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आखिरी प्रयास

किसी दूर गाँव में एक पुजारी रहते थे जो हमेशा धर्म कर्म के कामों में लगे रहते थे।
एक दिन किसी काम से गांव के बाहर जा रहे थे तो अचानक उनकी नज़र एक बड़े से पत्थर पे पड़ी। तभी उनके मन में विचार आया कितना विशाल पत्थर है क्यूँ ना इस पत्थर से भगवान की एक मूर्ति बनाई जाये।
यही सोचकर पुजारी ने वो पत्थर उठवा लिया।

गाँव लौटते हुए पुजारी ने वो पत्थर के टुकड़ा एक मूर्तिकार को दे दिया जो बहुत ही प्रसिद्ध मूर्तिकार था।

अब मूर्तिकार जल्दी ही अपने औजार लेकर पत्थर को काटने में जुट गया।
जैसे ही मूर्तिकार ने पहला वार किया उसे एहसास हुआ की पत्थर बहुत ही कठोर है।
मूर्तिकार ने एक बार फिर से पूरे जोश के साथ प्रहार किया लेकिन पत्थर टस से मस भी नहीं हुआ।

अब तो मूर्तिकार का पसीना छूट गया वो लगातार हथौड़े से प्रहार करता रहा लेकिन पत्थर नहीं टूटा।

उसने लगातार 99 प्रयास किये लेकिन पत्थर तोड़ने में नाकाम रहा।

अगले दिन जब पुजारी आये तो मूर्तिकार ने भगवान की मूर्ति बनाने से मना कर दिया और सारी बात बताई।
पुजारी जी दुखी मन से पत्थर वापस उठाया और गाँव के ही एक छोटे मूर्तिकार को वो पत्थर मूर्ति बनाने के लिए दे दिया।

अब मूर्तिकार ने अपने औजार उठाये और पत्थर काटने में जुट गया, जैसे ही उसने पहला हथोड़ा मारा पत्थर टूट गया क्यूंकि पत्थर पहले मूर्तिकार की चोटों से काफी कमजोर हो गया था।
पुजारी यह देखकर बहुत खुश हुआ और देखते ही देखते मूर्तिकार ने भगवान की बहुत सुन्दर मूर्ति बना डाली।

पुजारी जी मन ही मन पहले मूर्तिकार की दशा सोचकर मुस्कुराये कि उस मूर्तिकार ने 99 प्रहार किये और थक गया, काश उसने एक आखिरी प्रहार भी किया होता तो वो सफल हो गया होता।

👉मित्रों यही बात हर इंसान के दैनिक जीवन पे भी लागू होती है, बहुत सारे लोग जो ये शिकायत रखते हैं कि वो कठिन प्रयासों के बावजूद सफल नहीं हो पाते लेकिन सच यही है कि वो आखिरी प्रयास से पहले ही थक जाते हैं। लगातार कोशिशें करते रहिये क्या पता आपका अगला प्रयास ही वो आखिरी प्रयास हो जो आपका जीवन बदल दे।

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Car Accident
A woman and a man are involved in a car accident; it’s a bad one. Both of their cars are totally demolished but amazingly neither of them are hurt.
After they crawl out of their cars, the woman says, “So you’re a man; that’s interesting. I’m a woman. Wow, just look at our cars! There’s nothing left, but fortunately we are unhurt. This must be a sign from God that we should meet and be friends and live together in peace for the rest of our days.”
Flattered, the man replied, “Oh yes, I agree with you completely! This must be a sign from God!”
The woman continued, “And look at this, here’s another miracle. My car is completely demolished but this bottle of wine didn’t break. Surely God wants us to drink this wine and celebrate our good fortune.”
Then she hands the bottle to the man. The man nods his head in agreement, opens it and drinks half the bottle and then hands the it back to the woman. The woman takes the bottle, immediately puts the cap back on, and hands it back to the man.
The man asks, “Aren’t you having any?”
The woman replies, “No. I think I’ll just wait for the police.”

