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1963 के बाद कांग्रेस शासन में कुल 1200 मिग-21 लड़ाकू विमान खरीदे गए थे, 2013 तक उनमें से 840 विमान अर्थात 70% विमान दुर्घटनाग्रस्त (क्रैश) हुए
इन दुर्घटनाओं में भारतीय वायुसेना के 140 अमूल्य पायलेट शहीद हुए और 40 नागरिक मारे गए
ज्यादातर दुर्घटनाएँ विमानो में तकनीकी खराबी के कारण हुई

क्या भारत के किसी एक पत्रकार की भी हिम्मत हुई कि वह गांधी परिवार से उन 140 पायलेट के नुकसान और 840 विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर कोई सवाल पूछ सके ?

क्या कांग्रेस से किसी ने पूछा कि उन सस्ते व घटिया मिग-21 की खरीद व उसके बाद उनके घटिया स्पेयर पार्ट्स की खरीद का जिम्मेदार कौन है?

आज जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार विश्व के सबसे उन्नत #राफेल लड़ाकू विमान खरीद रहा है जिनके स्पेयर पार्ट्स यहां भारत मे ही बनेगें तो यही कांग्रेस व गांधी परिवार उसमे रोड़े अटका रहा है।🤔🤔🤔

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सच्ची_घटना
गद्दारकांग्रेसकीकङवीसच्चाई
“अरे बुढिया तू यहाँ न आया कर , तेरा बेटा तो चोर-डाकू था, इसलिए #गोरों ने उसे मार दिया“
जंगल में लकड़ी बिन रही एक मैली सी धोती में लिपटी बुजुर्ग महिला से वहां खड़ें भीर ने हंसते हुए कहा .
“ नही #चंदू ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हैं “ बुजुर्ग औरत ने गर्व से कहा।
उस बुजुर्ग औरत का नाम #जगरानीदेवी था और इन्होने पांच बेटों को जन्म दिया था, जिसमे आखरी बेटा कुछ दिन पहले ही शहीद हुआ था। उस बेटे को ये माँ प्यार से चंदू कहती थी और दुनियां उसे “ #आजाद “ जी हाँ ! #चंद्रशेखरआजाद के नाम से जानती हैं।
हिंदुस्तान आजाद हो चुका था , आजाद के मित्र #सदाशिव_राव एक दिन आजाद के माँ-पिता जी की खोज करतें हुए उनके गाँव पहुंचे।
आजादी तो मिल गयी थी लेकिन बहुत कुछ खत्म हो चुका था।
चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी।
आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी।
अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं।
लेकिन वृद्ध होने के कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें।
कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं थी।
शर्मनाक बात तो यह कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद (1949 ) तक जारी रही।
चंद्रशेखरआज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर #सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे, क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र #भगवानदास_माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की।
मार्च 1951 में जब आजाद की माँ जगरानी देवी का #झांसी में निधन हुआ तब सदाशिव जी ने उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था।
आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक स्थान पर पीठ का निर्माण किया।
प्रदेश की तत्कालीन सरकार (प्रदेश में #कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे #गोविन्दबल्लभपन्त) ने इस निर्माण को गयासुदीन गाजी खान उर्फ नेहरू के कहने पर झाँसी की जनता द्वारा किया हुआ अवैध और गैरकानूनी कार्य घोषित कर दिया।
किन्तु झाँसी के नागरिकों ने तत्कालीन सरकार के उस शासनादेश को महत्व न देते हुए चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया।
मूर्ति बनाने का कार्य चंद्रशेखर आजाद के ख़ास सहयोगी कुशल शिल्पकार #रूद्रनारायणसिंह जी को सौपा गया। उन्होंने फोटो को देखकर आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी।
जब सरकार को यह पता चला कि आजाद की माँ की मूर्ती तैयार की जा चुकी है और सदाशिव राव, रूपनारायण, भगवान् दास माहौर समेत कई क्रांतिकारी झांसी की जनता के सहयोग से मूर्ती को स्थापित करने जा रहे है तो उसने अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश, समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया।
चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना ना की जा सके।
जनता और क्रन्तिकारी आजाद की माता की प्रतिमा लगाने के लिए निकल पड़ें।
अपने आदेश की झाँसी की सडकों पर बुरी तरह उड़ती धज्जियों से तिलमिलाई तत्कालीन सरकार ने अपनी #पुलिस को सदाशिव को #गोली मार देने का आदेश दे डाला
किन्तु आज़ाद की माताश्री की #प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में ले लिया।
जुलूस पर पुलिस ने #लाठी_चार्ज कर दिया।
सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और कुछ लोग की मौत भी हुईं।
(हालांकि मौत की पुष्टि नही हुईं )
चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी।
आजाद हम आपको कौन से मुंह से आपको श्रद्धांजलि दें ?
जब हम आपकी माताश्री की 2-3 फुट की मूर्ति के लिए उस देश में 5 फुट जमीन भी हम न दे सकें।
जिस देश के लिए आप ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया उसी देश की #कांग्रेसी सरकार ने आप सभी क्रांतिकारियों का अपमान किया ।
🙏🙇सभार 🙏🙇
द्वारा 👉भूतपूर्व आर्मी कमांडो श्री लिलाधर लमोरिया जब तक यह गद्दार कांग्रेस मिट नही जायेगी तब तक देश को इसकी कङवी सच्चाई बताता रहुगा 👈
जय हिंद वंदेमातरम्
जय श्री राम
देशभक्त पोस्ट को शेयर जरूर करेंगे
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Photo from Harshad Ashodiya


