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एक महिला, जो एक बड़ी कंपनी में अधिकारी थी, मीटिंग के लिए लेट हो रही थी। वह 80 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से जा रही थी जबकि उस सड़क पर गति सीमा अधिकतम 60किमी प्रति घंटा थी। उसे इतनी तेज गति से जाता देख एक हवलदार ने उसका पीछा किया और रोक लिया। . . . हवलदार – मैडम, क्या मैं आपका लाइसेंस देख सकता हूं? महिला – मैं माफी चाहती हूं। एक बार मैं नशे में गाड़ी चलाते हुए पकड़ी गई थी, तब मुझसे लाइसेंस छीन लिया गया था। हवलदार – तो चलिए गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कार्ड ही दिखा दीजिए। महिला – जी यह गाड़ी चोरी की है। मैंने गाड़ी चुराकर ड्राइवर का कत्ल कर दिया। उसकी लाश पीछे डिक्की में है। हवलदार (घबराकर) – मैडम आप अपनी जगह से हिलिएगा मत। मैं और पुलिसवालों को बुला रहा हूं। हवलदार ने अपने वॉकी-टॉकी पर संदेश दिया और पांच मिनट के अंदर पुलिस इंस्पेक्टर टीम के साथ आ पहुंचे। इंस्पेक्टर ने महिला से कहा, ‘मैडम क्या मैं आपका लाइसेंस देख सकता हूं।’ महिला ने बैग में से लाइसेंस निकालकर दे दिया। इंस्पेक्टर ने लाइसेंस देखा। वह असली था। फिर इंस्पेक्टर ने गाड़ी का रजिस्ट्रेशन मांगा। महिला ने वह भी पेश कर दिया। फिर आखिर में इंस्पेक्टर ने झटके से गाड़ी की डिक्की खोल दी। डिक्की एकदम खाली थी। इंस्पेक्टर ने हवलदार को गुस्से से देखा। महिला ने जोर देते हुए कहा, ‘और मुझे पक्का यकीन है कि अब यह हवलदार कहेगा कि मैं तेज गाड़ी चला रही थी!’ . *औरतो से बराबरी नही करनी चाहिए*

