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पश्चात्ताप
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भगमतिया टूटी खटिये पर बैठी खाँसते खाँसते दुहरी हो गयी थी। खाँसते खाँसते वह पानी की आस में घर में बहू की तरफ भी झाँक भी लेती।

बहू नीलम जर्जर हो चुके घर में झाड़ू मारते हुए बड़बड़ाये जा रही थी, “इस बुढ़िया ने तो नाक में दम कर रखा है। न मरती है न चैन से जीने देती है। बच्चों को तैयार कराना और स्कूल में भेजना फिर घर में झाड़ू पोंछा क्या कम है ? ऊपर से इन महारानी की जिम्मेदारी…और फिर काम पर भी जाना है।” बड़बड़ाती हुई नीलम जब तक पानी लेकर सास के पास पहुँचती उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।

आनन फानन हरीश को माँ के गुजरने की खबर दी गयी जो कि गाँव में ही आरा मशीन पर मजदूरी करता था।

पड़ोसियों व रिश्तेदारों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार की विधियाँ पूरी कराई जा रही थीं।

मृतात्मा की शांति के लिए मंत्रोच्चार के बीच पड़ोसी पंडित दीनानाथ ने हरीश से भगमतिया के निर्जीव शरीर को पानी पिलाने का निर्देश दिया।

पड़ोसी महिलाओं की भीड़ में सुबक रही नीलम सोच रही थी ‘काश, मैंने यही पानी उसे कुछ देर पहले वक्त रहते पिला दिया होता तो आज हरीश को उसके मृत शरीर को पानी देने की नौबत ही नहीं आती।’
पश्चात्ताप के आवेग में उसका रुदन और तेज हो गया।

राजकुमार कांदु
स्वरचित /मौलिक

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લાઈટ બલ્બના શોધક થોમસ આલ્વા એડિસનના જીવનનો એક બહુ જ રસપ્રદ પ્રસંગ છે. એ સમયે એમની ઉંમર ૬૭ વર્ષની હતી. પોતાની લેબોરેટરીમાં આખો દિવસ કામ કરીને દરરોજની જેમ, એક સાંજે તેઓ ઘરે પાછા ફર્યા. ડિનર કર્યા બાદ તેઓ આરામ કરી રહ્યા હતા, ત્યારે અચાનક એક માણસ દોડતો દોડતો એમના ઘરે આવ્યો. ખૂબ ચિંતાતુર ચહેરા સાથે એ માણસે સમાચાર આપ્યા, ‘લેબોરેટરીમાં આગ લાગી છે. જલદી આવો.’ થોમસ એડિસન શાંત ચહેરે બહાર નીકળ્યા. પોતાના ઘરથી થોડે દૂર આવેલા તેમના રિસર્ચ અને પ્રોડક્શન કેમ્પસમાં લાગેલી આગને તેઓ થોડીવાર સુધી જોતા રહ્યા. તેમણે જોયું કે વર્ષોની મહેનતથી ઉભી કરેલી લેબોરેટરીમાંથી આગની પ્રચંડ જ્વાળાઓ નીકળી રહી હતી. આ દ્રશ્ય જોઈને તેમણે પોતાના દીકરાને બોલાવ્યો અને બાળસહજ ભાવ સાથે કહ્યું, ‘જા, જલદી તારા મમ્મીને બોલાવતો આવ. આટલી સરસ આગ પછી ક્યારેય જોવા નહીં મળે.’

‘પણ આપણી લેબોરેટરી બળી રહી છે.’ દીકરાએ ચિંતા વ્યક્ત કરી. એના જવાબમાં એડિસને સ્માઈલ કરીને કહ્યું, ‘કાંઈ વાંધો નહીં બેટા. ઘણો બધો કચરો એકઠો થયો’તો. સળગી જવા દે.’ એડિસનનું આ રીએક્શન બહુ વિચિત્ર હતું. પોતાની જિંદગી ભરની મહેનત આ રીતે નજર સામે બળીને રાખ થઈ જાય, તો કોઈ માણસ શાંતિ કેવી રીતે જાળવી શકે ? આવી ભીષણ આગ અને ભયંકર લાગતી દુર્ઘટનાને કેવી રીતે કોઈ પોઝીટીવલી જોઈ શકે ?. પરંતુ એડિસન જરાય નિરાશ ન થયા. એક ઊંડો શ્વાસ લઈને તેમણે દીકરાને કહ્યું, ‘જે થયું, તે સારા માટે.’