जब मनीष तिवारी बोल रहा था तो किसी को ये पेपर वहां लहराना चाहिए।
16 जुलाई 1947 का अखबार …हेड लाइन है कांग्रेस द्वारा भारत विभाजन योजना स्वीकृतियानी कि जो लोग मोहम्मद अली जिन्ना या मुस्लिम लीग को देश के बंटवारे का जिम्मेदार मानते हैं वह आधा सच है पूरा सच यह है कि देश के बंटवारे की पूरी योजना कांग्रेस पार्टी ने बनाई थी और उस समय के कांग्रेश के सर्वे सर्वा महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के दिमाग की उपज थी कि देश को तोड़ दिया जाएउस समय कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में यह प्रस्ताव रखा गया था कि सभी हिंदू भारत में रहेंगे और जितने भी मुस्लिम हैं वह पाकिस्तान चले जाएंगे यह झूठ बोलकर मत विभाजन के द्वारा भारत के बंटवारे की योजना को स्वीकार कर लिया गया लेकिन जब देश बटा तब महात्मा गांधी ने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत में जो भी मुसलमान रहना चाहे वह रह सकता है

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🚩🔱

1973 में
इंदिरा गाँधी ने
न्यायमूर्ति A.N. रे को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में बैठा दिया
वो भी तब जब उनसे वरिष्ठ न्यायधीशों की लिस्ट जैसे न्यायमूर्ति JM शेलात, KS हेगड़े और AN ग्रोवर सामने थी.

अंततः हुआ यह कि नाराज़गी के रूप में इन तीनों न्यायधीशों ने इस्तीफा दे दिया.

इसके बाद कांग्रेस ने पार्लियामेंट में जवाब दिया, …
‘यह सरकार का काम है कि किसे मुख्य न्यायधीश रखें और किसको नहीं और हम उसी को बिठाएंगे जो हमारी विचारधारा के पास हो.’

और आज वही लोग न्यायाधीशों की आज़ादी की बात करते हैं?⁉⁉

1975 में न्यायाधीश जगमोहन सिंहा को एक फैसला सुनाना था.

फैसला था राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के चुनावी भ्रष्टाचार के मामले का.

उनको फ़ोन आता है जिसमें कहा जाता है, ‘अगर तुमने इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ फैसला सुनाया, तो अपनी पत्नी से कह देना इस साल करवा चौथ का व्रत न रखे’

जिसका न्यायमूर्ति सिंहा ने आराम से जवाब देते हुए कहा
‘किस्मत से मेरी पत्नी का देहांत 2 महीने पहले ही हो चुका है.’

इसके बाद न्यायमूर्ति सिंहा ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया
जो आज भी मिसाल के रूप में जाना जाता है.

इसने कांग्रेस सरकार की चूलें हिला दी और इसी से बचने के लिए इंदिरा गाँधी और कांग्रेस द्वारा ‘इमरजेंसी’ जनता पर थोप दी गयी. देश को नहीं, इंदिरा गाँधी को बचाना था.

