Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एकअनोखा मुकदमा


एकअनोखा मुकदमा💢

न्यायालय में एक मुकद्दमा आया ,जिसने सभी को झकझोर दिया |अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं| मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था|
एक 60 साल के व्यक्ति ने ,अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था|
मुकदमा कुछ यूं था कि “मेरा 75 साल का बड़ा भाई ,अब बूढ़ा हो चला है ,इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता |मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है |
मैं अभी ठीक हूं, सक्षम हू। इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय”।
न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया| न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो|
मगर कोई टस से मस नहीं हुआ,बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ |अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी है या मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो।
छोटा भाई कहता कि पिछले 35 साल से,जब से मै नौकरी मे बाहर हू अकेले ये सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना कर्तव्य कब पूरा करूँगा।जबकि आज मै स्थायी हूं,बेटा बहू सब है,तो मां भी चाहिए।
परेशान न्यायाधीश महोदय ने सभी प्रयास कर लिये ,मगर कोई हल नहीं निकला|
आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है|
मां कुल 30-35 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी |उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान बराबर हैं| मैं किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाकर ,दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती|
आप न्यायाधीश हैं , निर्णय करना आपका काम है |जो आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।
आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है| ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।
फैसला सुनकर बड़े भाई ने छोटे को गले लगाकर रोने लगा |
यह सब देख अदालत में मौजूद न्यायाधीश समेत सभी के आंसू छलक पडे।
कहने का तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो ,तो इस स्तर का हो|
ये क्या बात है कि ‘माँ तेरी है’ की लड़ाई हो,और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं |यह पाप है।
धन दौलत गाडी बंगला सब होकर भी यदि मा बाप सुखी नही तो आप से बडा कोई जीरो(0)नही।

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

❤ भगवान अकेला है ❤

जो आदमी सब को छोड़ कर , अपने पैरो पर खड़ा हो जाता है, वह भगवान का प्यारा हो जाता है । क्यों की भगवान उसे चाहता है जो किसी को पकड़े हुए नही है, जो अपने बल पर खड़ा है ।

मैंने सुनी है एक कहानी। एक मुसलमान फकीर था। वह रात सोया । उसने एक स्वप्न देखा की वह स्वर्ग चला गया है। सपने में हि लोग स्वर्ग जाते है।
असलियत में तो नर्क चले जाए लेकिन स्वप्न में कोई नर्क क्यों जाए? स्वप्न में तो कम से कम स्वर्ग जाना चाहिए।

स्वप्न में वह चला गया। और देखता है की स्वर्ग के रास्ते पर बड़ी भीड़ भाड़ है,
लाखों लोगों की भीड़ है। उसने पूछा की क्या बात है आज? तो भीड़ के रास्ते चलते किसी आदमी ने कहा की भगवान का जन्म दिन है। उसका जलसा मनाया जा रहा है।

तो उसने कहा बड़े सौभाग्य मेरे, भगवान के बहोत दिनों से दर्शन करने थे। वह मौका मिल गया। आज भगवान का जन्म दिन है, अच्छे मौके पर में स्वर्ग आ गया।

वह भी रास्ते के किनारे लाखों दर्शको की भीड़ में खड़ा हो गया । फिर एक घोड़े पर सवार एक बहोत शानदार आदमी, उसके साथ लाखो लोग निकले।
वह झुककर लोगो से पूछता है क्या जो घोड़े पर सवार है वे ही भगवान है ? तो किसी ने कहा, नही वह भगवान नही है ,यह हज़रत मोहम्मद है और उनके पीछे उनको मानने वाले लोग है ।

वह जुलुस निकल गया। फिर दुसरा जुलुस है और रथ पर सवार एक बहोत महिमाशाली व्यक्ति है। वह पूछता है क्या ये ही भगवान है ? किसी ने कहा नही, ये भगवान नही, यह राम है और राम के मानने वाले लोग।

और क्राइस्ट और बुद्ध और महावीर और जरथुस्त्र और कंफ्यूशियश और न मालुम कितने महिमाशाली लोग निकलते है और उनकी मानने वाले लोग निकलते है।

