Posted in कविता - Kavita - કવિતા

ટાઇટલ,, ,,,,,,,
કાનો માત્રા વિના કવિત

હર હર હર ભજ નવ રહ અહમ પર,
ધરમ ધર મન પર ,કર પર જલ ધર,

ખલક પર ડગ ધર,અડગ રહ ઇશ પર,
નવ રહ અધમ ધર,પર સંગ પર રહ ,

વચન ભંગ નવ કર,કથન કર કરમ કર,
વચન કર સત પર,શક ભ્રમ નવ કર ,

ભજન કર નમન કર,અમર રહ ખલક પર,
નર ઉર હર ભજ, મન રખ સત સંગ પર ,

રચિયતા,,,
રાજેશભાઇ વ્યાસ,
ધ્રુવનગર, મોરબી

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

यह कविता जिसने भी लिखी प्रशंसनीय है।
हिन्दी वर्णमाला का क्रम से कवितामय प्रयोग-सराहनीय है।

चानक
कर मुझसे
ठलाता हुआ पंछी बोला
श्वर ने मानव को तो
त्तम ज्ञान-दान से तौला
पर हो तुम सब जीवों में
ष्य तुल्य अनमोल
क अकेली जात अनोखी
सी क्या मजबूरी तुमको
ट रहे होंठों की शोख़ी
र सताकर कमज़ोरों को
अं ग तुम्हारा खिल जाता है
अ: तुम्हें क्या मिल जाता है.?
हा मैंने- कि कहो
ग आज सम्पूर्ण
र्व से कि- हर अभाव में भी
र तुम्हारा बड़े मजे से
ल रहा है
छो टी सी- टहनी के सिरे की
गह में, बिना किसी
गड़े के, ना ही किसी
कराव के पूरा कुनबा पल रहा है
ठौ र यहीं है उसमें
डा ली-डाली, पत्ते-पत्ते
लता सूरज
रावट देता है
कावट सारी, पूरे
दि वस की-तारों की लड़ियों से
न-धान्य की लिखावट लेता है
ना दान-नियति से अनजान अरे
प्र गतिशील मानव
फ़ रेब के पुतलो
न बैठे हो समर्थ
ला याद कहाँ तुम्हें
नुष्यता का अर्थ.?
ह जो थी, प्रभु की
चना अनुपम…
ला लच-लोभ के
शीभूत होकर
र्म-धर्म सब तजकर
ड्यंत्रों के खेतों में
दा पाप-बीजों को बोकर
हो कर स्वयं से दूर
क्ष णभंगुर सुख में अटक चुके हो
त्रा स को आमंत्रित करते
ज्ञा न-पथ से भटक चुके हो।

🕯️🕯️🕯️
अंग्रेजी के वर्णमाला का बहुत कुछ पढ़ा है,
पहली बार हिंदी में सुंदर प्रयोग है।।

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

हमारा देसी पंचाग कैलेंडर

प्रथम महीना चैत से गिन
राम जनम का जिसमें दिन।।

द्वितीय माह आया वैशाख। तेरी
वैसाखी पंचनद की साख।।

ज्येष्ठ मास को जान तीसरा।
अब तो जाड़ा सबको बिसरा।।

चौथा मास आया आषाढ़।
नदियों में आती है बाढ़।।

पांचवें सावन घेरे बदरी।
झूला झूलो गाओ कजरी।।

भादौ मास को जानो छठा।
कृष्ण जन्म की सुन्दर छटा।।

मास सातवां लगा कुंआर।
दुर्गा पूजा की आई बहार।।

कार्तिक मास आठवां आए।
दीवाली के दीप जलाए।।

नवां महीना आया अगहन।
सीता बनीं राम की दुल्हन।।

पूस मास है क्रम में दस।
पीओ सब गन्ने का रस।।

ग्यारहवां मास माघ को गाओ।
समरसता का भाव जगाओ।।

मास बारहवां फाल्गुन आया।
साथ में होली के रंग लाया।।

बारह मास हुए अब पूरे।
छोड़ो न कोई काम अधूरे।।
प्रस्तुत है हिंदू देशी पंचाग!
काम आवेगा सदैव श्रीमान!!
राकेशाहू🥰🙏🌹

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

.
तू अपनी खूबियाँ ढूंढ,
कमियाँ निकालने के लिये
लोग हैं..अगर रखना है कदम, तो आगे रख, पीछे खींचने के लिये *लोग हैं...* सपने देखने हैं तो ऊँचे देख, नीचा दिखाने के लिये *लोग हैं...* अपने अंदर जुनून की चिंगारी भड़का, जलने के लिये *लोग हैं...* अगर बनानी है तो यादें बना, बातें बनाने के लिये *लोग हैं...* प्यार करना है तो खुद से कर, दुश्मनी करने के लिये *लोग हैं...* रहना है तो बच्चा बनकर रह, समझदार बनाने के लिये *लोग हैं...* भरोसा रखना है तो खुद पर रख, शक करने के लिये *लोग हैं...* तू बस सँवार ले खुद को, आईना दिखाने के लिये *लोग हैं...* खुद की अलग पहचान बना, भीड़ में चलने के लिये *लोग हैं...* तू कुछ करके दिखा दुनियाँ को, तालियाँ बजाने के लिये *लोग हैं*...

