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ओ३म्

“गाय का दुग्ध एवं इससे बने पदार्थ स्वस्थ जीवन का आधार हैं”

परमात्मा ने इस सृष्टि को जीवात्माओं के सुख आदि भोग व अपवर्ग के लिए बनाया है। सृष्टि को बनाकर परमात्मा जीवों को उनके कर्मों का भोग कराने के लिये जन्म देता व उनका माता-पिता व भूमि माता के द्वारा पालन कराता है। परमात्मा ने मनुष्य जीवन को उत्तम, श्रेष्ठ व महान बनाने के लिये ज्ञान सहित अन्न, दुग्ध व ओषधि आदि पदार्थ प्रचुर मात्रा में संसार में बनाये व उपलब्ध करा रखे हैं। परमात्मा ने सृष्टि को उत्पन्न कर आदि काल में सभी प्राणियों की अमैथुनी सृष्टि की थी। संसार, वनस्पति जगत तथा इतर प्राणी जगत के अस्तित्व में आने के बाद परमात्मा ने मनुष्यादि की अमैथुनी सृष्टि की थी। परमात्मा ने मनुष्यों को धर्म व अधर्म अथवा कर्तव्य व अकर्तव्य का बोध कराने के लिए उन्हें सभी सत्य विद्याओं का ज्ञान चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद चार ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा के द्वारा उपलब्ध कराये थे। हम आज जो भी भाषा बोलते हैं वह सब भाषायें वेदों की भाषा संस्कृत से ही समय के साथ अपभ्रंसों, उच्चारण के विकारों तथा भौगोलिक आदि कारणों से बनी हैं। परमात्मा की अपनी भाषा संस्कृत है जिसमें उसने चार वेदों का ज्ञान दिया है। वेदों की संस्कृत भाषा से श्रेष्ठ अन्य कोई भाषा नहीं है यदि होती तो परमात्मा उसी भाषा में ज्ञान देता। आज भी विद्वान इस बात को सिद्ध करते हैं कि संस्कृत भाषा ही आज भी विश्व की श्रेष्ठतम भाषा है।

ईश्वरीय ज्ञान वेदों का अध्ययन कर व वेद ज्ञान को ग्रहण कर मनुष्य अपने मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकता है। इस जीवन को महान तथा दूसरों के लिए लाभकारी व हितकर बना सकता है। इन वेदों के अध्ययन से ही हमारे देश में महान मनुष्य जिन्हें ऋषि कहा जाता है, उनकी परम्परा व श्रृंखला चली जो सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न होकर महाभारत के कुछ काल बाद ऋषि जैमिनी पर समाप्त हुई। हमारे सभी ऋषि महान थे। ब्रह्मा, मनु, यज्ञावलक्य, पतंजलि, गौतम, कपिल, कणाद, जैमिनी, बाल्मीकि, वेद व्यास, महर्षि जैमिनी तथा महर्षि दयानन्द सभी महान पुरुष थे। वैदिक संस्कृति को ही पूर्णतया अपनाकर राम, कृष्ण, लक्ष्मण, भरत, युधिष्ठिर, विदुर, चाणक्य आदि भी महान पुरुष बने। इन महापुरुषों के समान महापुरुष संसार में कहीं उत्पन्न नहीं हुए हैं। हमारा सौभाग्य है कि आज भी सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान हमें सुलभ है। हम इसका अध्ययन कर तथा इसे आचरण में लाकर महानता को प्राप्त हो सकते हैं। सभी मनुष्यों के लिए महान बनने के द्वार वेदों ने खोले हुए हैं। ऋषि दयानन्द सरस्वती जी का सत्यार्थप्रकाश एवं इतर सभी ग्रन्थ मनुष्य को महान बनाने सहित उसे देश व समाज का एक आदर्श पुरुष व नागरिक बनाने में सहायक होते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमात्मा के उत्पन्न किए गये सभी मनुष्यों को देश, काल, जाति, सम्प्रदाय आदि से ऊपर उठकर वेदों को ही जीवन में अपनाना चाहिये। इसी में समस्त मानव जाति का कल्याण निहित है।

