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(((( मूढ़ से महाकवि ))))
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द्वार के सामने निकलती पशुओं की कतार को देखकर वह चिल्लाया… उट् उट्
भीतर से पति की वाणी सुनकर गृहिणी निकली। उसके कानों मे ये शब्द बरबस प्रवेश पा गए।
व्याकरण की महापण्डिता, दर्शन की मर्मज्ञा नागरी और देवभाषा की यह विचित्र खिचड़ी देखकर सन्न रह गयी।
आज विवाह हुए आठवाँ दिन था। यद्यपि इस एक सप्ताह मे बहुत कुछ उजागर हो चुका था…
मालूम पड़ने लगा था कि जिसे परम विद्वान बताकर दाम्पत्य बन्धन मे बाँधा गया था, वह परम मूर्ख है।
आज ऊंट को संस्कृत मे बोलने के दाम्भिक प्रयास ने अनुमान पर प्रामाणिकता की मुहर लगा दी।
उफ !… इतना बड़ा छल !… ऐसा धोखा !
वह व्यथित हो गयी, व्यथा को पीने के प्रयास मे उसने निचले होंठ के दाहिने सिरे को दाँतों से दबाया।
ओह !… नारी कितना सहेगी तू ? कितनी घुटन है तेरे भाग्य मे?
कब तक गीला होता रहेगा तेरा आँचल आंसुओं की निर्झरिणी से।
सोचते सोचते उसे ख्याल आया कि वह उन्हें भोजन हेतु बुलाने आयी थी।
चिन्तन को एक ओर झटककर उसने पति के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा, “आर्य भोजन तैयार है।”
“अच्छा।” कहकर वह चल पड़ा।
भोजन करते समय तक दोनों निःशब्द रहे। हाथ धुलवाने के पश्चात् गृहिणी ने ही पहल की.. “स्वामी”।
“कहो” स्वर मे अधिकार था।
“यदि आप आज्ञा दे तो मैं आपकी ज्ञानवृद्धि मे सहायक बन सकती हूँ।”
“तुम ज्ञान वृद्धि में “ ? .. आश्चर्य से पुरुष ने आंखें उसकी ओर उठाई।”
स्वर को अत्यधिक विनम्र बनाते हुए उसने कहा, “अज्ञान अपने सहज रूप मे उतना अधिक खतरनाक नहीं होता, जितना कि तब, जब कि वह ज्ञान का छद्म आवरण ओढ़ लेता है।”
“तो… तो मैं अज्ञानी हूँ।” … अटकते हुए शब्दों मे भेद खुल जाने की सकपकाहट झलक रही थी।
“नहीं नहीं आप अज्ञानी नहीं हैं।” स्वर को सम्मानसूचक बनाते हुए वह बोली,
“पर ज्ञान अनन्त है और मैं चाहती हूँ कि आप मे ज्ञान के प्रति अभीप्सा जगे।
फिर आयु से इसका कोई बन्धन भी नहीं। अपने यहाँ आर्य परम्परा मे तो वानप्रस्थ और संन्यास मे भी विद्या प्राप्ति का विधान है।
कितने ही ऋषियों ने, आप्त पुरुषों ने जीवन का एक दीर्घ खण्ड बीत जाने के बाद पारंगतता प्राप्त की।
“सो तो ठीक है पर ………….।”
पति की मानसिकता मे परिवर्तन को लक्ष्य कर उसका उल्लासपूर्ण स्वर फूटा.. “मैं आपकी सहायिका बनूँगी।”
“तुम मेरी शिक्षिका बनोगी? पत्नी और गुरु।”
कहकर वह अट्टहास करके हंस पड़ा। हंसी मे मूर्खता और दम्भ के सिवा और क्या था ?
पति के इस कथन को सुनकर उसके मन मे उत्साह का ज्वार जैसे चन्द्र पर लगते ग्रहण को देख थम गया।
वह सोचने लगी आह ! … पुरुष का दम्भ।
नारी नीची है, जो जन्म देती है वह नीची है, जो पालती है वह नीची हैं,