आधी रात बीत जाती है, फिर धीरे धीरे रास्ते में सन्नाटा हो जाता है । फिर यह आदमी सोचता है की अभी भगवान नही निकले। वे कब निकलेंगे? और जब लोग जाने के करीब हो गए है, रास्ता उजड़ने लगा है, कोई रास्ते पर ध्यान नही दे रहा है, तब तक एक बूढ़ा-सा आदमी अकेले चला आ रहा है। उसके साथ कोई भी नही है। वह हैरान होता है कि ये महाशय कौन है ? जिनके साथ कोई भी नही । यह अपने आप ही घोड़े पर बैठकर चले आ रहे है, बिलकुल अकेले। तो ये चलता हुआ आदमी कहता है की हो न हो, यह भगवान होंगे । क्यों कि भगवान से अकेला और दुनिया में कोई भी नही है ।

वह जाकर भगवान को ही पूछता है उस घोड़े पर बैठे हुए बूढ़े आदमी से की महाशय आप भगवान है ? में बहुत हैरान हूँ, मोहम्मद के साथ बहुत लोग थे,
क्राइष्ट के साथ बहुत लोग थे, राम के साथ बहुत लोग थे, सबके साथ बहुत बहुत लोग थे, आपके साथ कोई भी नही?

भगवान की आँखों से आसूं गिरने लगे और भगवान ने कहा ,सारे लोग उन्ही के बिच बंट गए है, कोई बचा ही नही जो मेरे साथ हो सके।कोई राम के साथ,
कोई कृष्ण के साथ, मेरे साथ तो कोई भी नहीं। और मेरे साथ वही हो, में अकेला ही हूँ !

घबराहट में उस फकीर की नींद खुल गयी। नींद खुल गयी तो पाया वह
जमीन पर अपने झोंपड़े में है। वह पास पड़ोस में जाकर केहने लगा की मैंने एक बहुत दुखद स्वप्न देखा है, बिलकुल झूठा स्वप्न देखा है।

मैंने यह देखा की भगवान अकेला है । यह कैसे हो सकता है? वह फकीर मुझे भी मिला और मैंने उससे कहा की तुमने सच्चा ही स्वप्न देखा है।

भगवान से ज्यादा अकेला कोई भी नही। क्यों की जो हिन्दू हो सकता है
वह भगवान के साथ नही हो सकता। जो मुसलमान है वह भगवान के साथ नही हो सकता है। जो जैन है वह भगवान के साथ नही हो सकता है। जो कोई भी नही है, जिसका कोई विशेषण नही है, जो किसी का अनुयायी नही है, जो किसी का शिष्य नही है, जो बिलकुल अकेला है, जो बिलकुल नितान्त अकेला है वही केवल उस नितान्त अकेले से जुड़ सकता है, जो भगवान है।

अकेले में, तन्हाई मैं, लोनलिनैस में, बिलकुल अकेले में वह द्वार खुलता है जो भगवान से जोड़ता है । भीड़ भाड़ से भगवान का कोई संबंध नही।

!! ओशो !!

[ नेति नेति : 9 ]

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, Bollywood

गिरीश कर्नाड का वास्तविक चेहरा….

