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वेदों में सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति


वेदों में सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति
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सूर्य किरण से नाना प्रकार के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। वाष्प स्नान से जो लाभ होता है वही लाभ धूप स्नान से होता है। धूप स्नान से रोम कूप खुल जाते हैं और शरीर से पर्याप्त मात्रा में पसीना निकलता है और शरीर के अन्दर का दूषित पदार्थ गल कर बाहर निकल जाता है। जिससे स्वास्थ्य सुधर जाता है।

जिन गायों को बाहर धूप में घूमने नहीं दिया जाता है और सारे दिन घर में ही रख कर खिलाया-पिलाया जाता है, उनके दुग्ध में विटामिन डी विशेष मात्रा में नहीं पाया जाता है।

उदय काल का सूर्य निखिल विश्व का प्राण है। प्राणःप्रजानामुदयत्येष सूर्यः प्राणोपनिषद् 1/8 सूर्य प्रजाओं का प्राण बन कर उदय होता है।

अथर्ववेद में सूर्य किरणों से रोग दूर करने की चर्चा है। अथर्ववेद काँड 1 सूक्त 22 में-

अनुसूर्यमुदयताँ हृदयोतो हरिमा चते। गौ रोहितस्य वर्णन तेन त्वा परिद्धयसि॥ 1॥

अर्थ- हे रोगाक्राँत व्यक्ति। तेरा हृदय धड़कन, हृदयदाह आदि रोग और पाँडुरोग सूर्य के उदय होने के साथ ही नष्ट हो जायं। सूर्य के लाल रंग वाले उदयकाल के सूर्य के उस उदय कालिक रंग से भरपूर करते हैं।

इस मंत्र में सूर्य की रक्त वर्ण की किरणों को हृदय रोग के नाश करने के लिए प्रयोग करने का उपदेश है। सूर्य किरण चिकित्सा के अनुसार कामला और हृदयरोग के रोगी को सूर्य की किरणों में रखे लाल काँच के पात्र में रखे जल को पिलाने का उपदेश है।

“परित्वा रोहितेर्वर्णेदीर्घायुत्वाय दम्पत्ति। यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्॥ 2॥

अर्थ- हे पाँडुरोग से पीड़ित व्यक्ति। दीर्घायु प्राप्त कराने के लिए तेरे चारों ओर सूर्य की किरणों से लाल प्रकाश युक्त आवरणों में तुझे रखते हैं जिससे यह तू रोगी पाप के फलस्वरूप रोग रहित हो जाय और जिससे तू पाँडुरोग से भी मुक्त हो जाय।

ऐसे रोगियों को नारंगी, सन्तरे, सेब, अंगूर आदि फलों को खिलाने तथा गुलाबी रंग के पुष्पों से विनोद कराना भी अच्छा है।

या रोहिणी दैवत्या गावो या उत रोहिणीः। रुपं रुपं वयोवयस्तामिष्ट्रवा परिदध्यसि॥ 3॥

अर्थ- जो देव, प्रकाश सूर्य की प्रातःकालीन रक्त वर्ण की किरणें हैं और जो लाल वर्ण की कपिला गायें हैं या उगने वाली औषधियाँ हैं उनके भीतर विद्यमान कान्तिजनक चमक को और दीर्घायु जनक उन द्वारा तुझको सब प्रकार से परिपुष्ट करते हैं।

हृदयरोग के सम्बन्ध में वाव्यटूट अष्ठग संग्रह हृदय रोग निदान अ. 5 में लिखते हैं, पाँच प्रकार का हृदय रोग होता है वातज, पितज, कफज, त्रिदोषज और कृमियों से। इनके भिन्न-2 लक्षण प्रकट होते हैं। इसी प्रकार पाँडुरोग का एक विकृत रूप हलीमक है। उसमें शरीर हरा, नीला, पीला हो जाता है। उसके सिर में चक्कर, प्यास, निद्रानाश, अजीर्ण और ज्वर आदि दोष अधिक हो जाते हैं। इनकी चिकित्सा में रोहिणी और हारिद्रव और गौक्षीर का प्रयोग दर्शाया गया है। रोहित रोहिणी, रोपणाका, यह एक ही वर्ग प्रतीत होता है। हारिद्रव हल्दी और इसके समान अन्य गाँठ वाली औषधियों का ग्रहण है। शुक भी एक वृक्ष वर्ग का वाचक है।

अथर्ववेद काण्ड 6, सूक्त 83 में गंडमाला रोग को सूर्य से चिकित्सा करने का वर्णन है।

अपचितः प्रपतत सुपर्णों वसतेरिव। सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वो पोच्छतु॥

(अथर्व. 6। 83।1)

अर्थ- हे गंडमाला ग्रन्थियों। घोंसले से उड़ जाने वाले पक्षी के समान शीघ्र दूर हो जाओ। सूर्य चिकित्सा करे अथवा चन्द्रमा इनको दूर करे।

यहाँ सूर्य की किरणों से गंडमाला की चिकित्सा करने का उपदेश है। नीले रंग की बोतल से रक्त विकार के विस्फोटक दूर होते हैं। यही प्रभाव चंद्रालोक का भी है। रात में चन्द्रातप में पड़े जल से प्रातः विस्फोटकों को धोने से उनकी जलन शान्ति होती है और विष नाश होता है।

एन्येका एयेन्येका कृष्णे का रोहिणी वेद। सर्वासामग्रभं नामावीरपूनीरपेतन॥

(अथर्व. 6। 83। 2)

अर्थ- गंडमालाओं में से एक हल्की लाल श्वेत रंग की स्फोटमाला होती है, दूसरी श्वेत फुँसी होती है। तीसरी एक काली फुँसियों वाली होती है। और दो प्रकार की लाल रंग की होती है उनको क्रम से ऐनी, श्येनी, कृष्णा और रोहिणी नाम से कहा जाता है। इन सबका शल्य क्रिया के द्वारा जल द्रव पदार्थ निकालता हूँ। पुरुष का जीवन नाश किये बिना ही दूर हो जाओ।

असूतिका रामायणयऽपचित प्रपतिष्यति। ग्लोरितः प्र प्रतिष्यति स गलुन्तो नशिष्यति ॥

(अथर्व. 6।83।3)

अर्थ- पीव उत्पन्न न करने वाली गंडमाला, रक्तनाड़ियों के मर्म स्थान में होने वाली, ऐसी गंडमाला भी पूर्वोक्त उपचार से विनाश हो जायेगी। इस स्थान से व्रण की पीड़ा भी विनाश हो जायेगी।

वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा यदिदं जुहोमि। (अथर्व. 6।83।4)

अर्थ- अपने खाने-पीने योग्य भाग को मन से पसन्द करता हुआ सहर्ष खा, जो यह सूर्य किरणों से प्रभावित जल, दूध, अन्नादि पदार्थ मैं देता हूँ।

सं ते शीष्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः। उद्यन्नादित्य रश्मिमिः शीर्ष्णो रोगमनीनशोंग भेदमशीशमः।

(अथर्व. 9।8।22)

अर्थ- हे रोगी तेरे सिर के कपाल सम्बन्धी रोग और हृदय की जो विशेष प्रकार की पीड़ा थी वह अब शाँत हो गई है। हे सूर्य! तू उदय होता हुआ ही अपनी किरणों से सिर के रोग को नाश करता है और शरीर के अंगों को तोड़ने वाली तीव्र वेदना को भी शाँत कर देता है।

इस प्रकार समस्त रोगों को सूर्य उदय होता हुआ अपनी किरणों से दूर करता है।

धूप स्नान करते समय रोगी का शरीर नग्न होना चाहिए। जब सूर्य की किरणें त्वचा पर पड़ती है तो उससे विशेष लाभ होता है। सिर को सदैव धूप लगने से बचाना चाहिए। छाजन(एक्जिमा) रोग में धूप स्नान से बहुत लाभ होता है। यदि शरीर का कोई प्रधान अंग निर्बल हो गया हो, तो धूप स्नान से उन्हें लाभ होता है। कुछ रोगों में धूप स्नान मना भी है यथा सभी प्रकार के ज्वर में।

इस तरह से वेदों में नैसर्गिक सूर्य क्रिया चिकित्सा का स्पष्ट वर्णन है।

सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति दिलाती है हर बीमारी से मुक्ति
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सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति इस प्रकार की चिकित्सा है जिसका उपयोग प्रत्येक व्यक्ति आसानी से अपने घर पर कर सकता है। इससे व्यक्ति अपने शरीर को बीमार होने से बचा सकता है या अपनी बीमारी से मुक्ति पा सकता है। सूर्य चिकित्सा के अपने सिद्धांत हैं जो कि पूर्णत: प्राकृतिक हैं।

क्या कहते हैं सूर्य किरण चिकित्सा पद्धति के सिद्धान्त
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सूर्य विज्ञान के अनुसार रोगोत्पत्ति का कारण शरीर में रंगों का घटना-बढ़ना है। सूर्य किरण चिकित्सा के अनुसार अलग‍-अलग रंगों के अलग-अलग गुण होते हैं|।लाल रंग उत्तेजना और नीला रंग शक्ति पैदा करता है। इन रंगों का लाभ लेने के लिए रंगीन बोतलों में आठ-नौ घण्टे तक पानी रखकर उसका सेवन किया जाता है।
मानव शरीर रासायनिक तत्वों का बना है। रंग एक रासायनिक मिश्रण है। जिस अंग में जिस प्रकार के रंग की अधिकता होती है शरीर का रंग उसी तरह का होता है। जैसे त्वचा का रंग गेहुंआ, केश का रंग काला और नेत्रों के गोलक का रंग सफेद होता है। शरीर में रंग विशेष के घटने-बढ़ने से रोग के लक्षण प्रकट होते हैं, जैसे खून की कमी होना शरीर में लाल रंग की कमी का लक्षण है। सूर्य स्वास्थ्य और जीवन शक्ति का भण्डार है।

