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💖🎉एक दुखियारी भैंस का खुला ख़त

अब तो जिसे देखो वही गाय की तारीफ़ करने में लगा हुआ है। कोई उसे माता बता रहा है तो कोई बहन! अगर गाय माता है तो हम भी तो आपकी चाची, ताई, मौसी, बुआ कुछ लगती ही होंगी!

हम सब समझती हैं। हम अभागनों का रंग काला है ना! इसीलिये आप इंसान लोग हमेशा हमें ज़लील करते रहते हो और गाय को सर पे चढ़ाते रहते हो!

आप किस-किस तरह से हम भैंसों का अपमान करते हो, उसकी मिसाल देखिये।

आपका काम बिगड़ता है अपनी ग़लती से और टारगेट करते हो हमें कि

देखो गयी भैंस पानी में

गाय को क्यूं नहीं भेजते पानी में! वो महारानी क्या पानी में गल जायेगी?

आप लोगों में जितने भी लालू लल्लू हैं, उन सबको भी हमेशा हमारे नाम पर ही गाली दी जाती है

काला अक्षर भैंस बराबर

माना कि हम अनपढ़ हैं, लेकिन गाय ने क्या पीएचडी की हुई है?

जब आपमें से कोई किसी की बात नहीं सुनता, तब भी हमेशा यही बोलते हो कि

भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फ़ायदा!

आपसे कोई कह के मर गया था कि हमारे आगे बीन बजाओ? बजा लो अपनी उसी प्यारी गाय के आगे!

अगर आपकी कोई औरत फैलकर बेडौल हो जाये तो उसे भी हमेशा हमसे ही कंपेयर करोगे कि

भैंस की तरह मोटी हो गयी हो

करीना; कैटरीना गाय और डॉली बिंद्रा भैंस! वाह जी वाह!

गाली-गलौच करो आप और नाम बदनाम करो हमारा कि

भैंस पूंछ उठायेगी तो गोबर ही करेगी

हम गोबर करती हैं तो गाय क्या हलवा करती है?

अपनी चहेती गाय की मिसाल आप सिर्फ़ तब देते हो, जब आपको किसी की तारीफ़ करनी होती है-

वो तो बेचारा गाय की तरह सीधा है, या- अजी, वो तो राम जी की गाय है!

तो गाय तो हो गयी राम जी की और हम हो गये लालू जी के!

वाह रे इंसान! ये हाल तो तब है, जब आप में से ज़्यादातर लोग हम भैंसों का दूध पीकर ही सांड बने घूम रहे हैं।

उस दूध का क़र्ज़ चुकाना तो दूर, उल्टे हमें बेइज़्ज़त करते हैं! आपकी चहेती गायों की संख्या तो हमारे मुक़ाबले कुछ भी नहीं हैं। फिर भी, मेजोरिटी में होते हुए भी हमारे साथ ऐसा सलूक हो रहा है!

प्लीज़ कुछ करो! आपके ‘कुछ’ करने के इंतज़ार में – आपकी एक तुच्छ प्रशंसक!

भैंस
(वाट्सएप सन्देश)

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*बचपन से ही हमलोग एक कथा सुनते आ रहे हैं कि….*

एक बिच्छू जल में छटपटा रहा था और एक महात्मा उसे बचा रहे थे…!

लेकिन, जैसे ही महात्मा उसे उठाते थे… बिच्छू उन्हें डंक मार कर काट लेता था.
ये देख कर… लोगों ने महात्मा को समझाया कि….
महात्मा… ऐसे जीव को क्यों बचाना, जो खुद को बचाने वाले को ही काट रहा है ???
जाने दो न…!

लेकिन, ये सुनते ही महात्मा जी पर “महात्मागीरी” हावी हो गई…
और, वे कहने लगे… “जब यह छोटा सा जीव अपना स्वभाव नहीं छोड़ता…
तो, फिर मैं क्यों छोड़ दूँ ???”

‘पंचतंत्र’ में इतनी कथा के बाद विराम लग गया…!

पर, असलियत में ये कथा आगे भी चलती रही.

लोगों ने उस नदी वाली बात को भुला दिया….
पर, महात्मा अपनी “महात्मागीरी” में लगे रहे…

और, ढेरों बिच्छू बचा बचा कर अपने इर्द-गिर्द जमा कर लिए …

चूंकि, बिच्छुओं की प्रजनन दर भी बहुत तेज थी तो जल्द ही हर तरफ बिच्छू ही नजर आने लगे.

