहते है की तेरे किस्मत ही खराब है जो तेरी आजादी का पूछते ही वो बेहोश हो गए। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी में सब समझ गया।
दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता हैं। सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है। सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है की कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहाँ हैं। सेठजी कहते हैं, हाँ महाराज आज सुबह-सुबह वो जानबुझ कर बेहोश हो गया मैंने देखा की वो मर गया है इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया।
तब संत ने सेठजी से कहा की देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर आजाद हो गया।
इस कहानी से तात्पर्य ये है कि हम सत्संग में तो जाते हैं ज्ञान की बाते करते हैं या सुनते भी हैं, पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में हीं उलझा रहता हैं। सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को पसंद करते है जिसमे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता हैं। हमे वहां भी मान यश मिल जाये यही सोचते रहते हैं। जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर सभी बातों को महत्व देना चाहिये और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं उसे साहस के साथ मन से उतार कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए।

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एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था । चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर तस्वीर बनाई और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को , जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे । जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी । यह देख वह बहुत दुखी हुआ । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था । तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई ।
उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे । उसने अगले दिन यही किया । शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया ।
वह संसार की रीति समझ गया ।
“कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान , लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता है “
“जिंदगी आईसक्रीम की तरह है, टेस्ट करो तो भी पिघलती है;.,,,
वेस्ट करो तो भी पिघलती है,,,,,,
इसलिए जिंदगी को टेस्ट करना सीखो,
वेस्ट तो हो ही रही है.,,
“Life is very beautiful”.

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एक ठंडी रात में, एक अरबपति बाहर एक बूढ़े गरीब आदमी से मिला। उसने उससे पूछा, “क्या तुम्हें बाहर ठंड महसूस नहीं हो रही है, और तुमने कोई कोट भी नहीं पहना है?”

बूढ़े ने जवाब दिया, “मेरे पास कोट नहीं है लेकिन मुझे इसकी आदत है।” अरबपति ने जवाब दिया, “मेरे लिए रुको। मैं अभी अपने घर में प्रवेश करूंगा और तुम्हारे लिए एक कोट ले लाऊंगा।”

वह बेचारा बहुत खुश हुआ और कहा कि वह उसका इंतजार करेगा। अरबपति अपने घर में घुस गया और वहां व्यस्त हो गया और गरीब आदमी को भूल गया।

सुबह उसे उस गरीब बूढ़े व्यक्ति की याद आई और वह उसे खोजने निकला लेकिन ठंड के कारण उसे मृत पाया, लेकिन उसने एक चिट्ठी छोड़ी थी, जिसमे लिखा था कि, “जब मेरे पास कोई गर्म कपड़े नहीं थे, तो मेरे पास ठंड से लड़ने की मानसिक शक्ति थी। लेकिन जब आपने मुझे मेरी मदद करने का वादा किया, तो मैं आपके वादे से जुड़ गया और इसने मेरी मानसिक शक्ति को खत्म कर दिया। “

अगर आप अपना वादा नहीं निभा सकते तो कुछ भी वादा न करें। यह आप के लिये जरूरी नहीं भी हो सकता है, लेकिन यह किसी और के लिए सब कुछ हो सकता है। 🙏

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भगवान की लाठी..

एक बुजुर्ग दरिया के किनारे पर जा रहे थे। एक जगह देखा कि दरिया की सतह से एक कछुआ निकला और पानी के किनारे पर आ गया।

उसी किनारे से एक बड़े ही जहरीले बिच्छु ने दरिया के अन्दर छलांग लगाई और कछुए की पीठ पर सवार हो गया। कछुए ने तैरना शुरू कर दिया। वह बुजुर्ग बड़े हैरान हुए।

उन्होंने उस कछुए का पीछा करने की ठान ली। इसलिए दरिया में तैर कर उस कछुए का पीछा किया।

वह कछुआ दरिया के दूसरे किनारे पर जाकर रूक गया। और बिच्छू उसकी पीठ से छलांग लगाकर दूसरे किनारे पर चढ़ गया और आगे चलना शुरू कर दिया।

वह बुजुर्ग भी उसके पीछे चलते रहे। आगे जाकर देखा कि जिस तरफ बिच्छू जा रहा था उसके रास्ते में एक भगवान् का भक्त ध्यान साधना में आँखे बन्द कर भगवान् की भक्ति कर रहा था।

उस बुजुर्ग ने सोचा कि अगर यह बिच्छू उस भक्त को काटना चाहेगा तो मैं करीब पहुँचने से पहले ही उसे अपनी लाठी से मार डालूँगा।

