Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बहुत समय पहले की बात है हिमालय के जंगलों में एक बहुत ताकतवर शेर रहता था . एक दिन उसने बारासिंघे का शिकार किया और खाने के बाद अपनी गुफा को लौटने लगा. अभी उसने चलना शुरू ही किया था कि एक सियार उसके सामने दंडवत करता हुआ उसके गुणगान करने लगा .
उसे देख शेर ने पूछा , ” अरे ! तुम ये क्या कर रहे हो ?”
” हे जंगल के राजा, मैं आपका सेवक बन कर अपना जीवन धन्य करना चाहता हूँ, कृपया मुझे अपनी शरण में ले लीजिये और अपनी सेवा करने का अवसर प्रदान कीजिये .” , सियार बोला.
शेर जानता था कि सियार का असल मकसद उसके द्वारा छोड़ा गया शिकार खाना है पर उसने सोचा कि चलो इसके साथ रहने से मेरे क्या जाता है, नहीं कुछ तो छोटे-मोटे काम ही कर दिया करेगा. और उसने सियार को अपने साथ रहने की अनुमति दे दी.
उस दिन के बाद से जब भी शेर शिकार करता , सियार भी भर पेट भोजन करता. समय बीतता गया और रोज मांसाहार करने से सियार की ताकत भी बढ़ गयी , इसी घमंड में अब वह जंगल के बाकी जानवरों पर रौब भी झाड़ने लगा. और एक दिन तो उसने हद्द ही कर दी .
उसने शेर से कहा, ” आज तुम आराम करो , शिकार मैं करूँगा और तुम मेरा छोड़ा हुआ मांस खाओगे.”
शेर यह सुन बहुत क्रोधित हुआ, पर उसने अपने क्रोध पर काबू करते हुए सियार को सबक सिखाना चाहा.
शेर बोला ,” यह तो बड़ी अच्छी बात है, आज मुझे भैंसा खाने का मन है , तुम उसी का शिकार करो !”
सियार तुरंत भैंसों के झुण्ड की तरफ निकल पड़ा , और दौड़ते हुए एक बड़े से भैंसे पर झपटा, भैंसा सतर्क था उसने तुरंत अपनी सींघ घुमाई और सियार को दूर झटक दिया. सियार की कमर टूट गयी और वह किसी तरह घिसटते हुए शेर के पास वापस पहुंचा .
” क्या हुआ ; भैंसा कहाँ है ? “, शेर बोला .
” हुजूर , मुझे क्षमा कीजिये ,मैं बहक गया था और खुद को आपके बराबर समझने लगा था …”, सियार गिडगिडाते हुए बोला.
“धूर्त , तेरे जैसे एहसानफरामोश का यही हस्र होता है, मैंने तेरे ऊपर दया कर के तुझे अपने साथ रखा और तू मेरे ऊपर ही धौंस जमाने लगा, ” और ऐसा कहते हुए शेर ने अपने एक ही प्रहार से सियार को ढेर कर दिया.
किसी के किये गए उपकार को भूल उसे ही नीचा दिखाने वाले लोगों का वही हस्र होता है जो इस कहानी में सियार का हुआ. हमें हमेशा अपनी वर्तमान योग्यताओं का सही आंकलन करना चाहिए और घमंड में आकर किसी तरह का मूर्खतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Kumar Viswajit जी की शानदार पोस्ट………

“जिंदगी का फीनिक्स है कोबरा हो जाना!”

सांप की बहुत विषैली प्रजाति होती है, कोबरा। जिसे अलग अलग हिस्सों में अलग अलग नाम से बोलते हैं। बेहद गुस्सैल और बेहद अटैकिंग।

वो वक्त बस्तर का था। तीन दिनों के ऑपेरशन के बाद, बहुत थके हारे वापस कैम्प लौटे थे। नहा धोकर इच्छा थी बीयर पीकर मछली फ्राई के सेवन की। अचानक से वापस लौटने का आदेश मिला। कोई दूसरी पार्टी के एक भाई को गोली लगी थी तो उन्हें सड़क तक लाने वाली उस पार्टी को रोड सेफ्टी की सुरक्षा मुहैया करानी थी।