लष्मीकांत वर्शनय

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*એક નાનકડી વાર્તા:* એક બાળકને સ્વર્ગ અને નરક જોવાની ખુબ જ ઇચ્છા હતી. એ રોજ આ માટે ભગવાનને પ્રાર્થના કરતો. એક દિવસ ભગવાન તેના પર રાજી થયા અને બાળકને સ્વર્ગ તથા નરક બતાવવાનું વચન આપ્યુ. કોઇ એક ચોક્કસ દિવસે ભગવાનને થોડી ફુરસદ મળી એટલે એ પેલા બાળક પાસે આવ્યા અને કહ્યુ, “ચાલ બેટા, આજે તને સ્વર્ગ અને નરકની મુલાકાત કરાવું. બોલ તારે પહેલા કોની મુલાકાત લેવી છે?” બાળકે કહ્યુ, “પ્રભુ, પહેલા નરક બતાવો. પછી સ્વર્ગમાં થોડો સમય આરામ કરવો હોઇ તો પણ વાંધો ન આવે.” ભગવાન બાળકને લઇને નરકમાં ગયા. દરવાજો ખોલીને અંદર પ્રવેશ્યા. સૌ પ્રથમ ભોજનશાળાની મુલાકાતે ગયા. બાળકે જોયુ તો ત્યાં અનેક પ્રકારના ભોજન હતા. જાત જાતના પકવાનોના થાળ પડ્યા હતા. આમ છતા લોકો ભુખના માર્યા તરફડીયા મારી રહ્યા હતા. કેટલાકના મોઢામાંથી સારુ ભોજન જોઇને લાળો ટપકતી હતી પરંતું એ ભોજન લેતા ન હતા. બાળકે ભગવાનને પુછ્યુ, “પ્રભુ આવુ કેમ ? ભોજન સામે હોવા છતા આ લોકો કેમ ખાતા નથી અને દુ:ખી થઇને રાડો પાડે છે?” ભગવાને બાળકને કહ્યુ, “બેટા, આ તમામ લોકોના હાથ સામે જો. બધાના હાથ સીધા જ રહે છે. એને કોણીથી વાળી શકતા નથી અને એટલે એ ભોજનને હાથમાં લઇ શકે છે પણ પોતાના મુખ સુધી પહોંચાડી શકતા નથી. ભોજનને મુખ સુધી પહોંચાડવા એ હવામાં ઉંચે ઉડાડે છે અને પછી પોતાના મુખમાં ઝીલવા માટેનો પ્રયાસ કરે છે પણ એમા એ સફળ થતા નથી.” બાળકે દલીલ કરતા કહ્યુ, “પ્રભુ આ તો નરકના લોકો માટે હળાહળ અન્યાય જ છે. ભોજન સામે હોવા છતા તમે કરેલી કરામતને કારણે હાથ વળતો નથી અને એ ખાઇ શકતા નથી.” ભગવાને કહ્યુ, “ચાલ બેટા હવે તને સ્વર્ગની ભોજનશાળા બતાવું. એ જોઇને તને નરક અને સ્વર્ગ વચ્ચેનો ભેદ બહુ સરળતાથી સમજાઇ જશે અને હું અન્યાય કરુ છુ કે કેમ ? તે પણ તને ખબર પડી જશે.” બાળક ભગવાનની સાથે સ્વર્ગની ભોજનશાળામાં ગયો. અહિંયા નરકમાં હતા એ જ પ્રકારના બધા ભોજન હતા અને એવી જ વ્યવસ્થાઓ હતી છતાય બધાના ચહેરા પર આનંદ હતો. બધા શાંતિથી ભોજન લઇ રહ્યા હતા. બાળકે ધ્યાનથી જોયુ તો અહિંયા પણ દરેક લોકોની શારિરીક સ્થિતી નરક જેવી જ હતી. મતલબ કે કોઇના હાથ કોણીથી વળી શકતા નહોતો. પરંતું લોકો ભોજન લેતી વખતે એકબીજાને મદદ કરતા હતા સામ-સામે બેસીને પોતાના હાથમાં રહેલો કોળીયો સામેવાળી વ્યક્તિના મુખમાં મુકતા હતા અને સામેવાળી વ્યક્તિના હાથમાં રહેલો કોળિયો પોતાના મુખમાં સ્વિકારતા હતા. બાળકે ભગવાનની સામે જોઇને હસતા હસતા કહ્યુ, “પ્રભુ મને સ્વર્ગ અને નરક વચ્ચેનો તફાવત બરોબર સમજાઇ ગયો.” *સ્વર્ગ મેળવવા માટે મરવાની જરુર નથી. એકબીજાને મદદ કરવાની ભાવના હોય તો આ ધરતી પર જ સ્વર્ગની અનુભૂતિ થશે.* ‘તારુ જે થવુ હોય તે થાય હું મારુ કરુ’ આવી વિચારસરણી જ્યાં છે તે નરક છે અને ‘મારુ જે થવુ હોય તે થાય પહેલા હું તારુ કરુ’ આવી ભાવના જ્યાં છે ત્યાં સ્વર્ગ છે.👏..🙏🏻 मामका पाण्डवस्चिव किम कुर्वन्ति,

