Posted in आरक्षण, वर्णाश्रमव्यवस्था:

एक जमाना था .. कानपुर की “कपड़ा मिल” विश्व प्रसिद्ध थीं कानपुर को “ईस्ट का मैन्चेस्टर” बोला जाता था।
लाल इमली जैसी फ़ैक्टरी के कपड़े प्रेस्टीज सिम्बल होते थे. वह सब कुछ था जो एक औद्योगिक शहर में होना चाहिए।

मिल का साइरन बजते ही हजारों मज़दूर साइकिल पर सवार टिफ़िन लेकर फ़ैक्टरी की ड्रेस में मिल जाते थे। बच्चे स्कूल जाते थे। पत्नियाँ घरेलू कार्य करतीं । और इन लाखों मज़दूरों के साथ ही लाखों सेल्समैन, मैनेजर, क्लर्क सबकी रोज़ी रोटी चल रही थी।
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फ़िर “कम्युनिस्टो” की निगाहें कानपुर पर पड़ीं..
तभी से….बेड़ा गर्क हो गया।

“आठ घंटे मेहनत मज़दूर करे और गाड़ी से चले… मालिक।”
यह बर्दास्त नही होगा।

ढेरों हिंसक घटनाएँ हुईं,
मिल मालिक तक को मारा पीटा भी गया।

नारा दिया गया
“काम के घंटे चार करो, बेकारी को दूर करो”

अलाली किसे नहीं अच्छी लगती है. ढेरों मिडल क्लास भी कॉम्युनिस्ट समर्थक हो गया। “मज़दूरों को आराम मिलना चाहिए, ये उद्योग खून चूसते हैं।”

कानपुर में “कम्युनिस्ट सांसद” बनी सुभाषिनी अली । बस यही टारगेट था, कम्युनिस्ट को अपना सांसद बनाने के लिए यह सब पॉलिटिक्स कर ली थी ।
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अंततः वह दिन आ ही गया जब कानपुर के मिल मज़दूरों को मेहनत करने से छुट्टी मिल गई। मिलों पर ताला डाल दिया गया।

मिल मालिक आज पहले से शानदार गाड़ियों में घूमते हैं (उन्होंने अहमदाबाद में कारख़ाने खोल दिए।) कानपुर की मिल बंद होकर भी ज़मीन के रूप में उन्हें (मिल मालिकों को) अरबों देगी। उनको फर्क नहीं पड़ा ..( क्योंकि मिल मालिकों कभी कम्युनिस्ट के झांसे में नही आए !)

कानपुर के वो 8 घंटे यूनिफॉर्म में काम करने वाला मज़दूर 12 घंटे रिक्शा चलाने पर विवश हुआ .. !! (जब खुद को समझ नही थी तो कम्युनिस्ट के झांसे में क्यों आ जाते हो ??)

स्कूल जाने वाले बच्चे कबाड़ बीनने लगे…

और वो मध्यम वर्ग जिसकी आँखों में मज़दूर को काम करता देख खून उतरता था, अधिसंख्य को जीवन में दुबारा कोई नौकरी ना मिली। एक बड़ी जनसंख्या ने अपना जीवन “बेरोज़गार” रहते हुए “डिप्रेशन” में काटा।
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“कॉम्युनिस्ट अफ़ीम” बहुत “घातक” होती है, उन्हें ही सबसे पहले मारती है, जो इसके चक्कर में पड़ते हैं..!

कॉम्युनिज़म का बेसिक प्रिन्सिपल यह है :

“दो क्लास के बीच पहले अंतर दिखाना, फ़िर इस अंतर की वजह से झगड़ा करवाना और फ़िर दोनों ही क्लास को ख़त्म कर देना”

Posted in संस्कृत साहित्य

નિંદ્રા નો કુદરતી ક્રમ..!!

