Posted in कविता - Kavita - કવિતા

जीने की असली उम्र तो साठ है।
बुढ़ापे में ही असली ठाठ है।।
न बचपन का होमवर्क,
न जवानी का संघर्ष,
न 40 की परेशानियां,
बेफिक्रे दिन और सुहानी रात है।
जीने की असली उम्र तो साठ है।

बुढ़ापे में ही असली ठाठ है।।
न स्कूल की जल्दी,
न ऑफिस की किट किट,
न बस की लाइन,
न ट्रैफिक का झमेला,
सुबह रामदेव का योगा,
दिनभर खुली धूप ,
दोस्तों यारों के साथ राजनीति पर चर्चा आम है,
जीने की असली उम्र तो साठ है।

बुढ़ापे में ही असली ठाठ है।।
न मम्मी डैडी की डांट ,
न ऑफिस में बॉस की फटकार,
पोते-पोतियों के खेल,
बेटे-बहू का प्यार,
इज्जत से झुकते सर ,
सब के लिए आशीर्वाद और दुआओं की भरमार है।
जीने की असली उम्र तो साठ है।

बुढ़ापे में ही असली ठाठ है।।
न स्कूल का डिसिप्लिन,
न ऑफिस में बोलने की कोई पाबंदी,
न घर पर बुजुर्गों की रोक टोक,
खुली हवा में हंसी के ठहाके,
बेफिक्र बातें, किसी को कुछ भी कहने के लिए आज़ाद हैं ।
जीने की असली उम्र तो साठ है।
बुढ़ापे में ही असली ठाठ है।।

🌹🕺🏻💃🚘💃🏿🕺🏿🌹
सभी सेवानिवृत्त आदरणीय बंधुओं को सादर 🙏

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कहाँ पर बोलना है
और कहाँ पर बोल जाते हैं।
जहाँ खामोश रहना है
वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।

कटा जब शीश सैनिक का
तो हम खामोश रहते हैं।
कटा एक सीन पिक्चर का
तो सारे बोल जाते हैं।।

नयी नस्लों के ये बच्चे
जमाने भर की सुनते हैं।
मगर माँ बाप कुछ बोले
तो बच्चे बोल जाते हैं।।

बहुत ऊँची दुकानों में
कटाते जेब सब अपनी।
मगर मज़दूर माँगेगा
तो सिक्के बोल जाते हैं।।

अगर मखमल करे गलती
तो कोई कुछ नहीँ कहता।
फटी चादर की गलती हो
तो सारे बोल जाते हैं।।

हवाओं की तबाही को
सभी चुपचाप सहते हैं।
च़रागों से हुई गलती
तो सारे बोल जाते हैं।।

बनाते फिरते हैं रिश्ते
जमाने भर से अक्सर।
मगर जब घर में हो जरूरत
तो रिश्ते भूल जाते हैं।।

कहाँ पर बोलना है
और कहाँ पर बोल जाते हैं
जहाँ खामोश रहना है
वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।

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वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

एक ध्वज लिये हुए एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

– द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

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મારી સાથે બોલે છે ને..?
એમ પૂછીને પણ એકબીજા
સાથે બોલતા,

રીસેસમાં ફક્ત લંચ
બોક્સના નહિ,
આપણે લાગણીઓના
ઢાંકણાં પણ ખોલતા.

કિટ્ટા કર્યા પછી ફરી પાછા
બોલી જતા,

એમ ફરી એક વાર
બોલીએ,
ચાલ ને યાર,
એક જૂની નોટબુક ખોલીએ.

ચાલુ ક્લાસે
એકબીજાની સામે જોઈને
હસતા’તા,

કોઈપણ જાતના
એગ્રીમેન્ટ વગર,
આપણે એકબીજામાં
વસતા’તા.

એક વાર મારું હોમવર્ક
તેં કરી આપ્યું’તું,

નોટબુકના એ પાનાને મેં
વાળીને રાખ્યું’તું.

હાંસિયામાં જે દોરેલા,
એવા સપનાઓના ઘર હશે,

દોસ્ત,
મારી નોટબુકમાં આજે પણ
તારા અક્ષર હશે.

એક પણ પ્રશ્ન પૂછ્યા વગર
જ્યાં આપણા આંસુઓ
કોઈ લૂછતું’તું,

એકલા ઉભા રહીને
શું વાત કરો છો..?
એવું ત્યારે ક્યાં કોઈ
પૂછતું’તું..?

ખાનગી વાત કરવા માટે
સાવ નજીક આવી,
એક બીજાના કાનમાં
કશુંક કહેતા’તા…

ત્યારે ખાનગી કશું જ નહોતું
અને છતાં ખાનગીમાં
કહેતા’તા.