1976 में
A.N. रे ने इंदिरा गाँधी द्वारा खुद पर किये गए एहसान का बदला चुकाया
शिवकांत शुक्ला बनाम ADM जबलपुर के केस में.

उनके द्वारा बैठाई गयी पीठ ने उनके सभी मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया.

उस पूरी पीठ में मात्र एक बहादुर न्यायाधीश थें
जिनका नाम था न्यायमूर्ति HR खन्ना जिन्होंने आपमें साथी मुख्य न्यायधीश को कहा कि ‘क्या आप खुद को आईने में आँख मिलाकर देख सकते हैं?’

इस पीठ में न्यायाधीश AN रे, HR खन्ना, MH बेग, YV चंद्रचूड़ और PN भगवती शामिल थें.

यह सब मुख्य न्यायाधीशों की लिस्ट में आये सिर्फ एक न्यायधीश को छोड़ के जिनका नाम था
न्यायधीश HR खन्ना जी.

खन्ना जी को इंदिरा गाँधी की सरकार ने दण्डित किया और अनुभव तथा वरिष्ठता में उनसे नीचे बैठे न्यायधीश MH बेग को देश का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया.

यह था भारत के लोकतंत्र का हाल कांग्रेस के राज में!⁉⁉

यही न्यायाधीश MH बेग रिटायरमेंट के बाद नेशनल हेराल्ड के डायरेक्टर बना दिये गए.

यह नेशनल हेराल्ड अखबार वही अखबार है
जिसके घोटाले में आज सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ज़मानत पर छूटे हुए हैं.

यह पूरी तरह से कांग्रेस का अखबार था और एक प्रकार से कांग्रेस के मुखपत्र की तरह काम करता था.

आश्चर्यजनक रूप से न्यायाधीश बेग ने अपॉइंटमेंट स्वीकार कर लिया.

राहुल गाँधी का
‘संविधान को खतरा’वाले सवाल पर उनके मुँह पर यह जानकारियां मारी जानी चाहिए और उनसे पूछना चाहिए कि
क्या इस प्रकार से ही बचाना चाहते हो लोकतंत्र को?

बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि

1980 में इंदिरा गाँधी सरकार में वापस आयी और इसी MH बेग को अल्पसंख्यक कमीशन का चैयरमैन नियुक्त कर दिया गया.

वह इस पद पर 1988 तक रहे
और उनको ‘पद्म विभूषण’ से राजीव गाँधी की सरकार द्वारा सम्मानित भी किया गया था.⁉⁉⁉

1962 में न्यायाधीश बेहरुल इस्लाम का एक और नया केस सामने आया
जो आपको जानना अति आवश्यक है.

श्रीमान इस्लाम कांग्रेस के राज्य सभा के MP थें 1962 के दौरान ही और उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था.
हार गए थे.

वो दोबारा 1968 में राज्य सभा के MP बनाये गए.
कांग्रेस की ही तरफ से (सीधी सी बात है.)

उन्होंने 1972 में राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया और उनको गुवाहाटी हाई कोर्ट का न्यायाधीश बना दिया गया.

1980 में वो सेवानिवृत्त हो गए.

परंतु
जब इंदिरा गाँधी 1980 में दोबारा वापस आयी तो इन्हीं श्रीमान इस्लाम को ‘न्यायाधीश बेहरुल इस्लाम’ की उपाधि वापस दी गयी और सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायधीश बना दिया गया.

गुवाहाटी हाई कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के 9 महीने बाद का यह मामला है भाई साहब!⁉⁉⁉

इंदिरा गांधी
पूरी तरह से यह चाहती थी कि सभी न्यायालयों पर उनका ‘कंट्रोल’ हो.

उस समय इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी और कांग्रेस पर लगे आरोपों की सुनवाई विभिन्न न्यायालयों में हो रही थी.

वो इंदिरा गाँधी के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुए और साफ तौर पर कांग्रेस के लिए भी.

‘न्यायाधीश’ इस्लाम ने एक महीने बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया और फिर एक बार असम के बारपेटा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े.

लोकतंत्र का इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा? जिस चुनाव में वो खड़े होने वाले थे उस साल चुनाव नहीं हो पाए अतः उनको एकबार फिर से कांग्रेस की तरफ से राज्य सभा का MP बना दिया गया.

