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POK_गिलगित_बाल्टिस्तान


#POK_गिलगित_बाल्टिस्तान
पोस्ट थोड़ी लम्बी है, लेकिन समय निकाल कर पढियेगा जरूर।।
वास्तव में अगर जम्मू कश्मीर के बारे में बातचीत करने की जरूरत है तो वह है POK  और अक्साई चीन के बारे मेंl इसके ऊपर देश में चर्चा होनी चाहिए गिलगित जो अभी POK में है  विश्व में एकमात्र ऐसा स्थान है जो कि 5 देशों से जुड़ा हुआ है.

अफगानिस्तान, तजाकिस्तान (जो कभी Russia का हिस्सा था), पाकिस्तान, भारत और  तिब्बत -चाइना l
“वास्तव में *जम्मू कश्मीर का महत्व, जम्मू के कारण नहीं,  कश्मीर के कारण नहीं, लद्दाख के कारण नहीं है. वास्तव में अगर इसका महत्व है तो उसका कारण है

गिलगित-बाल्टिस्तान l”
भारत के इतिहास में भारत पर जितने भी आक्रमण हुए यूनानियों से लेकर आज तक (शक , हूण, कुषाण , मुग़ल ) वह सारे ‘गिलगित’ से हुएl  हमारे पूर्वज, जम्मू-कश्मीर के महत्व को समझते थे उनको पता था कि अगर भारत को सुरक्षित रखना है तो दुश्मन को हिंदूकुश अर्थात गिलगित-बाल्टिस्तान उस पार  ही रखना हैl  किसी समय, इस गिलगित में, अमेरिका बैठना चाहता था, ब्रिटेन अपना नियंत्रण केन्द्र, “गिलगित” में बनाना चाहता था , Russia भी गिलगित में  बैठना चाहता था यहां तक कि पाकिस्तान में 1965 में गिलगित को रूस, को देने का वादा तक कर लिया था. आज चाइना “गिलगित” में बैठना चाहता है और वह अपने पैर पसार भी चुका है और पाकिस्तान तो बैठना चाहता ही थाl
दुर्भाग्य से इस “गिलगित” के महत्व को सारी दुनिया ने समझा है  केवल एक को छोड़कर, जिसका वास्तव में “गिलगित-बाल्टिस्तान” है और वह है भारत l
क्योंकि हमको इस बात की कल्पना भी नहीं है, भारत को अगर सुरक्षित रहना है तो हमें “गिलगित-बाल्टिस्तान” किसी भी हालत में  चाहिए l आज हम “आर्थिक शक्ति” बनने की सोच रहे हैं.  🌟✨

क्या आपको पता है?  गिलगित से सड़क के रास्ते, आप विश्व के अधिकांश कोनों में जा सकते हैं!!  “गिलगित’ से ,  5000 Km दुबई है,

1400 Km  दिल्ली है,

2800 Km  मुंबई है,

3500 Km रूस  है,

चेन्नई 3800 Km है और

लंदन 8000 Km है l

जब हम सोने की चिड़िया थे, हमारा सारे देशों से “व्यापार चलता था.” 85 % जनसंख्या इन मार्गों से जुड़ी हुई थी, मध्य एशिया, यूरेशिया, यूरोप, अफ्रीका सब जगह हम सड़कों से जा सकते हैं अगर “गिलगित-बाल्टिस्तान” हमारे पास हो l आज हम पाकिस्तान के सामने IPI (Iran-Pakistan-India) गैस लाइन बिछाने के लिए गिड़गिड़ाते हैं. ये तापी की परियोजना है, जो  कभी पूरी नहीं होगी अगर हमारे पास “गिलगित” होता तो गिलगित के आगे तज़ाकिस्तान था. हमें किसी के सामने हाथ नहीं फ़ैलाने पड़ते l   💫 🍃
हिमालय की 10 बड़ी चोटियाँ हैं जो कि विश्व की 10 बड़ी चोटियों में से है. ये सारी हमारी है और इन 10  में से 8  गिलगित-बाल्टिस्तान में है l  तिब्बत, पर चीन का कब्जा होने के बाद जितने भी पानी के वैकल्पिक स्त्रोत (Alternate Water Resources) हैं. वह सारे “गिलगित-बाल्टिस्तान” में हैं l
आप हैरान हो जाएंगे, वहां बड़ी-बड़ी 50-100  यूरेनियम और सोने की खदानें हैं. आप POK के “मिनरल डिपार्टमेंट” की रिपोर्ट को पढ़िए आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे !!  वास्तव में  गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व हमको मालूम नहीं है और *सबसे बड़ी बात, “गिलगित-बाल्टिस्तान” के लोग बहुत बड़े पाकिस्तान विरोधी हैं l

दुर्भाग्य क्या है? हम हमेशा ‘कश्मीर’ बोलते हैं, जम्मू- कश्मीर नहीं बोलते हैं l कश्मीर, कहते ही जम्मू, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान दिमाग से निकल जाता है l ये जो पाकिस्तान के कब्जे में, जो POK  है, उसका क्षेत्रफल 79000 वर्ग किलोमीटर है. उसमें ‘कश्मीर’ का हिस्सा तो सिर्फ 6000 वर्ग किलोमीटर है, 9000 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा ‘जम्मू’ का है और 64000 वर्ग किलोमीटर हिस्सा लद्दाख का है, जो कि “गिलगित-बाल्टिस्तान” है l यह कभी “कश्मीर का हिस्सा” नहीं था. यह “लद्दाख” का हिस्सा था, वास्तव में सच्चाई यही है l इसलिए “पाकिस्तान” यह जो बार-बार कश्मीर का राग अलापता रहता है, “उसको कोई यह पूछे तो सही – क्या गिलगित-बाल्टिस्तान और जम्मू का हिस्सा जिस पर  तुमने कब्ज़ा कर रखा है, क्या ये  भी कश्मीर का ही भाग है ??

