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पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान



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हंस जैन। रामनगर खंडवा
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पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान

क्या कोई ऐसा भी वृक्ष है,जिसं छूने मात्र से मनुष्य की थकान मिट जाती है। हरिवंश पुराण में ऐसे ही एक वृक्ष का उल्लेख मिलता है,जिसको छूने से देव नर्तकी उर्वषी की थकान मिट जाती थी। पारिजात नाम के इस वृक्ष के फूलो को देव मुनि नारद ने श्री कृश्ण की पत्नी सत्यभामा को दिया था। इन अदभूत फूलों को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर बैठी कि परिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए। पारिजात वृक्ष के बारे में श्रीमदभगवत गीता में भी उल्लेख मिलता है। श्रीमदभगवत गीता जिसमें 12 स्कन्ध,350 अध्याय व18000 ष्लोक है ,के दशम स्कन्ध के 59वें अध्याय के 39 वें श्लोक , चोदितो भर्गयोत्पाटय पारिजातं गरूत्मति। आरोप्य सेन्द्रान विबुधान निर्जत्योपानयत पुरम॥ में पारिजात वृक्ष का उल्लेख पारिजातहरण नरकवधों नामक अध्याय में की गई है।

सत्यभामा की जिद पूरी करने के लिए जब श्री कृष्ण ने परिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग लोक भेजा तो इन्द्र ने श्री कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पारिजात देने से मना कर दिया। जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने गरूड पर सवार होकर स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और परिजात प्राप्त कर लिया। श्री कृष्ण ने यह पारिजात लाकर सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया। जैसा कि श्रीमदभगवत गीता के श्लोक, स्थापित सत्यभामाया गृह उधान उपषोभन । अन्वगु•र्ा्रमरा स्वर्गात तद गन्धासलम्पटा, से भी स्पष्ट है। भगवान श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो था सत्यभामा की वाटिका में परन्तु उसके फूल उनकी दूसरी पत्नी रूकमणी की वाटिका में गिरते थे। लेकिन श्री कृष्ण के हमले व पारिजात छीन लेने से रूष्ट हुए इन्द्र ने श्री कृश्ण व पारिजात दोनों को शाप दे दिया था । उन्होन् श्री क्रष्ण को शाप दिया कि इस कृत्य के कारण श्री कृष्ण को पुर्नजन्म यानि भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जाना जाएगा। जबकि पारिजात को कभी न फल आने का शाप दिया गया। तभी से कहा जाता है कि पारिजात हमेशा के लिए अपने फल से वंचित हो गया। एक मान्यता यह भी है कि पारिजात नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी ,जिसे भगवान सूर्य से प्यार हो गया था, लेकिन अथक प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्यार कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्म हत्या कर ली थी। जिस स्थान पर पारिजात की कब्र बनी वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया। इसी कारण पारिजात वृक्ष को रात में देखने से ऐसा लगता है जैसे वह रो रहा हो, लेकिन सूर्य उदय के साथ ही पारिजात की टहनियां और पत्ते सूर्य को आगोष में लेने को आतुर दिखाई पडते है। ज्योतिश विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया गया है।

पूर्व वैज्ञानिक एवं ज्योतिष के जानकार गोपाल राजू की माने तो धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने में पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। उन्होने बताया कि यदि ,ओम नमो मणि़•ाद्राय आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली हयौं मणि भद्राय नम, मन्त्र का जाप 108 बार करते हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाए और पूजा के इस नारियल व फूलो को लाल कपडे में लपेटकर घर के पूजा धर में स्थापित किया जाए तो लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास करती है। यह पूजा साल के पांच मुहर्त होली,दीवाली,ग्रहण,रवि पुष्प तथा गुरू पुष्प नक्षत्र में की जाए तो उत्तम है। यहां यह भी बता दे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है। यानि वृक्ष से फूल तोड़ने की पूरी तरह मनाही है।

इसी पारिजात वृक्ष को लेकर गहन अध्ययन कर चुके रूड़की के कुंवर हरि सिंह यादव ने बताया कि यंू तो परिजात वृक्ष की प्रजाति भारत में नहीं पाई जाती, लेकिन भारत में एक मात्र पारिजात वृक्ष आज भी उ.प्र. के बाराबंकी जनपद अंतर्गत रामनगर क्ष्ोत्र के गांव बोरोलिया में मौजूद है। लगभग 50 फीट तने व 45 फीट उंचाई के इस वृक्ष की ज्यादातर शाखाएं भूमि की ओर मुड़ जाती है और धरती को छुते ही सूख जाती है।

एक साल में सिर्फ एक बार जून माह में सफेद व पीले रंग के फूलो से सुसज्जित होने वाला यह वृक्ष न सिर्फ खुशबू बिखेरता है, बल्कि देखने में भी सुन्दर लगता है। आयु की दृष्टि से एक हजार से पांच हजार वर्ष तक जीवित रहने वाले इस वृक्ष को वनस्पति शास्त्री एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं। जिसकी दुनियाभर में सिर्फ 5 प्रजातियां पाई जाती है। जिनमें से एक डिजाहाट है। पारिजात वृक्ष इसी डिजाहाट प्रजाति का है। कुंवर हरि सिंह यादव अपने षोध आधार पर बताते है कि एक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी । जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। कहा जाता है जब पांडव पुत्र माता कुन्ती के साथ अज्ञातवास पर थे तब उन्होने ही सत्यभामा की वाटिका में से परिजात को लेकर बोरोलिया गांव में रोपित कर दिया होगा। तभी से परिजात गांव बोरोलिया की शोभा बना हुआ है। देशभर से श्रद्धालु अपनी थकान मिटाने के लिए और मनौती मांगने के लिए परिजात वृक्ष की पूजा अर्चना करते है। पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है। पारिजात बावासीर रोग निदान के लिए रामबाण औषधी है। पारिजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बावासीर रोग ठीक हो जाता है। पारिजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से बावासीर के रोगी को बडी राहत मिलती है। पारिजात के फूल हदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलो के रस का सेवन किया जाए तो हदय रोग से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सुखी खासी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते है। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को अगर 5 काली मिर्च के साथ महिलाएं सेवन करे तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जंहा हेयर टानिक का काम करते है तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है। इस दृश्टि से पारिजात अपनेआपमें एक संपूर्ण औषधी भी है।

