Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

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● हैरतअंगेज काँड 😮

दिनांक 24 मई 1971
सुबह 11:00 बजे

भारतीय स्टेट बैंक
संसद भवन मार्ग
नयी दिल्ली

तब स्टेट बैंक की उस शाखा के चीफ कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा होते थे। उस दिन उनके पास इंदिरा गांधी के तत्कालीन मुख्य सचिव पी एन हक्सर का या उनकी आवाज़ में एक फोन आता हैः

‘आप के पास एक आदमी फलाँ कोडवर्ड लेकर आयेगा तो आप उसे 60 लाख रु दे देना।’

इसी दौरान पी एन हक्सर ने कथितरूप से इंदिरा गांधी से भी उनकी बात करवाई। बाद में ऐसा ही हुआ और केशियर साहब ने उस आदमी को 60 लाख रु दो अटैचियों में भर कर दे दिये और वह उन्हें ले कर चला गया।

अब आप सोचेंः

मान लो कि आपका नाम अनिल है और आप पार्क में घूमने गये हुए हैं। तभी कोई नितान्त अंजान आदमी आपके घर आ कर आपकी पत्नी को कहे कि कौशिश साहब ने 100 रु मँगवाये हैं। तो क्या वे उस आदमी को 100 रु का नोट दे देंगी? अजी 100 रु की तो बात छोड़िये वे 10 रु का नोट भी न दें।

पर केवल 300-350 रुपल्ली तनखवाह लेने चीफ कैशियर मल्होत्रा ने उस नितान्त अंजान आदमी को 1971 हाँ जी 1971 में बिना किसी लिखा पढ़ी और जान पहचान के 60 लाख रु दे दिये थे।

मजे की बात यह है कि उस चीफ कैशियर ने इतनी बड़ी रकम शाखा के प्रबंधक से पूछे बिना ही दे दी थी।

कमाल है। आज 51 साल के बाद उन 60 लाख रु की कीमत 200-250 करोड़ रु तो बैठती ही होगी। तब सोने का भाव 160 रु प्रति 10 ग्राम होता था।

चलो आगे बढ़ते हैं

उस आदमी के जाते ही केशियर ने प्रधानमंत्री कार्यालय को फोन मिलाया। शायद उस समय इंदिरा गांधी अपने कार्यालय में नहीं होंगी तो किसी और किसीने फोन उठाया और चीफ कैशियर ने उसे पी एन हक्सर समझ कर यह बता दिया कि फलाने आदमी को 60 लाख रु दे दिये हैं।

मतलब बात लीक हो गयी थी। फिर तो ऊपर से लेकर नीचे तक हड़कंप मच गया था। उसके अगले दिन के सभी समाचार पत्र इससे रंग गये थे।तुरंत पुलिस थाने में रपट लिखवायी गयी। उसके तीसरे दिन ही पुलिस ने दिल्ली के ही एक कमरे में उस आदमी को दबोच लिया और उसके पास से 59 लाख 95 हजार रु बरामद कर लिये थे।

आनन फानन में शायद उसी दिन उसे कोर्ट में पेश किया गया।

उस आदमी का नाम था रुस्तम सोहराबजी नागरवाला

उसके बाद का घटनाक्रम

फिर बीस मिनट में ही

० चार्जशीट दाखिल हो गयी।
० आरोप तय हो गये।
० सरकारी वकील ने दलीलें रखी तो बचाव पक्ष ने भी तर्क रखे।
० फिर आपसी बहस (cross examination) भी हो गये।

० कोर्ट का फैसला भी टाइप हो गया।

० और तो और उन्हीं बीस मिनटों में ही नागरवाला को साढ़े चार साल की सज़ा सुना कर जेल भेज दिया गया।

तारीख पर तारीख वाली बात उस दिन नानी के यहाँ गयी हुई थी 😀

(यह भी हो सकता है कि उसे वकील उपलब्ध ही न करवाया गया हो)

है ना कमाल की बात!