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_*जेएनयू के एक प्रौफेसर, एक टीवी चैनल का रिपोर्टर और भारतीय सेना के एक कर्नल का कश्मीर में आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया*_ तीनों को मौत के घाट उतारने का हुक्म हुआ । बन्दियों को मारने से पहले उनकी अन्तिम इच्छा पूछी गई । जेएनयू प्रौफेसर – “मैं तो कश्मीर को भारत से आजादी का समर्थक हूँ । आप कृपया मुझे न मारें । दिल्ली वापिस जाकर मैं आपकी दयालुता पर लम्बा व्याख्यान दूँगा ।” रिपोर्टर – “मुझे भी मत मारिये,जनाब, मैं भी भारत-सरकार को खूब कोसता हूँ । वापिस जाकर मैं आपकी विचारधारा पर अपने चैनल पर शानदार बहस कराऊँगा ।” कर्नल – “मेरी हत्या करने से पहले मुझे पीटा जाय ।” आतंकी सरगना (कर्नल से) – “तुम भी अपनी जान बख्शने के लिए गिड़गिड़ाओ, फिर हम अपना फैसला सुनायेंगे ।” कर्नल – “नहीं । मैं चाहता हूँ कि मेरी हत्या से पहले मुझे पीटा जाय” आतंकी सरगना के इशारे पर एक आतंकी ने भारतीय सेना के कर्नल पर अपनी एके-47 के बट से वार किया कर्नल ने फुर्ती से एके-47 छुड़ा ली और दनादन सभी आतंकियों को ढेर कर दिया प्रौफेसर और रिपोर्टर ने कर्नल से पूछा – “तुम्हारे अन्दर इतनी हिम्मत और हौसला था तो तुमने आतंकी से खुद को पिटवाया क्यों ? तुम ये फुर्ती और बहादुरी शुरू में भी दिखा सकते थे ।” _*कर्नल – “मैं चाहता था कि लड़ाई की पहल वो करें ।*_ _*क्योंकि अगर मैं पहल करता तो तुम दोनो मुझे ही कटघरे में खड़ा कर देते और सरकार एवं जनता को सफाई देते-देते मेरी उम्र गुजर जाती ।”*_ यह है हमारी व्यवस्था

शैलेश ओजा

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एक कहानी जो छू जाएगी कहीं से आपके अंतर्मन को… .. . “पाँच साल की बेटी बाज़ार में गोल गप्पे खाने के लिए मचल गई। “किस भाव से दिए भाई?” पापा नें सवाल् किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया……. . पापा को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है…. जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के 10 मिला करते थे। . पापा ने जेब मे हाथ डाला 15 रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की जरूरत का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर से दूर है 10 रुपये तो बस किराए में लग जाने है। “नहीं भई 5 रुपये में 10 दो तो ठीक है वरना नही लेने। यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया…. “अरे अब चलो भी , नहीं लेने इतने महँगे। पापा के माथे पर लकीरें उभर आयीं …. “अरे खा लेने दो ना साहब.. अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… . . . . गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी…. . . . जिसकी शादी उसने तीन साल पहले एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी…… उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था….. दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर उनका पेट बढ़ता ही चला गया …. और अंत में एक दिन सीढियों से गिर कर बेटी की मौत की खबर ही मायके पहुँची….. . . आज वह छटपटाता है कि उसकी वह बेटी फिर से उसके पास लौट आये..? और वह चुन चुन कर उसकी सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे… पर वह अच्छी तरह जानता है कि अब यह असंभव है. “दे दूँ क्या बाबूजी गोलगप्पे वाले की आवाज से पापा की तंद्रा टूटी… “रुको भाई दो मिनिट …. पापा पास ही पंसारी की दुकान थी उस पर गए जहाँ से जरूरत का सामान खरीदा था। खरीदी गई पाँच किलो चीनी में से एक किलो चीनी वापस की तो 40 रुपये जेब मे बढ़ गए। फिर ठेले पर आकर पापा ने डबडबायी आँखें पोंछते हुए कहा अब खिलादे भाई। हाँ तीखा जरा कम डालना। . . मेरी बिटिया बहुत नाजुक है…. सुनकर पाँच वर्ष की गुड़िया जैसी बेटी की आंखों में चमक आ गई . . और पापा का हाथ कस कर पकड़ लिया। जब तक बेटी हमारे घर है उनकी हर इच्छा जरूर पूरी करे,… क्या पता आगे कोई इच्छा पूरी हो पाये या ना हो पाये । ये बेटियां भी कितनी अजीब होती हैं ससुराल में कितना भी प्यार मिले….. माँ बाप की एक मुस्कान को तरसती है ये बेटियां…. ससुराल में कितना भी रोएँ पर मायके में एक भी आंसूं नहीं बहाती ये बेटियां…. क्योंकि बेटियों का सिर्फ एक ही आंसू माँ बाप भाई बहन को हिला देता है रुला देता है…. भगवान की अनमोल देंन हैं ये बेटियां …… हो सके तो बेटियों को बहुत प्यार दें उन्हें कभी भी न रुलाये क्योंकि ये अनमोल बेटी दो परिवार जोड़ती है दो रिश्तों को साथ लाती है। अपने प्यार और मुस्कान से। हम चाहते हैं कि सभी बेटियां खुश रहें हमेशा भले ही हो वो मायके में या ससुराल में। ●●●●●●●● खुशकिस्मत है वो जो बेटी के बाप हैं, उन्हें भरपूर प्यार दे, दुलार करें और यही व्यवहार अपनी पत्नी के साथ भी करें क्यों की वो भी किसी की बेटी है और अपने पिता की छोड़ कर आपके साथ पूरी ज़िन्दगी बीताने आयी है। उसके पिता की सारी उम्मीदें सिर्फ और सिर्फ आप से हैं।

