Posted in कहावतें और मुहावरे

કહેવતો (1890)
1 કાકા, મામા કહેવાના અને ગાંઠે હોય તો ખાવાના.
2 ગોળી તેવી ઠીકરી ને મા તેવી દીકરી.
3 છાંણના દેવ ને કપાશીયાને આંખો
4 ધન ખાધું સાળે તે ન મળે કોઈ કાળે.
5 થોડું બોલે જીતી જાય ઘણું બોલે તે ગોધા ખાય.
6 ગરથ ગાંઠે વિદ્યા પાઠે સ્ત્રી સાથે.
7 સકર્મિની જીભ ને અકર્મીના ટાંટીઆ.
8 ભૂખે રહેવુ પરંતુ કરજ ન કરવુ.
9 જેની ગાંઠે દામ તેને સૌ કરે સલામ.
10 જર, જમીન ને જોરૂ, એ ત્રણ કજીઆનાં ભેરૂ.
11 મિત્ર અને સ્ત્રીની પરીક્ષા સંકટ વખતે થાય છે.
12 હરકત ત્યાં બરકત.
13 મહેનત કરે તેની ખેડ ને મારે તેની તરવાર.
14 કીડી સંચે તેતર ખાય, પાપીનું ધન એળે જાય.
15 જેનો હોય વગ તેનો પેસે પગ.

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सिंह पर निबन्ध
निबंधकार Rakesh Srivastava जी।

सिंह एक शाकाहारी प्राणी है। यह भारत के गुजरात प्रान्त में पाया जाता है। इसके बड़े-बड़े नुकीले दाँतों से पता चलता है कि यह कभी मांसाहारी हुआ करता था। पर महात्मा गाँधी के प्रादुर्भाव के बाद, सिंह भी उनके संपर्क में आया। वह गाँधी से इतना प्रभावित हुआ कि उसने मांसाहार त्याग दिया और महात्मा के बताए अहिंसा के मार्ग पर चलने लगा। वह कंद-मूल खा कर अपना जीवन बिताने लगा। पर जब उसने घास खाने का प्रयास किया तो उसे इसमें काफी कठिनाई आई। तो महात्मा की तरह सिंह ने भी सत्य के साथ प्रयोग करने का निश्चय किया। बकरियाँ महात्मा को प्रिय थीं। तो वह महात्मा की पसंदीदा दो बकरियों को अपनी गुफा में ले आया और उन्हीं के साथ रहने लगा। इस बात से सिंहनी इतनी नाराज़ हुई कि वह सिंह को छोड़ कर अपने बच्चों को लेकर अपने मायके अफ्रीका चली गई।

अब सिंह अपनी बकरियों के साथ ही रहता, खाता, पीता और सोता। ऐसा वह इसलिए करता ताकि एक तो वह बकरियों से घास खाना सीख सके और दूसरा वह यह जाँच सके कि उसने अपनी इंद्रियों पर काबू पा लिया है या नहीं। उसे इन दोनों मापदंडों पर सफलता मिली। बकरियों ने उसे घास खाना सीखा दिया और सिंहनी की कमी भी महसूस नहीं होने दी। धीरे-धीरे सिंह को बकरियों से प्यार हो गया और उसने निर्णय किया कि आज के बाद से वह बकरियों को नही खायेगा।

बाद में उन बकरियों से जो बच्चे पैदा हुए उन्होंने गाँधी के निर्देश पर पहले खिलाफत आंदोलन में भाग लिया और फिर भारत छोड़ो आंदोलन में। अंग्रेजी हुकूमत इन बच्चों के अहिंसात्मक आंदोलन से इतनी डर गई कि उन्होंने भारत छोड़ दिया और ब्रिटेन वापस चले गए।

बाद में जब नेहरू जी ने अशोक स्तंभ को भारत का राष्ट्रीय चिह्न बनवाया तो उसमें सम्राट अशोक के सिंहों के स्थान पर सिंह और बकरी के समागम से पैदा हुए इन्हीं बच्चों को बिठा दिया। इसमें इन बच्चों का मुँह बंद करवा दिया गया ताकि कोई इन्हें देख के डर न जाये।