लोकतंत्र के लिए जिस प्रकार से कांग्रेस आज छाती पीट रही है, उसी ने लोकतंत्र का गला सबसे ज़्यादा बार घोंटा है.

😢😢

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#कुछपुरानीयादें

#सरदारपटेलजी की जब मृत्यु हुई तो एक घंटे बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसकी घोषणा की।

घोषणा के तुरन्त बाद उसी दिन एक आदेश जारी किया। उस आदेश के दो बिन्दु थे। पहला यह था की सरदार पटेल को दिया गया सरकारी कार उसी वक्त वापिस लिया जाय और दूसरा बिन्दु था की गृह मंत्रालय के वे सचिव/अधिकारी जो सरदार पटेल के अन्तिम संस्कार में बम्बई जाने चाहते हैं वो अपने खर्चे पर जायें।

लेकिन तत्कालीन गृह सचिव वी पी मेनन ने प्रधानमंत्री नेहरु के इस पत्र का जिक्र ही अपनी अकस्मात बुलाई बैठक में नहीं किया और सभी अधिकारियों को बिना बताये अपने खर्चे पर बम्बई भेज दिया।

उसके बाद नेहरु ने कैबिनेट की तरफ से तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद को सलाह भेजवाया की वे सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में भाग न लें। लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने कैबिनेट की सलाह को दरकिनार करते हुए अंतिम संस्कार में जाने का निर्णय लिया। लेकिन जब यह बात नेहरु को पता चली तो उन्होंने वहां पर सी राजगोपालाचारी को भी भेज दिया और सरकारी स्मारक पत्र पढने के लिये राष्ट्रपति के बजाय उनको पत्र सौप दिया।

इसके बाद कांग्रेस के अन्दर यह मांग उठी की इतने बङे नेता के याद में सरकार को कुछ करना चाहिए और उनका स्मारक बनना चाहिए तो नेहरु ने पहले तो विरोध किया फिर बाद में कुछ करने की हामी भरी।

कुछ दिनों बाद नेहरु ने कहा की सरदार पटेल किसानों के नेता थे इसलिये सरदार पटेल जैसे महान और दिग्गज नेता के नाम पर हम गावों में कुआँ खोदेंगे। यह योजना कब शुरु हुई और कब बन्द हो गयी किसी को पता भी नहीं चल पाया।

उसके बाद कांग्रेस के अध्यक्ष के चुनाव में नेहरु के खिलाफ सरदार पटेल के नाम को रखने वाले पुराने और दिग्गज कांग्रेसी नेता पुरुषोत्तम दास टंडन को पार्टी से बाहर कर दिया।

ये सब बाते बरबस ही याद दिलानी पङती हैं जब कांग्रेसियों को सरदार पटेल का नाम जपते देखता हूं….

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कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकारों ने एक साजिश के तहत ये झूठ फैलाया है की नेहरु आधुनिक भारत के निर्माता है …. सच्चाई ये है की अंग्रेजो ने नेहरु को एक तेज रफ्तार में चलती गाड़ी का स्टीयरिंग थमाया था ..

