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मुल्ला नसुरीद्दीन


मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन अपनी लान में आरामकुर्सी पर अधलेटा अखबार पढ़ रहा था। और एक अल्सेशियन कुत्ता उसके पांव के पास बैठा पूंछ हिला रहा था। एक पड़ोसी मित्र मिलने आए थे, कुत्ते के डर से दरवाजे पर ही खड़े हो गए। मुल्ला का ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने जोर से चिल्ला कर कहा कि भाई, यह कुत्ता काटता— आटता तो नहीं?

मुल्ला ने कहा, अरे आ जाइए, बिलकुल आ जाइए, कोई फिक्र मत कीजिए! फिर भी मित्र डरे थे, क्योंकि कुत्ता कुछ खड़ा हो गया था और गुर्रा कर देख रहा था। तो मित्र ने कहा कि ठीक, आप ठीक कहते हैं कि काटता इत्यादि तो नहीं? क्योंकि मुझे पहले कुत्तों के बड़े बुरे अनुभव हो चुके।

मुल्ला ने कहा, भाई, यही तो देखना चाहता हूं कि काटता है कि नहीं, अभी ही खरीद कर लाया हूं।

जीवन में परीक्षाएं दूसरों की मत लेना। और दूसरों की परीक्षाओं से जो तुम्हें मिल भी जाएगा, वह कभी तुम्हारा नहीं होगा। दूसरे के अनुभव कभी तुम्हारे अनुभव नहीं हो सकते। जीवन की आत्यंतिक रहस्यमयता तो उसी के सामने प्रगट होती है, जो अपने को ही अपना परीक्षा—स्थल बना लेता, जो अपने को ही अपनी प्रयोग— भूमि बना लेता।

इसलिए कहता हूं. सोच—विचार से नहीं, प्रयोग से, ध्यान से मति उपलब्ध होगी। और तुमने सदा सुन रखा है. स्वर्ग कहीं ऊपर, नर्क कहीं नीचे। उस भ्रांत धारणा को छोड़ दो। स्वर्ग तुम्हारे भीतर, नर्क तुम्हारे भीतर। स्वर्ग तुम्हारे होने का एक ढंग और नर्क तुम्हारे होने का एक ढंग। मैं से भरे हुए तो नर्क, मैं से मुक्त तो स्वर्ग।

संसार बंधन, और मोक्ष कहीं दूर सिद्ध—शिलाएं हैं जहां मुक्त पुरुष बैठे हैं—ऐसी भ्रांतियां छोड़ दो। अगर मन में चाह है, चाहत है, तो संसार। अगर मन में कोई चाहत नहीं, छोड़ने तक की चाह नहीं, त्याग तक की चाह नहीं, कोई चाह नहीं—ऐसी अचाह की अवस्था मोक्ष।

बाहर मत खोजना स्वर्ग—नरक, संसार—मोक्ष को। ये तुम्हारे होने के ढंग हैं। स्वस्थ होना मोक्ष है, अस्वस्थ होना संसार है। इसलिए? बाहर छोड़ने को भी कुछ नहीं है, भागने को भी कुछ नहीं है। हिमालय पर भी बैठो तो तुम तुम ही रहोगे और बाजार में भी बैठो तो तुम तुम ही रहोगे। इसलिए मैंने तुमसे नहीं कहा है, मेरे संन्यासियों को मैंने नहीं कहा है, तुम कुछ भी छोड़ कर कहीं जाओ। मैंने उनको सिर्फ इतना ही कहा, तुम जाग कर देखते रहो, जो घटता है घटने दो। गृहस्थी है तो गृहस्थी सही।

और किसी दिन अगर तुम अचानक अपने को हिमालय पर बैठा हुआ पाओ तो वह भी ठीक, जाते हुए पाओ तो वह भी ठीक है।

जो घटे, उसे घटने देना; इच्छापूर्वक अन्यथा मत चाहना। अन्यथा की चाह से मैं संगठित होता है। तुम अपनी कोई चाह न रखो, सर्व की चाह के साथ बहे चले जाओ। यह गंगा जहां जाती है, वहीं चल पड़ो। तुम पतवारें मत उठाना। तुम तो पाल खोल दो, चलने दो हवाओं को, ले चलने दो इस नदी की धार को।

इस समर्पण को मैंने संन्यास कहा है। इस समर्पण में तुम बचते ही नहीं, सिर्फ परमात्मा बचता है। किसी न किसी दिन वह घड़ी आएगी, वह मति आएगी कि हटेंगे बादल, खुला आकाश प्रगट होगा। तब तुम हंसोगे, तब तुम जानोगे कि अष्टावक्र क्या कह रहे है—न कुछ छोड़ने को, न कुछ पकड़ने को। जो भी दिखाई पड़ रहा है, स्वप्‍नवत है; जो देख रहा है, वही सत्य है।

हरि ओंम तत्सत्!
ओशो

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જૂની કાચબા અને સસલા ની વાર્તા એક જુદા જ અંત સાથે આજ ના management ને વધુ સારી રીતે સમજે છે
વાંચજો જરૂર

