Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कुपात्र को दान


कुपात्र को दान –*
एक दिन आप यमुना तट पर भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में पाँच रूपये का एक नोट गिरा था। ज्योंही आपकी दृष्टि उसपर पड़ी, आदेश मिला- इसे ले लो। आप सोचने लगे कि इसे लेकर करूँगा क्या? किन्तु आदेश मिलता रहा तो आपने उस रूपये को उठा लिया और मन्दिर पर चले आये। आपको इष्ट से आदेश मिला कि यह रुपया राधेलाल दलाल को दे दो। उसने तुम्हारी बड़ी सेवा की है, आजकल वह विपन्न है।

राधेलालजी व्यापार में दलाली का कार्य करते थे। उन्होंने बहुत धन कमाया था। बाजार में उनकी बड़ी साख थी। वह स्वभाव से बहुत सरल थे किन्तु जुआ खेलने का व्यसन था। सट्टे में ‘गुब्बा’ और न जाने क्या-क्या लगाते थे। उस जमाने में उन पर अस्सी हजार रुपये का कर्ज था। आपने उनसे कहा, “राधेलाल! देख ताखे में पाँच रुपया रखा है, तू ले ले।” यह सुनते ही राधेलाल उदास हो गये। वह कहने लगे, “अरे गुरु महाराज, आपकी कृपा ही पर्याप्त है। आपने मेरे लिये पैसा क्यों छू दिया?”
बहुत आग्रह पर भी उन्होंने वह रुपया नहीं उठाया। वह ठहरे पहले के धनी आदमी! कितना भी वह टूट गये थे तो क्या हुआ, संत का पैसा लेने की मनोवृत्ति ही नहीं बना सके।

महाराजजी सोचने लगे, “भगवान ने कहा कि इसे दे दो और यह लेता नहीं है। क्या किया जाय?” उसके जाने के पश्चात उसका एक छोटा सा लड़का आया। आपने उससे कहा, “ताखे से फूल निकालकर फेंक दो।” वह फूल निकालने लगा तो बोला, “महाराजजी! इसमें पाँच रुपया भी है।” आपने कहा, “अच्छा, तो तू पाँच रुपया पा गया। ठीक है, ले जा और कुछ खा-पी ले।” लड़का तो लड़का! वह रुपया लेकर चला गया।

महाराजजी आगरा से चलते समय राधेलाल से बोले, “देख! तू कर्ज-कर्ज बहुत चिल्लाता है, अब तो हम जा रहे हैं; किन्तु तुझे धन मिले तो कुछ दान-पुण्य कर देना और मेरा भी स्मरण करते रहना।”
कालान्तर में जब महाराजजी अनुसुइया में स्थायी रूप से रहने लगे थे, पता लगाते-लगाते राधेलाल दलाल भी वहाँ पहुँच गये। वह कहने लगे, “महाराजजी! आपके जाने के दो दिन बाद ही मैंने तीन लाख रुपये कमाये। कर्ज भी पट गया, दान-पुण्य भी किया। आगरा में जितने भी गरीब मेहतर और डोम थे, उन सबको खिलाया और सबको छककर शराब पिलायी। ऊपर से उन्हें पैसा भी बाँटा।

महाराजजी बिगड़े, “क्यों रे! दान तो सुपात्र को दिया जाता है। दान में शराब पिलायी जाती है क्या? तुम्हारे देने से उनके पास पैसा टिकेगा? बोल टिका?”
उन्होंने बताया, “नहीं महाराजजी! लोग दूसरे दिन उस पैसे की शराब छान-फूँककर मस्त हो गये लेकिन मैं कठिनाईयों से फिर घिर गया हूँ और तभी से आपकी खोज में हूँ।”
महाराजजी बोले, “हूँ बेटा! कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो जाता है। अब जुआ बन्द करके भजन कर, तभी तेरी कठिनाइयाँ दूर होंगी।” इस प्रकार आश्वासन देकर महाराजजी ने उन्हें विदा कर दिया।

