Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पिताजी के जाने के बाद आज पहली बार हम दोनों भाईयों में जम कर बहसबाजी हुई। फ़ोन पर ही उसे मैंने उसे खूब खरी-खरी सुना दी।

पुश्तैनी घर छोड़कर मैं कुछ किलोमीटर दूर इस सोसायटी में रहने आ गया था। उन तंग गलियों में रहना मुझे और मेरे बच्चों को कतई नहीं भाता था।

हम दोनों मियां-बीबी की अच्छी खासी तनख्वाह के बूते हमने ये बढ़िया से फ्लैट ले लिया।

सीधे-साधे से हमारे पिताजी ने कोई वसीयत तो की नहीं पर उस पुश्तैनी घर पर मेरा भी तो बराबर का हक बनता है।

छोटा भाई मना नहीं करता, लिखा-पढ़ी को भी राजी है पर दिक्कत अब ये है कि वो मेरे वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोलना चाह रहा है। उसकी टीचर की नौकरी सात महीने पहले छूट चुकी है।

दो महीने पहले ही आस-पास कहीं किराये का कमरा लेकर कोचिंग सेंटर खोला है। फोन पर कह रहा था, “आपके वाले हिस्से में कोचिंग सेंटर खोल लूँ तो मेरा किराया बच जाएगा।”

अब भला ये क्या बात हुई। चीज मेरी बरतेगा वो। ऊपर से मेरी धर्मपत्नी भी उसी की बात को सही ठहराते हुए बोली, “खोलने दो ना उसे कोचिंग सेंटर, छोटा भाई है आपका।
मुश्किल में है कुछ सहारा ही हो जायेगा।
आखिर बड़े भाई हो कुछ तो फ़र्ज बनता है कि नहीं।”

अब क्या बोलता, अखबार मेज पर पटका, थैला उठाया और सब्जी लेने निकल आया। मंडी में घुसते ही महीने भर से नदारद अपना सब्जी वाला भईया नज़र आया।

कई सालों से उससे ही सब्ज़ी लेता आ रहा हूँ। फटाफट वहीं जा पहुंचा।

“कहाँ ग़ायब हो गया था रे, महीना हो गया मुझे इधर-उधर से औने-पौने दाम में सब्जी लेते हुए।”

“गाँव गया था साब जी। छोटे भाई की माली हालत खराब हो गई थी। गया और सब ठीक कर आया।”

“घर में ही छोटी सी दुकान करा दी। बापू नहीं है तो क्या हुआ बड़ा भाई भी तो बाप समान होता है ना, साब जी।”

ये सुनकर लगा जैसे मैं जम सा गया। थैला वहीं छोड़कर ऑटो लिया और उन जानी पहचानी तंग गलियों से होता हुआ अपने पुराने घर जा पहुँचा।

बाहर खेलते हुए भाई के दोनों बच्चे मुझे देखते ही ”ताऊ जी, ताऊ जी” कहकर लिपट गए।

आवाज सुनकर छोटा भाई भी बाहर निकल आया। मैं उसे डाँटते हुए बोला, “क्यूँ रे, बहुत बड़ा हो गया है तू।

“मैंने जरा सा कुछ बोल क्या दिया, तुझ से तो पलट कर फ़ोन करने जैसा भी नही हुआ।”

“आपने जब साफ़-साफ़ मना कर दिया तो फिर फोन कैसे करता।”

“हाँ-हाँ जैसे तू तो मेरी हर बात मानता है।”

“क्यों नहीं मानता आप बोल कर तो देखो।”

“ये कुछ पैसे हैं रख ले, तेरी कोचिंग सेंटर के फर्नीचर की मरम्मत के लिए। यहाँ शिफ़्ट करने से पहले सब ठीक करा लियो।”

“मतलब मैं यहाँ अपना…..।
आपका ये एहसान मैं……।”
कहते-कहते उसका गला भर आया।

“एहसान नहीं पगले, ये तो मेरा फ़र्ज है जो मैं भूल गया था।” और ये बोलते हुए मेरी आँखें डबडबा गई……..।

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करवा चौथ


“करवा चौथ”

करवा चौथ का व्रत स्त्रियों का मुख्य त्योहार है। यह व्रत सुहागन महिलायें अपने पति की दीर्घायु के लिए करती हैं। करवा चौथ का व्रत कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सुहागन स्त्रियो द्वारा किया जाता है। यह व्रत हर विवाहित महिला अपने रिवाजो के अनुसार रखती है, और अपने जीवन साथी की अच्छी सेहत तथा अच्छी उम्र की प्रार्थना भगवान से करती है। आज कल यह व्रत कुँवारी लडकियाँ भी अच्छे पति की प्राप्ति के लिए रखती है।

करवा चौथ व्रत की कथा

जब भी कोई स्त्री करवा चौथ का व्रत करती है, तो वह व्रत के दौरान कथा सुनती है। व्रत के दौरान कथा सुनने की यह प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। इस व्रत की कथा सुहागन स्त्रियों के द्वारा सुनी जाती है। कथा इस प्रकार है:-

एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात लड़के और एक लड़की थी। कार्तिक महीने मे जब कृष्ण पक्ष की चतुर्थी आई, तो साहूकार के परिवार की महिलाओं ने भी करवा चौथ व्रत रखा। जब रात्री के समय साहूकार के बेटे भोजन ग्रहण करने बैठे, तो उन्होने साहूकार की बेटी (अपनी बहन) को भी साथ मे भोजन करने के लिए कहा। भाइयों के द्वारा भोजन करने का कहने पर उनकी बहन ने उत्तर दिया, कि आज मेरा व्रत है। मै चाँद के निकलने पर पूजा विधि सम्पन्न करके ही भोजन करूंगी। भाइयों के द्वारा बहन का भूख के कारण मुर्झाया हुआ चेहरा देखा नहीं गया। उन्होने अपनी बहन को भोजन कराने के लिए प्रयत्न किया। उन्होने घर के बाहर जाकर अग्नि जला दी। उस अग्नि का प्रकाश अपनी बहन को दिखाते हुये कहा कि देखो बहन चाँद निकाल आया है। तुम चाँद को अर्ध्य देकर और अपनी पूजा करके भोजन गृहण कर लो। अपने भाइयों द्वारा चाँद निकलने की बात सुनकर बहन ने अपनी भाभीयों के पास जाकर कहा। भाभी चाँद निकल आया है चलो पूजा कर ले। परंतु उसकी भाभी अपने पतियों द्वारा की गयी युक्ति को जानती थी। उन्होनें अपनी नन्द को भी इस बारे मे बताया और कहा की आप भी इनकी बात पर विश्वास ना करें। परंतु बहन ने भाभीयों की बात पर ध्यान ना देते हुये पूजन संपन्न कर भोजन गृहण कर लिया। इस प्रकार उसका व्रत टूट गया और गणेश जी उससे नाराज हो गए। इसके तुरंत बाद उसका पति बीमार हो गया, और घर का सारा रुपया पैसा और धन उसकी बीमारी ने खर्च हो गया। अब जब साहूकार की बेटी को अपने द्वारा किए गए गलत व्रत का पता चला तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने अपनी गलती पर पश्चाताप किया। अब उसने पुनः पूरे विधि विधान से व्रत का पूजन किया तथा गणेश जी की आराधना की। इस बार उसके व्रत तथा श्रध्दा भक्ति को देखते हुये भगवान गणेश उस पर प्रसन्न हो गए। उसके पति को जीवन दान दिया और उसके परिवार को धन तथा संपत्ति प्रदान की। इस प्रकार जो भी श्रद्धा भक्ति से इस करवा चौथ के व्रत को करता है, वो सारे सांसारिक क्लेशों से मुक्त होकर प्रसन्नता पूर्वक अपना जीवन यापन करता है।

करवा चौथ व्रत विधि

1. सूर्योदय से पहले स्नान कर के व्रत रखने का संकल्प लें और सास दृारा भेजी गई सरगी खाएं। सरगी में, मिठाई, फल, सेंवई, पूड़ी और साज-श्रृंगार का समान दिया जाता है। सरगी प्याज-लहसुन रहित होनी चाहिये।

2. सरगी करने के बाद करवा चौथ का निर्जल व्रत शुरु हो जाता है। मां पार्वती, महादेव शिव व गणेश जी का ध्यान पूरे दिन अपने मन में करती रहें।

3. दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्रित करें। इस चित्रित करने की कला को करवा धरना कहा जाता हैं, जो कि बड़ी पुरानी परंपरा है।

