शीतला दुबे

संत_कथा

एक बार दो संत भटकते – भटकते जिला बांदा उत्तरप्रदेश तुलसीदास जी के गांव पहुंच गए…संध्या की बेला थी एक सुंदर भवन देखकर अलख जगाई….एक महिला घर से बाहर निकली संतो को प्रणाम किया चौकी की तरफ इशारा करके बोली आप लोग बैठिए मैं कुछ मीठा पानी लेकर आती हूं… वो अंदर गई मीठा पानी लाई संतो का सत्कार करने लग गई…कुछ समय में चाय भी तैयार होकर आ गई संतो ने पीया… इतने में घर के मुखिया जी आ गए प्रणाम किया… और विनंती करने लगे संत जी रात होने को चली है आप लोग आज हमारे दरवाजे पर ही भोजन ग्रहण करें… संतो की खुशी का ठिकाना न रहा वो बोले ठीक है महाशय हम संत है अपने हाथ से ही बनाकर खाएंगे… आप हमें सारा समान उपलब्ध करवा दें हम यहीं बाहर ही अहरा लगाकर बाटी चोखा लगाकर प्रसाद ग्रहण कर लेंगे…मुखिया जी अंदर गए और सारा सामान आटा, दाल, चावल, देशी घी, आलू , बर्तन वगैरह लेकर आए और संत जी को दे दिया बोले लीजिए बनाइए… उसी में से एक संत जी उठे जो चेला जैसे लग रहे थे उन्होंने खाना बनाना चालू कर दिया… इधर गांव में कुछ लोगों को पता चल गया कि फलाने के यहां संतो का आगमन हुआ है तो गांव के युवा, वृद्ध इकट्ठा होने लगे… इधर – उधर की बाते होने लगी गांव वालो को भी बैठने के लिए मुखिया जी ने खटिया का इंतजाम किया…इतने में गांव के ही अलगू परधान भी पधारे संत जी को दंडवत प्रणाम किया…और आग्रह करने लगे कि महात्मा जी जब तक खाना बन रहा है तब तक आपके मुखारविंद से कुछ राम – नाम की चर्चा हो जाए… सब लोग प्रसन्न हो गए बोले हां प्रधान जी आप ने तो हमारे मन की बात कह दी इसीलिए हम लोग भी यहां पर इकट्ठा हुए है…. संत जी भी मन मसोसकर किसी तरह तैयार हुए… और कथा प्रारंभ किये बोले आज आप लोगों को सुग्रीव और बाली का वह प्रसंग सुनाने जा रहा हूं जिसमें राम जी जब बाली को बाण मारते है तब बाली रामजी से प्रश्न करता है कि… मै बैरी सुग्रीव पियारा… मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. कई बार प्रयास किए किंतु सफलता नहीं मिली…शायद आगे की लाइन संत जी को याद ही नहीं आ रही थी… यह सब उनका चेला जो खाना बना रहा था सुनकर व्यथित हुआ और वह बोला गुरुजी आइये आप भोजन बनाइये कथा मैं कहता हूं… गुरुजी गए खाना बनाने लगे…. अब चेला आ गया व्यास गद्दी पर और गुरुजी ने जहां से कथा रोकी थी चेले ने वहीं से चालू किया… मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. मैं बैरी सुग्रीव पियारा…. मैं बैरी सुग्रीव पियारा…चेला भी यहीं अटक गया कई बार कोशिश की अगली लाइन याद ही नहीं रही… इधर गांव वाले आपस में घुसुर – फुसुर करने लगे… तब मुखिया जी से नहीं रहा गया हाथ जोड़कर संत जी से बोले… “संत जी ना तैं बैरी ना वा बैरी बैरी आही मोंही जो तुमका दरवाजे पर संत समझ के रोक लीन्हा अब दादू जाव भोजन लेव कथा बंद करौ”……संत जी के जान में जान आई उठे चल दिए भोजन पर….?? सोचिए जब मन और व्यासपीठ पर शुद्धता नहीं होगी तो मन एकाग्र कैसे होगा?? कथा कैसे होगी???
कहानी का आशय – आज- कल जो मोरारी बापू जैसे संत व्यासपीठ पर बैठकर मौला मौला गा रहे है… देवी चित्रलेखा जो अजान को सपोर्ट करते हुए कह रही हैं कि अजान हो रही हो तो भागवद कथा बंद कर देनी चाहिए… और भी कई संत है जिन्होंने धर्म को धंधा बना लिया है…यह सब उनकी नहीं हमारी और आपकी कमी है जो हम आप इनको सर आंखों पर बिठाकर रखते हैं…. ऐसे लोगों का बहिष्कार होने चाहिए नहीं तो ऐसे लोगों के कारण ही हमारा सनातन धर्म और हम हंसी के पात्र बन जाएंगे और हमारा आस्तित्व खतरे में आ जाएगा!
जय रामजी की//
Shitala Dubey