इस वृक्ष के ऐतिहासिक महत्व व दुर्लभता को देखते हुए जंहा परिजात वृक्ष को सरकार ने संरक्षित वृक्ष घोषित किया हुआ है। वहीं देहरादून के राष्ट्रीय वन अनुसंधान संस्थान की पहल पर पारिजात वृक्ष के आस पास छायादार वृक्षों को हटवाकर पारिजात वृक्ष की सुरक्षा की गई। वन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. एसएस नेगी का कहना है कि पारिजात वृक्ष से चंूकि जन आस्था जुडी है। इस कारण इस वृक्ष को संरक्षण दिये जाने की निरंतर आवश्यकता है। इस वृक्ष की एक विषेशता यह भी है कि इस वृक्ष की कलम नहीं लगती ,इसी कारण यह वृक्ष दुर्लभ वृक्ष की श्रेणी में आता है। भारत सरकार ने पारिजात वृक्ष पर डाक टिकट भी जारी किया। ताकि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर पारिजात वृक्ष की पहचान बन सके।

सायटिका में लाभदायक पारिजात

हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।

परिचय : यह 10 से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25-30 फीट ऊँचा एक वृक्ष होता है और देशभर में खास तौर पर बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। विशेषकर मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में ज्यादातर पैदा होता है। इसके फूल बहुत सुगंधित और सुन्दर होते हैं जो रात को खिलते हैं और सुबह मुरझा जाते हैं।

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात, शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम – पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन- निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।

गुण : यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।

रासायनिक संघटन : इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से 12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल (1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं।

उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

गृध्रसी (सायटिका) : हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।

ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है। इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।

हंस जैन रामनगर खंडवा
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हमारे चिकित्सा पुरोधा


सत्य प्रकाश शर्मा

हमारे चिकित्सा पुरोधा (1 )
अति प्राचीन काल से हमारे देश में वेदों पर आधारित चिकित्सा विज्ञान अपनी चरम सीमा पर रहा है | हमारे ऋषिओं मनीषियों ने चिकित्सा विज्ञान को उन्नत और प्रतिष्ठित किया किया , इनका मूलमंत्र परोपकाय शतां विभूतयः रहा | पूरा विश्व जब निष्क्रिय था तव हम चिकित्सा क्षेत्र में शिखर पर रहे हैं |
प्रजापति :- – सभी जीवों के देव ने आयुर्वैदिक विद्या प्रदान की |
अश्विनी कुमार :- – ये दोनों जुड़वां भाई थे , जो देवताओं का उपचार करते थे | शल्य चिकित्सा में इनका कोई मुकाबला नहीं था | इन्होंने दधीच ऋषि से मृत व्यक्ति को भी जीवित करने की मधु – विद्या सीखी थी | इनके ग्रन्थ ‘ चिकित्सा सारतंत्र ‘ , ‘ अश्विनी संहिता ‘ , ‘धातुरत्नमाला ‘ , नाड़िनिदानं ‘ प्रमुख रहे |
धन्वंतरि :- – भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में बहुत जाना माना नाम है , इन्होंने अमृतमय औषिधिओं की खोज की थी | आयुर्वेद में इनका महान कार्य रहा |
निमि :- – सीता के परदादा निमि को नेत्र विशेषज्ञ कहा जाता है , ये अनेकों प्रकार के नेत्र ऑपरेशनों के विशेषज्ञ भी थे | इन्होने ‘वैद्य संदेह भंजनि ‘ , और ‘जनकतंत्र ‘ग्रन्थ लिखे |
अत्रेय :- – इनको जीवन विज्ञान का प्रमुख शिक्षक माना जाता है | किस रोग में कौनसी दवा काम करती है के विषय पर इन्होने छः शास्त्र लिखे | इनके मेधावी छात्र अग्निवेश ने अपना ‘अग्निवेश तंत्र ‘ लिखा | धनुर्विद्या में पारंगत अग्निवेश ने महाभारत के द्रोणाचार्य को धनुर्विद्या सिखाई थी | – – – – – – क्रमशः

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संजय कुमार

भारतीय शौच व्यवस्था एवं वामकुक्षी

Written by:- Suresh Chiplunkar

सदियों से भारतीय ज्ञान एवं संस्कारों की एक महान परंपरा रही है. वेदों-पुराणों-ग्रन्थों सहित विभिन्न उत्सवों एवं सामान्य सी दिखाई देने वाली प्रक्रियाओं में भी हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के स्वास्थ्य एवं प्रकृति के संतुलन का पूरा ध्यान रखा है.

जो परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं खानपान से लेकर पहनावे तक जो भी ज्ञान ऋषि-मुनियों ने हमें विरासत में दिया है, वह न सिर्फ अदभुत है, बल्कि पूर्णतः तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक भी है. प्रस्तुत लेख में मैं सिर्फ तीन उदाहरण देना चाहूँगा.

हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते हैं कि गर्भवती स्त्री को हमेशा सदविचार रखने चाहिए, सात्त्विक भोजन करना चाहिए और उससे हमेशा मृदु भाषा में ज्ञानपूर्ण बातचीत करनी चाहिए, ताकि होने वाली संतान भी तेजोमय एवं बुद्धिमान हो. इन बुजुर्गों को यह ज्ञान कहाँ से मिला?? क्या उन दिनों तथाकथित आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई होती थी? फिर इन लोगों ने कैसे जान लिया कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण सुनने-समझने की क्षमता रखता है? हम सभी ने महाभारत की वह कथा पढ़ी है, जिसमें अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन के गुप्त रहस्यों एवं पद्धति के बारे में विस्तार से बताते हैं. उस समय उनका पुत्र अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में था. यह बात हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई महाभारत में कही गई है कि “गर्भवती स्त्री के गर्भ में पल रहा भ्रूण एक निश्चित समय के पश्चात पूरी तरह सुनने-समझने और स्मरण रखने की शक्ति रखता है”. जब अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन का रहस्य बताया उस समय सुभद्रा जाग रही थीं, लेकिन जब अर्जुन चक्रव्यूह तोड़कर बाहर निकलने की योजना बता रहे थे उस समय सुभद्रा सो गई थीं. इसीलिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो स्मरण था, परन्तु उससे बाहर निकलने की कला उन्हें ज्ञात नहीं थी.

अब ये वर्षों पुराना सिद्धांत पश्चिम के वैज्ञानिक हमें ही सिखा रहे हैं. वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण किस सीमा तक सुनने-समझने-सोचने की क्षमता रखता है. आधुनिक विज्ञान द्वारा हमें बताया जा रहा है कि यह एक नई खोज है. कितना हास्यास्पद है ना??

मित्रों आपने अपने बुजुर्गों से “वामकुक्षी” नामक शब्द के बारे में तो सुना ही होगा, बहुत पुराना शब्द है, पीढ़ियों से चला आ रहा है. “वाम” यानी बाँया और “कुक्षी” यानी करवट. वामकुक्षी का अर्थ है बाँई करवट लेटना. हमारे बुजुर्गों को उनके आयुर्वेद एवं अनुभव ज्ञान से इस बात की पूरी जानकारी थी कि मनुष्य को भोजन के पश्चात कुछ देर “वामकुक्षी” लेनी चाहिए, अर्थात बाँई करवट लेटना चाहिए, ताकि पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है. जब बुजुर्गों को यह बात पता थी, तो स्वाभाविकतः इसका अर्थ यह भी होता है कि निश्चित हेए उन्हें इसके पीछे छिपे विज्ञान एवं शारीरिक संरचना की जानकारी भी होगी, अन्यथा वे दाँयी करवट लेटने को भी कह सकते थे… या यह भी कह सकते थे कि भोजन के पश्चात वज्रासन में बैठने की बजाय रस्सी कूदना चाहिए. अब पश्चिमी विज्ञान हमें बता रहा है कि बाँई करवट सोने से लीवर में स्थित “पाचक अम्ल” नीचे की तरफ होता है, जिससे भोजन अच्छे से पचता है और यह ह्रदय के लिए भी लाभकारी होता है. तात्पर्य यह कि भारतीयों को “वामकुक्षी” से मिलने वाले शारीरिक लाभों की पूरी जानकारी थी. कैसे थी? क्या यह विज्ञान नहीं था?? या फिर विज्ञान उसी को माना जाए, जो अंग्रेजी शब्दों में पश्चिम के गोरे हमें बताएँ??

तीसरा उदाहरण है भारतीय पद्धति की शौच व्यवस्था. जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत में सदियों से उकडूँ बैठकर शौच करने की परंपरा रही है. यहाँ तक कि हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि नीचे बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए. महिलाएँ तो आज भी बैठकर ही मूत्र-त्याग करती हैं, लेकिन अधिकाँश पुरुषों ने पश्चिम की नक़ल एवं पैंट-शर्ट वाले पहनावे के कारण खड़े-खड़े मूत्र त्याग की पद्धति अपना ली है. परन्तु पुराने जमाने ने जब पुरुष भी धोती धारण करते थे, तब वे नीचे बैठकर ही मूत्र-त्याग करते थे. यही पद्धति हम शौच करते समय भी अपनाते आए हैं. जब से भारतीयों का खान-पान विकृत हुआ है और उनके घुटनों में दर्द रहने लगा है तब से महानगरीय एवं अर्ध-नगरीय भारतीय भी पश्चिम की देन अर्थात “कमोड” का उपयोग करने लगे हैं. आधुनिक(?) वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि यदि शौच करते समय मनुष्य के दोनों घुटने उसके पेडू (या कहें बड़ी आँत) से ऊपर रहें तो बड़ी आँत पर दबाव नहीं रहता तथा शौच खुलकर होता है. जबकि जैसा कि चित्र में दिखाया है, कमोड पर बैठकर शौच करने से बड़ी आँत थोड़ी सी वक्राकार हो जाती है जिससे मल पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाता.

अब बताईये, क्या हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं बुजुर्गों को इसका विज्ञान पता नहीं था?? उन्हें सब कुछ अपने अनुभव और ग्रंथों में लिखे ज्ञान के आधार पर पता था. यहाँ तक कि पर्यावरण और खेतों की उर्वरकता को बरकरार रखने के लिए पुराने जमाने में खेतों के किनारे शौच किया जाता था. अब यह संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अपने-अपने घरों में भारतीय पद्धति से शौच तो किया ही जा सकता है. जिन बुजुर्गों अथवा मरीजों को घुटने में समस्या है और वे नीचे नहीं बैठ सकते, उनके कमोड हेतु पश्चिमी देशों से एक नया आविष्कार आया है जिसे “Squatty Potty” का नाम दिया गया है, इसे कमोड के पास पैरों के नीचे रखें ताकि आपके घुटने पेट से ऊपर हो जाएँ. वास्तव में अब पश्चिमी देश भी समझ चुके हैं, कि शौच की भारतीय पद्धति सर्वोत्तम है, लेकिन वहाँ पर भारतीय पद्धति के शौचालय नहीं हैं, तो उन्होंने इसकी जुगाड़ के रूप में इस उपकरण को निकाला है. शौच के पश्चात हाथ राख या मिट्टी से धोने चाहिए, पैरों को पीछे से भी धोना चाहिए, शौच करते समय बात नहीं करनी चाहिए जैसे कई “वैज्ञानिक” नियम हमारे प्राचीन ज्ञान ग्रंथों में मौजूद हैं, लेकिन चूँकि आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी शिक्षा, वामपंथी विकृति तथा सेकुलरिज़्म नामक बीमारी के कारण हिन्दू संस्कृति को अक्सर हेय दृष्टि से देखने का फैशन चल पड़ा है.

