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गौ हत्या


गौ हत्या बंद करवाने के लिए पूज्य करपात्री जी महाराज जब संतों और गौभक्तों को लेकर संसद का घेराव करने लगें तब इंदिरा गांधी ने हजारों संतों और गौभक्तों पर गोलियाँ चलवा दी थी. कहते हैं करपात्री जी ने इस अपराध के लिए कुपित होकर इंदिरा गांधी के वंश के विनाश का शाप दे दिया था. लेकिन यह चिंता करनेवाली बात है कि जिस पर करपात्री जी महाराज जैसे संत कुपित होकर शाप दे रहे थें, उसी इंदिरा गांधी पर सनातन धर्म के महान संत देवहरा बाबा का वरदहस्त था. 1977 में इंदिरा गांधी के चुनाव हारने के बाद देवरहा बाबा ने ही अपने आशीर्वाद के वरद मुद्रा को कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बनाने का संकेत दिया और 1978 से आजतक कांग्रेस का चुनाव चिन्ह देवरहा बाबा के आशीर्वाद का प्रतिनिधि वही पंजा है, जिस खूनी कांग्रेसी पंजे ने माँ भारती सहित भारत की धर्म, संस्कृति, विरासत आदि को लहूलुहान कर दिया है.

यही नहीं आनंदमयी माँ ने इंदिरा गांधी को एक दिव्य रुद्राक्ष माला प्रदान किया था, जो माला जबतक उनके गले में था वो सुरक्षित रहीं. जिस दिन उन्होंने उसे किसी कारण से नहीं पहन रखा था, उसी दिन उनकी हत्या हो गई थी. अर्थात जिन इंदिरा गांधी ने अली-कुली का नारा देकर असम में बंगलादेशियों को बसा कर वहाँ के लोकल जनसंख्या का संतुलन सिर्फ अपने वोट बैंक के लिए बिगाड़ दिया, जिसकी बहुत बड़ी कीमत आज देश चुका रहा है और इससे भी बड़ी कीमत आगे देश को चुकाना है, उसी इंदिरा गांधी को देश के दिव्य विभूतियों का आशीर्वाद प्राप्त था.

इंदिरा गांधी ने जब वामपंथियों से सत्ता में समर्थन लिया तब वामपंथियों ने बदले में शिक्षण संस्थान पर न सिर्फ कब्जा किया बल्कि रसियन पब्लिकेशन की देश में बाढ़ आ गई. लाखों वामपंथी पुस्तकों से हमारे पूरी पीढ़ी का ब्रेनवॉश करके उन्हें सनातन धर्म का विरोधी बना दिया गया. जब सनातन धर्म ही नहीं बचेगा तो सनातन की सेक्युलर चेतना के साथ पैदा होनेवाले देवहरा बाबा और आनंदमयी माँ के आगे धरा पर आने की परिस्थितियाँ कभी नहीं बन पायेंगी. आज बामियान और पेशावर में कोई आनंदमयी माँ पैदा नहीं हो रही हैं, जो कभी भारत ही था. धीरे-धीरे भारत के भीतर कई अघोषित बामियान और पेशावर बनते जा रहे हैं और भारत सिकुड़ता जा रहा है.

वामपंथियों ने जो हमारी नस्ल को खोखला किया है उसकी जड़ में इंदिरा गांधी हैं और उससे भी बड़े गुनाहगार इंदिरा गांधी को अपनी दिव्य चमत्कारी शक्तियों से बचाने वाले स्प्रिच्युअल गॉड मैन लोग हैं. देवहरा बाबा जिस राजीव गांधी को अपना प्यारा बच्चा बताते थें, उसी बाबा के प्यारे ने इस देश को उपहार में एक ऐसी विषकन्या दिया है जिसके जहर से सनातन धर्म की आत्मा नीली पड़ गयी है और वो मरणासन्न पड़ी है. ये दिव्य संत अपनी व्यक्तिगत साधना के लिए भले महान हों, पर लोकोपकार की दृष्टि से इन्होंने सृजन से अधिक सनातन धर्म का विनाश कर दिया है.

जिस पवित्र गांधी परिवार को देवहरा बाबा और आनंदमयी माँ जैसी दिव्य विभूतियाँ प्रोटेक्ट कर रही थीं, आज अगर साधारण स्वार्थ में डूबे नेता या नौकरशाह उस पवित्र परिवार के लिए अपनी वफादारी दिखाते हैं तो उन्हें हम माँ भारती का अपराधी क्यों मानते हैं? अगर दोषी हैं तो सभी दोषी हैं. हम एक का तो जयचंद कहकर तिरस्कार कर रहे हैं और दूसरे की महानता का यशोगान सुनाते नहीं थक रहे हैं. ऐसे हजारों महात्माओं से श्रेष्ठ राजर्षि नरेन्द्र मोदी जी हैं जो सही मायने में मरणासन्न सनातन धर्म को बचाने की एक आखिरी कोशिश कर रहे हैं. इस एक दूरदर्शी मोदी पर ऐसे हजारों सेक्युलर गॉड मैन कुर्बान हैं जिनमें चमत्कार करने की तो शक्ति थी पर दूरदर्शिता का घोर अभाव था.