लेकिन वह कुछ कदम आगे बढे ही थे कि उन्होंने देखा दूसरी तरफ से एक काला जहरीला साँप तेजी से उस भक्त को डसने के लिए आगे बढ़ रहा था। इतने में बिच्छू भी वहाँ पहुँच गया।

उस बिच्छू ने उसी समय सांप डंक के ऊपर डंक मार दिया, जिसकी वजह से बिच्छू का जहर सांप के जिस्म में दाखिल हो गया और वह सांप वहीं अचेत हो कर गिर पड़ा था। इसके बाद वह बिच्छू अपने रास्ते पर वापस चला गया।

थोड़ी देर बाद जब वह भक्त उठा, तब उस बुजुर्ग ने उसे बताया कि भगवान् ने उसकी रक्षा के लिए कैसे उस कछुवे को दरिया के किनारे लाया, फिर कैसे उस बिच्छु को कछुए की पीठ पर बैठा कर साँप से तेरी रक्षा के लिए भेजा।

वह भक्त उस अचेत पड़े सांप को देखकर हैरान रह गया। उसकी आँखों से आँसू निकल आए, और वह आँखें बन्द कर प्रभु को याद कर उनका धन्यवाद करने लगा,

तभी “”प्रभु”” ने अपने उस भक्त से कहा, जब वो बुजुर्ग जो तुम्हे जानता तक नही, वो तुम्हारी जान बचाने के लिए लाठी उठा सकता है। और फिर तू तो मेरी भक्ति में लगा हुआ था तो फिर तुझे बचाने के लिये मेरी लाठी तो हमेशा से ही तैयार रहती है..!!
🙏 जय जय श्री राधे

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रोहित और मोहित बड़े शरारती बच्चे थे, दोनों 5th स्टैण्डर्ड के स्टूडेंट थे और एक साथ ही स्कूल आया-जाया करते थे।

एक दिन जब स्कूल की छुट्टी हो गयी तब मोहित ने रोहित से कहा, “ दोस्त, मेरे दिमाग में एक आईडिया है?”

“बताओ-बताओ…क्या आईडिया है?”, रोहित ने एक्साईटेड होते हुए पूछा।

मोहित- “वो देखो, सामने तीन बकरियां चर रही हैं।”

रोहित- “ तो! इनसे हमे क्या लेना-देना है?”

मोहित-” हम आज सबसे अंत में स्कूल से निकलेंगे और जाने से पहले इन बकरियों को पकड़ कर स्कूल में छोड़ देंगे, कल जब स्कूल खुलेगा तब सभी इन्हें खोजने में अपना समय बर्वाद करेगे और हमें पढाई नहीं करनी पड़ेगी…”

रोहित- “पर इतनी बड़ी बकरियां खोजना कोई कठिन काम थोड़े ही है, कुछ ही समय में ये मिल जायेंगी और फिर सबकुछ नार्मल हो जाएगा….”

मोहित- “हाहाहा…यही तो बात है, वे बकरियां आसानी से नहीं ढूंढ पायेंगे, बस तुम देखते जाओ मैं क्या करता हूँ!”

इसके बाद दोनों दोस्त छुट्टी के बाद भी पढ़ायी के बहाने अपने क्लास में बैठे रहे और जब सभी लोग चले गए तो ये तीनो बकरियों को पकड़ कर क्लास के अन्दर ले आये। अन्दर लाकर दोनों दोस्तों ने बकरियों की पीठ पर काले रंग का गोला बना दिया। इसके बाद मोहित बोला, “अब मैं इन बकरियों पे नंबर डाल देता हूँ।, और उसने सफेद रंग से नंबर लिखने शुरू किये-

पहली बकरी पे नंबर 1
दूसरी पे नंबर 2
और तीसरी पे नंबर 4

“ये क्या? तुमने तीसरी बकरी पे नंबर 4 क्यों डाल दिया?”, रोहित ने आश्चर्य से पूछा।

मोहित हंसते हुए बोला, “ दोस्त यही तो मेरा आईडिया है, अब कल देखना सभी तीसरी नंबर की बकरी ढूँढने में पूरा दिन निकाल देंगे…और वो कभी मिलेगी ही नहीं…”

अगले दिन दोनों दोस्त समय से कुछ पहले ही स्कूल पहुँच गए।

थोड़ी ही देर में स्कूल के अन्दर बकरियों के होने का शोर मच गया।
कोई चिल्ला रहा था, “ चार बकरियां हैं, पहले, दुसरे और चौथे नंबर की बकरियां तो आसानी से मिल गयीं…बस तीसरे नंबर वाली को ढूँढना बाकी है।”