उसके बाद उसने जेल में किसी को यह कहा थाः

‘यदि मैं मुँह खोल दूँ तो देश की राजनीति में भूचाल आ जायेगा।’

(यह तब के समाचार पत्रों में छपा था और इस समाचार को मैंने स्वयं पढ़ा था)

इस बात के तीन दिन के भीतर ही ‘हार्ट अटैक’ के कारण उसकी मौत बतायी गयी थी।

पते की बात

इतना बड़ा काँड होने के बावजूद स्टेट बैंक के चीफ कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा को पुलिस ने गिरफ्तार तक नहीं किया था। बाद में मल्होत्रा ने या तो बैंक की नौकरी छोड़ दी थी या बैंक ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था फिर उन्होंने संजय गांधी की कं में (शायद मारुती कार) में नौकरी करनी शुरू कर दी थी।

है ना हैरानगी की बात कि इतने बड़े काँड के जिम्मेदार व्यक्ति को संजय गांधी ने नौकरी दे दी थी।

एक और बात

इस केस के कुछ गवाहों समेत जाँच करने वाले तीन-चार पुलिस अधिकारी सड़क दुर्घटना और संदेहास्पद स्थियों में मरे पाये गये थे। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इस मामले की तह तक जाने के लिये नागरवाला जाँच आयोग के नाम से एक आयोग भी बिठाया गया था मगर उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा था।

■ बात की सत्यता जानने के लिये गूगल पर नागरवाला काँड खोजिये और पढ़िये। इस पर आज भी बहुत सी प्रतिष्ठित वेबसाइट पर यह सब लिखा है।

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सर्दी की एक रात💐💐

मैं थक-हार कर काम से घर वापस जा रहा था। कार में शीशे बंद होते हुए भी..जाने कहाँ से ठंडी-ठंडी हवा अंदर आ रही थी…मैं उस सुराख को ढूंढने की कोशिश करने लगा..पर नाकामयाब रहा।

कड़ाके की ठण्ड में आधे घंटे की ड्राइव के बाद मैं घर पहुंचा…

रात के 12 बज चुके थे, मैं घर के बाहर कार से आवाज देने लगा….बहुत देर हॉर्न भी बजाया…शायद सब सो चुके थे…

10 मिनट बाद खुद ही उतर कर गेट खोला….सर्द रात के सन्नाटे में मेरे जूतों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी…

कार अन्दर कर जब दुबारा गेट बंद करने लगा तभी मैंने देखा एक 8-10 साल का बच्चा, अपने कुत्ते के साथ मेरे घर के सामने फुटपाथ पर सो रहा है… वह एक अधफटी चादर ओढ़े हुए था …

उसको देख कर मैंने उसकी ठण्ड महसूस करने की कोशिश की तो एकदम सकपका गया..

मैंने महंगी जेकेट पहनी हुई थी फिर भी मैं ठण्ड को कोस रहा था…और बेचारा वो बच्चा…मैं उसके बारे में सोच ही रहा था कि इतने में वो कुत्ता बच्चे की चादर छोड़ मेरी कार के नीचे आ कर सो गया।

मेरी कार का इंजन गरम था…शयद उसकी गरमाहट कुत्ते को सुकून दे रही थी…

फिर मैंने कुत्ते की भागने की बजाय उसे वहीं सोने दिया…और बिना अधिक आहट किये पीछे का ताला खोल घर में घुस गया… सब के सब सो रहे थे….मैं चुप-चाप अपने कमरे में चला गया।

जैसे ही मैंने सोने के लिए रजाई उठाई…उस लड़के का ख्याल मन आया…सोचा मैं कितना स्वार्थी हूँ….मेरे पास विकल्प के तौर पर कम्बल ,चादर ,रजाई सब थे… पर उस बच्चे के पास एक अधफटी चादर भर थी… फिर भी वो बच्चा उस अधफटी चादर को भी कुत्ते के साथ बाँट कर सो रहा था और मुझे घर में फ़ालतू पड़े कम्बल और चादर भी किसी को देना गवारा नहीं था…

यही सोचते-सोचते ना जाने कब मेरी आँख लग गयी ….अगले दिन सुबह उठा तो देखा घर के बहार भीड़ लगी हुई थी..

