Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक साधु व एक डाकू एक ही दिन मरकर यमलोक पहुंचे. धर्मराज उनके कर्मों का लेखा-जोखा खोलकर बैठे थे और उसके हिसाब से उनकी गति का हिसाब करने लगे.
.
निर्णय करने से पहले धर्मराज ने दोनों से कहा- मैं अपना निर्णय तो सुनाउंगा लेकिन यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो मैं अवसर देता हूं, कह सकते हो.
.
डाकू ने हमेशा हिंसक कर्म ही किए थे. उसे इसका पछतावा भी हो रहा था. अतः अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला महाराज ! मैंने जीवन भर पापकर्म किए. जिसने केवल पाप ही किया हो वह क्या आशा रखे. आप जो दंड दें, मुझे स्वीकार है.
.
डाकू के चुप होते ही साधु बोला महाराज ! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है. मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला. सदैव सत्कर्म ही किए इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का शीघ्र प्रबंध करें.
.
धर्मराज ने दोनों की बात सुनी फिर डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो. डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली.
.
यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति जताते हुए कहा- महाराज ! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा. मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निरर्थक हो जाएगा. मेरे पुण्य कर्मों का उचित सम्मान नहीं हो रहा है.
.
धर्मराज को साधु की बात पर बड़ा क्षोभ हुआ. वह क्षुब्ध होकर बोले- निरपराध व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला डाकू मर कर इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है.
.
तुम वर्षों के तप के बाद भी अहंकार ग्रस्त ही रहे. यह नहीं जान सके कि सब में एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है. तुम्हारी तपस्या अधूरी और निष्फल रही. अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो, और तप को पूर्ण करो.

उसी तपस्या में फल है, जो अहंकार रहित होकर की जाए. अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश्वर प्राप्ति का आधार बनता है. झूठे दिखावे तप नहीं हैं, ऐसे लोगों की गति वही होगी जो साधु की हुई….

Posted in हिन्दू पतन

यह जानना आवश्यक है की #रामायण के प्रसिद्ध नगर जैसे #अयोध्या, #चित्रकूट, #किष्किंधा इन सभी का बाद में क्या हुआ ?

ऐसा इसलिए ताकि हम भी यहूदियों की तरह खुद पर हुए अत्याचारों को याद रखे…

🔸1. #अयोध्या :- श्री राम और रघुवंश की राजधानी, सन 1270 में इस पर मुस्लिम आक्रमणकारी बलबन ने आक्रमण किया। बलबन ने अयोध्या के सभी मंदिर नष्ट कर दिये, जिस नगरी में रामराज्य की नींव रखी गयी उसी नगरी के बीच चौराहे पर महिलाओ और बच्चों की आपत्तिजनक स्थिति में नीलामी हुई। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा इन मंदिरों का पुनः निर्माण हुआ।

🔸2. #गंगा_नदी_का_तट :- यह वो तट था जिसके पास श्री राम ने ताड़का वध करके ऋषियों का उद्धार किया था। सन 1760 के समय जब अहमदशाह अब्दाली भारत मे घुस गया और भारत के मुसलमानो ने उसे गंगा नदी तक पहुँचाने में मदद की। तब मराठाओ को जलाने के लिये अब्दाली ने 1 हजार गायों का सिर काटकर इसी गंगा नदी में बहाया।

🔸3. #चित्रकूट :- वनवास के समय श्री राम चित्रकूट में रुके थे जिस पर 1298 में अलाउद्दीन खिलजी ने कब्जा कर लिया। 5 हजार पुरुष मार दिए गए, हजारों स्त्रियों को अलाउद्दीन खिलजी के हरम में भेजा गया और मंदिर नष्ट कर दिए गए। 1731 में राणोजी सिंधिया पुनः इस नगरी का उद्धार किया।

🔸4. #नासिक :- वह स्थान जहाँ लक्ष्मण जी ने शूर्पणखा की नाक काटी थी तथा जो श्री राम की कर्मभूमि थी। इस पर मुहम्मद बिन तुगलक ने हमला किया, तुलगक ने नासिक में स्थित प्रभु श्री राम द्वारा बनाये गए शिवालय में आग लगा दी और 12 दिनों तक भीषण संहार किया। नासिक वासियों से अपील की गयी कि वे इस्लाम अपना ले या मरने को तैयार रहे। बाद में छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज ने इन मंदिरों को पुनः स्थापित किया।

🔸5. #किष्किंधा :- वानरराज महाराज सुग्रीव का राज्य, जो आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य कहलाया। 1565 में तालिकोटा के युद्ध मे विजयनगर साम्राज्य की हार हुई और मुसलमानो ने सारा राज्य जला डाला, आप आज भी गूगल में हम्पी सर्च करे इसका बहुत बड़ा अवशेष आज भी देखने को मिल जाएगा, जो बताता है कि मुसलमानो से पहले भारत कितना भव्य था। मगर मजहबी आग ने सबकुछ जलाकर राख कर दिया। बाद में मैसूर के यदुवंशियों ने इसका पुनः उद्धार किया।

इस तरह हमारी रामायणकालीन नगरिया लूटी और दोबारा बनाई गई।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ઝંડુ ભટ્ટ એટલે જામ વિભાજી ના દરબાર ના નવરત્નો પૈકી ના એક રત્ન… જામનગર ની આયુર્વેદ પરંપરા ની ધરોહર. જામનગર ની આયુર્વેદ યુનિવર્સીટી ના પાયા માં ઝંડુ ભટ્ટ ની આયુર્વેદ પરંપરા છે…

ઝંડુ ભટ્ટ જ્યાં રહેતા હતા તે શેરી ને ઝંડુ ભટ્ટ ની શેરી તરીકે ઓળખવા માં આવે છે જ્યાં આજે પણ ઝંડુ ભટ્ટ જે મકાન માં રહેતા હતા તે અસ્તિત્વ માં છે… મેં આ સ્થળ ની નવ વર્ષ અગાઉ મુલાકાત લીધેલ… અહી હજુ ઝંડુ ભટ્ટ ના અમુક સાધનો સચવાયેલ પડ્યા છે…

જામનગર ની આ ધરોહર ને સંભાળી ને અહી ઝંડુ ભટ્ટ વિષે લોકો વધુ જાણે તેના માટે ની વ્યવસ્થા ગોઠવવા ની જરૂર છે… આયુર્વેદ યુનિવર્સીટી માં જ્યાં સુધી હું જાણું છું ત્યાં સુધી ઝંડુ ભટ્ટ નું પુતળું પણ મુકવા માં નથી આવ્યું… સુખનાથ મહાદેવ માં આવેલ એમની રસશાળા અત્યંત જીર્ણશીર્ણ હાલત માં છે…. ત્યાં થોડું ઉત્ખનન કરી અવશેષો બહાર કાઢવા ની જરૂર છે…

જામનગર ઝંડુ ભટ્ટ નું ઋણ ચૂકવી શકે તેમ નથી… પણ આ ઋણ ફેડવા માટે નાનો પ્રયત્ન કરવો ખુબ જરૂરી છે…

જામનગર ના નેતાઓ ના હૃદય માં જામનગર પ્રત્યે કોઈ લાગણી જન્મે એવી આશા રાખીએ અને ઝંડુ ભટ્ટ ની કાયમી યાદગીરી રહે તેવું કોઈ નક્કર કામ થાય એવી અપેક્ષા….