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આદતો


આદતો

लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते ।
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ।।
(हितोपदेश, मित्रलाभ, २७)

એટલે કે લોભમાંથી ક્રોધની ભાવના ઉત્પન્ન થાય છે, લોભમાંથી કામના કે ઈચ્છા ઉત્પન્ન થાય છે, લોભથી જ વ્યક્તિ મોહ પામે છે, એટલે કે તે પોતાનો વિવેક ગુમાવે છે અને તે જ વ્યક્તિના વિનાશનું કારણ બને છે. વાસ્તવમાં, લોભ જ બધા પાપનું કારણ છે.

માણસ આદતોનો ગુલામ છે. યાદ રાખો, આદતો થી વ્યક્તિ નો સ્વભાવ બને છે. અને પછી સ્વભાવ થી વ્યક્તિત્વ અને પછી વ્યક્તિત્વ થી વ્યક્તિનું જીવન સુંદર બદલી જાય છે. તેથી, જો જીવનને સુધારવું હોય તો, આદતોમાં સુધારો કરવો પડશે. એકવાર ખરાબ આદત બની જાય પછી તેને તોડવી ખૂબ મુશ્કેલ છે.

ચાલો એક ઉદાહરણ દ્વારા સમજીએ. નદી કિનારે એક માણસ તેના મિત્રો સાથે બેઠો હતો. પછી તેણે નદીમાં એક ધાબળો વહેતો જોયો. ધાબળો પકડવા તેણે નદીમાં કૂદીને ધાબળો પકડી લીધો. થોડી વાર પછી તેને લાગ્યું કે ધાબળો તેને પકડીને તેની સાથે લઈ જઈ રહ્યો છે. તેણે બચાવો-બચાવોની બૂમો પાડવા માંડી. બાજુમાં બેઠેલા મિત્રોએ કહ્યું ધાબળો છોડી દે. તેણે તણાતા તણાતા બૂમ પાડી અને કહ્યું – ‘પહેલાં મેં ધાબળો પકડ્યો હતો, હવે આ ધાબળોએ મને પકડ્યો છે. હું તેને છોડવા માંગુ છું પણ તે મને છોડતો નથી.

તે ‘ધાબળો વાસ્તવમાં રીંછ હતો, ધાબળો નહીં, જે ઉપરથી જોવામાં આવે ત્યારે ધાબળો જેવો દેખાતો હતો. રીંછે તેને પકડી લીધો હતો. હવે કોઈ તેને બચાવી સકે તેમ ન હતું. કહેવત છે લોભે લક્ષણ જાય, આની તો જાન જ ગઈ.

આવી ખરાબ ટેવો છે, પહેલા આપણે તેને ‘પકડીએ છીએ’, પછી તે આપણને પકડે છે. અને તે જયારે આપણને પકડે છે ત્યારે આપણે છુટી સકતા નથી.

હર્ષદ અશોડીયા ક.

૮૩૬૯૧૨૩૯૩૫

harshad30.wordpress.com

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आदत


उस विशाल हाथी के बारे में सोचिए, जो 1 टन से भी ज्यादा वजन सिर्फ अपनी सूंड से उठा लेता है ।

जरा सोचिए कि उसी हाथी को एक पतली रस्सी और एक छोटे खुटे से एक ही जगह पर बने रहने का आदी कैसे बनाया जाता है, जबकि वह खोटे को आसानी से उखाड़कर जहां चाहे वहां जा सकता है ।

जवाब यह है कि बचपन से हाथी को एक मजबूत जंजीर और एक मजबूत पेड़ से बांधा जाता है, हाथी के बच्चे की तुलना में जंजीर और पेड़ मजबूत होते हैं, बच्चे को बंदे रहने की आदत नहीं होती इसलिए वह उस जंजीर को खींचने और तोड़ने की लगातार नाकाम कोशिश करता है।

एक दिन ऐसा आता है जब बच्चा समझ जाता है कि खींचने और तोड़ने की कोशिश का कोई फायदा नहीं, वह रुक जाता है और शांत खड़ा रहने लगता है।