अपने बंदों को जगह जगह पर डिप्लॉय कर चुके थे। रोड पूरी तरह सुरक्षित था। रोड के किनारे कितने घने जंगल होते हैं, वो बस्तर को देखे बिना आप समझ नहीं पायेंगे कभी। अपनी पार्टी के साथ रोड किनारे जंगल में तैनात थे। हल्की थकान, और सुरक्षा पुश्त होने की वजह से ग्राउंड शीट डालकर थोड़ा सुस्ताने की कोशिश कर रहे थे। पहली झपकी के बाद ही छाती पर कुछ भारीपने का एहसास हुआ। आंख खुली तो देखा कि विकराल सा लम्बा काला कोबरा फन काढ़े छाती पर बैठा हुआ है। इस स्थिति को साइकोलॉजी में कहूं, तो यह वह स्थिति होती है जब सांसे चलती है, व्यक्ति जिंदा भी रहता है, लेकिन दिमाग काम करना बंद कर देता है।

कोई भी सांप सुन नही सकता, वो बस धरती पर रेंगता है, और उसी के वाइब्रेशन को महसूस करता है। प्रोटेक्शन वाले भी डिलेमा में ही थे। घनी झाड़ियों में कब सांप सीने पर सवार हो जाये, इसमें उनकी गलती ही क्या भला!

उनमें से एक बंदा जो साउथ का था, उसने समझदारी दिखायी। जोर से पैर को धरती पर पटकना शुरू किया। कोबरा अपने फन को अब उसकी तरफ मोड़ चुका था। मनः स्थिति ने बस इतनी ही इजाजत दी कि हाथ से उसे झटका दिया और उठ खड़ा हुआ। खैर उस घटना ने यह सबक दिया कि कितना भी थक जाऊं, कभी जंगल में झपकी तो दूर जमीन पर लेटा नहीं।

मेनहूडिज्म! मर्दानगी। जानते हैं ये क्या होता है! यह वह चीज होती है, जिसमें आप हर तरफ से घिर जायें, जब आपको मालूम हो कि शत्रु आपको जीवित नहीं छोड़ेगा, तब भी आप अकेले ही सही, लड़ते रहें, और मृत्यु को प्राप्त कर भी अटैक ना छोड़ें।

शेर को सबसे बड़ा मर्द समझते होंगे। लेकिन एक बार को वो भी जब ताकतवर के झुंड में फंस जाये, तो भागने की कोशिश करता है। लेकिन दुनिया में प्योर और हंड्रेड परसेंट कोई मर्द होता है तो वो है कोबरा।

कभी कोबरा को अटैक करते देखियेगा। वो किसी भी स्थिति में फंस जाये, डिफेंस की बिल्कुल नहीं सोचता, करेगा सिर्फ अटैक। लाठी डंडे हर वार को झेलेगा, लेकिन कभी भागने की नहीं सोचेगा, आखिरी सांस तक लड़ेगा। ये होता है हंड्रेड परसेंट मर्द होना।

मौत के खौफ से समझौता कर जिंदगी के लिये भाग जाने से कहीं बेहतर है कोबरा हो जाना। वो जबतक जीयेगा, मर्द बनकर जीयेगा। कुचल दीजियेगा उसके फन को, आखिरी सांस तक भी उसकी पूंछ आप पर वार करेगी।

” जिंदगी का फीनिक्स है कोबरा हो जाना!”

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Kumar Viswajit जी की शानदार पोस्ट………

“जिंदगी का फीनिक्स है कोबरा हो जाना!”

सांप की बहुत विषैली प्रजाति होती है, कोबरा। जिसे अलग अलग हिस्सों में अलग अलग नाम से बोलते हैं। बेहद गुस्सैल और बेहद अटैकिंग।

वो वक्त बस्तर का था। तीन दिनों के ऑपेरशन के बाद, बहुत थके हारे वापस कैम्प लौटे थे। नहा धोकर इच्छा थी बीयर पीकर मछली फ्राई के सेवन की। अचानक से वापस लौटने का आदेश मिला। कोई दूसरी पार्टी के एक भाई को गोली लगी थी तो उन्हें सड़क तक लाने वाली उस पार्टी को रोड सेफ्टी की सुरक्षा मुहैया करानी थी।

अपने बंदों को जगह जगह पर डिप्लॉय कर चुके थे। रोड पूरी तरह सुरक्षित था। रोड के किनारे कितने घने जंगल होते हैं, वो बस्तर को देखे बिना आप समझ नहीं पायेंगे कभी। अपनी पार्टी के साथ रोड किनारे जंगल में तैनात थे। हल्की थकान, और सुरक्षा पुश्त होने की वजह से ग्राउंड शीट डालकर थोड़ा सुस्ताने की कोशिश कर रहे थे। पहली झपकी के बाद ही छाती पर कुछ भारीपने का एहसास हुआ। आंख खुली तो देखा कि विकराल सा लम्बा काला कोबरा फन काढ़े छाती पर बैठा हुआ है। इस स्थिति को साइकोलॉजी में कहूं, तो यह वह स्थिति होती है जब सांसे चलती है, व्यक्ति जिंदा भी रहता है, लेकिन दिमाग काम करना बंद कर देता है।

कोई भी सांप सुन नही सकता, वो बस धरती पर रेंगता है, और उसी के वाइब्रेशन को महसूस करता है। प्रोटेक्शन वाले भी डिलेमा में ही थे। घनी झाड़ियों में कब सांप सीने पर सवार हो जाये, इसमें उनकी गलती ही क्या भला!