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एक प्रेरक कहानी प्रस्तुत है जो भारत -दर्शन से ली गई है 🙏

संसाधन और ज्ञान
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एक बार एक राजा ने प्रसन्न होकर एक लकड़हारे को एक चंदन का वन (चंदन की लकड़ी का जंगल) उपहार स्वरूप दिया।
लकड़हारा ठहरा साधारण मनुष्य! वह चंदन की महत्ता और मूल्य से अनभिज्ञ था। वह जंगल से चंदन की लकड़ियां लाकर उन्हें जलाकर भोजन बनाने के लिये प्रयोग करने लगा।
राजा को अपने गुप्तचरों से यह बात पता चली तो उसकी समझ में आया कि संसाधन का उपयोग करने हेतु भी बुद्धि व ज्ञान आवश्यक है।
यही कारण है कि लक्ष्मी जी (धन की प्रतीक देवी) और श्री गणेश जी (ज्ञान के प्रतीक देव) की एक साथ पूजा की जाती है ताकि व्यक्ति को धन के साथ-साथ उसे प्रयोग करने का ज्ञान भी प्राप्त हो।

[ भारत-दर्शन संकलन ]

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कर्म और भाग्य


एक बार एक धनी व्यक्ति मंदिर जाता है। पैरों में महँगे और नये जूते होने पर सोचता है कि क्या करूँ? यदि बाहर उतार कर जाता हूँ तो कोई उठा न ले जाये और अंदर पूजा में मन भी नहीं लगेगा, सारा ध्यान जूतों पर ही रहेगा।

उसे मंदिर के बाहर एक भिखारी बैठा दिखाई देता है। वह धनी व्यक्ति भिखारी से कहता है-
“भाई मेरे जूतों का ध्यान रखोगे?
जब तक मैं पूजा करके वापस न आ जाऊँ”,
भिखारी हाँ कर देता है।

अंदर पूजा करते समय धनी व्यक्ति सोचता है कि
“हे प्रभु आपने यह कैसा #असंतुलितसंसार बनाया है? किसी को इतना धन दिया है कि वह पैरों तक में महँगे जूते पहनता है तो किसी को अपना पेट भरने के लिये भीख तक माँगनी पड़ती है”। कितना अच्छा हो कि #सभीएकसमानहो_जायें।

वह धनिक निश्चय करता है कि वह बाहर आकर उस भिखारी को 100 का एक नोट देगा।

बाहर आकर वह धनी व्यक्ति देखता है कि वहाँ न तो वह भिखारी है और न ही उसके जूते।

धनी व्यक्ति ठगा सा रह जाता है। वह कुछ देर भिखारी का इंतजार करता है कि शायद भिखारी किसी काम से कहीं चला गया हो, पर वह नहीं आया। धनी व्यक्ति दुखी मन से नंगे पैर घर के लिये चल देता है।

रास्ते में थोड़ी दूर फुटपाथ पर देखता है कि एक आदमी जूते चप्पल बेच रहा है। धनी व्यक्ति चप्पल खरीदने के उद्देश्य से वहाँ पहुँचता है, पर क्या देखता है कि उसके जूते भी वहाँ बेचने के लिए रखे हैं तो वह अचरज में पड़ जाता है फिर वह उस फुटपाथ वाले पर दबाव डालकर उससे जूतों के बारे में पूछता है तो वह आदमी बताता है कि एक भिखारी उन जूतों को 100 रु. में बेच गया है।

धनी व्यक्ति वहीं खड़े होकर कुछ सोचता है और मुस्कराते हुये नंगे पैर ही घर के लिये चल देता है। उस दिन धनी व्यक्ति को उसके कई सवालों के जवाब मिल गये थे-

