Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#सोचिए कितना दिलचस्प है:

भारत का दावा है कि यूनाइटेड किंगडम के प्रधान मंत्री ऋषि सनक उनके मूल के हैं, क्योंकि उनके दादा-दादी ब्रिटिश शासन के तहत अविभाजित भारत से चले गए थे।

पाकिस्तान यह भी दावा करता है कि ऋषि सनक उनके पुत्र हैं क्योंकि उनके दादा का जन्म उनकी पंजाब भूमि में हुआ था।

केन्या का दावा है कि ऋषि सनक के पिता यशवीर सनक का जन्म केन्या में हुआ था। वे उसके मूल का भी दावा क्यों न करें।????

UK कहते हैं कि कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऋषि का जन्म यूके के साउथेम्प्टन में हुआ था। तो वह एक अंग्रेज है।

दक्षिण अफ्रीका भी अपने मूल का दावा करता है, क्योंकि ऋषि की माता उषा का जन्म वहीं हुआ था।

भारत यह भी दावा करता है कि ऋषि जी आराध्य दामाद हैं क्योंकि उन्होंने नारायण मूर्ति की बेटी अक्षता मूर्ति से शादी की थी।

USA अब यह दावा करते हुए युद्ध के मैदान में उतरता है कि अक्षता मूर्ति अब अमेरिकी नागरिक है, इसलिए, ऋषि अब उनका दामाद है।
😊

✍️ मोरल ऑफ़ द स्टोरी ✍️

सफलता के कई पिताजी होते हैं और असफलता अनाथ होती है।

Posted in हास्यमेव जयते

ચુંટણી જાહેર થતાં એક નેતા લોક સંપર્ક માટે ગામડામાં ગયા. લોકો એકત્ર થયા એટલે નેતાજીએ કહ્યું: “તમારા ગામની કોઈ સમસ્યા હોય તો કહો.”

લોકોએ કહ્યું: “અમારા ગામમાં સરકારી દવાખાનુ છે પણ કાયમી ડોક્ટર નથી. એનું કંઈક કરો.”

નેતાજીએ ખીસ્સામાંથી પોતાનો રેડ મી નોટ4 કાઢીને લગાવ્યો. થોડી વાત કરીને ફોનમાં ધમકી આપી કે ચોવીસ કલાકમાં કાયમી ડોક્ટર નહીં મળે તો તમારી બદલી કરાવી નાંખીશ. પછી લોકોને કહ્યું: “ચાલો, આ સમસ્યા હલ થઈ ગઈ. હવે બીજી કોઈ સમસ્યા હોય તો કહો.”

લોકોએ કહ્યું: “બીજો મોટો પ્રશ્ન એ છે કે અમારા ગામમાં કોઈ કંપનીનું નેટવર્ક મળતું નથી તેનું કંઈક કરો.”

નેતાજીએ ફોન ખીસ્સામાં નાંખીને ચાલતી પકડી…
🤣😂😅

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मौत तो एक दिन आनी ही है…..

एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था, और वह सोचता था कि मेरी किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। वह क्या करे?

एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को ही अपना मित्र बना लिया। उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगे !

काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इसलिए मैं मजबूर हूं, पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं करूंगा ही मुझसे क्या आशा रखते हो , साफ-साफ कहो। व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं…..

काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा चिंता मत करो चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो……

वह व्यक्ति बड़ा ही प्रसन्न हुआ। सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे…..

दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- “मित्र अब समय पूरा हुआ मेरे साथ चलिए मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा…..

उस व्यक्ति के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- ,”धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती”?…

तुमने मुझे वचन दिया था कि आने से पहले पत्र लिखूंगा। परंतु तुम तो बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए. मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया….

काल हंसा और बोला-, “मित्र इतना झूठ तो न बोलो। मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे आपने एक भी उत्तर नहीं दिया। उस व्यक्ति ने चौंककर पूछा – कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ…..

काल ने कहा – मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं….

मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बाल, उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो…..

बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं…..

कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा. नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया…..

इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा….

इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया।आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे। मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बार एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है…..

अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया…..

वह व्यक्ति काल के भेजे हुए इन पत्रों को सुन कर फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा…..

मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा, अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल ही नहीं आया…..

काल ने कहा – ,”आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर तुमने कर्म किये”…..

उस व्यक्ति को जब कोई मार्ग दिखाई नहीं दिया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया…..

काल ने हंसकर कहा – ,”मित्र यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है। धन-दौलत, शोहरत, सत्ता ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है मुझे नहीं”…..

…..काल ने उत्तर दिया – यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था, अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है…..

तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद, तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा, मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निर्वस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है। काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा…..

सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर….

एक ही सत्य है जो अटल है वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर, हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है, समय के गर्भ में छुपा होता है. परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है। समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु परमेश्वर की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए….

इस में तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु परमेश्वर की याद में रहकर ही कर्म करने चाहियें…..!

सभी मित्रों को सुबह सुबह की राम राम🙏
जय श्रीराम!

Posted in संस्कृत साहित्य

तो एक दिन बालक मूलशंकर ने देखा कि भगवान की मूर्ति के सामने रखे प्रसाद को एक चूहा खा रहा है। तो उन्होंने प्रसाद खाते चूहे को देखकर ये निष्कर्ष निकाला कि जो भगवान अपने प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वो हमारी क्या करेगा फिर उन्होंने बड़े होकर मूर्ति पूजा को पाखंड बताते हुए एक किताब लिखी सत्यार्थ प्रकाश और Guess What एक दिन चूहा उनकी किताब भी कुतर गया। तो क्या हमें इससे ये निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि किताब बकवास है क्योंकि चूहा खा गए। चूहा तो प्रसाद भी खा सकता है और किताब भी। उसे आपका अध्यात्म और तर्क दोनों ही समझ नहीं आते। अब मैं सोचता हूं ये कितनी बकवास कहानी थी जो बचपन में हमें पढ़ाई जाती थी।

बिल्कुल ऐसी ही बात बीबीसी ने लिखी है कि गुरु नानक देव जी ने बचपन में जनेऊ को पाखंड बताते हुए जनेऊ पहनने से मना कर दिया। जिस पर इन भाई साहब का कहना है कि गुरू नानक जी पंडित से कहा वो मुझे वो जनेऊ पहनाओं जो “जो दया रूपी कपास, संतोष रूपी सूत, जत रूपी गांठ और सत्य रूपी लपेटे का बना हो।”

इसपर जब मैंने इनसे पूछा कि क्या ऐसे किसी कपड़े का पग मिल सकता है अगर मैं पहनना चाहूं तो उन्होंने मना कर दिया। अब तीन धागों का जनेऊ पहनना पाखंड है लेकिन तीन मीटर का पग पहनना पाखंड नहीं है।

आप जैसे मूर्ति का अंधविश्वास कह सकते हैं, जनेऊ को पाखंड बता सकते हैं। ऐसे पग को नहीं कह सकते और आपको कहना भी नहीं चाहिए। क्या बीबीसी किसी और धर्म के धार्मिक प्रतीक को ऐसे अंधविश्वास बताते हुए स्टोरी कर सकता है या उसे करनी चाहिए।

खैर, सोचिए जब 11 साल के नानक जी ने जनेऊ पहनने से मना किया तो पुजारी ने क्या किया वो उनके बालमन में उपजे सवालों से प्रभावित हुआ और उनका बिना जनेऊ संस्कार किए वहां से चला गया। ये ही भारत है हम सवाल उठाते नानक भी हैं और उस हम उस सवाल का सम्मान करते पुजारी भी।

वरना हमने पढ़ा है अनलहक कहने पर मंसूर का क्या हाल किया गया था। अहमदियां क्यों जान बचाए – बचाए फिरते हैं और कैसे मंदिर नाम रखे गुरुद्वारों में भगवान की मूर्तियां उतार दी गईं।

