Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार की बात है.

अपने चातुर्य और विद्वता के लिए मशहूर मंत्री तेनालीराम से… एक बड़ी गलती हो गई जिससे राजा कृष्णदेव राय काफी रूष्ट हो गए.

और, राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को सजा देने की ठानी.

सजा के लिए उन्होंने मन ही मन 1 लाख स्वर्ण मुद्रा की दंड देने की सोची.

लेकिन , राजा द्वारा सीधे दंड की घोषणा करने पर तेनालीराम उनपर दुराग्रह का आरोप लगा सकते थे.

इसीलिए, राजा ने तेनालीराम से कहा कि… तुम्हारे गलती सजा तो तुम्हें जरूर मिलेगी लेकिन चूंकि तुम मेरे बहुत प्रिय भी हो इसीलिए मैं तुम्हें अपने पसंद का सरपंच चुनने का अधिकार देता हूँ.

मैं ध्यान दिला दूँ कि उस समय सरपंच… अभी पंचायती राज वाले एक आदमी सरपंच नहीं हुआ करते थे.. बल्कि, वो ज्यूरी की तरह 5 आदमियों की कमिटी होती थी… और, बहुमत (3 लोगों) का फैसला ही सरपंच का फैसला माना जाता था.

खैर… तेनालीराम ने अपने लिए बेहद ही गरीब (अंत्योदय टाइप के) 5 लोगों का एक पैनल सरपंच के तौर पर चुन लिया .

और, सुनवाई शुरू हो गई.

सुनवाई के उपरांत पैनल के सभी सदस्य एकमत थे कि तेनालीराम ने गलती की है और उसकी सजा उसे मिलनी ही चाहिए.

राजा एवं तेनालीराम को भी ये बता दिया गया कि तेनालीराम दोषी है और उसे सजा मिलनी ही चाहिए.

अब पैनल में सजा के तौर पर आर्थिक दंड पर चर्चा होने लगी.

जिसमें से पैनल के एक सदस्य ने सलाह दी कि… तेनालीराम बहुत बड़ा मंत्री है इसीलिए उसपर 10,000 (दस हजार) स्वर्ण मुद्राओं का दंड लगाया जाए..

10,000 स्वर्ण मुद्राओं की बात सुनते ही पैनल के बाकी सदस्यों का मुँह खुला का खुला रह गया और उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया कि….
इतना पैसा तो इसने कभी देखा भी नहीं होगा तो भला देगा कहाँ से …???

फिर, बात 5,000 स्वर्ण मुद्राओं पर आई.

उसपर भी बाकी सदस्यों ने आपत्ति किया कि इतना पैसा कमाने में तो इसकी पीढ़ियाँ गुजर जाएगी.

इस तरह… आर्थिक दंड की रकम घटते घटते 3 स्वर्ण स्वर्ण मुद्राओं पर आ गई.

फिर भी पैनल के 3 सदस्य इसपर राजी नहीं थे कि इस अपराध के लिए ये दंड बहुत है…
और, 3 स्वर्ण मुद्राएं बहुत होती है.

अंत में पैनल में 1 स्वर्ण मुद्रा पर सहमति बनी और तेनालीराम पर “बेमन से” सहानुभूति के साथ 1 स्वर्ण मुद्रा का आर्थिक दंड लगा दिया गया और पैनल के सदस्य चर्चा करने लगे कि…
बेचारे तेनालीराम पर बहुत आर्थिक बोझ पड़ गया इस आर्थिक दंड पर.

👉 ऐसा इसीलिए हुआ और तेनालीराम पर 1 लाख स्वर्ण मुद्रा की जगह 1 स्वर्ण मुद्रा का दंड इसीलिए लगा क्योंकि सरपंच के पैनल के लोग बेहद गरीब थे और उन्होंने धन कभी देखा नहीं था… वे खुद बेहद मुश्किल से अपना पेट भर पाते थे…
इसीलिए, ज्यादा सोच पाना उनकी कल्पना से भी परे था.

👉👉 ठीक वही गरीबों वाली हालत आज हम हिनुओं की है.

हमें शुरू से ही दबा कर डिप्रेस रखा है कि हम ज्यादा सोच ही नहीं पाते हैं.

हमारी सोच है कि… किसी तरह अयोध्या में राम मंदिर बन जाये, मथुरा में कृष्ण मंदिर और काशी में ज्ञानवापी मंदिर मिल जाये.

और, ज्यादा से ज्यादा किसी तरह ताजमहल, कुतुबमीनार, लालकिला आदि को हम हिन्दुओं का बनवाया हुआ घोषित कर दिया जाए.

इसके आगे हमारी सोच जाती ही नहीं है.

इसीलिए…. आजकल 3-4 दिन से लगभग हर जगह चर्चा इस पर हो रही है कि अयोध्या के बाद…. काशी, मथुरा, कुतुब मीनार और अब ताजमहल का वास्तविक इतिहास क्या है ?
आखिर देश में हो क्या रहा है ???

जबकि चर्चा इस पर होनी चाहिए कि आखिर हर मस्जिद के अंदर से मंदिरों के प्रमाण कैसे निकल रहे हैं ??

साथ ही… चर्चा इस पर होनी चाहिए कि इतने सारे मंदिरों को तोड़कर उसी पर मस्जिद क्यों बनाई गई ????

चर्चा इस पर भी खुलकर होना चाहिए कि क्या हिंदू आर्किटेक्चर को तोड़ना ही मुगल आर्किटेक्चर था… जिसकी प्रशंसा (वामपंथी) इतिहासकार करते नहीं थकते थे.

और, सबसे प्रमुख चर्चा तो इतिहासकारों के झूठ की भी होनी चाहिए जिन्होंने इतिहास के ‘सच’ को सेलेक्टिव इतिहास की ‘कब्र’ में दफन कर दिया और उसके ऊपर झूठे प्रोपेगैंडा का स्ट्रक्चर खड़ा कर देश को अंधेरे में रखा.

इसीलिए… सिर्फ सभी ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों को वापस लेना ही पर्याप्त नहीं है.

बल्कि…. मुगलों के कुकृत्य का बचाव करने वालों की जिम्मेदारी तय होनी जरूरी है.

तथा… जो भी लोग/समुदाय/संगठन खुद को मुगलों का वंशज घोषित करने पर आमादा हैं और उन आक्रांताओं का पक्ष ले रहे हैं…
उन सबसे माफी मंगवाने एवं हर्जाना वसूले जाने की जरूरत है..

भले ही उस हर्जाने को चुकाने में इन पंचरवालों की सैकड़ों पुश्तें क्यों न बीत जाए…!