अब वह दिमागी रूप से इसका आदी हो चुका होता है।

और जब वही बच्चा एक विशाल हाथी बन जाता है, तो उसे एक कमजोर रस्सी और खूटे से बांध दिया जाता है ।

वह हाथी चाहे तो एक झटका देने से ही आजाद हो सकता है ,मगर वह कहीं नहीं जाता क्योंकि बचपन से ही दिमागी रूप से वह इसका आदी हो चुका होता है।

आदतों को बदलने में सबसे मुश्किल बात यह होती है कि जो चीज काम नहीं कर रही है उसे कैसे बुलाया जाए और उसके बदले अच्छी आदतों को कैसे अपनाया जाए ।

रवि कुमार

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🙏 दुसरी आई॥


एकदा एका गरोदर पत्नीने मोठया उत्सुकतेने आपल्या पतीला विचारले:-
“आपल्याला काय होईल,
काय अपेक्षा आहे तुमची,
मुलगा की मुलगी
तुम्हाला काय वाटतं ?”

त्यावर पती म्हणाला:-
“जर आपल्याला मुलगा झाला तर,मी त्याचा अभ्यास घेईन,
त्याला गणितं शिकवीन,
त्याच्याबरोबर मी मैदानावर
खेळायला, पळायला पण जाईन,पोहायला शिकविन अशाअनेक गोष्टी मी त्याला शिकवीन”

हसत हसत बायकोने
यावर प्रतिप्रश्न केला:-
“आणि मुलगी झाली तर?”

यावर पतीने खूप छान उत्तर दिले.!

“जर आपल्याला मुलगी झाली तर मला तिला काही शिकवावेच लागणार नाही”

पत्नीने मोठया कुतूहलाने विचारले:-
“का असे का.?”

पती म्हणाला,
मुलगी म्हणजे जगातील एक अशी व्यक्ती आहे की तीच मला सगळं शिकवेल.

मी कसे आणि कोणते कपडे घालावेत,मी काय खायचं, काय नाही खायचं,कसं खायचं, मी काय बोललं पाहिजे,
आणि काय नाही बोलायचं,हे सारं ती मला पुन्हा एकदा शिकवेल.
थोडक्यात जणू ती माझी
दुसरी आई
होऊन माझी काळजी घेईल.

मी आयुष्यात काही विशेष कर्तृत्व नाही केलं तरी मी तिच्यासाठी तिचा आदर्श हिरो असेन.

एखादया गोष्टीसाठी मी जर तिला नकार दिला तर तो ही आनंदाने समजून घेईल.”

पति पुढे म्हणाला.!

“तिला नेहमी असे वाटत राहील की माझा नवरा माझ्या वडिलांसारखाच असला पाहिजे.
मुलगी कितीही मोठी झाली तरी तिला वाटतं की माझ्या बाबांची मी छोटीशी आणि गोड बाहुलीच आहे.माझ्यासाठी ती आख्ख्या जगाशी वैर पत्करायला तयार होईल.”

यावर पत्नीने पुन्हा हसून विचारले:
“म्हणजे तुम्हाला असं म्हणायचंय का,
की फक्त मुलगीच ह्या सर्व गोष्टी करेल,
आणि मुलगा तुमच्यासाठी काहीच करणार नाही “

यावर नवरा समजुतीच्या स्वरात म्हणाला:-

“अगं तसं नव्हे गं,कदाचित हे सगळं माझा मुलगाही माझ्यासाठी करेल,
पण त्याला हे सगळं शिकावं लागेल ,मुलींचं तसं नाही,
मुली या जन्मतः हे सगळं शिकूनच जन्माला येतात.
एक वडील म्हणून तिला माझा,आणि मला तिचा नेहमीच अभिमान वाटेल”

निराशेच्या सुरात पत्नी म्हणाली,
“पण ती आपल्या सोबत आयुष्यभर थोडीच रहाणार आहे.?”