अरुण सुक्ला

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

એક પાંદડું, જીદે ચડ્યું,


એક પાંદડું, જીદે ચડ્યું,
થયું નિજ પરિવારથી જુદું.

  ઝાડથી  છૂટું  પડીને  એ  પાંદડું
  ખૂબ  હરખાય  છે,
  હાશ !  છૂટયા  હવે  આ  ભીડથી,
  મનથી  એ  મલકાય  છે.

  વાયુ  સાથે  વહેતું  વહેતું
  આમ તેમ  લહેરાય  છે,
  સૃષ્ટિ  બહારની  ખૂબ  સુંદર  છે !
  એને  એવું  મનમાં  થાય  છે.

  ઝાડ  પર  રહ્યાં  ચિપકીને
  ત્યાં  આમ  ક્યાં  રખડાય  છે !
  ત્યાં  તો  બસ  બીજાઓ,
  મારી  સાથે  રોજ  અથડાય  છે,

  અહીં  તો  વાયુ  સાથે
  મજેથી  ઉડીને  જવાય  છે,
  ને  ઝરણાની  સાથે  ખળખળ
  ગીતો  મજાના  ગવાય  છે.

  પાણી  સાથે  ઉછળતાં
  ને કૂદતાં  એ  મલકાય  છે,
  પણ  સુખ  ક્ષણભંગૂર  છે
  એ  એને  ક્યાં  સમજાય  છે.

  ઝરણાંમાંથી  વહેતું  જ્યારે
  કિનારે  પહોંચી  જાય  છે,
  જાનવરોનાં  ખર  નીચે
  જ્યારે  ખૂબ  રગદોળાય  છે.

  પીડાથી  કણસતું  એ
  હવે ખૂબ  પસ્તાય  છે,
  ઝાડ  સાથે  જોડાયેલા  હોવાનું
  મૂલ્ય  એને  સમજાય  છે.

  આઝાદી  વ્હાલી  લાગે
  પણ મોંઘી  સાબિત  થાય  છે,
  સંયુકત પરિવાર  બન્ધન  નહિં
  પણ  જીવનનો  સાચો  પર્યાય  છે.

સંયુક્ત પરિવાર સુખી પરિવાર…

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

घर चाहे कैसा भी हो उसके एक कोने में खुलकर हंसने की जगह रखना


घर चाहे कैसा भी हो
उसके एक कोने में
खुलकर हंसने की जगह रखना

सूरज कितना भी दूर हो
उसको घर आने का रास्ता देना

कभी कभी छत पर चढ़कर
तारे ज़रूर गिनना
हो सके तो हाथ बढ़ा कर
चाँद को छूने की कोशिश करना

अगर हो लोगों से मिलना जुलना
तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना

भीगने देना बारिश में
उछल कूद भी करने देना
हो सके तो बच्चों को
एक काग़ज़ की किश्ती चलाने देना

कभी हो फुरसत, आसमान भी साफ हो
तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना
हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना

घर के सामने रखना एक पेड़
उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य  सुनना

घर चाहे कैसा भी हो 
घर के एक कोने में
खुलकर हँसने की जगह रखना

चाहे जिधर से गुज़रिये
मीठी सी हलचल मचा दिजिये,

उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है
अपनी उम्र का मज़ा लीजिए

ज़िंदा दिल रहिए जनाब
ये चेहरे पे उदासी कैसी
वक़्त तो बीत ही रहा है
उम्र की ऐसी की तैसी..!
Posted in कविता - Kavita - કવિતા

ગીત (શતતંતી જંતર આ જીવતર)

જાતાં પૂજ્યાં ડુંગર – કોતર
વળતાં ઝાંખર- ઝાડ જી
તારે આંગણ આવીને મેં
માણ્યો મનનો ઉઘાડ જી

શતતંતી જંતર આ જીવતર
મેળ મળે ના સ્હેજે
તું ચીંધાડે કળ કોઈ તો
તરીએ એના તેજે
લુખ્ખા સુક્કા જીવને બીજું
કોણ લડાવે લાડ જી
તારે આંગણ આવીને મેં
માણ્યો મનનો ઉઘાડ જી

વિના કારણે મારા પર હું
રીંસ કરું ને લડું
કોઈ ના જાણે એવા ખૂણે
જઇ જઇને હું રડું
મારામાં આ શું ઊગ્યું જે
ભીતર પાડે ધાડ જી
તારે આંગણ આવીને મેં
માણ્યો મનનો ઉઘાડ જી

-સંજુ વાળા Sanju Vala

કોરોના

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

‘गूंदपाक’ सियाळे में,
‘दही-छाछ’ उँधाळे में,
‘चीलड़ो’ बरसात में,
‘डॉयफ्रूट’ बारात में….