લોકોને ત્યારે એ જાણ નહોતી કે બહાર દેખાતી આગ કરતા વધારે ભીષણ આગ એડિસનની અંદર લાગેલી. બીજે દિવસે સવારે એક રિપોર્ટરને આપેલા ઇન્ટરવ્યુમાં એડિસને કહ્યું, ‘શું હું તમને એટલો બધો વૃદ્ધ લાગુ છું કે એક નવી શરૂઆત ન કરી શકું ? આવી બધી ઘટનાઓથી જિંદગીનો થાક અને કંટાળો દૂર થઈ જાય છે.’ કર્મચારીઓ સાથે પોતે પણ ડબલ-શિફ્ટમાં કામ કરીને તેમણે ફક્ત એક મહિનામાં લેબોરેટરી ઉભી કરી. એટલું જ નહીં, આગને કારણે થયેલા એક મિલિયન ડોલરના નુકશાનની સામે એ વર્ષે તેમણે દસ મિલિયન ડોલર્સની રેવેન્યુ ઉભી કરી. આને કહેવાય એટીટ્યુડ. જિંદગીના સૌથી ખરાબ સમયમાં પણ કંઈક સારું જોઈ શકવાની ટેલેન્ટ.

પરીસ્થિતિ ક્યારેય સારી કે ખરાબ નથી હોતી. એ પરીસ્થિતિ પ્રત્યેનું આપણું રીએક્શન સારું કે ખરાબ હોય છે. બાહ્ય પરિબળો કે સંજોગો ક્યારેય આપણા કાબુમાં નથી હોતા. બસ, એ સંજોગો પ્રત્યેની પ્રતિક્રિયા આપણા કાબુમાં હોય છે. આ એ જ એડિસન હતા જેમણે ૯૯૯ પ્રયત્નો પછી લાઈટ બલ્બની શોધ કરેલી. ત્યારે તેમણે કહેલું કે ‘હું ૯૯૯ વાર નિષ્ફળ નથી ગયો. મેં તો ૯૯૯ એવી તરકીબો શોધી કાઢી છે, જે કામ નથી કરતી.’ નિષ્ફળતા એ સફળતાનું વિરુદ્ધાર્થી નથી. એ સફળતા સુધી પહોંચવા માટેનું પગથિયું છે.

સ્ટોઈક ફિલોસોફીનો એક બહુ સરસ શબ્દ છે ‘અમોર ફેટી’ એટલે કે ‘લવ યોર ફેઈટ’. તમારી નિયતિને પ્રેમ કરો. તમારી સાથે જે કાંઈ પણ થઈ રહ્યું છે, એનો સહર્ષ સ્વીકાર કરો. જીવનમાં આવતા સંકટ, સંઘર્ષો અને તકલીફો પણ આપણું એક ‘બેટર વર્ઝન’ બનાવવા માટે બહુ જરૂરી હોય છે.
-ડૉ. નિમિત્ત ઓઝા ( all ©️ reserved )

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पितृ ऋण
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“डैड, मेरी कम्पनी का जो नया ब्राँच खुला है न इंडिया में, मुझे उसका चार्ज दिया गया है, तो मुझे अगले हफ़्ते इंडिया जाना होगा।”

“पर उत्कर्ष, अभी कुछ समय पहले ही तो एक महीना वहाँ बिता कर आए हो?”

“तब मैं वहाँ कम्पनी का नया ऑफ़िस स्थापित करने गया था।”

“और अब?”

“अब कंपनी ने इंडिया ट्रांसफर कर दिया है, वहाँ जो नया ऑफिस खुला है, उसे अब कुछ समय के लिए मुझे ही सँभालना है।”

धक्का लगा उन्हें! फिर से इंडिया! कितनी मुश्किल से पीछा छुड़ाया था उस देश से उन्होंने… दीनानाथ पाटिल उर्फ़ डैनी ने! लगा जैसे क़िस्मत फिर से उन्हें उसी ओर खींच रही है! डर भी लगा, कहीं उत्कर्ष ……..