કાચબા અને સસલા ની રેસ ની પંચતંત્ર ની વાર્તા તો કોને નહિ વાચી હોય?..
સસલા ને ખુબ ઘમંડ હતું, કાચબા એ એની સાથે શરત લગાડી અને દોડ શરુ થઇ, સસલો જીતી જ જવાનો હતો, પણ અભિમાન માં થોડાક આરામ કરવા રહ્યો અને કાચબો ધીમા પણ મક્કમ પગલે જીતી ગયો ,,, આપણ ને management નો એક પાઠ મળ્યો કે slow and steady wins the race

પણ મિત્રો વાર્તા અહી પૂરી નથી થતી,

આ દોડ પછી સસલા એ વિચાર્યું કે કાચબા અને મારી ની ક્ષમતા જોતા એનું જીતવું અશક્ય જ હતું ,, એથી એને ફરી શરત લગાડી,
આ વખતે સસલા એ એક ક્ષણ નો પણ વિરામ નો લીધી અને આરામ થી રેસ જીતી ગયો …..
આ બીજો એક પાઠ હતો કે ધીમો અને મક્કમ ક્યારેક જીતી શકે છે પણ પોતાની ક્ષમતા નો સંપૂર્ણ ઉપયોગ કરનાર હમેશા જીતે છે

પણ વાર્તા અહી પણ પૂરી નથી થતી..

હવે વિચારવા નો વારો કાચબા નો હતો ,, એને વિચાર્યું કે આ રેસ તો હું કડી પણ જીતી શકું એ શક્ય જ નથી .. તો એને પોતાની ક્ષમતા નું આકલન કર્યું અને સસલા ને ફરી એક વખત રેસ કરવા બોલાવ્યો પણ આ વખતે કાચબા એ કહ્યું કે “સસલા ભાઈ, તમે તો મારા થી ખુબ તેજ દોડો છો તો આ વખતે રેસ નો રસ્તો હું નક્કી ક્રીસ’..
સસલો તૈયાર થયો
રેસ શરુ થઇ , સસલો ખુબ આગળ નીકળી ગયો
પણ આ શું?
કાચબા એ નક્કી કરેલા રસ્તા માં તો વચ્ચે નદી હતી ,,
સસલો તો નદી કિનારે જ અટકી રહ્યો, કાચબા ધીરે ધીરે આવ્યો નદી પર કરી અને રેસ જીતી ગયો..
management નો નવો પાઠ કે આપડે આપડી ક્ષમતા મુજબ આપડા જીવન ના ધ્યેય નક્કી કરવા જોઈએ તો આપણ ને કોઈ હરાવી શકે નહિ

પણ છેલ્લો પાઠ હજી બાકી હતો
આટલી રેસ દરમિયાન બંને સારા મિત્રો બની ગયા હતા
એટલે બંને એ એક છેલ્લી વાર રેસ લગાડવા નું નકી કર્યું
રસ્તો એ જ નદી વાળો હતો
રેસ શરુ થતા જ સસલા એ કાચબા ને પોતાની પીઠ ઉપર બેસાડી નદી કિનારે લઇ આવ્યો અને ત્યાંથી કાચબા એ સસલા ને પોતાના પીઠ પર સવારી કરાવી

પરિણામ: બંને સાથે પહોચ્યા અને ખુબ જ ઝડપી પહોચ્યા

અને આજ છે management મહત્વ પૂર્ણ પાઠ કે જો બધા અલગ અલગ ક્ષમતા વાળા માણસો સાથે કામ કરે તો શ્રેષ્ઠ પરિણામ મળી શકે

Raje Kenz

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महान जासूस शरलक होम्स अपने मित्र डाक्टर वाटसन के साथ सिनेमा देखने गए थे। फिल्म में घुड़दौड़ का एक दृश्य था। शरलक होम्स ने कहा, वाटसन, देखो यह जो पीले रंग वाला घोड़ा है न, यही रेस में जीतेगा।

नहीं-नहीं, डाक्टर वाटसन बोले, मेरे खयाल से तो काला घोड़ा ही जीतेगा, वही सबसे आगे भी है।

कुछ ही समय में रेस के अंत होतेऱ्होते पीला घोड़ा वाकई तेज दौड़ कर आगे आ गया और जीत गया। डाक्टर वाटसन बोले–आश्चर्यविमुग्ध होकर बोले–मेरे मित्र, मुझे तुम पर नाज है। माना कि तुम विश्व के सर्वश्रेष्ठ ख्यातिनाम जासूस हो, मगर तुमने यह कैसे पता लगाया कि पीला घोड़ा ही जीतेगा जब कि वह दौड़ में सबसे पीछे था?

