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બચપન મા એક ગંડુ રાજા ની વાર્તા વાંચેલી …

આખરે ન્યાય નો સવાલ છે

એક ચોર ચોરી કરતા એ ઘર ની દીવાલ પડી જતા દટાઈ જાય છે .ચોર ની માતા રાજા પાસે ફરિયાદ કરે છે મારો પુત્ર આ દીવાલ પડવા થી મ્રુત્યુ પામ્યો મને ન્યાય મળવો જોઈએ … રાજા એ ઘર માલિક જે નગર શેઠ હતા તેમને બોલાવ્યા કે તમારા ઘર ની દીવાલ કાચી હતો એ પડી જતા એક નિર્દોષ ચોર યુવાન નું મ્રુત્યુ થયું છે જેના માટે તમે જવાબદાર છો … તમને મ્રુત્યુ દંડ આપવાં મા આવે છે તમારે કઈ કહેવું છે ?
નગર શેઠ :રાજાજી હું બિલકુલ નિર્દોષ છું આ ઘર નું બાંધકામ મે નાણામંત્રી ની ભલામણ થી મગન કોન્ટ્રાક્ટર ને આપ્યું હતું
રાજા : મગન કોન્ટ્રાકટર ને તાત્કાલિક હાજર કરો …
રાજા :- મગન કોંટ્રાક્ટર તમારા ખરાબ કામ ને કારણે એક નિર્દોષ ચોર યુવાન નું મ્રુત્યુ થયું છે તેના માટે તમને મ્રુત્યુ દંડ આપવા મા આવે છે .. તમારે તમાર બચાવ મા કઈ કહેવું છે
મગન કોંટ્રાક્ટર : રાજાજી મે આ માટે માટી નો કોન્ટ્રાક્ટ ગોરા કુંભાર ને આપ્યો હતો સાચો ગુન્હેગાર તો એ છે હું નહીં.
રાજા : ગોરા કુંભાર ને તાત્કાલીક હાજર કરો …
રાજા :ગોરાકુંભાર તમારી ભૂલ ને કારણે એક નિર્દોષ ચોર યુવાન નું મોત થયું છે માટે તમને મોત ની સજા ફરમાવવા મા આવે છે તમારે કઈ કહેવું છે …પણ ગોરા કુંભાર ડરી જવા ને કારણે કઈ બોલી શકતો નથી …એને ફાંસી ના માંચડે લઇ જવાયો …
જલ્લાદે બધી તપાસ કર્યા પછી જેલ મંત્રી ને કહ્યું કે ગોરા કુંભાર ભૂખ અને સતત ટેન્શન ના પરિણામે અશક્ત થઈ ગયો છે ફાંસી ના દોરડા ના માપ ની ગરદન નથી શું કરશું ?
જેલ મંત્રી એ તાત્કાલિક રાજા સાથે મંત્રણા કરી આપાત કાલીન બેઠક બોલાવી …
એક નિવ્રુત જજ ની અધ્યક્ષતા મા કમિટી રચાઈ જેને ફક્ત બે જ દિવસ મા રિપોર્ટ આપી પણ દીધો …
“અતિશય અશક્તિ ને કારણે ગોરા કુંભાર ની ગરદન ફાંસી ના દોરડા મા ફીટ બેસતી નથી…
માટે જેની ગરદન ફાંસી ના દોરડા મા ફીટ બેસતી હોય તેવા વ્યક્તિ ને તાત્કાલિક શોધી લાવી ને ફાંસી આપી દેવી ..
જે થી એક નિર્દોષ ચોર યુવાન ની માતા ને ન્યાય મળી શકે …
આખરે આ એક ન્યાય નો સવાલ છે …
જે માટે આપણા ન્યાય પ્રિય રાજા છેલ્લાં કેટલાય સમય થી ચિંતિત છે …
અને શાંતિ થી સૂઈ પણ શકતા નથી …
માટે હુકમ નો અમલ તાત્કાલિક ધોરણે કરવા મા આવે ….

આખરે ગામ ના મંદિર મા રહેતા એક સાધુ ની ગરદન ફાંસી ના દોરડા ના માપ ની મળી ગઈ … અને નિર્દોષ ચોર યુવાન ની માતા ને ન્યાય મળી ગયો …

આખરે ન્યાય નો સવાલ છે .
અને આપણા ન્યાય પ્રિય રાજા ની લોક પ્રિયતા નો સવાલ છે ….