जिसने पुरुष को बोलना चलना, तौर तरीके सिखाए वह नीची है, और पुरुष क्यों ऊंचा है ?
क्यों करता है, सृष्टि के इस आदि गुरु की अवहेलना?
क्योंकि उसे भोगी होने का अहंकार है। नारी की सृजन शक्ति की मान्यता और गरिमा से अनभिज्ञ है।
क्या सोचने लगी ? पति ने पूछा।
अपने को सम्हालते हुए उसने कहा, “कुछ खास नहीं।
फिर कहने से लाभ भी क्या ? “
“नहीं कहो तो ?” स्वर मे आग्रह था।
सुनकर एक बार फिर समझाने का प्रयास करते हुए कहा… “हम लोग विवाहित है।
दाम्पत्य की गरिमा परस्पर के दुःख सुख, हानि लाभ, वैभव-सुविधाएं, धन यश को मिल जुलकर उपयोग करने मे है।
पति पत्नी मे से कोई अकेला सुख लूटे, दूसरा व्यथा की धारा मे पड़ा सिसकता रहे, क्या यह उचित है ?”
“नहीं तो।” पति कुछ समझने का प्रयास करते हुए बोला।
“तो आप इससे सहमत है कि दाम्पत्य की सफलता का रहस्य स्नेह की उस संवहन प्रक्रिया मे है जिसके द्वारा एक के गुणों की उर्जस्विता दूसरे को प्राप्त होती है।
दूसरे का विवेक पहले के दोषों का निष्कासन, परिमार्जन करता है।”
“ठीक कहती हो।”
नारी की उन्नत गरिमा के सामने पुरुष का दम्भ घुटने टेक रहा था।
“तो फिर विद्या भी धन है, शक्ति है, ऊर्जा है, जीवन का सौंदर्य है। क्यों न हम इसका मिल बाँट कर उपयोग करें ?”
“हाँ यह सही है।”
“तब आपको मेरे सहायिका बनने में क्या आपत्ति है ?”
“कुछ नहीं।” .. स्वर ढीला था।
शायद नारी की सृजन शक्ति के सामने पुरुष का अहं पराजित हो चुका था।
“तो शुभस्य शीध्रं।”… और वह पढ़ाने लगी अपने पति को।
पहला पाठ अक्षर ज्ञान से शुरू हुआ।
प्रारंभ मे कुछ अरुचि थी, पर प्रेम के माधुर्य के सामने इसकी कड़वाहट नहीं ठहरी।
क्रमशः व्याकरण, छन्द शास्त्र, निरुक्त, ज्योतिष आदि छहों वेदाँग, षड्दर्शन, ज्ञान की सरिता उमड़ती जा रही थी।
दूसरे के अन्तर की अभीप्सा का महासागर उसे निःसंकोच धारण कर रहा था।
वर्षों के अनवरत प्रयास के पश्चात् पति अब विद्वान हो गया था।
ज्ञान की गरिमा के साथ वह नतमस्तक था, उस सृजनशिल्पी के सामने, जो नारी के रूप मे उसके सामने खड़ी थी।
सरस्वती की अनवरत उपासना उसके अन्तर मे कवित्व की अनुपमेय शक्ति के रूप मे प्रस्फुटित हो उठी थी।
वह कभी का मूढ़ अब महाकवि हो गया।
देश देशान्तर सभी उसे आश्चर्य से देखते, सराहते और शिक्षण लेने का प्रयास करते।
वह सभी से एक ही स्वानुभूत तथ्य कहता…
“पहचानो, नारी की गरिमा, उस कुशल शिल्पी की सृजनशक्ति, जो आदि से अब तक मनुष्य को पशुता से मुक्त कर सुसंस्कारों की निधि सौंपती आयी है।”
महाराज विक्रमादित्य ने उन्हें अपने दरबार मे रखा।
अब वे विद्वत कुलरत्न थे।
दाम्पत्य का रहस्य सूत्र उन्हें वह सब कुछ दे रहा था, जो एक सच्चे इनसान को प्राप्त होना चाहिए।
स्वयं के जीवन से लोकजीवन को दिशा देने वाले ये दंपत्ति थे “महाविदुषी विद्योत्तमा और कविकुल चूड़ामणि कालिदास।”
साभार :- अज्ञात