पूज्य महाराजजी प्रायः कहा करते थे- हो! जिस दिन से आप छोटा-सा भी दान करते हैं, उस दिन से संसार को किसी न किसी मात्रा में त्यागते हैं। दान मुक्ति की ओर ले चलता है। दान कई प्रकार के होते हैं, जैसे- स्वास्थ्यदान, विद्यादान, अन्नदान इत्यादि। अन्न सबका जीवन है किन्तु आयु पूरी होने पर अन्न रहते हुए भी काम नहीं देता। अन्त में विद्या भी काम नहीं आती। इन सबसे श्रेष्ठ दान अभयदान है। परमात्मा में ही अभय है। उसमें प्रवेश दिला देना सद्गुरुओं का दान है। हो! संसार में सब दानी ही बने हैं।
‘हाथी स्वान लेवा देई’ (विनय., पद ७५)- दस रुपया चढ़ाते हैं तो बदले में हाथी माँगते हैं। असली दानी तो मैं हूँ, जो मोक्ष देता हूँ और बदले में कुछ भी नहीं लेता। सोई महि मण्डित पण्डित दाता- एक ओर सन्त दानी है, दूसरी ओर भगवान महादानी!

‘मांगहुँ बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।’
(मानस, १/१४८)
‘हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।’
(मानस, ७/४६/५)

अहैतुकी कृपा करनेवाले इस संसार में या तो भगवान हैं या भगवान के अनन्य सेवक! वही मौलिक दाता हैं। इस सर्वोत्कृष्ट दान को पाने के लिए साधक को भी एक दान देना होता है- वह है मन का दान, विचारों का दान, इष्ट के प्रति मन-क्रम-वचन से समर्पण!

“शीश काटि चरनन धरे, तब पैठे घर माँहि।”

श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ के साहित्य जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति से लोकहित में साभार】

Advertisements
Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कन्या पूजन


कन्या पूजन


“बहू ! आज माताजी का पूजन करना है घर में ही पूड़ीयाँ , हलवा और चने का प्रशाद बनेगा ।”
.
“ओहो ! ये त्योहार भी आज ही आना था और ऊपर से ये पुराने रीतिरिवाज ढ़ोने वाली ये सास । इनके मुंह में तो जुबान ही नहीं है जो कुछ कह सकें माँ से ! ”
.
“अरे! यार कभी तो माँ की भी मान लिया करो , हमेशा अपनी ही चलाती हो । इस बार तो अपनी मनमर्जी को लगाम दो! ”
.
“तुम्हें मालूम है न ….मुझसे ये सब नहीं होने वाला है । रही बात बच्चियों में देवी माँ को देखने की तो मैं समझती हूँ कि अब जिस तरह से छोटी -छोटी देवियाँ राक्षसों द्वारा हलाल की जा रहीं हैं , पूजा से ज्यादा उन्हें बचाने की जरूरत है ।”
.
“ये तुम और तुम्हारी समाज सेवा मैं तो समझ सकता हूँ मगर माँ नहीं समझेगी और ज्यादा देर हुई तो वो खुद बैठ जाएंगी रसोई में और फिर जो होगा तुम जानती ही हो । ”
.