भारत में पहला छोटा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट अंग्रेजो ने दार्जिलिंग में 1897 में बनाया था जो 130 किलो वाट का था .. भारत में पहला बड़ा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट मैसूर के राजा ने कोलर के खान से सोना निकालने के लिए कावेरी नदी पर शिवसमुद्रम फाल पर 1887 में बनाया जो 1902 में पूरा हुआ .. ये 6 मेगावाट का था .. इसका ठेका अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक को दिया गया था .. शीप से टरबाइन और अन्य साजोसामान आये फिर उन्हें सैकड़ो हाथियों पर लादकर साईट तक ले जाया गया था ..
आजादी तक भारत में कुल 230 छोटे बड़े पॉवर प्रोजेक्ट कार्यरत थे जिसमे कई कोयला आधारित थर्मल प्रोजेक्ट भी थे ..
दोराबजी टाटा ने 1910 में ही टाटा पावर नामक कम्पनी बनाई थी … दोराबजी ने टाटा पॉवर द्वारा 1915 में महाराष्ट्र के खोपोली ने 72 मेगावाट का विशाल पावर प्रोजेक्ट बनाया .. टाटा पावर ने 1947 तक भारत में 23 बड़े पॉवर प्रोजेक्ट बना चुकी थी और बम्बई, दिल्ली और कोलकाता में इलेक्ट्रिक डिस्ट्रीब्यूशन नेट्वर्क बना चुकी थी
भारत के हैदराबाद, बीकानेर, जोधपुर, बडौदा, ग्वालियर सहित तमाम रियासतों ने अपने राज्यों में कई पॉवर प्रोजेक्ट बनवाये थे ..
आपको जानकर आश्चर्य होगा की 1947 तक चीन भारत से पॉवर, रेल, सडक तथा सेना आदि तमाम क्षमताओ में काफी पीछे था ..
अंग्रेजो ने नेहरु को चाय और काफी के विशाल बगान बनाकर दिए थे .. उन बागानों तक जो काफी दुर्गम पहाड़ो पर थे वहां अंग्रेजो ने सिचाई, रेल, सड़क आदि इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किये थे ..
अंग्रेजो ने नेहरु को बीस विशाल बंदरगाह और 23 एयरपोर्ट बनाकर दिए थे ..
अंग्रेजो ने भारत के हर इलाको में आधुनिक युनिवर्सिटी और कालेज खोले .. मद्रास दिल्ली मुंबई करांची में सेंट स्टीफ़न कोलेज, सियालकोट में मरे कोलेज, अजमेर में मेयो कालेज सहित पुरे भारत में 350 कालेज और 23 युनिवर्सिटी अंग्रेजो ने नेहरु को दिया था ..
• Serampore College: हावड़ा Estd.: 1818.
• Indian Institute of Technology, Roorkee: Estd.: 1847.
• University of Mumbai: Estd.: 1857.
• University of Madras: Estd.: 1857.
• University of Calcutta: Estd.: 1857.
• Aligarh Muslim University: Estd.: 1875.
• Allahabad University: Estd-1887
• पंजाब विश्वविद्यालय – 1882
• बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय -1916, युनिवर्सिटी ऑफ़ मैसूर -1916, पटना युनिवर्सिटी, नागपूर युनिवर्सिटी काशी विद्यापीठ सहित 49 बड़े विश्वविद्यालय थे .. 1947 तक भारत शिक्षा संस्थानों में तीसरे नम्बर पर था .
अंग्रेजो ने नेहरु को विशाल सेना दी थी .. ब्रिटिश इंडियन आर्मी 1895 में स्थापित हुई थी .. अंग्रेज आठ कमांड बनाकर गये थे जिसमे 2 पाकिस्तान में चले गये .. ब्रिटिश इंडियन आर्मी प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में बहादुरी से लड़ी थी .. अंग्रजो ने नेहरु को 45 सैनिक छावनियां और विशाल रोयल एयरफोर्स दिया था .. भारत विश्व में तीसरा देश था जिसने वायुसेना बनाया .. यानी चीन के पहले ही अंग्रेजो ने भारत को विशाल और आधुनिक वायुसेना बनाकर दी थी ..

आज देश में जितना भी रेलवे नेट्वर्क है उसका 67% 1947 तक बन चूका था .. भारत का ये विशाल रेल नेट्वर्क नेहरु का नही बल्कि अंग्रेजो का देन है .. उन्होंने विशाल नदियों पर पुल बनाये दुर्गम पहाड़ो को काटकर रेल लाइन बनाई .. भारत विश्व में चौथा देश और एशिया का पहला देश है जहाँ रेल चली .. भारत में 1853 को रेल चली .. जबकि इसके 30 साल बाद चीन में रेल चली ..

भारत में पहली लिफ्ट ओटिस कम्पनी ने 1890 में मैसूर पैलेस में लगाया था …भारत में विशाल चाय बागन और सागौन के लकड़ी के बागान लगाने वाली कम्पनी पारसी वाडिया खानदान की थी जिसका नाम था बाम्बे बर्मा ट्रेडिंग कम्पनी लिमिटेड .. ये कम्पनी 1863 में बनी थी ..और एशिया की बड़ी कम्पनी थी ..