एवं, इस संबंध में एक स्पष्ट नीति बने कि जबतक वे हर्जाने की इस रकम को चुका नहीं देते हैं तबतक वे पीड़ित हिन्दू समुदाय के गुलाम रहेंगे जिन्हें जिंदा रहने भर खाने पीने के अलावा और कोई अधिकार नहीं होगा.

तथा… उन गुलामों को अपनी सुविधा अनुसार खरीदा एवं बेचा जा सकेगा.

और हाँ… अगर गुलामी के दौर में भी अगर कोई म्लेच्छ हिन्दू सनातन धर्म में घर वापसी कर लेता है तो फिर वो उस गुलामी से बाहर आ जायेगा क्योंकि तब वो भी हिन्दू सनातन धर्म का ही एक हिस्सा बन जायेगा.

इस स्थिति में… उसके पुराने मजहब के बाकी लोग… इस नए सनातनी के भी गुलाम माने जाएंगे.

बनाओ ऐसा स्ट्रिक्ट नियम… फिर देखते हैं कि कौन खड़ा होता है उन आक्रांताओं के पक्ष में और बताता है खुद मुगलों का वंशज..

पुरानी कहावत है कि…
लात के भूत बात से नहीं मानते…!

इसीलिए… जो जैसे मानता है… उसे, उसी तरह मनवाने से देश की अस्मिता एवं सभ्यता संस्कृति सुरक्षित रहेगी.

जय महाकाल…!!!

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कुछ साल पहले जब मैं एक टूर से आ रहा था और कोटा रेलवे स्टेशन पर उतर कर ऑटो रिक्शा का इंतजार कर रहा था। अचानक एक व्यक्ति ने मेरी ओर हाथ हिलाया। वह मेरे पास आया और बोला, “नीलेश सर, मैं आपको घर छोड़ दूंगा।” चूंकि उन्होंने मुझे मेरे नाम से संबोधित किया, इसलिए मैंने आगे नहीं पूछा, यह जानकर मुझे आश्चर्य हुआ कि वह मेरा नाम जानते हैं।
उन्होंने बताया की उनका बेटा मेरी कोचिंग में क्लास 9 में पढ़ रहा है और वो अपने बेटे की पढ़ाई के लिए कोटा शिफ्ट हो गए है, बच्चे की पढ़ाई के लिए अपनी कृषि भूमि का एक हिस्सा भी बेच दिया । उनके बड़े बेटे का नाम आकाश था और वह हमारी प्रवेश परीक्षा को मुश्किल से पास कर सका था. वह कोटा में ऑटो चला रहे हैं क्योंकि वह शिक्षित नहीं थे और उनका सपना था कि उनके दोनों बेटे जेईई में शामिल हों। उनका बड़ा बेटा नौवीं और छोटा सातवीं कक्षा में था। उन्होंने बड़े बेटे को हमारी कोचिंग में डाल दिया लेकिन अपने छोटे बेटे के लिए फंड नहीं जुटा पा रहे थे इसलिए उसे गांव से नहीं बुलाया। उनके बड़े बेटे को अपने गांव में टॉपर होने के बावजूद भाषा और कोटा कोचिंग की कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था. ये कहते कहते उनका गाला भर आया.
मैंने उन्हें अगले दिन ऑफिस में मुझसे मिलने के लिए कहा। व्यक्तिगत बुलावा पाकर कर वे बहुत प्रसन्न हुए। वह अपने बेटे के साथ मेरे कार्यालय में मिलने आये। मैंने अपने कर्मचारियों से कहा कि वे मुझे उसके सभी शैक्षणिक रिकार्ड दें। मैंने आकाश की ओर देखा, वह सफेद शर्ट और ग्रे ट्राउजर में था, उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उलझन में लग रहा था, मैंने उससे बात करने की कोशिश की लेकिन उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उनके पिता ने उसकी ओर से बात की। उनके पिता को उसकी शैक्षणिक स्थिति के बारे में बहुत जानकारी थी। उन्होंने साझा किया कि आकाश को कुछ शिक्षकों के साथ समस्या है जो अंग्रेजी में बहुत तेज बोलते हैं ओर आकाश हिंदी माध्यम से होने के कारण समझ नहीं पा रहे थे।
मैंने उसके पिता को आश्वासन दिया कि जब तक वह कक्षा में स्वयं को एडजस्ट नही कर पायेगा तब तक मैं उसके लिए अलग से शिक्षक उपलब्ध कराऊंगा। जिससे वह ठीक से समझ पाए। इसके बाद वे मेरे कार्यालय में नियमित रूप से आए; हालाँकि वह मेरे कार्यालय में प्रवेश करने में बहुत झिझकते थे और घंटों-घंटों बाहर प्रतीक्षा करते थे। मैं संयोग से सड़क पर भी अगर मिल जाता था, तो हम आकाश की पढ़ाई के बारे में चर्चा करते थे।
उनके पास अक्सर उन अध्यायों की सूची होती थी जहां आकाश को कठिनाई हो रही थी और इसका एक संभावित समाधान भी था। वह जो भी मांगते थे, मैं उन्हें अतिरिक्त किताबें, अतिरिक्त नोट्स उपलब्ध करवा देता था। मैंने आकाश के प्रदर्शन की शायद ही कभी जाँच की हो मेरी प्रारंभिक धारणा के कारण – क्योंकि वह मुश्किल से ही हमारी चयन परीक्षा को पास कर पाया था।
लगभग छह महीने बाद, वह अपने बेटे के साथ मेरे कार्यालय में आए। मैंने आकाश को बेहतर स्थिति में पाया। उन्होंने मुझे अपने बेटे की प्रदर्शन रिपोर्ट दिखाई। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उनका बेटा टॉप बैच में आ गया है और कक्षा 9वीं के टॉप 10 पर्सेंटाइल में से एक था और बहुत अच्छा कर रहा था। यह हमारे लिए चमत्कार के करीब था कि एक छात्र जो हमारी प्रवेश परीक्षा को मुश्किल से पास कर सका, वह शीर्ष 10 पर्सेंटाइल में से एक था।
लेकिन आकाश के पिता के मन में कुछ खास था। उन्होंने मुझसे अपने बेटे आकाश के लिए आईआईटी जेईई की पुस्तकों का एक सेट मांगा। 9वीं कक्षा के छात्र के लिए यह एक बहुत ही असामान्य अनुरोध था। वह चाहते थे कि उनका बेटा IIT JEE की शीट हल करना शुरू करे। वह उन अध्यायों की एक सूची लेकर आए थे, जिनकी उन्हें भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित में आवश्यकता थी। मैं अनिच्छा से इसके लिए सहमत हो गया। मैंने उन्हें अपने छोटे बेटे को कोटा बुलाने के लिए भी कहा और यह आश्वासन दिया कि उन्हें अपने बेटे के लिए कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।
हम मिलते रहे, लेकिन समय का फासला बढ़ गया जब आकाश 11वीं कक्षा में आया, मुझे पता चला कि वह बंसल कोचिंग को ज्वाइन कर लिया है , मैं यह जानकर थोड़ा परेशान हुआ कि उन्होंने आकाश को हमारी कोचिंग ज्वाइन नहीं करवा कर बंसल क्लासेज ज्वाइन करवा दी.
सत्र के बीच में वह फिर से रेलवे स्टेशन पर मुझसे मिले, मेरा सूटकेस लिया और ऑटो में डाल दिया। चूँकि मैं थोड़ा दुखी था क्योंकि उनका बेटा अब किसी और कोचिंग में पढ़ रहा था। हमने काफी देर तक बात नहीं करी पर उन्होंने यह कहकर चुप्पी तोड़ी कि उनके बेटे को दो साल के लिए 100% छात्रवृत्ति मिली है , इसलिए उनके पास बंसल कोचिंग मैं रखने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। मैंने उससे पूछा कि अगर कोई समस्या थी तो वह मेरे पास क्यों नहीं आये । उसने हाथ जोड़कर कहा, “नीलेश सर हम तो पहले से ही आपके बहुत आभारी हैं। आपने पहले ही छोटे बेटे की फीस माफ कर दी है। आपने किताबें, शिक्षक उपलब्ध कराकर भी आकाश की कितनी बार मदद की है। मुझे और एहसान माँगने में झिझक महसूस हुई। मुझे आपके जैसा एक और फरिश्ता मिला जिसका बेटा बंसल क्लासेज में टॉपर है। जब मैंने उन्हें आकाश के बारे में बताया तो उन्होंने बंसल सर से बात की और मुझे फीस में शत-प्रतिशत छूट दिलवाई। बंसल सर ने भी व्यक्तिगत रूप से उनकी देखरेख की। वे किताबों और नोट्स के रूप में अतिरिक्त सामग्री उपलब्ध करा रहे है।“ उन्होंने अपनी आँखों में आँसू के साथ सारांशित किया। उनकी कहानी सुनकर मेरी सारी नकारात्मकता दूर हो गई।
हमने बाकी रास्ते में बात नहीं की। उन्होंने मुझे घर छोड़ दिया और मेरा सामान गेट के सामने रख दिया। मैंने अपना बटुआ में से 100 रुपये का नोट निकाला । लेकिन उन्होंने मेरे हाथ को रोककर दोनों हाथो से भर लिया, जैसे की वो किसी बात से शर्मिंदा थे , मैं उनकी मजबूरी समझ सकता था, और वो बिना कुछ कहे निकल गए। मैं 2 मिनट तक वहीं खड़ा रहा, समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूं।
दो साल बाद, मैं इस घटना को लगभग भूल गया। उन 2 सालों में उनसे कभी नहीं मिला। शाम को मैं अपने घर के बाहर टहल रहा था। मेरे घर के सामने एक ऑटो रुका, ऑटो वाला और आकाश को पहचान लिया, दोनों खुश दिख रहे थे। आकाश ने मेरे पैर छुए और उनके पिता ने हाथ जोड़कर मुझे बधाई दी। मिठाई का पैकेट ले कर आये थे।
आकाश को जेईई 2010 में लगभग 6000 रैंक के साथ चुना गया था और यह उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षण था। उसके पिता ने एक ही सांस में सब कुछ कह दिया।
उस दिन उनका चेहरा बहुत शांत था और उन्होंने अपने ऑटो की ओर इशारा किया और कहा “ कि जब तक मेरा छोटा बेटा जेईई में नहीं आ जाता, तब तक मैं इस ऑटो को लगभग 2 साल और चलाऊंगा। “ चूंकि मैंने कोटा में उनके संघर्ष को लगभग 4 वर्षों तक देखा था, इसलिए मेरे लिए उस संतुष्टि और उपलब्धि को समझना आसान था जो वह अंदर महसूस कर रहे होंगे।
यह माता-पिता द्वारा अपने बच्चों के लिए किए गए असाधारण पालन-पोषण और बलिदान की एक और कहानी थी।
मैंने अपने दोनों बच्चों से उनके पैर छूने और उनका आशीर्वाद लेने को कहा। मैं यह सोच रहा था कि आकाश अपने जीवन में आगे जाकर क्या करेगा किसी को पता नहीं, पर उसके आसपास के लोग उसके पिता के संघर्ष और बलिदान को कभी समझ पाएंगे कि नही।

