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[14/04, 7:37 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: आदमी जब पत्तल में खाना खाता था,
और घर मे जब कोई मेहमान आता था..
मेहमान को देख के वह हरा हो जाता था,
स्वागत में पूरा परिवार बिछ जाता था….

बाद में जब वह मिट्टी के बर्तन में खाने लगा,
रिश्तों को जमीन से जुड़कर निभाने लगा..

फिर जब पीतल के बर्तन उपयोग में लेता था,
रिश्तों को साल छः महीने में चमका लेता था..

फिर परिवार स्टील के बर्तन में खाने लगा,
रिश्तों को भी लंबे समय तक निभाने लगा..

लेकिन बर्तन कांच के जब से बरतने लगे,
एक हल्की सी चोट में रिश्ते बिखरने लगे..

अब बर्तन थर्मोकोल पेपर के इस्तेमाल होने लगे,
सारे सम्बन्ध भी अब यूज़ एंड थ्रो होने लगे….!!!

[14/04, 7:40 p.m.] संस्कृति ईबुक्स: बिस्तरों पर अब सलवटें नहीं पड़ती
ना ही इधर उधर छितराए हुए कपड़े हैं
रिमोट के लिए भी अब झगड़ा नहीं होता
ना ही खाने की नई नई फ़रमायशें हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

सुबह अख़बार के लिए भी नहीं होती मारा मारी
घर बहुत बड़ा और सुंदर दिखता है
पर हर कमरा बेजान सा लगता है
अब तो वक़्त काटे भी नहीं कटता
बचपन की यादें कुछ फ़ोटो में सिमट गयी हैं
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं ।

अब मेरे गले से कोई नहीं लटकता
ना ही घोड़ा बनने की ज़िद होती है
खाना खिलाने को अब चिड़िया नहीं उड़ती
खाना खिलाने के बाद की तसल्ली भी अब नहीं मिलती
ना ही रोज की बहसों और तर्कों का संसार है
ना अब झगड़ों को निपटाने का मजा है
ना ही बात बेबात गालों पर मिलता दुलार है
बजट की खींच तान भी अब नहीं है
मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं

पलक झपकते ही जीवन का स्वर्ण काल निकल गया
पता ही नहीं चला
इतना ख़ूबसूरत अहसास कब पिघल गया
तोतली सी आवाज़ में हर पल उत्साह था
पल में हँसना पल में रो देना
बेसाख़्ता गालों पर उमड़ता प्यार था
कंधे पर थपकी और गोद में सो जाना
सीने पर लिटाकर वो लोरी सुनाना
बार बार उठ कर रज़ाई को उड़ाना
अब तो बिस्तर बहुत बड़ा हो गया है
मेरे बच्चों का प्यारा बचपन कहीं खो गया है

अब तो रोज सुबह शाम मेरी सेहत पूँछते हैं
मुझे अब आराम की हिदायत देते हैं
पहले हम उनके झगड़े निपटाते थे
आज वे हमें समझाते हैं
लगता है अब शायद हम बच्चे हो गए हैं
मेरे बच्चे अब बहुत बड़े हो गए

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जैसा खाये अन्न वैसा होगा मन  जैसे हो बर्तन वैसे ही सम्बन्ध


जैसा खाये अन्न वैसा होगा मन
जैसे हो बर्तन वैसे ही सम्बन्ध


आदमी जब पत्तल में खाना खाता था
और घर मे जब कोई मेहमान आता था
मेहमान को देख के वह हरा हो जाता था
स्वागत में पूरा परिवार बिछ जाता था

बाद में जब वह मिट्टी के बर्तन में खाने लगा
रिश्तों को जमीन से जुड़कर निभाने लगा

फिर जब पीतल के बर्तन उपयोग में लेता था
रिश्तों को साल छः महीने में चमका लेता था

फिर परिवार स्टील के बर्तन में खाने लगा
रिश्तों को भी लंबे समय तक निभाने लगा

लेकिन बर्तन कांच के जब से बरतने लगे
एक हल्की सी चोट में रिश्ते बिखरने लगे

अब बर्तन थर्मोकोल पेपर इस्तेमाल करो
सारे सम्बन्ध भी हो गए अब यूज़ एंड थ्रो

R.k. Neekhara
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एक अच्छी कविता प्राप्त हुई है, जो मनन योग्य है।