  1. “समाज में कभी एकरूपता नहीं आ सकती, क्योंकि हमारे #कर्म कभी भी एक समान नहीं हो सकते और जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन संसार की सारी विषमतायें समाप्त हो जायेंगी।”
  2. ईश्वर ने हर एक मनुष्य के भाग्य में लिख दिया है कि किसको कब और कितना मिलेगा, पर यह नहीं लिखा कि वह कैसे मिलेगा। यह हमारे #कर्म तय करते हैं। जैसे कि भिखारी के लिये उस दिन तय था कि उसे 100 रु. मिलेंगे, पर कैसे मिलेंगे?
    यह उस भिखारी ने अपने #कर्म द्वारा तय किया।
  3. हमारे #कर्म ही हमारा भाग्य,

यश_अपयश,

लाभ_हानि.

जय_पराजय,

दुःख_शोक,

लोक_परलोक तय करते हैं।

हम इसके लिये #ईश्वर को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं।

Posted in बॉलीवुड - Bollywood

बॉलीवुड एक्टर नसीरुद्दीन शाह मूल रूप से अफगानिस्तान के हैं, लेकिन उनके पिता और दादा अंग्रेजी हुकुमत के समय भारत में बतौर सरकारी मुलाजिम काम करते थे।

नसीरुद्दीन शाह के पूर्वज ने जंग-ए-आज़ादी को कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ दिया था। बदले में अंग्रेजो ने “खुश” होकर उनके दादा को मेरठ की जागीर सौंप दी थी।

नसीरुद्दीन शाह के पिता मोहम्मद शाह ने नायब तहसीलदार से सरकारी नौकरी की शुरुआत की थी। उनके दादा आग़ा सैय्यद मोहम्मद शाह अफ़ग़ानिस्तान से थे और पेशे से फ़ौजी थे।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ों की तरफ़ से उनके दादा लड़े थे और जंग में उनकी क़ाबिलियत से खुश होकर उन्हें मेरठ के करीब एक जागीर दी गई थी। इसे सरधना जागीर कहा जाता था। जागीर के साथ ही आग़ा सैय्यद मोहम्मद शाह को ब्रिटिश सरकार ने ‘नवाब जान फिशानी’ की उपाधि भी दी थी।

पाकिस्तान बनने के बाद, नसीरुद्दीन शाह के बाप-दादा ने भारत में रहने का फैसला किया। नसीरुद्दीन शाह अब एनआरसी का विरोध कर रहे हैं।
शोभना राष्ट्रवादी

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एक बार मैं बैंगलोर अपने दोस्त के साथ होटल में खाने को गया था.

तो, कर्नाटक में वहाँ का ट्रेडिशनल भोजन इडली, डोसा , उत्पम, बिसबेला भात आदि ही होते हैं.

अब हमलोग ठहरे खांटी नार्थ इडियन… जो, पूरी सब्जी, लिट्टी आदि खा कर ऊब चुके होते हैं.

तो, हमलोगों ने होटल में बैठते ही वहाँ का “सेट डोसा” ऑर्डर किया.

चूंकि, वो बड़ा होटल था तो वहीं टेबल पर कांटा-चम्मच आदि रखा हुआ था.

डोसा टेबल पर आते ही मित्र ने बहुत तरीके से दो चम्मच उठाया (जिसमें से एक नार्मल और एक फोर्क (कांटे वाला) चम्मच था.

फिर, मित्र एक चम्मच से डोसा को दबाए और दूसरे से उसे काटे… उसके बाद उसे सांभर और चटनी में बारी बारी से डूबा कर खाये.

जबकि, मैंने डोसा को मोड़ा और हाथ से तोड़कर दे दनादन खा गया..

जितने समय में मेरा खाना खत्म हो गया उतने समय में मित्र कांटे चम्मच से आधा डोसा खाने में ही मशक्कत कर रहा था.

उसके बाद मैंने उस पर झुंझालते हुए कहा कि … अबे, हाथ से खाओ न ढंग से…!
क्या कांटे चम्मच का चूसियापा फैलाये हुए हो ???

