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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मनकेविकार💐💐

एक दिन मैंने एक संत से पूछा महराज ये मन में विकार क्यों आ जाते हैं?

न चाहते हुए भी, तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि तुम्हारी दाढ़ी मूंछ तुम्हारे चाहने से आती है या बिना बुलाये।

मैंने कहा बाबा ये तो प्रकृति के कारण आ जाती है।

चाहो या न चाहो, दाढ़ी मूंछ तो आ ही जाती है और फिर हम उसे हर दूसरे दिन रेजर से साफ कर लेते हैं।

बाबा ने कहा बस, तुम चाहो या न चाहो, विकार तो आएंगे ही क्योंकि प्रकृति गुण और अवगुणों से मिलकर बनी है इन विकारों को आने से कोई नहीं रोक सकता बस एक काम करो।

जिस तरह दाढ़ी को बनाने के लिए उस्तरा तैयार रखते हो उसी तरह इन विकारों को साफ करने के लिए सत्संग का उस्तरा तैयार रखो जैसे ही विकार आये सत्संग के उस्तरे से साफ करते चलो, क्योंकि विकारों को मिटाया नहीं जा सकता, बस साफ किया जा सकता है इसलिए सत्संग की विशेष महिमा है।

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मदद 💐💐

उस दिन सबेरे आठ बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला । मैं रेलवे स्टेशन पँहुचा , पर देरी से पँहुचने के कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी । मेरे पास दोपहर की ट्रेन के अलावा कोई चारा नही था । मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए ।
बहुत जोर की भूख लगी थी । मैं होटल की ओर जा रहा था । अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी । दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे .।बच्चों की हालत बहुत खराब थी ।
कमजोरी के कारण अस्थि पिंजर साफ दिखाई दे रहे थे ।वे भूखे लग रहे थे । छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था और बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था । मैं अचानक रुक गया ।दौड़ती भागती जिंदगी में पैर ठहर से गये ।
जीवन को देख मेरा मन भर आया । सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाएँ । मैं उन्हें दस रु. देकर आगे बढ़ गया तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हूँ मैं ! दस रु. का क्या मिलेगा ? चाय तक ढंग से न मिलेगी ! स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा । मैंने बच्चों से कहा – कुछ खाओगे ?
बच्चे थोड़े असमंजस में पड़ गए ! जी । मैंने कहा बेटा ! मैं नाश्ता करने जा रहा हूँ , तुम भी कर लो ! वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए । मेरे पीछे पीछे वे होटल में आ गए । उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डांट दिया और भगाने लगा ।
मैंने कहा भाई साहब ! उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो , पैसे मैं दूँगा ।होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा..! उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी ।
बच्चों ने नाश्ता मिठाई व लस्सी माँगी । सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया । बच्चे जब खाने लगे , उनके चेहरे की ख़ुशी कुछ निराली ही थी । मैंने भी एक अजीब आत्म संतोष महसूस किया । मैंने बच्चों को कहा बेटा ! अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए हैं उसमें एक रु. का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना ।
और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना ।मैं नाश्ते के पैसे चुका कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला ।
वहाँ आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे । होटल वाले के शब्द आदर में परिवर्तित हो चुके थे । मैं स्टेशन की ओर निकला , थोडा मन भारी लग रहा था । मन थोडा उनके बारे में सोच कर दु:खी हो रहा था ।
रास्ते में मंदिर आया । मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा – हे भगवान ! आप कहाँ हो ? इन बच्चों की ये हालत ! ये भूख आप कैसे चुप बैठ सकते हैं !
दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया , अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था ? क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया ? मैं स्तब्ध हो गया ! मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए ।
ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो ! मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र हैं । उसके कार्य कलाप वो ही जानता है , इसीलिए वो महान है !
भगवान हमें किसी की मदद करने तब ही भेजता है , जब वह हमें उस काम के लायक समझता है ।यह उसी की प्रेरणा होती है । किसी मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना ।
खुद में ईश्वर को देखना ध्यान है ! दूसरों में ईश्वर को देखना प्रेम है ! ईश्वर को सब में और सब में ईश्वर को देखना ज्ञान है….!!