सूर्य किरणों के फ़ायदे
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मनुष्य सूर्य के जितने अधिक सम्पर्क में रहेगा उतना ही अधिक स्वस्थ रहेगा। जो लोग अपने घर को चारों तरफ से खिड़कियों से बन्द करके रखते हैं और सूर्य के प्रकाश को घर में घुसने नहीं देते वे लोग सदा रोगी बने रहते हैं जहां सूर्य की किरणें पहुंचती हैं, वहां रोग के कीटाणु स्वत: मर जाते हैं और रोगों का जन्म ही नहीं हो पाता। सूर्य अपनी किरणों द्वारा अनेक प्रकार के आवश्यक तत्वों की वर्षा करता है और उन तत्वों को शरीर में ग्रहण करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
शरीर को कुछ ही क्षणों में झुलसा देने वाली गर्मियों की प्रचंड धूप से भले ही व्यक्ति स्वस्थ होने की बजाय बीमार पड़ जाए, लेकिन प्राचीन ग्रंथ अथर्ववेद में सुबह धूप स्नान हृदय को स्वस्थ रखने का कारगर तरीका बताया गया है। इसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति सूर्योदय के समय सूर्य की लाल रश्मियों का सेवन करता है उसे हृदय रोग कभी नहीं होता।
जैसा कि आप सब जानते ही होंगे कि सूर्य के प्रकाश में सात रंग होते हैं। उन सात रंगों में से प्रत्येक की अलग-अलग प्रकृति होती है। यह एक अलग तरह का फ़ायदा पहुंचाती है। इस बात को ध्यान में रख कर हम आपको उन सात रंगों के बारे में विशेष जानकारी दे रहे हैं ताकि आप उनसे लाभ ले सकें।

अब हम सूर्य के सातों रंगों की चिकित्सा के बारे में जानेंगे-
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  1. लाल किरण👉 सूर्य रश्मि पूंज में 80% केवल लाल किरण होती है| ये गर्मी की किरण होती है, जिनको हमारा चर्म भाग 80% सोख लेता है| स्नायु मंडल को उत्तेजित करना इनका विशेष काम है| लाल रंग गर्मी बढ़ता है व शरीर के निर्जीव भाग को चैतन्यता प्रदान करता है। शरीर के किसी भाग में यदि गति ना हो तो उस भाग पर लाल रंग डालने से उसमें चैतन्यता आ जाती है। लाल रंग से जोड़ों का दर्द, सर्दी का दर्द, सूजन, मोच, गठिया आदि रोगों मे लाभ मिलता है| जिसकी पगतली ठंडी हो तो उसे लाल रंग के मोजे पहनने चाहिए। शरीर में लाल रंग की कमी से सुस्ती अधिक होती है। नींद ज़्यादा आती है पर भूख कम हो जाती है। सूर्य तप्त लाल रंग के जल व तेल से मालिश करने से गठिया व किसी प्रकार के बाल रोग नहीं होते हैं। सूर्य तप्त लाल रंग के जल से फोड़े फुंसी धोएं तो लाभ मिलता है।

विशेष सावधानी
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1) जिस कमरे में लाल रंग का पेंट किया हो वहां भोजन ना करें। लाल रंग का टेबल कवर बिछा कर भोजन ना करें, इससे पाचन बिगड़ जाता है।
2) केवल लाल रंग का सूर्य तप्त जल थोड़ा सा ही पिएं, ज़्यादा पीने से उल्टी व दस्त होने का डर रहता है।

  1. नारंगी किरण👉 यह रंग भी गर्मी बढ़ाता है। यह रंग दमा रोग के लिए रामबाण है। दमा, टीबी, प्लीहा का बढ़ना, आंतों की शिथिलता आदि रोगों में नारंगी किरण तप्त जल 50 सी. सी. दिन में दो बार देने से लाभ मिलता है। लकवे में नारंगी किरण तप्त तेल से मालिश करने से लाभ मिलता है।
  2. पीली किरण:👉 पीला रंग बुद्धि, विवेक व ज्ञान की वृद्धि करने वाला है। ऋषि मुनि इसी कारण पीले कपड़े पहनते थे। पेट में गड़बड़, विकार, क्रमी रोग, पेट फूलना, कब्ज, अपच आदि रोगों में पीली किरण द्वारा सूर्य तप्त जल देने से लाभ मिलता है। पानी की मात्रा 50 सी. सी. दिन में 2 बार दें।
  3. हरी किरण👉 इसका स्वभाव मध्यम है। यह रंग आंख व त्वचा के रोगों में विशेष लाभकारी है। यह रंग भूख बढ़ाता है, हरा रंग दिमाग़ की गर्मी शांत करने व आंखों की ज्योति बढ़ाने में रामबाण है। समय से पहले सफेद हो रहे बालों में अगर हरी किरण द्वारा सूर्य तप्त तेल से मालिश करें तो आराम होगा। सिर व पांव मे मालिश करने से नेत्र रोग नहीं होते हैं व नींद अच्छी आती है। कान के रोगों में हरे तेल की 4-5 बूंदें डालने से लाभ होता है। जिन्हें खुजली हो, फोड़े फुंसी हो उन्हें हरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए।
  4. आसमानी किरण👉 इनमें चुंबकीय व विद्युत शक्ति होती है। यह सब रंगों में बेस्ट रंग है, यह रंग शांति प्रदान करता है। भगवान राम व कृष्ण भी यही रंग लिए हुए थे। आसमानी रंग जितना हल्का होता है उतना ही अच्छा होता है। टॉन्सिल या गले के रोग में आसमानी रंग का सूर्य तप्त जल दिन में 50 सी. सी. दो बार देने से लाभ मिलता है। अस्थि रोग या गठिया में इस जल से भीगी पट्टियां बांधें तो लाभ होगा। इस रंग के तेल की मालिश से शरीर मजबूत व सुंदर बनता है। स्वस्थ मानव भी अगर यह जल पिए तो टॉनिक का काम करता है। मधुमक्खी, बिच्छू के काटने पर उस स्थान को आसमानी रंग से धोएं तो लाभ होगा। शरीर में सूजन हो तो आसमानी रंग के कपड़े पहनें।
  5. नीली किरण👉 इस रंग की कमी से पेट में मरोड़, आन्त्रसोध व बुखार होता है। इसमें नीली किरण का सूर्य तप्त जल 50 सी. सी. दिन में दो बार दें, लाभ होगा। फोड़े फुंसी को इस जल से धोने पर उनमें पस नहीं पड़ता है। इस जल से कुल्ले करने पर टॉन्सिल व छालों में लाभ मिलता है। इस रंग के तेल से सिर में मालिश करने पर बाल काले व मुलायम बनते हैं। सिर दर्द नहीं होता है और दिमाग़ को ताक़त मिलती है। स्मरण शक्ति तेज होती है।
  6. बैंगनी किरण👉 यह किरण शीतल होती है। इस रंग की कमी से शरीर में गर्मी बढ़ जाती है। हैजा, हल्का ज्वर व परेशानी रहती है। बैंगनी किरण से बना सूर्य तप्त जल रैबीज के रोगी को 50 सी. सी. दिन में 2 बार देने से लाभ मिलता है। टी. बी. के रोगी को भी इस जल से लाभ मिलता है। नीली किरण वाले जल से बुद्धि बढ़ती है, दिमाग़ शांत रहता है। शरीर में इस रंग से बने तेल की मालिश से नींद अच्छी आती है व थकान दूर होती है।

सूर्य की किरण से सम्बंधित कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
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सूर्य किरण चिकित्सा प्रायः चार माध्यमों से की जाती है-

1.👉 पानी द्वारा भीतरी प्रयोग
2.👉 तेल द्वारा बाहरी प्रयोग
3.👉 सांस द्वारा
4.👉 सीधे ही किरण द्वारा

सूर्य की किरण में सात रंग होते हैं किंतु मूल रंग तीन ही होते है।

1.👉 लाल
2.👉 पीला
3.👉 नीला

सूर्य चिकित्सा इन रंगों की सहायता से की जाती है।
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1.👉 नारंगी (लाल, पीला, नारंगी में से एक)
2.👉 हरा रंग
3.👉 नीला (नीला, आसमानी, बैंगनी में से एक)

सूर्य तप्त (सूर्यतापी) जल तैयार करने की विधि
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साफ कांच की बोतल में साफ ताज़ा जल भरकर लकड़ी के कार्क से बंद कर दें। बोतल का मुंह बंद करने के बाद उसे लकड़ी के पट्टे पर रख कर धूप में रखें। 6-7 घंटे बाद सूर्य की किरण के प्रभाव से सूर्य तप्त होकर पानी दवा बन जाता है और रोग निरोधक तत्वों से युक्त हो जाता है। चाहें तो अलग-अलग बोतल में पानी बनाएं पर ध्यान रहे कि एक रंग की बोतल की छाया दूसरे रंग की बोतल पर ना पड़े।

धूप में रखी बोतल गरम हो जाने से उसमें खाली भाग पर भाप के बिंदु या बुलबुले दिखने लगें तो समझ जाएं कि पानी दवा के रूप में उपयोग के लिए तैयार है। धूप जाने से पहले लकड़ी के पट्टे सहित उसे घर में सही जगह पर रख दें व सूर्य तप्त जल को अपने आप ठंडा होने दें। यह पानी तीन दिन तक काम में लिया जा सकता है। पुराने रोगों में पानी की खुराक 25 सी. सी. दिन में तीन बार लें।

तेज रोगों में 25 सी. सी. दो-दो घंटे के बाद, बुखार, हैजा में 25 सी. सी. 1/2 घंटे के अंतराल से देना चाहिए। नारंगी रंग की बोतल का पानी नाश्ते या भोजन के 15 मिनट बाद लेना चाहिए। नीले व हरे रंग का पानी खाली पेट लेना चाहिए, क्योंकि इसका काम शरीर में जमा गंदगी बाहर निकलना व खून साफ करना है।

यदि आप टॉनिक के रूप में सूर्य तप्त जल पीना चाहते हैं तो उसे सफेद कांच की बोतल में भरकर बनाएं। इस पानी से बाल धोने से चमक आती है व बाल टूटते नहीं हैं।

