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🍒 *”કાચની બરણી ને બે કપ ચા”*

*”એક બોધ કથા”*

જીવનમાં જયારે બધું એક સાથે અને જલ્દી-જલ્દી કરવાની ઈચ્છા થાય…. બધું ઝડપથી મેળવવાની ઈચ્છા થાય અને આપણને દિવસના ૨૪ કલાક પણ ઓછા લાગવા લાગે…..
ત્યારે આ બોધકથા “કાચની બરણી ને બે કપ ચા” ચોક્કસ યાદ આવવી જોઈએ….!!!

દર્શનશાસ્ત્રના એક સાહેબ (ફિલોસોફીના પ્રોફેસર) વર્ગમાં આવ્યા અને વિદ્યાર્થીઓને કહ્યું કે એ આજે જીવનનો એક મહત્વપૂર્ણ પાઠ ભણાવવાના છે….!!!

એમણે પોતાની સાથે લાવેલી એક મોટી કાચની બરણી (જાર) ટેબલ પર રાખી એમાં ટેબલ ટેનીસના દડા ભરવા લાગ્યા અને જ્યાં સુધી એમાં એકપણ દડો સમાવાની જગ્યા ન રહી ત્યાં સુધી ભરતા રહ્યા….!!!

પછી એમણે વિદ્યાર્થીઓને પૂછ્યું, “શું આ બરણી ભરાઈ ગઈ છે..?!?”

“હા” નો અવાજ આવ્યો….

પછી સાહેબે નાના-નાના કાંકરા એમાં ભરવા માંડ્યા, ધીરે-ધીરે બરણી હલાવી તો ઘણાખરા કાંકરા એમાં જ્યાં-જ્યાં જગ્યા ખાલી હતી ત્યાં-ત્યાં સમાઈ ગયા.

ફરી એક વાર સાહેબે પૂછ્યું, “શું હવે આ બરણી ભરાઈ ગઈ છે….?!?”

વિદ્યાર્થીઓએ એકવાર ફરીથી “હા” કહ્યું….

હવે સાહેબે રેતીની થેલીમાંથી ધીરે-ધીરે તે બરણીમાં રેતી ભરવાનું શરૂ કર્યુ, રેતી પણ બરણીમાં જ્યાં સમાઈ શકતી હતી ત્યાં સમાઈ ગઈ… એ જોઈ વિદ્યાર્થીઓ પોતાના બંને જવાબ પર હસવા માંડ્યા….

ફરી સાહેબે પૂછ્યું, “કેમ.. ? હવે તો આ બરણી પૂરી ભરાઈ ગઈ છે ને..?!?”

“હા… હવે તો પૂરી ભરાઈ ગઈ..!!!” બધા વિદ્યાર્થીઓએ એક સ્વરમાં કહ્યું…..

હવે સાહેબે ટેબલ નીચેથી ચાના ભરેલા બે કપ બરણીમાં ઠાલવ્યા, ને ચા પણ બરણીમાં રહેલી રેતીમાં શોષાઈ ગઈ… એ જોઈ વિદ્યાર્થીઓ તો સ્તબ્ધ થઈ ગયા….!!!

હવે સાહેબે ગંભીર અવાજમાં સમજાવાનું શરુ કર્યું….

“આ કાચની બરણીને તમે તમારું જીવન સમજો….

ટેબલ ટેનીસના દડા સૌથી મહત્વપૂર્ણ ભાગ એટલે કે ભગવાન, પરિવાર, માતા-પિતા, દીકરા-દીકરી, મિત્રો, અને સ્વાસ્થ્ય…!!!

નાના-નાના કાંકરા એટલે કે તમારી નોકરી-વ્યવસાય, ગાડી, મોટું ઘર, શોખ વગેરે….

અને રેતી એટલે કે નાની નાની બેકારની વાતો, મતભેદો, ને ઝગડા…!!!

જો તમે તમારી જીવનરૂપી બરણીમાં સર્વપ્રથમ રેતી ભરી હોત તો તેમાં ટેબલ ટેનીસના દડા ને નાના-નાના કાંકરા ભરવાની જગ્યા જ ન રહેત… ને જો નાના-નાના કાંકરા ભર્યા હોત તો દડા ન ભરી શક્યા હોત, રેતી તો જરૂર ભરી શકતા….!!!

બસ, આજ વાત આપણા જીવન પર લાગુ પડે છે….
જો તમે નાની-નાની વાતોને વ્યર્થના મતભેદ કે ઝગડામાં પડ્યા રહો ને તમારી શક્તિ એમાં નષ્ટ કરશો તો તમારી પાસે મોટી-મોટી અને જીવન જરૂરીયાત અથવા તમારી ઇચ્છિત વસ્તુ કે વાતો માટે સમય ફાળવી જ ન શકો….

તમારા મનના સુખ માટે શું જરૂરી છે તે તમારે નક્કી કરવાનું છે…. ટેબલ ટેનીસના દડાની ફિકર કરો, એ જ મહત્વપૂર્ણ છે….
પહેલા નક્કી કરી લો કે શું જરૂરી છે… ? બાકી બધી તો રેતી જ છે….!!!

વિદ્યાર્થીઓ ધ્યાનપૂર્વક સાંભળી રહ્યા હતા ને અચાનક એકે પૂછ્યું, “પણ સાહેબ…. તમે એક વાત તો કહી જ નહિ કે ” ચાના ભરેલા બે કપ” શું છે ?”

સાહેબ હસ્યા અને કહ્યું, “હું એ જ વિચારું છું કે હજી સુધી કોઈએ આ વાત કેમ ના પછી…?!?”

“એનો જવાબ એ છે કે,
જીવન આપણને કેટલું પણ પરિપૂર્ણ અને સંતુષ્ટ લાગે, પણ આપણા ખાસ મિત્ર સાથે “બે કપ ચા” પીવાની જગ્યા હંમેશા હોવી જોઈએ.”