मेरी आपत्ति के बाद उसने मुझे कुपित नजर से देखा फिर वो भी हाथ से खा कर खत्म किया.

उसके बाद घर लौटने तक मैं रास्ते भर यही सोचता रहा कि… साला, ये कांटे चम्मच का उपयोग आखिर किसने और कब शुरू किया होगा.

फिर , कड़ी से कड़ी जोड़कर लॉजिक लगाने पर मुझे इसका जबाब समझ आ गया.

दरअसल, खाने में कांटे चम्मच का इसका उपयोग समझने से पहले हमें इसका शुरुआती प्रयोग समझना होगा कि आखिर ये शुरू ही क्यों हुआ ???

इस बात से शायद ही किसी को इनकार होगा कि “कांटे-चम्मच से खाना खाना एक पश्च्यात सभ्यता का अंग है”.

इसीलिए, इस संबंध में कुछ समझने से पहले हमें ये समझना होगा कि आखिर ये “पश्चिमी देशों” में ही क्यों शुरू हुए .

तो, इस बात का एकदम सामान्य सा जबाब है कि “ठंड”.

जी हाँ, ठंड के कारण ही पश्चिमी देशों में लोग दिन भर दिन भर गर्म कपड़ा पहने रहते हैं जिस कारण उन्हें भारतीय स्टाइल के शौचालय जाने में काफी परेशानी होती है क्योंकि, भारतीय स्टाइल के कमोड में लोगों को नीचे बैठना होता है… जो, पैंट शर्ट/जीन्स पैंट पहने लोगों के लिए किसी टास्क से कम नहीं है.

इससे निजात पाने के लिए उन्होंने “वेस्टर्न स्टाइल” का कुर्सी नुमा कमोड प्रयोग में लाना शुरू कर दिया जिसमें कि पैंट या जींस पहने हुए भी लोग आराम से बैठ सकते थे.

लेकिन, उसके बाद भी उन्हें समस्या बनी रही कि शौच के बाद उन्हें धोने में परेशानी होने लगी जिसका एक कारण तो पानी का बेहद ठंड होना था और दूसरा उनका पैंट पहने होना था.

इसका उपाय उन्होंने निकाला कि धोओ ही मत… सिर्फ “कागज से पोछ लो”.

अब कागज से पोछने पर दिक्कत ये हो गई कि फिर उन्हें अपने उन्हीं हाथों से “खाना भी खाना पड़ता था” जिस हाथ से उन्होंने अपना टॉयलेट पोछा था.

इसीलिए, उन्होंने हाइजीन मेंटेन रखने के लिए खाने के लिए हाथ का प्रयोग मिनिमम कर दिया…
और, खाने के लिए चम्मच (कांटे-चम्मच) का प्रयोग करने लगे.

समय बीतता गया और अंग्रेज भारत में शासक के रूप में स्थापित हो गए…!

तो, जो बड़े-बड़े नौकरशाह , पैसे वाले लोग और अंग्रेजों के चाटुकार जो अंग्रेजों के सीधे संपर्क में थे… उन्होंने अंग्रजों को कांटे-चम्मच से खाते देखा….
और, उन्होंने बिना इसकी सच्चाई जाने ही इसे स्टेटस सिंबल मान लिया और खुद भी वैसा ही करने लगे…!

चूंकि, अंग्रेजों का नकल कर कांटे-चम्मच से खाने वाले लोग… तत्कालीन समाज के बड़े और प्रभावशाली लोग थे….
इसीलिए, सामान्य जनता भी खाने के उस स्टाइल को स्टेटस सिंबल मानने लगी और उसका नकल करने लगी.