सामान्य रूप से देखने पर सूर्य का प्रकाश सफेद ही दिखाई देता है पर वास्तव में वह सात रंगों का मिश्रण होता है। कांच के त्रिपार्श्व से सूर्य की किरणों को गुजारने पर दूसरी ओर इन सात रंगों को स्पष्ट देखा जा सकता है। किसी विशेष रंग की कांच की बोतल में साधारण पानी, चीनी, मिश्री, घी, ग्लिसरीन आदि तीन-चौथाई भरकर सूर्य की किरणें दिखाने से या धूप में रखने से उस कांच द्वारा सूर्य के प्रकाश से उसी रंग की किरणों को ग्रहण किया जाता है। उसी रंग का तत्व और गुण पानी आदि वस्तु में उत्पन्न हो जाता है। वह सूर्यतप्त (सूर्य किरणों द्वारा चार्ज की गई वस्तु) रोग-निवारण गुणों और स्वास्थ्यवर्धक तत्वों से युक्त हो जाती है। इन सूर्यतापित वस्तुओं के उचित भीतरी और बाहरी प्रयोग से मनुष्य के शरीर में रंगों का संतुलन कायम रखा जा सकता है और अनेक प्रकार के रोगों को सहज ही दूर किया जा सकता है। यही सूर्य किरण चिकित्सा है।

प्रकृति की अमूल्य देन सूर्य-किरणें
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धूप और पाचन की क्रियाओं में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। यदि मनुष्य या अन्य किसी प्राणी पर प्रतिदिन सूर्य किरणें नहीं पड़तीं, तो उसकी पाचन और समीकरण शक्ति क्षीण हो जाती है। स्फुरण (Solar Radiation) तथा मानव जीवन इन दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। जीवन का सम्बन्ध प्रकाश-शक्ति तथा उसके वर्ण-वैभव से है, न कि प्रोटीन, श्वेत सार, हाइड्रोजन, कार्बन अथवा उष्णाँक से।

आकाश और वायु- तत्व की भाँति प्रकाश-तत्व भी अत्यन्त सूक्ष्म है। प्रकृति के हरे भरे प्रशस्त अंचल में हम जो नाना रंगों की चित्रपटी देखते हैं-यह सब सूर्य की सतरंगी किरणों की ही माया है। प्रकाश में अन्तर्निहित रंगीनी केवल नेत्रों को ही सुन्दर प्रतीत नहीं होती प्रत्युत जीवन रंजक भी है। सूर्य की किरणों का प्राणी जगत पर स्थायी प्रभाव पड़ा करता है। सूर्य किरण चिकित्सा का यही मूलाधार है। रंगीन बोतलों में पानी रखने से प्रकाश का प्रभाव भी बदलता रहता है और उसमें भाँति-2 के गुण उत्पन्न हो जाते हैं।

सूर्य की किरणों के रंग
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चर्म चक्षुओं से सूर्य की किरणें श्वेत प्रतीत होती हैं किन्तु वास्तव में ये सात रंगों की बनी हुई हैं। इन सातों रंगों का रासायनिक प्रभाव पृथक-2 होता है। विभिन्न फलों तथा तरकारियों को प्रकाश तथा रंग नाना प्रकार के गुण प्रदान करता है। इन रासायनिक गुणों के अनुसार हम पृथक भाजियों का प्रयोग करते हैं। प्रकृति की तीन रचना में सबका कुछ न कुछ गुप्त प्रयोजन है। वनस्पति जगत में प्रकाश तत्व के कारण ही नाना प्रकार के गुण, रंग, एवं रासायनिक तत्व सामने आते हैं।

रंगीन फल तथा तरकारियों का प्रभाव
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रंगों के आधार पर हम फल तथा तरकारियों को निम्न वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-

  1. पीला रंग👉 इस रंग वाले फलों का प्रभाव पाचन क्रिया पर बड़ा अच्छा पड़ता है, आमाशय और कोष्ठ के स्नायुओं को उत्तेजित करने में इसका विशेष महत्व है। ये फल रेचक व पाचक होते हैं। पेट की खराबियों में ये खासतौर पर काम में लाये जाते हैं। इनमें कागजी नींबू, चकोतरा, मकोय, अनानास, खरबूजा, पपीता, बथुआ, अमरूद। इनमें कार्बन, नाइट्रोजन या खनिज लवण प्रचुर मात्रा में होता है।
  2. लाल रंग👉 इस रंग वाले फलों में लोहा और पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है। नाइट्रोजन और ऑक्सीजन की भी पर्याप्त मात्रा होती है। इस वर्ग में चुकन्दर, लालबेर, टमाटर, पालक, लालशाक, मूली इत्यादि रखें गये हैं।
  3. नारंगी रंग👉 इन फल तथा तरकारियों में चूना और लोहा विशेष रूप से पाया जाता है। इस श्रेणी में नारंगी, आम, गाजर इत्यादि हैं।
  4. नीला रंग👉 इस रंग की श्रेणी में हम गहरा नीला और बैंगनी भी रखते हैं। इन तरकारियों में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, मैग्नीशियम तथा फास्फोरस अधिक होता है। इस श्रेणी में जामुन फालसा, आलू बुखारा, बेल, सेब विशेष रूप से आते हैं।
  5. हरे रंग👉 की तरकारियाँ शीतल प्रकृति की होती हैं, गुर्दों को हितकारी, पेट को साफ करने वाली और नेत्र तथा चर्म रोगों में लाभदायक सिद्ध होती है।

मनुष्य के शारीरिक अथवा मानसिक विकास में सूर्य किरणों द्वारा उत्पन्न उपरोक्त सभी रंगों के फल, शाक, भाजियों का संतुलन आवश्यक है। यदि एक ही प्रकार के रंग का भोजन अधिक दिन तक लेते रहे तो वह रंग शरीर में अधिक हो जायेगा और रोग उत्पन्न हो सकता है। अतः यथासंभव सभी रंगों का भोजन काम में लेना चाहिए। व्यक्तिगत रंग-संतुलन स्थापित कर हम सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं।

दैनिक जीवन में सूर्य किरणों का उपयोग
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मनुष्य के लिए सूर्य का प्रकाश सर्वश्रेष्ठ एवं अकथनीय गुणकारी है। हमारी आत्मा पर इसका प्रभाव इतना विकासपूर्ण होता है कि प्रायः हम अनुभव किया करते हैं कि अंधेरे में जैसे दम घुट रहा हो। उजाले में रहने से आँतरिक द्वेष दूर होते और हृदय की खिन्नता मिटकर चित्त प्रसन्न होता है। प्रकाश उत्साह, साहस और उत्सुकता का द्योतक है।

सूर्य स्नान👉 सूर्य में कीटाणुनाशक शक्तियाँ हैं अतः अधिक से अधिक धूप में रहने का अभ्यास करना चाहिए। सूर्य की प्राण पोषक शक्तियों को ग्रहण करने के लिए अमेरिका और इंग्लैण्ड में सूर्य स्नान का रिवाज है। समुद्र तट पर जब लोग सूर्य स्नान के लिए जाते हैं तो केवल जाँघिया के, अन्य पोशाक बिल्कुल उतार देते हैं, सूर्य की तेज किरणों में रेत पर लेट जाते हैं।

अनिद्रा में उपयोग
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अनिद्रा में एनीमिया अर्थात् रक्त की कमी में सूर्य का प्रकाश अमृत-तुल्य है। अनिद्रा क्षय तक उत्पन्न कर सकती है। सूर्य-प्रकाश लेने से रुधिर की प्राणपोषक वायु बढ़ जाती है, गति में भी तीव्रता आ जाती है। प्रकाश में श्वास क्रिया गहरी और धीमी हो जाती है। इसके फलस्वरूप रात्रि में अच्छी नींद आती है।

रक्त की कमी
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(एनीमिया) में रोगी सरदर्द से बड़ा परेशान रहता है। ऐसी दशा में सूर्य किरणें देने से लाभ होता है।

रक्तचाप
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सूर्य किरणों का बढ़े हुए रक्त चाप में उपयोग करने से रक्तचाप में कमी आ जाती है। सर्व साधारण के लिए भी यह उपयुक्त है कि वह 10-15 मिनट के लिए अवश्य धूप में बैठे। सूर्य किरण के सेवन से वजन बढ़ जाता है। रक्तचाप की सभी अवस्थाओं में किसी योग्य चिकित्सक के आदेशानुसार ही सूर्य-प्रकाश का सेवन करना चाहिए।

घाव-घावों को ठीक करने में
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सूर्य का प्रकाश बड़ा आश्चर्यजनक सिद्ध हुआ है क्योंकि रक्त में गति आ जाती है। सूर्य की किरणों से दूषित कीटाणु नष्ट होते हैं। सूर्य किरण शरीर को पार कर जाती हैं और रुधिर में जीवाणुओं की अभिवृद्धि करती हैं। इससे सब प्रकार की कमियाँ नष्ट होकर घाव अच्छा हो जाता है। रोगी को थोड़ी देर तक रोज सर्वांग सूर्य-स्नान लेना चाहिए।

क्षय में सूर्य का चमत्कार
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क्षय रोग में सूर्य किरणों से अत्यधिक लाभ होता है। रुधिर में प्राण शक्ति का आविर्भाव होता है। क्षय के रोगी को धूप में 10 से 20 मिनट तक बैठना चाहिये। शरीर पर जितने कम कपड़े रहें उतना अच्छा है। शरीर नंगा रहे तो सर्वोत्तम है। आधुनिक चिकित्सक सूर्य किरण को क्षय के लिये महौषधि मानते हैं। क्षय में सूर्य किरण का उपयोग करते हुए किसी योग्य चिकित्सक का आदेश लेना चाहिये।

साधारण जीवन में
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सूर्य-स्नान महान उपयोगी है, प्रकृति की अमूल्य तथा अनुपम देन है। छोटे-छोटे बच्चों का नित्य प्रति कुछ देर के लिए धूप में ही सेवन कराना चाहिये। शीतकाल में उन्हें धूप में ही खेलने देना चाहिये। गोद के शिशुओं को सूर्य किरणों में कुछ देर के लिए लिटाना चाहिए। रोगियों के लिये सूर्य प्रकाश महौषधि है।

सूर्य स्नान से शरीर के रक्त में लोहे की मात्रा 2 प्रतिशत बढ़ जायेगी। इसके लिए आप को लोह-प्रधान पदार्थ या लोह-तत्व बढ़ाने वाले भोजनों की आवश्यकता न पड़ेगी। धूप-स्नान से शरीर में इतना प्रभावोत्पादक गुण उत्पन्न होता है, जो कि औषधि-प्रणाली के लिए सर्वदा अज्ञात ही है, उसकी किसी भी दवा में इतना प्रभावोत्पादक गुण कभी नहीं पाया जाता। त्वचा के नीचे जो तत्व पहले से ही विद्यमान हैं, उसे सूर्य की किरणें तत्काल ही विटामिन डी. में परिणत कर देती हैं। शरीर में चूने की कमी के कारण होने वाले रोगों का इलाज बड़ा सहज हैं। वह है सूर्य-रश्मियों का उपयोग।
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अंग्रेजों ने कैसे चुराया प्लास्टिक सर्जरी का ज्ञान ?