*પોતાના ખાસ મિત્રો અને નજીકના વ્યક્તિઓને સમર્પિત…*🙏
મનોજ પટેલ
*☕ ☕*😊

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गांव के पान की दुकान पर खड़े एक 35 वर्षीय निठल्ले बेरोजगार युवक से मेंने पूछा=कुछ कमाते धमाते क्यों नहीं…?
दिन भर शराब पिए रहते हो,और राजश्री खाकर थूकते रहते हो?
वह बोला :– मेरी मर्जी
मैं बोला :– शादी हो गई …?
वह बोला :– हो गई
मैं बोला :– कैसे किये…?
वह बोला :- श्रम कार्ड से मुख्यमंत्री आदर्श विवाह योजना से 30,000 और अंतर्जातीय कन्यादान योजना से…250,000 मिलता है।,,,
मैं बोला :– फिर बाल बच्चे भी होंगे उसके लिये कमाओ…?
वह बोला :– जननी सुरक्षा से डिलेवरी फ्री और साथ मे 1500 रू का चेक.और
श्रम कार्ड में भगिनी प्रसूति योजना से 20,000 मिलता है

मैंने बोला :– तो बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिये कमाओ..?
वह फिर :– गुटका पिचक कर कहा
उनके लिये तो पढ़ाई, यूनिफार्म,किताबें और भोजन सब सरकार की तरफ़ से फ्री…!
और
श्रम कार्ड से मुख्यमंत्री नौनिहाल और मेधावी छात्रवृत्ति योजना में हर साल पैसे मिलगे।
और जब लड़का कॉलेज करेगा तो
BPLसूची मे होने की वजह से उसे फ्री एडमिशन और स्कोलरशिप भी मिलेंगे तो क्या टेशन ?
मैंने बोला :– यार घर कैसे चलाते हो ?
वह बोला :– छोटी लड़की को अभी सरकार से साइकिल मिली है।

लड़के को लॅपटाप मिला है।
मॉ-बाप को वृद्धावस्था पेन्शन मिलती है और 1 रूपये किलो मे पूरे महिने भर का चावल मिलता है।

मैं झुझलाँ कर बोला यार माॅ-बाप को तीर्थयात्रा के लिये तो कमाओ …??
उसने कहा ……..मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना से भेज दिया हूं
मैं बोला ……..कम से कम इलाज के लिए कमाओ*
उसने कहा ……. आयुष्मान कार्ड है न फ्री में पांच लाख तक का इलाज होता है
मुझे गुस्सा आया और मैंने बोला :–
माॅ बाप के मरने के बाद जलाने के लिये तो कमा..?
वह बोला :– 1 रू में विद्युत शवदाह गृह है..!
मैंने कहा :– अरे बाप अपने बच्चों की शादी के लिये तो कमाओ..?
वह मुस्कुराया और बोला :–
फिर वहीं प्रश्न आ गये…
वैसे ही होगी जैसे मेरी हुई
यार एक बात बता *ये इतने अच्छे कपड़े तू कैसे पहनता है?
वह बोला :– राज की बात हैं..फिर भी मैं बता देता हूँ
..सरकारी जमीन पर कब्जा कर आवास बनाओ , लोन लो और फिर मकान बेच कर फिर जमीन कब्जा कर पट्टा ले लो…!!
तुम जैसे लाखों लोग काम करके हमारे लिए टैक्स भर ही रहे हैं।
और किसान खेती मे मेहनत करके अनाज पैदा करता है, और सरकार उसे खरीद कर हमे मुफ़्त में देती है तो फिर हम काम क्यों करें।
वंदे मातरम

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एक बार औरंगजेब के दरबार में एक शिकारी जंगल से
पकड़कर एक बड़ा भारी शेर लाया ! लोहे के पिंजरे में बंद
शेर बार-बार दहाड़ रहा था ! बादशाह कहता था… इससे
बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं मिल सकता ! दरबारियों ने
हाँ में हाँ मिलायी.. किन्तु वहाँ मौजूद राजा यसवंत सिंह
जी ने कहा – इससे भी अधिक शक्तिशाली शेर मेरे पास है !
क्रूर एवं अधर्मी औरंगजेब को बड़ा क्रोध हुआ ! उसने
कहा तुम अपने शेर को इससे लड़ने को छोडो..
यदि तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सर काट
लिया जायेगा …… !
दुसरे दिन किले के मैदान में दो शेरों का मुकाबला देखने
बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी ! औरंगजेब बादशाह
भी ठीक समय पर आकर अपने सिंहासन पर बैठ गया !
राजा यशवंत सिंह अपने दस वर्ष के पुत्र पृथ्वी सिंह के
साथ आये ! उन्हें देखकर बादशाह ने पूछा– आपका शेर
कहाँ है ? यशवंत सिंह बोले- मैं अपना शेर अपने साथ
लाया हूँ ! आप केवल लडाई की आज्ञा दीजिये !
बादशाह की आज्ञा से जंगली शेर को लोहे के बड़े पिंजड़े में
छोड़ दिया गया ! यशवंत सिंह ने अपने पुत्र को उस पिंजड़े
में घुस जाने को कहा ! बादशाह एवं वहां के लोग हक्के-
बक्के रह गए ! किन्तु दस वर्ष का निर्भीक बालक
पृथ्वी सिंह पिता को प्रणाम करके हँसते-हँसते शेर के
पिंजड़े में घुस गया ! शेर ने पृथ्वी सिंह की ओर देखा ! उस
तेजस्वी बालक के नेत्रों में देखते ही एकबार तो वह पूंछ
दबाकर पीछे हट गया.. लेकिन मुस्लिम सैनिकों द्वारा भाले
की नोक से उकसाए जाने पर शेर क्रोध में दहाड़ मारकर
पृथ्वी सिंह पर टूट पड़ा ! वार बचा कर वीर बालक एक
ओर हटा और अपनी तलवार खींच ली ! पुत्र को तलवार
निकालते हुए देखकर यशवंत सिंह ने पुकारा – बेटा, तू यह
क्या करता है ? शेर के पास तलवार है क्या जो तू उसपर
तलवार चलाएगा ? यह हमारे हिन्दू-धर्म की शिक्षाओं के
विपरीत है और धर्मयुद्ध नहीं है !
पिता की बात सुनकर पृथ्वी सिंह ने तलवार फेंक दी और
निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा ! अंतहीन से दिखने वाले एक
लम्बे संघर्ष के बाद आख़िरकार उस छोटे से बालक ने शेर
का जबड़ा पकड़कर फाड़ दिया और फिर पूरे शरीर को चीर
दो टुकड़े कर फेंक दिया ! भीड़ उस वीर बालक पृथ्वी सिंह
की जय-जयकार करने लगी ! अपने.. और शेर के खून से
लथपथ पृथ्वी सिंह जब पिंजड़े से बाहर निकला तो पिता ने
दौड़कर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया !
तो ऐसे थे हमारे पूर्वजों के कारनामे.. जिनके मुख-मंडल
वीरता के ओज़ से ओतप्रोत रहते थे !
और आज हम क्या बना रहे हैं अपनी संतति को..
सारेगामा लिट्ल चैंप्स के नचनिये.. ?
आज समय फिर से मुड़ कर इतिहास के
उसी औरंगजेबी काल की ओर ताक रहा है.. हमें
चेतावनी देता हुआ सा.. कि ज़रुरत है कि हिन्दू अपने
बच्चों को फिर से वही हिन्दू संस्कार दें.. ताकि बक्त पड़ने
पर वो शेर से भी भिड़ जाये.. न कि “सुवरों” की तरह
चिड़ियाघर के पालतू शेर के आगे भी हाथ पैर जोड़ें.. !