“तूने मना क्यों नहीं किया? कहते मेरे पेरेंट्स सीनियर सिटिज़न हैं। उनकी तबियत भी सही नहीं रहती। मैं नहीं जा सकता?”

“ये सब बातें नहीं सुनी जाती हैं मल्टीनेशनल कम्पनियों में, डैड। उन्हें बस अपने काम से मतलब होता है।”

“तो तुम कोई दूसरी नौकरी ढूढ़ लो! तुम्हें तो कोई भी नौकरी मिल जाएगी, इतने हाइली क्वालिफाइड हो।”

“ये एक चैलेन्ज है डैड, कंपनी को जब इंडिया वाले ब्राँच से प्रॉफ़िट मिलने लगेगा तो मेरा कैरियर ऊँचाइयों पर पहुँच जाएगा। फिर वे मुझे एक एम्प्लॉई से पार्ट्नर भी बना सकते हैं!” उत्कर्ष का जवाब सुन वे चुप हो गए।

उत्कर्ष ने डैड को ये नहीं बताया कि उसने स्वयं अपने बॉस से अनुरोध किया था इस पोस्टिंग के लिए।

कुछ ही सप्ताह पूर्व इंडिया के पुणे शहर गया था उत्कर्ष अपनी कम्पनी की शाखा को स्थापित करने के लिए। काम के बीच में पड़े एक वीकएंड में वह अपनी मौसी के यहाँ चला गया था जो मुंबई में रहती थीं।

“पुणे में खुल रहा तुम्हारा ऑफ़िस? अरे, वहीं पास में तो तुम्हारा ददिहाल है। क्या नाम था गाँव का….. अंबोली…. हाँ यही। याद है मुझे अच्छी तरह से। दीदी विदा होकर वहीं तो गई थी।”

ये सब जानकारी उत्कर्ष के लिए नयी थी! अपने ददिहाल में वह किसी को नहीं जानता था! अचंभित ही रहता कि डैड के तरफ़ का कोई भी नज़दीकी रिश्तेदार उनके संपर्क में क्यों नहीं है?

“मेरे दादाजी का नाम क्या था?”
“पाटिल …. शंभुनाथ पाटिल। इससे ज़्यादा मैं नहीं जानती।”

अगले वीकेंड वह अंबोली पहुँच गया था मन में उठ रहे हज़ार प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने… वो कहाँ से आया है…. उसकी फ़ैमिली में कौन-कौन है, क्या कोई अपना मिलेगा? आदि!

धड़कते दिल से जब वह गाँव पहुँचा तो एक बुज़ुर्ग से उसने शंभुनाथ पाटिल का घर पूछा। पता तो उन्होंने बता दिया, पर थोड़ा आश्चर्य ज़ाहिर किया,
“कौन हो बेटा? आज तक तो शंभु काका से मिलने शहर से कोई नहीं आया! जब उनके बेटे ने धोखे से उनकी सारी ज़मीन बेच दी व उनसे सारे संबंध तोड़ विदेश चला गया तबसे बेचारे दोनों अकेले ही रहते हैं।”

“जी मैं उनका दूर का रिश्तेदार हूँ।” मन बहुत व्यथित हो उठा था। उसके दादा-दादी ज़िंदा हैं, इतने बरसों से अकेले रह रहे हैं और उसे पता ही नहीं!

घर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। परंतु जो वृद्ध-द्वय सामने बैठे थे उन्हें देख उसकी आँखों से गंगा-जमुनी धार बह निकली! कृष्काय, शरीर पर एक छटाँक माँस नहीं पर अपना सब कार्य स्वयं करते हुए। क्या यही उसके दादा-दादी हैं?

उनके पाँव छूते हुए जब उसने अपना परिचय दिया तो उनको सम्भाल पाना उसके लिए असंभव हो गया।

इस मुलाक़ात ने स्वयं उसे भी बहुत अस्थिर कर दिया था परंतु इस वृद्ध दम्पत्ति की हालत को शब्दों में बयान करना उसके लिए नामुमकिन था। जिसका उन्होंने दशकों से सपना देखना भी छोड़ दिया था वो अगर सच बन उनके सामने आ जाए तो दिल की धड़कन तो कुछ पल को रुक ही जाएगी न!