बाहर निकला तो किसी को बोलते सुना-

अरे वो चाय बेचने वाला सोनू कल रात ठण्ड से मर गया..

मेरी पलके कांपी और एक आंसू की बूंद मेरी आँख से छलक गयी..उस बच्चे की मौत से किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा…बस वो कुत्ता अपने नन्हे दोस्त के बगल में गुमसुम बैठा था….मानो उसे उठाने की कोशिश कर रहा हो!

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हथौड़ा और चाबी💐💐

नयासर शहर की तंग गलियों के बीच एक पुरानी ताले की दूकान थी। लोग वहां से ताला-चाबी खरीदते और कभी-कभी चाबी खोने पर डुप्लीकेट चाबी बनवाने भी आते। ताले वाले की दुकान में एक भारी-भरकम हथौड़ा भी था जो कभी-कभार ताले तोड़ने के काम आता था।
हथौड़ा अक्सर सोचा करता कि आखिर इन छोटी-छोटी चाबियों में कौन सी खूबी है जो इतने मजबूत तालों को भी चुटकियों में खोल देती हैं जबकि मुझे इसके लिए कितने प्रहार करने पड़ते हैं?

एक दिन उससे रहा नहीं गया, और दूकान बंद होने के बाद उसने एक नन्ही चाबी से पूछा, “बहन ये बताओ कि आखिर तुम्हारे अन्दर ऐसी कौन सी शक्ति है जो तुम इतने जिद्दी तालों को भी बड़ी आसानी से खोल देती हो, जबकि मैं इतना बलशाली होते हुए भी ऐसा नहीं कर पाता?”

चाबी मुस्कुराई और बोली,

दरअसल, तुम तालों को खोलने के लिए बल का प्रयोग करते हो…उनके ऊपर प्रहार करते हो…और ऐसा करने से ताला खुलता नहीं टूट जाता है….जबकि मैं ताले को बिलकुल भी चोट नहीं पहुंचाती….बल्कि मैं तो उसके मन में उतर कर उसके हृदय को स्पर्श करती हूँ और उसके दिल में अपनी जगह बनाती हूँ। इसके बाद जैसे ही मैं उससे खुलने का निवेदन करती हूँ, वह फ़ौरन खुल जाता है।

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बादल और राजा


बादल और राजा💐💐

बादल अरबी नस्ल का एक शानदार घोड़ा था। वह अभी 1 साल का ही था और रोज अपने पिता – “राजा” के साथ ट्रैक पर जाता था। राजा
घोड़ों की बाधा दौड़ का चैंपियन था और कई सालों से वह अपने मालिक को सर्वश्रेष्ठ घुड़सवार का खिताब दिला रहा था।

एक दिन जब राजा ने बादल को ट्रैक के किनारे उदास खड़े देखा तो बोला, ” क्या हुआ बेटा तुम इस तरह उदास क्यों खड़े हो?”

“कुछ नहीं पिताजी…आज मैंने आपकी तरह उस पहली बाधा को कूदने का प्रयास किया लेकिन मैं मुंह के बल गिर पड़ा…मैं कभी आपकी तरह काबिल नहीं बन पाऊंगा…”

राजा बादल की बात समझ गया। अगले दिन सुबह-सुबह वह बादल को लेकर ट्रैक पर आया और एक लकड़ी के लट्ठ की तरफ इशारा करते हुए बोला- ” चलो बादल, ज़रा उसे लट्ठ के ऊपर से कूद कर तो दिखाओ।”