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इच्छाओं पर विजय


एक युवक था. उस को जीवन से बड़ी ख्वाहिशें थीं. उसे लगता था कि उसे बचपन में वह सब नहीं मिल सका जिसका वह हकदार था.

बचपन निकल गया. किशोरावस्था में आया. वहां भी उसे बहुत कुछ अधूरा ही लगा. उसे महसूस होता कि उसकी बहुत सारी इच्छाएं पूरी नहीं हो सकीं. उसके साथ न्याय नहीं होता.

इसी असंतोष की भावना में युवा हो गया. उसे लगता था जब वह अपने पैरों पर खड़ा होगा तो सारी इच्छाएं पूरी करेगा. वह अवस्था भी आएगी. पर उसकी इच्छाएं इतनी थीं कि लाख कोशिशों पर भी वह पूरा नहीं कर पा रहा था.

वह युवक बेचैन रहने लगा. इसी बीच किसी सत्संगी के संपर्क में आया और उसे वैराग्य हो गया. वह स्वभाव से और कर्म दोनों से संत हो गया. संत होने से उसे किसी चीज की लालसा ही न रही.

जिन संत की संगति से उसमें वैराग्य आया था, वह लगातार भगवान की भक्ति में लगे रहते. उनकी इच्छाएं बहुत थोड़ी थीं. वह पूरी हो जातीं तो वह योग, साधना और यज्ञ-हवन करते.

इस युवक में भी वह गुण आ गए. अब वह भी संत हो गए. इससे उन्हें मानसिक सुख मिलने लगा और उसमें दैवीय गुण भी आने लगे. अब वह भी एक बार वह ईश्वर की लंबी साधना में बैठे.

इनकी साधना से एक देवता प्रसन्न हो गए. उन्होंने दर्शन दिए और कोई इच्छित वरदान मांगने को कहा.

संत ने कुछ पल सोचा फिर देवता से बोले कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिए.

देवता ने प्रश्न किया- जहां तक मैं जानता हूं आपकी ज्यादातर आकांक्षाएं पूरी ही न हो सकी हैं.

इस पर संत ने कहा- जब मेरे मन में इच्छाएं थीं तब तो कुछ मिला ही नहीं. अब कुछ नहीं चाहिए तो आप सब कुछ देने को तैयार है. आप प्रसन्न हैं यही काफी है. मुझे कुछ नहीं चाहिए.

देवता मुस्कुराने लगे.उन्होंने कहा- इच्छा पर विजय प्राप्त करने से ही आप महान हुए. भगवान और आपके बीच की एक ही बाधा थी, आपकी अनंत इच्छाएं.

उस बाधा को खत्म कर आप पवित्र हुए. मुझे स्वयं परमात्मा ने भेजा है. इस लिए आप कुछ न कुछ स्वीकार करके हमारा मान अवश्य रखें.

संत ने बहुत सोच-विचारकर कहा- मुझे वह शक्ति दीजिए कि यदि मैं किसी बीमार व्यक्ति को स्पर्श कर दूं तो वह भला-चंगा हो जाए.

किसी सूखे वृक्ष को छू दूं तो उसमें जान आ जाए. देवता ने कहा- आप जैसा चाहते हैं वैसा ही होगा.

वरदान देकर देवता चलने को हुए तो संत ने कहा- रुकिए मैं अपना विचार बदल रहा हूं.

देवता को लगा क्या इसमें फिर से लालसा पैदा हो गईं. उन्होंने कहा- अब क्या विचार किया है, बताएं. आपको एक अवसर विचार बदलने का मैं देता हूं.

संत ने कहा- मैं अपने वरदान में संशोधन चाहता हूं. मैंने आपसे मांगा कि यदि मैं बीमार व्यक्ति को छूं दूं तो उसे स्वास्थ्य लाभ हो जाए. सूखे वृक्ष को छूं दूं तो हरा भरा हो जाए.

मैं इस वरदान में एक संशोधन यह चाहता हूं रोगी और वृक्ष का कल्याण मेरे छूने से नहीं मेरी छाया पड़ने ही होने लगे और मुझे इसका पता भी न चले.

देवता को बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने पूछा- क्या आप ऐसा इसलिए मांग रहे हैं क्योंकि आप किसी मलिन या बीमार को स्पर्श करने से बचना चाहते हैं ?

संत ने कहा- ऐसा बिल्कुल नहीं है. रोगी या मलिन व्यक्ति से दूर रहने के लिए नहीं मैं ऐसा मांग रहा. मैं नहीं चाहता कि संसार में यह बात फैले कि मेरे स्पर्श करने से लोगों को लाभ होता है.

एक बार यह बात फैली तो फिर संसार में मुझे लोग एक चमत्कारिक शक्तियों वाला सिद्ध प्रचारित कर देंगे. मैं लोगों का कल्याण तो चाहता हूं लेकिन उस कल्याण के साथ मेरी प्रसिद्धि हो यह नहीं चाहता.

देवता ने प्रश्न किया- पर आप ऐसा क्यों चाहते हैं. इससे क्या नुकसान हो सकता है.

संत बोले- शक्ति का अहसास मन को मलिन करके कुच्रकों की रचना शुरू करता है चाहे वह कोई दैवीय सिद्धि ही हो क्यों न हो. यदि प्रचार शुरू हुआ और मेरे मन में श्रेष्ठता का अभिमान होने लगा तो फिर यह वरदान मेरे लिए शाप बन जाएगा.

इससे तो अच्छा है कि लोगों का कल्याण चुपचाप ही हो जाए. न मुझे पता चलेगा न अभिमान की संभावना रहेगी.

देवता प्रसन्न हो गए. उन्होंने कहा- परमात्मा ने ऐसे वरदान के लिए सर्वथा योग्य व्यक्ति का चयन किया है. आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी.