परमात्मा ने मनुष्यों की प्रमुख आवश्यकता ज्ञान को ही सृष्टि के आरम्भ में प्रदान नहीं किया अपितु वह मनुष्यों के शरीर निर्माण व बल प्राप्ति के साधन अन्न, ओषधि, फल व दुग्ध आदि को भी सृष्टि के आरम्भ से उत्पन्न कर रहा है। इन सभी पदार्थों का अपना अपना महत्व है। दुग्ध का भी अपना महत्व है। मनुष्य जीवन के निर्माण में माता के दुग्ध के बाद जो सर्वोत्तम दुग्ध होता जिसे शिशु जन्म काल से आरम्भ कर मृत्यु पर्यन्त सेवन करता है वह गोदुग्ध होता है। गोदुग्ध पूर्ण आहार होता है। इसका सेवन कर मनुष्य ज्ञान व बल से युक्त दीर्घ आयु को प्राप्त होकर निरोग व स्वस्थ रहते हुए अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत कर सकता है और जीवन के उद्देश्य भोग व अपवर्ग को प्राप्त कर सकता है। गोदुग्ध सभी पशुओं के दुग्ध में गुणों की दृष्टि से सर्वोत्तम होता है। इसी कारण हमारे शास्त्रों में गो की स्तुति में अनेक मार्मिक एवं प्रेरक वचन पढ़ने को मिलते हैं। गो विश्व की माता है। गोदुग्ध अमृत है। गो विश्व की नाभि है। गो का आदर व पालन करें। ऐसे अनेक वचन वेदों व वेदानुकूल ग्रन्थों में ऋषियों ने हमें बताये हैं। गोपालन से मनुष्य सत्कर्मों का संचय करता है जिससे उसे जन्म जन्मान्तर में सुख व भोग प्राप्त होते हैं। गो पूर्ण शाकाहारी पशु है। उसने हमारे पूर्वजों सहित हमारा व हमारी सन्तानों का माता के समान पालन किया है। आज भी छोटे बच्चे गोदुग्ध पीकर ही अपने शरीर की उन्नति व बल की वृद्धि करते हैं। गोदुग्ध का सेवन विद्या प्राप्ति में भी सहायक होता है। गोदुग्ध का पान करने से मनुष्य की बुद्धि कठिन व जटिल विषयों को भी सरलता से समझने की सामथ्र्य को प्राप्त होती है। अतः संसार के सभी मनुष्यों को गोरक्षा करने हेतु गोपालन करना चाहिये और अपने आहार व भोजन में गोदुग्ध व इससे बने नाना प्रकार के पदार्थ दधि, मक्खन, घृत, छाछ आदि का सेवन करना चाहिये। गो के सभी पदार्थ उत्तम गुणों से युक्त हैं। गो का गोबर भी ईधन के काम आता है तथा कृषि कार्यों में भी यह उत्तम खाद होता है जिससे हमें विषमुक्त अन्न प्राप्त होता है। गोमूत्र भी एक ओषधि होता है जिससे हमें अनेक रोगों यहां तक की कैंसर के उपचार में भी लाभ होता है। अतः गो माता को किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं देना चाहिये। गो के प्रति माता का भाव होना चाहिये। हमें उससे प्रेम करना चाहिये और उसे समय समय पर यथाशक्ति चारा आदि खिलाते रहना चाहिये। ऐसा करने पर ही हम राम व कृष्ण सहित ऋषियों के वंशज तथा गो भक्त कहला सकेंगे।

ऋषि दयानन्द ने गोमाता की करुण पुकार को सुनकर गोरक्षा हेतु गोकरुणानिधि नाम से एक लघु ग्रन्थ लिखा है। इस ग्रन्थ में गो संबंधी अनेक महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डाला है। हम इस ग्रन्थ से उनके कुछ वचन प्रस्तुत कर रहे हैं। ग्रन्थ की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि वे धर्मात्मा विद्वान लोग धन्य हैं, जो ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव, अभिप्राय, सृष्टि-क्रम, प्रत्यक्षादि प्रमाण और आप्तों के आचार से अविरुद्ध चल के सब संसार को सुख पहुंचाते हैं और शोक है उन पर जो कि इनसे विरुद्ध स्वार्थी, दयाहीन होकर जगत् की हानि करने के लिए वर्तमान हैं। पूजनीय जन वो हैं जो अपनी हानि हो तो भी सबका हित करने में अपना तन, मन, धन सब कुछ लगाते हैं और तिरस्करणीय वे हैं जो अपने ही लाभ में सन्तुष्ट रहकर अन्य के सुखों का नाश करते हैं। वह आगे लिखते हैं कि सृष्टि में ऐसा कोन मनुष्य होगा जो सुख और दुःख को स्वयं न मानता हो? क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है कि जिसके गले को काटे वा रक्षा करें, वह दुःख और सुख को अनुभव न करे? जब सबको लाभ और सुख ही में प्रसन्नता है, तब बिना अपराध किसी प्राणी को प्राण वियोग करके अपना पोषण करना सत्पुरुषों के सामने निन्द्य कर्म क्यों न होवे? सर्वशक्मिान् जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों के आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करे कि जिससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रिया की सिद्धि से युक्त होकर सब मनुष्य आनन्द में रहें। इसी पुस्तक में ऋषि दयानन्द ने गणित की रीति से गणना कर बताया है कि एक गाय की एक पीढ़ी के दुग्ध से 1,54,440 मनुष्य एक बार में तृप्त हो सकते हैं। इसी प्रकार एक गाय की एक पीढ़ी में जो बछड़े होते हैं उनसे जो अन्न उत्पन्न किया जाता है उससे भी गणना करने पर 2.56,000 लोगों का एक बार का भोजन हो सकता है। इस प्रकार एक गाय की एक पीढ़ी से ही एक समय में 4,10,440 मनुष्य क्षुधा निवृत्ति व भोजन को प्राप्त हो सकते हैं। इस कारण से जो मनुष्य गाय की हत्या कर उनका मांस खाते हैं वह उस गाय से होने वाले लाभों को अन्य मनुष्यों को वंचित करने से अज्ञानी व पाप करने वाले मनुष्य सिद्ध होते हैं।