यावर आपले पाणावलेले डोळे पुसत पती म्हणला:-

“हो तू म्हणतीयेस ते खरंय,ती आपल्या सोबत नसेल,पण जगाच्या पाठीवर ती कुठेही गेली तरी मला काही फरक पडणार नाही कारण ती आपल्या सोबत नसली तरी,आपण मात्र नक्की तिच्या सोबत असू, “तिच्या हृदयात, तिच्या मनात, कायमचे!!
अगदी तिच्या शेवटच्या श्वासा पर्यंत.

कारण,
मुली ह्या परी सारख्या असतात,त्या जन्मभरासाठी, आपुलकी, माया आणि निस्वार्थ प्रेम घेऊनच जन्माला येतात !!!”

खरोखर मुली ह्या,
परी सारख्याच असतात!

ज्यांना 👨‍👨‍👧 मलगी आहे…

अशा माझ्या सर्व मित्रांना व मैत्रीणींना व भावांना, समर्पित !!

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जिसकी लाठी उसकी भेंस


एक भला आदमी एक बार पशु मेला देखने गया | उसे वहा एक भेंस पसंद आ गई और वो उसे खरीद कर अपने घर जा रहा था की उसे रास्ते में उसे एक बदमाश मिला | उसके हाथो में एक खूब मोठी लाठी थी | बदमाश भेंस वाले के रास्ते में लाठी पटकता हुआ खड़ा हो गया और जोर से बोला, “अरे और भेंस वाले, चुपचाप ये भेंस मुझे दे दे और तू यहाँ से नो दो ग्यारह हो जा वरना तेरी खेर नहीं |

भेंस वाला बुद्धिमान था | उसने सोचा अगर में लाठी वाले से लडू गा तो यह मेरा सिर फोड़ देगा | इसलिए उसने चुपचाप भेंस की रस्सी उसके हाथो में थमा दी और उदास होकर बोला, “भाई यह भेंस अब तुम्हारी हो गई | इसे तुम ले जा सकते हो | पर में खाली हाथ घर जाऊ गा तो अच्छा नहीं लगे गा | इसलिए तुम एक काम करो, तुम मेरी भेंस ले लो और में तुम्हारी लाठी ले लेता हु |

बदमाश सोचने लगा की अगर मेरे पास भेंस आ जाती है तो लाठी का क्या काम | और उसने अपनी लाठी भले आदमी को दे दी | लाठी आते ही भला आदमी तन कर खड़ा हो गया और बोला, “भेंस की रस्सी इधर ला वरना तेरा सिर फोड़ दुगा | लुटेरा क्या करता, वो डर गया था | जिस लाठी के दम पर उसने भेंस छिनी थी अब वह उसके पास से जा चुकी थी |

उसने चुपचाप भेंस की रस्सी उस भले आदमी के हाथो में दे दी और गिडगिडा क बोला, “अपनी भेंस संभालो और मुझको मेरी लाठी लोटा दो | भला जनता था की एक बर लाठी उसके हाथो में दे दी तो फिर से में अपनी भेंस को खो बेठुगा | इसलिए उसने कहा, केसी लाठी और कोनसी लाठी ? अरे मुर्ख, जिसकी लाठी उसकी भेंस और चुपचाप यहाँ से चला जा | और यह सुन कर बदमाश चुपचाप वहा से चला गया |

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लालच का फल हमेशा बुरा ही होता है


बहुत पुरानी बात है एक गाव में एक बहुत बड़ा सेठ रहता था | वह एक दिन कही जा रहा था की अचानक उसका बटुआ गली में खो गया तो उसने पुरे गाव में घोषणा करवा दी की उसके बटुए में पांच हजार रुपे थे और जो उसे लोटा देगा, वह उसे पांच सो रुपे के इनाम में देगा |