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“सम्मान की ललक “

“बड़ी अम्मा,अब तो मोहन भइया के पास तू शहर चली जा.. जीवन भर अपाहिज पति की ख़ातिर गाँव में रही..सब्ज़ी बेचकर पति,बच्चों को पालती रही.. अब तुम्हारे आराम के समय हैं.. जेठू तो चला गया, अकेली जान , तेरा क्या है.. मोहन भइया की शहर में सरकारी नौकरी है, भौजाई भी अच्छी है.. फिर तू क्यों सब्ज़ी बेच कर अपना जीवन खपा रही है?” सब्ज़ी बेचते हुए देखकर अम्मा के देवर का लड़का शिवपूजन ने कहा।
“नहीं बेटे.. तू तो जानता है,तेरा जेठू कैसा सिर फिरा था..गाँव छोड़कर कभी जाना नहीं चाहा..उसकी वजह से मैं यहीं रहकर उसे कमा कर जीवन भर ख़िलाती रही..फिर भी न जाने उसे कैसी खुन्नस थी मुझसे..मुझे देखते ही मेरे लिए उसकी नफ़रतों में उबाल आने लगती.. बहाने खोज खोज कर बूढ़ा मुझे अपनी बैसाखी दिखाता..पास होती तो लगा भी देता..जीवन भर अपमान सह कर उसे पालती रही.. उसकी नफ़रत झेलती रही, मानो मैंने ही उसके पैर कटवा दिए हों! अब तो हमारे सम्मान से जीने के समय आए हैं..खुद इज़्ज़त से कमाती खाती हूँ.. जब तक शरीर साथ देता है! बाद में जो भी हो.. मोहन चाहे जैसे रक्खे! अभी से क्यूँ अपने सम्मान को गिरवी रखने का उपाय करूँ?कौन जाने मोहन भी बाप जैसा ही हो!” डबडबायी आँखों में विश्वास की चमक के साथ अम्मा ने कहा
बड़ी अम्मा ‘सम्मान की ललक’ में खुद के कर्मों से अर्जित सम्मान को जीना चाहती हैं…खुद को खुद की नज़रों में उठाना चाहती है!
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स्वरचित
रंजना बरियार

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हिसाब_बराबर / लघुकथा

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“काकी!.आप सौदा पूरा तौलने के बाद दो-चार टमाटर हर ग्राहकों के थैले में यूँही मुफ्त में क्यों डाल देती हो?”
रोज वहीं बगल में भुट्टे की दुकान लगा पाँच का बीस बनाने वाला आखिर आज उससे पूछ बैठा।
“बेटा!.बस उतने से ही अपना हिसाब बराबर हो जाता है।”
“कैसा हिसाब?”
“ये मेरी तराजू बहुत पुरानी है और वजन रखने वाला पलड़ा थोड़ा ज्यादा घिस गया है।” काकी ने घिसकर छेद हो चुके तराजू का वह पलड़ा पलट कर उसे दिखाया।
“उससे क्या हुआ?”
“बेटा!.ग्राहकों को कम तो नहीं तौल सकती ना!”
“इसलिए दो-चार किलो टमाटर यूँही मुफ्त में बांट देती हो!” काकी की बेवकूफी पर उसे हंसी आई ।
“अरे!.मुफ्त में कहां?.उनके हक का ही तो उन्हें देती हूँ।”
“काकी जितना आप सोचती हो ना!.उतना कोई गौर नहीं करता।”
“वह सब गौर करता है बेटा!”
“कौन?”
उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी अपने कर्म में ईमानदारी बरतने की भरसक कोशिश करती काकी ने पूरे विश्वास के साथ श्रद्धा भाव से हाथ जोड़ ऊपर आसमान की ओर देखा।
“वो ऊपर वाला।”

पुष्पा कुमारी “पुष्प”
पुणे (महाराष्ट्र)
02/03/2021

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सुप्रभातम

एक बोध कथा

बहुत समय पहले की बात है, एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया, संयोगवश वह रास्ता भूलकर घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि हो गई और वर्षा होने लगी। राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।

कुछ दूरी पर उसे एक दीपक जलता हुआ दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था, अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था।

