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गाय व भैंस के दूध में अंतर
जो बहुत कम लोग जानते हैं !

भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते खा जायें वह नहीं बचायेगी,

जबकि गाय के बच्चे के पास अनजान आदमी तो क्या शेर भी आ जाये तो जान दे देगी, परन्तु जीते जी बच्चे पर आँच नही आने देगी।
इसीलिए उसके दूध में स्नेह का गुण भरपूर होता है।

भैंस को गन्दगी पसन्द है, कीचड़ में लथपथ रहेगी,,

पर गाय अपने गोबर पर भी नहीं बैठेगी उसे स्वच्छता प्रिय है।

भैंस को घर से 2 किमी दूर तालाब में छोड़कर आ जाओ वह घर नहीं आ सकती उसकी याददास्त जीरो है।

गाय को घर से 5 किमी दूर छोड़ दो।
वह घर का रास्ता जानती है,आ जायेगी।
गाय के दूध में #स्मृति तेज है।

दस भैंसों को बाँधकर 20 फुट दूर से उनके बच्चों को छोड़ दो, एक भी बच्चा अपनी माँ को नहीं पहचान सकता,

जबकि गौशालाओं में दिन भर गाय व बछड़े अलग-अलग शैड में रखते हैं, सायंकाल जब सबका माता से मिलन होता है तो सभी बच्चे (हजारों की स॔ख्या में) अपनी अपनी माँ को पहचान कर दूध पीते हैं, ये है गाय दूध की याददास्त।

जब भैंस का दूध निकालते हैं तो भैंस सारा दूध दे देती है,

परन्तु गाय थोड़ा-सा दूध ऊपर चढ़ा लेती है, और जब उसके बच्चे को छोड़ेंगे तो उस चढ़ाये दूध को उतार देती है।
ये गुण माँ के हैं जो भैंस मे नहीं हैं।

गली में बच्चे खेल रहे हों और भैंस भागती आ जाये तो बच्चों पर पैर अवश्य रखेगी…

लेकिन गाय आ जाये तो कभी भी बच्चों पर पैर नही रखेगी।

भैंस धूप और गर्मी सहन नहीं कर सकती…

जबकि गाय मई जून में भी धूप में बैठ सकती है।

भैंस का दूध तामसिक होता है….
जबकि गाय का सात्विक।

भैंस का दूध आलस्य भरा होता है, उसका बच्चा दिन भर ऐसे पड़ा रहेगा जैसेे भाँग खाकर पड़ा हो।
जब दूध निकालने का समय होगा तो मालिक उसे उठायेगा…

परन्तु गाय का बछड़ा इतना उछलेगा कि आप रस्सा खोल नहीं पायेंगे।

फिर भी लोग भैंस खरीदने में लाखों रुपए खर्च करते हैं….
जबकि गौमाता का दूध अमृत समान होता है।।

🙏जय गौमाता🙏

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ગાય માતા


🌹🌹 ગાય માતા 🌹🌹 વિષે થોડી જાણકારી 💐

૧. ગાય માતા જે જગ્યા એ ઊભી રહી ને ખુશીથી શ્વાસ લઈ શકે ત્યાં વાસ્તુદોષ પુરો થઈ જાય છે.

૨. જે જગ્યા એ ગાય માતા ખુશીથી ભાંભરે એ જગ્યા એ દેવી દેવતા ફુલો વરસાવે છે

૩. ગાય માતા ના ગળામાં ટોકરી અવસ્ય બાંધવી ગાયના ગળામાં બાંધેલી ટોકરી વગાડવાથી ગાયમાતા ની આરતી થાય છે

૪. જે માણસ ગાય ની સેવા પુજા કરે છે તેના ઉપર આવનારુ બધુ દુ:ખ ગાય માતા હરી લે છે

૫. ગાયમાતા ની ખરી માં નાગદેવતા નો વાસ હોય છે,જે જગ્યા યે ગાય માતા ફરે છે તે જગ્યા એ સાંપ અને વિંછી કયારેય આવતા નથી

૬. ગાય માતા ના છાંણ માં લક્ષ્મીજી નો વાસ હોય છે

૭. ગાય માતા ની એક આંખ મા સુર્ય અને બીજી આંખ માં ચંદ્ર દેવ નો વાસ હોય છે

૮. ગાય માતા ના દુધ માં સોનેરી તત્વો મળી આવે છે જે રોગો ની ક્ષમતા તાકાત નો નાશ કરીનાખે છે

૯. ગાય માતા ની પુંછડી માં હનુમાનજી નો વાસ હોય છે. કોઈ પણ વ્યક્તિ ને ખરાબ નજર લાગે તો ગાય માતા ની પુછડી માથે ફેરવવા થી ઝાડો નાખવાથી નજર ઊતરી જાય છે

૧૦. ગાય માતા ની પીઠ ઊપર એક કુંન્ધ આવેલી હોય છે એ કુંન્ધ ઊપર સુર્યકેતુ નામ ની નાળી હોય છે રોજ સવારે ગાય માતા ની કુંન્ધ ઊપર હાથ ફેરવવાથી રોગો નો નાશ થાય છે

૧૧. એક ગાય માતા ને ચારો ખવડાવાથી કરોડો દેવી દેવતાઓ ને ભોગ ચડે છે આ સૃષ્ટી પર ગાય માતાનું અસ્તીત્વ અને પુજન છે ત્યાં સુઘીજ સૃષ્ટિનું અસ્તીત્વ છે આવી પણ દ્રઢ માન્યતા છે

૧૨. ગાય માતા ના દુધ, ધી, માખણ, દહી, છાણ, ગૌ મુત્ર થી બનાવેલ પંચગવ્વીય હજારો રોગો ની દવા છે આના સેવન થી અસાધારણ રોગ મટી જાય છે

૧૩. જે માણસ ની ભાગ્ય રેખા સુતી હોય એ માણસે એની હથેળી માં ગોળ રાખી ગાય માતા ની જીભ થી ચટાડે ગાય માતા નીજીભ થી હથેળી પર રાખેલ ગોળ ને ચાટવા થી એ માણસ ની ભાગ્ય રેખા ખુલી જશે