उसी दिन संध्या के समय एक बुढिया को उस सेठ का बटुआ मिल गया और वह उसे लेकर फोरन सेठ के पास आई | लेकिन सेठ को लालच आ गया और उसने पूरा का पूरा पैसा खुद रखने की ठान ली | इसलिए उसने बुढिया से कहा की उसके बटुए में पांच हजार पांच सो रुपे थे और उसने पांच सो रूपये पहले ही रख लिये है | पर बुढिया को यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी और वो सीधा राजा के पास चली गई | उस बुढिया ने राजा को सारी बात बताई और बोली, “हे महाराज अगर मुझे पैसे लेने ही होते तो में सारे पैसे रख लेती न की पांच सो रुपे रख कर बाकि वापिस करती |

बुढिया की पूरी बात सुन कर राजा को शक हुआ की सेठ बुढिया को दोखा दे रहा है | इसलिए राजा ने सेठ को एक सबक सिखाने के लिए सेठ से कहा, “में समझता हु की ये बटुआ तुम्हारा नहीं है क्योकि इसमें सिर्फ पांच हजार रुपे है ने की पांच हजार पांच सो | और हमारे पास पांच हजार खोने की कोई शिकायत नहीं है इसलिए हम ये फेसला लेते है की ये पांच हजार वाला बटुआ इस बुढिया को दे देते है | हम बुढिया की ईमानदारी से बहुत खुश है | इसलिए इन्हें बतोर इनाम हम इन्हें पांच हजार रूपये अपनी तरफ से भी देते है |” बस फिर क्या था या सुन कर सेठ के तो होश ही उड़ गए और बुढिया राजा को उसके न्याय के लिए आशीर्वाद देकर ख़ुशी ख़ुशी वहा से चली गई |

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बहुत पुरानी बात है। जयनगर नाम का एक बहुत समृद्ध राज्य था