😶😶 कोई जवाब नहीं मिलेगा l   💫
क्या आपको पता है “गिलगित-बाल्टिस्तान” , लद्दाख, के रहने वाले लोगो की औसत आयु  विश्व में सर्वाधिक है! यहाँ के लोग विश्व अन्य लोगो की तुलना में ज्यादा जीते है l

😮

भारत में आयोजित एक सेमिनार में गिलगित-बाल्टिस्तान के एक बड़े नेता को बुलाया गया था उसने कहा, “we are the forgotten people of forgotten lands of BHARAT”.

 

उसने कहा,  “देश हमारी बात ही नहीं जानता l” ❕😲

किसी ने उनसे सवाल किया, “क्या आप भारत में रहना चाहते हैं??”

तो उन्होंने कहा, “60 साल बाद तो आपने मुझे भारत बुलाया और वह भी अमेरिकन टूरिस्ट वीजा पर, और आप मुझसे सवाल पूछते हैं कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं l आप गिलगित-बाल्टिस्तान के बच्चों को IIT , IIM  में दाखिला दीजिए  AIIMS  में हमारे लोगों का इलाज कीजिए l हमें यह लगे तो सही कि भारत हमारी चिंता करता है हमारी बात करता है l गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान की सेना कितने अत्याचार करती है लेकिन आपके  किसी भी राष्ट्रीय अखबार में उसका जिक्र तक नहीं आता है l आप हमें ये अहसास तो दिलाइये की आप हमारे साथ है l”
यहाँ, मैं खुद आपसे यह पूछता हूं कि आप सभी ने पाकिस्तान, को हमारे कश्मीर में हर सहायता उपलब्ध कराते हुए देखा होगा l वह बार-बार कहता है कि हम कश्मीर की जनता के साथ हैं, कश्मीर की  आवाम हमारी है l लेकिन क्या आपने कभी यह सुना है कि किसी भी भारत के नेता, मंत्री या सरकार ने यह कहा हो कि हम POK गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता के साथ हैं, वह हमारी आवाम है, उनको जो भी सहायता उपलब्ध होगी हम उपलब्ध करवाएंगे आपने यह कभी नहीं सुना होगा l  कांग्रेस सरकार ने, कभी POK  गिलगित-बाल्टिस्तान, को पुनः भारत में लाने के लिए कोई बयान तक नहीं दिया प्रयास तो बहुत दूर की बात है l हालाँकि पहली बार “अटल बिहारी वाजपेयी जी” की सरकार के समय POK का मुद्दा उठाया गया फिर 10 साल पुनः मौन धारण हो गया और फिर से नरेंद्र मोदी जी की सरकार आने पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में ये मुद्दा उठाया l
आज अगर आप किसी को गिलगित के बारे में पूछ भी लोगे तो उसे यह पता नहीं है कि यह जम्मू कश्मीर का ही भाग है l वह यह पूछेगा क्या यह कोई चिड़िया का नाम है ?? वास्तव में हमें जम्मू कश्मीर के बारे में जो गलत नजरिया है उसको बदलने की जरूरत है l
अब करना क्या चाहिए?? तो पहली बात है सुरक्षा में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा का मुद्दा बहुत “संवेदनशील” है. इस पर अनावश्यक वाद-विवाद नहीं होना चाहिए l

एक अनावश्यक वाद विवाद चलता है कि जम्मू कश्मीर में इतनी  सेना क्यों है??

तो ‘बुद्धिजीवियों’ को बता दिया जाए कि जम्मू-कश्मीर का 2800 किलोमीटर का “बॉर्डर” है, जिसमें 2400  किलोमीटर पर LOC है l आजादी, के बाद भारत ने “पांच युद्ध लड़े* वह सभी “जम्मू-कश्मीर से लड़े,” भारतीय सेना के 18 लोगों को “परमवीर चक्र” मिला और वह 18 के 18 जम्मू कश्मीर में ‘शहीद’ हुए हैं l
इनमें 14000 भारतीय सैनिक शहीद हुए हैं जिनमें से 12000 जम्मू कश्मीर में शहीद हुए हैं l

अब सेना, “बॉर्डर” पर नहीं, तो क्या मध्यप्रदेश में रहेगी? क्या यह सब जो सेना की इन बातों को नहीं समझते, वही यह सब अनर्गल चर्चा करते हैं l
वास्तव में जम्मू कश्मीर पर बातचीत करने के बिंदु होने चाहिए👉 POK  ,  वेस्ट पाक रिफ्यूजी, कश्मीरी हिंदू समाज, आतंक से पीड़ित लोग, धारा 370 और 35A  का दुरूपयोग, गिलगित-बाल्टिस्तान का वह क्षेत्र जो आज पाकिस्तान -चाइना के कब्जे में है l

जम्मू- कश्मीर के गिलगित- बाल्टिस्तान में अधिकांश जनसंख्या शिया मुसलमानों की है और वह सभी “पाक विरोधी” हैं. वह आज भी अपनी लड़ाई खुद लड़  रहे हैं. पर “भारत” उनके साथ है ऐसा उनको महसूस कराना चाहिए. देश कभी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ वास्तव में पूरे देश में इसकी चर्चा होनी चाहिएl
वास्तव में जम्मू-कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदलना चाहिएl जम्मू कश्मीर को लेकर सारे देश में सही जानकारी देने की जरूरत हैl  इसके लिए एक इंफॉर्मेशन कैंपेन चलना चाहिए l  पूरे देश में  वर्ष में एक बार 26 अक्टूबर को  जम्मू कश्मीर का दिवस मनाना चाहिएl सबसे बड़ी बात है कि जम्मू कश्मीर को “राष्ट्रवादियों* की नजर से देखना होगा जम्मू कश्मीर की चर्चा हो तो वहां के राष्ट्रभक्तों की चर्चा होनी चाहिए तो उन 5 जिलों के कठमुल्ले तो फिर वैसे ही अपंग हो जाएंगे l