अब वे सारे बिच्छू…. जो पहले सिर्फ छूने पर ही डंक मारते थे,
अब, बिना छुए ही खुद से पहल कर महात्मा को “काटने” लगे.

यहाँ तक कि… उन्हें “ध्यान-साधना” भी न करने दें.

तब तंग आकर महात्मा बोले…
“अरे…!
मुझे मेरी पूजा तो करने दो,
वरना मैं महात्मा कैसे बना रह पाऊंगा ??”

इस पर बिच्छू कहते हैं….
“अब हमारी गिनती ज्यादा है.
इसीलिए, अब रहना है तो हम जैसा बन के रहो,
वरना हम तेरा जीवन ही समाप्त कर देंगे।”

यह देखकर… हैरान- परेशान महात्मा ने “डंडा” लेकर बिच्छुओं की खातिरदारी करनी शुरू की..

तो झट से…. सारी “बिच्छू जमात” चिल्लाने लगी कि…
तुम तो महात्मा हो,
तुम्हें हिंसा नहीं करनी चाहिए,
तुम तो वसुधैव कुटुम्बकम वाले लोग हो..
तुम अपना स्वभाव कैसे बदल सकते हो ???
तुम असहिष्णु कैसे हो गये ???”

पहले यही गुजरात में हुआ…
फिर up में हुआ…
और, अब यही असम और तिरिपुरा में हो रहा है.

असल में इसमें गलती बिच्छुओं की नहीं है बल्कि महात्मा की ही है..
क्योंकि, सांप और बिच्छू का स्वभाव ही है काटना…!

और, सांप की वो प्रवृति कभी बदल नहीं सकती…!
उसे तो एक दिन डसना ही है…
फिर चाहे… उसे दूध पिलाओ अथवा न पिलाओ…

ठीक यही प्रवृति दाढ़ी वाले हरे बिच्छुओं में भी पाई जाती है…

पहले तो वे आपके मुहल्ले अथवा घर के बाहर जमीन पर असहाय और लाचार से पड़े रहेंगे…

लेकिन, अगर आप

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A father told his daughter, “Congrats on your graduation. I bought you a car a while back. I want you to have it now.”
Before I give it to you, take it to a car dealer in the city and sell it. See how much they offer.”

The girl came back to her father and said: “They offered me $10,000 dollars because it looks very old”
Father said: “Ok, now take it to the pawn shop”.

The girl returns to her father and said: “The pawn shop offered $1,000 dollars because it’s a very old car and a lot of work done”.

The father told her to join a passionate car club with experts and show them the car. The girl drove to the passionate car club. She returned to her father after a few hours and told him, “Some people in the club offered me $100,000 dollars because its a rare car that’s in good condition.”

Then the father said, “I wanted to let you know that you are not worth anything if you are not in the right place. If you are not appreciated, do not be angry, that means you are in the wrong place. “Don’t stay in a place where no one sees your value .”

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नोएडा के एक फाइव स्टार हॉस्पिटल में डॉक्टरों की टीम ने पेशेंट को तुरंत बायपास सर्जरी करवाने की सलाह दी पेशेंट बहुत नर्वस हो गया किंतु तुरंत तैयारी में लग गया

ऑपरेशन के पहले वाले सारे टेस्ट हो जाने के बाद डॉक्टर की टीम ने बजट बताया 18 लाख जो कि पेशेंट और परिवार वालों को बहुत ही ज्यादा लगा

लेकिन “जान है तो जहान है” यह सोचकर वह फॉर्म भरने लगा फार्म भरते भरते व्यवसाय का कॉलम आया तो आपरेशन की टेंशन और रूपये के इंतजाम की उधेड़बुन में ना जाने क्या सोचते सोचते या पता नहीं किस जल्दबाजी में उसने उस काॅलम के आगे “C.B.I.” लिख दिया

और फिर अचानक हॉस्पिटल का वातावरण ही बदल गया

डॉक्टरों की दुसरी टीम चेकअप करने आयी रीचेकिंग हुई टेस्ट दोबारा करवाए गए और टीम ने घोषित किया कि ऑपरेशन की जरूरत नहीं है मेडिसिन खाते रहिये ब्लाकेज निकल जायेगा।

पेशेंट को रवाना करने से पहले तीन महीने की दवाइयाँ फ्री दी गई और चैकअप और टेस्ट फीस में भी जबरदस्त ‘डिस्काउँट’ दिया गया