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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हंस और उल्लू

ये कहानी आपको झकझोर देगी 2 मिनट में एक अच्छी सीख अवश्य पढ़ें….

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!

हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ??

यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !

भटकते-भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।

वह जोर से चिल्लाने लगा।

हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।

ये उल्लू चिल्ला रहा है।

हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??

ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।

पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।

सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।

हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा

पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।

हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??

अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!

उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये।

कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी।

पंचलोग भी आ गये!

बोले- भाई किस बात का विवाद है ??

लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!

लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।

हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है।

इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जाँच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया।

उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!

रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई – ऐ मित्र हंस, रुको!

हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ??

पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?

उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!

लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है!

मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।

यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!

शायद इतने साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने योग्यता व गुण आदि न देखते हुए , हमेशा , ये हमारी बिरादरी का है, ये हमारे एरिया का है, के आधार पर अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!

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🍒 🍊🍐🍋🥭🍌 🍍🍇🍓 भगवान् बड़े ही दयालु हैं
एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था।उसमें तरह-तरह के फल लगते थे।
उस बगीचे की सारी देख-रेख एक किसान‌‌ अपने परिवार के साथ करता था और वो किसान हर दिन बगीचे के ताजे फल लेकर राजा‌ के राजमहल में जाता था। 🍇🍓
एक दिन किसान ने पेड़ों पर देखा कि नारियल, अनार, अमरूद और अंगूर आदि पक कर‌‌ तैयार हो रहे हैं फिर वो किसान सोचने लगा- कि आज कौन सा फल‌ राजा को अर्पित करूं?
उसे लगा कि आज राजा को अंगूर अर्पित करने चाहिए,क्योंकि वो बिल्कुल पक कर तैयार हैं।फिर उसने अंगूरों की टोकरी भर ली और राजा को देने चल पड़ा।
किसान जब राजमहल में पहुंचा, तो राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था और थोड़ी सा नाराज भी लग रहा था।
किसान ने रोज की तरह मीठे रसीले अंगूरों की टोकरी राजा के सामने रख दी,और थोड़ी दूरी पर बैठ गया। अब राजा उसी ख्यालों में टोकरी में से अंगूर उठाता,एक खाता और एक खींचकर किसान के माथे पर निशाना साधकर फेंक देता।राजा का अंगूर 🍇🍇जब भी किसान के माथे या शरीर पर लगता था, तो किसान कहता- भगवान बड़े ही दयालु हैं।
राजा फिर और जोर से अंगूर फेंकता था,और किसान फिर वही कहता- भगवान बड़े ही दयालु हैं।थोड़ी देर बाद जब राजा को🍑🍎 एहसास हुआ,कि वो क्या कर रहा है और प्रत्युत्तर क्या आ रहा है,तो वो संभलकर बैठ गया और फिर किसान से कहा- मैं तुम्हें बार-बार अंगूर मार रहा हूं और ये अंगूर तुम्हें लग भी रहे हैं, पर फिर भी तुम बार-बार यही क्यों कह रहे हो- भगवान बड़े ही दयालु हैं।
किसान बड़ी ही नम्रता से बोला- राजा जी बाग में आज नारियल,🥥🍐🍇🍉 अनार, अमरुद और अंगूर आदि फल तैयार थे पर मुझे भान हुआ कि क्यों न मैं आज आपके लिए अंगूर ले चलूं।अब लाने को तो मैं नारियल, अनार और अमरुद भी ला सकता था,पर मैं अंगूर लाया। यदि अंगूर की जगह नारियल,🥥 अनार या अमरुद🍐 रखे होते,तो आज मेरा हाल क्या होता?
इसीलिए मैं कह रहा था- भगवान बड़े ही दयालु हैं।
तात्पर्य—–
इसी प्रकार भगवान भी हमारी कई मुसीबतों को बहुत ही हल्का करके हमें उबार लेते हैं।पर ये तो हम ही नाशुकरे हैं जो शुक्र न करते हुए, उल्टा उन्हें ही गुनहगार ठहरा देते हैं।
मेरे साथ ही ऐसा क्यूं हुआ ? मेरा क्या कसूर था ?
भगवान का तो हर पल धन्यवाद करते रहना चाहिए हैं👏