इस कश्मीर श्रृंखला के माध्यम से मैंने आपको पूरे जम्मू कश्मीर की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों से अवगत करवाया और मेरा मुख्य उद्देश्य सिर्फ यही है कि जम्मू कश्मीर के बारे में देश के प्रत्येक नागरिक को यह सब जानकारियां होनी चाहिए l

अब आप इतने समर्थ हैं कि जम्मू कश्मीर को लेकर आप किसी से भी वाद-विवाद या तर्क कर सकते हैं l किसी को आप समझा सकते हैं कि वास्तव में जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियां क्या है l वैसे तो जम्मू कश्मीर पर एक ग्रन्थ लिखा जा सकता है लेकिन मैंने जितना हो सका उतने संछिप्त रूप में इसे आपके सामने रखा है l

अगर आप  इस श्रंखला को अधिक से अधिक जनता के अंदर प्रसारित करेंगे तभी हम जम्मू कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदल सकते हैं अन्यथा नहीं l इसलिए मेरा आप सभी से यही अनुरोध है श्रृंखला को अधिक से अधिक लोगों की जानकारी में लाया जाए ताकि देश की जनता को जम्मू कश्मीर के संदर्भ में सही  तथ्यों  का पता लग सके l
Refrences :

INDIA INDEPENDECE ACT 1947

INDIAN CONSTITUTION ACT 1950

JAMMU & KASHMIR ACT 1956

INDIAN GOVT. ACT 1935

Dr. Kirshandev Jhari

Dr. kuldeep Chandra Agnihotri

Jammu-kashmir Adhyan Kendra

Sushil pandit (kashmiri pandit)

SC & J&K HC Court judgements

News sources  &

Various ACCORDS & Statements
जय हिन्द !  #कश्मीर_श्रृंखला भाग ९

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कश्मीर कुछ अनकही कुछ अनसुनी बातें 

—————————————-
नेपाल में राजशाही ख़त्म होने के बाद प्रजातंत्र आया।  डेमोक्रेटिक तरीके से सरकार की स्थापना हुई और शासन चलाने के लिए संविधान बना।  नेपाल की मुख्य पार्टियों में नेपाल कांग्रेस , प्रचन दा की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और बाकी छोटी छोटी पार्टियां हैं।  नेपाल में हिल और तराई क्षेत्र दो मुख्य इलाके हैं।  
तराई में रहने वाले मधेशी कहलाते हैं जिनके भारत से अभिन्न सम्बन्ध रहे हैं।  मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद नेपाल से भारत के सम्बन्ध बिगड़े।  क्योंकि नेपाली सरकार का आरोप था की नेपाल में चलते मधेशियों के आंदोलन को भारत की मोदी सरकार हवा दे रही है , भड़का रही है।  नेपाल की सरकार को  झुकाने के लिए अघोषित ब्लॉकेड कर रही है।  
सवाल ये है की मधेशियो का आंदोलन क्या था ? वो अपनी ही सरकार के खिलाफ क्यों थे ? इतने खिलाफ की महीनो उन्होंने ब्लॉकेड रखा।  अन्न जल पेट्रोल डीजल हर चीज की किल्लत होने दी।  
डेमोक्रेसी के बाद जब संविधान बना. साथ में चुनाव करवा कर सरकार की स्थापना के लिए नेपाल को चुनावी क्षेत्रो में बांटा गया।  संसदीय सीटें। 
उस समय की सरकार में कम्युनिस्ट ज्यादा थे जो हिली एरिया से बिलोंग करते थे।  आबादी ज्यादा तराई इलाको में थी।  मधेशी ज्यादा थे।  
लेकिन संसदीय सीटें इस तरह निर्धारित की गयी ताकि हिल रीजन से ज्यादा सांसद चुने जाएँ और तराई इलाकों से कम।  
इससे सत्ता में हमेशा पहाड़ी लोगों का वर्चस्व रहेगा।  सरकार उनकी रहेगी।  
और  यही नेपाल में अशांति का कारन बना।  आज तक असंतोष है और मधेशी आंदोलनरत हैं।  
कम जनसँख्या, कम इलाका  होते हुए भी नेपाल में एक वर्ग ने सत्ता पर पकड़ हासिल कर ली।  
क्या पहले भी ऐसा हुआ है कभी।  जब ऐसी ही किसी तरकीब से किसी वर्ग ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की हो ? 
नीचे सलंग्न तस्वीर देखिये।  ये नक्शा जम्मू कश्मीर का है।  कुल इलाका २ लाख वर्ग किलोमीटर।  जिसमे करीब 1 लाख भारत के पास है , 78 हजार पाकिस्तान के  पास और शेष चीन के पास।  
भारतीय जम्मू कश्मीर प्रदेश के तीन रीजन हैं। 
लद्दाख जो सबसे बड़ा डिवीजन है , जिसमे दो जिले हैं।  ये बौद्ध बहुल इलाका है।  
 जम्मू दूसरा बड़ा डिवीजन जिसमे दस जिले हैं , ये हिन्दू बहुल है और कुछ जिले मुस्लिम बहुल।  
कश्मीर जिसका कुल एरिया 15 हजार किलोमीटर है दस जिले हैं और मुस्लिम प्रधान है।  कश्मीर का कुल एरिया लद्दाख के कारगिल जिले के बराबर है और लेह जिला कश्मीर एरिया का तिगुना है।  
जम्मू एरिया से कुल 37 विधायक चुने जाते हैं।  लद्दाख से 4 और कश्मीर से 46 . 
कुल 87 विधायकों में 46 विधायक कश्मीर से।  सबसे छोटे इलाके से।  
फिर अचरज की क्या बात की जम्मू कश्मीर को हम कश्मीरी राजनीती से ही जानते हैं।  महबूबा मुफ़्ती , फारूख बाप बेटा , गुलाम नबी आजाद।  यही जम्मू कश्मीर को रिप्रेजेंट करते हैं।  
जम्मू कश्मीर की कुल आबादी में 68 % मुस्लिम हैं।  और इसीलिए गुलाम नबी आजाद ने पिछले चुनाव में कहा था की जम्मू कश्मीर में कोई मुख्य मंत्री बनेगा तो वो मुस्लिम ही होगा।  
लेकिन क्या आबादी में बहुलता ही सब कुछ है ? 
एरिया छोटा बड़ा महत्वपूर्ण नहीं है।  लद्दाख के हिस्से में 4 विधायक संतोषजनक हैं।  जिनमे एक विधायक का एरिया 35 हजार वर्ग किलोमीटर हैं।  कश्मीर का ढाई गुना।  क्या ये जस्टिफाइड है ? 
और प्रदेशों में आबादी कम होते हुए भी ज्यादा सीटें नहीं हैं ? 
प्रदेश की राजनीति , सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने का ये बेहद आसान तरीका है।  
कब कैसे ये विधानसभा सीटें निश्चित हुईं ? किसने किया , किसने साजिश रची , मालूम नहीं ? 
कश्मीर को लेकर फैली तमाम उत्तेजना में कुछ सवाल कभी नहीं पूछे गए।  
लेकिन अब वो सवाल सामने आएंगे जरूर।

