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राजा भरथरी


कथा राजा भरथरी (भर्तृहरि) की पत्नी के धोखे से आहत होकर बन गए तपस्वी?

उज्जैन में भरथरी की गुफा स्थित है। इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है। गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है।

गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है। यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था।

यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा। यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है।

गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है।

गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है

पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :-

उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे।

राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से। पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे।

कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ।

गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।

यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे।

जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे।

वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए।

राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है।

जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी।

राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे।

इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी।

भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है।

उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे।

एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।

‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे।

गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’

शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए।

गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है। शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है।

जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’ भरथरी अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए।

सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।

‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।

’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’ गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’

थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की। भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।

अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी।

एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए। भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं।

तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी!

अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’

गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।

Ex शिवानंद मिश्रा

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बात उस समय की है जब जापान में दो राज्यों के बीच युद्ध चल रहा था। युद्ध अपने चरम पर था। आने वाला कल युद्ध का आखिरी दिन था। ऐसे कठिन समय में जापान के एक राज्य के सेनापति ने अपनी सेना के समस्त सरदारों के साथ बैठक की। बैठक में पक्ष और विपक्ष की शक्ति को लेकर चर्चा हुई।
शत्रु की सेना संख्या, हथियार और अपनी क्षमता सहित हर तरह से उन पर हावी थी। बैठक करने वाले राज्य के सरदारों का आत्मविश्वास डगमगाने लगा। लेकिन सेनापति पीछे नहीं हटना चाहता था। तब उसने सैनिकों से कहा, ‘निर्णय सुबह होगा।’
सुबह हुई, सेना चलते-चलते मंदिर के सामने रुकी। सेनापति पूजा के लिए मंदिर में चला गया। थोड़ी देर बाद वह मंदिर से वापिस निकला और उसने सैनिकों से कहा, मेरे पास अभिमंत्रित किया हुआ सिक्का है। यह हमें बताएगा कि युद्ध लड़ना है या पीछे हटना है। इसके बाद उसने सिक्‍के को आसमान में उछाला। सिक्का उछालने के पहले उसने कहा था कि अगर चित्त आता है तो विजय होगी और पट आता है तो पराजय।
सिक्का जमीन पर गिरा। लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। क्योकि सिक्का चित्त की तरफ से गिरा था। सैनिकों का आत्मविश्वास फिर से जाग गया। युद्ध के मैदान में जब दोनों सेनाएं आमने-सामने थी तो आत्मविश्वास से भरी सेना ने जमकर युद्ध किया। हुआ यूं कि उन्होंने अपने से ज्यादा भारी सेना के लोगों को हरा दिया।
युद्ध समाप्त हो चुका था। विजयी सेना के सरदार ने दूसरे सरदार से कहा, ‘हमें तो जीतना ही था।’ यह सुनकर सेनापति ने सरदार को अपने पास बुलाया और वह अभिमंत्रित सिक्का दिखाया। उस सिक्के के दोनों तरफ चित्त बना हुआ था।
कठिन परिस्थितियों में जो अभिमंत्रित सिक्का हमें सफलता दिलाता है, वही आत्मविश्वास है। यदि विश्वास दृढ़ हो कि यह कार्य करना है तो सैकड़ों बाधाओं को पार करके भी हम उसमें सफल हो जाएंगे।
जीत का मनोविज्ञान आत्मविश्वास में निहित है। इसलिए कहा भी गया है कि, ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत।