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐मन का भूत💐💐

एक आदमी ने एक भूत पकड़ लिया और उसे बेचने शहर गया , संयोगवश उसकी मुलाकात एक सेठ से हुई, सेठ ने उससे पूछा – भाई यह क्या है,
उसने जवाब दिया कि यह एक भूत है। इसमें अपार बल है कितना भी कठिन कार्य क्यों न हो यह एक पल में निपटा देता है। यह कई वर्षों का काम मिनटों में कर सकता है
सेठ भूत की प्रशंसा सुन कर ललचा गया और उसकी कीमत पूछी…….,
उस आदमी ने कहा कीमत बस पाँच सौ रुपए है ,
कीमत सुन कर सेठ ने हैरानी से पूछा- बस पाँच सौ रुपए…….
उस आदमी ने कहा – सेठ जी जहाँ इसके असंख्य गुण हैं वहाँ एक दोष भी है।अगर इसे काम न मिले तो मालिक को खाने दौड़ता है।
सेठ ने विचार किया कि मेरे तो सैकड़ों व्यवसाय हैं, विलायत तक कारोबार है यह भूत मर जायेगा पर काम खत्म न होगा ,
यह सोच कर उसने भूत खरीद लिया
मगर भूत तो भूत ही था , उसने अपना मुँह फैलाया और बोला – काम काम काम काम…
सेठ भी तैयार ही था, उसने भूत को तुरन्त दस काम बता दिये ,
पर भूत उसकी सोच से कहीं अधिक तेज था इधर मुँह से काम निकलता उधर पूरा होता , अब सेठ घबरा गया ,
संयोग से एक सन्त वहाँ आये,
सेठ ने विनयपूर्वक उन्हें भूत की पूरी कहानी बताई..
सन्त ने हँस कर कहा अब जरा भी चिन्ता मत करो एक काम करो उस भूत से कहो कि एक लम्बा बाँस ला कर आपके आँगन में गाड़ दे बस जब काम हो तो काम करवा लो और कोई काम न हो तो उसे कहें कि वह बाँस पर चढ़ा और उतरा करे तब आपके काम भी हो जायेंगे और आपको कोई परेशानी भी न रहेगी सेठ ने ऐसा ही किया और सुख से रहने लगा…..
यह मन ही वह भूत है। यह सदा कुछ न कुछ करता रहता है एक पल भी खाली बिठाना चाहो तो खाने को दौड़ता है।
श्वास ही बाँस है।
श्वास पर भजन- सिमरन का अभ्यास ही बाँस पर चढ़ना उतरना है।
आप भी ऐसा ही करें। जब आवश्यकता हो मन से काम ले लें जब काम न रहे तो श्वास में नाम जपने लगो तब आप भी सुख से रहने लगेंगे…

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💐💐मन का भूत💐💐

एक आदमी ने एक भूत पकड़ लिया और उसे बेचने शहर गया , संयोगवश उसकी मुलाकात एक सेठ से हुई, सेठ ने उससे पूछा – भाई यह क्या है,
उसने जवाब दिया कि यह एक भूत है। इसमें अपार बल है कितना भी कठिन कार्य क्यों न हो यह एक पल में निपटा देता है। यह कई वर्षों का काम मिनटों में कर सकता है
सेठ भूत की प्रशंसा सुन कर ललचा गया और उसकी कीमत पूछी…….,
उस आदमी ने कहा कीमत बस पाँच सौ रुपए है ,
कीमत सुन कर सेठ ने हैरानी से पूछा- बस पाँच सौ रुपए…….
उस आदमी ने कहा – सेठ जी जहाँ इसके असंख्य गुण हैं वहाँ एक दोष भी है।अगर इसे काम न मिले तो मालिक को खाने दौड़ता है।
सेठ ने विचार किया कि मेरे तो सैकड़ों व्यवसाय हैं, विलायत तक कारोबार है यह भूत मर जायेगा पर काम खत्म न होगा ,
यह सोच कर उसने भूत खरीद लिया
मगर भूत तो भूत ही था , उसने अपना मुँह फैलाया और बोला – काम काम काम काम…
सेठ भी तैयार ही था, उसने भूत को तुरन्त दस काम बता दिये ,
पर भूत उसकी सोच से कहीं अधिक तेज था इधर मुँह से काम निकलता उधर पूरा होता , अब सेठ घबरा गया ,
संयोग से एक सन्त वहाँ आये,
सेठ ने विनयपूर्वक उन्हें भूत की पूरी कहानी बताई..
सन्त ने हँस कर कहा अब जरा भी चिन्ता मत करो एक काम करो उस भूत से कहो कि एक लम्बा बाँस ला कर आपके आँगन में गाड़ दे बस जब काम हो तो काम करवा लो और कोई काम न हो तो उसे कहें कि वह बाँस पर चढ़ा और उतरा करे तब आपके काम भी हो जायेंगे और आपको कोई परेशानी भी न रहेगी सेठ ने ऐसा ही किया और सुख से रहने लगा…..
यह मन ही वह भूत है। यह सदा कुछ न कुछ करता रहता है एक पल भी खाली बिठाना चाहो तो खाने को दौड़ता है।
श्वास ही बाँस है।
श्वास पर भजन- सिमरन का अभ्यास ही बाँस पर चढ़ना उतरना है।
आप भी ऐसा ही करें। जब आवश्यकता हो मन से काम ले लें जब काम न रहे तो श्वास में नाम जपने लगो तब आप भी सुख से रहने लगेंगे…