लेकिन, आज आप निष्पक्ष भाव से सोचें कि हम हिन्दू जो नित्यक्रिया के बाद साबुन से हाथ धोने से लेकर नहाने तक की प्रक्रिया का पालन करते हैं…. उन्हें सच में कांटे चम्मच से खाने की जरूरत है क्या ???

क्या हम बिना-वजह ही किसी से बहुत जल्दी प्रभावित होकर उसकी नकल नहीं करने लगते हैं…???

बात तो ये सब बहुत सामान्य ही है लेकिन, मेरे ख्याल से किसी बात की वैज्ञानिकता और प्रासंगिकता समझे बिना ही आंख बंद कर उसकी नकल करना बेवकूफी की श्रेणी में आता है ना कि आधुनिकता की श्रेणी में…!

जय महाकाल…!!!

नोट : लोगों की जरूरत किस तरह धीरे-धीरे आदत में परिवर्तित हो जाती है इसका सबसे अच्छा उदाहरण मलेच्छ समुदाय है जिनके पूर्वजों ने अरब में पानी की कमी के कारण “टोंटी वाला लोटा” इस्तेमाल में लाया होगा ताकि उससे पानी कम गिरे…!

लेकिन, मूर्ख कटेशर बिना उसकी वैज्ञानिकता और प्रासंगिकता समझे ही आज भी हिंदुस्तान में “उसी टोंटी वाले लोटे” का प्रयोग करते हैं… भले ही वे पानी के बहुतायत से आई बाढ़ के कारण डूब के ही क्यों ना मर जाएँ..!!

कुमार सतीश

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मुर्ख पडोसी


प्राचीन भारत में, एक बहुत ही दयालु व्यापारी रहता था। वह निर्धन लोगों को पैसे दान करता था और अपने दोस्तों की हमेशा मदद करता था। उस व्यापारी ने एक दिन अपना सारा पैसा और पैसे के साथ अपनी ख्याति भी खो दी। उसके दोस्त उसे अनदेखा करने लगे। इन सबसे तंग आकर एक रात उसने सोचा, “मैंने सब कुछ खो दिया, कोई मेरे साथ नहीं है। मुझे मर जाना चाहिए।”

यह सोचते सोचते उसे गहरी नींद आ गई। सोते हुए उसने एक सपना देखा। सपने में एक भिक्षु ने उससे कहा, “कल मैं तुम्हारे द्वार पर आऊंगा। तुम्हें मेरे सिर पर लाठी से चोट करनी होगी। मैं सोने की मूर्ति में बदल जाऊंगा।” लगभग सुबह हो चुकी थी। व्यापारी जागा और सपने के बारे में सोचने लगा।

फिर कुछ समय बाद, एक भिक्षु ने घर के दरवाजे पर दस्तक दी। व्यापारी ने भिक्षु को अंदर बुलाया। व्यापारी ने भिक्षु के सिर पर लाठी से वार किया और भिक्षु तुरंत ही सोने की मूर्ति में बदल गया। पास से ही एक पड़ोसी जा रहा था उसने यह सब देख लिया।

लालची पड़ोसी ने व्यापारी की नकल करने का फैसला लिया। अगले दिन पड़ोसी एक आश्रम में गया और कुछ भिक्षुओं से एक कठिन पुस्तक को समझाने के लिए अपने घर पर आने का आग्रह किया। भिक्षुओं ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया।

अगले दिन कई भिक्षु उस पड़ोसी के घर आए। उसने अपने घर का द्वार बंद कर दिया और भिक्षुओं के सिर पर लाठी से प्रहार करना शुरू कर दिया। जब एक भी भिक्षु सोने की मूर्ति में नहीं बदला तो पड़ोसी निराश हो गया।

पड़ोसी को भिक्षुओं पर हमला करने के अपराध में बंदी बना लिया गया। पड़ोसी ने अपने कृत्य के लिए व्यापारी को दोषी ठहराया। राजा ने व्यापारी को राजदरबार में बुलाया। व्यापारी ने राजा को अपने सपने के बारे में सब कुछ बता दिया। उसने कहा, “महाराजा, मैंने पड़ोसी से भिक्षुओं पर हमला करने के लिए नहीं कहा। पड़ोसी को यह मूर्खता करने से पहले इसके दुष्परिणामों के बारे में सोचना चाहिए था।”