मुनिद्र मिश्रा

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मिस्त्र का पुस्तकालय


मिस्र के प्राचीन विचारक अनस्तेशियस के आश्रम में पुस्तकों का विशाल संग्रह था। उस संग्रह में कई प्राचीन किताबें थीं। एक बार उनके आश्रम में आए सन्यासी ने उनका एक अमूल्य ग्रंथ चुरा लिया। यदि वे चाहते तो उस सन्यासी के पीछे अपने शिष्यों को भेजकर वह ग्रंथ हासिल कर सकते थे। लेकिन उन्हें डर था कि वह सन्यासी एक और पाप, झूठ बोलने का न कर दे।
कुछ दिनों बाद एक धनी व्यक्ति वह ग्रंथ लेकर अनस्तेशियस के आश्रम में आया। उसने कहा मुझे दुर्लभ ग्रंथ एकत्र करने का शौक है। मुझे इस ग्रंथ के बदले में एक सन्यासी मोटी रकम मांग रहा है। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए।
अनस्तेशियस ने अपना ग्रंथ पहचान लिया। उन्होंने कहा यह ग्रंथ अमूल्य है। इसे आप किसी भी मूल्य में खरीद लीजिए। धनी व्यक्ति ने कहा मैं मुंहमांगी कीमत पर धन खरीदने के लिए तैयार हूं। लेकिन उस सेठ ने बातों ही बातों में अनस्तेशियस की सलाह के बारे में भी बताया।
यह सुनकर वह सन्यासी दंग रह गया। आज तक उसकी भलाई के बारे में किसी ने भी नहीं सोचा था और न ही उससे इतना प्यार भरा व्यवहार किया था। उसने धनी व्यक्ति से वह ग्रंथ वापिस ले लिया और उसके पैसे लौटा दिए।
वह सन्यासी सीधे अनस्तेशियस के आश्रम पहुंचा। और विन्रम भाव से वह ग्रंथ अनस्तेशियस को लौटाना चाहा लेकिन अनस्तेशियस ने कहा रख लो, शायद तुम्हें इसकी जरूरत है।
सन्यासी ने कहा, मैं यह ग्रंथ लौटाना चाहता हूं और यहीं रहकर आपसे ज्ञान की प्राप्ति चाहता हूं। अनस्तेशियस ने उस सन्यासी को आश्रम में रख लिया।
असली ज्ञानी वही होता है जो मधुर और प्रेमपूर्वक व्यवहार करे। और बिना किसी की भावनाएं आहत कर उसे सन्मार्ग पर ले जाए।

मुनिन्द्र मिश्रा

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भाई इसलिए सबका DNA टेस्ट जरूरी है…..!

घटना महाराजा
रणजीत सिंह के समय की है…
एक गाय ने अपने सींग एक दीवार की बागड़ में कुछ ऐसे फंसाए की बहुत कोशिश के बाद भी वह उसे निकाल नही पा रही थी…
भीड़ इकट्ठी हो गई,लोग गाय को निकालने के लिए तरह तरह के सुझाव देने लगे ….
सबका ध्यान एक ही और था कि गाय को कोई कष्ट ना हो….
तभी एक व्यक्ति आया वो आते ही बोला कि गाय के सींग काट दो …
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
खैर घर के मालिक ने दीवार को गिराकर गाय को सुरक्षित निकाल लिया…
गौ माता के सुरक्षित निकल आने पर सभी प्रसन्न हुए, किन्तु गौ के सींग काटने की बात महाराजा तक पहुंची…
महाराजा ने उस व्यक्ति को तलब किया
उससे पूछा गया क्या नाम है तेरा?
व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए नाम बताया दुलीचन्द….
पिता का नाम –सोमचंद जो एक सिपाही था ,
और लड़ाई में मारा जा चुका था …
महाराजा ने उसकी अधेड़ माँ को बुलवाकर पूछा तो माँ ने भी यही सब दोहराया,किन्तु महाराजा असंतुष्ट थे….
उन्होंने जब उस महिला से सख्ती से पूछ ताछ करवाई तो पता चला कि उसका पति जब लड़ाई पर जाता था तब उसके अवैध संबंध उसके पड़ोसी समसुद्दीन से हो गए थे …अतः ये लड़का दुलीचंद उसी समसुद्दीन की औलाद है…
सोमचन्द
की नही…..
महाराजा का संदेह सही साबित हुआ…उन्होंने अपने दरबारियों से कहा कि कोई भी शुध्द सनातनी हिन्दू रक्त
अपनी संस्कृति,
अपनी मातृ भूमि,
और
अपनी गौ माता के अनीष्ट,अपमान
और
उसके पराभाव को सहन नही कर सकता…
जैसे ही
मैंने सुना कि दुलीचंद ने गाय के सींग काटने की बात की तभी मुझे यह अहसास हो गया था कि हो ना हो इसके रक्त में अशुद्धता आ गई है…
सोमचन्द की औलाद ऐसा नही सोच सकती तभी तो वह समसुद्दीन की औलाद निकला
आज भी हमारे समाज में
सन ऑफ सोमचन्द
की आड़ में
बहुत से
“सन ऑफ समसुद्दीन” घुस आए है …
जो अपनी हिन्दू सभ्यता संस्कृति पर आघात करते है …
और उसे देख कर खुश होते है…!