राम जी की चीड़िया, राम जी का खेत
खा लो चीड़िया भर भर पेट

बाबा नानक से जुड़ी वो कहानी जो मां बचपन में सुनाती थी।

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शरवण कुमार



🌳🦚आज की कहानी🦚🌳

💐💐शरवण कुमार💐💐

पौराणिक युग में शांतुनु नामक एक सिद्ध साधू थे, इनकी पत्नी भी एक सिद्ध धर्म परायण नारी थी , कहानी उस समय की हैं, जब शांतुनु और उनकी पत्नी बहुत वृद्ध हो चुके थे और उनकी आँखों की रोशनी भी चली गई थी . इन दोनों का एक पुत्र था जिसका नाम था श्रवण कुमार ।

श्रवण कुमार बहुत ही सरल स्वभाव का व्यक्ति था . माता-पिता के लिए उसके मन में बहुत प्रेम एवम श्रद्धा थी वो दिन रात अपने माता-पिता की सेवा करता था ।
अपने माता पिता का बच्चो की तरह लालन पालन करता था । उसके माता पिता भी स्वयं को गौरवशाली महसूस करते थे और अपने पुत्र को दिन रात हजारो दुआये देते थे । कई बार दोनों एक दुसरे से कहते कि हम कितने धन्य हैं कि हमें श्रवण जैसा मातृभक्त पुत्र मिला, जिसने स्वयं के बारे में ना सोच कर, अपना पूरा जीवन, वृद्ध नेत्रहीन माता पिता की सेवा में लगा दिया ।

इसकी जगह कोई अन्य होता तो विवाह के बाद केवल स्वयं का हित सोचता और बूढ़े नेत्रहीन माता-पिता को कही छोड़ आता और ख़ुशी से अपना जीवनव्यापन करता ।

जब ये बात श्रवण ने सुनी तो उसने माता पिता से कहा कि मैं कुछ भी भिन्न नहीं कर रहा हूँ, यह मेरा कर्तव्य हैं, जब मैं छोटा था तब आपने मुझे इससे भी ज्यादा अच्छा जीवन दिया और अब मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ हैं कि मैं आपकी सेवा करूँ . आप दोनों जो भी इच्छा रखते हैं, मुझसे कहे । मैं उन्हें अवश्य पूरा करूँगा . तब शांतुनु और उसकी पत्नी कहते हैं – पुत्र श्रवण ! हम दोनों की आयु बहुत हो चुकी हैं , अब जीवन का कोई भरोसा नहीं हैं, किसी भी समय हमारी आँखे बंद हो सकती हैं ऐसे में हमारी एकमात्र इच्छा हैं, हम तीर्थ यात्रा करना चाहते हैं, क्या तुम हमारी यह इच्छा पूरी कर सकते हो ? श्रवण कुमार अपने माता-पिता के चरणों को पकड़ कर अत्यंत प्रसन्नता के साथ कहता हैं – हाँ पिताश्री, यह तो मेरे लिए परम सौभाग्य की बात होगी कि मैं आप दोनों की इच्छा पूरी करू .
श्रवण अपने माता पिता को तीर्थ करवाने हेतु एक कावड़ तैयार करता हैं जिसमे एक तरफ शांतुनु एवम दूसरी तरफ उनकी पत्नी बैठती हैं . और कावड़ के डंडे को अपने कंधे पर लादकर यात्रा शुरू करता हैं . उसके हृदय में माता पिता के प्रति इतना स्नेह हैं कि उसे उस कावड़ का लेषमात्र भी भार नहीं लगता . अपने पुत्र के इस कार्य से माता-पिता का मन प्रसन्नता से भर उठता हैं और वे पुरे रास्ते अपने पुत्र श्रवण को दुआयें देते चलते हैं ।