4. आठ पूरियों की अठावरी बनाएं। हलुआ बनाएं। पक्के पकवान बनाएं।

5. फिर पीली मिट्टी से मां गौरी और गणेश जी का स्वरूप बनाइये। मां गौरी की गोद में गणेश जी का स्वरूप बिठाइये। इन स्वरूपों की पूजा संध्याकाल के समय पूजा करने के काम आती है।

6. माता गौरी को लकड़ी के सिंहासन पर विराजें और उन्हें लाल रंग की चुनरी पहना कर अन्य सुहाग, श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। फिर उनके सामने जल से भरा कलश रखें।

7. वायना (भेंट) देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें। रोली से करवे पर स्वास्तिक बनाएं।

8. गौरी गणेश के स्वरूपों की पूजा करें। इस मंत्र का जाप करें –

‘नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌।

प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥’

ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही पूजा करती हैं। हर क्षेत्र के अनुसार पूजा करने का विधान और कथा अलग-अलग होती है।

9. अब करवा चौथ की कथा कहनी या फिर सुननी चाहिये। कथा सुनने के बाद आपको अपने घर के सभी वरिष्ठ लोगों का चरण स्पर्श कर लेना चाहिये।

10. रात्रि के समय छननी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें उसे अर्घ्य प्रदान करें। फिर पति के पैरों को छूते हुए उनका आर्शिवाद लें। फिर पति देव को प्रसाद दे कर भोजन करवाएं और बाद में खुद भी करें।

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कैसे बने भगवान विष्णु तिरुपति बालाजी

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एक बार समस्त देवताओं ने मिलकर एक यज्ञ करने का निश्चय किया । यज्ञ की तैयारी पूर्ण हो गयी । तभी वेद ने एक प्रश्न किया तो एक व्यवहारिक समस्या आ खड़ी हुई । ऋषि-मुनियों द्वारा किए जाने वाले यज्ञ की हविष्य तो देवगण ग्रहण करते थे । लेकिन देवों द्वारा किए गए यज्ञ की पहली आहूति किसकी होगी ? यानी सर्वश्रेष्ठ देव का निर्धारण जरुरी था, जो फिर अन्य सभी देवों को यज्ञ भाग प्रदान करे ।

ब्रह्मा-विष्णु-महेश परम् अात्मा हैं । इनमें से श्रेष्ठ कौन है ? इसका निर्णय आखिर हो तो कैसे ? भृगु ने इसका दायित्व सम्भाला । वह देवों की परीक्षा लेने चले । ऋषियों से विदा लेकर वह सर्व प्रथम अपने पिता ब्रह्मदेव के पास पहुँचे ।

ब्रह्मा जी की परीक्षा लेने के लिए भृगु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया । इससे ब्रह्मा जी अत्यन्त कुपित हुए और उन्हें शिष्टता सिखाने का प्रयत्न किया । भृगु को गर्व था कि वह तो परीक्षक हैं, परीक्षा लेने आए हैं । पिता-पुत्र का आज क्या रिश्ता ? भृगु ने ब्रह्म देव से अशिष्टता कर दी । ब्रह्मा जी का क्रोध बढ़ गया और अपना कमण्डल लेकर पुत्र को मारने भागे । भृगु किसी तरह वहाँ से जान बचाकर भाग चले आए ।

इसके बाद वह शिव जी के लोक कैलाश गए । भृगु ने फिर से धृष्टता की । बिना कोई सूचना का शिष्टाचार दिखाए या शिव गणों से आज्ञा लिए सीधे वहाँ पहुँच गए, जहाँ शिव जी माता पार्वती के साथ विश्राम कर रहे थे । आए तो आए, साथ ही अशिष्टता का आचरण भी किया । शिव जी शांत रहे, पर भृगु न समझे । शिव जी को क्रोध आया तो उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया । भृगु वहाँ से भागे ।

अन्त में वह भगवान विष्णु के पास क्षीर सागर पहुंचे । श्री हरि शेष शय्या पर लेटे निद्रा में थे और देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं । महर्षि भृगु दो स्थानों से अपमानित करके भगाए गए थे । उनका मन बहुत दुखी था । विष्णु जी को सोता देख । उन्हें न जाने क्या हो गया और उन्होंने विष्णु जी को जगाने के लिए उनकी छाती पर एक लात जमा दी ।

विष्णु जी जाग उठे और भृगु से बोले “हे ब्राह्मण देवता ! मेरी छाती वज्र समान कठोर है और आपका शरीर तप के कारण दुर्बल है, कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं आयी ? आपने मुझे सावधान करके कृपा की है । आपका चरण चिह्न मेरे वक्ष पर सदा अंकित रहेगा ।”

भृगु को बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने तो भगवान की परीक्षा लेने के लिए यह अपराध किया था । परन्तु भगवान तो दण्ड देने के बदले मुस्करा रहे थे । उन्होंने निश्चय किया कि श्रीहरि जैसी विनम्रता किसी में नहीं । वास्तव में विष्णु ही सबसे बड़े देवता हैं । लौट करके उन्होंने सभी ऋषियों को पूरी घटना सुनायी । सभी ने एक मत से यह निर्णय किया कि भगवान विष्णु को ही यज्ञ का प्रधान देवता समझकर मुख्य भाग दिया जाएगा ।

लेकिन लक्ष्मी जी ने भृगु को अपने पति की छाती पर लात मारते देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध आया । परन्तु उन्हें इस बात पर क्षोभ था कि श्रीहरि ने उद्दण्ड को दण्ड देने के स्थान पर उसके चरण पकड़ लिए और उल्टे क्षमा मांगने लगे ! क्रोध से तमतमाई महालक्ष्मी को लगा कि वह जिस पति को संसार का सबसे शक्तिशाली समझती है, वह तो निर्बल हैं । यह धर्म की रक्षा करने के लिए अधर्मियों एवं दुष्टों का नाश कैसे करते होंगे ?

महालक्ष्मी ग्लानि में भर गई और मन श्रीहरि से उचाटन हो गया । उन्होंने श्रीहरि और बैकुण्ठ लोक दोनों के त्याग का निश्चय कर लिया । स्त्री का स्वाभिमान उसके स्वामी के साथ बंधा होता है । उनके समक्ष कोई स्वामी पर प्रहार कर गया और स्वामी ने प्रतिकार भी न किया, यह बात मन में कौंधती रही । यह स्थान वास के योग्य नहीं । पर, त्याग कैसे करें ? श्रीहरि से ओझल होकर रहना कैसे होगा ? वह उचित समय की प्रतीक्षा करने लगीं ।

श्रीहरि ने हिरण्याक्ष के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए वराह अवतार लिया और दुष्टों का संहार करने लगे । महालक्ष्मी के लिए यह समय उचित लगा । उन्होंने बैकुण्ठ का त्याग कर दिया और पृथ्वी पर एक वन में तपस्या करने लगीं ।

तप करते-करते उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया । विष्णु जी वराह अवतार का अपना कार्य पूर्ण कर वैकुण्ठ लौटे तो महालक्ष्मी नहीं मिलीं । वह उन्हें खोजने लगे ।

श्रीहरि ने उन्हें तीनों लोकों में खोजा किन्तु तप करके माता लक्ष्मी ने भ्रमित करने की अनुपम शक्ति प्राप्त कर ली थी । उसी शक्ति से उन्होंने श्री हरि को भ्रमित रखा । आख़िर श्रीहरि को पता लग ही गया । लेकिन तब तक वह शरीर छोड़ चुकीं थीं । दिव्य दृष्टि से उन्होंने देखा कि लक्ष्मी जी ने चोलराज के घर में जन्म लिया है । श्रीहरि ने सोचा कि उनकी पत्नी ने उनका त्याग सामर्थ्यहीन समझने के भ्रम में किया है, इसलिए वह उन्हें पुनः प्राप्त करने के लिए अलौकिक शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे ।

महालक्ष्मी ने मानव रुप धरा है तो अपनी प्रिय पत्नी को प्राप्त करने के लिए वह भी साधारण मानवों के समान व्यवहार करेंगे और महालक्ष्मी जी का हृदय और विश्वास जीतेंगे । भगवान ने श्रीनिवास का रुप धरा और पृथ्वी लोक पर चोलनरेश के राज्य में निवास करते हुए महालक्ष्मी से मिलन के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे ।