सब कुछ सही चला आ रहा था। अशोक स्तंभ के सिंह, ढोकला और खाखरा खा रहे थे। आस-पास से गुजरने वाले लोग इन्हें थप्पड़ भी मार कर चले जाते तो भी ये कुछ न कहते क्योंकि इन्हें पता था कि शांति स्थापना के लिये सहिष्णुता आवश्यक है।

बाद में एक नरेन्द्र मोदी नाम का व्यक्ति आया। उसने सब कुछ उलट-पुलट कर रख दिया। वह अफ्रीका जाकर सिंह की estranged wife सिंहनी से मिला और सिंह के असली बच्चों को लेकर भारत आ गया। उसने उनसे वादा किया कि वह उनका हक दिलवा कर रहेगा। अभी हाल ही में सिंह के उन्हीं बच्चों को (जो कि अब बड़े हो गए हैं) नरेन्द्र मोदी ने अशोक स्तम्भ पर वापस रहने के लिए जगह दे दी है। इसके बाद से ही सिंह और बकरियों के संगम से जन्मे बच्चों के खेमे में खलबली मच गई है। उन्होंने नरेन्द्र मोदी के ऊपर हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अफ्रीका से आये हुए सिंह के बच्चे भारत के बाकी सिंहों के बच्चों को भी अन्य जानवरों के ऊपर हमला करना सिखा देंगे और पिछले सत्तर सालों से इंसानों और जानवरों के बीच चला आ रहा भाईचारा समाप्त हो जाएगा। इसे रुकवाने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उधर राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के प्रत्याशी यशवंत सिन्हा ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा है कि यदि वह राष्ट्रपति बने तो वह संसद परिसर से अशोक स्तम्भ के वर्तमान सिंहों को निकाल भगायेंगे और उनकी जगह अपनी मुस्कुराहट बिखेरते रोहिंगिया सिंहों को स्थापित करवाएंगे।

अब देखना यह है कि मोहब्बत जीतती है या नफरत!

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एक पण्डित जी एक दिन एक बच्चे से उलझ गये ।

बच्चे ने भी एक प्रश्न दाग दिया कि,

“वो कौन-सी वस्तु है, जो कभी अपवित्र नहीं होती……?”

पण्डित जी टोपी उतार कर पसीने-पसीने हो गये, मगर, उस बच्चे के प्रश्न का जवाब नहीं दे पाये ।

आखिर, हार मान कर बोले, चल तू बता ।

बच्चे ने कहा कि कभी न अपवित्र होने वाली वस्तु है,

टैन्ट हाउस के गद्दे, जिसे……

हिन्दू,-मुसलमान से ले कर पण्डित, हरिजन कुम्हार , डोम और बाल्मीकि सभी धर्म के लोग इस्तेमाल करते हैं ।

ये गद्दे मैयत से लेकर पूजा पण्डाल तक और धार्मिक कथा से ले कर उठावनी तक हर मौके पर बिछते हैं ।

इनको कोई सुतक भी नहीं लगता ।

बाराती भी इन गद्दों पर सोम-रस पीने के बाद वमन करते हैं ।

छोटे बच्चों को सुविधानुसार इन पर पेशाब करा दिया जाता है ।

इतना ही नहीं, इन पर बिछी चादरों से जूते भी चमका लियेे जाते हैं ।

हद तो तब होती है, जब हलवाई इन चादरों में पनीर का चक्का लटका देता है ।

उसी पनीर से क्या मजे का मटर-पनीर बनता है….

😤😤😤😤

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पण्डित चारों खाने चित था…..!!

बच्चा पण्डित जी पर पानी के छीटे मार रहा था……!! 😀😀

इस पोस्ट को एक चुटकुले के नजरिए से ना देखा जाए।

यह एक सत्यता है जिसे हम सब जानते , पर मानते नही है।
और दिखावा करते है।
!! जय हिंद!!