बादला हंसते हुए बोला, “क्या पिताजी, वो तो ज़मीन पे पड़ा है…उसे कूदने में क्या रखा है…मैं तो उन बाधाओं को कूदना चाहता हूँ जिन्हें आप कूदते हैं।”

“मैं जैसा कहता हूँ करो।”, राजा ने लगभग डपटते हुए कहा।

अगले ही क्षण बादल लकड़ी के लट्ठ की और दौड़ा और उसे कूद कर पार कर गया।

“शाबाश! ऐसे ही बार-बार कूद कर दिखाओ!”, राजा उसका उत्साह बढाता रहा।

अगले दिन बादल उत्साहित था कि शायद आज उसे बड़ी बाधाओं को कूदने का मौका मिले पर राजा ने फिर उसी लट्ठ को कूदने का निर्देश दिया।

करीब 1 हफ्ते ऐसे ही चलता रहा फिर उसके बाद राजा ने बादल से थोड़े और बड़े लट्ठ कूदने की प्रैक्टिस कराई।

इस तरह हर हफ्ते थोड़ा-थोड़ा कर के बादल के कूदने की क्षमता बढती गयी और एक दिन वो भी आ गया जब राजा उसे ट्रैक पर ले गया।

महीनो बाद आज एक बार फिर बादल उसी बाधा के सामने खड़ा था जिस पर पिछली बार वह मुंह के बल गिर पड़ा था… बादल ने दौड़ना शुरू किया… उसके टापों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी… 1…2…3….जम्प….और बादल बाधा के उस पार था।

आज बादल की ख़ुशी का ठिकाना न था…आज उसे अन्दर से विश्वास हो गया कि एक दिन वो भी अपने पिता की तरह चैंपियन घोड़ा बन सकता है और इस विश्वास के बलबूते आगे चल कर बादल भी एक चैंपियन घोड़ा बना।

दोस्तों, बहुत से लोग सिर्फ इसलिए लक्ष्य हासिल नहीं कर पाते क्योंकि वो एक बड़ी चुनौती को छोटी छोटी चुनोतियों में हिस्सा नहीं कर पाते। इसलिए अगर आप भी अपनी जिंदगी में एक विजेता बनना चाहते हैं…एक बड़ा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं तो नियमानुसार उसे पाने के लिए आगे बढिए… पहले छोटी-छोटी बाधाओं को पार करिए और उस बड़े लक्ष्य को प्राप्त कर अपना जीवन सफल बनाइये।

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बघर


बघर💐💐

यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, इतनी देर क्यों कर दी! “उफ्फ” हर बात में रोक टोक, हर बात में नाराजगी।
मैं भी गुस्से से खाना छोड़, घर से बाहर एक पार्क की तरफ बढ़ गया।

मम्मी के लगातार फोन से परेशान होकर, मैंने अपना मोबाइल फोन ही स्विच ऑफ कर दिया।

पार्क के गेट से लगे एक बेंच पर बैठने ही वाला था कि इस ठंड भरी रात में नज़र एक शख्स की तरफ गई। जो एक पतली सी चादर ओढ़े, बिल्कुल अकेला एक बैग लिए बैठा था। कुछ किताबें खोल, उस बेंच से लगे लाइट के नीचे, वो किताबों में नज़रें गढ़ाए हुए था।

ये भी शायद मेरी ही तरह गुस्से में घर से आया हो। मैंने अपनी जैकेट की चेन बंद कर पॉकेट में हाथ डाला और वहीं पास में ही बैठ गया। रात के तकरीबन दस बजे होंगे। हम दोनों के सिवा यहां कोई तीसरा नज़र नहीं आ रहा था। इसलिए मेरी नज़र बार बार उसी पर जा रही थी। मगर उसने मुझे एक बार भी नहीं देखा।उसे देख ये महसूस हो रहा था कि उसे ठंड लग रही थी।

उत्सुकतावश मैंने ही पूछ लिया
“तुम भी..घरवालों से नाराज हो..क्या..?”