वह झोंपड़ी बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त थी। उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहरने देने के लिए प्रार्थना की।

बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी – कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं।
उन्हें इस झोंपड़ी की गंध ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश/ज़िद करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ, इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता। मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।

राजा ने प्रतिज्ञा की, कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, उसे तो सिर्फ एक रात ही तो काटनी है।

तब बहेलिये ने राजा को वहाँ ठहरने की अनुमति दे दी, लेकिन सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली करने की शर्त को दोहरा दिया। राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा।

सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह जब उठा तो वही सबसे परम प्रिय लगने लगा। राजा जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा। और बहेलिये से वहीं ठहरने की प्रार्थना करने लगा।

इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा।

राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।

यह कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने राजा “परीक्षित” से पूछा, “परीक्षित” बताओ कि उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था?

परीक्षित ने उत्तर दिया, भगवन् ! वह राजा कौन था, उसका नाम तो बताइये? मुझे वह तो मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक वहाँ रहना चाहता है। उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है।

श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा, हे राजा परीक्षित! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।

इस मल-मूत्र की गठरी “देह(शरीर)” में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है ?” राजा परीक्षित का ज्ञान जाग गया और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।

“वस्तुतः यही सत्य है।”

जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि, हे भगवन् ! मुझे यहाँ (इस कोख) से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा। और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो (उस राजा की तरह हैरान होकर) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया (और पैदा होते ही रोने लगता है)

फिर धीरे धीरे उसे उस गंध भरी झोंपड़ी की तरह यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है। यही कथा मेरी भी है

जय जय सियाराम

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एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया। पूजा पाठ के लिए बनारस से एक विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भोजन की व्यवस्था की गई। जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया। शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज़ चलता है।भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया करती थी।

रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जाएगा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है।

खैर करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है। शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था।वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ? वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें। सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं। आप ने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा। वो महिला प्रसन्न हो गई और काम में व्यस्त हो गई। कथा खत्म हुई और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।

शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी। शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी और जोर जोर से ऊँ भूर्भुवः स्वः ….. ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ से तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई। शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो…?

महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था। मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ। शास्त्री जी बोले क्या मतलब ??

महिला बोली की आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है। लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा “भव सागर” तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की। शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी। किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों में आंसू आ गए और बोले माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा।

इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूं। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए। उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले मां चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।

श्रद्धा और विश्वास ही है जो पत्थर को भी भगवान बनाता है।

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अन्नपूर्णा

छोटी के आने से तो जैसे घर में रौनक ही आ गई। दो दिन पहले ही इस सास बिना ससुराल में ब्याह कर आई है। मैंने भी उसके आवभगत में कोई कमी कसर नहीं छोड़ी आखिर बड़ी जिठानी जो ठहरी। पढ़ी-लिखी, रूप-गुण की धनवान, सर्वगुण सम्पन्न छोटी ने आते ही सबका मन मोह लिया।

आज उसकी पहली रसोई है इस घर में। छोटे-बड़े दोनों देवरों ने यहाँ तक कि इन्होंने भी फरमाइश कर डाली उससे इटालियन, चाइनीज खाने की। छोटी ने भी कमर में साड़ी का पल्लू खोंसा और बड़ी जी-जान से एक-एक करके सब कुछ बना कर डाइनिंग टेबल पर सजा दिया। इधर खाने की खुशबू पूरे घर में फैलनी शुरू हुई नहीं कि उधर बगल वाले घर से आई ताई जी का मुँह बनाना शुरू हो गया। “ये कौन सा नया रिवाज़ निकाला है तुम लोगों ने, आज के दिन बिदेसी खाने का?”