૧૪. ગાય માતા ના ચારેય પગની વચ્ચેથી નીકળી ને પરીક્રમા કરવાથી મનુષ્ય ભય મુક્ત થઈ જાય છે

૧૫. ગાય માતા ના ગર્ભ માં થી મહાન વિદ્વાન ધમઁ રક્ષક ગૌ કણજી મહારાજ પૈદા થયા હતા

૧૬. ગાય માતા ની સેવા માટે આ પ્રુથ્વી પર દેવી દેવતાઓયે અવતાર લીધો હતો

૧૭. જયારે ગાય માતા વાછરડા ને જન્મ આપે ત્યારે પેહલુ દુધ વાંઝ સ્ત્રી ને પીવડાવા થી એનુ વાંઝીયાપણુ ખત્મ થઈ જાય છે

૧૮. સ્વસ્થ ગૌ માતા નુ ગૌ મુત્ર ને રોજ બે તોલા પ્રમાણ સાફ કપડામાં ગાળી ને પીવાથીબધા રોગ મટીજાય છે

૧૯. ગાય માતા પ્રેમ ભરી નજરથી જેને જોવે એના ઊપર ગાય માતા ની ક્રુપા અપાર થઈ જાય છે

૨૦. કાળી ગાય ની પુુજા કરવાથી નવ ગ્રહ શાન્ત રહે છે જે ધ્યાનપુર્વક ગાય ની પુજા કરે છે એમને શત્રુ દોષ થી છુટકારો મલે છે

૨૧. ગાય એક હાલતુ ચાલતુ મંદિર છેઆપણા સનાતન ધમઁ માં ગાય માતાના દર્શન અે તેત્રીશ કરોડ દેવીદેવતાઓ ના દર્શન બરાબર છે, રોજ મંદિરે જઈ શકતા નથી પણ ગાય માતા ના દશઁન થી બધા દેવોના દશઁન થઈ જાય છે

૨૨. કોઈપણ શુભ કાર્ય અટકેલુ હોય વારે ઘડીયે કરવાથી સફળતા ન મળતી હોય તો ગાય માતા ના કાન મા કહેવા થીઅટકી ગયેલુ કામ પુરુ થઈ જશે

૨૩. ગાય માતા બધા સુખોની દાતાર છે
🌹🙏🙏🙏🙏🙏🌹
હૈ મા તમે અનંત ! તમારા ગુણ અનંત !🙏
એટલી મારામા સાર્મથ્ય નથી કે હું આપના ગુણો ના વખાણ કરી શકું…!🙏

આપને આ પોસ્ટ સારી લાગી હોય તો તમારા મિત્રો સુધી પહોચાડો🙏🙏🙏 🌹 જય હિન્દુરાષ્ટ્ર 🌹

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गाय सर्वोत्तम हितकारी पशु होने सहित मनुष्यों की पूजनीय देवता है


ओ३म्
-आज गोवर्धन पर्व पर-

“गाय सर्वोत्तम हितकारी पशु होने सहित मनुष्यों की पूजनीय देवता है”

परमात्मा ने इस सृष्टि को जीवात्माओं को कर्म करने व सुखों के भोग के लिए बनाया है। जीवात्मा का लक्ष्य अपवर्ग होता है। अपवर्ग मोक्ष वा मुक्ति को कहते हैं। दुःखों की पूर्ण निवृत्ति ही मोक्ष कहलाती है। यह मोक्ष मनुष्य योनि में जीवात्मा द्वारा वेदाध्ययन द्वारा ज्ञान प्राप्त कर एवं उसके अनुरूप आचरण करने से प्राप्त होता है। सांख्य दर्शन में महर्षि कपिल ने मोक्ष का सूक्ष्मता से विवेचन किया है जिससे यह ज्ञात होता है कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य वेद विहित सद्कर्मों अर्थात् ईश्वरोपासना द्वारा ईश्वर साक्षात्कार, अग्निहोत्र यज्ञ एवं परोपकार आदि को करके जन्म व मरण के बन्धन वा दुःखों से छूटना है, यही मोक्ष है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए भूमि, अन्न व जल सहित गोदुग्ध व फलों आदि मुख्य पदार्थों की आवश्यकता होती है। गोदुग्ध हमें गाय से मिलता है। दूध व घृत आदि वैसे तो अनेक पशु से प्राप्त होते है परन्तु देशी गाय के दूध के गुणों की तुलना अन्य किसी भी पशु से नहीं की जा सकती। गाय का दुग्ध मनुष्य के स्वास्थ्य, बल, बुद्धि, ज्ञान-प्राप्ति, दीर्घायु आदि के लिए सर्वोत्तम साधन व आहार है। मनुष्य का शिशु अपने जीवन के आरम्भ में अपनी माता के दुग्ध पर निर्भर रहता है। माता के बाद उसका आहार यदि अन्य कहीं से मिलता है तो वह गाय का दुग्ध ही होता है। गाय का दूध भी लगभग मां के दूध के समान गुणकारी व हितकर होता। भारत के ऋषि, मुनि, योगी व विद्वान गोपालन करते थे और गाय का दूध, दधि, छाछ व घृत आदि का सेवन करते थे। गोदुग्ध से घृत भी बनाते थे और उससे अग्निहोत्र यज्ञ कर वायु व जल आदि की शुद्धि करते थे। इन सब कार्यों से वह स्वस्थ, सुखी व दीर्घायु होते थे। ईश्वर प्रदत्त वेद के सूक्ष्म व सर्वोपयोगी ज्ञान को प्राप्त होकर सृष्टि के सभी रहस्यों यहां तक की ईश्वर का साक्षात्कार करने में भी सफल होते थे और मृत्यु होने पर मोक्ष या श्रेष्ठ योनि में जन्म लेकर सुखों से पूर्ण जीवन प्राप्त करते थे।