“गिरीश कर्नाड की मौत मुझे अपने बचपन की ओर ले गयी… शायद कक्षा 4 या 5 में पढ़ते होंगे कि पिक्चरों में अरुचि रखने वाले पिता जी ने एक इतवार को कहा कि हिन्द टाकीज में एक बढ़िया पिक्चर ‘मंथन’ लगी है ,चलो देखने चलते थे… घर के सभी सदस्य 3 रिक्शों पर सवार होकर हिन्द टाकीज पहुचे.. पिता के उत्साह का रहस्य खुला… पिक्चर एक कला फ़िल्म थी और साथ मे टैक्सफ्री भी ! शायद ढाई रुपये का ड्रैस सर्किल का टिकिट था ! बालकनी में कितने लोग होंगे…मगर ड्रैस सर्किल में हमारा ही परिवार था ! हाल खाली पड़ा था…
पिक्चर गुजरात की दुग्ध क्रांति Operation Flood पर थी… हीरो गिरीश कर्नाड थे… हीरोइन पिक्चर में आदिवासी बनी हुई… स्मिता पाटिल थीं ! पिक्चर में कोऑपरेटिव,दूध उत्पादन और गांव वगैरा था… मगर हमे स्मिता पाटिल और गिरीश कर्नाड का नैन मटक्का ही अच्छा लगा… एक कोई गाना भी था पिक्चर में ” मोरे घर आँगड़ा ” टाइप का ! मगर धीर -गंभीर गिरीश कर्नाड हमे भा गए ! स्मिता पाटिल की शक्ल हमारे घर की महरी से मिलती जुलती लगी तो उनसे हमारा लगाव आगे न बढ़ सका !… पिक्चर के बाद हम सभी भाई -बहन और मां… पिता जी से नाराज़ हो गए ! हम सब समझे थे कि कोई धर्मेंद्र – माला सिन्हा जैसे किसी हीरो -हीरोइन की फ़िल्म देखने को मिलेगी !
बाद में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में ‘मालगुडी डेज़’ में गिरीश कर्नाड ‘स्वामी’ के पिता के रूप में दिखाई दिए .. जनाब, यह वह सीरियल था जो आज भी दक्षिणी भारत के घर,पोस्ट ऑफिस,गाँव का रेलवे स्टेशन… हरे भरे खेत, बारिश, जंगल और स्वामी के बालमन से उत्पन्न परिस्थियों से उपजी कहानियों की याद दिला देता है !…
मगर असली ज़िन्दगी में गिरीश कर्नाड एक गुस्सैल,दंभी,वामपंथी साम्यवादी थे ! तीन विषयों में ऑक्सफोर्ड से परास्नातक थे ! अनेक किताबे भी लिखी… वी बी कारंत के बाद सबसे लब्धप्रतिष्ठ नाट्यकार थे… लिखते भी थे… अभिनय क्या बात थी ,वाह ! मगर सनातन संस्कृति से उनकी नफरत इस हद तक थी वह इसके खत्म हो जाने की कामना करते थे ! हिंदुहन्ता टीपू सुल्तान के नाम से बंगलौर हवाई अड्डे का नामकरण चाहते थे ! गौरी लंकेश,तीस्ता सीतलवाड़,जावेद आनंद ,प्रकाशराज और प्रशांत भूषण जैसों से उनका याराना था ! JNU में गिरीश कर्नाड पूजे जाते थे !…
टाटा लिटरेरी फेस्टिवल 2012 का मुम्बई में आयोजन था ! विश्व-प्रसिद्ध बुकर और नोबल पुरस्कार विजेता सर वी एस नायपाल का स्वागत होना था, उनका व्याख्यान भी था ! उनसे पहले गिरीश कर्नाड को थियेटर में योगदान हेतु 20 मिनट के व्याख्यान के लिए बुलाया गया ! दरअसल कर्नाड… सर नायपाल की पुस्तक ‘A Wounded Civilization ‘ से बहुत नाराज थे ! Wounded Civilization में सर नायपाल ने कर्नाटक में हम्पी नगर को मुस्लिम बादशाहों द्वारा नष्ट करने का भावपूर्ण वर्णन किया था ! साथ ही साथ बाबरी ध्वंस को हिंदुओं का साहसिक कार्य बताया था… मुम्बई दंगों में मुस्लिम आतंक की चर्चा की थी ! यह किताब पूरी दुनिया मे सराही गई… हिंदुओं के पक्ष को दुनिया ने जाना ! गिरीश कर्नाड एक वामपंथी और नक्सली समर्थक होने के नाते हिंदु सभ्यता की तारीफ या बाबरी ध्वंस का महिमा मंडन कैसे सुन सकते थे ?..
कार्यक्रम में वी एस नायपाल अपनी पत्नी के साथ मौजूद थे ! जैसे ही गिरीश कर्नाड को भाषण का मौका मिला, उन्होंने अपना विषय छोड़… सर वी एस नायपाल पर चढ़ाई कर दी ! उन्हें वस्तुतः गलियों से नवाजा… उन्हें गद्दार कहा… एक नोबिल पुरुस्कार विजेता… जिसका सम्मान पूरी दुनिया करती थी ,इंग्लैंड ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी थी… उनकी पत्नी लेडी नादिरा नायपाल भी कार्यक्रम में अपने पति का… उनके पुरखों के देश मे सम्मान होते देखने साथ आईं हुई थी ! गिरीश कर्नाड ने 40 मिनट तक सर नायपाल को सैकड़ो राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के सामने गलियाया… आयोजक अनिल धारकर ने भी गिरीश की बदतमीज़ी को चालू रहने दिया….
अंततः विश्वप्रसिद्ध दर्जनों किताबों के लेखक नोबिल पुरुस्कार विजेता, जो खुद को भारत की संतान कहता था… फफक- फफक कर रो पड़ा… उनकी पत्नी भी अपमान के सन्निपात से जड़ रह गईं… अपमानित और रोते हुए… सर वी एस नायपाल कार्यक्रम छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो गए ! गिरीश कर्नाड हंसते हुए मंच से उतरे ! उसके बाद मृत्यु होने तक सर वी एस नायपाल ने भारत की ओर कभी मुख उठा कर नहीं देखा !! …
गिरीश कर्नाड !! यह लेख… मैंने आपको श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं… वरन सर वी एस नायपाल को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा है ! कर्नाड साहेब आपकी तुलना मैं वी पी सिंह से करूँगा जो 26/11 के दौरान दुखदायी मौत को प्राप्त हुए थे और उनको श्रद्धांजलि देने की फुरसत किसी के पास नहीं थी ….”