स्कूल का सारा स्टाफ तीसरे नंबर की बकरी ढूढने में लगा गया…एक-एक क्लास में टीचर गए अच्छे से तालाशी ली। कुछ खोजू वीर स्कूल की छतों पर भी बकरी ढूंढते देखे गए… कई सीनियर बच्चों को भी इस काम में लगा दिया गया।

तीसरी बकरी ढूँढने का बहुत प्रयास किया गया….पर बकरी तब तो मिलती जब वो होती…बकरी तो थी ही नहीं!

आज सभी परेशान थे पर रोहित और मोहित इतने खुश पहले कभी नहीं हुए थे। आज उन्होंने अपनी चालाकी से एक बकरी अदृश्य कर दी थी।

दोस्तों, इस कहानी को पढ़कर चेहरे पे हलकी सी मुस्कान आना स्वाभाविक है। पर इस मुस्कान के साथ-साथ हमें इसमें छिपे सन्देश को भी ज़रूर समझना चाहिए। तीसरी बकरी, दरअसल वो चीजें हैं जिन्हें खोजने के लिए हम बेचैन हैं पर वो हमें कभी मिलती ही नहीं….क्योंकि वे reality में होती ही नहीं!

हम ऐसी लाइफ चाहते हैं जो perfect हो, जिसमे कोई problem ही ना हो…. it does not exist!_
हम ऐसा life-partner चाहते हैं जो हमें पूरी तरह समझे जिसके साथ कभी हमारी अनबन ना हो…..it does not exist!_

हम ऐसी job या बिजनेस चाहते हैं, जिसमे हमेशा सबकुछ एकदम smoothly चलता रहे…it does not exist!_

क्या ज़रूरी है कि हर वक़्त किसी चीज के लिए परेशान रहा जाए? ये भी तो हो सकता है कि हमारी लाइफ में जो कुछ भी है वही हमारे life puzzle को solve करने के लिए पर्याप्त हो….ये भी तो हो सकता है कि तीसरी चीज की हम तलाश कर रहे हैं वो हकीकत में हो ही ना….और हम पहले से ही complete हों!

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निराशा से आशा की और 🐾🐾
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नकारात्मकता से सकारात्मकता की
और ले जाता एक ग्रुप
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हम क्यों डरते हैं और भय से
मुक्ति कैसे हो
😂😂😂👉🏽👉🏽😃😃😃

हंस जैन। 98272 14427

दोस्तों,
शुरूआत करते हैं एक कहानी से – एक गांव में एक तपस्वी महात्मा परमात्मा की भक्ति में लीन रहते थे पूरे गांव के लोग उनकी सेवा में लगे रहते थे। एक बार रात के समय महात्मा ने काल को गांव की ओर आते देखा और उसको सावधान किया तब यमराज ने बताया की विधि के विधानानुसार इस गांव से मुझे एक विशेष बीमारी के माध्यम से 500 लोगों को काल के गाल में समाना है तब उन महात्मा ने यमराज को सावधान किया कि ध्यान रहे केवल 500 लोगों के ही प्राण आप इस बीमारी से लेंगे। यमराज से उन्हें भरोसा दिलाया। महात्मा लोगों की सहायता करने में असमर्थ थे इसलिये वे कुछ महिनो के लिये यात्रा पर निकल गये। वापस लौटने पर गांव वालों ने उन्हें अपना दुख सुनाया और बताया कि गांव में पूरे 1500 लोग मारे गये। तब उन महात्मा ने यमराज को ललकारा तब यमराज ने बताया कि मैने पूरी ईमादारी से इस बीमारी से केवल 500 ही जानें ली हैं तब महात्मा ने पूछा कि यहाँ तो पूरे 1500 लोग अपनी जान गवां बैठें हैं तब यमराज ने बताया कि बाकी 1000 लोग तो इस बीमारी के भय से ही अपने प्राण गवां बैठे और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुये। इसमे मेरा कोई दोष नही।

इस कहानी का सार तो हम समझ ही चुके है की भय ही मौत का कारण होता हैं । यदि आपको कोई चूहा मामूली काट खाये और दिखाई नही दे और अचानक सांप दिख जाए आप डर के मारे ही मर जायेगे की आपको सांप ने काटा ।

