Posted in कविता - Kavita - કવિતા

મારી સાથે બોલે છે ને..?
એમ પૂછીને પણ એકબીજા
સાથે બોલતા,

રીસેસમાં ફક્ત લંચ
બોક્સના નહિ,
આપણે લાગણીઓના
ઢાંકણાં પણ ખોલતા.

કિટ્ટા કર્યા પછી ફરી પાછા
બોલી જતા,

એમ ફરી એક વાર
બોલીએ,
ચાલ ને યાર,
એક જૂની નોટબુક ખોલીએ.

ચાલુ ક્લાસે
એકબીજાની સામે જોઈને
હસતા’તા,

કોઈપણ જાતના
એગ્રીમેન્ટ વગર,
આપણે એકબીજામાં
વસતા’તા.

એક વાર મારું હોમવર્ક
તેં કરી આપ્યું’તું,

નોટબુકના એ પાનાને મેં
વાળીને રાખ્યું’તું.

હાંસિયામાં જે દોરેલા,
એવા સપનાઓના ઘર હશે,

દોસ્ત,
મારી નોટબુકમાં આજે પણ
તારા અક્ષર હશે.

એક પણ પ્રશ્ન પૂછ્યા વગર
જ્યાં આપણા આંસુઓ
કોઈ લૂછતું’તું,

એકલા ઉભા રહીને
શું વાત કરો છો..?
એવું ત્યારે ક્યાં કોઈ
પૂછતું’તું..?

ખાનગી વાત કરવા માટે
સાવ નજીક આવી,
એક બીજાના કાનમાં
કશુંક કહેતા’તા…

ત્યારે ખાનગી કશું જ નહોતું
અને છતાં ખાનગીમાં
કહેતા’તા.

હવે, બધું જ ખાનગી છે
પણ કોની સાથે શેર કરું..?
નજીકમાં કોઈ કાન નથી…

દોસ્ત, તું કયા દેશમાં છે..?
કયા શહેરમાં છે..?
મને તો એનું પણ ભાન નથી.

બાકસના ખોખાને
દોરી બાંધીને
ટેલીફોનમાં બોલતા,
એમ ફરી એક વાર
બોલીએ,

ચાલ ને યાર,
એક જૂની નોટબુક ખોલીએ.

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पत्नी की फटकार का महत्व- 👩

पत्नी की फटकार सुनी जब,
तुलसी भागे छोड़ मकान।
राम चरित मानस रच डाला,
जग में बन गए भक्त महान।।

पत्नी छोड़ भगे थे जो जो,
वही बने विद्वान महान।
गौतम बुद्ध महावीर तीर्थंकर,
पत्नी छोड़ बने भगवान।।

पत्नी छोड़ जो भागे मोदी
हुए आज हैं पंत प्रधान।।
अडवाणी ना छोड़ सके तो,
देख अभी तक हैं परेशान।।

नहीं कि है शादी पप्पू ने,
नहीं सुनी पत्नी की तान।
इसीलिए फिरते है भटकते,
बन न सके राजनेता महान।।

हम भी पत्नी छोड़ न पाए,
इसीलिए तो हैं परेशान।
पत्नी छोड़ बनो सन्यासी,
पाओ मोक्ष और निर्वाण।।

(हास्य कविता का आनन्द लीजिये,,,, )
प्रेम से बाेलाे राघे राघे

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ये मोबाइल यूँ ही हट्टा कट्टा नहीं

बहुत कुछ खाया – पीया है इसने
मसलन
ये हाथ की घड़ी खा गया 
ये टॉर्च – लाईटे खा गया
ये चिट्ठी पत्रियाँ खा गया
ये किताब खा गया
ये रेडियो खा गया
ये टेप रिकॉर्डर खा गया
ये कैमरा खा गया
ये कैल्क्युलेटर खा गया
ये परोस की दोस्ती खा गया
ये मेल – मिलाप खा गया
ये हमारा वक्त खा गया
ये हमारा सुकून खा गया
ये पैसे खा गया
ये रिश्ते खा गया
ये यादास्त खा गया
ये तंदुरूस्ती खा गया
कमबख्त
इतना कुछ खाकर ही स्मार्ट बना
बदलती दुनिया का ऐसा असर
होने लगा
आदमी पागल और फोन स्मार्ट
होने लगा
जब तक फोन वायर से बंधा था
इंसान आजाद था
जब से फोन आजाद हुआ है
इंसान फोन से बंध गया है
ऊँगलिया ही निभा रही रिश्ते
आजकल
जुवान से निभाने का वक्त कहाँ है
सब टच में बिजी है
पर टच में कोई नहीं है ।