गाय से हमें केवल दूध ही नहीं मिलता अपितु गाय माता नाना प्रकार से हमारी सेवा करती है और साथ ही कुछ महीनों व वर्षों के अन्तराल पर हमें पुनः बछड़ी व बछड़े देकर प्रसन्न व सन्तुष्ट करती है। बछड़ी कुछ वर्ष में ही गाय बन जाती है और हम उसके भी दुग्ध, गोबर, गोमूत्र, गोचर्म (मरने के बाद) को प्राप्त कर अपने जीवन मे सुख प्राप्त करते हैं। गोबर न केवल ईधन है जिससे विद्युत उत्पादन, गुणकारी खाद, घर की लिपाई आदि में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी प्रकार से गोमूत्र भी एक महौषधि है। इससे कैंसर जैसे रोगों का सफल उपचार होता है। नेत्र ज्योति को बनाये रखने नेत्र रोगों को दूर करने में भी यह रामबाण के समान औषध है। त्वचा के रोगों में भी गोमूत्र से लाभ होता है। आजकल पंतजलि आयुर्वेद द्वारा गोमूत्र को सस्ते मूल्य व आकर्षक पैकिंग में उपलब्ध कराया जा रहा है जिसे लाखों लोग अमृत समान इस औषध-द्रव का प्रतिदिन सेवन करते हैं। गोमूत्र किटाणु नाशक होता है। इससे उदरस्थ कीड़े भी समाप्त हो जाते हैं। ऐसे और भी अनेक लाभ गोमूत्र से होते हैं। गाय के मर जाने पर उसका चर्म भी हमारे पैरों आदि की रक्षा करता है। गोचर्म के भी अनेक उपयोग हैं अतः हम जो-जो लाभ गो माता से लेते जाते हैं उस उससे हम गोमाता के ऋणी होते जाते हैं। हमारा भी कर्तव्य होता है कि हम भी गोमाता को उससे हमें मिलने वाले लाभों का प्रत्युपकार करें, उसका ऋण उतारें, उसको अच्छा चारा दें, उसकी खूब सेवा करें और उसके दुग्ध व गोमूत्र का पान करें जिससे हम स्वस्थ, सुखी, आनन्दित व दीर्घायु होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति कर सकंे।

गाय से हमें सबसे अधिक लाभ गोदुग्ध से ही होता है। जो मनुष्य गोदुग्ध का सेवन अधिक करता है उसको अधिक अन्न की आवश्यकता नहीं होती। इससे अन्न की बचत होती है और देश के करोड़ो भूखे व निर्धन लोगों को अपनी भूख की निवृत्ति में सहायता मिल सकती है। यह रहस्य की बात है कि देश में जितनी अधिक गौंवे होंगी देश में गोदुग्ध, गोघृत व अन्न उतना ही अधिक सस्ता होगा जिससे निर्धन व देश के भूखे रहने वाले लोगों को लाभ होगा। अनुमान से ज्ञात होता है कि देश की लगभग 40 प्रतिशत से अधिक जनता निर्धन एवं अन्न संकट से ग्रसित है। हमने भी अपने जीवन में निर्धनता और परिवारों में अन्न संकट देखा है। ऐसी स्थिति में यदि किसी निर्धन व्यक्ति के पास एक गाय है और आस-पास से उसे चारा मिल जाता है तो वह परिवार अन्न संकट सहित गम्भीर रोगों व मृत्यु का ग्रास बनने से बचाया जा सकता है।

ऋषि दयानन्द ने गाय के दूध और अन्न के उत्पादन से संबंधित गणित के अनुसार गणना कर बताया है कि एक गाय के जन्म भर के दूघ मात्र से 25,740 पच्चीस हजार सात सौ चालीस लोगों का एक समय का भोजन होता है अर्थात् इतनी संख्या में लोगों की भूख से तृप्ति होती है। स्वामी जी ने एक गाय की एक पीढ़ी अर्थात् उसके जीवन भर के कुल बछड़ी व बछड़ों से दूघ मात्र से एक बार के भोजन से कितने लोग तृप्त हो सकते हैं, इसकी गणना कर बताया है कि 1,54,440 लोग तृप्त व सन्तुष्ट होते हैं। वह बताते हैं कि एक गाय से जन्म में औसत 6 बछड़े होते हैं। उनके द्वारा खेतों की जुताई से लगभग 4800 मन अन्न उत्पन्न होता है। इससे कुल 2,56,000 हजार मनुष्य का भोजन से निर्वाह एक समय में हो सकता है। यदि एक गाय की एक पीढ़ी से कुल दूघ व अन्न से तृप्त होने वाले मनुष्यों को मिला कर देखें तो कुल 4,10,440 चार लाख दस हजार चार सौ चालीस मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन से होता है। वह यह भी बताते हैं कि यदि एक गाय से उसके जीवन में उत्पन्न औसत 6 गायों वा बछड़ियों से उत्पन्न दूध व बछड़ों-बैलों से अन्न की गणना की जाये तो असंख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है। इसके विपरीत यदि एक गाय को मार कर खाया जाये तो उसके मांस से एक समय में केवल अस्सी मनुष्य ही पेट भर कर सन्तुष्ट हो सकते है। निष्कर्ष में ऋषि दयानन्द जी कहते हैं कि ‘देखो! तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मार कर असंख्य मनुष्यों की हानि करना महापाप क्यों नहीं?’ गायों से इतने लाभ मिलने पर भी यदि कोई व्यक्ति व समूह गाय की हत्या करता व करवाता है और मांस खाता है व उसे प्रचारित व समर्थन आदि करता है तो वह बुद्धिमान कदापि नहीं कहा जा सकता। गाय सही अर्थों में देवता है जो न केवल हमें अपितु सृष्टि के आरम्भ से हमारे पूर्वजों का पालन करती आ रही है और प्रलय काल तक हमारी सन्तानों का भी पालन करती रहेगी। गाय से होने वाले इन लाभों के कारण निश्चय ही वह एक साधारण नहीं अपितु सबसे महत्वपूर्ण वा प्रमुख देवता है। हम गोमाता को नमन करते हैं। हमें गोमाता पृथिवी माता व अपनी जन्मदात्री माता के समान महत्वपूर्ण अनुभव होती है। वेद ने तो भूमि, गाय और वेद को माता कह कर उसका स्तुतिगान किया है।