☺जीसोरो करा देवे

गलरको ‘खीर’ को,
‘कोफ़्तो’ पनीर को,
रंग ‘केसर फीणी’ को,
‘चूरमो’ देसी चीणी को….

☺जीसोरो करा देवे

रोटी ‘बाजरी’ की,
चटणी ‘काचरी’ की,
‘बाटो’ भोभर को,
बड़ो ‘मोठ-मोगर’ को…

☺जीसोरो करा देवे

सबड़को ‘राबड़ी’ को,
स्वाद ‘गुलाबड़ी’ को,
साग ‘काचर फळी’ को,
मिठास ‘गुड़ की डळी को’…..

☺जीसोरो करा देवे

खुपरी ‘मतीरा’ की,
खुशबु ‘सीरा’ की,
अचार ‘सांगरी केर’ को,
‘भुजियो’ बीकानेर को …..

☺जीसोरो करा देवे

‘कचौरी’ दाळ की,
”जळेबी’ घाळ की,
‘खीचड़ो’ बाजरी मोठ को,
मजो सावण की ‘गोठ’ को …..

☺जीसोरो करा देवे

‘दूध’ घर की गाय को,
सुरडको ‘गर्म चाय’ को,
‘राजभोग’ छेना को,
शर्बत ‘केरी पोदीना को …..

☺जीसोरो करा देवे

गप्पा “गुवाड़” की,
शान “मारवाड़” की,
मीठो पत्तो ‘पान’ को,
खाणो ‘राजस्थान’ को…

☺जीसोरो करा देवे

🌹🙏🏻 जय-जय राजस्थान🙏🌹

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

“हर उस बेटे को समर्पित जो घर से दूर है”

बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
जो तकिये के बिना कहीं…भी सोने से कतराते थे…
आकर कोई देखे तो वो…कहीं भी अब सो जाते हैं…
खाने में सो नखरे वाले..अब कुछ भी खा लेते हैं…
अपने रूम में किसी को…भी नहीं आने देने वाले…
अब एक बिस्तर पर सबके…साथ एडजस्ट हो जाते हैं…
बेटे भी घर छोड़ जाते हैं.!!
घर को मिस करते हैं लेकिन…कहते हैं ‘बिल्कुल ठीक हूँ’…
सौ-सौ ख्वाहिश रखने वाले…अब कहते हैं ‘कुछ नहीं चाहिए’…
पैसे कमाने की जरूरत में…वो घर से अजनबी बन जाते हैं
लड़के भी घर छोड़ जाते हैं।
बना बनाया खाने वाले अब वो खाना खुद बनाते है,
माँ-बहन-बीवी का बनाया अब वो कहाँ खा पाते है।
कभी थके-हारे भूखे भी सो जाते हैं।
लड़के भी घर छोड़ जाते है।
मोहल्ले की गलियां, जाने-पहचाने रास्ते,
जहाँ दौड़ा करते थे अपनों के वास्ते,,,
माँ बाप यार दोस्त सब पीछे छूट जाते हैं
तन्हाई में करके याद, लड़के भी आँसू बहाते है
लड़के भी घर छोड़ जाते हैं
नई नवेली दुल्हन, जान से प्यारे बहिन- भाई,
छोटे-छोटे बच्चे, चाचा-चाची, ताऊ-ताई ,
सब छुड़ा देती है साहब, ये रोटी और कमाई।
मत पूछो इनका दर्द वो कैसे छुपाते हैं,
बेटियाँ ही नही साहब, बेटे घर छोड़ जाते हैं

massom__neeraj

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

एडमिन को यह कविता समर्पित करते हुये बड़े हर्ष का अनुभव हो रहा है……

मन में थी मिलने की इच्छा,
तभी तो हम सबको मिलाया है,
आपस में कर सलाह-मशवरा,
एडमिन्स ने यह ग्रुप बनाया है।
लगता था पहले जहाँ अंधेरा,
एक दीपक उसने जलाया है,
हर मैसेज एक किरण होगी,
ऐसा ही प्रकाश जगमगाया है।
जब मिट गई आस मिलन की
तब छलकाई उसने ये प्याली है
संदेशे पढ़कर सभी के होठों पर
छाई खुशहाली की यह लाली है
सच्चे संबंध कहाँ इस जीवन में,
फिर भी हंसकर गले लगाया है,
लाईक और वॉह-वॉह करके ही
इतना बढ़िया सा ग्रुप सजाया है
इतनी सारी मुश्किलों के सामने,
इस कविता को बनाया है,
मन में थी मिलने की इच्छा,
तभी तो एडमिन ने ग्रुप बनाया है

🌷ग्रुप में विराजमान सभी अनमोल रत्नों को भी समर्पित..👏