(વાર્તા ને મુખ્ય હાર્દ સાચવી ને ટૂંક મા સમાવવા નો પ્રયત્ન કરેલ છે )

#Cp

રમેશ ભદ્રા

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जब दुबई की बुनियाद रखने वाले शेख राशिद बिन अल मकतूम से उनके देश के भविष्य के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि मेरे दादा ऊंट की सवारी करते थे, मेरे पिता भी ऊंट की सवारी करते थे, मैं मर्सिडीज की सवारी करता हूं, मेरा बेटा लैंड रोवर की सवारी करता है।

…..और मेरा पोता लैंड रोवर की सवारी करने जा रहा है लेकिन मेरे परपोते को फिर से ऊंट की सवारी करनी होगी।

उसने पूछा क्यों? उनका जवाब था, “मुश्किल वक्त मजबूत आदमी पैदा करता है, मजबूत आदमी आसान वक्त पैदा करता है। आसान वक्त कमजोर आदमी पैदा करता है और कमजोर आदमी कठिन वक्त पैदा करता है।”

ज्यादातर लोग यह नहीं समझेंगे, लेकिन आपको बहादुर बनना होगा, न कि आरामतलब। हमने मुश्किलें देखी हैं और बच्चों के लिए चीजें आसान की हैं। हमारे बच्चों ने आसानी देखी है और वे परेशानिया पैदा कर रहे हैं।

कुदरत ने इंसान को इस दुनिया में मजे के लिए नहीं मेहनत के लिए बनाया है।
मेहनत इंसान को ताकतवर बनाती है और आराम इंसान को बीमार बनाता है। वह काम न करें जिसमें मेहनत की जरूरत न हो बल्कि मुश्किल काम करे !!

Mirza Faisal Baig

Chhabra Sutinder

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रोहिगया मुसलमानों को भारत में बसने का निमंत्रण देने वाले हिंदुओं के लिए

आप एक प्रयोग कीजिये, एक भगौने में पानी डालिये और उसमे एक मेढक छोड़ दीजिये। फिर उस भगौने को आग में गर्म कीजिये।
जैसे जैसे पानी गर्म होने लगेगा, मेढक पानी की गर्मी के हिसाब से अपने शरीर को तापमान के अनकूल सन्तुलित करने लगेगा।
मेढक बढ़ते हुए पानी के तापमान के अनकूल अपने को ढालता चला जाता है और फिर एक स्थिति ऐसी आती है की जब पानी उबलने की कगार पर पहुंच जाता है। इस अवस्था में मेढक के शरीर की सहनशक्ति जवाब देने लगती है और उसका शरीर इस तापमान को अनकूल बनाने में असमर्थ हो जाता है।
अब मेढक के पास उछल कर, भगौने से बाहर जाने के अलावा कोई चारा नही बचा होता है और वह उछल कर, खौलते पानी से बाहर निकले का निर्णय करता है।
मेढक उछलने की कोशिश करता है लेकिन उछल नही पाता है। उसके शरीर में अब इतनी ऊर्जा नही बची है की वह छलांग लगा सके क्योंकि उसकी सारी ऊर्जा तो पानी के बढ़ते हुए तापमान को अपने अनुकूल बनाने में ही खर्च हो चुकी है।
कुछ देर हाथ पाँव चलाने के बाद, मेढक पानी मर पर मरणासन्न पलट जाता है और फिर अंत में मर जाता है।
यह मेढक आखिर मरा क्यों?
सामान्य जन मानस का वैज्ञानिक उत्तर यही होगा की उबलते पानी ने मेढक की जान ले ली है लेकिन यह उत्तर गलत है।
सत्य यह है की मेढक की मृत्यु का कारण, उसके द्वारा उछल कर बाहर निकलने के निर्णय को लेने में हुयी देरी थी। वह अंत तक गर्म होते मौहोल में अपने को ढाल कर सुरक्षित महसूस कर रहा था। उसको यह एहसास ही नही हुआ था की गर्म होते हुए पानी के अनुकूल बनने के प्रयास ने, उसको एक आभासी सुरक्षा प्रदान की हुयी है। अंत में उसके पास कुछ ऐसा नही बचता की वह इस गर्म पानी का प्रतिकार कर सके और उसमे ही खत्म हो जाता है।
मुझे इस कहानी में जो दर्शन मिला है वह यह की यह कहानी मेढक की नही है, यह कहानी ‘हिन्दू’ की है।
यह कहानी, सेकुलर प्रजाति द्वारा हिन्दू को दिए गए आभासी सुरक्षा कवच की है।
यह कहानी, अपने सेकुलरी वातावरण में ढल कर, सकूँ की ज़िन्दगी में जीते रहने की, हिन्दू के छद्म विश्वास की है।
यह कहानी, अहिंसा, शांति और दुसरो की भावनाओ के लिहाज़ को प्राथिमकता देने में, उचित समय में निर्णय न लेने की है।
यह कहानी, सेकुलरो के बुद्धजीवी ज्ञान, ‘मेढक पानी के उबलने से मरा है’ को मनवाने की है।
यह कहानी, धर्म के आधार पर हुए बंटवारे के बाद, उद्वेलित समाज के अनकूल ढलने के विश्वास पर, वहां रुक गए हिन्दुओ के अस्तित्व के समाप्त होने की है।
यह कहानी, कश्मीरियत का अभिमान लिए कश्मीरी पंडितो की कश्मीर से खत्म होने की है।
यह कहानी, सेकुलरो द्वारा हिन्दू को मेढक बनाये रखने की है।
यह कहानी, आपके अस्तिव को आपके बौद्धिक अहंकार से ही खत्म करने की है।
लेकिन यह एक नई कहानी भी कहती, यह मेरे द्वारा मेढक बनने से इंकार की भी कहानी है! मेरी कहानी, आपकी भी हो सकती है यदि आप, आज यह निर्णय करे की अब इससे ज्यादा गर्म पानी हम बर्दाश्त करने को तैयार नही है।
मेरी कहानी, आपकी भी हो सकती है यदि आप, आज जातिवाद, क्षेत्रवाद, आरक्षण और ज्ञान के अहंकार को तज करके, मेढक से हिन्दू बनने को तैयार है।
आइये! थामिये, एक दूसरे का हाथ और उछाल मार कर और बाहर निकल आइये, इस मृत्युकारकप सेक्युलरि सडांध के वातावरण से और वसुंधरा को अपनी नाद से गुंजायमान कीजिये, “हम हिन्दू है! हम आर्य है! हम भारत है!
रवि रंजन

