Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

गुणाढ्य सातवाहन नरेश के दरबार में पंडित थे ! राजा एक बार रानियों के साथ सरोवर में जलक्रीड़ा कर रहे थे ! राजा ने अंजुलि में जल भर कर पानी रानी पर उलीचा , रानी ने अपना बचाव करते हुए राजा को लक्षित करते हुए कातर नेत्रों से अनुरोध किया ” मोदकैः मोदकैः ” ! राजा ने समझा रानी मोदक की अभिलाषा कर रही हैं उन्होंने तुरन्त लड्डुओं के थाल मंगवाने के लिये सेविकाओं को निर्देश दिया ! रानी और उनकी सहेलियाँ खिलखिला कर हँस पड़ीं ! मोदकैः से रानी का आशय था मा उदकैः अर्थात् पानी मत उछालो जबकि राजा समझा मोदकैः अर्थात् रानी लड्डू चाह रही है !

संस्कृत व्याकरण में अज्ञानता के कारण राजा को बहुत लज्जित होना पड़ा ! राजा ने प्रण कर लिया कि जब तक संस्कृत में निष्णात नहीं हो जाऊँगा तब तक प्रजा को मुँह नहीं दिखाऊँगा ! राजा ने संस्कृत सीखने की इच्छा व्यक्त करते हुए गुणाढ्य से अनुरोध किया ! गुणाढ्य ने कहा कि छः वर्षों में आपको संस्कृत का महापंडित बना दूँगा ! राजा तैयार हो गये लेकिन तभी दूसरे ईर्ष्यालु दरबारी शर्ववर्मन ने केवल ६ महीने में ही संस्कृत सिखा देने का दावा किया ! गुणाढ्य ने उसी समय घोषणा की कि यदि तुम ऐसा कर दोगे तो मैं संस्कृत, पाली और प्राकृत तीनों प्रचलित भाषाओं में काव्य रचना छोड़ दूँगा !

राजा की दिलचस्पी व्याकरण सम्मत भाषा ज्ञान में थी ताकि उसे अपनी विदुषी रानियों के समक्ष कालिदास के समान लज्जित न होना पड़े ! महापंडित बनना उसका उद्देश्य नहीं था सो शर्ववर्मन ने उसे ६ महीने में संस्कृत सिखा दी ! शर्त हार जाने के कारण गुणाढ्य ने तीनों भाषायें छोड़ दीं साथ साथ राजदरबार भी छोड़ दिया और जंगलों में चले गये !

किंतु कवि की रचनात्मकता अभिव्यक्ति का माध्यम खोज ही लेती है ! वनवासियों में प्रचलित पैशाची भाषा में उन्होंने वृहत्कथा की रचना की ! जंगल में कागज ओर स्याही तो थी नहीं अतः पशुओं के चमड़ों पर पशुओं के रक्त से लगभग सात लाख श्लोकों का यहअद्भुत ग्रंथ लिखा गया ! ग्रंथ पूर्ण होने पर गुणाढ्य राजधानी के पास जाकर एक स्थान पर ठहर गये और ग्रंथ को राजा के पास अपने दो शिष्यों के माध्यम से भिजवाया लेकिन राजा रक्त से चमड़े पर लिखी हुई रचना को देख कर वितृष्णा से भर उठा और बिना पढ़े ही रचना को वापस कर दिया !

गुणाढ्य रचना के अपमान से अत्यंत दुखी हो उठे और उन्होंने निर्णय लिया कि वह रचना को जला देंगे ! राजधानी के पास एक पर्वत पर अग्नि प्रज्वलित की गई ! शिष्यों ने आग्रह किया कि जलाने से पूर्व यह रचना पढ़ कर सुना दें ! शिष्य आसन मार कर बैठ गये और गुणाढ्य वृहत्कथा का एक एक पृष्ठ पढ़ कर सुनाते जाते थे और उसे अग्नि को अर्पित करते जाते थे ! रचना सुनने की उत्सुकता में जंगल के पशु पक्षी भी सब कुछ छोड़ छाड़ कर वहीं जम गये ! सात लाख श्लोकों की रचना इतनी दिलचस्प थी कि कोई उठने का नाम नहीं ले रहा था !

उधर राजा भोजन की गुणवत्ता खराब होने के कारण बीमार हो गया ! पूछताछ पर पता चला कि रसोई में आने वाला मांस एकदम सूखा हुआ ही आ रहा है और इसी कारण राजा बीमार पड़ गया है ! लुब्धकों ने बताया कि जंगल के पशु आज कल सूख गये हैं क्योंकि वे भोजन छोड़ कर दिन रात किसी अघोरी के पास बैठे कहानियाँ सुनते रहते हैं !

उत्सुक राजा गुणाढ्य के पास पहुँचा और चारों ओर का दृश्य देख कर चकित रह गया ! उसने गुणाढ्य को अपनी रचना को यूँ नष्ट करने से रोका लेकिन तब तक वृहत्कथा के ६ लाख श्लोक जल चुके थे ! शेष एक लाख श्लोक उसने राजा को दे दिये जिनका बाद में पैशाची से संस्कृत में अनुवाद हुआ !

वृहत्कथा ने संस्कृत साहित्य की धारा ही बदल दी , सोमदेव ने कथासरित् सागर और क्षेमेंद्र ने वृहत्कथा मंजरी नाम से वृहत्कथा के अनुवाद किये ! अभी तक जो संस्कृत कवि अपने कथानक और पात्रों के लिये धार्मिक और पौराणिक चरित्रों पर आश्रित थे अब वृहत्कथा के लौकिक चरित्रों पर लेखनी चलाने लगे।
महाकवि दंडिन् का दशकुमार चरितम् और बाण भट्ट की कादंबरी की कथाओं का मूलश्रोत वृहत्कथा में ही है ! पंचतंत्र जिसका अनुवाद संसार की सभी भाषाओं में हुआ वृहत्कथा की ही ऋणी है। लौकिक संस्कृत कथायें तत्कालीन समाज का भी सजीव चित्रण करती हैं। कहानी से कहानी जोड़ते हुए कथानक को आगे बढ़ाने की विधा ताकि पाठक की रुचि निरंतर बनी रहे गुणाढ्य की विश्व साहित्य को देन है।

साभार : राजकमल गोस्वामी
प्रस्तुति सहयोग : प्रमोद शर्मा

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