Rahul Sing Rathore

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डालमिया


अरुण सिंग

टाटा, बिड़ला और डालमिया ये तीन नाम बचपन से सुनते आए है मगर डालमिया घराना कही व्यापार में नजर नहीं आया ,
डालमिया घराने के बारे में जानने की बहुत इच्छा थी। लीजिए आप भी पढ़िए की नेहरू के जमाने मे भी 1 लाख करोड़ के मालिक डालमिया को साजिशो में फंसा के नेहरू ने कैसे बर्बाद कर दिया

येतस्वीर है राष्ट्रवादी खरबपति सेठ रामकृष्ण डालमिया की ,जिसे नेहरू ने झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल भेज दिया तथा कौड़ी-कौड़ी का मोहताज़ बना दिया ।
दरअसल डालमिया जी ने स्वामी करपात्री जी महाराज के साथ मिलकर गौहत्या एवम हिंदू कोड बिल पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर नेहरू से कड़ी टक्कर ले ली थी । लेकिन नेहरू ने हिन्दू भावनाओं का दमन करते हुए गौहत्या पर प्रतिबंध भी नही लगाई तथा हिन्दू कोड बिल भी पास कर दिया और प्रतिशोध स्वरूप हिंदूवादी सेठ डालमिया को जेल में भी डाल दिया तथा उनके उद्योग धंधों को बर्बाद कर दिया ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस व्यक्ति ने नेहरू के सामने सिर उठाया उसी को नेहरू ने मिट्टी में मिला दिया.

देशवासी प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद और सुभाष बाबू के साथ उनके निर्मम व्यवहार के बारे में वाकिफ होंगे मगर इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपनी ज़िद के कारण देश के उस समय के सबसे बड़े उद्योगपति सेठ रामकृष्ण डालमिया को बड़ी बेरहमी से मुकदमों में फंसाकर न केवल कई वर्षों तक जेल में सड़ा दिया बल्कि उन्हें कौड़ी-कौड़ी का मोहताज कर दिया.

जहां तक रामकृष्ण डालमिया का संबंध है, वे राजस्थान के एक कस्बा चिड़ावा में एक गरीब अग्रवाल घर में पैदा हुए थे और मामूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने मामा के पास कोलकाता चले गए थे.

वहां पर बुलियन मार्केट में एक salesman के रूप में उन्होंने अपने व्यापारिक जीवन का शुरुआत किया था. भाग्य ने डटकर डालमिया का साथ दिया और कुछ ही वर्षों के बाद वे देश के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए.

उनका औद्योगिक साम्राज्य देशभर में फैला हुआ था जिसमें समाचारपत्र, बैंक, बीमा कम्पनियां, विमान सेवाएं, सीमेंट, वस्त्र उद्योग, खाद्य पदार्थ आदि सैकड़ों उद्योग शामिल थे.

डालमिया सेठ के दोस्ताना रिश्ते देश के सभी बड़े-बड़े नेताओं से थी और वे उनकी खुले हाथ से आर्थिक सहायता किया करते थे.

इसके बाद एक घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया. कहा जाता है कि डालमिया एक कट्टर सनातनी हिन्दू थे और उनके विख्यात हिन्दू संत स्वामी करपात्री जी महाराज से घनिष्ट संबंध थे.

करपात्री जी महाराज ने 1948 में एक राजनीतिक पार्टी राम राज्य परिषद स्थापित की थी. 1952 के चुनाव में यह पार्टी लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी और उसने 18 सीटों पर विजय प्राप्त की.

हिन्दू कोड बिल और गोवध पर प्रतिबंध लगाने के प्रश्न पर डालमिया से नेहरू की ठन गई. पंडित नेहरू हिन्दू कोड बिल पारित करवाना चाहते थे जबकि स्वामी करपात्री जी महाराज और डालमिया सेठ इसके खिलाफ थे.

हिन्दू कोड बिल और गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्वामी करपात्रीजी महाराज ने देशव्यापी आंदोलन चलाया जिसे डालमिया जी ने डटकर आर्थिक सहायता दी.

नेहरू के दबाव पर लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पारित हुआ जिसमें हिन्दू महिलाओं के लिए तलाक की व्यवस्था की गई थी. कहा जाता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद हिन्दू कोड बिल के सख्त खिलाफ थे इसलिए उन्होंने इसे स्वीकृति देने से इनकार कर दिया.

ज़िद्दी नेहरू ने इसे अपना अपमान समझा और इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पुनः पारित करवाकर राष्ट्रपति के पास भिजवाया. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति को इसकी स्वीकृति देनी पड़ी.

इस घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया. कहा जाता है कि नेहरू ने अपने विरोधी सेठ राम कृष्ण डालमिया को निपटाने की एक योजना बनाई.

नेहरू के इशारे पर डालमिया के खिलाफ कंपनियों में घोटाले के आरोपों को लोकसभा में जोरदार ढंग से उछाला गया. इन आरोपों के जांच के लिए एक विविन आयोग बना. बाद में यह मामला स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिसमेंट को जांच के लिए सौंप दिया गया.