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મારા ઘર પાસે અજય વિજય નામની ભેળની લારી ઊભી રહે છે. મુંબઈ જેવા શહેરમાં આવી લારીઓનો ક્યાં તોટો હોય, પણ‌ જેની ચાટ જીભને ચટકો લગાડી દે એવી આ લારીનું અમને ઘેલું. આમ તો પાણીપુરી એટલે આજે ય દાંતની તકલીફ સાથે પરમપ્રિય. એનાં નામથી જ જઠરાગ્નિ પ્રદીપ્ત થઈ જાય . એવા આ ચાટવાળા પાસે તે દિવસે અમે ઘરનાં ચારેક જણાં પાણીપુરી ખાવા ગયા. બાળ કામદારનો સરકારી પ્રતિબંધ ઘોળીને પીવાઈ ગયો હતો. ત્યાં એક દસેક વર્ષનો છોકરો બધાંને તૈયાર થયેલી ડિશ આપતો હતો અને ખાઈ રહ્યાં બાદ ડિશ ધોઈ પાછી આપી રહ્યો હતો. વચ્ચે કોઈ આઘું ઊભું હોય તો એનાં પૈસા લાવી માલિકને આપતો. એની ચપળતા અને સસ્મિત કામ નિપટાવવાની રીત જોઈ, મનમાં એના પ્રતિ એક અનુકંપા જાગી . પાણીપુરી ખાઈ લીધાં બાદ વધેલાં પૈસા લેતાં એક ઈચ્છા થઈ એ છોકરાને કશુંક આપવાની,પણ ન એણે હાથ લાંબો કર્યો ન ઈચ્છા દર્શાવી.એની નજરમાં અહંકાર નહીં, સ્વાભિમાન હતું, જાણે કહેતો ન હોય ,
પૈસા નહીં સાહેબ,એકલો ન પડુ જોજો,
ખભે હાથ રાખી,લડવા હિંમત સદા આપજો!

આવી એક બીજી વાત, હવે તો તૈયાર રબર- પ્લાસ્ટિક સોલવાળા ચંપલ,સેન્ડલ , એટલે રિપેર બહુ ઓછું આવે અને આવે તો ય ફેંકી જ દેવી પડે. પણ મારાં જેવા જૂનવાણી લોકો ચામડાની ચંપલ પહેરે તેથી તૂટે ખરી.આ કારણે ગલીના નાકે ,એક ખબરી જેવું કામ કરે એવા મોચી ઓછાં. પણ હું નસીબદાર કે તે દિવસે મારી કોલ્હાપુરી ચંપલનો અંગૂઠો તૂટયો અને મોચી પણ જાણીતો મળ્યો. એણે આગળનાં ગ્રાહકનું કામ પતાવી મને અંગૂઠો રિપેર કરી આપ્યો .હું તો રાજી થઈ એને પૈસા આપવા પર્સમાં હાથ નાખ્યો ત્યાં એ બોલી ઉઠ્યો,” રહેવા દો બહેન , આટલાં અમસ્તા કામના પૈસા લીધાં હોત તો ક્યારનો એક બંગલો બાંધ્યો હોત.જાઓ વહેલાં!”
એને તો પૈસા લેવાનો પૂર્ણ હક્ક હતો એ જતો કરી એવી નૈતિકતાનો પાઠ શિખવાડ્યો જે કહી ગયો કે દરેક કાર્યને પૈસે ન તોલાય , દુનિયામાં પ્રેમ, સ્નેહથી પણ જીવન જીવી જવાય.
એક દિન બીક જાયેગા માટીકે મોલ,
જગમેં રહ જાયેંગે પ્યારે તેરે બોલ.
આવી નાની વાતો મનમાં ઘર કરી જાય છે ત્યારે એણે શીખવેલ પાઠ તો અણમોલ શીખ આપી જાય જેનો કોઈ શાળા કે કોલેજના પાઠ્યક્રમમાં ન સમાવેશ થયો હોય.
બેંકની નોકરી એટલે લોન વસૂલી તો ખરી જ . આપણાં જ પૈસા માંગતા આપણે નમ્ર, સંયમિત શબ્દો વાપરવા પડે એ કેવી કરૂણતા. આવી જ એક વસૂલી માટે એક જરા આબરૂદાર કહેવાય એવી વ્યક્તિ પાસે જવાનું નક્કી કર્યું .ત્રણેક હપ્તા ચૂકી ગયેલા એ કર્જદારને જરા આકરાં શબ્દોમાં કહેવાની તૈયારી સાથે અમે બે જણા એને ત્યાં ગયાં . અપેક્ષા તો એવી હતી કે મુખ્ય વ્યક્તિ મળશે જ નહીં . એનાં બદલે એણે અમારું જોરશોરથી સ્વાગત કર્યું અને પોતાની મોટાઈના કિસ્સા કીધાં.છેવટે અમારે ખૂબ નરમાશથી એને કહેવું પડ્યું કે એમનાં હપ્તા ભરવાની સમય મર્યાદા પાર થઈ ગઈ છે અને વ્યાજ વધતું જાય છે. એમણે ત્રીસ તારીખ સુધીમાં પૈસા ભરવાની હામી ભરી .
ત્યાંથી નીકળી થોડાં અંતરે એક સાવ સામાન્ય લાગતી વ્યક્તિ દેખાઈ . મારી સાથે આવેલ સહકાર્યકરને યાદ આવ્યું કે એની પણ સાવ મામૂલી જેવી રકમ લેણી નીકળતી હતી . એની સાથે ખૂબ કડક શબ્દોમાં વાત કરી.આગલા કર્જદાર સાથે જે ન કરી શક્યાં તે આ વ્યક્તિ સાથે કરી જાણે ઉભરો કાઢ્યો. તેણે કોઈ પ્રતિભાવ ન આપતા ‘ત્રીસ તારીખે પૈસા ભરીશ’ એમ કહેતાં અમે બેંક પાછાં ફર્યાં.
ત્રીસ તારીખે બેંકિંગ કલાકો પૂરાં થયાં પણ પેલા મોટી રકમ ભરનારા મહાનુભાવ કંઈ દેખાયાં નહીં.એ ચીડ સાથે શટર નીચું કરી અંદર કામ કરતા હતાં ત્યારે શટર ઊંચું કરી પેલી સામાન્ય દેખાતી વ્યક્તિ કેશિયર સામે ખિસ્સામાંથી અસ્તવ્યસ્ત નોટો કાઢી સ્લીપ ભરવા કહી રહી હતી. કેશિયર અણગમા સાથે બોલ્યો,” આજે જ પૈસા ભરવા જરૂરી હતાં! કાલે ભર્યા હોત તો.મારે બધું ફરી ટેલી કરવું પડશે. મેં પણ ત્યાં જઈ ‘કાલે આવ્યાં હોત તો’ જેવી ભાવના વ્યક્ત કરી.
એણે કહ્યું,” સાહેબ ,ત્રીસ તારીખે પૈસા ભરવાનું વચન આપ્યું હતું ને,તો આજે જ ભરવાં પડે ને પૈસા!”હું એની વચન પરસ્તીને વંદી રહી.