अंग्रेजों को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिलने का इतिहास बड़ा रोचक हैं. सन 1769 से 1799 तक, तीस वर्षों में, हैदर अली – टीपू सुलतान इन बाप-बेटे और अंग्रेजों में 4 बड़े युद्ध हुए.

इन मे से एक युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाला ‘कावसजी’ नाम का मराठा सैनिक और 4 तेलगु भाषी लोगों को टीपू सुलतान की फ़ौज ने पकड़ लिया. बाद में इन पांचों लोगों की नाक काटकर टीपू के सैनिकों ने, उनको अंग्रेजों के पास भेज दिया.

इस घटना के कुछ दिनों के बाद एक अंग्रेज कमांडर को एक भारतीय व्यापारी के नाक पर कुछ निशान दिखे. कमांडर ने उनको पूछा तो पता चला कि उस व्यापारी ने कुछ ‘चरित्र के मामले में गलती’ की थी, इसलिए उसको नाक काटने की सजा मिली थी.

लेकिन नाक कटने के बाद, उस व्यापारी ने एक वैद्य जी के पास जाकर अपनी नाक पहले जैसी करवा ली थी. अंग्रेज कमांडर को यह सुनकर आश्चर्य हुआ. कमांडर ने उस कुम्हार जाति के वैद्य को बुलाया और कावसजी और उसके साथ के चार लोगों की नाक पहले जैसी करने के लिए कहा.

कमांडर की आज्ञा से, पुणे के पास के एक गांव में यह ऑपरेशन हुआ. इस ऑपरेशन के समय दो अंग्रेज डॉक्टर्स भी उपस्थित थे. उनके नाम थे – थॉमस क्रूसो और जेम्स फिंडले.

इन दोनों डॉक्टरों ने, उस अज्ञात मराठी वैद्य के किए हुए इस ऑपरेशन का विस्तृत समाचार ‘मद्रास गजेट’ में प्रकाशन के लिए भेजा. वह छपकर भी आया.

विषय की नवीनता एवं रोचकता देखते हुए, यह समाचार इंग्लैंड पहुचा. लन्दन से प्रकाशित होने वाले ‘जेंटलमैन’ नामक पत्रिका ने इस समाचार को अगस्त, 1794 के अंक में पुनः प्रकाशित किया. इस समाचार के साथ, ऑपरेशन के कुछ छायाचित्र भी दिए गए थे.

अगस्त, 1794 के लन्दन से प्रकाशित ‘जेंटलमैन’ मासिक का वह पृष्ठ, जिसमें पुणे में संपन्न हुई प्लास्टिक सर्जरी का विवरण छपा है.
जेंटलमैन में प्रकाशित ‘स्टोरी’ से प्रेरणा लेकर इंग्लैंड के जे. सी. कॉर्प नाम के सर्जन ने इसी पद्धति से दो ऑपरेशन किये. दोनों सफल रहे. और फिर अंग्रेजों को और पश्चिम की ‘विकसित’ संस्कृति को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिली. पहले विश्व युद्ध में इसी पद्धति से ऐसे ऑपरेशन्स बड़े पैमाने पर हुए और वह सफल भी रहे.

वास्तव में प्लास्टिक सर्जरी से पश्चिमी जगत का परिचय इससे भी पुराना हैं. वह भी भारत की प्रेरणा से.

‘एडविन स्मिथ पापिरस’ ने पश्चिमी लोगों के बीच प्लास्टिक सर्जरी के बारे में सबसे पहले लिखा ऐसा माना जाता हैं. लेकिन रोमन ग्रंथों में इस प्रकार के ऑपरेशन का वर्णन एक हजार वर्ष पूर्व से मिलता हैं.

अर्थात भारत में यह ऑपरेशन्स इससे बहुत पहले हुए थे. आज से पौने तीन हजार वर्ष पहले, ‘सुश्रुत’ नाम के शस्त्र-वैद्य (आयुर्वेदिक सर्जन) ने इसकी पूरी जानकारी दी हैं. नाक के इस ऑपरेशन की पूरी विधि सुश्रुत के ग्रंथ में मिलती हैं.

किसी विशिष्ट वृक्ष का एक पत्ता लेकर उसे मरीज की नाक पर रखा जाता हैं. उस पत्ते को नाक के आकार का काटा जाता हैं. उसी नाप से गाल, माथा या फिर हाथ / पैर, जहां से भी सहजता से मिले, वहां से चमड़ी निकाली जाती हैं. उस चमड़ी पर विशेष प्रकार की दवाइयों का लेपन किया जाता हैं.

फिर उस चमड़ी को जहाँ लगाना हैं, वहां बांधा जाता हैं. जहां से निकाली हुई हैं, वहां की चमड़ी और जहां लगाना हैं, वहां पर विशिष्ट दवाइयों का लेपन किया जाता हैं. साधारणतः तीन हफ्ते बाद दोनों जगहों पर नई चमड़ी आती हैं, और इस प्रकार से चमड़ी का प्रत्यारोपण सफल हो जाता हैं.

इसी प्रकार से उस अज्ञात वैद्य ने कावसजी पर नाक के प्रत्यारोपण का सफल ऑपरेशन किया था.

नाक, कान और होंठों को व्यवस्थित करने का तंत्र भारत में बहुत पहले से चलता आ रहा हैं. बीसवी शताब्दी के मध्य तक छेदे हुए कान में भारी गहने पहनने की रीति थी.

उसके वजन के कारण छेदी हुई जगह फटती थी. उसको ठीक करने के लिए गाल की चमड़ी निकाल कर वहां लगाई जाती थी. उन्नीसवी शताब्दी के अंत तक इस प्रकार के ऑपरेशन्स भारत में होते थे.

हिमाचल प्रदेश का ‘कांगड़ा’ जिला तो इस प्रकार के ऑपरेशन्स के लिए मशहूर था. कांगड़ा यह शब्द ही ‘कान + गढ़ा’ ऐसे उच्चारण से तैयार हुआ हैं.

डॉ एस सी अलमस्त ने इस ‘कांगड़ा मॉडल’ पर बहुत कुछ लिखा हैं. वे कांगड़ा के ‘दीनानाथ कानगढ़िया’ नाम के नाक, कान के ऑपरेशन्स करने वाले वैद्य से स्वयं जाकर मिले. इन वैद्य के अनुभव डॉ. अलमस्त जी ने लिख कर रखे हैं.

सन 1404 तक की पीढ़ी की जानकारी रखने वाले ये ‘कान-गढ़िया’, नाक और कान की प्लास्टिक सर्जरी करने वाले कुशल वैद्य माने जाते हैं.

ब्रिटिश शोधकर्ता सर एलेग्जेंडर कनिंघम (1814–1893) ने कांगड़ा की इस प्लास्टिक सर्जरी को बड़े विस्तार से लिखा हैं. अकबर के कार्यकाल में ‘बिधा’ नाम का वैद्य कांगड़ा में इस प्रकार के ऑपरेशन्स करता था, ऐसा फारसी इतिहासकारों ने लिख रखा हैं.

‘सुश्रुत’ की मृत्यु के लगभग ग्यारह सौ (1100) वर्षों के बाद ‘सुश्रुत संहिता’ और ‘चरक संहिता’ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ. यह कालखंड आठवी शताब्दी का हैं. ‘किताब-ए-सुसरुद’ नाम से सुश्रुत संहिता मध्यपूर्व में पढ़ी जाती थी.

आगे जाकर, जिस प्रकार से भारत की गणित और खगोलशास्त्र जैसी विज्ञान की अन्य शाखाएं, अरबी (फारसी) के माध्यम से यूरोप पहुंची, उसी प्रकार ‘किताब-ए-सुसरुद’ के माध्यम से सुश्रुत संहिता यूरोप पहुच गई.

चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी में इस ऑपरेशन की जानकारी अरब–पर्शिया (ईरान)–इजिप्त होते हुए इटली पहुँची.

इसी जानकारी के आधार पर इटली के सिसिली आयलैंड के ‘ब्रांका परिवार’ और ‘गास्परे टाग्लीया-कोसी’ ने कर्णबंध और नाक के ऑपरेशन्स करना प्रारंभ किया. किन्तु चर्च के भारी विरोध के कारण उन्हें ऑपरेशन्स बंद करना पड़े. और इसी कारण उन्नीसवीं शताब्दी तक यूरोपियन्स को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी नहीं थी.

ऋग्वेद का ‘आत्रेय (ऐतरेय) उपनिषद’ अति प्राचीन उपनिषदों में से एक हैं. इस उपनिषद में (1-1-4) ‘मां के उदर में बच्चा कैसे तैयार होता हैं’, इसका विवरण हैं. इस में कहा गया हैं कि गर्भावस्था में सर्वप्रथम बच्चे के मुंह का कुछ भाग तैयार होता हैं. फिर नाक, आँख, कान, ह्रदय (दिल) आदि अंग विकसित होते हैं.

आज के आधुनिक विज्ञान का सहारा लेकर, सोनोग्राफी के माध्यम से अगर हम देखते हैं, तो इसी क्रम से, इसी अवस्था से बच्चा विकसित होता हैं.

भागवत में लिखा है (2-1022 और 3-26-55) कि मनुष्य में दिशा पहचानने की क्षमता कान के कारण होती हैं. सन 1935 में डॉक्टर रोंस और टेट ने एक प्रयोग किया. इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मनुष्य के कान में जो वेस्टीब्यूलर (vestibular apparatus) होता है, उसी से मनुष्य को दिशा पहचानना संभव होता हैं.

