Posted in कविता - Kavita - કવિતા

“हर उस बेटे को समर्पित जो घर से दूर है”

बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
जो तकिये के बिना कहीं…भी सोने से कतराते थे…
आकर कोई देखे तो वो…कहीं भी अब सो जाते हैं…
खाने में सो नखरे वाले..अब कुछ भी खा लेते हैं…
अपने रूम में किसी को…भी नहीं आने देने वाले…
अब एक बिस्तर पर सबके…साथ एडजस्ट हो जाते हैं…
बेटे भी घर छोड़ जाते हैं.!!
घर को मिस करते हैं लेकिन…कहते हैं ‘बिल्कुल ठीक हूँ’…
सौ-सौ ख्वाहिश रखने वाले…अब कहते हैं ‘कुछ नहीं चाहिए’…
पैसे कमाने की जरूरत में…वो घर से अजनबी बन जाते हैं
लड़के भी घर छोड़ जाते हैं।
बना बनाया खाने वाले अब वो खाना खुद बनाते है,
माँ-बहन-बीवी का बनाया अब वो कहाँ खा पाते है।
कभी थके-हारे भूखे भी सो जाते हैं।
लड़के भी घर छोड़ जाते है।
मोहल्ले की गलियां, जाने-पहचाने रास्ते,
जहाँ दौड़ा करते थे अपनों के वास्ते,,,
माँ बाप यार दोस्त सब पीछे छूट जाते हैं
तन्हाई में करके याद, लड़के भी आँसू बहाते है
लड़के भी घर छोड़ जाते हैं
नई नवेली दुल्हन, जान से प्यारे बहिन- भाई,
छोटे-छोटे बच्चे, चाचा-चाची, ताऊ-ताई ,
सब छुड़ा देती है साहब, ये रोटी और कमाई।
मत पूछो इनका दर्द वो कैसे छुपाते हैं,
बेटियाँ ही नही साहब, बेटे घर छोड़ जाते हैं

massom__neeraj

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

एडमिन को यह कविता समर्पित करते हुये बड़े हर्ष का अनुभव हो रहा है……

मन में थी मिलने की इच्छा,
तभी तो हम सबको मिलाया है,
आपस में कर सलाह-मशवरा,
एडमिन्स ने यह ग्रुप बनाया है।
लगता था पहले जहाँ अंधेरा,
एक दीपक उसने जलाया है,
हर मैसेज एक किरण होगी,
ऐसा ही प्रकाश जगमगाया है।
जब मिट गई आस मिलन की
तब छलकाई उसने ये प्याली है
संदेशे पढ़कर सभी के होठों पर
छाई खुशहाली की यह लाली है
सच्चे संबंध कहाँ इस जीवन में,
फिर भी हंसकर गले लगाया है,
लाईक और वॉह-वॉह करके ही
इतना बढ़िया सा ग्रुप सजाया है
इतनी सारी मुश्किलों के सामने,
इस कविता को बनाया है,
मन में थी मिलने की इच्छा,
तभी तो एडमिन ने ग्रुप बनाया है