विगत साठ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था को वामपंथी एवं सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने स्वार्थ एवं धर्म विरोधी मानसिकता के कारण इतना दूषित कर दिया है कि अधिकाँश लोगों को हमारे ग्रन्थ अथवा परम्पराएँ बेकार लगती हैं. जब भी पश्चिमी देश कोई शोध करके हमें बताते हैं तब यहाँ के “परजीवी” किस्म के बुद्धिजीवी उनकी जयजयकार में लग जाते हैं. जबकि वही बात सदियों पहले भारत के संत और आयुर्वेदिक चिकित्सक आदि हमें न सिर्फ लिखित में बता चुके थे बल्कि उन्होंने उन बातों को हमारे रोजमर्रा के जीवन में धर्म के साथ इतनी सुन्दर तरीके से पिरोया था कि अब वह हमें सामान्य सी बातें लगती हैं. इस पश्चिमी वैचारिक गुलामी और वैज्ञानिक आधार पर टिके हुए वृहद भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति के सैकड़ों और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं…

हिंदू धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र जो अब पूरी दुनिया अपना रही है-
घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:।(वाधूलस्मृति 9)
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:।(मनुस्मृति 4/49))
नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए।
तथा न अन्यधृतं धार्यम् (महाभारत अनु.104/86)
दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:(वाधूलस्मृति 69)
स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए।
लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।
(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक)
नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं।
न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।(विष्णुस्मृति 64)
पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें।
न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:।(महाभारत अनु.104/52)
न आर्द्रं परिदधीत(गोभिलगृह्यसूत्र 3/5/24)
गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
चिताधूमसेवने सर्वे वर्णा: स्नानम् आचरेयु:। वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च(विष्णुस्मृति 22)
श्मशान में जाने पर, वमन होने/करने पर, हजामत बनवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।
हस्तपादे मुखे चैव पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्।(पद्मपुराण सृष्टि 51/88)
नाप्रक्षालित पाणिपादौ भुञ्जीत।(सु.चि.24/98)
हाथ, पैर और मुंह धोकर भोजन करना चाहिए।
अपमृज्यान्न च स्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभि:।(मार्कण्डेय पुराण 34/52)
स्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे कपड़ों से शरीर को नहीं पोंछना चाहिए, अर्थात् किसी सूखे कपड़े (तौलिए) से ही पोंछना चाहिए।
न वार्यञ्जलिना पिबेत्।( मनुस्मृति 4/63)
नाञ्जलिपुटेनाप: पिबेत्।(सु.चि.24/98)
अंजलि से जल नहीं पीना चाहिए, किसी पात्र(गिलास) से जल पीयें।
न धारयेत् परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन।(पद्मपुराण सृष्टि 51/86)
दुसरों के स्नान के वस्त्र (तौलिए इत्यादि) प्रयोग में न लें।
*अब देख लीजिएआधुनिक अस्पताल और मेडिकल साइंस धराशाई हो चुके हैं और समस्त विश्व हजारों साल पुराने बचाव के उपाय अपना रहा है।

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पुराने समय की कहावत है – – –

चैते गुड़, वैसाखे तेल । जेठ के पंथ¹, अषाढ़े बेल ।।
सावन साग, भादौ दही²। कुवांर करेला, कार्तिक मही³ ।।
अगहन जीरा, पूसै धना। माघे मिश्री, फागुन चना।।
जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहीं धरै।।।।

किस माह में क्या न खाएँ

_आवश्यक निर्देश

चैत्र माह में नया गुड़ न खाएं (15 march-15april)
बैसाख माह में नया तेल न लगाएं (16April-15may)
जेठ माह में दोपहर में नहीं चलना चाहिए (16May-15june)
अषाढ़ माह में पका बेल न खाएं (16june-15july)
सावन माह में साग न खाएं (16july-15August)
भादों माह में दही न खाएं (16august-15september)
क्वार माह में करेला न खाएं (16september-15october)
कार्तिक माह में जमीन पर न सोएं (16October-15november)
अगहन माह में जीरा न खाएं (16 November -15 December)
पूस माह में धनिया न खाएं (16 Dec- 15 jan)
माघ माह में मिश्री न खाएं (16jan-15feb)
फागुन माह में चना न खाएं (16 feb- 14march )

आयुर्वेदामृतम्

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सौंफ

दो दिन पहले वैज्ञानिको के एक ग्रुप के साथ बैठा था। कुछ विज्ञान कुछ बियर कुछ खाने के बाद स्वीट्स का दौर चल रहा था। यूँ ही बात करते करते किसी ने बात छेड़ दी विदेश में भोजन की। एक नए लड़के ने अपना एक्सपीरियंस बताया कि किस प्रकार उसके दोस्त को कोरिया में कुछ भी खाने को नही मिला तो उसको एक इंडियन ने थोड़ा सा दही का कल्चर दिया कि जा दही जमा ले। मतलब वहां दही भी नही मिलता। खैर अपन को इहाँ तक तो वार्ता में कोई इंटरेस्ट नही आ रहा था और हम चुपचाप अपना भोजन खा रहे थे।

वहीं एक बक्टेरियोलॉजिस्ट भी बैठा था। इसी बात पर उसने यूँ ही कमेंट कर दिया कि हाँ जब पहली बार कभी दही का कल्चर बनाया गया होगा तो सौंफ से बनाया था।

हमारे कान खड़े हो गए। सौंफ? सौंफ से?? वही सौंफ जो हम हजारों सालों से खाने के बाद यूँ ही चबा लेते हैं या पान में डाल कर खाते आये हैं सदियों से।

खड़े कान लिए हमने उस वैज्ञानिक का रूबरू किया और फिर पूछा सौंफ से दही का कल्चर? वो कैसे??