“कोई चिंता की जरूरत नहीं है मुझे मालूम था कि आज ये सब होने वाला है और मैं पहले ही इंतजाम करके आई थी रात को ही । पंडित जी सुबह नौ बजे आएंगे और साथ ही बच्चियाँ भी आएंगी ।”
.
लगभग एक घंटे बाद दरवाजे की घंटी बजी तो पंडित जी के साथ दस बारह बच्चियाँ भी थी । पूजा स्थान पर पंडित जी को सामान देकर वह सास को भी बुला लाई । पूजा अच्छी तरह से सम्पन्न हुई अब भोग लगाने की बारी थी ।
.
“जाओ बहू भोग का सामान ले आओ !”
.
“लंच बॉक्स, कपियाँ, पेंसिलें , चाकलेट और कपड़े की कई थैलियाँ बहू ने सामने रख दीं । ”
.
“अरे! ये क्या है ? कन्या पूजन करना है मुझे ! देवी को भोग लगाना है । प्रसाद क्या बनाया है वो लेकर आओ ।”
.
“माँ ! देवी तो कोई प्रसाद नहीं खाती उन्हें जो भी भोग लगा दो वे ग्रहण कर लेती है । ये बच्चियाँ भी देवी का ही रूप हैं । मैंने इनके लिए पनीर, पुलाव बनाया है और रोटियाँ हैं मिठाई बाहर से मँगवा ली है । इसी का भोग लगेगा आज !”
.
“राम राम राम ! कैसी बात कर रही हो बहू ? क्या तुम पूजा को भी मज़ाक समझती हो ? देवी माँ नाराज हो जाएंगी !”
.
“माँ जी ! ये तो मैं नहीं जानती कि देवी माँ नाराज होंगी या नहीं पर ये जरूर जानती हूँ कि ये बच्चियाँ जो मैंने पास की गरीब बस्ती से बुलाई हैं आज जरूर खुश होंगी और दूसरों को खुशी देना ही पूजा है मेरे लिए । ”
.
सास हैरान और परेशान उस सामान को देख रही थी और साथ ही बहू को ।
.
“पंडित जी से देवी माँ को मिठाई और भोजन का भोग लगवाकर पूजा समाप्त करें ताकि बच्चियों को भोजन करवाया जा सके ।”
.
बच्चियों को अच्छे और नए आसनों पर बैठाया गया । सब के सामने भोजन परोसा गया और प्रेम से बच्चियों को भोजन करवाया गया ।
.
“आइये माँ जी ! लीजिये कन्याओं को अपने हाथों से उपहार दीजिये !”
.
अनमने मन से सास आगे आई तो बहू ने पचास -पचास के नोट उनके हाथों में थमा दिये । हर बच्ची को लंच बॉक्स, कपियाँ, पेंसिलें , चाकलेट और कपड़े की थैली के साथ पचास रुपये दिये ।
.
“बहू ! तू तो पैसे लुटा रही है बेकार में इन गरीबों पर और ये मनमानी ठीक नहीं है ।”
.
“माँ जी ! ये जिंदा देवियाँ हैं , इनकी मदद ही हमारी पूजा है । जो प्रसाद गलियों में फेंक दिया जाय और अनादर हो, मैं पसंद नहीं करती , इसलिए मैंने जरूरत का सामान उन्हें दिया है जिस से सही में खुशी हासिल हो । वैसे भी पूजा के बदले हम चाहते भी क्या हैं खुशी ही न ! अब मेरी टेढ़ी-मेढ़ी पूड़ीयाँ ये खुशी कहाँ दे पाती !”
.
“सही कह रही है बहू ! मैं ही न समझ सकी तेरी बात । तेरी पूजा ही सफल है ।” और बहू को गले लगा लिया ।

