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એક ખેતરના ખૂણા પર મકાન બનાવીને


એક ખેતરના ખૂણા પર મકાન બનાવીને એક કુટુંબ રહેતું હતું. માં-બાપ, દાદાજી, તેમનો પૌત્ર. માં-બાપ રોજે મજુરી ઉપર નીકળી જતા, અને ઘરે દાદાજી અને દસ વરસનો પૌત્ર જ રહેતા. દાદાજી રોજે સવારે વહેલા ઉઠીને બારી પાસે મુકેલી ખુરશી પર બેસીને પુસ્તકો વાંચતા રહેતા.

એક દિવસ પૌત્રએ પૂછ્યું: “દાદા…હું તમારી જેમ જ બુક્સ વાંચવાનો પ્રયત્ન કરું છું, પણ હું તેમાં કઈ સમજતો નથી. અને હું જે કઈ પણ સમજુ છું એ એક-બે દિવસમાં ભૂલી જાઉં છું. ઘણીવાર તો બુક બંધ કરું ને પાછળ બધું ભુલાઈ જાય છે. તમે પણ બધું ભૂલી જાઓ છો. તો પછી પુસ્તકો અને કહાનીઓ વાંચવાનો મતલબ શું?”

દાદાજી હસ્યા, અને ઉભા થઈને રસોડામાં ગયા અને લોટ ચાળવાનો ગંદો હવાલો લઈને આવ્યા. પોતાના પૌત્રને કહ્યું: “આ હવાલો લે, અને બહાર ખેતરમાં જતા પાણીના ધોરીયા માંથી હવાલો ભરીને લેતો આવ. મારે આ હવાલામાં સમાય એટલું પાણી જોઈએ છે.”

દીકરાને જેમ કહેલું તેમ કર્યું, પરંતુ હવાલો ભરીને દોડતો દાદાજી પાસે આવ્યો એ પહેલા જ હવાલાના કાણાઓ માંથી બધું પાણી લીક થઇ ગયું. દાદાજી હસ્યા અને કહ્યું: “બીજી વાર ભરતો આવ, પરંતુ આ વખતે ઝડપથી દોડીને આવજે.” દીકરો બીજી વાર ગયો, પણ ફરીથી તે દાદાજી પાસે પહોંચે એ પહેલા હવાલો ખાલી હતો! હાંફતા-હાંફતા તેણે દાદાજીને કહ્યું કે આ હવાલામાં તો પાણી ભરીને લાવવું અશક્ય લાગે છે. હું એક ગ્લાસમાં કે લોટામાં ભરતો આવું.
પરંતુ દાદાજી કહે: “ના. મારે આ હવાલામાં સમાય એટલું પાણી જ પીવું છે! મને લાગે છે તું સરખી કોશિશ નથી કરી રહ્યો.” છોકરો ફરી બહાર ગયો, અને પૂરી ઝડપથી દોડતો આવ્યો, પણ હવાલો ફરી ખાલી જ હતો! થાકીને જમીન પર બેસીને દાદાજીને તેણે કહ્યું: “દાદા…કહું છું ને…આ નકામું છે. ના ચાલે.”

“ઓહ… તો તને લાગે છે કે આ નકામું કામ છે?” દાદાજીએ કહ્યું, “-તું એકવાર હવાલા સામે તો જો.”

છોકરાએ હવાલાને જોયો અને પહેલીવાર તેણે જોયું કે હવાલો બદલાઈ ગયો હતો. તે જુના ગંદા હવાલા માંથી ધોવાયેલો, ચોખ્ખો, ચળકતો હવાલો બની ગયો હતો. તેના દરેક મેલ ધોવાઇ ગયા હતા.

દાદાજીએ હસીને કહ્યું: “બેટા…જયારે તમે પુસ્તકો વાંચો ત્યારે આવું થાય છે. તું કદાચ બધું સમજે નહી, કે બધું યાદ ન રહે, પરંતુ જયારે તમે વાંચો, ત્યારે તમે બદલાતા હો છો. અંદર અને બહાર પણ. કોઈ પણ કહાની કે કોઈ સારી વાત તમને અંદરથી થોડા ધોઈ નાખે છે, અને તમારો મેલ દુર કરે છે.

આહીર પ્રવીણ સોનારા

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कुमार सतीश

एक बहुत पुरानी कहानी है कि….

एक बार एक पंडित जी ने कहीं पूजा करवाया और उस पूजा में दान स्वरूप पंडित जी एक बहुत ही प्यारी सी बछिया (छोटी गाय) मिली…!