રાત્રી ના ૧૧ થી ૩ સુધી લોહી નો મહત્તમ પ્રવાહ લીવર તરફ હોય છે. આ એ મહત્વ નો સમય છે જયારે શરીર લીવર ની મદદ થી, વિષરહિત થવાની પ્રક્રિયા માં થી, પસાર થાય છે, એનો આકાર મોટો થઈ જાયે છે,પણ આ પ્રક્રિયા આપ ગાઢ નિદ્રા માં, પોચો પછીજ શરૂ થાયે છે.. તમે ૧૧ વાગે ગાઢ નિંદ્રા ની અવસ્થા માં પોહચો પછીજ આ પ્રક્રિયા શરૂ થાય અને તો શરીર ને, પુરા ૪ કલાક મળે વિષમુક્ત થવા માટે હવે તમે જો ૧૨ વાગે ગાઢ નિંદ્રા ની અવસ્થા માં પહોંચો તો તમારા શરીર ને ૩

કલાક જ મળે..!!જો, ૧ વાગે ગાઢ નિંદ્રા ની અવસ્થા માં પહોંચો તો તમારા શરીર ને 2 કલાક જ મળે. અને જો,..2 વાગે ગાઢ નિંદ્રા ની અવસ્થા માં પહોંચો તો

તમારા શરીર ને ૧ જ કલાક મળે. જ્યાં ૪ કલાક ની તાતી જરૂર હોય ત્યાં ઓછા કલાક મળવા થી વિષ મુક્તિ નું કાર્ય સંપૂર્ણ રીતે ના થઈ શકે. અને શરીર વિષયુક્ત રોગો નું ઘર થતું જાયે. થોડું વિચારી જુવો જયારે પણ તમે મોડી રાત સુધી જાગ્યા હોવ ત્યારે ગમે તેટલા કલાક

ઊંઘો તમને પોતાની કાયા બીજે દિવસે થાકેલીજ લાગશે.શરીર ને વિષમુક્ત થવા પૂરતો સમય ના આપી ને, શરીર ની બીજી અનેક ક્રિયાઓ માં તમે અજાણતાંજ અવરોધ ઉત્પન્ન કરો છો. બ્રહ્મા મુરત એટલે સવારે ૩ થી ૫ ના સમય માં લોહી નું સંચરણ ફેફસાં તરફ થતું હોય છે. જે અત્યંત જરૂરી ક્રિયા નું સ્થાન છે તે વખતે તમે મન અને તનને સ્વચ્છ કરી, ધ્યાન જેવી સુક્ષ્મા પ્રકિર્યા માં જાતને પરોવી જોઈએ જેથી બ્રહ્માંડીય ઉર્જા જે તે સમય એ વિપુલ માત્રા માં સહજ ઉપલબ્ધ હોય તે તમને પ્રાપ્ત થાય,તે પછી ખુલ્લી હવા માં, વ્યાયામ કરવો જોઈએહવા માં આ સમયે લાભપ્રદ આયન ની માત્રા ખૂબજ વધારે હોય છે. ૫ થી ૭ શુદ્ધ થયેલા રક્ત નો સંચાર તમારા મોટા આંતરડા તરફ હોય છે. જે પાછલો મળ કાઢવાની પ્રક્રિયા માં સક્રિય ભાગ લે છે અને શરીર ને આખા દિવસ દરમિયાન લેવાતા પોષક તત્વો ગ્રહણ કરવા માટે તૈયાર

કરે છે.

પછી સૂર્યોદય ના સમય એ,7- 9 શુદ્ધ રક્ત સ્વચ્છ શરીર ના પેટ અને આમાશય તરફ વહે છે.

આ સમય છે જયારે પૌષ્ટિક નાસ્તો એટલે શિરામણ આરોગવો જોઈએ. તમારા દિવસ નો તે સહુથી જરૂરી આહાર છે.સવારે પૌષ્ટિક નાસ્તો ના કરતા લોકો ને ભવિષ્ય માં ઘણી બધી આરોગ્ય-લક્ષી સમસ્યા નો સામનો કરવો

પડે છે. આ કુદરત એ તમારા શરીર માટે બનાવેલી આરોગ્ય

ઘડિયાળ છે.

એને અનુસરવા થી ચિતા સુધી ચાલતા જઈ શકાય.

હવે તમે પૂછશો કે કયારેક કોઈ કાર્ય મોડી રાત સુધી કરવું પડે

તો શું કરવાનું?હું તો વિનંતી કરીશ કે કેમ જલદી સૂઈ ને વહેલા ઉઠી ને ના કરી શકાય?બસ તમારા મોડી રાત ના કાર્યો ને વહેલા ઉઠી નેકરવાની આદત પાડો સમય તો સરખોજ મળશે. પણ સાથે સાથે સ્વસ્થ શરીર પ્રાપ્ત થશે. જય શ્રી
#વન્દે_માતરમ 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

होती विद्यालंकार


इतिहासिक प्रोपेगैंडा को ध्वस्त करें।

आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले नहीं बल्कि #बंगाली_कुलीन_ब्राह्मण ‘#होती_विद्यालंकार’ है.