हैपी नवरात्रि आपको और आपके पुरे परिवार को

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

गौतम बुद्ध के पांच शिशय थे


गौतम बुद्ध के पांच शिशय थे, जब वे तपश्चर्या कर रहे थे। फिर बुद्ध को लगा कि इस तपश्चर्या में कुछ सार नहीं है, व्यर्थ मैं अपने शरीर को सुखा रहा हूं; यह तो निपट दुखवाद है; यह तो आत्महिंसा है। तो उन्होंने तपश्चर्या छोड़ दी। वे जो पांच शिशय थे वे तो परंपरागत रूप से इसीलिए उनके शिशय थे कि बुद्ध तपश्चर्या में बड़े कुशल थे, अपने को सताने में लाजवाब थे। ऐसे-ऐसे ढंग से अपने को सताते थे, ऐसी-ऐसी नई-नई ईजादें करते थे अपने को सताने की, इसीलिए वे पांच उनसे प्रभावित थे। उन्होंने देखा: यह तो भ्रशट हो गया, गौतम भ्रशट हो गया। अब इसने तपश्चर्या छोड़ दी। तो वे छोड़ कर चले गए।
और तब बुद्ध को परमज्ञान हुआ। जब परमज्ञान बुद्ध को हुआ तो उन्होंने कहा कि पहले मैं उन पांच को खोजूं जो मुझे छोड़ कर चले गए थे। कुछ भी हो, वे मेरे साथ वर्षों रहे। वे मुझे छोड़ कर चले गए हैं, मैंने उन्हें नहीं छोड़ दिया है। उनकी नासमझी के लिए इतना बड़ा दंड देना उचित नहीं है। तो वे उनकी तलाश में आए, इसीलिए सारनाथ तक आए, क्योंकि जैसे-जैसे उनकी खोज की, पता चला वे और आगे, और आगे, पता चला वे सारनाथ में रुके हुए हैं, तो वे सारनाथ आए। सुबह का वक्त है। ऐसी ही सुबह रही होगी। वे पांचों बैठे हैं एक वृक्ष के नीचे और उन्होंने देखा बुद्ध को आते हुए। उन पांचों ने कहा: यह भ्रशट गौतम आ रहा है। हम इसको उठ कर नमस्कार न करें। यह भ्रशट हो चुका है, इसको क्यों नमस्कार करना? हम इसकी तरफ पीठ ही रखें। आए और खुद ही बैठ जाए तो बैठ जाए। हम यह भी नहीं कहेंगे कि आइए, पधारिए, विराजिए। हम क्यों कहें? इससे तो हम ही बेहतर हैं, कम से कम अपने मार्ग पर तो डटे हुए हैं। यह तो मार्ग से च्युत हो गया।
उन्होंने पांचों ने तय कर लिया। मगर जैसे-जैसे बुद्ध करीब आए, वैसे-वैसे मुश्किल होने लगी। एक उठा और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। दूसरा उठा और वह भी गिरा। फिर तो पांचों उठे और बुद्ध के चरणों पर गिरे। बुद्ध ने कहा कि मेरे मित्रो, इतनी जल्दी अपना संकल्प नहीं छोड़ देना चाहिए। क्या तुमने तय नहीं किया था…क्योंकि तुम्हारे ढंग देख कर मुझे लग रहा था कि तुमने तय किया है…कि सम्मान नहीं दोगे। तुमने मेरी तरफ पीठ कर ली। फिर तुम मेरे चरणों में क्यों गिरे?
उन्होंने कहा: यह तो हमें भी पता नहीं। मगर तुम्हारे साथ एक हवा आई, तुम्हारे साथ गंध का एक प्रवाह आया! तुम क्या आए, एक ऊर्जा आई, एक वातावरण आया। तुम क्या आए जैसे वसंत आया और फूल अपने आप खिलने लगें। हम करें भी तो क्या करें?
इसको मैं श्रद्धा कहता हूं: फूल अपने आप खिलने लगे।
आदर, आनंद मैत्रेय, औपचारिक होता है–दो कौड़ी का, उसका कोई भी मूल्य नहीं। मूल्य है तो श्रद्धा का। भाषाकोश में तो दोनों का एक ही अर्थ है, लेकिन जीवन के कोष में दोनों बड़े विपरीत हैं। श्रद्धा में प्राण होते हैं; आदर लाश है। आदर होता है परंपरागत; श्रद्धा होती है व्यक्तिगत। आदर होता है सामूहिक; श्रद्धा होती है निजी, आत्मगत। श्रद्धा अपना निर्णय है; आदर दूसरों का निर्णय है। और जो दूसरों के निर्णय से चलता है, वह भी कोई आदमी है? भेड़ है! आदर में शर्त होती है, फिर शर्त चाहे कोई भी हो–आयु की शर्त हो, कि कोई उम्र में बड़ा है, तो उसको आदर देना चाहिए। अब उम्र में बड़े होने से क्या आदर का संबंध है? कोई संबंध नहीं है। कितने तो बूढ़े हैं दुनिया में, जो बचकानी प्रवृत्तियों से भरे हुए हैं। कोई बूढ़े होने से ही थोड़े प्रौढ़ होता है। काश प्रौढ़ता इतनी सस्ती बात होती, कि बूढ़े हो गए और प्रौढ़ हो गए! अधिकतर लोग तो बाल धूप में ही सफेद करते हैं। जीवन का अनुभव और बात है। उम्र का बढ़ते जाना और बात है। उम्र तो जानवरों की भी बढ़ेगी। उम्र तो बढ़ती चली जाएगी। वह तो घड़ी और कैलेंडर की बात है; आत्मा की नहीं। ऐसे भी पड़े रहे तो भी उम्र बढ़ती ही रहेगी; कुछ भी न किया तो भी उम्र बढ़ती रहेगी। सब तरह की मूढ़ताएं करते रहे तो भी उम्र बढ़ती रहेगी। उम्र का कोई संबंध बोध से नहीं है।

🌺🌺 रहिमन धागा प्रेम का # 10
🌺🌺🌺🌺 ओशो

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक वृद्ध सन्यासी महात्मा हिमालय की कन्दराओं में कहीं रहते थे।