ऋषि दयानन्द ने गोरक्षा, गोपालन व गोहत्या रोकने के लिए गाय के प्रति कुछ मार्मिक वचन भी कहें हैं। उन्होंने लिखा है कि देखिए, जो पशु निःसार घास-तृण, पत्ते, फल-फूल आदि खावें और दूध आदि अमृतरूपी रत्न देवें, हल गाड़ी आदि में चलके अनेकविध अन्न आदि उत्पन्न कर, सबके बुद्धि, बल, पराक्रम को बढ़ाके नीरोगता करें, पुत्र-पुत्री ओर मित्र आदि के समान मनुष्यों के साथ विश्वास और प्रेम करें, जहां बांधे वहां बंधे रहें, जिधर चलावें उधर चलें, जहां से हटावें वहां से हट जावें, देखने और बुलाने पर समीप चले आवें, जब कभी व्याघ्रादि पशु वा मारनेवाले को देखें, अपनी रक्षा के लिए पालन करनेवाले के समीप दौड़ कर आवें कि यह हमारी रक्षा करेगा। जिसके मरे पर चमड़ा भी कण्टक आदि से रक्षा करे, जंगल में चरके अपने बच्चे और स्वामी के लिए दूध देने के नियत स्थान पर नियत समय पर चलें आवें, अपने स्वामी की रक्षा के लिए तन-मन लगावें, जिनका सर्वस्व राजा और प्रजा आदि मनुष्य के सुख के लिए है, इत्यादि शुभगुणयुक्त, सुखकारक पशुओं के गले छुरों से काटकर जो मनुष्य अपना पेट भर, सब संसार की हानि करते हैं, क्या संसार में उनसे भी अधिक कोई विश्वासघाती, अनुपकारक, दुःख देनेेवाले और पापी मनुष्य होंगे? इन शब्दों को पढ़कर भी यदि कोई मनुष्य गो व इतर पशुओं का मांस खाना नहीं छोड़ता तो उसे निबुद्धि मनुष्य ही कहा जा सकता है।

परमात्मा ने गाय को मनुष्य को दुग्ध पान कराने सहित कृषि कार्यों में सहायक करने के लिए बनाया है, मांसाहार के लिए नहीं। अतः सभी सरकारों, मनुष्यों व धर्म-मत व सम्प्रदायों को गोरक्षा पर ध्यान देना चाहिये तथा गोहत्या न केवल भारत अपितु पूरे विश्व में सर्वथा बन्द होनी चाहिये।

-मनमोहन कुमार आर्य

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” उरुग्वे ” एक ऐसा देश है , जिसमे औसतन हर एक आदमी के पास 4 गायें हैं


” उरुग्वे “ एक ऐसा देश है , जिसमे औसतन हर एक आदमी के पास 4 गायें हैं … और
पूरे विश्व में वो खेती के मामले में नम्बर वन की पोजीशन में है …
सिर्फ 33 लाख लोगों का देश है और 1 करोड़ 20 लाख 🐄 गायें है …
हर एक 🐄 गाय के कान पर इलेक्ट्रॉनिक 📼 चिप लगा रखी है …
जिससे कौन सी 🐄 गाय कहाँ पर है , वो देखते – रहते हैं …
एक किसान मशीन के अन्दर बैठा , फसल कटाई कर रहा है , तो दूसरा उसे स्क्रीन पर जोड़ता है , कि फसल का डाटा क्या है … ???
इकठ्ठा किये हुये डाटा के जरिए , किसान प्रति वर्ग मीटर की पैदावार का स्वयं विश्लेषण करता हैं …
2005 में 33 लाख लोगों का देश , 90 लाख लोगों के लिए अनाज पैदा करता था … और …
आज की तारीख में 2 करोड़ 80 लाख लोगों के लिये अनाज पैदा करता है …
” उरुग्वे “ के सफल प्रदर्शन के पीछे देश , किसानों और पशुपालकों का दशकों का अध्ययन शामिल है …
पूरी खेती को देखने के लिए 500 कृषि इंजीनियर लगाए गए हैं और ये लोग ड्रोन और सैटेलाइट से किसानों पर नजर रखते हैं , कि खेती का वही तरीका अपनाएँ जो निर्धारित है …
यानि ” दूध , दही , घी , मक्खन “ के साथ आबादी से कई गुना ज्यादा अनाज उत्पादन …
” सब अनाज , दूध , दही , घी , मक्खन , आराम से निर्यात होते हैं और हर किसान लाखों में कमाता है … “
एक आदमी की कम से कम आय 1,25,000/= महीने की है l
” इस देश का राष्ट्रीय चिन्ह सूर्य 🌞 व राष्ट्रीय प्रगति चिन्ह गाय 🐄 व घोड़ा 🐎 हैं … “
” उरूग्वे में गाय 🐄 की हत्या पर तत्काल फाँसी का कानून है … “
🐄🐎🌞 🐄🐎🌞 🐄🐎🌞
” धन्यवाद है , इस गौ – प्रेमी देश को … “
मुख्य बात यह है , ” कि ये सभी गो – धन भारतीय हैं … “
जिसे वहाँ ” इण्डियन काउ “ के तौर पर जानते हैं …
” दु:ख इस बात का है , कि भारत में गो – हत्या होती है और वहाँ उरुग्वे में गो – हत्या पर मृत्युदण्ड का प्रावधान है … “
” क्या हम इस कृषक राष्ट्र उरुग्वे से कुछ सीख सकते हैं … ??? “