लेकिन, जब पंडित जी जब उस बछिया को लेकर घर आने लगे तो कुछ उचक्कों ने पंडित जी से उस बछिया को छीनने का सोचा…!

लेकिन, सीधे छीन लेने में खतरा था और छीनने के कारण उन्हें दंड पाने का भी भय था…

इसीलिए, उन उचक्कों ने एक प्लान बनाया और और वे पूरे रास्ते में बिखर गए.

जब पंडित जी उस रास्ते से गुजरे से पहले उचक्के ने कहा :
अरे पंडित जी, ये बकरी कहाँ से ले आये ?
आप इस बकरी का क्या करेंगे ??

इस पर पंडित जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि… जजमान, शायद तुम्हें दिख नहीं रहा है कि.. ये बकरी नहीं बल्कि, बछिया है.

इस पर उस उचक्के ने बछिया को ध्यान से देखने का नाटक किया .. और, फिर बोला कि….
नहीं, पंडित जी, मैंने बहुत ध्यान से देखा… ये बकरी ही है.. किसी ने आपको बेवकूफ बनाकर बछिया के बदले बकरी दे दी है.

इस पर पंडित जी… हँसते हुए आगे बढ़ गए.

लेकिन, साजिश के अनुसार…. थोड़ी दूर पर दूसरे उचक्के ने उन्हें फिर टोक दिया… और, वही सब बातें दुहराने लगा.

इस बार पंडित जी को खुद पर ही थोड़ा शक हुआ कि… कहीं उनसे ही कोई भूल तो नहीं हो रही है.

लेकिन, फिर भी पंडित जी… बछिया को लेकर आगे बढ़ गए.

आगे फिर उन्हें तीसरा उचक्का मिला और वो भी पंडित जी का ब्रेन वाश करने लगा.

इस तरह … पांचवे, छठे और सातवें उचक्के तक पहुंचते-पहुंचते पंडित जी को भी ये विश्वास हो गया कि…
जजमान ने उन्हें बछिया नहीं बल्कि बकरी ही दी है.

और, पंडित जी ने…. अपनी बछिया को बकरी समझ कर उसे छोड़ दिया और आगे बढ़ गए…!

👉 इस कहानी में समझने लायक बात यह कि… पंडित जी इसीलिए धोखा खा गए क्योंकि…

  • पंडित जी को बछिया और बकरी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी.
  • और, पंडित जी ने… खुद से ज्यादा उन उचक्कों पर विश्वास कर लिया… और, पंडित जी उनके षड्यंत्र को भांप नहीं पाए.

👉 👉 ऐसा ही कुछ हमारे हिनू समाज के साथ किया गया है.. जहाँ कुछ मुगल उचक्कों और उसके आगे के रास्ते पर में वामपंथी और खान्ग्रेसी उचक्कों ने….
पिस्लामी आक्रांता का बर्बरता और पाप छुपाने के लिए …. हमारे समाज में महिलाओं की बुरी स्थिति बताई….
और, उसे हिन्दू सनातन धर्म की कुरीति घोषित कर दिया.

बाल विवाह, सतीप्रथा आदि को जोरशोर से हिनू सनातन धर्म की कुरीति बताया गया…
और, इस माध्यम से हिनुओं को मानसिक रूप से डिप्रेस किया गया.

लेकिन… उन्होंने कभी ये कभी ये नहीं बताया कि…

सतीप्रथा … मुसरिम आक्रांताओं के कुत्सित दृष्टि से बचने का एक सुरक्षा माध्यम था… क्योंकि, मुगलों ने ये नियम बना दिया था कि जिस भी सुंदर स्त्री का पति नहीं होगा वो बादशाह की मानी जायेगी.

साथ ही… बालविवाह भी मुसरिम आक्रांता से बचने के लिए ही अपनाया गया गया एक सुरक्षा माध्यम था….
ताकि, कुंवारी लड़की देखकर मुसरिम उसे उठा ना ले जाएं….!

लेकिन… बालविवाह और सतीप्रथा को हिनू सनातन धर्म की कुरीति बताने वाले ये भूल गए कि…

हमारे वेद… नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय और उच्च स्थान प्रदान करते है..!

स्त्रियों की शिक्षा दीक्षा, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का वर्णन वेदों में पाया जाता है..!

और, वेदों में जो अधिकार नारी के लिए बताए गए है.. ये सब संसार के किसी भी दूसरे धर्मग्रंथों में नही मिलता. (वेद की ऋचाएं संलग्न है)

हमारे वेद तो स्त्री को… घर की साम्राज्ञी से लेकर देश की शासक और पृथ्वी की साम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते है.

सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि…. वेदों में स्त्री को यज्ञ समान पूजनीय बताया गया है और वैदिक काल में नारी अध्ययन अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र तक में जाया करती थी.

माँ दुर्गा, काली से लेकर माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी स्त्री ही तो हैं.

इसके अलावा… हमारे यहाँ स्वयंवर का भी प्रचलन था…जिसमें लड़कियां खुद अपना वर चुनती थी.

स्वयंवर अपनेआप में बालविवाह के कहानी की धज्जियाँ उड़ाने के लिए काफी है…
क्योंकि, जाहिर सी बात है कि… स्वयंवर में लड़कियाँ जब अपना वर चुनती होंगी तो वे इतनी परिपक्व तो होती ही होगी कि… जो सही और गलत में भेद कर सके.

लेकिन…. इसके उलट… आपके किसी भी मुगल , वामपंथी, खान्ग्रेसी अथवा कोर्स के किताब ने कभी भी…. तीन तलाक, हलाला और पॉलीगेमी (बहुपत्नी) को कुरीति के तौर पर नहीं बताया.

किसी कोर्स के किताब ने भी नहीं बताया कि… पिस्लाम में विवाह नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट होते हैं… जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है.

बहुत से मित्र तो आजतक ये नहीं जानते हैं कि…. पिस्लामी शरीयत कानून के हिसाब से किसी भी घटना की गवाही के तौर पर पिस्लामी ख़्वातूनों की गवाही.. पुरुषों से आधी ही मानी जाती है.

लेकिन…. इन सबको कभी भी कुरीति नहीं बताया गया…

बल्कि, कुरीति बताया गया… मुसरिम आक्रांताओं से बच सकने वाले सुरक्षात्मक उपायों को.

और… हममें से अधिकांश लोगों ने वामपंथियों और खांग्रेसियों की इस बात को स्वीकार भी कर लिया… क्योंकि… जिस तरह कहानी में पंडित जी बछिया और बकरी के बारे में जानकारी नहीं थी…

उसी तरह … हमारे पास हमारे धर्मग्रंथों और संदर्भों की जानकारी नहीं है.

यही कारण है कि… कभी स्त्रियों के मामले में डिफेंसिव किया जाता है तो कभी… हमारे त्योहारों और पूजा पाठ को पाखंड बताया जाता है.

और… दूसरों को जाने ही दें…
हमारे अपने ही लोग… श्री राम कथा और भागवत कथा के नाम … फिल्मी गीत और हली-मौला गाते फिरते हैं.

जय महाकाल…!!!

नोट : आप इस पूरे लेख से आसानी से समझ सकते हैं कि उनलोगों ने हमारे दलित भाइयों को किस तरह भरमाया होगा.

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मोहनलाल जैन

जब औरंगजेब ने मथुरा का श्रीनाथ मंदिर तोड़ा तो मेवाड़ के नरेश राज सिंह 100 मस्जिद तुड़वा दिये थे।
अपने पुत्र भीम सिंह को गुजरात भेजा, कहा ‘सब मस्जिद तोड़ दो तो भीम सिंह ने 300 मस्जिद तोड़ दी थी’।

वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था और महाराज अजीत सिंह को राजा बनाकर ही दम लिया।

कहा जाता है कि दुर्गादास राठौड़ का भोजन, जल और शयन सब अश्व के पार्श्व पर ही होता था। वहाँ के लोकगीतों में ये गाया जाता है कि यदि दुर्गादास न होते तो राजस्थान में सुन्नत हो जाती।

वीर दुर्गादास राठौड़ भी शिवाजी के जैसे ही छापामार युद्ध की कला में विशेषज्ञ थे।

मध्यकाल का दुर्भाग्य बस इतना है कि हिन्दू संगठित होकर एक संघ के अंतर्गत नहीं लड़े, अपितु भिन्न भिन्न स्थानों पर स्थानीय रूप से प्रतिरोध करते रहे।

औरंगजेब के समय दक्षिण में शिवाजी, राजस्थान में दुर्गादास, पश्चिम में सिख गुरु गोविंद सिंह और पूर्व में लचित बुरफुकन, बुंदेलखंड में राजा छत्रसाल आदि ने भरपूर प्रतिरोध किया और इनके प्रतिरोध का ही परिणाम था कि औरंगजेब के मरते ही मुगलवंश का पतन हो गया।

इतिहास साक्षी रहा है कि जब जब आततायी अत्यधिक बर्बर हुए हैं, हिन्दू अधिक संगठित होकर प्रतिरोध किया है। हिन्दू स्वतंत्र चेतना के लिए ही बना है। हिंदुओं का धर्मांतरण सूफियों ने अधिक किया है। तलवार का प्रतिरोध तो उसने सदैव किया है, बस सूफियों और मिशनरियों से हार जाता है।
बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।
कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है….
मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा….!

अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ….इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।

जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।
अब जरा विचार करें….. क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्षों तक राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?
अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्षों तक टिका रहा। हम्पी नगर में हीरे माणिक्य की मण्डियां लगती थीं। महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने, 5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 9 नन्दों ने 100 वर्षों तक , 12 मौर्यों ने 316 वर्षों तक , 10 शुंगों ने 300 वर्षों तक , 4 कण्वों ने 85 वर्षों तक , 33 आंध्रों ने 506 वर्षों तक , 7 गुप्तों ने 245 वर्षों तक राज्य किया । और पाकिस्तान के सिंध, पंजाब से लेके अफ़ग़ानिस्तान के पर समरकन्द तक राज करने वाले रघुवंशी लोहाणा(लोहर-राणा) जिन्होने देश के सारे उत्तर-पश्चिम भारत वर्ष पर राज किया और सब से ज्यादा खून देकर इस देश को आक्रांताओ से बचाया, सिकंदर से युद्ध करने से लेकर मुहम्मद गजनी के बाप सुबुकटिगिन को इनके खुद के दरबार मे मारकर इनका सर लेके मूलतान मे लाके टाँगने वाले जसराज को भुला दिया। कश्मीर मे करकोटक वंश के ललितादित्य मुक्तपीड ने आरबों को वो धूल चटाई की सदियो तक कश्मीर की तरफ आँख नहीं उठा सके। और कश्मीर की सबसे ताकतवर रानी दिद्दा लोहराणा(लोहर क्षत्रिय) ने सब से मजबूत तरीके से राज किया। और सारे दुश्मनों को मार दिया। तारीखे हिंदवा सिंध और चचनामा पहला आरब मुस्लिम आक्रमण जिन मे कराची के पास देब्बल मे 700 बौद्ध साध्विओ का बलात्कार नहीं पढ़ाया जाता। और इन आरबों को मारते हुए इराक तक भेजने वाले बाप्पा रावल, नागभट प्रथम, पुलकेसीन जैसे वीर योद्धाओ के बारेमे नहीं पढ़ाया जाता।
फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।

उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।
वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का …….. भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों…!
तुम्हे धिक्कार है !!!

यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।

एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हिन्दू योद्धाओं को इतिहास से बाहर कर सिर्फ मुगलों को महान बतलाने वाला नकली इतिहास पढ़ाया जाता है। महाराणा प्रताप के स्थान पर अत्याचारी व अय्याश अकबर को महान होना लिख दिया है।
ये इतिहास को ऐसा प्रस्तुत करने का जिम्मेवार सिर्फ एक व्यक्ति है वो है
मौलाना आजाद, भारत का पहला केंद्रीय शिक्षा मंत्री ।
अब यदि इतिहास में उस समय के वास्तविक हिन्दू योद्धाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है तो विपक्ष शिक्षा के भगवा करण करने का आरोप लगाता है !

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हँस जैन रामनगर खँडवा
98272 14427

दुर्गुणों को बाहर करो
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एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी | वहीं थोड़ी दूरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था| जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी, तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें ,अतः सभी संत के पास पहुंचे |जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो पूछा कि कैसे आना हुआ ?
तो लोगों ने कहा ‘महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है । मन भी नहीं होता पानी पीने को।
संत ने पूछा –हुआ क्या ?पानी क्यों नहीं पी रहे हो ?
लोग बोले–तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे । बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में । अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ?संत ने कहा — ‘एक काम करो ,उसमें गंगाजल डलवाओ,तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया,फिर भी समस्या जस की तस
लोग फिर से संत के पास पहुंचे,अब संत ने कहा”भगवान की पूजा कराओ”।
लोगों ने कहा ••••ठीक है
भगवान की पूजा कराई ,फिर भी समस्या जस की तस ।लोग फिर संत के पास पहुंचे !
अब संत ने कहा उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ।
लोगों ने फिर कहा ••••• हाँ, अवश्य
सुगंधित द्रव्य डाला गया । नतीजा फिर वही…ढाक के तीन पात।लोग फिर संत के पास गए …अब संत खुद चलकर आये
लोगों ने कहा– महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, पूजा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं; लेकिन महाराज !हालत वहीं की वहीं
अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका कार्य ठीक क्यों नहीं हुआ ?
तो संत ने पूछा– कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं ?
लोग बोले — उनके लिए न आपने कहा था, न हमने निकाला, बाकी सब किया । वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं ।
संत बोले — जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा ।
सही बात यह है कि हमारे आपके जीवन की भी यही कहानी है ,
इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं । इन्हीं की सारी बदबू है ।
हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं– तीर्थ यात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ ।
सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है
कथा सार :
पहले हम सभी अपने भीतर के दुर्गुणों को निकाल कर बाहर करें तभी हमारा जीवन उपयोगी होगा ।