जाने क्यूँ,
अब शर्म से,
चेहरे गुलाब नहीं होते।
जाने क्यूँ,
अब मस्त मौला मिजाज नहीं होते।

पहले बता दिया करते थे,
दिल की बातें।
जाने क्यूँ,
अब चेहरे,
खुली किताब नहीं होते।

सुना है,
बिन कहे,
दिल की बात,
समझ लेते थे।
गले लगते ही,
दोस्त हालात,
समझ लेते थे।

तब ना फेस बुक था,
ना स्मार्ट फ़ोन,
ना ट्विटर अकाउंट,
एक चिट्टी से ही,
दिलों के जज्बात,
समझ लेते थे।

सोचता हूँ,
हम कहाँ से कहाँ आगए,
व्यावहारिकता सोचते सोचते,
भावनाओं को खा गये।

अब भाई भाई से,
समस्या का समाधान,
कहाँ पूछता है,
अब बेटा बाप से,
उलझनों का निदान,
कहाँ पूछता है,
बेटी नहीं पूछती,
माँ से गृहस्थी के सलीके,
अब कौन गुरु के,
चरणों में बैठकर,
ज्ञान की परिभाषा सीखता है।

परियों की बातें,
अब किसे भाती है,
अपनों की याद,
अब किसे रुलाती है,
अब कौन,
गरीब को सखा बताता है,
अब कहाँ,
कृष्ण सुदामा को गले लगाता है

जिन्दगी में,
हम केवल व्यावहारिक हो गये हैं,
मशीन बन गए हैं हम सब,
इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!

इंसान जाने कहां खो गये हैं….!

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मन्दिर लगता आडंबर , और मदिरालय में खोए हैं


रचयिता कौन है पता नहीं, पर रचना है बड़ी सुंदर..

“मन्दिर लगता आडंबर ,
और मदिरालय में खोए हैं ,”
“भूल गए कश्मीरी
पंडित ,
और अफजल पे रोए हैं……..”

“इन्हें गोधरा नहीं दिखा ,
गुजरात दिखाई देता है ,”
“एक पक्ष के लोगों का ,
जज्बात दिखाई देता है……..”

“हिन्दू को गाली देने का ,
मौसम बना रहे हैं ये ,”
“धर्म सनातन पर हँसने को ,
फैशन बना रहे हैं ये…….”

“टीपू को सुल्तान मानकर ,
खुद को बेच कर फूल गए ,”
“और प्रताप की खुद्दारी की ,
घास की रोटी भूल गए…….”

“आतंकी की फाँसी इनको ,
अक्सर बहुत रुलाती है ,”
“गाय माँस के बिन भोजन की ,
थाली नहीं सुहाती है…….”

“होली आई तो पानी की ,
बर्बादी पर ये रोते हैं ,”
“रेन डाँस के नाम पर ,
बहते पानी से मुँह धोते हैं……..”

“दीवाली की जगमग से ही ,
इनकी आँखें डरती हैं ,”
“थर्टी फर्स्ट की आतिशबाजी ,
इनको क्यों नहीं अखरती है…….”

“देश विरोधी नारों को ,
ये आजादी बतलाते हैं ,”
“राष्ट्रप्रेम के नायक संघी ,
इनको नहीं सुहाते हैं……..”

“सात जन्म के पावन बंधन ,
इनको बहुत अखरते हैं ,”
“लिव इन वाले बदन के ,
आकर्षण में आहें भरते हैं…..”

“आज समय की धारा कहती ,
मर्यादा का भान रखो ,”
“मूल्यों वाला जीवन जी कर ,
दिल में हिन्दुस्तान रखो……..”

“भूल गया जो संस्कार ,
वो जीवन खरा नहीं रहता ,”
“जड़ से अगर जुदा हो जाए ,
तो पत्ता हरा नहीं रहता……..”