 

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આદમીની ઓકાત

બાકસની એક દિવાસળી,
ધી નો એક લોટો,
લાકડાના ઢગલા ઉપર,
થોડા કલાકમાં રાખ….
બસ આટલી છે
આદમીની ઓકાત!!!!

એક બુઢા બાપ,
સાંજે મરી ગયા,
પોતાની આખી જીંદગી,
પરિવારના નામે કરી ગયા,
ક્યાંક રડવાનો અવાજ,
તો ક્યાંક વાતમાં વાત,
અરે જલ્દી લઈ જાઓ,
કોણ રાખશે આખી રાત….
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

મર્યા પછી નીચે જોયું,
નજારો નજર સામે જોયો,
પોતાના મરણ પર,
કોઈ લોકો જબરજસ્ત,
તો કોઈ લોકો જબરજસ્તી,
રડતાં હતાં……..
નથી રહ્યા… જતાં રહ્યાં…….
ચાર દિવસ કરશે વાત…
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

છોકરો સારો ફોટો બનાવશે,
સામે અઞરબતી મુકશે,
સુગંધી ફુલોની માળા હશે,
અશ્રુ ભરી શ્રધ્ધાંજલિ હશે,
પછી એ ફોટા પર,
ઝાળા પણ કોન કરશે સાફ..
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

આખી જીંદગી,
મારૂ- મારૂં કર્યુ,
પોતાના માટે ઓછું,
બીજાના માટે વધારે જીવ્યા,
કોઈ નહીં આપે સાથ,
જશો ખાલી હાથ,
તલભાર સાથે લઈ જવાની,
નથી ઓકાત,
બસ આટલી છે,
*આદમીની ઓકાત!!!!*

*તો પછી જીવનમાં ધમંડ શું કામ??*

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मेरे भाइयों – मेरी बहनों,

अपनी गृहस्थी को कुछ इस तरह बचा लिया करो,
कभी आँखें दिखा दी तो कभी सर झुका लिया करो !

आपसी नाराज़गी को लम्बा चलने ही ना दिया करो,
वो ना भी हंसें तो क्या हुआ, तुम ही मुस्करा दिया करो !

रूठ कर बैठे रहने से घर भला कहाँ चलते हैं,
कभी उन्होंने गुदगुदा दिया तो कभी तुम मना लिया करो !

खाने पीने पे विवाद कभी होने ही ना दिया करो,
कभी गरम खा लिया तो कभी बासी से ही काम चला लिया करो !

पति हो या पत्नी, महत्व में कोई भी कम नहीं होता,
कभी खुद डॉन बन गए तो कभी उन्हें बॉस बना दिया करो !

अपनी गृहस्थी को कुछ इस तरह बचा लिया करो…

★Best Wishes For All Couples★

via MyNt

संजय गुप्ता

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‼🐚‼🐚🙏🐚‼🐚‼

दादी माँ बनाती थी.. रोटी !!
पहली.. गाय की ,
और आखरी.. कुत्ते की..!

हर सुबह.. नन्दी आ जाता था ,
दरवाज़े पर.. गुड़ की डली के लिए..!

कबूतर का.. चुग्गा ,
चीटियों.. का आटा..!

शनिवार, अमावस, पूर्णिमा का सीधा.. सरसों का तेल ,
गली में.. काली कुतिया के ब्याने पर.. चने गुड़ का प्रसाद..!

सब कुछ.. निकल आता था !

वो भी उस घर से.. ,
जिसमें.. भोग विलास के नाम पर.. एक टेबल फैन भी न था..!

आज..
सामान से.. भरे घरों में..
कुछ भी.. नहीं निकलता !
सिवाय लड़ने की.. कर्कश आवाजों के.!
….हमको आज भी याद है –
मकान चाहे.. कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे.. सच्चे थे..! !