गोकरूणानिधि लघु पुस्तक की भूमिका में ऋषि दयानन्द जी के गोपालन व गोरक्षा के समर्थन में लिखे कुछ शब्द लिख कर हम इस लेख को विराम देते हैं। वह कहते हैं ‘सृष्टि में ऐसा कौन मनुष्य होगा जो सुख और दुःख को स्वयं न मानता हो? क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है कि जिसके गले को काटे वा रक्षा करे, वह दुःख और सुख को अनुभव न करे? जब सबको लाभ और सुख ही में प्रसन्नता है, तब विना अपराध किसी प्राणी का प्राण वियोग करके अपना पोषण करना सत्पुरुषों के सामने निन्द्य (निन्दित) कर्म क्यों न होवे? सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों की आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करे कि जिससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रिया की सिद्धि से युक्त होकर सब मनुष्य आनन्द में रहें।’ हम अनुरोध करते हैं कि पाठकों को गोरक्षा का महत्व जानने के लिए ऋषि दयानन्द जी की ‘गोकरुणानिधि’ तथा पं. प्रकाशवीर शास्त्री लिखित ‘गोहत्या राष्ट्रहत्या’ पुस्तकें पढ़नी चाहिये। गोरक्षा से देश की अर्थव्यवस्था भी सुदृण होती है। गोरक्षा व गोपालन आदि कार्यों से हम अपने अगले जन्म को सृष्टिकर्ता ईश्वर से उत्तम परिवेश में मनुष्य जन्म प्राप्त करने के अधिकारी बनते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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गाय और भैंस की कुछ आश्चर्यजनक जानकारी।

दोनों में अंतर

  1. भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते खां जायें वह नहीं बचायेगी, जबकि गाय के बच्चे के पास अनजान आदमी तो क्या शेर भी आ जाये तो जान दे देगी परन्तु जीते जी बच्चे पर आंच नही आने देगी। इसीलिए उसके दूध में स्नेह का गुण भरपूर होता है।
  2. भैंस के दो बेटे बड़े होकर यानि दो झोटे एक गांव में मिलकर नहीं रह सकते। आमना-सामना होते ही एक दूसरे को मारेंगे, भाई-भाई का दुश्मन ! परन्तु गाय के 10 साण्ड इकट्ठे रह सकते हैं, ये भाईचारे का प्रमाण है।
  3. भैंस गन्दगी पसन्द है, कीचड़ में लथपथ रहेगी पर गाय अपने गोबर पर भी नहीं बैठेगी वह स्वच्छता प्रिय है।
  4. भैंस को घर से 2 किमी दूर तालाब में छोड़कर आ जाओ वह घर नहीं आ सकती उसकी यादास्त जीरो है। गाय को घर से 5 किमी दूर छोड़ दो वह घर का रास्ता जानती है, आ जायेगी ! गाय के दूध में स्मृति तेज है।
  5. दस भैंस बान्धकर 20 फुट दूर से उनके बच्चों को छोड़ दो, एक भी बच्चा अपनी मां को नहीं पहचान सकता जबकि गोशालाओं में दिन भर गाय व बच्चे अलग-अलग शैड में रखते हैं, सायंकाल जब सबका मिलन होता है तो सभी बच्चे (हजारों की स॔ख्या में) अपनी अपनी मां को पहचान कर दूध पीते हैं, ये है गोदुग्ध की मेमरी।
  6. जब भैंस का दूध निकालते हैं तो भैंस सारा दूध दे देती है परन्तु गाय थोड़ा सा दूध ऊपर चढ़ा लेती है, और जब उसके बच्चे को छोड़ेंगे तो उस चढाये दूध को उतार देती है ! ये गुण माँ के हैं जो भैंस मे नही हैं।
  7. गली में बच्चे खेल रहे हों और भैंस भागती आ जाये तो बच्चों पर पैर अवश्य रखेगी लेकिन गाय आ जाये तो कभी भी बच्चों पर पैर नही रखेगी।
  8. भैंस धूप और गर्मी सहन नहीं कर सकती जबकि गाय मई जून में भी धूप में बैठ सकती है।
  9. भैंस का दूध तामसिक होता है जबकि गाय का सात्विक ! भैंस का दूध आलस्य भरा होता है, उसका बच्चा दिन भर ऐसे पड़ा रहेगा जैसेे अफीम या भांग खाकर पड़ा है, जब दूध निकालने का समय होगा तो मालिक उसे ठोकरें मारकर उठायेगा परन्तु गाय का बछड़ा इतना उछलेगा कि आप रस्सा खोल नही पायेंगे ठीक से।
    “”कौन हमारे सुखदाता धरती गंगा गौ माता
    गोमाता को जीने दो दूध की नदियां बहने दो”””

🌹🌹गौ🌹 माता🌹 की 🌹जय 🌹🌹

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भारत की संतान –जिन्हें हम भूल गए,
वीर बलिदानी हरफूल सिंह