हँस जैन रामनगर खँडवा
98272 14427 🙏🏽🙏🏾🙏🙏🏿

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👇Read this very interesting☺

One day a florist went to a barber for a haircut.
After the cut, he asked about his bill, and the barber replied, ‘I cannot accept money from you, I’m doing community service this week.

The florist was pleased and left the shop.

When the barber went to open his shop the next morning, there was a ‘Thank You’ card and a dozen roses waiting for him at his door.

Later, a grocer comes in for a haircut, and when he tried to pay his bill, the barber again replied, ‘I cannot accept money from you , I’m doing community service this week.

The grocer was happy and left the shop.

The next morning when the barber went to open up, there was a ‘Thank You’ card and a bag of fresh vegetables waiting for him at his door.

Then a politician came in for a haircut, and when he went to pay his bill, the barber again replied, ‘I cannot accept money from you. I’m doing community service this week.

The politician was very happy and left the shop.

The next morning, when the barber went to open up,
there were a dozen politicians lined up waiting for a free haircut.

And that, my friends, illustrates the fundamental difference between the citizens of our country and the politicians who run it.

If you don’t forward this, someone will miss a good laugh.

😃😃😂😝😜

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चंदामामा


जिसे पढ़-पढ़कर हम बड़े हुए हैं उस चंदामामा पत्रिका के बुरे दिन आ गए

अनिरुद्धlallantopaniruddha@gmail.com 

जिसे पढ़-पढ़कर हम बड़े हुए हैं उस चंदामामा पत्रिका के बुरे दिन आ गए

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि बाल मैगजीन चंदामामा के बौद्धिक संपदा अधिकार बेच दिए जाएं. (तस्वीर साभार- फेसबुक.)

बचपन. कंचे, गिल्ली-डंडा, खो-खो, कबड्डी और साइकिल रेस वाला बचपन. पूरे मोहल्ले में हो-हल्ला और धमाचौकड़ी. साइकिल के टायर को लकड़ी से चलाना. अपनी पसंद की कॉमिक्स में खो जाना. नंदन, पराग और चंपक जैसी मैगजीन तमाम घरों की शान थीं. कुछ बच्चे लोटपोट और इंद्रजाल कॉमिक्स लेते थे. हर बच्चा उछल-कूद के बीच छुट्टी के दिनों में इन कॉमिक्स और किस्से कहानियों की दुनिया में डूबा रहता था. ऐसी ही एक और बाल पत्रिका थी चंदामामा. 90 के दशक में इसके सुपरहीरो विक्रम-बेताल की कहानियों का तो बच्चों में जबरदस्त क्रेज था. चंदामामा का बच्चों को हर वक्त इंतजार रहता था. इसमें लोककथाओं, पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित कहानियां आती थीं. मगर अब ये पत्रिका इतिहास बनती दिख रही है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मैगजीन के बौद्धिक संपदा अधिकार बेचने का आदेश दिया है. क्या है ये पूरा मामला आइए समझते हैं.

कब से छप रही थी मैगजीन?

चंदामामा का पहला अंक जुलाई, 1947 में तेलुगू और तमिल में प्रकाशित हुआ था. (तस्वीर साभार- फेसबुक.)
चंदामामा का पहला अंक जुलाई, 1947 में तेलुगू और तमिल में आया था. (तस्वीर साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)

आजादी के वक्त यानी साल 1947 में इस मैगजीन का प्रकाशन शुरू हुआ था. इस पत्रिका की स्थापना दक्षिण भारत के फैमस फिल्म प्रोड्यूसर बी नागी रेड्डी ने की थी. रेड्डी ने अपने करीबी दोस्त चक्रपाणि को इसका संपादन सौंपा. चंदामामा का पहला अंक जुलाई, 1947 में तेलुगू और तमिल में प्रकाशित हुआ. 1975 में इसके संपादक नागीरेड्डी के बेटे बी विश्वनाथ बनाए गए. उन्होंने कई साल तक इस पत्रिका का संपादन और प्रकाशन किया. साल 1990 तक ये पत्रिका हिंदी, इंग्लिश, मराठी, तमिल, तेलुगू, सिंधी, सिंहली और संस्कृत जैसी 13 भाषाओं में आने लगी. लेकिन कुछ वक्त के बाद इस पत्रिका के बुरे दिन भी शुरू हो गए. साल 2006 आते-आते पत्रिका की आर्थिक हालत बिगड़ गई. इसका सर्कुलेशन गिरने लगा. और विज्ञापन आने कम हो गए. विज्ञापन किसी भी पत्रिका की जान होते हैं. चंदामामा इसमें पिछड़ रही थी.