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🙏🙏रामरामजी🙏🙏

एक व्यक्ति धन की कामना से ठाकुर जी की सेवा करता था। उसका धन बढ़ने की बजाय नष्ट होता गया।

एक दिन उसकी भेंट किसी साहूकार से हुई जब दोनों में वार्तालाप हुआ तो साहुकार बोला- “आप गलत मूर्ति का पूजन कर रहे हैं। ठाकुर जी तो केवल अपने चरणों की भक्ति देते हैं या फिर जन्म-मरण के बंधन से सदा-सदा के लिए मुक्ति दिलवा देते हैं। धन देने वाली तो मां लक्ष्मी हैं। आप उनकी सेवा करें।”

उस व्यक्ति को तो केवल धन की कामना थी फिर चाहे वो ठाकुर जी की भक्ति से हो या देवी लक्ष्मी की। उसने घर आकर ठाकुर जी की मूर्ति को उठाकर सिंहासन के किनारे कुछ दूरी पर रखी अलमारी में रख दिया और सिंहासन पर मुरली मनोहर की जगह देवी को सम्मान के साथ पधरा कर पूजा करने लगा।

एक दिन वह देवी को गुग्गुल की सुगंधित धूप दे रहा था। उसने देखा धूप का धुआं हवा से मुरलीमनोहर की ओर जा रहा है। उसे बहुत क्रोध आया और मन ही मन विचार करने लगा देना-लेना कुछ नहीं धूप सूंघने को तैयार बैठे हैं। देवी के धूप को सूँघ कर जूठी कर रहे हैं। उसने रूई ली और ठाकुर जी की नाक में ठूंस दी।

उसी समय ठाकुर जी प्रगट हो गए और बोले- वर मांगों।

वो व्यक्ति बोला- “वरदान मैं बाद में माँगुंगा पहले यह बताएं जब मैं आपकी सेवा करता था तब तो आप जड़ बने रहे अब आप कैसे प्रसन्न होकर मुझे वरदान देने आ गए।”

ठाकुर जी बोले- “पहले तुम मुझे पत्थर की मूर्ति समझते थे तो मैं भी जड़ बना रहा परंतु अब तुमने मुझे साक्षात भगवान समझा तुम्हें विश्वास हो गया की मैं धूप सूंघ रहा हूं। तो मैं भी सच में तुम्हारे सामने आ गया।

शास्त्र कहते हैं जिसकी जैसी भावना होती है व जिसका जैसा विश्वास होता है उसकी सिद्धि भी उसी प्रकार होती है..!!