उनमें से एक बंदा जो साउथ का था, उसने समझदारी दिखायी। जोर से पैर को धरती पर पटकना शुरू किया। कोबरा अपने फन को अब उसकी तरफ मोड़ चुका था। मनः स्थिति ने बस इतनी ही इजाजत दी कि हाथ से उसे झटका दिया और उठ खड़ा हुआ। खैर उस घटना ने यह सबक दिया कि कितना भी थक जाऊं, कभी जंगल में झपकी तो दूर जमीन पर लेटा नहीं।

मेनहूडिज्म! मर्दानगी। जानते हैं ये क्या होता है! यह वह चीज होती है, जिसमें आप हर तरफ से घिर जायें, जब आपको मालूम हो कि शत्रु आपको जीवित नहीं छोड़ेगा, तब भी आप अकेले ही सही, लड़ते रहें, और मृत्यु को प्राप्त कर भी अटैक ना छोड़ें।

शेर को सबसे बड़ा मर्द समझते होंगे। लेकिन एक बार को वो भी जब ताकतवर के झुंड में फंस जाये, तो भागने की कोशिश करता है। लेकिन दुनिया में प्योर और हंड्रेड परसेंट कोई मर्द होता है तो वो है कोबरा।

कभी कोबरा को अटैक करते देखियेगा। वो किसी भी स्थिति में फंस जाये, डिफेंस की बिल्कुल नहीं सोचता, करेगा सिर्फ अटैक। लाठी डंडे हर वार को झेलेगा, लेकिन कभी भागने की नहीं सोचेगा, आखिरी सांस तक लड़ेगा। ये होता है हंड्रेड परसेंट मर्द होना।

मौत के खौफ से समझौता कर जिंदगी के लिये भाग जाने से कहीं बेहतर है कोबरा हो जाना। वो जबतक जीयेगा, मर्द बनकर जीयेगा। कुचल दीजियेगा उसके फन को, आखिरी सांस तक भी उसकी पूंछ आप पर वार करेगी।

” जिंदगी का फीनिक्स है कोबरा हो जाना!”