एक वृद्ध सन्यासी महात्मा हिमालय की कन्दराओं में कहीं रहते थे।
उनकी सहृदयता, ज्ञान,और बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर -दूर तक फैली थी।
एक दिन एक महिला उनके पास पहुंची,दण्डवत प्रणाम कर रुआंसी होते हुए अपना दुखड़ा सन्यासी महात्माजी को बताया……
.
“बाबा जी!, मेरे पति मुझसे बहुत प्रेम करते थे, लेकिन जबसे वह युद्ध से लौटें हैं ठीक से बात तक भी नहीं करते।”
.
“युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है।” सन्यासी महात्मा जी ने जवाब दिया।
.
“महात्मन!सुना है कि आपकी दी हुई औषधि इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है,कृपया मेरी मनोस्थिति को समझते हुए आपश्री मुझे वह औषध प्रदान करने एवम उसकी सेवन विधि बताने की अनुकम्पा करें।”
महिला ने कातर स्वर में विनती की l
.
सन्यासी महात्मा ने कुछ देर मन ही मन विचार किया और बोले,…….
देवी! मैं तुम्हे वह औषधि ज़रूर दे देता किन्तु उसे बनाने के लिए ऐसी वस्तु की आवश्यकता है जो इस समय मेरे पास नहीं है,मेरे शिष्य भी सुदूर तीर्थ यात्रा पर गए हुए हैं एवम मेरे लिए उस वस्तु का इंतज़ाम करना फिलहाल तो दुष्कर है।”
.
“मेरे लिए औषध निर्माण हेतु आपश्री को जिस भी वस्तु की आवश्यकता हो कृपया अवगत करवाएं।मैं हर हाल में उसे आपश्री के श्रीचरणों में समर्पित करूंगी।”
.
करबद्ध होकर महिला ने विश्वाश पूर्वक कहा।
.
“मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए।” सन्यासी महात्मा शान्त स्वर में बोले।
.
अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी ,बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखाई दिया,बाघ उसे देखते ही दहाड़ उठा। महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी l
अगले कुछ दिनों तक यही हुआ, महिला हिम्मत कर उस बाघ के पास जाती और डर कर वापस चली जाती।
महीना बीतते-बीतते बाघ महिला की मौजूदगी का अभ्यस्त हो गया और अब वह उसे देख कर भी सामान्य ही रहता l
अब तो महिला बाघ के लिए मांस भी लाने लगी , और बाघ बड़े चाव से उसे खाता।
.
बाघ और महिला की दोस्ती बढ़ने लगी और तो और महिला तो बाघ को थपथपाने भी लगी और देखते देखते एक दिन वह भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया l
फिर क्या था,बिना कोई देरी किये महिला जा पँहुची सन्यासी महात्मा जी के पास।
खुश होते हुए बोली, “ले आई बाघ की मूँछ का बाल।”
लेकिन यह क्या….
“बहुत अच्छा” कहते हुए सन्यासी ने उस बाल को जलती हुई आग में फ़ेंक दिया l
.
“अरे यह क्या बाबा जी, आप नहीं जानते इस बाल को लाने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये और आपने इसे जला दिया ……अब मेरी औषधि कैसे बनेगी ?” महिला घबराते हुए बोली l
.
“अब तुम्हे किसी औषधि की ज़रुरत ही नहीं रही” सन्यासी महात्मा मुस्कुराते हुए बोले,” जरा सोचो! तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया, जब एक हिंसक पशु को धैर्य और प्रेम से जीता जा सकता है तो क्या एक इंसान को नहीं ? जाओ जिस तरह तुमने बाघ को अपना मित्र बना लिया उसी तरह अपने पति के अन्दर प्रेम भाव जागृत करो l”
.
महिला महात्मा जी की बात समझ गयी,एक नए आत्मविश्वास के साथ लौट पड़ी अपने पति का वही पुराना प्रेम पाने को।
जीवन बहुत छोटा है।उसे सरल रूप से जिया जाय तभी बेहतर है,अन्यथा उलझकर तो हम अपनी परेशानियों को ही बढ़ाते है।
मनुष्य चाहे तो अपने आत्मविश्वास धैर्य और प्रेम से क्या नहीं कर सकता।

