Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

गत वर्ष दिवाली पर लंबे समय बाद भारत आना हुआ था- पैतृक स्थान पर कई दिन रहा भी। जेट लैग का असर इस कदर था कि रोज़ सुबह साढ़े तीन – चार बजे आँख खुल जाती। घर में किसी को क्या डिस्टर्ब करना- तो साढ़े चार बजे के आसपास घर के पास मंदिर में चला जाता था।

मंदिर के पंडित जी सुबह पौने पाँच बजे बिना नागा किए रोज़ाना आ जाते- नल से पानी भर भर मंदिर के आहाते को धोते- झाड़ू आदि के बाद। आरती आदि भी कर बैठ जाते उधर ही। छोटी जगह- सुबह सुबह से ही मंदिर में भक्त आदि आने लगते। नोट करता – पंडित जी को कभी फ़ुरसत ना रहती। कभी कुछ कभी कुछ। सुबह से लोग कुंडली बनवाने, गुण मिलाने , उपाय पूछने आदि आते।

एक दिन सुबह सुबह पूछा- आप इतने बिजी हो, दैनिक आय क्या है। जवाब बड़ा विचित्र था। bare मिनिमम इनकम। कोई कुंडली बनवाने के २१ देता- कोई दिलदार हुआ तो १०१। इसी प्रकार लोग हवन, पूजा आदि करवाने बुलाते। दिन में एक बात और नोट की- अनेक लोग उनपर यहीं छींटाकशी करते- आपकी मोनोपॉली है- कोई और कर्मकांड वाला पंडित ही नहीं है इधर।

लेकिन एक बात समझ में अच्छे से आयी- वैल्यू ऑफ़ लेबर की कोई वैल्यू ही नहीं है। यदि कोई व्यक्ति लगन से घंटे लगा कर कुंडली बना रहा है तो २१ रुपये तो डिज़र्व नहीं करता। कुंडली वाला कागज तक ख़ुद से दे रहे है। कुछ उन्नीस बीस हो जाये तो लोग सुनाने वाले भी बहुतेरे है। कुंडली मैच करवाने वाले लोग लखियों खर्च करेंगे विवाह में लेकिन कुंडली मिलाने के सौ पचास? हवन में लोग उम्मीद करेंगे पंडित जी बाक़ायदा संस्कृत के मंत्र पूरे बोलेंगे और दो घंटे तक पूजा करवायेंगे- अंत में दक्षिणा?

पंडित जी को समझाया- एक रेट लिस्ट बना कर टांग लें – कुंडली के इतने, पूजा लिस्ट के इतने। आख़िर आपके समय और आपके सब्जेक्ट मैटर एक्स्पर्टीज़ का लोग लाभ ले रहे है। बेचारे- हिचक गये- प्रस्ताव स्वीकार ना किया। उन्हें अमेरिका भी पुजारी के तौर पर आने का प्रस्ताव दिया- इधर साउथ इंडियन और गुजराती समाज के लोगों का वर्चस्व है- एक यूपी वाले भी आ जाये तो क्या बुराई है? वो ना माने।

सबसे कमाल की बात- सब भक्तिन लेडीज लोग पंडित जी से डिबेट भी करने में उस्ताद थी- आज क्या और कैसे पूजा करनी है आपको- और ना जाने क्या क्या।

वाक़ई में छोटे मंदिर आदि के पुजारी /पंडित समाज के प्राणियो में बड़ा सब्र होता है। और मेजोरिटी में यहीं लोग है- ऐसा जीवन जीने को मजबूर!

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एक सुनार था, उसकी दुकान से मिली हुई एक
लोहार की दुकान थी। सुनार जब काम करता तो उसकी दुकान से बहुत धीमी आवाज़ आती, किन्तु जब लोहार काम करता तो उसकी दुकान से कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ सुनाई देती।

एक दिन एक सोने का कण छिटक कर लोहार
की दुकान में आ गिरा। वहाँ उसकी भेंट लोहा
के एक कण के साथ हुई। सोने के कण ने लोहे के कण से पूछा- भाई हम दोनों का दुख एक समान है, हम दोनों को ही एक समान आग में तपाया जाता है और समान रूप ये हथौड़े की चोट सहनी पड़ती है। मैं ये सब यातना चुपचाप
सहता हूँ, पर तुम बहुत चिल्लाते हो, क्यों?

लोहे के कण ने मन भारी करते हुऐ कहा- तुम्हारा कहना सही है, किन्तु तुम पर चोट करने वाला हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है। मुझ पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा मेरा सगा भाई है।
परायों की अपेक्षा अपनों द्वारा दी गई चोट अधिक पीड़ा पहुचाँती है।

इस लिए अपनों को पीड़ा देना बंद कीजिये ।