तीर्थ करते समय जब वे तीनों अयोध्या नगरी पहुँचते हैं, तब माता पिता श्रवण से कहते हैं कि उन्हें प्यास लगी हैं . श्रवण कावड़ को जंगल में रखकर, हाथ में पत्तो का पात्र बनाकर, सरयू नदी से जल लेने जाता हैं . उसी समय, उस वन में अयोध्या के राजा दशरथ आखेट पर निकले थे और उस घने वन में वह हिरण को शिकार बनाने के लिए उसके पीछा कर रहे थे, तब ही उन्हें घने जंगल में झाड़ियों के पार सरयू नदी से पानी के हल चल की आवाज आती हैं , उस हलचल को हिरण के पानी पिने की आवाज समझ कर महाराज दशरथ शिकार के उद्देश्य से तीर चला देते हैं और उस तीर से श्रवण कुमार के हृदय को आघात पहुंचता हैं जिससे उसके मुँह से पीड़ा भरी आवाज निकलती हैं जिसे सुन दशरथ स्तब्ध रह जाते हैं और उन्हें अन्हौनी का अहसास होता हैं और वे भागकर सरयू नदी के तट पर पहुंचते हैं, जहाँ वे अपने तीर को श्रवण के ह्रदय में लगा देख भयभीत हो जाते हैं और उन्हें अपनी भूल का अहसास होता हैं . दशरथ, श्रवणकुमार के समीप जाकर उससे क्षमा मांगते हैं, तब अंतिम सांस लेता श्रवण कुमार महाराज दशरथ को अपने वृद्ध नेत्रहीन माता पिता के बारे में बताता हैं और कहता हैं कि वे प्यासे हैं उन्हें जाकर पानी पिला दो और उसके बाद उन्हें मेरे बारे में कहना और इतना कह कर श्रवण कुमार मृत्यु को प्राप्त हो जाता हैं . भारी ह्रदय के साथ महाराज दशरथ श्रवण के माता पिता के पास पहुँचते हैं और उन्हें पानी पिलाते हैं . माता पिता आश्चर्य से पूछते हैं उनका पुत्र कहा हैं ?

वे भले ही नेत्रहीन हो, पर वे दोनों अपने पुत्र को आहट से ही समझ लेते थे . माता पिता के प्रश्नों को सुन महाराज दशरथ उनके चरणों में गिर जाते हैं और बीती घटना को विस्तार से कहते हैं . पुत्र की मृत्यु की खबर सुनकर माता पिता रोने लगते हैं और दशरथ से उन्हें अपने पुत्र के पास ले जाने को कहते हैं . महाराज दशरथ कावड़ उठाकर दोनों माता पिता को श्रवण के शरीर के पास ले जाते हैं । माता पिता बहुत जोर-जोर से विलाप करने लगते हैं, उनके विलाप को देख महाराज दशरथ को अत्यंत ग्लानि का आभास होता हैं और वे अपनी करनी की क्षमा याचना करते हैं लेकिन दुखी पिता शांतुनु महाराज दशरथ को श्राप देते हैं कि जिस तरह मैं शांतुनु, पुत्र वियोग में मरूँगा, उसी प्रकार तुम भी पुत्र वियोग में मरोगे . इतना कहकर दोनों माता- पिता अपने शरीर को त्याग मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं ।


महाराज दशरथ श्राप मिलने से अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं और कई वर्षो बाद जब उनके पुत्र राम का राज्य अभिषेक होता हैं, तब माता कैकई के वचन के कारण राम, सीता और लक्षमण को चौदह वर्षो का वनवास स्वीकार करना पड़ता हैं और इस तरह महाराज दशरथ की मृत्यु भी पुत्र वियोग में होती हैं । अपने अंतिम दिनों में उन्हें शांतुनु के कहे शब्द याद आते हैं और वे राम के वियोग में अपना शरीर त्याग देते हैं ।