💐💐प्रेषक अभिजीत चौधरी💐💐

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐चोर और कान्हा💐💐

एक बार एक पंडित जी थे, वो रोज घर घर जा के भगवत गीता का पाठ करते तथा कान्हा की कथा सुनाते थे |

एक दिन उन्हे एक चोर ने पकड़ लिया और उसे कहा तेरे पास जो कुछ भी है मुझे दे दो ,

तब वो पंडित बोला की बेटा मेरे पास कुछ भी नहीं है, तुम एक काम करना मैं यहीं पड़ोस के घर मैं जाके भगवत गीता का पाठ करता हूँ,

वो यजमान बहुत दानी लोग हैं, जब मैं कथा सुना रहा होऊंगा तुम उनके घर में जाके चोरी कर लेना, चोर मान गया

अगले दिन जब पंडित जी कथा सुना रहे थे तब वो चोर भी वहां आ गया,

तब पंडितजी बोले की यहाँ से मीलों दूर एक गाँव है वृन्दावन, वहां पे एक लड़का रहता है, जिसका नाम कान्हा है,

वो हीरों जवाहरातों से लदा रहता है, अगर कोई लूटना चाहता है तो उसको लूटो वो रोज रात को एक पीपल के पेड़ के नीचे आता है, जिसके आस पास बहुत सी झाडिया हैं…

चोर ने ये सुना और ख़ुशी ख़ुशी वहां से चला गया, वो अपने घर गया और अपनी बीवी से बोला आज मैं एक कान्हा नाम के बच्चे को लुटने जा रहा हूँ ,

मुझे रास्ते में खाने के लिए कुछ बांध दे , पत्नी ने कुछ सत्तू उसको दे दिया और कहा की बस यही है जो भी है,

चोर वहां से ये संकल्प लेके चला कि अब तो में उस कान्हा को लुट के ही आऊंगा, वो बेचारा पैदल पैदल टूटे चप्पल में ही वहां से चल पड़ा,

रास्ते में बस कान्हा का नाम लेते हुए, वो अगले दिन शाम को वहां पहुंचा जो जगह उसे पंडित जी ने बताई थी,

अब वहां पहुँच के उसने सोचा कि अगर में यहीं सामने खड़ा हो गया तो बच्चा मुझे देख के भाग जायेगा तो मेरा यहाँ आना बेकार हो जायेगा,

इसलिए उसने सोचा क्यूँ न पास वाली झाड़ियों में ही छुप जाऊ, वो जैसे ही झाड़ियों में घुसा,

झाड़ियों के कांटे उसे चुभने लगे, उस समय उसके मुंह से एक ही आवाज आयी कान्हा, कान्हा ,

उसका शरीर लहू लुहान हो गया पर मुंह से सिर्फ यही निकला, कि कान्हा
आ जाओ,

अपने भक्त कि ऐसी दशा देख के कान्हा जी चल पड़े तभी लक्ष्मी जी बोली कि प्रभु कहाँ जा रहे हो वो आपको लूट लेगा,