*🙏🏽🙏🏿🙏जय जय श्री राधे*🙏🏾🙏🏻🙏🏼

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વાતનાં યુ-ટર્ન દ્વારા કૃત્રિમ સરસાઈ ભોગવતાં લોકો

એકવાર કરિયાણાની દુકાને હું કેટલીક વસ્તુઓ ખરીદવા ગયેલો. ત્યાં એક બહેન ખાંડ લેવા આવેલાં. એ બહેન મારી સાથે વાતોએ વળગ્યાં. તેણે વસવસો વ્યક્ત કરતાં મને કહ્યું કે, “ભાઈ! અમારા છોકરાવ મહિને દશ કિલો ખાંડ (ચા વગેરેમાં) પી જાય છે!”

મને એનાં પ્રત્યે સહાનુભૂતિ થઈ. મેં જવાબ આપ્યો, “એટલી બધી ખાંડ ન પીવાયને!”
મારો જવાબ સાંભળી એ બહેને તુરત જ યુ-ટર્ન લીધો અને તેઓ બોલ્યાં, “એને કામવું છે અને એને ખાવું છે ને!” આ બહેન છોકરાવની ફરિયાદનાં બહાને પોરહ(પોરસ) કરતા હતાં.

આવી જ રીતે જેનાં ચારેય દીકરાઓ પરણી ગયેલાં અને એ ચારેય પોતાના જ ભેગાં રહેતાં હતાં એવા એ ચારેય દીકરાઓની માતાએ મને તેનાં ઘરની વાત કરતાં કહ્યું કે, “મારી મોટી વહુને પરમ દિવસે સાંજે મેં કહ્યું કે, ‘અત્યારે હું રસોઈ બનાવવા રસોડામાં જાઉં છું. રોટલી, રીંગણાંનું શાક, ખીચડી અને ટીંડોરાનો સંભારો.”
એ સાંભળીને મારી વહુ બોલી, “હા, બનાવો મમ્મી! પણ ટીંડોરાનો સંભારો તો આજે બપોરે જ ખાધો છે. અત્યારે કોબીનો સંભારો કરજો.” મેં કહ્યું, “હા, બેટા! ભલે, કોબીનો સંભારો કરીશ.” પછી બે કલાકમાં જ મેં ફટાફટ એક ચૂલે ખીચડી અને બીજા ચૂલે રોટલી, શાક, સંભારો, એમ રોટલી, રીંગણાંનું શાક, ખીચડી અને કોબીનો સંભારો બનાવી નાખ્યાં.”
હું એ બહેનની વાત અને એ વાતનો અંત કેવો હશે એ જાણવા ‘હં… હં…’ એમ જવાબ દેતો રસપૂર્વક સાંભળી રહ્યો હતો.

પછી એ બહેને આગળ ચલાવ્યું, “રસોઈ બની ગયાં પછી મારી મોટી વહુએ મારા મોટા દીકરાને ફોન કર્યો કે, ‘તમે દુકાનેથી હમણાં ઘરે આવવાના છો ને તો ઘરે ત્રણ કિલો સમોસા ગરમાગરમ લેતાં આવજો.’ આ સાંભળીને મેં કહ્યું, ‘સમોસા? સમોસા કોનાં માટે? બાજુવાળા બહેને કે કોઈએ મંગાવ્યાં છે કે તારી બહેનપણીઓ અત્યારે બેસવા આવવાની છે?’
મારી વહુએ કહ્યું, ‘ના, મમ્મી! કોઈએ મગાવ્યાં નથી કે કોઈ બેસવા આવવાનું નથી. મને ખાવાનું મન થયું છે. પણ હું એકલી થોડીક ખાઉં? ઘરમાં બધાય ખાશે. એટલે ત્રણ કિલો જ મંગાવી લીધાં.’
મેં ઘરનાં તમામ સોળ જણાંની રસોઈ બનાવી નાખી હતી. તેથી મેં કહ્યું, ‘આ રસોઈ બનાવી નાખી છે એનું શું? તેં સમોસા ખાવાનું રસોઈ બન્યાં પહેલાં કહ્યું હોત, તો આટલી સોળ જણાંની રસોઈ બગડેત નહીં.’
તો મારી વહુએ કહ્યું કે, ‘એમાં શું મમ્મી? રસોઈ ગાયને નાખી દઈશું.’ મેં કહ્યું, ‘ગાયને નાખી દેવાય? આપણે સવારે ખાઈ જઈશું. ફ્રીઝમાં રસોઈ બગડે નહીં.’ મારી વહુ કહે, ‘અમે કોઈ ટાઢું નહીં ખાઈએ.'”
હું એ બહેનની વાત ‘હં… હં…’ એમ જવાબ દેતો રસપૂર્વક સાંભળી રહ્યો હતો.
એ બહેને આગળ કહ્યું, “પછી મારો મોટો દીકરો દુકાનેથી આવ્યો અને રસ્તામાં સમોસાવાળાને ત્યાંથી ત્રણ કિલો ગરમ સમોસા લઈ આવ્યો અને સૌએ ખાધાં. જેઓ હાજર ન્હોતાં અને પાછળથી જમ્યાં એનાં માટે ઘરે તેલ મૂકીને ગરમ કર્યાં. પછી વધેલી રસોઈ રોટલી, રીંગણાંનું શાક, ખીચડી અને કોબીનો સંભારો- એ સોળ જણાંની બધીયેય રસોઈ બીજા દિવસે સવારે ગાયને નાખી દીધી. અમારા ઘરમાં કોઈ ટાઢું ખાય નહીં. શું કરવું ભાઈ?!”
એ બહેને વહુનાં કારણે પોતાના ઘરમાં થયેલાં આવા નોંધપાત્ર બગાડ વિશે મારી પાસે તેનું હૈયું ઠાલવ્યું અને છેલ્લે બોલ્યાં, “શું કરવું ભાઈ!?”
મેં કહ્યું, “તમારા દીકરાઓ આવો બગાડ થાય ત્યારે તમારી વહુને કાંઈ ક્યે નહીં?” એ બહેને મને વળતો પ્રશ્ન કર્યો, “શું ક્યે??” મેં કહ્યું, “તમારી વહુને સમોસા ખાવા હતાં તો રસોઈ બનાવ્યા અગાઉ કહેવાયને, એટલે રસોઈ બગડે નહીં. સોળ જણાંની રસોઈ બગડી એ બરાબર ન કહેવાય. સોળ જણાં હોટલમાં જમવા જાય તો કેટલો ખર્ચો થાય. તમારે વહુને કહેવું જોઈતું આજે રસોઈ બની ગઈ છે એટલે સમોસા હવે કાલે મંગાવીશું. આમ કરીએ તો તો ઘર જાય અને ઓસરી રહે.”