इसके बाद क्या हुआ?

चंदामामा पत्रिका को फिर से चलाने की सारी कोशिशें बेकार गईं. (फोटो साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)
चंदामामा पत्रिका को फिर से चलाने की सारी कोशिशें बेकार गईं. (फोटो साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)

मार्च 2007 में मुंबई की एक सॉफ्टवेयर कंपनी जियोडेसिक लिमिटेड ने इस मैगजीन को करीब 10 करोड़ रुपए में खरीद लिया. चंदामामा के संस्थापक नागीरेड्डी के बेटे विश्वनाथ और मॉर्गन स्टेनली इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट के एमडी विनोद सेठी ने 94 फीसदी हिस्सा जियोडेसिक को बेच दिया. इसके बाद जियोडेसिक ने भी इस पत्रिका को नए सिरे से चलाने की कोशिश की. जियोडेसिक लिमिडेट ने चंदामामा का नवीनीकरण और डिजिटलाइजेशन कराया. इस काम में अमेरिका की कारनेगी-मेलोन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राज रेड्डी और उनकी टीम की मदद ली. इसके बाद जुलाई 2008 से जियोडेसिक ने अपनी वेबसाइट पर हिंदी, तमिल और तेलुगू में छपे मैजगीन के पुराने अंक मुहैया कराने शुरू कर दिए. साथ ही मैगजीन को आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर जीवी श्रीकुमार से रिडिजाइन करवाकर रीलांच किया. साल 2008 में अमिताभ बच्चन ने मुंबई में पत्रिका की 60वीं वर्षगांठ पर चंदामामा का नया संस्करण लॉन्च किया. मगर ये सारे दांव बेकार गए. मैगजीन नहीं चली तो नहीं चली.

नया मैनेजमेंट मुसीबत में आ गया
साल, 2014 में जियोडेसिक लिमिटेड का नया मैनेजमेंट एक नई मुसीबत में फंस गया. अप्रैल 2014 में कंपनी अपने 15 एफसीसीबी यानी फॉरेन करेंसी कनवर्टिबल बॉन्ड्स का भुगतान नहीं कर पाया. फॉरेन करेंसी कनवर्टिबल बॉन्ड्स एक खास तरह के बॉन्ड होते हैं, जिनको जारी करके देशी कंपनियां विदेशों से पैसा इकट्ठा करती है. जियोडेसिक लिमिटेड विदेशी निवेशकों का करीब 1000 करोड़ रुपया नहीं चुका पाई. इस पर निवेशकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में केस कर दिया. हाईकोर्ट ने जून 2014 में जियोडेसिक लिमिटेड की संपत्तियों को कब्जे में लेने का आदेश दे दिया. साथ ही कंपनी को लिक्विडेटर यानी कर्ज निपटान अधिकारी के सुपुर्द कर दिया. उसी वक्त से चंदामामा की 10 हजार स्क्वायर फुट की प्रॉपर्टी बंद पड़ी है. और जियोडेसिक लिमिटेड और उसके वरिष्ठ अधिकारी मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग की निगरानी में हैं. बाद में जियोडेसिक पर 812 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप भी लगे. अवैध कमाई को वैध करना मनी लॉन्ड्रिंग कहलाता है. इस आरोप के बाद जियोडेसिक के तीन डायरेक्टर किरन प्रकाश कुलकर्णी, प्रशांत मुलेकर, पंकज श्रीवास्तव और फर्म के सीए दिनेश जाजोडिया को गिरफ्तार कर लिया गया था.

क्या होता है बौद्धिक संपदा अधिकार?