अब यह ज्ञान हजारों वर्ष पहले हमारे पुरखों को कहां से मिला होगा..?

संक्षेप में, प्लास्टिक सर्जरी का भारत में ढाई से तीन हजार वर्ष पूर्व से अस्तित्व था. इसके पक्के प्रमाण भी मिले हैं.

शरीर विज्ञान का ज्ञान और शरीर के उपचार यह हमारे भारत की सदियों से विशेषता रही है. लेकिन ‘पश्चिम के देशों में जो खोज हुई हैं, वही आधुनिकता हैं और हमारा पुरातन ज्ञान याने दकियानूसी हैं’, ऐसी गलत धारणाओं के कारण हम हमारे समृद्ध विरासत को नकार रहे हैं..!

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અચૂક વાંચવા જેવી માહિતી :

“હાર્ટએટેક અને પાણી”
તમે કેટલા એવા લોકોને જાણો છો જે રાત્રે સુતા પહેલા પાણી પીવાનું ટાળે છે કારણકે તેમને રાત્રે ઉઠવું પડશે.
હાર્ટએટેક અને પાણી – ક્યારેય આ જાણકારી ન હતી ! માહિતી રસપ્રદ છે.
બીજીપણ એવી વાત જે ખબર નહોતી અને ડોક્ટરને પૂછ્યું કે કેટલાક લોકોને કેમ રાત્રે પેશાબ કરવા માટે વારંવાર ઉઠવું પડે છે
હૃદયરોગ Dr એ આપેલ જવાબ – ગુરુત્વાકર્ષણના કારણે જયારે તમે ઉભેલા હોવ ત્યારે પાણી તમારા શરીરના નીચેના ભાગમાં જમા થાય છે (પગે સોજા આવવા) પણ જયારે તમે સુઈ જાવ છો ત્યારે તમારા પગ કિડનીના સમાંતરે હોય છે અને ત્યારે કીડની તે પાણીને બહાર ફેંકે છે.
એ ખબર હતી કે તમારે શરીરના ઝેરી કચરાને બહાર ફેંકવા માટે પાણીની આવશ્યકતા હોય છે પણ આ માહિતી નવીજ હતી.
પાણી પીવા માટેનો યોગ્ય સમય, એક હૃદયરોગ Dr આપેલી ખુબજ અગત્યની માહિતી……..
યોગ્ય સમયે પીવામાં આવેલું પાણી શરીરમાં તેની અસરકારકતા વધારી દે છે.
સવારે ઉઠ્યા પછી ૨ ગ્લાસ પાણી પીવાથી આંતરિક અંગો સક્રિય થાય છે.
જમવાના અડધા કલાક પહેલા ૧ ગ્લાસ પાણી પીવાથી પાચનક્રિયા સક્રિય થાય છે.
સ્નાન કરતા પહેલા ૧ ગ્લાસ પાણી બ્લડપ્રેશરને નીચું રાખે છે.
રાત્રે સુતા પહેલા ૧ ગ્લાસ પાણી પીવાથી સ્ટ્રોક અને હાર્ટએટેકનું જોખમ ઘટે છે.
રાત્રે પાણી પીને સુવાથી પગના સ્નાયુઓ જકડાઈ(સાદી રીતે કહીએ તો નસ ચઢી જવી) જતા નથી સ્નાયુઓને પાણીની જરૂરત હોય છે અને જો તેમણે પાણી ના મળે તો તે જકડાઈ જાય અને તમે ચીસ પાડીને બેઠા થાવ.
૨૦૦૮ ના અમેરિકન કોલેજ ઓફ કાર્ડીઓલોજીના જર્નલના અંકમાં પ્રસિદ્ધ થયેલ જેમાં જણાવ્યા પ્રમાણે…..
હાર્ટએટેક સામાન્ય રીતે સવારના ૬ થી બપોર સુધીમાં વધારે આવે છે જો રાત્રીના સમયે હાર્ટએટેક આવે તો તે વ્યક્તિની સાથે કંઇક અસામાન્ય બનાવ બન્યો હોય એમ પણ સંભવ છે.
જો તમે એસ્પીરીન જેવી કોઈ દવા લેતા હોવ તો એ દવા રાતના સમયે લેવી જોઈએ કારણકે એસ્પિરીનની અસર ૨૪ કલાક માટે રહેતી હોય છે એટલે સવારના સમયે તેની તીવ્રતમ માત્રામાં અસર હોય છે.
એસ્પીરીન તમારા દવાના ડબ્બામાં ઘણા વર્ષો સુધી રહી શકે છે અને જયારે તે જૂની થાય છે ત્યારે એમાંથી (સરકો) વિનેગર જેવી વાસ આવે છે.
બીજી વાત જે દરેકને મદદરૂપ થશે – બેયર કંપની ક્રિસ્ટલ જેવી એસ્પીરીન બનાવે છે જે જીભ ઉપર મુકતાજ ઓગળી જાય છે. તે સામાન્ય ગોળી કરતા ઝડપથી કામ કરે છે. માટે એસ્પીરીન કાયમ તમારી સાથે રાખો.
હાર્ટએટેકના સર્વમાન્ય લક્ષણો ડાબા હાથ અને છાતીમાં દુખાવા ઉપરાંત પણ કેટલાક લક્ષણો છે જેની માહિતી પણ જરૂરી છે જેમ કે દાઢીમાં ખુબજ દુખાવો થવો, ઉલટી ઉબકા જેવો અનુભવ થવો, ખુબજ પરસેવો થવો. પણ આ લક્ષણો ક્યારેક્જ દેખાય છે.
નોંધ – હાર્ટએટેકમાં ક્યારેક છાતીમાં દુખાવો ના પણ થાય.
મોટાભાગના (લગભગ ૬૦%) લોકોને જયારે ઊંઘમાં હાર્ટએટેક આવ્યો તો તેઓ જગ્યા નહતા. પરંતુ જો તમને છાતીમાં જોરદાર દુખાવો ઉપડે તો તેનાથી તમે ગાઢ નિંદ્રામાંથી પણ જાગી જાવ છો.
જો તમને હાર્ટએટેક આવે તો – તાત્કાલિક ૨ એસ્પીરીન મોઢામાં મુકીદો અને થોડાક પાણી સાથે તેને ગળી જાવ.
પછી ૧૦૮ ને ફોન કરો, તમારા પડોશી કે સગા જેઓ નજીક રહેતા હોય તેમણે ફોન કરો અને કહો “હાર્ટએટેક” અને એ પણ જણાવો કે તમે ૨ એસ્પીરીન લીધી છે. પછી મુખ્ય દરવાજાની સામે સોફા કે ખુરશીમાં બેસો અને તેમના આવવાની રાહ જુઓ – સુઈ જશો નહિ.
એક હૃદયરોગના તબીબે એમ જણાવ્યું કે જો આ માહીતીને ૧૦ લોકો શેર કરે તો ૧ જીવન બચાવી શકાય છે. મેં તો આ માહિતીને શેર કરી હવે તમે શું કરશો?આ મેસેજને બને એટલા લોકો સુધી પહોંચાડો એ કોઈકનું જીવન બચાવી શકે છે.
જીવન એ એક જ વાર મળતી અમુલ્ય ભેટ છે……..

વિશાલ સોજીત્રા

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आयुर्वेद पे पुस्तकों का सूचीपत्र – ७७ पुस्तके


आयुर्वेद पे पुस्तकों का सूचीपत्र – ७७ पुस्तके
harshad30.wordpress.com
+973-66331781
1500 Time Tested Home Remedies And The Science Behind Them.pdf
2Ayurvedic Astrology.pdf
3Black’s Medical Dictionary.pdf
4Body For Life.pdf
5Fear.pdf
6Home Emergency Guide.pdf
7Home Remedies By Sri Swami Sivananda.pdf
8How To Sleep & Have More Energy.pdf
9Physical Rehabilation.pdf
10Practice Of Ayurveda.pdf
11Secrets Of The Pulse.pdf
12The Great Indian Diet – Shilpa Shetty Kundra.epub
13Tibetan Medicine – Rechung Rinpoche.pdf
14Top 100 Health Care Careers.pdf
15आधुनिक चिकित्सा शास्त्र.pdf
16आयुर्वेद विज्ञान – डॉ. कमला प्रसाद मिश्र.pdf
17आयुर्वेद सार संग्रह.pdf
18आयुर्वेदीय औषधीगुणधर्म शास्त्र.pdf
19आरोग्यनिधि भाग २.pdf
20एलोवेद.pdf
21औषध दर्शन भाग२.pdf
22औषध–दर्शन भाग१.pdf
23घर का वैध.pdf
24घरेलु  चिकित्सा – पं. श्रीराम शर्मा आचार्य..pdf
25घरेलु चिकित्सा – आचार्य श्रीराम शर्मा.pdf
26जंगल की जड़ी-बूटियां – रामेश बेदी.pdf
27जंगल की जड़ी-बूटियां.pdf
28जडीबुटी चिकित्सा.pdf
29जड़ी-बूटियों द्वारा स्वास्थ्य संरक्षण.pdf
30जल चिकित्सा – अर्थात पानी का इलाज.pdf
31तुलसी के चमत्कारी गुण.pdf
32नाडी दर्शन – ताराशंकर वैध.pdf
33निसर्गोपचार​ मराठी.pdf
34प्रतिदिन का भारतीय संसाधित आहार.pdf
35बाला विनोद – विवाहिता स्त्रियों का धर्मं.pdf
36मादक औषधियां.pdf
37विटामिन डी Ima.pdf
38वेदों में आयुर्वेद.pdf
39वैदिक चिकित्सा – पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर.pdf
40सम्पूर्ण चिकित्सा.pdf
41स्वदेशी चिकित्सा – भाग १.pdf
42स्वदेशी चिकित्सा – भाग २.pdf
43स्वदेशी चिकित्सा – भाग ३.pdf
44स्वदेशी चिकित्सा – भाग ४.pdf
45स्वस्थ जीवन के 10 सुनहरे नियम.pdf
46होमियो पैथिक चिकित्सा तत्त्व .pdf
47આરોગ્ય આપણા સૌનું – ભાગ ૩ .pdf
48આરોગ્ય સૂત્ર .pdf
49ઘરગથ્થુ વૈદુ – સ્વામી શ્રી નિર્દોષાનંદ.pdf
50તમારો રોગ તમારૂ  આરોગ્ય – ભાગ ૩ .pdf
51તમારો રોગ તમારૂ  આરોગ્ય – ભાગ ૪ .pdf
52તમેજ તમારા વૈધ – શોભન.pdf
53દિવ્ય ઔષધિ – ભાગ ૨ .pdf
54દિવ્ય ઔષધિ – ભાગ ૩ .pdf
55ફળો આહાર રૂપે ઔષધ રૂપે .pdf
56મગજ ન ગુમાવો વજન ગુમાવો .pdf
57મસાલા મુખવાસ આહાર રૂપે ઔષધ રૂપે .pdf
58માનવ દેહ મંદિર .pdf
59માનવશરીર – ટોપ ટેન.pdf
60વન ઔષધિ ની માર્ગદર્શિકા .pdf
61વનવગડો અંક-13 ૧૦ ૨૦૨૦.pdf
62વનસ્પતિ.pdf
63વાયુ ના રોગો .pdf
64વૃક્ષાયુર્વેદ.pdf
65વૈધક ચિકિત્સાસાર ભાગ ૦૧.pdf
66વૈધક ચિકિત્સાસાર ભાગ ૦૨.pdf
67વ્યસનમુક્તિ – ડૉ. કેતન ઝવેરી.pdf
68શરીર અને વૈદિક શાસ્ત્ર.pdf
69શાક ભાજી કઠોળ આહાર રૂપે ઔષધ રૂપે .pdf
70સરળ રોગોપચાર.pdf
71સુશ્રુત આયુર્વેદ – શરીર સ્થાન.pdf
72સ્વસ્થ આહાર – ડૉ. કેતન ઝવેરી .pdf
73સ્વાસ્થ્ય સુધા.pdf
74હાઈ બ્લડ પ્રેશર – ડૉ. કેતન ઝવેરી.pdf
75હાડકાં અને સાંધાની તકલીફો – ડૉ. કેતન ઝવેરી.pdf
76હાડકાં નબળા પડવાની તકલીફ – ડૉ. કેતન ઝવેરી .pdf
77હ્દયરોગ.pdf
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लवणं व्यञ्जनं चैव धृतं तैलं तथैव च ।
लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत ।।