એ બહેનની ચારેય વહુઓ કટલેરી, ડ્રેસ, સાડી અને બ્યુટીપાર્લર પર આંધળો ખર્ચ કરતી હોવાં છતાં ચીપી ચીપીને અને લાંબા લહેકાં કરીને બોલતી હોવાથી તેનાં સાસુ એવા આ બહેન તેનાથી અંજાઈને પ્રભાવિત થઈ ગયાં હતાં તેથી મારો જવાબ સાંભળી તેણે પેલા ખાંડવાળા બહેનની જેમ તુરત જ યુ-ટર્ન લીધો: “એને કામવું છે અને એને ખાવું છે ને!” શું કહેવું એ બહેનને? એનાં ઘરે બગાડમાં મારી કોઈ ભૂમિકા હતી ખરી? એ બહેન બીજાને શું સમજતાં હશે? આવા લોકો પોતે બીજા કરતાં ખૂબ સુખી છે એ વાતનો ઢોલ પીટતાં રહેતાં હોય છે.

સ્ત્રીઓનાં યુ-ટર્ન લેવાનાં પ્રસંગો કહ્યાં એવી જ રીતે યુ-ટર્ન લેવા વાળા પુરુષોનાં પ્રસંગોમાંથી એક પ્રસંગ કહું:
હું તલાટી-કમ-મંત્રી હોવાથી અમારે ગામે જમીન મહેસુલની વસુલાત કરવાની હોય છે. રકમ ઝાઝી હોય તો બીજા જ દિવસે અને થોડી રકમ હોય તો મહિનાનાં અંત સુધીમાં આ સરકારી રકમ ફરજીયાત બેંકમાં જમા કરાવી દેવી પડે.

આ રીતે એકવાર મેં ગામે જમીન મહેસુલ તથા શિક્ષણ ઉપકરની કરેલ વસુલાતની રકમનાં ચલન મહિનાની આખર તારીખે બેયનાં ચાર ચાર નકલમાં ચલન તૈયાર કરી, તાલુકા પંચાયતે નોંધી તેમાં તાલુકા વિકાસ અધિકારી સાહેબની સહી કરાવી એસ.બી.આઈ. ખાતે ભરવા ગયો. આખર તારીખ હોવાથી તાલુકાનાં ઘણાં ગામોનાં તલાટી-કમ-મંત્રીઓ ત્યાં ચલન ભરવા આવેલાં. લાઈન મોટી હતી તેથી એકાદ કલાકે વારો આવ્યો ત્યારે મેં ચલન ભરી દીધાં. બારીએથી ચલન કાઉન્ટર પર જાય. એ કાઉન્ટરનાં કર્મચારી ત્યાંથી આપણને ચલનની ઓરીજનલ અને ત્રિપ્લીકેટ નકલ આપે. એ કાઉન્ટર પર હું ચલનની નકલો લેવા ગયો. એ કાઉન્ટરનાં કર્મચારીએ મને પૂછ્યું, “આજે આટલા બધાં તલાટી-કમ-મંત્રીઓ અહીં કેમ છે?”
મેં કહ્યું, “આજે આખર તારીખ છે ને!” તેણે કહ્યું, “એટલે?” મેં કહ્યું, “આખા મહિનામાં કરેલી મહેસુલની વસુલાત આખર તારીખ સુધીમાં બેંકમાં જમા કરાવી દેવી જ પડે.”
“આ રકમ આપણે આજે જમા ન કરાવીએ અને કાલે અથવા ચાર પાંચ દિવસ પછી બેંકમાં જમા કરાવીએ તો શું થાય?” તેણે મને પ્રશ્ન પૂછ્યો.
મેં કહ્યું, “તો નિયમ મુજબ એ કામચલાઉ ઉચાપત કહેવાય. તેથી તાલુકા વિકાસ અધિકારી સાહેબ નોટિસ આપે, ખુલાસો પૂછે અને પગલાં પણ લઈ શકે.”

પેલા બહેનોની જેમ તુરત જ આ કર્મચારીએ પણ યુ-ટર્ન લીધો અને સ્હેજ ઊંચા અવાજે બોલીને મને કહ્યું, “નોકરો તો હુંય કરું છું. હું તો આ બધાય નિયમ જાણતો જ હોઉંને! સરકારી વસુલાતની રકમ આખર તારીખ સુધીમાં બેંકમાં જમા કરાવી દેવી જ પડે, નહીંતર નોકરી પણ જાય. હું ય ‘નોકરો’ કરું છું.”

આવા લોકો બીજાને કેમ ઉતારી પાડવા એમાં માહિર હોય છે અને જિંદગીનો ૯૦% સમય એમાં જ વેડફી નાખે છે. તેઓ નિયમો જાણતાં હતાં તો પછી મને પૂછવાની શું જરૂર હતી?
આ કર્મચારીનાં શબ્દો સાંભળીને અમુક તલાટી-કમ-મંત્રીઓ પૂરી વાત સમજ્યા વિના હું ગુનેગાર હોઉં એમ હસતાં હસતાં મારી સામે જોવા લાગ્યાં. એ બેંકના એ ભાઈએ મને પ્રશ્નો પૂછ્યાં હતાં અને મેં તેનાં જવાબો આપ્યાં હતાં એમાં મેં શું ખોટું કર્યું હતું? પેલા કર્મચારીએ પોતે કંઈ જાણતો ન હોય એમ મને પૂછ્યું હતું. તેણે ‘નોકરો’ તો હુંય કરું છું એમ કહી પોતાનો ‘હું’ પણાનો અહમ પોસ્યો હતો. સામેની વ્યક્તિને વાતોએ ચઢાવી તેનાં પર કૃત્રિમ સરસાઈ સ્થાપનારા લોકો પણ સમાજમાં મળી આવે છે.
-ગુણવંતરાય જોબનપુત્રા.