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

उद्दालक ऋषि के पुत्र का नाम श्‍वेतकेतु था। उद्दालक ऋषि के एक शिष्य का नाम कहोड़ था। कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्‍चात् उद्दालक ऋषि ने उसके साथ अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता का विवाह कर दिया। कुछ दिनों के बाद सुजाता गर्भवती हो गई। एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तो गर्भवती सुजाता ने कहा कि आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ क्रोधित होकर उसके गर्भ पर चोट की ।
हठात् एक दिन कहोड़ राजा जनक के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ बंदी से शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। हार हो जाने के फलस्वरूप उन्हें जेल में बन्दी बना दिया गया। इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने के कारण वह अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्‍वेतकेतु को अपना भाई समझता था। एक दिन जब वह उद्दालक की गोद में बैठा था तो श्‍वेतकेतु ने उसे अपने पिता की गोद से खींचते हुये कहा कि हट जा तू यहाँ से, यह तेरे पिता की गोद नहीं है। अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपनी माता के पास आकर अपने पिता के विषय में पूछताछ की। माता ने अष्टावक्र को सारी बातें सच-सच बता दीं।
अपनी माता की बातें सुनने के पश्‍चात् अष्टावक्र अपने मामा श्‍वेतकेतु के साथ बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिये राजा जनक के यज्ञशाला में पहुँचे। वहाँ द्वारपालों ने उन्हें रोकते हुये कहा कि यज्ञशाला में बच्चों को जाने की आज्ञा नहीं है। इस पर अष्टावक्र बोले कि अरे द्वारपाल ! केवल बाल सफेद हो जाने या अवस्था अधिक हो जाने से कोई बड़ा आदमी नहीं बन जाता। जिसे वेदों का ज्ञान हो और जो बुद्धि में तेज हो वही वास्तव में बड़ा होता है। इतना कहकर वे राजा जनक की सभा में जा पहुँचे और बंदी को शास्त्रार्थ के लिये ललकारा।
राजा जनक ने अष्टावक्र की परीक्षा लेने के लिये पूछा कि वह पुरुष कौन है जो तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अक्षरों वाली वस्तु का ज्ञानी है? राजा जनक के प्रश्‍न को सुनते ही अष्टावक्र बोले कि राजन्! चौबीस पक्षों वाला, छः ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करे।
अष्टावक्र का सही उत्तर सुनकर राजा जनक ने फिर प्रश्‍न किया कि वह कौन है जो सुप्तावस्था में भी अपनी आँख बन्द नहीं रखता? जन्म लेने के उपरान्त भी चलने में कौन असमर्थ रहता है? कौन हृदय विहीन है? और शीघ्रता से बढ़ने वाला कौन है? अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि हे जनक! सुप्तावस्था में मछली अपनी आँखें बन्द नहीं रखती। जन्म लेने के उपरान्त भी अंडा चल नहीं सकता। पत्थर हृदयहीन होता है और वेग से बढ़ने वाली नदी होती है।
अष्टावक्र के उत्तरों को सुकर राजा जनक प्रसन्न हो गये और उन्हें बंदी के साथ शास्त्रार्थ की अनुमति प्रदान कर दी।
(1.) बंदी ने अष्टावक्र से कहा कि एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, देवराज इन्द्र एक ही वीर हैं तथा यमराज भी एक है। अष्टावक्र बोले कि इन्द्र और अग्निदेव दो देवता हैं। नारद तथा पर्वत दो देवर्षि हैं, अश्‍वनीकुमार भी दो ही हैं। रथ के दो पहिये होते हैं और पति-पत्नी दो सहचर होते हैं।
(2.) बंदी ने कहा कि संसार तीन प्रकार से जन्म धारण करता है। कर्मों का प्रतिपादन तीन वेद करते हैं। तीनों काल में यज्ञ होता है तथा तीन लोक और तीन ज्योतियाँ हैं। अष्टावक्र बोले कि आश्रम चार हैं, वर्ण चार हैं, दिशायें चार हैं और ओंकार, अकार, उकार तथा मकार से बना है । ये वाणी के प्रकार भी चार हैं।
(3.) बंदी ने कहा कि यज्ञ पाँच प्रकार का होता है, यज्ञ की अग्नि पाँच हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, पंच दिशाओं की अप्सरायें पाँच हैं, पवित्र नदियाँ पाँच हैं तथा पंक्‍ति छंद में पाँच पद होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दक्षिणा में छः गौएँ देना उत्तम है, ऋतुएँ छः होती हैं, मन सहित इन्द्रयाँ छः हैं, कृतिकाएँ छः होती हैं और साधक भी छः ही होते हैं।
(4.) बंदी ने कहा कि पालतु पशु सात उत्तम होते हैं और वन्य पशु भी सात ही, सात उत्तम छंद हैं, सप्तर्षि सात हैं और वीणा में तार भी सात ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि आठ वसु हैं तथा यज्ञ के स्तम्भक कोण भी आठ होते हैं।
(5.) बंदी ने कहा कि पितृ यज्ञ में समिधा नौ छोड़ी जाती है, प्रकृति नौ प्रकार की होती है तथा बृहती छंद में अक्षर भी नौ ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दिशाएँ दस हैं, तत्वज्ञ दस होते हैं, बच्चा दस माह में होता है (सामान्य रूप से कहा है) और दहाई में भी दस ही होता है।
(6.) बंदी ने कहा कि ग्यारह रुद्र हैं, यज्ञ में ग्यारह स्तम्भ होते हैं और पशुओं की ग्यारह इन्द्रियाँ होती हैं। अष्टावक्र बोले कि बारह आदित्य होते हैं बारह दिन का प्रकृति यज्ञ होता है, जगती छंद में बारह अक्षर होते हैं और वर्ष भी बारह मास का ही होता है।
(7.) बंदी ने कहा कि त्रयोदशी उत्तम होती है, पृथ्वी पर तेरह द्वीप हैं।…… इतना कहते कहते बंदी श्‍लोक की अगली पंक्ति भूल गये और चुप हो गये। इस पर अष्टावक्र ने श्‍लोक को पूरा करते हुये कहा कि वेदों में तेरह अक्षर वाले छंद अति छंद कहलाते हैं और अग्नि, वायु तथा सूर्य तीनों तेरह दिन वाले यज्ञ में व्याप्त होते हैं।
इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदी की हार हो जाने पर अष्टावक्र ने कहा कि राजन् ! यह हार गया है, अत एव इसे भी जेल में डाल दिया जाये। तब बंदी बोला कि हे महाराज! मैं वरुण का पुत्र हूँ और मैंने सारे हारे हुये ब्राह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। मैं अभी उन सबको आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ। बंदी के इतना कहते ही बंदी से शास्त्रार्थ में हार जाने के बाद जेल में डाले गये सार ब्राह्मण जनक की सभा में आ गये, जिनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे।
अष्टावक्र ने अपने पिता के चरणस्पर्श किये। पिता ने उसे आशीर्वाद दिया ।