हम हर पल भय मे ही जी रहे हैं यह भय कि कल चीजें बदल जाएंगीं … कोई मर जाएगा, हमारा दिवाला निकल जाएगा, हमारी नौकरी छिन जाएगी। हजारों चीजें ऐसी हैं जो बदल सकती हैं। हम ज्यादा से ज्यादा भयों के नीचे दब जाते हैं। और उनमें से कोई भी असली कारण नहीं है। क्योंकि कल भी हम इन्हीं भयों से भरे थे, व्यर्थ ही। चीजें बदल गई हों लेकिन हम अभी भी जिंदा हैं। मनुष्य के पास बहुत बड़ी क्षमता है किसी भी स्थिति से तालमेल करने की।

एक उदाहरण देखे अपने घर के बगीचे या गमले में जो आपने अपने मनपसंद का पौधा लगाया है उसके आस पास नजर डालें। आपको उसके आस-पास बहुत से खरपतवार या स्वयं ही उग आये पौधे और घास दिखाई देगी। अब आप एक एक कागज की पर्चियाँ बनायें एक पर्ची पर लिखे तनाव, दूसरे पर लिखे अनजाना भय, तीसरे पर लिखे चिंता और चौथे पर लिखे क्रोध। अब इन पर्चियों को इन खरपतवार वाले पौधों पर लगा दीजिये। जो पौधा आपने उगाया है उसकी जड़ों में खाद डालें। कुछ दिनों बाद आप पायेंगे कि उस खाद का उपयोग आपके पौधे ने तो बहुत ही कम किया लेकिन उन खरपतवार वाले पौधे उस खाद को पाकर और हरे भरे और बढ़ गये। हमारे जीवन में भी यही हो रहा है हमारी विचार शक्ति इन तनाव, चिंता, क्रोध और अनजान भय के कारण अपना हृास कर रही है हम स्वयं को इन चारों विकारों से बनी चार दीवारी में स्वयं को कैद किये बैठे हैं जिससे हमे बाहर निकलने का मार्ग नही सूझता। घर की चिंतायें, कार्यस्थल या व्यवसाय का तनाव, बात बात में क्रोध और हम समय एक अनजाना भय बना रहता है।

आप सभी डिस्कवरी चैनल तो देखते ही होंगे जिसमें दिखाया जाता है कि कैसे 10-15 शेरनियाँ एक हाथी को लगातार अपने दांतों से नोंच नोंच आक्रमण कर धराशयी कर देती हैं, हाथी बलशाली होते हुये भी स्वयं की रक्षा नही कर पाता। और आपने ये भी देखा होगा कि कभी कभी एक अकेला सैनिक ही पूरी एक टुकड़ी को परास्त कर देता है। ये दोनों घटनाये मनोबल की शक्ति का परिणाम हैं, तो हमें एक बात याद रखनी है कि हमें अपने मनोबल को किसी भी परिस्थिति में कम नही होने देना है और लगातार मनोबल की शक्ति को बढ़ाने की ओर अग्रसर होना है। ऐसे आध्यात्मिक और प्रेरणास्पद ज्ञान को लगातार प्राप्त करते रहना है जिससे हमारा मनोबल बना रहे। जैसे किसी पानी की बंूद को भी यदि तेज बहाव में डाल दिया जाये तो वह भी अपनी शक्ति बढ़ा लेती है और उस तेज बहाव का हिस्सा होती है। और यही तेज बहाव अपने साथ -साथ बड़े-बड़े लकड़ी के गठ्ठरों को भी बहा ले जाता है।

एक बात गांठ बांध लें कि जब एक बीज वृक्ष बनने की ओर अग्रसर होता है तो ढेरों मुसीबतें आती हैं तूफान, घनघोर वर्षा, तपा देने वाली भीषण गर्मी आदि। याद रखें की आप कैसी भी परिस्थिति हो किसी निराशा में आकर ध्यान से न चुकें भले ही कम समय के लिये उस दुखद या मुसीबत के समय ध्यान करें लेकिन करें जरूर। याद रखें कि मुश्किलें भी मुश्किल में पड़ जातीं हैं जब वे परमात्मा का नाम सुनती हैं। भले ही एक दीपक तूफान में, निराशा के कारण बुझ जायें लेकिन परमात्मा किसी न किसी दूसरे दीये को भेज देता है भले ही देर से भेजे और वह दूसरा दीये पहले दीये को अपनी लौ से फिर से रोशन कर देता है। भगवान ने गीता में कहा है जो सतत् मेरा ध्यान करता है मै उसके योग की रक्षा करता हूँ। जैसे प्रह्लाद की भक्ति ने भगवान को एक खम्बे से प्रकट कर दिया और भगवान ने नरसिंह अवतार में आकर उसकी रक्षा की। जब तेरे काज तुझसे न संवरें वंदे, अपने मालिक पर छोड़ तो अपने धंधे।