प्रभु बोले कि कोई बात नहीं अपने ऐसे भक्तों के लिए तो में लुट जाना तो क्या मिट जाना भी पसंद करूँगा,

और ठाकुरजी बच्चे का रूप बना के आधी रात को वहां आए वो जैसे ही पेड़ के पास पहुंचे चोर एक दम से बाहर आ गया और उन्हें पकड़ लिया,

और बोला कि ओ कान्हा तुने मुझे बहुत दुखी किया है, अब ये चाकू देख रहा है न, अब चुपचाप अपने सारे गहने , मुझे दे दे

कान्हा जी ने हँसते हुए उसे सब कुछ दे दिया, वो चोर हंसी ख़ुशी अगले दिन अपने गाँव में वापिस पहुंचा,

और सबसे पहले उसी जगह गया जहाँ पे वो पंडित जी कथा सुना रहे थे, और जितने भी गहने वो चोरी करके लाया था उनका आधा उसने पंडित जी के चरणों में रख दिया,

जब पंडित ने पूछा कि ये क्या है, तब उसने कहा अपने ही मुझे उस कान्हा का पता दिया था में उसको लूट के आया हूँ, और ये आपका हिस्सा है,

पंडित ने सुना और उसे यकीन ही नहीं हुआ, वो बोला कि में इतने सालों से पंडिताई कर रहा हूँ वो मुझे आज तक नहीं मिला,

तुझ जैसे पापी को कान्हा कहाँ से मिल सकता है, चोर के बार बार कहने पर पंडित बोला कि चल में भी चलता हूँ तेरे साथ वहां पर, मुझे भी दिखा कि कान्हा कैसा दिखता है,

और वो दोनों चल दिए, चोर ने पंडित जी को कहा कि आओ मेरे साथ यहाँ पे छुप जाओ, और काटो के कारण दोनों का शरीर लहू लुहान हो गया, और मुंह से बस एक ही आवाज निकली कान्हा,कान्हा,

ठीक मध्य रात्रि कान्हा बच्चे के रूप में फिर वहीँ आये , और दोनों झाड़ियों से बाहर निकल आये,

पंडित कि आँखों में आंसू थे वो फूट फूट के रोने लग गया, और जाके चोर के चरणों में गिर गया और बोला कि

हम जिसे आज तक देखने के लिए तरसते रहे, जो आज तक लोगो को लुटता आया है, तुमने उसे ही लूट लिया तुम धन्य हो,

आज तुम्हारी वजह से मुझे कान्हा के दर्शन हुए हैं, तुम धन्य हो.. ऐसा है हमारे कान्हा का प्यार, अपने सच्चे भक्तों के लिए ,

जो उसे सच्चे दिल से पुकारते हैं, तो वो भागे भागे चले आते हैं ।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

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🥅अनोखी परंपरा🥅
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एक गांव मे अंधे पति-पत्नी रहते थे । इनके यहाँ एक सुन्दर बेटा पैदा हुआ जो अंधा नही था।

एक बार पत्नी रोटी बना रही थी उस समय बिल्ली रसोई मे घूस कर बनाई रोटियां खा गई।
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बिल्ली की रसोई मे आने की रोज की आदत बन गई इस कारण दोनों को कई दिनों तक भूखा सोना पङा।

एक दिन किसी प्रकार से मालूम पङा कि रोटियां बिल्ली खा जाती है।

अब पत्नी जब रोटी बनाती उस समय पति दरवाजे के पास बांस का फटका लेकर जमीन पर पटकता।
इससे बिल्ली का आना बंद हो गया।

जब लङका बङा हुआ ओर शादी हुई।  बहु जब पहली बार रोटी बना रही थी तो उसका पति बांस का फटका लेकर बैठ गया औऱ फट फट करने लगा।

कई दिन बीत जाने के बाद पत्नी ने उससे पुछा की तुम रोज रसोई के दरवाजे पर बैठ कर बांस का फटका क्यों पीटते हो?