बहुत पुरानी बात है। जयनगर नाम का एक बहुत समृद्ध राज्य था। वहां का राजा बहुत दयालु और जनप्रिय था। लेकिन संतान का न होना उसके जीवन की सबसे बड़ी कमी थी। एक दिन बूढ़े मंत्री ने उन्हें सुझाव दिया कि क्यों न आप वन में आश्रम बनाकर रह रहे कुलगुरु के पास जाकर आशीर्वाद लें। शायद उससे समस्या का समाधान हो जाए। राजा को मंत्री का यह सुझाव पसंद आया और वे रानी के साथ वन में अपने कुलगुरु के आश्रम की ओर चल पड़े। कुलगुरु ने जब उन्हें देखा तो वे बहुत प्रसन्न हुए और जब राजा ने उन्हें अपनी समस्या सुनाई तो उन्होंने कहा कि मेरा आशीर्वाद है कि तुम्हारे यहां एक वर्ष के भीतर ही पुत्र का जन्म होगा। कुलगुरु का आशीर्वाद फलित हुआ और राजा के यहां एक वर्ष बीतने से पहले ही पुत्र का जन्म हुआ। राजकुमार बड़ा होने लगा तो राजा ने सोचा कि इसकी शिक्षा सर्वोत्तम होनी चाहिए। यही सोचकर उन्होंने अपने सेनापति से कहा कि पांच ऐसे व्यक्ति ढूंढ़ कर लाओ, जिनमें से एक सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो, दूसरा सर्वश्रेष्ठ गदाधारी हो, तीसरा श्रेष्ठ तलवार चलाने वाला हो, चौथा मल्लयुद्ध में निपुण हो और पांचवा सर्वश्रेष्ठ घुड़सवार हो। सेनापति ने कुछ ही दिनों में ऐसे पांच लोगों को तलाश लिया। राजा ने उन्हें बहुत सम्मान के साथ राजकुमार का आचार्य नियुक्त किया। समय बीतता गया और जब राजकुमार युवा हुआ तो वह देश का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, घुड़सवार, मल्लयुद्ध (कुश्ती) में निपुण, श्रेष्ठ गदाधारी तथा सर्वश्रेष्ठ तलवारबाज बन चुका था। राजा का अत्याधिक प्रिय और युद्ध प्रवीण होने के साथ-साथ युवा अवस्था के कारण राजकुमार बहुत घमंडी हो गया। वह अपने सामने किसी को कुछ समझता ही न था और अपने सम्मान के प्रति वह आवश्यकता सेे अधिक सजग था। कोई उसके सामने सिर उठाकर बात नहीं कर सकता था। आसपास के छोटे-छोटे राज्यों की संपदा पर भी उसकी नजर बनी रहती और वह उन पर आक्रमण करता रहता। उसका लोभ दिन पर दिन बढ़ता जाता था। साथ ही साथ गुस्सा भी हमेशा उसकी नाक पर ही रहता था। कुछ चापलूसी करने वाले दोस्तों ने उसे स्त्रियों के प्रति भी गलत आचरण का अभ्यस्त बना दिया था। धीरे-धीरे पूरे राज्य में उसके बारे में बातें होने लगीं और वे बातें जब राजा के कानों तक पहुंची तो राजा हैरान रह गए। उन्होंने अपने मंत्री से कहा कि मुझे राजकुमार को लेकर कुल गुरु के आश्रम जाना चाहिए, क्योंकि वही हैं जो राजकुमार को सही रास्ते पर ला सकते हैं।लेकिन राजकुमार ने कहा कि वह किसी आश्रम में नहीं जाना चाहता। राजा ने कहा वहां एक ऐसे व्यक्ति हैं जो तुमसे हर बात में श्रेष्ठ हैं। यह सुनते ही राजकुमार का अहंकार जाग उठा। उसने कहा, मुझसे श्रेष्ठ कोई है ही नहीं। तब राजा ने कहा कि यदि वे तुमसे श्रेष्ठ न हुए तो मैं अपना सारा राजपाट तुम्हें सौंपकर संन्यास ले लूंगा। राजकुमार ने उनकी बात मान ली। जब वे कुलगुरु के आश्रम में पहुंचे तो राजकुमार ने देखा कि एक बहुत दुबले वृद्ध व्यक्ति को राजा ने दंडवत प्रणाम किया। राजा ने राजकुमार से कहा, यही हमारे कुलगुरु हैं। राजकुमार उनकी बात सुनकर हंसने लगा और उसने कहा, मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, घुड़सवार, मल्लयुद्ध में निपुण हूं। तलवारबाजी और गदा युद्ध में भी मेरा कोई सानी नहीं है और आप कहते थे कि आप के कुलगुरु मुझसे श्रेष्ठ हैं। जबकि सामने खड़े ये बूढ़े व्यक्ति तो ठीक से खड़े भी नहीं हो सकते।

कुल गुरु ने हंसकर कहा, ‘तुम ठीक कहते हो राजकुमार, लेकिन मैं कैसे मान लूं कि तुम सारी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ हो?

तब राजकुमार ने कहा कि आप चाहें तो मेरी परीक्षा लेकर देख लें। कुल गुरु ने कहा, ‘ठीक है, यदि तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो तो वायु को भेदकर दिखाओ, गदा युद्ध में निपुण हो तो सामने जल रही अग्नि को पराजित करो, तलवारबाजी जानते हो तो यह जो नदी है इसे काटकर दिखाओ, सबसे अच्छे घुड़सवार हो तो तुम्हारे सामने जो पृथ्वी है, इसे पीछे छोड़ कर बताओ और यदि तुम सबसे अच्छे पहलवान हो तो आसमान को नीचे गिराकर दिखाओ।