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ઘણા સમય પહેલા ત્યાં એક રાજા એ લગ્ન કરવાનું નક્કી કર્યું પણ સામે ૬ રાજકુમારી હતી જેમાંથી એને એકને પસંદ કરવાની હતી,

એટલે એણે બધી રાજકુમારીઓને થોડા બીજ આપ્યા ને કહ્યું કે ૬ મહિના પછી આમાંથી જે સૌથી સારું ગુલાબ લઈ ને આવશે એની સાથે હું લગ્ન કરીશ,

૬ મહિના પછી રાજકુમારીઓ જુદા જુદા કોઈ સફેદ તો કોઈ પીળું તો કોઈ લાલ ગુલાબ લઈ ને રાજા પાસે આવી,

પણ

એક રાજકુમારી ખાલી હાથે રાજા પાસે ઉભી રહી ને કહ્યું ” માફ કરજો મહારાજ પણ તમે જે બીજ આપ્યા હતા એ ગુલાબ ના હતા જ નઈ “

રાજા ને આ રાજકુમારીની સત્ય બોલવાની હિમ્મત ને આદત ખૂબ ગમી ગઈ અને એણે આ રાજકુમારી સાથે લગ્ન કરવાનું નક્કી કર્યું…

😜😜😜

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किसी गाँव में एक किसान अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. एक दिन किसान सुबह सुबह कहीं जाने के लिए तैयार हो गया और अपनी पत्नी से बोला – “मैं दूसरे गाँव जा रहा हूँ. शाम तक लौट आऊंगा , तब तक तुम घर का ख़याल रखना.”

पत्नी ने पूछा – “दूसरे गाँव क्यों जा रहे हो ?”

किसान – “मेरा एक मित्र अपनी भैंस बेच रहा है , उसे देखने जा रहा हूँ. अगर पसंद आई तो मैं ही खरीद लूंगा. बच्चों को पीने के लिए दूध मिलेगा.”

भैंस खरीदने की बात सुनकर पत्नी खुश हो गई. बोली – “ये तो तुमने बहुत अच्छा सोचा. मैं भी कब से आपसे यही कहना चाहती थी. भैंस आ जायेगी तो घर में दूध दही की कमी न रहेगी. मैं उसके दूध की मलाई निकाल कर अपनी माँ के पास भेज दिया करूंगी. उनके घर पर भैंस नहीं है.”

माँ का नाम सुनते ही किसान भड़क उठा. बोला – “मेरी भैंस की मलाई तेरी माँ क्यों खाएगी ? मैं खाऊँगा और मेरे बच्चे खायेंगे. उसे मलाई खानी है तो अपनी भैंस क्यों नहीं खरीद लेती ?”

पति के मुँह से अपनी माँ के लिए ऐसे शब्द सुनकर पत्नी भी भड़क उठी. तमतमा कर बोली – “इस घर की हर चीज़ पर मेरा भी उतना ही अधिकार है जितना तुम्हारा है. अगर मैं अपनी भैंस की मलाई अपनी माँ को खिलाना चाहती हूँ तो तुम्हें क्या आपत्ति है ?”

किसान – “आपत्ति है ! मेरी भैंस की मलाई तेरे मायके वाले नहीं खा सकते, समझी !”

पत्नी – “खायेंगे और जरूर खायेंगे … देखती हूँ कौन रोकता है !”

किसान – “अगर तेरी माँ ने मेरी भैंस की मलाई खाई तो मैं उसकी गर्दन पकड़ कर सारी मलाई बाहर निकाल लूंगा.”

पत्नी – “खबरदार जो मेरी माँ के बारे में ऊलजलूल बात की तो … मुझसे बुरा कोई न होगा !”

और इसी तरह वाद-विवाद होते होते विवाद बढ़ गया. दोनों एक दूसरे पर जोर-जोर से चिल्लाने लगे.

पटकी पटका शुरू हो गई।

यहाँ तक कि उनकी आवाज़ घर से निकलकर पड़ोसियों के घर तक पहुँचने लगी.

बगल में एक समझदार किस्म के पडोसी का घर था.
वह निकल कर इनके घर आया कि देखें आखिर माजरा क्या है ?

पडोसी ने आकर पहले तो दोनों पति-पत्नी से झगडे का कारण समझा. फिर पूरा मामला समझने के बाद उसने एक लाठी उठाई और किसान के घर में तोड़फोड़ मचानी शुरू कर दी. एक दो मटके फूट भी गए.

किसान हक्का बक्का !
पत्नी भी हैरान रह गई …
इस पडोसी को क्या हो गया ?

किसान उसे रोकने की कोशिश करता हुआ बोला – “अरे भाई, तुम्हे क्या हो गया ? मेरे घर का नुकसान क्यों कर रहे हो ?

पडोसी बोला – “तेरी भैंस ने मेरा बहुत नुकसान कर दिया … सारा खेत चर गई !” और इतना कहकर फिर मटके फोड़ने लगा.

किसान बोला – “क्यों झूठ बोलते हो ? मेरे घर पर तो भैंस है ही नहीं, फिर तुम्हारा खेत कैसे चर गई ?”

पडोसी बोला – “वैसे ही जैसे इसकी माँ तेरी भैंस की मलाई खा गई !”

और उसके बाद झगड़ा खत्म हो गया।

रवि कांत

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🎋पक्के साधक कैसे बने? 🎋

एक बार एक गुरूजी अपने शिष्यों को भक्ति का उपदेश देते हुए समझा रहे थे कि बेटा पक्के साधक बनो, कच्चे साधक ना बने रहो । कच्चे पक्के साधक की बात सुनकर एक नये शिष्य के मन में सवाल पैदा हुआ !

उसने पूछ ही लिया “ गुरूजी ये पक्के साधक कैसे बनते हैं ?”

गुरूजी मुस्कुराये और बोले, बेटा एक गाँव में एक हलवाई रहता था । हलवाई हर रोज़ कई तरह की मिठाइयाँ बनाता था, जो एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती थी ।
आस पास के गाँवो में भी हलवाई की बड़ी धाक जमी हुई थी , अक्सर लोग हलवाई की मिठाईयों और पकवानों का आनंद लेने आते थे !
एक दिन हलवाई की दुकान पर एक पति पत्नी आये
उनके साथ उनका छोटा सा बच्चा भी था, जो बहुत ही चंचल था
उसके पिता ने हलवाई को हलवा बनाने का आदेश दिया !
वह दोनों तो प्रतीक्षा करने लगे, लेकिन वह बच्चा बार – बार आकर हलवाई से पूछता* –
“ हलवा बन गया क्या ?” हलवाई कहता – “ अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी ।” वह थोड़ी देर प्रतीक्षा करता और फिर आकर हलवाई को आकर पूछता – “खुशबू तो अच्छी आ रही है, हलवा बन गया क्या ?” हलवाई कहता – “ अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी ।” एक बार, दो बार, तीन बार, बार – बार उसके ऐसा बार बार पूछने से हलवाई थोड़ा चिढ़ गया !
उसने एक प्लेट उठाई और उसमें कच्चा हलवा रखा और बोला – “ ले बच्चे खा ले”
बच्चे ने खाया तो बोला – “ ये हलवा तो अच्छा नहीं है”
हलवाई फौरन बोला “ अगर अच्छा हलवा खाना है तो चुपचाप जाकर वहाँ बैठ जाओ और प्रतीक्षा करो ।” इस बार बच्चा चुपचाप जाकर बैठ गया I