अरुण शुक्ला

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

वो बड़े इत्मीनान से गुरु के सामने खड़ा था। गुरु अपनी पारखी नजर से उसका परीक्षण कर रहे थे। नौ दस साल का छोकरा। बच्चा ही समझो। उसे बाया हाथ नहीं था। किसी बैल से लड़ाई में टूट गया था।

“तुझे क्या चाहिए मुझसे?” गुरु ने उस बच्चे से पूछा।

उस बच्चे ने गला साफ किया। हिम्मत जुटाई और कहा, ” मुझे आप से कुश्ती सीखनी है।

एक हाथ नहीं और कुश्ती लड़नी है ? अजीब बात है।

” क्यू ?”

“स्कूल में बाकी लड़के सताते है मुझे और मेरी बहन को। टुंडा कहते है मुझे। हर किसी की दया की नजर ने मेरा जीना हराम कर दिया है गुरुजी। मुझे अपनी हिम्मत पे जीना है। किसी की दया नहीं चाहिए। मुझे खुद की और मेरे परिवार की रक्षा करती आनी चाहिए।”

“ठीक बात। पर अब मै बूढ़ा हो चुका हूं और किसी को नहीं सिखाता। तुझे किसने भेजा मेरे पास?”

“कई शिक्षकों के पास गया मै। कोई भी मुझे सिखाने तैयार नहीं। एक बड़े शिक्षक ने आपका नाम बताया। तुझे वो ही सीखा सकते है क्यों की उनके पास वक्त ही वक्त है और कोई सीखने वाला भी नहीं है ऐसा बोले वो मुझे।”

वो गुरूर से भरा जवाब किसने दिया होगा ये उस्ताद समझ गए। ऐसे अहंकारी लोगो की वजह से ही खल प्रवृत्ति के लोग इस खेल में आ गए ये बात उस्ताद जानते थे।

“ठीक है। कल सुबह पौ फटने से पहले अखाड़े में पहुंच जा। मुझ से सीखना आसान नहीं है ये पहले है बोल देता हूं। कुश्ती ये एक जानलेवा खेल है। इसका इस्तेमाल अपनी रक्षा के लिए करना। मै जो सिखाऊ उसपर पूरा भरोसा रखना। और इस खेल का नशा चढ़ जाता है आदमी को। तो सिर ठंडा रखना। समझा?”

“जी उस्ताद। समझ गया। आपकी हर बात का पालन करूंगा। मुझे आपका चेला बना लीजिए।” मन की मुराद पूरी हो जाने के आंसू उस बच्चे की आंखो में छलक गए। उसने गुरु के पांव छू कर आशीष लिया।

” अपने एक ही चेले को सिखाना उस्ताद ने शुरू किया। मिट्टी रोंदी, मुगदुल से धूल झटकायी और इस एक हाथ के बच्चे को कैसे विद्या देनी है इसका सोचते सोचते उस्ताद की आंख लग गई।

एक ही दांव उस्ताद ने उसे सिखाया और रोज़ उसकी ही तालीम बच्चे से करवाते रहे। छह महीने तक रोज बस एक ही दाव। एक दिन चेले ने उस्ताद के जन्मदिन पर पांव दबाते हुए हौले से बात को छेड़ा।

“गुरुजी, छह महीने बीत गए, इस दांव की बारीकियां अच्छे से समझ गया हूं और कुछ नए दांव पेंच भी सिखाइए ना। “

उस्ताद वहा से उठ के चल दिए। बच्चा परेशान हो गया कि गुरु को उसने नाराज़ कर दिया।

फिर उस्ताद के बात पर भरोसा कर के वो सीखते रहा। उसने कभी नहीं पूछा कि और कुछ सीखना है।

गांव में कुश्ती की प्रतियोगिता आयोजित की गई। बड़े बड़े इनाम थे उसमे। हरेक अखाड़े के चुने हुए पहलवान प्रतियोगिता में शिरकत करने आए। उस्ताद ने चेले को बुलाया। “कल सुबह बैल जोत के रख गाड़ी को। पास के गांव जाना है। सुबह कुश्ती लड़नी है तुझे।”

पहली दो कुश्ती इस बिना हाथ के बच्चे ने यूं जीत लिए। जिस घोड़े के आखरी आने की उम्मीद हो और वो रेस जीत जाए तो रंग उतरता है वैसा सारे विरोधी उस्तादों का मुंह उतर गया। देखने वाले अचरज में पड़ गए। बिना हाथ का बच्चा कुश्ती में जीत ही कैसे सकता है? कौन सिखाया इसे?”