રઘુકુલ રીત સદા ચલી આઈ,પ્રાણ જાયે પર વચન ન જાઈ!

રામના અનુગામી એવાં આપણે વચન વિશે વાંચી, સાંભળી એનું પાલન કેમ કરી શકાય એનો વિચાર ક્યાં કરીએ જ છીએ !એ સાવ સામાન્ય લાગતી વ્યક્તિએ શીખવ્યું.
મારી દીકરી નાની હતી ત્યારે, આજથી ત્રીસેક વર્ષ પહેલાં એને લઈ મારાં ઘરની સામે એક જાહેર બગીચામાં લઈ જતી.રોજ શક્ય નહોતું પણ તે વખતે એની તબિયત સારી નહીં એટલે રોજ થોડી વાર હું લઈ જતી. એક દિવસ એક કિન્નર આવ્યો, તાળી પાડી પૈસા માંગતા મેં આપી છૂટકારો કરી લીધો. મારી દીકરી સંતાઈ જોવા લાગી .બીજે દિવસે પણ સાધારણ એ જ સમયે ત્યાં આવી પૈસા માંગ્યા. મારાં મોઢાં પર અણગમો અને દીકરીનો ડર એને સમજાઈ ગયો. વચ્ચે બેએક દિવસ ન જવાયું,પણ વળી પાછી એની બગીચામાં હાજરી જોઈ  અકળાઈ જવાયું.પણ આ તો જાહેર બગીચો!મારી દીકરી પણ એની તાળી સાંભળી મારી સોડમાં ભરાઈ.

Rohit Patel, [02/01/2023 7:11 PM]
એ કિન્નરે તો ય મારી સમીપ આવી પૈસા માંગ્યા પણ લીધાં વિના તરત જ દરવાજા તરફ દોડ્યો. ત્યાં ઉભેલા ફૂગ્ગાવાળા પાસે એક ફૂગ્ગો લાવી મારી દીકરીને આપ્યો ,ગાલે એક ટપલી મારી એનાં ઓવારણાં લઈ ચાલતી પકડી.મને ત્યારે એની સાથે કુદરતે કરેલાં અન્યાય વિશે વિચાર આવ્યો . એમને ય ક્યાં ગમતું હશે આમ માનરહિત જીવવું…પણ એણે એક વાત શીખવી..

   પ્રેમ કરવો ,પ્રેમ કરતાં રહેવું,પ્રેમ એ જ એક આશ છે,
  આજ નહીં તો કાલ મારો કાળ બદલાશે ,એ વિશ્વાસ છે!

આ ચારે ય પ્રસંગો કોઈ વ્યાખ્યાન કે સત્સંગથી કમ નહોતાં. જિંદગીના મોંઘેરા પાઠ ભણાવતી યુનિવર્સિટી જેવી એ ચારેય વ્યક્તિ મનોપટલ પર અંકિત છે.વંદન એ સૌને.

©️માયા દેસાઈ

મુંબઈ ભારત

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અણધાર્યો ઘા


ખેતરને શેઢે ઉભા ઉભા લહેરાતા પાકને જોઈને રામજીથી ઊંડો નિસાસો નંખાઈ ગયો. ખાસ્સી વાર એમનેમ ઉભો રહ્યો પછી ઘર તરફની વાટ એણે પકડી. રસ્તામાં એનો ખાસ ભાઈબંધ હરિયો મળ્યો પણ એની તરફ એણે નજર સુધ્ધાં ન નાંખી. એથી હરિયો થોડો ઝંખવાણો પડ્યો.

ઘરે આવીને રામજી સીધો ઓરડે જઈને ખેતરના કાગળો તપાસવા લાગ્યો. સરકારી કાગળોમાં કશી ગતાગમ ન પડતાં એણે બધું પાછું મૂકી દીધું. રામજીને આ રીતે જોઈને એની પત્ની રેવા કેટલાય દિવસથી ચિંતામાં હતી. આટલો મોટો દગો કોઈ ક્યાં સુધી ખમી શકે? એણે એની રીતે નણંદને સમજાવવાની કોશિશ કરી જોઈ પણ બધું વ્યર્થ.

રામજીની મોટી બહેન રૂપા બહુ સમજુ ને કહ્યાગરી. જ્યારે પિતાનું દેહાંત થયું ત્યારે રૂપાએ જ એને સંભાળ્યો હતો. આટલી ગુણિયલ બહેન કેમ આવી જીદે ચડી હશે એનું કારણ રામજી સમજી શકતો નહતો. પૈતૃક સંપત્તિમાં દીકરીનો ભાગ હોય એવો કાયદાનો એ ફાયદો ઉઠાવી રહી હતી.

ઘર અને જમીનમાં પોતાનો હિસ્સો આપી દેવા રૂપાએ જ્યારે કહેણ મોકલ્યું ત્યારે રામજીને રીતસરનો આંચકો જ લાગ્યો. એમ તો બહેન માટે પોતે બધું ત્યજી શકે એમ હતો પરંતુ રૂપાની માંગણી એને સાવ અજુગતી લાગી. વળી લાંબા સમયથી એ અવસર-પ્રસંગે ભાઈને મળવા આવવાનુંય ટાડતી.

છેવટે જે વાતનો ડર હતો એ થઈને જ રહી. રૂપાએ કાયદેસર નોટિસ મોકલી ને સંપત્તિમાં એનો હિસ્સો પડાવી લીધો. ઘર તો રામજીને ભાગે આવ્યું પણ ખેતર.. એક પળમાં રામજી ખુદ ખેડૂત મટીને ખેતમજૂર થઈ ગયો.

થોડા દિવસમાં રૂપાએ જમીન વેચવા કાઢી ત્યારે રામજીને દાળમાં કંઇક કાળું હોવાની શંકા ઉપજી. હરજી, રામજીનો ખાસ ભાઈબંધ. રામજીએ હરજીને રૂપાનું ખેતર લેવા વિનવણી કરી. ઉછીના પાછીના કરીને હરજીએ ખેતરનો સોદો કર્યો.

આ વખતની ભાઈબીજ કરવા રૂપાએ ભાઈને નોતર્યો નહોતો તેમ છતાં રેવાને સમજાવીને રામજી રૂપાના આંગણે આવીને ઉભો રહ્યો. અંદરના ઓરડેથી કોઈકના હાથ ઉપાડવાનો અને બાઈ માણસનો રડવાનો અવાજ આવી રહ્યો હતો. રામજી અને રેવા પળભરમાં જ અવાજ ઓળખી ગયા. ધડામ દઈને બારણું ખોલીને રામજી અંદર પ્રવેશ્યો. ખૂણામાં ટૂંટિયું વાળીને રૂપા પડી હતી અને એનો ધણી લાતે લાતે મારી રહ્યો હતો. રામજીએ પોતાના બનેવીને ઊંધા હાથની બે લગાવી દીધી અને રૂપાને લઈને ઘર તરફ પગ માંડ્યા.