राजा आकाशराज निःसंतान थे । उन्होंने शुकदेव जी की आज्ञा से सन्तान प्राप्ति यज्ञ किया । यज्ञ के बाद यज्ञशाला में ऋषियों ने राजा को हल जोतने को कहा गया । राजा ने हल जोता तो हल का फल किसी वस्तु से टकराया । राजा ने उस स्थान को खोदा तो एक पेटी के अन्दर सहस्रदल कमल पर एक छोटी-सी कन्या विराजमान थी । वह महालक्ष्मी ही थीं । राजा के मन की मुराद पूरी हो गई थी । चूंकि कन्या कमल के फूल में मिली थी, इसलिए उसका नाम रखा गया “पदमावती” ।

पदमावती नाम के अनुरुप ही रुपवती और गुणवती थी । साक्षात लक्ष्मी का अवतार । पद्मावती विवाह के योग्य हुई । एक दिन वह बाग में फूल चुन रही थी । उस वन में श्रीनिवास (बालाजी) आखेट के लिए गए थे । उन्होंने देखा कि एक हाथी एक युवती के पीछे पड़ा है और डरा रहा है । राजकुमारी के सेवक भाग खड़े हुए । श्रीनिवास ने तीर चलाकर हाथी को रोका और पदमावती की रक्षा की । श्रीनिवास और पदमावती ने एक-दूसरे को देखा और रीझ गए । दोनों के मन में परस्पर अनुराग पैदा हुआ । लेकिन दोनों बिना कुछ कहे अपने-अपने घर लौट गए ।

श्रीनिवास घर तो लौट आए, लेकिन मन पदमावती में ही बस गया । वह पदमावती का पता लगाने के लिए उपाय सोचने लगे । उन्होंने ज्योतिषी का रुप धरा और भविष्य बांचने के बहाने पदमावती को ढूंढने निकल पड़े । धीरे-धीरे ज्योतिषी श्रीनिवास की ख्याति पूरे चोल राज में फैल गयी ।

पदमावती के मन में श्रीनिवास के लिए प्रेम जागृत हुआ । वह भी उनसे मिलने को व्याकुल थीं । किन्तु कोई पता-ठिकाना न होने के कारण उनका मन चिंतित था । इस चिन्ता और प्रेम विरह में उन्होंने भोजन-श्रृंगार आदि का त्याग कर दिया । इसके कारण उसका शरीर कृशकाय होता चला गया । राजा से पुत्री की यह दशा देखी नहीं जा रही थी, वह चिंतित थे । ज्योतिषी की प्रसिद्धि की सूचना राजा को हुई ।

राजा ने ज्योतिषी श्रीनिवास को बुलाया और सारी बात बताकर अपनी कन्या की दशा का कारण बताने को कहा । श्रीनिवास राजकुमारी का हाल समझने पहुंचे तो पदमावती को देखकर प्रसन्न हो गए । उनका उपक्रम सफल हुआ । उन्होंने परदमावती का हाथ अपने हाथ में लिया । कुछ देर तक पढने का स्वांग करने के बाद बोले – “महाराज ! आपकी पुत्री प्रेम के विरह में जल रही है । आप इनका शीघ्र विवाह कर दें तो ये स्वस्थ हो जायेंगी ।”

पदमावती ने अब श्रीनिवास की ओर देखा । देखते ही पहचान लिया । उनके मुख पर प्रसन्नता के भाव आए और वह हँसीं । काफी दिनों बाद पुत्री को प्रसन्न देख राजा को लगा कि ज्योतिषी का अनुमान सही है । राजा ने श्रीनिवास से पूछा – “ज्योतिषी महाराज ! यदि आपको यह पता है कि मेरी पुत्री प्रेम के विरह में पीड़ित है तो आपको यह भी सूचना होगी कि मेरी पुत्री को किससे प्रेम है ? उसका विवाह करने को तैयार हूँ, आप उसका परिचय दें ?

श्रीनिवास ने कहा – “महाराज ! आपकी पुत्री एक दिन वन में फूल चुनने गई थी । एक हाथी ने उन पर हमला किया तो आपके सैनिक और दासियां भाग खड़ी हुईं । राजकुमारी के प्राण एक धनुर्धर ने बचाए थे ।”

राजा ने कहा – “हाँ, मेरे सैनिकों ने बताया था कि एक दिन ऐसी घटना हुई थी । एक वीर पुरुष ने उसके प्राण बचाए थे । लेकिन मेरी पुत्री के प्रेम से उस घटना का क्या तात्पर्य है ?”

श्रीनिवास ने बताया – “महाराज ! आपकी पुत्री को अपनी जान बचाने वाले उसी युवक से प्रेम हुआ है ।” राजा के पूछने पर श्रीनिवास ने कहा – “वह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि शंख चक्रधारी स्वयं भगवान विष्णु ही हैं । इस समय बैकुण्ठ को छोड़कर मानव रुप में श्रीनिवास के नाम से पृथ्वी पर वास कर रहे हैं । आप अपनी पुत्री का विवाह उनसे करें । मैं इसकी सारी व्यवस्था करा दूंगा ।” यह बात सुनकर राजा प्रसन्न हो गए कि स्वयं विष्णु उनके जमाई बनेंगे ।

श्रीनिवास और पदमावती का विवाह तय हो गया । श्रीनिवास रुप में श्रीहरि ने शुकदेव के माध्यम से समस्त देवी-देवताओं को अपने विवाह की सूचना भिजवा दी । शुकदेव की सूचना से सभी देवी-देवता अत्यंत प्रसन्न हुए । देवी-देवता श्रीनिवास जी से मिलने औऱ बधाई देने पृथ्वी पर पहुंचे ।

परन्तु श्रीनिवास जी को खुशी के बीच एक चिंता भी होने लगी । देवताओं ने पूछा – “भगवन ! संसार की चिंता हरने वाले आप इस उत्सव के मौके पर इतने चिंतातुर क्यों हैं ?”

श्रीनिवास जी ने कहा – “चिंता की बात तो है ही, धन का अभाव । महालक्ष्मी ने मुझे त्याग दिया, इस कारण धनहीन हो चुका हूँ । स्वयं महालक्ष्मी ने तप से शरीर त्याग मानव रुप लिया है और पिछली स्मृतियों को गुप्त कर लिया है । इस कारण उन्हें यह सूचना नहीं है कि वह महालक्ष्मी का स्वरुप हैं । वह तो स्वयं को राजकुमारी पदमावती ही मानती हैं । मैंने निर्णय किया है कि जब तक उनका प्रेम पुनः प्राप्त नहीं करता, अपनी माया का उन्हें आभास नहीं कराउंगा । इस कारण मैं एक साधारण मनुष्य का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। और वह हैं, राजकुमारी । राजा की पुत्री से शादी करने और घर बसाने के लिए धन, वैभव और ऐश्वर्य की जरुरत है । वह मैं कहां से लाऊं ?”

स्वयं नारायण को धन की कमी सताने लगी । मानव रुप में आए प्रभु को भी विवाह के लिए धन की आवश्यकता हुई । यही तो ईश्वर की लीला है । जिस रुप में रहते हैं, उस योनि के जीवों के सभी कष्ट सहते हैं । श्रीहरि विवाह के लिए धन का प्रबंध कैसे हो ? इस बात से चिंतित हैं । देवताओं ने जब यह सुना तो उन्हें आश्चर्य हुआ । देवताओं ने कहा – “कुबेर, आवश्यकता के बराबर धन की व्यवस्था कर देंगे ।”

देवताओं ने कुबेर का आह्वान किया तो कुबेर प्रकट हुए । कुबेर ने कहा – “यह तो मेरे लिए प्रसन्नता की बात है कि आपके लिए कुछ कर सकूं । प्रभु ! आपके लिए धन का तत्काल प्रबंध करता हूँ । कुबेर का कोष आपकी कृपा से ही रक्षित है ।”

श्रीहरि ने कुबेर से कहा – “यक्षराज कुबेर ! आपको भगवान भोलेनाथ ने जगत और देवताओं के धन की रक्षा का दायित्व सौंपा है । उसमें से धन मैं अपनी आवश्यकता के हिसाब से लूंगा अवश्य, पर मेरी एक शर्त भी होगी ।”

श्रीहरि कुबेर से धन प्राप्ति की शर्त रख रहे हैं, यह सुनकर सभी देवता आश्चर्य में पड़ गए । श्रीहरि ने कहा – “ब्रह्मा जी और शिव जी साक्षी रहें । कुबेर से धन ऋण के रुप में लूंगा, जिसे भविष्य में ब्याज सहित चुकाऊंगा ।”