नेहरू ने अपनी पूरी सरकार को डालमिया के खिलाफ लगा दिया. उन्हें हर सरकारी विभाग में प्रधानमंत्री के इशारे पर परेशान और प्रताड़ित करना शुरू किया. उन्हें अनेक बेबुनियाद मामलों में फंसाया गया.

नेहरू की कोप दृष्टि ने एक लाख करोड़ के मालिक डालमिया को दिवालिया बनाकर रख दिया. उन्हें टाइम्स ऑफ़ इंडिया और अनेक उद्योगों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ा. अदालत में मुकदमा चला और डालमिया को तीन साल कैद की सज़ा सुनाई गई.

तबाह हाल और अपने समय के सबसे धनवान व्यक्ति डालमिया को नेहरू की वक्र दृष्टि के कारण जेल की कालकोठरी में दिन गुज़ारने पड़े.

व्यक्तिगत जीवन में डालमिया बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे. उन्होंने अच्छे दिनों में करोड़ों रुपये धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए दान में दिये. इसके अतिरिक्त उन्होंने यह संकल्प भी लिया था कि जबतक इस देश में गोवध पर कानूनन प्रतिबंध नहीं लगेगा वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे. उन्होंने इस संकल्प को अंतिम सांस तक निभाया. गौवंश हत्या विरोध में 1978 में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

ये तस्वीर है राष्ट्रवादी खरबपति सेठ रामकृष्ण डालमिया की ,जिसे नेहरू ने झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल भेज दिया तथा कौड़ी-कौड़ी का मोहताज़ बना दिया ।

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स्वामी करपात्री जी महाराज का मूल नाम श्री हर नारायण ओझा था।
वे हिन्दू दसनामी परम्परा के भिक्षु थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम हरीन्द्रनाथ सरस्वती था किन्तु वे “करपात्री” नाम से ही प्रसिद्ध थे, क्योंकि वे अपने अंजुली का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे।
वे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी जी की स्मरण शक्ति ‘फोटोग्राफिक’ थी, यह इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रुप में लिखा हुआ है। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें ‘धर्मसम्राट’ की उपाधि प्रदान की गई।
“अखिल भारतीय राम राज्य परिषद” भारत की एक परम्परावादी हिन्दू पार्टी थी। इसकी स्थापना स्वामी करपात्री ने सन् 1948 में की थी। इस दल ने सन् 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी। सन् 1952, 1957 एवम् 1962 के विधान सभा चुनावों में हिन्दी क्षेत्रों (मुख्यत: राजस्थान) में इस दल ने दर्जनों सीटें हासिल की थी।
जब इंदिरा गांधी वादे से मुकर गयी–
इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था। करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती।
इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजो के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दवाब में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी।
गौ हत्या निषेध आंदोलन–
और जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों की इस मांग को ठुकरा दिया जिसमे सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी, तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी, जिसे ”गोपाष्टमी” भी कहा जाता है।
इस धरने में मुख्य संतों के नाम इस प्रकार हैं- शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्री महाराज और रामचन्द्र वीर।
राम चन्द्र वीर तो आमरण अनशन पर बैठ गए थे, लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्ते और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी जिसमें कई साधू मारे गए।
इस ह्त्या कांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ”गुलजारी लाल नंदा” ने अपना त्याग पत्र दे दिया, और इस कांड के लिए खुद को सरकार को जिम्मेदार बताया था।
लेकिन संत ”राम चन्द्र वीर” अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था। राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनिया के सभी रिकार्ड तोड़ दिए है। यह दुनिया की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिए 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था।
इंदिरा के वंश पर श्राप–
लेकिन खुद को निष्पक्ष बताने वाले किसी भी अखबार ने इंदिरा के डर से साधुओं पर गोली चलने और राम चंद्र वीर के बलिदान की खबर छापने की हिम्मत नहीं दिखायी, सिर्फ मासिक पत्रिका “आर्यावर्त” और “केसरी” ने इस खबर को छापा था। और कुछ दिन बाद गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका “कल्याण” ने गौ अंक में एक विशेषांक प्रकाशित किया था, जिसमे विस्तार सहित यह घटना दी गयी थी।
और जब मीडिया वालों ने अपने मुहों पर ताले लगा लिए थे तो करपात्री जी ने कल्याण के उसी अंक में इंदिरा को सम्बोधित करके कहा था-
“यद्यपि तूने निर्दोष साधुओं की हत्या करवाई है, फिर भी मुझे इसका दुःख नही है। लेकिन तूने गौ हत्यारों को गायों की हत्या करने की छूट देकर जो पाप किया है, वह क्षमा के योग्य नहीं है। इसलिये मैं आज तुझे श्राप देता हूँ कि-
”गोपाष्टमी” के दिन ही तेरे वंश का नाश होगा”,
“आज मैं कहे देता हूँ कि गोपाष्टमी के दिन ही तेरे वंश का भी नाश होगा..!“
श्राप सच हो गया–
जब करपात्री जी ने यह श्राप दिया था तो वहाँ “प्रभुदत्त ब्रह्मचारी“ भी मौजूद थे। करपात्री जी ने जो भी कहा था वह आगे चल कर अक्षरशः सत्य हो गया।
इंदिरा के वंश का गोपाष्टमी के दिन ही नाश हो गया। सुबूत के लिए इन मौतों की तिथियों पर ध्यान दीजिये–
1- संजय गांधी की मौत आकाश में हुई, उस दिन हिन्दू पंचांग के अनुसार गोपाष्टमी थी।
2- इंदिरा की मौत घर में हुई, उस दिन भी गोपाष्टमी थी।
3- राजीव गांधी मद्रास में मरे, उस दिन भी गोपाष्टमी ही थी।
गोली चलने के दिन स्वामी करपात्री जी ने उपस्थित लोगों के सामने गरज कर कहा था कि-
“लोग भले इस घटना को भूल जाएँ, लेकिन मैं इसे कभी नहीं भूल सकता।
गौ हत्यारे के वंशज नहीं बचेंगे, चाहे वह आकाश में हो या पाताल में हों या चाहे घर में हो या बाहर हो, यह श्राप इंदिरा के वंशजों का पीछा करता रहेगा।”
फिर करपात्री जी ने राम चरित मानस की यह चौपाई लोगों को सुनायी–
“।। संत अवज्ञा करि फल ऐसा, जारहि नगर अनाथ करि जैसा ।।”