चारपाई पर.. बैठते थे ,
दिल में प्रेम से.. रहते थे..!

सोफे और डबल बैड.. क्या आ गए ?
दूरियां हमारी.. बढा गए..!

छतों पर.. सब सोते थे !
बात बतंगड.. खूब होते थे..!

आंगन में.. वृक्ष थे ,
सांझे.. सबके सुख दुख थे..!

दरवाजा खुला रहता था ,
राही भी.. आ बैठता था…!

कौवे छत पर.. कांवते थे
मेहमान भी.. आते जाते थे…!

एक साइकिल ही.. पास था ,
फिर भी.. मेल जोल का वास था..!

रिश्ते.. सभी निभाते थे ,
रूठते थे , और मनाते थे…!

पैसा.. चाहे कम था ,
फिर भी..
माथे पे.. ना कोई शिकन था.. !

मकान चाहे.. कच्चे थे ,
पर..रिश्ते सारे सच्चे थे..!!

अब शायद..सब कुछ पा लिया है !
पर..
लगता है कि.. बहुत कुछ गंवा दिया!!!

‼💎‼🐚🔔🐚‼💎‼
जय श्री राम
जै शनिदेब जी * बी एस नेगी‼🐚

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पिता बहुत खुश होते हैं,
जब पिता बन जाते हैं।

पिता अपनी संतान को
सहारा देकर खड़ा करते हैं.
अंगुली पकड़ कर
चलना सिखाते हैं.
इसी क्रम में
गिरती संतान को संभालते हैं,
उठाकर गोद में
चूम लेते हैं पिता.

पिता अपनी संतान को
हवा में उछाल कर
पकड़ लेते हैं,
उसे ये अहसास दिलाने के लिए,
कि मैं हूँ ना
तुम फिक्र मत करो!

बेफिक्र संतान
पिता की अंगुली पकड़ते हुए,
पिता के कंधे पर बैठते हुए,
हवा में उछलते हुए,
बड़ी होती है।

पिता,
दुनिया के
रस्मो रिवाज़ निभाते हुए,
बेटी को भेज देते हैं ससुराल,
बेटे को
पढ़ा लिखा कर पिता,
बना देते हैं कमाने लायक.
बसा देते है घर उसका.

पिता,पोते-पोती संग खेलने का
अरमान लिए,
करते रहते हैं
अपने दायित्वों का निर्वहन.

एक दिन बेटा
जिस पिता की अंगुली पकड़ कर
चलना सीखा था,
उसी पिता को
करियर की दुहाई देता
अंगूठा दिखा कर
चलता बनता है!

पिता,अम्मा को दिलासा देते,
उम्मीदों का दामन थामें,
उठाते रहते हैं जिम्मेदारियों का बोझ,
करते रहते हैं
अपने बुढ़ापे की लाठी का इंतज़ार.

बेटा,जो कभी पिता के कंधे पर
चढ़ कर खेला करता था,
किसी दिन
मोबाइल पर
पड़ोसी से सूचना पाकर
चला आता है घर,
आंगन में निर्जीव पड़ी
पिता की देह को
कंधा देने!

इस दौर में पिता
याद आते भी हैं तो
‘फादर्स डे’ के दिन!
बाकी के दिन पिता
घर में अम्मा को दिलासा देते हुए
पीते रहते हैं कड़वे सच का घूंट!

बेटा मीठे झूठ की चाशनी में
फादर्स डे का कार्ड
और गिफ्ट लपेट कर
भेजता रहता है फादर्स डे पर
पिता को.

बेटा ये नहीं जानता कि
पिता को फादर्स डे पर
कार्ड और गिफ्ट नहीं चाहिए,
उन्हें चाहिए अपना वो बेटा,
जो
गोद में खेलता था,
कंधे पर चढ़ता था,
हवा में उछाले जाने पर भी
मुस्कुराता था!
क्या पिता को मिल पायेगा
अपना वो बेटा???
या कि
फादर्स डे पर
सिर्फ कार्ड और गिफ्ट???
ये हमें तय करना है।