पति ने जवाब दिया कि
ये हमारे घर की परम्परा है इस मैं रोज ऐसा कर रहा हुँ।

माँ बाप अंधे थे बिल्ली को देख नही पाते उनकी मजबूरी थी इसलिये फटका लगाते थे। बेटा तो आँख का अंधा नही था पर अकल का अंधा था। इसलिये वह भी ऐसा करता जैसा माँ बाप करते थे।

ऐसी ही दशा आज के समाज की है। पहले शिक्षा का अभाव था इसलिए पाखंड वादी लोग जिनका स्वयं का भला हो रहा था उनके पाखंड वादी मूल्यों को माना औऱ अपनाया। जिनके पिछे किसी प्रकार का लौजिक  नही है। लेकिन आज के पढे लिखे हम वही पाखंडता भरी परम्पराओं व रूढी वादिता के वशीभूत हो कर जीवन जी रहे हैं।

इसलिये सबसे पहले समझौ,जानो ओर तब मानो तो समाज मे परिवर्तन होगा।

     *"अपना दीपक स्वयं बनें"*

❤️🌹जय श्री जिनेन्द्र🌹❤️
🙏🏻पवन जैन🙏🏻

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐लाल बहादुर शास्त्री💐💐

बात उस समय की है, जब लाल बहादुर शास्त्री मुगलसराय के स्कूल में पढ़ते थे। तब उनका नाम लाल बहादुर वर्मा लिखा जाता था। उन्हें नाम के साथ सरनेम लगाना पसंद नहीं था। उन्होंने स्कूल जाने की उम्र में ही निश्चय कर लिया कि अपने नाम के आगे से वर्मा हटवाएंगे। यह बात उन्होंने घर में अपने, माता-पिता व अन्य सदस्यों को बताई। घर के सदस्यों ने लाल बहादुर की इच्छा पर कोई आपत्ति नहीं जताई। अगले दिन लाल बहादुर अपने साथ परिवार के एक सदस्य को लेकर स्कूल पहुंचे और उनके जरिए हेड मास्टर के पास अपना निवेदन पहुंचाया कि उन्हें लाल बहादुर वर्मा न कह कर सिर्फ लाल बहादुर बुलाया जाए।

निवेदन सुनकर हेड मास्टर साहब ने लाल बहादुर से ही पूछा, ‘बेटे तुम ऐसा क्यों चाहते हो?’ उनके पास जवाब तैयार था। तुरंत बोले, ‘सर मेरा मानना है कि हर इंसान की पहचान उसके काम और नाम से होनी चाहिए, सरनेम से नहीं। सरनेम व्यक्ति की जाति और धर्म का बोध कराता है और मुझे यह बात अच्छी नहीं लगती।’ छोटे से बालक की यह बात सुनकर हेडमास्टर काफी प्रभावित हुए। खुद हेड मास्टर का खुद का नाम वसंत लाल वर्मा था। मगर लाल बहादुर के विचारों का सम्मान करते हुए उन्होंने उनके नाम के आगे से वर्मा सरनेम हटा दिया। इसके बाद उन्हें लाल बहादुर कह कर पुकारा जाने लगा।

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद जब 1925 में लाल बहादुर ने काशी विद्यापीठ वाराणसी से ‘शास्त्री’ की डिग्री प्राप्त की, तो उसके बाद उन्होंने अपना पूरा नाम लाल बहादुर शास्त्री बताना और लिखना प्रारंभ किया। शास्त्री की यह पहचान उनके सरनेम से नहीं, वरन उनकी अर्जित की गई शिक्षा से बनी थी। स्वाभाविक ही इस पहचान को उन्होंने गर्व से अपनाया और अपने व्यक्तित्व व कार्यों की बदौलत इसे पूरे देश का गौरव बना दिया।

💐💐 प्रेषक अभिजीत चौधरी 💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
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🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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वीर शिरोमणि बर्बरीक की गाथा…!!

हरियाणा के पानीपत जिले में एक गाँव है चुलकाना. इसे चुलकाना धाम भी कहते हैं.
यही वो स्थान हैं जहाँ घटोत्कच पुत्र बर्बरीक का शीश भगवान श्रीकृष्ण ने मांग लिया था.
कथा है जब तीन वाणधारी बर्बरीक कुरुक्षेत्र युद्धस्थल की ओर जा रहा था तब श्रीकृष्ण ने इसी स्थान पर वेश बदल कर उसे रोका था.