JusticeForHinduSadhus
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स्वामी करपात्री जी महाराज का मूल नाम श्री हर नारायण ओझा था।
वे हिन्दू दसनामी परम्परा के भिक्षु थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम हरीन्द्रनाथ सरस्वती था किन्तु वे “करपात्री” नाम से ही प्रसिद्ध थे, क्योंकि वे अपने अंजुली का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे।
वे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी जी की स्मरण शक्ति ‘फोटोग्राफिक’ थी, यह इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रुप में लिखा हुआ है। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें ‘धर्मसम्राट’ की उपाधि प्रदान की गई।
“अखिल भारतीय राम राज्य परिषद” भारत की एक परम्परावादी हिन्दू पार्टी थी। इसकी स्थापना स्वामी करपात्री ने सन् 1948 में की थी। इस दल ने सन् 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी। सन् 1952, 1957 एवम् 1962 के विधान सभा चुनावों में हिन्दी क्षेत्रों (मुख्यत: राजस्थान) में इस दल ने दर्जनों सीटें हासिल की थी।
जब इंदिरा गांधी वादे से मुकर गयी–
इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था। करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती।
इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजो के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दवाब में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी।
गौ हत्या निषेध आंदोलन–
और जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों की इस मांग को ठुकरा दिया जिसमे सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी, तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी, जिसे ”गोपाष्टमी” भी कहा जाता है।
इस धरने में मुख्य संतों के नाम इस प्रकार हैं- शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्री महाराज और रामचन्द्र वीर।
राम चन्द्र वीर तो आमरण अनशन पर बैठ गए थे, लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्ते और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी जिसमें कई साधू मारे गए।
इस ह्त्या कांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ”गुलजारी लाल नंदा” ने अपना त्याग पत्र दे दिया, और इस कांड के लिए खुद को सरकार को जिम्मेदार बताया था।
लेकिन संत ”राम चन्द्र वीर” अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था। राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनिया के सभी रिकार्ड तोड़ दिए है। यह दुनिया की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिए 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था।
इंदिरा के वंश पर श्राप–
लेकिन खुद को निष्पक्ष बताने वाले किसी भी अखबार ने इंदिरा के डर से साधुओं पर गोली चलने और राम चंद्र वीर के बलिदान की खबर छापने की हिम्मत नहीं दिखायी, सिर्फ मासिक पत्रिका “आर्यावर्त” और “केसरी” ने इस खबर को छापा था। और कुछ दिन बाद गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका “कल्याण” ने गौ अंक में एक विशेषांक प्रकाशित किया था, जिसमे विस्तार सहित यह घटना दी गयी थी।
और जब मीडिया वालों ने अपने मुहों पर ताले लगा लिए थे तो करपात्री जी ने कल्याण के उसी अंक में इंदिरा को सम्बोधित करके कहा था-
“यद्यपि तूने निर्दोष साधुओं की हत्या करवाई है, फिर भी मुझे इसका दुःख नही है। लेकिन तूने गौ हत्यारों को गायों की हत्या करने की छूट देकर जो पाप किया है, वह क्षमा के योग्य नहीं है। इसलिये मैं आज तुझे श्राप देता हूँ कि-
”गोपाष्टमी” के दिन ही तेरे वंश का नाश होगा”,
“आज मैं कहे देता हूँ कि गोपाष्टमी के दिन ही तेरे वंश का भी नाश होगा..!“
श्राप सच हो गया–
जब करपात्री जी ने यह श्राप दिया था तो वहाँ “प्रभुदत्त ब्रह्मचारी“ भी मौजूद थे। करपात्री जी ने जो भी कहा था वह आगे चल कर अक्षरशः सत्य हो गया।
इंदिरा के वंश का गोपाष्टमी के दिन ही नाश हो गया। सुबूत के लिए इन मौतों की तिथियों पर ध्यान दीजिये–
1- संजय गांधी की मौत आकाश में हुई, उस दिन हिन्दू पंचांग के अनुसार गोपाष्टमी थी।
2- इंदिरा की मौत घर में हुई, उस दिन भी गोपाष्टमी थी।
3- राजीव गांधी मद्रास में मरे, उस दिन भी गोपाष्टमी ही थी।
गोली चलने के दिन स्वामी करपात्री जी ने उपस्थित लोगों के सामने गरज कर कहा था कि-
“लोग भले इस घटना को भूल जाएँ, लेकिन मैं इसे कभी नहीं भूल सकता।
गौ हत्यारे के वंशज नहीं बचेंगे, चाहे वह आकाश में हो या पाताल में हों या चाहे घर में हो या बाहर हो, यह श्राप इंदिरा के वंशजों का पीछा करता रहेगा।”
फिर करपात्री जी ने राम चरित मानस की यह चौपाई लोगों को सुनायी–
“।। संत अवज्ञा करि फल ऐसा, जारहि नगर अनाथ करि जैसा ।।”