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

चार आने का हिसाब


चार आने का हिसाब___________

https://www.facebook.com/AdhyatmikKahaniya/
बहुत समय पहले की बात है चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था , दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी, उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। उसने कई ज्योतिषियों और पंडितों से इसका कारण जानना चाहा, बहुत से विद्वानो से मिला, किसी ने कोई अंगूठी पहनाई तो किसी ने यज्ञ कराए , पर फिर भी राजा का दुःख दूर नहीं हुआ, उसे शांति नहीं मिली एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा , तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी , किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – ” मैं एक राहगीर हूँ , मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं , चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो। किसान – ” ना – ना सेठ जी , ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं , इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें , मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं। “
किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी , वह बोला , ” धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं ?”
“सेठ जी , मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ , और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ… “, किसान बोला।
“क्या ? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं , और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं , यह कैसे संभव है !” , राजा ने अचरज से पुछा।
” सेठ जी”, किसान बोला ,” प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है …. प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है। “
” तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो ?, राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया।
किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया , ”
इन चार आनो में से एक मैं कुएं में डाल देता हूँ , दुसरे से कर्ज चुका देता हूँ , तीसरा उधार में दे देता हूँ और चौथा मिटटी में गाड़ देता हूँ ….”
राजा सोचने लगा , उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था , पर वो जा चुका था।
राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।
दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया , अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया।
बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया।
राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया।
” मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ , और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ; बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो ?” , राजा ने प्रश्न किया।
किसान बोला ,” हुजूर , जैसा की मैंने बताया था , मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ , यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ, दुसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ , यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ , तीसरा मैं उधार दे देता हूँ , यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ, और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ , यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक ,सामाजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ। “
राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का समाधान हो चुका था , वह जान चुका था की यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा।
मित्रों, देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है ? पैसों के मामलों में हम कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं , लाइफ को बैलेंस्ड बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रूपये कमा लें पर फिर भी प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे.

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

चमत्कारी ताबीज़


चमत्कारी ताबीज़

https://www.facebook.com/AdhyatmikKahaniya/

किसी गांव में राम नाम का एक नवयुवक रहता था। वह बहुत मेहनती थे, पर हमेशा अपने मन में एक शंका लिए रहता कि वो अपने कार्यक्षेत्र में सफल होगा या नहीं! कभी-कभी वो इसी चिंता के कारण आवेश में आ जाता और दूसरों पर क्रोधित भी हो उठता।
एक दिन उसके गांव में एक प्रसिद्ध महात्मा जी का आगमन हुआ।

खबर मिलते ही राम, महात्मा जी से मिलने पहुंचा और बोला, “ महात्मा जी मैं कड़ी मेहनत करता हूँ, सफलता पाने के लिए हर-एक प्रयत्न करता हूँ; पर फिर भी मुझे सफलता नहीं मिलती। कृपया आप ही कुछ उपाय बताएँ।”

महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा- बेटा, तुम्हारी समस्या का समाधान इस चमत्कारी ताबीज में है, मैंने इसके अन्दर कुछ मन्त्र लिखकर डालें हैं जो तुम्हारी हर बाधा दूर कर देंगे। लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए तुम्हे एक रात शमशान में अकेले गुजारनी होगी।”

शमशान का नाम सुनते ही राम का चेहरा पीला पड़ गया, “ लल्ल..ल…लेकिन मैं रात भर अकेले कैसे रहूँगा…”, राम कांपते हुए बोला।

“घबराओ मत यह कोई मामूली ताबीज नहीं है, यह हर संकट से तुम्हे बचाएगा।”, महात्मा जी ने समझाया।

राम ने पूरी रात शमशान में बिताई और सुबह होती ही महात्मा जी के पास जा पहुंचा, “ हे महात्मन! आप महान हैं, सचमुच ये ताबीज दिव्य है, वर्ना मेरे जैसा डरपोक व्यक्ति रात बिताना तो दूर, शमशान के करीब भी नहीं जा सकता था। निश्चय ही अब मैं सफलता प्राप्त कर सकता हूँ।”

इस घटना के बाद राम बिलकुल बदल गया, अब वह जो भी करता उसे विश्वास होता कि ताबीज की शक्ति के कारण वह उसमें सफल होगा, और धीरे-धीरे यही हुआ भी…वह गाँव के सबसे सफल लोगों में गिना जाने लगा।

इस वाकये के करीब 1 साल बाद फिर वही महात्मा गाँव में पधारे।

राम तुरंत उनके दर्शन को गया और उनके दिए चमत्कारी ताबीज का गुणगान करने लगा।

तब महात्मा जी बोले,- बेटे! जरा अपनी ताबीज निकालकर देना। उन्होंने ताबीज हाथ में लिया, और उसे खोला।
उसे खोलते ही राम के होश उड़ गए जब उसने देखा कि ताबीज के अंदर कोई मन्त्र-वंत्र नहीं लिखा हुआ था…वह तो धातु का एक टुकड़ा मात्र था!