आपकी आंतरिक शक्ति ही आपको भय से मुक्ति दिलाएगी ।कल के डर का ख़ौफ़ इतना भी नही पाले की आज की जिंदगी भी नही जी पाये । मुझसे जब कोई पूछता हैं की मेरा कल कैसा रहेगा तो मै कहता हूँ की यदि आपने वर्तमान जी लिया तो कल भविष्य भी बेहतरीन होगा । हर उस भय को एक पल के लिए हटा दो जो आपको मानसिक परेशान करता हैं एक पल को सब भूल जाओ की आप बीमार हो , आपको कोई गम्भीर बीमारी हैं, किसी पीढ़ा का आपको हर रोज सामना करना पढ़ता हैं।इन सब को भूलकर आज घर से बाहर निकलो और प्रकृति के साथ बस जाओ।एक पल की जिंदगी का मजा लो। वो हर मस्ती करो जो कभी बचपन मे सोचते थे कभी पूरी नही की ।

हंस जैन 98272 14427

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एक बार मध्यप्रदेश के इन्दौर नगर में एक रास्ते से ‘महारानी देवी अहिल्यावाई होल्कर के पुत्र मालोजीराव’ का रथ निकला तो उनके रास्ते में हाल ही की जनी गाय का एक बछड़ा सामने आ गया।

गाय अपने बछड़े को बचाने दौड़ी तब तक मालोरावजी का ‘रथ गाय के बछड़े को कुचलता’ हुआ आगे बढ़ गया।

किसी ने उस बछड़े की परवाह नहीं की। गाय बछड़े के निधन से स्तब्ध व आहत होकर बछड़े के पास ही सड़क पर बैठ गई।

थोड़ी देर बाद अहिल्यावाई वहाँ से गुजरीं। अहिल्यावाई ने गाय को और उसके पास पड़े मृत बछड़े को देखकर घटनाक्रम के बारे में पता किया।

सारा घटनाक्रम जानने पर अहिल्याबाई ने दरबार में मालोजी की पत्नी मेनावाई से पूछा-

यदि कोई व्यक्ति किसी माँ के सामने ही उसके बेटे की हत्या कर दे, तो उसे क्या दंड मिलना चाहिए?

मालोजी की पत्नी ने जवाब दिया- उसे प्राण दंड मिलना चाहिए।

देवी अहिल्यावाई ने मालोराव को हाथ-पैर बाँध कर मार्ग पर डालने के लिए कहा और फिर उन्होंने आदेश दिया मालोजी को मृत्यु दंड रथ से टकराकर दिया जाए। यह कार्य कोई भी सारथी करने को तैयार न था।

देवी अहिल्याबाई न्यायप्रिय थी। अत: वे स्वयं ही माँ होते हुए भी इस कार्य को करने के लिए भी रथ पर सवार हो गईं।

वे रथ को लेकर आगे बढ़ी ही थीं कि तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी।

वही गाय फिर रथ के सामने आकर खड़ी हो गई, उसे जितनी बार हटाया जाता उतनी बार पुन: अहिल्याबाई के रथ के सामने आकर खड़ी हो जाती।

यह दृश्य देखकर मंत्री परिषद् ने देवी अहिल्यावाई से मालोजी को क्षमा करने की प्रार्थना की, जिसका आधार उस गाय का व्यवहार बना।

उस तरह गाय ने स्वयं पीड़ित होते हुए भी मालोजी को द्रौपदी की तरह क्षमा करके उनके जीवन की रक्षा की।

इन्दौर में जिस जगह यह घटना घटी थी, वह स्थान आज भी गाय के आड़ा होने के कारण ‘आड़ा बाजार’ के नाम से जाना जाता है।

उसी स्थान पर गाय ने अड़कर दूसरे की रक्षा की थी। ‘अक्रोध से क्रोध को, प्रेम से घृणा का और क्षमा से प्रतिशोध की भावना का शमन होता है’।

भारतीय ऋषियों ने यूँ ही गाय को माँ नहीं कहा है, बल्कि इसके पीछे गाय का ममत्वपूर्ण व्यवहार, मानव जीवन में, कृषि में गाय की उपयोगिता बड़ा आधारभूत कारण है।

गौसंवर्धन करना हर भारतीय का संवैधानिक कर्तव्य भी है
॥जय राम जी की॥
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