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

http://www.navhindu.com

🙏🎪प्रभु के घर में देर है अंधेर नहीं🎪🙏

एक अमीर ईन्सान था उसने समुद्र मे अकेले घूमने के लिए एक नाव बनवाई। छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र की सैर करने निकला। अभी वह आधे समुद्र तक पहुंचा ही था कि अचानक एक जोरदार तुफान आया। और उस तूफ़ान में उसकी नाव पुरी तरह से तहस-नहस हो गई लेकिन वह लाईफ जैकेट की मदद से समुद्र मे कूद गया। जब तूफान शांत हुआ तब वह तैरता-तैरता एक टापू पर पहुंचा लेकिन वहाँ भी कोई नही था।

टापू के चारो और समुद्र के अलावा कुछ भी नजर नही आ रहा था टापू पूरी तरह से वीरान था।

राधा सखी उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने पूरी जिदंगी मे किसी का कभी भी बुरा नही किया तो मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ? उस ईन्सान को लगा कि अगर प्रभू ने मौत से बचाया तो आगे का रास्ता भी प्रभू ही बताएगा। धीरे-धीरे वह वहाँ पर उगे फल-फूल-पत्ते खाकर दिन बिताने लगा। परन्तु जैसे जैसे दिन बीतने लगे अब धीरे-धीरे उसकी आस टूटने लगी, प्रभू पर से उसका भरोसा उठने लगा।

फिर उसने सोचा कि अब पूरी जिंदगी यही इस टापू पर ही बितानी है तो क्यूँ ना एक झोपडी बना लूँ?

फिर उसने झाड की डालियो और पत्तो से एक सुन्दर छोटी सी झोपडी बनाई। उसने मन ही मन कहा कि आज से झोपडी मेँ सोने को मिलेगा आज से बाहर नही सोना पडेगा। रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला बिजलियाँ जोर जोर से कड़कने लगी| तभी अचानक एक बिजली उस झोपडी पर आ गिरी और झोपडी धधकते हुए जलने लगी। यह देख कर वह ईन्सान टूट गया। आसमान की तरफ देखकर बोला हे प्रभू ये तेरा कैसा इंसाफ है?

तूने मुझ पर अपनी कृपा की द्रश्टी क्यूँ नहीं की?