वीर हरफूल का जन्म 1892 ई० में भिवानी जिले के लोहारू तहसील के गांव बारवास में एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था।उनके पिता एक किसान थे।
बारवास गांव के इन्द्रायण पाने में उनके पिता चौधरी चतरू राम सिंह रहते थे। उनके दादा का नाम चौधरी किताराम सिंह था। 1899 में हरफूल के पिताजी की प्लेग के कारण मृत्यु हो गयी। इसी बीच ऊनका परिवार जुलानी(जींद) गांव में आ गया।यहीं के नाम से उन्हें वीर हरफूल जाट जुलानी वाला कहा जाता है।
उसके बाद हरफूल सेना में भर्ती हो गए। उन्होंने 10 साल सेना में काम किया। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में भी भाग लिया। उस दौरान ब्रिटिश आर्मी के किसी अफसर के बच्चों व औरत को घेर लिया।तब हरफूल ने बड़ी वीरता दिखलाई व बच्चों की रक्षा की। अकेले ही दुश्मनों को मार भगाया। फिर हरफूल ने सेना छोड़ दी। जब सेना छोड़ी तो उस अफसर ने उन्हें गिफ्ट मांगने को कहा ,तो उन्होंने फोल्डिंग गन मांगी। वह बंदूक अफसर ने उन्हें खुशी खुशी दे दी।
टोहाना में मुस्लिम राँघड़ो का एक गाय काटने का एक कसाईखाना था। वहां की 52 गांवों की नैन खाप ने इसका कई बार विरोध किया। कई बार हमला भी किया जिसमें नैन खाप के कई नौजवान शहीद हुए व कुछ कसाइ भी मारे गए लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई क्योंकि ब्रिटिश सरकार मुस्लिमों के साथ थी और खाप के पास हथियार भी नहीं थे।
तब नैन खाप ने वीर हरफूल को बुलाया व अपनी समस्या सुनाई।हिन्दू वीर हरफूल भी गौहत्या की बात सुनकर लाल पीले हो गए और फिर नैन खाप के लिए हथियारों का प्रबंध किया।
हरफूल ने युक्ति बनाकर दिमाग से काम लिया। उन्होंने एक औरत का रूप धरकर कसाईखाने के मुस्लिम सैनिको और कसाइयों का ध्यान बांट दिया फिर नौजवान अंदर घुस गए उसके बाद हरफूल ने ऐसी तबाही मचाई के बड़े बड़े कसाई उनके नाम से ही कांपने लगे।उन्होंने कसाइयों पर कोई रहम नहीं खाया। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया और गऊओ को मुक्त करवाया। अंग्रेजों के समय बूचड़खाने तोड़ने की यह प्रथम घटना थी।
इस महान साहसिक कार्य के लिए नैन खाप ने उन्हें सवा शेर की उपाधि दी व पगड़ी भेंट की।
उसके बाद तो हरफूल ने ऐसी कोई जगह नहीं छोड़ी जहां उन्हें पता चला कि कसाईखाना है वहीं जाकर धावा बोल देते थे।
उन्होंने जींद,नरवाना,गौहाना,रोहतक आदि में 17 गौहत्थे तोड़े। उनका नाम पूरे उत्तर भारत में फैल गया। कसाई उनके नाम से ही थर्राने लगे। उनके आने की खबर सुनकर ही कसाई सब छोड़कर भाग जाते थे। मुसलमान और अंग्रेजों का कसाइवाड़े का धंधा चौपट हो गया इसलिए अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी। मगर हरफूल कभी हाथ न आये।कोई अग्रेजो को उनका पता बताने को तैयार नहीं हुआ।
वीर हरफूल उस समय चलती फिरती कोर्ट के नाम से भी मशहूर थे। जहाँ भी गरीब या औरत के साथ अन्याय होता था, वे वहीं उसे न्याय दिलाने पहुंच जाते थे। उनके न्याय के भी बहुत से किस्से प्रचलित हैं।
अंग्रेजों ने हरफूल के ऊपर इनाम रख दिया और उन्हें पकड़ने की कवायद शुरू कर दी इसलिए हरफूल अपनी एक ब्राह्मण धर्म बहन के पास झुंझनु (राजस्थान) के पंचेरी कलां पहुंच गए। इस ब्राह्मण बहन की शादी भी हरफूल ने ही करवाई थी।
यहां का एक ठाकुर भी उनका दोस्त था। वह इनाम के लालच में आ गया व उसने अंग्रेजों के हाथों अपना जमीर बेचकर दोस्त व धर्म से गद्दारी की।
अंग्रेजों ने हरफूल को सोते हुए गिरफ्तार कर लिया। कुछ दिन जींद जेल में रखा लेकिन उन्हें छुड़वाने के लिये हिन्दुओ ने जेल में सुरंग बनाकर सेंध लगाने की कोशिश की और विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने उन्हें फिरोजपुर जेल में चुपके से ट्रांसफर कर दिया। बाद में 27 जुलाई 1936 को चुपके से पंजाब की फिरोजपुर जेल में अंग्रेजों ने उन्हें रात को फांसी दे दी। उन्होंने विद्रोह के डर से इस बात को लोगो के सामने स्पष्ट नहीं किया। उनके पार्थिव शरीर को भी हिन्दुओ को नहीं दिया गया। उनके शरीर को सतलुज नदी में बहा दिया गया।
इस तरह देश के सबसे बड़े गौरक्षक, गरीबो के मसीहा, उत्तर भारत के रॉबिनहुड कहे जाने वाले वीर हरफूल सिंह ने अपना सर्वस्व गौमाता की सेवा में कुर्बान कर दिया।
उन्होंने अपना जीवन गौरक्षा व गरीबों की सहायता में बिताया मगर कितने शर्म की बात है कि बहुत कम लोग आज उनके बारे में जानते हैं। कई गौरक्षक संगठन तो उनको याद भी नहीं करते। गौशालाओं में भी गौमाता के इस लाल की मूर्तियां नहीं है।

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गौमाता व भैंस में अंतर

हमने बचपन में दादी और मां से एक दोहा सुना था…🤗

गाय माता गोमती बाछडियो गणेश !🙏

डेयरी ने सब प्रकार के दूध को मिक्स कर दिया… 😇

दोनों में अंतर :