तो वैज्ञानिक महोदय ने बड़े कूल कूल बताया कि हां, सौंफ के सरफेस पर बहुत सारा लैक्टोबैसिलस होता है ना।

वो कहाँ से आता है सौंफ पर? हमने पूछा ।

वो बोले बस होता है प्राकृतिक। सौंफ के सरफेस पर खुद की प्रकृति में होता है। वो वैज्ञानिक अपने क्षेत्र के बड़े वैज्ञानिक। उनकी बात पर शक का तो सवाल ही नही।

वो चर्चा तो खत्म हो गई। हमारे दीमाग़ में ढोल नगाड़े बाजे गाजे सब बजने लगे। हिंदुस्तान जिंदाबाद गूंजने लगा। जय हिंद जय सनातन जय पुरातन के नारे लगने लगे।

हजारों साल पहले की भारतीय प्रथा का वैज्ञानिक कारण सामने था।

लैक्टोबैसिलस एक बहुत ही स्ट्रांग प्रोबियोटिक्स होती है। पेट में स्वास्थ्यवर्धक जीवाणुओं का बैलेंस बनाये रखने के लिए इस बैक्टीरिया का आंत में होना बहुत जरूरी है।

यह नही होगा तो हजार बीमारियां आती हैं। डायबिटीज से लेकर थायराइड अल्सर कैंसर न जाने क्या क्या।

Sporlac नाम की एलोपथिक गोलियां तो लंबी बीमारी से उठने के बाद सिर्फ इसलिए दी जाती हैं ताकि शरीर में लैक्टोबैसिलस की जनसंख्या पुनः बढ़ जाये। इम्युनिटी और ताकत आ जाये। पर आजकल डॉक्टर लोग भी चलता काम करते हैं sporlac नही देते किसी को भी। उनको किसी की इम्युनिटी से क्या मतलब।

अब आते हैं सौंफ पर।

हजारों साल पहले से भोजन के तुरंत बाद हम जो सौंफ खाते थे न, वो सौंफ नही अपने स्वास्थ्य की गारंटी पर दस्तखत करते थे। सौंफ के साथ लांखो लैक्टोबसिलस पेट मे रोज चले जाते थे।

यह था उस प्रथा का वैज्ञानिक कारण।

अब तो हम इस प्रथा को लगभग भूल गए।

तो गणतंत्र दिवस पर आइए दुबारा अपनी प्राचीन प्रथाओं को बिना सवाल पूछे दुबारा शुरू करने का प्रण लें ।

वो ग्रेट थी, ग्रेट हैं। वैज्ञानिक कारण जब मिलेगा, मिल जाएगा।

तो कल से खाने के बाद सौंफ फिर शुरू। ओके। और भुनी हुई नही। धुली हुई नही। फैंसी सुगर कोटेड नही। बिल्कुल ताजी सौंफ हरी हरी।

और देखिए, मुझे उड़ते उड़ते भी कोई वैज्ञानिक तथ्य सुनाई देता है तो मैं उसमें सनातन खोजता हूँ। आपका स्वास्थ्य खोजता हूँ। और आप तक पहुंचाता भी हूँ।

चलो फिर बोलो इसी बात पर जय हिंद जय सनातन। 🚩

✍️ डॉ.सुनील वर्मा (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी)

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ગોળ અને ખાંડમાં શુ ફેર છે ?


ગોળ અને ખાંડમાં શુ ફેર છે ? ક્યુ સારું છે ? શા માટે ગોળ જ વપરાય ?? વગેરે માહિતી તમારા માટે…

લેખ શાંતિથી વાંચજો, વિચારજો અને અનુસરણ કરશો જી… usefull લાગે તો બીજાને share કરવાનું ભૂલતા નહિ…

આયુર્વેદમાં લખ્યું છે કે શરીરને ભોજનમાંથી મળવા વાળી જે સાકર છે, તે ઝડપથી પેટ માં પચે તેમાં રસ્તામાં કોઈ ખલેલ ન પડે. એવી કોઈ વસ્તુ ભોજનમાં નાં હોવી જોઈએ જે પાચન ક્રિયા ને રોકે….

આપણા દેશમાં એક ખુબ જ મોટી લેબોરેટરી છે જેનું નામ CDRI (CENTRAL Drug research institute) છે. ત્યાંના વૈજ્ઞાનિકો જણાવે છે કે ભોજન માં એવી કઈ કઈ વસ્તુ છે જે આપણા ભોજનની કુદરતી સાકર ને શરીર માટે મદદ રૂપ થવામાં અડચણ રૂપ થાય છે તો બધા વેજ્ઞાનિકો એ એક જ અવાજે જે વસ્તુનું નામ લીધું હતું,
તેનું નામ ખાંડ હતું.

તેની જગ્યાએ શું ખઈએ. જવાબ છે-ગોળ

ગોળ અને ખાંડમાં ફરક !

બન્નેમાં ઘણો ફરક છે, ખાંડ બનાવવા માટે શેરડીના રસમાં ૨૩ ઝેર (કેમિકલ) ભેળવવા પડે છે,અને તે બધા શરીર ની અંદર તો જાય છે પરંતુ બહાર નથી નીકળી શકતા અને ગોળ એક જ એવો છે કોઈ પણ ઝેર ભળ્યા સિવાય સીધે સીધો બને છે શેરડીના રસને ગરમ કરતા જાઓ,ગોળ બની જાય છે.તેમાં કઈ પણ ભેળવવું પડતું નથી.માત્ર તેમાં દૂધ ભેળવવાનું છે બીજું કઈ ભેળવવાનું નથી.