મીઠું/નમક, તેલ, ચોખા / ભાત અને અન્ય ખોરાકના વ્યંજનો આંગળીઓની મદદથી પીરસવા ન જોઈએ. હંમેશા ચમચાનો ઉપયોગ કરવો. -ધર્મસિન્ધુ 3 પૂ.આહ્નિક

अनातुर खानि खानि न स्पृशेहनिमित्ततः ।।

ખાસ કારણ વગર પોતાની ઈન્દ્રિયોને આં ખ,નાક, કાન વગેરેને સ્પર્શ નહિં જ કરવો. મનુસ્મૃતિ 4/144

अपमृज्यान्न च सन्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।।

પોતે અગાઉ પહેરેલાં કપડાંનો ઉપયોગ કરવો જોઈએ નહિં,સ્નાન કર્યા પછી પોતે જ પોતાનું શરીરને કોરું કરી નાખવું. માર્કડેંય પુરાણ 34/52

हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे भोजनं चरेत ।।

જમતાં પહેલાં હાથ, પગ, મોઢું બરાબર ધોઈ જ નાંખવા. પદ્મસૃષ્ટિ-51/88

स्न्नानाचारविहीनस्य सर्वाः स्युः निष्फलाः क्रियाः ।

સ્નાન કર્યા વિના કરેલાં સઘળા કામો નિષ્ફળ જાય છે. વાઘલસ્મૃતિ - 69

न धारयेत् परस्यैतं स्न्नानवस्त्रं कदाचन् ।।

સ્નાન કર્યા પછી બીજાના કપડાં કે ટુવાલનો ઉપયોગ કરવો જ નહિં. પદ્મસૃષ્ટિ- 51/86

अन्यदेव भवद्वासः शयनीये नरोत्तम।
अन्यद् रथ्यासु देवनाम् आचार्याम् अन्यदेव हि ।।

સુતી વખતે, બહાર જતી વખતે કે પૂજા કરતી વખતે અલગ અલગ વસ્ત્રો ધારણ કરવા. મહાભારત -104/86

न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयाद् ।।

પહેરેલાં વસ્ત્રો ધોયા વગર ફરી પહેરવાં નહિં. વિષ્ણુસ્મૃતિ -64

तथा न अन्यथृतं (वस्त्रं) थार्यम् ।।

બીજાના પહેરેલાં વસ્ત્રો કદાપિ ન પહેરવા. મહાભારત -104/86

न आद्रंपरिदधीत

ભીના વસ્ત્રો કદાપિ ન પહેરવા. ગોભિસગુહ્યમસૂત્ર-3/5/24

चिताधूमसेवने सर्वे वर्णाः स्न्नानम् आचयेयुः वमनेश्मश्रुकर्मणि कृते च ।

સ્મશાનમાં જઈને આવ્યા પછી અચૂક સ્નાન કરવું જ વાળ કપાવ્યા પછી પણ અચૂક સ્નાન કરવું જ. વિષ્ણુસ્મૃતિ -22

આજની પરિસ્થીતિના સંદર્ભમાં આપણા પૂર્વજો કેટલા દીર્ઘદ્રષ્ટા હતા, 5000 વર્ષ પહેલાં સુક્ષ્મદર્શકયંત્ર વિના પણ વાયરસને ઓળખી તે સામે લડવાની સાવચેતી રોજ બરોજના જીવનમાં સદાચાર તરીકે શીખવાડી દિધી હતી.
વંદન છે તે સંસ્કૃતિને
” दुर्लभ भारते जन्म “
Proud to be our culture 🙏👍👍🙏

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🌹 सफेद दाग 🌹

🌷 रात ताँबे के गिलास में पानी रखिये,सुबह तुलसी रस 5 ml मिलाकर पीजिए। ठंड में थोड़ा गुनगुना कर लें।

आधे घण्टे बाद

🌷 सर्वकल्प क्वाथ 1 चम्मच पतजंलि का रोज सुबह शाम उबालकर, छानकर, इसमे 10 gm बाकुची चूर्ण मिलाए,पियें। इस काढ़े को पीने के पहले या बाद में
कायाकल्प वटि 1 पतजंलि , पुनरनवा मन्डूर 1 गोली भी खायें।

ऊपर के दोनों उपाय खाली पेट करने हैं। अर्थात सुबह सबसे पहले उठकर फिर शाम 4-5 बजे । इसको लेने के बाद डेढ़ घण्टे तक कुछ नही खाना,पीना है।

🌷रात भोजन के 2 घण्टे बाद गहरे लाल गुड़हल 5 ताजे या सूखे फूलों को गर्म दूध में मसलकर,मिश्री मिलाकर पिएं।

🌷बाकुची तेल को सफेद दागों पर लगाइये। अगर जलन करे तो 1चम्मच तेल को 1 चमच्च देशी गाय के घी में मिलाकर गर्म करिये,उतारिये,गुनगुना ही लगाइये।

2 साल लगातार करिये।

खट्टी चीज पूरी तरह बन्द।
तली मसालेदार कोई चीज नही खाना। सूखी सब्जी जैसे भिंडी की, तले आलू, तले करेला आदि बिल्कुल बन्द 2 साल के लिए।

बथुआ भाजी, लौकी, तोरई,परवल ,रोटी ही खायें।

उगते सूर्य के दर्शन करियेगा, सूर्य से रोगमुक्ति की प्रार्थना करिये। धूप सेंकना।

नमक कम से कम।
🌼🌻🌼🌻🌼🌻🌼🌻
वैद्यराज श्री गणेश

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पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान



यन्त्र तंत्र मंत्र ग्रुप की भेंट
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हंस जैन। रामनगर खंडवा
9827214427
🖤🖤🖤🖤🖤🖤

पारिजात नाम के वृक्ष को छूने से मिटती है थकान

क्या कोई ऐसा भी वृक्ष है,जिसं छूने मात्र से मनुष्य की थकान मिट जाती है। हरिवंश पुराण में ऐसे ही एक वृक्ष का उल्लेख मिलता है,जिसको छूने से देव नर्तकी उर्वषी की थकान मिट जाती थी। पारिजात नाम के इस वृक्ष के फूलो को देव मुनि नारद ने श्री कृश्ण की पत्नी सत्यभामा को दिया था। इन अदभूत फूलों को पाकर सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण से जिद कर बैठी कि परिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए। पारिजात वृक्ष के बारे में श्रीमदभगवत गीता में भी उल्लेख मिलता है। श्रीमदभगवत गीता जिसमें 12 स्कन्ध,350 अध्याय व18000 ष्लोक है ,के दशम स्कन्ध के 59वें अध्याय के 39 वें श्लोक , चोदितो भर्गयोत्पाटय पारिजातं गरूत्मति। आरोप्य सेन्द्रान विबुधान निर्जत्योपानयत पुरम॥ में पारिजात वृक्ष का उल्लेख पारिजातहरण नरकवधों नामक अध्याय में की गई है।