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#कैलाश_मानसरोवर_यात्रा 
चाइना ने कैलाश मानसरोवर यात्रा रोक दी बहुत ज़ोर शोर के साथ TV पे दिखाया गया वामीयो और काँगियो ने इसे मोदी की विफलता साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी ।
चाइना मानसरोवर यात्रा रोक सकता है क्यूँ ना रोके आख़िरकार कैलाश मानसरोवर अब चाइना का हिस्सा है लेकिन वह १९६२ से पहिले भारत में था ।
यह वामपंथियों ने नहीं बताया …… नेहरु प्रधानमंत्री थे और उनका एक लटकन माने चाटुकार रक्षामंत्री नाम था वी के कृष्ण मेनन निहायद मूर्ख और गँवार ….. उसकी योग्यता बस इतनी थी की वह नेहरु का चाटुकार था।
उसने कभी देश की सेना का बल बढ़ाने के बारे में नहीं सोचा बल्कि उनका कहना था की हमारा कोई दुश्मन है नहीं चाइना दोस्त है हिंदी चीनी भाई भाई टाइप वाला और पाकिस्तान से दुश्मनी १९४८ के बाद ख़त्म हो गयी है तो महानुभाव ने संसद में प्रस्ताव रखा की सेना हटा ली जाय और कम कर दी जाय ऑर्डिनेन्स फ़ैक्टरी भी चलाने की ज़रूरत नहीं है । यह सब उनकी राय थी जिससे आप उनकी मूर्खता का अंदाज़ा स्वयं भी लगा सकते हैं !……
फिर क्या चाइना ने आक्रमण कर दिया रक्षामंत्री विदेश घूमने में इतने मगन की की एक हफ़्ते तक सेना भी नहीं भेजी । और जब भेजी तब तक चाइना २६०००० वर्ग किलॉमेटर क़ब्ज़ा कर चुका था जिसमें कैलाश मानसरोवर का भी नाम है हालाँकि सेना अपनी सामर्थ्य भर लड़ी लेकिन हम युद्ध हर गए और समझौते में नेहरु ने वह ज़मीन चाइना के हवाले कर दिया । 
जब संसद में महावीर त्यागी जी ने सवाल उठाया की यह भूमि हमको कब वापस मिलेगी तो नेहरु  जवाब था बंजर ज़मीन है कुछ नहीं उगता जाने दो ! यह कांग्रेसियत है और ऐसे थे हमारे देश के महान प्रथम प्रधानमंत्री जिनको हम चाचा नेहरु बोलते है !

लेकिन मैं तो संघी हूँ तो यह सब झूठ है कहो मैं झूठ बोलियाँ ……

कश्मीर पर कल. 

राणा प्रवीन जी की पोस्ट. 

कापी पेस्ट.

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चाइना ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए भारतीयों की एंट्री पर रोक लगा दी ।

लगा भी सकते है, भाई आखिर कैलाश मानसरोवर उनके इलाके में जो आता है ।पर क्यों आता है और कब से आता है ।

1962 से पहले कैलाश मानसरोवर भारत का हे हिस्सा था, जब तक चीन ने भारत पर हमला कर के उसे हतिया नही लिया ।

इस के लिए हम सभी नेहरु का दोषी ठहराते है, और वो थे भी, क्यों की प्रधान मंत्री तो वो ही थे तब ।

पर क्या पता है चाइना के पास इतनी हिम्मत आई कहा से की वो भारत पर हमला कर सके ।

असल में उस वक़्त भारत के एक महा मुर्ख रक्षा मंत्री थे वि. के. कृषण मेनन ।

जी हाँ मुर्ख ही नही महा मुर्ख, ये थे तो रक्षा मंत्री पर इन्हें, देश की रक्षा और सेना से कोई मतलब नही था ।

ये भारत में कम और विदेशो में ज्यादा रहते थे, इनकी काबिलियत बस यही थी की ये नेहरु के दोस्त थे और इस कारण ये रक्षा मंत्री बने वर्ना इनकी बातें सुन कर आप इन्हें अपने घर का नौकर भी न रखो ।