उनकी संस्कृत व्याकरण, कविता, आयुर्वेद, गणित, स्मृति, नव्य-न्याय, आदि पर अद्वितीय पकड़ थी । इनके ज्ञान से प्रभावित होकर काशी के पंडितों ने इन्हें ‘विद्यालंकार’ की उपाधि से सम्मानित किया था.

होती विद्यालंकर का जन्म वर्ष 1740 में हुआ था और सन 1810 में इनका निधन हुआ था मतलब यह सावित्रीबाई से बहुत पहले कि हैं। अंग्रेज़ मिशनरि #विलियम_वार्ड ने सन 1811 में प्रकशित अपनी पुस्तक में होती विद्यालंकर का जिक्र करते हुए कहा है कि इनके गुरुकुल में देश भर से छात्र – छात्रएं अध्यन हेतु आती थीं। हर कोई होती का विद्यालंकर नाम से सम्मान करता था।

होती विद्यालंकर के जन्म से कुछ दशक बाद रूप मंजरी देवी का जन्म हुआ था। यह भी बंगाल कि #कुलीन_ब्राह्मण थीं । ये आयुर्वेद की ज्ञाता थीं और कन्याओं के लिए विद्यालय की स्थापना की थीं । इन्हें भी विद्यालंकर उपाधि से सम्मानित किया गया था । सब इन्हें #होतु_विद्यालंकर कहते थें। सन 1875 में इनका निधन हुआ था।

वर्ष 1935 में दिनेश चंद्र सेन ने Greater Bangal : – A social History नाम से पुस्तक लिखे थें। इसमे इन्होंने होती विद्यालंकर और रूप मंजूरी देवी का बंगाल की अन्य विदुषियों के साथ वर्णन किया था।

सावित्रीबाई फुले के विद्यालय को #ईस्ट_इंडिया_कंपनी और #ईसाई_मिशनरियों का समर्थन था। 16 नवम्बर 1852 को अंग्रेज़ो ने सावित्रीबाई को #बेस्ट_टीचर का पुरष्कार दिया था। अंग्रेज़ो का सावित्रीबाई का समर्थन देना और विद्यालय हेतु आर्थिक सहायता करना इसके पीछे सोची समझी चाल थी ।

सावित्रीबाई फुले को प्रथम महिला शिक्षक कहना उतना ही सत्य है जितना जुगनू को सूर्य से अधिक रोशनी वाला कहना सत्य है।

नोट :- प्रथम गुरु माता हैं , इतिहासिक दस्तावेज का सहारा इसलिए लेना पड़ता है ताकि इतिहासिक प्रोपेगैंडा को ध्वस्त कर सकें ।

पोस्ट का श्रेय :: विप्र श्रीयुत सांकृत्यान जी को 🌹🙏🙌❤

“जय श्री भगवान् परशुराम” 🙏📿🚩

Posted in हिन्दू पतन

सावित्री बाई


मित्रो आज सावित्री बाई ज्योतिराव फुले की जयंती है एक लाइन में बता दूं ये भी अंग्रेजो की द-लाल इल्लु एजेन्ट में से एक थीं।
वैसे मैं इन एजेंटो के बारे में बहुत पहले लिख चुका हूं कि इन्हें हमेशा इतिहास में महान बताया गया है जबकि हकीकत इससे उलट होती थी।

आप सोच रहे होंगे कि सूर्य वर्धन की आदत है हर बात को षड्यंत्र से जोड़ना तो मैं इस पर सफाई नही दूंगा बस आपको ये कहूंगा पहले तथ्य को पढ़िए समझिए फिर तय करिये की हम गलत हैं या सही!