फिर वह ईन्सान हताश होकर सर पर हाथ रखकर रो रहा था तभी अचानक एक नाव टापू के पास आई। नाव से उतरकर दो आदमी बाहर आये और बोले कि हम तुम्हे बचाने आये हैं। दूर से इस वीरान टापू मे जलता हुआ झोपडा देखा तो लगा कि कोई उस टापू पर मुसीबत मे है। अगर तुम अपनी झोपडी नही जलाते तो हमे पता ही नही चलता कि टापू पर कोई है।

उस आदमी की आँखो से आँसू गिरने लगे।

🙏उसने प्रभू से क्षमा माँगी और बोला कि “हे प्रभू मुझे क्या पता कि तूने मुझे बचाने के लिए मेरी झोपडी जलाई थी।यक़ीनन तू अपने भक्तौ का हमेशा ध्यान रखता है। तूने मेरे सब्र का इम्तेहान लिया लेकिन मैं उसमे फैल हो गया। मुझे क्षमा करना। दिन चाहे सुख के हों या दुख के, प्रभू अपने भक्तौ के साथ हमेशा रहता हैं।

🙏🕉️radhey radhey 🙏🕉️

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजीव सुक्ला

🔴दर्पण

एक राजधानी में एक संध्या बहुत स्वागत की तैयारियां हो रही थीं। सारा नगर दीयों से सजाया गया था। रास्तों पर बड़ी भीड़ थी और देश का सम्राट खुद गांव के बाहर एक संन्यासी की प्रतीक्षा में खड़ा था। एक संन्यासी का आगमन हो रहा था। और जो संन्यासी आने को था नगर में, सम्राट के बचपन के मित्रों में से था। उस संन्यासी की दूर-दूर तक सुगंध पहुंच गई थी। उसके यश की खबरें दूर-दूर के राष्ट्रों तक पहुंच गई थीं। और वह अपने ही गांव में वापस लौटता था, तो स्वाभाविक था कि गांव के लोग उसका स्वागत करें। और सम्राट भी बड़ी उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा में नगर के द्वार पर खड़ा था।

संन्यासी आया, उसका स्वागत हुआ, संन्यासी को राजमहल में लेकर सम्राट ने प्रवेश किया। उसकी कुशलक्षेम पूछी। वह सारी पृथ्वी का चक्कर लगा कर लौटा था। राजा ने अपने मित्र उस संन्यासी से कहा, सारी पृथ्वी घूम कर लौटे हो, मेरे लिए क्या ले आए हो? मेरे लिए कोई भेंट?

संन्यासी ने कहा, मुझे भी खयाल आया था, पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटूं तो तुम्हारे लिए कुछ लेता चलूं। बहुत चीजें खयाल में आईं, लेकिन जो चीज भी मैंने लानी चाही, साथ में खयाल आया, तुम बड़े सम्राट हो, निश्चित ही यह चीज भी तुमने अब तक पा ली होगी। तुम्हारे महलों में किस बात की कमी होगी, तुम्हारी तिजोरियों में जो भी पृथ्वी पर सुंदर है, बहुमूल्य है, पहुंच गया होगा, और मैं हूं गरीब फकीर, नग्न फकीर, मैं तुम्हें क्या ले जा सकूंगा। बहुत खोजा, लेकिन जो भी खोजता था यही खयाल आता था तुम्हारे पास होगा और जो तुम्हारे पास हो उसे दुबारा ले जाने का कोई अर्थ न था। फिर भी एक चीज मैं ले आया हूं। और मैं सोचता हूं, वह तुम्हारे पास नहीं होगी।

सम्राट भी विचार में पड़ गया कि यह क्या ले आया होगा? उसके पास कुछ दिखाई भी न पड़ता था, सिवाय एक झोले के। उस झोले में क्या हो सकता था? आप भी कल्पना न कर सकेंगे, वह उस झोले में क्या ले आया था? कोई भी कल्पना न कर सकेगा वह क्या ले आया था? उसने झोले को खोला और एक बड़ी सस्ती सी और एक बड़ी सामान्य सी चीज उसमें से निकाली। एक आईना, एक दर्पण। और सम्राट को दिया और कहा, यह दर्पण मैं तुम्हारे लिए भेंट में लाया हूं, ताकि तुम इसमें स्वयं को देख सको।