यह कोई कठिन मामला नहीं, वाटसन–शरलक होम्स ने मुस्कुरा कर भेद खोला–मैं यह फिल्म पहले भी कई बार देख चुका हूं।

इस संसार की फिल्म को तुम कितनी बार देख चुके हो, अभी भी तुम्हें पता नहीं कि पीला घोड़ा जीतेगा! अभी भी तुम आशा बांधे हो कि काला घोड़ा जीतेगा, क्योंकि काला घोड़ा आगे है। यहां पीले घोड़े ही जीतते हैं।

जीसस का प्रसिद्ध वचन है: वे जो सबसे अंत में हैं, मेरे प्रभु के राज्य में प्रथम होंगे। पीले घोड़ों की बात हो रही है। पीछे था सबसे। और जो यहां प्रथम हैं, वे मेरे प्रभु के राज्य में अंतिम होंगे।

यहां कौन है अंतिम? जिसने जीवन से सारी आशा छोड़ दी, दौड़ ही छोड़ दी, दौड़ ही नहीं रहा है। वह घोड़ा जीतेगा। जो दौड़ ही नहीं रहा है, उसी का नाम संन्यासी है। जो घुड़दौड़ छोड़ कर किनारे बैठ कर विश्राम कर रहा है, आंख बंद कर ली हैं, भीतर डुबकी मार गया है। जिसका लक्ष्य अब बाहर नहीं है कहीं; जिसका लक्ष्य अब भीतर है। जो अंतर्मुखी हो गया है। जिसने एक नई यात्रा पकड़ ली है–अंतर्यात्रा। वही जीतेगा।

जग की आसा करै न कबहूं, पानी पिवै न मांगी हो।

तुम तो क्या-क्या मांग रहे हो, पानी भी पीने को मत मांगना! क्योंकि इस जगत में प्यास ही नहीं मिटती। कितना ही पानी पीओ, प्यास बढ़ती चली जाती है। इस जगत में प्यास मिटाने के उपाय ही नहीं। प्यास तो मिटती है केवल परमात्मा को पीने से।

और परमात्मा मांगने से नहीं मिलता, परमात्मा मांग छोड़ देने से मिलता है। इस गणित को खयाल रख लो। कुछ भी न मांगो। परमात्मा को भी मत मांगना। मोक्ष भी मत मांगना। मांगना ही मत! जिस क्षण तुम उस घड़ी में आ जाओगे, जहां तुम्हारे चित्त में कोई मांग की रेखा भी न रही, उसी घड़ी सब मिल जाएगा। उसी क्षण तुम्हारी गागर सागर से भर जाएगी।

भूख पियास छुटै जब निंद्रा, जियत मरै तन त्यागी हो।

ओशो

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एक झेन फकीर मंदिर में रात रुका। रात सर्द थी और उसने मंदिर में से बुद्ध की प्रतिमा को उठा लिया; लकड़ी की प्रतिमा थी, जला कर आंच ताप ली। जब मंदिर के पुजारी की नींद खुली आधी रात को; लकड़ी की आवाज, जलने की आवाज सुन कर, तो वह भागा आया। उसने कहा कि यह तू आदमी पागल है क्या? हमने तो तुझे साधु समझ कर मंदिर में ठहरा लिया, यह तूने क्या पाप किया? तूने बुद्ध को जला डाला!

तो वह साधु एक लकड़ी को उठा कर बुद्ध की जली हुई मूर्ति में, राख में टटोलने लगा। उस मंदिर के पुजारी ने पूछा, क्या करते हो अब? उसने कहा, मैं बुद्ध की अस्थियां खोज रहा हूं। वह पुजारी हंसा। उसने कहा, तुम निश्चित पागल हो। अरे, लकड़ी की मूर्ति में कैसी अस्थियां?

उसने कहा, जब अस्थियां ही नहीं हैं तो कैसे बुद्ध? तुम, दो मूर्तियां और रखी हैं, उठा लाओ, रात अभी बहुत बाकी है। और तुम भी आ जाओ, हम तो ताप ही रहे हैं, तुम क्यों ठंड में ठिठुर रहे हो, ताप ही लो!

उसने तो उसे उसी वक्त मंदिर के बाहर निकाला, क्योंकि कहीं वह दूसरी मूर्तियां और न जला डाले।

सुबह जब पुजारी उठा तो उसने देखा कि वह साधु राह के किनारे लगे मील के पत्थर पर दो फूल चढ़ा कर हाथ जोड़े बैठा है। उसने कहा, हद हो गई! रात बुद्ध को जला बैठा, अब मील के पत्थर पर फूल चढ़ा कर बैठा है! उसने जा कर फिर उसे हिलाया और कहा, तू आदमी कैसा है? अब यह क्या कर रहा है यहां?

उसने कहा, भगवान को धन्यवाद दे रहा हूं। यह उनकी ही कृपा है कि उनकी मूर्ति को जलाने की क्षमता आ सकी। और मूर्ति तो मानने की बात है। जहां मान लिया, वहां बुद्ध। वे तो सभी जगह मौजूद हैं, मगर हम सभी जगह देखने में समर्थ नहीं; हम तो एक ही दिशा में ध्यान लगाने में समर्थ हैं। तो अभी जो सामने मिल गया, यह पत्थर मिल गया, फूल भी लगे थे किनारे, सब साधन—सामग्री उन्हीं ने जुटा दी, सोचा कि अब पूजा कर लें। अब धूप भी निकल आई, दिन भी ताजा हो गया। फिर रात इन्होंने साथ दिया था। देखा नहीं, जब सर्दी पड़ी तो इन्हीं को ले कर आंच ली थी। शरीर को भी ये बचा लेते हैं, आत्मा को भी बचा लेते हैं। अब धन्यवाद दे रहे हैं।

शिष्य और गुरु के बीच बड़ा अनूठा संबंध है। वह अपने सत्य को पूरा खोल कर भी रख देता है, लेकिन इसका अर्थ नहीं है कि अवज्ञा कर रहा है, या अभद्रता कर रहा है। यही भद्र संबंध है। और धन्यवाद भी उसका पूरा है।
ओशो

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सिकंदर सारी दुनिया जीतना चाहता था। डायोजनीज ने उससे कहा, क्या करोगे सारी दुनिया को जीतने के बाद? सिकंदर ने कहा, क्या करेंगे? फिर विश्राम करेंगे!