अब तीसरे कुश्ती में सामने वाला खिलाड़ी नौसिखुआ नहीं था। पुराना जांबाज़। पर अपने साफ सुथरे हथकंडों से और दांव का सही तोड़ देने से ये कुश्ती भी बच्चा जीत गया।

अब इस बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ गया। पूरा मैदान भी अब उसके साथ हो गया था। मै भी जीत सकता हूं ये भावना उसे मजबूत बना रही थी।

देखते ही देखते वो अंतिम बाज़ी तक पहुंच गया।

जिस अखाड़े वाले ने उस बच्चे को इस बूढ़े उस्ताद के पास भेजा था, उस अहंकारी पहलवान का चेला ही इस बच्चे का आखरी कुश्ती में प्रतिस्पर्धी था।

ये पहलवान सरीखे उम्र का होने के बावजूद शक्ति और अनुभव से इस बच्चे से श्रेष्ठ था। कई मैदान मार लिए थे उसने। इस बच्चे को वो मिनटों में चित कर देगा ये स्पष्ट था। पंचों ने राय मशवरा किया।

” ये कुश्ती लेना सही नहीं होगा। कुश्ती बराबरी वालो में होती है। ये कुश्ती मानवता और समानता के अनुसार रद्द किया जाता है। इनाम दोनों में बराबरी से बांटा जाएगा।” पंचों ने अपना मंतव्य प्रकट किया।

“मै इस कल के छोकरे से कई ज्यादा अनुभवी हूं और ताकतवर भी। मै ही ये कुश्ती जीतूंगा ये बात सोलह आने सच है। तो इस कुश्ती का विजेता मुझे बनाया जाए।” वंहा प्रतिस्पर्धी अहंकार में बोला।

“मै नया हूं और बड़े भैया से अनुभव में छोटा भी। मेरे उस्ताद ने मुझे ईमानदारी से खेलना सिखाया है। बिना खेले जीत जाना मेरे उस्ताद की तौहीन है। मुझे खेल कर मेरे हक का जो है उसे दीजिए। मुझे ये भीख नहीं चाहिये।” उस बांके जवान की स्वाभिमान भरी बात सुन कर जनता ने तालियों की बौछार कर दी।

ऐसी बाते सुनने को अच्छी पर नुकसान देय होती। पंच हतोत्साहित हो गए। कुछ कम ज्यादा ही गया तो? पहले ही एक हाथ खो चुका है अपना और कुछ नुकसान ना हो जाए? मूर्ख कही का!

लड़ाई शुरू हुई।

और सभी उपस्थित अचंभित रह गए। सफाई से किए हुए वार और मौके की तलाश में बच्चे ने फेंका हुआ दांव उस बलाढ्य प्रतिस्पर्धी को झेलते नहीं बना। वो मैदान के बाहर औंधे मुंह पड़ा था। कम से कम परिश्रम में उस नौसिखुए स्पर्धक ने उस पुराने महारथी को धूल चटा दी थी।

अखाड़े में पहुंच कर चेले ने अपना मेडल निकाल के उस्ताद के पैरो में रख दिया। अपना सिर उस्ताद के पैरो की धूल माथे लगा कर मिट्टी से सना लिया।

“उस्ताद, एक बात पूछनी थी। “

“पूछ।”

“मुझे सिर्फ एक ही दांव आता है। फिर भी मै कैसे जीता?”

“तू दो दांव सीख चुका था। इस लिए जीत गया।”

“कौनसे दो दांव उस्ताद?”

पहली बात, तू ये दांव इतनी अच्छी तरह से सीख चुका था के उसमे गलती होने की गुंजाइश ही नहीं थी। तुझे नींद में भी लड़ाता तब भी तू इस दांव में गलती नहीं करता। तुझे ये दांव आता है ये बात तेरा प्रतिद्वंदी जान चुका था, पर तुझे सिर्फ यही दांव आता है ये बात थोड़ी उसे मालूम थी?”

“और दूसरी बात क्या थी उस्ताद? “

“दूसरी बात ज्यादा महत्व रखती है। हरेक दांव का एक प्रतीदांव होता है! ऐसा कोई दाव नहीं है जिसका तोड़ ना हो। वैसे ही इस दांव का भी एक तोड़ था।”

“तो क्या मेरे प्रतिस्पर्धी को वो दांव मालूम नहीं होगा?”