राम बोला, “ ये क्या महात्मा जी, ये तो एक मामूली ताबीज है, फिर इसने मुझे सफलता कैसे दिलाई?”

महात्मा जी ने समझाते हुए कहा- ” सही कहा तुमने, तुम्हें सफलता इस ताबीज ने नहीं बल्कि तुम्हारे विश्वास की शक्ति ने दिलाई है। पुत्र, हम इंसानों को भगवान ने एक विशेष शक्ति देकर यहाँ भेजा है। वो है, विश्वास की शक्ति। तुम अपने कार्यक्षेत्र में इसलिए सफल नहीं हो पा रहे थे क्योंकि तुम्हें खुद पर यकीन नहीं था…खुद पर विश्वास नहीं था। लेकिन जब इस ताबीज की वजह से तुम्हारे अन्दर वो विश्वास पैदा हो गया तो तुम सफल होते चले गए ! इसलिए जाओ किसी ताबीज पर यकीन करने की बजाय अपने कर्म पर, अपनी सोच पर और अपने लिए निर्णय पर विश्वास करना सीखो, इस बात को समझो कि जो हो रहा है वो अच्छे के लिए हो रहा है और निश्चय ही तुम सफलता के शीर्ष पर पहुँच जाओगे। “

राम महात्मा जी के बात को गंभीरता से सुन रहा था और उसे आज एक बहुत बड़ी सीख मिली थी कि यदि उसे किसी भी क्षेत्र में सफल होना है तो उसे अपने प्रयत्नों पर विश्वास करना होगा। यदि वह खुद पर विश्वास कर लेता है तो उसकी सफलता का प्रतिशत हमेशा बढ़ता चला जायेगा।

मित्रों, सफलता का सीधा सम्बन्ध आपके अंदर के विश्वास से होता है। यदि आप खुद पर यकीन रखते हैं तो आपको हाथों में अलग-अलग पत्थरों के अंगूठियाँ पहनने की जरूरत नहीं, माला या ताबीज के साथ की जरूरत नहीं है। बस मन में विश्वास का होना जरूरी है कि आप कर सकते हैं, सफल हो सकते हैं और आप सफल हो जायेंगे भी।

🏆विश्वास रखिये, आगे बढ़िए और सफलता पाइए।🏆

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक व्यक्ति बहुत परेशान था। – उसके दोस्त ने उसे सलाह दी कि कृष्ण भगवान की पूजा शुरू कर दो।


एक व्यक्ति बहुत परेशान था। – उसके दोस्त ने उसे सलाह दी कि
कृष्ण भगवान की पूजा शुरू कर दो।

उसने एक कृष्ण भगवान की मूर्ति घर
लाकर उसकी पूजा करना शुरू कर दी।
कई साल बीत गए लेकिन …
कोई लाभ नहीं हुआ।

एक दूसरे मित्र ने कहा कि
तू काली माँ कीपूजा कर,
जरूर तुम्हारे दुख दूर होंगे।
अगले ही दिन वो एक काली माँ
की मूर्ति घर ले आया।

कृष्ण भगवान की मूर्ति मंदिर के ऊपर
बने एक टांड पर रख दी और
काली माँ की मूर्ति मंदिर में रखकर
पूजा शुरू कर दी।

कई दिन बाद उसके दिमाग में ख्याल आया
कि जो अगरबत्ती, धूपबत्ती
काली जी को जलाता हूँ, उसे तो
श्रीकृष्ण जी भी सूँघते होंगे।
ऐसा करता हूँ कि श्रीकृष्ण का मुँह बाँध देता हूँ।

जैसे ही वो ऊपर चढ़कर श्रीकृष्ण का
मुँह बाँधने लगा कृष्ण भगवान ने उसका
हाथ पकड़ लिया। वो हैरान
रह गया और भगवान से पूछा –
इतने वर्षों से पूजाकर रहा था तब
नहीं आए! आज कैसे प्रकट हो गए?

भगवान श्रीकृष्ण ने समझाते हुए कहा,
“आज तक तू एक मूर्ति
समझकर मेरी पूजा करता था।
किन्तु आज तुम्हें एहसास हुआ कि

“कृष्ण साँस ले रहा है ”
बस मैं आ गया।”

प्यार से कहिये – ” जय श्री कृष्णा “👏🙏

उर्मिला सुकला