श्रीहरि की बात से कुबेर समेत सभी देवता विस्मय में एक-दूसरे को देखने लगे । कुबेर बोले – “भगवन ! मुझसे कोई अपराध हुआ तो उसके लिए क्षमा कर दें । पर, ऐसी बात न कहें । आपकी कृपा से विहीन होकर मेरा सारा कोष नष्ट हो जाएगा ।”

श्रीहरि ने कुबेर को निश्चिंत करते हुए कहा – “आपसे कोई अपराध नहीं हुआ । मैं मानव की कठिनाई का अनुभव करना चाहता हूँ । मानव रुप में उन कठिनाइयों का सामना करुँगा, जो मानव को आती हैं । धन की कमी और ऋण का बोझ सबसे बड़ा होता है ।”

कुबेर ने कहा – “प्रभु ! यदि आप मानव की तरह ऋण पर धन लेने की बात कर रहे हैं तो फिर आपको मानव की तरह यह भी बताना होगा कि ऋण चुकाएंगे कैसे ? मानव को ऋण प्राप्त करने के लिए कई शर्तें झेलनी पड़ती हैं ।”

श्रीनिवास ने कहा – “कुबेर ! यह ऋण मैं नहीं, मेरे भक्त चुकाएंगे । लेकिन मैं उनसे भी कोई उपकार नहीं लूंगा । मैं अपनी कृपा से उन्हें धनवान बनाऊंगा । कलियुग में पृथ्वी पर मेरी पूजा धन, ऐश्वर्य और वैभव से परिपूर्ण देवता के रुप में होगी । मेरे भक्त मुझसे धन, वैभव और ऐश्वर्य की मांग करने आएंगे । मेरी कृपा से उन्हें यह प्राप्त होगा, बदले में भक्तों से मैं दान प्राप्त करूंगा जो चढ़ावे के रुप में होगा । मैं इस तरह आपका ऋण चुकाता रहूंगा ।”

कुबेर ने कहा – “भगवन ! कलियुग में मानव जाति धन के विषय में बहुत विश्वास के योग्य नहीं रहेगी । उन पर आवश्यकता से अधिक विश्वास करना क्या उचित होगा ?”

श्रीनिवास जी बोले – “शरीर त्यागने के बाद तिरुपति के तिरुमाला पर्वत पर बाला जी के नाम से लोग मेरी पूजा करेंगे । मेरे भक्तों की अटूट श्रद्धा होगी । वह मेरे आशीर्वाद से प्राप्त धन में मेरा हिस्सा रखेंगे । इस रिश्ते में न कोई दाता है और न कोई याचक । हे कुबेर ! कलियुग के आखिरी तक भगवान बाला जी धन, ऐश्वर्य और वैभव के देवता बने रहेंगे । मैं अपने भक्तों को धन से परिपूर्ण करूंगा तो मेरे भक्त दान से न केवल मेरे प्रति अपना ऋण उतारेंगे, बल्कि मेरा ऋण उतारने में भी मदद करेंगे । इस तरह कलियुग की समाप्ति के बाद मैं आपका मूलधन लौटा दूंगा ।”

कुबेर ने श्रीहरि द्वारा भक्त और भगवान के बीच एक ऐसे रिश्ते की बात सुनकर उन्हें प्रणाम किया और धन का प्रबंध कर दिया । भगवान श्रीनिवास और कुबेर के बीच हुए समझौते के साक्षी स्वयं ब्रह्मा और शिव जी हैं । दोनों वृक्ष रुप में साक्षी बन गए । आज भी पुष्करणी तीर्थ के किनारे ब्रह्मा और शिव जी बरगद के पेड़ के रुप में साक्षी बनकर खड़े हैं ।

ऐसा कहा जाता है कि निर्माण कार्य के लिए स्थान बनाने के लिए इन दोनों पेड़ों को जब काटा जाने लगा तो उनमें से खून की धारा फूट पड़ी । पेड़ काटना बन्द करके उसकी देवता की तरह पूजा होने लगी ।

इस तरह भगवान श्रीनिवास (बाला जी) और पदमावती (महालक्ष्मी) का विवाह पूरे धूमधाम से हुआ । जिसमें सभी देवगण पधारे । भक्त मन्दिर में दान देकर भगवान पर चढ़ा ऋण उतार रहे हैं, जो कलियुग के अन्त तक जारी रहेगा ।

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ऋण से मुक्ति


ऋण से मुक्ति

एक धर्मशाला में पति-पत्नी अपने छोटे-से नन्हें-मुन्ने बच्चे के साथ रुके। धर्मशाला कच्ची थी। दीवालों में दरारें पड़ गयी थीं आसपास में खुला जंगल जैसा माहौल था। पति-पत्नी अपने छोटे-से बच्चे को प्रांगण में बिठाकर कुछ काम से बाहर गये।

वापस आकर देखते हैं तो बच्चे के सामने एक बड़ा नाग कुण्डली मारकर फन फैलाये बैठा है। यह भयंकर दृश्य देखकर दोनों हक्के-बक्के रह गये। बेटा मिट्टी की मुट्ठी भर-भरकर नाग के फन पर फेंक रहा है और नाग हर बार झुक-झुककर सहे जा रहा है। माँ चीख उठी–बाप चिल्लाया–‘बचाओ… बचाओ… हमारे लाड़ले को बचाओ।’

लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। उसमें एक निशानेबाज था। ऊँट गाड़ी पर बोझा ढोने का धंधा करता था। वह बोला–‘मैं निशाना तो मारूँ, सर्प को ही खत्म करूँगा लेकिन निशाना चूक जाय और बच्चे को चोट लग जाय तो मैं जिम्मेदार नहीं। आप लोग बोलो तो मैं कोशिश करूँ ?’

पुत्र के आगे विषधर बैठा है ! ऐसे प्रसंग पर कौन-सी माँ-बाप इनकार करेगे ? वह सहमत हो गये और माँ बोली–‘भाई ! साँप को मारने की कोशिश करो। अगर गलती से बच्चे को चोट लग जायेगी तो हम कुछ नहीं कहेंगे।’

ऊँटवाले ने निशाना मारा। साँप जख्मी होकर गिर पड़ा, मूर्च्छित हो गया। लोगों ने सोचा कि साँप मर गया है। उन्होंने उसको उठाकर बाड़ में फेंक दिया। रात हो गयी। वह ऊँटवाला उसी धर्मशाला में अपनी ऊँटगाड़ी पर सो गया।

रात में ठण्डी हवा चली। मूर्च्छित साँप सचेतन हो गया और आकर ऊँटवाले के पैर में डसकर चला गया। सुबह लोग देखते हैं तो ऊँटवाला मरा हुआ था।

दैवयोग से सर्पविद्या जानने वाला एक आदमी वहाँ ठहरा हुआ था। वह बोला–‘साँप को यहाँ बुलवाकर जहर को वापस खिंचवाने की विद्या मैं जानता हूँ। यहाँ कोई आठ-दस साल का निर्दोष बच्चा हो तो उसके चित्त में साँप के सूक्ष्म शरीर को बुला दूँ और वार्तालाप करा दूँ।’

गाँव में से आठ-दस साल का बच्चा लाया गया। उसने उस बच्चे में साँप के जीव को बुलाया। उससे पूछा गया–‘इस ऊँटवाले को तूने काटा है ?’

बच्चे में मौजूद जीव ने कहा–‘हाँ।’

फिर पूछा–‘इस बेचारे ऊँट वाले को क्यों काटा ?’

बच्चे के द्वारा वह साँप बोलने लगा–‘मैं निर्दोष था। मैंने इसका कुछ बिगाड़ा नहीं था। इसने मुझे निशाना बनाया तो मैं क्यों इससे बदला न लूँ ?’

‘वह बच्चा तुम पर मिट्टी डाल रहा था उसको तो तुमने कुछ नहीं किया !’