बॉलीवुड हिंजड़ा #अर्जुन_कपूर

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. मेजर और चायवाला,,,,,,

एक मेजर साहब के नेतृत्व में बीस जवानों की एक टुकड़ी हिमालय के अपने रास्ते पर थी ।

बेतहाशा ठण्ड में मेजर ने सोचा की अगर उन्हें यहाँ एक कप चाय मिल जाती तो आगे बढ़ने की ताकत आ जाती ।

लेकिन रात का समय था आस पास कोई बस्ती भी नहीं थी।

लगभग एक घंटे की चढ़ाई के पश्चात् उन्हें एक जर्जर चाय की दुकान दिखाई दी ।

लेकिन अफ़सोस उस पर ताला लगा था ।

भूख और थकान की तीव्रता के चलते जवानों के आग्रह पर मेजर साहब दुकान का ताला तुड़वाने को राज़ी हो गये ।

ताला तोडा गया, तो अंदर उन्हें चाय बनाने का सभी सामान मिल गया ।

जवानों ने चाय बनाई साथ वहां रखे बिस्किट आदि खाकर खुद को राहत दी । थकान से उबरने के पश्चात् सभी आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे , लेकिन मेजर साहब को यूँ चोरो की तरह दुकान का ताला तोड़ने के कारण आत्मग्लानि हो रही थी ।

उन्होंने अपने पर्स में से दो हज़ार का एक नोट निकाला और चीनी के डब्बे के नीचे दबाकर रख दिया तथा दुकान का शटर ठीक से बंद करवाकर आगे बढ़ गए ।

चार महीने की समाप्ति पर इस टुकड़ी के सभी बीस जवान सकुशल अपने मेजर के नेतृत्व में उसी रास्ते से वापस आ रहे थे ।

रास्ते में उसी चाय की दुकान को खुला देखकर वहां सभी विश्राम करने के लिए रुक गए ।

उस दुकान का मालिक एक बूढ़ा चाय वाला था जो एक साथ इतने ग्राहक देखकर खुश हो गया और उनके लिए चाय बनाने लगा ।

चाय की चुस्कियों और बिस्कुटों के बीच मेजर साहब चाय वाले से उसके जीवन के अनुभव पूछने लगे ,खासतौर पर
इतने बीहड़ में दूकान चलाने के बारे में ।

बुजुर्ग व्यक्ति उन्हें कईं कहानियां सुनाता रहा और साथ ही भगवान का आभार प्रकट करता रहा ।

तभी एक जवान बोला ” बाबा आप भगवान को इतना मानते हो , अगर भगवान सच में होता तो फिर उसने तुम्हें इतने बुरे हाल में क्यों रखा हुआ है” ।

बाबा बोला “नहीं साहब ऐसा नहीं कहते भगवान के बारे में, भगवान् तो है और सच में है …. मैंने देखा है”

आखरी वाक्य सुनकर सभी जवान कोतुहल से बुजुर्ग की ओर देखने लगे ।

बाबा बोला “साहब मै बहुत मुसीबत में था , एक दिन मेरे इकलौते बेटे को आतंकवादियों ने पकड़ लिया । उन्होंने उसे बहुत मारा पिटा, लेकिन उसके पास कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए उन्होंने उसे मार पीट कर छोड़ दिया”।

“मैं दुकान बंद करके उसे हॉस्पिटल ले गया ।मै बहुत तंगी में था साहब और आतंकवादियों के डर से किसी ने उधार भी नहीं दिया” ।

“मेरे पास दवाइयों के पैसे भी नहीं थे और मुझे कोई उम्मीद भी नज़र नहीं आती थी । उस रात मै बहुत रोया और मैंने भगवान से प्रार्थना की और मदद मांगी “और साहब … उस रात भगवान मेरी दुकान में खुद आए”

“मै सुबह अपनी दुकान पर पहुंचा ताला टूटा देखकर मुझे लगा कि मेरे पास जो कुछ भी थोड़ा बहुत था वो भी सब लुट गया” ।

” मै दुकान में घुसा तो देखा दो हज़ार रूपए का एक नोट, चीनी के डब्बे के नीचे भगवान ने मेरे लिए रखा हुआ है” ।

“साहब ….. उस दिन दो हज़ार के नोट की कीमत मेरे लिए क्या थी, शायद मै बयान न कर पाऊं …
लेकिन भगवान् है साहब … भगवान् तो है” ।

बुजुर्ग फिर अपने आप में बड़बड़ाया ….