जब हलवा पककर तैयार हो गया तो हलवाई ने थाली में सजा दिया और उन की टेबल पर परोस दिया ।
इस बार जब उस बच्चे ने हलवा खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा
उसने हलवाई से पूछा – “ हलवाई काका ! अभी थोड़ी देर पहले जब मैंने इसे खाया था, तब तो यह बहुत ख़राब लगा था. अब इतना स्वादिष्ट कैसे बन गया ?”

तब हलवाई ने उसे प्रेम से समझाते हुए कहा – “ बच्चे जब तू ज़िद कर रहा था, तब यह हलवा कच्चा था और अब यह पक गया है कच्चा हलवा खाने में अच्छा नहीं लगता यदि फिर भी उसे खाया जाये तो पेट ख़राब हो सकता है. लेकिन पकने के बाद वह स्वादिष्ट और पोष्टिक हो जाता है ।”
अब गुरूजी अपने शिष्य से बोले “ बेटा कच्चे और पक्के साधक का फर्क समझ में आया कि नहीं ?”
शिष्य हाथ जोड़ कर बोला गुरू जी “ हलवे के कच्चे और पक्के होने की बात तो समझ आ गई, लेकिन एक साधक के साथ यह कैसे होता है ?”

गुरूजी बोले – बेटा साधक भी हलवाई की तरह ही है । जिस तरह हलवाई हलवे को आग की तपिश से धीरे धीरे पकाता है उसी तरह साधक को भी स्वयं को निरन्तर साधना से पकाना पड़ता है । जिस तरह हलवे में सभी आवश्यक चीज़ें डालने के बाद भी जब तक हलवा कच्चा है, तो उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता !

उसी तरह एक सेवक भी चाहे कितना ही ज्ञान जुटा ले, कर्मकाण्ड कर ले जब तक सिमरन और भजन की अग्नि में नहीं तपता, तब तक वह कच्चा ही रहता है जिस तरह हलवे को अच्छे से पकाने के लिए लगातार उसका ध्यान रखना पड़ता है, उसी तरह साधक को भी अपने मन की चौकीदारी करते रहना चाहिए। जब पकते – पकते हलवा का रँग बदल जाये उसमें से खुशबु आने लगे और उसे खाने में आनन्द का अनुभव हो, तब उसे पका हुआ कहते है । उसी तरह जब साधना, साधक और साध्य तीनों एक हो जाये, साधक के शरीर से प्रेम की खुशबू आने लगे तब समझना चाहिए कि साधक पक्का हो चुका है ।”

जब तक सेवक का सिमरन पक्का न हो जाये, उसे सावधान और सतर्क रहना चाहिए !
क्योंकि माया बड़ी ठगनी है । कभी भी साधक को अपने रास्ते से गिरा सकती है ।
अतः साधक को निरंतर सिमरन और भजन से खुद को मजबूत बनाना चाहिए जी. !!

स्वामी जयदेवांग महाराज,हिमाचल प्रदेश।

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!! अच्छे इंसान का निर्माता !!

एक 6 वर्षीय लड़का अपनी 4 वर्षीय छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था। अचानक उसे लगा कि उसकी छोटी बहन पीछे रह गई है। वह रुका, पीछे मुड़कर देखा तो जाना, कि उसकी बहन एक खिलौने की दुकान के सामने खड़ी कोई चीज निहार रही है। लड़का पीछे से आता है और बहन से पूछता है -‘कुछ चाहिए तुम्हें?’ लड़की एक गुड़िया की तरफ उंगली उठाकर दिखाती है। बच्चा उसका हाथ पकड़ता है, एक जिम्मेवार बड़े भाई की तरह अपनी बहन को वह गुड़िया उठा कर दे देता है। बहन बहुत खुश हो गई।
दुकानदार यह सब देख रहा था। बच्चे का प्रगल्भ व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित भी हुआ।
अब वह बच्चा बहन के साथ काउंटर पर आया और दुकानदार से पूछा- ‘सर कितनी कीमत है इस गुड़िया की?’
दुकानदार एक शांत और गंभीर व्यक्ति था। उसने जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखे थे। उसने बड़े प्यार और अपनत्व से बच्चे से पूछा -‘बताओ बेटे आप क्या दे सकते हो?’ बच्चा अपनी जेब से वह सारी सीपें बाहर निकाल कर दुकानदार को देता है, जो उसने थोड़ी देर पहले, बड़ी मेहनत से,अपनी बहन के साथ, समंदर के किनारे से चुन-चुन कर बीनी थी ।
दुकानदार वह सब लेकर यों गिनता है,जैसे कोई पैसे गिन रहा हो। सीपें गिनकर वह बच्चे की तरफ देखने लगा, तो बच्चा बोला- ‘सर कुछ कम है क्या?’
दुकानदार- ‘नहीं- नहीं यह तो इस गुड़िया की कीमत से भी ज्यादा है, मैं वापस देता हूं’, यह कहकर -उसने चार सीपें रख ली और बाकी की बच्चे को वापस दे दी ।बच्चा बड़ी खुशी से, सीपें अपनी जेब में रखकर, बहन को साथ लेकर चला गया।

यह सब उस दुकानदार का कर्मचारी देख रहा था। उसने आश्चर्य से मालिक से पूछा- ‘मालिक इतनी महंगी गुड़िया, आपने केवल 4 सीपों के बदले में दे दी।’
दुकानदार एक स्मित संतुष्टि वाला हास्य करते हुए बोला-‘ हमारे लिए यह केवल सीप है, पर उस 6 साल के बच्चे के लिए अति मूल्यवान हैं,और अब इस उम्र में वह नहीं जानता कि पैसे क्या होते हैं। पर जब वह बड़ा होगा ना… और जब उसे याद आएगा कि उसने सीपों के बदले बहन को गुड़िया खरीद कर दी थी, तब उसे मेरी याद जरूर आएगी। और फिर वह सोचेगा कि…’ यह विश्व अच्छे मनुष्यों से भी भरा हुआ है।’ यह बात उसके अंदर सकारात्मक दृष्टिकोण बढ़ाने में मदद करेगी, और वह भी एक अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित होगा।