विक्रम बेताल जैसे चंदामामा के पात्र अब शायद इतिहास हो सकते हैं. (तस्वीर साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)
विक्रम बेताल जैसे चंदामामा के पात्र अब शायद इतिहास हो सकते हैं. (तस्वीर साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 11, जनवरी, 2018 को एक नया आदेश जारी किया है. इसमें कहा गया है कि चंदामामा के इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स यानी बौद्धिक संपदा अधिकार बेच दिए जाएं. किसी शख्स या फिर संस्था का अपने प्रोडक्ट पर एक हक होता है. इसे ही बौद्धिक संपदा अधिकार कहा जाता है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एस जे कठावाला ने इसी बौद्धिक संपदा अधिकार और बाकी प्रॉपर्टी को बेचने का आदेश दिया है. उन्होंने कहा है कि जियोडेसिक के सभी निदेशक इस बारे में फौरन अपनी सहमित दें. इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट यानी ईडी इनको अपने कब्जे में लेकर बेचे. ईडी कंपनी के डायरेक्टर्स की कोई 16 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी पहले ही अटैच कर चुका है. चंदामामा के अलावा जियोडेसिक के पास करीब 25 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी है. इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी के नाम पर जियोडेसिक के पास चंदामामा की कहानियां आदि ही हैं. एक अनुमान के मुताबिक कंपनी के पास चंदामामा की हस्तलिखित और डिजिटल फॉर्मेट में करीब 6,000 कहानियां हैं. इसके अलावा 36 फिक्शनल कैरेक्टर हैं. विक्रम-बेताल सीरियल के 640 एपिसोड हैं. इनका पेटेंट और मैगजीन का कॉपीराइट अधिकार जियोडेसिक के पास है.

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ચંદામામા चन्दामामा


આજે આપણી પાસે મનોરંજન માટે અગણિત સંસાધનો ઉપલબ્ધ છે, પરંતુ જૂના દિવસો દરમિયાન પરિસ્થિતિ જુદી હતી. બાળકો પાસે મનોરંજનના ફક્ત મર્યાદિત માધ્યમો હતા, તેમાંથી કોમિક્સ સૌથી લોકપ્રિય માધ્યમ હતું, જે બાળકો અને યુવાનોમાં એકદમ લોકપ્રિય હતું અને વૈશ્વિક સ્તરે વ્યાપકપણે પ્રેક્ટિસ કરવામાં આવ્યું હતું. ભારતમાં વિવિધ ભાષાઓમાં કકોમિક્સ જેમ વિવિધ સામયિકો પ્રકાશિત થયા હતા. જેમાંથી કેટલાક એકદમ પ્રખ્યાત થયા. ચાંદમામા પણ તેમાંનું એક હતું.

જુલાઇ 1947 માં ચંદમામા પ્રથમ તેલુગુ (ચંદમામા તરીકે) અને તમિલ (અંબુલીમા તરીકે) માં પ્રકાશિત થયા હતા. તેલુગુ ફિલ્મ નિર્માતા બી.વી. તે નાગી રેડ્ડી અને ચક્રપાણી દ્વારા કરવામાં આવ્યું હતું અને ચક્રપાણીના નજીકના મિત્ર અને તેલુગુ સાહિત્યના મહાન વિદ્વાન કોડાવતીગંતી કુટુંબરાવ દ્વારા સંપાદિત કરવામાં આવ્યું હતું. તેમણે તેમના મૃત્યુ પહેલા 28 વર્ષ સુધી સામયિકનું સંપાદન કર્યું. તે સચિત્ર સામયિક હતું, મુખ્યત્વે બાળકો અને યુવાનો પર ધ્યાન કેન્દ્રિત કરતું. આ માસિક સામયિક તેના ઉત્તમ ઉદાહરણોને લીધે કોઈ પણ સમયમાં સમગ્ર ભારતમાં પ્રચંડ લોકપ્રિયતા હાંસલ કરી હતી. ચાંદમામા ખાસ કરીને પૌરાણિક / જાદુઈ વાર્તાઓ ધરાવતા હતા, જે ઘણા વર્ષોથી ચાલે છે. તેમણે તેમના સામયિક દ્વારા દાદા દાદીની વાર્તાઓને નવો દેખાવ આપવાની પરંપરાને પુનર્જીવિત કરી. સંસ્કૃત સાહિત્ય ‘બેતાલ પચીસી’ માંથી લેવામાં આવેલી વિક્રમ બેટલની વાર્તાઓએ તેમને વિશેષ ખ્યાતિ પ્રાપ્ત કરી.