🌷ग्रुप में विराजमान सभी अनमोल रत्नों को भी समर्पित..👏

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

સૂના સમદરની પાળે રે, આઘા સમદરની પાળે

સૂના સમદરની પાળે રે, આઘા સમદરની પાળે,

ઘેરાતી રાતના છેલ્લા શ્વાસ ઘૂંટે છે એક બાળુડો રે

સૂના સમદરની પાળે

નો’તી એની પાસ કો માડી રે, નો’તી એની પાસ કો બેની

વ્હાલાના ઘાવ ધોનારી, રાત રોનારી કોઈ ત્યાં નો’તી રે

સૂના સમદરની પાળે

વેગે એનાં લોહી વ્હેતાં’તાં રે, વેગે એનાં લોહી વ્હેતાં’તાં,

બિડાતા હોઠના છેલ્લા બોલ ઝીલન્તો એક ત્યાં ઊભો રે

સૂના સમદરની પાળે

વીરા મારો દેશડો દૂરે રે, વીરા મારું ગામડું દૂરે,

વાલીડા દેશવાસીને સોંપજે મોંઘી તેગ આ મારી રે

સૂના સમદરની પાળે

એ ને એંધાણીએ કે’જે રે, એ ને નિશાણીએ કે’જે,

રાજેસર ગામ ને રેવાતીરનો વાસી દૂર પોઢયો છે રે

સૂના સમદરની પાળે

લીલૂડા લીંબડા હેઠે રે, લીલૂડા લીંબડા હેઠે,

ભેળા થૈ પૂછશે ભાંડુ, રણઘેલુડો કેમ રોકાણો રે

સૂના સમદરની પાળે

માંડીને વાતડી કે’જે રે,માંડીને વાતડી કે’જે,

ખેલાણા કોડથી કેવા કારમા રૂડા ખેલ ખાંડાના રે

સૂના સમદરની પાળે

કે’જે સામા પાવ ભીડંતા રે, કે’જે સામા ઘાવ ઝીલન્તા,

ઊભા’તા આપણા વંકા વીર રોકીને વાટ વેરીની રે

સૂના સમદરની પાળે

લોકોએ કેટલાંય હૃદયસ્થ ગીતોને લોકગીત માની લીધાં છે પણ એ વાસ્તવમાં હોય છે કોઈ કવિ-ગીતકારોની રચનાઓ, જેમકે કસુંબીનો રંગ, શિવાજીનું હાલરડું, જનનીની જોડ સખી નહીં જડે રે લોલ, પગ મને ધોવા દ્યો રઘુરાય-વગેરેને લોકોએ તો લોકગીત જેવાં જ ચાહ્યાં છે પણ એ લોકઢાળનાં ગીતો છે, લોકગીતો નથી. એવું સંભવ છે કે પાંચ-દસ દાયકા પછી આ ગીતો લોકગીતોમાં ખપી જશે!

‘સૂના સમદરની પાળે રે…’ રાષ્ટ્રીય શાયર ઝવેરચંદ મેઘાણીનું કરૂણશૌર્યથી છલકાતું બેનમૂન ગીત છે. સને ૧૯૩૦માં સાબરમતી જેલવાસ દરમિયાન મેઘાણીભાઈએ ‘રોયલ રીડર’ના જૂના અંકમાં પ્રગટ થયેલું કેરોલીન શેરીડાન નોર્ટન નામના કવિનું અંગ્રેજી કથાગીત ‘બીન્જન ઓન ધ રહાઈન’ વાંચ્યું ને એનું ગુજરાતીમાં ભાષાંતર નહીં પણ રૂપાંતર ‘સૂના સમદરની પાળે’ સ્વરૂપે કર્યું. મૂળ રચનામાં જર્મનીની રહાઈન નદીને રૂપાંતરિત કરી ગુજરાતની લોકમાતા રેવા એટલે કે નર્મદારૂપે!

ભારત માતાની આઝાદી ઈચ્છતા નવલોહિયા જુવાનો ગામે ગામથી નીકળી પડયા છે, અંગ્રેજો કત્લેઆમ ચલાવી રહ્યા છે જેમાં અનેકાનેક યુવાઓ શહીદી પામ્યા પણ આ ગીતમાં જેની વાત છે એકાકી સપૂત બુરી રીતે ઘાયલ થઈ સંધ્યાટાણે સમુદ્રને તીરે છેલ્લા શ્વાસ શ્વસી રહ્યો છે, એને કશુંક કહેવું છે, અન્ય એક યોદ્ધો ત્યાંથી પસાર થાય છે, એને બોલાવી ઝટઝટ પોતાના આખરી બોલ સુણાવે છે કે હું રેવાતીરના રાજેસર ગામનો છું, મારું ગામ તો અહીંથી દૂર છે એટલે ત્યાં જઈ મારી શહીદીના ખબર આપી દેજે ને મારી આ તલવાર કોઈ વીરને સોંપજે જેથી મારું આઝાદીનું અધૂરું સપનું તે પૂરું કરે!

તું મારા ગામમાં જઈશ એટલે પાદરમાં લીમડા નીચે મારી વાટ જોતા મારા ભાઈબંધો તને મળશે એને માંડીને વાત કરજે કે માતૃભૂમિને ગુલામીમાંથી મુક્ત કરાવવા આપણા વીરબંકાઓએ કેવા ઘાવ ઝીલ્યા અને સામા ઘાવ દીધા. આવી જ રીતે મારી માતા, મારી બેન અને ભવિષ્યમાં મારી જીવનસંગિની થવા ઈચ્છુકને પણ મારી શૌર્યગાથા સંભળાવજે.

શૂરવીર પિતાને ખોળે બેસીને બાલ્યકાળમાં એમના ધીંગાણાંની વાતો સાંભળીને પોતાનામાં દેશપ્રેમના સંસ્કાર ઉતરી આવ્યા હતા એટલે જ તો પિતાના મોતબિછાને જયારે ભાઈઓ વચ્ચે મિલકતના ભાગ પડયા ત્યારે પોતે પિતાજીની વાંકડી તલવાર વારસામાં માગી હતી!

મુખડું અને ૪૧ અંતરાનું દીર્ઘ, આંખમાં આંસુ ઉભરાવનારું આ શૌર્યગીત યુવા શ્રોતાઓ સમક્ષ થતા લોકસંગીતના કાર્યક્રમોનું ‘રતન’ છે.