  1. भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते खां जायें वह नही बचायेगी, जबकि गाय के बच्चे के पास अनजान आदमी तो क्या शेर भी आ जाये तो जान दे देगी परन्तु जीते जी बच्चे पर आंच नही आने देगी। इसीलिए उसके दूध में स्नेह का गुण भरपूर होता है।
  2. भैंस गन्दगी पसन्द है, कीचड़ में लथपथ रहेगी पर गाय अपने गोबर पर भी नहीं बैठेगी वह स्वच्छता प्रिय है।
  3. भैंस को घर से 2 किमी दूर तालाब में छोड़कर आ जाओ वह घर नहीं आ सकती उसकी यादास्त जीरो है। गाय को घर से 5 किमी दूर छोड़ दो वह घर का रास्ता जानती है, आ जायेगी ! गाय के दूध में स्मृति तेज है।
  4. दस भैंस बान्धकर 20 फुट दूर से उनके बच्चों को छोड़ दो, एक भी बच्चा अपनी मां को नही पहचान सकता जबकि गोशालाओं में दिन भर गाय व बच्चे अलग अलग शैड में रखते हैं, सायंकाल जब सबका मिलन होता है तो सभी बच्चे (हजारों की स॔ख्या में) अपनी अपनी मां को पहचान कर दूध पीते हैं, ये है गोदुग्ध की मेमरी।
  5. जब भैंस का दूध निकालते हैं तो भैंस सारा दूध दे देती है परन्तु गाय थोड़ा सा दूध ऊपर चढ़ा लेती है, और जब उसके बच्चे को छोड़ेंगे तो उस चढाये दूध को उतार देती है ! ये गुण माँ के हैं जो भैंस मे नही हैं।
  6. गली में बच्चे खेल रहे हों और भैंस भागती आ जाये तो बच्चों पर पैर अवश्य रखेगी लेकिन गाय आ जाये तो कभी भी बच्चों पर पैर नही रखेगी।
  7. भैंस धूप और गर्मी सहन नहीं कर सकती जबकि गाय मई जून में भी धूप में बैठ सकती है।
  8. भैंस का दूध तामसिक होता है जबकि गाय का सात्विक ! भैंस का दूध आलस्य भरा होता है, उसका बच्चा दिन भर ऐसे पड़ा रहेगा जैसेे अफीम या भांग खाकर पड़ा है, जब दूध निकालने का समय होगा तो मालिक उसे ठोकरें मारकर उठायेगा परन्तु गाय का बछड़ा इतना उछलेगा कि आप रस्सा खोल नही पायेंगे ठीक से।
    मेरा इतना कहना है कि विधाता ने 100 वर्ष की आयु निर्धारित की है उस आयु को प्रत्येक व्यक्ति जिए वह तभी संभव है जब वह अपना खान-पान सही करेगा
    🙏जय गौमाता🙏🚩🚩
    || जय श्री राधे कृष्ण ||
Posted in गौ माता - Gau maata, छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक प्रसंग, एक कहानी जो सच है।

एक बार ‘मध्यप्रदेश के इन्दौर’ नगर में एक रास्ते से
महारानी देवी अहिल्यावाई होल्कर के पुत्र मालोजीराव
का रथ निकला
तो उनके रास्ते में हाल ही की जनी गाय का एक बछड़ा सामने आ गया।

गाय अपने बछड़े को बचाने दौड़ी तब तक मालोजीराव का रथ गाय के बछड़े को कुचलता हुआ आगे बढ़ गया।

किसी ने उस बछड़े की परवाह नहीं की।
गाय बछड़े के निधन से स्तब्ध व आहत होकर बछड़े के पास ही सड़क पर बैठ गई।

🚩थोड़ी देर बाद अहिल्यावाई वहाँ से गुजरीं।
अहिल्यावाई ने गाय को और उसके पास पड़े मृत बछड़े को देखकर घटनाक्रम के बारे में पता किया।

🚩सारा घटनाक्रम जानने पर अहिल्यावाई ने दरबार में मालोजी की पत्नी मेनावाई से पूछा…
यदि कोई व्यक्ति किसी माँ के सामने ही उसके बेटे की हत्या कर दे,
तो उसे क्या दंड़ मिलना चाहिए?

🚩मालोजी की पत्नी ने जवाब दिया- उसे माँ प्राण दंड मिलना चाहिए।_

🚩देवी अहिल्यावाई ने मालोराव को हाथ-पैर बाँध कर मार्ग पर डालने के लिए कहा
और
फिर उन्होंने आदेश दिया मालोजी को मृत्यु दंड़ रथ से टकराकर दिया जाए।

🚩यह कार्य कोई भी सारथी करने को तैयार न था। देवी अहिल्यावाई न्यायप्रिय थी।

अत: वे स्वयं ही माँ होते हुए भी इस कार्य को करने के लिए भी रथ पर सवार हो गईं।

🚩वे रथ को लेकर
आगे बढ़ी ही थीं
कि तभी एक अप्रत्यासित घटना घटी।
‘वही गाय’
फिर रथ के सामने आकर खड़ी हो गई,

उसे जितनी बार हटाया जाता उतनी बार पुन: अहिल्यावाई के रथ के सामने आकर खड़ी हो जाती।

🚩यह द़ृश्य देखकर
मंत्री परिषद् ने देवी अहिल्यावाई से मालोजी को क्षमा करने की प्रार्थना की,
जिसका आधार उस गाय का व्यवहार बना।

🚩उस तरह गाय ने स्वयं पीड़ित होते हुए भी मालोजी को द्रौपदी की तरह क्षमा करके
उनके जीवन की रक्षा की।

🚩इन्दौर में
जिस जगह यह घटना घटी थी,
वह स्थान आज भी गाय के आड़ा होने के कारण
‘आड़ा बाजार’
के नाम से जाना जाता है।
उसी स्थान पर गाय ने अड़कर दूसरे की रक्षा की थी।✔

‘अक्रोध से क्रोध का, प्रेम से घृणा का और क्षमा से प्रतिशोध की भावना का शमन होता है’

भारतीय ऋषियों ने यूँ ही गाय को माँ नहीं कहा है, बल्कि इसके पीछे गाय का ममत्वपूर्ण व्यवहार, मानव जीवन में, कृषि में गाय की उपयोगिता बड़ा आधारभूत कारण है। गौसंवर्धन करना हर भारतीय का संवैधानिक कर्तव्य भी है।