કુટુંબ રાજે આ જર્નલોમાં ભારતીય પૌરાણિક કથાઓની બધી સુવિધાઓ લખી હતી, સાથે સાથે યુવા લેખકોને પ્રોત્સાહન આપ્યું હતું. આ સામયિકની કેટલીક વાર્તાઓ દસરી સુબ્રહ્મણ્યમ દ્વારા લખી હતી, જેમણે લોકપ્રિય ‘પાટલ દુર્ગમ’ જેવી સિરિયલો બનાવી હતી. મેગેઝિનમાં 2008 માં કેટલાક નોંધપાત્ર ફેરફારો થયા, હવે તે પૌરાણિક કથાઓ તેમજ સમકાલીન વાર્તાઓ, સાહસિક સિરીયલો, રમતગમત, તકનીકી, સમાચાર પૃષ્ઠો વગેરેને ઉમેરી રહ્યા છે. સૌથી પ્રાચીન સામયિકોમાંના એક હોવાને કારણે, સંવેદનશીલ અને શૈક્ષણિક સાહિત્ય સાથે વ્યવહાર કરવાની સાથે યુવાનોને મનોરંજન કરાવવાની જવાબદારી પણ તેની છે. બાળસાહિત્ય અને શૈક્ષણિક અધ્યયનના વધતા વલણો અને તેના વિશ્લેષણને ધ્યાનમાં રાખીને, ચંદમામાએ તેમની સંપાદકીય નીતિઓને સમયની સાથે રાખવાની કોશિશ પણ કરી.

આ સામયિક અંગ્રેજી સહિત 12 ભારતીય ભાષાઓમાં સંપાદિત કરવામાં આવી હતી અને તેમાં લગભગ 2,00,000 વાચકો હતા. 2007 માં, ચંદમામાને મુંબઇ સ્થિત સોફ્ટવેર સર્વિસ પ્રોવાઇડર જિઓડેસિક દ્વારા ખરીદ્યો હતો. તેમણે તત્કાલીન 60 વર્ષ જૂનું સામયિક ડિજિટાઇઝ કરવાની યોજના બનાવી. જુલાઈ, 2008 માં, પ્રકાશન દ્વારા તેલુગુ, અંગ્રેજી, હિન્દી અને તમિલમાં તેનું portalનલાઇન પોર્ટલ શરૂ થયું.

લગભગ છ દાયકાની સુંદર મુસાફરી પછી, માર્ચ 2013 થી, ચંદમામાએ ગ્રાહકોને કોઈ પણ પ્રકારની સૂચના આપ્યા વિના અને ગ્રાહકોને પરત આપ્યા વિના તમામ ભાષાઓમાં પ્રકાશિત કરવાનું બંધ કર્યું. જુલાઈ, 2016 માં, મેગેઝિનની મૂળ વેબસાઇટને ચાંદમામા કંપની દ્વારા બંધ કરવાની મંજૂરી આપવામાં આવી હતી અને તે દૂર કરવામાં આવી હતી. નાણાકીય કટોકટી કંપનીના બંધ થવાના મુખ્ય કારણ તરીકે દર્શાવવામાં આવી હતી. ઇન્ડિયન એક્સપ્રેસના એક અહેવાલ મુજબ, જૂન 2014 માં, બોમ્બે હાઈકોર્ટના સત્તાવાર લિક્વિડેટરએ કંપનીની સંપત્તિનો કબજો લીધો હતો, કારણ કે એપ્રિલે 2014 માં કંપનીએ તેના વિદેશી ચલણ કન્વર્ટિબલ બોન્ડ્સ (એફસીસીબી) ધારકોને 2 162 મિલિયન (લગભગ આશરે) માં વેચી દીધા હતા. 1000 કરોડ). આની વસૂલી હજી ચાલુ છે.

હવે તેની websiteફિશિયલ વેબસાઇટએ તેના મૂળ સંસ્કરણ ઑનલાઇન અપલોડ કરવાનું શરૂ કર્યું છે, જે બધા મફત ડાઉનલોડ માટે ઉપલબ્ધ છે. તમે નીચેની લિંક (https:// Chandamama.in/) ની મુલાકાત લઈને વિવિધ ભાષાઓમાં ચાંદમામાનું ડિજિટલ સંસ્કરણ વાંચી શકો છો. વેબસાઇટ પર 1947 થી 2006 સુધીની વાર્તાઓ ઉપલબ્ધ છે.

૬૦૦ જેટલા માસિક ની પીડીએફ કોપી તદન ફ્રી છે. રોજની એક માસિક વાંચસો તો પણ બે વરસે ખૂટસે. ૧૦,૦૦૦ જેટલી બાળકોની વાર્તાઓ.. અને બીજું ગણું બધુ.

બાળકોનું અગ્રેજી નું ભણતર એ આપણાં સાહિત્ય નું ખૂન છે. આવનારી પેઢી ન તો ડાયરો સમજી સકસે ન સોરઠી ભાષા નું ઊંડાણ.

સંદર્ભ

1.https://en.wikipedia.org/wiki/Chandamama
2.https://yourstory.com/2017/12/chandamama-goes-digital
3.https://bit.ly/2wIYclT
4.https://chandamama.in/hindi/
5.https://bit.ly/2RuFYkR