સોના વાટકડી રે – નીલેશ પંડયા

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

खिचड़ी का अविष्कार।

कई वर्षों पहले एक बार,
दिन का नाम था रविवार।

पति-पत्नी की एक जोड़ी थी,
नोंकझोंक जिनमें थोड़ी थी।

अधिक था उनमें प्यार,
मीठी बातों का अम्बार।

सुबह पतिदेव ने ली अंगड़ाई,
पत्नी ने बढ़िया चाय पिलाई।

फिर नहाने को पानी किया गर्म,
निभाया अच्छी पत्नी का धर्म।

पति जब नहाकर निकल आए,
पत्नी ने बढ़िया पकौड़े खिलाए।

फिर पतिदेव ने समाचार-पत्र पकड़ा,
दोनों हाथों में उसे कसकर जकड़ा।

अगले तीन घंटे तक न खिसके,
रहे वो समाचार-पत्र से चिपके।

पत्नी निपटाती रही घर के काम,
मिला न एक पल भी आराम।

एक पल को जो कुर्सी पर टिकी,
पति ने तुरंत फरमाइश पटकी।

बोले अब नींद आ रही है ढेर सारी,
प्रियतमा बना दो पूड़ी और तरकारी।

पत्नी बोली मैं हूँ आपकी आज्ञाकारी,
लेकिन फ्रिज में नहीं है तरकारी।

पति बोले दोपहर तक कोहरा छाया है,
सूरज को भी बादलों ने छिपाया है।

ऐसे में तरकारी लेने तो न जाऊँगा,
छोड़ो पूड़ी, दाल-चावल ही खाऊँगा।

पत्नी बोली थोड़ी देर देखिए टीवी,
अभी खाना बनाकर लाती बीवी।

पति तुरंत ही गए कमरे के अंदर,
पत्नी ने रसोई में खोले कनस्तर।

दाल-चावल उसमें रखे थे पर्याप्त,
पर सिलेंडर होने वाला था समाप्त।

बन सकते थे चावल या फिर दाल,
क्या बनाएँ क्या न का था सवाल।

कोहरा, बादल और था थरथर जाड़ा,
सूरज निकले गुजर चुका था पखवाड़ा।

कैसे कहती पत्नी कि सिलेंडर लाना है
वरना दाल-चावल को भूल जाना है।

इतनी ठंड में पति को कैसे भेजूँ बाजार,
काँप-काँप उनका हो जाएगा बँटाधार।

इस असमंजस से पाने के लिए मुक्ति,
धर्मपत्नी ने लगायी एक सुंदर युक्ति।

कच्ची दाल में कच्चे चावल मिलाए,
धोकर उसने तुरंत कुकर में चढ़ाए।

कुछ देर में एक लम्बी सी आई सीटी,
पति के पेट में चूहे करने लगे पीटी।

पत्नी ने मेज पर खिचड़ी लगायी,
साथ में अचार और दही भी लायी।

नया व्यंजन देखकर दिमाग ठनका,
और पति के मुख से स्वर खनका।

बोले न तो है चावल न ही है दाल,
दोनों को मिलाजुला ये क्या है बवाल।

पत्नी बोली सिलेंडर हो गया खाली,
इसलिए मैंने चावल-दाल मिला डाली।

एक बार ही कुकर था चढ़ सकता,
दाल-चावल में से कोई एक पकता।

इतनी ठंड में आप जो बाहर जाते,
अगले दो घण्टे तक कँपकँपाते।

इसलिए मैंने इन दोनों को मिलाया,
आपके लिए ये नया व्यंजन बनाया।

खाने से पहले धारणा मत बनाइए,
तनिक एक चम्मच तो चबाइए।

पेट में चूहे घमासान मचा रहे थे,
चावल देख पति ललचा रहे थे।

नुक्ताचीनी और नखरे छोड़कर,
खाया एक कौर चम्मच पकड़कर।

नये व्यंजन का नया स्वाद आया,
पत्नी का नवाचार बहुत भाया।

बोले अद्भुत संगम तुमने बनाया,
और मुझे ठण्ड से भी है बचाया।

तृप्त हूँ मैं ये नया व्यंजन खाकर,
और धन्य हूँ तुम-सी पत्नी पाकर।

पर एक बात तो बताओ प्रियतमा,
क्या नाम है इसका, क्या दूँ उपमा।

पत्नी बोली पहली बार इसे बनाया,
नाम इसका अभी कहाँ है रख पाया।

खिंच रही थी गैस दुविधा थी बड़ी,
इसलिए इसको बुलाएँगे खिचड़ी।

मित्रों इनके सामने जब समस्या हुई खड़ी,
न तो पति चिल्लाया न ही पत्नी लड़ी।

आपके समक्ष भी आए जब ऐसी घड़ी,
प्रेम से पकाइएगा कोई नयी खिचड़ी।

तो इस पूरी घटना का जो निकला सार,
उसे हम कह सकते हैं कुछ इस प्रकार।

कि पति-पत्नी में जब हो असीम प्यार,
तो हो जाता है खिचड़ी का अविष्कार

रामचंद्र आर्य

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

Just Beautiful …….

