Posted in सुभाषित - Subhasit

नीचे जो चित्र भेजा गया है, इसका ध्यान से अवलोकन करिये ………… सात प्रकार की शिक्षा देने वाला है शायद य़ह चित्र….जिन्हें आप ठीक से जान सकते हो……

1. हर अवसर लपक लेने के लिए ही नहीं है, कई बार धोखा भी हो सकता है l

2. दूसरे को तबाह करने के लिए कई बार लोग इतने अंधे हो जाते हैं कि खुद को ही तबाह कर लेते है l

3.हर योद्धा हर मैदान में जंग नहीं जीत सकता l हमें पता होना चाहिए कौन सा मैदान हमारे लिए सबसे उपयुक्त है l यह मैदान कुत्ते का नहीं उस पक्षी का था l

4. हर एक की एक सीमा होती है – अपनी सीमा को पहचानिए l

5. कोई उकसाये तो कई बार उसका उपयुक्त जवाब, उकसावे में न आकर – लड़ाई न करना है l

6. हर काम अकेले नहीं हो सकता, कई बार कुछ हासिल करने के लिए आपके पास एक टीम होनी चाहिए, लेकिन आप टीम के प्रति बफादार भी होने चाहिए स्वार्थी नही…

7.वही करिये जो आप सबसे बेहतर कर सकते है, वो नहीं – जो आपकी जान ही ले ले।

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પ્રયત્ન


શું તમે જાણો છો કે સિંહો તેમના શિકાર કરવાના એક ચતુર્થાંશ પ્રયાસોમાં જ સફળ થાય છે ? – તેનો અર્થ એ છે કે તેઓ તેમના 75% પ્રયાસોમાં નિષ્ફળ જાય છે અને તેમાંથી માત્ર 25%માં જ સફળ થાય છે.

અને મોટાભાગના શિકારી પ્રાણીઓ માટે આ સામાન્ય હકીકત છે છતાં તેઓ તેમના શિકારનો પીછો કરવામાં અને શિકાર કરવાના પ્રયત્નોમાં નિરાશ થતા નથી.

કેટલાક લોકો વિચારે છે તેમ આનું મુખ્ય કારણ ભૂખ છે પરંતુ તેમ નથી, તે “વ્યર્થ પ્રયાસોના કાયદા” (Law of Wasted Efforts ) ની સમજ છે જે સહજ રીતે પ્રાણીઓમાં પ્રવર્તમાન છે , એક કાયદો જેના દ્વારા # પ્રકૃતિ સંચાલિત છે.

માછલીના અડધા ઈંડા ખવાઈ જાય છે…અડધા રીંછબાળ તરુણાવસ્થા પહેલા મરી જાય છે… વિશ્વનો મોટા ભાગનો વરસાદ મહાસાગરોમાં પડે છે… અને મોટાભાગના વૃક્ષોના બીજ પક્ષીઓ ખાઈ જાય છે.

વૈજ્ઞાનિકોએ શોધી કાઢ્યું છે કે પ્રાણીઓ, વૃક્ષો અને પ્રકૃતિની અન્ય શક્તિઓ માટે “વ્યર્થ પ્રયત્નો” (Wasted efforts) નો કાયદો વધુ સ્વીકાર્ય છે.

ફક્ત માણસો જ એમ વિચારે છે કે થોડા પ્રયત્નોમાં સફળતાનો અભાવ એ નિષ્ફળતા છે… પરંતુ સત્ય એ છે કે: આપણે ત્યારે જ નિષ્ફળ જઈએ છીએ જ્યારે આપણે પ્રયત્ન કરવાનું બંધ કરીએ છીએ.

સફળતા એ નથી કે મુશ્કેલીઓ અને પછડાટથી મુક્ત જીવન જીવવું… પરંતુ સફળતા એ છે કે તમારી ભૂલો પાર પાડી ને આગળ ચાલવું , તમારા પ્રયાસ વ્યર્થ જાય તો દરેક તબક્કે પ્રયાસ ચાલુ રાખવા.