इस बात को छः महीने हो गये पेशेन्ट अब भला चंगा है कभी-कभी उस हाॅस्पीटल में चैकअप के लिये चला जाता है उस दिन के बाद उसका चैकअप भी फ्री होता है और बिना चाय पिलाये तो डाॅक्टर आने ही नहीं देते…

पेशेंट बहुत खुश है हाॅस्पीटल के इस व्यवहार से गाहे बगाहे लोगो के आगे इस अस्पताल की तारीफ करता रहता है

पर कई बार ये सोच कर बहुत हैरान होता है कि 15 साल हो गये उसे नौकरी करते पर “Central Bank of India” का एम्प्लॉई होने की वजह से इतनी इज्जत इतना सम्मान तो उसके परिवार वालों ने कभी नहीं दिया जैसे वो अस्पताल वाले उसे सर पर बैठाए रखते हैं

🤔🤔😂🤩😀

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नोएडा के एक फाइव स्टार हॉस्पिटल में डॉक्टरों की टीम ने पेशेंट को तुरंत बायपास सर्जरी करवाने की सलाह दी पेशेंट बहुत नर्वस हो गया किंतु तुरंत तैयारी में लग गया

ऑपरेशन के पहले वाले सारे टेस्ट हो जाने के बाद डॉक्टर की टीम ने बजट बताया 18 लाख जो कि पेशेंट और परिवार वालों को बहुत ही ज्यादा लगा

लेकिन “जान है तो जहान है” यह सोचकर वह फॉर्म भरने लगा फार्म भरते भरते व्यवसाय का कॉलम आया तो आपरेशन की टेंशन और रूपये के इंतजाम की उधेड़बुन में ना जाने क्या सोचते सोचते या पता नहीं किस जल्दबाजी में उसने उस काॅलम के आगे “C.B.I.” लिख दिया

और फिर अचानक हॉस्पिटल का वातावरण ही बदल गया

डॉक्टरों की दुसरी टीम चेकअप करने आयी रीचेकिंग हुई टेस्ट दोबारा करवाए गए और टीम ने घोषित किया कि ऑपरेशन की जरूरत नहीं है मेडिसिन खाते रहिये ब्लाकेज निकल जायेगा।

पेशेंट को रवाना करने से पहले तीन महीने की दवाइयाँ फ्री दी गई और चैकअप और टेस्ट फीस में भी जबरदस्त ‘डिस्काउँट’ दिया गया

इस बात को छः महीने हो गये पेशेन्ट अब भला चंगा है कभी-कभी उस हाॅस्पीटल में चैकअप के लिये चला जाता है उस दिन के बाद उसका चैकअप भी फ्री होता है और बिना चाय पिलाये तो डाॅक्टर आने ही नहीं देते…

पेशेंट बहुत खुश है हाॅस्पीटल के इस व्यवहार से गाहे बगाहे लोगो के आगे इस अस्पताल की तारीफ करता रहता है

पर कई बार ये सोच कर बहुत हैरान होता है कि 15 साल हो गये उसे नौकरी करते पर “Central Bank of India” का एम्प्लॉई होने की वजह से इतनी इज्जत इतना सम्मान तो उसके परिवार वालों ने कभी नहीं दिया जैसे वो अस्पताल वाले उसे सर पर बैठाए रखते हैं

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एक साधु व एक डाकू एक ही दिन मरकर यमलोक पहुंचे. धर्मराज उनके कर्मों का लेखा-जोखा खोलकर बैठे थे और उसके हिसाब से उनकी गति का हिसाब करने लगे.
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निर्णय करने से पहले धर्मराज ने दोनों से कहा- मैं अपना निर्णय तो सुनाउंगा लेकिन यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो मैं अवसर देता हूं, कह सकते हो.
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डाकू ने हमेशा हिंसक कर्म ही किए थे. उसे इसका पछतावा भी हो रहा था. अतः अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला महाराज ! मैंने जीवन भर पापकर्म किए. जिसने केवल पाप ही किया हो वह क्या आशा रखे. आप जो दंड दें, मुझे स्वीकार है.
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डाकू के चुप होते ही साधु बोला महाराज ! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है. मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला. सदैव सत्कर्म ही किए इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का शीघ्र प्रबंध करें.
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धर्मराज ने दोनों की बात सुनी फिर डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो. डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली.
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यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति जताते हुए कहा- महाराज ! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा. मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निरर्थक हो जाएगा. मेरे पुण्य कर्मों का उचित सम्मान नहीं हो रहा है.
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धर्मराज को साधु की बात पर बड़ा क्षोभ हुआ. वह क्षुब्ध होकर बोले- निरपराध व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला डाकू मर कर इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है.
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तुम वर्षों के तप के बाद भी अहंकार ग्रस्त ही रहे. यह नहीं जान सके कि सब में एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है. तुम्हारी तपस्या अधूरी और निष्फल रही. अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो, और तप को पूर्ण करो.