🌹 गुफ़्तगू 🌹

उसने कहा- बेवजह ही
खुश हो क्यों?
मैंने कहा- हर वक्त
दुखी भी क्यों रहूँ !

उसने कहा- जीवन में
बहुत गम हैं,
मैंने कहा -गौर से देख,
खुशियां भी कहाँ कम हैं।

उसने तंज़ किया –
ज्यादा हँस मत,
नज़र लग जाएगी,
मेरा ठहाका बोला-
चिकनी हूँ,
फिसल जाएगी।

उसने कहा- नहीं होता
क्या तनाव कभी ?
जवाब दिया- मैंने ऐसा
तो कहा नहीं!

उसकी हैरानी बोली-
फिर भी यह हँसी?
मैंने कहा-डाल ली आदत
हर घड़ी मुसकुराने की!

फिर तंज़ किया-अच्छा!!
बनावटी हँसी, इसीलिए
परेशानी दिखती नहीं।
मैंने कहा-
अटूट विश्वास है,
प्रभु मेरे साथ है,
फिर चिंता-परेशानी की
क्या औकात है।
कोई मुझसे “मैं दुखी हूँ”
सुनने को बेताब था,
इसलिए प्रशनों का
सिलसिला भी
बेहिसाब था

पूछा – कभी तो
छलकते होंगे आँसू ?
मैंने कहा-अपनी
मुसकुराहटों से बाँध
बना लेता हूँ,
अपनी हँसी कम पड़े तो
कुछ और लोगों को
हँसा देता हूँ ,
कुछ बिखरी ज़िंदगियों में
उम्मीदें जगा देता हूँ…
यह मेरी मुसकुराहटें
दुआऐं हैं उन सबकी
जिन्हें मैंने तब बाँटा,
जब मेरे पास भी
कमी थी।

बीके लवकेश
🌹🧘🏼‍♂👨‍👨‍👦‍👦😌🙏🏻

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

“👩पत्नी की फटकार” का महत्व- 😍😳🤣

पत्नी की फटकार सुनी जब,
तुलसी भागे छोड़ मकान l
राम चरित मानस रच डाला,
जग में बन गए भक्त महान ll

पत्नी छोड़ भगे थे जो जो,
वही बने विद्वान महान l
गौतम बुद्ध महावीर तीर्थंकर,
पत्नी छोड़ बने भगवान ll

पत्नी छोड़ जो भागे मोदी
हुए आज हैं पंत प्रधान l
अडवाणी ना छोड़ सके तो,
देख अभी तक हैं परेशान ll

नहीं किया शादी पप्पू ने,
नहीं सुनी पत्नी की तान l
इसीलिए फिरता है भटकता,
बन न सका नेता महान ll

हम भी पत्नी छोड़ न पाए,
इसीलिए तो हैं परेशान l
पत्नी छोड़ बनो सन्यासी,
पाओ मोक्ष और निर्वाण ll

कविता का केवल आनन्द लें, रिस्क केवल अपने दम पर लें…. क्योंकि, लेखक स्वयं लापता है
😂😍🤩😎🤓😳🤣

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

मत कहना, हम ओल्ड हो गये!
हम तो तपकर गोल्ड हो गये।

जीवन के झंझावातों से
लड़ना, हमने मिलकर सीखा,
कैसे-कैसे मोड़ से गुजरे,
आगे बढ़ना हमने सीखा।

अनुभवों का अब साथ समंदर,
है न अब, चुनौती का डर.
जो आयेगा, टल जायेगा,
हम तो भाई, बोल्ड हो गये।

अब जीवन के नये रंग हैं,
नयी पीढ़ी के नये ढंग हैं.
पर बच्चों का, अपनों का भी,
प्यारा-प्यारा संग, संग है।

जीवन की यह सांझ सुनहरी,
ढल गई वह बीती दोपहरी.
नयी हैं राहें, नयी निगाहें,
करने को मन कुछ खुद चाहे.
खुलकर जी लें, खुलकर हँस लें.
बस जीवन यह कहना चाहे।

सचमुच हम तो बोल्ड हो गये.

मत कहना हम ओल्ड हो गये!
हम तो तपकर गोल्ड हो गये।🙏

रामेश्वर लाल