ગોળ થી પણ સારી વસ્તુ તમે ખાઈ શકો છો તેનું નામ છે કાકવી. જો તમે ક્યારેય ગોળ બનતા જોયું હશે તો ખબર પડી જશે.આ કાકવી ગોળ થી પણ સારી છે, કાક્વીને ડોલમાં ભરીને રાખો તે ખરાબ થતી નથી,૧ વર્ષ આરામ થી રાખી શકો છો. કાક્વી નો ભાવ પણ ગોળ જેટલો જ હોય છે.હવે તમે યા તો કાકવી ખાવ નહી તો ગોળ ખાવ. જો તમને કાકવી મળી રહે છે તો સમજી લો કે તમે રાજા છો, જો કાકવી ન મળે તો ગોળ મળી રહ્યો છે તો નાના રાજા છો.☺☺

ખાંડે આખી દુનિયાનો સત્યાનાશ કરી નાખ્યો છે. જ્યાર થી ખાંડ બનાવવા નું અને ખાવાનું શરુ કર્યું છે, ત્યારથી શરીરની હાલત ખરાબ છે.

રસપ્રદ જાણકારી💐👌👌

ભારત ને છોડી ને દુનિયા ના દેશો માં ગોળ અને કાકવી ની ખુબ જ માંગ છે. કેમ કે ખાંડ થી બનેલી મીઠાઈ જલ્દી ખરાબ થઇ જાય છે,તેમાં ગુણવત્તા હોતી નથી,પરંતુ ગોળ માંથી બનેલી મીઠાઈ ઘણા મહિના સુધી બગડતી નથી અને સારી ક્વોલેટી ની હોય છે.

તમને સાંભળીને નવાઈ લાગશે કે ગામમાં ગોળ નો ભાવ ૨૦-૩૦ રૂપિયા કિલો હોય છે.પરંતુ ઇજરાયલ માં ગોળનો ભાવ 170 રૂપિયા કિલો વેચાય છે.જર્મની માં ગોળનો ભાવ ૨૧૦ રૂપિયા કિલો છે, કેનેડામાં ભારત ના રૂપિયાના હિસાબે ગોળનો ભાવ ૩૩૦ રૂપિયા કિલો છે. આ બધા દેશોમાં ગોળ ની ખુબ જ માગ છે.ખાંડ ત્યાં સસ્તી છે કેમ કે તેમણે ખબર છે કે ખાંડ ઝેર છે અને ગોળ અમૃત છે.

ગોળ અને ખાંડ ની એક જ વાત યાદ રાખો. જો ખાંડ તમે ખાધી તો તેને પચાવવી પડે છે અને તેમાં એટલા નુકશાનકારક તત્વો હોય છે કે આસાની થી પચતા નથી.જો ગોળ ખાશો તો ગોળ એટલી સરસ જાત છે,કે જે પણ ગોળ સાથે તમે ખાધું છે, તેને ગોળ પચાવી દે છે.

ગોળ ભોજનને માત્ર ૪ કલાક ૪૦ મીનીટમાં પચાવી દે છે. એટલા માટે ભોજન સાથે ગોળ જરૂર ખાવ અને ખાંડ બિલકુલ ન ખાઓ.

આ સુત્રનું પાલન કરશો તો ડાયાબિટીસ, આર્થરાઈટીસ, અસ્થમા, ઓસ્તીમાલીસીસ જેવી ૧૪૮ ગંભીર બીમારીઓ જીંદગી માં ક્યારેય નહિ આવે.

તમે તમારી જીંદગી માં થી ખાંડ ને કાઢી નાખો કેમ કે આપણે જે કુદરતી ખાંડ ફળ માંથી કે બીજી વસ્તુઓ માંથી મળી રહે છે, આ ખાંડ તમને પચવા ના રસ્તા માં મોટી અડચણ છે.

તમે એક વાત યાદ રાખો જો ત્યાગવા ની કોઈ વસ્તુ છે ને સૌથી વધુ નફરત કરવી છે તો તે ખાંડથી કરો ગોળ ખાઓ કાકવી ખાઓ.

મહત્વની એક વાત..

ખાંડ આપણે ચીન વગેરે દેશમાંથી આયાત કરવી પડે છે, જ્યારે ગોળ આપના પોતાના દેશની પ્રોડક્ટ છે… તેને ભોજનમાં વિશેષ સ્થાન આપીએ… દેશને આર્થિક રીતે પણ સમૃદ્ધ કરીએ…

👌💐👌💐👌💐👌

કૃપયા આ પોસ્ટમાં કોઈપણ ફેરફાર કર્યા વગર જ SAHRE કરજો।..