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PM रिलीफ फंड, काँग्रेस अध्यक्ष और अनोखी सच्चाई —

बन्धुओं! पूरा विश्व कोरोना #वायरस के #महामारी से जूझ रहा है। भारत ने भी इस महामारी से बचने के लिए कई उपाय किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने लोगों से PM-CARES में दान देने की भी अपील की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने जब PM-CARES की बात की है तो अब इसको लेकर चर्चा यह है कि आखिर इस PM-CARES की क्या आवश्यकता है❓जबकि पहले से ही प्रधानमंत्री राहत कोष है। लोग प्रधानमंत्री राहत कोष में क्यों ना दान करें❓ PM-CARES में क्यों दान करें❓

तो बन्धुओं! इस बारे में एक ऐसी अनोखी और खौफनाक सच्चाई पता चली है, जिसे जानकर आप भी दंग रह जाएंगे । समाचार वेबसाइट प्रभासाक्षी और OPIndia ने अपनी रिपोर्ट में इस बारे में विस्तार से बताया है।

दरअसल प्रधानमंत्री राहत कोष की स्थापना जवाहरलाल नेहरू जी ने की थी और इसके #क्लाज में एक #प्रावधान डाल दिया गया था कि इसके जो कमेटी मेंबर होंगे उन सभी की #सहमति और #दस्तखत से ही इस फंड का उपयोग किया जा सकेगा।
साथ ही आश्चर्यजनक रूप से नेहरू ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को भी प्रधानमंत्री राहत कोष में एक कमेटी मेंबर के तौर पर डाल दिया।

अब सोचिए जब यह एक सरकारी फंड है तब किसी भी राजनीतिक पार्टी का अध्यक्ष उस फंड का ट्रस्टी क्यों बनाया गया❓और आज भी बिना सोनिया गांधी के दस्तखत से या उनकी सहमति से प्रधानमंत्री राहत कोष में से मोदी पैसे खर्च नहीं कर सकते।
ये कितनी खौफनाक सच्चाई है कि इस प्रधानमंत्री राहत कोष में केवल एक विशेष राजनीतिक पार्टी का अध्यक्ष ही मेम्बर होगा। साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से वही इसे संचालित करेगा।

इसीलिए मोदीजी ने इस फंड को कांग्रेस अध्यक्ष यानी सोनिया गांधी के चंगुल से हटाने के लिए एक नया फंड बनाया जिसका नाम रखा “पीएम केयर फंड ” और इस नए फंड में जितने भी ट्रस्टी हैं वह सभी सरकारी लोग हैं।

कोई भी राजनीतिक पार्टी का अध्यक्ष या सदस्य इसमें शामिल नहीं है। #पीएम केयर के जो ट्रस्टी हैं उसमें एक प्रधानमंत्री,#वित्त मंत्री,#रक्षा मंत्री और #गृह मंत्री है और आने वाले वक्त में भले ही सरकार बदल जाए तो भी उस वक्त की सरकार बिना किसी राजनीतिक दखलंदाजी के इस फंड का उपयोग कर सकेगी।

व्यक्तिगत रूप से आप भले ही कितने ही मोदीजी के विरोधी हों लेकिन आपको मानना पड़ेगा कि जब देश #हित की बात आती है तो मोदीजी पार्टी पॉलिटिक्स से ऊपर उठकर कार्य करते हैं। वरना वे चाहते तो भाजपा अध्यक्ष को भी इसका मेम्बर बना सकते थे लेकिन उन्होंने यह नहीं किया।

— साभार

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1963 के बाद कांग्रेस शासन में कुल 1200 मिग-21 लड़ाकू विमान खरीदे गए थे, 2013 तक उनमें से 840 विमान अर्थात 70% विमान दुर्घटनाग्रस्त (क्रैश) हुए
इन दुर्घटनाओं में भारतीय वायुसेना के 140 अमूल्य पायलेट शहीद हुए और 40 नागरिक मारे गए
ज्यादातर दुर्घटनाएँ विमानो में तकनीकी खराबी के कारण हुई

क्या भारत के किसी एक पत्रकार की भी हिम्मत हुई कि वह गांधी परिवार से उन 140 पायलेट के नुकसान और 840 विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर कोई सवाल पूछ सके ?