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🕉 नरसिंह अवतार 🕉 नृसिंह अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से चतुर्थ अवतार हैं जो वैशाख में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अवतरित हुए। पृथ्वी के उद्धार के समय भगवान ने वाराह अवतार धारण करके हिरण्याक्ष का वध किया। उसका बड़ा भाई हिरण्यकशिपु बड़ा रुष्ट हुआ। उसने अजेय होने का संकल्प किया। सहस्त्रों वर्ष बिना जल के वह सर्वथा स्थिर तप करता रहा। ब्रह्मा जी सन्तुष्ट हुए। दैत्य को वरदान मिला। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। लोकपालों को मार भगा दिया। स्वत सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरूपाय थे। असुर को किसी प्रकार वे पराजित नहीं कर सकते थे। हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थें । एक दिन सहज ही अपने चारों पुत्रों में सबसे छोटे प्रह्लाद से पूछा बेटा, तुझे क्या अच्छा लगता है ? प्रह्लाद ने कहा – इन मिथ्या भोगों को छोड़कर वन में श्री हरि का भजन करना ये सुनकर हिरण्यकशिपु बहुत क्रोधित हो गया , उसने कहा – इसे मार डालो। यह मेरे शत्रु का पक्षपाती है। असुरों ने आघात किया। भल्ल-फलक मुड़ गये, खडग टूट गया, त्रिशूल टेढ़े हो गये पर वह कोमल शिशु अक्षत रहा। दैत्य चौंका। प्रह्लाद को विष दिया गया पर वह जैसे अमृत हो। सर्प छोड़े गये उनके पास और वे फण उठाकर झूमने लगे। मत्त गजराज ने उठाकर उन्हें मस्तक पर रख लिया। पर्वत से नीचे फेंकने पर वे ऐसे उठ खड़े हुए, जैसे शय्या से उठे हों। समुद्र में पाषाण बाँधकर डुबाने पर दो क्षण पश्चात ऊपर आ गये। घोर चिता में उनको लपटें शीतल प्रतीत हुई। गुरु पुत्रों ने मन्त्रबल से कृत्या (राक्षसी) उन्हें मारने के लिये उत्पन्न की तो वह गुरु पुत्रों को ही प्राणहीन कर गयी। प्रह्लाद ने प्रभु की प्रार्थना करके उन्हें जीवित किया। अन्त में हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को बाँध दिया और स्वयं खड्ग उठाया। और कहा – तू किस के बल से मेरे अनादर पर तुला है , कहाँ है वह ? प्रह्लाद ने कहा – सर्वत्र? इस स्तम्भ में भी . प्रह्लाद के वाक्य के साथ दैत्य ने खंभे पर घूसा मारा। वह और समस्त लोक चौंक गये। स्तम्भ से बड़ी भयंकर गर्जना का शब्द हुआ। एक ही क्षण पश्चात दैत्य ने देखा समस्त शरीर मनुष्य का और मुख सिंह का, बड़े-बड़े नख एवं दाँत, प्रज्वलित नेत्र, स्वर्णिम सटाएँ, बड़ी भीषण आकृति खंभे से प्रकट हुई। दैत्य के अनुचर झपटे और मारे गये अथवा भाग गये। हिरण्यकशिपु को भगवान नृसिंह ने पकड़ लिया। मुझे ब्रह्माजी ने वरदान दिया है! छटपटाते हुए दैत्य चिल्लाया। दिन में या रात में न मरूँगा, कोई देव, दैत्य, मानव, पशु मुझे न मार सकेगा। भवन में या बाहर मेरी मृत्यु न होगी। समस्त शस्त्र मुझ पर व्यर्थ सिद्ध होंगे। भुमि, जल, गगन-सर्वत्र मैं अवध्य हूँ। नृसिंह बोले- देख यह सन्ध्या काल है। मुझे देख कि मैं कौन हूँ। यह द्वार की देहली, ये मेरे नख और यह मेरी जंघा पर पड़ा तू। अट्टहास करके भगवान ने नखों से उसके वक्ष को विदीर्ण कर डाला। वह उग्ररूप देखकर देवता डर गये, ब्रह्मा जी अवसन्न हो गये, महालक्ष्मी दूर से लौट आयीं, पर प्रह्लाद-वे तो प्रभु के वर प्राप्त पुत्र थे। उन्होंने स्तुति की। भगवान नृसिंह ने गोद में उठा कर उन्हें बैठा लिया और स्नेह करने लगे।