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💐 ۞☝ ∥ आयुर्वेदिक दोहे ∥ ☝۞ 💐
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१Ⓜदही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय,
होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय…
२Ⓜबहती यदि जो नाक हो, बहुत बुरा हो हाल,
यूकेलिप्टिस तेल लें, सूंघें डाल रुमाल…
३Ⓜअजवाइन को पीसिये , गाढ़ा लेप लगाय,
चर्म रोग सब दूर हो, तन कंचन बन जाय…
४Ⓜअजवाइन को पीस लें , नीबू संग मिलाय,
फोड़ा-फुंसी दूर हों, सभी बला टल जाय…
५Ⓜअजवाइन-गुड़ खाइए, तभी बने कुछ काम,
पित्त रोग में लाभ हो, पायेंगे आराम…
६Ⓜठण्ड लगे जब आपको, सर्दी से बेहाल,
नीबू मधु के साथ में, अदरक पियें उबाल…
७Ⓜअदरक का रस लीजिए. मधु लेवें समभाग,
नियमित सेवन जब करें, सर्दी जाए भाग…
८Ⓜरोटी मक्के की भली, खा लें यदि भरपूर,
बेहतर लीवर आपका, टी.बी भी हो दूर…
९Ⓜगाजर रस संग आँवला, बीस औ चालिस ग्राम,
रक्तचाप हिरदय सही, पायें सब आराम…
१०Ⓜशहद आंवला जूस हो, मिश्री सब दस ग्राम,
बीस ग्राम घी साथ में, यौवन स्थिर काम…
११Ⓜचिंतित होता क्यों भला, देख बुढ़ापा रोय,
चौलाई पालक भली, यौवन स्थिर होय…
१२Ⓜलाल टमाटर लीजिए, खीरा सहित सनेह,
जूस करेला साथ हो, दूर रहे मधुमेह…
१३Ⓜप्रातः संध्या पीजिए, खाली पेट सनेह,
जामुन-गुठली पीसिये, नहीं रहे मधुमेह…
१४Ⓜसात पत्र लें नीम के, खाली पेट चबाय, दूर करे मधुमेह को, सब कुछ मन को भाय…
१५Ⓜसात फूल ले लीजिए, सुन्दर सदाबहार,
दूर करे मधुमेह को, जीवन में हो प्यार…
१६Ⓜतुलसीदल दस लीजिए, उठकर प्रातःकाल,
सेहत सुधरे आपकी, तन-मन मालामाल…
१७Ⓜथोड़ा सा गुड़ लीजिए, दूर रहें सब रोग,
अधिक कभी मत खाइए, चाहे मोहनभोग…
१८Ⓜअजवाइन और हींग लें, लहसुन तेल पकाय,
मालिश जोड़ों की करें, दर्द दूर हो जाय…
१९Ⓜऐलोवेरा-आँवला, करे खून में वृद्धि,
उदर व्याधियाँ दूर हों,जीवन में हो सिद्धि…
२०Ⓜदस्त अगर आने लगें, चिंतित दीखे माथ,
दालचीनि का पाउडर, लें पानी के साथ…
२१Ⓜमुँह में बदबू हो अगर, दालचीनि मुख डाल,
बने सुगन्धित मुख, महक, दूर होय तत्काल…
२२Ⓜकंचन काया को कभी, पित्त अगर दे कष्ट,
घृतकुमारि संग आँवला, करे उसे भी नष्ट…
२३Ⓜबीस मिली रस आँवला, पांच ग्राम मधु संग,
सुबह शाम में चाटिये, बढ़े ज्योति सब दंग…
२४Ⓜबीस मिली रस आँवला, हल्दी हो एक ग्राम,
सर्दी कफ तकलीफ में, फ़ौरन हो आराम…
२५Ⓜनीबू बेसन जल शहद, मिश्रित लेप लगाय,
चेहरा सुन्दर तब बने, बेहतर यही उपाय…
२६.Ⓜमधु का सेवन जो करे, सुख पावेगा सोय,
कंठ सुरीला साथ में, वाणी मधुरिम होय…
२७.Ⓜपीता थोड़ी छाछ जो, भोजन करके रोज,
नहीं जरूरत वैद्य की, चेहरे पर हो ओज…
२८Ⓜठण्ड अगर लग जाय जो नहीं बने कुछ काम, नियमित पी लें गुनगुना, पानी दे आराम…
२९Ⓜकफ से पीड़ित हो अगर, खाँसी बहुत सताय,
अजवाइन की भाप लें, कफ तब बाहर आय…
३०Ⓜअजवाइन लें छाछ संग, मात्रा पाँच गिराम, कीट पेट के नष्ट हों, जल्दी हो आराम…
३१Ⓜछाछ हींग सेंधा नमक, दूर करे सब रोग,
जीरा उसमें डालकर, पियें सदा यह भोग…।

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॥ સર્વજન સુખાય સર્વજન હિતાય ચ ॥

વર્ષાની વિદાય અને શરદનુ આગમન એટલે ભાદરવો.

દિવસે ધોમ ધખે અને મોડી રાત્રે આછુ ઓઢીને સુવુ પડે એવો ઠાર પડે. આયુર્વેદાચાર્યો કહી ગયા છે કે વર્ષામા પિત્તનો સંગ્રહ થાય અને શરદમા તે પિત્ત પ્રકોપે.
આ પ્રકોપવુ એટલે તાવ.

ભાદરવાના તાપ અને તાવથી બચવા ત્રણ-ચાર ઘરગથ્થુ પ્રયોગો (સ્વાનુભુત છે.)

૧) ભાદરવાના ત્રીસે દિવસ રોજ રાત્રે જમ્યા પછી સુદર્શન/મહાસુદર્શન ઘનવટી – ૨-૩ ટીક્ડી ચાવીને પાણી સાથે (ત્રણ કલાકથી વહેલી નહી, પછી જ).

૨) જો ભાવે તો ભાદરવાના ત્રીસે દિવસ દુધ-ચોખા-સાકરની ખીર અથવા દુધ-પૌવા ખાવુ. ગળ્યુ દુધ એ વકરેલા પિત્તનુ જાની દુશ્મન છે.

આ હેતુથી જ શ્રાદ્ધપક્ષમાં ખીર બનાવવાનુ આયોજન થયુ હતુ.

૩) જેની છાલ પર કથ્થાઇ/કાળા ડાઘ હોય એવા પાકલ કેળાને છુંદીને એમા સાકર ઉમેરી બપોરે જમવા સાથે ખાવા. જો ઇચ્છા હોય તો ઘી પણ ઉમેરવુ. પણ કેળા સાથે ઘી પાચનમા ભારે થાય. એટલે જો ઘી ઉમેરો, તો પછી બે-ત્રણ એલચી વાટીને ઉમેરી દેવી. પાચન સહેલુ થાશે. એવુ કોઇક જ હોય જેને સાકર-કેળા-ઘીનુ મિશ્રણ રોટલી સાથે ન ફાવે.

(જો ખીર અને કેળા – બન્નેનો પ્રયોગ કરવો હોય તો કેળા બપોરે અને ખીર સાંજે એમ ગોઠવવુ).

૪) ભુલેચુકે ખાટી છાશ ન જ પીવી. ખુબ વલોવેલી, સાવ મોળી છાશ લેવી હોય તો ક્યારેક લેવાય.