डायोजनीज खूब हंसने लगा। उसने कहा, अगर विश्राम ही करना है तो हम अभी विश्राम कर रहे हैं, तो तुम भी करो। सारी दुनिया जीत कर विश्राम करोगे, यह बात कुछ समझ में नहीं आई। इसमें तर्क क्या है? क्योंकि सारी दुनिया के जीतने का विश्राम से कोई भी तो संबंध नहीं है। विश्राम मैं बिना कुछ जीते कर रहा हूं। जरा मेरी तरफ देखो!

और वह कर ही रहा था विश्राम। वह नदी—तट पर नग्न लेटा था। सुबह की सूरज की किरणें उसे नहला रही थीं। मस्त बैठा था। मस्त लेटा था। कहीं कुछ करने को न था, विश्राम में था। तो वह खूब हंसने लगा। उसने कहा, सिकंदर तुम पागल हो! तुम जरा मुझे कहो तो, कि अगर विश्राम दुनिया को जीतने के बाद हो सकता है, तो डायोजनीज कैसे विश्राम कर रहा है? मैं कैसे विश्राम कर रहा हूं? मैंने तो कुछ जीता नहीं। मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। मेरे हाथ में एक भिक्षा—पात्र हुआ करता था, वह भी मैंने छोड़ दिया। वह इस कुत्ते की दोस्ती के कारण छोड़ दिया।

कुत्ता उसके पास बैठा था। डायोजनीज का नाम ही हो गया था यूनान में : ‘डायोजनीज कुत्ते वाला’। वह कुत्ता सदा उसके साथ रहता था। उसने आदमियों से दोस्ती छोड़ दी। उसने कहा, आदमी कुत्तों से गए—बीते हैं। उसने एक कुत्ते से दोस्ती कर ली। और उसने कहा, इस कुत्ते से मुझे एक शिक्षा मिली, इसलिए मैंने पात्र भी छोड़ दिया, पहले एक भिक्षा—पात्र रखता था। एक दिन मैंने इस कुत्ते को नदी में पानी पीते देखा। मैंने कहा, ‘ अरे, यह बिना पात्र के पानी पी रहा है! मुझे पात्र की जरूरत पड़ती है!’ वहीं मैंने छोड़ दिया। इस कुत्ते ने मुझे हरा दिया। मैंने कहा, यह हमसे आगे पहुंचा हुआ है? मुझे पात्र की जरूरत पड़ती है? क्या जरूरत? जब कुत्ता पी लेता है पानी और कुत्ता भोजन कर लेता.। तो मेरे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी मैं विश्राम कर रहा हूं।. और क्या तुम संदेह कर सकते हो मेरे विश्राम पर?

नहीं, सिकंदर भी संदेह न कर सका। वह आदमी सच कह रहा था। वह निश्चित ही विश्राम में था। उसकी ‘आंखें, उसका सारा भाव, उसके चेहरे की विभा वह ऐसा था जैसे दुनिया में कुछ पाने को बचा नहीं, सब पा लिया है। कुछ खोने को नहीं, कोई भय नहीं, कोई प्रलोभन नहीं।

सिकंदर ने कहा, तुमसे मुझे ईर्ष्या होती है। चाहता मैं भी हूं ऐसा ही विश्राम, लेकिन अभी न कर सकूंगा। दुनिया तो जीतनी ही पड़ेगी। मैं यह तो बात मान ही नहीं सकता कि सिकंदर बिना दुनिया को जीते मर गया।

डायोजनीज ने कहा, जाते हो, एक बात कहे देता हूं, कहनी तो नहीं चाहिए, शिष्टाचार में आती भी नहीं, लेकिन मैं कहे देता हूं : तुम मरोगे बिना विश्राम किए।

और सिकंदर बिना विश्राम किए ही मरा! भारत से लौटता था, रास्ते में ही मर गया, घर तक भी नहीं पहुंच पाया। और जब बीच में मरने लगा और चिकित्सकों ने कहा कि अब बचने की कोई उम्मीद नहीं, तो उसने कहा, सिर्फ मुझे चौबीस घंटे बचा दो, क्योंकि मैं अपनी मां को मिलना चाहता हूं। मैं अपना सारा राज्य देने को तैयार हूं। मैंने यह राज्य अपने पूरे जीवन को गंवा कर कमाया है, मैं वह सब लुटा देने को तैयार हूं. चौबीस घंटे! मैंने अपनी मां को वचन दिया है कि मरने के पहले जरूर उसके चरणों में आ जाऊंगा।

चिकित्सकों ने कहा कि तुम सारा राज्य दो या कुछ भी करो, एक श्वास भी बढ़ नहीं सकती। सिकंदर ने कहा, किसी ने अगर मुझे पहले यह कहा होता, तो मैं अपना जीवन न गंवाता। जिस राज्य को पाने में मैंने सारा जीवन गंवा दिया, उस राज्य को देने से एक श्वास भी नहीं मिलती! डायोजनीज ठीक कहता था कि मैं कभी विश्राम न कर सकूंगा।