दर्पण राजा के भवन में बहुत थे, दीवारें दर्पणों से ढकी थीं। राजा ने कहा, दर्पण तो मेरे महल में बहुत हैं। लेकिन उस फकीर ने कहा, होंगे जरूर, लेकिन तुमने उनमें शायद ही स्वयं को देखा हो। मैं जो दर्पण लाया हूं इसमें तुम खुद को देखने की कोशिश करना।

जमीन पर बहुत ही कम लोग हैं जो खुद को देखने में समर्थ हो पाते हैं। और वह व्यक्ति जो स्वयं को नहीं देख पाता, वह चाहे सारी पृथ्वी देख डाले, तो भी मानना कि वह अंधा था, उसके पास आंखें नहीं थीं। क्योंकि जो आंखें स्वयं को देखने में समर्थ न हो पाएं, वे आंखें ही नहीं।♣️

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

दीनेश प्रताप सिंग

“प्रभु की ओर”*
🕉
जब भगवान् की लगन लग जाती है या भगवान् की ओर जीवन की गति हो जाती है तो जीवन दूसरी ओर जा ही नहीं सकता। यदि जाता है तो इसका यही अर्थ है कि जीवन की गति भगवान् की ओर नहीं है।
एक बूढ़े महात्मा जंगल में रहते थे। उनके पास एक राजा संन्यास लेकर आये। बूढ़े महात्मा ने सोचा जरा इसकी परीक्षा की जाय। एक बार नये महात्मा क्षेत्र में रोटी लेकर आ रहे थे तो इन्होंने जरा कोहनी मार दी। इस पर रोटी गिर गयी, किन्तु उन्होंने बड़े प्रेमपूर्वक बिना किसी क्षोभ के रोटी उठा ली और चल दिये। फिर पीछे गये, धक्का दिया और रोटी फिर गिर गयी। इस बार नये महात्मा ने रोटी उठा ली पर जरा हँसे । पुनः आगे बढ़े फिर उन्होंने वैसा ही किया और रोटी गिरा दी। इस बार वे हँसे और खड़े हो गये। हाथ जोड़कर बोले-“महाराज ! आपने बड़ी कृपा की जो मेरी परीक्षा ली। मैं इतने बड़े राज्य का जब त्याग करके यहाँ आ गया हूँ तो इस रोटी वाली बात में मुझे कौन-सा क्षोभ होगा ?” महात्मा बोले- “इसीलिये रोटी गिराई है। तुम्हें अभी तक राज्य के त्याग की बात याद है। इतना बड़ा त्याग करके आ गये यह तुम अपने मन में याद रखते हो और यही सुनना भी चाहोगे कि कितना बड़ा त्यागी है। अगर, राज्य का महत्व तुम्हारे मन में बना हुआ है तो राज्य का त्याग कहाँ हुआ ? इस त्याग का भी त्याग कर दो तब ठीक है।”
एक बार की बात है कि काशी में मणिकर्णिका घाट पर कुछ लोग बैठे थे। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष को चाँदनी रात थी। कुछ के मन में बात आयी कि चाँदनी रात में नाव पर बैठकर के प्रयाग चलते हैं। वहाँ नाव भाडे पर लिया और उसमें सवार हो गये। काशी में भाँग घुटती है इस कारण बैठने वाले भी भाँग पिये थे और केवट भी। सब बैठ गये तो नाव चलने लगी। सभी सो गये। चलाते-चलाते सबेरा हो गया। सबेरे जब नशा उतरा तो देखा कि नाव वहीं मणिकर्णिका घाटपर ही पड़ी है। आगे गयी ही नहीं। एक ने केवट से पूछा कि क्या तुमने डाँड नहीं चलायी ? उसने कहा कि, “डाँड चलाते-चलाते हमारे हाथ थक गये।” फिर पूछा कि, “तुमने डाँड चलाया तो नाव गयी कैसे नहीं ?” बाद में देखा गया कि रस्सा खोला ही नहीं गया था। इसी प्रकार हम लोगों ने साधना की कहाँ ? जगत् का रस्सा बँधा ही है। रस्सा बाँधे रखकर कहते हैं कि भगवान् हमें मिले ही नहीं। अरे ! उधर तुम गये ही कहाँ ? रस्सा खोलो और भगवान् की ओर नाव ले जाओ फिर तुरन्त वहाँ पहुँचोगे।
*