૫) ઠંડા પહોરે (વહેલી સવારે કે સાંજે) પરસેવો વળે એટલુ ચાલવુ. (ઠંડી અને ચાંદની રાતમાં રાસગરબા ના આયોજન પાછળનુ રહસ્ય આ જ હતુ – પરસેવો પડે)

આચાર્યોએ શરદને રોગોની માતા કહી છે – रोगाणाम् शारदी माता. એને ‘યમની દાઢ’ પણ કહી. આપણામા એક આશિર્વાદ પ્રચલીત હતો – शतम् जीव शरदः એટલે કે આવી સો શરદ સુખરુપ જીવી જાઓ એવી શુભેચ્છા આપવામા આવતી.
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जुकाम के अनुभूत उपचार प्रयोग


कारण-
असंयमित खानपान , चाय, नमकीन , तेल युक्त पदार्थों का अति सेवन, फ्रिज की चीजें, कोल्ड्रिंग , आइसक्रीम का अति सेवन इसके अतिरिक्त ऋतु परिवर्तन ठंड लगना, पानी में भीग जाना , ठंडे पानी का अति सेवन तथा सर्दियों में बिना कान मुंह सर ढके के हवा में घूमने से भी सर्दी जुकाम की तकलीफ हो जाती है-
लक्षण-
सर्दी जुकाम होते ही कब्ज रहने लगता है जिससे भूख कम लगती है सिर दर्द, बदन दर्द , शरीर में ज्वर, आंख से पानी गिरता है , गले में खराश व छाले आते हैं, मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है , थूक निगलने में व भोजन निगलने में कठिनाई होती है, गले में दर्द होता है तथा कभी-कभी नाक से पानी आना या नाक बंद हो जाना जैसी समस्या होती है  आवाज बैठ जाना, बार-बार खांसी चलना, छाती में दर्द होना, पीठ में दर्द होना तथा कमजोरी लगना यह लक्षण सर्दी खासी पुरानी होने पर पाए जाते हैं-
सर्दी जुकाम नजले के लिए घरेलू नुस्खे-
1- शहद और अदरक का रस  एक एक चम्मच मिलाकर सुबह-शाम पीने से जुकाम ठीक हो जाता है-
2- नागर वेल के 2-4 कोरे पत्ते चबा लेने से सर्दी जुकाम में आराम मिलता है –
3- अजवाइन को पीसकर उसमें प्याज का रस मिलाकर छाती पर मलने से जुकाम में बदन दर्द में व हल्के बुखार में आराम मिलता है  इससे शरीर में स्फूर्ति आती है जुकाम कम होता है-
4- सोंठ के चूर्ण में गुड और थोड़ा सा घी डालकर 30-40 ग्राम के लड्डू बनाएं  यह लड्डू सुबह-शाम खाने से जुकाम दूर हो जाता है –
5- कुछ लोगों को हमेशा जुकाम रहता है ऐसे व्यक्तियों ने तुलसी का रस लहसुन का रस काली मिर्च मिलाकर सुबह-शाम लेने से जुकाम से पूर्ण रुप से छुटकारा मिल जाता है –
6- कुनकुने पानी में एप्सम साल्ट  मिलाकर उसमें पैर रखने से जुकाम व बदन दर्द में आराम मिलता है-
7- गुड़ की डली के बीच जरा सी पीसी हुई हींग और दो काली मिर्च कूटकर डालकर गोली बनाए  इस गोली का सुबह शाम सेवन करने से जुकाम में आराम होता है-
8- पांच बरगद के कोमल पत्ते तथा सात तुलसी के पत्तों को उबालकर चाय बना ले इसमें आधा चम्मच मिश्री मिला लें इस चाय को दिन में दो बार पीने से नजला, जुखाम, तथा कफ संबंधित समस्याए दूर होती है –
9- सोंठ काली मिर्च और अजवाइन का चूर्ण खांसी अरुचि दूर करता है  इसके सेवन से पाच्नाग्नि प्रदीप्त होती है यह चूर्ण 1 ग्राम शहद के साथ कुकुर खांसी में भी लाभदायक है-
10- सुदर्शन चूर्ण को गर्म पानी के साथ दिन में दो बार लेने से  नजला जुखाम बदन दर्द तथा ज्वर में भी लाभ होता है –
11- नीलगिरी का तेल छाती पीठ व कनपटी पर मलने से तथा सूंधने से जुकाम ठीक होता है  बंद नाक खुलती है छाती का भारीपन कम होता है-
12- रात्रि को सोने से पहले दोनों नासा छिद्रों में गाय के घी की कुछ बूंदे नस्य रुप से डालने से सर दर्द, माइग्रेन, साइनस तथा सर्दी दूर होती है -सरसों के तेल को कान में तथा नाक में डालने से सर्दी जुकाम नजला में राहत मिलती है –
13- खट्टे दही में गुड़ मिलाकर और उसमें काली मिर्च का चूर्ण डालकर सेवन करने से नया पुराना सब प्रकार का जुकाम नजला दूर होता है –
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दोस्तो बारिश के इस मौसम सर्दी, और खाँसी से सभी परेशान रहते है खासकर बच्चे।
इसलिये मै आपको गुड़ अदरक का हलवा बता रही हूँ।जिसके उपयोग से आप सबको आराम मिलेगा।
इसे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को दिया जा सकता है।

आप नींबू के आकार का अदरक ले छील कर किसे अब इससे दोगुना गुड़ ले उसे भी किसे।5काली मिर्च कूट ले।

अब एक तड़का पैन या जो आपको उचित लगे वो बर्तन लकर गर्म करे।इसमे आधा चम्मच घी डाले और पिघलते ही अदरक डाल दे।अदरक को सिर्फ पानी सुखाने तक भूने गैस बंद करे अब इसमे एक चुटकी हल्दी, एक चुटकी नमक,काली मिर्च, और गुड़ डाले अच्छे से मिलाये।गैस चालू कर एकदम धीमी आंच पर गुड़ पिघलने तक रखे।

अब इसे हल्का गुनगुना ही खाये।

रात मे सोने से पहले ले।आप दिन मे भी खा सकते है।
खाने के बाद आधा से एक घंटे पानी ना पीये।

बडे़ एक चम्मच और बच्चों को आधा चम्मच दे।

संजय गुप्ता