उसने मेरी तरफ देखा..फिर कुछ सोचने लग गया
“मैं आप..ही से पूछ..रहा हूँ”
मैंने फिर से उससे पूछा।

उसने पहली बार किताबों को छोड़ मेरी तरफ देख कर कहा
“नही भाई..मैं उनसे क्यूं नाराज होऊंगा, वो तो मुझसे मीलों दूर हैं”

“तो इतनी..रात को यूं यहां..?”

उसने बड़ी उदास होकर कहा

“यहां जिस कमरे में रहता था, उन्होंने अचानक वो खाली करा दिया, उनकी कोई दूर की रिश्तेदार आईं हैं, अब वहीं रहेंगी। एक कमरे की बात हुई है, पर वो परसों से मिलेगा.. कोई होटल ले नहीं सकता अभी..उतने पैसे..”

उसकी बातें खत्म भी नहीं हुई कि उसके मोबाइल पर किसी का कॉल आ गया
“हेल्लो माँ!.. हां माँ.. खाना खा लिया..अभी..अभी खाया माँ.. हां माँ ठीक से हूँ….पापा को बोलना..वो मेरे पैसे के लिए परेशान नहीं होंगे. मैं मैनेज कर लूंगा..नहीं माँ उतनी ठंड नहीं है यहां.. हां माँ मिल जाएगा.. हां माँ.. बाय.. माँ”

फोन रखते रखते उसकी आँखें भीग आईं थीं, उसे देख मैं आत्मग्लानि से भर अपने फोन को तुरंत ऑन किया। मम्मी का फोन अब भी आ रहा था।

“हेल्लो, कहाँ है बेटे? कब से फोन कर रही हूँ…घर आ जा जल्दी..पापा ने भी अभी तक खाना नहीं खाया है”

“आ रहा हूँ..मम्मी, अच्छा सुनो..वो आगे वाला खाली पड़ा कमरा, दो दिनों के लिए किसी को मिल सकता है क्या?”

मैंने मम्मी से उस लड़के की पूरी बात बता दी। फोन पापा ने ले लिया
“ले आ उसे भी..और सुन..बात बात पर, घर छोड़ कर नहीं जाते”
पापा की आवाज में मेरे लिए जो दर्द था, उसने मेरी आँखों में भी आंसू ला दिए थे।

“हां पापा..”

मैं उस लड़के का बैग उठा, उसके साथ, घर की ओर चल पड़ा। घर क्या होता है, आज इस बेघर ने..मुझे समझा दिया है.!

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हमारे इलाके एक मंदिर है , जहाँ के पंडित लगभग २० साल से पंडिताई कर कर रहे हैं ।एक बार मंदिर जाने पर मेरे पास आये और बोले ,” मेरे बेटे की फीस में ३००० रूपये की कमी पड़ रही है , कुछ लोगों से कहा है पर ईश्वर की इच्छा उनके पास भी इस समय नहीं हैं , अगर आप मदद कर सके तो … मैं बाद में वापस कर दूँगा ,बच्चे का साल बर्बाद हो जाएगा , २० साल से मंदिर की सेवा में हूँ , यहीं ,मैं आपको जुबान दे रहा हूँ … मैं आप के पैसे अवश्य लौटा दूंगा।मैंने घर आ कर पैसे निकाल कर उनको दे दिए क्योंकि मुझे उनकी बात में सच्चाई दिखी।मेरे साथ उस समय मेरी पड़ोसन भी गयी थीं , उन्होंने मुझसे कहा ,” कौन लौटाता है , आप उन पैसों को भूल जाइए, मुझे भी उस समय यही लगा कि हो सकता है ऐसा हो , फिर भी मुझे ये तसल्ली थी कि वो पैसे बच्चे की शिक्षा में लगे हैं। इसलिए शाम को मैंने पति को पूरी घटना बताते हुए कहा ,” मैंने एक बच्चे की शिक्षा के लिए वो पैसे दिए हैं , अगर वो नहीं लौटाते हैं तो ठीक है वो उनके बच्चे की शिक्षा में लग गए , अगर लौटा देते हैं तो मैं किसी दूसरे बच्चे की शिक्षा में वो पैसे लगा दूँगी …