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ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र में गौ (गाय) की महिमा
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1👉 ज्योतिषमें गोधूलिका समय विवाहके लिये
सर्वोत्तम माना गया है।

2👉 यदि यात्रा के प्रारम्भ में गाय सामने पड़ जाय अथवा अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई सामने पड़ जाय तो यात्रा सफल होती है।

3👉 जिस घर में गाय होती है, उसमें वास्तुदोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

4 👉 जन्मपत्री में यदि शुक्र अपनी नीचराशि कन्या पर हो, शुक्र की दशा चल रही हो या शुक्र अशुभ भाव (6,8,12)-में स्थित हो तो प्रात:काल के भोजन में से एक
रोटी सफेद रंग की गाय को खिलाने से शुक्र का नीचत्व एवं शुक्र सम्बन्धी कुदोष स्वत: ही समाप्त हो जाता है।

5👉 पितृदोष से मुक्ति👉 सूर्य, चन्द्र, मंगल या शुक्र की युति राहु से हो तो पितृदोष होता है। यह भी मान्यता है कि सूर्य का सम्बन्ध पिता से एवं मंगल का सम्बन्ध रक्त से होने के कारण सूर्य यदि शनि, राहु या केतु के साथ स्थित हो या दृष्टि सम्बन्ध हो तथा मंगल की युति राहु या केतु से हो तो पितृदोष होता है। इस दोष से जीवन संघर्षमय बन जाता है। यदि पितृदोष हो तो गाय को प्रतिदिन या
अमावास्या को रोटी, गुड़, चारा आदि खिलाने से पितृदोष समाप्त हो जाता है।

6👉 किसी की जन्मपत्री में सूर्य नीचराशि तुला पर हो या अशुभ स्थिति में हो अथवा केतु के द्वारा परेशानियाँ आ रही हों तो गाय में सूर्य-केतु नाडी में होने के फलस्वरूप
गाय की पूजा करनी चाहिये, दोष समाप्त होंगे।

7👉 यदि रास्ते में जाते समय गोमाता आती हुई दिखायी दें तो उन्हें अपने दाहिने से जाने देना चाहिये, यात्रा सफल होगी।

8👉 यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गो
माताका नाम ले, बुरे स्वप्न दिखने बन्द हो जायेंगे।

9👉 गाय के घी का एक नाम आयु भी है-‘आयई घृतम्’। अत: गाय के दूध-घी से व्यक्ति दीर्घायु होता है। हस्तरेखा में आयु रेखा टूटी हुई हो तो गायका घी काम में
लें तथा गाय की पूजा करें।

11👉 देशी गाय की पीठ पर जो ककुद् (कूबड़) होता है, वह ‘बृहस्पति’ है। अत: जन्मपत्रिका में यदि बृहस्पति अपनी नीच राशि मकर में हों या अशुभ स्थिति हों तो देशी गाय के इस बृहस्पति भाग एवं शिवलिंग रूपी ककुद् के दर्शन करने चाहिये। गुड़ तथा चने की दाल रखकर गाय को रोटी भी दें।

👉 गोमाता के नेत्रों में प्रकाश स्वरूप भगवान् सुर्य तथा ज्योत्स्ना के अधिष्ठाता चन्द्रदेव का निवास होता है। जन्म पत्री में सूर्य-चन्द्र कमजोर हो तो गोनेत्र के दर्शन करें, लाभ होगा।

वास्तुदोषों का निवारण भी करती है गाय
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जिस स्थान पर भवन, घर का निर्माण करना हो, यदि वहाँ पर बछड़े वाली गाय को लाकर बाँधा जाय तो वहाँ सम्भावित वास्तु दोषों का स्वत: निवारण हो जाता
है, कार्य निर्विघ्न पूरा होता है और समापन तक आर्थिक बाधाएँ नहीं आतीं।
गाय के प्रति भारतीय आस्था को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि गाय सहज रूप से भारतीय जनमानस में रची-बसी है। गोसेवा को एक कर्तव्य के रूप में माना गया है। गाय सृष्टि मातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिये निवेदन के प्रसंग पुराणों में बहुत प्रसिद्ध हैं। ‘समरांगणसूत्रधार’-जैसा प्रसिद्ध बृहद्वास्तुग्रन्थ गोरूप में पृथ्वी-ब्रह्मादि के समागम-संवाद से ही आरम्भ होता है।

वास्तुग्रन्थ ‘मयमतम्’ में कहा गया है कि भवन निर्माणका शुभारम्भ करनेसे पूर्व उस भूमि पर ऐसी गाय को लाकर बाँधना चाहिये, जो सवत्सा (बछड़ेवाली) हो। नवजात बछडे को जब गाय दुलारकर चाटती है तो उसका फेन भूमिपर गिरकर उसे पवित्र बनाता है और वो समस्त दोषों का निवारण हो जाता है। यही वास्तुप्रदीप, अपराजितपृच्छा आदि ग्रन्थों में का
महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि गाय जहां बैठकर निर्भयता पूर्वक सांस लेती है तो उस स्थान के सारे पापों को खींच लेती है।

निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भयम।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति ।।

यह भी कहा गया है कि जिस घर में गाय की सेवा होती है, वहाँ पुत्र-पौत्र, धन, विद्या आदि सुख जो भी चाहिये, मिल जाता है। यही मान्यता अत्रिसंहिता में भी आयी है। महर्षि अत्रि ने तो यह भी कहा है कि जिस
घर में सवत्सा धेनु नहीं हो, उसका मंगल-मांगल्य कैसे
होगा?