ये जनाब लोकसभा ये प्रस्ताव रखते थे की, अब भारत का कोई भी मुल्क दुश्मन नही है, तो हमे अपनी फौज हटा देनी चाहिए ।

जी बिलकुल, इनको महा मुर्ख ऐसे ही नही कहा मैंने, इनका कहना था चीन हमारा दोस्त है और पाकिस्तान से हमारे दुश्मनी, 1948 में ही खत्म हो गई , तो हम पर हमला ही कोन करेगा ।

इन महानुभाव ने न सिर्फ सेना में कटोती की बल्कि जो शस्त्र बनाने वाले कारखाने थे उन्हें भी बंद करवा दिया था, जिस से चीन समझ गया था की पड़ोस में मूर्खो की सरकार है, और उसने हमला कर दिया ।

इस हमले में भारत की न सिर्फ 72000 वर्ग मील ज़मीन गई बल्कि, लाखो लोगो की जान भी गई ।

हमले के बाद भी ये इतने सतर्क थे की हफ्ते भर तक तो इन्होने चीन की सेना का जवाब देने के लिए अपनी सेना ही नही भेजी ।

और नेहरु ने जब अमेरिका के कहने पर चीन से संधी की तो वो 72000 वर्ग ज़मीन उन्हें दान में देकर की ।

उसकी हारी हुई ज़मीन का हिस्सा था कैलाश मानसरोवर, जो तीर्थ तो हमारा है पर उस पर कब्ज़ा है चाइना का ।

और जब युद्ध हारने पर विपक्ष के महावीर त्यागीजी ने नेहरु से पुछा की ये ज़मीन वापस कब ली जाएगी, तो नेहरु का जवाब था की वो बंज़र ज़मीन थी, उस पर एक घास का तिनका भी नही होता था , क्या करेंगे उस ज़मीन का?

इतने महान थे हमारे चाचा नेहरु और उनके सिपेसलार ।

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पाकिस्तान व बॉगलादेश बनने व भारत विभाजन के फायदे हिंदूऔ को ?
जिन्ना ने दिया था हिंदुओं को सौ वर्ष का अभय दान

 

सभी जानते हैं 1947 भारत के बटवारे की मूल वजह क़ायदे-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना थे और जिन्ना  की जिद्द के कारण अंग्रेजों ने भारत को दो हिस्से में बाँटकर हिंदुस्तान और पाकिस्तान बना दिया क्योंकि जिन्ना का यह मत था कि हिंदुओं की संस्कृति और जीवन शैली मुसलमानों से एकदम भिन्न है अतः हिंदू और मुसलमान एक साथ एक देश में नहीं रह सकते | अगर हिंदू हिंदुस्तान में रहता है तो मुसलमानों को भी एक पाक स्थान पाकिस्तान के रूप में दिया जाना चाहिए परिणाम स्वरुप एक बड़ी हिंसा के बाद हिंदुस्तान का बाँटवारा हो गया और भारत के तीन टुकड़ों में बाँट गया | जो पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के रूप में मुसलमानों को दे दिया गया | बाद को कालांतर में श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीतिक सूझबूझ से पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान बाँटकर कर पुनः दो हिस्से हो गये | पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के नाम से जाना जाने लगा और पश्चिमी पाकिस्तान पाकिस्तान के नाम से जाना जाने लगा | सुनने में तो बहुत बुरा लगता है लेकिन यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि जिन्ना की इसी बेवकूफी के कारण हिंदुस्तान में हिंदुओं को 100 वर्ष का अभय दान मिल गया |

 

आज स्पष्ट रुप से देखा जाता है जिन स्थानों पर मुसलमानों की जनसंख्या 30% से अधिक है वहां से हिंदू प्रति वर्ष पलायन कर रहा है |
 4 जनवरी 1990 को कश्मीर के अंदर तो खुलेआम मस्जिदों के लाऊडस्पीकरों से घोषणा की गई हिंदू अपने घर की बहू-बेटी व संपत्ति छोड़कर तत्काल चले जाएं वरना उनकी हत्या कर दी जाएगी | परिणामता: 2 लाख कश्मीरी हिंदू पंडितों को कश्मीर छोड़कर पलायन करना पड़ा | इसी तरह पश्चिम उत्तर प्रदेश मैं आज बहुत बड़ी मात्रा में हिंदू पलायन कर रहा है | बंगाल के अंदर भी बांग्लादेशियों की घुसपैठ के कारण मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ने के कारण वहां से बहुत बड़ी मात्रा में मूस्लिमो के डर से  हिंदूओं को पलायन करना पड़ रहा है | इतना ही नहीं भारत में जहां-जहां मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है वहां-वहां से हिंदू पलायन करके दूसरे स्थानों पर जा रहे हैं |

 

कल्पना कीजिए अगर जिन्ना ने अलग पाकिस्तान की मांग न की होती तो वर्तमान समय में पाकिस्तान के अंदर रहने वाला 19 करोड़ मुसलमान और बंगलादेश के अंदर रहने वाला 16 करोड़ मुसलमान तथा भारत के अंदर रहने वाले 25 करोड़ मुसलमान मिलाकर कुल भारत के अंदर 70  करोड़ मुसलमान होते जो 80 करोड़ हिंदुओं को भारत छोड़ कर भागने के लिए बाध्य कर देते | यह तो जिन्ना की नासमझी और जिद्द का परिणाम था कि हिंदुस्तान का बंटवारा हुआ और हिंदुस्तान की बहुत बड़ी मुसलमान आबादी पाकिस्तान चली गई | जिससे हिंदुस्तान में हिंदुओं को 100  वर्ष तक अपने तरीके से जिंदगी जीने का अधिकार प्राप्त हो गया वर्ना जब हिंदुस्तान के अंदर मुसलमानों की जनसंख्या 50 करोड़  होती तो या तो  हिंदुस्तान का हिंदू मुसलमान हो गया होता या हिंदुस्तान छोड़कर चला गया होता | जैसे देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान में 12% हिन्दू था जो आज मात्र 1% दयनीय अवस्था में रह गया है | कुछ हिंदूऔ को मार दिया व कई हिंदूऔ को तलवार के बल मूस्लिम बना दिया है पाकिस्तान मे l