उनकी बात सुनकर राजकुमार हंसने लगा और उसने कहा कि मैं तो क्या, संसार का कोई भी योद्धा ये काम नहीं कर सकता। कुलगुरु ने कहा कि मैं तो बहुत बूढ़ा और कमजोर हूं, लेकिन यदि चाहूं तो ये सारे काम बहुत आसानी से कर सकता हूं। उनकी बात सुनकर राजकुमार ने कहा, ‘यदि आपने यह सब करके दिखा दिया तो मैं आपका शिष्य बन जाऊंगा और आप जो कहेंगे हमेशा वही करूंगा। कुलगुरु मुस्कराए और उन्होंने एक तीर उठाया और अपनी मु_ी बांधकर कहा, ‘देखो मेरी मु_ी में वायु है मैं इसे तीर से भेद देता हूं। उन्होंने अपनी मु_ी के ऊपरी हिस्से में तीर रखा और कहा देखो मैंने वायु को भेद दिया। फिर उन्होंने कहा, गदा से अग्नि को पराजित करना है तो लकड़ी के ऊपर प्रहार करो लकडिय़ों पर प्रहार करते ही अग्नि बुझ गई और उन्होंने कहा देखो अग्नि हार गई। इसके बाद उन्होंने तलवार उठाई और नदी के किनारे को काटा तो नदी दो भागों में विभक्त होकर बहने लगी उन्होंने कहा देखो तलवार ने नदी को काट दिया। फिर उन्होंने कहा कि पृथ्वी से आगे निकलना चाहते हो तो अपने घोड़े का मुंह मोड़ लो। घोड़े का मुंह मोड़ते ही उन्होंने कहा तुम्हारे सामने जो पृथ्वी थी, वह पीछे छूट गई। इसके बाद उन्होंने एक बड़ी-सी थाली में पानी भरा और कहा इसमें देखो। राजकुमार ने देखा जल में आकाश दिख रहा था। गुरु ने कहा, देखो मैंने आकाश को नीचे गिरा दिया। उनकी बातें सुनकर राजकुमार आश्चर्यचकित रह गया और उसने कहा कि मुझे लगता था कि शरीर की ताकत ही सबसे बड़ी होती है, लेकिन आज मुझे लग रहा है कि कोई और शक्ति है, जो सबसे बड़ी है।

कुलगुरु ने बहुत प्रेम से उसके माथे पर हाथ रखा और कहा कि वह शक्ति ज्ञान की है। वह ज्ञान, जो सत्य है। ज्ञान सत्य होता है तो वह स्वयं ईश्वर की तरह ही होता है, लेकिन यह ईश्वर स्वरूप सत्य ज्ञान केवल उसी हृदय में निवास करता है, जिस हृदय में काम, क्रोध, मद, ​

krishankharar

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सर्वश्रेष्ठ समर्पित हो


एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नगर के बीच मे भगवान् का मन्दिर था..

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वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न कुछ लेकर आते थे।

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एक दिन महात्मा जी अपने कुछ शिष्यों के साथ नगर भ्रमण को गये तो बीच रास्ते मे उन्हे एक फल वाले के वहाँ एक आदमी कह रहा था की कुछ सस्ते फल दे दो भगवान् के मन्दिर चढ़ाने है।

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थोड़ा आगे बढे तो एक दुकान पर एक आदमी कह रहा था की दीपक का घी देना और वो घी ऐसा की उससे अच्छा तो तेल है।

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आगे बढ़े तो एक आदमी कह रहा था की दो सबसे हल्की धोती देना एक पण्डित जी को और एक किसी और को देनी है।

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फिर जब वो मन्दिर गये तो जो नजारा वहाँ देखा तो वो दंग रह गये…

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उस राज्य की राजकुमारी भगवान् के आगे अपना मुंडन करवा रही थी…

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वहाँ पर एक किसान जिसके स्वयं के वस्त्र फटे हुये थे पर वो कुछ लोगों को नये नये वस्त्र दान कर रहा था।

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जब महात्मा जी ने उनसे पूछा तो किसान ने कहा, हे महात्मन चाहे हम ज्यादा न कर पाये पर हम अपने ईश्वर को वो समर्पित करने की ईच्छा रखते है जो हमें भी नसीब न हो…

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जब मैं इन वस्त्रहीन लोगों को देखता हूँ तो मेरा बड़ा मन करता है की इन्हे उतम वस्त्र पहनावे।

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जब राजकुमारी से पूछा तो उस राजकुमारी ने कहा, हे देव एक नारी के लिये उसके सिर के बाल अति महत्वपुर्ण है और वो उसकी बड़ी शोभा बढ़ाते है..