दुबेजी

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एक्सपायरी डेट

एक बार अमेरिका में कैलीफोर्निया की सड़कों के किनारे पेशाब करते हुए देख एक बुजुर्ग आदमी को पुलिसवाले पकड़ कर उनके घर लाए और उन्हें उनकी पत्नी के हवाले करते हुए निर्देश दिया कि वो उस शक़्स का बेहतरीन ढंग से ख़याल रखें औऱ उन्हें घर से बाहर न निकलने दें ।

दरअसल वो बुजुर्ग बिना बताए कहीं भी औऱ किसी भी वक़्त घर से बाहर निकल जाते थे और ख़ुद को भी नहीं पहचान पाते थे ।

बुजुर्ग की पत्नी ने पुलिस वालों को शुक्रिया कहा और अपने पति को प्यार से संभालते हुए कमरे के भीतर ले गईं।

पत्नी उन्हें बार बार समझाती रहीं कि तुम्हें अपना ख्याल रखना चाहिए। ऐसे बिना बताए बाहर नहीं निकल जाना चाहिए। तुम अब बुजुर्ग हो गए हो, साथ ही तुम्हें अपने गौरवशाली इतिहास को याद करने की भी कोशिश करनी चाहिए। तुम्हें ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए जिससे शर्मिंदगी महसूस हो ।

जिस बुजुर्ग को पुलिस बीच सड़क से पकड़ कर उन्हें उनके घर ले गई थी, वो किसी ज़माने में अमेरिका के जाने-माने फिल्मी हस्ती थे। लोग उनकी एक झलक पाने के लिए तरसते थे। उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि उसी के दम पर वो राजनीति में पहुंचे और दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे तथा एकदिन वो अमेरिका के राष्ट्रपति बने। नाम था रोनाल्ड रीगन।

1980 में रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति बने और पूरे आठ साल दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति रहे। राष्ट्रपति रहते हुए उन पर गोली भी चली। कई दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद जब वो दोबारा व्हाइट हाऊस पहुंचे तो उनकी लोकप्रियता दुगुनी हो चुकी थी। रीगन अपने समय में अमेरिका के सबसे लोकप्रिय नामों में से एक थे।

राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब वो अपनी निज़ी नागरिकता में लौटे तो कुछ दिनों तक सब ठीक रहा। पर कुछ दिनों बाद उन्हें अल्जाइमर की शिकायत हुई और धीरे-धीरे वो अपनी याददाश्त खो बैठे।

शरीर था। यादें नहीं थीं। वो भूल गए कि एक समय था जब लोग उनकी एक झलक को तरसते थे। वो भूल गए कि उनकी सुरक्षा दुनिया की सबसे बड़ी चिंता थी। रिटायरमेंट के बाद वो सब भूल गए। पर अमेरिका की घटना थी तो बात सबके सामने आ गई कि कभी दुनिया पर राज करने वाला ये शख्स जब यादों से निकल गया तो वो नहीं रहा, जो था। मतलब उसका जीवन होते हुए भी खत्म हो गया था।

ताकतवर से ताकतवर चीज़ की भी एक एक्सपायरी डेट होती है ।
अहंकार व्यर्थ है चाहे वो सत्ता का हो,धन का हो , ज्ञान का हो या फ़िर अपने बाहुबल का !

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*एक्सपायरी डेट*

एक बार अमेरिका में कैलीफोर्निया की सड़कों के किनारे पेशाब करते हुए देख एक बुजुर्ग आदमी को पुलिसवाले पकड़ कर उनके घर लाए और उन्हें उनकी पत्नी के हवाले करते हुए निर्देश दिया कि वो उस शक़्स का बेहतरीन ढंग से ख़याल रखें औऱ उन्हें घर से बाहर न निकलने दें ।

दरअसल वो बुजुर्ग बिना बताए कहीं भी औऱ किसी भी वक़्त घर से बाहर निकल जाते थे और ख़ुद को भी नहीं पहचान पाते थे ।

बुजुर्ग की पत्नी ने पुलिस वालों को शुक्रिया कहा और अपने पति को प्यार से संभालते हुए कमरे के भीतर ले गईं।

पत्नी उन्हें बार बार समझाती रहीं कि तुम्हें अपना ख्याल रखना चाहिए। ऐसे बिना बताए बाहर नहीं निकल जाना चाहिए। तुम अब बुजुर्ग हो गए हो, साथ ही तुम्हें अपने गौरवशाली इतिहास को याद करने की भी कोशिश करनी चाहिए। तुम्हें ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए जिससे शर्मिंदगी महसूस हो ।

जिस बुजुर्ग को पुलिस बीच सड़क से पकड़ कर उन्हें उनके घर ले गई थी, वो किसी ज़माने में अमेरिका के जाने-माने फिल्मी हस्ती थे। लोग उनकी एक झलक पाने के लिए तरसते थे। उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि उसी के दम पर वो राजनीति में पहुंचे और दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे तथा एकदिन वो अमेरिका के राष्ट्रपति बने। नाम था रोनाल्ड रीगन।

1980 में रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति बने और पूरे आठ साल दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति रहे। राष्ट्रपति रहते हुए उन पर गोली भी चली। कई दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद जब वो दोबारा व्हाइट हाऊस पहुंचे तो उनकी लोकप्रियता दुगुनी हो चुकी थी। रीगन अपने समय में अमेरिका के सबसे लोकप्रिय नामों में से एक थे।

राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब वो अपनी निज़ी नागरिकता में लौटे तो कुछ दिनों तक सब ठीक रहा। पर कुछ दिनों बाद उन्हें अल्जाइमर की शिकायत हुई और धीरे-धीरे वो अपनी याददाश्त खो बैठे।

शरीर था। यादें नहीं थीं। वो भूल गए कि एक समय था जब लोग उनकी एक झलक को तरसते थे। वो भूल गए कि उनकी सुरक्षा दुनिया की सबसे बड़ी चिंता थी। रिटायरमेंट के बाद वो सब भूल गए। पर अमेरिका की घटना थी तो बात सबके सामने आ गई कि कभी दुनिया पर राज करने वाला ये शख्स जब यादों से निकल गया तो वो नहीं रहा, जो था। मतलब उसका जीवन होते हुए भी खत्म हो गया था।

ताकतवर से ताकतवर चीज़ की भी एक एक्सपायरी डेट होती है ।
अहंकार व्यर्थ है चाहे वो सत्ता का हो,धन का हो , ज्ञान का हो या फ़िर अपने बाहुबल का !