સારાંશ સરળતાથી કહીએ તો ફરીથી પ્રયાસ ચાલુ રાખો.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

टॉल्सटॉय की प्रसिद्ध कहानी है कि एक आदमी के घर एक संन्यासी मेहमान हुआ – एक परिव्राजक। रात गपशप होने लगी; उस परिव्राजक ने कहा कि तुम यहाँ क्या छोटी-मोटी खेती में लगे हो। साइबेरिया में मैं यात्रा पर था तो वहाँ जमीन इतनी सस्ती है मुफ्त ही मिलती है। तुम यह जमीन छोड़-छाड़कर, बेच-बाचकर साइबेरिया चले जाओ। वहाँ हजारों एकड़ जमीन मिल जाएगी इतनी जमीन में। वहाँ करो फसलें और बड़ी उपयोगी जमीन है और लोग वहाँ के इतने सीधे-सादे हैं कि करीब-करीब मुफ्त ही जमीन दे देते हैं।

उस आदमी को वासना जगी। उसने दूसरे दिन ही सब बेच-बाचकर साइबेरिया की राह पकड़ी। जब पहुँचा तो उसे बात सच्ची मालूम पड़ी। उसने पूछा कि मैं जमीन खरीदना चाहता हूँ। तो उन्होंने कहा, जमीन खरीदने का तुम जितना पैसा लाए हो, रख दो; और जीवन का हमारे पास यही उपाय है बेचने का कि कल सुबह सूरज के ऊगते तुम निकल पड़ना और साँझ सूरज के डूबते तक जितनी जमीन तुम घेर सको घेर लेना।
बस चलते जाना… जितनी जमीन तुम घेर लो। साँझ सूरज के डूबते-डूबते उसी जगह पर लौट आना जहाँ से चले थे- बस यही शर्त है। जितनी जमीन तुम चल लोगे, उतनी जमीन तुम्हारी हो जाएगी।

रात-भर तो सो न सका वह आदमी। तुम भी होते तो न सो सकते; ऐसे क्षणों में कोई सोता है ? रातभर योजनाएँ बनाता रहा कि कितनी जमीन घेर लूँ। सुबह ही भागा। गाँव इकट्ठा हो गया था। सुबह का सूरज ऊगा, वह भागा। उसने साथ अपनी रोटी भी ले ली थी, पानी का भी इंतजाम कर लिया था। रास्ते में भूख लगे, प्यास लगे तो सोचा था चलते ही चलते खाना भी खा लूँगा, पानी भी पी लूँगा। रुकना नहीं है; चलना क्या है; दौड़ना है। दौड़ना शुरू किया, क्योंकि चलने से तो आधी ही जमीन कर पाऊँगा, दौड़ने से दुगनी हो सकेगी – भागा …भागा।
सोचा था कि ठीक बारह बजे लौट पड़ूँगा; ताकि सूरज डूबते – डूबते पहुँच जाऊँ। बारह बज गए, मीलों चल चुका है, मगर वासना का कोई अंत है? उसने सोचा कि बारह तो बज गए, लौटना चाहिए; लेकिन सामने और उपजाऊ जमीन, और उपजाऊ जमीन…थोड़ी सी और घेर लूँ। जरा तेजी से दौड़ना पड़ेगा लौटते समय – इतनी ही बात है, एक ही दिन की तो बात है, और जरा तेजी से दौड़ लूँगा।