सत्यभामा की जिद पूरी करने के लिए जब श्री कृष्ण ने परिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग लोक भेजा तो इन्द्र ने श्री कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पारिजात देने से मना कर दिया। जिस पर भगवान श्री कृष्ण ने गरूड पर सवार होकर स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और परिजात प्राप्त कर लिया। श्री कृष्ण ने यह पारिजात लाकर सत्यभामा की वाटिका में रोपित कर दिया। जैसा कि श्रीमदभगवत गीता के श्लोक, स्थापित सत्यभामाया गृह उधान उपषोभन । अन्वगु•र्ा्रमरा स्वर्गात तद गन्धासलम्पटा, से भी स्पष्ट है। भगवान श्री कृष्ण ने पारिजात को लगाया तो था सत्यभामा की वाटिका में परन्तु उसके फूल उनकी दूसरी पत्नी रूकमणी की वाटिका में गिरते थे। लेकिन श्री कृष्ण के हमले व पारिजात छीन लेने से रूष्ट हुए इन्द्र ने श्री कृश्ण व पारिजात दोनों को शाप दे दिया था । उन्होन् श्री क्रष्ण को शाप दिया कि इस कृत्य के कारण श्री कृष्ण को पुर्नजन्म यानि भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जाना जाएगा। जबकि पारिजात को कभी न फल आने का शाप दिया गया। तभी से कहा जाता है कि पारिजात हमेशा के लिए अपने फल से वंचित हो गया। एक मान्यता यह भी है कि पारिजात नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी ,जिसे भगवान सूर्य से प्यार हो गया था, लेकिन अथक प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्यार कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्म हत्या कर ली थी। जिस स्थान पर पारिजात की कब्र बनी वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया। इसी कारण पारिजात वृक्ष को रात में देखने से ऐसा लगता है जैसे वह रो रहा हो, लेकिन सूर्य उदय के साथ ही पारिजात की टहनियां और पत्ते सूर्य को आगोष में लेने को आतुर दिखाई पडते है। ज्योतिश विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया गया है।

पूर्व वैज्ञानिक एवं ज्योतिष के जानकार गोपाल राजू की माने तो धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने में पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। उन्होने बताया कि यदि ,ओम नमो मणि़•ाद्राय आयुध धराय मम लक्ष्मी़वसंच्छितं पूरय पूरय ऐं हीं क्ली हयौं मणि भद्राय नम, मन्त्र का जाप 108 बार करते हुए नारियल पर पारिजात पुष्प अर्पित किये जाए और पूजा के इस नारियल व फूलो को लाल कपडे में लपेटकर घर के पूजा धर में स्थापित किया जाए तो लक्ष्मी सहज ही प्रसन्न होकर साधक के घर में वास करती है। यह पूजा साल के पांच मुहर्त होली,दीवाली,ग्रहण,रवि पुष्प तथा गुरू पुष्प नक्षत्र में की जाए तो उत्तम है। यहां यह भी बता दे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है। यानि वृक्ष से फूल तोड़ने की पूरी तरह मनाही है।

इसी पारिजात वृक्ष को लेकर गहन अध्ययन कर चुके रूड़की के कुंवर हरि सिंह यादव ने बताया कि यंू तो परिजात वृक्ष की प्रजाति भारत में नहीं पाई जाती, लेकिन भारत में एक मात्र पारिजात वृक्ष आज भी उ.प्र. के बाराबंकी जनपद अंतर्गत रामनगर क्ष्ोत्र के गांव बोरोलिया में मौजूद है। लगभग 50 फीट तने व 45 फीट उंचाई के इस वृक्ष की ज्यादातर शाखाएं भूमि की ओर मुड़ जाती है और धरती को छुते ही सूख जाती है।

एक साल में सिर्फ एक बार जून माह में सफेद व पीले रंग के फूलो से सुसज्जित होने वाला यह वृक्ष न सिर्फ खुशबू बिखेरता है, बल्कि देखने में भी सुन्दर लगता है। आयु की दृष्टि से एक हजार से पांच हजार वर्ष तक जीवित रहने वाले इस वृक्ष को वनस्पति शास्त्री एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं। जिसकी दुनियाभर में सिर्फ 5 प्रजातियां पाई जाती है। जिनमें से एक डिजाहाट है। पारिजात वृक्ष इसी डिजाहाट प्रजाति का है। कुंवर हरि सिंह यादव अपने षोध आधार पर बताते है कि एक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी । जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। कहा जाता है जब पांडव पुत्र माता कुन्ती के साथ अज्ञातवास पर थे तब उन्होने ही सत्यभामा की वाटिका में से परिजात को लेकर बोरोलिया गांव में रोपित कर दिया होगा। तभी से परिजात गांव बोरोलिया की शोभा बना हुआ है। देशभर से श्रद्धालु अपनी थकान मिटाने के लिए और मनौती मांगने के लिए परिजात वृक्ष की पूजा अर्चना करते है। पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है। पारिजात बावासीर रोग निदान के लिए रामबाण औषधी है। पारिजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बावासीर रोग ठीक हो जाता है। पारिजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से बावासीर के रोगी को बडी राहत मिलती है। पारिजात के फूल हदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलो के रस का सेवन किया जाए तो हदय रोग से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सुखी खासी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते है। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को अगर 5 काली मिर्च के साथ महिलाएं सेवन करे तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जंहा हेयर टानिक का काम करते है तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है। इस दृश्टि से पारिजात अपनेआपमें एक संपूर्ण औषधी भी है।

इस वृक्ष के ऐतिहासिक महत्व व दुर्लभता को देखते हुए जंहा परिजात वृक्ष को सरकार ने संरक्षित वृक्ष घोषित किया हुआ है। वहीं देहरादून के राष्ट्रीय वन अनुसंधान संस्थान की पहल पर पारिजात वृक्ष के आस पास छायादार वृक्षों को हटवाकर पारिजात वृक्ष की सुरक्षा की गई। वन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. एसएस नेगी का कहना है कि पारिजात वृक्ष से चंूकि जन आस्था जुडी है। इस कारण इस वृक्ष को संरक्षण दिये जाने की निरंतर आवश्यकता है। इस वृक्ष की एक विषेशता यह भी है कि इस वृक्ष की कलम नहीं लगती ,इसी कारण यह वृक्ष दुर्लभ वृक्ष की श्रेणी में आता है। भारत सरकार ने पारिजात वृक्ष पर डाक टिकट भी जारी किया। ताकि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर पारिजात वृक्ष की पहचान बन सके।

सायटिका में लाभदायक पारिजात

हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।

परिचय : यह 10 से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25-30 फीट ऊँचा एक वृक्ष होता है और देशभर में खास तौर पर बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। विशेषकर मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में ज्यादातर पैदा होता है। इसके फूल बहुत सुगंधित और सुन्दर होते हैं जो रात को खिलते हैं और सुबह मुरझा जाते हैं।

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात, शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम – पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन- निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।

गुण : यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।

रासायनिक संघटन : इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से 12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल (1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं।

उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

गृध्रसी (सायटिका) : हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।

ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है। इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

यन्त्र तंत्र मंत्र ग्रुप की भेंट

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हमारे चिकित्सा पुरोधा


सत्य प्रकाश शर्मा

हमारे चिकित्सा पुरोधा (1 )
अति प्राचीन काल से हमारे देश में वेदों पर आधारित चिकित्सा विज्ञान अपनी चरम सीमा पर रहा है | हमारे ऋषिओं मनीषियों ने चिकित्सा विज्ञान को उन्नत और प्रतिष्ठित किया किया , इनका मूलमंत्र परोपकाय शतां विभूतयः रहा | पूरा विश्व जब निष्क्रिय था तव हम चिकित्सा क्षेत्र में शिखर पर रहे हैं |
प्रजापति :- – सभी जीवों के देव ने आयुर्वैदिक विद्या प्रदान की |
अश्विनी कुमार :- – ये दोनों जुड़वां भाई थे , जो देवताओं का उपचार करते थे | शल्य चिकित्सा में इनका कोई मुकाबला नहीं था | इन्होंने दधीच ऋषि से मृत व्यक्ति को भी जीवित करने की मधु – विद्या सीखी थी | इनके ग्रन्थ ‘ चिकित्सा सारतंत्र ‘ , ‘ अश्विनी संहिता ‘ , ‘धातुरत्नमाला ‘ , नाड़िनिदानं ‘ प्रमुख रहे |
धन्वंतरि :- – भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में बहुत जाना माना नाम है , इन्होंने अमृतमय औषिधिओं की खोज की थी | आयुर्वेद में इनका महान कार्य रहा |
निमि :- – सीता के परदादा निमि को नेत्र विशेषज्ञ कहा जाता है , ये अनेकों प्रकार के नेत्र ऑपरेशनों के विशेषज्ञ भी थे | इन्होने ‘वैद्य संदेह भंजनि ‘ , और ‘जनकतंत्र ‘ग्रन्थ लिखे |
अत्रेय :- – इनको जीवन विज्ञान का प्रमुख शिक्षक माना जाता है | किस रोग में कौनसी दवा काम करती है के विषय पर इन्होने छः शास्त्र लिखे | इनके मेधावी छात्र अग्निवेश ने अपना ‘अग्निवेश तंत्र ‘ लिखा | धनुर्विद्या में पारंगत अग्निवेश ने महाभारत के द्रोणाचार्य को धनुर्विद्या सिखाई थी | – – – – – – क्रमशः

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संजय कुमार

भारतीय शौच व्यवस्था एवं वामकुक्षी

Written by:- Suresh Chiplunkar

सदियों से भारतीय ज्ञान एवं संस्कारों की एक महान परंपरा रही है. वेदों-पुराणों-ग्रन्थों सहित विभिन्न उत्सवों एवं सामान्य सी दिखाई देने वाली प्रक्रियाओं में भी हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के स्वास्थ्य एवं प्रकृति के संतुलन का पूरा ध्यान रखा है.

जो परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं खानपान से लेकर पहनावे तक जो भी ज्ञान ऋषि-मुनियों ने हमें विरासत में दिया है, वह न सिर्फ अदभुत है, बल्कि पूर्णतः तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक भी है. प्रस्तुत लेख में मैं सिर्फ तीन उदाहरण देना चाहूँगा.

हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते हैं कि गर्भवती स्त्री को हमेशा सदविचार रखने चाहिए, सात्त्विक भोजन करना चाहिए और उससे हमेशा मृदु भाषा में ज्ञानपूर्ण बातचीत करनी चाहिए, ताकि होने वाली संतान भी तेजोमय एवं बुद्धिमान हो. इन बुजुर्गों को यह ज्ञान कहाँ से मिला?? क्या उन दिनों तथाकथित आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई होती थी? फिर इन लोगों ने कैसे जान लिया कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण सुनने-समझने की क्षमता रखता है? हम सभी ने महाभारत की वह कथा पढ़ी है, जिसमें अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन के गुप्त रहस्यों एवं पद्धति के बारे में विस्तार से बताते हैं. उस समय उनका पुत्र अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में था. यह बात हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई महाभारत में कही गई है कि “गर्भवती स्त्री के गर्भ में पल रहा भ्रूण एक निश्चित समय के पश्चात पूरी तरह सुनने-समझने और स्मरण रखने की शक्ति रखता है”. जब अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन का रहस्य बताया उस समय सुभद्रा जाग रही थीं, लेकिन जब अर्जुन चक्रव्यूह तोड़कर बाहर निकलने की योजना बता रहे थे उस समय सुभद्रा सो गई थीं. इसीलिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो स्मरण था, परन्तु उससे बाहर निकलने की कला उन्हें ज्ञात नहीं थी.