उसी तपस्या में फल है, जो अहंकार रहित होकर की जाए. अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश्वर प्राप्ति का आधार बनता है. झूठे दिखावे तप नहीं हैं, ऐसे लोगों की गति वही होगी जो साधु की हुई….

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ઝંડુ ભટ્ટ એટલે જામ વિભાજી ના દરબાર ના નવરત્નો પૈકી ના એક રત્ન… જામનગર ની આયુર્વેદ પરંપરા ની ધરોહર. જામનગર ની આયુર્વેદ યુનિવર્સીટી ના પાયા માં ઝંડુ ભટ્ટ ની આયુર્વેદ પરંપરા છે…

ઝંડુ ભટ્ટ જ્યાં રહેતા હતા તે શેરી ને ઝંડુ ભટ્ટ ની શેરી તરીકે ઓળખવા માં આવે છે જ્યાં આજે પણ ઝંડુ ભટ્ટ જે મકાન માં રહેતા હતા તે અસ્તિત્વ માં છે… મેં આ સ્થળ ની નવ વર્ષ અગાઉ મુલાકાત લીધેલ… અહી હજુ ઝંડુ ભટ્ટ ના અમુક સાધનો સચવાયેલ પડ્યા છે…

જામનગર ની આ ધરોહર ને સંભાળી ને અહી ઝંડુ ભટ્ટ વિષે લોકો વધુ જાણે તેના માટે ની વ્યવસ્થા ગોઠવવા ની જરૂર છે… આયુર્વેદ યુનિવર્સીટી માં જ્યાં સુધી હું જાણું છું ત્યાં સુધી ઝંડુ ભટ્ટ નું પુતળું પણ મુકવા માં નથી આવ્યું… સુખનાથ મહાદેવ માં આવેલ એમની રસશાળા અત્યંત જીર્ણશીર્ણ હાલત માં છે…. ત્યાં થોડું ઉત્ખનન કરી અવશેષો બહાર કાઢવા ની જરૂર છે…

જામનગર ઝંડુ ભટ્ટ નું ઋણ ચૂકવી શકે તેમ નથી… પણ આ ઋણ ફેડવા માટે નાનો પ્રયત્ન કરવો ખુબ જરૂરી છે…

જામનગર ના નેતાઓ ના હૃદય માં જામનગર પ્રત્યે કોઈ લાગણી જન્મે એવી આશા રાખીએ અને ઝંડુ ભટ્ટ ની કાયમી યાદગીરી રહે તેવું કોઈ નક્કર કામ થાય એવી અપેક્ષા….

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क्यों कोसता है खुद को


क्यों कोसता है खुद को*🙏

संतों की एक सभा चल रही थी…

किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संत जन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें…

संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था. उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे…
वह सोचने लगा- अहा ! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है…???

एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा… । संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा. ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है…

घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा सिर्फ मिट्टी का ढेर था…

किसी काम का नहीं था. कभी ऐसा नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है…

फिर एक दिन एक कुम्हार आया. उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और मुझे बोरी में भर कर गधे पर लादकर अपने घर ले गया ।

वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाकपर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा, फिर थापी मार-मारकर बराबर किया । बात यहीं नहीं रूकी, उसके बाद आंवे के आग में झोंक दिया जलने को…

इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेजने के लिए लाया गया . वहां भी लोग मुझे ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं ?
ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये…

मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था…

रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो. मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है…

लेकिन ईश्वर की योजना कुछ और ही थी,
किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया…

तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी उसकी☝️ की कृपा थी…

उसका मुझे वह गूंथना भी उसकी ☝️ की कृपा थी…

मुझे आग में जलाना भी उसकी☝️ की मौज थी…

और…
बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भी उसकी☝️ ही मौज थी…

अब मालूम पड़ा कि मुझ पर सब उस परमात्मा की कृपा ही कृपा थी…

दरसल बुरी परिस्थितिया हमें इतनी विचलित कर देती हैं कि हम उस परमात्मा के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं और खुद को कोसने लगते हैं , क्यों हम सबमें शक्ति नहीं होती उसकी लीला समझने की…