ઘરે પહોંચીને રૂપાએ એના પતિની કાળી બાજુના એક પછી એક પાનાં ખોલ્યાં. પતિએ જ પોતાના ભાઈ પાસેથી હિસ્સો મંગાવ્યો ને એણે આનાકાની કરી તો રામજીને જાનથી મારી નાખવાની ધમકી આપી. રૂપા ડરી ગઈ ને ભાઈને બચાવવાના હેતુથી જમીનનો ભાગ એણે લઈ લીધો.

ઘણા દિવસો પછી બંને ભાઈબહેન મુક્ત મને રડ્યા.. લાગણીથી..પસ્તાવાથી..અને ઉજ્જવળ ભાવિની ખુશીથી..

-અંકિતા સોની (ધોળકા)

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एक दिन दोपहर को एक दोस्त के साथ सबजी बाज़ार टहलने गया..! अचानक, फटे कपड़ों में एक बूढ़ा आदमी हाथ में हरी सब्जियों का थैलियां लेकर हमारे पास आया..!* उस दिन सब्जियों की बिक्री बहुत कम थी,पत्ते निर्जलित और पीले रंग के लग रहे थे और उनमें छेद हो गए थे जैसे कि कीड़ों ने काट लिया हो..! लेकिन मेरे दोस्त ने बिना कुछ कहे तीन थैली खरीद लिए..!बूढ़े ने भी लज्जित होकर समझाया: “मैंने ये सब्जियां खुद उगाईं..!कुछ समय पहले बारिश हुई थी, और सब्जियां भीग गई थीं..! वे बदसूरत दिखती हैं..!मुझे खेद है..”

बूढ़े आदमी के जाने के बाद,मैंने अपने दोस्त से पूछा: “क्या तुम सच में घर जाकर इन्हें पकाओगे..?”

वह मुझे ना कहना नहीं चाहता था..”ये सब्जियां अब नहीं खाई जा सकतीं”

“तो फिर इसे खरीदने की परेशानी क्यों उठाई?” मैंने पूछा..

उन्होंने उत्तर दिया,”क्योंकि उन सब्जियों को खरीदना किसी के लिए भी असंभव है..! अगर मैं इसे नहीं खरीदता,तो शायद बूढ़े के पास आज के लिए कोई आय नहीं होगी”

मैंने अपने मित्र की विचारशीलता और चिंता की मन ही मन प्रशंसा की..!आगे चलकर मैंने भी बूढ़े व्यक्ति को पकड़ लिया और उससे कुछ सब्जियां खरीदीं..!
बुढ़े ने बहुत खुशी से कहा, “मैंने इसे पूरे दिन बेचने की कोशिश की,लेकिन कोई भी खरीदने के लिए तैयार नहीं था..! मुझे बहुत खुशी है कि आप दोनों मुझसे खरीदे। बहुत-बहुत धन्यवाद”

मुट्ठी भर हरी सब्जियां जो मैं बिल्कुल भी नहीं खा सकता,ने मुझे एक मूल्यवान सबक सिखाया..!

जब हम निचले स्तर पर होते हैं,तो हम सभी आशा करते हैं कि हमारे साथ चमत्कार होंगे, लेकिन जब हम सक्षम होते हैं, तो क्या हम चमत्कार करने वाले बनने को तैयार होते हैं…?

इन दो कहानियों को पढ़ने के बाद आपके पास दो विकल्प हैं:-👇

1) आप इस सकारात्मक संदेश का प्रचार कर सकते हैं,और दुनिया में अधिक प्यार फैला सकते हैं..!

2) आप इसे पूरी तरह से अनदेखा भी कर सकते हैं जैसे कि आपने इसे कभी नहीं देखा..!

हालाँकि,आपकी छोटी सी साझा कार्रवाई अनगिनत दुर्भाग्यपूर्ण लोगों की नियति को रोशन कर सकती है..!!
जय श्री राधे राधे

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एक कंपनी की हर दीपावली की पूर्व संध्या पर एक पार्टी और लॉटरी आयोजित करने की परंपरा थी..!*

लॉटरी ड्रा के नियम इस प्रकार थे: प्रत्येक कर्मचारी एक फंड के रूप में सौ रुपये का भुगतान करता है..! कंपनी में तीन सौ लोग थे,यानी कुल तीस हजार रुपये जुटाए जा सकते हैं..! विजेता सारा पैसा ले जाता है..!

लॉटरी ड्रा के दिन कार्यालय चहल-पहल से भर गया..! सभी ने कागज की पर्चियों पर नाम लिखकर लॉटरी बॉक्स में डाल दिया..!

हालांकि एक युवक लिखने से झिझक रहा था..! उसने सोचा कि कंपनी की सफाई वाली महिला के कमजोर और बीमार बेटे का नए साल की सुबह के तुरंत बाद ऑपरेशन होने वाला था, लेकिन उसके पास ऑपरेशन के लिए आवश्यक पैसे नहीं थे, जिससे वह काफी परेशान थी..!
भले ही वह जानता था कि जीतने की संभावना कम है, केवल 0.33 प्रतिशत संभावना, उसने नोट पर सफाई वाली महिला का नाम लिखा..!

उत्साहपूर्ण क्षण आया। बॉस ने लॉटरी बॉक्स को हिलाते हुए उस में से एक पर्ची निकाला..! वह आदमी भी अपने दिल में प्रार्थना करता रहा: इस उम्मीद से कि सफाई वाली महिला पुरस्कार जीत सकती है..! तब बॉस ने ध्यान से विजेता के नाम की घोषणा की, और लो – चमत्कार हुआ!
विजेता सफाई वाली महिला निकली..! कार्यालय में खुशी की लहर दौड़ गई और वह महिला पुरस्कार लेने के लिए तेजी से मंच पर पहुंची..! वह फूट-फूट कर रोने लगी और कहा, “मैं बहुत भाग्यशाली और धन्य हूँ! इस पैसे से, मेरे बेटे को अब आशा है!”