” वो उसे मालूम था। पर वो कुछ नहीं कर सका। जानते हो क्यू?… क्यूंकि उस तोड़ में दांव देने वाले का बाया हाथ पकड़ना पड़ता है!”

अब आपके समझ में आया होगा कि एक बिना हाथ का साधारण सा लड़का विजेता कैसे बना?

जिस बात को हम अपनी कमजोरी समझते है, उसी को जो हमारी शक्ति बना कर जीना सिखाता है, विजयी बनाता है, वो ही सच्चा उस्ताद है।

अंदर से हम कहीं ना कहीं कमजोर होते है, दिव्यांग होते है। उस कमजोरी को मात दे कर जीने की कला सिखाने वाला गुरु हमे चाहिए।

अरुण शुक्ला

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#Nathu_La_Tiger!!!

रेवाड़ी का एक गाँव है #कोसली इस 25-30 हज़ार की आबादी के इलाके को आप #जांबाज़ों_की_नगरी भी बुला सकते हैं….. अब एक गांव जिसने अशोक चक्र, महावीर चक्र, IOM सहित ढेरों वीरता पुरस्कार जीत रखे हों उसे ये नाम देना अनुचित भी नहीं……

इसी गांव के एक बुजुर्ग रिटायर्ड फौजी की मृत्यु
23 मार्च 2017 को हो गयी अब हिंदुस्तानियों की रीत है अपने योद्धाओं को भुलाने की तो कहीं उनको भी न अखबारों ने याद किया न TV वालों ने न सरकारों को सुध आयी….
जिस चीन की पिद्दी सी हरकत पर हमारे पत्रकार न्यूज़ चैनल पर बवाल काटते हैं उनपर ये 92 साल का बुजुर्ग सैनिक मुस्कुरा के सीना चौड़ा कर कह देता था “रहपटा भी न झेला जा है चीनिया तै”
ये कहना मजाक नहीं होता था….. उनके इतिहास की गर्वोक्ति थी ये….

ये रिटायर्ड फौजी थे महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर राव साहब #राय_सिंह_यादव कोसली का ये शेर वीरों की जमात में Nathu La Tiger के उपनाम से जाना जाता था….
2nd ग्रेनेडियर्स का पूर्व कमांडिंग ऑफीसर
जिसने अपनी बटालियन के साथ 1967 मैं चीनियों को वो सबक सिखाया था के चीन के राष्ट्राध्यक्ष को एकतरफा घोषणा करनी पड़ी थी किसी भी स्थिति में चीनी सेना भारतीय सैनिकों पर गोली न चलायें…..

ब्रिगेडियर राय सिंह (तब लेफ्टिनेंट कर्नल) और उनकी बटालियन ने चीनियों की हाथापाई का उत्तर उन्ह पहले ढंग से लतिया कूट के दिया और जब गोलियां चलीं तो चीनियों को अपने सैनिकों की पौने चार सौ से ज्यादा लाशें उठाने को भारत के आगे घुटनों पर आना पड़ा…
इस युद्ध में सर और छाती पर गंभीर घाव लगने के बाद भी लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह मैदान से नहीं हटे और लगातार अपने जवानों को निर्देश देते रहे….. बेहद सीमित हथियारों के साथ उन्होंने चीनियों को वो सबक सिखाया जो वो न आज तक भूले न भूलेंगे……

इस युद्ध में 2nd ग्रेनेडियर्स और 18 राजपूत के कुल 88 जवानों ने अपने प्राण राष्ट्र के लिए आहूत किये जिनमें मेजर हरभजन सिंह (MVC)भी थे…..
तो जब तक भारतीय सेना के मेजर शैतान सिंह भाटी, मेजर धन सिंह थापा, ब्रिगेडियर राय सिंह यादव, मेजर हरभजन सिंह चीनियों को याद हैं निश्चित रहिये….. उनमें गोली चलाने का दम नहीं!
बाद में इस पूरे घटनाक्रम पर एक फ़िल्म भी बनी पलटन नाम से……. देख सकते हैं अपने योद्धाओं पर गर्व करने को…..!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक थे सेठ गंगाराम …..