खयाल रखना, कठिन में एक आकर्षण है अहंकार को। सरल में अहंकार को कोई आकर्षण नहीं है। इसलिए सरल से हम चूक जाते हैं। सरल.. परमात्मा बिलकुल सरल है। सत्य बिलकुल सरल है, सीधा—साफ, जरा भी जटिलता नहीं।
ओशो

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐अपना काम खुद करें💐💐

दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सज्जन मिले, साथ में उनकी पत्नी भी थी, सज्जन की उम्र लगभग 80 की रही होगी,मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 के पार ही होंगी, पत्नी खिड़की की ओर बैठी थी, सज्जन बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था, प्लेन के उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने खाने का कुछ सामान निकाला और पति की ओर किया, पति कांपते हाथों से धीरे धीरे खाने लगे…

फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व हुआ तो उन लोगों ने राजमा चावल का आर्डर किया, दोनों आराम से राजमा चावल खा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक में उन सज्जन ने कोई जूस लिया था…

खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल का ढक्कन खोलना शुरु किया तो ढक्कन उनसे खुला ही नहीं, सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और मैं लगातार उन्हें देखे जा रहा था, मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी तो शिष्टाचार वश मैंने कहा :- लाइए, मैं खोल देता हूं !

सज्जन ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और बोले :- बेटा जी, ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा ! मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन प्रश्नभरी निगाहों से उन्हें देखता रहा…

ये सज्जन ने कहा :- बेटा जी, आज तो आप खोल देंगे लेकिन अगली बार कौन खोलेगा, इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए, पत्नी भी पति की ओर देख रही थी, जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था, लेकिन सज्जन उसे खोलने की कोशिश में लगे रहे और बहुत कोशिशों के बाद अंततः उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया, दोनों आराम से जूस पी रहे थे…

मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में जिंदगी का एक सबक मिला, सज्जन ने मुझे बताया :- हमने एक नियम बना रखा है अपना हर काम खुद ही करना है…, घर में बच्चे हैं, हंसता खेलता परिवार है, सब साथ ही रहते हैं लेकिन अपनी रोज की जरूरतों के लिए केवल पत्नी की ही मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं, दोनों एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं…

सज्जन ने मुझसे कहा :- जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए, एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो बेटा, समझो बिस्तर पर ही पड़ जाउंगा, फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं वो काम उससे, फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा, अभी चलने में पांव कांपते हैं,खाने में भी हाथ कांपते हैं लेकिन जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए…

हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे, हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं,बेटे बहू कहते हैं कि अकेले आपको दिक्कत होगी लेकिन उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना फिरना बंद करके खुद को घर में बंद कर लेंगे, सारी जिंदगी खूब काम किया, अब सब कुछ बेटों को देकर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और हम दोनों उसी से आराम से घूमते हैं, जहां जाना होता है, एजेंट टिकट बुक करा देता है, टैक्सी घर पर आ जाती है,वापसी में एयरपोर्ट पर ही टैक्सी आ जाती है ! होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है, स्वास्थ्य व उम्र के अनुसार सब एकदम ठीक है, बस, कभी कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती लेकिन थोड़ा दम लगाओ तो वो भी खुल जाती है…

मेरी तो आंखें ही खुली रह गई, मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में मैंने पूरे जीवन की ही फिल्म देख ली ! एक ऐसी फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था…

दोस्तो, जब तक हो सके “आत्मनिर्भर” रहो, जहां तक संभव हो, अपना काम स्वयं ही करें…

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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मास्साब का स्कूटर
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माथुर साहब पेशे से अध्यापक थे। कस्बे से विद्यालय की दूरी 7 किलोमीटर थी। एकदम वीराने में था उनका विद्यालय। कस्बे से वहाँ तक पहुंचने का साधन यदा कदा ही मिलता था तो अक्सर लिफ्ट मांगके ही काम चलाना पड़ता था और न मिले तो प्रभु के दिये दो पैर, भला किस दिन काम आएंगे।

“कैसे उजड्ड वीराने में विद्यालय खोल धरा है सरकार ने, इससे भला तो चुंगी पर परचून की दुकान खोल लो।”
लिफ्ट मांगते, साधन तलाशते माथुर साहब रोज यही सोचा करते। 😪

धीरे धीरे कुछ जमापूंजी इकठ्ठा कर, उन्होंने एक स्कूटर ले लिया। बजाज का नया चमचमाता स्कूटर।

स्कूटर लेने के साथ ही उन्होंने एक प्रण लिया कि वो कभी किसी को लिफ्ट को मना न करेंगें।। आखिर वो भी जानते थे जब कोई लिफ्ट को मना करे तो कितनी शर्मिंदगी महसूस होती है। 🛵😇

अब माथुर साहब रोज अपने चमचमाते स्कूटर से विद्यालय जाते, और रोज कोई न कोई उनके साथ जाता। लौटते में भी कोई न कोई मिल ही जाता।🛵👬☀️🛵👬🏾☀️🛵👫☀️🛵👬🏻☀️