1865: ALLAHABAD BANK
1892: BRITANNIA INDUSTRIES LTD
1895: PUNJAB NATIONAL BANK
1897: CENTURY TEXTILES AND INDUSTRIES LTD
1897: GODREJ AND BOYCE MANUFACTURING CO. LTD
1899: CALCUTTA ELECTRICITY SUPPLY CORPORATION
1902: SHALIMAR PAINT COLOUR AND VARNISH CO.
1903: INDIAN HOTELS CO. LTD
1908: BANK OF BARODA
1911: TVS
1904: KUMBAKONAM BANK LTD
1905: PHOENIX MILLS LTD
1906: CANARA BANKING CORP. (UDIPI) LTD
1906: BANK OF INDIA
1907: ALEMBIC PHARMACEUTICALS LTD
1907: TATA STEEL LTD सहित चार सौ से ज्यादा बड़ी कम्पनियां 1947 में पहले बन चुकी थी ..और 80 से ज्यादा बैंक थे

यानी चाहे शिक्षा हो या बैंकिग हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर हो या रेलवे हो या उर्जा हो .. 1947 तक भारत हर फिल्ड में टॉप पर था .. फिर भी कांग्रेसी कुत्ते कहते है की नेहरु आधुनिक भारत के निर्माता है .. कांग्रेसी कुत्ते इस तरह से प्रचारित करते है जैसे 1947 तक भारत एकदम पिछड़ा था .. कोई स्कुल तक नही था .. लोग लालटेन युग में जीते थे .. फिर नेहरु आये और मात्र 2 सालो में भारत को आधुनिक बना दिया।।

जितेंद्र प्रताप सिंह की वाल से साभार

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गांधी मुसलमानो से डर गए थे.. ??

यह एक विवादस्पद मगर सच है कि करमचंद गांधी मुसलमानो से डर गए थे -१९०८ में एक घटना के बाद गाँधी जी में मुसलामानों के प्रति कड़ा रवैया बदलकर पक्षपात करना शुरू किया। हुआ यूं कि दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सरकार ने वहां रहने वाले भारतीयों पर ३ पौंड का टेक्स लगाया, गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार से इस विषय में बहस की जिसे मुसलामानों ने सहयोग नहीं दिया तब गाँधी जी ने इसकी जबरदस्त आलोचना की एक सामूहिक वकतव्य में इस्लाम पर कड़ी बात भी कही जिससे मुसलामानों में रोष बढ़ा, १० फरवरी १९०८ को मीर आलम नामक पठान की अगुआई में एक दस्ते ने गाँधी जी की उनके निवास पर बेरहमी से पिटाई की और जान से मार डालने की धमकी भी दी। डाक्टर भीमराव आंबेडकर ने भी स्वीकार किया कि इस घटना के बाद गाँधी जी ने आपत्तिजनक वक्तव्य तो देने बंद कर ही दिए, साथ ही उनकी सभी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते रहे और उनके अपराध तक को शह देने लगे।

२३ दिसंबर १९२६ : श्रद्धानंद स्वामी जब बीमार थे और बिस्तर पर लेटे थे तब अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने उन्हें चाकू से गोद कर मार डाला, श्रद्धानंद स्वामी एक आर्य समाज के प्रचारक थे और धर्म परिवर्तन कर चुके मुसलामानों को शुद्धि योजना द्वारा वापस हिन्दू धर्म में लाना चाहते थे, गाँधी जी का बड़ा बेटा हीरालाल जो मुसलमान बन चूका था इन्ही स्वामी द्वारा वापस हिन्दू बना था। एक मुसलमान महिला, जो स्वामी के पास हिन्दू धर्म में वापस जाने के लिए आयी तब उसके मुस्लिम पति के अदालत का सहारा लेकर स्वामी पर इलज़ाम भी लगाया लेकिन अदालत ने स्वामी को बरी कर दिया इस घटना से कई मुस्लिम खफा हो गए और कुछ ही दिनों में उनकी हत्या कर दी गयी। तब गाँधी जी ने कुछ दिनों बाद गुवाहाटी में कांग्रेस की कांफ्रेंस में कहा – भाई रशीद का जुर्म मैं नहीं मानता बल्कि नफरत फैलाने वाले ही जिम्मेदार हैं यानिकी उनहोंने स्वामी जी को ही दोषी ठहराया।

धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के जरिये गाँधी जी का यही मुस्लिम तुष्टिकरण देश के विभाजन का भी कारण बना, जब २६ मार्च १९४० को जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की अवधारणा पर जोर दिया तब गाँधी जी का वक्तव्य था – अन्य नागरिकों की तरह मुस्लिम को भी यह निर्धारण करने का अधिकार है कि वो अलग रह सके, हम एक संयुक्त परिवार में रह रहे हैं ( हरिजन , ६ अप्रैल १९४० ).
अगर इस देश के अधिकांश मुस्लिम यह सोचते हैं कि एक अलग देश जरूरी है और उनका हिदुओं से कोई समानता नहीं है तो दुनियाँ की कोई ताक़त उनके विचार नहीं बदल सकती और इस कारण वो नए देश की मांग रखते है तो वो मानना चाहिए, हिन्दू इसका विरोध कर सकते है ( हरिजन , १८ अप्रैल १९४२ )।

१२ जून १९४७ को जब कांग्रेस सेशन में बंटवारे के मुद्दे पर विचार हुआ तब पुरुषोत्तम दास टंडन, गोविन्द वल्लभ पन्त, चैतराम गिडवानी आदि ने इसका तर्क के साथ घोर विरोध किया था तब गाँधी जी ने सारे वक्ताओं को किनारे कर ४५ मिनट की जो स्पीच दी उसका सार इस प्रकार है अगर कांग्रेस ने बंटवारे को स्वीकार नहीं किया तो कुछ और ग्रुप ( संभवतः नेता जी सुभाष चन्द्र बोस) कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देंगे और देश में भूचाल जैसा आ जाएगा। दुसरे शब्दों में गाँधी जी ने मुसलामानों को पाकिस्तान बनाने के लिए प्रेरित ही किया। इस घटना के बाद वल्लभ भाई ने भी बंटवारा स्वीकार करने का फैसला किया।

बंटवारे के बाद भी गाँधी जी की नीतियों ने देश का जो नुक्सान किया वो इस प्रकार है, २३ % मुस्लिम जनसँख्या के लिए ३२ % भूमि पाकिस्तान को दी गयी, बंटवारे के बाद मुख्य कदम था जल्द से जल्द पापुलेशन एक्सचेंज, यानिकी मुस्लिम को पाकिस्तान और हिन्दुओं को भारत में पुनर्वास दिलाना, जिसकी वकालत जिन्ना और माउंट बेटन दोनों ने की थी और मुस्लिम लीग के प्रस्ताव में यह मुद्दा शामिल था। लेकिन गाँधी जी ने कुछ मुसलामानों की अनिच्छा के चलते गाँधी जी ने इसे “इम्प्रक्टिकल” करार दिया, बिहार में दंगे भड़कने पर भी मुस्लिम लीग का यह प्रस्ताव लागू नहीं किया गया। माउंट बेटन ने जब नेहरु पर दबाव डाला तब नेहरु ने गाँधी की ओर देखा और गाँधी जी ने इसे स्वीकार नहीं किया, नतीज़तन हिन्दुओं ( मुख्यतया सिख और सिन्धी) का भारत में पलायन तो हुआ लेकिन मुसलामानों का पाकिस्तान में न के बराबर और जिनका पाकिस्तान पलायन हुआ वो मुहाजिर कहलाये यानि दोयम दर्जे के पाकिस्तानी।

गाँधी जी के विरोध के कारण ही “वन्दे मातरम” राष्ट्रगान नहीं बन पाया, दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी इसे बहुत पसंद करते थे उन्होंने लिखा था ” यह संवेदना में आदर्श है और मधुर भी, यह सिर्फ देशभक्ति जगाता है और भारत को माँ की तरह गुण गाता है ” परन्तु जब उन्हें मालूम हुआ मुस्लिम इसे नापसंद करते है तब उनहोंने सामूहिक सभा में गाना बंद कर दिया और जन गण मन राष्ट्रगीत बनाया गया।

बंटवारे के बाद जब सिन्धी और पंजाबी दिल्ली में केम्प में रह रहे थे तब गाँधी जी ने वहां का दौरा किया और कहा- मुस्लिम अगर पाक को हिन्दू विहीन करते हैं तो हमें नाराज़ नहीं होना चाहिए बल्कि हौसला रखना चाहिए
इस प्रकार गाँधी जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण का इतिहास रच कर दिखा दिया और कांग्रेस उनके नक़्शे कदम पर चलकर आगे बढती रही और धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा ही रच दी !

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निओ दीप