Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

महान दार्शनिक लाओत्से का नाम आपने अवश्य सुना होगा, इस अद्भुत व्यक्ति का जन्म चीन में हुआ था। वह इतना विनम्र और सरल व्यक्ति था, इतना अद्भुत व्यक्ति था कि उसकी एक एक अंतर्दृष्टि बहुमूल्य है। उसके एक एक शब्द में इतना अमृत है, उसके एक एक शब्द में इतना सत्य है, कि जिसका कोई हिसाब ही नहीं है, लेकिन आदमी वह बहुत ही सीधा और सरल था। इतना कि लोग उसके साधारणपना को ही असाधारण समझते थे।
चीन के सम्राट के कानों तक उसकी खबर पहुंची और सम्राट ने कहा, मैंने सुना है कि लाओत्से नाम का जो व्यक्ति है बहुत असाधारण है, एक्सट्रा आर्डिनरी है। असामान्य ही नहीं, बहुत असामान्य है, बहुत असाधारण है। उसके वजीरों ने कहा, ‘हां यह बात तो सच है। उससे ज्यादा असाधारण व्यक्ति इस समय पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।
‘सम्राट उसे देखने गया। सम्राट देखने गया, तो उसने सोचा था कि वह बहुत महिमाशाली, कोई बहुत प्रकाश युक्त, कोई बहुत अद्भुत व्यक्तित्‍व का कोई प्रभावशाली व्यक्ति होगा। जब सम्राट उसके द्वार पर पहुंचा, तो उस झोपड़े के बाहर ही एक छोटी सी बगिया थी, और लाओत्से उसी अपनी बगिया में कुदाली लेकर मिट्टी खोद रहा था।
सम्राट ने उससे पूछा, ‘बागवान’ लाओत्से कहां है? क्योंकि यह तो कोई खयाल ही नहीं कर सकता था कि यही “लाओत्से” होगा। फटे से कपड़े पहने हुए, बाहर मिट्टी खोद रहा हो, इसकी तो कल्पना नहीं हो सकती थी। सीधा सादा किसान जैसा मालूम होता था।
लाओत्से ने कहा, ‘भीतर चलें, बैठें। मैं अभी लाओत्से को बुलाकर आ जाता हूं। सम्राट भीतर जाकर बैठा और प्रतीक्षा करने लगा। वह जो लाओत्से था, जो बगीचे में मिट्टी खोद रहा था, वह पीछे के रास्ते से गया, झोपड़े में से अंदर आया, आकर नमस्कार किया और कहा “मैं ही लाओत्से हूं”.. राजा बहुत हैरान हुआ। उसने कहा, तुम तो वही बागवान मालूम होते हो, जो बाहर था’ उसने कहा ‘मैं ही लाओत्से हूं’। कसूर माफ करें, क्षमा करें कि मैं यह छोटा सा काम कर रहा था, लेकिन आप कैसे आये? उस राजा ने कहा, लेकिन मैंने तो सुना कि तुम बहुत असाधारण व्यक्ति हो, लेकिन तुम तो बहुत साधारण मालूम होते हो। लाओत्से बोला, मैं बिलकुल ही साधारण हूं, आपको किसी ने गलत खबर दे दी है।
राजा वापस लौट गया। अपने मंत्रियों से जाकर उसने कहा कि तुम कैसे नासमझ हो, एक साधारण जन के पास मुझे भेज दिया। उन सारे लागों ने कहा, ‘महाराज उस आदमी की यही तो असाधारणता है कि वह एकदम साधारण है’। ‘मंत्रियों ने कहा, ‘उस आदमी की यही तो खूबी है कि वह पूर्णतः साधारण है।
साधारण से साधारण आदमी भी यह स्वीकार करने को राजी नहीं होता कि वह साधारण है। उस आदमी की यही खूबी है, यही विशिष्टता है कि उसने कुछ भी असाधारण होने की इच्छा नहीं की है, वह एकदम साधारण हो गया है।
राजा दुबारा गया, और उसने लाओत्से से पूछा कि ‘तुम्हें यह साधारण होने का खयाल कैसे पैदा हुआ? तुम साधारण कैसे बने? उसने कहा, ‘अगर मैं कोशिश करके साधारण बनता, तो फिर साधारण बन ही नहीं सकता था, क्योंकि कोशिश करने में तो आदमी असाधारण बन जाता है। नहीं, मुझे तो दिखायी पड़ा, और मैं एकदम साधारण था। मैंने अनुभव कर लिया है, मैं साधारण बना नहीं हूं। मैंने जाना है कि मैं साधारण हूं। मैं बना नहीं हूं साधारण, क्योंकि बनने की कोशिश में तो आदमी असाधारण बन जाता है। मैं बना नहीं, मैंने तो जाना है जीवन को, और पहचाना भी है।