भगवान् के होने का आत्मविश्वास उसकी आँखों में साफ़ चमक रहा था ।

यह सुनकर वहां सन्नाटा छा गया

बीस जोड़ी आँखे मेजर की तरफ एकटक देख रही थी जिसकी आंख में उन्हें अपने लिए स्पष्ट आदेश था ” खामोश रहो ” ।

मेजर साहब उठे, चाय का बिल जमा किया और बूढ़े चाय वाले को गले लगाते हुए बोले “हाँ बाबा मै जानता हूँ भगवान् है…. और तुम्हारी चाय भी शानदार थी” ।

और उस दिन उन बीस जोड़ी आँखों ने पहली बार मेजर की आँखों में चमकते हुए पानी के दुर्लभ दृश्य को देखा ।

इस कहानी से अनुभव किया कि भगवान तुम्हें कब किसकी मदद के लिए किसका भगवान बनाकर कहाँ भेज देंगे, ये खुद तुम भी नहीं जानते….,इसलिए भगवान में हमेशा विश्वास रखिये!!!
जय महादेव

विरभद्र आर्य
🚩

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#madhu Sharma

***बेहतर***

हर नौकरी पेशा की सुबह लगभग एक जैसी ही होती है। उठते ही एक कप चाय, फिर प्रातः कर्मों से निवृत्ति, अंत में नाश्ता कर, तैयार हो ऑफिस के लिए भागा दौड़ी। मैं भी कोई अपवाद नहीं हूं।

“साहब जी ! जूते पॉलिश कर दिए हैं।”

डाइनिंग टेबल से नाश्ता कर उठते उठते मोहन की आवाज मेरे कानों में पड़ी। वह चमचमाते जूते और तह की हुई जुराबों की जोड़ी लिए मेरे सामने खड़ा था। मैंने तुरंत जूते मोजे पहने और बाहर आ गया। पोर्टिको में सरकारी स्विफ्ट डिजायर का पिछला गेट खोले मेरा ड्राइवर अनवर खड़ा था।

“सुनिए ! कल अदिति की क्राफ्ट्स की क्लास है। आते समय नेहरू मार्केट से यह सामान ले आइएगा।”
गाड़ी में बैठते बैठते पत्नी ने मेरे हाथ में एक पर्चा थमते हुए कहा।

“देखो मैं शाम को लेट हो सकता हूं। तुम यह सब सामान मोहन से क्यों नहीं मंगा लेती।” मुझे इरिटेशन सा हुआ।

“तुम्हें लगता है मोहन यह सब समझ पायेगा ? पिछली बार भी उसने सब कुछ गड़बड़ कर दिया था।”पत्नी हॅऺ॑सी और उसने आज का अखबार मेरे हाथ में दे दिया।

“ठीक है”, कहकर मैं कार की पिछली सीट पर जम गया।

सुबह-सुबह चाय की चुस्कियों के साथ आप सिर्फ अखबार की हेडलाइन पढ़ पाते हैं। अधिकांश व्यक्ति पूरा अखबार या तो शाम को घर आकर पढ़ते हैं या पढ़ते ही नहीं। लेकिन मेरी बात ओर है। मैं घर से ऑफिस जाने के बीच का आधे घंटे का वक्त अखबार पढ़ने में ही खर्च करता हूं। मेरे घर से ऑफिस की दूरी मात्र 7 या 8 किलोमीटर होगी लेकिन महानगरों में दूरियां किलोमीटर से नहीं समय से नापी जाती है। गाड़ी में अखबार में डूबे रहने का एक और फायदा है। आपको भिखारी परेशान नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि यह आदमी कार के बंद शीशों के पीछे से उनकी तरफ नजर नहीं उठाएगा।