હવે, બધું જ ખાનગી છે
પણ કોની સાથે શેર કરું..?
નજીકમાં કોઈ કાન નથી…

દોસ્ત, તું કયા દેશમાં છે..?
કયા શહેરમાં છે..?
મને તો એનું પણ ભાન નથી.

બાકસના ખોખાને
દોરી બાંધીને
ટેલીફોનમાં બોલતા,
એમ ફરી એક વાર
બોલીએ,

ચાલ ને યાર,
એક જૂની નોટબુક ખોલીએ.

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पत्नी की फटकार का महत्व- 👩

पत्नी की फटकार सुनी जब,
तुलसी भागे छोड़ मकान।
राम चरित मानस रच डाला,
जग में बन गए भक्त महान।।

पत्नी छोड़ भगे थे जो जो,
वही बने विद्वान महान।
गौतम बुद्ध महावीर तीर्थंकर,
पत्नी छोड़ बने भगवान।।

पत्नी छोड़ जो भागे मोदी
हुए आज हैं पंत प्रधान।।
अडवाणी ना छोड़ सके तो,
देख अभी तक हैं परेशान।।

नहीं कि है शादी पप्पू ने,
नहीं सुनी पत्नी की तान।
इसीलिए फिरते है भटकते,
बन न सके राजनेता महान।।

हम भी पत्नी छोड़ न पाए,
इसीलिए तो हैं परेशान।
पत्नी छोड़ बनो सन्यासी,
पाओ मोक्ष और निर्वाण।।

(हास्य कविता का आनन्द लीजिये,,,, )
प्रेम से बाेलाे राघे राघे

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ये मोबाइल यूँ ही हट्टा कट्टा नहीं

बहुत कुछ खाया – पीया है इसने
मसलन
ये हाथ की घड़ी खा गया 
ये टॉर्च – लाईटे खा गया
ये चिट्ठी पत्रियाँ खा गया
ये किताब खा गया
ये रेडियो खा गया
ये टेप रिकॉर्डर खा गया
ये कैमरा खा गया
ये कैल्क्युलेटर खा गया
ये परोस की दोस्ती खा गया
ये मेल – मिलाप खा गया
ये हमारा वक्त खा गया
ये हमारा सुकून खा गया
ये पैसे खा गया
ये रिश्ते खा गया
ये यादास्त खा गया
ये तंदुरूस्ती खा गया
कमबख्त
इतना कुछ खाकर ही स्मार्ट बना
बदलती दुनिया का ऐसा असर
होने लगा
आदमी पागल और फोन स्मार्ट
होने लगा
जब तक फोन वायर से बंधा था
इंसान आजाद था
जब से फोन आजाद हुआ है
इंसान फोन से बंध गया है
ऊँगलिया ही निभा रही रिश्ते
आजकल
जुवान से निभाने का वक्त कहाँ है
सब टच में बिजी है
पर टच में कोई नहीं है ।

 

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આદમીની ઓકાત

બાકસની એક દિવાસળી,
ધી નો એક લોટો,
લાકડાના ઢગલા ઉપર,
થોડા કલાકમાં રાખ….
બસ આટલી છે
આદમીની ઓકાત!!!!

એક બુઢા બાપ,
સાંજે મરી ગયા,
પોતાની આખી જીંદગી,
પરિવારના નામે કરી ગયા,
ક્યાંક રડવાનો અવાજ,
તો ક્યાંક વાતમાં વાત,
અરે જલ્દી લઈ જાઓ,
કોણ રાખશે આખી રાત….
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

મર્યા પછી નીચે જોયું,
નજારો નજર સામે જોયો,
પોતાના મરણ પર,
કોઈ લોકો જબરજસ્ત,
તો કોઈ લોકો જબરજસ્તી,
રડતાં હતાં……..
નથી રહ્યા… જતાં રહ્યાં…….
ચાર દિવસ કરશે વાત…
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

છોકરો સારો ફોટો બનાવશે,
સામે અઞરબતી મુકશે,
સુગંધી ફુલોની માળા હશે,
અશ્રુ ભરી શ્રધ્ધાંજલિ હશે,
પછી એ ફોટા પર,
ઝાળા પણ કોન કરશે સાફ..
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

આખી જીંદગી,
મારૂ- મારૂં કર્યુ,
પોતાના માટે ઓછું,
બીજાના માટે વધારે જીવ્યા,
કોઈ નહીં આપે સાથ,
જશો ખાલી હાથ,
તલભાર સાથે લઈ જવાની,
નથી ઓકાત,
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

*તો પછી જીવનમાં ધમંડ શું કામ??*