मैंने पाया, मुझे न मृत्यु का पता है, न जन्म का पता है। मैंने सोचा यह श्वास क्यों चलती है, यह मुझे पता नहीं है, खून क्यों बहता है, मुझे पता नहीं है। मुझे भूख क्यों लगती है, मुझे प्यास क्यों लगती है, यह मुझे पता नहीं है। तो मैंने पाया कि मैं तो बिलकुल अज्ञानी हूं। फिर मैंने पाया कि मैं तो बिलकुल अशक्त हूं, मेरी अपनी कोई शक्ति ही नहीं। फिर मैंने पाया, मैं तो कुछ भी विशिष्ट नहीं हूं। जैसी दो आंखें दूसरों को हैं, वैसी दो आंखें मेरे पास हैं। दो हाथ दूसरों के पास हैं, वैसे दो हाथ मेरे पास हैं। मैं तो एक अति सामान्य व्यक्ति हूं यह मैंने देखा, पहचाना। मैं साधारण हूं मैं बड़ा नहीं हूं। यही तो मैने देखा और समझा और मैंने पाया कि मैं साधारण हूं।
लेकिन यह घटना ऐसे घटी कि मैं एक दिन जंगल गया था, लाओत्से ने कहा और वहा मैंने लोगों को लकड़ियां काटते देखा। बड़े बड़े वृक्ष काटे जा रहे थे। ऊंचे ऊंचे वृक्ष काटे जा रहे थे। सारा जंगल कट रहा था। बड़े वृक्ष लगे हुए थे और जंगल कट रहा था, लेकिन बीच जंगल में एक बहुत बड़ा वृक्ष था। इतना बड़ा वृक्ष था कि उसकी छाया इतने दूर तक फैल गई थी, वह इतना पुराना था और प्राचीन मालूम होता था कि उसके नीचे एक हजार बैलगाड़ियां विश्राम कर सकती थीं, इतनी उसकी छाया थी। तो मैंने अपने मित्रों से कहा कि जाओ और पूछो कि इस वृक्ष को कोई क्यों नहीं काटता है? यह वृक्ष इतना बड़ा कैसे हो गया? जहा सारा जंगल कट रहा है, वहां इतना बड़ा वृक्ष कैसे बचा है? जहा सब वृक्ष ठूंठ रह गए हैं, जहां नये वृक्ष काटे जा रहे हैं रोज, वहां यह इतना बड़ा वृक्ष कैसे बच रहा है? वह क्यों लोगों ने इसे छोड़ दिया?
मै और मेरे मित्र वहां गये। मैंने वृद्ध बढ़इयों से पूछा ‘यह वृक्ष इतना बड़ा कैसे हो गया?’ उन्होंने कहा, ‘यह वृक्ष बड़ा अजीब है। यह बिलकुल साधारण है, इसके पत्ते जानवर नहीं खाते। इसकी लकड़ियों को जलाया नहीं जा सकता, वे धुआं करती हैं। इसकी लकड़ियां बिलकुल फ्री और टेढ़ी मेढ़ी हैं। इनको काटकर फर्नीचर भी नहीं बनाया जा सकता। द्वार दरवाजे भी नहीं बनाये जा सकते। यह वृक्ष बिलकुल बेकार है, यह बिलकुल साधारण सा वृक्ष है, इसीलिए इसको कोई काटता नहीं। लेकिन जो वृक्ष सीधा है और ऊंचा गया है, उसे काटा जाता है और उसके खंभे बनाये जाते हैं।
लाओत्से हंसा और वापस लौट आया। उसने कहा, उस दिन से मैं समझ गया कि अगर सच में तुम्हें जीवन में बड़ा होना है, तो उस वृक्ष की भांति हो जाओ, जो बिलकुल साधारण है। जिसके पत्ते भी अर्थ के नहीं, जिसकी लकड़ी भी अर्थ की नहीं। तो उस दिन से मैं वैसा वृक्ष हो गया, बिलकुल बेकार। मैंने फिर सारी महत्वाकांक्षाएं छोड़ दीं। बड़ा होने की, ऊंचा होने की असाधारण होने की सारी दौड़ मैंने छोड़ दी, क्योंकि मैंने पाया कि जो ऊंचा होना चाहेगा, वह काटा जायेगा।
मैंने पाया कि जो बड़ा होना चाहेगा, वह काट कर छोटा कर दिया जायेगा। मैंने पाया है कि प्रतियोगिता में, प्रतिस्पर्धा में महत्वाकांक्षाओं में सिवाय मृत्यु के और कुछ भी नहीं है। तब मैं अति साधारण जैसा मैं था, चुपचाप वैसे ही बैठा रहा। जिस दिन मैंने सारी दौड़ छोड़ दी, उसी दिन मैंने पाया कि मेरे भीतर कोई अद्भुत चीज का जन्म हो गया है। उसी दिन मैंने पाया कि मेरे भीतर परमात्मा के अनुभव की शुरुआत हो गयी है।
जो व्यक्ति साधारण से साधारण और सरल से सरल होने को राजी हो जाता है, सत्य खुद उसके द्वार आ जाता है। जो व्यक्ति असाधारण होने की, विशिष्ट होने की, बडा होने की, महत्वाकांक्षी होने की, अहंकार तृप्त करने की दौड़ में पड जाता है, उसके जीवन में असत्य घना से घना होता जाता है और सत्य से उसके संबंध सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। अंततः उसके पास झूठ का एक ढेर रह जाता है और सत्य की कोई भी किरण नहीं बचती।
इसके विपरीत जो सरल हो जाता है, बिल्कुल सीधा, साधारण और सामान्य, उसके जीवन में झूठ की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। उसके जीवन में सत्य की किरण अर्थात परमात्मा का जन्म होता है और सारा अंधकार समाप्त हो जाता है।

साभार……🙏