इसके अतिरिक्त एक फायदा और है। आप गाड़ी ड्राइव कर रहे हो और आपके बगल में कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जो समझता है कि वह आपसे बेहतर ड्राइवर है तो वह आपको बात-बात पर टोकेगा, यहां तक कि आपका गाड़ी चलाना दूभर हो जाएगा। मैं भी स्वयं को बेहतरीन ड्राइवर समझता हूं। अनवर के अपने पास ड्राइवर लगने के कुछ समय बाद तक मैंने उसे बार-बार खराब ड्राइविंग के लिए झिड़कियां दी थी। इतनी कि वह मुझसे तंग हो गया था और ट्रांसफर के लिए अर्जी लगा दी थी। ऑफिस पूल में वैसे ही ड्राइवरों की कमी चल रही थी। मुझे लगा, यदि यह चला जाएगा तो नया ड्राईवर आना मुश्किल है, तो मैंने ऑफिस जाते वक्त अखबार पढ़ना और लौटते वक्त किसी फाइल को पढ़ना प्रारंभ कर दिया। अब मेरा ध्यान न तो सड़क की ओर जाता, ना ही अनवर की ड्राइविंग की ओर। नतीजा भी सुखद निकला। अब न तो अनवर को मुझसे कोई शिकायत थी ना ही मुझे अनवर से कोई शिकायत।

आज बुधवार था। हर बुधवार इस अख़बार में तीसरे पन्ने पर किसी न किसी महान व्यक्ति के कोट्स प्रकाशित होते हैं।

मैंने तीसरा पन्ना खोला। आज राल्फ वाल्डो इमर्सन के विचार छपे थे।अमेरिका में जन्मे ‘राल्फ वाल्डो इमर्सन’ मशहूर निबंधकार, वक्ता और कवि थे। वे अमेरिका में नई जाग्रति लेकर आये थे। मैंने उत्सुकतावश उनके लिखे शब्दों को पढ़ना शुरू किया।

“मैं जिस व्यक्ति से भी मिलता हूँ, वह किसी ना किसी रूप में मुझसे बेहतर है।”
और मैं यहीं रुक गया। मैं एक बड़ा सरकारी अधिकारी हूं। न जाने कितने लोग रोजाना मेरे संपर्क में आते हैं। हो सकता है, कुछ लोग मुझ से बेहतर हों, लेकिन सभी लोग मुझसे बेहतर कैसे हो सकते हैं। मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गई। बड़े लोग भी कभी-कभी भावनाओं में बह कर बड़ी बेहूदी बातें लिख मारते हैं।

घर से ऑफिस के बीच करीब एक किलोमीटर का पेच आता था, जिस पर ट्रैफिक बहुत कम होता था । बस यहीं हमारी गाड़ी गति पकड़ पाती थी।

गाड़ी को थोड़ा तेज होता महसूस कर मैंने खिड़की से बाहर देखा तो रास्ते का वही हिस्सा तय हो रहा था। अचानक गाड़ी के ब्रेक लगे और गाड़ी जहां की तंहा रुक गई। मैंने चौंक कर सामने देखा। कुछ ही क्षण में डिवाइडर से कूद कर एक सांड दौड़ता हुआ सड़क पार करने लगा।

यदि गाड़ी में ब्रेक नहीं लगते तो हम निश्चित रूप से उस सांड से टकरा जाते।

“साहब! आज तो बाल बाल बचे!” अनवर ने पसीना पोंछते हुए कहा ।

“लेकिन सांड तो बाद में कूदकर आया था। तुमने पहले ही गाड़ी कैसे रोक ली।”मैंने हतप्रभ होकर पूछा‌।

“साहब! मैं गाड़ी चलाते वक्त डिवाइडर पर पूरा ध्यान रखता हूं। मैंने दूर से ही दो सांडो को डिवाइडर पर लड़ते हुए देख लिया था। यह वाला सांड हमारी तरफ था और दूसरे सांड से कमजोर भी था। इसलिए संभावना यही थी कि यही मेदान छोड़कर भागेगा और सड़क पर आएगा।”

“ओह माय गॉड! मैं इतने वर्षो से गाड़ी चला रहा हूं, लेकिन इतना ज्यादा एंटिसिपेशन तो मैंने कभी किया ही नहीं!!”यह सोचते हुए मुझे झटका सा लगा। आज मुझे महसूस हुआ कि अनवर मुझसे बेहतर ड्राइवर है।