गाय का घर में पालन करना बहुत लाभकारी है। इससे घरों में सर्वबाधाओं और विघ्नों का निवारण हो जाता है। बच्चों में भय नहीं रहता। विष्णुपुराण में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण पूतना के दुग्धपान से डर गये तो नन्द-दम्पती ने गाय की पूँछ घुमाकर उनकी नजर उतारी और भयका निवारण किया। सवत्सा गाय के शकुन
लेकर यात्रा में जाने से कार्य सिद्ध होता है।

पद्मपुराण और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लाँघकर नहीं जाना चाहिये। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिये जाते समय गाय के रँभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान-लाभ के लिये गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है।

शिवपुराण एवं स्कन्दपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पाँवकी धूलिका भी अपना महत्त्व है। यह पापविनाशक है, ऐसा
गरुडपुराण और पद्मपुराण का मत है। ज्योतिष एवं धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि गोधूलि वेला विवाहादि मंगलकार्यों के लिये सर्वोत्तम मुहूर्त है। जब गायें जंगल से
चरकर वापस घर को आती हैं, उस समयको गोधूलि वेला कहा जाता है। गायके खुरों से उठने वाली धूलराशि। समस्त पाप-तापों को दूर करनेवाली है। पंचगव्य एवं पंचामृत की महिमा तो सर्वविदित है ही। गोदान की महिमा से कौन अपरिचित है ! ग्रहों के अरिष्ट-निवारण के
लिये गोग्रास देने तथा गौ के दान की विधि ज्योतिष-ग्रन्थों में विस्तार से निरूपित है। इस प्रकार गाय सर्वविध कल्याणकारी ही है।

पं देवशर्मा
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Posted in गौ माता - Gau maata, छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“गाय का झूठा गुड़”

एक शादी के निमंत्रण पर जाना था, पर मैं जाना नहीं चाहता था।

एक व्यस्त होने का बहाना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना..लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना पड़ा।

उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने बाली रोड़ पर बैठा हुआ था, हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था , पास के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी कि तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी,

और उसमें से एक वृद्ध उतरे,अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।

वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये, पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था, अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया, सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बाद बच्चे अपने मांबाप को घेर लेते हैं, कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी, वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।

कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता,

हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे,मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।

मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला श्रीमानजी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का झूठा गुड क्यों खाया ??

उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।

जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।

मैं अब भी नहीं समझा श्री मान जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???

वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।

तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था,मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये।

मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।

शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय।

कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया। *और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।*

इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था,

मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया,

शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका झूँठा गुड़ खाता हूँ,

मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ , परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।

मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम,

मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई ,मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला वापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।

सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।

उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि…..,

गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है, जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है।

ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।

🕉️🌹जै श्री परशुराम 👏🙏 🕉️ जय गौ माता की 🕉️

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⛳सनातन-धर्म की जय,हिंदू ही सनातनी है✍🏻
👉🏻लेख क्र.- सधस/२०७७/श्रा./कृ/१३ – ९८०
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⚜️गौरक्षा एवम् गौसंवर्धन⚜️

⛳🙏🏻शिवाजी महाराज के बाल्यकाल की घटना है। अपने पिता के साथ वे बादशाह के यहाँ जा रहे थे। बीजापुर की बात है। रास्ते में एक कसाई गाय🐄 को घसीटते हुए ले जा रहा था😢🤚🏻 और वहाँ के बाजार के जो हिन्दू थे, वे सिर झुका करके बैठे थे।😢 मुगलशासन था, कौन क्या कर सकता था ? उस समय शिवाजी की उम्र दस वर्ष की भी नहीं थी, नौ-दस के बीच की रही होगी । बालक शिवाजी ने तलवार🗡️ खींची और पहले तो गाय 🐄की रस्सी काटकर उसे बन्धनमुक्त कर दिया और वह कसाई कुछ कहे, इससे पहले ही उसके मस्तक को धड़ से अलग कर दिया😳😊👌🏻–यह है शौर्य ⛳।🤚🏻😊✔️
👉🏻प्राचीन समय में इतनी बड़ी संख्या में गोधन हमारे देश में था कि जब ग्वारिया गायों 🐄को लेकर आते तो गायों के खुरों से इतनी रज उड़ती थी कि दिन में ही सूर्यास्त का अनुभव होता।😳✔️ महाभारत के ‘अनुशासन-पर्व ‘ में आता है कि धर्मराज युधिष्ठिर के यहाँ दस हजार गोसदन थे–गौवर्ग थे, तो वर्ग क्या है ? एक वर्ग में ८ लाख गायें थीं।😳😳✔️ इससे लगता है कि जनसंख्या कम थी, गायें ज्यादा थीं। आगे फिर लिखा है कि एक लाख, दो लाख पचास हजार, तीन लाखके गोसदन तो अनेक थे।✔️😳