इस “चमत्कार” के बारे में सोचते हुए, वह आदमी लॉटरी बॉक्स की ओर बढ़ा..! उसने कागज का एक टुकड़ा निकाला और यूँ ही उसे खोला..!
उस पर भी सफाई वाली महिला का नाम था..! वह आदमी बहुत हैरान हुआ..! उसने एक के बाद एक कागज के कई टुकड़े निकाले..!
हालाँकि उन पर लिखावट अलग-अलग थी, नाम सभी एक ही थे..! वे सभी सफाई वाली महिला के नाम थे..! आदमी की आँखों में आँसू भर आए और वह स्पष्ट रूप से समझ गया कि यह क्या चमत्कार है, लेकिन चमत्कारी आसमान से नहीं गिरते, लोगों को इसे खुद बनाना पड़ता है…!

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माँ का श्राद्ध


एक दोस्त हलवाई की दुकान पर मिल गया। मुझसे कहा- ‘आज माँ का श्राद्ध है, माँ को लड्डू बहुत पसन्द है, इसलिए लड्डू लेने आया हूँ ‘

मैं आश्चर्य में पड़ गया। अभी पाँच मिनिट पहले तो मैं उसकी माँ से सब्जी मंडी में मिला था। मैं कुछ और कहता उससे पहले ही खुद उसकी माँ हाथ में झोला लिए वहाँ आ पहुँची। मैंने दोस्त की पीठ पर मारते हुए कहा- ‘भले आदमी ये क्या मजाक है? माँजी तो यह रही तेरे पास !

दोस्त अपनी माँ के दोनों कंधों पर हाथ रखकर हँसकर बोला, ‍’भई, बात यूँ है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोसकर उसे जीते-जी तृप्त करूँ। मैं मानता हूँ कि जीते जी माता-पिता को हर हाल में खुश रखना ही सच्चा श्राद्ध है।

आगे उसने कहा, ‘माँ को मिठाई,सफेद जामुन, आम आदि पसंद है मैं वह सब उन्हें खिलाता हूँ। श्रद्धालु मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाते हैं। मैं मंदिर नहीं जाता हूँ, पर माँ के सोने के कमरे में कछुआ छाप अगरबत्ती लगा देता हूँ।

सुबह जब माँ गीता पढ़ने बैठती है तो माँ का चश्मा साफ कर के देता हूँ। मुझे लगता है कि ईश्वर के फोटो व मूर्ति आदि साफ करने से ज्यादा पुण्य माँ का चश्मा साफ करके मिलता है।

यह बात श्रद्धालुओं को चुभ सकती है पर बात खरी है।हम बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते हैं। रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिए कि गाय-कौए को खिलाया ऊपर पहुँचता है या नहीं, यह किसे पता।

माता-पिता को जीते-जी ही सारे सुख देना वास्तविक श्राद्ध है॥

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चाहत पिया मिलन की


आज घर में सुबह से खूब चहल पहल थी । हो भी क्यूँ ना आख़िर इस घर की बेटी जो आ रही थी । इस बार शीतल दीदी और मनोज जीजा जी बहुत सालों के बाद इंडिया आ रहे है …. सोफ़े के कुशनों को ठीक करती हुई इन्दु पति अजय से बोलीं । हाँ तुम ठीक कह रही हो, दीदी लगभग दस साल के बाद आ रही है । जब बच्चे छोटे थे तब तो दो तीन बार आई थी । फिर बच्चे स्कूल जाने लगे, घर नौकरी खर्चे सब देखना पड़ता है । आख़िर हमारी तरह पति पत्नी वहाँ नौकरी ही तो करते हैं । अब बच्चे कमाने लगे हैं तो अब दीदी जीजा जी काफ़ी ख़ुद को चिन्ता रहित महसूस करते होंगे । वो तो है ,कह कर इन्दु रसोई में चली गई । थोड़ी देर में बाहर गाड़ी के हॉर्न से सब बाहर की ओर भागे ।

माँ शारदा जो सुबह से ही बेटी दामाद के आने का इन्तज़ार कर रही थी , आज उसके भी दर्द से भरे पाँवों में जान आ गई थी । बहुत प्यार से शीतल और मनोज सबसे मिले । देर रात तक इन्दु शीतल अजय बातें करते रहे । सुबह शीतल की आँख बहुत देर से खुली । बाहर उठकर आई तो दिसंबर की ठण्ड ने कंपकंपी छुड़वा दी । दीदी शाल ओढ़ लो और छत पर चले जाओ बड़ी अच्छी धूप निकल आई है… मैं चाय बनाकर उपर ही ले आऊँगी, दीदी को शाल ओढ़ाती इन्दु बोली । साथ बैठी माँ भी बोली हाँ हाँ ठीक कह रही है बहु उपर चली जा .. धूप के साथ साथ बहुत अच्छा तुझे एक सरप्राइज़ भी मिलेगा । सरप्राइज़!! कैसा सरप्राइज़ माँ ?? अरे कुछ ख़ास नहीं दीदी आप जाइये, इन्दु ने बात को बहुत हल्के में लेते हुए कहा । छत पर आकर शीतल इधर-उधर देखने लगी कि क्या बदलाव लाये हैं ये लोग उपर वाले हिस्से में लेकिन उसे तो कुछ भी नहीं दिखाई दिया । सामने पड़ी कुर्सी पर बैठकर आसपास के घरों को देखने लग गई । तभी शीतल ने गौर किया कि सामने जो ख़ाली प्लाट पड़ा था वहाँ एक आलीशान सुन्दर मकान बना हुआ था । शीतल उस घर को देख ही रही थी कि माँ उपर आ गई । माँ सामने वाला मकान तो बहुत सुंदर बनाया है किसी ने .. यही तो सरप्राइज़ है कहकर माँ अपने कमरे में चली गई । शीतल छत की छोर पर आकर दीवार पकड़ कर देखने लगी और सोचने लगीं .. माँ भी ना यह भी कोई सरप्राइज़ है । तभी शीतल की नज़र उस घर की महिला जो तार पर कपड़े सुखाने डाल रही थी उस पर पड़ी और वो उसको देखती ही रही । तभी वो महिला भी मुड़ी उसकी नज़र भी शीतल पर पड़ी तो वो ओर क़रीब आ गई । दोनों अपनी अपनी छत से एक दूसरे को साफ़ देख रही थी । बचपन की सहेलियाँ आज सालो के बाद एक दूसरे को देख रही थी । शीतल !! सन्ध्या !! दोनों एक साथ कहकर हंसने लगी । तू कब आई शीतल सच में तुझसे मिलने की बड़ी तमन्ना थी । तभी शारदा भी पीछे आकर खड़ी हो गई और कहने लगी यही सरप्राइज़ था और वो भी दोनों सहेलियों के लिए । शीतल शाम को घर आजा बैठते पहले की तरह फिर से एक बार संध्या ने आँखें मटकाते हुए कहा,शीतल ने भी मुस्कराते हुए हाँ मैं सिर हिलाया ।
शाम को शीतल एक सुन्दर सा तोहफ़ा लेकर संध्या के घर पहुँच गई। बरसो बाद दोनों सहेलियाँ बड़े प्यार से गले मिली । सामने ही संध्या की सासु माँ भी बैठी थी । संध्या ने शीतल का परिचय करवाते हुए कहा … अम्मा जी ये शीतल है मेरी बड़ी प्यारी सहेली, हम लोग पहली से बारहवीं कक्षा तक एक साथ थी । फिर मेरी शादी हो गई और ये कालेज पढ़ने दूसरे शहर चली गई । अब ये अमेरिका में रहती है । शीतल ने झुककर प्रणाम किया । अच्छा अच्छा !! बहुत ख़ुशी हुई मिलकर बेटा सदा ख़ुश रहो … तुम दोनों बैठकर बातें करो मैं चाय नाश्ते का बन्दोबस्त करती हूँ कहकर अम्मा रसोई घर की तरफ़ चल दी । थोड़ी देर में बहुत ही प्यारी नाज़ुक सी लड़की हाथ में पानी के दो गिलास लेकर आई , जिसने दोनों हाथों में लाल रंग का चूड़ा पहन रखा था । पानी मेज़ पर रखकर उसने शीतल के पाँव छूते हुए कहा पैरीपोणा आंटीजी!! शीतल ने दोनों हाथों से उसे उठाकर प्यार से उसके सिर पर हाथ रखते हुए प्रश्न भरी निगाहों से संध्या की ओर देखने लगी । ये छवि है हमारी बहुरानी , अभी दो हफ़्ते पहले ही शादी हुई है .. छवि बेटा तू जा जाकर पैकिंग कर मैं चाय बना लूँगी । छवि के जाने के बाद संध्या शादी की कहानी सुनाने लगी । मेरी दूर की रिश्तेदारी से है इसके पापा,पिछले पाँच साल से इसकी माँ कैंसर से लड़ रही थी । पिता की सारी जमा पूँजी माँ के इलाज में चली गई । बीमार माँ की बस यही तमन्ना की बेटी को दुल्हन के रूप में देख सके । इत्तफ़ाक़ से मेरा बेटा वरूण छुट्टी पर घर आया हुआ था । मेरी दीदी ने वरूण के लिए छवि के लिए पूछा तो हम सब गाड़ी करके छवि को देखने गये हमें लड़की बहुत पसन्द आई और बस वही चुनीं चढ़ाकर ले आये ।

