Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक दिन बीरबल ने अकबर से कहा, ‘मनुष्य एक दूसरे के मन की बात बिना कहे भी जान लेते हैं।’ इसकी पुष्टि करने के लिए दोनों भेष बदल कर चल दिए। उनकी नजर एक लकड़हारे पर पड़ी जो एक हरा भरा पेड़ काट रहा था। बीरबल ने पूछा, ‘हुजूर, इसके बारे में आपका क्या विचार है?’
अकबर-‘यह दुष्ट तो हरे पेड़ को काट रहा है। सोचता हूं, इसे कोड़े लगाऊं!’ दोनों उसके पास पहुंच गए तो बीरबल ने पूछा,’भाई, यह क्या कर रहे हो?’ वह गुस्से में बोला-‘देखते नहीं पेड़ काट रहा हूं। यही मेरा रोजगार है।’ बीरबल-‘क्या तुम जानते हो कि बादशाह की मौत हो गई है?’ लकड़हारा, ‘चलो अच्छा हुआ! बेकसूरों को सताता था।’ अकबर हैरान था कि वह ऐसा क्यों सोचता है?
थोड़ा और आगे बढ़ने पर बीरबल ने पहाड़ी पर बकरियां चराती एक बुढ़िया की ओर इशारा कर अकबर से पूछा- ‘आपका इसके बारे में क्या ख्याल है शहंशाह?’ अकबर ने कहा,’इस पर श्रद्धा होती है। इस उम्र में भी बकरी चराकर परिवार का पालन कर रही है।’ बुढ़िया के पास पहुंचकर बीरबल ने पूछा, ‘तुम बकरियां क्यों चराती हो?’ बुढ़िया ने दोनों की ओर देखा और बताया-‘परिवार पालने और बच्चों के दूध के लिए।’ अकबर ने कहा- ‘बड़ा अच्छा भाव है।’ बीरबल बुढ़िया से बोला,’क्या तुम्हें मालूम है कि बादशाह नहीं रहे?’ यह सुनकर बुढ़िया रोने लगी- ‘ओ मेरे बादशाह, हमें किसके सहारे अकेला छोड़ गए।’
बीरबल ने अकबर से कहा,’देखा हुजूर, लकड़हारे और बुढ़िया के प्रति आपके मन में जैसे भाव थे, वह आपके चेहरे पर झलकते हुए उन दोनों के मन में बिन कहे ही पहुंच गए। इसलिए उनका जवाब भी उनके हिसाब से ही मिला।