बालक रूपी साँप ने कहा–“बच्चा तो मेरा तीन जन्म पहले का लेनदार है। तीन जन्म पहले मैं भी मनुष्य था, वह भी मनुष्य था। मैंने उससे तीन सौ रुपये लिए थे लेकिन वापस नहीं दे पाया। अभी तो देने की क्षमता भी नहीं है। ऐसी भद्दी योनियों में भटकना पड़ रहा है।

संयोगवश वह सामने आ गया तो मैं अपना फन झुका-झुकाकर उससे माफी मांग रहा था। उसकी आत्मा जागृत हुई तो धूल की मुट्ठियाँ फेंक-फेंककर वह मुझे फटकार दे रहा था कि ‘लानत है तुझे ! कर्जा नहीं चुका सका….।’ उसकी वह फटकार सहते-सहते मैं अपना ऋण अदा कर रहा था।

हमारे लेन-देन के बीच टपकने वाला वह ऊँट वाला कौन होता है ? मैंने इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था फिर भी इसने मुझ पर निशाना मारा। मैंने इसका बदल लिया।”

सर्पविद्या जाननेवाले ने साँप को समझाया–‘देखो, तुम हमारा इतना कहना मानों, इसका जहर खींच लो।’

उस सर्प ने कहा–‘मैं तुम्हारा कहना मानूँ तो तुम भी मेरा कहना मानो। मेरी तो वैर लेने की योनि है। और कुछ नहीं तो न सही, मुझे यह ऊँटवाला पाँच सौ रुपये देवे तो अभी इसका जहर खींच लूँ। उस बच्चे से तीन जन्म पूर्व मैंने तीन सौ रुपये लिये थे, दो जन्म और बीत गये, उसके सूद के दौ सौ मिलाकर कुल पाँच सौ लौटाने हैं।’

किसी सज्जन ने पाँच सौ रूपये उस बच्चे के माँ-बाप को दे दिये। साँप का जीव वापस अपनी देह में गया, वहाँ से सरकता हुआ मरे हुए ऊँटवाले के पास आया और जहर वापस खींच लिया। ऊँटवाला जिन्दा हो गया।

‘इस कथा से स्पष्ट होता है कि इतना व्यर्थ खर्च नहीं करना चाहिए कि सिर पर कर्जा चढ़ाकर मरना पड़े और उसे चुकाने के लिए फन झुकाना पड़े, मिट्टी से फटकार सहनी पड़े। जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक कर्मों का ऋणानुबन्ध चुकाना ही पड़ता है। अतः निष्काम कर्म करके ईश्वर को सन्तुष्ट करें। अपने आत्मा- परमात्मा का अनुभव करके यहीं पर, इसी जन्म में शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करे।’

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बेटा चल छत पर चलें कल तो तेरी शादी है,आज हम माँ बेटी पूरी रात बातें करेंगे।

चल तेरे सिर की मालिश कर दूँ, तुझे अपनी गोद में सुलाऊँ कहते कहते आशा जी की आँखें बरस पड़ती हैं। विशाखा उनके आंसू पोंछते हुए कहती है :

ऐसे मत रो माँ, मैं कौन सा विदेश जा रही हूँ। 2 घण्टे लगते हैं आगरा से मथुरा आने में जब चाहूंगी तब आ जाऊँगी।

विदा हो जाती है विशाखा माँ की ढेर सारी सीख लिए,

मन में छोटे भाई बहनों का प्यार लिये, पापा का आशीर्वाद लिये। चाचा-चाची, दादी-बाबा, मामा-मामी, बुआ-फूफा, मौसी-मौसा सबकी ढेर सारी यादों के साथ, जल्दी आना बिटिया, आती रहना बिटिया कहते, हाथ हिलाते सबके चेहरे धुंधले हो गए थे विशाखा के आंसुओं से। संग बैठे आकाश उसे चुप कराते हुए कहते हैं सोच लो पढ़ाई करने बाहर जा रही हो। जब मन करे चली आना।

शादी के 1 साल बाद ही विशाखा के दादा जी की मृत्यु हो गयी, उस समय वो आकाश के मामा की बेटी की शादी में गयी थी,आकाश विशाखा से कहता हैl

ऐसे शादी छोड़ कर कैसे जाएंगे विशु, दादाजी को एक न एक दिन तो जाना ही था। फिर चली जाना !

चुप थी विशाखा क्योंकि माँ ने सीखा कर भेजा था अब वही तेरा घर है, जो वो लोग कहें वही करना। 6 महीने पहले आनंद भईया(मामा के बेटे) की शादी में भी नहीं जा पायी थी क्योंकि सासु माँ बीमार थीं।

अब विशाखा 1 बेटी की माँ बन चुकी थी, जब उसका पांचवा महीना चल रहा था तभी चाची की बिटिया की शादी पड़ी थी, सासू माँ ने कहा दिया ऐसी हालत में कहाँ जाओगी। वो सोचती है, कैसी हालत सुबह से लेकर शाम तक सब काम करती हूँ, ठीक तो हूँ इस बार उसका बहुत मन था, इसलिए उसने आकाश से कहा मम्मी जी से बात करे और उसे शादी में लेकर चले, चाची का फोन भी आया था आकाश के पास, तो उन्होंने कह दिया आप लोग जिद करेंगे तो मैं ले आऊँगा लेकिन कुछ गड़बड़ हुई तो जिम्मेदारी आपकी होगी। फिर तो माँ ने ही मना कर दिया बेटा रहने दे बेटा कल को कुछ भी हुआ तो तेरे ससुराल वाले बहुत नाराज हो जाएंगे।

वैसे तो ससुराल में विशाखा को कोई कष्ट नहीं था,किसी चीज की कमी भी नहीं थी,फिर भी उसे लगता था जैसे उसे जिम्मेदारियों का मुकुट पहना दिया गया हो। उसके आने से पहले भी तो लोग बीमार पड़ते होंगे, तो कैसे सम्भलता था सब, उसके आने से पहले भी तो उनके घर में शादी ब्याह पड़ते होंगे, तो आज अगर वो किसी समारोह में न जाकर अपने मायके के समारोह में चली जाए तो क्या गलत हो जाएगा।

दिन बीत रहे थे कभी 4 दिन कभी 8 दिन के लिए वो अपने मायके जाती थी और बुझे मन से लौट आती थी।विशाखा के नंद की शादी पक्की हो गयी है, उन दोनों का रिश्ता बहनो या दोस्तों जैसा है। अपनी नंद कमला की वजह से ही उसे ससुराल में कभी अकेलापन नहीं लगा।कमला की शादी होने से विशाखा जितनी खुश थी उतनी ही उदास भी थी, उसके बिना ससुराल की कल्पना भी उसके आंखों में आंसू भर देती थी।

विशाखा ने शादी की सारी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से संभाल ली थी, उसको दूसरा बच्चा होने वाला है, चौथे महीने की प्रेगनेंसी है फिर भी वो घर-बाहर का हर काम कर रही है। सभी रिश्तेदार विशाखा की सास से कह रहे हैं बड़ी किस्मत वाली हो जो विशाखा जैसी बहु पायी हो।

शादी का दिन भी आ गया, आज विशाखा के आँसू रुक ही नहीं रहे थे, दोनों नंद भाभी एक दूसरे को पकड़े रो रही थीं, तभी विशाखा की सास उसे समझाते हुए कहती हैं, ऐसे मत रो बेटा, कोई विदेश थोड़े ही जा रही हो जब चाहे तब आ जाना।

तब कमला कहती है, नहीं माँ जब दिल चाहे तब नहीं आ पाऊँगी। वो पूछती हैं ऐसे क्यों कह रही हो बेटा, माँ के पास क्यों नहीं आओगी तुम?

