मुस्लिम सैनिकों के विश्वासघात से हुई थी महाराणा प्रताप की हार
नेहरू – वामपंथी गठजोड़ ने आतातायी अकबर को महान साबित किया

भील और गेडि़या लोहरों को करो वंदन, उन्हें क्षत्रीय बनाओ

…………..भारत का इतिहास देशद्रोही है। भारतीय इतिहास पर जवाहरलाल नेहरू और कम्युनिस्टों के गठजोड़ का दुष्परिणाम है। हर वीर और राष्टभक्त को आतातायी घोषित कर देना, आतातायी को महान घोषित कर देना नेहरू और कम्युनिस्टों की मानसिकता रही है जो भारत में सफल हुई।
………… अकबर जैसा आतातायी को महान घोषित कर दिया गया और महाराणा प्रताप जैसे वीर और देशभक्त की वीरता को इतिहास से बाहर कर दिया गया। महान तो महाराणा प्रताप को कहा जाना चाहिए था जिसने घास की रोटी खायी, अंतिम दम तक लडे पर आतातायी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।
………….. आधुनिक इतिहास के शोध में यह सामने आया है कि महाराणा प्रताप की सेना में मुस्लिम सैनिक भी थी। मुस्लिम सैनिकों ने मजहब के आधार पर विश्वासघात किया था और अंतिम समय में जब युद्ध निर्णायक स्थिति में था तब मुस्लिम सैनिको ने अकबर के सैनिकों के साथ मिल गये थे और युद्ध से हट गये, युद्ध सामग्री की आपूर्ति चैन को बाधित कर दिया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि महाराणा प्रताप की सेना की हार हुईं।
…………….. सिर्फ दो समूह -वर्ग ऐसे हैं जिन्होंने आज तक महाराणा प्रताप के लिए लड़ रहे हैं जिनके लिए महाराणा प्रताप ही सबकुछ हैं। एक भील हैं जो आज आदिवासी के रूप में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और नेपाल की तराई में हैं। भील महाराना प्रताप की पराजय के बाद महाराणा प्रताप के बचे-खुचे वंशव जिनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल थे लेकर जंगलों में छिप गये थे। अन्यथा आतातायी अकबर के सैनिकों के हाथों मारे जाते। दूसरा वर्ग गेडि़या लोहार हैं जो आज भी सड़कों पर लोहे की वस्तु बनाते हैें, हथियार बनाते हैं पर घर नहीं बनाते हैं, सड़कों पर ही रहते हैं। उनका कहना है कि जब तक हम महाराणा प्रताप के फर्ज को नहीं पूरा कर पायेगे तब तक अपना घर नहीं बनायेंगे। ऐसे महान भील और गेडिया लोहर हैं।
…………… हमें और खासकर महाराणा प्रताप के नाम पर बने सभी संगठनों का कर्तव्य है कि भील आदिवासियों और गेडि़या लोहारों का वंदन करें, उनको सम्मान दें, सबसे अच्छा होता कि उन्हें क्षत्रीय धर्म की शिक्षा देकर उन्हें क्षत्रीय बना दिया जाता। क्या इस कार्य के लिए क्षत्रीय लोग सामने आयेंगे?
…………… महाराणा प्रताप के प्रति सच्ची ऋधाजंलि तो तब मानी जाती जब हम आतातायी अकबर के वंशजों और आयातित मजहबी संस्कृति को जमींदोज कर अपनी सनातन संस्कृति की विजय सुनिश्चित करने का संकल्प लेते।

………. आचार्य श्री विष्णु गुप्त ……….