एक रोज लौटते वक्त एक व्यक्ति परेशान सा लिफ्ट के लिये हाथ फैलाये था, अपनी आदत अनुसार माथुर साहब ने स्कूटर रोक दिया। वह व्यक्ति पीछे बैठ गया। 🛵👬

थोड़ा आगे चलते ही उस व्यक्ति ने छुरा निकाल माथुर साहब की पीठ पर लगा दिया। 🕵🏽‍♂️🔪

“जितना रुपया है वो, और ये स्कूटर मेरे हवाले करो।” व्यक्ति बोला। 🕵🏽‍♂️🔪💵🛵

माथुर साहब की सिट्टी पिट्टी गुम, डर के मारे स्कूटर रोक दिया। पैसे तो पास में ज्यादा थे नहीं, पर प्राणों से प्यारा, पाई पाई जोड़ कर खरीदा स्कूटर तो था। 😪😓

“एक निवेदन है,” स्कूटर की चाभी देते हुए माथुर साहब बोले । 😇

“क्या?” वह व्यक्ति बोला। 🧐

“यह कि तुम कभी किसी को ये मत बताना कि ये स्कूटर तुमने कहाँ से और कैसे चोरी किया, विश्वास मानो मैं भी रपट नहीं लिखाउँगा।” माथुर साहब बोले। 😇

“क्यों?” व्यक्ति हैरानी से बोला। 🧐

“यह रास्ता बहुत उजड्ड है, निरा वीरान | सवारी मिलती नहीं, उस पर ऐसे हादसे सुन आदमी लिफ्ट देना भी छोड़ देगा।” माथुर साहब बोले।😪

व्यक्ति का दिल पसीजा, उसे माथुर साहब भले मानुष प्रतीत हुए, पर पेट तो पेट होता है। ‘ठीक है कहकर’ वह व्यक्ति स्कूटर ले उड़ा। 🛵💨

☀️

अगले दिन माथुर साहब सुबह सुबह अखबार उठाने दरवाजे पर आए, दरबाजा खोला तो स्कूटर सामने खड़ा था। माथुर साहब की खुशी का ठिकाना न रहा, दौड़ कर गए और अपने स्कूटर को बच्चे जैसा खिलाने लगे, देखा तो उसमें एक कागज भी लगा था।🛵📝

“मास्साब, यह मत समझना कि तुम्हारी बातें सुन मेरा हृदय पिघल गया। 😏

कल मैं तुमसे स्कूटर लूट उसे कस्बे ले गया, सोचा भंगार वाले के पास बेच दूँ।
“अरे ये तो मास्टर साहेब का स्कूटर है। 🤨” इससे पहले मैं कुछ कहता भंगार वाला बोला।

“अरे, उन्होंने ही ने मुझे बाजार कुछ काम से भेजा है।” कहकर मैं बाल बाल बचा। परन्तु शायद उस व्यक्ति को मुझ पर शक सा हो गया था। 🛵👀🏃‍♂️

फिर मैं एक हलवाई की दुकान गया, जोरदार भूख लगी थी तो कुछ सामान ले लिया। “अरे ये तो मास्साब का स्कूटर है।🤨” वो हलवाई भी बोल पड़ा। “हाँ, उन्हीं के लिये तो ये सामान ले रहा हूँ, घर में कुछ मेहमान आये हुए हैं।” कहकर मैं जैसे तैसे वहां से भी बचा। 🛵👀🏃‍♂️

फिर मैंने सोचा कस्बे से बाहर जाकर कहीं इसे बेचता हूँ। शहर के नाके पर एक पुलिस वाले ने मुझे पकड़ लिया।👮🏽‍♂️

“कहाँ, जा रहे हो और ये मास्साब का स्कूटर तुम्हारे पास कैसे।🤨” वह मुझ पर गुर्राया। किसी तरह उससे भी बहाना बनाया। 🛵👀🏃‍♂️💨

हे, मास्साब तुम्हारा यह स्कूटर है या आमिताभ बच्चन। सब इसे पहचानते हैं। 😪 आपकी अमानत मैं आपके हवाले कर रहा हूँ, इसे बेचने की न मुझमें शक्ति बची है न हौसला। आपको जो तकलीफ हुई उस एवज में स्कूटर का टैंक फुल करा दिया है।🙁”

पत्र पढ़ माथुर साहब मुस्कुरा दिए, और बोले। “कर भला तो हो भला।”
😄 😇🙏🙏😌

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐इनाम💐💐

सात वर्षीय बेटी दूसरी कक्षा में प्रवेश पा गयी…..
क्लास में हमेशा से अव्वल आती रही है पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाज़ार ले गया….

बेटी ने जूते लेने से ये कह कर मना कर दिया की पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरुरत है वो अभी इस साल काम दे सकते हैं…..
अपने जूतों की बजाए उसने मुझे अपने दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा…
मैंने सोचा बेटी अपने दादा से शायद बहुत प्यार करती है इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी समझ रही है….

खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा…..
दुकानदार ने बेटी के साइज़ की सफ़ेद शर्ट निकाली… डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी फिर भी बेटी ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा….