“नहीं ताई जी, खीर-पूरी भी बनाई है छोटी बहु ने। जरा चख के तो बताइए।” छोटी कुछ कह बैठती इससे पहले ही मैंने उसे आँख दिखाकर चुप रहने का इशारा किया और खीर-पूरी की थाली ताई जी आगे रख दी। ताई जी ने खूब छक कर खाया, खूब तारीफ़ की, छोटी को नेग में सौ का नोट और ढेर सारा आशीर्वाद देकर वो लौट गयीं।

इधर दोनों देवर और ये अपने-अपने पसंदीदा खाने पर टूट पड़े। डाईनिंग टेबल पर तीनों की खुसर-फुसर से अंजान हम दोनों देवरानी-जिठानी बड़ी अचरज से एक-दूसरे की शक्ल देखने लगीं। तभी छोटा देवर प्लेट को काँटे से बजाते हुए बोला,” आज से छोटी भाभी इस घर की मास्टर-शेफ़ मुक़र्रर की जातीं हैं।”

“शुक्रिया, आप सभी को मेरा बनाया खाना पसंद आया पर ये मास्टर शेफ़ भी आप सब से कुछ कहना चाहती है………मास्टर शेफ़ के खाने से सिर्फ जिव्हा तृप्त होती है पर अन्नपूर्णा के खाने से तो आत्मा तक तृप्त हो जाती है। बस सामने खड़ी इस घर की साक्षात अन्नपूर्णा की कृपा सदा मुझ पर बनी रहे। उसकी बगल में ही खीर का कटोरा हाथ में लिए खड़ी थी, वो मेरी तरफ देख कर बोली।

“कौन अन्नपूर्णा?” छोटे देवर ने पूछ लिया।

आँख दिखाकर, चुप रहने का इशारा किया पर इस बार छोटी मानी ही नहीं। फाटक से बोल पड़ी। “बड़ी भाभी।”

मीनाक्षी चौहान

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” शाप “
जिज्जी जबसे गोलोक वासी हुई थी उनका तन्हा मकान भुतहा सा लगने लगा था ।बरसी के बाद तो सारा ही धूल धूसरित हो रहा था पता नही बहन प्रेम ने भाई की बुद्धि फेर दी थी या भाई ने ही भुला दिया उस छोटे से घर का ढेर सारा प्यार । बहनोई जी के जाने के बाद जिज्जी बस हमीं से दुःख सुख बांटा करती बेटा तो सीधा सादा पर बुद्धि जाने किसने फेरी कि जबसे अमेरिका जाकर बस गया कभी कभार साल में आकर एक बार अपने कर्तव्य की इतिश्री कर जाता उसके बाद से माँ की कोई चिंता नही थी …..हाँ मरने से एक महीना पहले आकर पास रह गया यही बहुत है शायद जिज्जी की आत्मा तो तृप्त हो गई होगी ।
बेटियाँ चाहे जान भी दे दे ,पर माँ बाप पुत्र मोह में ही फंसे रहते है।मुझे याद है
कभी कभी मेरे सामने जिज्जी को बहनोई जी कहा करते थे… “क्यों इन बन्धनो में बंधी है…. क्यो इतना समान जोड़ रही है… देख ना सब सड़ेगा कोई नही लेगा तेरा समान” ….. जाने किस बेला में मुंह पर सुरसती जी ने बैठकर ऐसी वाणी निकाली जो सच हो रही थी….
जबकि सारी उमर साधु सा जीवन जीने वाले जीजा बेटे का मोह ना त्याग सके…. उसी के लियें तड़पते रहे थे मरते दम तक …..
वो तो दामाद इतने अच्छे मिले थे कि ग्यारह साल तक छः महीने बड़ी छः महीने छोटी,दोनों बेटियाँ (जिज्जी) माँ को आकर ले जाते और उनका ध्यान रखते थे मैने तो हमेशा लड़कियो को ही करते देखा था ।ये छोटा सा आशियाना भी तो कभी छोटी कभी बड़ी ने ही सजाया ,तो फिर मरते दम जिज्जी ने अपनी छोटी सी कुटिया भी करोड़पति लड़के के नाम क्यूँ लिख दी । जबकि हरदम यही कहने वाली जिज्जी कि चाहे कुछ हो जायें मै अपनी दोनों बिटिया और दामाद को भी अपना कुछ हिस्सा दूंगी .. जाने कितनी यादें इस घर से जुड़ी थी छोटी की…
बेटी के जापे से ले कर पिता के अन्तिम समय तक वही तो साथ रही बेटा बहु तो मेहमान की तरह आये और चले गये बरसी के दिन छोटी फूट फूट कर रो पड़ी थी…. जब बरसी में आये भाई ने मां बाप के छोटे से घर का सौदा कर लिया अमेरिका मे ग्रीन कार्ड होल्डर भाई जिसकी तीन या चार महीने की तन्ख्वाह में वो घर बिक रहा था वो मासूम भाई अपनी छोटी बहन का मन ना समझ
सका बेटियों की यादोँ से भरा घर….
लाक डाउन की वजह से बीच में ही रह गया सौदा ,ना वो अमेरिका से जल्दी आ पायेगा…..।
जाने कब ये घर शाप से मुक्त होगा ।
अपर्णा गुप्ता लखनऊ