चेतन जा

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હું સવાર ના છાપું વાંચી રહયો હતો…ત્યાં..રસોડામાંથી મધુર અવાજ પત્નીનો સાંભળ્યો… એ ય ! સાંભળો છો.. ચ્હા-નાસ્તો તૈયાર છે. મારા દરેક કામ પડતા મૂકી તેનો સુરીલો અવાજ સાંભળવા નો લહાવો હું ચુકતો નથી … આ .એજ આવાજ..છે જયારે લગ્ન થયા હતા.. અને આજે ૬૧ વર્ષ ની ઉંમરે પણ આ જ શબ્દ ની મધુરતા…. આ એજ ધર્મપત્ની છે…જેની સાથે ૩૨ વર્ષ પહેલાં લગ્ન કર્યા હતા ત્યારે ..તેની સાથે દલીલ કરતા કરતા હું થાકી જતો.પણ એ હથિયાર કદી નીચે ના મુકતી… જબરજસ્ત જીવન માં ઉંમર પ્રમાણે પરિવર્તન છેલ્લા દશ વર્ષ થી હું જોઈ રહ્યો છું….તેનું અાધ્યાત્મિક લેવલ ઉપર જતું હતું.. ઘડપણ..આવે એટલે ઝગડા કરવા ની શક્તિ અદ્રશ્ય થતી જાય. સમજ શક્તિ ખીલતી જાય પહેલાં ..નાની.. નાની વાતો ઉપર દલીલ અને ઝગડા નું સ્વરૂપ લેતા હતા આજે.. દલીલો..ને હસવામાં કાઢી નાખીએ છીએ.. કારણ …સમય અને પરિસ્થિતિ ની થપ્પડ ઓ ભલ ભલ ને ઢીલા કરી નાખે છે… એક કારણ ઉમર નું પણ છે…સતત એક બીજા ને બીક લાગે છે… કયું પંખી કયારે ઉડી જશે તે ખબર નથી.. બચેલા દિવસો આનંદ અને મસ્તી થી વિતાવી લઈએ . પતિ…પત્ની ના સંબંધોમાં નિખાલસતા આવતી જાય.. જીતવા કરતા હારવા મા મજા આવતી જાય…દલીલ કરવા કરતાં..મૌન રહેવા મા મજા આવતી જાય… જેમ..જેમ એક બીજા ના શરીર પ્રત્યે ના આકર્ષણ ઓછું થતું જાય અને પ્રભુ પ્રત્યે ..નું આકર્ષણ વધતું જાય… સમજી જાવ..કે.ઘડપણ બારણે આવી ગયુ છે…. જે લોકો ઘડપણ મા ફક્ત રૂપિયા નું જ આયોજન કરે છે….તે લોકો હંમેશા દુઃખી હોય છે અને બીજા ને કરે છે… તેઓ ઘડપણ મા મંદિર કે બાગ બગીચા મા જવા નુ આયોજન નથી કરતા ..પણ બેંક મા પાસ બુક ભરવાનું આયોજન પહેલેથી કરી રાખે છે… તેમની જીંદગી બેન્ક અને ઘર વચ્ચે જ ખલાસ થઈ જાય છે… રૂપિયા એકલા માનસિક શાંતિ નું કારણ નથી….ઘણી વાર રૂપિયા પણ અશાંતિ નું કારણ બનતું હોય છે.. ઘડપણ માં લેવા કરતા છોડવાની ભાવના ,કટાક્ષ કરવા કરતા પ્રેમ ની ભાષા… સંતાન હોય કે સમાજ ..પૂછે એટલા નો જ જવાબ.. આપતા થશો ત્યારે ઘડપણ ની શોભા વધી જશે.. તમારી નિખાલસતા ,આનંદી સ્વભાવ અને જરૂર લાગે ત્યારે તટસ્થ અભિપ્રાય..એ તમારી ઘડપણ ની પહેચાન છે… મેં છાપા મા ધ્યાન કેન્દ્રિત કર્યું..ત્યાં જ દીકરીનો ફોન આવ્યો…..સેવા પુરી થઈ ગઇ હતી….પત્નીએ પોતે બનાવેલ સિદ્ધાંતો મુજબ હસી -ખુશી..ની વાતો.. કરવાની કોઈ ની પંચાત સાંભળવાની નહીં ..કે પોતે કરવાની નહી..ંતબિયત ની પુછા કરી…પછી..ફોન મને આપ્યો.. મે સ્વભાવ મુજબ સહેલી શિખામણ આપી..