जय जय श्री राधे*🙏🙏🏻🙏🏻🌹

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पुष्पा गुप्ता

. “नियम का महत्व”

एक संत थे। एक दिन वे एक जाट के घर गए। जाट ने उनकी बड़ी सेवा की। सन्त ने उसे कहा कि रोजाना नाम -जप करने का कुछ नियम ले लो। जाट ने कहा बाबा, हमारे को वक्त नहीं मिलता। सन्त ने कहा कि अच्छा, रोजाना ठाकुर जी की मूर्ति के दर्शन कर आया करो। जाट ने कहा मैं तो खेत में रहता हूँ और ठाकुर जी की मूर्ति गाँव के मंदिर में है, कैसे करूँ ?
संत ने उसे कई साधन बताये, कि वह कुछ-न-कुछ नियम ले लें। पर वह यही कहता रहा कि मेरे से यह बनेगा नहीं, मैं खेत में काम करूँ या माला लेकर जप करूँ। इतना समय मेरे पास कहाँ है ? बाल-बच्चों का पालन पोषण करना है। आपके जैसे बाबा जी थोड़े ही हूँ। कि बैठकर भजन करूँ। संत ने कहा कि अच्छा तू क्या कर सकता है ? जाट बोला कि पड़ोस में एक कुम्हार रहता है। उसके साथ मेरी मित्रता है। उसके और मेरे खेत भी पास-पास हैं, और घर भी पास-पास है। रोजाना एक बार उसको देख लिया करूँगा। सन्त ने कहा कि ठीक है, उसको देखे बिना भोजन मत करना। जाट ने स्वीकार कर लिया। जब उसकी पत्नी कहती कि भोजन कर लो। तो वह चट बाड़ पर चढ़कर कुम्हार को देख लेता। और भोजन कर लेता। इस नियम में वह पक्का रहा।
एक दिन जाट को खेत में जल्दी जाना था। इसलिए भोजन जल्दी तैयार कर लिया। उसने बाड़ पर चढ़कर देखा तो कुम्हार दीखा नहीं। पूछने पर पता लगा कि वह तो मिट्टी खोदने बाहर गया है। जाट बोला कि कहाँ मर गया, कम से कम देख तो लेता। अब जाट उसको देखने के लिए तेजी से भागा। उधर कुम्हार को मिट्टी खोदते-खोदते एक हाँडी मिल गई। जिसमें तरह-तरह के रत्न, अशर्फियाँ भरी हुई थीं। उसके मन में आया कि कोई देख लेगा तो मुश्किल हो जायेगी। अतः वह देखने के लिए ऊपर चढा तो सामने वह जाट आ गया।
कुम्हार को देखते ही जाट वापस भागा। तो कुम्हार ने समझा कि उसने वह हाँडी देख ली। और अब वह आफत पैदा करेगा। कुम्हार ने उसे रूकने के लिए आवाज लगाई। जाट बोला कि बस देख लिया, देख लिया। कुम्हार बोला कि अच्छा, देख लिया तो आधा तेरा आधा मेरा, पर किसी से कहना मत।
जाट वापस आया तो उसको धन मिल गया। उसके मन में विचार आया कि संत से अपना मनचाहा नियम लेने में इतनी बात है। अगर सदा उनकी आज्ञा का पालन करूँ तो कितना लाभ है। ऐसा विचार करके वह जाट और उसका मित्र कुम्हार दोनों ही भगवान् के भक्त बन गए।
तात्पर्य यह है कि हम दृढता से अपना एक उद्देश्य बना ले, नियम ले लें तो वह भी हमारी डुबती किश्ती पार लगा सकता है।

“जय जय श्री राधे”


“श्रीजी की चरण सेवा”