 

अगर हिंदुओं की यह पलायनवादी सोच नहीं समाप्त हुई तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के अंदर राष्ट्रपति से लेकर होमगार्ड तक सभी मुसलमान होंगे और उनके समक्ष हिंदुओं के हितों की रक्षा करने के लिए कोई भी व्यक्ति नहीं होगा | जैसे आज बांग्लादेश व पाकिस्तान में हो रहा है | 
योगेश कुमार मिश्र 

9451252162

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मानसरोवर


चाइना ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए भारतीयों की एंट्री पर रोक लगा दी ।

लगा भी सकते है, भाई आखिर कैलाश मानसरोवर उनके इलाके में जो आता है ।पर क्यों आता है और कब से आता है ।

1962 से पहले कैलाश मानसरोवर भारत का हे हिस्सा था, जब तक चीन ने भारत पर हमला कर के उसे हतिया नही लिया ।

इस के लिए हम सभी नेहरु का दोषी ठहराते है, और वो थे भी, क्यों की प्रधान मंत्री तो वो ही थे तब ।

पर क्या पता है चाइना के पास इतनी हिम्मत आई कहा से की वो भारत पर हमला कर सके ।

असल में उस वक़्त भारत के एक महा मुर्ख रक्षा मंत्री थे वि. के. कृषण मेनन ।

जी हाँ मुर्ख ही नही महा मुर्ख, ये थे तो रक्षा मंत्री पर इन्हें, देश की रक्षा और सेना से कोई मतलब नही था ।

ये भारत में कम और विदेशो में ज्यादा रहते थे, इनकी काबिलियत बस यही थी की ये नेहरु के दोस्त थे और इस कारण ये रक्षा मंत्री बने वर्ना इनकी बातें सुन कर आप इन्हें अपने घर का नौकर भी न रखो ।

ये जनाब लोकसभा ये प्रस्ताव रखते थे की, अब भारत का कोई भी मुल्क दुश्मन नही है, तो हमे अपनी फौज हटा देनी चाहिए ।

जी बिलकुल, इनको महा मुर्ख ऐसे ही नही कहा मैंने, इनका कहना था चीन हमारा दोस्त है और पाकिस्तान से हमारे दुश्मनी, 1948 में ही खत्म हो गई , तो हम पर हमला ही कोन करेगा ।

इन महानुभाव ने न सिर्फ सेना में कटोती की बल्कि जो शस्त्र बनाने वाले कारखाने थे उन्हें भी बंद करवा दिया था, जिस से चीन समझ गया था की पड़ोस में मूर्खो की सरकार है, और उसने हमला कर दिया ।

इस हमले में भारत की न सिर्फ 72000 वर्ग मील ज़मीन गई बल्कि, लाखो लोगो की जान भी गई ।

हमले के बाद भी ये इतने सतर्क थे की हफ्ते भर तक तो इन्होने चीन की सेना का जवाब देने के लिए अपनी सेना ही नही भेजी ।

और नेहरु ने जब अमेरिका के कहने पर चीन से संधी की तो वो 72000 वर्ग ज़मीन उन्हें दान में देकर की ।

उसकी हारी हुई ज़मीन का हिस्सा था कैलाश मानसरोवर, जो तीर्थ तो हमारा है पर उस पर कब्ज़ा है चाइना का ।

और जब युद्ध हारने पर विपक्ष के महावीर त्यागीजी ने नेहरु से पुछा की ये ज़मीन वापस कब ली जाएगी, तो नेहरु का जवाब था की वो बंज़र ज़मीन थी, उस पर एक घास का तिनका भी नही होता था , क्या करेंगे उस ज़मीन का? उस पर उन्होंने उत्तर दिया उगता तो हमारे ओर आपके सर पर भी कुछ नही इसका मतलब यह भी दे दे हम।

इतने महान थे हमारे चाचा नेहरु और उनके सिपेसलार ।

TMC..😠

विनोद सिंह

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बहुत से लोग कहते है, कश्मीर में हिन्दू को पुनः बसायेंगे।

पर क्या ये घटना के बाद आपको लगता है हिन्दू फिर से बसाने के बाद बचेंगे।

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अभी न्यूज़ देख रहा था ध्यान से सुनने पर एक गहराई वाली बात सुनाई दी कल कश्मीर में एक DSP मोहम्मद अयूब “पंडित” की मस्जिद के बाहर मुस्लिमो ने पीट पीटकर हत्या कर दी

न्यूज़ चैनल वाले DSP के परिवार वालो के मुह में माइक डालकर सवाल पूछ रहे थे रोते हुए एक महिला के मुहँ से सच निकल गया

उस महिला ने बुर्खे के अन्दर से बोला ” भीड़ ने मेरे अयूब को “#पंडित” समझकर पिट डाला वो उसको मुखबिर समझ रहे थे पहले अयूब से पूछ लेते वो तो वहां #नमाज पढने गया था

अगर भीड़ सिर्फ नाम में “#पंडित” होने पर ही आपको पीटकर मार डालती है तो इसका मतलब आप समझ सकते हो कश्मीर में “कश्मीरी पंडितो ” की क्या #हालात हुई होगी

माइक मुहँ में डालकर सच उगलवाने के लिए “अज्ञात” पत्रकार को धन्यवाद्

ये प्रोग्राम ABP न्यूज़ पर था

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पत्थरबाजों का समर्थन दिखा रहा है ख़ूनी रंग. श्रीनगर मस्जिद के बाहर DSP की पीट – पीट कर हत्या…

डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित मस्जिद के बाहर ड्यूटी कर रहे थे, तभी उन पर भीड़ ने हमला किया…

न्यूज़ चैनल वाले DSP के परिवार वालो के मुह में माइक डालकर सवाल पूछ रहे थे …..