शीतल -यह तुमने बहुत पुण्य का काम किया , अब कैसी है इसकी माँ ??
संध्या- वो तो दो दिन बाद ही चल बसी
शीतल – ओ नो तभी फूल सा चेहरा थोड़ा उदास लग रहा है
संध्या- हाँ वो तो है और फिर साथ में कल वरूण वापिस जा रहा है मुम्बई उसकी छुट्टी ख़त्म हो गई
शीतल- और ये??
ये यही हमारे पास रहेगी झट से दूसरी ओर से आती संध्या कीं सासु माँ बोली । उनकी बात सुनकर शीतल बोली , अभी वरूण के पास पत्नी को रखने का उचित प्रबंध नहीं होगा वहाँ ?? उस बात पर संध्या झट से बोली, नहीं हमारा बेटा तो बहुत बड़े ओहदे पर लगा है यहाँ तक कि दो बेडरूम का फ़्लैट भी कम्पनी ने दिया हुआ है । शीतल थोड़ा सोच कर फिर बोली.. बहू घर के काम वग़ैरह नहीं जानती होगी ?? काम की तो तुम पूछो ही मत हर काम में निपुण हैं, रसोई सम्भालने से लेकर पुरा घर सम्भालने तक , माँ कीं बीमारी यही तो थी जो सबका ख़्याल रख रही थी , बहू की तारीफ़ों के पुल बांधती हुईं संध्या बोली । शीतल को सोचो में डूबा देख सासु माँ झट से बोली… बेटा ये रिवाज है नई बहू कुछ दिन ससुराल रहती है फिर आयेगा जब अगली बार तो ले जायेगा अपनी बीवी को । अब शीतल कहे बिना रह ना पाई , ये कैसा रिवाज है आंटीजी जो ख़ुशी देने की बजाय उदास ही कर दे । शादी के बाद पति पत्नी के जीवन का सबसे सुनहरा समय होता है । एक दूसरे के साथ मौज मस्ती का ही नहीं बल्कि एक दूसरे को अच्छे से समझने का भी .. आप को इसे साथ भेज देना चाहिए । इन्हें एक दूसरे से दूर रखना सही नहीं है ।शीतल ने संध्या की ओर देखते हुए बोला बहू ना सही एक बार अपने बेटे की आँखों में झांक कर देख लेना कि उसकी चाहत क्या कहतीं हैं । थोड़ी देर में शीतल चली गई । अगले दिन शीतल बाहर भाभी के साथ खड़ी गली में सब्ज़ी ख़रीद रही थी तो उसने देखा कि गाड़ी में नौकर सामान रख रहा है । फिर सब लोग भी बाहर आ गये हैं । वरूण माता-पिता दादी से आशीर्वाद ले रहा है । तभी शीतल एकदम से एक टक देखती रही ये क्या !! यह तो बहुरानी भी पीछे पीछे सबके पाँव छू रही हैं । पाँच मिनट में वो दोनों निकल गये । संध्या सामने खड़ी शीतल को मुसकरा कर देखने लगी और फिर आकर उसके पास आकर बोली …. तू सही कह रही थी उदास तो मेरा बेटा भी था । मैंने अपने पति को तुम्हारा विचार बताया तो उन्होंने कहा ठीक ही तो कह रही है तुम्हारी दोस्त ख़ुशी पहले हैं रिवाज बाद मे है और ये रिवाज तो मुझे पहले भी कभी समझ नहीं आये ।हमारे पास बाद में रह लेगी अभी इसे वरूण के साथ भेज देते हैं । अम्मा भी इनके आगे कुछ बोल ना पाई और बेटे ने आते जाते हमारी बातें सुनकर टिकट भी बुक करवा ली ।सच में शीतल तू जैसे हमारे घर में कल इन दोनों की चाहत बनकर ही आई थी बस ऐसे ही हर किसी के जीवन में ख़ुशियाँ बिखेरती रहना । ❤️

🪷🪷परेषक: डॉ दर्शन बांगिया🪷🪷