मित्रो जैसा कि हमे आजतक किताबो में पढ़ाया जाता है कि सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवियत्री थीं।
उन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर सनातन धर्म मे फैले कुप्रथाओं के विरुद्ध आवाज उठाई थी और स्त्री अधिकारों एवं स्त्रियों के शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए थे।

इनका जन्म 3 January 1831 को Naigaon Maharashtra में हुआ था एवं मृत्यु 10 March 1897 को Pune में हुई थी।

इनके बारे में पहला बड़ा भ्रम या झूठ फैलाया गया कि इन्होंने स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार दिलाया था तो जानकारी के लिए बता दें तंजावर के महाराज #सरफॉजी_भौंसले ने 1805 में कन्या विद्यालय प्रारम्भ किया था जिसमे महिला शिक्षिकाओं की भी नियुक्ति की थी।

जबकि #सावित्री_बाई_फुले का जन्म ही 1831 में हुआ था अब आप ही बताइए कि 1805 पहले आता है या 1831 ??

सिर्फ तंजावर के महाराज ने ही कन्या शाला प्रारम्भ नही की थी बल्कि 1829 में #Cynthia_farrar नाम की मिशनरी महिला द्वारा मुम्बई में एक गर्ल्स मिशनरी स्कूल चलाया जा रहा था तथा बंगाल में 1847 #कालीकृष्ण नाम की कन्या शाला चल रही थी।

बाकी 1835 से पहले भारत मे शिक्षा दर लगभग सौ फीसद थी प्रमाण के लिए धर्मपाल जी की पुस्तक The Beautiful Tree पढ़ सकते हैं।

दूसरा तथ्य लार्ड मैकाले ने खुद 1832 में भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए इंग्लैंड की संसद भवन में बोला था कि भारत 100% शिक्षित लोग हैं।
उसने कोई स्त्री पुरुष का अनुपात नही बताया था और न ही ऐसा कोई अनुपात था।

सावित्री बाई जैसे झूठे व्यक्तित्व के लिए कोई आवाज नही निकालता है वास्तव में भारतीय अपना इतिहास भूल जाते हैं अरे उन्नसवीं शताब्दी में भारत के प्रत्येक मंदिर में एक गुरुकुल होता था तो खुद सोचिए हम अशिक्षित कैसे हो सकते थे?
गार्गी, अपाला,लोपामुद्रा, रानी लक्ष्मीबाई इत्यादि कितनी विदुषी स्त्रिया इस भारत भूमि में हुई हैं जिनके सामने अच्छे अच्छे मठाधीश नही टिकते थे।

तो मित्रों ऐसे झूठे व्यक्तित्व झूठे तथ्यों को नकारना शुरु करिये जिससे हमारा इतिहास झूठलाया जाता है।

संज्ञानात्मक

जय श्री राम
⚔️🦁🚩

सूर्य वधान सिँह

रानी दुर्गावती (गोण्डवाना,१५२४-१५६४), रानी चेन्नम्मा (किट्टूर, १७७८-१८२९), रानी अहल्याबाई (१७२५-१७९५) आदि शिक्षित शासिकायें थी। History Of Classical Sanskrit Literature, 1937, Tirupati by M Krishnamachariar, पृष्ठ ३९१-३९६ पर ६००-१८०० ई के कई कवयित्रियों की सूची है। शंकराचार्य तथा मण्डन मिश्र के शास्त्रार्थ में मण्डन मिश्र की पत्नी भारती को एकमात्र योग्य मध्यस्थ माना गया था।

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युयुत्सु


एक चोर राजमहल में चोरी करने गया, उसने राजा-रानी की बातें सुनी । राजा रानी से कह रहे थे कि गंगा तट पर बहुत साधु ठहरे हैं, उनमें से किसी एक को चुनकर अपनी कन्या का विवाह कर देंगें । यह सुनकर चोर साधु का रुप धारण कर गंगा तट पर जा बैठा । दूसरे दिन जब राजा के अधिकरी एक-एक करके
सभी साधुओं से विनती करने लगे तब सभी ने विवाह करना अस्वीकार किया । जब चोर के पास आकर अधिकारियों ने निवेदन किया तब उसने हां ना कुछ भी नहीं कहा । राजा के पास जाकर अधिकारियों ने कहा कि सभी ने मना किया, परंतु एक साधु लगता है, मान जाएंगे । राजा स्वयं जाकर साधुवेषधारी चोर के पास हाथ जोडकर खडे हो गये एवं विनती करने लगे । चोर के मन में विचार आया कि मात्र साधु का वेष धारण करने से राजा मेंरे सामने हाथ जोडकर खडा है; तो यदि मैं सचमुच साधु बन गया,तो संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो मेरे लिए अप्राप्त होगी । उसने विवाह के प्रस्ताव को अमान्य कर दिया एवं सच्चे अर्थ में साधु बन गया । उसने कभी भी विवाह नहीं किया एवं साधना कर संतपद प्राप्त किया । मात्र कुछ समय के लिए साधुओं के जमावडे में बैठने का प्रभाव इतना हो सकता है, तो सत्संग का प्रभाव कितना होगा ।
सत्संग जीवन मैं परिवर्तन का एक आसान और सुगम मार्ग है