जब सोमवार प्रातः वह पुणे लौटने लगा तो दादा-दादी बेतहाशा रोने लगे… उन्हें लग रहा था कि उनके पुत्र की तरह उनका पोता भी अब कभी लौट कर नहीं आएगा। बेटे का तीस वर्षों से इंतज़ार कर रहे बूढ़े माँ-बाप ने अपनी क़िस्मत से समझौता कर लिया था। पर अब……
“दादीमाँ, दादाजी मैं आपसे अपनी क़सम खा कर कह रहा हूँ, मैं आपलोगों को छोड़ कर कभी नहीं जाऊँगा। फ़्राइडे शाम को मैं वापस आ जाऊँगा, आप बिलकुल निश्चिंत रहें। नौकरी तो करनी है न!”

शायद ये सप्ताह उस दम्पत्ति के जीवन का सबसे लम्बा इंतज़ार रहा होगा पर जब शुक्रवार को उत्कर्ष वापस लौटा तो मानो उनके जान में जान आ गई। दादी का मुस्कुराता चेहरा तो सचमुच में सुंदर लग रहा था!

खून के रिश्ते में कोई बात तो होती है…. वह हमारे हृदय के तारों को झंकृत करने से कभी नहीं चूकती।

उस सप्ताहंत उत्कर्ष से जितना बन पड़ा उसने दादा-दादी के रिहाइश को बेहतर करने की कोशिश की। ये उसका इंडिया में आख़िरी वीकेंड था, अगले शुक्रवार उसकी वापसी की फ़्लाइट थी पर उसने अपने भविष्य का खाका मन ही मन में तैयार कर लिया था।

पूरा एक महीना लगा उसे अपने बॉस को इस बात के लिए मनाने में कि उसका ट्रांसफ़र भारत वाले नव-स्थापित दफ़्तर में कर दे। इसके लिए उसे न सिर्फ़ सफलता का आश्वासन देना पड़ा, वरन पहले से कम वेतन पर काम करने के लिए भी राज़ी होना पड़ा।

परंतु उसे इन बातों का कोई ग़म न था। उसने निश्चय कर लिया था कि अपने दादाजी व दादीमाँ की बची हुई ज़िंदगी में ख़ुशियाँ भरने के लिए वह कुछ भी करेगा।

जिस पितृ-ऋण को अमरीकी नागरिक बन चुके उसके माता-पिता चुकाने से चूक गए थे, उससे उन्हें उऋण करने का कर्तव्य उनके बेटे का ही तो होगा न!