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Dear Girls यह आपके लिए है‼️💯

एक महिला एक दुकान में कपड़े पहनकर पहुंची, जिसमें उसका शरीर भी अच्छा दिख रहा था। दुकान के मालिक ने उसे अच्छी तरह से देखा, उसे बैठने के लिए कहा, सीधे उसकी आँखों में देखा और कुछ ऐसा कहा जिसे वह जीवन में कभी नहीं भूल पाएगी।
“लेडी, इस दुनिया में भगवान ने जो कुछ भी मूल्यवान बनाया है, वह ढका हुआ है और देखने और खोजने में मुश्किल है।”

उदाहरण के लिए:

1. आपको हीरे कहाँ मिल सकते हैं?
• जमीन में, ढका और संरक्षित।

2. मोती कहाँ हैं?
• समुद्र में गहरा, एक सुंदर खोल में ढका और संरक्षित।

3. आपको सोना कहां मिल सकता है?
• जमीन के नीचे, चट्टान की परतों से ढका हुआ और वहां तक पहुंचने के लिए आपको कड़ी मेहनत करनी होगी और गहरी खुदाई करनी होगी।

इतना कहकर, उसने फिर उसकी ओर देखा और कहा, “तुम्हारा शरीर पवित्र और अद्वितीय है।”
आप सोने, हीरे और मोतियों से कहीं अधिक कीमती हैं, इसलिए आपको भी ढंकना चाहिए।

और उन्होंने आगे कहा: “यदि आप अपने कीमती खनिजों जैसे सोना, हीरे और मोती को गहराई से ढक कर रखते हैं, तो आवश्यक मशीनों के साथ एक “प्रतिष्ठित खनन संगठन”, व्यापक व्यापक वर्षों तक काम करेगा।
पहले वे आपकी सरकार (परिवार) से संपर्क करेंगे,
पेशेवर अनुबंधों पर हस्ताक्षर करें (विवाह)
और पेशेवर रूप से निकालें (वैवाहिक जीवन)।

लेकिन अगर आप अपने खनिजों को पृथ्वी की सतह (उजागर) पर खुद को खोजने देते हैं, तो आप हमेशा बड़ी संख्या में अवैध खनिकों को आने, शोषण करने और उस धन को अवैध रूप से लेने के लिए आकर्षित करेंगे।

महिलाओं, आप मूल्यवान हैं

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किसी￰ बाजार में एक चिड़ीमार तीतर बेच रहा था।

उसके पास एक बड़ी सी जाली वाली बक्से में बहुत सारे तीतर थे और एक छोटे से बक्से में सिर्फ एक तीतर।

किसी ग्राहक ने उससे पूछा तीतर कितने का है?