कमला कहती है, कैसे आऊँगी माँ हो सकता जब मेरा आने का मन करे तब मेरे ससुराल में कोई बीमार पड़ जाए, कभी किसी की शादी पड़ जाए या कभी मेरा पति ही कह दे तुम अपने रिस्क पे जाओ कुछ हुआ तो फिर मुझसे मत कहना l

सब एकदम अवाक रह जाते हैं, वो लोग विशाखा की तरफ देखने लगते हैं,

तभी कमला कहने लगती है, नहीं माँ भाभी ने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा लेकिन, मैंने देखा था उनकी सूजी हुई आंखों को जब उनके दादा जी की मौत पर आप लोग शादी का जश्न मना रहे थे। मैंने महसूस की है वो बेचैनी जब आपको बुखार होने के चलते वो अपने भईया की शादी में नहीं जा पा रही थीं। मैंने महसूस किया है उस घुटन को जब भैया ने उन्हें उनकी चाची की बेटी की शादी में जाने से मना कर दिया था, उन भईया ने जिन्होंने उनकी विदाई के वक़्त कहा था सोच लो तुम बाहर पढ़ने जा रही हो जब मन करे तब आ जाना। आपको नहीं पता भईया आपने भाभी का विश्वास तोड़ा है।

कल को मेरे ससुराल वाले भी मुझे छोटे भईया की शादी में न आने दें तो, पापा हमारी गुड़िया तो आपकी जान है, कभी सोचा है आप सबने कल को पापा को कुछ हो जाये और गुड़िया के ससुराल वाले उसे न आने दें।

कभी भाभी की जगह खुद को रख कर देखिएगा, एक लड़की अपने जीवन के 20-25 साल जिस घर में गुजारती है, जिन रिश्तों के प्यार की खुशबू से उसका जीवन भरा होता है उसको उसी घर जाने, उन रिश्तों को महसूस करने से रोक दिया जाता है।

मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी मैं आपके लिए कुछ नहीं कर पाई, जिन रिश्तों में बांधकर हम आपको अपने घर लाये थे वही रिश्ते वही बन्धन आपकी बेड़ियाँ बन गए और ये कहते-कहते कमला विशाखा के गले लग जाती है। आज सबकी आंखें नम थी, सबके सिर अपनी गलतियों के बोझ से झुके हुए थे।

दोस्तों, ये किसी एक घर की कहानी नहीं है, हमारे समाज में शादी होते ही लड़कियों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। अपना परिवार अपना घर ही पराया हो जाता है, वहाँ जाने के लिए उसे दूसरों की आज्ञा लेनी ही पड़ती है …..

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संसार में धन का महत्व


संसार में धन का महत्व 💰💰💵

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एक महात्मा जी भक्ति कथाएं सुनाते थे. उनका अंदाज बड़ा सुंदर था औऱ वाणी में ओज था इसलिए उनका प्रवचन सुनने वालों की बड़ी भीड़ होती.

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उनकी ख्याति दूर-दूर तक हो गई. एक सेठ जी ने भी ख्याति सुनी. दान-धर्म-प्रवचन में रूचि रखते थे इसलिए वह भी पहुंचे. लेकिन उन्होंने अपना वेष बदल रखा था. मैले-कुचैले पहन लिए जैसे कोई मेहनत कश मजदूर हो.

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प्रतिदिन प्रवचन में आकर वह एक कोने में बैठ जाते और चुपचाप सुनते. प्रवचन में आने वाला एक व्यक्ति कई दिनों बाद आया. महात्मा जी के पूछने पर बताया कि उसका घर जलकर राख हो गया. उसके पास रहने को घर नहीं है.

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महात्मा जी ने सबसे कहा- ईश्वर ने कोप किया. वह आपकी परीक्षा लेना चाहते है कि क्या आप अपने साथी की सहायता करेंगे. वह आपकी परीक्षा ले रहे हैं इसलिए जो बन पड़े, सहायता करें.

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एक चादर घुमाई गई. सबने कुछ न कुछ पैसे डाले. मैले कपड़े में बैठे सेठ ने 10 हजार रूपए दिए. सबकी आंखें फटी रह गईं. वे तो उससे कोई उम्मीद ही नहीं रख रहे थे.

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सब समझते थे कि वह कंगाल और नीच पुरुष है जो अपनी हैसियत अनुसार पीछे बैठता है. सबने उसके दानशीलता की बड़ी प्रशंसा की. उसके बारे में सब जान चुके थे.

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अगले दिन सेठ फिर से उसी तरह मैले कपड़ों में आया और स्वभाव अनुसार पीछे बैठ गया. सब खड़े हो गए और उसे आगे बैठने के लिए स्थान देकर प्रार्थना की पर सेठ ने मना कर दिया.

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फिर महात्मा जी बोले- सेठ जी आप यहां आएं, मेरे पास बैठिए. आपका स्थान पीछे नहीं.

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सेठ ने उत्तर दिया- सच में संसार में धन की ही पूजा है. आम लोगों की भावनाएं तो भौतिकता से जुड़ी होंगी लेकिन महात्मा जी आप तो संत है. मैले कपड़े वाले को अपने पास बिठाने की आपको तभी सूझी जब मेरे धनी होने का पता चला.

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माया को माया मिले, कर-कर लंबे हाथ। तुलसीदास गरीब की, कोई न पूछे बात।।

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महात्मा जी आप माया के प्रभाव में मुझे अपना रहे हैं. क्या यह सत्य है या कोई और कारण है ?

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महात्मा जी बोले- आपको समझने में फेर हुआ है. मैं यह सम्मान आपके धन के प्रभाव में नहीं दे रहा. जरूरत मंद के प्रति आपके त्याग के भाव को दे रहा हूं.

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धन तो लोगों के पास होता ही है, दान का भाव नहीं होता. यह उस भाव को सम्मान है.

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त्याग और अपरिचितों के प्रति दया का भाव मनुष्य को विचारों से संत बना देता है. परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं इसलिए इसके धारण करने वाला मान-प्रतिष्ठा से युक्त यशस्वी और संततुल्य आदरणीय हो जाता है.

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गुरु पल पल का साथी

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एक बार एक पूर्ण संत अपने एक प्रिय शिष्य के साथ अपने आश्रम के पास के वन क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे… _ _ _ _ _ तभी उन संत जी मे अपने आगे आ गे एक बहुत बड़े और विषैले सर्प को जाते देखा… देख कर अपने शिष्य से बोले देखो कितना सुंदर प्राणी है… जाओ पकडो इसे जरा पास से देखें… गुरु का हुक्म सुनते ही शिष्य बिना तनिक भी डरे या घबराए उस सर्प पर कूद गया और उसे पकड़ कर अपने गुरु के पास ले आया… अब वो सर्प इस सब से क्रोधित तो बहुत था परन्तु अपने सामने एक संत को देख कर शांत ही रहा… संत नें कहा ठीक है अब जाने दो इसे और उस शिष्य नें उस सर्प को जाने दिया… अब संत बोले पुत्र तुम्हें उस सर्प से भय नहीं लगा… वह बोला आपके होते मुझे भय क्यों लगे… हुक्म आपका था तो भय भी आपको ही लगना चाहिए… सुन कर संत मुस्करा दिया…

उसी रात्रि जब सब आश्रम में सो रहे थे तो वही सर्प वहां आ गया और उस शिष्य के पास आ कर फुंकारा… जैसे बदला लेने आया हो… शिष्य की नींद खुल गयी और अपने सामने उसी सर्प को देख कर वो कुछ हैरान हुआ परन्तु बिना डरे उसने फिर से उसे पकडने की कोशिश की परन्तु इस बार उस सर्प ने उसके हाथ पर डस लिया… अब पीड़ा में उसने अपने गुरु को समरण किया… और उसे कुछ भी नहीं हुआ… अगली सुबह वह अपने गैरू के सम्मुख हाजिर हुआ और रात्रि की बात कह सुनाई और बोला देख लो मुझे उस विशैले सर्प के काटने से भी कुछ नहीं हुआ…

तभी संत जी मे अपना हाथ आगे करके दिखाया और बोले देख ले भाई तेरी जिम्मेदारी ली है तो जो हुआ यहां हुआ है… उनका हाथ जहर से नीला हो गया था… अब शिष्य अपने गुरु के आगे नतमस्तक हो गया.. शिष्यों को हो न हो परन्तु गुरु को सदैव अपने शिष्यों का ध्यान रहता है…

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ब्रह्ममय आत्मज्ञान ))))

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भरत ऋषि वन में आश्रम बनाकर रहते थे। मोह-माया से मुक्त परम् वैराग्य भाव से संध्या-वंदन, तप करते रहते थे।

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आश्रम में विचरने वाले पशु-पक्षियों से भी उन्हें कोई मोह नहीं था। चाहे साधारण मनुष्य हो, चाहे ऋषि-मुनि हों, सबके मन की अवस्था सदा एक जैसी नहीं रहती।

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एक दिन किसी व्याघ्र ने एक हिरणी का शिकार कर लिया। उसका छोटा-सा बच्चा असहाय-सा भागता हुआ भरत ऋषि के आश्रम में आ गया।

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अचानक उस मातृविहीन मृग-शिशु को देखकर ऋषि के मन में ममता उमड़ आई। जीवों के प्रति दया का भाव ऋषियों-मुनियों का धर्म ही होता है।

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भरत भी उस मृग छौना की ममता में ऐसे फंस गए कि अपने संध्या-वंदन का नित्य धर्म ही भूल गए। जब देखो तब उस शिशु की सेवा में लगे रहते।

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उसकी देखभाल करते। उसके साथ खेलते। उनकी सारी दिनचर्या का मुख्य कर्म वह मृग छौना ही हो गया।