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भक्ति और विश्वास
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एक गांव में एक बुजुर्ग महिला रहती थी। वो बहुत ही सरल (भोली) थी।
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जो जैसा कह देता था मान जाती थी। घर में बेटा बहू और नाती पोते थे। भोली दिनभर अपने नाती पोते को खिलाती रहती थी।
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वो कभी किसी से नहीं झगड़ती थी। मंदिर रोज दर्शन करने जाती थी। सब पूंछे कि भोली मंदिर जाने से क्या मिलता है? तो भोली झट से कहती ठाकुर जी तो मिलते हैं।
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सब ठहाके मार के हंसते और भोली का मजाक उड़ाते थे।
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भोली किसी का बुरा नहीं मानती थी हमेशा खुश रहती थी।
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एक दिन मंदिर के पुजारी को किसी काम से बाहर जाना था। उन्होंने भोली से कहा, माई ठाकुर जी से मिलने तो रोज आती हो..
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दो दिन भगवान् की पूजा तथा सेवा करो और भोजन बना कर खिलाओ। हमें जरूरी काम से बाहर जाना है।
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दो दिन मंदिर में ही रहना अपने ठाकुर जी के साथ। भोली मान गयी, बोली ठीक है जैसा बनेगा खिला देंगे।
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दो दिन की तो बात है। ठाकुर जी की बात थी भोली कैसे मना करती। रोज मिलने भी जाती थी।
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भोली भगवान को मूर्ति नहीं इंसान की तरह समझती थी। हमेशा पुजारी जी से कहती थी आप बहुत काम करते हैं।
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भगवान को रोज नहलाना, कपड़े पहनाना और फिर खाना बनाकर खिलाना, भगवान से कह दो अपना काम खुद करें। दिनभर सजे बैठे रहते हैं।
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पुजारी जी जानते थे कि ये तो भोली है। इसको कैसे समझाया जाए। पुजारी जी भी हंसकर रह जाते थे।
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पुजारी जी भोली को मंदिर की जिम्मेदारी सौंपकर चले गए।
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भोली ने बाल्टी पानी भरा और बोली.. ठाकुर जी जल्दी आओ अपने आप नहा लो।
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ठाकुर जी ने आकर स्नान किया बोली.. कपड़े पहनो जल्दी और ये चंदन रखा है तैयार हो जाओ।
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ठाकुर जी ने सब काम स्वयं ही कर लिया। भोली ने रसोई बनाई, थाली परोस दी और कहा.. जल्दी अपने आप भोजन करो।
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ठाकुर जी ने भोजन कर लिया। फिर भोली ने साफ सफाई की और फिर थक गई।
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फिर बोली ठाकुर जी अब सो जाओ। ठाकुर जी सो गए और भोली भी वहीं बैठ गई।
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जब ठाकुर जी सो गए तो वो भी आराम करने कमरे में चली गई। इसी तरह दो दिन बीत गए।
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पुजारी जी जब आए तो भोली से पूछा हमारे ठाकुर जी की सेवा अच्छी तरह से की है ना।
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भोली बोली.. हमने तो ठाकुर जी का बस भोजन बनाया, ठाकुर जी ने अपने सारे काम स्वयं किए। हम बूढ़े कैसे इतना काम करते।
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भोली बोली हम बहुत थक गये है अपने घर जा रहे हैं।
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पुजारी जी को भोली की बात पर विश्वास नहीं हुआ… बोले, भोली माई एक दिन और काम कर दो फिर चली जाना अपने घर, हम भी बहुत थके हुए हैं एक दिन आराम करलें तो ठीक रहेगा।
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भोली किसी तरह मान गयी।
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भोली फिर वैसे ही ठाकुर जी को बुलाने लगी। जैसे पहले बुलाया था, पुजारी जी छुपकर सब देख रहे थे।
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ठाकुर जी आए और अपने आप स्नान करने लगे।
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जैसे ही पंडित जी ने ठाकुर जी के दर्शन किए। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
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पुजारी जी भोली के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे, भोली माई तुम ने आज मुझे भगवान के दर्शन करा दिए। तुम धन्य हो मैया।
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मैंने इतनी सेवा की परन्तु विश्वास की कमी थी.. आज मेरी आंखें खोल दीं। ऐसी है भोली मैया की कहानी।
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जो गर भगवान को पाना चाहते हो तो छल-कपट का त्याग करो अन्यथा किसी भोले भगत के साथ हो जाओ, भगवन तो मिल ही जायेंगे। क्योंकि भगवान उन्हें छल कपट नहीं भाता..!!