तो उसने जवाब दिया एक तीतर की कीमत 80 रूपये है।

ग्राहक ने दुसरे बक्से में जो अकेला तीतर था उसकी कीमत पूछी तो तीतर वाले ने जवाब दिया।

अव्वल तो मैं इसे बेचना ही नहीं चाहूंगा लेकिन अगर आप लेने की जिद करोगे तो इसकी कीमत 5000 रूपये होगी।

ग्राहक ने आश्चर्य से पूछा इसकी कीमत 5000 रुपया क्यों?

इस पर तीतर वाले का जवाब था ये मेरा अपना पालतू तीतर है। और दुसरे तीतरो को जाल में फसाने का काम करता है और दूसरे सभी फंसे हुए तीतर है।
ये चीख पुकार करके दूसरे तीतरो को बुलाता है।

और दुसरे तीतर बिना सोचे समझे एक जगह जमा हो जाते है और मैं आसानी से शिकार कर पाता हूँ।

इसके बाद फंसाने वाले तीतर को उसके मन पसंद की खुराक दे देता हूँ।

जिससे ये खुश हो जाता है बस इस वजह से इसकी कीमत ज्यादा है।

बाजार में एक समझदार आदमी ने उस तीतर वाले को 5000 रूपये देकर उस तीतर का सरे बाजार गर्दन उड़ा दिया।

किसी ने पूछा आपने ऐसा क्यों किया ?

उसका जवाब था ऐसे गद्दार को जिन्दा रहने का कोई हक़ नहीं जो अपने मुनाफे के लिए अपनी ही कौम को फंसाने का काम करे और अपने ही लोगो को धोखा देता है।

हमारी सामाजिक व्यवस्था में भी 5000 रू की क़ीमत वाले बहुत से तीतर हैं..!

_’जिन्हें सेक्युलर, लिबरल, वामपंथी, कम्युनिस्ट, धर्मनिरपेक्ष, विपक्षी, जातिवादी, परिवारवादी आदि दलों के नाम से जानते हैं. जो अपनी वर्तमान राजनीति के चक्कर में भारत को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं।_

*अपने धर्म और समाज के ऐसे तीतरों से सावधान रहिये।*

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आधा सत्य…आधा झूठ


एक नाविक तीन साल से एक जहाज पर काम कर रहा था। एक दिन नाविक रात मेँ नशे मेँ धुत हो गया।

ऐसा पहली बार हुआ था। कैप्टन नेँ इस घटना को रजिस्टर मेँ इस तरह दर्ज किया, ” नाविक आज रात नशे मेँ धुत था।”

नाविक नेँ यह बात पढ़ ली। नाविक जानता था कि इस एक वाक्य से उसकी नौकरी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।
https://chat.whatsapp.com/IFTU806cXlE0yKJcEVxuJJ
इसलिए वह कैप्टन के पास गया, माफी मांगी और कैप्टन से कहा कि उसनेँ जो कुछ भी लिखा है, उसमेँ आप ये जोड़ दीजिये कि ऐसा तीन साल मेँ पहली बार हुआ है, क्योँकि पूरी सच्चाई यही है।

कैप्टन नेँ उसकी बात से साफ इंकार कर दिया और कहा कि मैनेँ जो कुछ भी रजिस्टर मेँ दर्ज किया है. वही सच है।”

कुछ दिनों बाद नाविक की रजिस्टर भरनेँ की बारी आयी। उसने रजिस्टर मेँ लिखा-” आज की रात कैप्टन नेँ शराब नहीँ पी है।” कैप्टन ने इसे पढ़ा और नाविक से कहा कि इस वाक्य को आप या तो बदल देँ अथवा पूरी बात लिखनेँ के लिए आगे कुछ और लिखेँ, क्योँकि जो लिखा गया था, उससे जाहिर होता था कि कैप्टन हर रोज रात को शराब पीता था।