कई बार हमारे साथ भी ऐसा ही होता है हम खुद को कोसने के साथ परमात्मा पर ऊँगली उठा कर कहते हैं कि उसने☝️ न मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया ,
क्या मैं इतना बुरा हूँ ? और मलिक ने सारे दुःख तकलीफ़ें मुझे ही क्यों दिए ।
*लेकिन सच तो ये है मालिक उन तमाम पत्थरों की भीड़ में से तराशने के लिए एक आप को चुना । अब तराशने में तो थोड़ी तकलीफ तो झेलनी ही पड़ती है 😊

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मिट्टी का दिल


मिट्टी का दिल💐💐

पंकज एक गुस्सैल लड़का था. वह छोटी-छोटी बात पर नाराज़ हो जाता और दूसरों से झगड़ा कर बैठता. उसकी इसी आदत की वजह से उसके अधिक दोस्त भी न थे।

पंकज के माता-पिता और सगे-सम्बन्धी उसे अपना स्वभाव बदलने के लिए बहुत समझाते पर इन बातों का उसपर कोई असर नहीं होता।

एक दिन पंकज के पेरेंट्स को शहर के करीब ही किसी गाँव में रहने वाले एक सन्यासी बाबा का पता चला जो अजीबो-गरीब तरीकों से लोगों की समस्याएं दूर किया करता था।

अगले दिन सुबह-सुबह वे पंकज को बाबा के पास ले गए।

बाबा बोले, “जाओ और चिकनी मिटटी के दो ढेर तैयार करो।

पंकज को ये बात कुछ अजीब लगी लेकिन माता-पता के डर से वह ऐसा करने को तैयार हो गया।

कुछ ही देर में उसने ढेर तैयार कर लिया.

बाबा बोले, “अब इन दोनों ढेरों से दो दिल तैयार करो!”

पंकज ने जल्द ही मिटटी के दो हार्ट शेप तैयार कर लिए और झुंझलाते हुए बोला, “हो गया बाबा, क्या अब मैं अपने घर जा सकता हूँ?”

बाबा ने उसे इशारे से मना किया और मुस्कुरा कर बोले, “अब इनमे से एक को कुम्हार के पास लेकर जाओ और कहो कि वो इसे भट्टी में डाल कर पका दे.”

पंकज को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि बाबा करना क्या चाहते हैं पर अभी उनकी बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा न था.
दो-तीन घंटे बाद पंकज यह काम कर के लौटा।

“यह लो रंग और अब इस दिल को रंग कर मेरे पास ले आओ!”, बाबा बोले।

“आखिर आप मुझसे कराना क्या चाहते हैं? इन सब बेकार के टोटकों से मेरा गुस्सा कम नहीं हो रहा बल्कि बढ़ रहा है!”, पंकज बड़बड़ाने लगा।
बाबा बोले, “बस पुत्र यही आखिरी काम है!”

पंकज ने चैन की सांस ली और भट्टी में पके उस दिल को लाल रंग से रंगने लगा.।

रंगे जाने के बाद वह बड़ा ही आकर्षक लग रहा था. पंकज भी अब कहीं न कहीं अपनी मेहनत से खुश था और मन ही मन सोचा रहा था कि वो इसे ले जाकर अपने रूम में लगाएगा.

वह अपनी इस कृति को बड़े गर्व के साथ बाबा के सामने लेकर पहुंचा.

पहली बार उसे लग रहा था कि शायद बाबा ने उससे जो-जो कराया ठीक ही कराया और इसकी वजह से वह गुस्सा करना छोड़ देगा.
“तो हो गया तुम्हारा काम पूरा?”, बाबा ने पूछा.

“जी हाँ, देखिये ना मैंने खुद इसे लाल रंग से रंगा है!”, पंकज उत्साहित होते हुए बोला.

“ठीक है बेटा, ये लो हथौड़ा और मारो इस दिल पर.”, बाबा ने आदेश दिया.

“ये क्या कह रहे हैं आप? मैंने इतनी मेहनत से इसे तैयार किया है और आप इसे तोड़ने को कह रहे हैं?”, पंकज ने विरोध किया.
इस बार बाबा गंभीर होते हुए बोले, “मैंने कहा न मारो हथौड़ा!”

पंकज ने तेजी से हथौड़ा अपने हाथ में लिए और गुस्से से दिल पर वार किया.

जिस दिल को बनाने में पंकज ने आज दिन भर काम किया था एक झटके में उस दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए.

“देखिये क्या किया आपने, मेरी सारी मेहनत बर्बाद कर दी.”