वर्तमान में जो गाय🐄 के विरोधी हैं, वे भगवान्‌, धर्म, गुरु और वेद–इन सबके विरोधी हैं।✔️ हमारा चाहे जैसा स्वार्थ हो, लेकिन हमें गाय 🐄का विरोध करने वाले के पक्ष में जाकर खड़ा नहीं होना चाहिये, चाहे जैसा पद- प्रतिष्ठा का लालच हो, ऐसे लोगों को अपना मत भी नहीं देना चाहिये।😊⛳✔️ गाय के प्रति जिनकी निष्ठा नहीं, श्रद्धा नहीं, गाय🐄की रक्षा जो नहीं चाहता। ऐसे व्यक्ति या दल को अपना मत देने का तात्पर्य है कि हम गोवध में हिस्सेदार बन रहे हैं और निश्चित ही हम गोवध के भागी भी होंगे। इस सम्बन्धमें बहुत सावधानी रखनी है।✔️⛳

जय गौमाता की⛳✔️
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जनजागृति हेतु लेख प्रसारण अवश्य करें⛳🙏🏻

कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।

सूर्यपुत्र शनिदेव की जय⛳
⛳⚜️सनातन धर्मरक्षक समिति⚜⛳

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गाय की दोस्ती की मिसाल की एक सच्ची घटना है


गाय की दोस्ती की मिसाल की एक सच्ची घटना है..! वैसे आपने हीरा मोती के बारे में पढा़ ही होगा…! लेकिन यह घटना #तमिलनाडु के #मदुरई_शहर के #पलामेडु_गाँव की हैं। मदुरई के एक गाँव पलामेडू में एक किसान ने अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण अपनी दुधारु गाय #लक्ष्मी को एक ग्वाला से 20,000 में बेच देते हैं। जबकी लक्ष्मी उनके साथ जो पिछले चार साल से थी। लेकिन घर की तंगी के वजह से उन्हे मजबुरन लक्ष्मी को किसी और से बचना पडा़। लेकिन जब वो खरीदार लक्ष्मी को लेने आया तो कुछ वाक्या युँ हुआ कि अब वो चर्चा का विषय बन गया है। जब लक्ष्मी को ले जाने खरीदार आया और उसे अपनी गाडी़ में करके ले जाने लगा तो लक्ष्मी का एक दोस्त #मंजमलाई जो की वही के एक स्थानीय मंदिर का बैल है। वो पिछले चार सालों से लक्ष्मी के साथ खेलता, खाता था। इन चारो सालों में दोनो में दोस्ती इतनी गहरी है गई थी देखते बन रही थी आज। जब उसने देखा की लक्ष्मी को कोई और ले जा रहा है तब वह किसी भी हाल में लक्ष्मी को जाने नही दे रहा था। वो अपने दोस्त को वापस पाना चाहता था। मांजमलाई लक्ष्मी को छुडा़ने के लिए दौड़ते हुए आया और वाहन के चारों ओर घूमने लगा, घुमते रहा, घुमते रहा। और जब उसके घुमने के बावजूद भी जब खरीदार अपनी गाडी़ शुरू किया और जाने लगा तो, मंज़ामलाई उस वाहन के पीछे एक मील तक दौड़ लगाई…सिर्फ इसलिए कि, लक्ष्मी को वो किसी तरह रोक ले और उसे कहीं और न जाने दें। लेकिन खरीदार नहीं रूका और वो लक्ष्मी को अपने साथ ले गया और मंजामलाई को वहीं दौड़ता छोड़ दिया..!किसी ने इसका #वीडियो बना लिया और अपलोड कर अपलोड होते ही यह वीडियो तेजी वारल हुआ। विडियो देखने के बाद कई लोगों ने मणिकंदन को फोन करना शुरू कर दिया और वो चाहते थे इस किसान को उनकी गाय लक्ष्मी को वापस आ जाए जिसके लिए उन्हें पैसे देना चाहते थे, अब सुनिए अब उस दुग्ध फार्म वाले ग्वाले को लालच आ गया और उसने दोगुने दाम कर दिए लक्ष्मी के 20000 हजार की लक्ष्मी वो अब वो 40000 मांगने शुरू कर दिएजब यह खबर तमिलनाडु के सीएम के बेटे ओपी जयप्रदीप को पता चला तो उन्होने उस गाय को वापस लाए और मंदिर में फिर उस किसान को दे दिए। अब लक्ष्मी और मंजमलाई फिर से इकट्ठे होकर खेलते और खाते है..! गायें भावुक प्राणी हैं। वो भी हमारे जैसे भाव, प्यार साथ स्नेह और दर्द महसूस करते हैं। उन्हें भी प्यार का अनुभव होता है…💖💖💖