કીધુ બેટા ઘણા દિવસથી તુંનથી આવ્ી ..તારો ઘરે કયારે આવવાનો પ્રોગ્રામ છે…? દીકરી કહે …તમારા જમાઈને પૂછી ને કહીશ…સારું બેટા…. જય શ્રી ક્રિષ્ના… કહી મે ફોન મૂકી દીધો…. પત્ની કહે… તમે પણ શું ?એને આવવું હશે ત્યારે આવશે… હવે પૂછવાનું બંધ કરી દો… એ લોકો એમને ત્યાં આનંદ અને મસ્તી માં જીવે છે તો આપણે.. તે લોકોને યાદ કરી આપણો વર્તમાન શું કામ બગાડવો ?… લાગણી માટે યાચક ના થવાય..સમજ્યા… પત્ની હસ્તા હસ્તા બોલી..મારા જેવું રાખો.. “આવો તો પણ સારું..ના આવો તો પણ સારું.. તમારું સ્મરણ તે તમારા થી પ્યારું..”… પંખી ને પાંખો આવે એટલે ઉડે …ઉડવા દો …કોઈ દિવસ માળો યાદ આવશે ત્યારે આવશે… પણત્યારે માળો ખાલી હશે… પત્નીની આંખ મા પાણી હતા…પણજીંદગી જીવવાની જડ્ડી બુટ્ટી તેને શોધી લીધી હતી… તરત જ મન મક્કમ કરી બોલી લો ચા પીવો..અને નાહી લો…આજે શ્રાવણ મહિના નો શનિવાર છે…મંદિરે જવાનું છે.. પાંચ મિનિટ બેસ ..ને મેં હસ્તા.. હસ્તા કીધું , માલિકી હક્કની અસર છે આ બધી.. પત્ની કહે કંઈ સમજાયું નહીં.. મેં કીધું..તું પહેલા મને કહે… દીકરી ના લગ્ન થાય એટલે માલિકી હક્ક કોનો..માઁ બાપ નો કે જમાઈનો ? પત્ની કહે…હસ્તા..હસ્તા બોલી..આમ વિક્રમ.. વેંતલ જેવા સવાલ ના કરો..જે હોય તે સીધે સીધું કહો.. આનો મતલબ…પોતાની રીતે નિર્ણય લેવા પૂરતો પણ સક્ષમ નથી….બધું પત્ની ને પૂછી ને… એક માઁ બાપ જ દુનિયા મા એવા છે..કે તે કદી પોતાના સંતાન ની ખોડ..ખાપહણ..ને નજર અંદાજ કરી અવિરત પ્રેમ કરે છે… અરે , તમોને સવાર..સવાર માં થઈ શુ ગયું છે..? પત્ની બોલી.. પત્ની તે તારી લાગણી ઓને દબાવી દીધી છે…અને હું વ્યક્ત કરું છું…ફરક એટલો જ છે.. બાકી બન્ને ની વેદના એક સરખી જ છે.. જો …અપેક્ષા દુઃખો ની જનેતા છે….છોડ ને ..આ બધું…સવાર..સવાર માં મારા તરફ થી ફરિયાદ હોય તો કહે…પત્ની બોલી તારી વાત તો સાચી છે..એકલા..છીયે એટલે જ શાંતિ છે….રોજ.. રોજ.. દીકરા વહુ ના મૂડ પ્રમાણે ચાલવું એના કરતાં એકલા રેહવું સારું…આપણી જરૂરિયાત પણ કેટલી…. રોજ કિલો શાક સમારી ને આપો ,તો પણ વહુ તો એમજ કે ..ઘરડા માણસ થી કામ શું થાય ? ગઈ કાલે દીકરીનો પણ ફોન હતો..તે પણ રજા ની મુશ્કેલી છે…જમાઇ રાજ પણ આવું જ કેહતા હતા… પત્ની કહે ..બધાય પ્રવૃતિશીલ છે અને આપણે બન્ને જ નવરા… છીયે… દીકરા ને વહુ લઈ ગઈ… અને દીકરી ને જમાઇ રાજ… આપણે તો હતા ત્યાં ને ત્યાં.. ચલ આજે.. મૂડ નથી પિકચર જોવા જઈએ… કયું પિકચર જોવું છે…પત્ની બોલી. ચલ હવે ટેકો કર.. તો ઉભો થઇ શકીશ…. આ પગ પણ.. પત્ની ભેટી પડી…એટલું જ બોલી” “મેં હું ના” હું ફરીથી જાણે 25 વર્ષ નો નવ જુવાન થઈ ગયો… તેવી તાક્ત તેના શબ્દો એ મને આપી દીધી.. इक मन था मेरे पास वो, अब खोने लगा है पाकर तुझे … तुम हो जहाँ, साजन, मेरी दुनिया है वहीं पे दिन रात … मेरे प्यार भरे सपने, कहीं कोई न छीन ले… યજ્ઞેશ .

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जीवन के लिए


जीवन के लिए

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🔵 पत्नी ने कहा – आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…

🔴 पति- क्यों ??

🔵 उसने कहा -अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…

🔴 पति- क्यों??

🔵 पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…

🔴 पति- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…

🔵 पत्नी- और हाँ गणपति के लिए पाँच सौ रुपए दे दूँ उसे ? त्यौहार का बोनस..

🔴 पति- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…

🔵 पत्नी- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!

🔴 पति- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…

🔵 पत्नी- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाह पाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…

🔴 पति- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??

🔵 तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा…

🔴 पति- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?

🔵 बाई- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..

🔴 पति- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?

🔵 बाई- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में 500 रूपए खर्च कर दिए…

🔴 पति- अच्छा ! मतलब क्या किया 500 रूपए का??

🔵 बाई- नाती के लिए 150 रूपए का शर्ट, 40 रूपए की गुड़िया, बेटी को 50 रूपए के पेढे लिए, 50 रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, 60 रूपए किराए के लग गए.. 25 रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए 50 रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए 75 रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…

🔴 पति- 500 रूपए में इतना कुछ???

🔵 वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा…उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे…

🔴 “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया…l