रोते हुए एक महिला के मुहँ से सच निकल गया ….

उस महिला ने बुर्खे के अन्दर से बोला ” भीड़ ने मेरे अयूब को “पंडित” समझकर पिट डाला वो उसको मुखबिर समझ रहे थे …..

पहले अयूब से पूछ लेते वो तो वहां नमाज पढने गया था …. 

अगर भीड़ सिर्फ नाम में “पंडित” होने पर ही आपको पीटकर मार डालती है तो इसका मतलब आप समझ सकते हो 

कश्मीर में “कश्मीरी पंडितो ” की हालात हुई होगी…..

मुसलमान को ‘हिन्दू’ समझकर मुसलमानों ने मार डाला वह भी मस्जिद के सामने … 
अब क्या होगा ..?

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और उस पर उस मुसलमान की माँ कह रही है की पूंछ तो लेते “”हिन्दू”” है की नहीं….
अखलाक को भीड ने माराऔरDSPअयूब को भी,तब फिर अखलाक ही अकेला मासूम क्यो

एकविचार

क्या मासूमियत भी मरने व मारने वाले के धर्म से तय होगी

यदि मुस्लिम समुदाय के लिए रमजान एक पाक महिना है तो फिर इस महीने में जिस तरह DSP का खून बहाया गया उस पर अभी तक किसी मुस्लिम धर्म गुरु की कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई ? 
क्या वो इस हत्या को इस्लाम के हिसाब से जायज मान रहे हैं ?
#कश्मीर

Dr. Dhananjay Singh

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जब कश्मीर के राजपूत महाराजा हरिसिंह को मिला नेहरू और शेख अब्दुल्ला के हांथों धोखा—–

दुष्ट कांग्रेस पार्टी,राजपूतों की सबसे बड़ी दुश्मन—
क्श्मीर के आखिरी राजपूत राजा महाराजा हरि सिंह, जिन्होंने भारत में आजादी की परिकल्पना से कई साल पहले सन् 1925 में कश्मीर राज्य को स्वाधीन कराने का लक्ष्य देकर राष्ट्र्रीयता की भावना का जो परिचय पूरे भारत के सामने दिया था, को जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला जैसे सत्तालोभी नेताओं द्वारा बुरी तरह नष्ट कर दिया गया। महाराजा हरि सिंह की भारत के तत्कालीन राष्ट्र्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को लिखे गए पत्र में इस घटना का खुलासा हुआ है कि कैसे नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने साजिश के तहत मनमाने तरीके से कश्मीर के भारत में विलय को अंजाम दिया, जिससे इतनी बड़ी कश्मीर समस्या का जन्म हुआ।
17 अगस्त 1952 को लिखे गए अपने 9000 शब्दों के इस पत्र में महाराजा हरि सिंह ने देश के प्रथम राष्ट्रपति  डॉ राजेंद्र प्रसाद को आगाह किया है कि कैसे जवाहर लाल नेहरू, शेख अब्दुल्ला और लुई माउंटबेटन जिसे लोगों ने मिलकर भारतीय प्रांतों की आजादी के समय होने वाले विलय के नियमों के साथ खिलवाड़ कर अपनी मनमानी दिखाई जिसका प्रभाव आजतक कश्मीर में देखा जा सकता है। कश्यप मुनि की धरती कश्मीर का भारत में विलय राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों ही रूप से महत्वपूर्ण था। किंतु भारत के हुक्मरानों ने ऐसी चाल चली जिसे ना तो सरकारी अनुदान प्राप्त इतिहासकारों ने दिखाया और ना ही आगे आने वाली सरकारों ने ऐसे किसी पत्र को सामने आने दिया। इतिहास के साथ साथ लोगों की मानसिकता के साथ खिलवाड़ करने वाले ऐसे लोगों का सच सामने लाने के लिए सरकार को हर एक दस्तावेज को सार्वजनिक करना होगा जो भारत के इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसके बाद ही जनता नायकों, खलनायकों, धूर्तों और चाटुकारों में फर्क कर पाएगी।
महाराजा हरि सिंह ने अपने पत्र में लिखा है कि कैसे सन् 1925 में उनके जैसे देशभक्त के कश्मीर की सत्ता संभालते ही अंग्रेज तिलमिला गए क्योंकि कश्मीर उनके लिए बहुत महत्व रखता था। अंग्रजों ने वहां के मुसलमानों को भड़काकर धार्मिक विद्रोह की शुरूआत की तथा हिंदु राज का अंत और इस्लाम खतरे में जैसे नारों को जन्म दिया। कश्मीर प्रांत में चौधरी गुलाम अब्बास तथा मौलाना यूसुफ शाह जैसे नेताओं ने हिंदु विरोधी नारों के साथ नेशनल कानफ्रेंस नामक पार्टी की स्थापना की जिसे कांग्रेस पार्टी का पूरा समर्थन भी मिला। नेहरू की हिंदु विरोधी विचारधारा को देखते हुए मांउटबेटन ने हरि सिंह के पाकिस्तान में शामिल होने की संभावना के तरफ इसारा भी किया था। सन् 1947 में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने राजा हरि सिंह को पत्र लिखकर मेहर चंद महाजन को प्रधानमंत्री बनाने की सूरत में पूरा सहयोग देने का अश्वासन दिया था। हरि सिंह द्वारा महाजन को प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद पटेल ने शेख अब्दुल्ला की कश्मीर को लेकर बुरी नीयत के बारे में महाजन को अगाह भी किया था।
जवाहरलाल नेहरू ने भी महाजन को कुछ ऐसे ही लिखे पत्र में शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर की अंतरिम सरकार का मुखिया बनाकर हरि सिंह को हटाने की बीच में से हटाने की मांग की थी। नेहरू का कहना था कि शेख अब्दुल्ला ही कश्मीर का सबसे प्रसिद्ध नेता है इसलिए उसे ही राज्य का मुख्यमंत्री बनना चाहिए। उन्होंने यहां तक कि कश्मीर विलय पर चल रहे कार्यक्रम को तब तक के लिए स्थगित कर दिया था जब तक शेख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री नहीं बन जाता। महाराजा हरि सिंह को कश्मीर को लेकर मिले हुए विशेषाधिकारों के बावजूद नेहरू ने राजा पर अब्दुल्ला को बड़ा पद देने के लिए दबाव बनाना भी शुरू कर दिया था। नेहरू के कहने पर भारत की अंतरिम सरकार में मंत्री एन गोपालस्वामी अयंगार ने अब्दुल्ला के हस्ताक्षर किए हुए पत्र को स्वीकृति के लिए महाराजा के पास भेजा जिसमें अब्दुल्ला को विशेष स्थान देने की बात कही गई थी।
शेख अब्दुल्ला ने ताकत मिलते ही राजा हरि सिंह को परेशान करना शुरू कर दिया। हरि सिंह ने राष्ट्रपति से शिकायत की थी कि शेख जानबूझ कर उनको नजरअंदाज कर रहा है और नेहरू के समर्थन से अअपनी मनमानी करने में कामयाब हो रहा है। यहां तक कि राजा हरि सिंह के कश्मीर में घूमने और वहां की जनता से मिलने पर भी अब्दुल्ला ने रोक लगा दिया था। नेहरू के दबाव में हरि सिंह को कुछ महीनो के लिए मजबूरन कश्मीर छोड़ना पड़ा और इसी दौरान शेख अब्दुल्ला ने सरकारी समेत राजा की निजी संपत्तियों पर भी कब्जा करना शुरू कर दिया था। अब्दुल्ला ने हिंदुओं के खिलाफ जाते हुए राजा के धर्मार्थ ट्रस्ट को परेशान करने की नीयत से पैसे निकालने पर रोक लगा दी। अब्दुल्ला ने हिंदु मंदिरो और देव स्थानों पर पूजा करने पर भी रोक लगा दी जो नेहरू के स्वतंत्र भारत में धर्मनिरपेक्षता का पहला उदाहरण है।
हरि सिंह ने डा राजेंद्र प्रसाद को लिखे पत्र में नेहरू द्वारा भारत के संविधान के विपरीत जाते हुए अनुच्छेद 370 का दुरूपयोग कर उसे शेख अब्दुल्ला के पक्ष में परिवर्तित करने का आरोप लगाया था। राजा ने पूछा था कि “क्या भारत सरकार उस व्यक्ति को अनदेखा कर सकती है जिसने सरकार को कश्मीर में प्रवेश करने की आज्ञा दी ? वह इंसान, जिसने कश्मीर के भारत में विलय की नींव रखी, आज उसे ही कश्मीर से निकाला जा रहा है |” महाराजा हरि सिंह के नेहरू, माउंटबेटन और भारत सरकार के भरोसे और नेक सोच पर चलने के बावजूद एक ऐसे तरीके से उनका अंत करना ना ही सम्मानजक है और ना ही सही |