मैंने बेटी से कहा….आराध्या बेटा…. ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है तो फिर और लम्बी क्यों ….
बेटी ने कहा …. पापा जी मुझे शर्ट स्कर्ट के अंदर ही डालनी होती है इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा…..
लेकिन यही शर्ट मुझे अगली क्लास में भी काम आ जाएगी….पिछली वाली शर्ट भी अभी नयी जैसी ही पड़ी है लेकिन छोटी होने की वजह से मैं उसे पहन नहीं पा रही

मैं खामोश रहा….

घर आते वक़्त मैंने बेटी से पूछा…. तुम्हे ये सब बातें कौन सिखाता है आराध्या….

आराध्या बोली….पापा जी मैं अक्सर देखती हूँ कि कभी माँ अपनी साडी छोड़कर तो कभी आप अपने जूतों को छोडकर हमेशा मेरी किताबों और कपड़ो पर पैसे खर्च कर दिया करते है

गली- मोहल्ले में सब लोग कहते हैं के आप बहुत ईमानदार आदमी हैं और हमारे साथ वाले दीपक के पापा को सब लोग चोर, कुत्ता, बे-ईमान, रिश्वतखोर और जाने क्या क्या कहते है जबकि आप दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं……
जब सब लोग आपकी तारीफ़ करते हैं तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है …, मम्मी और दादा जी भी आपकी तारीफ करते है

पापा जी मैं चाहती हूँ कि मुझे कभी जीवन में नए कपडे, नए जूते मिले या ना मिले….. लेकिन कोई आपको चोर, बे-ईमान, रिश्वतखोर या कुत्ता न कहे…..
मैं आपकी ताक़त बनना चाहती हूँ पापा जी…आपकी कमजोरी नहीं

बेटी की बात सुनकर मैं निरुतर था

आज मुझे पहली बार मुझे मेरी ईमानदारी का इनाम मिला था….
आज बहुत दिनों बाद आँखों में ख़ुशी, गर्व और सम्मान के आंसू थे….
दोस्तो …..दुनिया में सबसे बडा खूबसूरत इनाम अपने परिवारों अपने बच्चों की आँखों में स्वयं को एक हीरो की तरह देखना ….आपके बच्चे आपको अपना आदर्श मानते है आपको प्यार और सम्मान देते है मेरी नजर में इससे बडा इनाम आपकी मेहनत लग्न का नहीं हो सकता ……अपने अपनो के लिए आदर्श बनिए ताकि वह भी गर्वित होकर कहे ….ये है मेरे मम्मी पापा…
“दोस्तो #मान और #सम्मान पैसो से नही #संस्कारो से मिलता है..”

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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देवरानी-जेठानी

“अरे सुनीता! पहले मीनू को दे गरम परांठा… देर हो रही है इसे… मेरा क्या है, बाद में भी ले लूंगी..” सासु मां बड़े लाड़ से बोलीं ।

सुनीता ने चुपचाप परांठा मीनू की प्लेट में रख दिया और वापस रसोई में चली गई। मीनू पढ़ाई का कीड़ा थी। पढ़ते-पढ़ते बैंक में बड़ी ऑफिसर बन गई थी, लेकिन फिर भी पढ़ने का जुनून खत्म नहीं हुआ था। कलेक्टर बनने का सपना देख रही थी…

मां-बाप कब तक रुकते। समझा-बुझाकर

शादी कर दी, इस शर्त पर, कि ससुराल

वाले आगे पढ़ने से नहीं रोकेंगे।

ससुराल वालों को भला क्या आपत्ति होती.. कमाऊ, होनहार बहू.. बेटा एम एन सी में अच्छे पद पर था, लेकिन फिर भी सरकारी नौकरी तो सरकारी होती है।

ससुराल पहुंच कर मीनू ने देखा कि जेठानी सुनीता की कदर एक नौकरानी से ज्यादा नहीं है। बातों-बातों में मीनू ने महसूस किया कि सुनीता भी कम प्रतिभाशाली छात्रा नही रही थी.. लेकिन पिता की

असामयिक मृत्यु और फिर ज

विवाह ने उसे इस स्थिति में डाल दिया

था।

अब तक तो ससुराल में अपनी स्थिति से शायद संतुष्ट थी, लेकिन अब मीनू का घर में रुआब देखकर वह निराशा के गर्त में जा रही थी!! शुरुआत मे मीनू ने अपनी सामान्य ज्ञान की पुस्तक उसके हाथ में पकड़ाकर प्रश्न पूछने के लिए कहा और महसूस किया कि वो सब कुछ बहुत जल्दी याद कर लेती है.. बस फिर क्या था.. मीनू ने सुनीता को लगातार प्रोत्साहित किया और अंततः वो पढ़ने के लिए राजी हो गई। घर वालों को आभास भी नहीं हुआ और मीनू ने सुनीता की तैयारी करवा के कितने ही प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरवा दिए।

आज रिजल्ट निकला था… सुनीता अधिकारी वर्ग में चयनित हो गई थी… और मीनू बन गई थी… कलेक्टर ! “सचमुच बहनें सदा माँ के पेट से ही जन्म नहीं लेती..!” सुनीता ने आंसू छुपाने के लिए मीनू की ओर अपनी पीठ कर ली । दोस्तों, घड़ी की सुईयो की तरह जीवन में अपने रिश्तों को बनाए रखें… कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई तेज है और कोई धीमा, मायने रखता है जुड़े रहना..