अब ये वर्षों पुराना सिद्धांत पश्चिम के वैज्ञानिक हमें ही सिखा रहे हैं. वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण किस सीमा तक सुनने-समझने-सोचने की क्षमता रखता है. आधुनिक विज्ञान द्वारा हमें बताया जा रहा है कि यह एक नई खोज है. कितना हास्यास्पद है ना??

मित्रों आपने अपने बुजुर्गों से “वामकुक्षी” नामक शब्द के बारे में तो सुना ही होगा, बहुत पुराना शब्द है, पीढ़ियों से चला आ रहा है. “वाम” यानी बाँया और “कुक्षी” यानी करवट. वामकुक्षी का अर्थ है बाँई करवट लेटना. हमारे बुजुर्गों को उनके आयुर्वेद एवं अनुभव ज्ञान से इस बात की पूरी जानकारी थी कि मनुष्य को भोजन के पश्चात कुछ देर “वामकुक्षी” लेनी चाहिए, अर्थात बाँई करवट लेटना चाहिए, ताकि पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है. जब बुजुर्गों को यह बात पता थी, तो स्वाभाविकतः इसका अर्थ यह भी होता है कि निश्चित हेए उन्हें इसके पीछे छिपे विज्ञान एवं शारीरिक संरचना की जानकारी भी होगी, अन्यथा वे दाँयी करवट लेटने को भी कह सकते थे… या यह भी कह सकते थे कि भोजन के पश्चात वज्रासन में बैठने की बजाय रस्सी कूदना चाहिए. अब पश्चिमी विज्ञान हमें बता रहा है कि बाँई करवट सोने से लीवर में स्थित “पाचक अम्ल” नीचे की तरफ होता है, जिससे भोजन अच्छे से पचता है और यह ह्रदय के लिए भी लाभकारी होता है. तात्पर्य यह कि भारतीयों को “वामकुक्षी” से मिलने वाले शारीरिक लाभों की पूरी जानकारी थी. कैसे थी? क्या यह विज्ञान नहीं था?? या फिर विज्ञान उसी को माना जाए, जो अंग्रेजी शब्दों में पश्चिम के गोरे हमें बताएँ??

तीसरा उदाहरण है भारतीय पद्धति की शौच व्यवस्था. जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत में सदियों से उकडूँ बैठकर शौच करने की परंपरा रही है. यहाँ तक कि हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि नीचे बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए. महिलाएँ तो आज भी बैठकर ही मूत्र-त्याग करती हैं, लेकिन अधिकाँश पुरुषों ने पश्चिम की नक़ल एवं पैंट-शर्ट वाले पहनावे के कारण खड़े-खड़े मूत्र त्याग की पद्धति अपना ली है. परन्तु पुराने जमाने ने जब पुरुष भी धोती धारण करते थे, तब वे नीचे बैठकर ही मूत्र-त्याग करते थे. यही पद्धति हम शौच करते समय भी अपनाते आए हैं. जब से भारतीयों का खान-पान विकृत हुआ है और उनके घुटनों में दर्द रहने लगा है तब से महानगरीय एवं अर्ध-नगरीय भारतीय भी पश्चिम की देन अर्थात “कमोड” का उपयोग करने लगे हैं. आधुनिक(?) वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि यदि शौच करते समय मनुष्य के दोनों घुटने उसके पेडू (या कहें बड़ी आँत) से ऊपर रहें तो बड़ी आँत पर दबाव नहीं रहता तथा शौच खुलकर होता है. जबकि जैसा कि चित्र में दिखाया है, कमोड पर बैठकर शौच करने से बड़ी आँत थोड़ी सी वक्राकार हो जाती है जिससे मल पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाता.

अब बताईये, क्या हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं बुजुर्गों को इसका विज्ञान पता नहीं था?? उन्हें सब कुछ अपने अनुभव और ग्रंथों में लिखे ज्ञान के आधार पर पता था. यहाँ तक कि पर्यावरण और खेतों की उर्वरकता को बरकरार रखने के लिए पुराने जमाने में खेतों के किनारे शौच किया जाता था. अब यह संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अपने-अपने घरों में भारतीय पद्धति से शौच तो किया ही जा सकता है. जिन बुजुर्गों अथवा मरीजों को घुटने में समस्या है और वे नीचे नहीं बैठ सकते, उनके कमोड हेतु पश्चिमी देशों से एक नया आविष्कार आया है जिसे “Squatty Potty” का नाम दिया गया है, इसे कमोड के पास पैरों के नीचे रखें ताकि आपके घुटने पेट से ऊपर हो जाएँ. वास्तव में अब पश्चिमी देश भी समझ चुके हैं, कि शौच की भारतीय पद्धति सर्वोत्तम है, लेकिन वहाँ पर भारतीय पद्धति के शौचालय नहीं हैं, तो उन्होंने इसकी जुगाड़ के रूप में इस उपकरण को निकाला है. शौच के पश्चात हाथ राख या मिट्टी से धोने चाहिए, पैरों को पीछे से भी धोना चाहिए, शौच करते समय बात नहीं करनी चाहिए जैसे कई “वैज्ञानिक” नियम हमारे प्राचीन ज्ञान ग्रंथों में मौजूद हैं, लेकिन चूँकि आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी शिक्षा, वामपंथी विकृति तथा सेकुलरिज़्म नामक बीमारी के कारण हिन्दू संस्कृति को अक्सर हेय दृष्टि से देखने का फैशन चल पड़ा है.

विगत साठ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था को वामपंथी एवं सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने स्वार्थ एवं धर्म विरोधी मानसिकता के कारण इतना दूषित कर दिया है कि अधिकाँश लोगों को हमारे ग्रन्थ अथवा परम्पराएँ बेकार लगती हैं. जब भी पश्चिमी देश कोई शोध करके हमें बताते हैं तब यहाँ के “परजीवी” किस्म के बुद्धिजीवी उनकी जयजयकार में लग जाते हैं. जबकि वही बात सदियों पहले भारत के संत और आयुर्वेदिक चिकित्सक आदि हमें न सिर्फ लिखित में बता चुके थे बल्कि उन्होंने उन बातों को हमारे रोजमर्रा के जीवन में धर्म के साथ इतनी सुन्दर तरीके से पिरोया था कि अब वह हमें सामान्य सी बातें लगती हैं. इस पश्चिमी वैचारिक गुलामी और वैज्ञानिक आधार पर टिके हुए वृहद भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति के सैकड़ों और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं…

हिंदू धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र जो अब पूरी दुनिया अपना रही है-
घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:।(वाधूलस्मृति 9)
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:।(मनुस्मृति 4/49))
नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए।
तथा न अन्यधृतं धार्यम् (महाभारत अनु.104/86)
दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:(वाधूलस्मृति 69)
स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए।
लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।
(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक)
नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं।
न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।(विष्णुस्मृति 64)
पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें।
न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:।(महाभारत अनु.104/52)
न आर्द्रं परिदधीत(गोभिलगृह्यसूत्र 3/5/24)
गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
चिताधूमसेवने सर्वे वर्णा: स्नानम् आचरेयु:। वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च(विष्णुस्मृति 22)
श्मशान में जाने पर, वमन होने/करने पर, हजामत बनवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।
हस्तपादे मुखे चैव पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्।(पद्मपुराण सृष्टि 51/88)
नाप्रक्षालित पाणिपादौ भुञ्जीत।(सु.चि.24/98)
हाथ, पैर और मुंह धोकर भोजन करना चाहिए।
अपमृज्यान्न च स्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभि:।(मार्कण्डेय पुराण 34/52)
स्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे कपड़ों से शरीर को नहीं पोंछना चाहिए, अर्थात् किसी सूखे कपड़े (तौलिए) से ही पोंछना चाहिए।
न वार्यञ्जलिना पिबेत्।( मनुस्मृति 4/63)
नाञ्जलिपुटेनाप: पिबेत्।(सु.चि.24/98)
अंजलि से जल नहीं पीना चाहिए, किसी पात्र(गिलास) से जल पीयें।
न धारयेत् परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन।(पद्मपुराण सृष्टि 51/86)
दुसरों के स्नान के वस्त्र (तौलिए इत्यादि) प्रयोग में न लें।
*अब देख लीजिएआधुनिक अस्पताल और मेडिकल साइंस धराशाई हो चुके हैं और समस्त विश्व हजारों साल पुराने बचाव के उपाय अपना रहा है।

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पुराने समय की कहावत है – – –

चैते गुड़, वैसाखे तेल । जेठ के पंथ¹, अषाढ़े बेल ।।
सावन साग, भादौ दही²। कुवांर करेला, कार्तिक मही³ ।।
अगहन जीरा, पूसै धना। माघे मिश्री, फागुन चना।।
जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहीं धरै।।।।

किस माह में क्या न खाएँ

_आवश्यक निर्देश

चैत्र माह में नया गुड़ न खाएं (15 march-15april)
बैसाख माह में नया तेल न लगाएं (16April-15may)
जेठ माह में दोपहर में नहीं चलना चाहिए (16May-15june)
अषाढ़ माह में पका बेल न खाएं (16june-15july)
सावन माह में साग न खाएं (16july-15August)
भादों माह में दही न खाएं (16august-15september)
क्वार माह में करेला न खाएं (16september-15october)
कार्तिक माह में जमीन पर न सोएं (16October-15november)
अगहन माह में जीरा न खाएं (16 November -15 December)
पूस माह में धनिया न खाएं (16 Dec- 15 jan)
माघ माह में मिश्री न खाएं (16jan-15feb)
फागुन माह में चना न खाएं (16 feb- 14march )

आयुर्वेदामृतम्