मोहनलाल जैन

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. “गो-महिमा” एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा- नाथ! आपने बताया है कि ब्राह्मण की उत्पत्ति भगवान् के मुख से हुई है; फिर गौओं की उससे तुलना कैसे हो सकती है ? विधाता! इस विषय को लेकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। ब्रह्माजी ने कहा- बेटा! पहले भगवान् के मुख से महान् तेजोमय पुंज प्रकट हुआ। उस तेज से सर्व प्रथम वेद की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् क्रमशः अग्नि, गौ और ब्राह्मण-ये पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुए। मैंने सम्पूर्ण लोकों और भुवनों की रक्षा के लिये पूर्वकाल में एक वेद से चारों वेदों का विस्तार किया। अग्नि और ब्राह्मण देवताओं के लिये हविष्य ग्रहण करते हैं और हविष्य (घी) गौओं से उत्पन्न होता है; इसलिये ये चारों ही इस जगत् के जन्मदाता हैं। यदि ये चारों महत्तर पदार्थ विश्व में नहीं होते तो यह सारा चराचर जगत् नष्ट हो जाता। ये ही सदा जगत् को धारण किये रहते हैं, जिससे स्वभावत: इसकी स्थिति बनी रहती है। ब्राह्मण, देवता तथा असुरों को भी गौ की पूजा करनी चाहिये; क्योंकि गौ सब कार्यों में उदार तथा वास्तव में समस्त गुणों की खान है। वह साक्षात् सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप है। सब प्राणियों पर उसकी दया बनी रहती है। प्राचीन काल में सबके पोषण के लिये मैंने गौ की सृष्टि की थी। गौओं की प्रत्येक वस्तु पावन है। और समस्त संसार को पवित्र कर देती है। गौ का मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी-इन पंचगव्यों का पान कर लेने पर शरीर के भीतर पाप नहीं ठहरता। इसलिये धार्मिक पुरुष प्रतिदिन गौ के दूध, दही और घी खाया करते हैं। गव्य पदार्थ सम्पूर्ण द्रव्यों में श्रेष्ठ, शुभ और प्रिय हैं। जिसको गायका दूध, दही और घी खाने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होता, उसका शरीर मल के समान है। अन्न आदि पाँच रात्रि तक, दूध सात रात्रि तक, दही दस रात्रि तक और घी एक मास तक शरीर में अपना प्रभाव रखती है। जो लगातार एक मास तक बिना गव्य का भोजन करता है, उस मनुष्य के भोजन में प्रेतों को भाग मिलता है, इसलिये प्रत्येक युग में सब कार्यों के लिये एकमात्र गौ ही प्रशस्त मानी गयी है। गौ सदा और सब समय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चारों पुरुषार्थ प्रदान करनेवाली है। जो गौ की एक बार प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग का सुख भोगता है। जैसे देवताओं के आचार्य बृहस्पतिजी वन्दनीय हैं, जिस प्रकार भगवान् लक्ष्मीपति सबके पूज्य हैं, उसी प्रकार गौ भी वन्दनीय और पूजनीय है। जो मनुष्य प्रात:काल उठकर गौ और उसके घी का स्पर्श करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। गौएँ दूध और घी प्रदान करने वाली हैं। वे घृत की उत्पत्ति-स्थान और घी की उत्पत्ति में कारण हैं। वे घी की नदियाँ हैं, उनमें घी की भँवरें उठती हैं ऐसी गौएँ सदा मेरे घर पर मौजूद रहें घी मेरे सम्पूर्ण शरीर और मन में स्थित हो। 'गौएँ सदा मेरे आगे रहें। वे ही मेरे पीछे रहें। मेरे सब अंगों को गौओं का स्पर्श प्राप्त हो। मैं गौओं के बीच में निवास करूँ।' इस मन्त्र को प्रतिदिन सन्ध्या और सबेरे के समय शुद्ध भाव से आचमन करके जपना चाहिये। ऐसा करने से उसके सब पापों का क्षय हो जाता है तथा वह स्वर्गलोक में पूजित होता है। जैसे गौ आदरणीय है, वैसे ब्राह्मण; जैसे ब्राह्मण हैं वैसे भगवान् विष्णु। जैसे भगवान् श्रीविष्णु हैं, वैसी ही श्रीगंगाजी भी हैं। ये सभी धर्म के साक्षात् स्वरूप माने गये हैं । गौएँ मनुष्यों की बन्धु हैं और मनुष्य गौओं के बन्धु हैं। जिस घर में गौ नहीं है, वह बन्धु रहित गृह है। छहों अंगों, पदों और क्रमों सहित सम्पूर्ण वेद गौओं के मुख में निवास करते हैं। उनके सींगों में भगवान् श्रीशंकर और श्रीविष्णु सदा विराजमान रहते हैं । गौओं के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में ब्रह्मा, ललाट में महादेवजी, सींगों के अग्रभाग में इन्द्र, दोनों कानों में अश्विवनीकुमार, नेत्रों में चन्द्रमा और सूर्य, दाँतों में गरुड़, जिह्वा में सरस्वती देवी, अपान (गुदा)-में सम्पूर्ण तीर्थ, मूत्रस्थान में गंगाजी, रोमकूपों में ऋषि, मुख और पृष्ठभाग में यमराज, दक्षिण पार्श्व में वरुण और कुबेर, वाम पाश्र्व में तेजस्वी और महाबली यक्ष, मुख के भीतर गन्धर्व, नासिका के अग्रभाग में सर्प, खुरों के पिछले भाग में अप्सराएँ, गोबर में लक्ष्म, गोमूत्र में पार्वती, चरणों के अग्रभाग में आकाशचारी देवता, रँभाने की आवाज में प्रजापति और थनों में भरे हुए चारों समुद्र निवास करते हैं। जो प्रतिदिन स्नान करके गौ का स्पर्श करता है, वह मनुष्य सब प्रकार के स्थूल पापों से भी मुक्त हो जाता है। जो गौओं के खुर से उड़ी हुई धूल को सिर पर धारण करता है, वह मानों तीर्थ के जल में स्नान कर लेता है और सब पापों से छुटकारा पा जाता। ---------:::×:::---------- "ॐ श्री सुरभ्यै नम:"


गौरव गुप्ता

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नीचे तस्वीर में जिस व्यक्ति को देख रहे हैं वह है अभिनव गोस्वामी