बर्बरीक के यह कहने पर कि वह केवल हारते हुए पक्ष की ओर से ही युद्ध करेगा श्रीकृष्ण चिंतित हो गए. यह बेहद गंभीर बात थी. इस तरह तो कौरव और पांडव दोनों का सफाया हो जायेगा. क्योंकि कोई एक पक्ष तो हारेगा ही और बर्बरीक उसकी तरफ से युद्ध करने लगेगा. जब दूसरा पक्ष हारने लगेगा तो बर्बरीक पाला बदल कर उसकी तरफ हो जाएगा. इसका परिणाम यह होगा कि एक समय ऐसा आएगा जब दोनों पक्षों का सफाया हो जायेगा.

बर्बरीक का कहना था सम्पूर्ण विश्व को नष्ट करने के लिए उसका एक वाण ही बहुत है. अपनी बात सिद्ध करने के लिए बर्बरीक ने वहाँ स्थित पीपल के वृक्ष पर वाण चलाया जिसने वृक्ष के सभी पत्तों को छेद दिया. एक पत्ता श्रीकृष्ण ने अपने पाँव के नीचे दबा लिया था जिसे छेदने के लिए वाण उनके पाँव पर मंडराने लगा. बर्बरीक के चेतावनी देने पर श्रीकृष्ण ने पत्ते पर से अपना पाँव हटा लिया और वाण ने उस आखिरी पत्ते को भी छेद दिया. आश्चर्यजनक रूप से आज भी उस पीपल वृक्ष के पत्तों में छेद होता है और इसे कोई भी वहाँ जाकर देख सकता है.

श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर माँग लिया. आश्चर्य की बात यह कि उसका सिर धड़ से अलग होने के बाद भी श्रीकृष्ण से वार्तालाप करता रहा और उसने महाभारत युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की. तब श्रीकृष्ण द्वारा बर्बरीक के शीश को एक ट्राइकोप्टर का रूप देकर युद्ध क्षेत्र में उड़ाया गया. सम्भावना यह भी है संजय द्वारा धृतराष्ट्र को महाभारत युद्ध का जो आँखों देखा हाल सुनाया गया उसका प्रसारण इसी बर्बरीक के शीश द्वारा बने ट्राइकोप्टर से प्रसारित किया गया.

बर्बरीक का जो वर्णन है वो उसे अतिमानवीय सिद्ध करता है. बर्बरीक की योग्यताएं एक इंसान की बजाय किसी सुपर कंप्यूटर जैसी अधिक लगती हैं. बर्बरीक शब्द बर्बर से बना है और संस्कृत में बर्बर का अर्थ अमानवीय होता है. इसी से अंग्रेजी शब्द बारबेरियन की उत्पत्ति हुई है. शायद यही कारण है पूरे महाभारत में कहीं भी बर्बरीक का जिक्र नहीं मिलता क्योंकि वह कोई मानव नहीं बल्कि AI यानी आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस था.

ईसवी सन 1027 में कुछ मजदूर वर्तमान राजस्थान के सीकर जिले के गांव खाटू में कुआं खोद रहे थे.
लगभग तीस फ़ीट की खुदाई के बाद उन्हें एक धातु का बक्सा मिला. बक्सा बहुत अच्छी तरह से सील किया हुआ था और उसपर संस्कृत में बर्बरीक खुदा था.
बक्से को खोलने पर उसमें से एक चमकीली धातु से बना मानव सिर मिला. इस सिर की आंखें बिलकुल मानव आंखों जैसी और सचेत थीं.

इस सिर को तत्काल वहां के राजा रूप सिंह चौहान के पास ले जाया गया. राजा रूप सिंह ने अनेक विद्वानों को इस शीश का रहस्य और उद्गम जानने के काम पर लगा दिया.
ढेरों प्राचीन ग्रंथों को खंगालने के बाद विद्वान बर्बरीक और श्रीकृष्ण की कथा तक पहुँचे. इसके बाद पूर्ण श्रद्धा और विधि विधान के बाद इस शीश को इसके प्राप्ति स्थल पर मंदिर बनाकर स्थापित कर दिया गया.
आज यह शीश श्री खाटू श्यामजी के नाम से विख्यात है…
जय सनातन धर्म🔱🚩🔱