रवि कांत

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एक चोर राजमहल में चोरी करने गया, उसने राजा-रानी की बातें सुनी । राजा रानी से कह रहे थे कि गंगा तट पर बहुत साधु ठहरे हैं, उनमें से किसी एक को चुनकर अपनी कन्या का विवाह कर देंगें । यह सुनकर चोर साधु का रुप धारण कर गंगा तट पर जा बैठा । दूसरे दिन जब राजा के अधिकरी एक-एक करके
सभी साधुओं से विनती करने लगे तब सभी ने विवाह करना अस्वीकार किया । जब चोर के पास आकर अधिकारियों ने निवेदन किया तब उसने हां ना कुछ भी नहीं कहा । राजा के पास जाकर अधिकारियों ने कहा कि सभी ने मना किया, परंतु एक साधु लगता है, मान जाएंगे । राजा स्वयं जाकर साधुवेषधारी चोर के पास हाथ जोडकर खडे हो गये एवं विनती करने लगे । चोर के मन में विचार आया कि मात्र साधु का वेष धारण करने से राजा मेंरे सामने हाथ जोडकर खडा है; तो यदि मैं सचमुच साधु बन गया,तो संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो मेरे लिए अप्राप्त होगी । उसने विवाह के प्रस्ताव को अमान्य कर दिया एवं सच्चे अर्थ में साधु बन गया । उसने कभी भी विवाह नहीं किया एवं साधना कर संतपद प्राप्त किया । मात्र कुछ समय के लिए साधुओं के जमावडे में बैठने का प्रभाव इतना हो सकता है, तो सत्संग का प्रभाव कितना होगा ।
सत्संग जीवन मैं परिवर्तन का एक आसान और सुगम मार्ग है

Posted in हिन्दू पतन

धर्मान्तरण का इलाज !!

असम में एक ईसाई धर्मप्रचारक भेजे गए थे, नाम था क्रूज़, इन्हें असम के एक प्रभावशाली परिवार के लड़के को घर आकर अंग्रेजी पढ़ाने का अवसर मिला,पादरी साहब धीरे-धीरे घर का निरीक्षण करने लगे, उन्हें पता चल गया कि, बच्चे की दादी इस घर में सबसे प्रभाव वाली हैं, इसलिए उनको यदि ईसा की शिक्षाओं के जाल में फंसाया जाए तो उनके माध्यम से पूरा परिवार और फिर पूरा गा़व ईसाई बनाया जा सकता है!
पादरी साहब दादी मां को बताने लगे , कैसे ईसा कोढ़ी का कोढ़ ठीक कर देते थे, कैसे वो नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति देते थे, आदि-आदि !दादी ने कहा, बेटा, हमारे “राम-कृष्ण” के चमत्कारों के आगे तो कुछ भी नहीं ये सब ! तुमने सुना है कि हमारे राम ने एक पत्थर का स्पर्श किया तो वो जीवित स्त्री में बदल गई। राम जी के नाम के प्रभाव से पत्थर भी तैर जाता था पानी में,आज भी तैर रहे है।
पादरी साहब खामोश हो जाते पर प्रयास जारी रखते अपना ! एक दिन पादरी साहब चर्च से केक लेकर आ गए और दादी को खाने को दिया , पादरी साहब को विश्वास था कि दादी न खायेंगी , पर उसकी आशा के विपरीत दादी ने केक लिया और खा गई !पादरी साहब आंखों में गर्वोक्त उन्माद भरे अट्टहास कर उठे, दादी तुमने चर्च का प्रसाद खा लिया !
अब तुम ईसाई हो…….
दादी ने पादरी के कान खींचते हुए कहा, वाह रे गधे ! मुझे एक दिन केक खिलाया – तो मैं ईसाई हो गई! और मैं जो प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती ह़ू तो तू हिन्दू क्यों नहीं हुआ ? तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का वायु ,जल लेता है, फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए!
अपने स्वधर्म और राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और गलत दिशा में जाने से बचाने वाली – ये दादी मां थी असम की सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी “कमला देवी हजारिका ! कौन जानता है इनको असम से बाहर ? क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि, देश इनके बारे में जाने ? #virsasambhalmuhim #meravirsameradharm #noconversioninpunjab