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जीवन में वैराग्य के स्थान पर मोह-ममता की प्रधानता हो गई। वह मृग छौना ज्यों-ज्यों बड़ा होता गया, त्यों-त्यों भरत उसी के मोहपाश में बंधते गए।

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उसको ही खिलाने-पिलाने, देखभाल करने तथा उसके साथ समय बिताने में भरत का जीवन बीतने लगा।

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वह एक तपस्वी थे, आश्रम में रहते थे, पूजा-पाठ, संध्या-वंदन, जप-तप, यम-नियम सब भूल गए।

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जब वह मरने लगे तब भी उनका चित्त ईश्वर के प्रति उन्मुख न होकर उसी हिरण में लगा रहा कि मैं मर जाऊंगा तो कौन इसकी रक्षा करेगा…

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कौन इसके चारे-पानी का ध्यान रखेगा, कौन हिंसक पशुओं से इसे बचाएगा, यही चिंता करते-करते एक दिन उनके प्राण निकल गए।

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कहते हैं, आदमी मरते समय जिस पर आसक्ति रखता है, अगले जन्म में उसी भाव में जन्म लेना पड़ता है। ऋषि भरत के साथ भी यही हुआ।

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अगले जन्म में वह मृग-योनि में पैदा हुए। शरीर भले ही मृग का था, जीव तो ऋषि भरत का ही था। उन्हें पूर्व-जन्म की स्मृति थी, पर कुछ बता नहीं पाते थे।

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समय आने पर इस मृग की मृत्यु हो गई। फिर महर्षि भरत अंगिरा ऋषि के गोत्र में पैदा हुए। पहले के पूर्व जन्मों की स्मृति उन्हें थी।

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मोह ममता के कारण इन्हें बार-बार जन्म लेना पड़ता था। विचार करते-करते उन्हें अद्वैत भाव का पूर्ण ज्ञान हो गया।

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ईश्वर और जीव भिन्न-भिन्न नहीं हैं। उस परब्रह्म परमात्मा का ही एक अंश यह आत्मा है वह चाहे जिस योनि में जिस रूप में, जन्म ले, है ईश्वर का ही अंश।

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इस प्रकार उनके विचार तथा कर्म ब्रह्मस्वरूप हो गए। वह जड़वत ज्ञान-शून्य भाव से व्यवहार करते थे।

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उन्हें शरीर, आत्मा, पशु,पक्षी तथा मनुष्य में कोई भेद ही ज्ञात नहीं होता था। उनकी इसी जड़-भाव स्थिति के कारण उनका नाम ‘जड़ भरत’ हो गया।

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एक बार सौबीर नरेश कुछ ज्ञान प्राप्त करने के लिए महर्षि कपिल के आश्रम जाना चाहते थे। पालकी तैयार की गई। उसे ढोने वाले तीन कहार थे।

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चौथे की खोज थी कि राजा के सेवकों ने हट्टे-कट्टे जड़ भरत को देखा तो उन्हें पकड़कर पालकी ढोने के काम में लगा दिया।

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जड़ भरत अन्य सेवकों की तरह पालकी ढोने लगे। उसके चेहरे से लगता ही नहीं था कि उन्हें किसी काम में लगाया गया था। इसलिए वह अपने भाव में ज्ञान-शून्य जैसे होकर रह रहे थे।

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इससे अन्य कहारों की गति में असुविधा हो रही थी तथा विलंब भी हो रहा था।

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राजा सौबीर ने पालकी से बाहर सिर निकाल कर देखा तो सोचा कि यह नया कहार इस तरह से कंधे पर पालकी को उठा रखे चल रहा था जैसे वह इस काम में लगा ही नहीं है।

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राजा ने पूछा, ‘‘अरे ओ नए कहार ! तू देखने में इतना हट्टा-कट्टा है, स्वस्थ भी खूब है।अभी तूने थोड़ी ही दूर पालकी ढोई, क्या थक गया है जो चला नहीं जाता?’’

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जड़ भरत ने कहा, ‘‘कौन थका है, कौन मोटा-ताजा है, कौन किसकी पालकी ढो रहा है। यह तो शरीर चल रहा है।’’

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राजा ने कहा, ‘‘तुझे दिखाई नहीं देता ? मैं पालकी में बैठा हूँ और पालकी की डांडी तेरे कंधे पर है।’’

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जड़ भरत ने कहा, ‘‘राजन! किसी पर किसी का भार नहीं है। पृथ्वी पर मेरे दोनों पैर हैं, पैर पर कमर, उदर और कंधों का भार है। कंधे पर पालकी में आप हैं।

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मैं पृथ्वी पर चलकर आपकी पालकी ढो रहा हूँ, ये सब मिथ्या है, भ्रम है। आप, मैं तथा अन्य जीव जड़-चेतन सब पंच भूतों के सम्मिलित तत्व हैं। सबके भार पंचभूत-क्षिति, जल, पातक, गगन, समीर ही ढो रहे हैं।

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यदि आप समझते हैं कि पालकी मेरे लिए भार है तो यही बात आप पर भी है। जिन द्रव्यों से यह पालकी बनी है उन्हीं द्रव्यों, तत्वों से इस जगत तथा समस्त जड़-चेतन का निर्माण हुआ है, इसलिए किसी से कोई भेद मत देखिए।

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कहार बने इस ब्राह्मण की बात सुनकर सौबीर नरेश चौंके। उन्हें लगा कि किस ऐसे परम ज्ञानी को हमारे सेवक पकड़कर ले आए और पालकी ढोने के काम में लगा दिया।

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यह तो स्वयं ब्रह्मस्वरूप है तथा इसकी दृष्टि में समस्त ब्रह्मांड और इसमें व्याप्त जड़-चेतन सब ब्रह्ममय है।

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सौबीर अपराध-भाव से दुखी होकर पालकी से उतर पड़े और कहा, ‘‘ब्राह्मण-देवता! अपराध क्षमा हो।

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मैं आत्मज्ञान की प्राप्ति करने के लिए ही महर्षि कपिल के पास जा रहा था, पर ऐसा ब्रह्ममय आत्मज्ञान मुझे आप से इस रूप में मिला, यह मेरा परम् सौभाग्य है।

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आप कौन हैं? मुझे और ज्ञान देकर मेरा कल्याण करें।’’

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जड़ भरत ने राजा सौबीर को बताया, ‘‘मैं कौन हूँ ?, आप कौन हैं? बताने पर सब संज्ञा में होगी। जैसे तुम केवल राजा ही नहीं हो, पिता हो, पुत्र हो, पति हो, शत्रु हो, मित्र हो।

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यह तुम्हारा मस्तक है, पेट है, हाथ-पांव, आंख, कान हैं। क्या तुम इनमें से कोई एक हो?

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ये सब संज्ञाएं हैं, इन सबसे अलग होकर विचार करोगे तब पता चलेगा कि तुम कौन हो। राज्य, धन, सम्पत्ति से कल्याण नहीं होगा। परमार्थ की कामना करो।’’

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जड़ भरत से सौबीर नरेश ने ऐसा आत्मज्ञान प्राप्त किया कि वे सम्पूर्ण प्राणियों को अपने साथ अभिन्न देखने लगे तथा इस तत्वज्ञान का बोध होते ही वे संसार के समस्त विकारों से मुक्त हो दिव्य जीवन बिताने लगे।

[अग्नि पुराण से]

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कुछ साल पहले, मेरी एक सहेली ने सिर्फ 50 साल की उम्र पार की थी। लगभग 8 दिनों बाद वह एक बीमारी से पीड़ित हो गई थी … और उसकी जल्दी ही मृत्यु हो गई।

ग्रुप में हमें एक शोक संदेश प्राप्त हुआ कि … *”दुख की बात है .. वह हमारे साथ नहीं रही ” … RIP*

दो महीने बाद मैंने उसके पति को फोन किया। ऐसे ही मुझे लगा कि .. वह बहुत परेशान होगा. क्योंकि ट्रैवल वाला जॉब था। अपनी मृत्यु तक मेरी सहेली सब कुछ देख लेती थी .. घर .. अपने बच्चों की शिक्षा … वृद्ध ससुराल वालों की देखभाल करना .. उनकी बीमारी .. रिश्तेदारों का प्रबंधन करना .. _ *सब कुछ, सब कुछ, सब कुछ* _

वह कहती रहती थी .. “मेरे घर को मेरे समय की जरूरत है, .. मेरे पति चाय काफ़ी भी नहीं बना पाते, मेरे परिवार को मुझसे हर चीज के लिए जरूरत है, लेकिन कोई भी मेरे द्वारा किए गए प्रयासों की परवाह नहीं करता है और न ही मेरी सराहना करता है। सब मेरी मेहनत को नोर्मल मान के चलते हैं “।

मैंने उसके पति को यह जानने के लिए फ़ोन किया कि क्या परिवार को किसी सहारे की जरूरत है. मुझे लगा कि उनके पति बहुत परेशान होंगे .. अचानक से सारी ज़िम्मेदारियों को निभाना है, उम्र बढ़ने के साथ साथ .. माता-पिता, बच्चे, अपनी नौकरी , इस पर अकेलापन उम्र .. कैसे होंगे बेचारे ?