“भारत माता की जय”
जय सिया राम🌹🙏🚩

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बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी


बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान करो दुष्टदलन को सज्जित होकर काल भैरव का स्तुतगान करो मत गिनो मृत्यु के कौरों को अब समर प्रासंगिक गीता का सम्मान करो गांडीव उठाओ पार्थ प्रथम अब स्थगित विकास के सौपान करो बुद्ध महावीर को भूलो कुछ दिन बन महाकाल खलप्राण हरो करो चिताभस्म से श्रृंगार अरि की समर भयंकर धनु पिनाक शरसंधान करो खोलो त्रिनेत्र अब तांडव करो हर चंडीके अब हो प्रसन्न यथेष्ट रक्तपान करो हिन्दू हृदय की सहज सौम्यता त्यागो शोकरहित हो रक्षकों में अभिमान भरो जा डटो वीर भूमि में कुछ दिन सकल सैन्य संस्थानों में जान भरो व्याकुल पांचजन्य अब वायु मांगे शक्ति साधना अपरिहार्य अब ध्यान धरो वाणी से नहीं फलता पौरुष भव रणधीर अब रिपुदमन के अभियान करो पुष्प नहीं होते अभीष्ट उत्सर्गियों को अथाह अरि शोणित से उनका पिंडदान करो हर वस्तु अवलंबित है कालगति पर सृजन, विकास तज रणभूमि को प्रस्थान करो धरो कवच! आभूषण तजकर नयनो में अब क्रोध भरो किस उलझन में पड़े हो राजन! तत्काल कटी कृपाण धरो।। बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान करो।। pramod kumar

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बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान


बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान करो दुष्टदलन को सज्जित होकर काल भैरव का स्तुतगान करो मत गिनो मृत्यु के कौरों को अब समर प्रासंगिक गीता का सम्मान करो गांडीव उठाओ पार्थ प्रथम अब स्थगित विकास के सौपान करो बुद्ध महावीर को भूलो कुछ दिन बन महाकाल खलप्राण हरो करो चिताभस्म से श्रृंगार अरि की समर भयंकर धनु पिनाक शरसंधान करो खोलो त्रिनेत्र अब तांडव करो हर चंडीके अब हो प्रसन्न यथेष्ट रक्तपान करो हिन्दू हृदय की सहज सौम्यता त्यागो शोकरहित हो रक्षकों में अभिमान भरो जा डटो वीर भूमि में कुछ दिन सकल सैन्य संस्थानों में जान भरो व्याकुल पांचजन्य अब वायु मांगे शक्ति साधना अपरिहार्य अब ध्यान धरो वाणी से नहीं फलता पौरुष भव रणधीर अब रिपुदमन के अभियान करो पुष्प नहीं होते अभीष्ट उत्सर्गियों को अथाह अरि शोणित से उनका पिंडदान करो हर वस्तु अवलंबित है कालगति पर सृजन, विकास तज रणभूमि को प्रस्थान करो धरो कवच! आभूषण तजकर नयनो में अब क्रोध भरो किस उलझन में पड़े हो राजन! तत्काल कटी कृपाण धरो।। बजने दो अब रणभेरी तुम रणचंडी का आह्वान करो।। pramod kumar

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सारे रिश्ते देह के , मन का केवल यार| यारी जब से हो गई , जीवन है गुलज़ार||


सारे रिश्ते देह के ,
मन का केवल यार|
यारी जब से हो गई ,
जीवन है गुलज़ार||

 

मन ने मन से कर लिया आजीवन अनुबन्ध|
तेरी मेरी मित्रता स्नेहसिक्त सम्बन्ध||

मित्र सरीखा कौन है,
इस दुनिया में मर्द|
बाँट सके जो दर्द को
बन कर के हमदर्द||

 

मीत बनो तो यूँ बनो,
जैसे शिव और राम |
इक दूजे का रात दिन ,
जपे निरन्तर नाम ||

 

मेरी हर शुभकामना ,
फले तुझे ऐ यार
यश धन बल आरोग्य से ,
दमके तेरा घर संसार ||

 

चाहे दुःख का रुदन हो ,
चाहे सुख के गीत
रहना मेरे साथ में,
हर दम मेरे मीत||