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महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी …. !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा “देवव्रत” (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था — अकेला …. !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , “प्रणाम पितामह” …. !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी , बोले , ” आओ देवकीनंदन …. ! स्वागत है तुम्हारा …. !!

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था” …. !!

कृष्ण बोले , “क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप” …. !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले,” पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव … ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है” …. !

कृष्ण चुप रहे …. !

भीष्म ने पुनः कहा , “कुछ पूछूँ केशव …. ?
बड़े अच्छे समय से आये हो …. !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय ” …. !!

कृष्ण बोले – कहिये न पितामह ….!

एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न …. ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका , “नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं … मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह … ईश्वर नहीं ….”

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े …. ! बोले , ” अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे …. !! “

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले …. ” कहिये पितामह …. !”

भीष्म बोले , “एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या …. ?”

“किसकी ओर से पितामह …. ? पांडवों की ओर से …. ?”

” कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था …. ? आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या …. ? यह सब उचित था क्या …. ?”

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह …. !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ….. !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन …. !!

मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह …. !!

“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण …. ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है …. !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण …. !”

“तो सुनिए पितामह …. !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ …. !
वही हुआ जो हो होना चाहिए …. !”

“यह तुम कह रहे हो केशव …. ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ….? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ….. ? “

“इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है …. !

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है …. !!
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था …. !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह …. !!”

” नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो …. !”

” राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह …. !
राम के युग में खलनायक भी ‘ रावण ‘ जैसा शिवभक्त होता था …. !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ….. ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे …. ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था …. !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया …. ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं …. !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह …. ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो …. !!”

“तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव …. ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा …. ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ….. ??”

” भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह …. !

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा …. !

वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा …. नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा …. !

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह …. !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय …. !

भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह ….. !!”

“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव …. ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ….. ?”

“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह …. !

ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ….. !केवल मार्ग दर्शन करता है*

सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है …. !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न …. !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ….. ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न …. ?
यही प्रकृति का संविधान है …. !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से …. ! यही परम सत्य है ….. !!”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे …. !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी …. !
उन्होंने कहा – चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है …. कल सम्भवतः चले जाना हो … अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण …. !”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था …. !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ….।।

पराग डोसी की फेसबुक पोस्ट से साभार
धर्मों रक्षति रक्षितः
चित्र सौजन्य : Keshav Venkataraghavan

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. ☀️'आसानी से विश्वास नहीं करें'☀️ ________________________________

एक बार एक शिकारी जंगल में शिकार करने के लिए गया। बहुत प्रयास करने के बाद उसने जाल में एक बाज पकड़ लिया।

शिकारी जब बाज को लेकर जाने लगा तब रास्ते में बाज ने शिकारी से कहा, “तुम मुझे लेकर क्यों जा रहे हो?”

शिकारी बोला, “ मैं तुम्हे मारकर खाने के लिए ले जा रहा हूँ।”

बाज ने सोचा कि अब तो मेरी मृत्यु निश्चित है। वह कुछ देर यूँही शांत रहा और फिर कुछ सोचकर बोला, “देखो, मुझे जितना जीवन जीना था मैंने जी लिया और अब मेरा मरना निश्चित है, लेकिन मरने से पहले मेरी एक आखिरी इच्छा है।”

“बताओ अपनी इच्छा?”, शिकारी ने उत्सुकता से पूछा।

बाज ने बताना शुरू किया-

मरने से पहले मैं तुम्हें दो सीख देना चाहता हूँ, इसे तुम ध्यान से सुनना और सदा याद रखना।