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भगवान कृष्ण के काल में ,

लगभग 5000 वर्ष पहले जो व्यक्ति

10 हजार गाये रखता था वह गोकुल कहलाता था ।
5 लाख गाये रखता था वह उपनन्द कहलाता था ।

9 लाख गाये रखता था वह नन्द कहलाता था ।
10 लाख गाये रखता था वह वृषभानु कहलाता था ।

50 लाख गाये रखता था वह वृषभानुवर कहलाता था ।

और 1करोड़ गाये रखने वाला नन्दराजा कहलाता था ।

—-गर्ग संहिता ,गोलोक खंड ,अध्याय 4

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બ્રાઝીલ પાસેના પરાના સ્ટેટમાં છે ભાવનગર બ્રીડના હજ્જારો ગૌ-વંશ


ગુજરાત સમાચાર ૨૨ મી ૨૦૨૦

બ્રાઝીલ પાસેના પરાના સ્ટેટમાં છે ભાવનગર બ્રીડના હજ્જારો ગૌ-વંશ

– આજે બોળચોથ – ગૌવંશના પુજનનું પર્વ

ભાવનગર, તા. 19 ઓગસ્ટ 2019, રવિવાર

શ્રાવણ વદ ચોથ-બોળચોથ તરીકે ઉજવાય છે. શ્રાવણી પર્વસમુહમાં આ પ્રથમ દિવસ છે. સોમવાર – આ દિવસે ગૌવંશ અને ખાસ કરીને ગાય અને વાછરડાની પૂજા કરવાની પરંપરા છે. ધાર્મિક માન્યતા અને સંસ્કૃતિ મુજબ આ ક્રિયાકાંડ થાય છે જ્યારે ગૌ-વંશની સ્થિતિ જુદી છે. પ્રત્યેક શહેર-ગામમાં રખડતી ગાયો, આખલા, ખૂંટનો ત્રાસ કાયમી બન્યો છે. આ પરિપેક્ષ અને આ બોળચોથના દિવસે ઇતિહાસ પર નજર કરતા પશુપાલન અને જીવદયા-સંસ્કાર મૂલ્યના ઉદાહરણ જોવા મળે છે.
ભાવનગરના રાજવી મહારાજા કૃષ્ણકુમારસિંહજીના પશુપાલન પ્રેમ અને જીવમાત્ર પ્રત્યે અનુકંપાના દસ્તાવેજ રૃપે ભાવનગરી ખૂંટનો દેહ આજે પણ દ. અમેરિકામાં સચવાયેલો છે. આઝાદી પછીના એ સમયમાં બ્રાઝીલ પાસેના પરાના રાજ્યના મોટા પશુપાલક મિ.ગ્રેસિયા સિડ ભારતમાંથી પણ સારા પશુઓ લઈ જતા અને પોતાના દેશમાં પશુપાલન, ડેરી ઉદ્યોગ ચલાવતા. મિ. સિડને ભાવનગરની દરબાર ગૌશાળામાં ઉત્તમ કોટીનો ખૂંટ હોવાની માહિતી મળી તે ભાવનગર આવ્યા મહારાજા કૃષ્ણકુમારસિંહજીને મળ્યા. સિડએ આ કૃષ્ણાખૂંટ ખરીદવાની ઈચ્છા વ્યક્ત કરી કોરો ચેક આપ્યો. મહારાજાએ આ પશુપાલકની પારખુ નજર અને પરદેશમાં ગુજરાતની એક બીડ-ઔલાદ ઉભી થાય તે હેતુથી ખૂંટ આપ્યો. મિ.સિડના મતે આ ખૂંટની કિંમત ૫૦,૦૦૦ હતી પરંતુ કૃષ્ણકુમારસિંહજીએ માત્ર રૃા.૧૦,૦૦૦ જ ચેકમાં લખ્યા.
આ ખૂંટ બ્રાઝીલના પરાના રાજ્યમાં લઈ જવાયો જ્યાં તેના દ્વારા ધણ ઉભું થયું જેને ભાવનગર બ્રીડ-ભાવનગર ઔલાદ તેવું નામ અપાયું. આ કૃષ્ણાખૂંટ અને તેના બીડ એટલી ઉપયોગી સાબિત થઈ અને ત્યાંના રાજયાધિકારીઓને એટલી પસંદ પડી કે ‘કૃષ્ણા’ના મૃત્યુ બાદ તેના દેહને સ્ટફ કરી પરાના મ્યુઝીયમમાં મુકાયેલ છે. કૃષ્ણકુમારસિંહજી ૧૯૬૩માં યુરોપ ગયા ત્યારે મિ.સિડએ તેમને સપરિવાર આગ્રહસહ પરાના સ્ટેટ બોલાવ્યા અને તેમના હસ્તે મહારાજ કૃષ્ણકુમારસિંહજી રોડ નામકરણ પણ થયું. એક પશુના કારણે આજે પણ ભાવનગરનું નામ વિદેશમાં ગૌરવ સાથે લેવાય છે અને આજ ભાવનગરમાં રખડતા આખલા, ખુંટ, ગાયને કારણે લોકો ત્રસ્ત છે.
સરકારને પશુનું ખરૂ મુલ્ય સમજાયું ન હતું
કૃષ્ણા ખુંટ દ. અમેરિકાના પશુપાલક લઈ ગયા તે પૂર્વે તે સમયની સૌરાષ્ટ્ર સરકારે પણ આ ખૂંટની માગણી કરી હતી. મહારાજા કૃષ્ણકુમારસિંહજીએ સંમતિ આપી સરકાર કિંમત નક્કી કરે તેમ જણાવ્યું. સરકારી અધિકારીઓ કિંમત એટલી ઓછી જણાવી કે મહારાજાને લાગ્યું આ લોકોને પશુના યોગ્ય મુલ્ય વિશે ખબર નથી તે તેનો ઉછેર અને જાળવણી પણ ન જ કરી શકે. મહારાજાએ ખૂંટ ન આપ્યો. દેશ માટે પ્રથમ રાજ્ય સમર્પિત કરી દેનાર રાજવીને પૈસાનો સવાલ ન હતો પરંતુ પશુના જતનની ચિંતા હતી તેનો આ કિસ્સો ઉદાહરણરૃપ છે.
દુઝણી નહીં વસુકી ગયેલી ગાય માગી મોંઘીબાએ…
ખરી ગૌ-સેવા શું છે તેની સત્ય ઘટના મુકુંદરાય પારાશર્યના સત્યકથાઓ પુસ્તકમાં વાંચવા મળે છે. ગોહિલવાડના એક ગામની મોંઘીબા નામની વિધવાએ પતિની ઉત્તરક્રિયામાં ઘરની દુઝણી ગાય ગૌદાનમાં આપી દીધી. ગૌ-સેવા કરતા દંપતિની આ વિધવાને બીજી ગાય લઈ લેવા માટે ગામના ગરાસિયા દરબારે જણાવ્યું. ઠીક પડે તે ગાય લઈ જવા દરબારે જણાવ્યું ત્યારે વસુકી ગયેલી ગાય પસંદ કરી મોંઘીબા ઘરે લઈ ગયા. કોઈ દુઝણાની આશા વગર માત્ર ગૌસેવા માટે આ ગાય લીધી અને જીવંત પર્યત તેની સેવા કરી. છેલ્લા દિવસોમાં શરીર અટક્યું ત્યારે વૈદ્યએ દૂધ લેવા જણાવ્યું પરંતુ સમજણા થયા બાદ દૂધ, ઘી, દહીં કે છાસ પણ ન લેનાર મોંઘીબાએ દૂધ ન જ લીધું. તેમનું મૃત્યુ પણ ફળીયા બાંધેલી ગાય પાસે જ થયુ ંહતું. આ સત્ય ઘટના એ પુસ્તકમાં હૃદયદ્રાવક શબ્દો સાથે લખાયેલી છે. એક તરફ આવા વ્યક્તિ પણ હતા – હોય છે તો બીજી તરફ પોતાના દુઝણા ઢોરને ગામમાં પ્લાસ્ટીક ખાવા રખડતા મુકી દેનારા માલધારીઓ પણ છે.