अमेरिका में करोड़ों का वेतन नहीं आया रास,
गांव में खोली गौशाला

एक करोड़ 95 लाख रुपये सालाना के पैकेज पर प्रतिष्ठित एप्पल कंपनी की नौकरी छोड़ अमेरिका के ग्रीन कार्ड से मोह त्याग जिले की खैर तहसील स्थित पैतृक गांव जरारा में गोशाला खोली। इसके साथ जैविक खेती को आगे बढ़ाया और अब 200 बच्चों के लिए एक आवासीय गुरुकुल खोल कर नि:शुल्क शिक्षा देने की तैयारी है।

जहां संस्कृत को मूल विषय बना कर बच्चों को वेद पुराण की तार्किक वैज्ञानिक शिक्षा से जोड़ा जाएगा। ये शानदार पहल की है डाटा साइंटिस्ट अभिनव गोस्वामी ने। वे यहां ऐसा माडल तैयार कर रहे हैं, जो ग्रामीण जीवन को स्वावलंबी बनाकर खुशहाली लाएगा। इस काम में उन्हें अपने परिजनों का पूरा सहयोग मिल रहा है।
अभिनव पूरी दुनिया में ऐसे ही 108 गुरुकुल बनाना चाहते हैं, जहां जैविक खेती और गोशाला के बीच संस्कृत के साथ-साथ आधुनिक विषयों की पढ़ाई होगी। यहां बच्चे रटेंगे नहीं, प्रत्यक्ष देख कर समझेंगे। मसलन, अगर तारामंडल पढ़ाया जा रहा है तो यह दूरबीनों से मौके पर ही दिखाया भी जाएगा। यहां बच्चों को अपने जीवन की दिशा तय करने की शिक्षा दी जाएगी ताकि वह अपने गांव में रह कर ही अपनी रुचि के अनुसार स्वावलंबी बनें।

पूरा प्रोजेक्ट लगभग 12 करोड़ रुपये का

इस गुरुकुल में दुनिया की अलग अलग प्रतिष्ठित कंपनियों में काम करने वाले दिग्गज इंजीनियर और विषय विशेषज्ञ गेस्ट फैकल्टी रहेंगे। इसमें बच्चे का चयन उसकी किसी एक खास अच्छी आदत पर आधारित होगा, जो प्रवेश के दौरान मौके पर परखी जाएगी। अभिनव बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट में अब तक वह अपनी कमाई के ढाई करोड़ रुपये खर्च कर चुके हैं। पूरा प्रोजेक्ट लगभग 12 करोड़ रुपये का होगा। निर्माण पूरा होने के बाद जैविक खेती, दुग्ध उत्पाद, शहद, पॉलीहाउस में संरक्षित खेती और जैविक खाद से होने वाली आय से गुरुकुल संचालित होगा। इससे इतनी आय होगी कि किसी से कुछ मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

गोस्वामी ने बताया कि अमेरिका के कैलीफोर्निया में मकान लेने के दौरान रामायण का अंखड पाठ शुरू कराया। इसी दौरान विदेश के वैभव से विरक्ति हो गई। पत्नी प्रतिभा और दोनों बच्चों को समझाया तो सब राजी हो गए। जब अभिनव लौटे तो छोटे भाई जगदीश गोस्वामी भी मुंबई की चकाचौंध से वापस आ गए। वह टीवी सीरियलों में बतौर कास्टिंग डायरेक्टर काम कर रहे थे। दो भाइयों की लगन को देख कर चचेरे भाई इंजीनियर प्रतीक गिरि ने टाटा स्टील की नौकरी छोड़ी और पूरे प्रोजेक्ट की सोलर लाइट डिजाइन की।
ऐसा है गुरुकुल का डिजाइन

  • 500 बीघा में जैविक खेती आसपास के किसानों को जोड़ कर, अभी 100 बीघा में हो रही।
  • 20 बीघा में गुरुकुल और आवासीय भवन का निर्माण। ये काम अप्रैल के बाद शुरू हो जाएगा।
  • 60 बीघा में गोशाला और कारपोरेट आफिस का निर्माण। निर्माण कार्य जारी, एक महीने में पूरा होगा।
  • 140 घन मीटर की क्षमता का गोबर गैस प्लांट है, सरकार से घरेलू गैस सिलेंडर भरने की अनुमति मांगी है।

जरारा गांव से अमेरिका तक का सफर
वर्ष 1992 में खैर इंटर कालेज से इंटरमीडिएट,1995 में एएमयू से बीएससी आनर्स स्टैटिक्स, 1997 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से एमएससी, इसके बाद पीएचडी शुरू करते ही अभिनव को जीई कैपिटल सर्विस में नौकरी मिल गई। इसके बाद फ्रैंकलिन टेम्पेल्टन और फिर आईक्योर में नौकरी मिली।

इसी कंपनी ने वर्ष 2007 में अमेरिका बुला लिया। वहां रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड में काम करने के बाद वर्ष 2013 में एप्पल कंपनी में डाटा साइंटिस्ट बन गए। वर्ष 2017 में कैलीफोर्निया में रहने के दौरान नौकरी छोड़ दी। उस वक्त वह तीन लाख डॉलर सालाना के पैकेज पर थे, जो भारतीय मुद्रा में लगभग एक करोड़ 95 लाख रुपये होते हैं।

अभिनव गोस्वामी ने हर बात में सरकार को कोस-कोस कर समाज हितैषी होने का ढोंग नहीं किया, समाज को बदलने के लिए खुद को दांव पर लगाया, खुद बड़ी नौकरी व सारी सुविधाएं त्याग कर जमीन पर उतरे। समाज ऐसे लोगों से बनता और बदलता है। 2014 के बाद ऐसे लोगों ने समाज को बदलने के लिए अपनी-अपनी तरह से बीड़ा उठा रखा है। यह देश हम सबका है, और इसे स्वर्णिम बनाना हम सबकी जिम्मेदारी है

सोर्स अमर उजाला

पृथ्वीराजसनातन