रवि कांत

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Two young ladies arrived a Meeting wearing clothes that were quite revealing their body parts. Here is what the Chairman told them: He took a good look at them and made them sit. Then he said something that, they might never forget in their life. He looked at them straight in the eyes and said; “ladies, everything that God made valuable in this world is well covered and hardly to see, find or get.
1. Where do you find diamonds? Deep down in the ground, covered and protected.
2. Where do you find pearls? Deep down at the bottom of the ocean, covered up and protected in a beautiful shell.
3. Where do you find gold? Way down in the mine, covered over with layers of rock and to get them, you have to work hard & dig deep down to get them.
He looked at them with serious eyes and said;
“Your body is sacred & unique” You are far more precious than gold, diamonds and pearls, and you should be covered too.”So he added that, if you keep your treasured mineral just like gold, diamond and pearls, deeply covered up, a reputable mining organization with the requisite machinery will fly down and conduct years of extensive exploration.
First, they will contact your government (family), sign professional contracts (wedding) and mine you professionally( legal marriage).But if you leave your precious minerals uncovered on the surface of the earth, you always attract a lot of illegal miners to come and mine you illegally. Everybody will just pick up their crude instruments and just have a dig on you just freely like that. Keep your bodies deeply covered so that it invite professional miners to chase you.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ત્રણ મિત્રો એક બારમાં દારુ ઢીંચવા જાય છે, અને જ્યારે તેઓ ઉઠે છે, ત્યારે એક જેલમાં હોય છે. તેમને ખયાલ આવ્યો કે ગુનામાં તેમને સજા થઇ છે, પણ તેમણે કયો ગુનો કર્યો હતો , તેની ખબર ન હતી.

પહેલા વ્યક્તિને ઇલેક્ટ્રીક ખુરશી પર બેસાડીને તેની છેલ્લી ઇચ્છા પુછવામાં આવે છે. તે કહે છે, ”હું સંત છું. અને ભગવાનની તાકાતને માનું છું. અને તે હંમેશા નિર્દોશ લોકોની મદદ કરવા તૈયાર જ હોય છે. ” આટલુ સાંભળીને ઇલેક્ટ્રીક ચેરની સ્વીચ દબાવવામાં આવે છે. પણ કંઇ થતુ નથી. તેથી પોલીસને લાગે છે કે આ ભગવાનની ઇચ્છા હશે, એટલે તેને જવા દે છે.

બીજા વ્યક્તિને ખુરશી પર બેસાડી છેલ્લી ઇચ્છા પૂછવામાં આવે છે. તે કહે છે,
”હું વકીલ છું. અને હંમેશા નિર્દોષ ને અન્યાય ન થાય તેમાં માનું છું. અને ન્યાય સૌથી મોટી તાકાત છે. ” આટલુ સાંભળીને ખુરશીમાં કરંટ દોડાવવા સ્વીચ દબાવવામાં આવે છે, પણ ફરી કંઇ નથી થતુ. પોલીસને લાગ્યુ કે કાયદો અને ન્યાય પણ તેની સાથે હશે એટલે બીજાને પણ જવા દીધો.

છેલ્લો વ્યક્તિ અંદર આવે છે, અને આવતા વેત કહે છે, ”હું ઇલેક્ટ્રીકલ એન્જીનિયર છું. અને તમને કહી દઉં કે જ્યાં સુધી તમે પેલા છુટ્ટા વાયર ને નહી જોડો ત્યાં સુધી આ ખુરશી માં કરન્ટ નહી દોડે..”
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ભગવાન તેની આત્માને શાંતિ આપે…!

રાજે કેનઝ