स्वरचित
प्रीति आनंद अस्थाना

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*प्रसाद*

मंदिर के बाहर बहुत लंबी कतार थी दर्शनार्थियों की ,हर किसी को जल्दी से जल्दी भगवान के दर्शन पाने थे। कई लोग पंक्ति के बीच में घुसकर खुद को आगे बढाने का भी प्रयास कर रहे थे।लोगों मे धक्का मुक्की हो रही थी , कहासुनी भी हो रही थी, कोई कह रहा था.. ये कोई तरीका है दर्शन करने का.., तो कोई कह रहा था..–हम यहाँ पहले से खड़े थे.. ।
रमा भी अपने पति के साथ खड़ी धीरे धीरे कतार में आगे बढ़ रही थी।कतार इतनी लंबी थी कि रमा का नंबर आने मे अभी भी लगभग एक घंटा लगना था।
बहुत शोर भी हो रहा था… कोई मंत्र जप कर रहा था….कुछ लोग जयकारे लगा रहे थे।रमा भी मन ही मन ईश्वर का नाम लेती हुई पग पग आगे खिसक रही थी।
कतार में आगे बढ़ते बढ़ते रमा ने देखा… रेलिंग के पार एक महिला खड़ी है ..जिस के तन पर पुराने से कपड़े थे और हाथ मे एक छोटा सा बच्चा था ।वो महिला कातर दृष्टि से सबको देख रही थी , किसी से भीख भी नही मांग रही थी , उसका बच्चा रह रहकर रोता था…वो बैचेन सी उसको छाती से लगा लेती….बच्चा छाती में मुँह घुसा लेता …पलभर को चुप होता.. फिर वापिस रोने लगता… और वो महिला फिर उसे छाती से चिपका लेती..।
भीड़ के शोर में उसकी आवाज़ तो सुनाई नही दे रही थी.. लेकिन उसके हावभाव से उसकी मजबूरी और परेशानी साफ़ नज़र आ रही थी।
कतार धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी…. पर रमा तो जैसे वहीं जड़ हो गई.. बार बार उसको देखती और बैचेन हो जाती।
‘सुनो…रमा ने पति से कहा।’
‘क्या हुआ…. रमा का पति बोला।’
‘वो देखिए.. वो बच्चा कितनी देर से रो रहा है.. उसकी माँ कितनी परेशान लग रही है…रमा ने कहा।’
‘तुम उधर क्यों देख रही हो… ये तो इन लोगों का धंधा है..छोटे छोटे बच्चों को गोद मे लेकर भीख मांगने का… जल्दी जल्दी चलो पहले ही बहुत भीड़ है….पतिदेव कुछ झिड़कते हुए बोले..।”
रमा चुप हो गई… धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी। पर उसका ध्यान उस महिला पर ही केन्द्रित था…बच्चा बार बार रो रहा था.. माँ बैचेनी से उसको चुप कराने का निष्फल प्रयास कर रही थी।रमा का मन विचलित था…उसको एक एक कदम उठाना भारी लग रहा था।
अचानक कोई कतार में बीच में घुसने की कोशिश करने लगा..उस पर लोग चिल्ला पुकार करने लगे..।कतार की गति और धीमी हो गई।रमा ने देखा ,,उस महिला की आँखों से आँसू निकल रहे थे… बच्चा चुप नही हो रहा था।
रमा से रहा न गया… वो पति से बोला..”मैं दो मिनिट मे आती हूँ”
“चुपचाप यहीं खड़ी रहो…फालतू बातों में अपना दिमाग मत खपाओ….पतिदेव लगभग डांटते हुए बोले।
रमा आगे चलने लगी।अगले ही पल चुपचाप भीड़ से निकलकर लगभग भागते हुए महिला की तरफ़ दौड़ी।
“रमा….रमा….सुनो,…..पतिदेव ज़ोर से बोले।
रमा बिना उन्हें देखे दौड़कर सीधे महिला के पास पहुंच गई।
“बच्चा क्यों रहा है….रमा ने पूछा”
“भूखा है बहनजी…महिला ने नीची नज़रे करके उत्तर दिया…”
“तुम किसी से कुछ मांग भी नही रही.. क्या बात है….रमा ने पूछा।
“मांग मांग कर थक चुकी हूं बहनजी… कोई विश्वास नही करता कि बच्चा सच मे भूखा है….सबको लगता है कि मैं चिकोटी काटकर बच्चे को रुलाती हूँ..ताकि लोग दया करके मुझे भीख दे दें…मै कह कहकर थक चूकी हूँ कि , मेरा बच्चा सच मे भूखा है , उसे कुछ खाने को नही मिला तो वो दम तोड़ देगा… लेकिन कोई विश्वास नही करता… एक साँस मे वो महिला बोली.. और फफककर रोने लगी… बच्चा भी हिचक हिचक कर रो रहा था…”
रमा ने सारा प्रसाद , जो उसने भगवान को अर्पित करने के लिए लिया था… उस महिला को दिया और साथ मे ईश्वर को चढावे के लिए हाथ में पकड़े एक सौ एक रुपये भी उस महिला को देकर बोली…”जल्दी से बच्चे को कुछ खिला दो….।”
महिला रमा के पैर छूकर बोली-” आप तो भगवान हो बहनजी….मंदिर से निकलकर ,मेरे बच्चे मे प्राण फूकने आई हो…..आप तो भगवान हो बहनजी…।”
रमा ने पीछे मुडकर देखा…. पतिदेव कतार मे लगे…उसीको घूर रहे थे।
रमा धीरे धीरे आराम से चलकर गई और कतार में सबसे पीछे खड़ी हो गई… उसे कोई जल्दी नही थी…मंदिर में पहुंचने की… उसे भगवान के दर्शन हो चुके थे और वह प्रसाद भी अर्पित कर चुकी थी… और भगवान को प्रसाद ग्रहण करते हुए वो अपनी आँखों से देख रही थी…….

*नम्रता सरन ” सोना “*
भोपाल मध्यप्रदेश