*********

गाड़ी ऑफिस पॉर्टिको में रुकी। ऑफिस प्यून अली तत्परता पूर्वक सीढ़ियों पर खड़ा था ‌। उसने लपक कर गाड़ी का गेट खोला और मेरे नीचे उतरने के बाद अगली सीट पर पड़ा फाइलों का बस्ता उठाया। अब वह मेरे आगे आगे गलियारे की भीड़ को हटाता चल रहा था।
अपने कक्ष में पहुंचने के बाद मैं कुर्सी पर बैठा ही था कि वह ट्रे में पानी का ग्लास रख फिर से हाजिर हो गया।

अबकी बार मैंने उसे ध्यान से देखा।

दरमियाने कद का दुबला पतला साधारण से चेहरे मोहरे वाला व्यक्ति, जिसकी वर्दी भी शायद कई दिनों से धुली न थी।

“यह इंसान मुझसे किन मायनों में बेहतर हो सकता है?”मैंने अली की ओर देखते हुए सोचा और मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। मेरे पानी पीकर ग्लास रख देने के बावजूद वह वहीं खड़ा रहा। मैंने प्रश्नवाचक नजरों से उसकी और देखा ।
“सर आज ग्यारह बजे से दो बजे तक छुट्टी चाहिए।”

“क्यों ? किसलिए??” मेरी त्योरियां चढ़ी।

“सर ! आज से पन्द्रह अगस्त के फंक्शन के लिए रिहर्सल चालू हो रहे हैं।”

“तुम्हारा उसमें क्या काम है।”

“सर! मैं हर साल फंक्शन में भाग लेता हूं।”

“अच्छा ! क्या करते हो तुम फंक्शन में?” मैंने व्यंगात्मक अंदाज में पूछा।

“सर, मैं गाता हूं और बजाता भी हूं।”

मैंने फिर से अली की ओर देखा। “यह पिद्दी और पिद्धि का शोरबा गाता और बजाता है।”

मुझे विश्वास नहीं हुआ। इस ऑफिस में ज्वाइन करने के बाद यहां मेरा पहला स्वतंत्रता दिवस समारोह आने वाला था।

“रिहर्सल कहां पर होगा ? मैं भी आऊंगा।”

अली के चेहरे पर खुशी की लहर तैर गई।
“सर !ऑडिटोरियम में आइए। वहीं पर रिहर्सल है।”

एक के बाद एक आती फाइलों से लगभग बारह बजे मैंने निजात पाई और उठ कर ऑडिटोरियम की और रवाना हुआ। जैसे ही मैंने ऑडिटोरियम का गेट खोला , मेरे कानों में मधुर स्वर लहरी समा गई। सामने स्टेज पर मध्य में अली बैठा था। उसके सामने हारमोनियम था और वह गीत गा रहा था।

“यह देश है वीर जवानों का! अलबेलों का, मस्तानो का। इस देश का यारों क्या कहना!”

मैं ऑडिटोरियम में लगी कुर्सियों में पिछली कतार पर बैठ गया। अली ने एक के बाद एक देश भक्ति गीत गाकर सारा माहौल तिरंगा कर दिया था। मैं मंत्रमुग्ध सा सुनता रहा। करीब आधे घंटे बाद गुप्ता जी, मेरे पीए ने आकर मेरी तंद्रा भंग की।

“सर मैंने आपको कहां कहां नहीं ढूंढा। आपका मोबाइल भी चेंबर में पड़ा है। बड़े साहब आपको याद कर रहे हैं।”

मैं अचकचा कर उठा और सीधा मिलिंद साहब के चेंबर में गया।

मिलिंद साहब, हमारे ओफिस के सबसे बड़े अफसर। रिटायरमेंट के पेटे में है। खोपड़ी पूरी तरह खल्वाट। फूले फूले गाल। शरीर भी भरा पूरा और जगह-जगह कपड़ों से बाहर निकलता हुआ। मैंने आज उन्हें पहली बार ध्यान से देखा और सोचा, यह आदमी किस तरह से मुझसे बेहतर है। ठीक है मुझसे सीनियर है लेकिन इसमें इसकी क्या काबिलीयत । उम्र में ज्यादा है तो सीनियर होगा ही। इसकी उम्र में आते-आते मैं इससे बहुत ऊपर पहुंच जाऊंगा।

“अरे भाई कहां चले गए थे? तुम्हारे लिए बड़ा जरूरी काम आ गया था। “
मैंने उन्हें बताया।

“तुम्हें शायद पता नहीं तुम्हारा प्यून अली इस शहर का मशहूर कव्वाल है।”

“अच्छा??”