क्या कांग्रेस से किसी ने पूछा कि उन सस्ते व घटिया मिग-21 की खरीद व उसके बाद उनके घटिया स्पेयर पार्ट्स की खरीद का जिम्मेदार कौन है?

आज जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार विश्व के सबसे उन्नत #राफेल लड़ाकू विमान खरीद रहा है जिनके स्पेयर पार्ट्स यहां भारत मे ही बनेगें तो यही कांग्रेस व गांधी परिवार उसमे रोड़े अटका रहा है।🤔🤔🤔

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सच्ची_घटना
गद्दारकांग्रेसकीकङवीसच्चाई
“अरे बुढिया तू यहाँ न आया कर , तेरा बेटा तो चोर-डाकू था, इसलिए #गोरों ने उसे मार दिया“
जंगल में लकड़ी बिन रही एक मैली सी धोती में लिपटी बुजुर्ग महिला से वहां खड़ें भीर ने हंसते हुए कहा .
“ नही #चंदू ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हैं “ बुजुर्ग औरत ने गर्व से कहा।
उस बुजुर्ग औरत का नाम #जगरानीदेवी था और इन्होने पांच बेटों को जन्म दिया था, जिसमे आखरी बेटा कुछ दिन पहले ही शहीद हुआ था। उस बेटे को ये माँ प्यार से चंदू कहती थी और दुनियां उसे “ #आजाद “ जी हाँ ! #चंद्रशेखरआजाद के नाम से जानती हैं।
हिंदुस्तान आजाद हो चुका था , आजाद के मित्र #सदाशिव_राव एक दिन आजाद के माँ-पिता जी की खोज करतें हुए उनके गाँव पहुंचे।
आजादी तो मिल गयी थी लेकिन बहुत कुछ खत्म हो चुका था।
चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी।
आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी।
अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं।
लेकिन वृद्ध होने के कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें।
कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं थी।
शर्मनाक बात तो यह कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद (1949 ) तक जारी रही।
चंद्रशेखरआज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर #सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे, क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र #भगवानदास_माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की।
मार्च 1951 में जब आजाद की माँ जगरानी देवी का #झांसी में निधन हुआ तब सदाशिव जी ने उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था।
आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक स्थान पर पीठ का निर्माण किया।
प्रदेश की तत्कालीन सरकार (प्रदेश में #कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे #गोविन्दबल्लभपन्त) ने इस निर्माण को गयासुदीन गाजी खान उर्फ नेहरू के कहने पर झाँसी की जनता द्वारा किया हुआ अवैध और गैरकानूनी कार्य घोषित कर दिया।
किन्तु झाँसी के नागरिकों ने तत्कालीन सरकार के उस शासनादेश को महत्व न देते हुए चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया।
मूर्ति बनाने का कार्य चंद्रशेखर आजाद के ख़ास सहयोगी कुशल शिल्पकार #रूद्रनारायणसिंह जी को सौपा गया। उन्होंने फोटो को देखकर आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी।
जब सरकार को यह पता चला कि आजाद की माँ की मूर्ती तैयार की जा चुकी है और सदाशिव राव, रूपनारायण, भगवान् दास माहौर समेत कई क्रांतिकारी झांसी की जनता के सहयोग से मूर्ती को स्थापित करने जा रहे है तो उसने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश, समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया।
चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके।
जनता और क्रन्तिकारी आजाद की माता की प्रतिमा लगाने के लिए निकल पड़ें।
अपने आदेश की झाँसी की सडकों पर बुरी तरह उड़ती धज्जियों से तिलमिलाई तत्कालीन सरकार ने अपनी #पुलिस को सदाशिव को #गोली मार देने का आदेश दे डाला
किन्तु आज़ाद की माताश्री की #प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में ले लिया।
जुलूस पर पुलिस ने #लाठी_चार्ज कर दिया।
सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और कुछ लोग की मौत भी हुईं।
(हालांकि मौत की पुष्टि नही हुईं )
चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी।
आजाद हम आपको कौन से मुंह से आपको श्रद्धांजलि दें ?
जब हम आपकी माताश्री की 2-3 फुट की मूर्ति के लिए उस देश में 5 फुट जमीन भी हम न दे सकें।
जिस देश के लिए आप ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया उसी देश की #कांग्रेसी सरकार ने आप सभी क्रांतिकारियों का अपमान किया ।
🙏🙇सभार 🙏🙇
द्वारा 👉भूतपूर्व आर्मी कमांडो श्री लिलाधर लमोरिया जब तक यह गद्दार कांग्रेस मिट नही जायेगी तब तक देश को इसकी कङवी सच्चाई बताता रहुगा 👈
जय हिंद वंदेमातरम्
जय श्री राम
देशभक्त पोस्ट को शेयर जरूर करेंगे
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Photo from Harshad Ashodiya