राजा व्यापारी की बात से सहमत था अत‌‌: उसने व्यापारी को मुक्त कर दिया और सैनिकों से मूर्ख पड़ोसी को कारागार में डालने का आदेश दिया।

बिना सोचे समझे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।

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एक आदमी और उसकी पत्नी शादी की वर्षगांठ मनाने के लिए ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे🤔

फ़्लाइट के दौरान अचानक माइक पर पायलट की आवाज़ गूंजी:-
लेडीज़ एंड जेंटलमैन,मुझे बड़े दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि प्लेन के दोनों इंजन फ़ेल हो गए हैं🤔
मैं इमरजेंसी लैंडिंग की कोशिश कर रहा हूं। मुझको एक अनजाना वीरान द्वीप दिखाई दे रहा है,मैं उस पर प्लेन उतारने जा रहा हूं…..
इसके बाद यह भी हो सकता है कि हम ज़िंदगी भर के लिए वहीं फंस कर रह जाएंगे😎

प्लेन सुरक्षित ढंग से टापू पर उतार दिया गया

कुछ देर बाद उस आदमी ने अपनी डरी सहमी पत्नी से पूछा:- तुमने मेरे क्रेडिट कार्ड के सब ड्यूज़ जमा करा दिए थे ना❓😎

I’m sorry. मैं चेक जमा करना भूल गई..पत्नी बोली

कोई बात नहीं🤔क्या तुमने कार लोन की मासिक क़िस्त का चेक दे दिया था❓🤔 आदमी ने पूछा

पत्नी रुआंसी हो गईं और डर के मारे कांपते हुए लहजे में बोली:- मुझे माफ़ कर दीजिए,मैं ये चेक भी जमा करना भूल गई थी😭
अब आदमी ने ख़ुशी से झूमते हुए अपनी पत्नी को बांहों में भर लिया और दनादन उसको चूमने लगा😀

पत्नी डर के मारे ज़ोर लगा कर उस आदमी की बांहों के घेरे से निकल गई और चिल्लाई:-
आप पागल हो गए हैं क्या❓😎ऐसे हालात में भी कोई खुश होता है क्या….❓😎

जवाब में आदमी चिल्लाया:-
हम बच गए….जानेमन, हम बच गए…ये बैंक वाले हमें हर हाल में ढूंढ निकालेंगे 😀😀😀

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असली ख़ुशी


नीलेश और कमल दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। पर दोनों के स्वभाव में बहुत अंतर था। जहां कमल शांत स्वभाव का था, वहीं नीलेश को हर समय कोई ना कोई शरारत सूझते रहती थी। पढ़ाई में उसका मन ही नहीं लगता था। वहीँ कमल पढ़ाई में अव्वल था। शिक्षक के हर सवालों का जवाब वह फट्ट से दे देता था। नीलेश को इसी चीज की तकलीफ थी। खुद पढ़ाई में ध्यान ना लगा कर कमल के हर क्रियाकलापों की कॉपी करना ही उसका काम था। कैसे उसे पीछे धकेले और नीचा दिखाए, बस इसी चक्कर में वह हमेशा लगा रहता था। इन सबके बीच में इसका सबसे बुरा असर उसकी खुद की पढ़ाई पर पड़ रहा था।

इसी तरह एक बार लंच टाइम में जब कमल थोड़ी देर के लिए कक्षा से बाहर गया तो नीलेश ने उसके स्कूल बैग से विज्ञान की कॉपी चुरा ली। ताकि जब शिक्षक उससे कुछ पूछे तो वह जवाब देने की स्थिति में ना हो। हुआ भी वही शिक्षक की खूब डांट पड़ी कमल को। निलेश तो मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।