उसने पानी भी न पीया; क्योंकि रुकना पड़ेगा उतनी देर – एक दिन की ही तो बात है, फिर कल पी लेंगे पानी, फिर जीवन भर पीते रहेंगे। उस दिन उसने खाना भी न खाया। रास्ते में उसने खाना भी फेंक दिया, पानी भी फेंक दिया, क्योंकि उनका वजन भी ढोना पड़ा रहा है, इसलिए दौड़ ठीक से नहीं पा रहा है। उसने अपना कोट भी उतार दिया, अपनी टोपी भी उतार दी, जितना निर्भार हो सकता था हो गया।
एक बज गया, लेकिन लौटने का मन नहीं होता, क्योंकि आगे और-और सुंदर भूमि आती चली जाती है। मगर फिर लौटना ही पड़ा; दो बजे तक वो लौटा। अब घबड़ाया। सारी ताकत लगाई; लेकिन ताकत तो चुकने के करीब आ गई थी। सुबह से दौड़ रहा था, हाँफ रहा था, घबरा रहा था कि पहुँच पाऊँगा सूरज डूबते तक कि नहीं। सारी ताकत लगा दी। पागल होकर दौड़ा। सब दाँव पर लगा दिया। और सूरज डूबने लगा…। ज्यादा दूरी भी नहीं रह गई है; लोग दिखाई पड़ने लगे। गाँव के लोग खड़े हैं और आवाज दे रहे हैं कि आ जाओ, आ जाओ! उत्साह दे रहे हैं, भागे आओ! अजीब सीधे-सादे लोग हैं – सोचने लगा मन में; इनको तो सोचना चाहिए कि मैं मर ही जाऊँ, तो इनको धन भी मिल जाए और जमीन भी न जाए। मगर वे बड़ा उत्साह दे रहे हैं कि भागे आओ!

उसने आखिरी दम लगा दी – भागा – भागा…। सूरज डूबने लगा; इधर सूरज डूब रहा है, उधर वो भाग रहा है…। सूरज डूबते – डूबते बस जाकर गिर पड़ा। कुछ पाँच – सात गज की दूरी रह गई है, घिसटने लगा।
अभी सूरज की आखिरी कोर क्षितिज पर रह गई. घिसटने लगा। और जब उसका हाथ उस जमीन के टुकड़े पर पहुँचा, जहाँ से भागा था, उस खूँटी पर, सूरज डूब गया। वहाँ सूरज डूबा, यहाँ यह आदमी भी मर गया। इतनी मेहनत कर ली! शायद हृदय कर दौरा पड़ गया। और सारे गाँव के सीधे – सादे लोग जिनको वह समझाता था, हँसने लगे और एक – दूसरे से बात करने लगे!
ये पागल आदमी आते ही जाते हैं! इस तरह के पागल लोग आते ही रहते हैं! यह कोई नई घटना न थी; अक्सर लोग आ जाते थे खबरें सुनकर, और इसी तरह मरते थे। यह कोई अपवाद नहीं था; यही नियम था। अब तक ऐसा एक भी आदमी नहीं आया था, जो घेरकर जमीन का मालिक बन पाया हो।
यह कहानी तुम्हारी कहानी है, तुम्हारी जिंदगी की कहानी है, सबकी जिंदगी की कहानी है। यही तो तुम कर रहे हो – दौड़ रहे हो कि कितनी जमीन घेर लें! बारह भी बज जाते हैं, दोपहर भी आ जाती है, लौटने का भी समय होने लगता है – मगर थोड़ा और दौड़ लें! न भूख की फिक्र है, न प्यास की फिक्र है।

जीने का समय कहाँ है; पहले जमीन घेर लें, पहले जितोड़ी भर लें, पहले बैंक में रुपया इकट्ठा हो जाए, फिर जी लेंगे, फिर बाद में जी लेंगे, एक ही दिन का तो मामला है। और कभी कोई नहीं जी पाता। गरीब मर जाते हैं भूखे; अमीर मर जाते हैं भूखे, कभी कोई नहीं जी पाता। जीने के लिए थोड़ी विश्रांति चाहिए। जीने के लिए थोड़ी समझ चाहिए। जीवन मुफ्त नहीं मिलता – बोध चाहिए।