“हां और इस बार तो वह मेरे लिखे देशभक्ति गीत को भी स्वरबद्ध कर गाने वाला है।”

“आपका लिखा गीत? आप लिखते भी हैं??”

मुझे आश्चर्यचकित देख मिलिंद साहब हॅ॑सने लगे। उन्होंने टेबल की दराज खोली और तीन पुस्तकें निकाली।

“यह देखो! मेरी कविताओं की यह तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।”

मैं फटी फटी निगाहों से उन तीनों किताबों को घूर रहा था।

मिलिंद साहब ने बारी बारी से तीनों किताबों पर मेरे लिए सप्रेम भेंट लिखा, अपने हस्ताक्षर किए और मुझे सौंप दी।

काम निपटा कर जब मैं अपने कक्ष में पहुंचा तो मेरे दिमाग में अली का मधुर गायन ही घूम रहा था। एक तरफ उसकी दिलकश आवाज और दूसरी तरफ मैं , जो एक पंक्ति भी ढंग से नहीं गा सकता। अब मुझे फिर से इमर्सन की पंक्तियां याद आने लगी।

“चलो, आज संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति की कोई ऐसी खासियत ढूंढते हैं जो मुझसे बेहतर है।” मैंने सोचा।

दिन भर में बहुत लोग आए और गए। आज पहली बार मैंने हर व्यक्ति को इतने ध्यान से देखा और बात की थी। मैं ऐसे व्यक्ति को ढूंढ रहा था जो किसी भी बात में मुझसे बेहतर ना हो।
लेकिन निराशा ही हाथ लगी। किसी का चेहरा मुझसे बेहतर था, किसी की आंखें। कुछ लोग मुझसे ज्यादा लंबे थे और किसी किसी के बाल मुझसे ज्यादा घने थे।

यह तो हुई शारीरिक विशेषताओं की बातें, मुझे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसमें कोई ना कोई गुण मुझसे ज्यादा ना हो।

****

शाम को घर लौटते समय मैंने अनवर से नेहरू मार्केट चलने को कहा।

“चंद्रा आर्ट वर्क्स”की सीढ़ियां चढ़ते ही गोयल साहब ने हाथ जोड़कर मेरा स्वागत किया। दुकान पर बहुत भीड़ थी।

मैंने पत्नी द्वारा दिया हुआ पर्चा उनके हाथ में पकड़ा दिया। छोटे-मोटे तकरीबन पन्द्रह आइटम होंगे। गोयल साहब ने मुश्किल से दो मिनट पर्चे पर नजर डाली और अपने सहायक को निर्देश देने शुरू किए।

पांच मिनट में सारा सामान पैक हो चुका था। गोयल साहब ने मेरे द्वारा दिए गए पर्चे पर ही हिसाब लगा कर एक मिनट से भी कम में रुपए जोड़कर मेरे हवाले कर दिया। मैंने साइड में खड़े होकर दोबारा से हिसाब लगाना शुरू किया।

मोबाइल फोन के केलकुलेटर की सहायता के बावजूद मुझे दस मिनट लग गए लेकिन हिसाब में एक रुपए का भी अंतर नहीं आया।

घर पहुंचते ही मोहन ने गाड़ी में से बस्ता निकाला।
उसे देखते ही मेरी बांछे खिल गई।
“हां ! शायद यह वही है जो किसी भी बात में मुझसे बेहतर नहीं हो सकता।”

मोहन जब चाय लेकर आया तो मैंने उसे अपने पास नीचे बिठा कर बातों में लगा लिया।

मैं उससे घर परिवार की बातें करने लगा। बातों बातों में पता चला कि गांव में उसके पास चालीस बीघा जमीन है जिस पर उसकी पत्नी और बच्चे खेती-बाड़ी करते हैं।

मैं स्तब्ध रह गया। मुझे इतने वर्ष नौकरी करते हो गये लेकिन मेरे पास न गांव में कोई जमीन है ना ही शहर में। पिछले तीन महीने से मैं शहर के आउटस्कर्ट में स्थित दौ सो वर्ग गज के टुकड़े को खरीदने के लिए प्रयासरत हूं लेकिन सफलता नहीं मिल रही। और यह बंदा चालीस बीघा जमीन का मालिक है।