विभाजन पूर्व देश के बहुत बड़े धन्नासेठ थे गंगाराम। मूलतः वह एक सिविल इंजीनियर व आर्किटेक्ट थे।वो इतने बड़े धन्नासेठ थे कि लाहौर का हाईकोर्ट, लाहौर का सबसे बड़ा अस्पताल, लाहौर का आर्ट्स कॉलेज, लाहौर का म्यूजियम, लाहौर का सबसे बड़ा कॉलेज एचिसन कॉलेज और केवल लाहौर नहीं बल्कि पाकिस्तान में मानसिक रोगियों का सबसे बड़ा अस्पताल फाउंटेन हॉउस भी धन्नासेठ गंगाराम ने अपने धन से ही बनवाया था। उनके द्वारा बनवाए गए उपरोक्त संस्थानों का भरपूर लाभ लाहौर समेत पाकिस्तान वाले पंजाब अर्थात आधे से अधिक पाकिस्तान के नागरिक आज भी ले रहे हैं। गंगाराम तो बिचारे 1926 में ही मर गए थे। लेकिन 1947 में जब भारत विभाजित हुआ तो लाहौर के शांतिप्रिय सेक्युलर समाज ने गंगाराम को उनकी मौत के 21 बरस बाद भी बख्शा नहीं। पाकिस्तान बनते ही सेक्युलर समाज की भीड़ ने लाहौर के मॉल रोड पर लगी हुई गंगाराम की मूर्ति को घेर कर उस पर अंधाधुंध लाठियां बरसाते हुए मूर्ति को बुरी तरह क्षत विक्षत कर दिया। लेकिन उस भीड़ की गंगा जमुनी तहजीब और सेक्युलरिज्म की आग फिर भी ठंढी नहीं हुई तो उसने गंगाराम की मूर्ति पर जमकर कालिख पोती और मूर्ति को फ़टे पुराने जूतों की माला पहना कर अपने सेक्युलरिज्म की आग को भीड़ ने ठंढा किया।

1947 के धार्मिक दंगों के दौरान घटी उपरोक्त घटना का जिक्र उर्दू के मशहूर साहित्यकार सआदत हसन मंटो ने अपनी बहुचर्चित लघुकथा “गारलैंड” में कुछ इस तरह किया है… “हुजूम ने रुख़ बदला और सर गंगाराम के बुत पर पिल पड़ा। लाठीयां बरसाई गईं, ईंटें और पत्थर फेंके गए। एक ने मुँह पर तारकोल मल दिया। दूसरे ने बहुत से पुराने जूते जमा किए और उन का हार बना कर बुत के गले में डाल दिया। तब तक वहां पुलिस आ गई और गोलियां चलना शुरू हुईं। बुत को जूतों का हार पहनाने वाला जखम हो गया। चुनांचे मरहम पट्टी के लिए उसे सर गंगाराम हस्पताल भेज दिया गया।”

केवल गंगाराम ही नहीं, लाहौर में अपनी पत्नी के नाम से पाकिस्तान का सबसे बड़ा चेस्ट हॉस्पिटल, गुलाब देवी चेस्ट हॉस्पिटल बनवाने वाले लाला लाजपत राय की मूर्ति के साथ भी यही व्यवहार किया गया और उसे उखाड़ कर फेंक दिया गया। हालांकि लाला जी की मृत्यु 19 साल पहले 1926 में ही हो चुकी थी।
तथाकथित “गंगा जमुनी” तहजीब और सेक्युलरिज्म का डांस करने वाले मीडिया का कोई सेक्युलर डांसर क्योंकि आपको धन्नासेठ गंगाराम औऱ लाला लाजपत राय जी की उपरोक्त कहानी कभी नहीं सुनाएगा बताएगा। इसलिए आवश्यक है कि इस कहानी को हम आप जन जन तक पहुंचाएं और उन्हें बताएं कि अपनी “गंगा जमुनी” तहजीब और “सेक्युलरिज्म” की भयानक आग से बंगाल को जलाकर राख करने पर उतारू शांतिप्रिय सेक्युलर नागरिक कितने अहसानफरामोश कितने कमीने, कितने कृतघ्न और कितने जहरीले होते हैं। इसका एहसास सिर्फ कश्मीर से मारे गए हिंदू ही कर पा रहे हैं बाकी लोग तो मस्त सो रहे हैं

अंत में यह उल्लेख अवश्य कर दूं कि #दिल्ली_स्थित_सर_गंगाराम_हॉस्पिटल भी लाहौर के उन्हीं धन्नासेठ गंगाराम ने ही बनवाया था।
सच को पहचाने समझे और एहसास करें कि आप हजारों साल गुलाम क्यों रहे?
*गंगा जमुनी तहजीब आपको निभानी है, वह भाई हैं और आप उनका चारा है वह उनकी इच्छा है कि वह उसे कब खाते हैं*