हर समय नीलेश मौके की ताक में रहता कि कैसे कमल को परेशान करें। एक तरह से वह कमल की वजह से हीन भावना का शिकार भी होते जा रहा था। उसे लगता था कि वह कभी पढ़ाई नहीं कर पाएगा। कभी कमल का पेन गायब कर देता तो कभी लंच बॉक्स में खाना ही नहीं रहता। कमल को परेशान देखकर उसे बड़ी खुशी होती थी। धीरे-धीरे उसकी शरारत और हीन भावना दोनों ही बढ़ने लगे। क्लास के दूसरे बदमाश लड़कों से भी उसकी दोस्ती हो गई थी जो उसे हर समय उकसाते रहते थे ।

नीलेश की एक दोस्त थी रितिका जिसकी हर बात वह मानता था। नीलेश की हरकतों को देखकर रितिका को बड़ी तकलीफ हो रही थी, उसने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, पर वह हीन भावना का ऐसा शिकार हुआ था कि निकल ही नहीं पा रहा था।

देखते-देखते परीक्षाएं नजदीक आ गयीं। निलेश की पूरी कोशिश थी कि इस बार कमल को पहले रैंक पर नहीं आने देगा। अचानक कुछ उड़ती हुई खबर मिली उसे। उसके कुछ उद्दंड दोस्तों ने एग्जाम के पेपर चुरा लिए और नीलेश को दे दिया। नीलेश की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। अब तो इस बार वह अव्वल आकर ही रहेगा। परीक्षाएं खत्म हो गई और कुछ दिन के बाद रिजल्ट भी आ गया। अपनी कक्षा में वह सबसे अव्वल था। उसने कमल की तरफ विजयी मुस्कान से देखा। आज उसने कमल को पीछे छोड़ दिया था। कमल को अपने कम नंबरों से थोड़ी निराशा जरूर थी पर वह हारा नहीं था। उसने नीलेश को उसके सफलता पर बहुत बधाई दी और उसे गले लगा लिया।

नीलेश असमंजस में पड़ गया, क्या करे क्या ना करे, अपने स्वभाव पर रोए या कमल की अच्छाई पर खुश हो। जिस लड़के को उसने परेशानी के सिवा कुछ ना दिया था, आज वही उसे उसकी सफलता पर बधाई दे रहा था। पल भर में ही उसकी जीत की खुशी काफूर हो गई और आईने की तरह उसके कारनामे सामने दिखने लगे।

बेईमानी से लायी गयी रैंक पर उसे अब बड़ी शर्मिंदा हो रही थी, सामने रखे अच्छे अंक भी उसे बार-बार उसकी गलतियों का एहसास करा रहे थे। उसकी आंखों के कोरों से शर्मिंदगी के आंसू बहने लगे और अपनी गलतियों को सुधारने का मौका सूझने लगा। उसने मन में ठान लिया कि वह कमल से अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगेगा और शिक्षक के सामने अपनी चोरी भी कुबूल करेगा, चाहे उसे स्कूल से निकलना ही क्यों ना पड़े।

तभी सर ने आवाज दी, “नीलेश यहाँ आओ, तुम्हारी क्लास में फर्स्ट रैंक आई है, मैं तुमसे बहुत खुश हूँ, बताओ तुमने ये सफलता कैसे हासिल की?”