बाबा ने पंकज की इस बात पर ध्यान न देते हुए अपने थैले में रखा मिट्टी का दूसरा दिल निकाला और बोले, “चिकनी मिट्टी का यह दूसरा दिल भी तुम्हारा ही तैयार किया हुआ है… मैं इसे यहाँ जमीन पर रखता हूँ… लो अब इस पर भी अपना जोर लगाओ…”

पंकज ने फ़ौरन हथौड़ा उठाया और दे मारा उस दिल पर.

पर नर्म और नम होने के कारण इस दिल का कुछ ख़ास नहीं बिगड़ा बस उसपर हथौड़े का एक निशान भर उभर गया.

“अब आप खुश हैं… आखिर ये सब कराने का क्या मतलब था… मैं जा रहा हूँ यहाँ से!”, पंकज यह कह कह कर आगे बढ़ गया.

“ठहरो पुत्र!,” बाबा ने पंकज को समझाते हुए कहा, “जिस दिल पर तुमने आज दिन भर मेहनत की वो कोई मामूली दिल नहीं था… दरअसल वो तुम्हारे असल दिल का ही एक रूप था.

तुम भी क्रोध की भट्टी में अपने दिल को जला रहे हो… उसे कठोर बना रहे हो… ना समझी के कारण तुम्हे ऐसा करना ताकत का एहसास दिलाता है… तुम्हे लगता है की ऐसा करने से तुम मजबूत दिख रहे हो… मजबूत बन रहे हो… लेकिन जब उस हथौड़े की तरह ज़िंदगी तुम पर एक भी वार करेगी तब तुम संभल नहीं पाओगे… और उस कठोर दिल की तरह तुम्हारा भी दिल चकनाचूर हो जाएगा!

समय है सम्भल जाओ! इस दूसरे दिल की तरह विनम्र बनो… देखो इस पर तुम्हारे वार का असर तो हुआ है पर ये टूट कर बिखरा नहीं… ये आसानी से अपने पहले रूप में आ सकता है… ये समझता है कि दुःख-दर्द जीवन का एक हिस्सा है और उनकी वजह से टूटता नहीं बल्कि उन्हें अपने अन्दर सोख लेता है…जाओ क्षमाशील बनो…प्रेम करो और अपने दिल को कठोर नहीं विनम्र बनाओ!”

पंकज बाबा को एक टक देखता रह गया. वह समझ चुका था कि अब उसे कैसा व्यवहार करना है!

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એક માણસને પોતાના જ સગા,પરિવાર વગેરેની બીક બહુ લાગ્યા કરતી હતી.
એવો છૂપો ભય લાગ્યા કરે કે કોઈ મને દગો કરશે,કોઈ કાંઈક કરાવી નાખશે,વગેરે શંકાઓમાં એટલો ભયભીત રહેતો હતો કે ખાવું-પીવું અને ઉંઘ હરામ થઈ ગઈ.
એના એક મિત્રની સલાહથી એણે ફકીર પાસે તાવીજ બનાવડાવ્યું.
તાવીજ આપતા ફકીરે સૂચના આપી કે..
દર શુક્રવારે આ તાવીજને ગુગળનો ધૂપ દેવાનું ચૂકતો નહિ.
બહાર જા ત્યારે આ તાવીજ સાથે લઈ જવાનું ભૂલતો નહી.
કોઈનો ઓછાયો-આભડશેટ લાગી ન જાય એનું ધ્યાન રાખજે.
આ માણસ તો સૂચના મુજબ જ વર્તવા લાગ્યો.
કોઈનો ડર ન રહ્યો.
ભયમુક્ત થયો.
બીજો બધો ડર તો કાલ્પનિક હતો.
એ બધી બાબતે નિર્ભય બની ગયો.
પણ….
તાવીજનો ડર વધી ગયો.
તાવીજ ક્યાંક અડી જાહે તો ?
તાવીજ કોક ભાળી જાહે તો ?
આભડશેટ લાગી જાહે તો ?
તાવીજ ખોવાઈ જાહે તો ?
કોક ચોરી તો નહીં જાય ને ?
બીજો બધો ડર તો સાવ ભૂલી જવાયો પણ તાવીજ નો ભય આજીવન રહયો.
– સાર તો આપ સૌ વિદ્વાનો પોતપોતાની રીતે મેળવી લેશો.
(આવી મર્મસભર વાતો માટે લાખણશીભાઈ ગઢવીને સાંભળો.)
— ભાલ