पहली सीख तो यह कि किसी कि बातों का बिना प्रमाण, बिना सोचे-समझे विश्वास मत करना।

और दूसरी ये कि यदि तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो या तुम्हारे हाथ से कुछ छूट जाए तो उसके लिए कभी दुखी मत होना।

शिकारी ने बाज की बात सुनी और अपने रस्ते आगे बढ़ने लगा।

कुछ समय बाद बाज ने शिकारी से कहा- “ शिकारी, एक बात बताओ…अगर मैं तुम्हे कुछ ऐसा दे दूँ जिससे तुम रातों-रात अमीर बन जाओ तो क्या तुम मुझे आज़ाद कर दोगे?”

शिकारी फ़ौरन रुका और बोला, “ क्या है वो चीज, जल्दी बताओ?”

बाज बोला, “ दरअसल, बहुत पहले मुझे राजमहल के करीब एक हीरा मिला था, जिसे उठा कर मैंने एक गुप्त स्थान पर रख दिया था। अगर आज मैं मर जाऊँगा तो वो हीरा इसे ही बेकार चला जाएगा, इसलिए मैंने सोचा कि अगर तुम उसके बदले मुझे छोड़ दो तो मेरी जान भी बच जायेगी और तुम्हारी गरीबी भी हमेशा के लिए मिट जायेगी।”

यह सुनते ही शिकारी ने बिना कुछ सोचे समझे बाज को आजाद कर दिया और वो हीरा लाने को कहा।

बाज तुरंत उड़ कर पेड़ की एक ऊँची साखा पर जा बैठा और बोला, “ कुछ देर पहले ही मैंने तुम्हे एक सीख दी थी कि किसी के भी बातों का तुरंत विश्वास मत करना लेकिन तुमने उस सीख का पालन नही किया…दरअसल, मेरे पास कोई हीरा नहीं है और अब मैं आज़ाद हूँ।

यह सुनते ही शिकारी मायूस हो पछताने लगा…तभी बाज फिर बोला, तुम मेरी दूसरी सीख भूल गए कि अगर कुछ तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो तो उसके लिए तुम कभी पछतावा मत करना।

इस कहानी – से हमें ये सीख मिलती है कि हमे किसी अनजान व्यक्ति पर आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए और किसी प्रकार का नुक्सान होने या असफलता मिलने पर दुखी नहीं होना चाहिए, बल्कि उस बात से सीख लेकर भविष्य में सतर्क रहना चाहिए।

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✳️ एक बहुत ही सुंदर दृष्टांत… ✳️

एक बार की बात है वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे।

नारायण नारायण !!

नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।

हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि ! कहाँ जा रहे हो?

नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है?

हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है, प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है।

नारदजी: अच्छा?? क्या लिखा पढ़ी कर रहे है?

हनुमानजी बोले: मुझे पता नहीं मुनिवर आप खुद ही देख आना।

नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है।

नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है?
ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।

प्रभु बोले: नहीं नारद, मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता।

नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है? ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो?

प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।

नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते हैं?

प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ।

नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है?

नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान ! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं पर आप का नाम उस में कहीं नहीं है?

हनुमानजी ने कहा कि: मुनिवर,! होगा, आप ने शायद ठीक से नहीं देखा होगा?

नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था।

हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक अन्य दैनंदिनी भी रखते है उसमें भी वे नित्य कुछ लिखते हैं।

नारदजी बोले:अच्छा?

हनुमानजी ने कहा: हाँ!

नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु ! सुना है कि आप अपनी अलग से दैनंदिनी भी रखते है! उसमें आप क्या लिखते हैं?

प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नहीं है।

नारदजी: ”प्रभु ! बताईये ना, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं?

प्रभु मुस्कुराये और बोले मुनिवर मैं इनमें उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।

नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जीव्हा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तों के वे स्वयं भक्त हो जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपनी हृदय रूपी विशेष सूची में रखते हैं।

श्री राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की…

हे नाथ!हे मेरे नाथ!!आप बहुत ही कृपालु हैं!!!🙏