फोन कुछ समय के लिए बजा ..नही उठाया … एक घंटे के बाद उन्होंने वापस कॉल किया.. उसने माफी मांगी कि वह मेरे कॉल का जवाब नहीं दे पाए. क्यूँकि अपने क्लब में एक घंटे के लिए टेनिस खेलना शुरू किया था और दोस्तों से मिलना वग़ैरह भी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका समय ठीक से गुजर जाए।

यहां तक कि उन्होंने पुणे में ट्रान्स्फ़र करवा लिया। इसलिए अब ट्रैवल नही करना पड़ता ।

“घर पर सब ठीक है?” मैंने पूछा;

उन्होंने जवाब दिया, एक रसोइया रख लिया है .. थोड़ा और पेमेंट किया तो वह किराने का सामान और सब्ज़ी फल वग़ैरह भी ला देगा । उन्होंने अपने बूढ़े माता-पिता के लिए *फ़ुल टाइम केयर टेकर* रख ली थी।

“ठीक चल रहा है … बच्चे भी ठीक हैं। जीवन धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लौट रहा है “… उन्होंने कहा।

मैं मुश्किल से एक-दो वाक्य बोल पायी और हमारी बात पूरी हो गयी ।

मेरी आंखों में आंसू आ गए।

मेरी सहेली मेरे ख्यालों में आ रही थी … उसने अपनी सास की छोटी सी बीमारी के लिए हमारे स्कूल के पुनर्मिलन को छोड़ दिया था। वो अपनी भतीजी की शादी में नही गयी क्योंकि उसको अपने घर में मरम्मत के काम की देखरेख करनी थी।

वह कई मजेदार पार्टियों और फिल्मों से चूक गई थी क्योंकि उसके बच्चों की परीक्षा थी और उसे खाना बनाना था, उसे अपने पति की जरूरतों का ख्याल रखना था …

उसने हमेशा कुछ प्रशंसा और कुछ पहचान की तलाश की थी .. जो उसे कभी नहीं मिली।

आज मुझे उसका कहने का मन हो रहा है ।।

यहाँ कोई भी अपरिहार्य नहीं है।

और कोई भी याद नहीं किया जाएगा .. यह सिर्फ हमारे दिमाग का भ्रम है।

शायद यह सांत्वना है .. या यूँ कहें की हमारे समझने का तरीक़ा… जब आप दूसरों को खुद से पहले रखते हैं तो वास्तव में आप यह भी दिखा रहे होते हैं की आप पहले नहीं हैं

*रियालिटी बाइट्स* :

_ उसके मरने के बाद उन्होंने दो और नौकरानियाँ रख ली गईं और घर ठीक चल रहा था

इसलिए

मन का यह वहम हटा दो कि मैं अपरिहार्य हूं और मेरे बिना घर नहीं चलेगा ..

💟 *सभी महिलाओं को मेरा संदेश:*

*सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने आप के लिए समय निकालें ..*

… *अपने दोस्तों के साथ संपर्क में रहें … बात करें, हंसें और आनंद लें*

*अपने शौक़ पूरे करो, अपने जुनून को जियो, अपनी जिंदगी को जियो*

*कभी कभार वो उन चीजों को करें जो करने में हमें मज़ा आता हैं …*

💙 दूसरों में अपनी ख़ुशी मत देखो, *तुम भी कुछ खुशियों के हकदार हो* क्योंकि अगर तुम खुश नहीं हो तो तुम दूसरों को खुश नहीं कर सकते

हर किसी को आपकी ज़रूरत है, लेकिन आपको भी अपनी देखभाल और प्यार की ज़रूरत है।

*हम सभी के पास जीने के लिए केवल एक ही जीवन है*

#UM.. 🙏

*ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है 🙏🏻👍🏻

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एक भक्त था जिसका नाम था गोवर्धन। गोवर्धन एक ग्वाला था। बचपन से दूसरों पे आश्रित क्योंकि उसका कोई नहीं था और जिस गाँव में रहता, वहाँ की लोगो की गायें आदि चरा कर जो मिलता, उसी से अपना जीवन चलाता, पर गाँव के सभी लोग उस से बहुत प्यार करते थे !

एक दिन गाँव की एक महिला, जिसे वह काकी कहता था, के साथ उसे वृन्दावन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उसने वृन्दावन के ठाकुर श्री बाँकेबिहारी जी के बारे बहुत कुछ सुना था, सो दर्शन की इच्छा तो मन में पहले से थी।

वृन्दावन पहुँच कर जब उसने बिहारी जी के दर्शन किये, तो वो उन्हे देखता ही रह गया, और उनकी छवि में खो गया। एकाएक उसे लगा के जैसे ठाकुर जी उसको कह रहे हैं, “आ गए मेरे गोवर्धन ! मैं कब से प्रतीक्षा कर रहा था, मैं गायें चराते थक गया हूँ, अब तू ही मेरी गायें चराने जाया कर।” गोवर्धन ने मन ही मन “हाँ” कही। इतनी में गोस्वामी जी ने पर्दा डाल दिया, तो गोवर्धन का ध्यान टूटा।

जब मन्दिर बन्द होने लगा, तो एक सफाई कर्मचारी ने उसे बाहर जाने को कहा।

गोवर्धन ने सोचा, ठीक ही तो कह रहे है, सारा दिन गायें चराते हुए ठाकुर जी थक जाते होंगे, सो अब आराम करेंगे, तो उसने सेवक से कहा, ठीक है, पर तुम बिहारी जी से कहना कि कल से उनकी गायें चराने मैं ले जाऊँगा। इतना कह वो चल दिया। सेवक ने उसकी भोली सी बात गोस्वामी जी को बताई। गोस्वामी जी ने सोचा, कोई बिहारी जी के लिए अनन्य भक्ति ले कर आया है, चलो यहाँ रह कर गायें भी चरा लेगा, और उसके खाने पीने, रहने का इंतजाम मैं कर दूँगा।

गोवर्धन गोस्वामी जी के मार्ग दर्शन में गायें चराने लगा। सारा सामान और दोपहर का भोजन इत्यादि उसे वही भेज दिया जाता.

एक दिन मन्दिर में भव्य उत्सव था। गोस्वामी जी व्यस्त होने के कारण गोवर्धन को भोजन भेजना भूल गए। पर भगवान् को तो अपने भक्त का ध्यान नहीं भूलता। उन्होने अपने एक वस्त्र में कुछ मिष्ठान इत्यादि बाँधे और पहुँच गए यमुना पर गोवर्धन के पास। गोवर्धन ने कहा, आज बड़ी देर कर दी, बहुत भूख लगी है। गोवर्धन ने जल्दी से सेवक के हाथ से पोटली ले कर भर पेट भोजन पाया। इतने में सेवक जाने कहाँ चला गया, अपना वस्त्र वहीँ छोड़ कर।

शाम को जब गोस्वामी जी को भूल का एहसास हुआ, तो उन्होने गोवर्धन से क्षमा मांगी। तो गोवर्धन ने कहा, “अरे आप क्या कह रहे है, आपने ही तो आज नए सेवक को भेजा था, प्रसाद देकर, ये देखो वस्त्र, जो वो जल्दी में मेरे पास छोड़ गया।”

गोस्वामी जी ने वस्त्र देखा तो आश्चर्यचकित हो गए और गोवर्धन पर बिहारी जी की कृपा देख आनंदित हो उठे। ये वस्त्र स्वयं बिहारी जी का पटका (गले में पहनने वाला वस्त्र) था, जो उन्होने खुद सुबह बिहारी जी को पहनाया था।

ऐसे है हमारे बिहारी जी जो भक्तों के लिए पल में दौड़े आते हैं।