जब मनीष तिवारी बोल रहा था तो किसी को ये पेपर वहां लहराना चाहिए।
16 जुलाई 1947 का अखबार …हेड लाइन है कांग्रेस द्वारा भारत विभाजन योजना स्वीकृतियानी कि जो लोग मोहम्मद अली जिन्ना या मुस्लिम लीग को देश के बंटवारे का जिम्मेदार मानते हैं वह आधा सच है पूरा सच यह है कि देश के बंटवारे की पूरी योजना कांग्रेस पार्टी ने बनाई थी और उस समय के कांग्रेश के सर्वे सर्वा महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के दिमाग की उपज थी कि देश को तोड़ दिया जाएउस समय कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में यह प्रस्ताव रखा गया था कि सभी हिंदू भारत में रहेंगे और जितने भी मुस्लिम हैं वह पाकिस्तान चले जाएंगे यह झूठ बोलकर मत विभाजन के द्वारा भारत के बंटवारे की योजना को स्वीकार कर लिया गया लेकिन जब देश बटा तब महात्मा गांधी ने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत में जो भी मुसलमान रहना चाहे वह रह सकता है

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🚩🔱

1973 में
इंदिरा गाँधी ने
न्यायमूर्ति A.N. रे को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में बैठा दिया
वो भी तब जब उनसे वरिष्ठ न्यायधीशों की लिस्ट जैसे न्यायमूर्ति JM शेलात, KS हेगड़े और AN ग्रोवर सामने थी.

अंततः हुआ यह कि नाराज़गी के रूप में इन तीनों न्यायधीशों ने इस्तीफा दे दिया.

इसके बाद कांग्रेस ने पार्लियामेंट में जवाब दिया, …
‘यह सरकार का काम है कि किसे मुख्य न्यायधीश रखें और किसको नहीं और हम उसी को बिठाएंगे जो हमारी विचारधारा के पास हो.’

और आज वही लोग न्यायाधीशों की आज़ादी की बात करते हैं?⁉⁉

1975 में न्यायाधीश जगमोहन सिंहा को एक फैसला सुनाना था.

फैसला था राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के चुनावी भ्रष्टाचार के मामले का.

उनको फ़ोन आता है जिसमें कहा जाता है, ‘अगर तुमने इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ फैसला सुनाया, तो अपनी पत्नी से कह देना इस साल करवा चौथ का व्रत न रखे’

जिसका न्यायमूर्ति सिंहा ने आराम से जवाब देते हुए कहा
‘किस्मत से मेरी पत्नी का देहांत 2 महीने पहले ही हो चुका है.’

इसके बाद न्यायमूर्ति सिंहा ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया
जो आज भी मिसाल के रूप में जाना जाता है.

इसने कांग्रेस सरकार की चूलें हिला दी और इसी से बचने के लिए इंदिरा गाँधी और कांग्रेस द्वारा ‘इमरजेंसी’ जनता पर थोप दी गयी. देश को नहीं, इंदिरा गाँधी को बचाना था.

1976 में
A.N. रे ने इंदिरा गाँधी द्वारा खुद पर किये गए एहसान का बदला चुकाया
शिवकांत शुक्ला बनाम ADM जबलपुर के केस में.

उनके द्वारा बैठाई गयी पीठ ने उनके सभी मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया.

उस पूरी पीठ में मात्र एक बहादुर न्यायाधीश थें
जिनका नाम था न्यायमूर्ति HR खन्ना जिन्होंने आपमें साथी मुख्य न्यायधीश को कहा कि ‘क्या आप खुद को आईने में आँख मिलाकर देख सकते हैं?’

इस पीठ में न्यायाधीश AN रे, HR खन्ना, MH बेग, YV चंद्रचूड़ और PN भगवती शामिल थें.

यह सब मुख्य न्यायाधीशों की लिस्ट में आये सिर्फ एक न्यायधीश को छोड़ के जिनका नाम था
न्यायधीश HR खन्ना जी.

खन्ना जी को इंदिरा गाँधी की सरकार ने दण्डित किया और अनुभव तथा वरिष्ठता में उनसे नीचे बैठे न्यायधीश MH बेग को देश का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया.

यह था भारत के लोकतंत्र का हाल कांग्रेस के राज में!⁉⁉

यही न्यायाधीश MH बेग रिटायरमेंट के बाद नेशनल हेराल्ड के डायरेक्टर बना दिये गए.

यह नेशनल हेराल्ड अखबार वही अखबार है
जिसके घोटाले में आज सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ज़मानत पर छूटे हुए हैं.

यह पूरी तरह से कांग्रेस का अखबार था और एक प्रकार से कांग्रेस के मुखपत्र की तरह काम करता था.

आश्चर्यजनक रूप से न्यायाधीश बेग ने अपॉइंटमेंट स्वीकार कर लिया.