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मैंने सोचा की मैं अपने इष्टदेव को वो समर्पित करूँ जो मेरे लिये बहुत महत्वपुर्ण है इसलिये मैं अपने ईष्ट को वही समर्पित कर रही हूँ।

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जब उन दोनो से पूछा की आप अपने ईष्ट को सर्वश्रेष्ठ समर्पित कर रहे हो तो फिर आपकी माँग भी सर्वश्रेष्ठ होगी तो उन दोनो ने ही बड़ा सुन्दर उत्तर दिया।

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हे देव, हमें व्यापारी नही बनना है और जहाँ तक हमारी चाहत का प्रश्न है तो हमें उनकी निष्काम भक्ति और निष्काम सेवा के अतिरिक्त कुछ भी नही चाहिये।

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जब महात्मा जी मन्दिर के अन्दर गये तो वहाँ उन्होने देखा वो तीनों व्यक्ति जो सबसे हल्का घी, धोती और फल लेकर आये…

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साथ मे अपनी मांगो की एक बड़ी सूची भी साथ लेकर आये और भगवान् के सामने उन मांगो को रख रहे है।

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तब महात्मा जी ने अपने शिष्यों से कहा, हे मेरे अतिप्रिय शिष्यों जो तुम्हारे लिये सबसे अहम हो जो शायद तुम्हे भी नसीब न हो जो सर्वश्रेष्ठ हो वही ईश्वर को समर्पित करना…

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और बदले मे कुछ माँगना मत और माँगना ही है तो बस निष्काम-भक्ति और निष्काम-सेवा इन दो के सिवा अपने मन मे कुछ भी चाह न रखना।

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इसीलिये हमेशा याद रखना की भले ही थोड़ा ही समर्पित हो पर जो सर्वश्रेष्ठ हो बस वही समर्पित हो।

राधे राधे❤️🙏

Sakshi Bhalla

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संत महिमा


एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे। एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था। एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ, आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.?

संत बोले – श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे। किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ? मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।

संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया….कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है।

किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा। फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया…3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है,

बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए।

किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा, जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला, अच्छा बच्चु .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो, और मुझ पर जादू कर रहे हो।

शयाम सुंदर उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे।

किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया। और बाबा से बोला बाबा, आपका शिकार लाया हुँ… बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं।

संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर जी से कातर वाणी में बोले –

हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए…!!

भगवान बोले – इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया।

भगवान तो भक्तों के संतों के आधीन ही होतें हैं।

जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं, पर संत को रोज़ प्रणाम करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए ।

भक्तो यह होता है संत की संगति का परिणाम!!

“संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान,

ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान”

सच्ची श्रद्धा भक्ति से निस्वार्थ पूरे भाव से पुकारो दीनानाथ को फिर देखो प्रभु कैसे दौर दौड़े चले आते है क्यूंकि भगत के वश में है भगवान

राधे राधे❤️🙏

Sakshi Bhalla

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एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।

राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।

कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं?

संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।

संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है।

अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है।

उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है।

उसको (भगवान्) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हो, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो।

आप आँखे बंद कर के विश्वास के साथ पुकारे, सच मानिये

थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा।

राधे राधे❤️🙏

Sakshi Bhalla

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जय लक्ष्मी माँ


एक साहूकार की एक बेटी थी। वह रोजाना पीपल के पेड़ में पानी डालने जाती थी। पीपल के पेड़ पर लक्ष्मी जी का वास था। एक दिन लक्ष्मी जी ने प्रकट होकर उससे कहा तू मेरी सहेली बन जा।

वह लड़की माता पिता की आज्ञाकारी थी। उसने कहा यदि मेरे मेरे माता पिता आज्ञा दे देंगे तो मै आपकी सहेली बन जाउंगी। उसके माता पिता ने उसे आज्ञा दे दी। दोनों सहेली बन गई।