नाविक नेँ कैप्टन से कहा कि उसनेँ जो कुछ भी रजिस्टर मेँ लिखा है, वही सच है।

दोनोँ बातेँ सही हैँ, लेकिन दोनोँ से जो संदेश मिलता है, वह झूठ के सामान है।

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એક પ્રચલિત કથા છે. મહાકવિ કાલિદાસને પોતાની વિદ્વતાનું અભિમાન હતું. એક વખત તે પગપાળા સફર કરી રહ્યા હતા. રસ્તામાં તેમને ખૂબ તરસ લાગી. તેમણે જોયું કે એક વાવ પર પનિહારી પાણી ભરી રહી હતી.
ત્યાં જઈને કાલિદાસ બોલ્યા:- માતા મને પાણી પીવડાવો , આપને પૂણ્ય મળશે
સ્ત્રી બોલી:- ભાઈ હું તમને ઓળખતી નથી, તમારો પરિચય આપો, હું ચોક્કસ પાણી પીવડાવીશ.
કાલિદાસે કહ્યું:- હું યાત્રિક છું , કૃપા કરીને પાણી પીવડાવો.
સ્ત્રી બોલી:- તમે યાત્રિક કઈ રીતે છો.? યાત્રિક તો કેવળ બે જ છે, સૂર્ય અને ચંદ્ર છે. તે ક્યારેય રોકાતા નથી, હંમેશા ચાલતા રહે છે. તમે આમાંથી કોણ છો ?, સત્ય બતાવો.
કાલિદાસે કહ્યું:- હું મહેમાન છું, કૃપા કરીને પાણી પીવડાવો.
સ્ત્રી બોલી:- તમને મહેમાન કઈ રીતે કહેવાય ? સંસારમાં કેવળ બે જ મહેમાન છે. પહેલું ધન અને બીજું યૌવન. એમને જવામાં સમય નથી લાગતો. સાચું કહો, તમે કોણ છો?

કાલિદાસ અત્યાર સુધીના તર્ક થી પરાજિત અને હતાશ થઈ ગયા હતા. તેણે કહ્યું: હું સહનશીલ છું. હવે પાણી પીવડાવો.
સ્ત્રીએ કહ્યું:- નહીં. સહનશીલ તો બે જ છે.પહેલી ધરતી જે પાપી- પૂણ્યશાળી બંનેનો બોજ ઉપાડે છે, તેની છાતી ચીરીને બીજ વાવો તો પણ તે અનાજના ભંડાર આપે છે.બીજું સહનશીલ વૃક્ષ છે જેને પત્થર મારો તો પણ મીઠા ફળ આપે છે. તમે સહનશીલ નથી. સાચું બોલો તમે કોણ છો?

આ તર્ક વિતર્કથી કાલિદાસ લગભગ મૂર્છિત જેવા થઈ ગયા અને ઉશ્કેરાઈને કહ્યું:- હું હઠીલો છું.
સ્ત્રી બોલી:- પાછું અસત્ય. હઠીલા તો બે જ છે.પહેલા ને અને બીજા કેશ , તમે કેટલી વખત કાપો પણ ઉગી નીકળે છે. સાચું કહો બ્રાહ્મણ તમે કોણ છો ?

કાલિદાસ હવે સાવ અપમાનિત અને પરાજિત થઈ ગયા હતા. તેણે કહ્યું:- તો પછી હું મૂર્ખ જ છું.
સ્ત્રી એ કહ્યું:- નહીં. મૂર્ખ તો બે જ છે.પહેલો રાજા છે જે યોગ્યતા વિના પણ બીજા પર શાસન કરે છે. અને બીજો દરબારી પંડિત જે રાજા ને પ્રસન્ન કરવા ખોટી વાત ને પણ સાચી ઠરાવવાની ચેષ્ટા કરે છે.

કાલિદાસ સાવ અવાચક થઈ ગયા, કંઈ પણ બોલવાની સ્થિતિમાં ન રહ્યા.
તે પેલી સ્ત્રીના પગમાં પડી ગયા અને પાણી આપવા માટે કરગરવા લાગ્યા.
સ્ત્રી એ કહ્યું:- ઉઠો વત્સ !
અવાજ સાંભળી કાલિદાસે ઉપર જોયું તો સાક્ષાત માતા સરસ્વતી ઉભા હતા. કાલિદાસ ફરીથી નતમસ્તક થઈ ગયા.
માતાએ કહ્યું:- વિદ્યાથી જ્ઞાન આવે છે નહિ કે અહંકાર.
તું વિદ્યાના બળ પર પ્રાપ્ત થયેલ માન અને પ્રતિષ્ઠા ને જ તારી ઉપલબ્ધિ માનીને અહંકાર કરી બેઠો. એટલે તારી આંખો ખોલવા મારે આ સ્વાંગ ધારણ કરવો પડ્યો.
કાલિદાસને પોતાની ભૂલ સમજાઈ. તેમનો અહંકાર ઓગળી ગયો .તે ફરીથી માતાના ચરણોમાં નમી પડ્યા. પોતાની તરસ છીપાવીને આગળ ચાલી નીકળ્યા.

વિદ્વતા પર કદી ઘમંડ ન કરવો. એ ઘમંડ જ વિદ્વતાને નષ્ટ કરી નાખે છે.
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હરીશ મોઢ