Posted in संस्कृत साहित्य

तीर्थ जा आविषकार


*तीर्थ का आविष्कार*
हम लोग प्रायः तीर्थयात्रा पर जाते हैं,वहाँ नदी मे स्नानदान,उपवास,कल्प करते हैं,मंदिरों मे भगवान का दर्शन करते हैं,भीड़ के धक्के खाते हैं,पूछो तो कहते हैं यही हमारा धर्म है,हमारे पूर्वज ऐसा करते आएं है। पुण्यलाभ होता है। अब डंडा पीटने की बात है तो यह हमारा अधिकार है और हमारे अधिकार की सुरक्षा करके हमारा राजा भी गौरवान्वित होता है। पर किसी ने सोचा कि यह तीर्थ वास्तव मे होता क्या है?
आइए देखते हैं शास्त्रमतः-
शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहि्ँसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न स पुनरावर्तते।।
यह छा०उ०/८/१५/१/ के मंत्र का अंश है।
इसमे आचार्यकुल से समावर्तन पश्चात आत्मज्ञ के शेष जीवन के पर्यवसानपर्यन्त्र के कर्तव्य कर्मों का निर्धारण हुआ कि,,शुचौविविक्तेsमेध्यादिरहिते देशे यथावदासीनः,,अपवित्र पदार्थ से रहित स्थान पर विहीत विधिनुसार आसन लगाकर बैठकर स्वाध्याय करना।
तो जंगल मे,एकांत स्थान पर नदी किनारे सन्यासी लोग जाकर स्वाध्याय करने लगे। अपने इन्द्रियों को आत्मवस्थित करने लगे। धीरे-धीरे यहाँ भीड़ इकट्ठा होने लगी तो तात्कालिन शासकों ने यहाँ विश्रामस्थल की व्यवस्था कर दी।अब श्रुति आगे कहती हैः-,,अन्यत्र तीर्थेभ्यः,,,,अहिंसा,,ऐसा स्थान जहाँ स्थावर जंगमसहित किसी प्राणी को पीड़ा न हो इसलिए ऐसी व्यवस्था गुरू अपने शिष्य को देता था। इसी को जैनदर्शन मे तपश्चर्या कहा गया है।लेकिन श्रुति मे,,कर्मातिशेषेण,,शब्द भी प्रयुक्त हुआ है। अर्थात् पाप-पुण्य जो भी है उसे पूर्ण करने के उपरान्त ऐसे एकांत स्थान पर जाकर भिक्षार्टन द्वारा शेष जीवन बिताना यहाँ तात्पर्यित प्रतीत होता है। इस लाजिक को ध्यान न देकर पुण्य कमाने की अज्ञानतारूपी अभिलाषा लिए ऐसे स्थानों पर भीड़ एकत्र होने लगी। यहाँ मंदिर बनने लगे। बढ़ती जनसंख्या और शास्त्रों के ज्ञान को जाने बिना पाप धोने पहुँचने वालें लोगों की धार्मिक भावनाओं का शोषण करने व्यापारी और मठाधीशों की बाढ़ सी आ गयी। तरह तरह के तीर्थ माहात्म्य लिखे जाने लगे,पण्डों ने महल बनाना शुरू किया और हो गया वर्तमान स्वरूप वाले तीर्थ का आविष्कार। अब जाओ और धक्के खाओ।

*शुभ प्रभात मित्रों*
*ऊँ तत् सत्*

विजय शंकर दुबे

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