आज डिनर पत्नी ने ही तैयार किया था। भोजन करते वक्त मैं सोचता रहा कि ऐसा खाना मैं ताजिंदगी नहीं बना सकता ‌।

डिनर के बाद मैं और पत्नी टहलने के लिए निकलने ही वाले थे कि मेरी छोटी बेटी तन्वी ने मुझे रोक लिया।

“पापा प्लीज! मेरी पेंटिंग तो देख कर जाओ ना।”

“अब यह सात साल की लड़की क्या पेंटिंग बनाएगी?”
सोचा फिर भी मन मार कर मैंने उसकी पेंटिंग देखी।

गजब! वाकई गजब!! तन्वी ने तो कमाल कर दिया था। ऐसी पेंटिंग तो मैं आज भी नहीं बना सकता। बेटी की तारीफों के पुल बांधते हुए मैं घूमने निकल गया।

रात सोने से पहले मैंने ऑफिस की फाइलों का बस्ता खोला।

सबसे ऊपर वही सुबह का अखबार रखा हुआ था और इमर्सन की पंक्तियां मेरी ओर झांक रही थी।
“मैं जिस व्यक्ति से भी मिलता हूँ, वह किसी ना किसी रूप में मुझसे बेहतर है।”
मैंने दोबारा से उन्हें पढ़ा , दिनभर की घटनाओं को याद किया, अपना अहम टूटते हुए महसूस किया और मेरे चेहरे पर फिर से मुस्कान आ गई।

स्वरचित और मौलिक
मधुसूदन शर्मा

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक


राजा के दरबार मे…
एक आदमी नौकरी मांगने के लिए आया,,,,,
उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई,
तो वो बोला,
“मैं आदमी हो, चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ,,😇
राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया,,,,,😎
कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा,
तो उसने कहा….
नस्ली नही है….😏
राजा को हैरानी हुई, 😳
उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा,,,,,
उसने बताया घोड़ा नस्ली तो हैं,
पर इसके पैदा होते ही इसकी मां मर गई थी,
इसलिए ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला बढ़ा है,,,,,
राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं??🧐
“उसने कहा
“जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके,
जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता है,,😎
राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ,😊
उसने नौकर के घर अनाज ,घी, मुर्गे, और ढेर सारी बकरियां बतौर इनाम भिजवा दिए ,🥰
और अब उसे रानी के महल में तैनात कर दिया,,,😎
कुछ दिनो बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी,🧐
उसने कहा,
“तौर तरीके तो रानी जैसे हैं,
लेकिन पैदाइशी नहीं हैं,😏
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, 😨
उसने अपनी सास को बुलाया,🤨
सास ने कहा
“हक़ीक़त ये है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था,
लेकिन हमारी बेटी 6 महीने में ही मर गई थी,
लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया,,🥰
राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा,
“तुम को कैसे पता चला??🧐
“”उसने कहा,
” रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा है,
एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है,
जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही,😏
राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ,😇
और फिर से बहुत सारा अनाज भेड़ बकरियां बतौर इनाम दी,🥰
साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर लिया,,😎
कुछ वक्त गुज़रा,
राजा ने फिर नौकर को बुलाया,
और अपने बारे में पूछा,😇
नौकर ने कहा
“जान की सलामती हो तो कहूँ”🙏🏻
राजा ने वादा किया तो उसने कहा,
“न तो आप राजा के बेटे हो,
और न ही आपका चलन राजाओं वाला है”😐
राजा को बहुत गुस्सा आया, 😡
मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था,😏
राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा…
मां ने कहा,
ये सच है,
तुम एक चरवाहे के बेटे हो,
हमारी औलाद नहीं थी,
तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला,,,,,😊
राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा ,
बता, “भोई वाले तुझे कैसे पता चला????🧐🤨
उसने कहा
” जब राजा किसी को “इनाम दिया करते हैं,
तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं,
लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं…😏
ये रवैया किसी राजा का नही,
किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है,,🤨
किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं । 😏
इंसान की असलियत की पहचान,
उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती है!