राहुल गाँधी का
‘संविधान को खतरा’वाले सवाल पर उनके मुँह पर यह जानकारियां मारी जानी चाहिए और उनसे पूछना चाहिए कि
क्या इस प्रकार से ही बचाना चाहते हो लोकतंत्र को?

बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि

1980 में इंदिरा गाँधी सरकार में वापस आयी और इसी MH बेग को अल्पसंख्यक कमीशन का चैयरमैन नियुक्त कर दिया गया.

वह इस पद पर 1988 तक रहे
और उनको ‘पद्म विभूषण’ से राजीव गाँधी की सरकार द्वारा सम्मानित भी किया गया था.⁉⁉⁉

1962 में न्यायाधीश बेहरुल इस्लाम का एक और नया केस सामने आया
जो आपको जानना अति आवश्यक है.

श्रीमान इस्लाम कांग्रेस के राज्य सभा के MP थें 1962 के दौरान ही और उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था.
हार गए थे.

वो दोबारा 1968 में राज्य सभा के MP बनाये गए.
कांग्रेस की ही तरफ से (सीधी सी बात है.)

उन्होंने 1972 में राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया और उनको गुवाहाटी हाई कोर्ट का न्यायाधीश बना दिया गया.

1980 में वो सेवानिवृत्त हो गए.

परंतु
जब इंदिरा गाँधी 1980 में दोबारा वापस आयी तो इन्हीं श्रीमान इस्लाम को ‘न्यायाधीश बेहरुल इस्लाम’ की उपाधि वापस दी गयी और सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायधीश बना दिया गया.

गुवाहाटी हाई कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के 9 महीने बाद का यह मामला है भाई साहब!⁉⁉⁉

इंदिरा गांधी
पूरी तरह से यह चाहती थी कि सभी न्यायालयों पर उनका ‘कंट्रोल’ हो.

उस समय इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी और कांग्रेस पर लगे आरोपों की सुनवाई विभिन्न न्यायालयों में हो रही थी.

वो इंदिरा गाँधी के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुए और साफ तौर पर कांग्रेस के लिए भी.

‘न्यायाधीश’ इस्लाम ने एक महीने बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया और फिर एक बार असम के बारपेटा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े.

लोकतंत्र का इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा? जिस चुनाव में वो खड़े होने वाले थे उस साल चुनाव नहीं हो पाए अतः उनको एकबार फिर से कांग्रेस की तरफ से राज्य सभा का MP बना दिया गया.

लोकतंत्र के लिए जिस प्रकार से कांग्रेस आज छाती पीट रही है, उसी ने लोकतंत्र का गला सबसे ज़्यादा बार घोंटा है.

😢😢

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#कुछपुरानीयादें

#सरदारपटेलजी की जब मृत्यु हुई तो एक घंटे बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसकी घोषणा की।

घोषणा के तुरन्त बाद उसी दिन एक आदेश जारी किया। उस आदेश के दो बिन्दु थे। पहला यह था की सरदार पटेल को दिया गया सरकारी कार उसी वक्त वापिस लिया जाय और दूसरा बिन्दु था की गृह मंत्रालय के वे सचिव/अधिकारी जो सरदार पटेल के अन्तिम संस्कार में बम्बई जाने चाहते हैं वो अपने खर्चे पर जायें।

लेकिन तत्कालीन गृह सचिव वी पी मेनन ने प्रधानमंत्री नेहरु के इस पत्र का जिक्र ही अपनी अकस्मात बुलाई बैठक में नहीं किया और सभी अधिकारियों को बिना बताये अपने खर्चे पर बम्बई भेज दिया।

उसके बाद नेहरु ने कैबिनेट की तरफ से तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद को सलाह भेजवाया की वे सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में भाग न लें। लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने कैबिनेट की सलाह को दरकिनार करते हुए अंतिम संस्कार में जाने का निर्णय लिया। लेकिन जब यह बात नेहरु को पता चली तो उन्होंने वहां पर सी राजगोपालाचारी को भी भेज दिया और सरकारी स्मारक पत्र पढने के लिये राष्ट्रपति के बजाय उनको पत्र सौप दिया।

इसके बाद कांग्रेस के अन्दर यह मांग उठी की इतने बङे नेता के याद में सरकार को कुछ करना चाहिए और उनका स्मारक बनना चाहिए तो नेहरु ने पहले तो विरोध किया फिर बाद में कुछ करने की हामी भरी।

कुछ दिनों बाद नेहरु ने कहा की सरदार पटेल किसानों के नेता थे इसलिये सरदार पटेल जैसे महान और दिग्गज नेता के नाम पर हम गावों में कुआँ खोदेंगे। यह योजना कब शुरु हुई और कब बन्द हो गयी किसी को पता भी नहीं चल पाया।

उसके बाद कांग्रेस के अध्यक्ष के चुनाव में नेहरु के खिलाफ सरदार पटेल के नाम को रखने वाले पुराने और दिग्गज कांग्रेसी नेता पुरुषोत्तम दास टंडन को पार्टी से बाहर कर दिया।

ये सब बाते बरबस ही याद दिलानी पङती हैं जब कांग्रेसियों को सरदार पटेल का नाम जपते देखता हूं….