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कश्मीर में हुआ था बडा नरसंहार
डोडा नरसंहार – अगस्त १४, १९९३ को बस रोककर १५ हिंदुओं की हत्या कर दी गई ।

संग्रामपुर नरसंहार – मार्च २१, १९९७ घर में घुसकर ७ कश्मीरी पंडितों का अपहरण कर मार डाला गया ।

वंधामा नरसंहार – जनवरी २५, १९९८ को हथियारबंद आतंकियों ने ४ कश्मीरी परिवार के २३ लोगों को गोलियों से भून कर मार डाला ।

प्रानकोट नरसंहार – अप्रैल १७, १९९८ को उधमपुर जिले के प्रानकोट गांव में एक कश्मीरी हिन्दू परिवार के २७ लोगोंको माैत के घाट उतार दिया था, इसमें ११ बच्चे भी थे । इस नरसंहार के बाद डर से पौनी और रियासी के १००० हिंदुओं ने पलायन किया था ।

२००० में अनंतनाग के पहलगाम में ३० अमरनाथ यात्रियों की आतंकियों ने हत्या कर दी थी ।

२० मार्च २००० चित्ती सिंघपोरा नरसंहार होला मना रहे ३६ सिखों की गुरुद्वारे के सामने आतंकियों ने गोली मार कर हत्या कर दी ।

२००१ में डोडा में ६ हिंदुओं की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी ।

२००१ जम्मू कश्मीर रेलवे स्टेशन नरसंहार, सेना के रूप में आतंकियों ने रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी कर दी, इसमें ११ लोगों की मृत्यु हो गई ।

२००२ में जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर आतंकियों ने दो बार आक्रमण किया, पहला ३० मार्च और दूसरा २४ नवंबर को । इन दोनों आक्रमणों में १५ से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गई ।

२००२ क्वासिम नगर नरसंहार, २९ हिन्दू मजदूरों को मारा गया । इनमें १३ महिलाएं और एक बच्चा था ।

२००३ नदिमार्ग नरसंहार, पुलवामा जिले के नदिमार्ग गांव में आतंकियों ने २४ हिंदुओं को मृत्यु के घाट उतार दिया था ।

स्त्रोत : दैनिक भास्कर