नीलेश बड़ा असमंजस में था, समझ में ही नहीं आ रहा था कि हंसे या रोए। सामपेपर ने मार्कशीट पड़ी हुई थी, जिसमें हर विषयों में उसे सबसे अधिक नंबर मिले थे पर उसे वह खुशी नहीं मिल पा रही थी जो अच्छे अंक मिलने पर होती है।

नीलेश दबे क़दमों से ब्लैक बोर्ड के सामने पहुंचा-

“सर, फर्स्ट रैंक मेरी नहीं कमल की आई है, मैं आप सभी से माफ़ी मांगता हूँ… मैंने चीटिंग की है, कमल को नीचा दिखाने के लिए मैंने पेपर आउट करा दिया था।

सर, आप इसकी जो चाहे वो सजा मुझे दे सकते हैं। कमल, I am really sorry! मैंने हमेशा तुम्हे परेशान करता रहा पर आज तुमने ही मुझे गले लगा कर बधायी दी।”

और ये कहते-कहते नीलेश की आँखों में आँसू आ गए।

क्लास के सबसे शरारती बच्चे को इस तरह टूटता देख सभी भावुक हो गए, रितिका और कमल फ़ौरन उसके पास पहुंचे और उसका हाथ थाम लिया।

स्कूल मैनेजमेंट ने भी नीलेश का पश्चाताप बेकार नहीं जाने दिया और पुनः परीक्षा ले उसे पास कर दिया।

अब नीलेश समझ चुका था कि बेईमानी से पायी गयी सफलता कभी ख़ुशी नहीं दे सकती, असली ख़ुशी ईमानदारी और सच्चाई के रास्ते पर चल कर ही पायी जा सकती है।

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खोटा सिक्का: ठाकुर जी प्यारा भक्त


ठाकुर जी का एक बहुत प्यारा भक्त था, जिसका नाम अवतार था। वह छोले बेचने का काम करता था, उसकी पत्नी रोज सुबह सवेरे उठ छोले बनाने में उसकी सहायता करती थी। एक बार की बात है एक भिखारी जिसके पास खोटे सिक्के थे उसको सारे बाजार में कोई वस्तु नहीं देता था तो वह अवतार के पास छोले लेने आता है! अवतार ने खोटा सिक्का देखकर भी उस भिखारी को छोले दे दिए। ऐसे ही चार-पांच दिन उस भिखारी ने अवतार को खोटे सिक्के देकर छोले ले लिए और उसके खोटे सिक्के चल गए! धीरे-धीरे सारे बाजार में यह बात फैल गयी की अवतार तो खोटे सिक्के भी चला लेता हैं! लोग उसे मूर्ख कहने लगे और कुछ उसे समझाने लगे पर अवतार लोगों की बात सुनकर कभी जवाब नहीं देते थे। अपने ठाकुर की मौज में खुश रहते थे! एक बार जब अवतार पाठ पढ़ कर उठे तो अपनी पत्नी से बोले क्या छोले तैयार हो गए?
पत्नी बोली आज तो घर में हल्दी मिर्च नहीं थी और मैं बाजार से लेने गयी तो सब दुकानदारों ने कहा कि यह तो खोटे सिक्के हैं और उन्होंने सामान नहीं दिया!
पत्नी के शब्द सुनकर अवतार ठाकुर की याद में बैठ गए और बोले जैसी तेरी इच्छा मेरे स्वामी ! तुम्हारी लीला कौन जान सका हैं!
तभी आकाशवाणी हुई क्यों अवतार तू जानता नहीं था कि यह खोटे सिक्के हैं!
अवतार बोला ठाकुर जी मै जानता था!
ठाकुर जी ने कहा फिर भी तूने खोटे सिक्के ले लिए ऐसा क्यूँ किया भले मानुष?
अवतार बोला हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया, कि जब मैं आपकी शरण मे आऊँ तो आप मुझे अपनी शरण से नकार ना दें! क्योंकि आप तो खरे सिक्के ही लेते हो आप स्वयं सब जानते हो ! खोटे सिक्कों को भी आपकी शरण मे जगह मिल सकें!
थोड़ी देर में दूसरी आकाशवाणी हुई हे भले मानुष ! तेरा भोलापन तेरा प्यार स्वीकार है मुझे। तू ठाकुर का खोटा सिक्का नहीं खरा सिक्का हैं!