एक दिन लक्ष्मी जी ने उसे खाना खाने के लिए निमंत्रण दिया। माता पिता की आज्ञा लेकर वह लक्ष्मी जी के यहाँ जीमने चली गई।

लक्ष्मी जी ने उसे शाल दुशाला भेंट किया , रूपये दिए। उसे सोने से बनी चौकी पर बैठाया। सोने की थाली , कटोरी में छत्तीस प्रकार के व्यंजन परोस कर खाना खिलाया।

जब वह अपने घर के लिए रवाना होने लगी तो लक्ष्मी जी ने कहा मैं भी तुम्हारे यहाँ जीमने आऊँगी। उसने कहा ठीक है , जरूर आना।

घर आने के बाद वह उदास होकर कुछ सोच में पड़ गई । पिता ने पूछा सहेली के यहाँ जीम कर आई तो उदास क्यों हो। उसने अपने पिता को कहा लक्ष्मीजी ने उसे बहुत कुछ दिया अब वो हमारे यहाँ आएगी तो मैं उसे कैसे जिमाउंगी ,अपने घर में तो कुछ भी नहीं है।

पिता ने कहा तू चिंता मत कर। बस तुम घर की साफ सफाई अच्छे से करके लक्ष्मी जी के सामने एक चौमुखा दिया जला कर रख देना। सब ठीक होगा।

वह दिया लेकर बैठी थी। एक चील रानी का नौलखा हार पंजे में दबाकर उड़ती हुई जा रही थी। उसके पंजे से वह हार छूटकर लड़की के पास आकर गिरा। लड़की हार को देखने लगी। उसने अपने पिता को वह हार दिखाया।

बाहर शोर हो रहा था की एक चील रानी का नौलखा हार उड़ा ले गई है। किसी को मिले तो लौटा दे। एक बार तो दोनों के मन विचार आया की इसे बेचकर लक्ष्मी जी के स्वागत का प्रबंध हो सकता है।

लेकिन अच्छे संस्कारों की वजह से पिता ने लड़की को कहा यह हार हम रानी को लौटा देंगे। लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए धन तो नहीं पर हम पूरा मान सम्मान देंगे।

उन्होंने हार राजा को दिया तो राजा ने खुश होकर कहा जो चाहो मांग लो। साहूकार ने राजा से कहा की बेटी की सहेली के स्वागत के लिए शाल दुशाला , सोने की चौकी , सोने की थाली कटोरी और छत्तीस प्रकार के व्यंजन की व्यवस्था करवा दीजिये। राजा ने तुरंत ऐसी व्यवस्था करवा दी।

लड़की ने गणेश और लक्ष्मी जी दोनों को बुलाया। लक्ष्मी जी को सोने की चौकी पर बैठने को कहा। लक्ष्मी जी ने कहा की मैं तो किसी राजा महाराजा की चौकी पर भी नहीं बैठती। लड़की ने कहा मुझे सहेली बनाया है तो मेरे यहाँ तो बैठना पड़ेगा।

गणेश और लक्ष्मी जी दोनों चौकी पर बैठ गए। लड़की ने बहुत आदर सत्कार के साथ और प्रेम पूर्वक भोजन करवाया। लक्ष्मी जी बड़ी प्रसन्न हुई। लक्ष्मी जी ने जब विदा मांगी तो लड़की ने कहा अभी रुको मैं लौट कर आऊं तब जाना ,और चली गई।

लक्ष्मी जी चौकी पर बैठी इंतजार करती रही। लक्ष्मी जी के वहाँ होने से घर में धन धान्य का भंडार भर गया। इस प्रकार साहूकार और उसकी बेटी बहुत धनवान हो गए।

हे लक्ष्मी माँ। जिस प्रकार आपने साहूकार की बेटी का आतिथ्य स्वीकार करके भोजन किया और उसे धनवान बनाया। उसी प्रकार हमारा भी आमंत्रण स्वीकार करके हमारे घर पधारें और हमें धन धान्य से परिपूर्ण करें।

जय लक्ष्मी माँ ❤️🙏

Sakshi Bhalla