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मूर्ख राजा और चतुर मंत्री💐💐 एक राजा बहुत ही मूर्ख और सनकी था।एक दिन राजा अपने मंत्री के साथ संध्या के समय नदी के किनारे टहल रहा था। तभी उसने मंत्री से पूछा, मंत्री ! बताओ यह नदी किस दिशा की ओर, और कहाँ बहकर जाती है ?

मंत्री ने उत्तर दिया ~ महाराज,यह पूर्व दिशा की ओर बहती है,और पूर्व की ओर स्थित देशो में बहकर समुद्र में मिल जाती है।

यह सुनकर राजा बोला:-यह नदी हमारी है, और इसका पानी भी हमारा है, क्या पूर्व में स्थित देश इस नदी के पानी का उपयोग करते हैं ?

मंत्री ने उत्तर दिया ~ जी, महाराज, जब नदी उधर बहती है तो करते ही होंगे.
इस पर राजा बोला ~जाओ, नदी पर दीवार बनवा दो, और सारा का सारा पानी रोक दो।

हम नहीं चाहते , कि पूर्व दिशा में स्थित देशों को पानी दिया जाये।
मंत्री ने उत्तर दिया लेकिन, महाराज ! इससे हमें ही नुकसान होगा.

राजा गुस्से में बोला ~नुकसान ! कैसा नुकसान ।
नुकसान तो हमारा हो रहा है, हमारा पानी पूरब के देश मुफ्त में ले रहे हैं,
और तुम कहते हो , कि नुक्सान हमारा ही होगा।
मेरी आज्ञा का शीघ्र से शीघ्र पालन करो।
मंत्री ने तुरंत कारीगरों को बुलाया और नदी पर दीवार बनाने का काम शुरू करवा दिया।कुछ ही दिनों में दीवार बन कर तैयार हो गयी।

राजा बहुत खुश हुआ, पर उसकी मूर्खता की वजह से कुछ समय बाद
नदी का पानी शहर के घरों में घुसने लगा।
लोग अपनी परेशानी लेकर मंत्री के पास आये।मंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया, कि वह सब कुछ ठीक कर देगा.

मंत्री ने एक योज़ना बनाई,महल में एक घंटा बजाने वाला था।वह हर घंटे पर समय के अनुसार घंटा बजा देता था, जिससे सभी को समय का पता चल जाता था।मंत्री ने उस आदमी को आदेश दिया, कि वह आज रात को जितना समय हो उसका दोगुना घंटा बजाये।आदमी ने ऐसा ही किया,जब रात के तीन बजे , तो उसने 6 बार घंटा बजाया, जिसका अर्थ था कि सुबह के 6 बज गए हैं।

घंटा बजते ही सभी लोग उठ गए,राजा भी उठ गया और बाहर आ गया,वहाँ पर मंत्री मौजूद था।

राजा ने मंत्री से पूछा ~ मंत्री ,अभी तक सुबह नहीं हुई है क्या ? और सूरज अभी तक निकला क्यों नहीं है ?

मंत्री ने उत्तर दिया ~ महाराज,सुबह तो पूरब की ओर से होती है क्योंकि सूरज … पूरब की ओर से निकलता है,
शायद पूरब के देशों ने सूरज को रोक दिया है।
हमने उनका पानी रोक दिया था,इसीलिए अब हमारे राज्य में कभी सूरज नहीं निकलेगा।

राजा बहुत चिंतित हुआ और बोला ~क्या अब कभी भी हमारे देश में सूरज नहीं निकलेगा ? हम सब अन्धकार में कैसे रहेंगे ?
इसका उपाय बताओ मंत्री।

महाराज,
यदि आप नदी का पानी छोड़ दें, तो शायद वे भी सूरज छोड़ देंगे,मंत्री ने उत्तर दिया।

राजा ने तुरंत मंत्री को हुक्म दिया, कि वह नदी पर बनाई गयी दीवार को तुड़वाए. मंत्री ने राजा की आज्ञा का पालन किया और कारीगरों को आदेश दिया कि … दीवार को तोड़ दिया जाये.

कारीगरों ने दीवार तोड़ दी, और।जैसे ही दीवार टूटी , सचमुच।सूर्योदय का समय हो चुका था, और दिव्यमान सूरज चारों तरफ अपनी लालिमा बिखेर रहा था।

सूरज को उगता देख …राजा बहुत खुश हुआ ओर मंत्री को इनाम दिया और कहा ~ तुम्हारी वजह से आज हम फिर सूरज को देख पाये हैं। अब हमारे राज्य में कभी अँधेरा नहीं रहेगा।
मंत्री ने मासूम सा मुँह बनाकर जवाब दिया ~ महाराज, यह तो मेरा फ़र्ज़ था.

💐💐कथा सार 💐💐
एक चतुर व्यक्ति …आने वाली कठिनाईयों को पहले से देख लेता है , और उनका सामना करने की तैयारी कर लेता है।

एक मूर्ख व्यक्ति आँखें बंद करके राह पर चलता रहता है , और दुष्परिणामों को भोगता रहता है।
मूर्ख और समझदार में यही फर्क है कि … चतुर बेवकूफी भरे सवाल से भी कुछ ना कुछ सीख लेता है।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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