इसके बाद कई महीने बीत गए … मैंने उनसे कभी पैसों के बारे में बात नहीं की , वो स्वयं ही कहते रहे कि मैं लौटा दूँगा , लौटा दूँगा और मैं कोई बात नहीं कह कर आगे बढ़ जाती। करीब एक साल बाद वो मेरे पास आये और पैसे लौटते हुए बोले ,” आज ईश्वर की कृपा से मैं मुक्त हुआ , बहुत विपरीत परिस्थितियाँ आयीं, समय पर नहीं लौटा सका , पर अपना संकल्प सदा याद रहा , कागज़ में लिख कर रख लिया था।वो पैसे दे कर चले गए | मैंने वो पैसे किसी और बच्चे की शिक्षा में लगाने के लिए रख लिए।लेकिन मैं सोचती रही कि दिल्ली के एक पोर्श इलाके का मंदिर , जहाँ अक्सर आयोजन होते रहते हैं वहाँ का पंडित मात्र ३००० रुपये जमा कर लौटाने के लिए इतना संघर्ष करता रहा।वो पंडित जिसकी ड्यूटी सुबह ६ बजे से रात ९ बजे तक चलती है , जो नयी कारों के आगे मन्त्र पढ़ कर नारियल फोड़ने के बाद भी स्वयं सायकिल से चलता है।कहाँ है उसके पास पैसा ?

इसी में मुझे एक घटना याद आ गयी। आज से करीब २५ साल पहले की बात है हमारे गाँव के पंडित जो अक्सर हमारे घर आया करते थे और माँ उनको आटा , घी , शक्कर आदि बाँध कर दे देती थी।एक बार वो पिताजी से बात कर रहे थे , हमने तो कर ली पंडिताई अब बेटा नहीं करेगा | उनकी मासिक तनख्वाह मात्र दो अंको में थी , जो उस समय गाँव में कुये से पानी भरने वालों से भी कम थी।उनका जीवन इसी भिक्षा और शादी ब्याह में चढ़ाए गए पैसों से चलता था ।अक्सर पंडितों को भोजन भट्ट , खाऊ , पैसा ऐठने वाले से संबोधित किया जाता है | क्या दुबले -पतले सूखे बीमार पंडित बहुतायत से नहीं हैं ?

कुछ प्रसिद्द बड़े मंदिरों , मठों की बात छोड़ दें तो जरा आप भी ध्यान दीजिये हमारे घरों में पूजा पाठ करने वाले , शादी–ब्याह कराने वाले , मुंडन–जनेऊ करने वाले कितने पंडित ऐसे हैं जिनकी अट्टालिकाएं खड़ी हैं , कार से चलते हैं या बैंक लबालब भरे हैं।या तो हम कह दे कि हमें मंदिर ही नहीं चाहिए, लेकिन अगर हमें मंदिर चाहिए , मदिर में पूजा –पाठ , घंटा ध्वनि , मंत्रोच्चार के लिए एक पंडित चाहिए ,तो पंडित को ११ रुपये देते समय हमें क्यों अहसान करने जैसा महसूस होता है , इससे ज्यादा तो हम होटल में टिप देते हुए खुद को शिष्ट महसूस करते हैं | क्या पंडित के परिवार नहीं है |

एक बार फिर से या तो हम कह दें कि हमें मंदिर ही नहीं चाहिए | लेकिन अगर हमें मंदिर चाहिए , और मंदिर में आरती करने के लिए एक पंडित भी चाहिए तो उसकी इतनी तनख्वाह तो हो कि वो अपना जीवन यापन कर सके।
व्हाट्सएप से साभार ।
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।।हर हर महादेव।।