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बड़ोदरा के एक गांव में लाक डाउन लगने के बाद


बड़ोदरा के एक गांव में लाक डाउन लगने के बाद से ही हर रोज रात में ये तेंदुआ इस गाय से मिलने आता है और घंटों ऐसे ही बैठा रहता है मानो वो किसी अपने से मिल रहा हो

रोज रोज कुछ देर के लिए गांव के कुत्तों का डरकर भौंकने और रात भर के लिए गांव के बाहर भाग जाने से गांव वालों ने सीसीटीवी कैमरा लगवाया तो ये नजारा दिखा

चूंकि तेंदुआ गांव के किसी जानवर को नुक्सान नहीं पहुंचाता है और दो-तीन घंटे गाय के पास बैठने के बाद चला जाता है इसलिए गांव वालों ने इस बात का पता लगाना शुरू कर दिया कि गाय और तेंदुए की इस अजीब प्रेम के पीछे क्या रहस्य है

इस रहस्य से पर्दा उठाया गाय के पुराने मालिक ने

उसने बताया कि 2010 में जब ये तेंदुआ छोटा था और इस गाय ने पहले बछिया को जन्म दिया था तब इस तेंदुए की मां को शिकारियों ने मार दिया था इसलिए वन विभाग वाले इस तेंदुए को उसकी गाय के पास लाते थे जहां वो उनके सामने ही दुध निकालकर तेंदुए को पिलाता था और इतने समय में तेंदुआ को गाय खुब दुलारती थी

फिर जब तेंदुआ बड़ा हो गया तो इसने दुध पीना बंद कर दिया और ये गाय भी उसने बेच दी

अभी भी तेदुए को लगता है कि ये गाय उसकी मां है और ये बहुत दिनों से इसको खोज रहा था , अब जाकर ये उसको मिली है तो इसीलिए ये उससे मिलने चला आता है।

वैसे कुछ मित्रों का कहना है ये तस्वीर काफी पुरानी है लेकिन मैंने आज प्रथम वार ही इस तस्वीर को देखा है और ये तस्वीर और पोस्ट मेरे दिल को छू गयी है इसलिए मैं इसे पोस्ट कर रहा हूँ!! ….